Home Blog Page 117

आज तेल के लिए हो रहे युद्ध, कभी ‘पक्षियों की बीट’ के लिए बौराई थी दुनिया: पढ़िए जब स्पेन ने Bird Poop के लिए लड़ी जंग, अमेरिका कानून ही ले आया

संयुक्त राज्य अमेरिका ने 3 जनवरी 2026 को वेनेज़ुएला पर एक बड़ा सैन्य हमला किया, जिसे ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिज़ॉल्व’ नाम दिया गया। इस अभियान में अमेरिकी सेना ने 150 से अधिक विमानों, डेल्टा फ़ोर्स और अन्य विशेष सशस्त्र इकाइयों की मदद से वेनेज़ुएला की राजधानी काराकास में हवाई और जमीनी हमले किए। इसके बाद राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिसिलिया फ्लोरेस को हिरासत में लेकर अमेरिका भेज दिया गया। कई देशों ने इस कार्रवाई को राष्ट्रपति के अपहरण के समान बताया।

अमेरिकी सरकार का कहना है कि उसकी नाराज़गी मादुरो सरकार से इसलिए है क्योंकि वेनेज़ुएला में ड्रग्स और नार्को-आतंकवाद को बढ़ावा दिया गया। लेकिन दुनिया के बड़े हिस्से की राय है कि इस टकराव की असली वजह वेनेज़ुएला का विशाल तेल भंडार और उससे अमेरिकी कंपनियों को होने वाला आर्थिक लाभ है।

वैश्विक तेल भंडार

पिछले कई दशकों में दुनिया के अनेक युद्ध तेल के लिए लड़े गए हैं। हालांकि इतिहास बताता है कि संसाधनों को लेकर संघर्ष हमेशा तेल तक सीमित नहीं रहे हैं। आज जब वैश्विक ध्यान दक्षिण अमेरिका पर है, तो यह जानना रोचक है कि कभी इसी क्षेत्र में एक युद्ध तेल के लिए नहीं, बल्कि पक्षियों की बीट—जिसे गुआनो कहा जाता है—जैसे संसाधन के लिए लड़ा गया था।

यदि कोई यह मानता है कि अमेरिका का ऐसा आक्रामक रवैया हाल की घटना है, तो इतिहास इससे अलग तस्वीर पेश करता है। अन्य औपनिवेशिक और साम्राज्यवादी शक्तियों की तरह अमेरिका भी लंबे समय से प्राकृतिक संसाधनों पर गहरी नजर रखता रहा है। कई बार उसने नैतिकता को पीछे छोड़कर अपने हितों को प्राथमिकता दी। इसी कारण एक समय में अमेरिका ने न केवल सोना और चाँदी, बल्कि पक्षियों और चमगादड़ों की बीट तक को भी ‘राष्ट्रीय हित’ का विषय माना।

पक्षियों के मल क्यों आते थे काम

यह दिलचस्प ऐतिहासिक कहानी 19वीं सदी के मध्य के अमेरिका से जुड़ी है। उस समय अमेरिका में खेती तेजी से फैल रही थी। किसान अब सिर्फ अपने खाने भर की खेती नहीं कर रहे थे, बल्कि बाजार और मुनाफे पर आधारित खेती हर जगह शुरू हो चुकी थी। बड़े-बड़े प्लांटेशन अभी भी मौजूद थे, जहाँ ग़ुलामों से काम लिया जाता था, और यह व्यवस्था अटलांटिक दास व्यापार से जुड़ी हुई थी। खेती का पूरा औद्योगीकरण और उसका वैज्ञानिक ज्ञान अभी आने में कई दशक बाकी थे।

इस मुनाफा-केंद्रित खेती के साथ एक गंभीर समस्या सामने आने लगी। हरके बाद पैदावार घटने लगी। 1850 तक अमेरिका के चौथे-पाँचवें खेतों की जमीन अपनी उपजाऊ शक्ति खोने लगी थी। ऐसा लगने लगा कि लगातार ज्यादा मुनाफा कमाने की लालच किसानों से उनकी मिट्टी की ताकत छीन रही है।

साम्राज्यों का तर्क सीधा और कठोर होता है, मुनाफा लगातार बढ़ना चाहिए। लेकिन बढ़ते मुनाफे के लिए ज्यादा संसाधनों की जरूरत होती है और कई बार ये संसाधन देश की सीमाओं के बाहर होते हैं। जब किसी चीज की कमी होने लगती है, तो वही चीज रणनीतिक संसाधन बन जाती है।

इसी दौर में एक ऐसी चीज अचानक बेहद कीमती बन गई, जिससे आज ज्यादातर लोग दूरी बनाए रखना पसंद करते हैं। जो चीज आज हमारी बालकनियों को गंदा कर देती है, वही 19वीं सदी में दुनिया भर की चाहत बन गई। यह चीज अंतरराष्ट्रीय कानून, नौसेना की तैनाती और यहाँ तक कि युद्धों का कारण बनी।

यह पदार्थ था गुआनो समुद्री पक्षियों और चमगादड़ों की सूखी बीट, जिसे पीसकर खेतों में खाद के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। गुआनो मुख्य रूप से गरम और सूखे, बिना आबादी वाले द्वीपों से मिलता था, जो मध्य अमेरिका और प्रशांत महासागर में स्थित थे।

दिलचस्प बात यह थी कि बाजार और मुनाफे की खेती से पैदा हुई समस्या का समाधान भी उसी बाजार में मौजूद था। अमेरिकी किसानों के लिए मिट्टी की उर्वरता लौटाने का जवाब गुआनो बना और इसी ने आगे चलकर पूरी दुनिया की राजनीति और युद्धों को प्रभावित किया।

गुआनो: दुनिया का सबसे असंभावित चमत्कारी पदार्थ

आज सुनने में गुआनो किसी साम्राज्य की नींव जैसा नहीं लगता, लेकिन 19वीं सदी में यह बेहद कीमती संसाधन था। गुआनो में नाइट्रोजन, फॉस्फेट और पोटैशियम भरपूर मात्रा में होते हैं। यही तीन तत्व आज भी NPK खाद के मुख्य घटक हैं। इस वजह से गुआनो एक चमत्कारी जैविक खाद माना जाता था, जो बंजर मिट्टी को फिर से उपजाऊ खेत में बदल देता था।

गुआनो का असर इतना जबरदस्त था कि कई जगहों पर फसल की पैदावार कई गुना बढ़ गई। उस दौर में जब कृषि पूरी अर्थव्यवस्था की रीढ़ थी और बारूद बनाने के लिए नाइट्रेट्स (खासकर पोटैशियम) की जरूरत होती थी, तब गुआनो दोहरा फायदा देने वाला रणनीतिक संसाधन बन गया खेती के लिए भी और सैन्य ताकत के लिए भी।

इसी कारण औपनिवेशिक शक्तियाँ, जो ज्यादा उत्पादन और सैन्य बढ़त चाहती थीं, गुआनो पर कब्जा जमाने के लिए आपस में होड़ करने लगीं। लेकिन गुआनो हर जगह नहीं मिलता था। इसके भंडार बहुत दुर्लभ थे और दुनिया के कुछ गिने-चुने, दूरदराज़ और निर्जन द्वीपों तक सीमित थे।

ये द्वीप सैकड़ों, बल्कि हजारों वर्षों तक इंसानों की पहुँच से बाहर रहे। इसी वजह से वहाँ समुद्री पक्षियों की बीट की परतें एक के ऊपर एक जमा होती गईं। समय के साथ ये परतें सख़्त होकर चट्टानों जैसी बन गईं और इन्हीं से विशाल गुआनो भंडार तैयार हुए।

इन द्वीपों की जलवायु भी गुआनो को ताक़तवर बनाने में मददगार थी। गर्म और सूखा मौसम, और बहुत कम बारिश, इसके पोषक तत्वों को बहने से बचाता था। इसी कारण इनमें मौजूद तत्व लंबे समय तक सुरक्षित रहते थे।

आज के नज़रिए से यह बात अजीब लग सकती है कि देश कभी पक्षियों की बीट के लिए युद्ध करें। लेकिन उन्नीसवीं सदी के रणनीतिकारों के लिए यह हँसने की नहीं, बल्कि बेहद गंभीर और ज़रूरी बात थी।

सदियों से पक्षियों के मल से ढके द्वीप

वो चट्टानें जिसकी कीमत पहले किसी ने नहीं समझी, बाद में युद्ध हुआ

पेरू के तट के पास स्थित द्वीपों पर उच्च गुणवत्ता का गुआनो बनने के लिए बिल्कुल अनुकूल परिस्थितियाँ थीं। इसी वजह से पेरू का गुआनो दुनिया में सबसे ज्यादा कीमती माना जाता था, क्योंकि उसमें पोषक तत्वों की मात्रा सबसे अधिक थी। औपनिवेशिक ताकतें इन गुआनो द्वीपों को सोने की खान की तरह देखती थीं। इनमें सबसे प्रसिद्ध थे चिंचा द्वीप (Chincha Islands), जो पेरू के समुद्र तट से कुछ दूरी पर स्थित हैं।

ये द्वीप बंजर, तेज हवाओं से घिरे और पूरी तरह निर्जन थे। पहली नजर में ये चट्टानी टापू बिल्कुल बेकार लगते थे। लेकिन इन्हीं परिस्थितियों की वजह से यहाँ बेहद बड़ी मात्रा में सबसे शुद्ध और ताकतवर गुआनो जमा हो पाया था। यह गुआनो सालों तक खेती की उत्पादकता बनाए रखने और उससे मिलने वाली आय के लिए काफी था, इतना कि इसने साम्राज्यों को ईर्ष्या में डाल दिया।

स्पेन, जिसकी अमेरिका पर पकड़ 19वीं सदी की शुरुआत से ही कमजोर पड़ रही थी, उसने इसमें अपना मौका देखा। 14 अप्रैल 1864 को स्पेन ने चिंचा द्वीपों पर कब्जा कर लिया और वहाँ से गुआनो निकालना शुरू कर दिया, ताकि अपनी खराब होती आर्थिक हालत को संभाला जा सके। लेकिन पेरू और उसके पड़ोसी देश गुआनो की कीमत को अच्छी तरह समझते थे और वे स्पेन को यह खजाना बिना विरोध के देने को तैयार नहीं थे।

नतीजा यह हुआ कि पेरू, चिली, इक्वाडोर और बोलीविया की संयुक्त सेनाओं ने स्पेन को चिंचा द्वीपों से पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। सुनने में अजीब जरूर लग सकता है कि इतिहास में कैसे ये अनोखा संघर्ष हुआ जहाँ पक्षियों की बीट को लेकर लड़ाई हुई। लेकिन उस समय इस युद्ध में शामिल देशों के लिए मामला बेहद गंभीर था। गुआनो की बिक्री से सेनाओं को पैसा मिलता था, व्यापार चलता था और कई देशों की आर्थिक हालत इसी पर टिकी हुई थी।

पेरू के तट के पास स्थित चिनचा द्वीप

USA ने उठाया फायदा

इन युद्धों को देखते हुए, अमेरिका ने इसका पहले ही हल निकाला। 1856 में अमेरिकी कॉन्ग्रेस ने गुआनो आइलैंड्स एक्ट नाम का एक कानून पास किया, जो आज भी लागू है। आज यह कानून अजीब लग सकता है, लेकिन उस समय अमेरिकी नेताओं को यह पूरी तरह व्यावहारिक लगा।

इस कानून के तहत किसी भी अमेरिकी नागरिक को यह अधिकार मिल गया कि वह गुआनो से भरपूर किसी निर्जन द्वीप पर अमेरिका की ओर से दावा कर सके। इसके बाद अमेरिकी नागरिक समुद्र यात्राओं पर निकले, गुआनो वाले द्वीप खोजे और उन्हें अमेरिकी क्षेत्र घोषित किया।

1857 में अमेरिका ने 22 तोपों से लैस एक युद्धपोत भेजा, ताकि इन नए दावा किए गए द्वीपों से गुआनो इकट्ठा किया जा सके और उसकी जाँच की जा सके। इसी तरीके से कैरेबियन सागर और प्रशांत महासागर में दर्जनों द्वीपों पर अमेरिका ने दावा किया। वहाँ अमेरिकी झंडे लगाए गए और प्राकृतिक संसाधन निकाले गए।

इन द्वीपों पर बसावट आमतौर पर स्थायी नहीं होती थी। उद्देश्य साफ था गुआनो को अमेरिका भेजो, मुनाफा कमाओ और फिर अगला द्वीप खोजो। अमेरिकी रवैया बेहद व्यावहारिक और सरल था, जहाँ गुआनो है, वहाँ अमेरिका का हित है। गुआनो आइलैंड्स एक्ट के तहत अमेरिका ने सौ से भी ज्यादा द्वीपों पर दावा किया। लेकिन जैसे ही गुआनो खत्म हुआ, ज्यादातर द्वीपों को छोड़ दिया गया।

अमेरिकी गुआनो द्वीप

जिस तरह गुआनो का महत्व अचानक बढ़ा था, उसी तरह वह जल्दी ही खत्म भी हो गया। वैज्ञानिक प्रगति के साथ यह समझ में आ गया कि गुआनो फसलों की पैदावार क्यों बढ़ाता है। इसके पीछे नाइट्रोजन और फॉस्फोरस की भूमिका साफ हो गई।

इसके बाद कृत्रिम (सिंथेटिक) उर्वरकों का उत्पादन शुरू हुआ, जिनसे बड़ी मात्रा में नाइट्रोजन और फॉस्फोरस मिलने लगे। अब कुछ टन पक्षियों की बीट के लिए युद्धपोत भेजने, कूटनीतिक तनाव पैदा करने या तोपें चलाने की जरूरत नहीं रही।

शुरुआत में गुआनो की जगह बोन मील, पिसा हुआ फॉस्फेट पत्थर जैसे विकल्प इस्तेमाल होने लगे। फिर 1910 के दशक में हैबर प्रक्रिया आने के बाद यूरिया खाद आम हो गई।

इतिहासकारों के लिए इसमें एक रोचक सबक है, जिस संसाधनके लिए कभी युद्धों और कानूनों को सही ठहराता था, वह कुछ ही दशकों में बेकार हो गया। बड़े-बड़े साम्राज्यों ने खुद को बदला, नई दिशा अपनाई और आगे बढ़ गए। पीछे रह गए खाली पड़े द्वीप, जिन पर अब भी सफेद, चॉक जैसी परतें जमी हैं, जो इतिहास की अजीब विडंबनाओं की याद दिलाती हैं।

पूरी बात को समझने के लिए गुआनो युग की एक छोटी समय रेखा पर नजर डालना जरूरी है। 1840 के दशक के आसपास यूरोप में मिट्टी की उर्वरता कम होने लगी थी। 1840 से 1860 के बीच पेरू के गुआनो से भरे द्वीपों को बड़े पैमाने पर खोदकर खाली किया गया।

1856 में अमेरिका ने गुआनो आइलैंड्स एक्ट लागू किया। 1864 से 1866 के बीच स्पेनिश साम्राज्य और उसकी पूर्व उपनिवेशों के बीच चिनचा द्वीपों को लेकर युद्ध हुआ। फिर 1800 के दशक के अंत तक दुनिया ने पक्षियों की बीट यानी गुआनो को लगभग नज़रअंदाज़ कर दिया और कृत्रिम उर्वरकों की ओर बढ़ गई।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रारब्ध राय ने लिखी है जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)

आज ट्रंप के बयानों को सुन कॉन्ग्रेस कर रही देश के PM का अपमान, कभी मनमोहन सिंह के लिए नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान को दिखा दी थी औकात: क्या पुराना वक्त भूल गए ‘चमचे’

इन दिनों डोनाल्ड ट्रंप का आक्रामक और अस्थिर मिजाज दुनियाभर में तनाव का कारण बना हुआ है। लेकिन चिंता की बात यह है कि भारत को लेकर भी उनका रवैया लगातार तल्ख होता जा रहै। जहाँ ट्रंप अपने से कमजोर देशों पर सीधे कार्रवाई करने से नहीं हिचक रहे, वहीं भारत जैसे सशक्त और आत्मनिर्भर देश के मामले में वह बयानबाजी के जरिए माहौल गरम करने की कोशिश कर रहे हैं।

स्थिति तब और खराब हो जाती है जब ट्रंप की इस बयानबाजी को देश की विपक्षी पार्टियाँ अपने राजनीतिक हितों के लिए भुनाने लगती हैं। भारत पर दूसरे देशों की टिप्पणियों को आधार बनाकर वे सरकार पर हमला बोलने लगती हैं, बिना यह सोचे कि इससे अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश की प्रतिष्ठा को ही नुकसान पहुँच सकता है।

विपक्ष का यह रवैया हाल के दिनों में और अधिक स्पष्ट हुआ है, जब डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर दिए गए बयानों का इस्तेमाल सोशल मीडिया पर उनकी छवि को कमजोर करने के लिए किया गया। हैरानी की बात यह है कि कॉन्ग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेता भी अमेरिका के संदर्भ में अपने ही प्रधानमंत्री को कमतर दिखाने से पीछे नहीं रहे, जो राजनीतिक विरोध की सामाओं को पार कर देता है।

दरअसल, हाल ही में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने व्यक्तिगत तौर पर भारत की लंबित रक्षा सौदे और व्यापारिक मुद्दों में उनसे बात की। ट्रंप ने कहा, “भारत ने अपाचे हेलीकॉप्टर का ऑर्डर दिया था, लेकिन 5 सालों तक डिलीवरी नहीं हुई। प्रधानमंत्री मोदी मुझसे मिलने आए थे। महोदय, क्या मैं आपसे मिल सकता हूँ?” डोनाल्ड ट्रंप ने आगे पीएम नरेंद्र मोदी के साथ उनके मजबूत संबंध बताते हुए कहा, “मेरा उनके साथ बहुत अच्छा रिश्ता है।”

ट्रंप के बयान पर कॉन्ग्रेस ने चलाया प्रोपेगेंडा

ट्रंप के इस बयान को कॉन्ग्रेस इकोसिस्टम ने प्रोपेगेंडा का रूप देकर सोशल मीडिया पर परोसा। वो भी बयान के एक अधूरा हिस्से को उठाकर, जिसमें ट्रंप ने पीएम मोदी की बात करते हुए कहा- ‘क्या मैं आपसे मिल सकता हूँ?’ इस अधूरे बयान से प्रधानमंत्री की आलोचना को लेकर धड़ाधड़ पोस्ट किए गए। प्रधानमंत्री मोदी पर विदेशों में भारत की बेइज्जती करवाने के आरोप लगाए गए। खासतौर पर राहुल गाँधी के ‘नरेंदर-सरेंडर’ वाले वीडियो से कॉन्ग्रेस ने प्रधानमंत्री का मजाक उड़ाया।

कॉन्ग्रेस की वरिष्ठ नेता सुप्रिया श्रीनाते ने कहा, “नेपाल, बांग्लादेश संभल नहीं रहा है। चीन का नाम ले नहीं पाते। अमेरिका में ‘सर सर’ करते मिमिया रहे हैं, इनसे कोई भी उम्मीद करना बेमानी है। मैंने किसी का नाम नहीं लिया- लेकिन सब जानते हैं वो कौन है वैसे बौखलाए भक्त अभी खुद ही दास्तान बयां करेंगे।”

कॉन्ग्रेस के छात्र संगठन (NSUI) ने कहा, “इनका इतिहास ही “I am sorry, Sir” से शुरू हुआ था। उसी कायर विरासत को प्रधानमंत्री मोदी आगे बढ़ा रहे हैं- हाथ जोड़कर ट्रंप के सामने “May I see you, Sir” की याचना करते हुए। जो देश कभी सातवें बेड़े के सामने डटकर खड़ा था, आज उसका प्रधानमंत्री दुनिया भर में रोज-रोज ट्रंप से बेइज्जती कराने के नए कीर्तिमान रच रहा है।”

कॉन्ग्रेसी प्रोपेगेंडा को बढ़ावा देने वाले मोहित चौहान कहते हैं, “लेकिन अब वे मुझसे नाराज हैं क्योंकि मैंने रूस पर भारी टैरिफ लगाकर भारत को रूस से तेल खरीदने से रोक दिया है। ट्रंप रोजाना भारत का अपमान करते हैं, लेकिन मोदी उनसे इतना डरते हैं कि एक शब्द भी नहीं बोलते। भारत को राहुल गाँधी जैसे सशक्त और शिक्षित प्रधानमंत्री की जरूरत है।”

ट्रंप के बयान के अधूरे हिस्से से गढ़ा नैरेटिव

कॉन्ग्रेस इकोसिस्टम ने डोनाल्ड ट्रंप के बयान के केवल एक हिस्से को चुनकर सोशल मीडिया पर नैरेटिव गढ़ा। ट्रंप के बयान के उन शब्दों पर फोकस किया गया, जिसमें प्रधानमंत्री मोदी इज्जत से बात कर केवल एक सवाल पूछ रहे हैं। ट्रंप ने इस बयान को इस तरह पेश किया, मानो भारत के प्रधानमंत्री विदेशी ताकतों के सामने कमजोर पड़ गए हों।

असलियत यह है कि ट्रंप ने उसी बयान में अगली ही पंक्ति में साफ कहा कि वे और प्रधानमंत्री काफी अच्छे दोस्त हैं। यह तथ्य कॉन्ग्रेस के इस प्रोपेगेंडा में जानबूझकर नजरअंदाज कर दिया गया, क्योंकि पूरी बात सामने आ जाती तो बनाया गया नैरेटिव टिक ही नहीं पाता। साफ है कि सच को पूरा बताने के बजाए अधूरे बयान को हथियार बनाकर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की गई।

अंतरराष्ट्रीय छवि को दरकिनार कर प्रधानमंत्री के लिए वही आपत्तिजनक भाषा

प्रोपेगेंडा फैलाने की जल्दबाजी में यह भी नहीं सोचा गया कि इसका असर कहीं न कहीं देश की अंतरराष्ट्रीय छवि पर भी पड़ सकता है। प्रधानमंत्री को निशाना बनाते हुए की गई बयानबाजी में यह विचार तक नहीं किया गया कि विदेश नीति जैसे संवेदनशील मुद्दों पर गैर-जिम्मेदार टिप्पणियाँ भारत की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचा सकती हैं। राजनीतिक विरोध के नाम पर संयम और मर्यादा दोनों को दरकिनार कर दिया गया।

यहाँ तक कि राहुल गाँधी द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए इस्तेमाल किए गए आपत्तिजनक शब्द ‘नरेंद्र-सरेंडर’ को प्रतिक्रिया के तौर पर बड़े पैमाने पर फैलाया गया। यह पहली बार नहीं है, जब प्रधानमंत्री की आलोचना आपत्तिजनक भाषा में की गई हो, लेकिन इस बार मामला देश की सीमाओं से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुँच गया। यही वजह है कि यह विवाद केवल राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि देश की साख से जुड़ा सवाल बन गया।

नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री पद का सम्मान, कॉन्ग्रेस को नहीं बूझेगा

दूसरी ओर नरेंद्र मोदी हैं, जिन्होंने प्रधानमंत्री पद का सम्मान हमेशा बरकरार रखा। एक बार पाकिस्तान में जब नवाज शरीफ ने तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को ‘देहाती महिला’ कहा था। उस समय पीएम मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे और खुद प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे। लेकिन नवाज शरीफ की इस टिप्पणी पर वह चुप नहीं बैठे, बल्कि कड़ा विरोध दर्ज किया।

पीएम मोदी ने कहा था, “आप मेरे प्रधानमंत्री को देहाती महिला कैसे कह सकते हैं। भारत के प्रधानमंत्री को देहाती महिला कैसे कह सकते हैं। भारत के प्रधानमंत्री का इससे अधिक अपमान और नहीं हो सकता। हम राजनीति के विषय पर उनसे लड़ सकते हैं लेकिन इसे बर्दाश्त नहीं कर सकते। सवा सौ करोड़ लोगों का यह देश अपने प्रधानमंत्री का अपमान बर्दाश्त नहीं करेगा।”

इससे साफ होता कि पीएम नरेंद्र मोदी अपने देश के प्रधानमंत्री का कितना सम्मान करते हैं। वह भी तब जब वह खुद उसी विपक्षी पार्टी के सामने चुनाव लड़ रहे हैं। साफ है कि भारत की आंतरिक राजनीति जैसी भी हो, लेकिन विदेशों में जाकर भारत और उसके प्रधानमंत्री का अपमान करना गलत है। लेकिन राहुल गाँधी और उनका कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम इसे समझने में असमर्थ है। इसीलिए राहुल गाँधी आए दिन विदेशों में जाकर भारत के आंतरिक मुद्दों पर बात करते हुए देश की मौजूदा सरकार और उसके प्रधानमंत्री को कोसते हैं।

ये इन दोनों पार्टियों की मानसिकता का सबूत है कि कॉन्ग्रेस कैसे प्रोपेगेंडा और राजनीतिक हित के लिए किसी भी हद तक जा सकता है, जबकि बीजेपी ने हमेशा प्रधानमंत्री पद का सम्मान किया है, यह देखे बिना की उस पद पर विपक्षी दल का व्यक्ति ही क्यों न हो।

‘मौत का सौदागर’ से लेकर ‘मोदी तेरी कब्र खुदेगी’ तक लगातार रिसता रहा है कॉन्ग्रेस-वामपंथ का जहर, लोकतंत्र में चुने हुए PM से यह कैसी घृणा?

दिल्ली की हवाओं में जब भी राजनीति का पारा चढ़ता है, कुछ खास तरह के नारे गूँजने लगते हैं। वर्ष 2022 से लेकर 2026 की शुरुआत तक, देश के विभिन्न हिस्सों- चाहे वह JNU का कैंपस हो, कॉन्ग्रेस की रैलियाँ हों या पहलवानों का धरना, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ ‘मोदी तेरी कब्र खुदेगी’ और ‘मौत’ जैसे आपत्तिजनक नारे एक पैटर्न की तरह सामने आए हैं। बता दें कि गालियों की इस फेहरिस्त की शुरुआत गुजरात में कॉन्ग्रेस नेता सोनिया गाँधी की ‘मौत के सौदागर’ से शुरू हुई थी।

2026: जेएनयू में ‘मोदी-शाह कब्र खुदेगी’ के नारों की गूँज

वामपंथी विचारधारा का गढ़ कहे जाने वाले जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के लिए विवाद और नारे कोई नई बात नहीं हैं। 5 जनवरी 2026 की रात एक बार फिर साबरमती हॉस्टल के बाहर ‘रेजिस्टेंस’ के नाम पर हुजूम जुटा। बहाना था 2020 की हिंसा की बरसी, लेकिन असली मकसद कुछ और ही निकला। जैसे ही खबर आई कि उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है, वैसे ही वहाँ मौजूद छात्र-छात्राओं का स्वर बदल गया।

देखते ही देखते कैंपस ‘मोदी-शाह की कब्र खुदेगी’ के नारों से गूँज उठा। विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसे सुप्रीम कोर्ट की अवमानना और लोकतंत्र पर हमला बताते हुए पुलिस से FIR दर्ज करने की माँग की है। यह जेएनयू की वही पुरानी फितरत है जहाँ शिक्षा के मंदिर को राजनीतिक अखाड़ा बनाकर देश के शीर्ष नेतृत्व के लिए कब्रें खोदी जाती हैं।

2025: रामलीला मैदान में कॉन्ग्रेस का ‘नफरती’ राग

साल 2025 में भी यही कहानी दोहराई गई। मौका था दिल्ली के रामलीला मैदान में कॉन्ग्रेस की ‘वोट चोरी’ के खिलाफ रैली का। कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों के बीच से वही शब्द निकले- ‘मोदी, तेरी कब्र खुदेगी।’ हैरानी की बात यह थी कि मंच पर बड़े नेता मौजूद थे और नीचे कार्यकर्ताओं के साथ महिला विंग की पदाधिकारी भी सुर में सुर मिला रही थीं।

भाजपा ने इसे ‘अर्बन नक्सलियों’ की भाषा बताया और कहा कि कॉन्ग्रेस अब ‘मुस्लिम लीग नक्सलवादी पार्टी’ जैसी भाषा बोल रही है। संवैधानिक संस्थाओं को डराने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त की तस्वीरों को कैदी के रूप में दिखाया गया। यह वही दौर था जब राजनीति के मंच से सीधे तौर पर प्रधानमंत्री की मौत की कामना की जा रही थी।

2023: पहलवान प्रदर्शन और पवन खेड़ा की गिरफ्तारी का ‘इत्तेफाक’

2023 में यह नफरती नारा दो बड़े मंचों पर दिखा। फरवरी में जब कॉन्ग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा को दिल्ली एयरपोर्ट पर विमान से उतारा गया और गिरफ्तार किया गया, तब वहाँ मौजूद राज्यसभा सांसद और बड़े नेताओं के सामने कार्यकर्ताओं ने जमीन पर बैठकर चिल्लाना शुरू किया- ‘मोदी तेरी कब्र खुदेगी।’

यही नहीं, अप्रैल 2023 में जब जंतर-मंतर पर पहलवानों का धरना चल रहा था, तब विनेश फोगाट और अन्य प्रदर्शनकारियों की मौजूदगी में भीड़ ने फिर से वही ‘मोदी तेरी कब्र खुदेगी’ वाला राग छेड़ा। खेल के मैदान से न्याय की माँग करने वाले मंचों पर अचानक इस तरह के नारों का घुस आना यह बताता था कि पर्दे के पीछे कोई और है जो इन नारों की स्क्रिप्ट लिख रहा है।

2022: ‘हिटलर की मौत’ और ‘कुत्ते की मौत’ वाला घटिया स्तर

नफरत के इस इतिहास में 2022 का साल सबसे ज्यादा विवादास्पद रहा। ‘अग्निपथ योजना’ के विरोध के दौरान पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोध कांत सहाय ने सारी मर्यादाएँ लांघ दीं। उन्होंने सरेआम कहा, “मोदी हिटलर की राह चलेगा तो हिटलर की मौत मरेगा।”

मौत की कामना करने का यह सिलसिला यहीं नहीं रुका। महाराष्ट्र में नागपुर में कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष शेख हुसैन ने और भी आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘जैसे कुत्ते की मौत होती है, वैसे ही नरेंद्र मोदी की मौत होगी।’ इन बयानों के बाद भाजपा की तरफ से देशभर में विरोध प्रदर्शन किए गए थे और कई जगह FIR दर्ज हुई।

लोकतंत्र में ‘कब्र’ की भाषा कितनी सही?

प्रधानमंत्री के खिलाफ पिछले चार-पांच सालों का यह ‘नारा संकलन’ (Compilation) एक खतरनाक ट्रेंड को दर्शाता है। 2007 के ‘मौत के सौदागर’ वाले बयान से शुरू हुआ यह सफर 2026 के ‘कब्र खुदेगी’ तक पहुँच गया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में मतभेद का इजहार सिर्फ मौत और कब्र के नारों से ही मुमकिन है? जेएनयू से लेकर रामलीला मैदान तक लगने वाले ये आपत्तिजनक नारे आज भी गवाह हैं कि राजनीति किस कदर व्यक्तिगत नफरत की आग में झुलस रही है।

ASI संरक्षित स्मारक, फिर भी हुआ अवैध निर्माण: भरूच की ‘जामा मस्जिद’ को लेकर अनशन पर बैठे संत, कहा- यह जैन मंदिर और चक्रधर स्वामी की जन्मस्थली

गुजरात के भरूच में पायनियर स्कूल के सामने स्थित जामा मस्जिद इन दिनों विवाद का केंद्र बन गई है। अखिल भारतीय संत समिति के संतों ने इस मस्जिद को लेकर विरोध शुरू किया है। उनका दावा है कि यह जगह दरअसल एक प्राचीन जैन मंदिर है और यहीं चक्रधर स्वामी का जन्म हुआ था। संत समिति का आरोप है कि यह मस्जिद भारतीय पुरातत्व विभाग (ASI) के संरक्षण में होने के बावजूद यहाँ नियमों के खिलाफ अवैध निर्माण किया गया है। पूरे मामले को देखते हुए भरूच के एसपी मौके पर पहुँचे और ASI अधिकारियों व संत समिति के प्रतिनिधियों से बातचीत की। उन्होंने सभी मुद्दों पर चर्चा कर सर्वे कराने का भरोसा दिया।

अखिल भारतीय संत समिति ने सोमवार (5 जनवरी 2025) को शक्तिनाथ मैदान में धरना दिया। संतों ने कहा कि जब तक ASI सख्त कार्रवाई नहीं करता, तब तक वे पानी भी नहीं पिएँगे। इससे पहले भी संत समिति इस जामा मस्जिद को समली विहार जैन मंदिर और चक्रधर स्वामी की जन्मस्थली बता चुकी है। वर्तमान में इस जामा मस्जिद में दिन में 5 वक्त की नमाज होती है और यहाँ मदरसे में बच्चों को शिक्षा भी दी जाती है।

बताया जाता है कि करीब 1905 में पुरातत्व विभाग ने इस मस्जिद को अपने अधीन ले लिया था और इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया था। हालाँकि, संत समिति का कहना है कि इसके बावजूद यहाँ नियमों के खिलाफ निर्माण और गतिविधियाँ हो रही हैं। संतों का आरोप है कि मुस्लिम समुदाय के कुछ लोग कानून का उल्लंघन कर इस ऐतिहासिक स्थल की असली पहचान बदलने की कोशिश कर रहे हैं।

इस मामले को लेकर संतों ने विरोध प्रदर्शन किया। उन्होंने माँग की कि इस जगह को उसकी पुरानी मूल स्थिति में वापस लाया जाए और यहाँ चल रही सभी अवैध गतिविधियों को तुरंत रोका जाए। अखिल भारतीय संत समिति के अध्यक्ष संत अविचल देवाचारी ने कहा कि यह एक ऐतिहासिक धरोहर स्थल है और यहाँ किसी भी तरह का दूसरा धार्मिक या सांस्कृतिक चिह्न नहीं है।

उन्होंने कहा कि जब पुरातत्व विभाग ने इस स्थल को अपने कब्जे में ले रखा है, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी भी उसी की है। अगर यहाँ कोई गतिविधि चल रही है तो उसे रोका जाना चाहिए। संतों ने यह भी माँग की कि जो भी नया निर्माण पहले मौजूद नहीं था और बाद में किया गया है, उसे तुरंत हटाया जाए। संत अविचल देवाचारी ने कहा कि सभी संतों और हिंदू समाज की यही माँग है कि इस स्थल को सिर्फ एक पुरातात्विक स्मारक के रूप में ही संरक्षित रखा जाए।

संतों ने क्या कहा?

‘ऑपइंडिया’ से बात करते हुए आंदोलन का नेतृत्व कर रहे अखिल भारतीय संत समाज के संन्यासी स्वामी मुक्तानंद ने कहा कि भरूच के हेड पोस्ट ऑफिस के पास स्थित यह जामा मस्जिद असल में पहले समली विहार जैन मंदिर के नाम से जानी जाती थी और यहीं चक्रधर स्वामी का जन्म हुआ था। उन्होंने बताया कि यह ऐतिहासिक स्थल भारत सरकार की संपत्ति है और ASI के संरक्षण में आने वाला राष्ट्रीय स्मारक है। ऐसे में इसमें किसी भी तरह का बदलाव करना कानूनन अपराध है। इसके बावजूद यहाँ नियमों का खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है।

स्वामी मुक्तानंद ने कहा कि देश में ASI के संरक्षण में करीब 3800 स्मारक हैं, जिनमें से लगभग 820 स्मारक ‘लिविंग मॉन्यूमेंट’ यानी जीवित स्मारक माने जाते हैं। उन्होंने भोजशाला में माता सरस्वती मंदिर और काशी का ज्ञानवापी मंदिर का उदाहरण देते हुए कहा कि ये दोनों भी संरक्षित जीवित स्थल हैं और वहाँ कानून के अनुसार कोई बदलाव नहीं किया गया। उसी तरह भरूच का यह स्थल भी जीवित स्मारक की श्रेणी में आता है।

उन्होंने साफ कहा कि कानून के मुताबिक किसी भी जीवित स्मारक में एक कील तक ठोंकना गैरकानूनी है। इसके बावजूद भरूच की जामा मस्जिद में वजूखाना बनाया गया है, पंखे, लाइटें, बोर्ड लगाए गए हैं और मदरसे से जुड़ा सामान भी वहाँ रखा गया है, जो सीधे तौर पर कानून का उल्लंघन है।

उन्होंने आगे कहा कि अगर कोई स्थल ‘जीवित स्मारक’ है, तो वहाँ पूजा या नमाज की अनुमति हफ्ते में सिर्फ एक दिन होती है, जैसे ताजमहल में केवल शुक्रवार को नमाज की इजाजत है। उन्होंने बताया कि एक समय कुछ लोगों ने ताजमहल में दिन में 5 वक्त नमाज पढ़ने की कोशिश की थी जिसके बाद ASI ने अदालत का रुख किया और उसे रुकवाया। इसी तरह भोजशाला में भी मंगलवार को ही पूजा की अनुमति है। हफ्ते में केवल एक दिन ही धार्मिक गतिविधि की इजाजत होती है लेकिन भरूच की जामा मस्जिद में इन नियमों का लगातार उल्लंघन हो रहा है।

उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे संरक्षित स्मारकों में कुछ समय के लिए पूजा या नमाज की जा सकती है लेकिन वहाँ कोई धार्मिक चिन्ह नहीं रखा जा सकता। पूजा या नमाज तो हो सकती है लेकिन कोई निर्माण या स्थाई ढाँचा बनाना पूरी तरह मना है। उनके अनुसार भरूच की जामा मस्जिद में इन सभी नियमों को नजरअंदाज किया गया है और इस संरक्षित स्थल के अंदरूनी हिस्से को पूरी तरह एक मस्जिद की तरह बना दिया गया है, जो आमतौर पर किसी भी संरक्षित स्मारक में नहीं होता।

उन्होंने यह भी कहा कि कानून के मुताबिक इस स्मारक के 100 मीटर के दायरे में कोई भी निर्माण नहीं किया जा सकता। अगर ऐसा होता है तो ASI को कार्रवाई करनी होती है। इसके बावजूद भरूच की जामा मस्जिद से सटे हुए कई मकान बना दिए गए हैं। ये मकान स्मारक की दीवार से बिल्कुल चिपकाकर बनाए गए हैं।

संतों की मांगें क्या हैं?

संत समिति ने ऑपइंडिया को बताया कि यह साबित हो चुका है कि भरूच में मौजूदा जामा मस्जिद की जगह पर पहले एक हिंदू-जैन मंदिर था। यह बात वहाँ की निर्माण शैली और स्मारक की बनावट देखकर साफ तौर पर समझ में आती है। संतों का हालिया विरोध इस बात को लेकर है कि इस स्मारक में नियमों का उल्लंघन रोका जाए और ASI द्वारा एक नया सर्वे कराया जाए।

संतों ने कहा है कि इस समय उनकी केवल यही माँग है कि इस स्मारक का प्रबंधन ASI के हाथ में रहे और जो नियमों का उल्लंघन यहां किया जा रहा है, उसे पूरी तरह बंद किया जाए। संत समिति की मांगें इस प्रकार हैं:-

  1. जिस समय इस स्थल को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अधिनियम 1904 के तहत विभाग ने अपने अधीन लिया था, उस समय का नक्शा, राजपत्र (गजट) अधिसूचना और यह बताते हुए कॉन्ट्रैक्ट लेटर सार्वजनिक किया जाए कि यह स्थान किससे और कैसे लिया गया था।
  2. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अधिनियम 1958 के अनुसार इस संरक्षित स्मारक के प्रवेश का समय तय किया जाए और नियमों के मुताबिक इसके खुलने और बंद होने की व्यवस्था की जाए।
  3. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अधिनियम 1958 के अनुसार नियमों के खिलाफ जो गतिविधियाँ यहाँ चल रही हैं, उन्हें तुरंत रोका जाए।
  4. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अधिनियम 1958 के तहत संरक्षित स्मारक में उसकी मूल संरचना बदलने के उद्देश्य से जो भी निर्माण किया गया है, उसे तुरंत हटाया जाए।
  5. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अधिनियम 1958 के अनुसार स्मारक की मूल संरचना और परिसर में सीमेंट का उपयोग प्रतिबंधित है। इसके बावजूद रेत, सीमेंट और ईंटों से कंक्रीट निर्माण कर अवैध गतिविधियों की व्यवस्था बनाई गई है, उसे तुरंत हटाया जाए।
  6. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अधिनियम 1958 तथा इसकी धारा 20A(1) और 20B (2010) के अनुसार 100 मीटर और 200 मीटर क्षेत्र को प्रतिबंधित और नियंत्रित क्षेत्र घोषित किया गया है लेकिन इसके बावजूद कई मकान और अन्य कंक्रीट संरचनाएँ बनाई गई हैं। इन्हें नियमों के अनुसार हटाया जाए और संरक्षित क्षेत्र की सुरक्षा की जाए।
  7. स्मारक के मुख्य प्रवेश द्वार पर नियमों के खिलाफ कंक्रीट मकान बना दिए गए हैं, जिससे मुख्य प्रवेश मार्ग संकरा हो गया है। इसे इसकी मूल स्थिति में बहाल किया जाए।
  8. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अधिनियम के तहत संरक्षित स्थलों की सुरक्षा और प्रबंधन के लिए बनाए गए नियमों का कई वर्षों से इस स्थल पर पालन नहीं किया गया है। इन नियमों के उल्लंघन के लिए संबंधित विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ पद के दुरुपयोग और आपराधिक लापरवाही के आरोप में कानूनी कार्रवाई शुरू की जाए और विभाग द्वारा इस संरक्षित स्थल पर पुलिस सुरक्षा की व्यवस्था की जाए।

दो दिन में सर्वे शुरू होगा: संत समाज

स्वामी मुक्तानंद ने आगे बताया कि आवेदन देने के बाद भी जब कोई कार्रवाई नहीं हुई तो अखिल भारतीय संत समिति के संन्यासियों ने 5 जनवरी से अनिश्चितकालीन उपवास शुरू कर दिया। इसके बाद प्रशासन ने तुरंत इस मामले को संज्ञान में लिया। स्वामी मुक्तानंद ने कहा कि एसपी अक्षय राज की मध्यस्थता में ASI अधिकारियों और संत समाज के बीच एक बैठक हुई जिसमें सभी मुद्दों पर कार्रवाई का आश्वासन दिया गया।

उन्होंने बताया कि स्थल पर जो अस्थाई व्यवस्थाएँ की गई हैं उन्हें 8 से 10 दिनों के भीतर हटा दिया जाएगा। वहीं, जो स्थाई निर्माण या व्यवस्थाएँ की गई हैं उन्हें अगले दो महीनों के भीतर हटाने की बात कही गई है। इसके अलावा, अगले 2-3 दिनों में सर्वे भी शुरू कर दिया जाएगा और सर्वे के दौरान संत समाज के कुछ लोगों को भी साथ रखा जाएगा।

(यह खबर मूल रूप से भार्गव राज्यगुरु ने गुजराती में लिखी है, जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ा जा सकता है।)

कभी ईशनिंदा का इल्जाम लगाकर जला देते हैं जिंदा, कभी चोर बताकर ले लेते हैं जान: जानिए यूनुस राज में हिंदुओं को किन-किन बहाने निशाना बना रहे कट्टरपंथी, 35 दिनों में 14 को मारा

बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथियों की वजह से एक और हिन्दू युवक की जान चली गई। मिथुन सरकार नाम के युवक को कट्टरपंथियों ने दौड़ाया। भीड़ को अपनी ओर आता देखकर मिथुन डर के मारे तालाब में कूद गया। डूबने से उसकी मौत हो गई। कट्टरपंथी चोर-चोर कह कर उसका पीछा कर रहे थे।

पुलिस ने उसकी बॉडी बरामद कर ली है। बांग्लादेश में पिछले 35 दिनों में 14 हिंदुओं की हत्या कर दी गई है जबकि 50 से ज्यादा हिंसक हमले हुए हैं। इन हत्याओं के बाद भी मोहम्मद यूनुस सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी हुई है।

अगस्त 2024 में शेख हसीना को हटाए जाने के बाद से देश की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति लगातार अस्थिर बनी हुई है। यूनुस की अंतरिम सरकार और फरवरी 2026 में होने वाले चुनावों के बीच, अल्पसंख्यक हिंदुओं के खिलाफ हिंसा, अत्याचार और हत्याओं का दौर जारी है। शेख हसीना ने हाल ही में कहा है कि इन उपद्रवियों पर लगाम लगाने के लिए मजबूत सरकार की दरकार है।

लेकिन हिन्दुओं की लगातार हो रही हत्या के बावजूद मुहम्मद यूनुस सरकार नींद से अब तक नहीं जगा पाई है। हिंसक इस्लामी भीड़ और कट्टरपंथी तत्वों को देश में अराजकता और अशांति फैलाने की खुली छूट मिली हुई है। दिसंबर 2025 से अब तक 11 हिन्दुओं की हत्या हो चुकी है।

स्थानीय मीडिया और सोशल मीडिया पर सामने आए मामलों पर गौर करें तो हालात की भयावहता का अंदाजा लगाया जा सकता है।

नरसिंदी में प्रांतोस कर्मकार की हत्या

2 दिसंबर को नरसिंदी जिले में 42 साल के हिंदू व्यवसायी प्रांतोस कर्मकार की गोली मारकर हत्या कर दी गई। उनकी ज्वेलरी की दुकान थी। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, नकाबपोश हमलावरों ने उन्हें घर से बाहर बुलाया, स्कूल के मैदान में ले जाकर सीने में गोली मार दी और फरार हो गए। बाद में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। पुलिस अब तक न तो हत्यारों की पहचान कर पाई है और न ही हत्या के मकसद का खुलासा हुआ है।

उत्पल सरकार की चाकू मारकर हत्या

5 दिसंबर की सुबह फरीदपुर जिले में 35 वर्षीय हिंदू मछली व्यापारी उत्पल सरकार की चाकू मारकर हत्या कर दी गई। हमलावरों ने उनकी वैन रोकी, सीने में वार किया और नकदी लूटकर फरार हो गए।

दिलचस्प बात यह है कि हमलावरों ने वैन चालक फिरोज मोल्ला को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया। उन्हें केवल आँखों पर पट्टी बाँधकर पुल से बाँध दिया गया था। बाद में स्थानीय लोगों ने मोल्ला को बचाया और पुलिस को सूचना दी।

पुलिस ने हिंदू मछली व्यापारी की खून ले लथपथ शव को फरीदपुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल पहुँचाा। पुलिस के मुताबिक, उत्पल सरकार की हत्या में 2-3 लोग शामिल थे, जिनकी तलाश की जा रही है।

रंगपुर में जोगेश चंद्र रॉय और सुबर्णा रॉय की हत्या

7 दिसंबर की रात रंगपुर जिले में 75 वर्षीय जोगेश चंद्र रॉय और उनकी 60 वर्षीय पत्नी सुबर्णा रॉय की बेरहमी से हत्या कर दी गई। जोगेश रॉय बांग्लादेश मुक्ति संग्राम 1971 के योद्धा थे। पड़ोसियों ने सुबह उनके शव बरामद किए। उनका गला कटा हुआ था। अवामी लीग ने इस हत्याकांड के पीछे जमात-ए-इस्लामी का हाथ बताया।

कोमिल्ला में शांतो दास की हत्या

12 दिसंबर को कोमिल्ला जिले के होमना उपजिला में शांतो दास नामक एक हिंदू युवक का शव मक्के के खेत से बरामद हुआ। वह ऑटो-रिक्शा चालक और ग्राम पुलिस बल के सदस्य थे। इस घटना के बारे में उनके पिता अरुण चंद्र दास ने कहा था, “मेरा बेटा शांतो ऑटो रिक्शा चलाता था। गुरुवार शाम के बाद से हम उससे संपर्क नहीं कर पा रहे थे।” पीड़ित का गला कटा हुआ था और गर्दन पर चाकू के कई घाव थे। पुलिस ने शांतो दास का शव बरामद कर पोस्टमार्टम के लिए कोमिला मेडिकल कॉलेज अस्पताल भेज दिया।

मयमनसिंह में दीपू चंद्र दास की हत्या

18 दिसंबर को बांग्लादेश के मयमनसिंह जिले के भालुका गाँव में एक हिंसक मुस्लिम भीड़ ने एक हिंदू युवक की पीट-पीटकर हत्या कर दी । मृतक की पहचान 27 वर्षीय दीपू चंद्र दास के रूप में हुई है। पीड़ित को बुरी तरह पीटा गया, पेड़ से बाँध दिया गया और फिर आग लगा दी गई। इस घटना का दिल दहला देने वाला वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था।

दीपू चंद्र दास एक कपड़ा कारखाने में मजदूर के रूप में काम करते थे। विवाद के बाद, उन पर ईशनिंदा का झूठा आरोप लगाया गया। घटना के दिन उसे फैक्ट्री से निकाल दिया गया था और फ्लोर मैनेजर ने कट्टरपंथियों को बता दिया था। इसके बाद पुलिस की हिरासत में लेने के बाद उसे कट्टरपंथियों ने पीट-पीट कर मार डाला।

बोगुरा में पिंटू अकांडा की हत्या

23 दिसंबर को बांग्लादेश के बोगुरा जिले के आदमदिघी उपजिला में एक माइक्रोबस से पिंटू अकांडा नामक 35 वर्षीय हिंदू व्यक्ति का शव बरामद किया गया। उन्हें एक दिन पहले चार अज्ञात हमलावरों ने बंदूक की नोक पर अगवा कर लिया था। पीड़ित एक व्यवसायी और लॉटरी शोरूम के मालिक थे।

प्रारंभिक रिपोर्टों के अनुसार, पिंटू अकांडा की गला घोंटकर हत्या की गई थी। एक बयान में, एएसपी आसिफ हुसैन ने कहा, “हमारा प्राथमिक संदेह है कि पिंटू को बंदूक की नोक पर अगवा करने के बाद गला घोंटकर मार डाला गया था। हम फिलहाल जाँच कर रहे हैं।”

पीड़ित परिवार ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। अपहरण का सीसीटीवी फुटेज अब सोशल मीडिया पर सामने आया है। वीडियो में चार नकाबपोश लोग पिंटू पर हथियार ताने हुए और उसे उसके शोरूम से बाहर ले जाते हुए दिखाई दे रहे हैं। इसके बाद पीड़ित को जबरन गाड़ी में बैठाया गया।

राजबाड़ी में अमृत मंडल की हत्या

24 दिसंबर को अमृत मंडल नामक एक अन्य हिंदू व्यक्ति को उन्मादी भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। यह घटना बांग्लादेश के राजबारी जिले के पांग्शा उपजिला में घटी। पीड़ित की उम्र महज 29 वर्ष थी। वह होसेनडांगा गाँव का निवासी था। अमृत मंडल को गंभीर हालत में अस्पताल ले जाया गया लेकिन चोटों के कारण उसकी मृत्यु हो गई।

बाद में उनके शव को पोस्टमार्टम के लिए राजबारी सदर अस्पताल के मुर्दाघर भेजा गया। हिंदू व्यक्ति की हत्या के बाद, मोहम्मद यूनुस ने अमृत मंडल को ‘अपराधी’ बताकर उसकी पीट-पीटकर हत्या को उचित ठहराने की कोशिश की। इसके अलावा अंतरिम सरकार के मुखिया यूनुस ने भी इस मामले में सांप्रदायिक पहलू को कम करके आँका।

हबीगंज में कामदेव दास की हत्या

हबीगंज जिले में 18 वर्षीय हिंदू युवक कामदेव दास की हत्या ने इलाके में दहशत फैला दी। वह 25 दिसंबर से लापता था और 27 दिसंबर को उसका शव तालाब से मिला। उसके गले पर निशान भी मिले हैं। परिजनों और स्थानीय लोगों ने इस हत्या के पीछे इस्लामी कट्टरपंथियों का आरोप लगाया है। स्थानीय लोगों के अनुसार, कामदेव गुरुवार (25 दिसंबर 2025) से लापता था। उसके पिता ने थाने में गुमशुदगी की शिकायत दर्ज कराई थी, लेकिन परिवार का आरोप है कि पुलिस ने मामले को गंभीरता से नहीं लिया।

बजेन्द्र बिस्वास की मारी गोली

29 दिसंबर को बांग्लादेश के अर्धसैनिक सहायक बल अंसार वाहिनी के हिन्दू सदस्य बजेन्द्र बिस्वास को गोली मार दी गई। ये अर्धसैनिक सहायक बल देश में आंतरिक सुरक्षा और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिम्मेदार है। बिस्वास को मैनन सिंह इलाके में मारा गया। उसकी हत्या उसके दोस्त ने ही की। बांग्लादेशी मीडिया आउटलेट RTV ऑनलाइन ने बताया कि घटना के समय फैक्ट्री में कुल 20 अंसार सदस्य काम कर रहे थे। घटना के समय अंसार सदस्य नोमान मियाँ और बजेंद्र एक साथ बैठे थे। अचानक नोमान ने बजेंद्र की जांघ पर बंदूक (शॉटगन) तानी और कहा, ‘क्या मैं गोली मार दूँ?’ और फिर गोली चला दी। उसके बाद नोमान भाग गया।

खोकन चंद्र दास की हत्या

31 दिसंबर को को हिन्दू व्यवसायी खोकन चंद्र दास को घर लौटते समय हमलावरों ने चाकू से वार किया। इसके बाद पेट्रोल छिड़कर जिंदा जला दिया। खोकन दास अपने गाँव में एक छोटा मेडिकल स्टोर चलाते थे और मोबाइल बैंकिंग से भी जुड़ा काम करते थे। बुधवार (31 दिसंबर 2025) की रात, जब वह दुकान बंद कर घर लौट रहे थे, तभी रास्ते में कुछ लोगों ने उन्हें घेर लिया। पहले उन पर धारदार हथियार से हमला किया गया, जिससे उन्हें गंभीर चोटें आईं। इसके बाद हमलावरों ने उन पर ज्वलनशील पदार्थ डालकर आग लगा दी।

अपनी जान बचाने के लिए खोकन दास किसी तरह पास के तालाब में कूद पड़े, जिससे आग तो बुझ गई लेकिन वह बुरी तरह झुलस चुके थे और अत्यधिक खून बह चुका था। स्थानीय लोगों ने उन्हें तुरंत अस्पताल पहुँचाया, जहाँ से हालत नाजुक होने पर ढाका रेफर किया गया। हालाँकि, गंभीर चोटों और जलने के कारण डॉक्टर उन्हें बचा नहीं सके।

राणा प्रताप बैरागी की हत्या

जेस्सोर जिले के केशबपुर उपजिला स्थित अरुआ गाँव निवासी 38 वर्षीय राणा प्रताप बैरागी की सोमवार (05 जनवरी 2026) शाम को अज्ञात हमलावरों ने सिर में गोली मारकर हत्या कर दी गई। बैरागी की मोनिरामपुर के कोपलिया बाजार में बर्फ बनाने की फैक्ट्री थी। इसके अलावा ने ‘दैनिक बीडी खबर’ समाचार में नरैल क्षेत्र के कार्यवाहक संपादक भी थे।

पुलिस के अनुसार, सोमवार शाम लगभग 5.45 बजे बैरागी अपनी फैक्ट्री में थे। तभी तीन हमलावर मोटरसाइकिल पर आए और उन्हें फैक्ट्री से बाहर बुलाया और अपने साथ ले गए। रास्ते में हमलावरों ने बैरागी के सिर में तीन गोली मारी और भाग गए। बैरागी की मौके पर ही मौत हो गई।

हिंदू दुकानदार मणि चक्रवर्ती की चाकू घोंपकर हत्या

वहीं नरसिंदी जिले के पोलाश उपजिला क्षेत्र में एक हिंदू दुकानदार की सोमवार (05 जनवरी 2026) को चाकू से गोदकर बेरहमी से हत्या कर दी गई। वे चारसिंदुर बाजार में अपनी किराना दुकान चलाते थे। सोमवार शाम को भी वह अपनी दुकान पर बैठे थे, तभी अज्ञात हमलावरों ने अचानक उन पर हमला कर दिया।

उन्हें अस्पताल ले जाया गया, लेकिन रास्ते में ही उन्होंने दम तोड़ दिया। मणि चक्रवर्ती को इलाके में प्रतिष्ठित व्यापारी के रूप में जाना जाता था। घटना के बाद से इलाके में दहशत फैल गई है।

मिथुन सरकार की हत्या

6 जनवरी को नाओगाँव जिले के महादेवपुर में कट्टरपंथी भीड़ से बचने के लिए नहर में कूदे एक हिंदू युवक मिथुन सरकार की मौत हो गई। रिपोर्ट के मुताबिक, स्थानीय लोगों की भीड़ ने मिथुन पर चोरी का आरोप लगाते हुए उसका पीछा किया। जान बचाने के लिए वह चकगौरी बाजार इलाके में एक नहर में कूद गया लेकिन तैर न पाने के कारण डूब गया। मदद की गुहार के बावजूद उसे बचाया नहीं गया। पुलिस ने नहर से उसका शव बरामद किया। मिथुन भंडारपुर गाँव का रहने वाला था।

ये वे हिन्दू थे, जिनकी मौत को पुलिस ने दर्ज की और मीडिया के सामने आई। कई ऐसी हत्याएँ भी हुई जिन्हें न तो दर्ज किया गया और न ही मीडिया में इन्हें जगह मिली।

हत्याओं के अलावा हिन्दुओं के उत्पीड़न की कई खबरें सामने आई। 19 दिसंबर को सिलहट में एक हिंदू पत्रकार सुशांत दासगुप्ता के घर पर हमला किया गया, वहीं एक रिक्शा चालक को कलावा पहनने पर पीटा गया। उस पर RA&W एजेंट होने का आरोप लगाया गया और पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया।

हिन्दू महिलाओं के साथ रेप की घटनाएँ काफी बढ़ गई है। जमीन हड़पने के लिए अकेली महिला को निशाना बनाया जा रहा है। कालीगंज में एक हिन्दू विधवा महिला को शाहीन और हसन ने गैंगरेप किया और उसके दो मंजिला घर को हड़पने की कोशिश की। महिला को पेड़ से बाँधकर उसके बाल भी काट डाले। वहीं एक हिन्दू सुमन को चोरी के आरोप में जमकर पीटा और खंभे से बाँध दिया। वह भिखारी था और उसका कोई आपराधिक मामला भी नहीं था।

ये यूनुस सरकार की हकीकत है जो चीख चीखकर कह रही है कि बांग्लादेश में कट्टरपंथियों का राज है। सरकार सिर्फ मूकदर्शक है, उसे न तो कानून व्यवस्था की फिक्र है और न ही जनता की।

हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो इसकी पुष्टि करता है। इसमें एक युवक बेखौफ थाने के अंदर बैठकर कह रहा है कि उसने हिन्दू पुलिस अधिकारी को जिंदा जला दिया। सत्ता का घमंड और सिस्टम का खस्ताहाल इससे ज्यादा क्या हो सकता है। इसे देखकर यही कहा जा सकता है कि बेशर्म मोहम्मद यूनुस, अब तो जाग जाओ, जनता त्राहि त्राहि कर रही है।

कहीं दिए अरबों डालर, कहीं किया युद्ध और कहीं बनाई रणनीति: जानिए- लुइजियाना से अलास्का तक अमेरिका ने कैसे फैलाईं अपनी सीमाएँ, अब ग्रीनलैंड कब्जाने का प्लान

नए साल 2026 की शुरुआत में ही डोनाल्ड ट्रंप ने दुनियाभर में हलचल मचा दी है। अमेरिका वेनेजुएला पर हमला कर वहाँ के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को गिरफ्तार कर अपने साथ ले आया। इस कदम के बाद अमेरिका ने कहा कि वे वेनेजुएला के तेल के 30 से 50 मिलियन बैरल का इस्तेमाल करेंगे और स्पष्टीकरण दिया कि यह कार्रवाई लोकतंत्र बहाल करने और सुरक्षा की वजह से की गई है। लेकिन बहुत देशों ने इसे अतंरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया है।

वेनेजुएला के बाद ट्रंप प्रशासन ने ग्रीनलैंड को भी अपनी ‘राष्ट्रीय सुरक्षा प्राथमिकता’ बताया है और कहा कि वह इसे हासिल करने के लिए कई विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। इन विकल्पों में सैन्य कार्रवाई भी शामिल है, ताकि रूस और चीन जैसे देशों के बढ़ते प्रभाव को टाला जा सके। लेकिन ग्रीनलैंड डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है और दोनों ने साफ कहा है कि वे अमेरिका को अपना हिस्सा नहीं बनने देंगे।

अगर इन दोनों घटनाओं को अलग-अलग न देखकर इतिहास के साथ जोड़ा जाए, तो अमेरिकी का पुरानी कहानी सामने आती है। अमेरिका पहले भी कई बार पैसे, ताकत और मौके का इस्तेमाल करके अपना सीमा दायरे को बढ़ा चुका है। लुइजियाना की खरीद हो, अलास्का का सौदा हो या हवाई और प्रशांत द्वीपों पर पकड़। हर बार वजह अलग बताई गई, लेकिन तरीका लगभग वही रहा।

अब वेनेजुएला में असर बढ़ाने की कोशिश और ग्रीनलैंड को प्राथमिकता बताना उसी पुराने पैटर्न की याद दिलाता है। इसी पृष्ठभूमि में यह समझना भी जरूरी है कि अमेरिका कैसे सीमा दायरे बढ़ा रहा है और क्यों अगली बारी ग्रीनलैंड की हो सकती है।

लुइजियाना सौदा: पैसे से अमेरिका का सबसे बड़ा सीमा विस्तार

अमेरिका का दायरा बढ़ने की कहानी की शुरुआत लुइजियाना सौदे से होती है। यह घटना बताती है कि अमेरिका ने सबसे पहले पैसों के दम पर कैसे अपना आकार कई गुना बढ़ाया। साल 1803 में अमेरिका ने फ्रांस से लुइजियाना नाम का एक बहुत बड़ा इलाका खरीद लिया। उस समय यह इलाका आज के अमेरिका के करीब एक-तिहाई हिस्से के बराबर था।

उस दौर में फ्रांस के शासक नेपोलियन को यूरोप में युद्ध लड़ने के लिए पैसों की जरूरत थी। वहीं अमेरिका को डर था कि अगर यह इलाका किसी ताकतवर देश के हाथ में रहा, तो उसकी सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। इसी मजबूरी और मौके का फायदा उठाकर अमेरिका ने सिर्फ 15 मिलियन डॉलर में यह पूरा इलाका खरीद लिया। उस समय यह रकम बड़ी लगती थी, लेकिन बाद में यह सौदा अमेरिका के इतिहास का सबसे सस्ता और सबसे फायदेमंद सौदा साबित हुआ।

फ्लोरिडा, टेक्सास से अलास्का: एक ही सोच से अमेरिका का फैलाव

लुइजियाना सौदे के बाद धीरे-धीरे अमेरिका ने अपने कदम आगे बढ़ाए। अगली बारी फ्लोरिडा की आती है। फ्लोरिडा पहले स्पेन के कब्जे में था, लेकिन उस समय स्पेन कमजोर हो चुका था और इस इलाके को ठीक से संभाल नहीं पा रहा था। अमेरिका को डर था कि फ्लोरिडा उसके लिए खतरा बन सकता है। आखिरकार 1819 में Adams-Onis Treaty हुआ और फ्लोरिडा अमेरिका को मिल गया।

इसके बाद टेक्सास। टेक्सास पहले मैक्सिको का हिस्सा था, लेकिन वहाँ बड़ी संख्या में अमेरिकी नागरिक बस चुके थे। हालात ऐसे बने कि टेक्सास ने खुद को अलग देश घोषित कर दिया। कुछ साल बाद 1845 में टेक्सास अमेरिका में शामिल हो गया। यह कोई जमीन खरीदने का सौदा नहीं था, बल्कि राजनीतिक चाल और ताकत का इस्तेमाल से किया गया विस्तार था।

इसी दौर में ओरेगन टेरिटरी को लेकर अमेरिका और ब्रिटेन आमने-सामने थे। दोनों देशों के बीच टकराव हो सकता था, लेकिन अंत में बातचीत का रास्ता निकला। नतीजतन 1846 की Oregon Treaty के तहत यह इलाका बाँट लिया गया और आज का ओरेगन और वॉशिंगटन अमेरिका के हिस्से में आ गया।

फिर आया सबसे बड़ा और निर्णायक मोड़, मेक्सिको-अमेरिका युद्ध। यह युद्ध 1846 से 1848 तक चला। युद्ध खत्म होने के बाद अमेरिका को बहुत बड़ा इलाका मिला, जिसमें आज का कैलिफोर्निया, एरिजोना, न्यू मैक्सिको, नेवाडा और यूटा शामिल है। इसे Mexican Cession कहा जाता है। अमेरिका ने कुछ पैसा दिया, लेकिन असल में यह जमीन युद्ध के बाद उसकी ताकत के कारण मिली।

इसके कुछ साल बाद 1853 में Gadsden Purchase हुआ। अमेरिका ने मैक्सिको से एक छोटा-सा मेसिला वैली इलाका खरीदा। अमेरिका की वजह थी कि उसे रेलवे लाइन बिछानी थी। 78 हजार स्क्वायर किलोमीटर की जमीन भले ही छोटी थी, लेकिन अमेरिका ने भविष्य को देखते हुए यह सौदा किया।

अलास्का: कभी बेकार समझा गया, आज दुनियाभर की राजनीति का केंद्र

अलास्का को अमेरिका के विस्तार की कहानी में सबसे दिलचस्प अध्याय माना जाता है। साल 1867 में अमेरिका ने इसे रूस से खरीदा था। उस समय अमेरिका के भीतर ही लोग इस फैसले का मजाक उड़ाते थे। कहा जाता था कि अमेरिका ने बर्फ, बर्फ और सिर्फ बर्फ खरीद ली है। इसे ‘रूस की बेकार जमीन’ तक कहा गया। लेकिन समय ने साबित किया कि यह अमेरिका का यहा फैसला उसकी दूरगामी सोच का उदाहरण है।

अलास्का में बाद में सोना, तेल और गैस निकली। धीरे-धीरे यह इलाका अमेरिका की ऊर्जा सुरक्षा का बड़ा आधार बन गया। आज अमेरिका के पूरे तेल उत्पादन का बड़ा हिस्सा अलास्का से आता है। सिर्फ संसाधन ही नहीं, बल्कि इसकी भौगोलिक स्थिति भी बेहद अहम है। अलास्का सीधे ‘रूस के बेहद करीब’ है और आर्कटिक क्षेत्र में भी अमेरिका की मौजूदगी को मजबूत करता है।

यही वजह है कि अलास्का सिर्फ राज्य नहीं, बल्कि अमेरिका का रणनीतिक हथियार बन चुका है। हाल के समय में अलास्का एक बार फिर चर्चा में आया था, जब डोनाल्ड ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की बैठक के लिए इस जगह को चुना गया था।

अलास्का यह दिखाता है कि अमेरिका ने सिर्फ आज की जरूरत नहीं देखी, बल्कि भविष्य की ताकत को ध्यान में रखकर फैसले किए। जिस जमीन को कभी बेकार कहा गया, वही आज अमेरिका को ऊर्जा, सुरक्षा और वैश्विक राजनीति में बढ़त देती है।

अमेरिका की यही सोच आज ग्रीनलैंड को लेकर भी दिखाई देती है। जैसे अलास्का में बर्फ के नीचे खजाना निकला, वैसे ही ग्रीनलैंड में भी खनिज, तेल और रणनीतिक रास्ते छिपे हुए हैं। इतिहास बताता है कि अमेरिका जब किसी बर्फीली और दूर की जमीन में दिलचस्पी दिखाता है, तो उसके पीछे सिर्फ नक्शा नहीं, बल्कि आने वाले दशकों की योजना होती है।

द्वीपों और छोटे क्षेत्रों के जरिए अमेरिका का फैलाव: समुद्री क्षेत्र में पकड़ मजबूत

अमेरिका ने खुद को केवल महाद्वीपों तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि द्वीपों और छोटे-छोटे क्षेत्रों के जरिए भी दायरा बढ़ाया। ये इलाके रणनीतिक और समुद्री महत्व रखते थे। हर जगह अमेरिका ने अलग तरीका अपनाया। किसी को खरीदा, कभी युद्ध के बाद समझौता और कभी सीधे दबाव या कब्जा। इन इलाकों से अमेरिका ने नौसेना और व्यापार में अपनी पकड़ मजबूत की।

सबसे पहले बात हवाई द्वीप (Hawaiian Island) की। हवाई पहले स्वतंत्र राज्य था, जहाँ रानी का शासन था। लेकिन अमेरिकी व्यापारियों और सेना के दबाव में 1898 में हवाई को अमेरिका में मिला लिया गया। यहाँ न खरीद हुई, न खुला युद्ध, बल्कि राजनीतिक दबाव और सत्ता पलट के जरिए अमेरिका ने इसे अपने अधीन किया।

इसके बाद आते हैं फिलिपींस और प्रशांत क्षेत्र के बड़े द्वीप। 1898 का स्पेन-अमेरिका युद्ध के बाद अमेरिका को फिलिपींस, गुआम (Guam) और प्यूर्टो रिको (Puerto Rico) मिले। यह इलाके सीधे युद्ध और उसके बाद हुए समझौते से अमेरिका में शामिल हुए। यहाँ अमेरिका का मकसद समुद्री रास्तों और रणनीतिक बेस पर दबदबा बनाना था।

अमेरिका ने छोटे और दूरदराज के अटोल और द्वीप भी अपने अधीन किए। इनमें Midway Island, Wake Island, Johnston Atoll, Palmyra Atoll, Kingman Reef और American Samoa शामिल हैं। ये इलाके आकार में छोटे थे। अमेरिका ने इनमें सैन्य बेस बनाए, नौसेना के लिए रास्ते बनाए, जिससे प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका की पकड़ मजबूत हुई।

निष्कर्ष: वेनेजुएला और ग्रीनलैंड, अमेरिकी के विस्तार की वही पुरानी कहानी

अगर अब तक की पूरी कहानी को एक साथ जोड़कर देखा जाए, तो बात साफ समझ आती है। अमेरिका का विस्तार कभी अचानक नहीं हुआ और न ही किसी एक तरीके को अपनाने से हुआ। उसने कभी जमीन पैसे देकर खरीदी, कभी समझौते और दबाव से ली, कभी युद्ध के बाद अपने कब्जे में की और कभी छोटो-छोटे क्षेत्रों में धीरे-धीरे अपने पकड़ बनाई। अलास्का से लेकर हवाई द्वीप, हर जगह अमेरिका ने अपने फायदे को सबसे ऊपर रखा है।

ऐसे में आज जब वेनेजुएला की बात होती है, तो इतिहास अपने आप याद आता है। वेनेजुएला दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार वाले देशों में से एक है। अमेरिका लंबे समय से वहाँ की राजनीति और सत्ता बदलाव में दिलचस्पी दिखाता रहा है। भले ही आज सीधे जमीन लेने की बात न हुई हो, लेकिन सत्ता पर असर डालकर और संसाधनों को नुकसान पहुँचाकर अमेरिका वही पुरानी रणनीति से अपना दायरा बढ़ाने का काम जरूर कर सकता है।

इसी तरह ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका की दिलचस्पी भी नई नहीं लगती है। बर्फ से ढका यह इलाका दिखने में भले ही खाली लगे, लेकिन इसके नीचे खनिज, तेल और भविष्य में समुद्री रास्ते छिपे हैं। जैसे कभी अलास्का को बेकार समझा गया था और बाद में वही अमेरिका के लिए खजाना साबित हुआ, वैसे ही ग्रीनलैंड को भी अमेरिका भविष्य की बड़ी रणनीति के तौर पर देख रहा है।

इसीलिए वेनेजुएला और ग्रीनलैंड को अलग-अलग घटनाओं की तरह देखने के बजाए, अगर उन्हें अमेरिका के पुराने विस्तार के इतिहास से जोड़कर देखा जाए। तब तस्वीर ज्यादा साफ हो जाती है।

राजनीति के लिए कानून-व्यवस्था के नाम का डर फैलाया गया: पढ़ें- मद्रास HC ने कार्तिगई दीपम जलाने को सही ठहराते हुए स्टालिन सरकार से क्या-क्या कहा

मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन के उस आदेश को सही ठहराया जिसमें थिरुपरनकुंद्रम हिल पर दीपाथून पर कार्तिगई दीपम जलाने की इजाजत दी गई थी। कोर्ट ने स्टालिन के नेतृत्व वाली DMK सरकार की कड़ी आलोचना की। साथ ही सरकार के कानून व्यवस्था की समस्या के दावों को खारिज करते हुए इसे बेबुनियाद और राजनीति से प्रेरित बताया।

मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन के फैसले को बरकरार रखा, जिसमें मशहूर थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर बने पुराने पत्थर के खंभे पर दीया जलाने का आदेश दिया गया था। यह भगवान मुरुगन के छह घरों में से एक माना जाता है। यह आदेश 6 जनवरी को जस्टिस जी. जयचंद्रन और जस्टिस के.के. रामकृष्णन की खंडपीठ ने दी थी।

कोर्ट ने द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) सरकार के रवैये को लेकर नाराजगी जताई, क्योंकि उसने साल में एक दिन होने वाले रस्म को करने की इजाज़त नहीं दी। कोर्ट ने कहा कि इससे अशांति फैलेगी। बेंच ने कानून व्यवस्था के मुद्दे को ‘फिजुल और यकीन करने के लायक नहीं’ बताया।

मद्रास हाईकोर्ट ने सख्ती के साथ कहा कि ऐसा तभी हो सकता है जब ऐसी गड़बड़ी खुद राज्य द्वारा स्पॉन्सर की गई हो। हम प्रार्थना करते हैं कि कोई भी राज्य अपना पॉलिटिकल एजेंडा पूरा करने के लिए उस लेवल तक न गिरे। इससे सरकार को बड़ी शर्मिंदगी उठानी पड़ेगी।

अपील करने वाले सबूत नहीं दे पाए, वक्फ बोर्ड के पास अधिकार नहीं

जजों ने कहा कि अपील करने वालों जैसे- हज़रत सुल्तान सिकंदर बादुशा अवुलिया दरगाह और राज्य के अधिकारियों के पास सबूत नहीं हैं। इनलोगों के पास ऐसे सबूत नहीं हैं कि शैवों के ‘आगम शास्त्र’ में उस जगह पर दीया जलाने पर रोक है, जो सीधे गर्भगृह में भगवान की मूर्ति के ऊपर नहीं है।

कोर्ट ने जोर देकर कहा, “निर्देश का मकसद सुरक्षा पक्का करना है। इसलिए जज द्वारा सुझाई गई दूरी की पाबंदी दीपम जलाने की जगह तय करने के लिए ज़रूरी शर्त नहीं है। दीपम जलाने की जगह तय करते समय सिर्फ धार की प्रॉपर्टी की सुरक्षा ही अहम है।”

धार्मिक कामों का महत्व, पत्थर के खंभे पर दीपम जलाने की जरूरत

बेंच ने कहा कि दीपम जलाने के लिए सबसे अच्छी जगह पत्थर का खंभा है, जो एक अलग चट्टान की चोटी पर है और उस चोटी के नीचे है जहाँ धार है। जजों ने धार्मिक कामों का मकसद भी बताया और बताया कि कार्तिकेयदीपम और दूसरे त्योहारों के दौरान अच्छी जगहों पर दीपम जलाने का रिवाज है, ताकि पहाड़ी और आस-पास के इलाकों में रहने वाले भक्त देख सकें और पूजा कर सकें।

फिर उन्होंने संत थिरुमूलर का ज़िक्र किया, जिन्होंने कहा था कि ‘रोशनी भगवान शिव का रूप है।’ कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि देवस्थानम के पास अपने भक्तों की इच्छाओं को नज़रअंदाज़ करने का कोई कारण नहीं है। उसकी ज़मीन की सीमाओं के अंदर ऊँची जगहों पर दीये जलाने की परंपरा है।

इसने पिछले फ़ैसले को दोहराया कि पहाड़ी पर कोई भी गतिविधि तय सीमाओं के अंदर हो रहा है। कोर्ट ने फिर से कहा कि पहाड़ी प्राचीन स्मारक और पुरातत्व स्थल और अवशेष (AMASR) एक्ट के तहत एक सुरक्षित इलाका है। सभी को एक्ट, इसके नियमों और जस्टिस आर. विजयकुमार के फैसले के बाद जो निकल कर सामने आया है, उसका पालन करना चाहिए।

DMK सरकार की चिंता निराधार

अदालत ने DMK सरकार की खिंचाई करते हुए कहा कि कानून-व्यवस्था की आशंका ‘एक काल्पनिक डर’ है, जिसे राजनीतिक एजेंडे के लिए बनाया गया है। पीठ ने कहा, “यह मानना हास्यास्पद और मुश्किल है कि शक्तिशाली राज्य इस डर से दीपम जलाने की अनुमति नहीं दे रहा है कि इससे सार्वजनिक शांति भंग होगी”। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पहाड़ी पर स्थित दीपस्तंभ की जगह श्री सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर की संपत्ति है।

बेंच ने आरोप लगाया, “देवस्थानम से कुछ लोगों को दीया जलाने के लिए खंभे तक आने देना और भक्तों को पहाड़ी के नीचे ही रोककर पूजा करना कोई मुश्किल काम नहीं है। यह दिखाना कि इस तरह के जमावड़े से शांति भंग होगी, भगदड़ मचेगी, समुदाय के बीच वैमनस्य बढ़ेगा, वगैरह, या तो यह दिखाता है कि वे कानून-व्यवस्था बनाए रखने में नाकाम हैं या समुदायों के बीच सद्भाव लाने में हिचकिचा रहे हैं।”

इसने कहा कि राज्य को, जिला प्रशासन के जरिए इस मुद्दे पर हिन्दू मुस्लिम समुदायों के बीच भाईचारा और शांति लाने की कोशिश करनी चाहिए था। कोर्ट ने कहा कि इतने सालों में शांति वार्ता ने सिर्फ शक बढ़ाने का काम किया है, क्योंकि यकीन की कमी है।

कोर्ट ने थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर दीया जलाने को सही ठहराया

जजों ने कहा कि दीपाथॉन में दीया देवस्थानम को जलाना होगा। आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया (ASI) पहाड़ी के स्मारकों की सुरक्षा के लिए AMASR एक्ट में दी गई पाबंदियों और रोक के साथ-साथ जरूरी शर्तें भी लागू करेगा।

उन्होंने बताया, “देवस्थानम को अपनी टीम के जरिए, तमिल महीने कार्तिगई में पड़ने वाले कार्तिगईदीपम त्योहार के मौके पर दीपाथून में दीया जलाना होगा। किसी भी आम आदमी को देवस्थानम टीम के साथ जाने की इजाज़त नहीं होगी।” टीम के सदस्यों की संख्या पुलिस और ASI से सलाह-मशविरा करने के बाद चुनी जाएगी। पूरा इवेंट डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर की देखरेख में होगा।

हिंदू अधिकारों के लिए कानूनी लड़ाई

मद्रास हाई कोर्ट ने फैसला किया कि थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर पुराना पत्थर का खंभा कार्तिगई दीपम का दीया जलाने के लिए सही है। हालांकि, खंभे के सिकंदर बादुशा दरगाह के पास होने की वजह से इसका विरोध हुआ, और दीया आमतौर पर उचिपिलैयार मंदिर के पास एक अलग जगह पर जलाया जाता था।

हालाँकि, जस्टिस जीआर स्वामीनाथन ने दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि दीपाथून पर दीया जलाने से मुस्लिम समुदाय या दरगाह के अधिकारों पर कोई बुरा असर नहीं पड़ेगा। 3 नवंबर को पारंपरिक उचिपिलैयार मंदिर मंडपम में दीया जलाने के बाद पुलिस और हिंदू एक्टिविस्ट के बीच लड़ाई हो गई थी।

DMK ने कानून व्यवस्था को मुद्दा बनाते हुए कोर्ट के आदेश के खिलाफ मद्रास हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। वहीं याचिकाकर्ता रामा रविकुमार ने CISF की मदद से पहाड़ी पर चढ़ने की कोशिश की थी।

लेकिन मदुरै डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर ने लोगों की सुरक्षा का हवाला देते हुए रोक लगा दी। इस स्थिति में मदुरै कमिश्नर जे लोगनाथन की अगुवाई में राज्य पुलिस ने श्रद्धालुओं को रोक दिया। हिंदू मुन्नानी के सदस्य समेत तमाम श्रद्धालुओं ने मंदिर के सामने जमा होकर कोर्ट द्वारा तय जगह पर दीया जलाने की इजाज़त देने की माँग की।

कुछ लोगों ने पुलिस बैरिकेड पार करने की भी कोशिश की। धक्का-मुक्की और झगड़े की वजह से एक पुलिस ऑफिसर घायल हो गया। एक टॉप हिंदू मुन्नानी एक्टिविस्ट के मुताबिक, मंदिर एडमिनिस्ट्रेशन ने कोर्ट के आदेश का पालन करने के लिए ‘कोई भी इंतज़ाम’ नहीं किया था।

मंदिर के मैनेजमेंट ने पिछले फैसले को यह कहते हुए चुनौती भी दी थी कि इस कार्रवाई से सांप्रदायिक सद्भाव को खतरा हो सकता है। लेकिन, कोर्ट ने सख्त निर्देश दिया कि शाम 6 बजे तक दीया जलाना होगा, नहीं तो शाम 6:05 बजे कंटेम्प्ट की कार्रवाई शुरू होगी।
जस्टिस स्वामीनाथन ने कहा, “मैंने खास तौर पर पुलिस को यह पक्का करने का आदेश दिया था कि भक्तों का पिटीशन में बताई गई जगह पर कार्यक्रम मनाने और पूजा करने का अधिकार बना रहे, लेकिन इसका पालन नहीं किया गया।”

फिर भी, तमिलनाडु सरकार और मदुरै के अधिकारियों ने बाद में फैसले को चुनौती देने के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां भक्तों ने जस्टिस जी जयचंद्रन और केके रामकृष्णन की डिवीजन बेंच को बताया कि तमिलनाडु के हिंदू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एंडोमेंट्स डिपार्टमेंट (HR&CE डिपार्टमेंट) कमिश्नर ने 17 दिसंबर को सनातन धर्म का ‘खुलेआम अपमान और बेइज्जती’ की है।

हिंदुओं का पक्ष रख रहे सीनियर एडवोकेट एस श्रीराम ने कहा कि हर बार जब शांति बैठक में हिन्दुओं को अपने अधिकार छोड़ने के लिए मजबूर किया गया है। उन्होंने थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर गैर-कानूनी कब्जे के साथ-साथ वहां जानवरों की बलि देने, उसका नाम बदलकर सिकंदर हिल करने और एक इस्लामी त्यौहार पर उसे हरे रंग से रंगने की कोशिश की भी चर्चा की। यह भी बताया गया कि राज्य कोई ऐसा डॉक्यूमेंट नहीं दे पाया, जिससे पता चले कि वह खंभा दीपाथॉन नहीं है।

यह ध्यान देने वाली बात है कि इस मामले को लेकर विपक्षी नेताओं ने पार्लियामेंट से वॉकआउट भी किया। विदुथलाई चिरुथैगल काची के फाउंडर-प्रेसिडेंट थोल. थिरुमावलवन ने तो थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर दीया जलाने की कोशिश कर रहे हिंदू भक्तों को ‘आतंकवादी’ तक कह डाला। यहाँ तक कि जस्टिस स्वामीनाथन को पद से हटाने की माँग की।

मद्रास HC ने हिंदू अधिकारों को दबाने की राज्य सरकार की कोशिश को एक बड़ा झटका दिया है और एक मिसाल कायम की है। भले ही राज्य की मशीनरी बेशर्मी से हिंदू अधिकारों को दबाने और उनके धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन करने की कोशिश कर रही हो। फैसले में कहा गया कि कानून और व्यवस्था बनाए रखना राज्य की जिम्मेदारी है, न कि सांप्रदायिक सद्भाव के बहाने हिंदू भक्तों को उनके विश्वासों और प्रथाओं को मानने से रोकना।

इसने सांप्रदायिक सद्भाव की गलत व्याख्या की भी निंदा की गई है, जो सिर्फ हिंदुओं की धार्मिक आजादी पर हमला करके हासिल की जाती है। सबसे महत्वपूर्ण बात, कोर्ट ने राज्य सरकार के गलत इरादों को सामने लाया है, जिसका मकसद मुसलमानों को खुश करने के लिए हिंदू समुदाय के अधिकारों को रोकना था।

(ये लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

अंबेडकर मंदिर के खिलाफ नहीं थे: सोमनाथ मंदिर से जुड़ा उनका पत्र बताता है असली इतिहास, लेखक अनुज धर ने शेयर किया दस्तावेज

गुजरात में समंदर के किनारे भारत का गौरव बनकर शान से खड़े सोमनाथ मंदिर पर महमूद गजनवी के आक्रमण को 1000 साल हो गए हैं। 8 जनवरी से गुजरात में सोमनाथ स्वाभिमान पर्व भी मनाया जाना है। इस बीच मंदिर से जुड़े पुराने किस्से लगातार चर्चा में हैं। सोशल मीडिया पर डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का मंदिर से जुड़ा एक पत्र वायरल हो रहा है जो उन्होंने कन्हैयालाल माणिकलाल (केएम) मुंशी को लिखा था।

सरदार पटेल ने नवंबर 1947 में जनता से वादा किया था कि वह सोमनाथ मंदिर का पुनर्निमाण करवाएँगे दिसंबर 1950 में उनके निधन के बाद तत्कालीन खाद्य मंत्री मुंशी ने यह जिम्मेदारी अपने कंधे पर ले थी। वह मंदिर के पुनर्निमाण की देख रेख कर रहे थे। मई 1951 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा नए मंदिर में ज्योतिर्लिंग की प्राण-प्रतिष्ठा की जानी थी उससे पहले मार्च 1951 में मुंशी को अंबेडकर ने पत्र लिखा था।

देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस मंदिर के पुनर्निमाण से विचलित थे यह तथ्य किसी से छिपा नहीं हैं। नेहरू ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के प्रस्ताव का ‘हिंदू पुनरुत्थानवाद‘ कहकर विरोध भी किया था। वहीं, अंबेडकर के पत्र से यह स्पष्ट होता है कि वह इस मंदिर के पुनर्निर्माण के ना केवल समर्थक थे बल्कि उसमें अपने सुझाव भी दे रहे थे।

अंबेडकर ने पत्र में क्या लिखा है?

एक वर्ग द्वारा अंबेडकर की यह छवि बनाई गई है कि हिंदू विरोधी थे लेकिन यह पत्र अंबेडकर की छवि को लेकर एक नई दृष्टि भी देता है। Conundrum और Your Prime Minister is Dead जैसी चर्चित किताबों के लेखक अनुज धर ने ‘X’ पर यह पत्र शेयर किया है।

27 मार्च 1951 के इस पत्र में अंबेडकर मुंशी को लिखते हैं, “मुझे यह जानकारी मिली है कि सोमनाथ में मूर्ति की स्थापना की तिथि 11 मई तय की गई है। मैं चाहता हूँ कि इस अवसर पर मेरे मित्र अनिरुद्धाचार्य जी को समारोह में आमंत्रित किया जाए। वे बड़ौदा जिले के चंदोदा स्थित मठ के प्रमुख हैं। मैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ और मुझे पूरा विश्वास है कि वे इस निमंत्रण के पूर्णतः योग्य हैं।”

GROK ने लेटर को बताया AI जेनरेटेड, जानें क्या है सच?

अनुज धर के पोस्ट शेयर करने के बाद कई X यूजर्स इस पत्र को नकली और AI द्वारा बनाया गया बताने लगे। कई यूजर्स ने मस्क की कंपनी xAI के चैटबॉट GROK को टैग कर इस लैटर को लेकर सवाल पूछे तो चैटबॉट ने इसे AI द्वारा बनाया गया पत्र बता दिया।

चैटबॉट ने X पोस्ट में लिखा, “यह पत्र अंबेडकर की आधिकारिक लेखों या ऐतिहासिक अभिलेखागारों में नहीं मिलता है। 2026 से पहले की खोजों में इसका कोई ज़िक्र नहीं मिला। ‘Antrudhachary’ नाम का 1951 के ऐतिहासिक रिकॉर्ड से कोई मेल नहीं खाता। ऐसा लगता है कि यह मनगढ़ंत है, हो सकता है कि AI द्वारा बनाया गया हो।”

इसके बाद तो इसे AI द्वारा बनाया गया बताने वालों की बाढ़ सी ही आ गई। हमने खुद अनुज धर से इस पत्र को लेकर बात की। उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा, “इन सभी रिकॉर्ड्स का सोर्स नेशनल आर्काइव्स है। जो कोई भी इन्हें नकली समझता है, उसे आर्काइव्स में केएम मुंशी के पेपर्स देखने चाहिए।” साथ ही, उन्होंने इस पत्र से जुड़े और पत्र भी साझा किए हैं।

यानी AI चैटबॉट के भरोसे जो लोग आर्काइव्स पढ़ने या उससे समझने की कोशिश करते हैं और मानते हैं कि AI है तो सब जानता है होगा, उनके लिए यह समझना भी जरूरी है कि AI शब्द नहीं जानता है। AI पर पूरी तरह भरोसा करना समस्या है।

चैटबॉट आर्काइव्स को इसलिए नहीं पढ़ पाता क्योंकि ऐतिहासिक अभिलेखों का बहुत बड़ा हिस्सा आज भी डिजिटल रूप में मौजूद ही नहीं है। भारत ही नहीं, दुनिया भर के आर्काइव्स में करोड़ों दस्तावेज कागज पर तो सुरक्षित हैं कि पुराने सरकारी फाइलें, निजी पत्र, हस्तलिखित डायरी, रिपोर्टें और रजिस्टर। ये दस्तावेज अक्सर न तो स्कैन किए गए हैं और न ही ऑनलाइन उपलब्ध हैं। चैटबॉट केवल उसी सामग्री तक पहुँच सकता है जो पहले से डिजिटल और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हो।

इसमें भी कई तरह की दिक्कतें हैं, जो आर्काइव्स डिजिटाइज किए भी गए हैं, वे अधिकतर स्कैन की गई तस्वीरों के रूप में होते हैं, न कि साफ-सुथरे टेक्स्ट फाइल की तरह। इनमें स्याही के धब्बे, फटे पन्ने, धुंधले अक्षर और पुरानी लिपियाँ होती हैं। ऐसी सामग्री को पढ़ने के लिए सिर्फ भाषा ज्ञान का नहीं बल्कि पैलियोग्राफी और ऐतिहासिक दस्तावेज पढ़ने का अभ्यास चाहिए जो चैटबॉट के लिए संभव नहीं है।

इस लेटर से जुड़े अन्य पत्र

अनुज धर ने अंबेडकर के इस पत्र से जुड़े दो अन्य पत्र भी साझा किए हैं जिनमें एक अंबेडकर को मुंशी का जवाब और दूसरे में स्वामी अनिरुद्धाचार्य को निमंत्रण है। 30 मार्च 1951 को मुंशी ने डॉक्टर अंबेडकर को लिखा, “27 मार्च के आपके पत्र के लिए धन्यवाद। मुझे अनिरुद्धाचार्य को समारोह के लिए आमंत्रित करके बहुत खुशी होगी। मैं आपसे यह भी अनुरोध करूँगा कि आप भी प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में शामिल हों।”

अंबेडकर को मुंशी का पत्र (साभार: अनुज धर)

30 मार्च 1951 को ही मुंशी ने स्वामी अनिरुद्धाचार्य को निमंत्रण देते हुए पत्र लिखा था। मुंशी ने लिखा, “आपको यह जानकारी होगी कि सोमनाथ लिंग की स्थापना 11 मई 1951 को प्रभास पाटन में तय की गई है। इसी दौरान अखिल भारतीय संस्कृत परिषद का आयोजन भी किया जाएगा। हम इस अवसर पर देश के सभी धार्मिक संस्थानों के प्रमुखों को आमंत्रित कर रहे हैं। हमें बहुत खुशी होगी यदि आप अपनी सुविधा के अनुसार इस पावन अवसर पर उपस्थित होकर कार्यक्रम की शोभा बढ़ाएँ। आप चाहें तो कार्यक्रम से दो दिन पहले भी पधार सकते हैं।”

स्वामी अनिरुद्धाचार्य को मुंशी का पत्र (फोटो साभार: अनुज धर)

अंबेडकर के पत्र के अलावा इन दोनों को पढ़ने के बाद अनुज धर का यह दावा पुख्ता हो जाता है कि यह पत्र कोई इकलौता पत्र नहीं है जो AI से बना लिया गया है बल्कि पत्रों की एक पूरी सीरीज है। इससे उन लोगों की भी पोल खुल जाती है जो अंबेडकर को हिंदुओं को खिलाफ खड़ा करने पर तुले रहते हैं।

‘डेमोक्रेसी’ के नाम पर गिराई सरकारें, तानाशाहों को किया मजबूत: जानिए कैसे दुनियाभर में दोगलापन करता है अमेरिका

शनिवार (3 जनवरी) की सुबह, काराकास की नींद रात के आसमान में फाइटर जेट्स के उड़ने की आवाज़ से खुली। सुबह तक यह साफ हो चुका था कि वेनेज़ुएला एक जाने-पहचाने अमेरिकी ड्रामे का नया मंच बन चुका है। यहाँ अमेरिकी सेना की टुकड़ी को ‘डेमोक्रेसी वापस लाने’ के एक मिशन पर लगाया गया था।

US के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कन्फर्म किया कि अमेरिकी सेना ने वेनेज़ुएला में कई हमले किए हैं और प्रेसिडेंट निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को पकड़कर यूनाइटेड स्टेट्स ले गए हैं। ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर ऑपरेशन की घोषणा की, और इसे ‘नारकोटिक टेररिज्म’ कहे जाने वाले सिस्टम के खिलाफ अभियान बताया।

(साभार- ट्रंप/ ट्रूथ सोशल)

इसके तुरंत बाद, US अटॉर्नी जनरल पामेला बोंडी ने बताया कि मादुरो और फ्लोरेस पर न्यूयॉर्क में नार्को-टेररिज्म की साजिश में शामिल होने से लेकर लोकतंत्र को खत्म करने जैसे आरोप लगाए गए थे।

ट्रंप ने मादुरो सरकार पर प्रवासियों को US के दक्षिणी बॉर्डर की ओर धकेलने, जेलों और मेंटल इंस्टीट्यूशन को खाली करने और ड्रग कार्टेल और आतंकवादी ग्रुप्स के साथ मिलकर काम करने का आरोप लगाया। ट्रंप के मुताबिक, वेनेजुएला अमेरिका में कोकेन लाने का एक बड़ा रास्ता बन गया है, जहाँ कैरिबियन और पैसिफिक के रास्ते नशीले पदार्थों की तस्करी होती है।

यह वजह जानी-पहचानी लग रही थी क्योंकि पहले भी अमेरिका ऐसे आरोप लगाकर कई देशों के साथ ऐसा व्यवहार कर चुका है। कई सालों से अमेरिका अपने विरोधी देशों और उनकी सरकारों पर मानवाधिकार उल्लंघन करने, लोगों पर जुल्म करने और दुनिया की सुरक्षा के लिए खतरा बताता रहा है।

वेनेज़ुएला के मामले में सितंबर 2025 में ट्रंप प्रशासन ने कई नावों पर हमला किया था और उसमें ड्रग्स होने की बात कही थी। यह एक संकेत था, जो अमेरिका ने दुनिया को दिया था।

हालाँकि मादुरो ने हमेशा ऐसे आरोपों से इनकार किया और उन्हें वेनेजुएला के बड़े तेल भंडार को कंट्रोल के लिए एक कवर बताया। हमलों से कुछ दिन पहले मादुरो ने प्रवासियों और ड्रग ट्रैफिकिंग पर US के साथ सहयोग की पेशकश की थी। लेकिन अमेरिका ने मादुरो के सामने देश छोड़ने की शर्त रख दी थी। इससे मादुरो उखड़ गए। इस पर अमेरिका ने मादुरो पर ‘गंभीर’ नहीं होने का आरोप लगाया।

इसका खामियाजा वेनेजुएला को उठाना पड़ा। अमेरिकी जेट बिना कॉन्ग्रेस की मंजूरी के उड़ गई। इसपर अमेरिका में भी सवाल किए जा रहे हैं। यूएन को बताना तो दूर की बात है।

वेनेज़ुएला में जो हुआ वह एक ऐसे पैटर्न से मेल खाता है, जिसे दुनिया ने पहले भी कई बार देखा है। डेमोक्रेसी, सिक्योरिटी और नैतिक जिम्मेदारी में लिपटा हुआ एक शासन बदलने का ऑपरेशन।

डेमोक्रेसी बहाल करने के नाम पर शासन बदलना

वेनेज़ुएला में US का दखल यूँ ही नहीं हुआ। यह दुनिया भर में अमेरिका की लीडरशिप में हुए तख्तापलट का एक और उदाहरण है। वियतनाम से लेकर इराक तक, अफगानिस्तान से लेकर सीरिया तक अमेरिका ने बार-बार मिलिट्री एक्शन को ‘खराब राज’ हटाने और उनकी जगह ‘डेमोक्रेटिक सिस्टम’ लाने के तौर पर इस्तेमाल किया। इसकी वजह से दुनिया में अस्थिरता का दौर आया और व्यापक हिंसा हुई।

2001 के आखिर में US के समर्थन वाली सेना काबुल में घुसी और कुछ ही हफ्तों में तालिबान सरकार को गिरा दिया। हामिद करजई को अमेरिकी समर्थन मिला और उन्हें अफगानिस्तान का लीडर बनाया गया। उस वक्त तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने सेंट्रल एशिया में डेमोक्रेसी की जड़ें जमने की बात कही। दो दशक बाद, US सैनिक वापस चले गए और तालिबान लगभग रातों-रात सत्ता में वापस आ गया। अमेरिका की बनाई सरकार गिर गई। इससे पता चलता है कि वह हमेशा से कितनी खोखली और परजीवी थी।

इराक ने भी ऐसा ही रास्ता अपनाया गया। 2003 में US सैनिकों ने सद्दाम हुसैन को सत्ता से बाहर कर दिया। इराक को मिडिल ईस्ट में लोकतंत्र का अगुआ करार दिया। लेकिन इराक के सिक्योरिटी सिस्टम को खत्म करने से लाखों हथियारबंद लोग बेरोजगार हो गए। देश बगावत, सांप्रदायिक हिंसा और सिविल वॉर में डूब गया। ईरान के सपोर्ट वाले मिलिशिया का असर बढ़ा, और इस अफ़रा-तफ़री से आखिरकार इस्लामिक स्टेट बना, जिसने इलाके के सिक्योरिटी माहौल को इस तरह से बदल दिया जो आज भी उसे परेशान करता है।

सीरिया, लीबिया और पहले वियतनाम एक ही कहानी के अलग-अलग रूप हैं। US नैतिकता की दुहाई देते हुए मौजूदा सरकार को सत्ता से बाहर करता है। सिस्टम खत्म कर देता है और टूटे-फूटे समाज को पीछे छोड़ जाता है। जानकार इस पैटर्न को विदेशियों द्वारा थोपा गया शासन परिवर्तन कहते हैं।

पिछले 120 सालों में यूनाइटेड स्टेट्स ने करीब 35 देशों के नेताओं को सत्ता से जबरदस्ती बाहर किया है। ये आंकड़ा पूरी दुनिया में हुए ऐसे सभी दखलदांजी का लगभग एक-तिहाई है। चिंता की बात यह है कि इनमें से लगभग एक-तिहाई देशों में शासन परिवर्तनों के बाद एक दशक के अंदर सिविल वॉर हुआ।

यहाँ तक ​​कि ट्रंप, जिन्होंने अमेरिका में अपनी राजनीति ही दुनिया के युद्ध बंद करने के नाम पर शुरू की, वे भी इस परंपरा से बाहर नहीं निकल पा रहे। हालाँकि उन्होंने बार-बार इराक हमले की निंदा की है और नियोकंज़र्वेटिव विदेश नीति की आलोचना की है, उनका वेनेजुएला दखल उनके ‘शांतिदूत’ होने के अपने दावों से मेल नहीं खाता।

बांग्लादेश: बिना बम के US ने बदली सरकार

जहाँ वेनेज़ुएला में फाइटर जेट और मिसाइलें देखी गईं, वहीं बांग्लादेश में अमेरिकी दखल अलग तरीके से हुआ। बांग्लादेश में सैनिक नहीं भेजे गए, बल्कि पॉलिटिकल प्रेशर, इंटेलिजेंस नेटवर्क और सड़क पर विरोध प्रदर्शनों के जरिए लोकतांत्रिक सरकार को हटाया गया।

एक किताब, इंशाअल्लाह बांग्लादेश: द स्टोरी ऑफ़ एन अनफिनिश्ड रेवोल्यूशन के मुताबिक, शेख हसीना के पूर्व होम मिनिस्टर असदुज्जमां खान कमाल ने CIA पर उन्हें सत्ता से हटाने की साज़िश रचने का आरोप लगाया है। उन्होंने इन घटनाओं को ‘CIA की एक परफेक्ट साज़िश’ बताया।

(फोटो- Hindu e shop)

कमाल ने दावा किया कि देश के आर्मी चीफ जनरल वाकर-उज़-ज़मान इस साज़िश के सेंटर में थे। हैरानी की बात यह है कि उन्होंने कहा कि बांग्लादेश की टॉप इंटेलिजेंस एजेंसियों ने भी हसीना को चेतावनी नहीं दी, जिससे लगता है कि सीनियर अधिकारियों की मिलीभगत रही होगी। कमाल के मुताबिक, वाकर ने आर्मी चीफ का पद संभालने के कुछ ही हफ़्तों बाद 5 अगस्त, 2024 को हसीना को देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया, यह एक ऐसा पद था जिस पर हसीना ने खुद उन्हें अपॉइंट किया था।

हसीना के गिरने से पहले हुए विरोध प्रदर्शनों को इंटरनेशनल लेवल पर तथाकथित जेन जी लीड और डेमोक्रेटिक बताया गया, लेकिन कमाल ने कहा कि जमात-ए-इस्लामी जैसे कट्टर इस्लामी ग्रुप, जो पहले से बँटे हुए थे, पहली बार विदेशी इंटेलिजेंस नेटवर्क के सपोर्ट से एक हो गए। उन्होंने आगे दावा किया कि पाकिस्तान की ISI ने इसमें अहम भूमिका निभाई। इस दौरान विदेश में ट्रेंड आतंकवादी प्रदर्शनकारियों के साथ मिल गए और पुलिस पर हमला किया।

कमाल ने तर्क दिया कि इसका मोटिवेशन स्ट्रेटेजिक था। उन्होंने कहा कि अमेरिका एक ही समय में साउथ एशिया में बहुत सारे मजबूत लीडर नहीं चाहता। भारत में नरेंद्र मोदी और चीन में शी जिनपिंग के होने से, हसीना का इंडिपेंडेंट रुख उनके लिए असुविधाजनक हो गया। एक और मुख्य वजह बंगाल की खाड़ी में सेंट मार्टिन आइलैंड था, जो अमेरिका चाहता था। हिन्द महासागर में जियोपॉलिटिक्स के लिए ये बहुत जरूरी है।

हसीना ने खुद सार्वजनिक तौर पर कहा था कि US ने उन पर सत्ता में बने रहने के बदले आइलैंड का एक्सेस माँगा था। उन्होंने इसे बांग्लादेश की संप्रभुता का उल्लंघन बताते हुए मना कर दिया। शेख हसीना को हटाए जाने के बाद इकॉनमिस्ट मुहम्मद यूनुस को सत्ता की जिम्मेदारी सौंपी गई, जो अमेरिका के करीबी थे।

तानाशाह के दोस्त, लोकतंत्र के दुश्मन

अमेरिका ने ‘डेमोक्रेसी’ के नाम पर कई देशों और उसके राष्ट्राध्यक्षों को बर्बाद किया। वहीं दूसरी ओर तानाशाही सरकारों के साथ उसके करीबी रिश्ते रहे, बशर्ते वे US के लिए फायदेमंद हों। सऊदी अरब इसका सबसे अच्छा उदाहरण है।

सऊदी में कोई चुनाव नहीं होता, कोई पॉलिटिकल पार्टी नहीं है और कोई राजनीतिक आजादी नहीं है। फिर भी अमेरिका उसे एक अहम साथी मानता है।

हाल ही में, US ने सऊदी अरब को $1.4 बिलियन की सैन्य साजोसामान की बिक्री को मंज़ूरी दी। इसमें उसकी आर्मी को ट्रेनिंग देने के लिए करोड़ों डॉलर शामिल हैं। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के व्हाइट हाउस दौरे के नतीजे में F-35 फाइटर जेट की बिक्री और एक स्ट्रेटेजिक डिफेंस एग्रीमेंट को मंजूरी मिली। इस व्यापार से US और सऊदी अरब के रिश्ते और ‘मधुर’ हुए।

यह वही सऊदी लीडरशिप है, जिसे मानवाधिकार के उल्लंघन, यमन में युद्ध और पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या पर दुनिया भर में गुस्से का सामना करना पड़ा है। फिर भी, ऐसा नहीं लगता कि इनमें से कोई भी बात रियाद को अमेरिकी सपोर्ट के लिए अयोग्य ठहराती है।

सऊदी अरब के अलावा, US के मिडिल ईस्ट, अफ्रीका और एशिया में दूसरे तानाशाही देशों के साथ मजबूत रिश्ते हैं। मिस्र, जहाँ मिलिट्री तख्तापलट के बाद प्रेसिडेंट अब्देल फत्ताह अल-सिसी का राज है, को US से अरबों की मिलिट्री मदद मिलती है।

यूनाइटेड अरब अमीरात, जहाँ पूरी तरह से राजशाही है, US का एक और करीबी पार्टनर है। इन रिश्तों को शायद ही कभी डेमोक्रेसी के लिए समस्या के तौर पर देखा जाता है। इसके बजाय, उन्हें ‘स्टेबिलिटी’, ‘सिक्योरिटी,’ और ‘रीजनल बैलेंस’ के तौर पर देखा जाता है।

जब ये सरकारें विरोध को दबाती हैं या विरोधियों को जेल में डालती हैं, तब भी अमेरिका चुप रहता है।

अमेरिका का दोगलापन

वेनेजुएला, अफगानिस्तान, इराक, बांग्लादेश के साथ और तानाशाही सरकारों के साथ अमेरिका के रिश्ते, उसके दोहरे चरित्र को उजागर करते हैं। डेमोक्रेसी का इस्तेमाल चुनिंदा तरीके से किया जाता है, दुश्मनों के खिलाफ हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है और दोस्तों के साथ डील करते समय नजरअंदाज कर दिया जाता है।

जो सरकारें US के असर का विरोध करती हैं, उन्हें क्रिमिनल, गैर-कानूनी या खतरनाक करार दिया जाता है। जो लोग बात मानते हैं, भले ही वे बिना चुनाव के राज करें या तानाशाही रवैया अपनाएँ, उन्हें ‘इनाम’ दिया जाता है।

इस पैटर्न को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है। सरकार बदलना डेमोक्रेसी के बारे में नहीं है, यह कंट्रोल के बारे में है। यह तेल, मिलिट्री बेस, शिपिंग रूट और जियोपॉलिटिकल फायदे के बारे में है। लैटिन अमेरिका से लेकर साउथ एशिया तक, यूनाइटेड स्टेट्स ने बार-बार दिखाया है कि उसका कमिटमेंट डेमोक्रेटिक वैल्यूज़ के लिए नहीं, बल्कि स्ट्रेटेजिक फायदे के लिए है।

(मूलरूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों का साजिशकर्ता अब्बा के लिए ‘इंटरनेशनल हीरो’, मजहबी ‘पत्रकार’ के लिए भगत सिंह: प्रोपेगेंडा फैलाते-फैलाते आरफा खानम के रोंगटे हुए खड़े

“जब इस दौर का इतिहास लिखा जाएगा, नाइंसाफी की दास्तान लिखी जाएगी तो उमर खालिद का नाम सबसे ऊपर होगा। क्योंकि वे पिछले 10 से 15 साल में मोदी सरकार की भगवा राजनीति का शिकार हुए हैं।”

तो कुछ इस तरीके से आरफा खानुम शेरवानी अपने नए यूट्यूब वीडियो में दिल्ली दंगा 2020 के साजिशकर्ता उमर खालिद का परिचय देती हैं। नए वीडियो में आरफा ने प्रतिबंधित संगठन SIMI से जुड़े उमर खालिद के अब्बा एस कासिल रसूल इलियास का साक्षात्कार लिया है। खालिद के अब्बा से बातचीत में आरफा ने अपने ‘प्रिय’ जोहरान को भी याद किया, और उमर खालिद की तुलना स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह से भी की। यह साक्षात्कार कुछ और नहीं, बल्कि उमर खालिद को ‘स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ने वाले क्रांतिकारी का तबका’ देने का पूरा प्रयास है, जिससे एक और भारत-विरोधी उमर खालिद का जन्म हो।

पूरे इंटरव्यू में काफी अटपटी बातें कही गई हैं। जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उमर खालिद के नाम को बढ़ावा मिलने पर खुशी जताई गई है, तो वहीं बाहरी देशों में पीएम मोदी की छवि को बेकार बताया गया है। न्यूयॉर्क के नवनिर्वाचित मेयर जोहरान ममदानी की उमर खालिद को लिखी उस चिट्ठी की बारे में भी बात की गई। उमर खालिद को लेकर भारत की मोदी सरकार और न्यायपालिका को भी घेरे में रखा गया। कुल मिलाकर आरफा और उमर खालिद के अब्बा के बीच उस राजनीति और विजन की बात हुई, जिसे जेल में बैठे उमर खालिद ने साल 2020 में सुलगाने की कोशिश की थी।

जोहरान ममदानी से मुलाकात की बात छिपाई

हाल ही में उमर खालिद के अब्बा इलियास ने खुलासा किया था कि उन्होंने न्यूयॉर्क में नवनिर्वाचित मेयर जोहरान ममदानी से दिसंबर 2025 में मुलाकात की थी। आरफा के साथ इंटरव्यू में भी उन्होंने यह बात दोहराई और जोहरान की उमर खालिद के नाम चिट्ठी पर भी बात की।

इलियास कहते हैं कि उन्होंने जोहरान ममदानी से मुलाकात की बात को छिपाकर रखा, क्योंकि वह ‘मुनासिब’ समझते थे कि जोहरान के शपथ लेते ही इस बात को दुनिया के सामने लाया जाए। यहाँ अब्बा ने पूरी रणनीति के साथ जोहरान की उमर खालिद के नाम चिट्ठी को दुनिया के सामने पेश किया है।

वह जानते थे कि यह बात जोहरान के चुनाव जीतने के बाद सामने आनी ही बेहतर है, क्योंकि तब वह ‘रौला’ दिखा सकते थे कि विदेश तक से उमर खालिद को समर्थन मिल रहा है। वह भी उस व्यक्ति से जो भारत के इस्लामी कट्टरपंथी और लेफ्ट-लिबरल के बीच खूब चर्चित है। इसीलिए पूरी बातचीत में बार-बार जोर देकर कह रहे हैं कि देखो उमर खालिद को जोहरान जैसे ‘महान व्यक्ति’ का समर्थन मिल रहा है, और वह ऐसे व्यक्ति से भारतीय राजनेताओं को सबक लेने की सीख भी देते हैं।

आरफा खानुम और जोहरान ममदानी की जबरदस्ती वाली दोस्ती

यहाँ जोहरान के ‘अनपेड कैंपियन’ का हिस्सा आरफा खानुम भी हमेशा की तरह जोहरान का राग अलापते हुए कहती हैं कि उमर खालिद को जोहरान ममदानी ने खत इसीलिए लिखा, क्योंकि वे दुनियाभर में नाइंसाफी की परवाह करते हैं।

आरफा यहाँ बिल्कुल सही है। दुनियाभर की परवाह तो करते हैं जोहरान ममदानी। बिल्कुल उसी तरह जिस तरह आरफा करती हैं। मुस्लिमों की हिंसा पर चुप्पी और हिंदुओं से जुड़े मामूली सी बात पर खूब बवाल। इसीलिए तो आरफा की तरह ही जोहरान को एक भारत-विरोधी और मोदी-विरोधी उमर खालिद की परवाह हैं, लेकिन बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार पर बोलना वह मुनासिब नहीं समझते।

असल में जोहरान और आरफा दुनिया के सामने एक मनगढ़ंत कहानी पेश करते हुए जबरदस्ती दोस्त बने बैठे हैं। क्योंकि एक ने मोदी-विरोधी छवि बनाकर न्यूयॉर्क में इस्लामी कट्टरपंथियों के वोट हासिल किए और दूसरी यहाँ भारत में बैठकर इस्लामी कट्टरपंथियों और आतंकवादियों की छवि सुधारती है। बदले में जोहरान मेयर तो बना, लेकिन आरफा तो अब भी आए दिन न्यूयॉर्क में तस्वीरें खिंचवाती है और वहाँ की नागरिकता मिलने का इंतजार करती है।

पीएम मोदी की छवि खराब, बेटा उमर विदेशों में ‘हीरो’

इंटरव्यू के दौरान आरफा खानुम सवाल करती हैं कि यह जानने के बाद भी कि जोहरान ‘एंटी-मोदी’ हैं और वे पीएम मोदी को ‘वॉर क्रिमिनल’ तक कह चुके हैं। तो ऐसे व्यक्ति से मिलने का क्या कारण था? तो खालिद के अब्बा का जवाब आता है, “मोदी को प्रधानमंत्री बनने से पहले अमेरिका का वीजा तक नहीं मिला था, बाहर के देशों में मोदी के बारे में अच्छी राय तो पाई नहीं जाती है।”

उधर, अपने बेटे को अंतरराष्ट्रीय स्तर का ‘हीरो’ बताने में अब्बा ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। उनके लिए देश का प्रधानमंत्री, जिसकी अमेरिका और रूस जैसे ताकतवर देशों से दोस्ती है वह मायने नहीं रखता। लेकिन एक भारत-विरोधी होने के नाते बेटे को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलना उनके लिए उपलब्धि हो जाती है। वह ऐसे कुछ किस्से भी सुनाते हैं, जिससे दर्शक उमर खालिद को अंतरराष्ट्रीय ‘हीरो’ मानने लगें।

एक किस्सा सुनाते हुए इलियास कहते हैं कि एक बार उनकी बीवी इंग्लैंड गई थी, उस दौरान बीवी ने जब टैक्सी ड्राइवर को बताया कि वह उमर खालिद की ‘मदर’ हैं, तो वह टैक्सी ड्राइवर तुरंत उमर को पहचान गया और कहने लगा- वही JNU वाला लड़का। लेकिन इलियास के इन किस्सों में एक बात अधूरी है कि उमर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोग पहचानते किस भाव से हैं? जिस छात्र पर देश-विरोधी धाराएँ लगी हो, उसे लोग अच्छी छवि के कारण तो पहचानते नहीं होंगे। ऐसे तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विजय मालया को भी लोग जानते हैं, लेकिन है तो वह ‘भगौड़ा’ ही न।

तो गुजारिश यह है कि उमर खालिद के अब्बा लोगो को न समझाए कि पीएम मोदी की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कैसी छवि है, क्योंकि यह पूरी दुनिया जानती है कि वह विश्व के ताकतवर नेताओं में गिने जाते हैं। यहाँ आपको स्पष्ट करने की जरूरत है कि उमर खालिद को किस छवि से विदेशों में जाना जाता है, बेशक है तो वह भारत-विरोधी तत्व ही।

आरफा के खुशी के आँसू और उमर के अब्बा की फेंकू बातें

पूरे इंटरव्यू में उमर खालिद के अब्बा इलियास लंबी-लंबी फेंकू बातें करते हैं। और उधर आरफा इन बातों को सुनकर खुशी के आँसू टपकाने ही वाली होती हैं। दोनों ने उमर को क्रांतिकारी साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। आरफा खानुम को उमर खालिद की आजादी वाली स्पीच को एक स्वतंत्रता आंदोलनकारी के नजरिए से देखती हैं। उधर, अब्बा कहते हैं कि कभी बेटे को रोकने की कोशिश नहीं की।

यहाँ तक कि आरफा खानुम ने उमर की तुलना स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह से तक कर दी। उमर खालिद को वे युवाओं का प्रेरणास्रोत बताते हैं। अगर उमर खालिद जैसा प्रेरणास्रोत युवाओं को मिल गया, तो शायद हर कॉलेज और यूनिवर्सिटी में टुकड़े-टुकड़े गैंग बन जाएगा। जैसे JNU में आए दिन जान से मारने की धमकी वाले सरकार-विरोधी नारे लगते हैं, ऐसा ही पूरे देश में दहशत फैलेगी। तब भी ये लोग सारा इल्जाम सरकार पर ही लगाएँगे कि सरकार ने समय पर युवाओं को क्यों नहीं रोका?

तिहाड़ जेल में बैठकर VIP ट्रीटमेंट ले रहे उमर खालिद के संघर्ष की गाथा तो उनके अब्बा इलियास ने आरफा खानुम के साथ इंटरव्यू में सुना दी। लेकिन कितने लोग इस पर यकीन करेंगे, यह एक बड़ा सवाल है। भारत-विरोधी नारे लगाने वाला उमर खालिद जब क्रांतिकारी और आजादी के लिए लड़ने वाला युवा बनकर पेश किया जाता है, तो कितने लोग चाहेंगे कि वह एक जेल में बैठे युवा से प्रेरणा लें। तो Gen Z को भी समझने की जरूरत है कि उमर खालिद को क्रांतिकारी दर्शाने वाला यह इंटरव्यू मात्र एक प्रोपेगेंडा है। वह चाहते हैं कि एक और उमर खालिद पैदा हो, जो भारत कि खिलाफ आवाज बने लेकिन यह नहीं बताते कि उस आवाज में सुर भारत-विरोधी नहीं, बल्कि भगत सिंह की तरह राष्ट्रहित में होने चाहिए।

तो आरफा खानुम को यह जानने की जरूरत है कि इस दौर का इतिहास जब लिखा जाएगा तो उमर खालिद का नाम नाइंसाफी की दास्तान में नहीं, बल्कि भारत-विरोधी तत्वों में सबसे ऊपर होगा। ये लोग देश का खाते हैं और उसी से छल करते हैं। उमर खालिद इसी तरह के तत्व हैं और पत्रकारिता का चोला पहनकर ऐसे लोगों का महिमामंडन करने वाली आरफा खानम भी इनसे कम नहीं हैं।