महाराष्ट्र में अवैध धर्मांतरण को रोकने के लिए ‘महाराष्ट्र धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम 2026’ आधिकारिक रूप से लागू हो गया है। राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों से बजट सत्र के दौरान पारित होने और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हस्ताक्षर के बाद इसे आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित कर दिया गया।
विधानसभा में इस बिल पर बहस के दौरान उद्धव ठाकरे की शिवसेना ने समर्थन किया था, जबकि कॉन्ग्रेस, एनसीपी और समाजवादी पार्टी सहित कई विपक्षी दलों ने इसका विरोध किया था।
यह कानून संगठित तरीके से ब्रेनवाशिंग, प्रलोभन या दबाव के जरिए भोले-भाले और कमजोर वर्ग के लोगों के धर्मांतरण को रोकने, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और सामाजिक सद्भाव को संरक्षित करने के उद्देश्य से लाया गया है।
कौन से तरीके माने जाएँगे अवैध धर्मांतरण के लिए प्रलोभन
इस कानून में गैर-कानूनी धर्मांतरण, प्रलोभन और दबाव की सीमाओं को काफी विस्तार से बताया गया है। इसमें उपहार, नकद राशि, रोजगार, विवाह का वादा, मुफ्त शिक्षा, बेहतर जीवनशैली देने के वादे को प्रलोभन माना गया है।
इसके अलावा किसी एक धर्म को श्रेष्ठ बताना या दूसरे धर्म की बुराई करना भी इसी श्रेणी में आएगा। शारीरिक हिंसा, डराना-धमकाना, संपत्ति को नुकसान पहुँचाना, ‘ईश्वर के नाखुश होने’ का डर दिखाना या ‘सामाजिक बहिष्कार’ की चेतावनी देते हुए दबाव डालना भी इसी श्रेणी में शामिल है।
साथ ही, शैक्षणिक संस्थानों के जरिए ब्रेनवाशिंग और किसी प्रकार के ‘सामूहिक धर्मांतरण’ को भी गैर-कानूनी माना गया है। इतना ही नहीं यदि कोई विवाह केवल धर्म परिवर्तन के उद्देश्य से किया गया है, तो अदालत उसे अमान्य घोषित कर सकती है।
क्या होगी सजा
इस कानून के तहत दर्ज अपराध गैर-जमानती होंगे और पुलिस को बिना औपचारिक शिकायत के स्वतः संज्ञान लेकर सीधे FIR दर्ज करने व जाँच करने का अधिकार होगा।
सामान्य मामलों में अवैध धर्मांतरण पर अधिकतम 7 साल की जेल और 1 लाख रुपए तक का जुर्माना होगा, जबकि नाबालिगों, महिलाओं, मानसिक अस्वस्थ व्यक्तियों या SC/ST समुदाय के लोगों और सामूहिक धर्मांतरण के मामलों में यह सजा 7 साल की जेल व 5 लाख रुपए तक का जुर्माना तय की गई है।
दोबारा अपराध करने पर सजा बढ़ाकर 10 साल और जुर्माना 7 लाख रुपए तक हो सकता है।
दोषी संस्थाओं का पंजीकरण रद्द करने, अनुदान रोकने और अवैध दस्तावेजों को प्रमाणित या समर्थित करने वाले सहयोगियों को भी दंडित करने का प्रावधान है।
अगर कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से धर्म परिवर्तन करना चाहता है, तो उसे 60 दिन पहले प्रशासन को सूचना देनी होगी। इसके अलावा धर्म परिवर्तन होने के बाद 25 दिनों के भीतर उसे अधिकारियों के पास पंजीकरण कराना होगा। अगर ऐसा नहीं किया गया तो उस धर्म परिवर्तन को अमान्य माना जाएगा।
कैसे फँसाए जाते हैं भोले-भाले लोग
बता दें कि धर्मांतरण के खिलाफ लाए फडणवीस सरकार के इस कानून में साफ है कि कुछ मामलों में कन्वर्जन, संगठित तरीके से लोगों का ब्रेनवॉश करके या कमजोर लोगों को टारगेट में लेकर किया जाता है। ऐसे धर्मांतरण कभी-कभी ‘बलपूर्वक, अनैच्छिक या नागरिकों को लालच देकर या दूसरे तरह से प्रभावित करके’ किए जाते हैं। इन गतिविधियों के दौरान टारगेट पर ‘भोले-भाले लोग’ होते हैं। उन्हें उपहार, धन, लाभ, रोजगार के अवसर या धार्मिक संगठनों के जो संस्थान संचालित हो रहे हैं, उनमें मुफ्त शिक्षा की पेशकश शामिल दी जाती है या फिर विवाह, बेहतर जीवनशैली या दैवीय उपचार के वादे किए जाते हैं।
महाराष्ट्र के इस कानून में प्रलोभन के दायरे को अन्य राज्यों की तुलना में कहीं अधिक विस्तार से बताया गया है। इसमें कहा गया है कि किसी एक धर्म को दूसरे धर्म से श्रेष्ठ बताकर या किसी अन्य धर्म के रीति-रिवाजों, परंपराओं या प्रथाओं की बुराई करना या उसे गलत तरीके से बताने का प्रयास भी प्रलोभन की श्रेणी में आ सकते हैं।
इस कानून में ‘दबाव’ को भी विस्तार से बताया गया है। इसमें किसी व्यक्ति, परिवार या समूह को डरा-धमका कर या मनोवैज्ञानिक दबाव के माध्यम से उनकी इच्छा के विरुद्ध कार्य करने के लिए बाध्य गैरकानूनी होगा। इसमें मारना-पीटना या धमकियाँ देना, संपत्ति को नुकसान पहुँचाने की धमकियाँ या यहाँ तक कि ‘ईश्वर के नाखुश होने’ और ‘सामाजिक बहिष्कार’ या बहिष्कार की चेतावनी भी शामिल है।
इसमें कहा गया है कि यदि कोई विवाह केवल धर्मांतरण के उद्देश्य से किया गया है, तो कोर्ट उस विवाह को अमान्य घोषित कर सकता है। विवाह के दोनों पक्षों में से किसी को भी अदालत में जाकर यह दावा करने का अधिकार होगा कि धर्म परिवर्तन अवैध रूप से किया गया था।
कैसे बदल सकते हैं धर्म
धर्मांतरण विरोधी कानून में उस प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है, जिसका पालन किसी व्यक्ति को कानूनी रूप से अपना धर्म बदलने के वक्त करना जरूरी है।
कानून में कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे धर्म को अपनाना चाहता है, तो उसे कम से कम 60 दिन पहले जिला मजिस्ट्रेट या सरकार द्वारा नियुक्त किसी दूसरे प्राधिकारी को इसकी जानकारी देनी होगी।
इसी प्रकार, यदि कोई संस्था या धार्मिक निकाय धर्मांतरण समारोह आयोजित करना चाहता है, तो उसे कम से कम 60 दिन पहले संबंधित अधिकारी को पूर्व सूचना देनी होगी।
सरकारी प्राधिकारी पूरी जानकारी अपने नोटिस बोर्ड के साथ-साथ स्थानीय प्राधिकरण के नोटिस बोर्ड पर भी चिपकाएगा, ताकि अगर जनता को कोई आपत्ति है तो वे बताएँ। आम लोगों को इसके लिए 30 दिन का समय दिया गया है।
यदि कोई आपत्ति आती है, तो प्राधिकरण पुलिस को जाँच का आदेश दे सकता है। यदि जाँच में यह पाया जाता है कि धर्मांतरण कानून का उल्लंघन है, तो पुलिस आपराधिक कार्रवाई कर सकती है।
कानून में यह भी अनिवार्य है कि धर्मांतरण हो जाने के बाद, धर्मांतरित व्यक्ति या समारोह संपन्न करने वाले व्यक्ति को 21 दिनों के भीतर घोषणा करनी होगी। यदि व्यक्ति जानकारी नहीं देता है, तो कानून यह मान लेगा कि धर्मांतरण हुआ ही नहीं है।
पुलिस खुद ले सकती है अवैध धर्मांतरण मामलों पर संज्ञान
इस कानून की एक और खासियत यह है कि पुलिस अधिकारियों को औपचारिक शिकायत के बिना भी कार्रवाई करने की अनुमति होगी । पुलिस को स्वतः संज्ञान लेने का अधिकार भी दिया गया है। वह जाँच कर सकता है कि कानून का उल्लंघन करते हुए कोई संपत्ति का हस्तांतरण हुआ है या नहीं।
यह कानून आपराधिक दायित्व का दायरा भी बढ़ाता है। धारा 12 के अनुसार, गैरकानूनी धर्मांतरण से जुड़े दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने, उनका समर्थन करने या उन्हें प्रमाणित करने वाले व्यक्तियों को भी अपराध में सहायता करने या उकसाने का दोषी माना जा सकता है और उन्हें दंडित किया जा सकता है।
अन्य राज्यों में धर्मांतरण कानून
धर्मांतरण के विरोध में मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, ओडिशा, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, गुजरात,उत्तराखंड, हरियाणा, राजस्थान समेत कई राज्यों में कानून बनाया गया है। दरअसल संविधान ने देश की जनता को धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को मूल अधिकार के तौर पर दिया है। ऐसे में किसी भी तरह से इसका उल्लंघन किया जाता है, तो ये संविधान की मूल भावना के भी खिलाफ है।


