सन 1989-90 के दौरान कश्मीरी पंडितों को घाटी से पलायन करने पर मजबूर करने के लिए की गयी यह पहली हत्या थी। पंडितों के सर्वमान्य नेता पं० टपलू को मार कर अलगाववादियों ने स्पष्ट संकेत दे दिया था कि अब कश्मीर घाटी में ‘निज़ाम-ए-मुस्तफ़ा’ ही चलेगा।
पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने पाकिस्तान के एक वरिष्ठ पत्रकार को दिए इंटरव्यू में आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद को लेकर सनसनीखेज खुलासा किया है।
उमा भारती ने कहा कि कॉन्ग्रेस पार्टी को शर्म आनी चाहिए क्योंकि इन्होने 1984 एवं 1991 में लोकसभा चुनाव में इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी की शहादत को राजनीतिक रूप से भुनाने की कोशिश की थी।
आतंकवादियों को हिरासत में लेने की ये पहली घटना नहीं है। पाकिस्तान पहले भी अन्तरराष्ट्रीय दबाव के चलते इस प्रकार के नाटक कर चुका है। यह पाकिस्तान द्वारा दुनिया की आँखों में धूल झोंकने का पुराना पेशा बन चुका है।
गिरफ़्तार डॉक्टर पर आतंकवादियों को वित्तीय मदद देने में शामिल होने का संदेह है। उसके सुरक्षा बलों को धोखे से भोजन और पानी में ज़हर देने की साज़िश में शामिल होने की भी बात सामने आई है।
कश्मीर में अलगाववाद को बल मिलता है पैन-इस्लामिज़म से, जो खिलाफत आंदोलन के या उससे भी पूर्व के उस विचार से प्रभावित है, जिसमें दुनिया के सभी मुस्लिमों को राष्ट्रीय सीमाओं से परे एक झंडे के नीचे खड़े होने को अपना आदर्श मानता है।
हाल ही में आई रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि पाकिस्तान सरकार की तरफ से हाफिज सईद के संगठनों पर बैन नहीं लगाया गया है, बल्कि सिर्फ निगरानी रखने की बात कही गई है।
साल 2014-17 के बीच पकड़े गए जैश-ए-मुहम्मद के आतंकियों में से 4 आतंकियों को प्रशिक्षण बालाकोट के उसी कैंप में मिला है जहाँ पर वायु सेना द्वारा हाल ही में हमला किया गया।
अच्छे लोग जैश-ए-मोहम्मद को पनाह देने वाले इमरान खान में statesmanship देख लेते हैं। 100 लोगों का पोस्ट पढ़कर उन्हें पूरा हिन्दुस्तान खून का प्यासा दिखने लगता है और पाकिस्तान के 2 पोस्ट पढ़कर शान्ति की जन्मभूमि। अच्छे लोग...
जमात ए इस्लामी (जम्मू कश्मीर) के नाम से 1942 में शोपियाँ में मौलवी गुलाम अहमद अहर ने स्थापित किया था जिस पर प्रतिबंध लगाया गया है। जमात ए इस्लामी (जम्मू कश्मीर) आरंभ से ही अलगाववादी संगठन रहा है जिस पर पहले भी (1990) में प्रतिबंध लग चुका है।