31 जुलाई 2026 की शाम दिल्ली में कैबिनेट की एक मीटिंग खत्म हुई और उसके बाद जो ऐलान हुआ, उसने भारत की पूरी ऊर्जा कहानी को नई दिशा दे दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट ने ‘समुद्र मंथन’ नाम की एक बड़ी योजना को मंजूरी दे दी। पूरा नाम है- नेशनल ऑफशोर एक्सप्लोरेशन स्कीम। इसके लिए सरकार ने ₹84,084 करोड़ का बजट रखा है, जो 2030-31 तक खर्च होगा। पेट्रोलियम मंत्रालय ने इसे भारत का अब तक का सबसे बड़ा और सबसे महत्वाकांक्षी समुद्री तेल गैस खोज मिशन बताया है।
कहानी यहीं से शुरू नहीं होती। इसकी नींव करीब साल भर पहले पड़ी थी, जब प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त 2025 को लाल किले से इसी तरह के एक आधुनिक समुद्र मंथन का जिक्र किया था। तब से लेकर अब तक सरकार लगातार नीतियों में बदलाव करती रही, ताकि जब असली योजना आए तो जमीन पहले से तैयार मिले।
भारत को इतनी बड़ी योजना की जरूरत क्यों पड़ी?
भारत आज दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल खरीदने वाला देश बन चुका है। हर साल भारत करीब 144 अरब डॉलर यानी लगभग ₹13 लाख करोड़ सिर्फ तेल के आयात पर खर्च करता है। यह पैसा हर साल बाहर चला जाता है, जबकि अगर देश के भीतर ही तेल और गैस निकल आए तो यही पैसा देश के विकास में लग सकता है।
पेट्रोलियम मंत्रालय की प्रेस विज्ञप्ति में साफ लिखा है कि हाल के भू राजनीतिक घटनाक्रम ने यह दिखा दिया है कि अपनी ऊर्जा की व्यवस्था खुद अपने हाथ में रखना कितना जरूरी है। समुद्र से जुड़ी जो तेल गैस खोजें होती हैं, उनमें एक अड़चन आती है, वह है समय। किसी भी समुद्री ब्लॉक को खोजने से लेकर वहाँ से तेल गैस निकलना शुरू होने तक 5 से 10 साल तक का वक्त लग जाता है।
इसके अलावा जो पुराने तेल गैस के कुएँ पहले से चल रहे हैं, उनका उत्पादन भी हर साल करीब 6 से 7 प्रतिशत घटता जाता है। यानी अगर नई खोज न हो तो देश का उत्पादन धीरे-धीरे कम ही होता जाएगा। इसी वजह से सरकार ने अब खोज को अपनी सबसे बड़ी प्राथमिकता बना दिया है।
पिछले 10 साल में जमीन कैसे तैयार हुई?
2014 के बाद से मोदी सरकार ने कई ऐसे बदलाव किए जिन्होंने आज की इस बड़ी योजना का रास्ता खोला। सबसे पहला बदलाव था नो गो एरिया को हटाना। पहले भारत के समुद्री क्षेत्र यानी एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन का बड़ा हिस्सा खोज के लिए बंद था। अब उसमें से 99 प्रतिशत से ज्यादा इलाका खोल दिया गया है, जिससे 10 लाख वर्ग किलोमीटर से ज्यादा समुद्री क्षेत्र पहली बार खोज के लिए उपलब्ध हुआ।
दूसरा बड़ा कदम था कॉन्ट्रैक्ट के तरीके को बदलना। पहले प्रोडक्शन शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट का सिस्टम था, जिसमें कंपनियों को उलझन ज्यादा होती थी। अब उसकी जगह रेवेन्यू शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट लाया गया, जो पहले से आसान और साफ सुथरा है। इसके अलावा 2025 में ऑयलफील्ड्स रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट संशोधन कानून पास हुआ, जिसने पूरे सेक्टर के कानूनी ढाँचे को आधुनिक बनाया। साथ ही पेट्रोलियम एंड नेचुरल गैस रूल्स 2025 भी लागू हुए, जिससे कारोबार करना आसान हुआ।
योजना के 4 बड़े हिस्से
समुद्र मंथन योजना को चार मुख्य भागों में बाँटा गया है। पहला मुख्य समुद्र के भीतर का डेटा जुटाना, जिस पर ₹28,534 करोड़ खर्च होंगे। इसमें ₹12,000 करोड़ 2D सिस्मिक डेटा जुटाने पर लगेंगे, ₹12,534 करोड़ 3D सिस्मिट डेटा और अन्य तकनीकों पर खर्च होंगे और ₹4000 करोड़ पुराने डेटा को दोबारा प्रोसेस करने और उसमें AI टूल लगाने पर खर्च होंगे।
दूसरा सबसे बड़ा हिस्सा है- समुद्र में खुदाई और वहाँ से जुड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर, जिस पर ₹55,200 करोड़ खर्च होंगे। इसमें ₹43,200 करोड़ गहरे पानी के 60 खोजी कुएँ खोदने पर लगेंगे। सरकार हर कुएँ की खुदाई की लागत का 50 प्रतिशत तक या फिर ₹675 करोड़, जो भी कम हो, वहन करेगी। ₹10 हजार करोड़ साझा समुद्री इंफ्रास्ट्रक्चर हब बनाने पर खर्च होंगे, ताकि खोजी गई गैस और तेल को जल्दी बाजार तक पहुँचाया जा सके। बाकी ₹2000 करोड़ ऑयल एंड गैस मैन्युफैक्चरिंग एंड सर्विसेज जोन बनाने पर लगेंगे, ताकि इससे जुड़े उपकरण और सेवाएँ देश में ही बनें।
तीसरा हिस्सा है मॉनिटरिंग और सपोर्ट का काम, जिसके लिए ₹300 करोड़ रखे गए हैं। यह पैसा डिजिटल निगरानी, ट्रेनिंग, जागरूकता कार्यक्रम और मीडिया आउटरीच में खर्च होगा।
एक गहरे पानी के खोजी कुएँ की लागत औसतन ₹1,192 से ₹1,430 करोड़ के बीच बैठती है, यानी यह बहुत जोखिम भरा और महँगा काम है। इसीलिए सरकार ने इसमें आधे खर्च की जिम्मेदारी खुद उठाने का फैसला किया, ताकि निजी कंपनियाँ भी इसमें उतरने से न घबराएँ।
किन-किन इलाकों में होगी खुदाई, पूरा भूगोल समझिए
समुद्र मंथन का पैसा हवा में खर्च नहीं होगा। यह पैसा भारत के पूर्वी और पश्चिमी दोनों समुद्री तटों पर मौजूद कुछ खास नदी बेसिनों में खुदाई पर लगेगा। ये वो जगहें हैं जहाँ बड़ी-बड़ी नदियाँ सदियों से समुद्र में मिट्टी और तलछट बहाकर लाती रही हैं और उसी तलछट की मोटी परतों के नीचे तेल और गैस दबा हुआ माना जाता है। इसीलिए सरकार का पूरा फोकस इन चार बड़े इलाकों पर है।
- कृष्णा गोदावरी बेसिन सबसे आगे है। यह इलाका आंध्र प्रदेश के तट पर है, जहाँ कृष्णा नदी और गोदावरी नदी दोनों बंगाल की खाड़ी में मिलती हैं। इन्हीं दोनों नदियों के नाम पर इसे केजी बेसिन कहा जाता है। यह इलाका पहले से ही भारत का सबसे बड़ा गैस उत्पादन केंद्र है और यहीं रिलायंस व ONGC के मशहूर गहरे पानी के गैस फील्ड भी मौजूद हैं। अब नई सिस्मिक तकनीक से इसी बेसिन के और गहरे हिस्सों में छिपे भंडारों की तलाश की जाएगी, जहाँ अभी तक पुरानी तकनीक की सीमाओं के कारण खुदाई नहीं हो पाई थी।
- महानदी बेसिन दूसरा बड़ा इलाका है, जो ओडिशा के तट के पास स्थित है। यहाँ महानदी अपने साथ लाई मिट्टी बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इस बेसिन में समुद्र के भीतर करीब 8 किलोमीटर की गहराई तक तेल और गैस के मजबूत भूगर्भीय संकेत मिले हैं, लेकिन अभी तक यहाँ बड़े पैमाने पर खोज नहीं हुई है। सरकार इसे भारत के सबसे संभावित लेकिन अभी तक अनछुए डीप वॉटर इलाकों में गिनती है।
- बंगाल पूर्णिया बेसिन तीसरा इलाका है, जो पश्चिम बंगाल के तट और उससे सटे समुद्री हिस्से में फैला है। यहाँ समुद्र के नीचे तलछट की परत करीब 10 किलोमीटर तक मोटी है, जो अपने आप में एक बड़ी बात है, क्योंकि जितनी मोटी तलछट परत होगी, उतनी ही ज्यादा संभावना है कि उसके नीचे प्राचीन हाइड्रोकार्बन भंडार दबे हों।
- कावेरी बेसिन चौथा इलाका है, जो तमिलनाडु के तट से शुरू होकर बंगाल की खाड़ी की तरफ फैलता है। यहाँ कावेरी नदी का मुहाना है और समुद्र के भीतर करीब 8 किलोमीटर गहराई तक कार्बोनेट चट्टानों की परतें मिली हैं, जिनमें जुरासिक युग के पुराने भंडार होने की उम्मीद जताई जा रही है।
इन चार नदी बेसिनों के अलावा अंडमान सागर का इलाका भी अब इस मिशन का अहम हिस्सा बन चुका है। यह क्षेत्र बाकी चारों बेसिनों से अलग है क्योंकि यह किसी बड़ी नदी के मुहाने पर नहीं, बल्कि अंडमान द्वीप समूह के आसपास के गहरे समुद्र में स्थित है, जहाँ की भूगर्भीय बनावट म्यांमार और इंडोनेशिया के तेल गैस क्षेत्रों जैसी मानी जाती है।
इसके अलावा योजना में पश्चिमी तट की मुंबई हाई और गुजरात के तटीय इलाकों को भी नजरअंदाज नहीं किया गया है, जहाँ पहले से चल रहे पुराने कुओं के आसपास भी नई सिस्मिक स्टडी और गहराई की खोज होगी, ताकि पुराने फील्ड के इर्द गिर्द छिपे छोटे भंडारों का भी पता लगाया जा सके।
साथ ही अंडमान का समुद्री क्षेत्र भी अब सुर्खियों में है। यहाँ ऑयल इंडिया लिमिटेड को हाल ही में एक बड़ी सफलता मिली है। पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने खुद 5 जून 2026 को इस खोज की घोषणा की कि श्री विजयपुरम-3 नाम के एक खोजी कुएँ में नैचुरल गैस मिली है।
Congratulations @OilIndiaLimited !
— Hardeep Singh Puri (@HardeepSPuri) June 5, 2026
An ocean of energy opportunities reinforced in the Andaman Sea!
Very happy to report the presence of natural gas in Sri Vijayapuram-3 an exploratory well drilled by Oil India Ltd. 15 km off the east coast of the Andaman Islands at a water… pic.twitter.com/j6QvWqZkFx
यह कुआँ अंडमान द्वीप समूह के पूर्वी तट से लगभग 15 किलोमीटर दूर और 355 मीटर गहरे समुद्र में खोदा गया था। समुद्र के तल से करीब 1900 मीटर से ज्यादा गहराई पर इओसीन नाम की भूगर्भीय परत में लगातार गैस फ्लेयरिंग दर्ज हुई, जो बताती है कि वहाँ गैस काफी दबाव के साथ मौजूद है।
यह अंडमान क्षेत्र में मिली दूसरी सफलता है। इससे पहले 2025 में श्री विजयपुरम-2 कुएँ में भी गैस मिलने की पुष्टि हो चुकी थी, जिसमें लगभग 87 प्रतिशत शुद्ध मीथेन पाई गई थी। भूवैज्ञानिकों का मानना है कि अंडमान की समुद्री संरचना म्यांमार और इंडोनेशिया के उन इलाकों जैसी ही है, जहाँ पहले से बड़े पैमाने पर तेल गैस निकाला जा रहा है। अगर सब कुछ योजना के अनुसार चला तो इस इलाके से 2030 तक व्यावसायिक उत्पादन शुरू हो सकता है।
राजस्थान में नई खोज
सिर्फ पूर्वी तट ही नहीं, राजस्थान से भी अच्छी खबर आई है। ऑयल इंडिया लिमिटेड को जैसलमेर के डांडेवाला फील्ड में एक नया गैस कुआँ मिला है, जहाँ पहली बार बेहद कम गहराई पर स्थित सानू फॉर्मेशन से गैस निकलनी शुरू हुई है। यह कुआँ सिर्फ 950 मीटर तक ड्रिल किया गया था और शुरुआती परीक्षण में हर दिन करीब 25 हजार स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर गैस निकलती पाई गई। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यहाँ कुल 75 मिलियन स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर गैस का भंडार मौजूद हो सकता है।
ONGC का सबसे बड़ा दाँव
अंडमान की इस सफलता के बाद ONGC ने भी अपना अब तक का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट शुरू कर दिया है। कंपनी गहरे और अति गहरे पानी में ड्रिलिंग के लिए करीब ₹1.5 लाख करोड़ का निवेश करने जा रही है। इसके लिए वैश्विक टेंडर निकाले जा चुके हैं और मुंबई में हुई प्री बिड मीटिंग में दुनिया की एक दर्जन बड़ी ड्रिलिंग कंपनियों ने हिस्सा लिया। इस काम में ONGC ने ब्राजील की पेट्रोब्रास, फ्रांस की टोटल एनर्जी और अमेरिका की एक्सोनमोबिल (Exxonmobil) जैसी दिग्गज कंपनियों के साथ भी तकनीकी सहयोग किया है।
इस पूरे मिशन में एडवांस्ड सिस्मिक इमेजिंग तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है। सर्वे जहाज समुद्र में कई किलोमीटर लंबी केबल छोड़ते हैं, जो नीचे की ओर ध्वनि तरंगें भेजती हैं। ये तरंगें समुद्र तल और उसके नीचे की चट्टानों से टकराकर वापस लौटती हैं और जहाज पर लगे सेंसर उन्हें रिकॉर्ड करते हैं। इसके बाद सुपरकंप्यूटर की मदद से समुद्र के नीचे की एक साफ तस्वीर तैयार की जाती है, जिससे पता चलता है कि किस जगह तेल गैस फँसा हो सकता है।
सरकार ने इसमें खर्च कम करने के लिए मल्टी क्लाइंट मॉडल भी अपनाया है। इसमें विदेशी जियोफिजिकल कंपनियाँ अपने खर्च और अपने जोखिम पर डेटा जुटाती हैं और बाद में उसे बाकी तेल कंपनियों को बेच देती हैं। इससे सरकार पर शुरुआती बोझ नहीं पड़ता और निजी निवेश भी आसानी से आता है।
लक्ष्य कितना बड़ा है?
पेट्रोलियम मंत्रालय के मुताबिक अगर खोज में सफलता मिलती रही तो भारत का सालाना तेल गैस उत्पादन मौजूदा 62 मिलियन मीट्रिक टन ऑयल इक्विवेलेंट से बढ़कर 80 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुँच सकता है। देश का कुल हाइड्रोकार्बन भंडार भी 1.6 अरब टन से बढ़कर 2.2 अरब टन हो सकता है। इससे हर साल करीब ₹1 लाख करोड़ के तेल आयात में कमी आने की उम्मीद है।
सरकार ने यह भी बताया कि इस योजना से 600 मिलियन मीट्रिक टन ऑयल इक्विवेलेंट से ज्यादा नए भंडार जुड़ सकते हैं और बड़े पैमाने पर रोजगार भी पैदा होगा।
आगे का रास्ता
समुद्र मंथन अब सिर्फ एक नीति नहीं, बल्कि जमीन पर काम करता हुआ मिशन बन चुका है। अंडमान में मिली गैस, राजस्थान में मिला नया भंडार और ONGC का ₹1.5 लाख करोड़ का निवेश यह दिखाते हैं कि सरकार इस बार सिर्फ बात नहीं, ठोस काम कर रही है। अगर अगले पाँच साल में तय की गई 60 खोजी कुओं की खुदाई और बड़े पैमाने पर सिस्मिक सर्वे का काम पूरा होता है, तो भारत आने वाले दशक में अपनी तेल गैस जरूरतों के लिए दूसरे देशों पर उतना निर्भर नहीं रहेगा जितना आज है। यही वह लक्ष्य है, जिसे हासिल करने के लिए ₹84,084 करोड़ की यह पूरी योजना बनाई गई है।


