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Ex मुस्लिम सलीम के हमलावरों के लिए रो रहे पड़ोसी, अब्बा कह रहा- ‘लोग बनेंगे डकैत’: क्या सिर्फ मजहब के आधार पर जीशान-गुलफाम के साथ खड़े कट्टरपंथी?

अगर मजहबी पहचान को न्याय और नैतिकता से ऊपर रख दिया जाएगा तो यह समाज के लिए गंभीर समस्या है और इस मामले में यही होता दिख रहा है। यह जानते हुए भी कि जीशान-गुलफाम ने गुनाह किया है लोग केवल मजहबी पहचान के आधार पर उसके साथ खड़े नजर आ रहे हैं।

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में दो सगे भाइयों जीशान और गुलफाम ने Ex मुस्लिम और यूट्यूबर सलीम वास्तिक का गला रेत दिया था। घटना के कुछ ही दिनों में उत्तर प्रदेश पुलिस ने दोनों भाइयों का एनकाउंटर कर दिया। दोनों भाइयों ने रोके जाने की कोशिश के दौरान पुलिस पर फायरिंग की और क्रास फायरिंग में पुलिस की गोली लगने से मारे गए।

दोनों भाइयों ने जिस तरह सलीम की गर्दन काटी थी, उसका वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ था। दोनों भाइयों ने पेशेवर अपराधी की तरह सलीम पर चाकू से करीब एक दर्जन वार किए। एक भाई के पास एनकाउंटर के वक्त पुलिस को इटली की पिस्टल भी मिली थी। इससे साफ है कि दोनों भाई कोई एक दिन जाकर अचानक अपराधी नहीं बन गए बल्कि कट्टरपंथ का जहर उनके भीतर तक फैला था।

दोनों भाई एक टेलीग्राम ग्रुप ‘मुस्लिम आर्मी मेहदी मॉडरेटर’ से भी जुड़े थे जहाँ से उनके ‘जिहादी’ विचारों को पानी मिल रहा था। हजारों लोगों की मौजूदगी वाले इस कट्टरपंथी ग्रुप के जरिए लोगों के मन में घृणा भरी जा रही थी। ये सब बातें हम आपको इसलिए बता रहे हैं क्योंकि अभी भी कुछ लोगों के लिए वे दोनों दरिंदे पाक साफ हैं, पीड़ित हैं और दोषी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश सरकार है।

सबसे पहले जीशान-गुलफाम के अब्बू बुनियाद अली की बात सुनते हैं। बुनियाद अली ने कहा कि जो आज बोया जा रहा है उसके काँटे 20 साल बाद निकलेंगे। बुनियाद ने कहा कि हिंदुस्तान में ऐसे काँटे बो दिए गए हैं कि आज की पीढ़ी तबाह हो गई है और उनके बच्चे डकैती करेंगे।

ये बुनियाद का कोई इकलौता बयान नहीं है, एक अन्य वीडियो में वो दोनों को शहीद बताता नजर आया। बुनियाद से पूछा गया कि दो बेटे मरे हैं, उसके चेहरे पर कोई दुख नहीं है। इस पर वो कहता है, “इस्लाम की हकीकत बताऊँ? हुसैन ने भी 72 शहीदों को कंधा दिया था।”

इसके अलावा बुनियाद ने एक अन्य शख्स से बातचीत में कहा, “कोर्ट कार्रवाई करे, सुप्रीम कोर्ट बैठा है, अगर सबने चूड़ियाँ पहन ली हैं तो फिर जैसे जिसका आए तो ठीक है। कोर्ट सब बेकार हो गए।” बुनियाद ने ड्रेमेटिक अंदाज में योगी आदित्यनाथ पर सवाल उठाए और कहा, “मुझे भी मार दो, खत्म करो।”

UP Tak के एक पत्रकार अमरोहा में उस गाँव में पहुँचे जहाँ दोनों भाई रहते थे। पत्रकार से बातचीत में जमील अहमद नाम के एक ग्रामीण ने कहा कि दोनों बहुत नेक लड़के थे और उनमें कोई फाल्ट नहीं था। वो बार दोनों को बेचारा कहता रहा और अंत में बोला कि एनकाउंटर गलत किया गया है।

जाकिर अली नाम के एक-दूसरे ग्रामीण ने कहा कि इस एनकाउंटर का पूरी बस्ती को अफसोस है। जाकिर बोलते-बोलते रोने लगा और कहने लगा कि रोजे में यहाँ किसी ने कुछ नहीं खाया है। हालाँकि, उसने यह जरूर कहा कि किसी ने उन्हें भड़काया होगा। मोहम्मद अयूब नाम के एक पड़ोसी ने कहा कि दोनों नेक बच्चे थे और ऐसे ही चले गए। अयूब ने कहा कि हमारी नजर में तो उन दोनों को कोई फॉल्ट नहीं है। जब अयूब से सलीम का गला रेते जाने को लेकर पूछा भी गया तो उन्होंने कहा कि इसकी उन्हें जानकारी नहीं है।

कट्टरपंथियों के लिए निकलता दर्द, गला रेतने पर खामशी

यह घटना केवल एक शख्स की गर्दन रेते जाने या कोई एक आपराधिक मामले तक सीमित नहीं है बल्कि यह कट्टरपंथी समाज की सोच और संवेदनाओं पर भी बड़ा सवाल खड़ा करती है। और ऐसे में इन सभी लोगों के बयान सुनने के बाद एक सवाल यह उठता है कि आखिर ऐसा क्या हो रहा है कि जघन्य अपराध के आरोपियों के लिए आँसू बहाए जा रहे हैं जबकि उस व्यक्ति के दर्द और उसके परिवार की पीड़ा पर की कोई बात नहीं कर रहा है जिसकी गर्दन रेत दी गई, जिस पर चाकू से वार पर वार किए गए।

आरोपितों के गाँव के लोगों के मन में एक बार भी यह बात नहीं आई कि जीशान-गुलफाम ने कुछ गलत किया है। ऐसा क्यों हुआ होगा? क्या ऐसा सिर्फ इसलिए क्योंकि सलीम ने इस्लाम की कट्टरता और कुरीतियों पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे तो क्या वो इस्लाम में होते हुए भी उम्माह का हिस्सा नहीं रहा था क्योंकि उसने सवाल उठाने शुरू कर दिए थे।

यहाँ एक बात और जो भुला दी गई वो ये कि उन दोनों को कहीं सोते या पुण्य काम करते नहीं मारा गया। दोनों आरोपित पुलिस पर फायरिंग कर रहे थे और अपनी जान बचाने के लिए पुलिस की जान लेने पर आमादा थे। पुलिसकर्मी घायल तक हुए। तो ये कोई एकतरफा कार्रवाई नहीं थी लेकिन ऐसे मामलों में में जब पुलिस की कार्रवाई होती है तो अचानक सहानुभूति की लहर उठने लगती है। पीड़ित के लिए नहीं बल्कि आरोपित के लिए।

जब कोई अपराध इतना क्रूर हो कि वह इंसानियत की सीमाओं को ही पार कर जाए, तब आरोपित के लिए कितनी इंसानियत दिखानी चाहिए, क्या दिखानी भी चाहिए? अव्वल तो समाज को साफ शब्दों में यह कहना चाहिए कि ऐसी हिंसा किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है।

ऐसे में एक खतरा और है, या यूँ कहें कि संदेश है वो ये कि अगर इस तरह के अपराध किए जाएँगे तब भी समाज का एक तबका आपकी मजहबी पहचान के आधार पर आपके साथ खड़ा रहेगा फिर चाहे आपने कितना ही वीभत्स गुनाह क्यों ना किया हो।

अगर मजहबी पहचान को न्याय और नैतिकता से ऊपर रख दिया जाएगा तो यह समाज के लिए गंभीर समस्या है और इस मामले में यही होता दिख रहा है। यह जानते हुए भी कि जीशान-गुलफाम ने गुनाह किया है लोग केवल मजहबी पहचान के आधार पर उसके साथ खड़े नजर आ रहे हैं।

इसी तरह की घटनाएँ ना केवल आपसी अविश्वास और सामाजिक तनाव बढ़ाती है बल्कि लोकतांत्रिक समाज के लिए बहुत नुकसानदायक हैं।

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शिव
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7 वर्षों से खबरों की तलाश में भटकता पत्रकार...

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