एक तरफ योगेंद्र यादव 'बाबासाहब के सपनों' की बात करते हुए जाति मिटाने की भी बात करते हैं, दूसरी तरफ ये भी चाहते हैं कि हर कोई अपनी जातिगत पहचान आगे करे। दोनों चीजें एक साथ कैसे हो सकती हैं?
न्यायमूर्ति अनीता सुमंत ने कहा था कि जातियों में समस्या है लेकिन यह व्यवस्था एक सदी से भी कम पुरानी है और इसका दोष पुरातन वर्ण व्यवस्था पर नहीं मढ़ा जा सकता।"
"सबसे बड़ी आबादी वाले हिन्दू अब आगे बढ़ कर अपने सारे हक़ ले लें क्या? हिन्दुओं को बाँट कर कॉन्ग्रेस इस देश को तबाह करना चाहती है। गरीबों को बाँटना चाहती है।"
जाति आधारित जनगणना के पीछे राजनीतिक मंशा क्या? क्या कहते हैं आँकड़े? एक गरीब और पिछड़े राज्य में जातियाँ गिनने में फूँके सैकड़ों करोड़ रुपए, लगा दी मशीनरी।