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खामेनेई की मौत पर कॉन्ग्रेसियों और वामपंथियों का रुदन, लाखों ईरानियों की हत्याओं पर साध रखी थी चुप्पी: समझें- कैसे सरकार दे रही भारत के हितों को प्राथमिकता

मोदी सरकार ने राष्ट्रीय हित और भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी है। खामेनेई की मौत के बाद कॉन्ग्रेसियों-वामपंथियों का यह दोहरा मापदंड साफ दिखाता है कि इनका रुदन राजनीतिक है, न कि मानवाधिकार का।

अमेरिका-इजरायल के संयुक्त हमलों में 28 फरवरी 2026 को ईरान के सुप्रीम लीडर अयातोल्लाह अली खामेनेई की हत्या हो गई। ईरानी राज्य मीडिया ने इसकी पुष्टि की और 40 दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे ‘इतिहास के सबसे बुरे लोगों में से एक’ की मौत बताया।

दुनिया भर में प्रतिक्रियाएँ आईं। कई लोकतांत्रिक देशों ने चुप्पी साध ली या संयम की अपील की। लेकिन भारत में कॉन्ग्रेस और वामपंथी दलों (सीपीआई, सीपीएम आदि) ने खामेनेई की मौत पर जो रुदन शुरू किया, वह न केवल आश्चर्यजनक है बल्कि भारत की स्वतंत्र विदेश नीति पर कब्जा करने की जिद को भी उजागर करता है।

कॉन्ग्रेसी-वामपंथी इकोसिस्टम खुद को विदेश नीति का ‘मालिक’ समझ रहा है और पीएम नरेंद्र मोदी को ‘चुप्पी’, ‘कायरता’ और ‘मूल्यों की धोखाधड़ी’ का आरोप लगाकर सोशल मीडिया पर घसीट रहा है।

इस लेख में हम विस्तार से देखेंगे कि खामेनेई के 37 साल के शासन में अलग-अलग प्रदर्शनों में कितने निर्दोष मारे गए, कॉन्ग्रेस-वामपंथी कैसे दोहरे मापदंड अपनाते हैं और मोदी सरकार की व्यावहारिक विदेश नीति को क्यों निशाना बना रहे हैं।

सबसे पहले कॉन्ग्रेस और वामपंथियों की प्रतिक्रिया देखें।

कॉन्ग्रेस ने ईरान के सर्वोच्च नेता अली ख़ामेनेई की हत्या की कड़े शब्दों में निंदा की है और इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का गंभीर उल्लंघन बताया है। पार्टी ने इस घटना को क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए एक बड़ा खतरा करार दिया है। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने बयान जारी कर ‘टारगेटेड मर्डर’ की निंदा की, इसे ‘युद्ध की घोषणा के बिना संप्रभुता का उल्लंघन’ बताया और खामेनेई के परिवार, ईरानी जनता तथा शिया समुदाय को संवेदना व्यक्त की।

प्रियंका गाँधी वाड्रा ने इसे ‘Despicable’ (घृणित) करार दिया और कहा कि ‘तथाकथित लोकतांत्रिक दुनिया के नेता’ ने एक संप्रभु देश के नेता की हत्या की। उन्होंने पीएम मोदी पर ‘इजरायल और अमेरिका के सामने घुटने टेकने’ का आरोप लगाया।

कॉन्ग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया पर वीडियो पोस्ट कर लिखा- “भारत और ईरान की दोस्ती इतिहास जितनी पुरानी है, फिर भी मोदी खामेनेई की हत्या पर एक शब्द नहीं बोल रहे। यह भारत-ईरान संबंधों का ऐतिहासिक धोखा और मोदी की नैतिक कायरता है।”

एक अन्य ट्वीट में खेड़ा ने लिखा, “अयातुल्ला खामेनेई और दूसरे ईरानी नेताओं की सुनियोजित हत्या पर मोदी सरकार की चुप्पी दिखाती है कि इसने नैतिक नेतृत्व का सर्वथा त्याग कर दिया है और इस कृत्य के लिए अमेरिका और इज़राइल की आलोचना करने से घबरा रही है। यह भारत के उन मूल्यों के प्रति विश्वासघात है, जिनके पक्ष में वह हमेशा खड़ा रहा है। इतिहास में भारत कभी इतना कमज़ोर नहीं दिखा था।”

वामपंथी दलों ने भी इसी तर्ज पर ईरान के साथ ‘एकजुटता’ जताई और अमेरिका-इजरायल को ‘आक्रांता’ बताया। कुछ वामपंथी कार्यकर्ता सोशल मीडिया पर ‘मोदी अमेरिका का पिट्ठू’ जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं।

इस्लामी कट्टरपंथियों और वामपंथियों प्रोपेगेंडा फैलाने वाली बदनाम अरफा खानुम शेरवानी ने तो यहाँ तक पूछ लिया कि खामेनेई की हत्या पर भारत का क्या रुख है? उसने खामेनेई की हत्या को लेकर पीएम मोदी को निशाना बनाने की कोशिश की। उसने लिखा कि पीएम मोदी कम से कम संवेदना ही जाहिर कर देते।

ये लोग खुद को विदेश नीति का ‘निर्णायक’ मानते हैं। भारत की परंपरागत विदेश नीति ‘अपनी सबसे दोस्ती, नहीं किसी से बैर’ रही है, लेकिन कॉन्ग्रेस-वामपंथी इसे ‘ईरान-रूस-चीन के साथ अंधी दोस्ती’ समझते हैं।

इस मामले में सार्वजनिक तौर पर मोदी सरकार ने संयम की अपील की है। यूएई पर ईरानी हमलों की निंदा की और भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित की और कश्मीर से लेकर चाबहार पोर्ट तक रणनीतिक हितों को प्राथमिकता दी।

वैसे, कोई जी-7 ‘लोकताँत्रिक’ देशों ने भी तो ने खामेनेई को शोक संदेश नहीं दिया, फिर भी कॉन्ग्रेस मोदी से ‘निंदा’ की माँग कर रही है। यह विदेश नीति पर कब्जे की कोशिश है, जैसे 2005-09 में यूपीए ने IAEA में ईरान के खिलाफ वोट किया था, लेकिन अब ‘दोस्ती’ का राग अलाप रही है। वामपंथी तो हमेशा से सोवियत-चीन-ईरान की तानाशाही का समर्थन करते आए हैं।

खामेनेई के शासनकाल में अनगनित जिंदगियाँ हुई खत्म

अब मुख्य मुद्दे पर आते हैं कि खामेनेई के शासन में अलग-अलग प्रदर्शनों में लाखों लोगों की हत्याएँ होती रही हैं। खामेनेई 1989 से सत्ता में थे। उनके शासन को ‘आयरन फिस्ट’ (लोहे का मुक्का) कहा जाता है। एमनेस्टी इंटरनेशनल, ह्यूमन राइट्स वॉच और ईरान ह्यूमन राइट्स जैसी संगठनों की रिपोर्टों के अनुसार, विरोध प्रदर्शनों को दबाने में हजारों निर्दोष मारे गए। महिलाओं पर जबरन हिजाब, अल्पसंख्यकों पर अत्याचार, इंटरनेट ब्लैकआउट और IRGC (इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स) की गोलीबारी से प्रदर्शनों का दबाने का यह उनका तरीका था।

ग्रीम मूवमेंट को बर्बरता से कुचलने का इतिहास

पहला बड़ा प्रदर्शन साल 2009 का ग्रीन मूवमेंट था। राष्ट्रपति चुनाव में धांधली के आरोप पर लाखों लोग सड़कों पर उतरे। ‘व्हेयर इज माय वोट’ का लोगों ने नारा’ लगा। हालाँकि खामेनेई ने इसे ‘विदेशी साजिश’ बताते हुए IRGC को दबाने का आदेश दिया। आधिकारिक आँकड़ों में दर्जनों मौतें, लेकिन BBC और अन्य रिपोर्टों के अनुसार कम से कम 72 से 80 लोग मारे गए।

सैकड़ों गिरफ्तार कर लिए गए और उन्हें जमकर यातनाएँ दी गईं। इस दौरान महिलाओं और युवाओं पर विशेष क्रूरता बरती गई। यह प्रदर्शन ईरान की लोकतंत्र की आखिरी उम्मीद था, लेकिन खामेनेई ने कुचल दिया।

साल 2017-18 में आर्थिक स्थिति बिगड़ने के खिलाफ लोग प्रदर्शन पर उतरे तो फिर से खामेनेई ने ‘विदेशी ताकतों’ के नाम पर लोगों को कुचल डाला।

साल 2019 में ईरान का ब्लडी नवंबर

साल 2019 का ‘ब्लडी नवंबर’ यानी ईंधन की कीमतें दोगुनी करने पर राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन। इमनेस्टी इंटरनेशनल ने एक हफ्ते में 321 मौतों की पुष्टि की की। रॉयटर्स और ईरानी अधिकारियों के अनाम स्रोतों के अनुसार कुल 1500 तक लोग मारे गए। महशहर में IRGC ने दलदल में छिपे 100 प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई। इंटरनेट बंद कर दिया गया।

ईरान ह्यूमन राइट्स ने इसे ‘आधुनिक ईरान का सबसे खूनी दमन’ बताया। खामेनेई ने सार्वजनिक रूप से ‘दंगे करने वालों को सबक सिखाओ’ कहा और इसके बाद विरोध प्रदर्शन कर रहे लोगों का सफाया कर दिया गया।

महसा अमीनी से जुड़ा आंदोलन

सबसे चर्चित रहा साल 2022 का ‘महसा अमीनी’ या ‘वुमन, लाइफ, फ्रीडम’ आंदोलन। 22 वर्षीय कुर्द महिला महसा अमिनी नैतिक पुलिस (मोरालिटी पुलिस) की हिरासत में मारी गई, वो भी कथित तौर पर हिजाब ठीक न पहनने पर। इसके बाद हुए दंगों में ईरान ह्यूमन राइट्स के अनुसार 551 लोग मारे गए, जिनमें 68 नाबालिग थे। ईरानी पुलिस ने लाइव गोलियाँ चलाई।

दिसंबर 2022 तक 476 मौतें पुष्टि हुईं, तो 2 युवाओं को फाँसी दे दी गई। अनगिनत अन्य लोगों को मारा गया, जिनका कोई रिकॉर्ड ही नहीं मिला। यह आंदोलन ईरान की महिलाओं की आजादी की लड़ाई था, लेकिन खामेनेई ने इसे कुचल दिया।

बहरहाल, इस पूरे मुद्दे पर भारत सरकार अपनी आधिकारिक प्रतिक्रिया दे चुकी है। फिर भी, एक दिलचस्प प्रतिक्रिया बीजेपी के सांसद निशिकांत दुबे की तरफ से आई है। उन्होंने खगड़े के ट्वीट को कोट करते हुए पुराना नोट पोस्ट किया है।

निशिकांत दुबे ने अतीत में ईरान के आधिकारिक कदमों को भी गिनाया है। इत्तेफाक की बात है कि उस समय देश में कॉन्ग्रेस की ही सरकारें थी और भारत दुश्मन देश पाकिस्तान के हमले झेल रहा था।

कॉन्ग्रेसियों – वामपंथियों की खुल चुकी है कलई

भारत में ‘लोकतंत्र’ और ‘मानवाधिकार’ का राग अलापने वाले कॉन्ग्रेसी और वामपंथी एक ऐसे तानाशाह के लिए आंसू बहा रहे हैं जिसने अपने ही लोगों पर गोली चलवाई। महसा अमिनी जैसी लड़कियों की मौत पर चुप्पी साधे रखी, लेकिन खामेनेई की हत्या पर छाती पीटे जा रहे हैं। ये इनका दोहरा मापदंड दिखाता है। वो सीधे-सीधे अमेरिका-इजरायल का विरोध न करके, उनका नाम सिर्फ पीएम मोदी को भला-बुरा कहने में ले रहे हैं।

दरअसल, कॉन्ग्रेसियों और वामपंथियों का रुदन न खामेनेई के लिए है, न ईरानी जनता के लिए। उनका यह रुदन यह अपनी प्रासंगिकता बचाने और पीएम मोदी को घेरने का प्रयास है। वे विदेश नीति खुद तय करना चाहते हैं, लेकिन जनता जानती है कि राष्ट्रीय हित ‘भावनाओँ’ से ऊपर होते हैं।

भारत को ऐसी ‘मोरल लीडरशिप’ की जरूरत नहीं जो तानाशाहों का शोक मनाए और लोकतंत्र के प्रतीक मोदी को घसीटे। ऐसे में साफ है कि पीएम मोदी की चुप्पी शक्ति है, जिसमें भारत की शांति और हितों की रक्षा है। लेकिन कॉन्ग्रेस-वामपंथी अभी भी पुरानी तानाशाही के गम में डूबे हैं।


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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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