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1877 में इससे मरे थे 5 करोड़ लोग, लेकिन 2026 वाला ‘Super El Nino’ उससे भी खतरनाक: पढ़ें- कैसे आग उगलता सूरज इस साल को बना सकता है महाविनाशक

वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि 1877 के मुकाबले आज पृथ्वी पहले से लगभग 1.4 डिग्री सेल्सियस अधिक गर्म हो चुकी है। यानी एल नीनो का प्रभाव अब और अधिक खतरनाक हो सकता है।

दुनिया एक बार फिर ऐसे जलवायु संकट की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है, जिसकी तुलना इतिहास की सबसे भयावह प्राकृतिक आपदाओं में से एक से की जा रही है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि आने वाला ‘सुपर एल नीनो’ 1877-78 के उस ऐतिहासिक एल नीनो से भी अधिक शक्तिशाली हो सकता है, जो दुनिया भर में भयानक सूखा, अकाल, बीमारियाँ और करोड़ों लोगों की मौत का कारण बना था।

इतिहासकारों के अनुसार, 1877-78 के सुपर एल नीनो के कारण फैले वैश्विक अकाल और बीमारियों में करीब 5 करोड़ लोगों की मौत हुई थी। भारत, चीन, ब्राजील और अफ्रीका के कई हिस्सों में लोग भूख, सूखे और महामारी से मरने लगे थे। उस समय यह आँकड़ा दुनिया की कुल आबादी का लगभग 3 से 4 प्रतिशत था।

अगर आज वैसी तबाही दोहराई जाए तो इसका असर 25 करोड़ से अधिक लोगों पर पड़ सकता है। हालाँकि वैज्ञानिक यह भी कहते हैं कि आज दुनिया 19वीं सदी की तुलना में कहीं अधिक तैयार है, लेकिन बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग ने खतरे को और गंभीर बना दिया है।

ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर एल नीनो क्या है, 1877 में क्या हुआ था और 2026 का संभावित सुपर एल नीनो दुनिया के लिए कितना बड़ा खतरा बन सकता है।

क्या होता है एल नीनो और क्यों माना जाता है खतरनाक?

एल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु चक्र है, जो प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय हिस्से में समुद्री सतह के तापमान में असामान्य बढ़ोतरी से जुड़ा होता है। यह El Nino Southern Oscillation यानी ENSO नामक जलवायु प्रणाली का हिस्सा है।

सामान्य परिस्थितियों में प्रशांत महासागर की हवाएँ पूर्व से पश्चिम की ओर बहती हैं, लेकिन एल नीनो के दौरान ये हवाएँ कमजोर पड़ जाती हैं। इससे समुद्र की गर्म सतह वाला पानी पूर्वी और मध्य प्रशांत क्षेत्र में फैलने लगता है।

इस गर्मी का असर केवल समुद्र तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरी दुनिया के मौसम पैटर्न को बदल देता है। कहीं भारी बारिश और बाढ़ आती है, तो कहीं सूखा और जंगलों में आग लगने की घटनाएँ बढ़ जाती हैं। वैश्विक तापमान भी सामान्य से अधिक हो जाता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, जब समुद्री सतह का तापमान सामान्य से 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक बढ़ जाता है, तो इसे आम बोलचाल में ‘सुपर एल नीनो’ कहा जाता है। हालाँकि वैज्ञानिक आधिकारिक रूप से इस शब्द का कम इस्तेमाल करते हैं।

1877 का सुपर एल नीनो क्यों बना मानव इतिहास की बड़ी त्रासदी?

1877-78 का एल नीनो इतिहास के सबसे विनाशकारी जलवायु संकटों में गिना जाता है। जलवायु पुनर्निर्माण अध्ययनों के अनुसार, उस समय प्रशांत महासागर के एक अहम हिस्से में समुद्री तापमान लगभग 2.7 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया था। इसके बाद दुनिया भर में बारिश का संतुलन बिगड़ गया।

भारत उन देशों में शामिल था, जहाँ इसका सबसे विनाशकारी असर पड़ा। मानसून लगभग गायब हो गया, फसलें बर्बाद हो गईं और भयंकर अकाल फैल गया। उत्तरी चीन में भी लंबे सूखे ने खेती को तबाह कर दिया। ब्राजील में नदियाँ सूख गईं, जबकि अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और ऑस्ट्रेलिया में भीषण सूखा और जंगलों में आग की घटनाएँ बढ़ीं।

सूखे और फसल बर्बादी के कारण भोजन की भारी कमी हो गई। इसके बाद कमजोर आबादी में हैजा, चेचक, पेचिश, प्लेग और मलेरिया जैसी बीमारियाँ फैल गईं। इतिहासकारों का मानना है कि इस आपदा ने कई समाजों को कमजोर किया, बड़े पैमाने पर पलायन बढ़ाया और कई क्षेत्रों में औपनिवेशिक नियंत्रण को और मजबूत बना दिया।

वॉशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर दीप्ति सिंह के अनुसार, अकाल केवल सूखे की वजह से नहीं आया था। उस समय उपनिवेशवादी नीतियों ने स्थानीय खाद्य और सामाजिक व्यवस्थाओं को कमजोर कर दिया था, जिससे लोग जलवायु संकट का सामना नहीं कर सके।

2026 का सुपर एल नीनो कितना शक्तिशाली हो सकता है?

वैज्ञानिकों के ताजा अनुमान चिंता बढ़ाने वाले हैं। अमेरिकी एजेंसी NOAA, यूरोपीय मौसम केंद्र ECMWF और विश्व मौसम संगठन (WMO) सहित कई संस्थानों का कहना है कि प्रशांत महासागर का तापमान इस बार सामान्य से 3 डिग्री सेल्सियस तक ऊपर जा सकता है। यदि ऐसा होता है तो यह 1877 के सुपर एल नीनो से भी अधिक शक्तिशाली साबित हो सकता है।

NOAA के अनुसार, इस बात की लगभग 25 प्रतिशत संभावना है कि यह ‘बहुत मजबूत’ एल नीनो बने। वहीं कुछ मॉडल्स यह भी संकेत दे रहे हैं कि इसका प्रभाव 2026 के अंत से 2027 की शुरुआत तक जारी रह सकता है।

जलवायु वैज्ञानिक कैथरीन हेहो ने चेतावनी दी है कि इसका मानव समाज और मानव कल्याण पर गहरा असर पड़ सकता है। वैज्ञानिक पॉल राउंडी ने इसे 1877 के बाद सबसे बड़ा एल नीनो बताया है।

ग्लोबल वार्मिंग क्यों बढ़ा रही खतरा?

वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि 1877 के मुकाबले आज पृथ्वी पहले से लगभग 1.4 डिग्री सेल्सियस अधिक गर्म हो चुकी है। यानी एल नीनो का प्रभाव अब और अधिक खतरनाक हो सकता है।

दीप्ति सिंह कहती हैं कि 1870 के दशक जैसे कई वर्षों तक चलने वाले सूखे दोबारा हो सकते हैं, लेकिन फर्क यह है कि अब महासागर और वातावरण पहले से ज्यादा गर्म हैं। इसका मतलब है कि गर्मी की लहरें, सूखा, जंगलों की आग और जल संकट कहीं अधिक गंभीर हो सकते हैं।

2023-24 का एल नीनो पहले ही दुनिया को रिकॉर्ड गर्मी दिखा चुका है। विश्व मौसम संगठन के अनुसार, 2024 पृथ्वी का सबसे गर्म वर्ष रिकॉर्ड किया गया। ऐसे में नया सुपर एल नीनो तापमान को और ऊपर धकेल सकता है।

दुनिया के किन हिस्सों पर पड़ सकता है असर?

एल नीनो का असर पूरी दुनिया में अलग-अलग रूप में दिखाई देता है। भारत, इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में मानसून कमजोर पड़ सकता है और सूखे का खतरा बढ़ सकता है। दक्षिण अमेरिका और प्रशांत क्षेत्र के कुछ हिस्सों में भारी बारिश और बाढ़ आ सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लंबे समय तक सूखा पड़ा तो खाद्य उत्पादन प्रभावित होगा। गेहूँ, चावल, मक्का और सोयाबीन जैसी फसलों की पैदावार घट सकती है। इससे वैश्विक खाद्य कीमतें बढ़ सकती हैं और गरीब देशों में खाद्य संकट गहरा सकता है।

जल संकट, बिजली उत्पादन और स्वास्थ्य सेवाओं पर भी असर पड़ने की आशंका है। कमजोर अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों में यह संकट सामाजिक और राजनीतिक अस्थिरता भी पैदा कर सकता है।

क्या आज दुनिया पहले से ज्यादा तैयार है?

1877 के मुकाबले आज दुनिया के पास बेहतर तकनीक और वैज्ञानिक जानकारी मौजूद है। उस समय यह समझ ही नहीं थी कि एल नीनो क्या होता है और इसके आने का अनुमान कैसे लगाया जाए। लेकिन 1982-83 और 1997-98 के सुपर एल नीनो के बाद जलवायु विज्ञान में काफी प्रगति हुई।

आज प्रशांत महासागर में हजारों सेंसर, उपग्रह और समुद्री उपकरण लगातार तापमान, हवाओं और नमी पर नजर रखते हैं। NOAA, WMO और ECMWF जैसी एजेंसियाँ पहले से चेतावनी जारी कर सकती हैं। इससे सरकारों को खाद्य भंडारण, जल प्रबंधन और आपदा तैयारियों का समय मिल जाता है।

वैज्ञानिक केविन ट्रेंबरथ के अनुसार, अब दुनिया रियल टाइम में एल नीनो की गतिविधियों पर नजर रख सकती है, जो 19वीं सदी में संभव नहीं था।

फिर भी क्यों बनी हुई है चिंता?

विशेषज्ञ मानते हैं कि 1877 जैसी करोड़ों मौतों वाली त्रासदी दोहराने की संभावना कम है, लेकिन खतरा पूरी तरह टला नहीं है। आज दुनिया की आबादी कहीं ज्यादा है और वैश्विक अर्थव्यवस्था आपस में गहराई से जुड़ी हुई है। किसी एक क्षेत्र में फसल खराब होने का असर पूरी दुनिया की खाद्य और आर्थिक व्यवस्था पर पड़ सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सुपर एल नीनो के कारण कई देशों में एक साथ सूखा और गर्मी बढ़ती है, तो इसका असर खाद्य सुरक्षा, जल संसाधनों और वैश्विक बाजारों पर दिखाई देगा। सबसे अधिक खतरा गरीब और जलवायु संकट से पहले से जूझ रहे देशों को होगा।

ऐसे में वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले महीनों में अंतरराष्ट्रीय सहयोग, मजबूत चेतावनी प्रणाली और समय रहते तैयारी ही दुनिया को संभावित जलवायु संकट से बचाने का सबसे बड़ा हथियार साबित हो सकती है।

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सौम्या सिंह
सौम्या सिंह
ख़ुद को तराशने में मसरूफ़

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