वास्तविकता ये है कि आप इतने दिनों से एक ऐसी भीड़ के जमावड़े को किसान का आंदोलन कहते रहे। जिसकी परिभाषा वामपंथी मीडिया गिरोह और विपक्षियों ने गढ़ी और जिसका पूरा ड्राफ्ट एक साल पहले हुए शाहीन बाग मॉडल के आधार पर तैयार हुआ।
कैपिटल हिल वाले अगर दंगाई थे तो दिल्ली के उपद्रवी संत कैसे हुए? ट्रम्प की आलोचना हो रही थी तो राहुल-प्रियंका की निंदा क्यों नहीं? ये दोहरा रवैया अपनाने वाले आज भी फेक न्यूज़ फैलाने में लगे हैं।