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पंजाब में सत्ता के पीछे भाग रहे कॉन्ग्रेस के कई गुट, चन्नी से लेकर बाजवा-रंधावा सब नाराज: जानिए अमरिंदर राजा वडिंग के खिलाफ बगावत कैसे बनी राहुल गाँधी के लिए सबसे बड़ी चुनौती

पंजाब कॉन्ग्रेस प्रदेश अध्यक्ष राजा वड़िंग, पूर्व मुख्यमंत्री चरनजीत सिंह चन्नी, कॉन्ग्रेस नेता प्रताप सिंह बाजवा, कॉन्ग्रेस सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा के गुटों के बीच टकराव खुलकर सामने आ गई है। चन्नी गुट ने वड़िंग के नेतृत्व को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है वहीं रंधावा केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मिल रहे हैं। दरअसल वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर बरकरार रखने के बाद कॉन्ग्रेस की मुश्किल ज्यादा बढ़ गई है।

हाल के दिनों में पंजाब कॉन्ग्रेस की अंदरूनी कलह खुलकर सामने आ गई है। इसकी सबसे बड़ी वजह पार्टी हाईकमान ने 2027 विधानसभा चुनाव से पहले संगठनात्मक जिम्मेदारियों का बंटवारा किया है, उसे माना जा रहा है। हाईकमान ने प्रदेश अध्यक्ष नहीं बदला। कई नेताओं को उम्मीद थी कि चुनाव से पहले नया चेहरा लाया जाएगा, लेकिन हाईकमान ने अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग पर भरोसा कायम रखा। इससे अलग-अलग गुटों में असंतोष बढ़ गया।

हालाँकि पंजाब कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष वडिंग ने शनिवार (4 जुलाई 2026) को गुटबाजी की बात को पूरी तरह से खारिज करते हुए कहा कि पार्टी की राज्य इकाई में कोई बगावत नहीं हुई है और जल्द ही वरिष्ठ नेता पूरे पंजाब में एक साथ प्रचार करते दिखेंगे। लेकिन ये बयान ही ‘दाल में कुछ काला’ होने के संकेत दे रही है। पार्टी के नेताओं में काफी बेचैनी महसूस की जा रही है, खास कर संगठनात्मक नियुक्तियों और पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के समर्थकों की प्रतिक्रिया ने सारी बातें आम कर दी हैं।

अब पार्टी के सामने सवाल यह है कि क्या यह मामला कुछ समय के लिए उठा विवाद है या इसके पीछे कोई गहरी बात है। कहीं पिछले विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी में मची उथल-पुथल की तरह इस बार भी पार्टी बिखर न जाए। पिछली बार तो सत्ता गंवाई थी, इस बार सपने गंवाने पड़ेंगे।

पंजाब में नेताओं की नियुक्ति और प्रतिक्रिया

1 जुलाई 2026 को कॉन्ग्रेस पार्टी हाई कमान ने 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए वडिंग को पंजाब अध्यक्ष और प्रताप सिंह बाजवा को विपक्ष का नेता बनाए रखा। इस दौरान पूर्व सीएम चरणजीत सिंह चन्नी को प्रदेश अध्यक्ष या दूसरी बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी गई, बल्कि उन्हें चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बना दिया गया।

इससे उनके समर्थकों ने चन्नी को दरकिनार किए जाने का संदेश गया। चन्नी एक दलित नेता हैं और राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। उन्होंने नियुक्ति किए जाने पर आलाकमान को कोई ‘धन्यवाद’ भी नहीं किया, जो आमतौर पर नेतागण सोशल मीडिया के माध्यम से करते हैं और जनता को मैसेज देते हैं। इससे अटकलें लगने लगीं कि वह नाराज हैं। सुखजिंदर सिंह रंधावा को कोर कमेटी का प्रमुख बनाया गया, लेकिन बताया जा रहा है कि वह भी ‘खुश’ नहीं हैं। प्रताप सिंह बाजवा स्वयं नेता प्रतिपक्ष बने हुए हैं, इसलिए उन्होंने खुलकर विद्रोह नहीं किया। उनका रुख यह है कि संगठन में सभी वरिष्ठ नेताओं को साथ लेकर चलना चाहिए।

हालाँकि बाजवा समर्थकों का मानना है कि चुनावी रणनीति और टिकट वितरण में उनकी भूमिका निर्णायक होनी चाहिए और पार्टी को गुटबाजी से बचना चाहिए। बाजवा फिलहाल सार्वजनिक टकराव से बचते दिख रहे हैं।

चन्नी की नाराजगी पार्टी को पड़ सकती है भारी

पूर्व सीएम चन्नी की नाराजगी से पंजाब कॉन्ग्रेस में टूट का खतरा पैदा हो गया है। बताया जा रहा है कि चन्नी पूर्व सांसद विजयइंदर सिंगला को प्रधान बनाने पर सहमत थे और उस वक्त वह कैंपेन कमेटी का प्रमुख बनने के लिए तैयार थे। लेकिन जब पार्टी आलाकमान सिंगला के नाम पर सहमत नहीं हुई, क्योंकि सिंगला हिन्दू नेता हैं।

इससे पहले भी सुनील जाखड़ को इसलिए कॉन्ग्रेस ने सीएम बनाने से इनकार किया था, क्योंकि वह हिन्दू नेता थे। ऐसी हालत में चन्नी ही एकमात्र दावेदार थे प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी के लिए, लेकिन आलाकमान ने वडिंग बनाए रखा, इससे चन्नी काफी खफा हैं। दरअसल 2027 में अगर कॉन्ग्रेस चुनाव जीतती है तो वड़िंग को मुख्यमंत्री की कुर्सी का अहम दावेदार माना जाएगा। इसके अलावा टिकट बंटवारे में भी प्रदेश अध्यक्ष की ज्यादा चलेगी। चुनाव में जीतने वाले विधायक भी वड़िंग के समर्थक ही ज्यादा होंगे, तो जाहिर है सीएम की कुर्सी के प्रबल दावेदार होंगे।

चन्नी गुट की मोरिंडा स्थित घर पर अहम बैठक हुई

रूपनगर में चन्नी के मोरिंडा स्थित आवास पर शुक्रवार (3 जुलाई 2026) को करीब 50 मौजूदा और पूर्व विधायक और दूसरे नेता जमा हुए। इनमें पूर्व डिप्टी सीएम ओपी सोनी, पूर्व मंत्री भारत भूषण आशु और गुरप्रीत कांगड़, पूर्व सांसद मोहम्मद सादिक और विधायक गुरकीरत सिंह कोटली शामिल थे। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, बैठक में चन्नी ने साफ कहा है कि हम राजा वेड़िंग के अध्यक्ष रहते हुए काम नहीं कर सकते। इस दौरान वहाँ मौजूद नेताओं ने हाथ उठा कर उनका समर्थन किया।

रिपोर्ट के मुताबिक राज्य के सर्वे रिपोर्ट में चन्नी सबसे बड़ा चेहरा बनकर उभरे। सर्वे में यह भी दावा किया गया कि चन्नी 13 में से 7 लोकसभा सीटों में आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री भगवंत मान से ज्यादा लोकप्रिय हैं। इसको देखते हुए चन्नी को सीएम चेहरा घोषित करने की सिफारिश भी की गई, लेकिन पार्टी आलाकमान ने नहीं माना।

दरअसल आलाकमान को लगा कि इससे सारा पावर चन्नी के हाथों में चला जाएगा, इसलिए हाईकमान ने उन्हें कैंपेन कमेटी का चेयरमैन बनाया। दरअसल पंजाब में हर जिले और कस्बे में पार्टी का गठन किया गया है। इसमें गठन राजा वेड़िंग के नेतृ्त्व में हुई है। ऐसे में ज्यादातर लोग उनके गुट के ही हैं। ऐसे में अगर प्रदेश नेतृत्व में बदलाव होता, तो स्थानीय स्तर पर नाराजगी हो सकती थी।

वड़िंग ने बगावत की बात का खंडन किया

प्रदेश अध्यक्ष वड़िंग ने चन्नी के घर पर हुई बैठक को बगावत मानने से इनकार कर दिया। उन्होंने पीटीआई से कहा, “कोई बगावत नहीं है।” उन्होंने कहा कि किसी साथी के घर पर नेताओं का मिलना एक आम बात है। उन्होंने कहा कि कुछ लोग मेरे घर पर जमा होंगे, कुछ रंधावा के घर, तो कुछ चन्नी के घर। उन्होंने चन्नी को एक सम्मानित सीनियर नेता और ‘हमारे भाई’ बताया और कहा कि न तो चन्नी और न ही वहाँ मौजूद सीनियर नेताओं ने पार्टी के खिलाफ कुछ कहा।

उन्होंने कहा कि अगर एक-दो लोगों ने ऐसा किया भी, तो उसकी कोई खास अहमियत नहीं है। उन्होंने मतभेद को ‘मनगढ़ंत’ बताते हुए विरोधियों पर आरोप लगाया कि वे एक सामान्य मीटिंग को हाईकमान के लिए चुनौती के तौर पर पेश कर रहे हैं।

इस दौरान वड़िंग ने खुद को CM की रेस से बाहर बताया। उन्होंने कहा, “मैं सिर्फ एक ही दौड़ में शामिल हूँ और वह है कॉन्ग्रेस को सत्ता में लाना।” उन्होंने कहा कि अगर पार्टी चन्नी या किसी और को CM पद का उम्मीदवार या राज्य प्रमुख चुनती है, तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह फैसला राहुल गाँधी और अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को करना है और वह ‘कॉन्ग्रेस के एक अनुशासित सिपाही’ के तौर पर उनके फैसले का समर्थन करेंगे।

अमित शाह से मिले रंधावा

चाहे वड़िंग कुछ भी कहें, लेकिन पार्टी के अंदर बेचैनी साफ दिख रही है और ये बेचैनी सिर्फ चन्नी के खेमे तक ही सीमित नहीं है। गुरदासपुर के सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा और उनके समर्थक नाराज चल रहे हैं। शुक्रवार (3 जुलाई 2026) को दिल्ली में गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की। हालाँकि उन्होंने कहा कि यह बैठक पंजाब में कानून-व्यवस्था के बारे में थी, लेकिन नियुक्तियों को लेकर अपनी नाराजगी का इजहार भी कर दिया।

कॉन्ग्रेस सांसद मनीष तिवारी काफी वक्त से हाशिए पर हैं। उन्हें आगामी विधानसभा चुनाव में कोई भूमिका भी नहीं दी गई है। ऐसे हालात में कॉन्ग्रेस के अंदर घमासान साफ दिख रही है। अब सबका ध्यान इस ओर है कि चुनाव में कॉन्ग्रेस कोई सीएम चेहरा पेश करती है या नहीं। अगर पेश करती है तो कौन होगा कॉन्ग्रेस का सीएम चेहरा?

पार्टी में 2021 जैसी उथल-पुथल मची हुई है। इसका असर यह हुआ कि विधानसभा चुनाव 2022 में पार्टी को सत्ता गँवानी पड़ी। पार्टी मात्र 18 सीटों पर सिमट कर रह गई और आम आदमी पार्टी ने भगवंत मान के नेतृत्व में सत्ता पर काबिज हो गई। अगर कॉन्ग्रेस ने फिर से पार्टी के अंदरुनी कलह रोकने में सफल नहीं हुई, तो कॉन्ग्रेस के लिए पंजाब की सत्ता दूर की कौड़ी साबित होगी।

पार्टी अध्यक्ष वड़िंग भले ही एकजुट होने की बात कह रहे हों, लेकिन चन्नी, रंधावा, बाजवा का गुट आने वाले दिनों में क्या स्टेंड लेते हैं और गाँव-गाँव, शहर-शहर एकसाथ ‘लड़ाई लड़ते’ दिखाई देते हैं या नहीं, इस पर ही पार्टी का सपना टिका हुआ है।

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रुपम
रुपम
रुपम के पास 20 साल से ज्यादा का पत्रकारिता का अनुभव है। जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा। जी न्यूज से टेलीविज़न न्यूज चैनल में कामकाज की शुरुआत। सहारा न्यूज नेटवर्क के प्रादेशिक और नेशनल चैनल में टेलीविज़न की बारीकियाँ सीखीं। सहारा प्रोग्रामिंग टीम का हिस्सा बनकर सोशल मुद्दों पर कई पुरस्कार प्राप्त डॉक्यूमेंट्री का निर्माण किया। एडिटरजी डिजिटल हिन्दी चैनल में न्यूज एडिटर के तौर पर काम किया।

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