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पहले बनी मस्जिद, फिर बढ़ी मुस्लिम आबादी और उसके बाद बदल गया हिंदू बहुल इलाके का नाम: पाटन में ‘झापटपरा’ हो गया ‘इस्लामपुरा’, पढ़ें ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट

गुजरात के पाटन जिले में एक हिंदू इलाके का नाम मुस्लिम आबादी ने ही बदल दिया। जानकारी के मुताबिक, पाटन जिले के हारीज वार्ड नंबर 4 के एक इलाके का नाम झापटपरा था, जिसे बदलकर अब ‘इस्लामपुरा’ कर दिया गया है। यहाँ तक कि स्थानीय लोगों के सरकारी दस्तावेजों में भी अब इलाके का नाम ‘इस्लामपुरा’ लिखा जा रहा है। इलाके में बदलती डेमोग्राफी (जनसांख्यिकी) की चिंता के बीच हाल ही में हिंदू संगठनों ने यह शिकायत उठाते हुए मामलातदार को आवेदन पत्र सौंपा था।

जाँच के लिए ऑपइंडिया जब मौके पर पहुँची, तो इस मामले में और भी जानकारियाँ सामने आईं। यह हकीकत भी बाहर आई कि इलाके में जैसे-जैसे मुस्लिम आबादी बढ़ी और डेमोग्राफी बदली, वैसे-वैसे नाम बदलना शुरू हुआ और सरकारी दस्तावेजों तक नया इस्लामी नाम पहुँच गया। स्थानीय हिंदू अब इस मामले में कार्रवाई की माँग कर रहे हैं। हिंदू संगठनों ने भी जाँच की माँग की है।

झापटपरा में 80 से लेकर 80 साल से रह रहे परिवारों ने ऑपइंडिया को बताया कि इलाके का नाम बरसों से ‘झापटपरा’ ही चला आ रहा है और पुराने दस्तावेजों में भी यही नाम देखने को मिलता है।

एक स्थानीय निवासी ने बताया, “हमारे बाप-दादाओं के समय से झापटपरा नाम चल रहा है। लेकिन अब दस्तावेजों में नाम बदल गया है। कोई नया दस्तावेज बनाने जाए, नया आधार कार्ड बनाए तो अब ‘इस्लामपुरा’ लिखा हुआ आता है। ऐसा क्यों हुआ, यह हमें नहीं पता।”

स्थानीय लोग कह रहे हैं कि उनके इलाके का एक ही नाम है और वह है झापटपरा। इस्लामपुरा नाम पहले कहीं था ही नहीं, लेकिन पिछले 10-12 सालों में जैसे ही मुस्लिम आबादी बढ़ी, वैसे ही यह नया नाम घुसा दिया गया।

मस्जिद बनते ही बढ़ने लगी आबादी, फंडिंग कहाँ से आई?

स्थानीय लोगों के अनुसार, साल 2011 में इलाके में मुस्लिम परिवारों के सिर्फ 20-25 घर थे। ये सभी मजदूरी का काम करते हैं। लेकिन कुछ समय पहले यहाँ एक मस्जिद का निर्माण किया गया। साथ ही एक मदरसा भी बना।

इलाके के हिंदुओं का एक सवाल यह भी है कि जो मस्जिद बनाई गई थी, उसके लिए इतनी फंडिंग कहाँ से आई। क्योंकि मस्जिद के निर्माण तक जितने परिवार रहते थे, उनमें से किसी की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वे लाखों रुपये इकट्ठे करके इतनी बड़ी इमारत बना सकें। स्थानीय लोगों और संगठनों को आशंका है कि मस्जिद निर्माण के लिए बाहर से भी फंडिंग आई हो सकती है।

इस मस्जिद के बनने के बाद धीरे-धीरे मुस्लिम घर बढ़ने लगे और आज लगभग 200 से 300 के करीब मुस्लिम परिवार इस इलाके में रहते हैं।

आबादी जैसे ही बढ़ी, वैसे ही मुस्लिमों ने पहले आपस में इलाके को ‘इस्लामपुरा’ कहना शुरू किया और उसके बाद सरकारी दस्तावेजों में भी यही लिखवाना शुरू कर दिया। इसके बाद स्थानीय हिंदुओं के दस्तावेजों में ही ‘झापटपरा’ की जगह ‘इस्लामपुरा’ ने ले ली। इसके अलावा इलाके की मौजूदा आबादी में से ज्यादातर लोगों के बाहरी राज्यों (गुजरात से बाहर के राज्यों) के होने की जानकारी मिली है।

पुराने दस्तावेजों और पालिका के रिकॉर्ड में चल रहा है ‘झापटपरा’

ऑपइंडिया ने स्थानीय लोगों के पास जाकर जब उनके सरकारी दस्तावेज देखे, तो पता चला कि 70-80 साल के बुजुर्गों के बरसों पहले बने दस्तावेजों में ‘झापटपरा’ लिखा हुआ था और ‘इस्लामपुरा’ का कहीं कोई जिक्र नहीं था। लेकिन बाद में जो दस्तावेज बने या अपडेट हुए, उनमें ‘इस्लामपुरा’ कर दिया गया और ‘झापटपरा’ गायब हो गया। एक नहीं बल्कि कई व्यक्तियों के दस्तावेजों में यही पैटर्न देखने को मिला है।

जबकि नगरपालिका के आधिकारिक दस्तावेजों में कहीं भी ‘इस्लामपुरा’ नहीं लिखा गया है और हर जगह ‘झापटपरा’ नाम ही चल रहा है।

इस दौरान मस्जिद के पास एक मुस्लिम व्यक्ति भी मिला। आबिद नाम का यह शख्स ऑपइंडिया से बातचीत में स्वीकार करता है कि इलाके का नाम झापटपरा है, लेकिन अब यह इस्लामपुरा के रूप में जाना जाता है। हालाँकि साथ ही वह कहता है कि उसे ज्यादा जानकारी नहीं है कि नाम किस तरह बदला, लेकिन इलाके में मुस्लिमों के रहने के कारण इसे ‘इस्लामपुरा’ के तौर पर जाना जाता है।

स्थानीय हिंदुओं का कहना है कि आपस में मुस्लिम चाहे किसी भी नाम से इलाके को पुकारते हों, उससे आधिकारिक तौर पर नाम नहीं बदल जाता और सरकारी दस्तावेजों में उसे नहीं लिखा जा सकता। वहीं एक व्यक्ति ने बताया कि उनके इलाके में पहले मुस्लिमों के कुछ ही घर थे, लेकिन अब वे बढ़ गए हैं। जिसके कारण हिंदू घर बेचकर जा रहे हैं। उन्होंने इलाके में ‘अशांत धारा’ (डिस्टर्बड एरिया एक्ट) लागू करने की भी माँग की।

यहाँ देखें पूरी ग्राउंड रिपोर्ट

साजिश रचने वालों के खिलाफ की जाए कार्रवाई: विश्व हिंदू परिषद

इस पूरे मामले में हिंदू संगठनों ने कानूनी कार्रवाई की माँग की है। हारीज नगर विश्व हिंदू परिषद के मंत्री रवि प्रजापति ने कहा, “हमने एक हफ्ते पहले मामलातदार को आवेदन पत्र सौंपकर इलाके के सभी लोगों के दस्तावेजों में सुधार करके इलाके का नाम फिर से झापटपरा करने की माँग की है। साथ ही जिन अधिकारियों या स्थानीय मुस्लिमों ने साजिश के तहत इलाके का नाम बदलने की कोशिश की है, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। आवेदन पत्र में हमने भी ऐसी ही माँग की है।”

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

FIFA विश्वकप के बीच जानाें ब्राजील के महान फुटबॉलर ‘माने गारिंचा’ की कहानी, जिसने अपंगता को मात दे दुनिया को मुस्कुराना सिखाया: लोगों ने कहा – ‘पीपुल्स जॉय’

मैं कंडोलिया मैदान के पास एक दुकान से चाय लेकर पी रहा था। दुकान के चारों तरफ पाँच-दस मीटर तक अदरक इलायची की महक थी। मेरे सामने इक टूटी हुई कुर्सी पड़ी थी जिसने न जाने कितनी बरसातें और न जाने कितनी बर्फबारी झेली थी। मैं अपनी चाय लिए उस कुर्सी पर जाकर पसर गया। मौसम एकदम साफ था। हाँ, बारिश के बाद ठंड जरूर बड़ गई थी। जब ठंड के मारे सारा बदन काँप रहा हो तो अदरक इलायची की चाय से ज्यादा सुकून कुछ भी नहीं देता।

चारों तरफ खूबसूरत पहाड़ थे। पीछे कंडोलिया मंदिर की तरफ से चिड़ियों और मंदिर की घंटियों का कोरस साफ सुनाई दे रहा था। बगल से ही इक सर्पीली सड़क नीचे मुख्य बाजार की ओर जा रही थी। नीचे मुख्य बाजार की ओर देखने पर, कोटद्वार, श्रीनगर और रुद्रप्रयाग को जाने वाली बसें और मुसाफिर साफ दिख रहे थे।

सुबह के छह बज रहे थे। सब्जी वाले अपने ठेले लगाने लगे थे और घर घर अखबार डालने वाले अपनी एटलस साइकिल ले अपने मिशन पर निकल चुके थे। पिछली रात, यही कोई दो बजे के आसपास, पुलिस कॉलोनी की तरफ बाघ आया था। चाय की दुकान पर सब वही बात कर रहे थे।

“बल भैजी, मैंने तो ये बी सुना की ध्यानी मास्टर ने बाघ को खुला चैलेंज दे दिया की बेट्टे फिर नी आणा तू यहाँ बतारा हूँ हाँ।”

मैदान में अब फुटबॉल खेलने वाले बच्चों का जमावड़ा होने लगा था। कई नन्हें मैसी-नेमार कोच के आने से पहले मैदान में बॉल को लेकर हँसते-खेलते जादुई करतब कर रहे थे। कोच के आते ही उन्हें मैदान के चक्कर लगाने पड़ते हैं और फिर बोरिंग एक्सरसाइज करनी पड़ती है। यह मैं पिछली तीन सुबहों से रोज मुस्कुराते हुए देख रहा हूँ। हालाँकि मैं इस बात से पूर्णतः सहमत हूँ कि कोच साब की बोरिंग एक्सरसाइज से जिसने भी दिल लगा लिया, उसका जीवन संवर जाता है परन्तु मेरा यह भी मानना है कि यह हमारे भीतर छुपा जादू ही है जो हमारे जीवन में रंग भरता है।

हमारा संपूर्ण जीवन भी कंडोलिया मैदान में चल रहे फुटबॉल सा ही तो है। हमारे चारों तरफ नटखट चीड़-देवदार हैं जो हमें अपनी ओर बुला रहे होते हैं। चिड़ियों के मीठे गीत हैं। बर्फ़ से लकदक पहाड़ियाँ हैं, जिनसे कभी भी मन नहीं भरता। पास ही चाय की दुकान पर हैं हर ठंडी सुबह थड़क रहे रोचक किस्से कहानियाँ। लेकिन हम इन सब को पीछे छोड़ एक बोरिंग रुटीन को गले लगा लेते हैं।

मुझे बार बार पौड़ी लौटना बेहद पसंद है। मैं जब भी कभी शहरों की दौड़ भाग में खुद को खोता हुआ पाता हूँ तो पौड़ी का एक चक्कर लगा आता हूँ।

यहाँ आकर ठंडी सुबहों में कंडोलिया मैदान के पास चाय लिए बैठे दूर श्रीनगर-सुमाड़ी की दिशा में दिखते, मफलर पहने, शांत खड़े पहाड़ों और मैदान में खेलते नन्हें बच्चों को घंटो देखते रहता हूँ। ऐसा करते हुए पता ही नहीं चलता कब चेहरे से खो गई मुस्कान, इक रंगीन लिफाफे में, वापस अपने पते पर लौट आती है।

कुछ जगहें और कुछ लोग होते हैं ना, जो आपको कुछ पलों के लिए ही सही, आपकी सारी परेशानियों से दूर ले जाते हैं- कंडोलिया के इस मैदान से कुछ ऐसा ही रिश्ता है मेरा। खैर अब तो बरसों हो गए कंडोलिया का मैदान देखे। मगर क्या आप जानते हैं, कभी ब्राजील की भूमि में एक ऐसा खिलाड़ी भी हुआ था जिसे आम जनमानस ने ‘पीपुल्स जॉय’ कहा था। जब भी वह शख्स मैदान पर उतरता, तमाम लोग अपने दर्द भूल कर कुछ पल मुस्कुराने लगते थे। आज बात करते हैं ‘पीपुल्स जॉय’ की।

28 अक्टूबर, 1933 के दिन ब्राज़ील के रियो डी जनेरियो राज्य के सुदूर दक्षिण में स्थित एक छोटे से गांव पाऊ ग्रान्डे में जन्मा था एक लड़का: मैनुएल फ्रांसिस्को दोस सांतोस ।

बालक मैनुएल का जब जन्म हुआ तो उसकी बाईं टाँग उसकी दाईं टाँग से 6 सेमी बड़ी थी और उसकी बाईं टाँग बाहर की दिशा में तो दाईं टाँग अंदर की दिशा में मुड़ी हुई थी। इसके चलते डॉक्टरों को उस नन्हे बच्चे को पैदा होते ही अपंग घोषित कर देना पड़ा था।

क्यूँकि वह लड़का, जिसे सब माने-माने कहा करते, अपने हमउम्र बच्चों से कद काठी में छोटा था तो उसकी बहन ने उसका नाम गारिंचा (एक नन्हीं सी भूरी चिड़िया) रख दिया। और ऐसे मैनुएल हो गया माने गारिंचा।

गारिंचा सड़कों और गलियों में फुटबॉल खेलता था। वह रियो की सड़कों का राजकुमार था। उसको फुटबॉल का प्रोफेशनल खिलाड़ी कभी नहीं बनना था। वो तो ताउम्र यूँ ही रियो की सड़कों पर ड्रिब्लिंग करते रहना चाहता था।

आपको यह जानकर हैरानी होगी की जब गारिंचा ने अपना बोटाफोगो क्लब से एक खिलाड़ी के तौर पर आधिकारिक करार किया तो उनकी उम्र बीस वर्ष थी और वो न सिर्फ शादीशुदा थे बल्कि उनकी संतानें भी थीं। उन्होंने अपने पहले ही ट्रेनिंग सेशन में उन दिनों ब्राज़ीली डिफेंस की दीवार कहे जाने वाले ‘निल्टन सांतोस’ को अपनी बेमिसाल ड्रिब्लिंग के आगे लाचार कर दिया था। पूरा बोटाफोगो क्लब यह देखकर आश्चर्यचकित था।

वेल्स नैशनल टीम के मशहूर डिफेंडर मेल होपकिंस ने 1958 विश्व कप में ब्राज़ील के खिलाफ हुए मुकाबले के बाद कहा था,”गारिंचा हमारी टीम की डिफेंस के लिए पेले से ज्यादा खतरनाक था। उसका सामना करना किसी चक्रवात के दौरान सड़क पर निकलने जैसा था।”

गारिंचा, जिन्हें फ्रेंच अखबारों ने विश्व द्वारा देखा सबसे खतरनाक राइट विंगर घोषित किया था, ने ब्राज़ीली टीम के साथ लगातार दो विश्व-कप ट्रॉफियाँ जीतीं। 1958 और फिर 1962 के विश्व कप की जीत में गारिंचा की बड़ी भूमिका थी। 1962 के विश्व कप में अपने करिश्माई विज़न और जादुई ड्रिब्लिंग के दम पर सारी दुनिया को अपना दिवाना बना लेने वाले गारिंचा वह पहले खिलाड़ी बने जिन्होंने विश्व कप के एक ही संस्करण में गोल्डन बॉल, गोल्डन बूट और विश्व-कप का खिताब जीता।

जब वह खेल रहे होते थे तो स्टेडियम में मौजूद सभी दर्शकों की नजरें बस उन पर ही बनी रहती थीं। गेंद उनकी किसी माशूका की तरह बस उन्हीं के इर्दगिर्द मंडराती रहती।

वो अपना बॉडी पोस्चर यूँ बना लेते की लगता गेंद को फार-पोस्ट की ओर मारेंगे। विपक्षी डिफेंडर उस दिशा में कूद पड़ता और वो फेंट करके गेंद को नियर-पोस्ट की ओर बढ़ा देते।

विपक्षी टीम के पास उनकी कलाबाजियाँ देखने के अलावा कोई चारा नहीं होता था। उनके अंतिम मैच तक ऐसी कोई टीम नहीं थी जो उनका काट ढूँढ सकी हो। आप गूगल करेंगे तो आपको मालूम पड़ेगा की जबतक गारिंचा प्लेइंग इलेवन में रहे, ब्राज़ील ने सिर्फ एक बार ही कोई मैच हारा। यह ब्राज़ील के लिए उनका आखिरी मैच था। वो दो, तीन खिलाड़ियों नहीं बल्कि अकेले विपक्षियों की पूरी टीम को छका कर गोल स्कोर किया करते। और ऐसा वो लगभग हर मैच में करते। फुटबॉल के प्रशंसकों की एक बड़ी संख्या उन्हें पेले से बढ़कर मानती थी।

दो विश्वयुद्ध देख चुकी मायूस और उदास दुनिया में नन्हें गारिंचा लोगों को खुशियाँ देते थे। गेंद जब जब उनके पास आती, खेल प्रशंसक उत्साह से चीखने लगते। गारिंचा ने उनकी उदास शामों को खुशनुमा गीत दिए। एक अपंग लड़के गारिंचा की मैदान की दाईं फ्लैंक से लगातार विपक्षी खेमे में की गई ट्रेडमार्क घुसपैठों ने एकबार फिर आम नागरिकों को यकीन दिलाया था कि आम जिंदगी में भी चमत्कार होते हैं।

अमूमन जो लोग भूखमरी और गरीबी से जूझ रहे होते थे, वो मैच के बाद खुश होकर गारिंचा के नाम के नारे लगाते हुए घरों को लौटते। कई दफा तो गारिंचा अपनी ट्रेनिंग खत्म होते ही स्टेडियम परिसर की दीवार फांद बाहर चले जाते और सड़कों पर मजदूरों और फैक्ट्री वर्कर्स के संग घंटों लैटिन अमेरिकी संगीत का आनंद लेते और फुटबॉल खेलते रहते।

लोगों ने उन्हें यूँ ही नहीं ‘ऐलेग्रिया दो पोवो’ अर्थात पीपुल्स’ जॉय कहा था। वो वाकई सही मायनों में इस दुनिया में खुशियों का पैगाम लेकर आए थे।

यही इस खेल की खूबसूरती है। यह आम जनमानस की हथेलियों पर खुशियाँ धर देता है और उन्हें कुछ पल अपने तमाम दुख दर्द भूल कर मुस्कुराने की वजहें देता है।

पहले भरत तिवारी, अब बंटी यादव… बिहार पुलिस ये दाग अच्छे नहीं

साल 2026 की शुरुआत में बिहार के पुलिस महानिदेशक (DGP) विनय कुमार ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की। उन्होंने बताया कि राज्य में हत्या, डकैती, बैंक लूट, दंगे जैसे बड़े अपराध कम हुए हैं। 2024 के मुकाबले 2025 में हत्या के मामलों में करीब 8.3% की कमी आने की बात कही।

आँकड़ों के अनुसार 2025 में बिहार में हत्या के कुल 2556 मामले दर्ज हुए। यानी, औसतन 7 हत्या रोज हुई। ऐसे में आप पूछ सकते हैं कि फिर भरत तिवारी या बंटी यादव की हत्या पर ही इतनी बात क्यों हो रही?

इसका जवाब आँकड़े नहीं देते। यह बिहार पुलिस के काम करने के तरीके में छिपा है। जब पटना रेलवे स्टेशन जैसी व्यस्त जगह पर किसी व्यक्ति के साथ मारपीट हो, उसका अपहरण कर लिया जाए, CCTV फुटेज में हमलावरों के चेहरे दिखे, फिर भी 5 दिन बाद उस व्यक्ति की मौका-ए-वारदात से 60 किमी दूर आधी गली हुई बॉडी मिले और इस बीच पुलिस केवल ‘तलाश रहे हैं’ जैसा रूटीन जवाब ही देती रही, तो यह आम लोगों के भीतर सुरक्षित होने के विश्वास को गहरे तक हिला देता है। विशेषकर, खतरे का यह संकेत उस राज्य के लिए और भी भयावह है, जिसने करीब ढाई दशक का जंगलराज भोगा हो।

क्या है बंटी यादव का मामला?

33 साल का बंटी यादव पटना के न्यू करबिगहिया इलाके का रहने वाला था। छोटी सी दुकान चलाकर अपने परिवार का गुजारा करता था। 6-7 जुलाई की दरमियानी रात उसे पटना रेलवे स्टेशन के बाहर से अगवा किया गया। उस समय वह एक दुकान में सामान खरीद रहा था। 11 जुलाई को मोकामा से सटे अथमलगोला थाना क्षेत्र के सूर्यपुरा गाँव में एक खेत में उसकी क्षत-विक्षत लाश मिली। पटना रेलवे स्टेशन से यह जगह करीब 60 किलोमीटर दूर है।

बंटी यादव का अपहरण होने से शव मिलने तक क्या-क्या हुआ?

वायरल सीसीटीवी फुटेज में कुछ लोग दुकान में घुसते हैं और पीछे से बंटी का कॉलर पकड़ते हैं। उसके साथ मारपीट करते हैं। उसे घसीटकर ले जाते हैं। इसके बाद उसे जबरन एक ऑटो में बिठाया जाता है। 11 जुलाई को शव मिलने के बाद बाढ़ के अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी रामकृष्णा ने बताया कि हाथ में पहने कड़े से परिजनों ने बंटी यादव की पहचान की। उसको अगवा किए जाने की शिकायत पटना के कोतवाली थाना में दर्ज कराई गई थी। उन्होंने बताया कि चार-पाँच दिन होने के कारण शव डिकम्पोज होना शुरू हो चुका था।

खबरों में पोस्टमार्टम रिपोर्ट के हवाले से बताया गया है कि बंटी के शरीर पर 100 से अधिक चोट के निशान थे। कई हिस्सों पर डंडे और रॉड से पिटाई के कारण काले निशान पड़ गए थे। अपहरण के करीब 14 से 18 घंटे बाद उसकी मौत हुई थी।

यानी, हत्या से पहले उसे करीब 18 घंटे तक टॉर्चर किया गया। मौत होने तक बुरी तरह पीटा गया। आँख-नाक कूच दिया गया। बायाँ हाथ ठीक था। दाहिने हाथ की केवल हड्डियाँ बची थी। दाएँ हाथ पर टैटू था। पहचान न हो सके इसलिए नुकीले चीज से गोदकर उसे हटा दिया गया था। फिर सड़क से सटे सूर्यपुरा गाँव के एक खेत में शव को गाड़ दिया गया।

दैनिक भास्कर ने पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर अजय कुमार सिंह के हवाले से बताया है कि बंटी के शरीर में गोली या छर्रे नहीं मिले हैं। ईंट-पत्थर जैसी भारी चीजों से पीट-पीटकर उसकी हत्या की गई होगी। डॉक्टर सिंह ने यह भी बताया है कि बॉडी गलनी शुरू हो चुकी थी, इसके कारण कुछ चोटें किस तरह के हथियार से आईं हैं, इसकी पुष्टि नहीं की जा सकती।

क्यों की गई बंटी यादव की हत्या?

पीड़ित परिजनों के अनुसार बंटी यादव ने न्यू करबिगहिया इलाके में सेक्स रैकेट चलाने का विरोध किया था। कथित तौर पर यह सेक्स रैकेट रवीश कुमार उर्फ बिसिया चला रहा था। रवीश पर कई मामले दर्ज हैं और कुछ महीने पहले ही वह जेल से बाहर निकला था।

रिपोर्ट के अनुसार अपहरण की घटना से करीब 15 दिन पहले रवीश से बंटी का विवाद हुआ था। इस दौरान रवीश ने उसे धमकी भी दी थी। दावा किया जा रहा है कि इस विवाद के कारण अगवा कर उसे मार डाला गया।

हालाँकि इन दावों में कितनी सत्यता है यह पुलिस की जाँच और अदालत के अंतिम निष्कर्षों के बाद ही सत्यापित हो पाएगा। शव मिलने के बाद डीएसपी रामकृष्णा ने देह व्यापार का विरोध करने के कारण बंटी की हत्या किए जाने के सवाल पर कहा कि दूसरे थाना क्षेत्र से मामला जुड़ा होने के कारण उनके लिए इस पर कमेंट करना उचित नहीं होगा। घटना के सभी पहलुओं की गहन जाँच की जा रही है।

किन लोगों ने की बंटी यादव की हत्या?

अब तक सामने आई जानकारी के अनुसार किचर किन्नर के कहने पर रवीश ने बंटी की हत्या की पूरी प्लानिंग की। किचर के तीन साथियों को 15 जून को गिरफ्तार किया गया था। उसे संदेह था कि बंटी यादव की मुखबिरी पर इनलोगों की गिरफ्तारी हुई। उल्लेखनीय है कि रवीश के सेक्स रैकेट को चलाने में किन्नर सहयोग कर रहे थे।

6 जुलाई की रात बंटी को कॉल कर पटना रेलवे स्टेशन के पास बुलाया गया। बंटी पर हमला करने से पहले रवीश और उसके साथियों ने किचर के घर शराब पार्टी की। इसके बाद ये लोग बंटी के पास पहुँचे और मारपीट करते हुए उसे दुकान से उठा लिया।

7 जुलाई को बंटी के परिजनों ने नामजद एफआईआर करवाई। रितेश, रवीश के भाई बजरंगी और ऑटो ड्राइवर रोहित को गिरफ्तार कर लिया गया है। रवीश, किचर किन्नर, अजीतपाल एवं अन्य फरार हैं। पुलिस इन्हें जल्द गिरफ्तार करने का दावा कर रही है।

पटना में बंटी यादव की हत्या
पटना में बंटी यादव की हत्या

बंटी यादव की लाश कहाँ मिली?

अथमलगोला इलाके के फोरलेन से सटे सूर्यपुरा गाँव के खेत में बंटी यादव की लाश मिली। राम नाम का युवक खेत में भैंस चरा रहा था। उसकी नजर शव पर पड़ी। बॉडी को गड्ढा कर गाड़ दिया गया था। उसके ऊपर बालू और पत्ते डाल दिए गए थे। बारिश होने के कारण बालू और पत्ते हट गए और शव दिखने लगा। राम ने गाँव पहुँच लोगों को इसकी सूचना दी। इसके बाद पुलिस को जानकारी दी गई।

बिहार पुलिस पर क्यों उठ रहे सवाल?

बंटी यादव के परिजनों का कहना है कि अगवा करने की शिकायत के बाद भी पुलिस ने कुछ नहीं किया। दैनिक भास्कर को बंटी के भाई मुकुल ने बताया है कि डेड बॉडी खोजने का काम उनलोगों ने खुद किया। जो लोग अब तक गिरफ्तार हुए हैं, उन्हें भी पकड़कर पुलिस को देने का दावा भी उन्होंने किया। उनका कहना है कि पुलिस केवल इतना कहती रही कि हम तलाश कर रहे हैं, जबकि रवीश और उसके साथियों का आपराधिक रिकॉर्ड रहा है।

  • बंटी का जहाँ से अपहरण हुआ, वहाँ का सीसीटीवी वायरल है। इसमें उसके साथ मारपीट करने वालों का चेहरा भी दिख रहा है। लेकिन इनमें से एक को भी अपहरण की शिकायत मिलने के बाद पुलिस नहीं पकड़ सकी।
  • अपहरण के बाद बंटी को पहले ऑटो में बिठाया गया। फिर भूतनाथ रोड पर दूसरी गाड़ी ​में शिफ्ट किया गया। पुलिस इस गाड़ी की पहचान तक न कर सकी।
  • रवीश के साथ बंटी के विवाद, बंटी को धमकी देने की बात, बंटी के अपहरण के बाद भी पुलिस रवीश का पता नहीं लगा सकी।
  • अपहरण की जगह से करीब 60 किमी दूर बंटी का शव मिला। इस दौरान कई थाना क्षेत्रों और टोल प्लाजा से वह गाड़ी गुजरी जिसमें बंटी को ले जाया गया, पर कहीं कोई कार्रवाई नहीं हुई।

क्यों सामान्य घटना नहीं है अगवा कर बंटी यादव की हत्या करना?

पटना बिहार की राजधानी है। पटना रेलवे स्टेशन देश के बड़े रेलवे स्टेशनों में से एक है। इसके मुख्य द्वार के पास ही महावीर मंदिर है। इसी इलाके से बंटी यादव को अगवा किया गया।

वहीं करबिगहिया इस रेलवे स्टेशन का पिछला भाग है। यहीं से ट्रेनों से उतरने वाले यात्री बस स्टैंड के लिए जाते हैं। यानी यह ऐसा इलाका है, जहाँ हर समय आवाजाही बनी रहती है। जाहिर है यहाँ पुलिस का पूरा तंत्र सक्रिय रहता होगा। ऐसी जगह से किसी को अगवा किया जाए, वह घटना सीसीटीवी में दर्ज हो फिर भी पुलिस कुछ न कर पाए तो यह सामान्य बात नहीं है।

बंटी का शव मिलने के बाद स्थानीय लोगों ने भी यह बात उठाई है। उनका कहना है कि जब यहाँ के लोग सुरक्षित नहीं हैं तो बाहर से आने वाले यात्री कैसे सुरक्षित रह सकते हैं। साथ ही ऐसी जगह पर सेक्स रैकेट का चलना भी पुलिस पर सवाल उठाते हैं। बिहार के चर्चित यूट्यूबर और जनसुराज के नेता मनीष कश्यप भी अपने एक रिपोर्ट में इस इलाके में अवैध धंधों की बात मुखरता से उठाई है।

ऑपइंडिया की बात

बंटी यादव की हत्या और भरत तिवारी का एनकाउंटर, दोनों एक जैसे मामले नहीं हैं। एक में पुलिस अपनी निष्क्रियता से सवालों के घेरे में है तो दूसरे में सरेंडर करने के बावजूद एनकाउंटर करने के आरोपों से घिरी है।

फिर भी दोनों मामले एक ही जैसे खतरे का संकेत देते हैं। यह बताते हैं कि केवल अपराध की संख्या कम होने का नंबर सामने रखकर, पुलिस यह नहीं कह सकती कि उसकी पूरी प्रक्रिया चुस्त-दुरुस्त है। उसे बार-बार यह दिखाना होगा कि कि जब भी कोई नागरिक संकट में होगा तो पुलिस अपराधियों से कहीं अधिक तेजी से काम करेगी। वैसे भी कानून-व्यवस्था का असली पैमाना अपराध का ग्राफ नहीं, नागरिकों के भीतर सुरक्षित होने का विश्वास होता है।

यदि यह विश्वास टूटता है, तो केवल आँकड़ों से लोगों को सुरक्षा का एहसास नहीं दिलाया जा सकता।

महाराष्ट्र सरकार की लाडकी बहिन योजना से 92 लाख लाभार्थी बाहर, eKYC फेल और आय सीमा बनी मुख्य वजह: जानिए हर साल कैसे होगी ₹16500 करोड़ की बचत

महाराष्ट्र सरकार ने अपनी प्रमुख मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहिन योजना के तहत अब तक का सबसे बड़ा लाभार्थी सत्यापन अभियान चलाया है। इस अभियान के बाद सरकार ने योजना से 92 लाख से अधिक लाभार्थियों के नाम हटा दिए हैं, जिससे योजना के कुल लाभार्थियों की संख्या में लगभग 38 प्रतिशत की कमी आ गई है।

यह बड़े पैमाने पर की गई कार्रवाई राज्यभर में चलाए गए सत्यापन अभियान के बाद हुई। जाँच में पता चला कि लाखों लाभार्थियों ने योजना के लिए जरूरी eKYC और अन्य अनिवार्य सत्यापन प्रक्रिया पूरी नहीं की, जबकि कई लोग योजना के तय पात्रता मानकों पर खरे नहीं उतरे। इस पूरी प्रक्रिया का राज्य की वित्तीय स्थिति पर भी बड़ा असर पड़ने वाला है।

इसी बीच भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने अपनी रिपोर्ट में वर्ष 2024-25 के दौरान इस योजना में 3,541 करोड़ रुपए के अतिरिक्त खर्च और वित्तीय प्रबंधन में कई कमियों की ओर ध्यान दिलाया था। वहीं अब 92 लाख से अधिक लाभार्थियों के नाम हटाए जाने के बाद सरकार पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ भी काफी कम होने की उम्मीद है।

अगर हटाए गए सभी लाभार्थियों को हर महीने मिलने वाली 1,500 रुपए की सहायता राशि आगे भी जारी रहती, तो सरकार को हर साल भारी खर्च उठाना पड़ता। लेकिन अब इन लाभार्थियों के हटने से राज्य सरकार की वार्षिक वित्तीय देनदारी में 16,500 करोड़ रुपए से अधिक की कमी आने का अनुमान है।

आइए अब विस्तार से समझते हैं कि यह फैसला क्यों लिया गया, किन कारणों से इतने बड़े पैमाने पर लाभार्थियों के नाम हटाए गए और इसका महाराष्ट्र की आर्थिक स्थिति पर क्या असर पड़ेगा।

क्या है लाडकी बहिन योजना

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले जून 2024 में मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहिन योजना को मंजूरी दी गई थी। महायुति सरकार ने इस योजना को महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत और आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से अपनी प्रमुख कल्याणकारी योजनाओं में शामिल किया था।

इस योजना के तहत ऐसे परिवारों की 21 से 65 वर्ष की पात्र महिलाओं को हर महीने 1,500 रुपए की आर्थिक सहायता सीधे उनके बैंक खाते में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के माध्यम से दी जाती है, जिनकी परिवार की वार्षिक आय 2.5 लाख रुपए से कम है। हालाँकि सरकारी कर्मचारी, आयकरदाता और कुछ अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ लेने वाले लोगों को इस योजना का लाभ नहीं दिया जाता।

योजना शुरू होने के बाद इसमें तेजी से लाभार्थियों की संख्या बढ़ी और इसके लिए बजट तथा अनुपूरक प्रावधानों के जरिए 60,000 करोड़ रुपए से अधिक का प्रावधान किया गया। एक समय इस योजना का लाभ करीब 2.43 करोड़ महिलाओं को मिल रहा था। लेकिन हाल ही में हुए सत्यापन अभियान के बाद लाभार्थियों की संख्या घटकर लगभग 1.5 करोड़ रह गई है।

महाराष्ट्र ने 92 लाख से ज्यादा लाभार्थियों को क्यों हटाया?

यह सत्यापन अभियान सितंबर 2025 में शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य अपात्र लाभार्थियों की पहचान करना और यह सुनिश्चित करना था कि योजना का लाभ केवल वास्तविक पात्र महिलाओं को ही मिलता रहे। जाँच में सामने आया कि सबसे ज्यादा नाम किसी धोखाधड़ी के कारण नहीं हटाए गए, बल्कि इसलिए हटाए गए क्योंकि लाभार्थियों ने सरकार द्वारा अनिवार्य की गई इलेक्ट्रॉनिक नो योर कस्टमर (eKYC) प्रक्रिया पूरी नहीं की थी।

आँकड़ों के अनुसार, करीब 62 लाख लाभार्थियों, यानी कुल हटाए गए लोगों में लगभग 67 प्रतिशत, के नाम केवल eKYC पूरा न करने की वजह से सूची से हटा दिए गए।
इसके अलावा कई अन्य लाभार्थी योजना के नियमों के अनुसार अपात्र पाए गए।

करीब 16 लाख महिलाओं के परिवारों की वार्षिक आय योजना में तय 2.5 लाख रुपए की सीमा से अधिक निकली। वहीं सत्यापन के दौरान 4.42 लाख लाभार्थियों ने बताया कि वे स्वयं या उनके परिवार का कोई सदस्य सरकारी कर्मचारी है, जिसके कारण वे योजना के लिए पात्र नहीं थे।

जाँच में यह भी पता चला कि करीब 3.6 लाख महिलाएँ पहले से ही संजय गाँधी निराधार योजना का लाभ ले रही थीं। वहीं लगभग 2.5 लाख मामलों में एक ही परिवार के दो से अधिक सदस्य योजना का लाभ ले रहे थे, जो योजना के नियमों के खिलाफ है।

इसके अलावा करीब 1.8 लाख लाभार्थियों की उम्र 65 वर्ष से अधिक पाई गई, जबकि 1.7 लाख मामलों को जिला स्तर पर किए गए सत्यापन के दौरान संदिग्ध मानते हुए हटाया गया। जाँच में यह भी सामने आया कि करीब 29 हजार पुरुष और लगभग 8 हजार सरकारी कर्मचारी भी गलत तरीके से इस योजना का लाभ ले रहे थे, जबकि वे इसके लिए पात्र नहीं थे।

eKYC की प्रक्रिया इतनी देर से क्यों हुई?

इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए महाराष्ट्र की महिला एवं बाल विकास मंत्री अदिति तटकरे ने कहा कि योजना शुरू होने के तुरंत बाद सरकार eKYC प्रक्रिया शुरू नहीं कर सकी, क्योंकि इसके कुछ ही समय बाद राज्य में विधानसभा चुनाव की घोषणा हो गई थी और आदर्श आचार संहिता लागू हो गई थी।

अदिति तटकरे के अनुसार, योजना जून 2024 में शुरू की गई थी, जबकि इसकी पहली दो किस्तें अगस्त 2024 में एक साथ जारी की गई थीं। लेकिन अनिवार्य सत्यापन शुरू होने से पहले ही राज्य चुनावी प्रक्रिया में चला गया, जिसके कारण eKYC लागू करने में देरी हुई। नई सरकार के गठन के बाद अगस्त 2025 में सरकार ने राज्यभर में eKYC सत्यापन अभियान शुरू किया।

उन्होंने कहा कि लाभार्थियों को कई बार बताया गया था कि यदि वे eKYC पूरा नहीं करेंगे तो उनकी सहायता राशि बंद कर दी जाएगी। सरकार ने उन्हें प्रक्रिया पूरी करने के लिए कई अवसर दिए और इसकी समयसीमा बढ़ाकर 31 दिसंबर 2025 तक कर दी थी। मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार ने किसी भी लाभार्थी का नाम मनमाने तरीके से नहीं हटाया।

उनके अनुसार, जिन लोगों ने योजना में पंजीकरण कराया था और जो पात्र थे, उन्हें अनिवार्य सत्यापन प्रक्रिया पूरी होने तक लगातार योजना का लाभ मिलता रहा।

सरकारी आँकड़ों का उपयोग करके AI से बनाया गया चार्ट

हटाए गए लाभार्थियों को पहले कितना भुगतान हुआ था?

सत्यापन अभियान से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, जिन लाभार्थियों के नाम बाद में योजना से हटाए गए, उन्हें भुगतान बंद होने से पहले कुल मिलाकर लगभग 14,000 करोड़ रुपए की सहायता राशि दी जा चुकी थी। अधिकारियों का अनुमान है कि जिन लाभार्थियों का भुगतान रोका गया, उन्हें औसतन करीब 10 महीने तक योजना का लाभ मिला।

हालाँकि सभी के लिए भुगतान बंद करने की कोई एक तय तारीख नहीं थी। सत्यापन के दौरान अलग-अलग चरणों में लाभार्थियों की जाँच हुई और उनकी पात्रता का पुनर्मूल्यांकन किया गया। इसी वजह से कुछ लोगों को दूसरों की तुलना में अधिक समय तक योजना का लाभ मिलता रहा, जबकि बाद में उन्हें अपात्र पाए जाने पर उनका भुगतान रोक दिया गया।

CAG रिपोर्ट में असल में क्या कहा गया था?

इसी दौरान जब लाभार्थियों का सत्यापन अभियान चल रहा था, भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने भी लाडकी बहिन योजना के वित्तीय प्रबंधन को लेकर गंभीर सवाल उठाए। वित्त वर्ष 2024-25 की राज्य वित्त ऑडिट रिपोर्ट में CAG ने बताया कि महिला एवं बाल विकास विभाग ने 29,693.09 करोड़ रुपए के स्वीकृत बजट के मुकाबले 33,237.24 करोड़ रुपए खर्च किए।

इस तरह विभाग ने 3,541.16 करोड़ रुपए का अतिरिक्त व्यय किया। ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया कि इस अतिरिक्त खर्च के लिए कोई स्पष्ट या ठोस कारण नहीं बताया गया। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि जनवरी से मार्च 2025 के बीच 15,586 करोड़ रुपए को वर्चुअल पर्सनल डिपॉजिट अकाउंट (VPDA) में स्थानांतरित कर दिया गया, जबकि उस समय इन पैसों की तत्काल आवश्यकता नहीं थी।

CAG ने इसे गंभीर वित्तीय अनियमितता बताते हुए कहा कि बिना वास्तविक खर्च की जरूरत के सरकारी खजाने से धन निकालकर VPDA में जमा करना उचित वित्तीय प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है। कुल मिलाकर CAG ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि योजना के क्रियान्वयन के दौरान बजट का अनुमान लगाने, खर्च पर नियंत्रण रखने और वित्तीय प्रबंधन में कई महत्वपूर्ण कमियाँ रहीं।

ऑडिट रिपोर्ट में सरकार को सलाह दी गई कि भविष्य में इस तरह की बड़ी डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) योजनाओं के लिए बजट बनाते समय संभावित लाभार्थियों की संख्या का अधिक वास्तविक और सटीक आँकलन किया जाए।

लाभार्थियों के नाम हटाने का मामला CAG की जाँच-पड़ताल से कैसे जुड़ा है?

लाभार्थियों के सत्यापन अभियान और CAG की ऑडिट रिपोर्ट का अक्सर एक साथ जिक्र किया जा रहा है, लेकिन दोनों अलग-अलग मुद्दों से जुड़े हैं। CAG द्वारा बताई गई 3,541 करोड़ रुपए की राशि वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान स्वीकृत बजट से अधिक किए गए खर्च को दर्शाती है।

यह निष्कर्ष योजना के वित्तीय प्रबंधन और बजट के उपयोग से जुड़ा है, न कि इस बात से कि व्यक्तिगत लाभार्थी पात्र थे या नहीं। वहीं 92 लाख से अधिक लाभार्थियों के नाम हटाए जाने का असर सरकार के भविष्य के खर्च पर पड़ेगा। योजना के तहत प्रत्येक लाभार्थी को हर महीने 1,500 रुपए दिए जाते हैं।

ऐसे में 92 लाख लाभार्थियों के हटने से सरकार की सालाना भुगतान देनदारी में लगभग 16,560 करोड़ रुपए की कमी आएगी। सरल शब्दों में कहें तो यदि लाभार्थियों की संख्या आगे भी इसी स्तर पर बनी रहती है, तो इस सत्यापन अभियान के कारण सरकार को हर साल 16,500 करोड़ रुपए से अधिक की बचत हो सकती है।

यही वजह है कि 3,541 करोड़ रुपए और 16,560 करोड़ रुपए के आँकड़ों की सीधे तुलना नहीं की जा सकती। 3,541 करोड़ रुपए वह अतिरिक्त खर्च है, जो पहले ही किया जा चुका था और बाद में लाभार्थियों के नाम हटाने से उसे वापस नहीं पाया जा सकता। दूसरी ओर 16,560 करोड़ रुपए सरकार की संभावित वार्षिक बचत का अनुमान है, क्योंकि अब हटाए गए लाभार्थियों को हर महीने सहायता राशि नहीं देनी पड़ेगी।

हालाँकि लाभार्थियों के इस सत्यापन अभियान से CAG की उस प्रमुख चिंता का कुछ हद तक समाधान जरूर होता है, जिसमें कहा गया था कि भविष्य में ऐसी योजनाओं का बजट वास्तविक पात्र लाभार्थियों की संख्या के आधार पर तैयार किया जाना चाहिए, न कि बढ़ा-चढ़ाकर दर्ज की गई लाभार्थी संख्या के आधार पर।

(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

UP को मिला विकास का एक और हाईवे, लखनऊ-कानपुर के बीच 3D एलिवेटेड तकनीकसे लैस अवध एक्सप्रेस-वे हुआ ऑपरेशनल: जानें लंबाई, स्पीड लिमिट से लेकर सब कुछ

यूपी को एक और सौगात मिल गई है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह,केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मिलकर लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे के रूप में यह सौगात दी है। इसके साथ ही 3 घंटे का सफर अब मात्र 35-40 मिनट में पूरा किया जा सकता है। इस पर अधिकतम 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से गाड़ियाँ दौड़ सकती हैं। 63 किलोमीटर लंबा यह एक्सप्रेस वे ₹4200 करोड़ रुपए की लागत से बनाया गया है।

उद्घाटन के बाद तीनों नेता खुद पहले इस एक्सप्रेस-वे का लुत्फ उठाने के लिए सफर कर लखनऊ पहुँचे। मंगलवार (14 जुलाई 2026) से इसे आम जनता के लिए खोल दिया जाएगा।

एक्सप्रेस वे के हैं कई नाम

लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेस-वे को NE6, अवध एक्सप्रेस वे और डिफेंस कॉरिडोर के नाम से जाना जाता है। इस कॉरिडोर को भारत सरकार के सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने एनएचएआई के साथ मिलकर बनाया है इसलिए इस मार्ग को NE-6 कहा जाता है।

लखनऊ-कानपुर तक का पूरा इलाका अवध के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपरा के अंतर्गत आता है। इसलिए सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने के लिए इसे अवध एक्सप्रेस वे कहा जाता है।

यूपी डिफेंस कॉरिडोर के प्रमुख केन्द्र लखनऊ और कानपुर हैं। इनसे रक्षा उत्पादन, लॉजिस्टिक्स और भारी वाहनों को बगैर किसी रुकावट के आवाजाही हो सकेगी, इसलिए इसे डिफेंस कॉरिडोर भी कहा जाता है। इस एक्सप्रेस वे से रक्षा उद्योग के विकास को नई रफ्तार मिलेगी क्योंकि यह रक्षा सेंटर बन रहे लखनऊ और कानपुर को जोड़ता है।

इतना ही नहीं 63 किलोमीटर के इस आधुनिक ऑटोमेटेड इंटेलिजेंस मशीन गाइडेड कंस्ट्रक्शन तकनीक से बना ये एक्सप्रेस वे पर्यावरण के भी अनुकूल है।

(साभार-x@nitingadkari)

दो पहिया वाहन को गुजरने की अनुमति नहीं

लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेस वे से कोई दुपहिया वाहन नहीं गुजर सकता। इससे सिर्फ कार, वैन और दूसरे चारपहिया वाहन ही गुजर सकते हैं। सुरक्षा के लिए यहाँ 63 हाई रिजॉल्युशन सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं, जिससे 500 मीटर तक छोटी से छोटी चीजें भी साफ दिखाई देती हैं। इनमें से 21 कैमरे वाहनों की गतिविधियों पर नजर रख रहे हैं।

अगर इंटरचेंज करते वक्त नियमों की अनदेखी की गई तो ऑनलाइन चालान कटेगा और बगैर रोके गाड़ियों की नंबर प्लेट देखकर टोल टैक्स ले लिया जाएगा। एक्सप्रेस वे पर 24 घंटे निगरानी करने के लिए दो आधुनिक कंट्रोल रूम 27वें और 35वें किलोमीटर के दौरान बनाए गए हैं। यहाँ पर आपातकालीन सेवाएँ भी उपलब्ध हैं और ट्रैफिक मैनेजमेंट भी यहीं से होता है।

इस मार्ग पर 6 इंटरचेंज दिए गए हैं ताकि अलग अलग जगहों पर गाड़ियाँ प्रवेश कर सके और निकासी हो सके। इस दौरान पूरे 38 अंडरपास, 6 फ्लाई ओवर, 3 बड़े पुल और 28 छोटे-छोटे पुल बनाए गए हैं।

एक्सप्रेस वे पर एआई आधारित निगरानी सिस्टम लगाई गई है जिससे किसी तरह की दुर्घटना या हादसा, असामान्य गतिविधि की सूचना तुरंत कंट्रोल रूम को मिल सकेगी। इससे एम्बुलैंस तुरंत पहुँच जाएगी और बचाव-राहत कार्य आसान होगा।

कितना और कैसे कटेगा टोल टैक्स

लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेस वे के उद्घाटन के बाद 14 जुलाई 2026 से यहाँ टोल टैक्स लगना शुरू हो रहा है। यहाँ कार जीप और एसयूवी के एक तरफ का टोल ₹275 रुपए जबकि 24 घंटे में वापसी पर ₹415 रुपए देने हैं। बड़ी और कमर्शियल गाड़ियों, बसों और ट्रकों को एक तरफ में 935 रुपए देना होगा। छोटे ट्रकों और व्यावसायिक वाहनों को 445 रुपए एक तरफ का टोल टैक्स देना होगा। दोपहिया वाहन तो इस पर जा ही नहीं सकते। टोल टैक्स पूरी तरह डिजिटल तरीके से देना है।

पूरे एक्सप्रेस वे पर कोई टोल प्लाजा वाला सिस्टम नहीं है, जहाँ बेरियर लगे होते हैं और एक-एक गाड़ी को टोल देकर उससे गुजरना पड़ता है, बल्कि इस एक्सप्रेस-वे पर बैरियर फ्री टोल सिस्टम है यानी कहीं रुकने की जरूरत नहीं है खुद-ब-खुद ऑटोमैटिक नंबर प्लेट एएनपीआर कैमरे से फास्टटैग के जरिए टोल कट जा रहे हैं। इससे लंबे कतारों में खड़े होने से मुक्ति मिली है। इंधन और समय की भी बचत हो रही है।

3 डी एलिवेटेड तकनीक वाला कॉरिडोर

63 किलोमीटर एक्सप्रेस वे का 18 किलोमीटर यानी करीब 30 फीसदी हिस्सा एलिवेटेड है। देश में ऐसा पहली बार प्रयोग किया गया है, जिसमें इतना लंबा हिस्सा 6 लेन एलिवेटेड बनाया गया है, यानी ये पूरा हिस्सा सिर्फ एक पिलर पर टिका हुआ है। इससे भीड़भाड़ वाले इलाकों के ट्रैफिक जाम से निजात मिलेगी। अमौसी, एनएच-27 और सरोजिनीनगर जैसे इलाके अक्सर जाम रहते हैं। यह एक्सप्रेस वे इन इलाकों में एलिवेटेड है। इससे बिना सिग्नल और रुकावट के वाहन यहाँ से निकल जाएँगे। इससे रोजाना ऑफिस आने जाने वालों को काफी फायदा होगा।

बगैर ट्रेनों को बाधा पहुँचाए बना खास बोस्टिंग गर्डर

लखनऊ कानपुर एक्सप्रेस वे को आधुनिक इंजीनियरिंग की मिसाल कहा जा रहा है। इसका सिस्टम 3डी ऑटोमेट मशीन गाइडेंस टेक्नोलॉजी पर आधारित है। भारत में इसका इस्तेमाल बृहत पैमाने पर पहली बार किया गया है। इस तकनीक में ग्रेडर और कंक्रीट बिछाने वाली मशीनों को जीपीएस और 3डी डिजिटल मॉडल से जुड़ा होता है। इससे किसी तरह के चूक की आशंका काफी कम हो जाती है। इसकी वजह से सड़क की फिनिशिंग इतनी शानदार और स्मूथ होती है कि गाड़ी में ग्लास में रखा हुआ पानी भी न छलके, हाई स्पीड से झटका लगना तो दूर की बात है।

उन्नाव के पास रेलवे लाइनों को पार करने के लिए एक्सप्रेस वे पर खास बोस्टिंग गर्डर का इस्तेमाल किया गया है। रेलवे ओवरब्रिज ज्यादातर कंक्रीट के पिलर पर बनते हैं, लेकिन यहाँ बेहद कम वक्त पर भारी स्टील गर्डर्स को हवा में असेंबल कर इस ब्रिज को तैयार किया गया है, ये आधुनिक आर्किटेक्चर का बेहतरीन उदाहरण है। इस निर्माणकार्य के दौरान रेलवे यातायात को किसी भी वक्त बाधा नहीं पहुँचाया गया।

लखनऊ आउटर रिंग रोड से कनेक्टिविटी

एक्सप्रेस वे को लखनऊ आउटर रिंग रोड से जोड़ा गया है जिससे कानपुर में बगैर घुसे ही लोग सीधे रायबरेली, सीतापुर, सुल्तानपुर,हरदोई जैसे इलाके तक जा सकेंगे। इससे लखनऊ में भी ट्रैफिक का दबाव कम होगा। इस इलाके में सर्विस रोड भी बनाई गई है ताकि स्थानीय स्तर पर ट्रैफिक जाम न हो।

लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेस वे केवल एक सड़क परियोजना नहीं है, बल्कि ये यूपी के आर्थिक विकास और देश की मजबूती का उदाहरण है। इससे व्यापार और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को बढ़ावा मिलेगा। इस क्षेत्र में आने वाले इलाकों के लोगों की बाजार तक पहुँच बनेगी। रोजगार के अवसर मिलेंगे और तरक्की होगी। आने वाले वर्षों में लखनऊ -कानपुर एक्सप्रेस वे यूपी के इंफ्रास्ट्रक्चर और निवेश को नई दिशा देने वाला है।

राहुल गाँधी के ‘सीक्रेट’ विदेश दौरे पर राजनीतिक घमासान, BJP ने पूछा- कहाँ हैं कॉन्ग्रेस के युवराज?: ‘छात्रों की गूँज’ कई शहरों में रद्द, अब देहरादून में होंगे ‘प्रकट’

राहुल गाँधी एक बार फिर से राजनीतिक हंगामा मचाने सार्वजनिक तौर पर सामने आने वाले हैं। कथित तौर पर वो बीते 20 दिनों से विदेश दौरे पर थे, जिसे सीक्रेट रखा गया था। सीक्रेट इसलिए क्योंकि उनकी ही पार्टी के कार्यकर्ताओं-नेताओं को ये जानकारी नहीं है कि राहुल गाँधी आखिर हैं कहाँ? बताया जा रहा है कि वो 17 जुलाई 2026 को देहरादून में ‘छात्रों की गूँज’ कार्यक्रम में सार्वजनिक उपस्थिति देंगे। आखिरी बार उन्हें इसी ‘छात्रों की गूँज’ कार्यक्रम के दौरान राजस्थान के कोटा में देखा गया था।

अब कॉन्ग्रेस पार्टी ने ऐलान किया है कि राहुल गाँधी 17 जुलाई 2026 को देहरादून में ‘छात्रों की गूँज‘ कार्यक्रम में शामिल होंगे, जिसकी तैयारी में पूरी पार्टी जुटी हुई है। चूँकि कोटा-प्रयागराज-पटना-दिल्ली की तरह ही देहरादून को भी शैक्षणिक हब माना जाता है, ऐसे में राहुल गाँधी की टारगेट ऑडियंस छात्रों के ही होने की उम्मीद है।

कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा जारी किया गया पोस्टर

राहुल गाँधी की गैरमौजूदगी में रद्द हो चुके हैं कई शहरों के कार्यक्रम

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो राहुल गाँधी के ‘सीक्रेट’ विदेशी दौरे की वजह से ‘छात्रों की गूँज’ कार्यक्रम के कई हिस्सों को रद्द कर दिया गया। पहले की रिपोर्ट्स में कहा जा रहा था कि कॉन्ग्रेस पार्टी कोटा की तर्ज पर ही प्रयागराज, पटना, दिल्ली में कार्यक्रमों का आयोजन करेगी, इसके बाद ही राहुल गाँधी देहरादून जाएँगे। लेकिन राहुल गाँधी के सीक्रेट विदेश दौरे की वजह से पहले तो प्रयागराज का कार्यक्रम बिना किसी हो हल्ले के रद्द हो गया, फिर पटना और दिल्ली का भी।

देश के अलग-अलग शहरों में कार्यक्रमों का आयोजन, लेकिन नहीं मिल रही चर्चा

द प्रिंट की रिपोर्ट के मुताबिक, कॉन्ग्रेस पार्टी की ओर से कार्यक्रमों की लिस्ट जारी की गई थी, जिसमें 10 जुलाई को प्रयागराज (इलाहाबाद), 11 जुलाई को पटना (ये तारीख कई बार बदली, 11 से लेकर 15 तक) और 14 जुलाई को दिल्ली में रैलियाँ होनी थीं। इन सभी के रद्द होने की वजह राहुल गाँधी की अनुपलब्धता बताई गई।

हालाँकि कॉन्ग्रेस पार्टी देश के अलग-अलग राज्यों और शहरों में इस तरह के आयोजन कर रही है, लेकिन राहुल गाँधी की गैर-मौजूदगी की वजह से इन कार्यक्रमों का कोई खास असर पड़ता नहीं दिख रहा है। इसी कड़ी में राँची में मैराथन दौड़ का आयोजन तक किया गया था, लेकिन राष्ट्रीय राजनीतिक चर्चाओं में ये आयोजन कोई खास जगह नहीं बना पाया।

14 जुलाई का कार्यक्रम 9 अगस्त को खिसका?

कॉन्ग्रेस पार्टी से जुड़े एक नेता ने नाम न छापने की शर्त पर ऑपइंडिया को बताया कि राहुल गाँधी की जो रैली 14 जुलाई 2026 को होनी थी, वो अब 9 अगस्त 2026 को हो सकती है। इसके लिए कॉन्ग्रेस पार्टी ने 6 जुलाई 2026 को एक बैठक भी बुलाई थी। इस बैठक को मीडिया में भी जगह मिली।

BJP का सवाल, कहाँ हैं कॉन्ग्रेस के युवराज?

इस बीच भारतीय जनता पार्टी ने कॉन्ग्रेस पार्टी पर जोरदार हमला बोला है। बीजेपी IT सेट के इन्चार्ज अमिल मालवीय ने भी यही सवाल पूछा है। उन्होंने एक्स पर लिखा, “राहुल गाँधी की 22 जून से 13 जुलाई के बीच की विदेश यात्रा पर रहस्य बरकरार है। वो कहाँ गए हैं? वो किससे मिल रहे हैं? उनकी यात्रा और अन्य खर्चों का वहन कौन कर रहा है? देश के विपक्ष के नेता को इस सवाल का जवाब देना चाहिए।”

बताया जा रहा है कि राहुल गाँधी लंदन, जर्मनी या फिनलैंड में हो सकते हैं। ऐसा दावा इंडिया टीवी की रिपोर्ट में किया गया है।

बता दें कि राहुल गाँधी की विदेश यात्राओं पर पहले भी विवाद होते रहे हैं। वो आत्यधिक व्यस्त चुनावी समय में भी पार्टी और देश को छोड़कर विदेश जाते रहे हैं। वो साल 2025 में बिहार चुनाव के समय भी पार्टी को मँझधार में छोड़ विदेश यात्रा पर निकल गए थे।

रेलवे के सैलून कोच में रुद्राभिषेक पर विवाद: ट्रेन बुकिंग की अधूूरी जानकारी ने छेड़ी बहस; पंडित और शास्त्रों से समझिए क्या है ‘मानस पूजा’, जिसमें नहीं होती ‘अग्नि’ की जरूरत

सोशल मीडिया पर एक वीडियो सामने आया है जो भारतीय रेलवे के एक सैलून कोच यानी प्राइवेट कोच का है, जिसमें कुछ लोग पंडित की मौजूदगी में पूजा (रुद्राभिषेक) करते हुए नजर आ रहे हैं। जैसे ही यह वीडियो सामने आया इस्लामी कट्टरपंथियों ने नियमों की दुहाई देनी शुरू कर दी। उनका कहना था कि उनके नमाज पढ़ने पर शोर होने लगता है तो पूजा पे शांति क्यों है?

कुछ लोगों ने इसे रेलवे के नियमों का खुला उल्लंघन बताना शुरू कर दिया, तो कुछ लोगों ने इस पर फायर हैजार्ड यानी चलती ट्रेन में आग लगने के खतरे का एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा कर दिया। देखते ही देखते इंटरनेट पर लोग इस बात को लेकर तरह-तरह के दावे करने लगे और सार्वजनिक कोचों में नमाज पढ़ने से इसकी तुलना की होने लगी।

लेकिन जब इस पूरे मामले की गहराई से पड़ताल की गई और रेलवे से लेकर इस पूजा को कराने वाले पंडित जी तक के पक्ष को समझा गया, तो सच इस पूरे हंगामे और दावों से बिल्कुल अलग निकला। आइए समझते हैं कि ये कौन सी पूजा थी, जिसमें आग का कोई खतरा नहीं हो सकता था और कैसे सार्वजनिक नमाज से इसकी तुलना पूरी तरह गलत साबित होती है।

रेलवे ने दी आधिकारिक सफाई और खारिज किए दावे

ऑल्ट न्यूज के मोहम्मद जुबैर ने सवाल किया कि क्या चलती ट्रेन के अंदर रुद्राभिषेक करने की इजाजत है। पश्चिम रेलवे ने इस पर जवाब देते हुए आधिकारिक तौर पर बताया कि जिस कोच को लेकर इतना बड़ा विवाद खड़ा किया जा रहा है, वह असल में कोई सरकारी विभाग, दफ्तर या किसी अथॉरिटी को अलॉट किया गया सरकारी या VIP सैलून नहीं था।

रेलवे ने स्पष्ट किया कि यह पूरी तरह से एक प्राइवेट कमर्शियल बुकिंग थी। इस सैलून कार को IRCTC के जरिए एक निजी संस्था यानी एक प्राइवेट पार्टी ने 8 जुलाई 2026 को बुक किया था। इस बुकिंग को पूरी तरह कानूनी और नियमों के तहत करने के लिए उस प्राइवेट पार्टी ने कमर्शियल बुकिंग के तौर पर 3 लाख 8 हजार 580 रुपए का एडवांस पेमेंट किया था।

रेलवे ने बताया कि इस सैलून कार को 10 जुलाई 2026 को नई दिल्ली से मुंबई के बीच चलने वाली ट्रेन संख्या 12926 पश्चिम एक्सप्रेस में एकतरफा यात्रा के लिए जोड़ा जाना तय हुआ था। उत्तर रेलवे ने ऑपरेशनल संभावनाओं और व्यवस्थाओं को ध्यान में रखते हुए ही 10 जुलाई 2026 को इस सैलून के कमर्शियल रन का आधिकारिक नोटिफिकेशन जारी किया था।

रेलवे ने अपने बयान में इस बात पर सबसे ज्यादा जोर दिया कि यात्रियों की समय-पाबंदी, उनकी सुरक्षा, संरक्षा और सुविधा सुनिश्चित करने की मुख्य जिम्मेदारी बिना किसी समझौते के हमेशा रेलवे की ही होती है और इस पूरी घटना के दौरान रेलवे के किसी भी सुरक्षा मानक का कोई उल्लंघन नहीं हुआ।

रेलवे ने साफ किया कि इस पूरी यात्रा में कोई भी व्यक्ति घायल नहीं हुआ और न ही किसी को कोई असुविधा हुई। जो पुजारी वीडियो में दिखाई दे रहे हैं, वह उसी सैलून कार में अभिषेक कर रहे हैं जिसे पूरी तरह से नियमों के तहत पैसे देकर बुक किया गया था। इसलिए सोशल मीडिया पर किए जा रहे सभी दावों को रेलवे ने सिरे से खारिज कर दिया।

सैलून कोच के नियम

IRCTC के नियमों के अनुसार, रेलवे नियमों के पालन के आधार पर कोई भी आम नागरिक या निजी संस्था IRCTC के जरिए कमर्शियल तौर पर सैलून कार को किराए पर ले सकती है। एक बार जब रेलवे की तरफ से बुकिंग मंजूर हो जाती है, तो किराए पर लेने वाले व्यक्ति को कानूनी कामों के लिए उस सैलून कार का इस्तेमाल करने की पूरी इजाजत होती है।

शर्त यह होती है कि यात्रा के दौरान सभी सुरक्षा जरूरतों, ऑपरेशनल निर्देशों और लागू रेलवे नियमों का सख्ती से पालन करना होगा। अगर आपने FTR यानी फुल टैरिफ रेट सेवा के तहत पूरा सैलून कोच अपने निजी इस्तेमाल के लिए बुक किया है, तो आप वहाँ अपनी आस्था और मर्जी के अनुसार कोई भी धार्मिक अनुष्ठान या पाठ कर सकते हैं।

बस इसमें एक ही मुख्य शर्त होती है कि सार्वजनिक सुरक्षा सर्वोपरि होनी चाहिए। इसका मतलब यह है कि आपके किसी भी अनुष्ठान या काम के कारण ट्रेन की यात्रा में कोई बाधा नहीं आनी चाहिए, आपके साथ चलने वाले सह-यात्रियों को किसी प्रकार की असुविधा नहीं होनी चाहिए।

रेलवे के सुरक्षा मानकों जैसे कि आग का खतरा पैदा करने वाली या किसी भी तरह की ज्वलनशील सामग्री के इस्तेमाल से कोई समझौता नहीं होना चाहिए। इसके अलावा बुकिंग के समय किसी भी संभावित नुकसान या पेनल्टी की भरपाई करने के लिए यात्री को एक रिफंडेबल सिक्योरिटी डिपॉजिट और रजिस्ट्रेशन चार्ज भी देना जरूरी होता है, ताकि अगर कोच को कोई नुकसान पहुँचे तो उसकी भरपाई की जा सके।

चलती-फिरती रसोई और सैलून कोच में मिलने वाली घर जैसी सुविधाएँ

IRCTC के मुताबिक यह सैलून कोच सामान्य ट्रेन के डिब्बों जैसा बिल्कुल नहीं होता है। यह लगभग एक चलते-फिरते 1BHK फ्लैट या एक प्राइवेट घर की तरह होता है। इस सैलून कोच के भीतर बकायदा आलीशान बेडरूम होते हैं और साथ में आने वाले अतिरिक्त लोगों को ठहराने के लिए चार से छह एक्स्ट्रा बर्थ या बेड की व्यवस्था होती है।

यात्रियों की यात्रा को पूरी तरह से आरामदायक और सुरक्षित बनाने के लिए रेलवे की तरफ से एक एसी अटेंडेंट और एक जनरल अटेंडेंट भी हमेशा उपलब्ध कराए जाते हैं। इस पूरे प्राइवेट कोच की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि इसके भीतर यात्रा के दौरान ताजा खाना पकाने के लिए एक पूरी रसोईघर यानी किचन की सुविधा दी जाती है।

इस रसोईघर में खाना बनाने और उसे सुरक्षित रखने के लिए जरूरी बर्तन, गर्म पानी का सिंक, रेफ्रिजरेटर और आरओ का शुद्ध पानी जैसी तमाम आधुनिक सुविधाएँ मौजूद होती हैं।हालाँकि इस कोच में किचन होता है, लेकिन सुरक्षा के कड़े नियमों के कारण आम यात्रियों को खुद वहाँ खाना पकाने या आग जलाने की इजाजत नहीं होती है।

IRCTC आवश्यकता पड़ने पर अतिरिक्त शुल्क लेकर खुद अपना रसोइया और खाना पकाने की सामग्री उपलब्ध कराती है, ताकि रेलवे के ट्रेन स्टाफ को अच्छी तरह से पता हो कि चलती ट्रेन में सुरक्षित तरीके से रसोई का संचालन कैसे करना है। इस पूरी व्यवस्था से यह बात साफ हो जाती है कि सैलून कोच कोई पब्लिक स्पेस यानी सार्वजनिक जगह नहीं है।

यह पूरी तरह से प्राइवेट स्पेस है जिसे एक तय समय के लिए यात्री अपना अस्थाई घर बना लेते हैं। ऐसे में जो काम कोई भी व्यक्ति अपने निजी घर के भीतर करने के लिए स्वतंत्र है, वही काम वह नियमों के दायरे में रहकर इस सैलून कोच के भीतर भी कर सकता है।

क्या वाकई था आग का खतरा? पंडित जी ने खुद खोली दावों की पोल

इस पूरे विवाद में जो सबसे बड़ा और मुख्य सवाल लोगों द्वारा उठाया गया, वह था फायर हैजार्ड यानी आग लगने के खतरे का तर्क। लोगों ने यह मान लिया कि चूँकि वीडियो में पूजा होते दिख रही है, तो निश्चित रूप से वहाँ हवन किया गया होगा या फिर दीए जलाए गए होंगे, जिससे चलती ट्रेन में आग लगने का एक बहुत बड़ा खतरा पैदा हो सकता था।

इस पूरे भ्रम को उन पंडित के बयान ने पूरी तरह से खारिज कर दिया, जिन्होंने खुद इस सैलून कोच में पूजा को संपन्न कराया था। पंडित जी ने ऑपइंडिया को बताया कि उन्होंने खुद यह पूजा (रुद्राभिषेक) कराई है और लोगों की यह सोच पूरी तरह से गलत है कि इसमें आग की कोई जरूरत होती है।

पंडित जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह मानस (मानसिक) पूजा थी और पूरी प्रक्रिया में अग्नि यानी आग की मौजूदगी बिल्कुल भी अनिवार्य या आवश्यक नहीं होती है। इस पूजा को करने के लिए किसी भी तरह के हवन की आवश्यकता नहीं होती है और यहाँ तक कि इसके लिए एक छोटा सा दीया जलाना भी जरूरी नहीं होता है।

पंडित जी के पक्ष से यह बात पूरी तरह से साफ हो जाती है कि उस सैलून कोच के भीतर न तो कोई माचिस जलाई गई, न कोई दीया जलाया गया और न ही किसी प्रकार का कोई हवन कुंड तैयार किया गया। वहाँ केवल भगवान शिव की मूर्ति या शिवलिंग पर जल, दूध और अन्य पवित्र सामग्रियों से अभिषेक किया जा रहा था और साथ में मंत्रों का पाठ किया जा रहा था।

जब पूजा में किसी भी स्तर पर आग या किसी ज्वलनशील वस्तु का इस्तेमाल ही नहीं हुआ, तो फिर वहाँ किसी भी प्रकार के फायर हैजार्ड या सुरक्षा नियमों के उल्लंघन का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता। यह पूरी तरह से एक सुरक्षित, शांत और जल आधारित धार्मिक अनुष्ठान था जिसे बिना किसी खतरे के संपन्न किया गया।

शास्त्रों में वर्णित पूजा के प्रकार और ‘मानस पूजा’ का गहरा विज्ञान: जहाँ सामग्री नहीं, सिर्फ मन की श्रद्धा ही काफी

सनातन धर्म और हिंदू शास्त्रों में पूजा-पाठ को लेकर बहुत ही गहरा विज्ञान बताया गया है। शास्त्रों में मुख्य रूप से आराधना और उपासना की तीन श्रेणियाँ या प्रकार बताए गए हैं, जिनमें से सबसे उत्तम और प्रभावशाली विधि को मानस पूजा का नाम दिया गया है।

मानस पूजा का सीधा और सरल अर्थ है- मन के द्वारा की जाने वाली पूजा। इस पूजा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें संसार की किसी भी भौतिक वस्तु (जैसे फूल, फल, दीपक, जल या धन) की आवश्यकता नहीं होती। आमतौर पर जब हम पूजा करते हैं, तो हमें कई तरह की सामग्रियों को जुटाना पड़ता है। लेकिन मानस पूजा पूरी तरह से आंतरिक होती है।

इसमें भक्त अपने मन की एकाग्रता और कल्पना शक्ति से भगवान को स्वर्ण सिंहासन पर बैठाता है, मन से ही उन्हें गंगाजल से स्नान कराता है, मन से ही छप्पन भोग लगाता है और मन से ही आरती उतारता है। शास्त्रों के अनुसार, ईश्वर को भौतिक वस्तुओं की भूख नहीं होती, वे केवल भक्त के ‘भाव’ के भूखे होते हैं।

आदि शंकराचार्य द्वारा रचित शिव मानसोपचार पूजा स्रोत के पहले ही श्लोक में वे कहते हैं, “रत्नैः कल्पितमासनं हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरं…” इसका अर्थ है, “हे प्रभु! मैंने अपने मन में ही आपके लिए रत्नों का सिंहासन, हिमालय के शीतल जल से स्नान और दिव्य वस्त्रों की कल्पना कर आपको अर्पित किए हैं।”

इस श्लोक में वे बात को पूरी तरह स्पष्ट कर देते हैं, “आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं… यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शंभो तवाराधनम्।”

इसका अर्थ है, “हे शंभो! मेरी आत्मा आप हैं, मेरी बुद्धि माता पार्वती हैं, मेरे प्राण आपके गण हैं, और मेरा यह शरीर ही आपका मंदिर है। अब मैं जो भी कर्म करता हूँ, वह सब आपकी ही पूजा है। यानी यहाँ भक्त का पूरा अस्तित्व ही पूजा बन जाता है, किसी बाहरी सामग्री की कोई जगह नहीं बचती।

श्रीमद्भागवत पुराण के 11वें स्कंध के 27वें अध्याय में भगवान श्री कृष्ण स्वयं उद्धव जी को पूजा के भेदों के बारे में बताते हैं। वहाँ वे स्पष्ट करते हैं कि जो भक्त बाहरी सामग्री जुटाने में असमर्थ हैं, या जो संन्यासी व विरक्त हैं, वे केवल मन के द्वारा मेरी उत्तम आराधना कर सकते हैं।

भगवान के अनुसार, मानसिक रूप से अर्पित की गई सेवा को वे सबसे पहले और सहर्ष स्वीकार करते हैं क्योंकि उसमें दिखावा शून्य होता है। मानस पूजा यह साबित करती है कि भक्ति किसी धन, साधन या परिस्थिति की मोहताज नहीं है। आप जहाँ हैं, जिस अवस्था में हैं, वहीं आंखें बंद करके अपने आराध्य को मन से याद कर सकते हैं।

इसमें न तो कोई खर्च है और न ही कोई शुद्धता-अशुद्धता का बाहरी बंधन, इसमें बस ‘आप’ होते हैं और आपका ‘ईश्वर’। ट्रेन के उस प्राइवेट सैलून कोच में भी इसी तरह बिना किसी भौतिक आग को जलाए, बिना किसी सुरक्षा को खतरे में डाले और बिना किसी सह-यात्री को परेशान किए, बेहद सादगी और शुद्ध भावना के साथ इस अनुष्ठान को पूरा किया गया था।

नमाज से इस पूजा की तुलना क्यों है पूरी तरह गलत?

इस पूरे मामले के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा इसकी तुलना सामान्य डिब्बों के गलियारों या कूपे में नमाज पढ़ने की घटनाओं से की जाने लगी।

लेकिन अगर हम रेलवे के नियमों और व्यवस्था को समझें, तो यह तुलना पूरी तरह से गलत है। इसका सबसे पहला और बड़ा कारण पब्लिक और प्राइवेट स्पेस का बुनियादी अंतर है।

जब कोई यात्री ट्रेन के सामान्य डिब्बों जैसे कि स्लीपर या एसी कोच के गैलरी, कॉरिडोर या रास्ते में नमाज पढ़ता है या कोई अन्य गतिविधि करता है, तो वह एक सार्वजनिक स्थान होता है जहाँ से लगातार दूसरे यात्रियों का आना-जाना लगा रहता है। ऐसी स्थिति में वहाँ से गुजरने वाले सह-यात्रियों का रास्ता रुक जाता है, उन्हें आने-जाने में भारी असुविधा होती है।

इसके बिल्कुल विपरीत, सैलून कोच एक पूरी तरह से बंद, सुरक्षित और निजी तौर पर बुक की गई जगह होती है। उसके भीतर कोई भी बाहरी सह-यात्री मौजूद नहीं होता है और न ही वहाँ किसी आम जनता का आना-जाना होता है। इसलिए सैलून कोच के भीतर की जाने वाली किसी भी गतिविधि से बाहरी यात्री को रत्ती भर भी असुविधा होने का कोई चांस ही नहीं रहता।

दूसरा सबसे महत्वपूर्ण अंतर सुरक्षा नियमों के सख्त पालन का है। रेलवे के नियम यह साफ कहते हैं कि अगर किसी नागरिक ने पूरा सैलून कोच निजी इस्तेमाल के लिए बुक किया है, तो वह वहाँ अपनी धार्मिक आस्था के अनुसार कोई भी अनुष्ठान करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है, बशर्ते वह रेलवे के किसी सुरक्षा कानून को न तोड़े।

चूँकि इस पूरी पूजा के दौरान पंडित जी की देखरेख में किसी भी तरह की आग, दीए या ज्वलनशील पदार्थ का उपयोग किया ही नहीं गया, इसलिए वहाँ सुरक्षा का कोई उल्लंघन हुआ ही नहीं। जब किसी सार्वजनिक व्यवस्था को नुकसान नहीं पहुँचा, किसी यात्री को कोई तकलीफ नहीं हुई तो फिर इस पूरी घटना को किसी भी अन्य नियम-विरुद्ध गतिविधि के बराबर खड़ा करना पूरी तरह से गलत है। इंटरनेट पर होने वाला यह पूरा बवाल असल में आधे-अधूरे तथ्यों, अधूरी धार्मिक समझ और रेलवे के नियमों की अज्ञानता का ही नतीजा है।

कौन थे ‘फादर अमीर’ जिन्होंने कतर को दुनिया की आर्थिक शक्ति बनाया: भारत में उनके निधन पर झुका तिरंगा, जानिए किन परिस्थितियों में होता है ऐसा

भारत ने कतर के ‘फादर अमीर’ हिज हाइनेस शेख हमद बिन खलीफा अल-थानी के निधन पर एक दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया है। 13 जुलाई 2026 को राष्ट्रीय झंडा आधा झुका रहेगा। तिरंगा उन सभी इमारतों पर एक दिन तक आधा झुका रहेगा, जहाँ राष्ट्रीय झंडा नियमित फहराया जाता है।

इस दिन कोई आधिकारिक मनोरंजन वाले कार्यक्रम भी नहीं आयोजित होंगे। संसदीय मामलों और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू जल्द ही कतर जाएँगे और भारत सरकार की ओर से कतर को शोक संदेश देंगे और संवेदना जताएँगे।

पीएम मोदी ने फादर अमीर शेख हमद बिन खलीफा अल-थानी के निधन पर शोक व्यक्त किया है और कहा है कि वह भारत के सच्चे दोस्त थे। उन्होंने कहा कि वे दूरदर्शी व्यक्ति थे, जिन्होंने कतर को विकास और खुशहाली को नई ऊँचाई दी। उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए कतर के फादर अमीर को श्रद्धांजलि दी और कतर के नेतृत्व, शाही परिवार और वहाँ की जनता के प्रति अपनी संवेदना जताई।

अपने पोस्ट में पीएम मोदी ने लिखा, हम उन्हें एक सच्चे दोस्त के रूप में याद करते हैं। पीएम ने फरवरी 2024 की अपनी कतर यात्रा को याद किया और ‘फादर अमीर’ के प्रति संवेदना जताते हुए उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।

2024 की प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान भारत-कतर के आपसी रिश्तों में और मजबूती आई। कतर भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने वाला अहम देश है। पीएम मोदी के दौरे के दौरान द्विपक्षीय व्यापार, निवेश, प्रौद्योगिकी और ऊर्जा के क्षेत्र में अहम समझौते हुए । कतर की जनसंख्या में अप्रवासी भारतीयों का बड़ा भाग है, जो कतर के विकास में अहम योगदान दे रहे हैं। इससे दोनों देश की नजदीकियाँ भी बढ़ी हैं।

कौन थे शेख हमद बिन खलीफा अल थानी

1995 से 2013 तक कतर के अमीर के रूप में अपनी सेवा देने वाले शेख हमद बिन खरीलाफ अल थानी को आधुनिक कतर का निर्माता कहा जाता है। कतर को आर्थिक राजनयिक और वैश्विक स्तर पर उन्होंने पहचान दिलाई। उनके शासनकाल में कतर ने अपने नेचुरल गैस के व्यापक भंडार के दम पर तेजी से प्रगति की और वैश्विक स्तर पर संपन्न देश के रूप में अपनी पहचान बना। उन्होंने इसके बाद अपनी सत्ता बेटे शेख तमीन बिन हमद अल थानी को सौंप दी। 12 जुलाई 2026 को 74 वर्ष में उनका निधन हो गया।

शेख हमद बिन खलीफा अल थानी को कतर में ‘फादर अमीर’ कहा जाता है। दरअसल ये कोई पारिवारिक संबोधन नहीं, बल्कि कतर में दिया जाने वाला एक सम्मानजनक आधिकारिक खिताब है। जब कोई शासक या अमीर अपनी सत्ता स्वेच्छा से अपने उत्तराधिकारी को सौंप देता है, तब उसे ‘फादर अमीर’ कहा जाता है। शेख हमद बिन खलीफा अल थानी ने 2013 में स्वेच्छा से अपने बेटे शेख तमीम बिन हमद अल-थानी को सत्ता सौंप दी थी। इसलिए उन्हें कतर में सम्मान से ‘फादर अमीर’ कहते हैं। खाड़ी देशों में इस तरह का स्वैच्छिक सत्ता हस्तांतरण बहुत कम देखने को मिलता है।

उनका जन्म 1952 में हुआ था। उनके अब्बू का नाम शेख खलीफा बिन हमद अल-थानी था जो कतर के शासक थे। उनकी अम्मी शेखा आयशा बिंत हमद अल अत्तिया था। कतर पर अली थानी राजवंश की शुरुआत 19वीं सदी के मध्य से है। जब कतर को 1971 में ब्रिटेन से आजादी मिली, तो उसके कुछ ही महीनों बाद 1972 में शेख हमद के पिता शेख खलीफा कतर के अमीर बन गए थे। इसलिए फादर अमीर को बचपन से ही सत्ता का उत्तराधिकारी माना जाता था।

यूके के प्रतिष्ठित रॉयल मिलिट्री एकेडमी सैंडहर्स्ट से 1971 में ग्रेजुशन करने के बाद वह कतर आकर सेना में शामिल हो गए। धीरे-धीरे वह सेना के कमांडर इन चीफ के पद तक पहुँचे। 1977 में उन्हें कतर का ‘क्राउन प्रिंस’ आधिकारिक तौर पर घोषित किया गया। जून 1995 में कतर में उन्होंने रक्तहीन सत्तापलट किया। हुआ यूँ कि उनके पिता शेख खलीफा जब स्विटजरलैंड की यात्रा पर थे तो उन्होंने सेना के समर्थन से तख्तापलट किया और खुद को ‘अमीर’ घोषित कर दिया। इसकी वजह से दोनों के रिश्तों में दरार आ गई। लंबे समय तक अब्बा फ्रांस में निर्वासित रहे, लेकिन आपसी सुलह के बाद 2004 में वे कतर लौटे, जहाँ 2016 में उनका निधन हुआ।

दरअसल फादर अमीर का मानना था कि उनके पिता प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल नहीं कर रहे और पुराने तरीके से शासन चला रहे हैं।

आधुनिक कतर के निर्माता

उन्होंने कतर को अपने शासनकाल में पूरी तरह बदल दिया।कतर के प्राकृतिक संसाधनों खासकर गैस भंडार का व्यापक तौर पर इस्तेमाल किया जाने लगा। उनके नेतृत्व में कतर दुनिया के सबसे बड़े एलएनजी निर्यातकों में शामिल हो गया। इसका असर ये हुआ कि देश में समृद्धि आई और प्रति व्यक्ति आय दुनिया में सबसे अव्वल श्रेणी में पहुँच गई। उन्होंने कतर के सॉवरेन वेल्थ फंड के जरिए दुनिया भर में बड़े निवेश कराए। इससे कतर की आर्थिक और रणनीतिक पहुँच कई देशों तक बढ़ी। उनके शासन में अल जजीरा न्यूज नेटवर्क की स्थापना हुई, जिसने कतर को वैश्विक मीडिया शक्ति के रूप में पहचान दिलाई।

उनके नेतृत्व में कतर ने 2022 फीफा विश्व कप की मेजबानी का अधिकार हासिल किया। इसके लिए देश में मेट्रो, स्टेडियम, सड़कें और दूसरे बुनियादी ढाँचे का व्यापक विकास हुआ। उन्होंने कतर को मध्य-पूर्व की कूटनीति में महत्वपूर्ण मध्यस्थ के रूप में स्थापित किया। हालाँकि कुछ क्षेत्रीय नीतियों और इस्लामी संगठनों के साथ संबंधों को लेकर उनकी सरकार विवादों में भी रही।

भारत और कतर के बीच ऊर्जा, व्यापार, तकनीक के क्षेत्र में मजबूत रिश्ते हैं। प्रवासी भारतीयों की बड़ी संख्या यहाँ रहती है जिससे दोनों देशों के संबंध और गहरे हो गए हैं। लाखों भारतीय वहाँ काम करते हैं और कतर के विकास में अपना योगदान दे रहे हैं। खासकर शेख हमद के शासनकाल के दौरान दोनों देशों के संबंध बेहद मजबूत हुए थे। यही वजह है कि भारत सरकार ने उनके निधन पर राष्ट्रीय शोक की घोषणा की है।

तिरंगा कब आधा झुकाया जाता है?

भारत में राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा को राष्ट्रीय शोक के वक्त आधा झुकाया जाता है। यह शोक के साथ-साथ उनके प्रति सम्मान का प्रतीक है।

आम तौर पर देश के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, भारत के मुख्य न्यायाधीश और दूसरे उच्च संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्तियों के निधन पर झंडा आधा झुकाया जाता है।

भारतीय ध्वज संहिता के अनुसार ऐसा किया जाता है। वैश्विक गणमान्य व्यक्तियों के निधन पर गृह मंत्रालय विशेष निर्देश जारी करता है, तब झंडा झुकाया जाता है।

किसी राज्य के राज्यपाल या मुख्यमंत्री के निधन पर उस राज्य में झंडा आधा झुकाया जाता है। किसी राष्ट्रीय त्रासदी पर या असाधारण घटना पर जब केन्द्र सरकार राष्ट्रीय शोक घोषित करती है तो झंडा आधा झुका रहता है।

इसके अलावा किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष, सरकार के मुखिया या महत्वपूर्ण वैश्विक नेता के निधन पर यदि भारत सरकार राष्ट्रीय शोक घोषित करती है, तो उस दिन सभी सरकारी इमारतों पर तिरंगा आधा झुका रहता है। इस दिन सरकारी कामकाज तो सामान्य रूप से होते हैं लेकिन कोई मनोरंजन कार्यक्रम नहीं होता है। हालाँकि राष्ट्रीय अवकाश भी नहीं होता है।

न्यूक्लियर पॉवर से रोशन होगा बांग्लादेश, भारत-रूस दे रहे तकनीकी सहयोग और ट्रेनिंग: समझें कैसे फुलप्रूफ सिक्योरिटी के साथ ये प्लांट लगातार देगा बिजली

भारत के बिल्कुल बगल में पश्चिम बंगाल से होकर बहने वाली पद्मा नदी के किनारे एक बहुत बड़ा बदलाव आकार ले रहा है। बांग्लादेश अपने पहले न्यूक्लियर पॉवर प्लांट यानी रूपपुर परमाणु ऊर्जा परियोजना का निर्माण कर रहा है। वहाँ खड़े विशालकाय, हाथीदांत के रंग जैसे कूलिंग टावर्स को देखने के लिए स्थानीय लोग आते हैं और तस्वीरें लेते हैं।

एक तरफ जहाँ पूरी दुनिया ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं और रूस द्वारा उसे दी जा रही मदद को लेकर चिंतित है, वहीं भारत के ठीक पड़ोस में एक और पड़ोसी देश परमाणु शक्ति बनने की दिशा में कदम बढ़ा चुका है। हालाँकि बांग्लादेश का यह प्रोजेक्ट पूरी तरह से शांतिपूर्ण नागरिक ऊर्जा के लिए है। ऐसे में इस प्रोजेक्ट को भारत का भी पूरा सहयोग मिल रहा है।

रूपपुर प्रोजेक्ट में तकनीकी तौर पर मिल रहा रूस का साथ

ब्लूमबर्ग की ताजी रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2028 में पूरी तरह से चलने जा रहा रूपपुर में बांग्लादेश का यह पहला परमाणु बिजली घर रूस की सरकारी कंपनी रोसाटॉम की मदद से बनाया जा रहा है। यह कुल 2.4 गीगावाट का प्रोजेक्ट है, जिसमें बारह-बारह सौ मेगावाट के दो आधुनिक रशियन-डिजाइन रिएक्टर लगाए जा रहे हैं।

वर्ल्ड न्यूक्लियर एसोसिएशन के मुताबिक, रोसाटॉम के साथ हुए मुख्य समझौते के तहत इस प्लांट की शुरुआती लागत करीब 12.65 बिलियन डॉलर आँकी गई थी, जिसमें शुरुआती कुछ सालों का परमाणु ईंधन भी शामिल है।

रूपपुर परमाणु प्लांट की प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI Grok)

पहले इस प्लांट की पहली यूनिट को साल 2023 तक शुरू होना था, लेकिन कोविड महामारी, यूक्रेन पर रूस के हमले और मध्य-पूर्व के भू-राजनीतिक संकटों के चलते यह प्रोजेक्ट लेट हो गया। अब उम्मीद है कि पहला रिएक्टर साल 2027 की शुरुआत में और दूसरा उसके एक साल बाद यानी 2028 तक पूरी तरह चालू हो पाएगा। इस परियोजना को प्रधानमंत्री तारिक रहमान की सरकार आगे बढ़ा रही है, जो साल 2024 में शेख हसीना सरकार की तख्तापलट के कुछ समय बाद सत्ता में आई है।

प्रोजेक्ट में देरी से बढ़ गई लागत, परेशान है बांग्लादेश

इस देरी की वजह से बांग्लादेश को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले बांग्लादेशी मुद्रा ‘टका’ काफी कमजोर हो गई है। स्थानीय मुद्रा के हिसाब से देखें तो पिछले 10 साल में इस प्रोजेक्ट की लागत लगभग एक-चौथाई बढ़ चुकी है। ब्लूमबर्ग को दिए बयान में ढाका यूनिवर्सिटी के न्यूक्लियर इंजीनियरिंग के प्रोफेसर डॉ. मोहम्मद शफीकुल इस्लाम का कहना है कि अगर यह प्रोजेक्ट समय पर पूरा हो जाता, तो न केवल लागत बढ़ने से बचती, बल्कि बांग्लादेश को महँगे जीवाश्म ईंधन के आयात से भी राहत मिल जाती।

प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI ChatGPT)

इसके बावजूद प्लांट के ऑपरेटरों का दावा है कि लंबे समय की सुरक्षा और बिजली की निश्चित आपूर्ति के लिहाज से यह सौदा देश के लिए पूरी तरह फायदेमंद और अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धी साबित होगा।

दुर्घटना होने पर किसकी होगी जिम्मेदारी?

अब आते हैं सबसे बड़े और सबसे डरावने सवाल पर कि अगर रूपपुर में कोई परमाणु दुर्घटना या तबाही होती है, तो इसका जिम्मेदार कौन होगा। यह सवाल इसलिए गंभीर है क्योंकि रूपपुर प्लांट भारतीय सीमा के बेहद करीब है। परमाणु रेडिएशन सीमाओं को नहीं मानता और हवा-पानी के जरिए यह कुछ ही घंटों में भारत के एक बड़े हिस्से विशेषकर पश्चिम बंगाल और उत्तर-पूर्वी राज्यों को अपनी चपेट में ले सकता है। अंतरराष्ट्रीय नियमों और न्यूक्लियर लायबिलिटी के सिद्धांतों के तहत इस स्थिति को समझना जरूरी है।

ऑपरेटर की प्राथमिक जिम्मेदारी (The Operator’s Liability): अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) और ‘वियना कन्वेंशन ऑन सिविल लायबिलिटी फॉर न्यूक्लियर डैमेज‘ के मुताबिक, किसी भी परमाणु दुर्घटना की स्थिति में सबसे पहली और सीधी जिम्मेदारी उस देश की एजेंसी की होती है जो प्लांट को चला रही है। रूपपुर के मामले में यह जिम्मेदारी ‘न्यूक्लियर पॉवर प्लांट कंपनी बांग्लादेश लिमिटेड’ (NPCBL) और बांग्लादेश सरकार की होगी। फुकुशिमा आपदा के समय भी पूरी जिम्मेदारी जापानी कंपनी टेपको (TEPCO) और जापान सरकार पर आई थी।

सप्लायर (रूस/रोसाटॉम) की भूमिका: सप्लायर देशों की भूमिका की बात करें तो रूस जैसे बड़े परमाणु निर्यातक अपने समझौतों में एक सुरक्षा कवच शामिल करवाते हैं। इसके तहत तकनीकी खराबी साबित होने पर भी वित्तीय मुआवजे का एक बड़ा हिस्सा ऑपरेटर देश को ही भुगतना पड़ता है। हालाँकि आधुनिक रशियन रिएक्टरों में सुरक्षा के लिए विशेष इंतजाम होते हैं जो पिघले हुए परमाणु ईंधन को बाहर फैलने से रोकते हैं, लेकिन किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा की स्थिति में रूस पर सीधी कानूनी जिम्मेदारी डालना अंतरराष्ट्रीय अदालतों में बहुत पेचीदा काम होता है।

परमाणु ऊर्जा की तरफ क्यों बढ़ रहा है बांग्लादेश

सुरक्षा के इतने बड़े जोखिमों और भारी-भरकम खर्च के बावजूद बांग्लादेश आखिर परमाणु बिजली के पीछे क्यों भाग रहा है। इसका जवाब उसके मौजूदा बिजली संकट और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में छिपा है। वर्तमान में बांग्लादेश की कुल बिजली उत्पादन क्षमता का एक बहुत बड़ा हिस्सा प्राकृतिक गैस, कोयले और फर्नेस ऑयल जैसे जीवाश्म ईंधन पर निर्भर है। देश में 42% बिजली प्राकृतिक गैस से, 23% कोयले से और करीब 19% फीसदी फर्नेस ऑयल से आती है। इसके अलावा एक बड़ा हिस्सा भारत से खरीदी जाने वाली बिजली का है।

बांग्लादेश पॉवर डेवलपमेंट बोर्ड के आँकड़ों के आधार पर बना चार्ट (फोटो साभार: AI ChatGPT)

बीते कुछ सालों में यूक्रेन युद्ध और ईरान के तनाव की वजह से जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और गैस की सप्लाई बाधित हुई, तो बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था चरमरा गई। पेट्रोल पंपों पर लंबी लाइनें लग गईं, गाँवों में कई-कई घंटों के पावर कट होने लगे और फैक्ट्रियों का उत्पादन ठप हो गया। इस बाहरी झटके ने बांग्लादेश को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि अगर देश को तरक्की की राह पर ले जाना है, तो ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होना ही पड़ेगा।

रूपपुर प्लांट जब 2028 में पूरी तरह चालू हो जाएगा, तो यह अकेले देश की 15% बिजली की जरूरत को पूरा करेगा। एनर्जी एनालिस्ट शफीकुल आलम के मुताबिक, इससे बांग्लादेश को अगले 5 से 7 साल तक कोई नया कोयला या गैस प्लांट लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, जिससे वह पर्यावरण के अनुकूल रिन्यूएबल एनर्जी (सौर और पवन ऊर्जा) पर ध्यान दे सकेगा।

एशिया में तेजी से बढ़ रही परमाणु उर्जा, रूस-चीन और भारत का दबदबा

दुनियाभर में बन रहे लगभग 80 परमाणु रिएक्टरों में से ज्यादातर एशिया में हैं और इन पर रूस व चीन का दबदबा है। ये दोनों देश विकासशील देशों को सस्ती दरों पर या लंबे समय के कर्ज (20 से 25 साल की आसान किश्तों) पर अपनी परमाणु तकनीक बेच रहे हैं। इसके जरिए वे इन देशों को अपने ऊपर दशकों के लिए निर्भर बना लेते हैं। बांग्लादेश को रूस द्वारा दिया गया भारी कर्ज उसे लंबे समय के लिए मॉस्को के रणनीतिक प्रभाव में ले आता है।

दक्षिण एशिया में परमाणु होड़ पहले से ही तेज है। भारत 2047 तक अपनी परमाणु क्षमता को 11 गुना बढ़ाकर 100 गीगावाट करने की योजना पर काम कर रहा है (जिसमें रूस खुद तमिलनाडु के कुडनकुलम में रिएक्टर बना रहा है)। वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान में चीन ने 6 परमाणु रिएक्टर सप्लाई किए हैं जिनकी क्षमता 3.3 गीगावाट है।

परमाणु नीति के विशेषज्ञ टोबी डाल्टन (कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस) एक जरूरी चेतावनी देते हैं। उनका कहना है कि किसी भी विकासशील देश को परमाणु ऊर्जा के ‘हाइप’ (चकाचौंध) में आकर जल्दबाजी में फैसले नहीं लेने चाहिए। न्यूक्लियर प्लांट चलाने के लिए केवल रिएक्टर बना लेना काफी नहीं है, इसके लिए एक बेहद कुशल कार्यबल, एक पूरी तरह स्वतंत्र रेगुलेटरी बॉडी (नियामक संस्था) और सबसे महत्वपूर्ण इस्तेमाल हो चुके परमाणु कचरे (Spent Fuel) को सुरक्षित ठिकाने लगाने की पुख्ता व्यवस्था होनी चाहिए।

ईस्ट-पाकिस्तान के दौर से जुड़ी है परमाणु जिद

वैसे, यहाँ ये जानना भी जरूरी है कि बांग्लादेश की यह परमाणु महत्वाकांक्षा कोई नई या अचानक पैदा हुई कहानी नहीं है। इसकी जड़ें 1960 के दशक से जुड़ी हैं, जब बांग्लादेश जैसी कोई जगह दुनिया के नक्शे पर नहीं थी और यह इलाका पूर्वी पाकिस्तान कहलाता था। साल 1961 में जब अविभाजित पाकिस्तान ने अपने परमाणु कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की, तब पूर्वी पाकिस्तान के पबना जिले के रूपपुर में एक परमाणु संयंत्र बनाने का प्रस्ताव रखा गया था।

उस समय जमीन भी अधिग्रहित कर ली गई थी, लेकिन पश्चिमी पाकिस्तान के शासकों ने जानबूझकर इस परियोजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया और सारा ध्यान अपने इलाके (पश्चिमी पाकिस्तान) पर केंद्रित रखा। पूर्वी पाकिस्तान के लोगों के मन में यह बात हमेशा एक कसक की तरह चुभती रही कि उनके साथ भेदभाव किया गया।

साल 1971 में एक खूनी संघर्ष के बाद भारत ने जब बांग्लादेश को आजाद कराया, तो देश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान ने इस सपने को फिर से जिंदा करने की कोशिश की, लेकिन देश की आर्थिक बदहाली और राजनीतिक अस्थिरता के कारण यह योजना दशकों तक फाइलों में दबी रही। अब जब भारत और पाकिस्तान दोनों के पास बड़ी परमाणु क्षमताएँ हैं, तो बांग्लादेश के भीतर एक तरह का राष्ट्रीय गौरव जागा है। वहाँ के आम लोगों और वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर भारत और पाकिस्तान ऐसा कर सकते हैं, तो बांग्लादेश को भी यह क्षमता हासिल करनी चाहिए।

भारत दे रहा है तकनीकी सहयोग और ट्रेनिंग, रूस-बांग्लादेश के साथ त्रिपक्षीय समझौता

भारत-बांग्लादेश और रूस के बीच 1 मार्च 2018 को एक बड़ा समझौता हुआ था। इस त्रिपक्षीय समझौते में रूसी कंपनी जहाँ परमाणु संयत्र लगा रही है, तो वहीं भारत की तरफ से इस प्रोजेक्ट को पूरा तकनीकी सहयोग दिया जा रहा है। खास बात ये है कि भारत बांग्लादेशी परमाणु वैज्ञानिकों को बाकायदा ट्रेनिंग भी दे रहा है।

भारत-रूस-बांग्लादेश असैन्य परमाणु समझौते का शुरुआती स्क्रीनग्रैब

ये समझौता इस परमाणु प्रोजेक्ट के पूरी तरह से शुरू होने तक लागू रहेगा। इस पूरे प्रोजेक्ट में भारत सरकार धन से नहीं बल्कि अपने ज्ञान का मदद कर रही है, इसके लिए भारत के वैज्ञानिकों का पूरा खर्च भी बांग्लादेश ही उठा रहा है।

यहाँ ये बताना भी अहम है कि बांग्लादेश में आज परमाणु उर्जा संयत्र काम करने जा रहा है, तो उसमें भारत और रूस का पूरा सहयोग है। ये प्रोजेक्ट भी शेख हसीना सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति का नमूना है, जिसे मोदी सरकार का भरपूर सहयोग मिला। आगे भी भारत इस प्रोजेक्ट को सहयोग करता रहेगा, ताकी पड़ोसी देश ऊर्जा के मामले में आँशिक आत्मनिर्भरता की तरफ बढ़ सके।

फीफा विश्व कप 2026 में रोमांचक जीत से सेमी में पहुँचे अर्जेंटीना और इंग्लैंड, अब फाइनल के लिए होगी जंग: पढ़ें कैसे डिफेंडिंग चैंपियन ने आखिरी पलों में स्विस टीम को दी मात

इंग्लिश क्लब आर्सेनल के लीजेंड, मशहूर खिलाड़ी व, डेनिस बर्जकेंप ने कभी कहा था – When you start supporting a football club, you don’t support it because of the trophies, or a player, or history, you support it because you found yourself somewhere there; found a place where you belong.

कहते हैं एकबार आप किसी फुटबॉल टीम से मोहब्बत कर बैठते हैं तो अपनी अंतिम सांसों तक भी उसका मोह, उसका दामन नहीं छोड़ पाते। यही तो है फुटबॉल का जादू।

खैर, बात करते हैं फीफा विश्व कप के बारे में।

बीती, देर रात ढाई बजे, टूर्नामेंट के तीसरे क्वार्टर फाइनल मुकाबले में, नॉर्वे के खिलाड़ी इंग्लैंड की टीम के विरुद्ध मैदान में उतरे। अर्लिंग हालांड के नेतृत्व में नॉर्वे एक बड़ा उलटफेर करने के इरादे से मैदान में उतरी थी। वहीं, कप्तान हैरी केन व साथी खिलाड़ियों के शानदार फॉर्म के दम पर इंग्लैंड इस मैच को जीत कर विश्व कप के सेमीफाइनल की ओर कदम बढ़ाना चाहती थी। नॉर्वे की कोशिश थी कि वह ब्राजील के खिलाफ किए शानदार प्रदर्शन को दुबारा दोहराते हुए एक बड़ा उलटफेर कर दे।

मियामी के स्टेडियम में मैच का आगाज़ होता है। नॉर्वे ने थ्री लाएंस को तब चौंका दिया था जब मैच के छत्तीसवें मिनट में युवा खिलाड़ी आंद्रेस सैल्देरुप एक जबरदस्त गोल दाग कर तीसरे क्वार्टर फाइनल मैच में इंग्लैंड के विरुद्ध अपनी टीम को बढ़त दिला देते हैं। सारा स्टेडियम वाइकिंग क्लैप्स से गूंज उठता है। इंग्लिश टीम थोड़ा परेशानियों में नजर आने लगती है।

मगर पहले हाफ के स्टॉपेज टाइम में ज्यूड बेलिंघम एक गोल दागते हुए चिंता के बादलों को कहीं दूर भेज देते हैं। मैच के 45+2 मिनट पर बांई फ्लैंक से एंथोनी गोर्डन नॉर्वे के चार खिलाड़ियों के बीच से एक सटीक पास अपने साथी खिलाड़ी के लिए बढ़ाते हैं। ज्यूड बेलिंघम कोई ग़लती नहीं करते और स्कोर को 1-1 कर देते हैं।

दूसरे हाफ का खेल शुरू होता है। दोनों ही टीमें गोल स्कोर करने की कोशिशें करती रहती हैं। मगर, ना नॉर्वे कोई गोल कर सकी थी ना ही इंग्लैंड। विरोधी बॉक्स के करीब आकर अक्सर नॉर्वे के खिलाड़ी अपने स्टार स्ट्राइकर अर्लिंग हालांड को नजरअंदाज करते दिखे। कई दफा अर्लिंग हालांड खुद को बेहतरीन पोजीशन में लेकर जा रहे थे पर गेंद उनकी ओर नहीं बढ़ाई जा रही थी। इंग्लिश टीम भी तमाम प्रयासों के बावजूद गोल स्कोर नहीं कर पा रही थी। एक बार फिर ओर्हान नायलांड गोल पर नॉर्वे के लिए बेहतरीन रक्षण करते नजर आए। नब्बे मिनट तक स्कोर बराबरी पर रहने के चलते मैच एक्स्ट्रा टाइम में चला जाता है।

यहाँ 90+3 मिनट में एक बार फिर ज्यूड बेलिंघम ही एक संकटमोचक की भांति इंग्लैंड के लिए एक शानदार गोल स्कोर कर देते हैं। अंतिम समय पर बेलिंघम के इस गोल के चलते इंग्लैंड इस क्वार्टर फाइनल मुकाबले में 2-1 से बेहद अहम बढ़त ले लेता है।

नॉर्वे वापसी के कई प्रयास करता है परन्तु वापसी करने की उसकी तमाम कोशिशें निर्रथक ही रह जाती हैं। मैच समाप्ति पर स्कोर 2-1 ही रहता है। इंग्लैंड सेमीफाइनल में अपनी जगह सुनिश्चित कर लेती है।

मेक्सिको के ख़िलाफ़ दो गोल मारने के पाँच दिन बाद ही बीती रात ज्यूड बेलिंघम ने फिर दो बेहद अहम गोल दाग आज खेल का रुख इंग्लैंड की ओर मोड़ दिया। तेईस वर्षीय ज्यूड बेलिंघम कप्तान हैरी केन की भांति अबतक इस विश्व कप में कुल छह गोल दाग चुके हैं। इंग्लिश टीम अपने इतिहास में चौथी दफा विश्व कप के सेमीफाइनल में जगह बना चुकी है।

इसके बाद सुबह साढ़े छह बजे, कन्सास सिटी स्टेडियम में कतर विश्व कप के विजेता, अर्जेंटीना, के समक्ष स्विट्जरलैंड की टीम थी। अर्जेंटीना ने पिछले मैच में अंतिम बारह मिनटों में करिश्माई खेल दिखाते हुए, मैच में 2-0 से पिछड़ने के बावजूद, 3-2 से मिस्र के खिलाफ अपना मैच जीता था। वहीं, स्विट्जरलैंड की टीम अपना पिछला मैच जीतने के बाद से ही इस मुकाबले के लिए जोरदार तैयारी में लगी हुई थी। ग्रानित झ़ाका के नेतृत्व में आज सुबह स्विस खिलाड़ी कुछ बड़ा करना चाहते थे। हालाँकि जब तक उनतालीस वर्षीय लियोनेल मेस्सी एक बीस वर्षीय मेस्सी के जज्बे के साथ खेलते रहेंगे, अर्जेंटीना को हराना कोई आसान काम नहीं होने वाला था।

अल्बीसेलेस्त के कोच लियोनेल स्कालोनी जरूर काफी चिंताओं से घिरे हुए हैं। उनकी परेशानी का कारण है कि वह अपने अनुभवी खिलाड़ियों के साथ आगे बढ़ें या फिर बेंच पर मौजूद खुद को साबित करने के लिए भूखे युवा खिलाड़ियों जैसे वैलेंटीन बार्को, नीको पाज़ व सीमिओनी को मैदान पर उतारें।

दोनों ही टीमें मैदान पर आती हैं। अर्जेंटीना अपनी पारंपरिक अल्बीसेलेस्त ( हल्की नीली व सफेद धारियां) जर्सी पहने मैदान में उतरती है। सामने थी बेहद प्यारी लाल रंग की अपनी जर्सी में स्विट्जरलैंड की टीम, जिसके पास आज खोने को कुछ भी न था। दोनों ही टीमों के समर्थकों का हुजूम स्टेडियम में उमड़ा हुआ था। लोगों में खुशी का माहौल था।

निर्धारित समय पर रेफरी होआओ पेड्रो पिन्हियेरो से इशारा मिलते ही टूर्नामेंट के आखिरी क्वार्टर फाइनल की शुरुआत होती है। स्विट्जरलैंड की टीम बेहद शानदार अंदाज में मैच की शुरुआत करते हैं। लेकिन मैच के दसवें मिनट में वह अर्जेंटीनी टीम को कॉर्नर प्रदान कर देते हैं। लियोनेल मेस्सी कॉर्नर लेने आगे आते हैं। वो एक बेहतरीन गेंद स्विस बॉक्स में भेजते हैं। वहां लीवरपूल के लिए क्लब फुटबॉल खेलने वाले एलिक्सिस मैक एलिस्टर मौका मिलते ही जोरदार हेडर से गेंद को गोलपोस्ट के भीतर भेज देते हैं। अर्जेंटीना इस गोल के साथ मैच में बढ़त ले लेती है। दर्शक दीर्घा में बैठे हजारों अर्जेंटीनी समर्थक उन्माद से पगलाए नजर आने लगते हैं।

खैर, मैच आगे बढ़ता है। पहले हाफ की समाप्ति तक स्कोर 1-0 ही रहता है। अगर अंत तक यही स्कोर रहे तो आज स्विट्जरलैंड की वापसी तय थी। वह लगातार अटैकिंग मूव्स बनाते रहते हैं। स्विस फॉरवर्ड लाइन बारम्बार अर्जेंटीनी रक्षापंक्ति को भेदने की कोशिशें करती रहती है। लेकिन लिसांद्रो मार्टिनेज़ आज बेहद शानदार रक्षण कर रहे थे। वह कई जरूरी टैकल्स करते जा रहे थे।

मगर सड़सठवें मिनट में दान न्दोऐ बांई छोर से गेंद लेकर आगे बढ़ते हैं। वह गेंद साथी खिलाड़ी की ओर सरका कर अपने लिए रिक्त स्थान बनाते हैं और तुरंत गेंद वापस पा कर गोलपोस्ट की दिशा में तीव्र शॉट लगाते हैं। गोलकीपर एमिलियानो मार्तिनेज़ का दुर्ग भेदा जा चुका था। स्कोर बराबर हो चुका था। इस बार खुशियां मनाने की बारी स्विस समर्थकों की थी।

लेकिन पाँच मिनट पश्चात ही खेल में एक मोड़ आता है जब पहले ही एक येलो कार्ड पाए ब्रील एम्बोलो को फाउल करने के चलते रेफरी द्वारा रेड कार्ड दिखा दिया जाता है। इतने बड़े मौके पर यह एक बेहद बचकानी गलती थी, जो आगे चलकर टीम के लिए बहुत महँगी भी साबित हो सकती थी।

स्विट्जरलैंड की टीम अब दस खिलाड़ियों के संग खेलने के लिए अभिशप्त हो गई थी। खेल आगे बढ़ता है। अर्जेंटीना बढ़त लेने की फिराक में कई हमले करती है। मगर उनके यह मंसूबे सफल नहीं रहते। दस खिलाड़ियों के साथ भी स्विस टीम का रक्षण काबिले-तारीफ था। मैच अब धीरे-धीरे एक्स्ट्रा-टाइम की दिशा में सरकता दिख रहा था।

नब्बे मिनट की समाप्ति तक स्विट्जरलैंड विपक्षी टीम को बढ़त लेने से वंचित रखते हैं। मैच अब एक्स्ट्रा-टाइम में जा चुका था। स्विस टीम अब तक काफी थक चुकी थी। दोनों ही टीमें कुछ जरूरी परिवर्तन भी करती हैं। मैच के 112 मिनट में होसे़ मैनुएल लोपेज़ तीन स्विस डिफेंडरों को अपनी ओर खींचते हुए गेंद को साथी खिलाड़ी हूलियन अल्वारेज़ की ओर बढ़ाते हैं। हूलियन अल्वारेज़ बॉक्स के बाहर से ही एक बेहतरीन कर्लिंग शॉट कोबेल के पोस्ट की और लगाते हैं। गोलकीपर कोबेल इस जादुई शॉट के आगे बेबस नजर आते हैं। अल्वारेज़ एक ऐसे समय में, जब मैच पेनाल्टी शूटआउट की ओर बढ़ रहा था, यह गोल दाग कर अर्जेंटीना को मैच में आगे कर देते हैं।

आठ मिनट पश्चात अर्जेंटीना फिर एकबार मौका पाते ही तेज काउंटर अटैक करती है। अल्माडा स्विस गोलपोस्ट पर निशाना साधते हैं। गेंद गोलकीपर से छिटक जाती है। लाउतारो मार्टिनेज तुरंत आगे बढ़ कर गेंद को जाल के भीतर भेज देते हैं। अर्जेंटीना 3-1 से यह मैच जीत जाता है।

तीन नॉकआउट मैचों में तीन-तीन गोल दागते हुए तीनों दफा पिछड़ने के बावजूद वापसी करते हुए गत विजेता सेमीफाइनल में पहुंच चुके हैं। अब अपने इतिहास का छठा सेमीफाइनल खेलने जा रही अर्जेंटीना का सामना होगा शानदार फुटबॉल खेल रही थॉमस टुकेल की इंग्लिश टीम से।

सेमीफाइनल मुकाबलों की बिसात सज चुकी है। अब पहले तो पंद्रह जुलाई को जबरदस्त अटैकिंग फुटबॉल खेल रही, इस टूर्नामेंट की सबसे संतुलित टीम फ्रांस का सामना होगा उनके हालिया वर्षों के चिर प्रतिद्वंद्वी स्पेन से। स्पेन की रक्षापंक्ति ने पूरे टूर्नामेंट में अबतक मात्र एक गोल खाया है। लेकिन वो गोल दागने के लिए भी संघर्षरत नजर आए हैं। डलास स्टेडियम में मजबूत अटैकिंग फोर्स एक बेहद मजबूत रक्षापंक्ति की परिक्षा लेती दिखेगी। कई पुराने हिसाब भी चुकता किए जाने हैं। यह बेहद शानदार मैच रहने वाला है।

फिर सोलह जुलाई को अटलांटा स्टेडियम में गत विजेता का सामना होगा शानदार फार्म में चल रही इंग्लिश टीम से। दोनों ही टीमें कैसे भी यह मैच जीत फाइनल में जगह बनाने का प्रयास करेंगी। अर्जेंटीनी टीम अबतक चंद खिलाड़ियों के व्यक्तिगत प्रदर्शन के चलते तीन नॉकआउट मुकाबलों में किसी तरह अपेक्षाकृत छोटी टीमों के खिलाफ जूझते हुए अंतिम क्षणों में बढ़त लेकर यहाँ तक पहुँची है। उनके पास बेंच पर नीको पाज, सिमियोनी व वैलेंटीन बार्को सरीखे तेजतर्रार युवा खिलाड़ी मौजूद हैं।

मगर कोच लियोनेल स्कालोनी ने अभी तक उम्रदराज खिलाड़ियों के अनुभव पर ही दाँव खेला है। अब सेमीफाइनल के बड़े मौके पर वह कुछ अलग करने का जोखिम शायद ही उठाएँ। इंग्लैंड की टीम के पास युवा व अनुभवी खिलाड़ियों की बेहतरीन फौज है जो अंत तक हार नहीं मानती। उनके पास अच्छा अटैक और शानदार डिफेंस है। इंग्लिश टीम के खिलाफ अर्जेंटीना के लिए मुकाबला बिल्कुल भी आसान नहीं होगा। यह एक और जबरदस्त टक्कर होगी।

फुटबॉल की खबरें जारी रहेंगी। बने रहिएगा साथ।

वीवा ला फुटबॉल।