भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) पटना की अंग्रेजी की प्रोफेसर डॉ प्रियांका त्रिपाठी एक बार फिर सुर्खियों में आ गई हैं। प्रियंका हाल के समय में हिंदू धर्म और उसके मूल तत्वों का अपमान करने के आरोप में आलोचना का सामना कर रही हैं।
इस बार उन्होंने एक नया विवादित शोध पत्र प्रकाशित किया है जिसका शीर्षक है, जेंडर्ड एंड कास्टिस्ट बॉडी: कास्ट(ई) इंग एंड कास्टिगेशन द फीमेल बॉडी इन सेलेक्ट बॉलीवुड फिल्म्स, जिसे बिदिशा पाल और पार्थ भट्टाचार्य के साथ मिलकर लिखा गया है। यह शोध पत्र भी उनके एजेंडा को बढ़ावा देने वाले विचारों और विवादित विषयों को लेकर चर्चा में है।
Hindu society normalises the act of r@pe claims a research paper.
डॉ प्रियंका त्रिपाठी ने इस शोध पत्र में भी अपने विवादित दावों को साबित करने के लिए पुरुषवादी और हिन्दू-विरोधी व्यक्तियों का हवाला दिया है। इसमें उन्होंने सुरज येगड़े का जिक्र किया है, जो अपने खालिस्तानी तत्वों से जुड़े होने के लिए कुख्यात हैं।
इस त्रय ने हिंदू समाज का अपमान और बढ़ा दिया, एक और संदिग्ध व्यक्ति मीना कंदासामी का हवाला देते हुए। उन्होंने लिखा, “एक पुरुष के लिए, महिला घर की दलित है (Zecchini 62 में उद्धृत)। महिलाओं को अक्सर कमजोर लिंग माना जाता है, चाहे उनकी जाति, वर्ग या स्थिति कुछ भी हो। पितृसत्ता महिलाओं को एक सीमित लिंग आधारित ढाँचे में बाँध देती है, जिससे उन्हें वस्तुवादित ऑब्जेक्टिफाइड जीवन जीना पड़ता है।” इसके जरिए उन्होंने तर्क किया कि महिला होना मूल रूप से ‘दलितता’ से जुड़ा हुआ है।
इस शोध पत्र ने शेखर कपूर की फिल्म बैंडिट क्वीन (1994) और अनुभव सिन्हा की आर्टिकल 15 का हवाला दिया, जो खुद भी एक लेफ्ट विंग की साजिश में शामिल माने जाते हैं। इसने बलात्कार जैसे संवेदनशील विषय को भी अपनी विकृत जातिवादी दृष्टिकोण से उठाने में कोई हिचक नहीं दिखाई।
लेखकों ने न केवल भारत में दलित समुदाय को आगे बढ़ाने के लिए किए गए ठोस प्रयासों, जैसे आरक्षण, को पूरी तरह नजरअंदाज किया, बल्कि उनके हालात की तुलना दक्षिण अफ्रीका में अपार्थीड से करके चौंका दिया।
उन्होंने लिखा, “अपार्थीड नस्लीय अलगाव और दक्षिण अफ्रीका के गैर-सफेद नागरिकों के खिलाफ आर्थिक और राजनीतिक भेदभाव का परिणाम था। भारत में दलित भी अलगाव की राजनीति का शिकार हैं। मुख्यधारा के भारतीय समाज में छुपा हुआ अपार्थीड मौजूद है, जो अलगाव के विचार को जन्म देता है। यह सब जाति व्यवस्था की श्रेणीबद्ध संरचना से उत्पन्न भौतिक अपार्थीड ही है। हालाँकि, दलित महिलाओं को अलग पहचान और अस्तित्व संबंधी संकटों का सामना करना पड़ता है क्योंकि उन्हें ‘अशुद्ध’ शरीर के रूप में देखा जाता है।”
लेखकों ने हालाँकि जल्दी ही अपने असली उद्देश्य पर पहुँच गए, जो हिंदू धर्म की निंदा करना था। उन्होंने बड़ी निडरता से दावा किया कि बलात्कार पितृसत्तात्मक हिंदू समाज में सामान्य घटना है।
पत्र में लिखा गया, “बलात्कार की क्रिया पितृसत्तात्मक हिंदू समाज के ‘नियमों’ में सामान्यीकृत है और कड़े रूढ़िवादिता के अनिवार्य परिणाम से जुड़ी है। जीन चैपमैन (2014) का कहना है कि ब्राह्मणवादी हिंदू धर्म महिलाओं के खिलाफ छोटी क्रियाओं को सामान्य मानता है और यह बताता है कि बलात्कार कोई अनियमित घटना नहीं है, बल्कि यह संरचित है।”
पत्र में शेखर कपूर की बैंडिट क्वीन का हवाला देते हुए लिखा गया, “सिनेमाई दृश्य सार्वजनिक बलात्कार के कृत्य में सवर्ण पितृसत्ता का लगातार प्रदर्शन करता है।” इसके जरिए उन्होंने बड़े जाति समुदाय की और अधिक निंदा भी की।
दिलचस्प बात यह है कि इस शोध पत्र में प्रस्तुत निंदनीय दावों के लिए किसी भी प्रकार के वास्तविक आंकड़े या तथ्य की जरूरत नहीं है और ऐसे सिद्धांत बनाने वाले लोग, जो इसे शोध के नाम पर पेश करते हैं, आम तौर पर किसी भी प्रकार की कार्रवाई या परिणाम का सामना भी नहीं करते।
डॉ प्रियंका त्रिपाठी का इतिहास विवादों से भरा रहा है
दिलचस्प बात यह है कि इस शोध पत्र में प्रस्तुत निंदनीय दावों के लिए किसी भी प्रकार के वास्तविक आंकड़े या तथ्य की जरूरत नहीं है और ऐसे सिद्धांत बनाने वाले लोग, जो इसे शोध के नाम पर पेश करते हैं, आम तौर पर किसी भी प्रकार की कार्रवाई या परिणाम का सामना भी नहीं करते।
इसके अलावा, यह पता चला है कि त्रिपाठी का ब्रिटेन की पब्लिशिंग कंपनी टेलर और फ्रांसिस के साथ गहरा संबंध है, जो लगातार भारत, हिंदुत्व, नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) की आलोचना करता रहा है और यहाँ तक कि भारतीय लोकतंत्र का भी मजाक उड़ाता रहा है।
त्रिपाठी की वैचारिकता, काम और संबंध हिंदू विरोध (Hindumisia) में गहराई से जड़ें जमा चुके हैं और ऐसे व्यक्ति को देश के एक प्रतिष्ठित संस्थान में भारतीय टॉप मस्तिष्कों को पढ़ाने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई है। सबसे चिंता की बात यह है कि शैक्षणिक संस्थानों में और भी कई लोग हैं जिनके विचार हिंदू विरोध से प्रभावित हैं।
यह बताना भी जरूरी नहीं कि वे भविष्य की पीढ़ियों में शिक्षा के नाम पर क्या बीजारोपण कर रहे हैं और अपने छात्रों के प्रति जाति या धर्म के आधार पर कितना पक्षपात कर रहे हैं। इसके अलावा, इनका उद्देश्य वास्तव में सच्चे रूप से दबे-कुचले समुदायों के मुद्दों को उठाना नहीं है, बल्कि उन्हें हिंदुओं पर हमला करने और अपनी विचारधारा फैलाने के लिए एक औजार के रूप में इस्तेमाल करना है।
इस तरह, यह साफ है कि यह पहली बार नहीं है जब अकादमिक जगत में हिंदू धर्म का मजाक उड़ाया, अपमानित और निजी एजेंडों के लिए इस्तेमाल किया गया और यह अंतिम भी नहीं होगा। त्रिपाठी और उनके जैसे लोग भारतीय शिक्षा प्रणाली में व्याप्त गिरावट का प्रतीक हैं और अगर संस्थान, सरकार या समुदाय द्वारा कड़े सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो ये और अधिक फैलेंगे, खासकर उस समुदाय में जिसकी आस्था को ये लोग मजाक या पिटाई का विषय बना देते हैं।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
भारत अपनी सीमाओं को केवल जमीन पर ही नहीं, बल्कि आसमान में भी सुरक्षित करने के लिए एक ऐसी ‘जादुई दीवार’ तैयार कर रहा है, जिसे पार करना किसी भी दुश्मन के लिए नामुमकिन होगा। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद भारत ने अपनी रक्षा रणनीति में एक बड़ा बदलाव किया है और अब पूरा फोकस ‘प्रोजेक्ट कुशा’ (Project Kusha) पर है।
इसे ‘मिशन सुदर्शन चक्र’ का नाम भी दिया जा रहा है। सरल शब्दों में कहें तो यह एक ऐसा एयर डिफेंस सिस्टम है जो ड्रोन, फाइटर जेट और मिसाइलों को आसमान में ही ढूँढकर उन्हें आग के गोले में तब्दील कर देगा। DRDO (रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन) के वैज्ञानिकों ने पुष्टि की है कि यह सिस्टम साल 2030 से भारतीय वायुसेना का हिस्सा बनना शुरू हो जाएगा।
क्या है प्रोजेक्ट कुशा और इसका ‘थ्री-टियर’ कवच?
प्रोजेक्ट कुशा असल में भारत का अपना स्वदेशी ‘लॉन्ग रेंज एयर डिफेंस सिस्टम’ (LRSAM) है। आपने रूस के प्रसिद्ध S-400 सिस्टम के बारे में सुना होगा, प्रोजेक्ट कुशा को भारत का S-400 ही माना जा रहा है। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसका ‘लेयर्ड डिजाइन’ है। इसका मतलब है कि यह सिस्टम एक नहीं, बल्कि तीन अलग-अलग स्तरों (Levels) पर सुरक्षा प्रदान करेगा।
DRDO की लैब (DRDL) के निदेशक ए राजू के अनुसार, इस प्रोजेक्ट में तीन तरह की मिसाइलें विकसित की जा रही हैं- मार्क-1, मार्क-2 और मार्क-3। ये तीनों मिसाइलें मिलकर 60 किलोमीटर से लेकर 350-400 किलोमीटर तक के दायरे में एक अभेद्य सुरक्षा चक्र बनाएँगी। अगर कोई दुश्मन मिसाइल 350 किमी दूर है, तो उसे मार्क-3 संभाल लेगा, और अगर कोई खतरा पास आ गया है, तो मार्क-1 और मार्क-2 उसे खत्म कर देंगे।
तीन मिसाइलों की ताकत: 60 से 400 किमी तक नो-फ्लाई जोन
प्रोजेक्ट कुशा की ये तीन मिसाइलें भारत की इंटरसेप्शन क्षमता (दुश्मन को बीच में ही रोकने की शक्ति) को नई ऊँचाइयों पर ले जाएँगी। रिपोर्ट के अनुसार, मार्क-1 (M1) मिसाइल की मारक क्षमता लगभग 150 किलोमीटर तक होगी। यह उन खतरों के लिए है जो मध्यम दूरी तक पहुँच चुके हैं। इसके बाद आती है मार्क-2 (M2), जिसकी रेंज 250 किलोमीटर तय की गई है।
सबसे खतरनाक है मार्क-3 (M3), जो भारत की इंटरसेप्शन पावर को 350 से 400 किलोमीटर तक पहुँचा देगी। यह सिस्टम इतना एडवांस होगा कि यह न केवल फाइटर जेट्स, बल्कि क्रूज मिसाइलों और ‘हाई-वैल्यू’ हवाई खतरों (जैसे दुश्मन के जासूसी विमान) को भी पलक झपकते ही पहचान लेगा। वायुसेना की योजना इसके 10 स्क्वाड्रन खरीदने की है, जो अगले दशक में भारत की हवाई सुरक्षा का मुख्य स्तंभ बनेंगे।
स्वदेशी ‘सुदर्शन चक्र’: आयात पर निर्भरता होगी खत्म
भारत अब तक लंबी दूरी के एयर डिफेंस के लिए रूस या अन्य देशों पर निर्भर रहता था। S-400 का आना एक बड़ी बात थी, लेकिन प्रोजेक्ट कुशा भारत को इस मामले में ‘आत्मनिर्भर’ बना देगा। ‘मिशन सुदर्शन चक्र’ के तहत भारतीय वैज्ञानिक मिसाइल गाइडेंस, सीकर तकनीक (जो मिसाइल को रास्ता दिखाती है) और प्रोपल्शन सिस्टम जैसी जटिल तकनीकों को खुद भारत में ही विकसित कर रहे हैं।
जब यह सिस्टम पूरी तरह तैयार हो जाएगा, तो यह भारत के मौजूदा सिस्टम जैसे ‘आकाश’ (जो कम दूरी के लिए है) और ‘S-400’ (जो बहुत लंबी दूरी के लिए है) के बीच के खाली स्थान को भर देगा। आकाश, कुशा और S-400 मिलकर एक ऐसी ‘मल्टी-लेयर’ सुरक्षा बनाएँगे कि दुश्मन का एक परिंदा भी भारतीय वायुक्षेत्र में पर नहीं मार सकेगा। इसे 2035 तक पूरी तरह से तैनात करने का लक्ष्य रखा गया है।
ट्रायल का दौर: काँसेप्ट से हकीकत की ओर बढ़ते कदम
प्रोजेक्ट कुशा अब केवल कागजों पर नहीं है, बल्कि यह डेवलपमेंटल ट्रायल के अहम फेज में प्रवेश कर रहा है। इसका मतलब है कि अब इन मिसाइलों के वास्तविक परीक्षण शुरू होने वाले हैं। पहले DRDO इसके तकनीकी ट्रायल करेगा, जिसमें देखा जाएगा कि मिसाइल का इंजन और रडार सही काम कर रहे हैं या नहीं। इसके बाद भारतीय वायुसेना के साथ ‘यूजर ट्रायल’ होंगे।
रणनीतिक दृष्टि से यह प्रोजेक्ट भारत की स्थिति को दुनिया के उन चुनिंदा देशों की कतार में खड़ा कर देगा, जिनके पास अपना खुद का मल्टी-लेयर्ड एयर डिफेंस नेटवर्क है। इससे न केवल हमारी हवाई सुरक्षा बढ़ेगी, बल्कि युद्ध के समय हमारे रणनीतिक ठिकानों (जैसे परमाणु प्लांट, बड़े शहर और सैन्य बेस) को किसी भी तरह के एरियल थ्रेट से सुरक्षा की गारंटी मिलेगी।
आसमान में भारत की बढ़ती धमक और आत्मनिर्भरता
प्रोजेक्ट कुशा केवल एक मिसाइल प्रोग्राम नहीं है, बल्कि यह बदलती वैश्विक परिस्थितियों में भारत की ‘प्रोएक्टिव डिफेंस’ रणनीति का एक बड़ा हिस्सा है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और सीमाओं पर बढ़ते तनाव के बीच, भारत ने यह समझ लिया है कि भविष्य के युद्ध जमीन से ज्यादा आसमान में लड़े जाएंगे। ड्रोन हमलों और हाई-स्पीड क्रूज मिसाइलों के दौर में, जिसके पास सबसे सटीक एयर डिफेंस होगा, वही देश सुरक्षित रहेगा।
इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी जीत इसकी स्वदेशी तकनीक है। जब हम विदेशी सिस्टम खरीदते हैं, तो उनकी मरम्मत और पार्ट्स के लिए हमें दूसरे देशों की शर्तों पर निर्भर रहना पड़ता है। लेकिन ‘प्रोजेक्ट कुशा’ या ‘सुदर्शन चक्र’ पूरी तरह हमारा अपना होगा। यह भारत के वैज्ञानिकों की काबिलियत का प्रमाण है कि हम S-400 के टक्कर का सिस्टम खुद तैयार कर रहे हैं। 2030 से जब इसकी तैनाती शुरू होगी, तब भारत का आकाश वास्तव में एक ‘अभेद्य किला’ बन चुका होगा। यह ‘न्यू इंडिया’ की वह तस्वीर है जो न केवल अपनी रक्षा करना जानती है, बल्कि तकनीक के मामले में दुनिया को चुनौती देने के लिए भी तैयार है।
दिल्ली के भगवान दास रोड पर स्थित राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) लंबे समय से परफॉर्मिंग और विजुअल आर्ट्स का एक मजबूत केंद्र रहा है, जो दूर-दूर तक अपनी छाप छोड़ता आया है। लेकिन अब हरियाणा के रोहतक में स्थित दादा लख्मी चंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ परफॉर्मिंग एंड विजुअल आर्ट्स (डीएलसी सुपवा) तेजी से उभर रहा है। इंदिरा गाँधी अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट से मात्र 85 किलोमीटर दूर यह विश्वविद्यालय कला के क्षेत्र में नई उम्मीदों की किरण बनकर सामने आया है। मोदी सरकार के साथ ही 2014 में अस्तित्व में आया यह संस्थान ‘कला साधना परम दैवतम्’ के ध्येय वाक्य के साथ आगे बढ़ रहा है।
36 एकड़ के विशाल परिसर को प्रसिद्ध आर्किटेक्ट राज रेवाल ने डिजाइन किया है, जिसमें करीब 300 करोड़ रुपये का निवेश हुआ। पिछले कुछ वर्षों में प्रशासनिक चुनौतियों, संकाय की कमी और उपकरणों की अपर्याप्तता के कारण विश्वविद्यालय को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। फिल्म और टेलीविजन विभाग में देरी से कई बैच प्रभावित हुए- उदाहरण के लिए, 2017-2021 बैच ने 2024 में डिग्री पूरी की, जबकि 2018-2022 बैच को 2025 या 2026 तक इंतजार करना पड़ा। छात्रों के विरोध प्रदर्शन भी हुए, जो 2016 से 2023 तक विभिन्न रूपों में जारी रहे और 2024 में दो महीने से अधिक चला। इन सबके बावजूद संस्थान में नई ऊर्जा का संचार हो रहा है।
साल 2025 में डॉ. अमित आर्य के छठे कुलपति के रूप में कार्यभार संभालने के बाद सुपवा में सकारात्मक बदलावों की बयार बहने लगी। एक जाने-माने पत्रकार और मीडिया विशेषज्ञ डॉ. आर्य ने नेतृत्व संभालते ही पुरानी कमियों को दूर करने और संस्थान को नई दिशा देने का संकल्प लिया। अप्रैल 2025 में हरियाणा सरकार ने सुपवा को राज्य की सभी यूनिवर्सिटीज में फिल्म मेकिंग कोर्स शुरू करने के लिए मेंटर बनाने की जिम्मेदारी सौंपी। साथ ही पंचकूला में हएमटी कालका की 100 एकड़ सरकारी जमीन पर फिल्म सिटी और गुरुग्राम में एक और फिल्म सिटी के लिए प्रक्रिया शुरू हुई। ये कदम हरियाणा में परफॉर्मिंग और विजुअल आर्ट्स के परिदृश्य को बदलने वाले साबित हो रहे हैं।
डॉ. आर्य ने सबसे पहले विश्वविद्यालय के पारंपरिक महोत्सव ‘सारंग’ को पुनर्जीवित करने का फैसला किया, जो कई वर्षों से बंद पड़ा था। उनके नेतृत्व में ‘सारंग’ को एनएसडी के भारत रंग महोत्सव (भारंगम) के साथ जोड़कर राष्ट्रीय स्तर पर लाया गया। फरवरी 2026 में आयोजित चार दिवसीय ‘भारंगम’ (भारत रंग महोत्सव के 25वें संस्करण का हिस्सा) और ‘सारंग’ महोत्सव ने सुपवा को नई पहचान दी। महोत्सव की सफलता की गूँज दिल्ली-एनसीआर तक पहुँची, जिस पर हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सैनी ने शुभकामनाएँ भेजीं और भविष्य में किसी आयोजन में शामिल होने की इच्छा जताई।
महोत्सव की शुरुआत प्रभु वंदना से हुई, जिसमें असम के शास्त्रीय नृत्य सत्रिया के माध्यम से कृष्ण की लीलाओं का सुंदर चित्रण किया गया। दिल्ली के पार्थ हजारिका ग्रुप ने ‘सत्त्रिया की आत्मा’ प्रस्तुत की, जिसमें चेहरे के भाव, हाथों की मुद्राएँ और शरीर की अभिव्यक्ति ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। सुधीर रेखरी के बैंड ने विविध गीतों की धुनों पर सभी को झूमने पर मजबूर किया। महोत्सव में रंगमंच, संगीत, नृत्य, कविता पाठ, लोक नृत्य और संवाद सत्रों का सिलसिला चला। सुपवा के 50 छात्रों ने कथक, भरतनाट्यम, भंगड़ा, कव्वाली और बॉडी मूवमेंट थियेटर जैसी प्रस्तुतियाँ दीं।
एनएसडी की ओर से आयोजित ‘भारंगम’ में दिल्ली, पंजाब और श्रीलंका से चार नाटकों का मंचन हुआ। 107 एनएसडी सदस्यों (कलाकार, टेक्निशियन, म्यूजिशियन) ने भाग लिया। श्रीलंका के अपूर्वा थिएटर ग्रुप का नाटक ‘कोलम्बा हाथे थोराना’ विशेष आकर्षण रहा। सिंहली भाषा में मंचित इस दो घंटे के प्रयोगात्मक नाटक में प्रेम, विवाह और संघर्ष के तीन भागों में इंसानी रिश्तों की नाजुकता को दर्शाया गया। प्रोजेक्टर पर सबटाइटल्स की मदद से भाषा की बाधा दूर हुई, लेकिन कलाकारों के अभिनय ने भाषा को पीछे छोड़ दिया। नाटक में निपुनी शारदा, थिलीनी जयमाली सहित आठ कलाकारों ने शानदार प्रदर्शन किया।
समापन समारोह में पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने अवधी गीतों से दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने कहा, “सुपवा की धरती पर कुलपति डॉ. अमित आर्य ने कला का बीज बोया है और उसकी बागवानी व रखवाली की है। यहां आकर ऐसा लगा जैसे एनएसडी पहुँच गई हूँ।” उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में शादी-विवाह के दौरान महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले गीतों में सहज अभिनय का उदाहरण दिया और छात्रों को अपनी अभिव्यक्ति को खुलकर सामने लाने की प्रेरणा दी।
‘नखरे वाली बन्नो आई पिया’ गीत पर अभिनेत्री मेघना मलिक भी उनके साथ नाचने को मजबूर हुईं। छात्र छात्राओं का जैसा समर्थन इस प्रदर्शन को मिला, इसे चार दिनों की सबसे सफल प्रस्तुति कही जा सकती है। जहाँ कलाकार के साथ साथ दर्शक दीर्घा में मौजूद पूरा जेन-जी समूह झूम रहा था।
अभिनेत्री मेघना मलिक ने कहा, “पहले अभिनय के लिए सिर्फ एनएसडी का नाम था, लेकिन अब सुपवा आपके शहर में है-इससे खूबसूरत क्या हो सकता है?” क्राइम रिपोर्टर श्रीवर्धन त्रिवेदी ने रंगमंच को संपूर्ण विद्या बताते हुए ऐसे आयोजनों की निरंतरता पर जोर दिया। अभिनेता विक्रम कोचर ने फैसले लेने की अहमियत पर प्रकाश डाला।
करीब 60 वॉलंटियर्स और पूरे सुपवा परिवार ने महोत्सव को सफल बनाया। डॉ. आर्य के नेतृत्व में तैयार रोडमैप के तहत भविष्य में ऐसे बड़े आयोजन नियमित होंगे। सुपवा अब एनएसडी जैसा विकल्प बन रहा है, जहाँ युवा कलाकारों को नई संभावनाएँ मिल रही हैं। हरियाणा में कला का नया अध्याय लिखा जा रहा है-उम्मीदों से भरा, ऊर्जा से लबरेज और सफलता की ओर अग्रसर।
भारत के सामरिक इतिहास में 14 फरवरी 2026 का दिन एक सुनहरे अक्षरों में लिखा जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार (14 फरवरी) को असम के डिब्रूगढ़ में C-130J सुपर हरक्यूलिस विमान से मोरन बाईपास पर बनी इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी (ELF) पर लैंडिंग की।
चीन सीमा के सामरिक महत्व को देखते हुए पूर्वोत्तर में यह अपनी तरह की पहली सुविधा है। यह सिर्फ एक सड़क नहीं, बल्कि युद्ध के समय वायुसेना का ‘ब्रह्मास्त्र’ है। यहाँ सुखोई-30 MKI और राफेल जैसे फाइटर जेट्स का ‘टच-एंड-गो’ अभ्यास यह बताता है कि अब भारत की सड़कें भी आसमान से आने वाली चुनौतियों का जवाब देने के लिए तैयार हैं।
क्या होती है इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी (ELF)?
आसान भाषा में कहे तो ELF हाईवे का वह हिस्सा है जिसे सामान्य दिनों में गाड़ियों के चलने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन आपातकाल में इसे कुछ ही घंटों के भीतर ‘रनवे’ में बदला जा सकता है। एक सामान्य सड़क और ELF में जमीन-आसमान का अंतर होता है। सामान्य सड़क फाइटर जेट्स का वजन नहीं सह सकती, लेकिन ELF को ICAO (International Civil Aviation Organization) के स्टैंडर्ड पर तैयार किया जाता है।
इसे बनाने में कंक्रीट और कोलतार की कई मोटी परतें बिछाई जाती हैं ताकि यह 40 टन के लड़ाकू विमान और 74 टन के भारी-भरकम मालवाहक विमानों (जैसे C-130J) का लैंडिंग लोड बर्दाश्त कर सके। इसकी बनावट में कोई बिजली के खंभे, ऊँचे पेड़ या डिवाइडर उस हिस्से में नहीं होते, ताकि विमान के पंख कहीं टकरा न जाएँ। इसके दोनों तरफ बाड़ (Fencing) लगाई जाती है ताकि जानवर या इंसान रनवे पर न आ सकें।
असम के अलावा देश में कहाँ-कहाँ हैं ये जादुई सड़कें?
भारत अपनी सीमाओं की सुरक्षा को अभेद्य बनाने के लिए एक महत्वाकांक्षी योजना पर काम कर रहा है, जिसके तहत देशभर में कुल 28 इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी (ELF) तैयार की जा रही हैं। पूर्वोत्तर भारत की बात करें तो असम में कुल 5 ऐसी स्ट्रिप बनाई जानी हैं, जिनमें मोरन की स्ट्रिप पहली और रणनीतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण है।
लेकिन असम के अलावा भी देश के विभिन्न कोनों में कई महत्वपूर्ण एयरस्ट्रिप पहले से ही सक्रिय (Operational) हैं, जो भारत की सैन्य शक्ति को वैश्विक स्तर पर प्रदर्शित करती हैं। राजस्थान के बाड़मेर (NH-925A) में स्थित स्ट्रिप भारत की पहली आधिकारिक ELF है, जिसका उद्घाटन 2021 में हुआ था।
पाकिस्तान सीमा के करीब होने के कारण यह पश्चिमी मोर्चे पर सुरक्षा की दृष्टि से बेहद अहम मानी जाती है। इसी तरह उत्तर प्रदेश में दो प्रमुख स्ट्रिप्स हैं, पहली आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर, जहाँ 2015 और 2017 में मिराज और सुखोई जैसे अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों की लैंडिंग कराकर दुनिया को भारत के बढ़ते सामर्थ्य का परिचय दिया गया था। दूसरी स्ट्रिप पूर्वांचल एक्सप्रेसवे के सुल्तानपुर जिले में स्थित है, जहाँ प्रधानमंत्री मोदी स्वयं C-130J सुपर हरक्यूलिस विमान से उतरकर इसकी क्षमता का प्रमाण दे चुके हैं।
तटीय और पहाड़ी क्षेत्रों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए दक्षिण भारत में आंध्र प्रदेश के नेल्लोर (NH-16) को एक प्रमुख रणनीतिक केंद्र के रूप में विकसित किया गया है। वहीं, पूर्वी तट पर ओडिशा के बालासोर (NH-16) में भी इसी तरह की सुविधा तैयार की गई है, ताकि बंगाल की खाड़ी की ओर से उत्पन्न होने वाले किसी भी खतरे का त्वरित जवाब दिया जा सके।
उत्तर में जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग में बनी ELF सबसे चुनौतीपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि इसे कठिन पहाड़ी भूगोल के बीच वायुसेना की सीधी पहुँच सुनिश्चित करने के लिए विशेष तौर पर निर्मित किया गया है। ये सभी एयरस्ट्रिप्स मिलकर भारत के चारों ओर एक ऐसा सुरक्षा कवच बनाती हैं, जो युद्ध या आपदा के समय भारतीय वायुसेना को किसी भी मुख्य एयरबेस पर निर्भरता के बिना तुरंत कार्रवाई करने की शक्ति देती हैं।
इमरजेंसी में ‘रिफिलिंग ऑयल’ और लॉजिस्टिक्स की क्या है तैयारी?
सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि अगर विमान हाईवे पर उतर गया, तो उसे तेल (ATF – Aviation Turbine Fuel) कहाँ से मिलेगा? इसके लिए वायुसेना और सरकार ने ‘मोबाइल रिफ्यूलिंग सिस्टम’ तैयार किया है। जब किसी हाईवे को ELF घोषित किया जाता है, तो उसके आसपास के डिपो में तेल का रिजर्व रखा जाता है।
आपातकाल यानि इमरजेंसी में विशालकाय टैंकर ट्रक, जिनमें हाई-प्रेशर पंप लगे होते हैं, सीधे हाईवे पर पहुँच जाते हैं। इसके अलावा, यहाँ ‘टेंपरेरी एटीसी (Air Traffic Control)’ केबिन बनाए जाते हैं। पोर्टेबल रडार और नेविगेशन सिस्टम को ट्रकों पर लोड करके स्ट्रिप के पास तैनात किया जाता है, जो पायलट को सुरक्षित लैंडिंग में मदद करते हैं। साथ ही, घायलों को निकालने के लिए हेलीकॉप्टर रिस्क्यू ज़ोन और मोबाइल मेडिकल यूनिट्स की भी व्यवस्था इन स्ट्रिप्स के पास पहले से चिह्नित होती है।
युद्ध और आपदा में कैसे बदल जाएगी देश की तस्वीर?
ELF का महत्व सिर्फ युद्ध तक सीमित नहीं है। कल्पना कीजिए कि पूर्वोत्तर में भीषण बाढ़ या भूकंप आ जाए और मुख्य एयरपोर्ट के रनवे क्षतिग्रस्त हो जाएँ। ऐसी स्थिति में ये हाईवे स्ट्रिप्स जीवनदान साबित होंगी। यहाँ बड़े मालवाहक विमान उतरकर टनों राहत सामग्री, दवाइयाँ और बचाव दल (NDRF) पहुँचा सकते हैं।
युद्ध के नजरिए से देखें तो दुश्मन सबसे पहले एयरबेस और रडार को निशाना बनाता है। अगर हमारा मुख्य रनवे तबाह भी हो जाए, तो हमारे फाइटर जेट्स इन 28 अलग-अलग हाईवे स्ट्रिप्स से उड़ान भरकर दुश्मन को जवाब दे सकते हैं। इससे दुश्मन के लिए यह अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है कि भारतीय वायुसेना अगला हमला कहाँ से करेगी। इसे ‘डिस्पर्सल ऑफ एसेट्स’ कहा जाता है, यानी अपनी ताकत को एक जगह जमा न करके फैला देना।
असम और पूर्वोत्तर के लिए क्यों है यह ‘गेम चेंजर’?
असम का डिब्रूगढ़-मोरन इलाका चीन सीमा (LAC) के बहुत करीब है। यहाँ का भूगोल नदियों और पहाड़ों से भरा है। यहाँ 4.2 किलोमीटर लंबी एयरस्ट्रिप का बनना सुरक्षा की रीढ़ को मजबूत करता है। इसके साथ ही सरकार ब्रह्मपुत्र के नीचे अंडरवाटर रोड-रेल टनल और कई स्ट्रेटेजिक टनल बना रही है।
ये सभी प्रोजेक्ट्स मिलकर ‘सिलीगुड़ी कॉरिडोर’ (चिकन नेक) पर हमारी निर्भरता को कम करेंगे। अगर कभी दुश्मन इस पतले गलियारे को रोकने की कोशिश भी करे, तो हमारी वायुसेना इन हाईवे स्ट्रिप्स के जरिए सेना की भारी तैनाती और रसद की सप्लाई जारी रख पाएगी। यह प्रधानमंत्री मोदी के उस विजन का हिस्सा है जिसमें ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ के तहत पूर्वोत्तर को देश का विकास इंजन और रक्षा कवच बनाया जा रहा है।
सिर्फ एक सड़क नहीं, भारत का ‘अभय कवच’
डिब्रूगढ़ के मोरन में प्रधानमंत्री की लैंडिंग ने एक स्पष्ट संदेश भेज दिया है। यह इस बात का प्रमाण है कि भारत अब अपनी सीमाओं पर केवल बुनियादी ढाँचा खड़ा नहीं कर रहा, बल्कि अपनी ‘फायरपावर’ को वहाँ शिफ्ट कर रहा है जहाँ से दुश्मन की संभावित चुनौती शुरू होती है।
चीन सीमा के इतने करीब फाइटर जेट्स का हाईवे पर उतरना यह दर्शाता है कि भारतीय वायुसेना अब पारंपरिक एयरबेस की मोहताज नहीं रही। अब हमारी हर मुख्य सड़क दुश्मन के लिए एक सक्रिय रनवे है। पूर्वोत्तर का भूगोल हमेशा से सेना के लिए एक चुनौती रहा है, लेकिन ELF जैसी सुविधाएँ इस चुनौती को ताकत में बदल देती हैं।
यह ‘प्रोएक्टिव’ डिफेंस का बेहतरीन उदाहरण है। मोबाइल रिफ्यूलिंग और पोर्टेबल एटीसी जैसी तैयारियाँ यह बताती हैं कि भारत अब किसी घटना के होने का इंतजार नहीं करता, बल्कि संभावित युद्ध की तैयारी शांति काल में ही पूरी कर लेता है। यह उस ‘न्यू इंडिया’ की तस्वीर है जो शांति का पक्षधर तो है, लेकिन अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए अपनी सड़कों को भी रणक्षेत्र बनाने का दम रखता है। पूर्वोत्तर अब भारत की सुरक्षा का सबसे मजबूत ढाल बन चुका है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार (10 फरवरी 2026) को एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि जाति जन्म से तय होती है और अंतरजातीय विवाह या धर्म परिवर्तन के बाद भी नहीं बदलती।
यह टिप्पणी जस्टिस अनिल कुमार ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम से जुड़े एक आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान की। मामला एक अनुसूचित जाति (SC) की महिला से जुड़ा है, जिसने अपनी जाति से बाहर विवाह किया था।
इस केस में दिनेश और आठ अन्य लोगों ने SC/ST एक्ट के तहत विशेष जस्टिस के उस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें IPC की धाराएँ 323 (मारपीट), 506 (धमकी), 452 (घर में घुसकर हमला) और 354 (महिला की मर्यादा भंग करने की कोशिश) के साथ-साथ SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(R) के तहत ट्रायल का सामना करने का आदेश दिया गया था। हालाँकि हाईकोर्ट ने उनकी अपील खारिज कर दी।
महिला ने आरोप लगाया था कि आरोपित ने उसके साथ मारपीट की, गाली-गलौज की और जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया। उसने शिकायत में बताया कि इस घटना में वह समेत तीन लोग घायल हुए थे। यह घटना उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले में हुई थी।
कोर्ट ने यह भी कहा कि FIR और शिकायत में बताई गई दोनों घटनाएँ एक ही दिन और एक ही समय की हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोपितों का यह दावा कि शिकायत बदले की भावना से दर्ज कराई गई है, स्वीकार नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि शिकायत में साफ तौर पर मारपीट और जातिसूचक गालियों का जिक्र है और तीन लोगों के घायल होने की बात भी सामने आई है। ऐसे में अपील में कोई दम नहीं है और इसे खारिज किया जाना सही है।
कोर्ट ने दलीलें सुनीं और अपना फैसला सुनाया
अपीलकर्ताओं ने दलील दी कि उन्हें झूठा फंसाया गया है और मौजूदा शिकायत से पहले महिला के खिलाफ ही एक FIR दर्ज की गई थी। उनका कहना था कि मेडिकल रिपोर्ट रिकॉर्ड में मौजूद है, जिससे साबित होता है कि उनके परिवार के अन्य लोग भी इस घटना में घायल हुए थे।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि महिला मूल रूप से पश्चिम बंगाल की रहने वाली है और वहाँ वह SC/ST समुदाय से संबंधित थी। लेकिन उसने जाट समुदाय के व्यक्ति से शादी कर ली है। आरोपितों का कहना था कि महिला ने यह सच छिपाया और खुद को अब भी SC/ST समुदाय की सदस्य बताकर मामला दर्ज कराया। उनके अनुसार, जब उसने जाट समुदाय के व्यक्ति से विवाह कर लिया, तो वह खुद को SC/ST समुदाय की महिला नहीं बता सकती।
आरोपितों ने आगे कहा कि किसी दूसरी जाति में विवाह करने के बाद महिला अपनी मूल जाति खो देती है और पति की जाति में शामिल हो जाती है। इसलिए उनके खिलाफ SC/ST एक्ट समेत अन्य धाराओं में कार्रवाई करना कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है और इसे रद्द किया जाना चाहिए।
हालाँकि कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि किसी मामले में क्रॉस-केस (दोनों पक्षों की ओर से दर्ज मुकदमा) होना, दूसरी पार्टी की शिकायत को खारिज करने का आधार नहीं बनता। इसलिए ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपितों को तलब करने में कोई अवैधता नहीं है।
कोर्ट ने साफ कहा कि यह तर्क कि जाट समुदाय के व्यक्ति से शादी करने के बाद महिला ने अपनी जाति खो दी, पूरी तरह बेबुनियाद है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन कर सकता है, लेकिन उसकी जाति नहीं बदलती। विवाह से भी जाति में कोई बदलाव नहीं होता। इसलिए आरोपितों की यह दलील टिकाऊ नहीं है। इन सभी तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने अपील खारिज कर दी।
विशेष न्यायाधीश, SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम का आदेश
SC/ST (अत्याचार निवारण) एक्ट की कोर्ट में विशेष न्यायाधीश संजीव कुमार सिंह ने 27 जुलाई 2022 को ज्योतिराय देवी की शिकायत पर फैसला सुनाया। ज्योतिराय देवी ने कोर्ट से माँग की थी कि दिनेश, महेंद्र, सतीश, लोटन, भारत भूषण, टिकेश, अजीत, सुभाष, रिंकू, राजेश देवी और मंजू देवी को मुकदमे के लिए तलब किया जाए और उन्हें सजा दी जाए।
ज्योतिराय देवी ने खुद को अनुसूचित जाति (SC) का बताया और आरोप लगाया कि आरोपित जाट समुदाय के प्रभावशाली लोग हैं। कोर्ट के आदेश में दर्ज है कि पिछले साल उन्होंने गाँव प्रधान का चुनाव लड़ा था, जिसके बाद से आरोपितों से उनकी रंजिश चल रही थी।
शिकायत के मुताबिक 6 सितंबर 2021 को वह अपने घर के आंगन में खाना बना रही थीं, तभी उनके आंगन में कुछ ईंटें फेंकी गईं। उन्होंने इसका विरोध किया तो आरोप है कि दिनेश और महेंद्र लाठी लेकर घर में घुस आए।
भारत भूषण के पास देसी तमंचा था, टिकेश के हाथ में लोहे की पाइप थी, अजीत के पास हंसिया था और शुभम व रिंकू ईंट और डंडे लिए हुए थे। वहीं राजेश देवी के हाथ में भी ईंट थी और मंजू देवी भी डंडा लिए हुए बताई गईं।
शिकायत के अनुसार, आरोपित ने ज्योतिराय देवी और उनके परिवार के सदस्यों के साथ मारपीट की और गाली-गलौज की। आरोप है कि वह गाँव में खुलकर अपनी बात रखती थीं और खुद को एक नेता के तौर पर स्थापित करने की कोशिश कर रही थीं, इसी वजह से आरोपित उन्हें सबक सिखाना चाहते थे।
शिकायत में कहा गया कि आरोपितों ने उन्हें धक्का देकर गिरा दिया और आपत्तिजनक बातें कहीं। इसी दौरान दिनेश ने उनके साथ अश्लील हरकत करते हुए उनके निजी अंगों को पकड़ लिया। वहीं महेंद्र, सतीश, राजेश देवी और मंजू देवी ने लाठी-डंडों और ईंटों से उनकी पिटाई की।
आरोप यह भी है कि भारत भूषण ने जान से मारने की नीयत से उनके परिवार वालों पर फायरिंग की। हालाँकि वे बाल-बाल बच गए, लेकिन ज्योतिराय देवी को चोटें आईं। शोर सुनकर पड़ोस के धर्मवीर और सीताराम मौके पर पहुँचे और बीच-बचाव करने की कोशिश की। इस दौरान आरोपितों ने उन्हें भी धमकाया और ज्योतिराय देवी को जान से मारने की धमकी देते हुए वहाँ से चले गए।
पुलिस शिकायत और कोर्ट के फैसले पर कोई कार्रवाई नहीं
शिकायत में यह भी कहा गया कि घटना के बाद ज्योतिराय देवी रिपोर्ट दर्ज कराने थाने पहुँचीं, लेकिन पुलिस ने उनकी शिकायत दर्ज नहीं की। इसके बाद उन्होंने 21 सितंबर 2021 को अलीगढ़ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) को लिखित आवेदन दिया। हालांकि, इसके बावजूद भी कोई कार्रवाई नहीं की गई।
मामले में ज्योतिराय देवी का बयान दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 200 और 202 के तहत दर्ज किया गया। उन्होंने अपने, विष्णु कुमार और रमेश की मेडिकल जाँच के रिपोर्ट की फोटोकॉपी भी SSP को सौंपने की बात कही।
इससे पहले उन्होंने धारा 156(3) CrPC के तहत भी एक आवेदन दिया था, जिस पर पुलिस स्टेशन से रिपोर्ट तलब की गई। उस रिपोर्ट में बताया गया कि दिनेश ने अलीगढ़ जिले के खैर थाने में आईपीसी की धाराएँ 147, 323, 308, 504 और 506 के तहत उनके पति विष्णु कुमार और आठ अन्य लोगों के खिलाफ FIR दर्ज कराई थी।
ज्योतिराय देवी ने अपने बयान में कहा कि संबंधित मेडिकल रिपोर्ट भी दी गई थीं। उन्होंने आरोप लगाया कि घटना के लिए सभी विपक्षी पक्ष जिम्मेदार हैं। हालाँकि, उनके गवाह और पति विष्णु कुमार ने अपने बयान में यह नहीं कहा कि राजेश देवी और मंजू देवी इस अपराध में शामिल थे। इस आधार पर उनके खिलाफ समन जारी करना उचित नहीं बताया गया।
फिर भी आदेश में कहा गया कि शिकायत से जुड़े साक्ष्यों की जांच के आधार पर IPC की धाराएँ 323 (मारपीट), 506 (धमकी), 452 (घर में घुसना) और 354 (महिला की मर्यादा भंग) तथा SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(R) के तहत प्रथम दृष्टया मामला बनता है। इसलिए उन्हें ट्रायल के लिए तलब करना उचित है।
कोर्ट ने दिनेश, महेंद्र, सतीश, लोटन, भारत भूषण, टिकेश, अजीत, सुभाष और रिंकू को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराएँ 323 (मारपीट), 506 (धमकी), 452 (घर में घुसना) और 354 (महिला की मर्यादा भंग) के साथ-साथ SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) के तहत ट्रायल का सामना करने का आदेश दिया।
कोर्ट ने शिकायतकर्ता को निर्देश दिया कि वह एक सप्ताह के भीतर आवश्यक प्रतिरक्षा/दस्तावेज प्रस्तुत करे। साथ ही आरोपितों को 18 सितंबर 2022 को निर्धारित अगली सुनवाई में उपस्थित होने का भी आदेश दिया गया।
लोटन सिंह की FIR में विष्णु और उसके साथियों पर आरोप
मथना गाँव के लोटन सिंह (पुत्र भगवान सहाय) ने 7 सितंबर 2021 को खैर थाने में एक FIR दर्ज कराई। उन्होंने आरोप लगाया कि गाँव प्रधान (प्रधानी) के चुनाव में वोट न देने को लेकर विष्णु और उसके साथियों से उनकी रंजिश चल रही थी।
अपनी शिकायत में उन्होंने कहा कि 6 सितंबर 2021 की शाम करीब 6:30 बजे श्याम सिंह (पुत्र रमेश), जुगेंद्र सिंह (पुत्र रामलाल), विष्णु, सीताराम, महेंद्र सिंह, लाल सिंह उर्फ लालू (पुत्र यशवीर), हरीकिशन उर्फ कालू और श्याम सिंह उर्फ श्याम लाठी-डंडे और ईंट लेकर जबरन उनके घर में घुस आए और मारपीट शुरू कर दी।
उन्होंने आगे बताया कि शोर सुनकर गिर्राज के बेटे दिनेश और देवदत्त के बेटे सतीश बीच-बचाव के लिए पहुँचे, लेकिन हमलावरों ने उन्हें भी पीट दिया। शिकायतकर्ता के अनुसार, “मेरे बेटे भारत और दिनेश को बुरी तरह पीटा गया। उनके सिर में गंभीर चोटें आई हैं और मुझे भी चोटें लगी हैं।”
उन्होंने आरोप लगाया कि मारपीट बेहद क्रूर थी। “मैं गंभीर हालत में थाने पहुँचा था। कल रिपोर्ट दर्ज नहीं करा सका, इसलिए आज आया हूँ,” उन्होंने सख्त कार्रवाई की माँग करते हुए कहा। इस मामले में पुलिस ने IPC की धाराएँ 147 (दंगा), 323 (मारपीट), 308 (गंभीर चोट पहुंचाने का प्रयास) और 452 (घर में घुसकर हमला) के तहत केस दर्ज किया।
इस फैसले से दलित ईसाई आरक्षण का रास्ता खुल सकता है
यह फैसला भले ही दो पक्षों के बीच विवाद को सुलझाने के संदर्भ में दिया गया हो, लेकिन इसके सामाजिक असर हो सकते हैं। खासतौर पर कोर्ट की यह टिप्पणी कि अंतरजातीय विवाह के बाद भी महिला की SC/ST जाति की पहचान बनी रहती है और धर्म परिवर्तन से भी जाति नहीं बदलती कई नई बहसों को जन्म दे सकती है।
इस व्याख्या के आधार पर आशंका जताई जा रही है कि वे लोग जिन्होंने ईसाई या अन्य धर्म अपनाया है, वे भी SC/ST आरक्षण में हिस्सेदारी का दावा कर सकते हैं, जबकि मौजूदा व्यवस्था के तहत यह लाभ मुख्य रूप से हिंदू, सिख और बौद्ध समुदाय के अनुसूचित जाति/जनजाति वर्गों के लिए निर्धारित है।
गौरतलब है कि पहले सुप्रीम कोर्ट स्पष्ट कर चुका है कि ईसाई धर्म अपनाने पर व्यक्ति अपनी जाति की पहचान खो देता है। कोर्ट ने कहा था कि “धर्म परिवर्तन के बाद व्यक्ति को उसकी पूर्व जाति से नहीं पहचाना जा सकता।” साथ ही यह भी रेखांकित किया गया था कि आरक्षण का उद्देश्य ऐतिहासिक अन्याय को दूर कर सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना है। यहाँ तक कि केवल आरक्षण लाभ पाने के लिए हिंदू धर्म में वापस आना भी संविधान के साथ छल माना गया है।
भारतीय अदालतें लगातार यह कहती रही हैं कि जो लोग हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई बन चुके हैं, वे SC आरक्षण के हकदार नहीं हैं। पिछले वर्ष इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य के जिलाधिकारियों को निर्देश दिया था कि वे ऐसे लोगों की पहचान करें जिन्होंने धर्म परिवर्तन के बावजूद SC दर्जे का लाभ लिया है, इसे संविधान के साथ धोखा बताया गया था।
दूसरी ओर, सैद्धांतिक रूप से ईसाई धर्म या अन्य मजहबों में जाति व्यवस्था नहीं मानी जाती। लेकिन भारत में ईसाई समुदाय के भीतर भी सामाजिक स्तर पर जातिगत पहचान देखने को मिलती है। कई लोग धर्म परिवर्तन के बाद भी अपनी पुरानी जातिगत पहचान को सामाजिक रूप से बनाए रखते हैं और इसी आधार पर आरक्षण की माँग उठती रहती है।
आलोचकों का तर्क है कि यदि कोई व्यक्ति हिंदू धर्म त्याग देता है, तो उसके साथ जुड़ी मूल सामाजिक संरचना को भी छोड़ना चाहिए। वहीं, यह भी कहा जाता है कि कुछ मिशनरी संगठनों द्वारा निचली जातियों के हिंदुओं को यह कहकर धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित किया जाता है कि वहाँ भेदभाव नहीं है। ऐसे में यदि वास्तविकता अलग हो, तो घर वापसी की राह भी खुली रहती है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि ईसाई या अन्य धर्मों में परिवर्तित लोगों को भी SC/ST आरक्षण का लाभ दिया जाता है, तो इससे उन हिंदू SC/ST समुदायों पर सीधा असर पड़ेगा जो पहले से सीमित सीटों और नौकरियों के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। नए दावेदार जुड़ने से शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में अवसर और कम हो सकते हैं, जिससे पहले से वंचित वर्गों के लिए आगे बढ़ना और मुश्किल हो जाएगा।
कुछ लोग यह भी तर्क देते हैं कि सरकार हिंदू मंदिरों और धार्मिक स्थलों से ही कर और दान का प्रबंधन करती है, इसलिए आरक्षण को हिंदू समाज के वंचित वर्गों के उत्थान का एक माध्यम माना जाता है। ऐसे में यदि आरक्षण का दायरा बिना स्पष्ट नीति के व्यापक किया गया, तो उसके मूल उद्देश्य और स्वरूप पर असर पड़ सकता है।
इस तरह, इलाहाबाद हाईकोर्ट के हालिया फैसले में की गई टिप्पणियाँ आगे चलकर कई कानूनी और सामाजिक चुनौतियाँ खड़ी कर सकती हैं, खासकर हिंदू SC/ST समुदाय से जुड़े आरक्षण के प्रश्न पर।
( मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। )
खुद को अंबेडकरवादी बताने वाले लक्ष्य लेकी सोशल मीडिया पर विवादों में घिर गए हैं। IIM इंदौर से पढ़े और TedX स्पीकर लक्ष्य के खिलाफ क्रिमिनल लॉयर और इन्फ्लुएंसर ट्यूलिप शर्मा ने साइबर शिकायत दर्ज कराई है। उस पर ब्राह्मणों के खिलाफ नफरत फैलाने, जातिगत गालियाँ देने और महिलाओं को अपमानजनक मैसेज भेजने का आरोप है।
ऑपइंडिया से बातचीत में ट्यूलिप ने शिकायत के बारे में कहा कि ऐसा करना जरूरी था, क्योंकि लक्ष्य जैसे लोग एक जगह पर नहीं रुकते, वो लगातार ऐसी हरकतें करते रहते हैं।
लक्ष्य लेकी आईआईएम इंदौर के ग्रेजुएट हैं और टीईडीएक्स स्पीकर भी रह चुके हैं। वे ‘लक्ष्य स्पीक्स’ नाम से इंस्टाग्राम पेज और यूट्यूब चैनल चलाते हैं। इंस्टाग्राम पर उनके लगभग 5 लाख 53 हजार फॉलोअर्स हैं और यूट्यूब पर 14 हजार से ज्यादा सब्सक्राइबर्स।
ट्यूलिप ने भारतनाट्यम और देवदासी पर उसके दावों पर उठाए सवाल, तो लक्ष्य ने ब्राह्मणों को दी गालियाँ
ट्यूलिप शर्मा ने गुरुवार (12 फरवरी 2026) को अपने इंस्टाग्राम हैंडल @_tulipsharma पर एक वीडियो डाला। इसमें उन्होंने बताया कि लक्ष्य लेकी काफी समय से जाति-विरोध के नाम पर ब्राह्मण समुदाय के खिलाफ नफरत फैला रहे हैं। उन्हें इससे कोई दिक्कत नहीं है क्योंकि अभिव्यक्ति की आजादी है और इंटरनेट पर नफरत कोई नई बात नहीं। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब कोई विरोधी राय बर्दाश्त न कर सके। वे ऐसे इन्फ्लुएंसर हैं जो अगर कोई उनके पोस्ट पर विरोधी कमेंट करे तो डीएम में आकर गंदी-गंदी बातें करते हैं।
An Instagram influencer Tulip Sharma exposed the rot behind so-called Ambedkarite activism after being harassed by Lakhshya Lakey, @lakhshya_speaks
Lakshya is widely known online for his obsessive hatred toward Brahmins, constantly pushing anti-Brahmin narratives under the… pic.twitter.com/hD3ormIk2P
ट्यूलिप ने बताया कि सब कुछ 11 फरवरी को शुरू हुआ जब लक्ष्य लेकी ने अपने इंस्टाग्राम पेज पर एक वीडियो डाला। उसमें उन्होंने दावा किया कि भारतनाट्यम को ब्राह्मणों ने हड़प लिया है। उन्होंने कहा कि भारतनाट्यम ब्राह्मणों की सांस्कृतिक चोरी है, असली डांस सदिर अट्टम या दासी अट्टम था जो देवदासियां करती थीं। उनका कहना था कि तमिल ब्राह्मण महिला रुक्मिणी देवी ने उस डांस के सेक्सुअल/इरोटिक हिस्से को हटा दिया, उसे साफ-सुथरा बना दिया, लेकिन ऐसा करते हुए सदिर अट्टम की असली जड़ों से इसे अलग कर दिया।
इसके जवाब में ट्यूलिप शर्मा ने कमेंट किया, “आपकी लॉजिक के मुताबिक, ‘ब्राह्मण’ महिला रुक्मिणी देवी ने देवदासियों के यौन शोषण के चक्र को खत्म कर दिया। अब इसमें समस्या क्या है? एक तरफ आप इसे दमनकारी व्यवस्था मानते हैं, फिर कोई सुधार करे तो भी समस्या है सिर्फ इसलिए कि सुधार करने वाली ‘ब्राह्मण’ है। हंसते हुए। जिंदगी में थोड़ी क्लैरिटी लाओ और व्हाट्सएप नॉलेज पर निर्भर मत रहो।”
लेकिन ट्यूलिप शर्मा के तर्क का तथ्यों से जवाब देने की बजाय लक्ष्य लेकी उनके डीएम में घुस आए और जातिगत गालियाँ देने लगे। अपने दावे के समर्थन में शर्मा ने बातचीत के स्क्रीनशॉट और स्क्रीन रिकॉर्डिंग भी शेयर किए।
ट्यूलिप शर्मा ने बताया कि बात ब्राह्मण लड़कियों की भी नहीं थी, फिर भी लक्ष्य लेकी अपनी ब्राह्मण एक्स गर्लफ्रेंड्स के बारे में डींगें हाँकने लगे। ट्यूलिप ने कहा, “बात ब्राह्मण लड़कियों की नहीं थी लेकिन लक्ष्य लेकी अपनी सारी एक्स को ब्राह्मण बताकर बहस जीतना चाहते थे। पूरी कम्युनिटी की लड़कियों को इस्तेमाल करके बहस जीतना दिखाता है कि वे कितने बड़े जातिवादी हैं।”
लक्ष्य लेकी की ब्राह्मण लड़कियों को ऑब्जेक्ट बनाने वाली सोच को और एक्सपोज करते हुए शर्मा ने बताया कि वो जाति खत्म करने के लिए ‘अंतरजातीय बच्चे’ पैदा करने की बात कर रहा था।
सोर्स: ट्यूलिप शर्मा का वीडियो
शर्मा ने वीडियो में कहा, “उनका पूरा प्रोफेशन ही ब्राह्मणों को गालियाँ देने पर टिका है और फिर वे अपनी ब्राह्मण एक्स के बारे में डींग मारते हैं। वे और आगे बढ़कर कहते हैं कि अंतरजातीय बच्चे बनाकर जाति खत्म कर रहे हैं।” शर्मा ने बातचीत का स्क्रीनशॉट भी शेयर किया।
एक वीडियो में लक्ष्य लेकी ने खुद कहा था कि वे अपनी एससी/एसटी कम्युनिटी के बाहर डेट करने की हिम्मत नहीं रखते, लेकिन ट्यूलिप शर्मा की एक फीमेल फॉलोअर के मैसेज बॉक्स में उसने लिखा, “ब्राह्मण गर्लफ्रेंड मुझे ब्लो जॉब देती है, प्रॉब्लम?”
ट्यूलिप शर्मा की इंस्टाग्राम स्टोरी से
कई पब्लिकली शेयर किए गए स्क्रीनशॉट्स के मुताबिक लक्ष्य लेकी ने ट्यूलिप शर्मा को डीएम में लिखा, “होली चॉप्ड, ब्राह्मण लड़की के लिए तुम बहुत बदसूरत हो।” एक और मैसेज में उन्होंने लिखा, “मेरी गर्लफ्रेंड तुमसे कहीं ज्यादा खूबसूरत है। तुम तो बॉयफ्रेंड वाली भी नहीं लगतीं।”
एक और मैसेज में लक्ष्य ने लिखा, “4 ब्राह्मण एक्स, सब तुमसे ज्यादा खूबसूरत।”
इस बीच ट्यूलिप शर्मा ने अपने फॉलोअर्स को बताया कि उन्होंने आईटी एक्ट और संबंधित बीएनएस सेक्शन के तहत लक्ष्य लेकी के खिलाफ साइबर शिकायत दर्ज करा दी है।
बैकलैश के बीच लक्ष्य लेकी ने दावा किया कि ट्यूलिप शर्मा ने उनके जातिवादी और अपमानजनक मैसेज के जो स्क्रीनशॉट शेयर किए हैं, वे फेक हैं। उनका कहना है कि उन्हें फर्जी केस में फंसाने की कोशिश हो रही है।
एक और वीडियो में लक्ष्य ने फिर दोहराया कि शर्मा के साथ उनकी चैट के सारे स्क्रीनशॉट फेक हैं। इस अंबेडकरवादी जाति एक्टिविस्ट ने विक्टिम कार्ड खेला और खुद की तुलना रोहित वेमुला से कर दी।
लक्ष्य ने कहा कि रोहित वेमुला के साथ भी इसी तरह की तरकीबें इस्तेमाल की गई थीं। लक्ष्य का रोहित वेमुला से अपनी तुलना करना बहुत बेशर्मी भरा था, क्योंकि असल में तेलंगाना पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट में कहा गया था कि वेमुला एससी जाति से नहीं थे।
ज्यादातर कथित जाति-विरोधी ‘एक्टिविस्ट्स’ की तरह लक्ष्य लेकी भी जाति श्रेष्ठता के विरोध के नाम पर ब्राह्मणों को निशाना बनाता रहा है। एक वीडियो में उसने कहा कि दूसरे देशों में वेजिटेरियन होते हैं लेकिन भारत में ‘प्योर वेजिटेरियन’ होते हैं। ब्राह्मणों के शाकाहार से जुड़े धार्मिक विश्वास पर हमला करते हुए उसने कहा, “केवल भारत में ही ‘प्योर वेजिटेरियन’ का कॉन्सेप्ट है। क्योंकि यहाँ शाकाहार सिर्फ जानवरों के बारे में नहीं है। ये शुद्धता, श्रेष्ठता और जाति के बारे में है। ये कहने के बारे में है कि मैं भगवान के ज्यादा करीब हूँ और तुम मांस खाने वाले दलित कम हो। वो ब्राह्मणवादी नजरिया तो वीगन लोगों में भी दिखता है जब वे दलित एक्टिविस्ट्स को वीगन न होने पर शर्मिंदा करते हैं।”
लक्ष्य ने ये नैरेटिव फैलाया कि ‘प्योर’ शब्द का मतलब जातिगत श्रेष्ठता या भगवान से ज्यादा निकटता है, जबकि असल में ये सिर्फ शाकाहार में सख्ती को दिखाता है।
जुलाई 2025 में एक पॉडकास्ट में लक्ष्य ने दावा किया कि ब्राह्मणों ने मराठा योद्धा राजा छत्रपति शिवाजी महाराज के साथ भेदभाव किया। उसका कहना था कि ब्राह्मणों ने शिवाजी की जाति की वजह से उनका राजतिलक करने से इनकार कर दिया था और उन्हें बनारस से पुजारी बुलाने पड़े।
ये दावा कट्टर ‘जाति-विरोधी’ एक्टिविस्ट्स द्वारा गढ़ा गया ब्राह्मण-विरोधी नैरेटिव का हिस्सा है। हकीकत में स्थानीय ब्राह्मणों ने शिवाजी का ताज नहीं ठुकराया था क्योंकि उन्हें उनकी जाति से कोई समस्या थी, बल्कि इसलिए कि उन्हें ऐंद्रेय राजाभिषेक करना नहीं आता था। इसलिए बनारस से गागाभट्ट को बुलाया गया। ध्यान देने वाली बात ये है कि गागाभट्ट भी मराठी ब्राह्मण थे, उनका परिवार महाराष्ट्र के पैठण से था। छत्रपति शिवाजी महाराज के राजतिलक को लेकर विवाद वैदिक रीति बनाम तांत्रिक रीति को लेकर था।
अपने एक एक्स पोस्ट में लक्ष्य ने यादवों को हिंदू धर्म छोड़ने के लिए उकसाया क्योंकि ब्राह्मण और ठाकुर उनके साथ शादी के रिश्ते नहीं जोड़ते। उसने लिखा, “और यादव, अपनी राजनीतिक ताकत और क्षत्रियता के दावों के बावजूद, ठाकुरों और ब्राह्मणों द्वारा बराबर नहीं माने जाते। कोई अंतरजातीय शादी नहीं। कोई सम्मान नहीं। सिर्फ ग्रेडेड इनइक्वालिटी। मेरे यादव भाइयों और बहनों इस जाति पिरामिड का हिस्सा बनने की कोशिश मत करो।”
आश्चर्य की बात नहीं कि लक्ष्य लेकी 2020 के दिल्ली दंगों के मुख्य आरोपित उमर खालिद का फैन है। उन्होंने मुस्लिम विक्टिमहुड का नैरेटिव फैलाया और कन्हैया कुमार के राजनीतिज्ञ बनने की तुलना उमर खालिद के जेल में रहने से की, सिर्फ इसलिए कि खालिद मुस्लिम है।
खालिद की लंबी जेल पर दुख जताते हुए लक्ष्य ने लिखा, “दो स्टूडेंट लीडर्स। एक ही कैंपस। एक जैसे आरोप। लेकिन दो बहुत अलग किस्मत। कन्हैया कुमार आजाद हैं, मुख्यधारा की राजनीति में आ गए। उमर खालिद, एक मुस्लिम, बेल के बिना 5 साल जेल में। ये संयोग नहीं है। भारत में मुस्लिम होने की कीमत है।”
दिलचस्प बात ये है कि लक्ष्य ने कहा कि उमर खालिद ‘मुस्लिम होने की कीमत’ चुका रहा है, जबकि खालिद खुद को नास्तिक बताता रहा है।
इस्लामो-लेफ्टिस्टों द्वारा उमर खालिद के लिए समर्थन और सहानुभूति जुटाने के लिए फैलाए जा रहे झूठे नैरेटिव के विपरीत ऑपइंडिया ने पहले रिपोर्ट किया था कि 2023 और 2024 में 14 स्थगनों में से 7 स्थगन खुद उमर खालिद ने माँगे थे। इसलिए जमानत वापस लेना ‘देरी’ की वजह से नहीं था। जबकि इस्लामी-लेफ्ट इकोसिस्टम ‘अन्याय’ का रोना रोता रहता है, असल में आरोपित के वकील की नाकाम कोशिशों की वजह से खालिद इतने दिनों से जेल में हैं।
दरअसल, भारत के पूर्व चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने भी इस साल कहा था कि असली समस्या कुछ वकीलों और राजनीतिक ग्रुप्स की सोच में है जो अपने केस सिर्फ कुछ खास जजों से सुनवाना चाहते हैं। ऑपइंडिया ने बार-बार रिपोर्ट किया है कि खालिद की लीगल टीम ने फरवरी 2024 में ‘परिस्थितियों में बदलाव’ का हवाला देकर जमानत अर्जी वापस लेने से पहले कम से कम सात बार स्थगन माँगा था।
कई सोशल मीडिया यूजर्स द्वारा शेयर किए गए स्क्रीनशॉट्स के मुताबिक लक्ष्य लेकी ने 1990 के दशक में इस्लामी आतंकवादियों द्वारा कश्मीरी पंडितों के सामूहिक नरसंहार और पलायन का भी मजाक उड़ाया। एक कमेंट के जवाब में लक्ष्य ने लिखा, “कश्मीर ब्राह्मणों का यही हालत था।” एक और में लिखा, “मुझे कुछ नहीं होगा, तुम्हारे कश्मीरी पंडित भाइयों की तरह।”
मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) पटना उस समय विवादों में आ गया जब पता चला कि उसकी कर्मचारी डॉ. प्रियंका त्रिपाठी ने हिंदू शास्त्रों को तोड़-मरोड़कर अपना घिनौना एजेंडा आगे बढ़ाया है। रिसर्च पेपर में कहा गया है, “युगों से हिंदू मिथोलॉजी में प्रकृति को भारत में स्त्रीत्व से बहुत निकटता से जोड़ा गया है, और यह लेख यह विस्तार से बताएगा कि यह लेस्बियन अनुभवों को हेट्रोनोंमेटिव प्रकृति और पुरुष (शाब्दिक अर्थ पुरुष) द्वंद्व से परे शक्ति (यानी पावर) का वैकल्पिक स्रोत कैसे ऊर्जा प्रदान करता है।”
यह आपत्तिजनक बयान प्रियंका त्रिपाठी और छंदिता दास ने लिखा है। पेपर का शीर्षक है “(एन)क्वीयरिंग प्रकृति: डीकोलोनियल इकोफेमिनिज्म और लेस्बियन सब्जेक्टिविटी इन आउट! स्टोरीज फ्रॉम द न्यू क्वियर इंडिया” और यह अंतरराष्ट्रीय जर्नल “फेमिनिस्ट एनकाउंटर्स: ए जर्नल ऑफ क्रिटिकल स्टडीज इन कल्चर एंड पॉलिटिक्स” में प्रकाशित हुआ है। लेखकों ने यह भी दावा किया, “क्वियर इको-फेमिनिज्म के डीकोलोनियल संदर्भ में शक्ति न केवल फिक्स्ड हेट्रोसेक्शुअल कैटेगरी को प्रतिरोध दे सकती है, बल्कि क्वियर सब्जेक्टिविटी और सस्टेनेबिलिटी के संभावित रास्ते भी बना सकती है।”
पेपर में आगे कहा गया, “मुख्य रूप से प्रजातियों के बीच फ्लुइडिटी और इंटरकनेक्टिविटी पर साझा जोर, बाइनरी मैकेनिज्म से परे, यही वजह है कि डीकोलोनियल भारतीय अवधारणा प्रकृति और क्वियर इकोफेमिनिज्म गहराई से जुड़े हैं।” फिर आगे लिखा है, “प्रकृति और उससे जुड़े शक्ति के आध्यात्मिक विश्वास के डीकोलोनियल लेंस से लेस्बियन इकोफेमिनिज्म का पुनर्निर्माण प्रभावी हो सकता है, क्योंकि यह हर महिला और उसके पृथ्वी पर संबंधों की मौजूदगी को पारंपरिक अन्यिंग के तरीके से परे प्रशंसा करने की संभावनाएं देता है।”
इसी तरह लिखा गया, “लेस्बियन को प्रकृति के रूप में या प्रकृति में पहचानने की यह उत्तेजना उन्हें शक्ति से सशक्त बनाती है।” पेपर ऐसे ही हिंदू धर्म के मूल मूल्यों पर खुले हमलों से भरा हुआ है, ऐसी आजादी जो किसी अन्य धर्म के साथ नहीं ली जा सकती क्योंकि ‘सर तन से जुदा’ का डर रहता है।
इसके अलावा लेखिकाओं ने हिंदुत्व पर हमला करने और हिंदू धर्म का मजाक उड़ाने का मौका नहीं छोड़ा और लिखा, “ऐसे मामलों में अक्सर उम्मीद की जाती है कि व्यक्तिगत चुनाव की आजादी और पहले से तय सामाजिक मानकों को जबरदस्ती सामंजस्य में लाया जाए। इससे छद्म पारिवारिक सम्मानजनकता और हिंदुत्व के बढ़ते कोड के तहत हेट्रोसेक्शुअल भारतीयता का निर्माण सुनिश्चित होगा (भरुचा, 1995; जुलुरी, 1999)।”
दास और त्रिपाठी ने हिंदू विश्वास के मूल सिद्धांतों के बार-बार उल्लंघन में कहा, “मौत में भी उनकी एकता, प्रकृति की गोद में, लेस्बियनिज्म की ऊँची शक्ति को दर्शाती है जो हर अनिवार्य दबाव को अस्वीकार करती है, ताकि परंपरा से बेहतर मौत को चुना जाए। यह निर्माण पश्चिमी साहित्य में बीसवीं सदी के मध्य में आम त्रासद लेस्बियन कहानी के मोटिफ पर आधारित है, लेकिन यहाँ हम यह भी तर्क दे रहे हैं कि इन युवा महिलाओं के लिए मौत मुक्ति है, सिर्फ विनाश नहीं। चुनी गई कहानियों में प्राकृतिक स्थानों में क्वियर प्रकृति का पुनर्निर्माण बहुत जानबूझकर किया गया है।”
प्रियंका त्रिपाठी कौन हैं?
प्रियंका त्रिपाठी ने आईआईटी खड़गपुर से पीएचडी की है। वे आईआईटी पटना में अंग्रेजी की एसोसिएट प्रोफेसर हैं और पहले ह्यूमैनिटीज एंड सोशल साइंसेज विभाग की हेड भी रह चुकी हैं। वे अमेरिका के ब्रिजवाटर स्टेट यूनिवर्सिटी द्वारा प्रकाशित जर्नल ऑफ इंटरनेशनल विमेंस स्टडीज की फेलोशिप कोऑर्डिनेटर भी हैं।
आधिकारिक वेबसाइट ने बताया कि इसके अलावा वे जर्नल ऑफ ग्राफिक नॉवेल्स एंड कॉमिक्स (टेलर एंड फ्रांसिस) और ग्लोबल साउथ लिटरेरी स्टडीज (टेलर एंड फ्रांसिस) की एसोसिएट एडिटर हैं।
वेबसाइट ने बताया कि त्रिपाठी को पहले चार्ल्स वॉलेस इंडिया ट्रस्ट विजिटिंग फेलोशिप (2024-25) यूनिवर्सिटी ऑफ लीड्स के स्कूल ऑफ हिस्ट्री और आईपीडी विजिटिंग रिसर्च फेलोशिप (2022-23) यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबरा के इंस्टीट्यूट फॉर एडवांस्ड स्टडीज इन द ह्यूमैनिटीज में मिल चुकी हैं।
वेबसाइट पर लिखा है, “उनकी ब्लूम्सबरी के साथ मोनोग्राफ है द जेंडर्ड वॉर: इवैल्यूएटिंग फेमिनिस्ट एथनोग्राफिक नैरेटिव्स ऑफ द 1971 वॉर ऑफ बांग्लादेश (2022)। नेशनल बुक ट्रस्ट ऑफ इंडिया के साथ उनकी आने वाली मोनोग्राफ है- मन की बात एंड भारतीय आर्ट, कल्चर एंड हेरिटेज। वे मेडिकल ह्यूमैनिटीज, जेंडर स्टडीज, साउथ एशियन फिक्शन और ग्राफिक नॉवेल्स के क्षेत्र में काम करती हैं।”
पितृसत्ता का विरोध करने के नाम पर हिंदू धर्म का मजाक उड़ाना
त्रिपाठी ने अपनी गहरी समझ के साथ घोषणा की कि हिंदू पुरुषों ने जब पारंपरिक मातृसत्तात्मक हिंदू समाज में जीवन पोषण में अपनी भूमिका समझी तो शिवलिंग (फैलस) की पूजा शुरू की। इसके बाद उन्होंने अपने लेख ‘विमेन एंड वूंडेड सेल्फ: एक्सप्लोरिंग इंडियन विमेंस शॉर्ट फिक्शन इन इंग्लिश’ में हिंदू विवाह व्यवस्था और महिलाओं के दमन पर जहरीला प्रवचन लिखा है।
उन्होंने अपेक्षित रूप से हिंदू मिथोलॉजी और शास्त्रों का सहारा लेकर महिलाओं को पुरुषों से कमतर और दबाया हुआ दिखाने की अपनी तोड़ी-मरोड़ी कहानी साबित करने की कोशिश की। इन आरोपों में वैदिक काल में लड़कियों के जन्म के साथ चिंता और पोस्ट-वैदिक काल में इसे विपदा मानने के संदर्भ शामिल थे, जो घरेलू हिंसा जैसे महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा के दौरान किए गए।
त्रिपाठी को ‘पितृसत्तात्मक’ हिंदू समाज से भी काफी नफरत लगती है। उन्होंने दास के साथ सह-लिखित ‘एक्सप्लोरिंग द मार्जिंस ऑफ कोठा कल्चर: रिकंस्ट्रक्टिंग अ कोर्टेसन लाइफ इन नीलम सरन गौर की रेक्विम इन रागा जानकी’ में कोठा संस्कृति की तारीफ की।
दोनों ने आरोप लगाया, “महिलाओं का ऐसा अन्यीकरण हिंदू पितृसत्तात्मक समाजों का भी स्वाभाविक हिस्सा है जो मानते हैं कि महिलाएं अपनी समस्याओं का समाधान नहीं कर सकतीं, जिसमें मनुस्मृति पूरी तरह डींग मारती है कि बचपन में महिला पिता की, युवावस्था में पति की और बुढ़ापे में बेटे की होती है (घोष, मनुस्मृति)।”
पेपर ने तो यहाँ तक कह दिया, “भारतीय घरों के विपरीत जहाँ लड़कियों को समझौता करना सिखाया जाता है, कोठे में महिलाएँ अपने फैसले खुद लेने में ज्यादा अभ्यस्त होती हैं, बंधनों को उलट देती हैं (ओल्डनबर्ग 278)” कोठे की गहरी परेशानियों वाली जिंदगी की चौंकाने वाली तारीफ में।
आईआईटी प्रोफेसर और एंटी-इंडिया ‘टेलर एंड फ्रांसिस’ से रिश्ता
ऊपर लिखी बातें तो सिर्फ बाहरी हैं। असल में त्रिपाठी की भ्रष्ट विचारधारा काफी जहरीली है। जिसमें वो बार-बार हिंदू धर्म, उसकी परंपराओं और रीति-रिवाजों का उपहास करने में आनंद लेती हैं बिना किसी परिणाम के डर के। उनका यूके की कंपनी टेलर एंड फ्रांसिस से गहरा संबंध है जो नियमित रूप से एंटी-इंडिया और हिंदू-विरोधी सामग्री फैलाती है जिसने ‘हिंदू राष्ट्रवादी राजनीति’ यानी हिंदुत्व को ईसाई समुदाय पर कथित हमलों के लिए जिम्मेदार ठहराया।
कंपनी ने भारतीय लोकतंत्र को ‘इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी’ कहकर कमजोर किया और मानवाधिकार को लेकर देश को फटकार लगाई। एक अन्य रिलीज के जरिए लिखा गया, “संवैधानिक रूप से गारंटीड अधिकारों का पालन और प्रावधान करें ताकि भारतीय लोकतंत्र के चल रहे क्षरण को रोका जा सके।”
इसने ऐसी ही सामग्री को जगह दी जो देश के आंतरिक मामलों में दखल देती है और नागरिकता संशोधन कानून को भेदभावपूर्ण बताती है। टेलर एंड फ्रांसिस की प्रकाशन ने यूक्रेन पर भारत के संप्रभु रुख को पसंद नहीं किया और रूस से उसके मजबूत संबंध को ‘घरेलू राजनीतिक थिएटर’ से जोड़ा।
निष्कर्ष
त्रिपाठी के आचरण का सच अब सामने आ गया है, लेकिन हकीकत यह है कि वे लंबे समय से ये हरकतें कर रही हैं। इससे भी चिंताजनक बात यह है कि आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान उनके जैसे तत्वों से भरे हैं जो हिंदू धर्म को दुनिया की हर बुराई से जोड़ने की कोशिश करते हैं और साथ ही इसे अपने खतरनाक एजेंडे को आगे बढ़ाने के प्लेटफॉर्म के रूप में इस्तेमाल करते हैं।
यही बात उनके रिसर्च पेपर्स और काम में योगदान देने वालों से भी साफ है। इसलिए यह न सिर्फ सरकार बल्कि पूरे देश के लिए चिंता का विषय होना चाहिए क्योंकि इसका भविष्य ऐसे समस्या वाली मानसिकता वाले लोगों के हाथ में है।
( मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। )
मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के बाद अब बांग्लादेश में आखिरकार लोकतांत्रिक सरकार बनने जा रही है। कल यानि गुरुवार (12 फरवरी 2026) को हुए आम चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने निर्णायक जीत हासिल कर सरकार बनाने जा रही है।
पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बेटे तारीक रहमान, जो 17 साल के ब्रिटेन प्रवास के बाद दिसंबर 2025 में अपने देश बांग्लादेश वापस लौटे थे, अब प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने वाले हैं।
300 सदस्यीय जातीय संसद (जातीय संगसद) की 299 में से 297 सीटों के नतीजे आ चुके हैं। ताजा आंकड़ों के अनुसार BNP और उसके सहयोगी दलों ने 210 से अधिक सीटें जीतकर दो-तिहाई बहुमत हासिल कर लिया है।
वहीं, मुख्य विपक्षी गठबंधन, जो जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व में 11 दलों का है, करीब 70 सीटों पर सिमटता दिख रहा है। तारीक रहमान ने ढाका-17 और बोगुरा-6, दोनों सीटों से जीत दर्ज की है और माना जा रहा है कि वह इसी हफ्ते के आखिर तक प्रधानमंत्री पद की शपथ ले सकते हैं। पार्टी ने जश्न मनाने के बजाय देशभर में शुक्रिया अदा करने के लिए दुआ करने की अपील की है, जो दो दशक बाद सत्ता में वापसी का संकेत है।
इन चुनावी नतीजों पर भारत की भी कड़ी नजर है, क्योंकि बांग्लादेश की राजनीतिक स्थिति सीधे तौर पर भारत की सुरक्षा से जुड़ी मानी जाती है। भारत में पहले से ही कुछ हलकों में चिंता जताई जा रही है।
वजह यह है कि BNP का अतीत भारत विरोधी रुख से जुड़ा रहा है। जब खालिदा जिया प्रधानमंत्री थीं, तब उत्तर-पूर्व भारत के अलगाववादी संगठनों, खासकर ULFA को बांग्लादेश में पनाह मिलने के आरोप लगे थे।
2001 से 2006 के कार्यकाल के दौरान बड़े पैमाने पर हथियारों की खेप भारत के लिए भेजे जाने के मामले में भी BNP सरकार पर आंखें मूंदने के आरोप लगे थे। साथ ही उस दौर में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा और भारत विरोधी बयानबाजी को भी नजरअंदाज किए जाने की बात कही जाती रही है।
भारत और बांग्लादेश के रिश्ते
जब बांग्लादेश में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की सरकार थी, तब भारत और बांग्लादेश के रिश्ते अपने सबसे खराब दौर में माने जाते हैं। उस समय सीमा पर झड़पें बढ़ीं, तस्करी के मामले सामने आए और सरकार का झुकाव पाकिस्तान की ओर माना गया।
हालात तब बदले जब अवामी लीग ने चुनाव जीता और शेख हसीना प्रधानमंत्री बनीं। उनके कार्यकाल में भारत विरोधी अलगाववादी संगठनों को बांग्लादेश से बाहर निकाल दिया गया, जिसके बाद उन्हें म्यांमार और दूसरे इलाकों में शरण लेनी पड़ी। दोनों देशों के बीच व्यापार भी हसीना सरकार के दौरान काफी बढ़ा।
ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि BNP का दोबारा सत्ता में आना भारत के लिए बहुत अच्छी खबर नहीं है। लेकिन चुनावी नतीजों को देखें तो भारत के नजरिए से यह सबसे बेहतर संभव परिणाम माना जा सकता है। इस चुनाव में असल में सिर्फ दो ही संभावित नतीजे थे और जो नतीजा सामने आया, वह दूसरे विकल्प से कहीं बेहतर है।
भारत की सबसे भरोसेमंद साझेदार रही अवामी लीग को इस बार चुनाव लड़ने से रोक दिया गया था। मुकाबला सिर्फ दो मोर्चों के बीच था, एक तरफ BNP और दूसरी तरफ जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाला 11 दलों का गठबंधन।
इस गठबंधन में कई कट्टर इस्लामी विचारधारा वाले दल शामिल हैं, जैसे जमात-ए-इस्लामी, बांग्लादेश खिलाफत मजलिस, खिलाफत मजलिस, बांग्लादेश खिलाफत आंदोलन, निजाम-ए-इस्लाम पार्टी और कुछ छात्र संगठन जो अब नेशनल सिटीजन पार्टी के नाम से सामने आए हैं। इन दलों का मकसद शरिया कानून के आधार पर इस्लामी राज्य की स्थापना बताई जाती है।
जमात-ए-इस्लामी ने 1971 में बांग्लादेश के गठन का विरोध किया था और उस समय पाकिस्तान के साथ खड़ी रही थी, जिस पर नरसंहार के आरोप लगे थे। इस संगठन की विचारधारा लंबे समय से कट्टरपंथी मानी जाती है और उस पर पाकिस्तान के प्रति नरम रुख रखने के आरोप भी लगते रहे हैं।
शेख हसीना सरकार के दौरान इस संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया गया था और इसे चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं थी। हालाँकि, हसीना सरकार के गिरने के बाद यह प्रतिबंध हटा दिया गया और संगठन फिर से राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल हो गया।
अगर जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व में सरकार बनती, तो यह भारत के लिए एक रणनीतिक बुरा सपना साबित होता। इसका मतलब होता कि ढाका खुलकर पाकिस्तान और चीन की ओर झुक जाता।
भारत के साथ लगी खुली और संवेदनशील सीमा के जरिए आतंकी नेटवर्क को बढ़ावा मिल सकता था। हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों पर हमलों में बढ़ोतरी की आशंका रहती। पानी बंटवारे जैसे मुद्दों पर विवाद और तेज होते और इंडिया आउट जैसी मुहिम को हवा मिलती। ऐसे हालात में बंगाल की खाड़ी पर चीन की पकड़ और मजबूत होती और पाकिस्तान को भी इस क्षेत्र में गलत तरीके से दखल का मौका मिल जाता।
भारत की पूर्वी सीमा पर कट्टरपंथी इस्लाम का असर बढ़ता, वही ताकतें सक्रिय हो जातीं जो पाकिस्तान में हावी हैं और जिन्होंने अफगानिस्तान और म्यांमार को अस्थिर किया। इसका सीधा असर पश्चिम बंगाल, असम और देश के दूसरे हिस्सों तक महसूस किया जा सकता था।
इसके मुकाबले बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) अलग है। उसमें कई कमियाँ हो सकती हैं, लेकिन वह मजहबी राज्य की वकालत करने वाली पार्टी नहीं, बल्कि खुद को राष्ट्रवादी पार्टी के रूप में पेश करती है।
शासन का अनुभव रखने वाली BNP से यह उम्मीद की जा रही है कि वह व्यावहारिक रुख अपनाएगी और समझेगी कि भारत से अलग-थलग रहकर बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था आगे नहीं बढ़ सकती।
अगर जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व में सरकार बनती, तो यह भारत के लिए एक रणनीतिक बुरा सपना साबित होता। इसका मतलब होता कि ढाका खुलकर पाकिस्तान और चीन की ओर झुक जाता।
भारत के साथ लगी खुली और संवेदनशील सीमा के जरिए आतंकी नेटवर्क को बढ़ावा मिल सकता था। हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों पर हमलों में बढ़ोतरी की आशंका रहती। पानी बंटवारे जैसे मुद्दों पर विवाद और तेज होते और इंडिया आउट जैसी मुहिम को हवा मिलती। ऐसे हालात में बंगाल की खाड़ी पर चीन की पकड़ और मजबूत होती और पाकिस्तान को भी इस क्षेत्र में गलत तरीके से दखल का मौका मिल जाता।
भारत की पूर्वी सीमा पर कट्टरपंथी इस्लाम का असर बढ़ता, वही ताकतें सक्रिय हो जातीं जो पाकिस्तान में हावी हैं और जिन्होंने अफगानिस्तान और म्यांमार को अस्थिर किया। इसका सीधा असर पश्चिम बंगाल, असम और देश के दूसरे हिस्सों तक महसूस किया जा सकता था।
इसके मुकाबले बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) अलग है। उसमें कई कमियाँ हो सकती हैं, लेकिन वह मजहबी राज्य की वकालत करने वाली पार्टी नहीं, बल्कि खुद को राष्ट्रवादी पार्टी के रूप में पेश करती है। शासन का अनुभव रखने वाली BNP से यह उम्मीद की जा रही है कि वह व्यावहारिक रुख अपनाएगी और समझेगी कि भारत से अलग-थलग रहकर बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था आगे नहीं बढ़ सकती।
On arrival in Dhaka, met with Mr Tarique Rahman @trahmanbnp, Acting Chairman of BNP and son of former PM of Bangladesh Begum Khaleda Zia.
Handed over to him a personal letter from Prime Minister @narendramodi.
भारत ने साफ संकेत दिया कि भले ही उसने शेख हसीना को शरण दी है, लेकिन वह बांग्लादेश की नई सरकार के साथ काम करने को तैयार है। जैसे ही यह स्पष्ट हुआ कि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) चुनाव जीतने जा रही है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आधिकारिक नतीजों का इंतजार किए बिना ही तारीक रहमान और BNP को बधाई दे दी।
यह सही है कि BNP का अतीत भारत के लिए पूरी तरह भरोसेमंद नहीं रहा है, लेकिन मौजूदा हालात में यही नई हकीकत है और दूसरे विकल्प की तुलना में बेहतर भी। दूसरा विकल्प एक इस्लामी गठबंधन था, जो बांग्लादेश को पाकिस्तान-चीन धुरी की ओर ले जा सकता था और भारत के खिलाफ माहौल को और भड़का सकता था।
खास बात यह भी है कि छात्रों द्वारा बनाई गई नेशनल सिटीजन पार्टी (NCP), जिसने हसीना सरकार को हटाने में भूमिका निभाई थी, चुनाव में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई। जमात के नेतृत्व वाले गठबंधन का हिस्सा रही NCP ने 30 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन सिर्फ 6 सीटें जीत सकी। चूँकि NCP खुलकर भारत विरोधी रुख रखती है, इसलिए उसका कमजोर प्रदर्शन भारत के लिए सकारात्मक माना जा रहा है।
एक और जरूरी बात यह है कि बांग्लादेश के मतदाताओं ने BNP को स्पष्ट और भारी बहुमत दिया है। पार्टी किसी सहयोगी दल पर निर्भर नहीं है। स्थिर और मजबूत BNP सरकार का मतलब है कि सीमा सुरक्षा पर बेहतर तालमेल हो सकता है और तस्करी व घुसपैठ पर सख्ती बढ़ सकती है।
अब भारत-बांग्लादेश संबंध आगे बढ़ सकते हैं। तीस्ता नदी के पानी बंटवारे, भारत-बांग्लादेश-म्यांमार-थाईलैंड हाईवे के जरिए कनेक्टिविटी और द्विपक्षीय व्यापार जैसे मुद्दों पर बातचीत फिर शुरू हो सकती है। यह भी उम्मीद है कि BNP के शासन में ढाका चीन की स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स रणनीति का पूरी तरह हिस्सा नहीं बनेगा।
हालाँकि एक बड़ा सवाल अब भी बना रहेगा शेख हसीना का भारत में रहना। बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण ने उन्हें ‘मानवता के खिलाफ अपराध’ के मामले में मौत की सजा सुनाई है।
अगर BNP सरकार अगर उनके वापस आने पर दबाव बढ़ाती है, तो दोनों देशों के रिश्ते जटिल हो सकते हैं और फैसला भारत के पाले में होगा। चुनाव से पहले BNP समेत कई दलों ने भारत से हसीना को सौंपने की माँग की थी।
फिलहाल नई सरकार के सामने शपथ लेने के बाद कई बड़ी जिम्मेदारियाँ होंगी, इसलिए शेख हसीना का मुद्दा तुरंत प्राथमिकता में नहीं भी हो सकता है। बांग्लादेश के मतदाताओं ने जुलाई चार्टर पर जनमत का समर्थन किया है, जिसके तहत नई सरकार और संसद को पहले 150 दिनों में कई बड़े बदलाव लागू करने होंगे। इसमें एक नया उच्च सदन बनाना और संविधान में कई अहम संशोधन शामिल हैं।
( मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। )
भारत की आजादी की लड़ाई जिस एक नारे के इर्द-गिर्द लड़ी गई, वह था ‘वंदे मातरम’। यह महज एक गीत नहीं, बल्कि उस समय के क्रांतिकारियों के लिए मौत को गले लगाने का साहस और माँ भारती के प्रति समर्पण का प्रतीक था। लेकिन दुर्भाग्य देखिए, जिस गीत ने देश को एकजुट किया, उसी पर आज ‘मजहबी आजादी’ और ‘इस्लाम’ के नाम पर बवाल काटा जा रहा है।
हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा वंदे मातरम के सभी छह छंदों को अनिवार्य करने और इसे राष्ट्रगान के समान सम्मान देने के आदेश ने एक बार फिर उस पुरानी दरार को गहरा कर दिया है, जिसे कभी मोहम्मद अली जिन्ना ने मुस्लिम लीग के जरिए पैदा किया था।
वंदे मातरम का नया प्रोटोकॉल और राष्ट्रभक्ति का पुनरुद्धार
केंद्र सरकार ने ‘वंदे मातरम’ के 150 साल पूरे होने के ऐतिहासिक अवसर पर राष्ट्रगीत के सम्मान को लेकर कड़े दिशानिर्देश जारी किए हैं। गृह मंत्रालय की नई गाइडलाइन के अनुसार, अब सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों और सभी आधिकारिक आयोजनों में इस गीत को बजाना अनिवार्य होगा। अब तक केवल शुरुआती दो अंतरे ही गाए जाते थे, लेकिन अब सभी छह छंदों का गायन अनिवार्य कर दिया गया है, जिसकी कुल अवधि 3 मिनट 10 सेकंड निर्धारित की गई है।
नए नियमों के मुताबिक, यदि राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत एक साथ प्रस्तुत किए जाते हैं, तो पहले ‘वंदे मातरम’ गाया जाएगा और इस दौरान उपस्थित सभी लोगों को सावधान की मुद्रा में खड़ा होना होगा। यह बदलाव केवल एक सरकारी आदेश नहीं है, बल्कि देश के प्रशासनिक ढाँचे में राष्ट्रभक्ति के उस गौरव को पुनर्स्थापित करने का प्रयास है जिसे दशकों से राजनीतिक झिझक के कारण पीछे रखा गया था।
हालाँकि, व्यावहारिक दिक्कतों और अव्यवस्था से बचने के लिए सिनेमाघरों और डॉक्यूमेंट्री फिल्मों के प्रदर्शन के दौरान इसे बजाना अनिवार्य नहीं रखा गया है, ताकि इसकी गरिमा भी बनी रहे और जनता को असुविधा भी न हो।
मजहबी कार्ड और एकेश्वरवाद का तर्क
जैसे ही सरकार ने इस प्रोटोकॉल को सार्वजनिक किया, मुस्लिम संगठनों ने मजहबी स्वतंत्रता की दलीलें देना शुरू कर दिया। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी का कहना है कि यह आदेश उनकी मजहबी स्वतंत्रता पर हमला है। अरशद मदनी का तर्क है कि मुसलमान सिर्फ अल्लाह की इबादत करता है और इस गीत के कुछ छंद मातृभूमि को ‘देवता’ के रूप में दिखाते हैं, जो इस्लाम के एकेश्वरवाद (एक खुदा) के खिलाफ है।
वहीं, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने तो इस अधिसूचना को ‘गैर-कानूनी’ बताते हुए कोर्ट में चुनौती देने की धमकी दे डाली। विरोधी नेता जैसे शोएब जमई और इमरान मसूद अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) का हवाला देते हैं। उनका कहना है कि किसी को भी अपनी आस्था के विरुद्ध कुछ गाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या अपनी मातृभूमि को ‘माँ’ कहना या उसे नमन करना किसी मजहब के खिलाफ हो सकता है?
जिन्ना का वही पुराना एजेंडा: 1937 से आज तक
इतिहास के पन्ने पलटें तो पता चलता है कि ‘वंदे मातरम’ का यह विरोध आज की उपज नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें उसी मुस्लिम लीग के एजेंडे में हैं जिसने भारत के टुकड़े किए थे। 1908 में पहली बार मुस्लिम लीग ने इस गीत का विरोध शुरू किया था और 1937 में मुहम्मद अली जिन्ना ने इसे ‘मुस्लिम विरोधी’ घोषित कर दिया था।
उस दौर में तत्कालीन कॉन्ग्रेस नेतृत्व, विशेषकर जवाहरलाल नेहरू ने जिन्ना के कट्टरपंथ के सामने घुटने टेक दिए थे। नेहरू ने खुद नेताजी सुभाष चंद्र बोस को पत्र लिखकर स्वीकार किया था कि वंदे मातरम की भाषा और पृष्ठभूमि मुसलमानों को असहज कर सकती है।
इसी तुष्टीकरण का परिणाम था कि 26 अक्टूबर 1937 को कॉन्ग्रेस ने इस गीत के टुकड़े कर दिए और इसके केवल पहले दो छंदों को ही स्वीकार किया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में संसद में इसी विश्वासघात का जिक्र करते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस ने सत्ता के लिए राष्ट्रगीत के साथ समझौता किया, जिसका अंततः परिणाम देश के विभाजन के रूप में सामने आया।
कट्टरपंथ की गहरी जड़ें और बदलती चुनौतियाँ
आज के दौर में मदनी, ओवैसी और शफीकुर्रहमान बर्क जैसे नेताओं की भाषा में जिन्ना की 1937 वाली सोच की साफ झलक मिलती है। यह विरोध अब केवल व्यक्तिगत बयानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह संस्थागत रूप ले चुका है।
देवबंद के मदरसों से फतवे जारी होना, बिहार विधानसभा में विधायकों का राष्ट्रगीत के दौरान बहिष्कार करना और संसद के भीतर वंदे मातरम को इस्लाम के खिलाफ बताना यह साबित करता है कि भारत के लोकतंत्र के भीतर भी अलगाववाद की वह खाद-पानी आज भी सक्रिय है।
इतना ही नहीं, ‘दल खालसा’ जैसे कुछ सिख संगठनों का इस विवाद में कूदना और इसे ‘हिंदुत्व थोपने’ की कोशिश बताना यह दर्शाता है कि धार्मिक पहचान को ढाल बनाकर राष्ट्र की एकता को कमजोर करने वाले तत्व एक नया मोर्चा खोलने की कोशिश कर रहे हैं।
वंदे मातरम का गौरवशाली इतिहास
‘वंदे मातरम’ का इतिहास बेहद गौरवशाली है। इसकी रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1875 में की थी और बाद में 1882 में यह उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ का हिस्सा बना। इस गीत को सार्वजनिक मंच पर पहली बार 1896 के कॉन्ग्रेस अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने स्वर दिया था। यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारतीय क्रांतिकारियों के लिए आजादी का मंत्र बन गया था।
मैडम भीकाजी कामा ने जब विदेशी धरती पर पहली बार भारतीय ध्वज फहराया, तो उस पर ‘वंदे मातरम’ ही अंकित था। लाला लाजपत राय ने इसी नाम से अखबार निकाला और न जाने कितने क्रांतिकारी इसी जयघोष को लगाते हुए हँसते-हँसते फाँसी के फँदे पर झूल गए। इसकी इसी महत्ता को देखते हुए, 24 जनवरी 1950 को डॉ राजेंद्र प्रसाद ने इसे आधिकारिक रूप से राष्ट्रगान (जन गण मन) के समान ही संवैधानिक दर्जा देने की घोषणा की।
सोच का वही पुराना और खतरनाक ढाँचा
यह पूरी स्थिति एक कड़वा और ठोस सच सामने लाती है कि आजादी के सात दशक बीत जाने के बाद भी भारत के भीतर एक ‘मिनी मुस्लिम लीग’ वाली मानसिकता फल-फूल रही है। मुस्लिम लीग की जो बुनियादी सोच 1908 या 1937 में थी कि ‘हमारी मजहबी पहचान राष्ट्र के प्रतीकों से ऊपर है’, वही सोच आज के कट्टरपंथी संगठनों में भी साफ दिखती है।
जब प्रधानमंत्री मोदी ने संसद में खड़े होकर 121 बार ‘वंदे मातरम’ का जयघोष किया, तो वह केवल एक चुनावी संबोधन नहीं था, बल्कि उन ताकतों को सीधा जवाब था जिन्होंने तुष्टीकरण की राजनीति के दम पर राष्ट्रगीत को शर्मिंदगी का विषय बना दिया था।
संविधान के आर्टिकल 25 की दुहाई देकर मजहबी आजादी की बात करने वाले ये लोग अक्सर यह भूल जाते हैं कि जिस मिट्टी ने उन्हें पहचान दी, उसी मिट्टी की वंदना से उन्हें परहेज क्यों है? ‘वंदे मातरम’ का सीधा सा अर्थ है ‘माँ, मैं तुझे नमन करता हूँ’। अगर किसी को अपनी जन्मभूमि को प्रणाम करने में अपना खुदा खतरे में नजर आता है, तो समस्या मजहब में नहीं बल्कि उस कट्टरपंथी व्याख्या में है जो राष्ट्रवाद को मजहब के चश्मे से देखती है।
जिन्ना ने जो विभाजनकारी बीज बोया था, आज की कट्टरपंथी ताकतें उसे ही सींच रही हैं। यह इस बात की पुष्टि करती है कि इन तत्वों की सोच में न तो पहले कोई परिवर्तन आया था और न ही भविष्य में आने की कोई संभावना है, क्योंकि उनकी प्राथमिकता भारत की अखंडता से ज्यादा अपनी संकुचित मजहबी पहचान को बनाए रखने में है।
गुजरात के जूनागढ़ में गिरनार पर्वत की तलहटी में स्थित भावनाथ महादेव मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से प्रवाहित सनातन चेतना का जीवंत केंद्र है। एक ओर जहाँ गिरनार की पर्वतमाला ऋषि-मुनियों की तपोभूमि रही है, वहीं दूसरी ओर भवनाथ महादेव उस आध्यात्मिक ऊर्जा का ध्रुवतारा हैं, जो इस धरती को शिवमय बनाता है।
महाशिवरात्रि के अवसर पर यहाँ लगने वाला मेला भले ही जनसामान्य को आकर्षित करता हो, पर इस मंदिर का इतिहास, इसकी स्थापत्य शैली और इससे जुड़ी पौराणिक परंपराएँ स्वयं में एक विस्तृत आख्यान हैं। यह स्थान गुजरात के जूनागढ़ से कुछ ही किलोमीटर दूर स्थित है, लेकिन इसका महत्व पूरे देश में फैला हुआ है, विशेषकर महाशिवरात्रि के मेले के दौरान, जिसे ‘मिनी कुंभ’ कहा जाता है।
गिरनार और शैव परंपरा: वैदिक-पौराणिक संदर्भ
गिरनार पर्वत का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में ‘रेवतक’ या ‘रेवताचल’ नाम से मिलता है। स्कंद पुराण के प्रभास खंड में गिरनार क्षेत्र को अत्यंत पवित्र शिवभूमि के रूप में वर्णित किया गया है। शिव पुराण में कहा गया है कि जहाँ-जहाँ तप और संयम की पराकाष्ठा होती है, वहाँ शिव का वास होता है और गिरनार ऐसा ही एक महान तपोस्थल है।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, भावनाथ महादेव का शिवलिंग स्वयंभू है, अर्थात इसकी स्थापना किसी मानव ने नहीं की, बल्कि यह स्वयं प्रकट हुआ है। इसी कारण इन्हें ‘भवना नाथ’ अर्थात सृष्टि के स्वामी देवाधिदेव के रूप में पूजा जाता है। गिरनार क्षेत्र जैन, वैष्णव और शैव परंपराओं का संगम रहा है, किंतु यहाँ जो अटूट शैव परंपरा प्रवाहित होती दिखाई देती है, उसका केंद्र भावनाथ महादेव हैं।
भावनाथ मंदिर की कथा स्कंद पुराण के प्रभास खंड और वस्त्रपथ क्षेत्र माहात्म्य में वर्णित है। पुराणों के अनुसार एक बार भगवान शिव कैलास छोड़कर पृथ्वी पर आए और गिरनार (रैवताचल या उज्जयंत पर्वत) को तप के लिए चुना। यह बात माता पार्वती को ज्ञात न होने के कारण वे शिव की खोज में निकल पड़ीं।
देवताओं और पार्वती के तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव भवानाथ रूप में स्वयं प्रकट हुए। ऐसी मान्यता है कि यह प्राकट्य वैशाख शुक्ल पूर्णिमा के दिन हुआ। इसके बाद माता पार्वती भी गिरनार में अंबिका रूप धारण कर विराजमान हुईं।
दूसरी प्रसिद्ध कथा के अनुसार, एक बार शिव-पार्वती आकाश मार्ग से रथ में विचरण कर रहे थे, तभी माता पार्वती का दिव्य आभूषण या वस्त्र मृगीकुंड के पास गिर गया। इससे यह क्षेत्र ‘वस्त्रपूत क्षेत्र’ के रूप में पवित्र माना जाने लगा और यहाँ शिवलिंग स्वयंभू रूप में प्रकट हुआ।
स्कंद पुराण में गिरनार को शिव-विष्णु-देवी के संगम स्थल के रूप में बताया गया है। शिव यहाँ तप में लीन हुए, माता पार्वती अंबिका रूप में वास करने लगीं और भगवान विष्णु दामोदर रूप में दामोदर कुंड में निवास करने लगे। इस प्रकार भावनाथ मंदिर एक त्रिवेणी संगम की भाँति है, जहाँ तीनों देवताओं की कृपा एक साथ प्राप्त होती है।
ऐतिहासिक-पौराणिक पृष्ठभूमि
भावनाथ मंदिर का निर्माण मनुष्यों द्वारा नहीं, बल्कि शिव के दैवीय प्राकट्य का परिणाम माना जाता है। इसे पौराणिक काल का मंदिर माना जाता है और कुछ लोकमान्यताओं में इसे महाभारत काल से भी जोड़ा जाता है। यहाँ दो शिवलिंग हैं, एक छोटा स्वयंभू और दूसरा बड़ा, जिसकी स्थापना अमरात्मा अश्वत्थामा द्वारा की गई मानी जाती है।
गिरनार पर्वत को चौरासी सिद्धों का निवास स्थल कहा जाता है। यहाँ नवनाथ, 84 सिद्ध, 64 जोगणियाँ और 52 वीरों के स्थान माने जाते हैं। लोककथाओं के अनुसार अश्वत्थामा, पांडव, गोपीचंद और भरथरी जैसे अमरात्मा महाशिवरात्रि की मध्यरात्रि में मृगीकुंड में स्नान कर भवनाथ के दर्शन के लिए आते हैं और कुंभ मेले में साधु वेश में विचरण करते हैं।
मंदिर के आसपास स्थित स्थल, जैसे सुदर्शन तालाब (अशोककालीन), ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी के हैं, किंतु मंदिर स्वयं इससे भी अधिक प्राचीन माना जाता है। समय के साथ मंदिर का जीर्णोद्धार होता रहा, जिसके परिणामस्वरूप यह 2001 के भूकंप के बाद भी मजबूती से खड़ा है।
इतिहासकारों के अनुसार, वर्तमान संरचना मध्ययुग में निर्मित मानी जाती है। जूनागढ़ क्षेत्र पर मौर्य, गुप्त, चालुक्य (सोलंकी) और बाद में चूड़ासमा राजाओं का शासन रहा। विशेष रूप से 10वीं से 12वीं शताब्दी के दौरान, सोलंकी शासकों द्वारा गुजरात में कई शिव मंदिरों का निर्माण किया गया था।
भावनाथ मंदिर की स्थापत्य शैली भी सोलंकी काल की झलक देती है, विशेष रूप से पत्थर की नक्काशी और गर्भगृह की बनावट में। हालाँकि उपलब्ध अभिलेख सीमित हैं, लेकिन स्थानीय परंपरा और क्षेत्रीय इतिहासकारों का मानना है कि मंदिर का मूल स्वरूप प्राचीन है, जो विभिन्न अवधियों में किए गए जीर्णोद्धार के माध्यम से संरक्षित रहा है।
स्थापत्य शैली
भावनाथ महादेव मंदिर की स्थापत्य शैली अत्यधिक अलंकरण नहीं, बल्कि तप और साधना की गंभीरता को दर्शाती है। गर्भगृह अपेक्षाकृत छोटा है, जहाँ शिवलिंग स्थापित है। मंदिर का शिखर पारंपरिक नागर शैली में निर्मित है। पत्थर की सादी संरचना, सीमित अलंकरण और प्राकृतिक परिवेश से सामंजस्य इसकी प्रमुख विशेषता है। यहाँ वास्तुकला का उद्देश्य केवल सुंदरता ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक एकाग्रता भी है, मानो पूरी संरचना साधक को अपने भीतर की यात्रा करने के लिए प्रेरित करती हो।
नागा साधु परंपरा और आध्यात्मिक रहस्य
भावनाथ महादेव का नाम लेते ही महाशिवरात्रि की मध्यरात्रि में निकलने वाली नागा साधुओं की ‘रवाड़ी’ स्मरण हो आती है। नागा सन्यासी इस स्थान को विशेष आध्यात्मिक शक्ति का केंद्र मानते हैं। मान्यता है कि इस रात स्वयं भगवान शिव गिरनार क्षेत्र में विचरण करते हैं।
यह परंपरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सनातन संन्यास परंपरा की निरंतर बहती धारा का प्रतीक है। जूनागढ़ की सांस्कृतिक पहचान में भवनाथ महादेव का स्थान केंद्रीय है। यहाँ केवल पूजा-अर्चना ही नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक संवाद भी होता है।
सदियों से यह स्थल साधकों, यात्रियों और संतों का मिलन केंद्र रहा है। गिरनार की तलहटी में स्थित यह मंदिर आज भी उतना ही जीवंत है, जितना सैकड़ों वर्ष पहले था। जब हम भावनाथ महादेव की ओर देखते हैं, तो हमें केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि वेदों की ऋचाओं से लेकर पुराणों की कथाओं तक फैली एक जीवंत परंपरा दिखाई देती है।
यह मंदिर दर्शाता है कि भारत की आध्यात्मिकता केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं, बल्कि भूगोल में भी अंकित है। गिरनार के शिखरों से टकराती हवाएँ आज भी वही संदेश दोहराती प्रतीत होती हैं, शिव शाश्वत हैं और उनकी परंपरा भी। भावनाथ महादेव अडिग, शांत और अनंत इसी शाश्वतता के साक्षात प्रतीक हैं।
यह रिपोर्ट मूल रुप से गुजराती में भार्गव राज्यगुरु ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।