कभी पूर्वी पाकिस्तान रहे बांग्लादेश से भारत में घुसपैठ एक ऐसी समस्या है जो एक लाइलाज बीमारी की तरह लगभग 50 वर्षों ज्यों की त्यों बनी हुई है। इस घुसपैठ की वजह से न सिर्फ कई प्रदेशों में जनसंख्या का भारी असंतुलन हुआ है बल्कि तमाम जगहों पर अपराध और आतंकवाद ने खूब फला-फूला। घुसपैठ की इसी दीर्घकालिक समस्या पर ऑपइंडिया ने ज़मीनी पड़ताल की। हमें पता चला कि बांग्लादेशी घुसपैठ भले ही अपने मूल देश में एक दूसरे के इतने शुभचिंतक न हों, पर भारत में आते ही वो एक संगठित गिरोह के तौर पर काम करने लगते हैं। इस घुसपैठ को विदेशी मदद भी मिलने के प्रमाण सामने आए हैं।
ऑपइंडिया ने सुरक्षा एजेंसियों में अपने सूत्रों से घुसपैठ पर लम्बे समय तक चर्चा की। उन्होंने बताया कि बांग्लादेशी अपना मुल्क छोड़ कर किसी भी देश में अवैध तौर पर घुसने के लिए बदनाम हैं। हमें बताया गया कि यूरोप और अमेरिका में भी हजारों की तादाद में बांग्लादेशी घुसपैठिए हैं लेकिन सीमाओं से सटा होने की वजह से उन्हें सबसे मुफीद भारत ही लगता है। चीन, म्यांमार, रूस और जैसे देश भी पड़ोस में हैं लेकिन वहाँ किसी प्रकार का राजनैतिक और मज़हबी समर्थन न मिलने की वजह से ये बांग्लादेशी खुद को सुरक्षित नहीं महसूस करते।
पढ़ाई, दवाई और कमाई का बहाना
घुसपैठ पर हमारे द्वारा जुटाई गई जानकारी के मुताबिक, बांग्लादेशी मुस्लिम भारत में घुसने के बाद पढ़ाई, दवाई और कमाई जैसे चेहरों को सबसे आगे रखते हैं। ये तीनों ऐसे विषय हैं जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संवेदना से जुड़े माने जाते हैं। छात्र, गरीब और मरीज के नाम पर घुसपैठ की कोशिशों में अगर वो पकड़े भी जाते हैं जो उन्हें विक्टिम कार्ड खेलने में आसानी होती है। इसी वजह से इन पर कोई तंत्र बेहद कड़ा एक्शन नहीं ले पाता क्योंकि तब तक मानवाधिकार के नाम पर बने तमाम संगठन इनके समर्थन में कूद जाते हैं।
अधिकतर का टारगेट भारतीय पासपोर्ट
सुरक्षा एजेंसियों द्वारा गिरफ्तार किए गए अधिकतर बांग्लादेशी फर्जी भारतीय पहचान पत्रों के साथ पकड़े गए हैं। इनके द्वारा पैन और आधार कार्ड के अलावा तमाम अन्य भारतीय पहचान पत्र बेहद सधे ढंग से बनवाए जाते हैं। इसकी मूल वजह घुसपैठियों का भारतीय पासपोर्ट हासिल करने का प्रयास होता है। हमें बताया गया कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय पासपोर्ट कई ऐसे देशों में भी सम्मानीय और मान्य है जहाँ बांग्लादेशियों की इंट्री बैन है। इस तरफ से घर के कुछ सदस्य विदेशों में बस कर पैसे भेजते रहते हैं। हालाँकि उनका परिवार भारत में ही बसा रहता है।
देवबंद से तमिलनाडु, आपस में सब कनेक्टेड
अपने मूल देश में रहने के दौरान भले ही बांग्लादेशी घुसपैठियों की आपस में कोई जान-पहचान न हो पर भारत में इंट्री करते ही उनमे से अधिकतर एक दूसरे से कनेक्टेड हो जाते हैं। तब छात्र मेडिकल वाले से और कमाई वाला कथित गरीब व्यापर वाले से घुल-मिल जाते हैं। ये कनेक्शन सिर्फ आसपास का ही नहीं रहता बल्कि इनके तार विदेशों से भी जुड़ जाते हैं। इसको बेहतर ढंग से UP ATS द्वारा मार्च 2024 में दबोचे गए कफीलुद्दीन के घटनाक्रम से समझा जा सकता है।
उत्तर प्रदेश के आतंकवाद निरोधक दस्ते (ATS) ने मार्च 2024 में कफीलुद्दीन नामक घुसपैठिए को तमिलनाडु के वेल्लोर शहर से पकड़ा था। लम्बे समय से भारत में अवैध तौर पर रह रहा कफीलुद्दीन अपने तमाम भारतीय पहचान पत्र बनवा चुका था। कफीलुद्दीन दशकों पहले इलाज के नाम पर भारत में घुसा था। हिंदी भाषी राज्यों को पार कर के उसने अपना छोटा-मोटा इलाज वेल्लोर के CMC अस्पताल में करवाया था। बेहद कम समय में ठीक हो कर कफीलुद्दीन वापस बांग्लादेश नहीं लौटा।
बताया जा रहा है कि कफीलुद्दीन उसी अस्पताल में लोगों को भर्ती करवाने के नाम पर दलाली का काम करने लगा था जहाँ खुद उसका इलाज हुआ था। इसी जगह पर रह कर उसने CMC कॉलेज में कई अन्य घुसपैठियों का भी इलाज करवाया। लेकिन इन सबमें सबसे खास बात ये निकली कि कफीलुद्दीन वेल्लोर से लगभग 2400 किलोमीटर दूर देवबंद में दारुल उलूम के आगे इस्लामी टोपी बेचने वाले नजीबुल से कनेक्टेड था। कफीलुद्दीन और नजीबुल ढाई हजार किलोमीटर दूर रहने के बावजूद मिल कर एक टीम की तरह काम कर रहे थे।
ATS ने अपनी जाँच में पाया था कि कफीलुद्दीन ने नजीबुल के साथ मिल कर कई बांग्लादेशी घुसपैठियों को भारत के अलग-अलग शहरों में भी शिफ्ट करवाया था। इन घुसपैठियों में से कथित छात्र, मरीज और गरीब सब शामिल थे। इसकी एवज में कफीलुद्दीन को काफी पैसे भी मिले थे। इन सभी का वो रैकेट भी ध्वस्त हुआ था जिस से ये पैन कार्ड से ले कर पासपोर्ट भी जाली पहचान पत्र पर बना दिया करते थे।
घुसपैठ में मदद के लिए विदेशी आतंकी संस्थाएँ भी तैयार
बांग्लादेशी मुस्लिमों की भारत में घुसपैठ कितनी बड़ी साजिश हो सकती है इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसके लिए विदेश में बैठे आतंकी संगठन भी पैसे देने के लिए तैयार हैं। जनवरी 2024 में UP ATS ने पश्चिम बंगाल में मदरसा चलाने वाले अबू सालेह को गिरफ्तार किया था। अबू सालेह का मदरसा दारुल उलूम से संबद्ध था। इस मदरसे में ब्रिटेन की उस उम्माह वेलफेयर ट्रस्ट से करोड़ों रुपए भेजे गए थे जिसे अमेरिका ने आतंकी समूह की लिस्ट में डाला था।
अबू सालेह के मदरसे से नजीबुल पढ़ कर निकला था जो पश्चिम बंगाल से सीधे देवबंद में शिफ्ट होता है। यहाँ वो दारुल उलूम के सामने सेंट और टोपी की दुकान खोल लेता है। इसी दुकान की आड़ में नजीबुल शेख हवाला का कारोबार करता है। इस काले कारोबार से मिले पैसे से नजीबुल बांग्लादेश के घुसपैठियों को भारत में शिफ्ट कर रहा था। उसने तमाम बांग्लादेशियों के पासपोर्ट और अन्य भारतीय पहचान पत्र बनवाए थे।
मदद के बदले आतंकवाद की माँग
विदेशी ताकतों के इशारे और मदद से बसाए गए बांग्लादेशी घुसपैठियों को कई बार भारत के खिलाफ आतंकी या आपराधिक घटनाओं में प्रयोग किया जाता है। मदद के बदले उनको अपनी सुविधा और इच्छा के अनुसार प्रयोग में लाया जाता है। कुछ घुसपैठी पहले से ही बांग्लादेशी गिरोहों के कनेक्शन में रह कर एक सोच के साथ भारत में आते हैं। यहाँ वो बांग्लादेश में सक्रिय आतंकी संगठनों की जड़ें भारत में जमाने का प्रयास करते रहते हैं। आपराधिक घटनाओं को अंजाम देने के बाद कई बार इनको बॉर्डर पार करवा दिया जाता है जिस से एजेंसियों को गिरफ्तारी में दिक्कत आती है।


