अंग्रेजों ने बनाए कुछ मुस्लिम नेता, जिन्होंने 'काफिर राजा' के विरुद्ध कुरान का हवाला देकर मुस्लिमों को भड़काया। फिर संगठित ढंग से हिन्दुओं का नरसंहार हुआ और उनकी दुकानें-घर लूट लिए गए। अंततः 'बुद्धिजीवियों' ने इस इस्लामी दंगे को 'सामंती राजा के खिलाफ जनता का विद्रोह' बता कर दंगाइयों को श्रद्धांजलि देनी शुरू कर दी।
सड़क पर नमाज जायज, 5 बार माइक से अजान सुकून देता है, लेकिन वेदों की धरती पर वैदिक रीति-रिवाज से लिबरल गिरोह को दिक्क्त। खुद सम्राट अशोक ने इसे 'धर्म स्तंभ' कहा था, ऐसे में धर्म के अनुसार कार्य न हों तो क्या अरब के हिसाब से हों?