दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने आईएसआईएस के तीन आतंकियों को गिरफ्तार किया था। ये दिल्ली-एनसीआर और यूपी में आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देने की योजना बना रहे थे। जफर अली भी इसी आतंकी मॉड्यूल से जुड़ा है।
डॉक्टर के मुताबिक उन लोगों ने इस बीच उनकी 3 वीडियो बनाई और बाद में उन्हें नारोल ड्रॉप कर दिया। जिसके बाद वे शिकायत करने थाने पहुँचे और आपबीती पुलिस को बताई।
पीरजादा वांकानेर से और जोशी जूनागढ़ से विधायक हैं। 2008 में 1500 लोगों की भीड़ की अगुवाई करते हुए उसे हिंसा के लिए उकसाया था। इस मामले में जिन लोगों को सजा सुनाई गई है, उनमें कॉन्ग्रेस के एक पूर्व विधायक और अन्य नेता भी हैं।
नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में शाह-ए-आलम इलाक़े में हुई हिंसा के दौरान 26 पुलिसकर्मी घायल हो गए थे। पठान ने अपने फेसबुक अकाउंट पर एक फ़र्ज़ी वीडियो पोस्ट कर भ्रामक खबर फैलाई थी।
“मैंने 2007 में पाकिस्तान छोड़ दिया था। यह एक इस्लामिक गणराज्य है। वहाँ मंदिरों को तोड़ दिया जाता है। हिंदू लड़कियों और महिलाओं को अगवा किया जाता है और उन पर अत्याचार किया जाता है। यहाँ तक कि वहाँ की पढ़ाई भी इस्लामिक है।”
अहमदाबाद के शाह-ए-आलम इलाक़े में मुस्लिम भीड़ द्वारा नागरिकता क़ानून के विरोध में हिंसा की गई। पुलिसकर्मियों पर जानलेवा हमला किया गया। इन आरोपों में अहमदाबाद पुलिस ने कॉन्ग्रेस कॉरपोरेटर शहज़ाद खान पठान समेत 49 दंगाईयों को हिरासत में लिया है।
"बड़ी संख्या में भीड़ दरगाह में इकट्ठी हुई और फिर बाद में भीड़ ने पुलिसकर्मियों पर भारी मात्रा में पथराव करना शुरू कर दिया। इंस्पेक्टर जेएम सोलंकी भी घायल हो गए। दरगाह में नमाज के बाद दो से तीन हजार उपद्रवियों की भीड़ सड़क पर आई और..."
देशव्यापी विरोधों के चलते, देश के कई हिस्सों में प्रशासन की तरफ़ से धारा-144 लागू की गई। लेकिन, विपक्षी नेताओं के उकसाने पर लोगों ने क़ानून का उल्लंघन किया और क़ानून को हाथों में लेते हुए 'शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन' की आड़ में पुलिस पर हमला भी किया।
हसीना बेन मूलरूप से भारत की ही रहने वाली थीं, लेकिन 1999 में निक़ाह हो जाने के बाद वो पाकिस्तान चली गईं थी। पाकिस्तान में उनके शौहर की मृत्यु हो जाने पर उन्होंने भारत वापस आने का फ़ैसला किया। दो साल पहले ही उन्होंने भारत की नागरिकता के लिए आवेदन किया था, जिसे...
नानावती-मेहता आयोग की फाइनल रिपोर्ट में 59 कारसेवकों को जलाए जाने के बाद राज्य में भड़की हिंसा को सुनियोजित हिंसा नहीं माना गया। आयोग ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली तत्कालीन गुजरात सरकार को अपनी रिपोर्ट में क्लीन चिट दी है।