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₹415 करोड़ के मनी लॉन्ड्रिंग मामले में अल-फलाह के जवाद सिद्दीकी को झटका, दोनों अर्जियाँ खारिज: पढ़ें- क्या थीं ‘अनरिलाइड दस्तावेज’ समेत अन्य माँगें और कोर्ट ने क्या कहा?

पहली अर्जी में सिद्दीकी ने अदालत से कहा कि उनके कारोबार से जुड़े कुछ दस्तावेज ऐसे हैं जो ऑफिशियल स्रोतों से आए हैं। सिद्दीकी ने इन्हें 'बेहद विश्वसनीय' और 'निर्विवाद प्रकृति' वाला बताते हुए रिकॉर्ड पर लेने की माँग की थी।

लाल किला ब्लास्ट के बाद चर्चा में आए अल-फलाह समूह से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में आरोपित जवाद अहमद सिद्दीकी को दिल्ली की साकेत कोर्ट से झटका लगा है। कोर्ट ने उनके द्वारा दाखिल की गईं दो अलग-अलग अर्जियाँ खारिज कर दी हैं।

पहली अर्जी में सिद्दीकी ने अपने कुछ ऐसे दस्तावेजों को अदालत के रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति माँगी थी जिन्हें उन्होंने ‘बेहद विश्वसनीय’ और ‘निर्विवाद प्रकृति’ का बताया था। जावेद का कहना था कि इन दस्तावेजों को देखना न्यायसंगत निर्णय के लिए अत्यंत आवश्यक है। दूसरी अर्जी में उन्होंने ED से जाँच के दौरान जुटाए गए उन दस्तावेजों की सूची देने की माँग की थी जिन पर एजेंसी अपने मामले के लिए भरोसा नहीं (unrelied documents) कर रही है।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश शीतल चौधरी प्रधान ने 4 अगस्त 2026 को दिए 48 पन्नों के आदेश में दोनों अर्जियों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जिस चरण पर मामला अभी लंबित है, वहाँ अदालत को मुख्य रूप से ED की अभियोजन शिकायत और उसके साथ पेश की गई सामग्री को देखना है और यह तय करना है कि आरोपित के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं।

समझिए, मामला किस स्टेज पर है

यह मामला PMLA की धारा 3 और 4 के तहत चल रहा है। ED ने PMLA की धारा 44(1)(b) के तहत शिकायत दाखिल की है। लेकिन अभी अदालत ने इस शिकायत पर संज्ञान (cognizance) नहीं लिया है। आसान शब्दों में कहें तो, अभी यह तय होना बाकी है कि ED की शिकायत और उसके साथ रखी गई सामग्री को देखकर अदालत आरोपित के खिलाफ आगे की आपराधिक प्रक्रिया शुरू करने लायक मामला पाती है या नहीं।

मौजूदा 4 अगस्त 2026 का आदेश मुख्य रूप से इस बात पर है कि संज्ञान लेने से पहले आरोपित को किस तरह और कितनी सीमा तक सुना जा सकता है। कोर्ट का यह भी कहना कि संज्ञान के सवाल पर ED की ओर से दलीलें पहले ही पूरी हो चुकी थीं और आरोपित की ओर से दलीलें होनी बाकी थीं। इसी बीच ये दोनों अर्जियाँ दाखिल की गईं और इन्हें पहले तय करना जरूरी था।

सिद्दीकी पर प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत करीब 415 करोड़ रुपए के मामले को लेकर केस चल रहा है। उनके संस्थान पर 2025 के नवंबर में हुए लाल किला विस्फोट के आरोपितों को शरण देने का भी आरोप है।

जवाद अहमद सिद्दीकी ने क्या की थी माँग?

सिद्दीकी की दोनों अर्जियों का आधार BNS की धारा 223(1) में मौजूद उस प्रावधान को लेकर था जिसके तहत आरोपित को सुने बिना अदालत किसी अपराध का संज्ञान नहीं ले सकती।

पहली अर्जी में सिद्दीकी ने अदालत से कहा कि उनके कारोबार से जुड़े कुछ दस्तावेज ऐसे हैं जो ऑफिशियल स्रोतों से आए हैं। इनमें अलग-अलग भारतीय सरकारी प्राधिकरणों और बैंकों से जुड़े दस्तावेज शामिल होने की बात कही गई है। सिद्दीकी ने इन्हें ‘बेहद विश्वसनीय’ (sterling quality) और ‘निर्विवाद प्रकृति’ (unimpeachable character) वाला बताया और कोर्ट से उन्हें रिकॉर्ड पर लेने को कहा था।

सिद्दीकी का कहना था कि इन दस्तावेजों को देखने से अदालत को ED के आरोपों में मौजूद कथित विरोधाभासों को समझने में मदद मिलेगी और इससे संज्ञान से पहले होने वाली सुनवाई अधिक प्रभावी और सार्थक बनेगी।

सिद्दीकी की दूसरी माँग थी कि ED को निर्देश दिया जाए कि वह unrelied documents यानी ऐसे दस्तावेजों की सूची दे, जिन्हें जाँच एजेंसी ने जाँच के दौरान हासिल तो किया है लेकिन अपने मामले में उन पर भरोसा नहीं किया है।

दूसरी अर्जी में सिद्दीकी ने BNSS की धारा 436 के तहत मामले से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी सवालों को उच्च न्यायालय के पास भेजने की माँग की थी। उनका मुख्य तर्क था कि धारा 223(1) का पहला ‘परंतुक’ नया प्रावधान है जो आरोपित को संज्ञान लेने से पहले सुनवाई का अधिकार देता है लेकिन इस सुनवाई की ‘सीमा, स्वरूप और दायरा’ अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।

कोर्ट के आदेश में कहा गया है, “इस मामले के रिकॉर्ड से सामने आए तथ्यों को देखते हुए जनहित, कानून और संविधान से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण सवाल उठते हैं। इन सवालों का सीधा संबंध इस बात से है कि मामले का संज्ञान लेने से पहले के चरण में प्रस्तावित आरोपी को किस तरह और कितनी सीमा तक सुनवाई का अवसर दिया जाना चाहिए।”

इसमें आगे कह गया है, “क्योंकि ये मुद्दे जटिल प्रकृति के हैं और अब तक देश के किसी भी उच्च न्यायालय या माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इन पर निर्णय नहीं दिया गया है, इसलिए यह बेहद महत्वपूर्ण है कि संज्ञान से पहले होने वाली सुनवाई से पहले किसी संवैधानिक न्यायालय द्वारा इन सवालों का समाधान किया जाए। या कम से कम, जब यह माननीय न्यायालय आवेदक को सुनवाई का अवसर दे तब इन महत्वपूर्ण सवालों को ध्यान में रखा जाए।”

क्या हैं रिलाइड, अनरिलाइड और स्टर्लिंग दस्तावेज?

जब कोई जाँच एजेंसी छापे मारकर या तलाशी के दौरान भारी मात्रा में दस्तावेज, डिवाइस, बैंक रिकॉर्ड आदि जब्त करती है तो उनमें से सिर्फ कुछ को ही वह अपनी शिकायत/चार्जशीट के साथ अदालत में पेश करती है और इन्हें ‘रिलाइड डॉक्यूमेंट्स’ (relied upon documents) कहा जाता है यानी जिन पर अभियोजन भरोसा कर रहा है।

बाकी बचे दस्तावेज जिन्हें एजेंसी शिकायत के साथ पेश नहीं करती ‘अनरिलाइड डॉक्यूमेंट्स’ (unrelied upon documents) कहलाते हैं। अभियुक्त पक्ष का हमेशा यह तर्क रहता है कि इन ‘अनरिलाइड’ दस्तावेजों में ऐसी चीजें भी हो सकती हैं जो अभियुक्त के बचाव में मददगार हों और इसीलिए कम-से-कम उनकी एक सूची अभियुक्त को मिलनी चाहिए।

वहीं, ‘स्टर्लिंग क्वालिटी दस्तावेज’ से अभियुक्त का मतलब उन दस्तावेजों से था, जो खुद अभियुक्त के पास मौजूद हैं और जिन्हें वह खुद कोर्ट के सामने रखना चाहता था।

जवाद अहमद सिद्दीकी ने दीं क्या दलीलें?

ऑपइंडिया के पास मौजूद कोर्ट के आदेश के मुताबिक, बचाव पक्ष ने शुरुआत में यह दावा किया कि सिद्दीकी पूरी तरह निराधार, द्वेषपूर्ण और असंगत कारणों से गंभीर उत्पीड़न व प्रताड़ना झेल रहे हैं और उन्हें भरोसा है कि आगे की कार्यवाही में वे मामले की खोखली बुनियाद उजागर कर देंगे।

इस अर्जी के माध्यम से एक महत्वपूर्ण कानूनी सवाल भी उठाया गया है कि अदालत द्वारा अपराध का संज्ञान लेने से पहले आरोपी को दी जाने वाली सुनवाई का स्वरूप, संदर्भ, दायरा और सीमा आखिर क्या होगी।

कोर्ट के आदेश का एक हिस्सा

सिद्दीकी की ओर से तर्क दिया गया कि आरोपित को सुनवाई का अवसर दिए बिना दंडाधिकारी किसी अपराध का संज्ञान नहीं ले सकता। बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट और देश के विभिन्न उच्च न्यायालय इस प्रावधान की व्याख्या कर चुके हैं और अब यह स्थापित कानूनी स्थिति है कि सुनवाई का अवसर केवल औपचारिकता नहीं हो सकता। आरोपित को अपना पक्ष रखने के लिए प्रभावी, उद्देश्यपूर्ण और सार्थक अवसर मिलना चाहिए।

बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि जब कानून आरोपित को सुनवाई का अवसर देता है तो इसका अर्थ केवल इतना नहीं हो सकता कि आरोपित को अदालत में उपस्थित होने दिया जाए और उसकी बात सुन ली जाए। उसका कहना था कि न्याय के हित में अदालत को ऐसी प्रक्रिया अपनानी चाहिए जिससे आरोपी को वास्तविक और प्रभावी तरीके से अपना पक्ष रखने का अवसर मिले।

दलील दी गई कि जब तक अभियुक्त को यह पता नहीं होगा कि कितनी और किस तरह की सामग्री जाँच एजेंसी ने रोक रखी है, तब तक वह अपना बचाव ठीक से तैयार नहीं कर सकता। यह भी कहा गया कि इन रोकी गई सामग्रियों में ऐसे सबूत भी हो सकते हैं जो अभियुक्त के पक्ष में हों और आरोपों को सीधे प्रभावित या कमजोर कर सकते हों। अभियोजन को यह छूट नहीं दी जा सकती कि वह केवल अभियुक्त को दोषी साबित करने वाली सामग्री चुने और बचाव में मदद करने वाली सामग्री को अपने पास दबाकर रखे।

ED ने कहा- कार्यवाही को लंबा खींचने की कोशिश

ED ने अदालत में सिद्दीकी की माँगों का कड़ा विरोध किया। ED ने इस पूरी अर्जी को कार्यवाही में जानबूझकर देरी कराने की एक सोची-समझी कोशिश करार दिया। ED के अनुसार, आरोपित अदालत को ऐसी जाँच करने के लिए मजबूर करना चाहता है जो संज्ञान से पहले की सुनवाई के दायरे से बिल्कुल बाहर है।

ED का तर्क था कि संज्ञान लेने और प्रोसेस (समन) जारी करने के चरण में कोर्ट को सिर्फ इतना देखना होता है कि शिकायत और अभियोजन द्वारा साथ में दाखिल सामग्री के आधार पर प्रथम दृष्टया (prima facie) मामला बनता है या नहीं। इस स्तर पर अभियुक्त को यह अधिकार नहीं है कि वह अपनी बचाव सामग्री पर विचार की माँग करे।

कोर्ट के आदेश का एक हिस्सा

ED ने कोर्ट को यह भी बताया कि 27 मार्च 2026 को इसी मामले में अनरिलाइड डॉक्यूमेंट्स को लेकर सिद्दीकी की माँग पर विस्तृत आदेश आ चुका है। उस आदेश में अदालत ने कहा था कि संज्ञान से पहले के चरण पर अनरिलाइड डॉक्यूमेंट्स की सूची देना जरूरी नहीं है। कोर्ट ने यह भी माना था कि उस समय जाँच जारी थी और ऐसी सूची देने से चल रही जाँच पर असर पड़ सकता है। इसी आधार पर वह आवेदन खारिज कर दिया गया था।

ED ने कहा कि इस मामले को हाई कोर्ट रेफर करने की कोई जरूरत नहीं है। ED ने धारा 436 की इस माँग को भी गलत और समय से पहले बताया। एजेंसी का कहना था कि सिद्दीकी जिन सवालों को हाई कोर्ट भेजना चाहते हैं, वे इस मामले में cognizance तय करने के लिए जरूरी नहीं हैं। वे व्यापक कानूनी सवाल हैं और अभी की सीमित सुनवाई से उनका सीधा संबंध नहीं है।

कोर्ट के आदेश में ED के दलीलों को लेकर कह गया है, “यह आवेदन कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है और इसका एकमात्र उद्देश्य मामले का संज्ञान लेने पर होने वाले विचार में देरी करना है। इसके लिए कार्यवाही को ऐसे दूसरे मुद्दों की ओर मोड़ा जा रहा है, जिनका इस न्यायालय द्वारा संज्ञान लेने से पहले के चरण में की जाने वाली सीमित कार्यवाही से कोई संबंध नहीं है।”

ED ने कहा कि BNSS की धारा 223(1) के प्रावधान के तहत होने वाली सुनवाई का दायरा सीमित है। इस सुनवाई का उद्देश्य मामले के गुण-दोष की विस्तार से जाँच करना, तथ्यों से जुड़े विवादित सवालों पर फैसला करना, बचाव पक्ष की दलीलों की जाँच करना या कानूनी सवालों पर अंतिम निर्णय देना नहीं है।

ED ने तर्क दिया कि अनुच्छेद 228 किसी अधीनस्थ न्यायालय को यह अधिकार नहीं देता कि वह इस प्रावधान का इस्तेमाल करे या माननीय उच्च न्यायालय को इसके तहत अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करने का निर्देश दे। अनुच्छेद 228 के तहत अधिकार का इस्तेमाल करने की शक्ति केवल माननीय उच्च न्यायालय में निहित है। इसका इस्तेमाल पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि उच्च न्यायालय इस बात से संतुष्ट है या नहीं कि कोई महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल मौजूद है, जिसका फैसला किया जाना जरूरी है।

ED के मुताबिक, BNSS की धारा 436 के तहत मामले को भेजने या भारत के संविधान के अनुच्छेद 228 को लागू करने का कोई आधार नहीं बनता है। अनुच्छेद 228 अधीनस्थ न्यायालय को यह अधिकार नहीं देता कि वह किसी मामले को उच्च न्यायालय के पास भेजे या उच्च न्यायालय को उसके तहत अपनी संवैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल करने का निर्देश दे।

कोर्ट ने अपने आदेश में क्या कहा?

न्यायाधीश शीतल चौधरी प्रधान ने अपने आदेश में कहा है, “आरोपित की ओर से unrelied documents की सूची देने की जो माँग की गई है, उस पर कोर्ट द्वारा 27 मार्च के विस्तृत आदेश में पहले ही फैसला किया जा चुका है। आरोपित को ऐसे दस्तावेज कब और किस चरण में दिए जाने चाहिए इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दे दिया है। आरोपित द्वारा की गई यह माँग बिना किसी कानूनी आधार के है और स्वीकार करने योग्य नहीं है।”

आदेश में आगे कहा गया है, “संज्ञान लेने के चरण में न्यायालय को केवल शिकायतकर्ता द्वारा पेश की गई सामग्री को ही देखना होता है। इसका उद्देश्य केवल यह पता लगाना है कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं, जिसके आधार पर आरोपित को अदालत में बुलाने की प्रक्रिया जारी की जा सके। आरोपित के पास मौजूद दस्तावेजों को रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति देने की माँग में कोई कानूनी आधार नहीं है।”

सिद्दीकी की दोनों अर्जियों को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा, “BNSS की धारा 436(2) में कहा गया है कि किसी मामले की सुनवाई कर रही सेशन कोर्ट, यदि उसे उचित लगे और वह मामला उपधारा (1) के तहत नहीं आता हो, तो उस मामले की सुनवाई के दौरान उठने वाले किसी भी कानूनी सवाल को उच्च न्यायालय के फैसले के लिए भेज सकती है। लेकिन वर्तमान मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में आरोपित द्वारा सामने रखे गए कानून से जुड़े कथित सवाल न तो अमान्य हैं और न ही प्रभावहीन।”

कोर्ट ने कहा, “इन प्रावधानों की व्याख्या उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसलों में पहले ही की जा चुकी है। इसलिए वर्तमान न्यायालय द्वारा इन सवालों पर माननीय उच्च न्यायालय से राय लेने के लिए मामला भेजने की जरूरत नहीं है। इसलिए, आरोपित की ओर से दाखिल इस आवेदन में भी कोई कानूनी आधार नहीं है।”

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शिव
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