जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि ग्राम सभाओं को ये अधिकार है कि वे अपनी संस्कृति और परंपरा की रक्षा के लिए कदम उठा सकती है। कोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के आदेश में दखल देने से मना कर दिया, जिसमें लालच और धोखाधड़ी से किए गए धर्मांतरण का सामाजिक सद्भाव और जनजातीय सांस्कृतिक पहचान पर क्या असर पड़ता है, इसके बारे में विस्तार से बताया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के उस अवलोकन को सही करार दिया है, जिसमें ‘लालच और धोखाधड़ी’ के द्वारा धर्म परिवर्तन कराए जाने को रोकने के लिए होडिंग लगाने को असंवैधानिक नहीं माना था।
The plea states that the High Court order reads like a “lecture” and ignores reports of attacks and village bans on Christians.
— Bar and Bench (@barandbench) February 16, 2026
सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि ये मामला सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। इसमें किसी भी धर्म को मानने की आजादी के उल्लंघन जैसी बात नहीं है। स्थानीय ग्राम सभाएँ PESA एक्ट 1996 के तहत अपनी परंपराओं को बचाने के लिए बाहरी व्यक्तियों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि अगर जनजातीय लोगों की परंपरा और संस्कृति की रक्षा के लिए ‘बाहरी हस्तक्षेप’ को रोकना और नियंत्रित करना जरूरी है, तो ऐसा किया जा सकता है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि एंट्री पर रोक ईसाइयों के साथ भेदभाव है और ये संविधान 25 का उल्लंघन है। छत्तीसगढ़ सरकार और ग्राम सभा की ओर से कहा गया था कि होडिंग्स केवल उन पादरियों की एंट्री रोकने के लिए है, जो बहला फुसलाकर या जबरन गाँववालों का धर्मांतरण करा रहे हैं।
Court: please see the writ petition before the high court and the relief claimed. You have been asked to go the gram Sabha.
— Bar and Bench (@barandbench) February 16, 2026
Gonsalves: the high court has given a long statement about how Christians are doing this and that without any material. You can’t stop me from doing my…
क्या है मामला
यह मामला कांकेर जिले के आठ जनजातीय लोगों के गाँव में ग्राम सभाओं द्वारा पास किए गए प्रस्तावों से जुड़ा है। ये गाँव हैं-कुडल, परवी, जुनवानी, घोटा, घोटिया, हबेचुर, मुसुरपुट्टा और सुलागी। गाँववालों ने होर्डिंग्स लगा कर कहा था कि PESA एक्ट 1996 के तहत पादरियों और ‘बाहरी लोगों’ की एंट्री पर बैन है।
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में दिगबल टांडी ने एक रिट पिटीशन फाइल की थी, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि होर्डिंग्स लगा कर पादरियों और धर्मपरिवर्तन करने वाले स्थानीय जनजातीय लोगों को गाँवों में आने से असल में रोका जा रहा है। उन्होंने दावा किया कि इससे संविधान के आर्टिकल 14, 19(1)(d) और 25 का उल्लंघन होता है। याचिकाकर्ता ने यह भी दावा किया कि ईसाई आदिवासियों को दफनाने के अधिकार से वंचित किया जा रहा है। उनका सामाजिक बहिष्कार किया जा रहा है और उन्हें जबरदस्ती भगाया जा रहा है, जिससे सांप्रदायिक तनाव पैदा हो रहा है।
हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की बेंच ने अपने फैसले में होर्डिंग्स लगाने से ग्रामसभा को रोकने से इनकार कर दिया। हाई कोर्ट ने कहा कि गैर-कानूनी या जबरदस्ती धर्म बदलने के खिलाफ चेतावनी देने वाले बैनर लगाना अपने आप में गैर-संवैधानिक नहीं कहा जा सकता।
हाई कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि धर्म बदलना भारत के सामाजिक-राजनीतिक माहौल में लंबे समय से एक सेंसिटिव मुद्दा रहा है। हालांकि संविधान धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने की आज़ादी की गारंटी देता है, लेकिन कोर्ट ने चेतावनी दी कि जबरदस्ती, लालच या धोखे से इस आज़ादी का गलत इस्तेमाल करना बहुत चिंता की बात है।
हाई कोर्ट ने कहा कि भारत में मिशनरी एक्टिविटी ओपनिवेशिक काल से चली आ रही है, जो शुरू में सामाजिक सुधार, पढ़ाई-लिखाई और हेल्थकेयर पर फोकस होती थी। समय के साथ, कुछ मिशनरी ग्रुप्स ने ऐसे प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े तबकों, खासकर अनुसूचित जनजातियों और अनुसूचित जातियों के बीच धर्म बदलने के लिए करना शुरू कर दिया।
हाई कोर्ट के मुताबिक, जब धर्म बदलना निजी आस्था का मामला नहीं रह जाता और लालच या कमज़ोरी का फायदा उठाने का नतीजा बन जाता है, तो यह जबरदस्ती नया कल्चर पैदा करता है। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की कृत्यों से जनजातीय समुदायों में ध्रुवीकरण, सामाजिक बहिष्कार और कभी-कभी हिंसक झड़पें हुई हैं।
हाई कोर्ट ने साफ किया कि आर्टिकल 25 खुद में पूरा अधिकार नहीं है, यह नैतिकता और दूसरे मामलों के अधीन है। इसका मतलब यह है कि लालच देकर धर्म बदलना सिर्फ धार्मिक चिंता नहीं है, बल्कि एक सामाजिक खतरा है।
हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता के भेदभाव के आरोपों को खारिज कर दिया और कहा कि उसे ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे पता चले कि सर्कुलर या होर्डिंग्स ईसाइयों के खिलाफ भेदभाव को बढ़ाता है। उसने कहा कि होर्डिंग्स सिर्फ कुछ पादरियों की एंट्री पर रोक से जुड़ा है, जो धर्म बदलने के लिए कार्यक्रम आयोजित करना चाहते हैं।
हाई कोर्ट ने यह भी बताया कि याचिकाकर्ता ने कोर्ट आने से पहले दूसरे कानूनी उपायों का इस्तेमाल नहीं किया था और उसे पहले संबंधित ग्राम सभाओं के सामने समाधान की माँग करनी चाहिए थी।


