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सपा के गुंडाराज में डर से नहीं आती थी इंडस्ट्रियाँ, CM योगी के राज में UP बना पसंदीदा: 16 महीनों में तैयार हुआ अशोक लेलैंड का EV प्लांट

उत्तर प्रदेश के लखनऊ के सरोजिनी नगर में जहाँ कभी पहले लैंब्रेटा बनाने वाला स्कूटर इंडिया की फैक्टरी हुआ करती थी, वहाँ अब लोगों को उनके गंतव्य तक पहुँचाने वाले इलेक्ट्रिक व्हीकल बसें बनाई जा रही हैं। यह कर रहा है- अशोक लेलैंड। 9 जनवरी 2026 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अशोक लेलैंड के स्मार्ट इलेक्ट्रिक बसों के प्लांट का उद्घाटन करने वाले हैं।

अशोक लेलैंड का यह प्लांट महज 16 महीनों में ही बनकर तैयार हो गया है और यह अपने आप में ही एक उपलब्धि है। अशोक लीलैंड के लखनऊ के ईवी प्लांट के बारे में हिंदूजा ग्रुप के कॉरपोरेट और सेल्स के अध्यक्ष एस के चढ्ढा बताते हैं कि आमतौर पर इस तरह के प्लांट को बनाने में 38 से 40 महीने लग जाते हैं लेकिन इसे 16 महीना में पूरा करने का पूरा श्रेय सीएम योगी की सरकार की सहायता और उनके दृढ़ निश्चय को जाता है।

लगभग 2 साल पहले हमने उत्तर प्रदेश में इस प्लांट का सपना देखा था और अब वह सच हुआ है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रयासों का ही सबसे बड़ा योगदान रहा है।

योगी सरकार के इंडस्ट्रियल पॉलिसी के कारण ही अशोक लेलैंड ने उत्तर प्रदेश में इंडस्ट्री लगाने पर विचार किया। 2023 में योगी सरकार के साथ समझौता पत्र पर हस्ताक्षर करने के बाद अशोक लेलैंड को योगी सरकार ने सरोजिनी नगर में 70 एकड़ की जमीन आवंटित की।

यह जमीन इससे पहले स्कूटर इंडिया के पास थी। वह फैक्ट्री बंद हुई तो जमीन खाली हो गई और योगी सरकार ने 75% लैंड सब्सिडी के साथ इलेक्ट्रॉनिक व्हीकल का प्लांट लगाने के लिए यह जमीन अशोक लेलैंड को दे दी।

अशोक लेलैंड का लखनऊ स्थित प्लांट

चड्ढा बताते हैं कि कई जगहों को देखने के बाद ईवी प्लांट के लिए इस जगह को सुनिश्चित किया गया। चड्ढा कहते हैं कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की दृढ़ इच्छा शक्ति और उनकी कमिटमेंट के चलते ही हिंदूजा ग्रुप नाम अशोक लीलैंड को यहाँ पर शुरू करने को लेकर सकारात्मकता मिली।

15 सितंबर 2023 में अशोक लेलैंड का उत्तर प्रदेश सरकार के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किया गया। इसके बाद फरवरी 2024 में भूमि पूजन के साथ ही प्लांट का निर्माण शुरू हो गया। 16 महीने में इस परियोजना को पूरा कर अशोक लेलैंड ने एक नया इतिहास रचा है कि हमारे समूह के लिए यह एक ऐतिहासिक मौका है।

गुंडा राज में लगता था डर

एसके चढ्ढा बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में यह हमारा पहला प्लांट है। इससे पहले यहाँ प्लांट बनाने की बात से काफी डर लगता था। इसके पीछे असुरक्षा, निर्माण कार्य को रोकने, काम में बढ़ा डालने जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ता था।

योगी सरकार के आने के बाद यहाँ की विकास योजनाएँ, प्रयागराज का कुंभ मेला का प्रबंधन और अन्य विकास के काम को देखा और इसके बाद ही लखनऊ में प्लांट लगाने का निर्णय शुरू किया गया। इस प्लांट के पहले चरण में 2500 बसों का निर्माण किया जाएगा। इसके बाद इसकी संख्या को बढ़ाकर 5000 और फिर 10000 तक की जाएगी।

EV बस की असेंबली करते कामगार

इसके चढ्ढा बताते हैं कि इस प्लांट में महिलाओं के प्रशिक्षण के लिए स्किल डेवलपमेंट सेंटर ‘नालंदा’ तैयार किया गया है। यह सीएम योगी आदित्यनाथ का महिला सशक्तिकरण को लेकर किया गया प्रण है कि देश की बेटियों को भी प्रशिक्षण मिले और वह भविष्य की टेक्नोक्रेट बनकर सामने आएँ।

₹1000 करोड़ का होगा निवेश

अशोक लेलैंड ने लखनऊ के इस प्लांट में 1000 करोड़ रुपए का निवेश करने की योजना बनाई है। हर साल इस मैन्युफैक्चरिंग यूनिट से पहले 2500 बसें तैयार होंगी। चड्ढा का कहना है कि इस ईवी प्लांट को आगे और भी विस्तार दिया जाएगा और इससे लगभग 10,000 लोगों को रोजगार मिलने की भी संभावना जताई है।

अशोक लेलैंड के लखनऊ के प्लांट हेड शक्ति सिंह यादव ने बताया कि उत्तर प्रदेश में देश की 30% से अधिक जनसंख्या रहती है। सरकार का भी यही विजन है कि प्रदेश और देश में प्रदूषण रहित वाहनों की संख्या बढ़ाई जाए।

इसी विजन को धरातल पर लाने के लिए अशोक लेलैंड ने लखनऊ में प्लांट बनाया है जिसमें इलेक्ट्रिक व्हीकल को वरीयता दी जाएगी। इस प्लांट में ईवी वाहनों के साथ अल्टरनेट फ्यूल्स और हाइड्रोजन बेस्ड वाहनों को भी निर्मित किए जाने पर योजना बनाई गई है।

शक्ति सिंह का कहना है कि योगी सरकार की योजना में सिंगल विंडो पोर्टल में सिंगल विंडो पोर्टल प्रणाली ‘निवेश मित्रा’ बनाई है। उसे प्रदेश में काम करना काफी आसान हो गया है। इसके तहत योजना के लिए हर तरह की मंजूरी ऑनलाइन ही मिल जाती है। इस तरह का प्रावधान अन्य किसी भी राज्य में नहीं है।

इस पोर्टल की वजह से ही सरकार की अलग-अलग विभागों की मंजूरी आसानी से मिलना संभव हुई है। पहले लगभग इन 45 विभागों में लगभग 500 पत्रों की मंजूरी लेनी पड़ती थी जिसमें पहले काफी समय लगता था। निवेश मित्रा ने इसे आसान बनाया है।

प्लांट को लेकर शक्ति सिंह कहते हैं कि यह उत्तर प्रदेश के अर्थव्यवस्था में मील का पत्थर साबित होगा क्योंकि प्रदेश की कई डीजल बसों को इलेक्ट्रिक बसों में बदल जाएगा।इसके अलावा उत्तर प्रदेश में रहने वाले श्रमिकों और कामगारों को भी दक्षता के प्रति प्रशिक्षण के साथ रोजगार के अवसर मिलेंगे।

शक्ति सिंह के अनुसार 2500 बसों के निर्माण के लिए लगभग 1000 कामगार लोगों की आवश्यकता पड़ेगी। इसके अलावा सब्सिडियरी श्रमिकों और सप्लायर को भी फायदा मिलेगा।फरवरी 2024 में प्लांट लगाने के बाद इसका उद्घाटन नवंबर 2025 में ही होना था लेकिन कुछ निजी करणों के चलते अशोक लीलैंड को यह समझ जनवरी तक स्थगित करना पड़ा।

टाटा ने भी योगी सरकार में की शुरुआत

अशोक लीलैंड से पहले वर्ष 2019 में टाटा मोटर्स ने भी लखनऊ में ही इलेक्ट्रिक व्हीकल बनाने का काम शुरू किया है। इसी कड़ी में अशोक लीलैंड भी अब शामिल हो गया है। इससे उत्तर प्रदेश ईवी ट्रांसपोर्टेशन का हब भी बनने की ओर अग्रसर हो गया है, जहां से पूरे देश में स्मार्ट स्विच इलेक्ट्रिक व्हीकल जाएगी और लोगों का जीवन आसान बनाएंगी।

यह बात तो साफ है कि योगी सरकार की इंडस्ट्रियल पॉलिसी के चलते ही महज 2 वर्षों में एक ऐसे प्रोजेक्ट को फाइलों से जमीन पर उतार दिया जो न केवल आम जनमानस को सुविधा देगी पर साथ ही रोजगार सृजन का भी मौका मिलेगा।

जहाँ अखिलेश की सरकार में गुंडाराज के चलते उद्यमी उत्तर प्रदेश में आना भी जरूरी नहीं समझते थे, वहीं अशोक लेलैंड के इस प्रोजेक्ट के धरातल पर आने से अब और भी इंडस्ट्री उत्तर प्रदेश में अपनी जगह तलाश रही हैं।

सिर्फ एक तीर का निशान और 10000 km दूर अंटार्कटिका के भूगोल की सारी जानकारी: जानिए सोमनाथ मंदिर में स्थापित ‘बाण स्तंभ’ का रहस्य

भारत की पश्चिमी तटरेखा पर अरब सागर के किनारे स्थित सोमनाथ मंदिर प्राचीन हिंदू सभ्यता की गौरवशाली विरासत, अदम्य साहस और पुनर्जागरण का जीवंत प्रतीक है। भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर बारह ज्योतिर्लिंगों में प्रथम माना जाता है।

सदियों से यह केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना, वैज्ञानिक दृष्टि और सनातन परंपरा की अविचल शक्ति का साक्षी रहा है। इसी मंदिर परिसर में स्थित एक रहस्यमयी स्तंभ, बाण स्तंभ आज भी श्रद्धालुओं और इतिहासकारों के लिए जिज्ञासा का केंद्र बना हुआ है।

बाण स्तंभ: जहाँ आध्यात्म और विज्ञान का अद्भुत संगम

सोमनाथ मंदिर के दक्षिण दिशा में, समुद्र की ओर मुख किए खड़ा बाण स्तंभ प्राचीन भारत के वैज्ञानिक और भौगोलिक ज्ञान का अनोखा प्रमाण है। इस स्तंभ के शीर्ष पर एक गोलाकार संरचना है, जिसके आर-पार एक बाण (तीर) अंकित है, जो ठीक दक्षिण दिशा की ओर संकेत करता है।

‘भारत की समुद्री विरासत’ नामक पुस्तक का भाग

स्तंभ के निचले भाग पर संस्कृत में अंकित एक शिलालेख लिखा है, “आसमुद्रान्त दक्षिण ध्रुव पर्यंत अबाधित ज्योतिर्मार्ग” यानी  इस स्थान से लेकर दक्षिण ध्रुव (अंटार्कटिका) तक कोई पर्वत या अवरोधक नहीं है। यह कथन एक भौगोलिक सत्य है।

सोमनाथ तट से लेकर लगभग 10,000 किलोमीटर दूर अंटार्कटिका तक वास्तव में कोई बड़ा स्थलखंड या पर्वत नहीं आता। यह शिलालेख इस बात का प्रमाण है कि छठी शताब्दी के आसपास के भारतवासियों को पृथ्वी की दिशा, समुद्री मार्ग और भूगोल का गहरा ज्ञान था, वह भी उस युग में जब आधुनिक नेविगेशन उपकरणों का अस्तित्व नहीं था।

गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में वेरावल के समीप प्रभास पाटन में स्थित सोमनाथ मंदिर का उल्लेख शिव पुराण के 14वें अध्याय में मिलता है। यह स्थान कपिला, हिरण और पौराणिक सरस्वती नदियों के संगम के कारण त्रिवेणी संगम के नाम से भी प्रसिद्ध है।

सोमनाथ केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि सनातन धर्म की निरंतरता, विश्वास और सांस्कृतिक आत्मा का केंद्र है। समुद्र की लहरों के बीच खड़ा यह मंदिर सदियों से भारत की आध्यात्मिक चेतना का मार्गदर्शन करता आया है।

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व: 1000 वर्षों की संघर्षगाथा

जनवरी 2026 सोमनाथ मंदिर के इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ाव है। इस वर्ष आक्रांता महमूद गजनवी द्वारा वर्ष 1026 में किए गए पहले आक्रमण के 1000 वर्ष पूरे हो रहे हैं। इसके बाद मंदिर पर कई बार आक्रमण हुए, इस्लामी आक्रांताओं द्वारा इसे ध्वस्त किया गया, लेकिन हर बार सोमनाथ अपने खंडहरों पर फिर से उठ खड़ा हुआ।

आजादी के बाद भारत के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल, प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद और केएम मुंशी जैसे दूरदर्शी नेताओं के प्रयासों से मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ और 11 मई 1951 को इसे वर्तमान स्वरूप में राष्ट्र को समर्पित किया गया।

सोमनाथ की इसी हजार वर्षीय संघर्ष और पुनरुत्थान की यात्रा को स्मरण करते हुए सोमनाथ स्वाभिमान पर्व मनाया जा रहा है। 5 जनवरी 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस अवसर पर एक विस्तृत लेख साझा किया, जिसमें उन्होंने सोमनाथ को भारत की आत्मा, स्वाभिमान और सनातन परंपरा की अमर पहचान बताया।

सोमनाथ मंदिर आज भी यह संदेश देता है कि आक्रमण हो सकते हैं, संरचनाएँ गिर सकती हैं, लेकिन भारत की आस्था, संस्कृति और चेतना को कभी नष्ट नहीं किया जा सकता।

पहले तोड़े हिंदू-जैन मंदिर, तब भरूच में खड़ी हुई जामा मस्जिद: जानिए क्या बताता है इतिहास, दस्तावेजों में सब दर्ज

भरूच शहर की जामा मस्जिद एक बार फिर विवादों के घेरे में है। दो दिन पहले, अखिल भारतीय संत समिति के संतों ने आरोप लगाया कि मस्जिद ASI (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) से सुरक्षित होने के बावजूद वहाँ अवैध निर्माण किया गया है और पुरातत्व विभाग के नियमों की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं। संतों ने इन आरोपों के साथ धरना प्रदर्शन किया। आखिरकार पुलिस प्रशासन को बीच-बचाव करना पड़ा और कार्रवाई का भरोसा देते हुए दो महीने का समय माँगा। संतों ने भी पुलिस पर भरोसा जताते हुए धरना खत्म कर दिया है और अब गेंद पुलिस के पाले में है।

धरने और संतों की माँगों के बीच अब एक पुराना मुद्दा फिर से चर्चा में है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या भरूच की यह जामा मस्जिद मंदिर तोड़कर बनाई गई थी? क्या यहाँ अतीत में हिंदू और जैन मंदिर थे? इतिहास और उस दौर की किताबें इस बारे में क्या कहती हैं, आइए जानते हैं।

इसका सबसे हालिया जिक्र सीताराम गोयल की एडिट की हुई किताब ‘हिंदू टेंपल्स: व्हॉट हैपन्ड टू देम’ (Hindu Temples: What Happened to Them) में मिलता है। वैसे तो यह किताब मुख्य रूप से राम जन्मभूमि विवाद पर केंद्रित थी, लेकिन इसमें एक अलग हिस्सा उन मस्जिदों और धार्मिक ढाँचों का भी है, जिन्हें भारत में मंदिरों को नष्ट करके बनाया गया था। इस किताब में राज्य और जिले के हिसाब से ऐसी मस्जिदों की पूरी सूची दी गई है।

सीताराम गोयल की किताब की क्रमवार सूची में अगर हम गुजरात वाला हिस्सा खोलें और भरूच जिले को देखें, तो सबसे पहला नाम ‘जामा मस्जिद’ का ही आता है। इसमें उल्लेख है कि इस मस्जिद का निर्माण साल 1321 में किया गया था। साथ ही यह भी साफ लिखा गया है कि मस्जिद को बनाने में हिंदू और जैन मंदिरों की सामग्री (स्तंभ और अवशेष) का इस्तेमाल किया गया था।

इसी पुस्तक का दूसरा भाग है- ‘द इस्लामिक एविडेंस’ (The Islamic Evidence)। यहाँ भी भरूच की इस मस्जिद का जिक्र मिलता है। मुगल काल के दस्तावेजों का हवाला देते हुए लिखा गया है कि भरूच की जामा मस्जिद में हिंदू और जैन मंदिरों के खंभों का उपयोग हुआ है।

कई ऐतिहासिक दस्तावेज इस बात पर एकमत हैं कि भरूच की यह जामा मस्जिद अलाउद्दीन खिलजी के समय में बनी थी। खिलजी एक आक्रामक हमलावर था, जिसने भारत में हिंदुओं की आस्था पर चोट करते हुए कई मंदिरों को तोड़ा था। सोमनाथ मंदिर भी उन्हीं मंदिरों में से एक था।

प्रसिद्ध इतिहासकार अमीर खुसरो लिखते हैं कि साल 1300 में खिलजी ने गुजरात के मंदिरों को निशाना बनाया और इस काम के लिए उलुघ खान को गुजरात भेजा। उलुघ खान सबसे पहले सोमनाथ आया, यहाँ उसने मंदिर तोड़ा और जमकर लूटपाट की। इसके बाद वह खंभात की ओर बढ़ा। अमीर खुसरो के अनुसार, खंभात के बाद उसने तटीय इलाकों के कई शहरों में तबाही मचाई और मंदिर ध्वस्त किए। भरूच भी इन्हीं तटीय शहरों में से एक था।

1832 में UK में जन्में पुरातत्वविद (Archaeologist) जेम्स बर्गेस ने भारत में काफी काम किया। वे 1886 से 1889 तक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के महानिदेशक (DG) भी रहे। उससे पहले वे पश्चिमी भारत के पुरातत्व विभाग के निदेशक थे। उन्होंने पश्चिमी भारत के ऐसे कई ऐतिहासिक स्थलों का दौरा किया और जो कुछ देखा, उसे अपनी डायरी और किताबों में दर्ज किया।

जेम्स बर्गेस ने अपनी किताब ‘ऑन द मुहम्मडन आर्किटेक्चर ऑफ भरूच, खंभात, धोलका, चंपानेर एंड महमूदबाद इन गुजरात’ में भरूच की इस मस्जिद का विशेष उल्लेख किया है।

इस जगह का परिचय देते हुए जेम्स बर्गेस लिखते हैं कि लगभग 1297 के आसपास खिलजी के आदेश पर भरूच में हमले शुरू हुए थे। इन हमलों के दौरान हिंदू मंदिर निशाने पर थे। जैसा कि अन्य जगहों पर हुआ, भरूच में भी हिंदू और जैन मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया और उन्हीं मंदिरों की सामग्री (खंभों और पत्थरों) का उपयोग करके ‘जामा मस्जिद’ खड़ी की गई।

बर्गेस ने अपनी किताब में मस्जिद के नक्शे और तस्वीरों के साथ पूरी जानकारी दी है, जिससे यह बात और स्पष्ट होती है। निर्माण की बारीकियों बताते हुए बर्गेस कहते हैं कि मस्जिद के खंभों के बीच की दूरी एक समान नहीं है। कहीं यह दूरी 8 फीट है, कहीं 13 फीट, तो कहीं 10 फीट। माप में इस अंतर की वजह से मस्जिद के गुंबदों के आकार में भी कमियाँ रह गई थीं।

बर्गेस की किताब से आभार

बर्गेस लिखते हैं कि निर्माण में यह ऊँच-नीच इसलिए है क्योंकि इसमें हिंदू मंदिरों की सामग्री का इस्तेमाल किया गया था। मस्जिद की छत का कुछ हिस्सा पुराने जैन और हिंदू मंदिरों के छोटे गुंबदों से लिया गया है। वहीं, कुछ खंभों पर जानवरों की कलाकृतियाँ बनी हुई हैं, जो साफ तौर पर दर्शाती हैं कि ये स्तंभ हिंदू मंदिरों के थे।

मस्जिद की पिछली दीवार पर बनी ‘मेहराब’ (दीवार में अर्धगोलाकार जगह) का जिक्र करते हुए बर्गेस लिखते हैं कि इसकी बनावट गुजरात की सामान्य मस्जिदों जैसी नहीं है। यहाँ तक कि तीनों मेहराबों की निर्माण शैली भी एक-दूसरे से काफी अलग दिखाई देती है।

आगे वे आंगन (कोर्टयार्ड) के बारे में लिखते हुए बताते हैं कि प्रवेश द्वार पर लगा संगमरमर का दरवाजा स्पष्ट रूप से किसी जैन मंदिर का लगता है। इस पर जैन धर्म से जुड़ी आकृतियाँ भी दिखाई देती हैं। बर्गेस ने यह भी नोट किया है कि इनमें से ज्यादातर आकृतियों को जानबूझकर नष्ट कर दिया गया था।

बर्गेस की किताब से आभार

‘भरूच जिला डायरेक्टरी की रिपोर्ट’ नाम के एक दस्तावेज में लिखा है कि खिलजी के समय में प्राचीन शहर पर आक्रमण हुआ था और उसी दौरान जैन देरासर (मंदिर) पर कब्जा करके वहाँ मस्जिद बनाई गई थी।

इसी रिपोर्ट में मंदिरों की लिस्ट में ‘शामलिया विहार’ नाम के एक देरासर (मंदिर) का उल्लेख मिलता है, जिसके बारे में यह नोट किया गया है कि बाद में मुस्लिम शासकों के समय इसे भी तोड़कर मस्जिद बना दिया गया था।

भरूच जिला कलेक्टर की आधिकारिक वेबसाइट पर भी यह दर्ज है कि जामा मस्जिद का निर्माण प्राचीन जैन मंदिरों के अवशेषों से किया गया था। इसके अलावा, इसमें बताया गया है कि मस्जिद का अधिकांश हिस्सा मंदिर की सामग्री से बना है। वेबसाइट पर स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि इसके पत्थर मंदिरों से लिए गए थे और इसकी ‘मेहराब’ में हिंदू मंदिर के चिह्न (निशान) मौजूद हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन तमाम दस्तावेजों और ऐतिहासिक साक्ष्यों में कहीं भी कोई विरोधाभास नहीं दिखता है। सभी की जानकारी एक-दूसरे से पूरी तरह मेल खाती है। यहाँ तक कि सरकारी वेबसाइट भी इन सभी तथ्यों की पुष्टि करती है।

यह रिपोर्ट मूल रूप से गुजराती भाषा में लिखी गई है। मेघल सिंह परमार की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

आज तेल के लिए हो रहे युद्ध, कभी ‘पक्षियों की बीट’ के लिए बौराई थी दुनिया: पढ़िए जब स्पेन ने Bird Poop के लिए लड़ी जंग, अमेरिका कानून ही ले आया

संयुक्त राज्य अमेरिका ने 3 जनवरी 2026 को वेनेज़ुएला पर एक बड़ा सैन्य हमला किया, जिसे ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिज़ॉल्व’ नाम दिया गया। इस अभियान में अमेरिकी सेना ने 150 से अधिक विमानों, डेल्टा फ़ोर्स और अन्य विशेष सशस्त्र इकाइयों की मदद से वेनेज़ुएला की राजधानी काराकास में हवाई और जमीनी हमले किए। इसके बाद राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिसिलिया फ्लोरेस को हिरासत में लेकर अमेरिका भेज दिया गया। कई देशों ने इस कार्रवाई को राष्ट्रपति के अपहरण के समान बताया।

अमेरिकी सरकार का कहना है कि उसकी नाराज़गी मादुरो सरकार से इसलिए है क्योंकि वेनेज़ुएला में ड्रग्स और नार्को-आतंकवाद को बढ़ावा दिया गया। लेकिन दुनिया के बड़े हिस्से की राय है कि इस टकराव की असली वजह वेनेज़ुएला का विशाल तेल भंडार और उससे अमेरिकी कंपनियों को होने वाला आर्थिक लाभ है।

वैश्विक तेल भंडार

पिछले कई दशकों में दुनिया के अनेक युद्ध तेल के लिए लड़े गए हैं। हालांकि इतिहास बताता है कि संसाधनों को लेकर संघर्ष हमेशा तेल तक सीमित नहीं रहे हैं। आज जब वैश्विक ध्यान दक्षिण अमेरिका पर है, तो यह जानना रोचक है कि कभी इसी क्षेत्र में एक युद्ध तेल के लिए नहीं, बल्कि पक्षियों की बीट—जिसे गुआनो कहा जाता है—जैसे संसाधन के लिए लड़ा गया था।

यदि कोई यह मानता है कि अमेरिका का ऐसा आक्रामक रवैया हाल की घटना है, तो इतिहास इससे अलग तस्वीर पेश करता है। अन्य औपनिवेशिक और साम्राज्यवादी शक्तियों की तरह अमेरिका भी लंबे समय से प्राकृतिक संसाधनों पर गहरी नजर रखता रहा है। कई बार उसने नैतिकता को पीछे छोड़कर अपने हितों को प्राथमिकता दी। इसी कारण एक समय में अमेरिका ने न केवल सोना और चाँदी, बल्कि पक्षियों और चमगादड़ों की बीट तक को भी ‘राष्ट्रीय हित’ का विषय माना।

पक्षियों के मल क्यों आते थे काम

यह दिलचस्प ऐतिहासिक कहानी 19वीं सदी के मध्य के अमेरिका से जुड़ी है। उस समय अमेरिका में खेती तेजी से फैल रही थी। किसान अब सिर्फ अपने खाने भर की खेती नहीं कर रहे थे, बल्कि बाजार और मुनाफे पर आधारित खेती हर जगह शुरू हो चुकी थी। बड़े-बड़े प्लांटेशन अभी भी मौजूद थे, जहाँ ग़ुलामों से काम लिया जाता था, और यह व्यवस्था अटलांटिक दास व्यापार से जुड़ी हुई थी। खेती का पूरा औद्योगीकरण और उसका वैज्ञानिक ज्ञान अभी आने में कई दशक बाकी थे।

इस मुनाफा-केंद्रित खेती के साथ एक गंभीर समस्या सामने आने लगी। हरके बाद पैदावार घटने लगी। 1850 तक अमेरिका के चौथे-पाँचवें खेतों की जमीन अपनी उपजाऊ शक्ति खोने लगी थी। ऐसा लगने लगा कि लगातार ज्यादा मुनाफा कमाने की लालच किसानों से उनकी मिट्टी की ताकत छीन रही है।

साम्राज्यों का तर्क सीधा और कठोर होता है, मुनाफा लगातार बढ़ना चाहिए। लेकिन बढ़ते मुनाफे के लिए ज्यादा संसाधनों की जरूरत होती है और कई बार ये संसाधन देश की सीमाओं के बाहर होते हैं। जब किसी चीज की कमी होने लगती है, तो वही चीज रणनीतिक संसाधन बन जाती है।

इसी दौर में एक ऐसी चीज अचानक बेहद कीमती बन गई, जिससे आज ज्यादातर लोग दूरी बनाए रखना पसंद करते हैं। जो चीज आज हमारी बालकनियों को गंदा कर देती है, वही 19वीं सदी में दुनिया भर की चाहत बन गई। यह चीज अंतरराष्ट्रीय कानून, नौसेना की तैनाती और यहाँ तक कि युद्धों का कारण बनी।

यह पदार्थ था गुआनो समुद्री पक्षियों और चमगादड़ों की सूखी बीट, जिसे पीसकर खेतों में खाद के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। गुआनो मुख्य रूप से गरम और सूखे, बिना आबादी वाले द्वीपों से मिलता था, जो मध्य अमेरिका और प्रशांत महासागर में स्थित थे।

दिलचस्प बात यह थी कि बाजार और मुनाफे की खेती से पैदा हुई समस्या का समाधान भी उसी बाजार में मौजूद था। अमेरिकी किसानों के लिए मिट्टी की उर्वरता लौटाने का जवाब गुआनो बना और इसी ने आगे चलकर पूरी दुनिया की राजनीति और युद्धों को प्रभावित किया।

गुआनो: दुनिया का सबसे असंभावित चमत्कारी पदार्थ

आज सुनने में गुआनो किसी साम्राज्य की नींव जैसा नहीं लगता, लेकिन 19वीं सदी में यह बेहद कीमती संसाधन था। गुआनो में नाइट्रोजन, फॉस्फेट और पोटैशियम भरपूर मात्रा में होते हैं। यही तीन तत्व आज भी NPK खाद के मुख्य घटक हैं। इस वजह से गुआनो एक चमत्कारी जैविक खाद माना जाता था, जो बंजर मिट्टी को फिर से उपजाऊ खेत में बदल देता था।

गुआनो का असर इतना जबरदस्त था कि कई जगहों पर फसल की पैदावार कई गुना बढ़ गई। उस दौर में जब कृषि पूरी अर्थव्यवस्था की रीढ़ थी और बारूद बनाने के लिए नाइट्रेट्स (खासकर पोटैशियम) की जरूरत होती थी, तब गुआनो दोहरा फायदा देने वाला रणनीतिक संसाधन बन गया खेती के लिए भी और सैन्य ताकत के लिए भी।

इसी कारण औपनिवेशिक शक्तियाँ, जो ज्यादा उत्पादन और सैन्य बढ़त चाहती थीं, गुआनो पर कब्जा जमाने के लिए आपस में होड़ करने लगीं। लेकिन गुआनो हर जगह नहीं मिलता था। इसके भंडार बहुत दुर्लभ थे और दुनिया के कुछ गिने-चुने, दूरदराज़ और निर्जन द्वीपों तक सीमित थे।

ये द्वीप सैकड़ों, बल्कि हजारों वर्षों तक इंसानों की पहुँच से बाहर रहे। इसी वजह से वहाँ समुद्री पक्षियों की बीट की परतें एक के ऊपर एक जमा होती गईं। समय के साथ ये परतें सख़्त होकर चट्टानों जैसी बन गईं और इन्हीं से विशाल गुआनो भंडार तैयार हुए।

इन द्वीपों की जलवायु भी गुआनो को ताक़तवर बनाने में मददगार थी। गर्म और सूखा मौसम, और बहुत कम बारिश, इसके पोषक तत्वों को बहने से बचाता था। इसी कारण इनमें मौजूद तत्व लंबे समय तक सुरक्षित रहते थे।

आज के नज़रिए से यह बात अजीब लग सकती है कि देश कभी पक्षियों की बीट के लिए युद्ध करें। लेकिन उन्नीसवीं सदी के रणनीतिकारों के लिए यह हँसने की नहीं, बल्कि बेहद गंभीर और ज़रूरी बात थी।

सदियों से पक्षियों के मल से ढके द्वीप

वो चट्टानें जिसकी कीमत पहले किसी ने नहीं समझी, बाद में युद्ध हुआ

पेरू के तट के पास स्थित द्वीपों पर उच्च गुणवत्ता का गुआनो बनने के लिए बिल्कुल अनुकूल परिस्थितियाँ थीं। इसी वजह से पेरू का गुआनो दुनिया में सबसे ज्यादा कीमती माना जाता था, क्योंकि उसमें पोषक तत्वों की मात्रा सबसे अधिक थी। औपनिवेशिक ताकतें इन गुआनो द्वीपों को सोने की खान की तरह देखती थीं। इनमें सबसे प्रसिद्ध थे चिंचा द्वीप (Chincha Islands), जो पेरू के समुद्र तट से कुछ दूरी पर स्थित हैं।

ये द्वीप बंजर, तेज हवाओं से घिरे और पूरी तरह निर्जन थे। पहली नजर में ये चट्टानी टापू बिल्कुल बेकार लगते थे। लेकिन इन्हीं परिस्थितियों की वजह से यहाँ बेहद बड़ी मात्रा में सबसे शुद्ध और ताकतवर गुआनो जमा हो पाया था। यह गुआनो सालों तक खेती की उत्पादकता बनाए रखने और उससे मिलने वाली आय के लिए काफी था, इतना कि इसने साम्राज्यों को ईर्ष्या में डाल दिया।

स्पेन, जिसकी अमेरिका पर पकड़ 19वीं सदी की शुरुआत से ही कमजोर पड़ रही थी, उसने इसमें अपना मौका देखा। 14 अप्रैल 1864 को स्पेन ने चिंचा द्वीपों पर कब्जा कर लिया और वहाँ से गुआनो निकालना शुरू कर दिया, ताकि अपनी खराब होती आर्थिक हालत को संभाला जा सके। लेकिन पेरू और उसके पड़ोसी देश गुआनो की कीमत को अच्छी तरह समझते थे और वे स्पेन को यह खजाना बिना विरोध के देने को तैयार नहीं थे।

नतीजा यह हुआ कि पेरू, चिली, इक्वाडोर और बोलीविया की संयुक्त सेनाओं ने स्पेन को चिंचा द्वीपों से पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। सुनने में अजीब जरूर लग सकता है कि इतिहास में कैसे ये अनोखा संघर्ष हुआ जहाँ पक्षियों की बीट को लेकर लड़ाई हुई। लेकिन उस समय इस युद्ध में शामिल देशों के लिए मामला बेहद गंभीर था। गुआनो की बिक्री से सेनाओं को पैसा मिलता था, व्यापार चलता था और कई देशों की आर्थिक हालत इसी पर टिकी हुई थी।

पेरू के तट के पास स्थित चिनचा द्वीप

USA ने उठाया फायदा

इन युद्धों को देखते हुए, अमेरिका ने इसका पहले ही हल निकाला। 1856 में अमेरिकी कॉन्ग्रेस ने गुआनो आइलैंड्स एक्ट नाम का एक कानून पास किया, जो आज भी लागू है। आज यह कानून अजीब लग सकता है, लेकिन उस समय अमेरिकी नेताओं को यह पूरी तरह व्यावहारिक लगा।

इस कानून के तहत किसी भी अमेरिकी नागरिक को यह अधिकार मिल गया कि वह गुआनो से भरपूर किसी निर्जन द्वीप पर अमेरिका की ओर से दावा कर सके। इसके बाद अमेरिकी नागरिक समुद्र यात्राओं पर निकले, गुआनो वाले द्वीप खोजे और उन्हें अमेरिकी क्षेत्र घोषित किया।

1857 में अमेरिका ने 22 तोपों से लैस एक युद्धपोत भेजा, ताकि इन नए दावा किए गए द्वीपों से गुआनो इकट्ठा किया जा सके और उसकी जाँच की जा सके। इसी तरीके से कैरेबियन सागर और प्रशांत महासागर में दर्जनों द्वीपों पर अमेरिका ने दावा किया। वहाँ अमेरिकी झंडे लगाए गए और प्राकृतिक संसाधन निकाले गए।

इन द्वीपों पर बसावट आमतौर पर स्थायी नहीं होती थी। उद्देश्य साफ था गुआनो को अमेरिका भेजो, मुनाफा कमाओ और फिर अगला द्वीप खोजो। अमेरिकी रवैया बेहद व्यावहारिक और सरल था, जहाँ गुआनो है, वहाँ अमेरिका का हित है। गुआनो आइलैंड्स एक्ट के तहत अमेरिका ने सौ से भी ज्यादा द्वीपों पर दावा किया। लेकिन जैसे ही गुआनो खत्म हुआ, ज्यादातर द्वीपों को छोड़ दिया गया।

अमेरिकी गुआनो द्वीप

जिस तरह गुआनो का महत्व अचानक बढ़ा था, उसी तरह वह जल्दी ही खत्म भी हो गया। वैज्ञानिक प्रगति के साथ यह समझ में आ गया कि गुआनो फसलों की पैदावार क्यों बढ़ाता है। इसके पीछे नाइट्रोजन और फॉस्फोरस की भूमिका साफ हो गई।

इसके बाद कृत्रिम (सिंथेटिक) उर्वरकों का उत्पादन शुरू हुआ, जिनसे बड़ी मात्रा में नाइट्रोजन और फॉस्फोरस मिलने लगे। अब कुछ टन पक्षियों की बीट के लिए युद्धपोत भेजने, कूटनीतिक तनाव पैदा करने या तोपें चलाने की जरूरत नहीं रही।

शुरुआत में गुआनो की जगह बोन मील, पिसा हुआ फॉस्फेट पत्थर जैसे विकल्प इस्तेमाल होने लगे। फिर 1910 के दशक में हैबर प्रक्रिया आने के बाद यूरिया खाद आम हो गई।

इतिहासकारों के लिए इसमें एक रोचक सबक है, जिस संसाधनके लिए कभी युद्धों और कानूनों को सही ठहराता था, वह कुछ ही दशकों में बेकार हो गया। बड़े-बड़े साम्राज्यों ने खुद को बदला, नई दिशा अपनाई और आगे बढ़ गए। पीछे रह गए खाली पड़े द्वीप, जिन पर अब भी सफेद, चॉक जैसी परतें जमी हैं, जो इतिहास की अजीब विडंबनाओं की याद दिलाती हैं।

पूरी बात को समझने के लिए गुआनो युग की एक छोटी समय रेखा पर नजर डालना जरूरी है। 1840 के दशक के आसपास यूरोप में मिट्टी की उर्वरता कम होने लगी थी। 1840 से 1860 के बीच पेरू के गुआनो से भरे द्वीपों को बड़े पैमाने पर खोदकर खाली किया गया।

1856 में अमेरिका ने गुआनो आइलैंड्स एक्ट लागू किया। 1864 से 1866 के बीच स्पेनिश साम्राज्य और उसकी पूर्व उपनिवेशों के बीच चिनचा द्वीपों को लेकर युद्ध हुआ। फिर 1800 के दशक के अंत तक दुनिया ने पक्षियों की बीट यानी गुआनो को लगभग नज़रअंदाज़ कर दिया और कृत्रिम उर्वरकों की ओर बढ़ गई।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रारब्ध राय ने लिखी है जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)

आज ट्रंप के बयानों को सुन कॉन्ग्रेस कर रही देश के PM का अपमान, कभी मनमोहन सिंह के लिए नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान को दिखा दी थी औकात: क्या पुराना वक्त भूल गए ‘चमचे’

इन दिनों डोनाल्ड ट्रंप का आक्रामक और अस्थिर मिजाज दुनियाभर में तनाव का कारण बना हुआ है। लेकिन चिंता की बात यह है कि भारत को लेकर भी उनका रवैया लगातार तल्ख होता जा रहै। जहाँ ट्रंप अपने से कमजोर देशों पर सीधे कार्रवाई करने से नहीं हिचक रहे, वहीं भारत जैसे सशक्त और आत्मनिर्भर देश के मामले में वह बयानबाजी के जरिए माहौल गरम करने की कोशिश कर रहे हैं।

स्थिति तब और खराब हो जाती है जब ट्रंप की इस बयानबाजी को देश की विपक्षी पार्टियाँ अपने राजनीतिक हितों के लिए भुनाने लगती हैं। भारत पर दूसरे देशों की टिप्पणियों को आधार बनाकर वे सरकार पर हमला बोलने लगती हैं, बिना यह सोचे कि इससे अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश की प्रतिष्ठा को ही नुकसान पहुँच सकता है।

विपक्ष का यह रवैया हाल के दिनों में और अधिक स्पष्ट हुआ है, जब डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर दिए गए बयानों का इस्तेमाल सोशल मीडिया पर उनकी छवि को कमजोर करने के लिए किया गया। हैरानी की बात यह है कि कॉन्ग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेता भी अमेरिका के संदर्भ में अपने ही प्रधानमंत्री को कमतर दिखाने से पीछे नहीं रहे, जो राजनीतिक विरोध की सामाओं को पार कर देता है।

दरअसल, हाल ही में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने व्यक्तिगत तौर पर भारत की लंबित रक्षा सौदे और व्यापारिक मुद्दों में उनसे बात की। ट्रंप ने कहा, “भारत ने अपाचे हेलीकॉप्टर का ऑर्डर दिया था, लेकिन 5 सालों तक डिलीवरी नहीं हुई। प्रधानमंत्री मोदी मुझसे मिलने आए थे। महोदय, क्या मैं आपसे मिल सकता हूँ?” डोनाल्ड ट्रंप ने आगे पीएम नरेंद्र मोदी के साथ उनके मजबूत संबंध बताते हुए कहा, “मेरा उनके साथ बहुत अच्छा रिश्ता है।”

ट्रंप के बयान पर कॉन्ग्रेस ने चलाया प्रोपेगेंडा

ट्रंप के इस बयान को कॉन्ग्रेस इकोसिस्टम ने प्रोपेगेंडा का रूप देकर सोशल मीडिया पर परोसा। वो भी बयान के एक अधूरा हिस्से को उठाकर, जिसमें ट्रंप ने पीएम मोदी की बात करते हुए कहा- ‘क्या मैं आपसे मिल सकता हूँ?’ इस अधूरे बयान से प्रधानमंत्री की आलोचना को लेकर धड़ाधड़ पोस्ट किए गए। प्रधानमंत्री मोदी पर विदेशों में भारत की बेइज्जती करवाने के आरोप लगाए गए। खासतौर पर राहुल गाँधी के ‘नरेंदर-सरेंडर’ वाले वीडियो से कॉन्ग्रेस ने प्रधानमंत्री का मजाक उड़ाया।

कॉन्ग्रेस की वरिष्ठ नेता सुप्रिया श्रीनाते ने कहा, “नेपाल, बांग्लादेश संभल नहीं रहा है। चीन का नाम ले नहीं पाते। अमेरिका में ‘सर सर’ करते मिमिया रहे हैं, इनसे कोई भी उम्मीद करना बेमानी है। मैंने किसी का नाम नहीं लिया- लेकिन सब जानते हैं वो कौन है वैसे बौखलाए भक्त अभी खुद ही दास्तान बयां करेंगे।”

कॉन्ग्रेस के छात्र संगठन (NSUI) ने कहा, “इनका इतिहास ही “I am sorry, Sir” से शुरू हुआ था। उसी कायर विरासत को प्रधानमंत्री मोदी आगे बढ़ा रहे हैं- हाथ जोड़कर ट्रंप के सामने “May I see you, Sir” की याचना करते हुए। जो देश कभी सातवें बेड़े के सामने डटकर खड़ा था, आज उसका प्रधानमंत्री दुनिया भर में रोज-रोज ट्रंप से बेइज्जती कराने के नए कीर्तिमान रच रहा है।”

कॉन्ग्रेसी प्रोपेगेंडा को बढ़ावा देने वाले मोहित चौहान कहते हैं, “लेकिन अब वे मुझसे नाराज हैं क्योंकि मैंने रूस पर भारी टैरिफ लगाकर भारत को रूस से तेल खरीदने से रोक दिया है। ट्रंप रोजाना भारत का अपमान करते हैं, लेकिन मोदी उनसे इतना डरते हैं कि एक शब्द भी नहीं बोलते। भारत को राहुल गाँधी जैसे सशक्त और शिक्षित प्रधानमंत्री की जरूरत है।”

ट्रंप के बयान के अधूरे हिस्से से गढ़ा नैरेटिव

कॉन्ग्रेस इकोसिस्टम ने डोनाल्ड ट्रंप के बयान के केवल एक हिस्से को चुनकर सोशल मीडिया पर नैरेटिव गढ़ा। ट्रंप के बयान के उन शब्दों पर फोकस किया गया, जिसमें प्रधानमंत्री मोदी इज्जत से बात कर केवल एक सवाल पूछ रहे हैं। ट्रंप ने इस बयान को इस तरह पेश किया, मानो भारत के प्रधानमंत्री विदेशी ताकतों के सामने कमजोर पड़ गए हों।

असलियत यह है कि ट्रंप ने उसी बयान में अगली ही पंक्ति में साफ कहा कि वे और प्रधानमंत्री काफी अच्छे दोस्त हैं। यह तथ्य कॉन्ग्रेस के इस प्रोपेगेंडा में जानबूझकर नजरअंदाज कर दिया गया, क्योंकि पूरी बात सामने आ जाती तो बनाया गया नैरेटिव टिक ही नहीं पाता। साफ है कि सच को पूरा बताने के बजाए अधूरे बयान को हथियार बनाकर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की गई।

अंतरराष्ट्रीय छवि को दरकिनार कर प्रधानमंत्री के लिए वही आपत्तिजनक भाषा

प्रोपेगेंडा फैलाने की जल्दबाजी में यह भी नहीं सोचा गया कि इसका असर कहीं न कहीं देश की अंतरराष्ट्रीय छवि पर भी पड़ सकता है। प्रधानमंत्री को निशाना बनाते हुए की गई बयानबाजी में यह विचार तक नहीं किया गया कि विदेश नीति जैसे संवेदनशील मुद्दों पर गैर-जिम्मेदार टिप्पणियाँ भारत की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचा सकती हैं। राजनीतिक विरोध के नाम पर संयम और मर्यादा दोनों को दरकिनार कर दिया गया।

यहाँ तक कि राहुल गाँधी द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए इस्तेमाल किए गए आपत्तिजनक शब्द ‘नरेंद्र-सरेंडर’ को प्रतिक्रिया के तौर पर बड़े पैमाने पर फैलाया गया। यह पहली बार नहीं है, जब प्रधानमंत्री की आलोचना आपत्तिजनक भाषा में की गई हो, लेकिन इस बार मामला देश की सीमाओं से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुँच गया। यही वजह है कि यह विवाद केवल राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि देश की साख से जुड़ा सवाल बन गया।

नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री पद का सम्मान, कॉन्ग्रेस को नहीं बूझेगा

दूसरी ओर नरेंद्र मोदी हैं, जिन्होंने प्रधानमंत्री पद का सम्मान हमेशा बरकरार रखा। एक बार पाकिस्तान में जब नवाज शरीफ ने तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को ‘देहाती महिला’ कहा था। उस समय पीएम मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे और खुद प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे। लेकिन नवाज शरीफ की इस टिप्पणी पर वह चुप नहीं बैठे, बल्कि कड़ा विरोध दर्ज किया।

पीएम मोदी ने कहा था, “आप मेरे प्रधानमंत्री को देहाती महिला कैसे कह सकते हैं। भारत के प्रधानमंत्री को देहाती महिला कैसे कह सकते हैं। भारत के प्रधानमंत्री का इससे अधिक अपमान और नहीं हो सकता। हम राजनीति के विषय पर उनसे लड़ सकते हैं लेकिन इसे बर्दाश्त नहीं कर सकते। सवा सौ करोड़ लोगों का यह देश अपने प्रधानमंत्री का अपमान बर्दाश्त नहीं करेगा।”

इससे साफ होता कि पीएम नरेंद्र मोदी अपने देश के प्रधानमंत्री का कितना सम्मान करते हैं। वह भी तब जब वह खुद उसी विपक्षी पार्टी के सामने चुनाव लड़ रहे हैं। साफ है कि भारत की आंतरिक राजनीति जैसी भी हो, लेकिन विदेशों में जाकर भारत और उसके प्रधानमंत्री का अपमान करना गलत है। लेकिन राहुल गाँधी और उनका कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम इसे समझने में असमर्थ है। इसीलिए राहुल गाँधी आए दिन विदेशों में जाकर भारत के आंतरिक मुद्दों पर बात करते हुए देश की मौजूदा सरकार और उसके प्रधानमंत्री को कोसते हैं।

ये इन दोनों पार्टियों की मानसिकता का सबूत है कि कॉन्ग्रेस कैसे प्रोपेगेंडा और राजनीतिक हित के लिए किसी भी हद तक जा सकता है, जबकि बीजेपी ने हमेशा प्रधानमंत्री पद का सम्मान किया है, यह देखे बिना की उस पद पर विपक्षी दल का व्यक्ति ही क्यों न हो।

‘मौत का सौदागर’ से लेकर ‘मोदी तेरी कब्र खुदेगी’ तक लगातार रिसता रहा है कॉन्ग्रेस-वामपंथ का जहर, लोकतंत्र में चुने हुए PM से यह कैसी घृणा?

दिल्ली की हवाओं में जब भी राजनीति का पारा चढ़ता है, कुछ खास तरह के नारे गूँजने लगते हैं। वर्ष 2022 से लेकर 2026 की शुरुआत तक, देश के विभिन्न हिस्सों- चाहे वह JNU का कैंपस हो, कॉन्ग्रेस की रैलियाँ हों या पहलवानों का धरना, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ ‘मोदी तेरी कब्र खुदेगी’ और ‘मौत’ जैसे आपत्तिजनक नारे एक पैटर्न की तरह सामने आए हैं। बता दें कि गालियों की इस फेहरिस्त की शुरुआत गुजरात में कॉन्ग्रेस नेता सोनिया गाँधी की ‘मौत के सौदागर’ से शुरू हुई थी।

2026: जेएनयू में ‘मोदी-शाह कब्र खुदेगी’ के नारों की गूँज

वामपंथी विचारधारा का गढ़ कहे जाने वाले जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के लिए विवाद और नारे कोई नई बात नहीं हैं। 5 जनवरी 2026 की रात एक बार फिर साबरमती हॉस्टल के बाहर ‘रेजिस्टेंस’ के नाम पर हुजूम जुटा। बहाना था 2020 की हिंसा की बरसी, लेकिन असली मकसद कुछ और ही निकला। जैसे ही खबर आई कि उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है, वैसे ही वहाँ मौजूद छात्र-छात्राओं का स्वर बदल गया।

देखते ही देखते कैंपस ‘मोदी-शाह की कब्र खुदेगी’ के नारों से गूँज उठा। विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसे सुप्रीम कोर्ट की अवमानना और लोकतंत्र पर हमला बताते हुए पुलिस से FIR दर्ज करने की माँग की है। यह जेएनयू की वही पुरानी फितरत है जहाँ शिक्षा के मंदिर को राजनीतिक अखाड़ा बनाकर देश के शीर्ष नेतृत्व के लिए कब्रें खोदी जाती हैं।

2025: रामलीला मैदान में कॉन्ग्रेस का ‘नफरती’ राग

साल 2025 में भी यही कहानी दोहराई गई। मौका था दिल्ली के रामलीला मैदान में कॉन्ग्रेस की ‘वोट चोरी’ के खिलाफ रैली का। कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों के बीच से वही शब्द निकले- ‘मोदी, तेरी कब्र खुदेगी।’ हैरानी की बात यह थी कि मंच पर बड़े नेता मौजूद थे और नीचे कार्यकर्ताओं के साथ महिला विंग की पदाधिकारी भी सुर में सुर मिला रही थीं।

भाजपा ने इसे ‘अर्बन नक्सलियों’ की भाषा बताया और कहा कि कॉन्ग्रेस अब ‘मुस्लिम लीग नक्सलवादी पार्टी’ जैसी भाषा बोल रही है। संवैधानिक संस्थाओं को डराने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त की तस्वीरों को कैदी के रूप में दिखाया गया। यह वही दौर था जब राजनीति के मंच से सीधे तौर पर प्रधानमंत्री की मौत की कामना की जा रही थी।

2023: पहलवान प्रदर्शन और पवन खेड़ा की गिरफ्तारी का ‘इत्तेफाक’

2023 में यह नफरती नारा दो बड़े मंचों पर दिखा। फरवरी में जब कॉन्ग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा को दिल्ली एयरपोर्ट पर विमान से उतारा गया और गिरफ्तार किया गया, तब वहाँ मौजूद राज्यसभा सांसद और बड़े नेताओं के सामने कार्यकर्ताओं ने जमीन पर बैठकर चिल्लाना शुरू किया- ‘मोदी तेरी कब्र खुदेगी।’

यही नहीं, अप्रैल 2023 में जब जंतर-मंतर पर पहलवानों का धरना चल रहा था, तब विनेश फोगाट और अन्य प्रदर्शनकारियों की मौजूदगी में भीड़ ने फिर से वही ‘मोदी तेरी कब्र खुदेगी’ वाला राग छेड़ा। खेल के मैदान से न्याय की माँग करने वाले मंचों पर अचानक इस तरह के नारों का घुस आना यह बताता था कि पर्दे के पीछे कोई और है जो इन नारों की स्क्रिप्ट लिख रहा है।

2022: ‘हिटलर की मौत’ और ‘कुत्ते की मौत’ वाला घटिया स्तर

नफरत के इस इतिहास में 2022 का साल सबसे ज्यादा विवादास्पद रहा। ‘अग्निपथ योजना’ के विरोध के दौरान पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोध कांत सहाय ने सारी मर्यादाएँ लांघ दीं। उन्होंने सरेआम कहा, “मोदी हिटलर की राह चलेगा तो हिटलर की मौत मरेगा।”

मौत की कामना करने का यह सिलसिला यहीं नहीं रुका। महाराष्ट्र में नागपुर में कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष शेख हुसैन ने और भी आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘जैसे कुत्ते की मौत होती है, वैसे ही नरेंद्र मोदी की मौत होगी।’ इन बयानों के बाद भाजपा की तरफ से देशभर में विरोध प्रदर्शन किए गए थे और कई जगह FIR दर्ज हुई।

लोकतंत्र में ‘कब्र’ की भाषा कितनी सही?

प्रधानमंत्री के खिलाफ पिछले चार-पांच सालों का यह ‘नारा संकलन’ (Compilation) एक खतरनाक ट्रेंड को दर्शाता है। 2007 के ‘मौत के सौदागर’ वाले बयान से शुरू हुआ यह सफर 2026 के ‘कब्र खुदेगी’ तक पहुँच गया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में मतभेद का इजहार सिर्फ मौत और कब्र के नारों से ही मुमकिन है? जेएनयू से लेकर रामलीला मैदान तक लगने वाले ये आपत्तिजनक नारे आज भी गवाह हैं कि राजनीति किस कदर व्यक्तिगत नफरत की आग में झुलस रही है।

ASI संरक्षित स्मारक, फिर भी हुआ अवैध निर्माण: भरूच की ‘जामा मस्जिद’ को लेकर अनशन पर बैठे संत, कहा- यह जैन मंदिर और चक्रधर स्वामी की जन्मस्थली

गुजरात के भरूच में पायनियर स्कूल के सामने स्थित जामा मस्जिद इन दिनों विवाद का केंद्र बन गई है। अखिल भारतीय संत समिति के संतों ने इस मस्जिद को लेकर विरोध शुरू किया है। उनका दावा है कि यह जगह दरअसल एक प्राचीन जैन मंदिर है और यहीं चक्रधर स्वामी का जन्म हुआ था। संत समिति का आरोप है कि यह मस्जिद भारतीय पुरातत्व विभाग (ASI) के संरक्षण में होने के बावजूद यहाँ नियमों के खिलाफ अवैध निर्माण किया गया है। पूरे मामले को देखते हुए भरूच के एसपी मौके पर पहुँचे और ASI अधिकारियों व संत समिति के प्रतिनिधियों से बातचीत की। उन्होंने सभी मुद्दों पर चर्चा कर सर्वे कराने का भरोसा दिया।

अखिल भारतीय संत समिति ने सोमवार (5 जनवरी 2025) को शक्तिनाथ मैदान में धरना दिया। संतों ने कहा कि जब तक ASI सख्त कार्रवाई नहीं करता, तब तक वे पानी भी नहीं पिएँगे। इससे पहले भी संत समिति इस जामा मस्जिद को समली विहार जैन मंदिर और चक्रधर स्वामी की जन्मस्थली बता चुकी है। वर्तमान में इस जामा मस्जिद में दिन में 5 वक्त की नमाज होती है और यहाँ मदरसे में बच्चों को शिक्षा भी दी जाती है।

बताया जाता है कि करीब 1905 में पुरातत्व विभाग ने इस मस्जिद को अपने अधीन ले लिया था और इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया था। हालाँकि, संत समिति का कहना है कि इसके बावजूद यहाँ नियमों के खिलाफ निर्माण और गतिविधियाँ हो रही हैं। संतों का आरोप है कि मुस्लिम समुदाय के कुछ लोग कानून का उल्लंघन कर इस ऐतिहासिक स्थल की असली पहचान बदलने की कोशिश कर रहे हैं।

इस मामले को लेकर संतों ने विरोध प्रदर्शन किया। उन्होंने माँग की कि इस जगह को उसकी पुरानी मूल स्थिति में वापस लाया जाए और यहाँ चल रही सभी अवैध गतिविधियों को तुरंत रोका जाए। अखिल भारतीय संत समिति के अध्यक्ष संत अविचल देवाचारी ने कहा कि यह एक ऐतिहासिक धरोहर स्थल है और यहाँ किसी भी तरह का दूसरा धार्मिक या सांस्कृतिक चिह्न नहीं है।

उन्होंने कहा कि जब पुरातत्व विभाग ने इस स्थल को अपने कब्जे में ले रखा है, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी भी उसी की है। अगर यहाँ कोई गतिविधि चल रही है तो उसे रोका जाना चाहिए। संतों ने यह भी माँग की कि जो भी नया निर्माण पहले मौजूद नहीं था और बाद में किया गया है, उसे तुरंत हटाया जाए। संत अविचल देवाचारी ने कहा कि सभी संतों और हिंदू समाज की यही माँग है कि इस स्थल को सिर्फ एक पुरातात्विक स्मारक के रूप में ही संरक्षित रखा जाए।

संतों ने क्या कहा?

‘ऑपइंडिया’ से बात करते हुए आंदोलन का नेतृत्व कर रहे अखिल भारतीय संत समाज के संन्यासी स्वामी मुक्तानंद ने कहा कि भरूच के हेड पोस्ट ऑफिस के पास स्थित यह जामा मस्जिद असल में पहले समली विहार जैन मंदिर के नाम से जानी जाती थी और यहीं चक्रधर स्वामी का जन्म हुआ था। उन्होंने बताया कि यह ऐतिहासिक स्थल भारत सरकार की संपत्ति है और ASI के संरक्षण में आने वाला राष्ट्रीय स्मारक है। ऐसे में इसमें किसी भी तरह का बदलाव करना कानूनन अपराध है। इसके बावजूद यहाँ नियमों का खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है।

स्वामी मुक्तानंद ने कहा कि देश में ASI के संरक्षण में करीब 3800 स्मारक हैं, जिनमें से लगभग 820 स्मारक ‘लिविंग मॉन्यूमेंट’ यानी जीवित स्मारक माने जाते हैं। उन्होंने भोजशाला में माता सरस्वती मंदिर और काशी का ज्ञानवापी मंदिर का उदाहरण देते हुए कहा कि ये दोनों भी संरक्षित जीवित स्थल हैं और वहाँ कानून के अनुसार कोई बदलाव नहीं किया गया। उसी तरह भरूच का यह स्थल भी जीवित स्मारक की श्रेणी में आता है।

उन्होंने साफ कहा कि कानून के मुताबिक किसी भी जीवित स्मारक में एक कील तक ठोंकना गैरकानूनी है। इसके बावजूद भरूच की जामा मस्जिद में वजूखाना बनाया गया है, पंखे, लाइटें, बोर्ड लगाए गए हैं और मदरसे से जुड़ा सामान भी वहाँ रखा गया है, जो सीधे तौर पर कानून का उल्लंघन है।

उन्होंने आगे कहा कि अगर कोई स्थल ‘जीवित स्मारक’ है, तो वहाँ पूजा या नमाज की अनुमति हफ्ते में सिर्फ एक दिन होती है, जैसे ताजमहल में केवल शुक्रवार को नमाज की इजाजत है। उन्होंने बताया कि एक समय कुछ लोगों ने ताजमहल में दिन में 5 वक्त नमाज पढ़ने की कोशिश की थी जिसके बाद ASI ने अदालत का रुख किया और उसे रुकवाया। इसी तरह भोजशाला में भी मंगलवार को ही पूजा की अनुमति है। हफ्ते में केवल एक दिन ही धार्मिक गतिविधि की इजाजत होती है लेकिन भरूच की जामा मस्जिद में इन नियमों का लगातार उल्लंघन हो रहा है।

उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे संरक्षित स्मारकों में कुछ समय के लिए पूजा या नमाज की जा सकती है लेकिन वहाँ कोई धार्मिक चिन्ह नहीं रखा जा सकता। पूजा या नमाज तो हो सकती है लेकिन कोई निर्माण या स्थाई ढाँचा बनाना पूरी तरह मना है। उनके अनुसार भरूच की जामा मस्जिद में इन सभी नियमों को नजरअंदाज किया गया है और इस संरक्षित स्थल के अंदरूनी हिस्से को पूरी तरह एक मस्जिद की तरह बना दिया गया है, जो आमतौर पर किसी भी संरक्षित स्मारक में नहीं होता।

उन्होंने यह भी कहा कि कानून के मुताबिक इस स्मारक के 100 मीटर के दायरे में कोई भी निर्माण नहीं किया जा सकता। अगर ऐसा होता है तो ASI को कार्रवाई करनी होती है। इसके बावजूद भरूच की जामा मस्जिद से सटे हुए कई मकान बना दिए गए हैं। ये मकान स्मारक की दीवार से बिल्कुल चिपकाकर बनाए गए हैं।

संतों की मांगें क्या हैं?

संत समिति ने ऑपइंडिया को बताया कि यह साबित हो चुका है कि भरूच में मौजूदा जामा मस्जिद की जगह पर पहले एक हिंदू-जैन मंदिर था। यह बात वहाँ की निर्माण शैली और स्मारक की बनावट देखकर साफ तौर पर समझ में आती है। संतों का हालिया विरोध इस बात को लेकर है कि इस स्मारक में नियमों का उल्लंघन रोका जाए और ASI द्वारा एक नया सर्वे कराया जाए।

संतों ने कहा है कि इस समय उनकी केवल यही माँग है कि इस स्मारक का प्रबंधन ASI के हाथ में रहे और जो नियमों का उल्लंघन यहां किया जा रहा है, उसे पूरी तरह बंद किया जाए। संत समिति की मांगें इस प्रकार हैं:-

  1. जिस समय इस स्थल को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अधिनियम 1904 के तहत विभाग ने अपने अधीन लिया था, उस समय का नक्शा, राजपत्र (गजट) अधिसूचना और यह बताते हुए कॉन्ट्रैक्ट लेटर सार्वजनिक किया जाए कि यह स्थान किससे और कैसे लिया गया था।
  2. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अधिनियम 1958 के अनुसार इस संरक्षित स्मारक के प्रवेश का समय तय किया जाए और नियमों के मुताबिक इसके खुलने और बंद होने की व्यवस्था की जाए।
  3. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अधिनियम 1958 के अनुसार नियमों के खिलाफ जो गतिविधियाँ यहाँ चल रही हैं, उन्हें तुरंत रोका जाए।
  4. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अधिनियम 1958 के तहत संरक्षित स्मारक में उसकी मूल संरचना बदलने के उद्देश्य से जो भी निर्माण किया गया है, उसे तुरंत हटाया जाए।
  5. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अधिनियम 1958 के अनुसार स्मारक की मूल संरचना और परिसर में सीमेंट का उपयोग प्रतिबंधित है। इसके बावजूद रेत, सीमेंट और ईंटों से कंक्रीट निर्माण कर अवैध गतिविधियों की व्यवस्था बनाई गई है, उसे तुरंत हटाया जाए।
  6. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अधिनियम 1958 तथा इसकी धारा 20A(1) और 20B (2010) के अनुसार 100 मीटर और 200 मीटर क्षेत्र को प्रतिबंधित और नियंत्रित क्षेत्र घोषित किया गया है लेकिन इसके बावजूद कई मकान और अन्य कंक्रीट संरचनाएँ बनाई गई हैं। इन्हें नियमों के अनुसार हटाया जाए और संरक्षित क्षेत्र की सुरक्षा की जाए।
  7. स्मारक के मुख्य प्रवेश द्वार पर नियमों के खिलाफ कंक्रीट मकान बना दिए गए हैं, जिससे मुख्य प्रवेश मार्ग संकरा हो गया है। इसे इसकी मूल स्थिति में बहाल किया जाए।
  8. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अधिनियम के तहत संरक्षित स्थलों की सुरक्षा और प्रबंधन के लिए बनाए गए नियमों का कई वर्षों से इस स्थल पर पालन नहीं किया गया है। इन नियमों के उल्लंघन के लिए संबंधित विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ पद के दुरुपयोग और आपराधिक लापरवाही के आरोप में कानूनी कार्रवाई शुरू की जाए और विभाग द्वारा इस संरक्षित स्थल पर पुलिस सुरक्षा की व्यवस्था की जाए।

दो दिन में सर्वे शुरू होगा: संत समाज

स्वामी मुक्तानंद ने आगे बताया कि आवेदन देने के बाद भी जब कोई कार्रवाई नहीं हुई तो अखिल भारतीय संत समिति के संन्यासियों ने 5 जनवरी से अनिश्चितकालीन उपवास शुरू कर दिया। इसके बाद प्रशासन ने तुरंत इस मामले को संज्ञान में लिया। स्वामी मुक्तानंद ने कहा कि एसपी अक्षय राज की मध्यस्थता में ASI अधिकारियों और संत समाज के बीच एक बैठक हुई जिसमें सभी मुद्दों पर कार्रवाई का आश्वासन दिया गया।

उन्होंने बताया कि स्थल पर जो अस्थाई व्यवस्थाएँ की गई हैं उन्हें 8 से 10 दिनों के भीतर हटा दिया जाएगा। वहीं, जो स्थाई निर्माण या व्यवस्थाएँ की गई हैं उन्हें अगले दो महीनों के भीतर हटाने की बात कही गई है। इसके अलावा, अगले 2-3 दिनों में सर्वे भी शुरू कर दिया जाएगा और सर्वे के दौरान संत समाज के कुछ लोगों को भी साथ रखा जाएगा।

(यह खबर मूल रूप से भार्गव राज्यगुरु ने गुजराती में लिखी है, जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ा जा सकता है।)

कभी ईशनिंदा का इल्जाम लगाकर जला देते हैं जिंदा, कभी चोर बताकर ले लेते हैं जान: जानिए यूनुस राज में हिंदुओं को किन-किन बहाने निशाना बना रहे कट्टरपंथी, 35 दिनों में 14 को मारा

बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथियों की वजह से एक और हिन्दू युवक की जान चली गई। मिथुन सरकार नाम के युवक को कट्टरपंथियों ने दौड़ाया। भीड़ को अपनी ओर आता देखकर मिथुन डर के मारे तालाब में कूद गया। डूबने से उसकी मौत हो गई। कट्टरपंथी चोर-चोर कह कर उसका पीछा कर रहे थे।

पुलिस ने उसकी बॉडी बरामद कर ली है। बांग्लादेश में पिछले 35 दिनों में 14 हिंदुओं की हत्या कर दी गई है जबकि 50 से ज्यादा हिंसक हमले हुए हैं। इन हत्याओं के बाद भी मोहम्मद यूनुस सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी हुई है।

अगस्त 2024 में शेख हसीना को हटाए जाने के बाद से देश की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति लगातार अस्थिर बनी हुई है। यूनुस की अंतरिम सरकार और फरवरी 2026 में होने वाले चुनावों के बीच, अल्पसंख्यक हिंदुओं के खिलाफ हिंसा, अत्याचार और हत्याओं का दौर जारी है। शेख हसीना ने हाल ही में कहा है कि इन उपद्रवियों पर लगाम लगाने के लिए मजबूत सरकार की दरकार है।

लेकिन हिन्दुओं की लगातार हो रही हत्या के बावजूद मुहम्मद यूनुस सरकार नींद से अब तक नहीं जगा पाई है। हिंसक इस्लामी भीड़ और कट्टरपंथी तत्वों को देश में अराजकता और अशांति फैलाने की खुली छूट मिली हुई है। दिसंबर 2025 से अब तक 11 हिन्दुओं की हत्या हो चुकी है।

स्थानीय मीडिया और सोशल मीडिया पर सामने आए मामलों पर गौर करें तो हालात की भयावहता का अंदाजा लगाया जा सकता है।

नरसिंदी में प्रांतोस कर्मकार की हत्या

2 दिसंबर को नरसिंदी जिले में 42 साल के हिंदू व्यवसायी प्रांतोस कर्मकार की गोली मारकर हत्या कर दी गई। उनकी ज्वेलरी की दुकान थी। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, नकाबपोश हमलावरों ने उन्हें घर से बाहर बुलाया, स्कूल के मैदान में ले जाकर सीने में गोली मार दी और फरार हो गए। बाद में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। पुलिस अब तक न तो हत्यारों की पहचान कर पाई है और न ही हत्या के मकसद का खुलासा हुआ है।

उत्पल सरकार की चाकू मारकर हत्या

5 दिसंबर की सुबह फरीदपुर जिले में 35 वर्षीय हिंदू मछली व्यापारी उत्पल सरकार की चाकू मारकर हत्या कर दी गई। हमलावरों ने उनकी वैन रोकी, सीने में वार किया और नकदी लूटकर फरार हो गए।

दिलचस्प बात यह है कि हमलावरों ने वैन चालक फिरोज मोल्ला को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया। उन्हें केवल आँखों पर पट्टी बाँधकर पुल से बाँध दिया गया था। बाद में स्थानीय लोगों ने मोल्ला को बचाया और पुलिस को सूचना दी।

पुलिस ने हिंदू मछली व्यापारी की खून ले लथपथ शव को फरीदपुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल पहुँचाा। पुलिस के मुताबिक, उत्पल सरकार की हत्या में 2-3 लोग शामिल थे, जिनकी तलाश की जा रही है।

रंगपुर में जोगेश चंद्र रॉय और सुबर्णा रॉय की हत्या

7 दिसंबर की रात रंगपुर जिले में 75 वर्षीय जोगेश चंद्र रॉय और उनकी 60 वर्षीय पत्नी सुबर्णा रॉय की बेरहमी से हत्या कर दी गई। जोगेश रॉय बांग्लादेश मुक्ति संग्राम 1971 के योद्धा थे। पड़ोसियों ने सुबह उनके शव बरामद किए। उनका गला कटा हुआ था। अवामी लीग ने इस हत्याकांड के पीछे जमात-ए-इस्लामी का हाथ बताया।

कोमिल्ला में शांतो दास की हत्या

12 दिसंबर को कोमिल्ला जिले के होमना उपजिला में शांतो दास नामक एक हिंदू युवक का शव मक्के के खेत से बरामद हुआ। वह ऑटो-रिक्शा चालक और ग्राम पुलिस बल के सदस्य थे। इस घटना के बारे में उनके पिता अरुण चंद्र दास ने कहा था, “मेरा बेटा शांतो ऑटो रिक्शा चलाता था। गुरुवार शाम के बाद से हम उससे संपर्क नहीं कर पा रहे थे।” पीड़ित का गला कटा हुआ था और गर्दन पर चाकू के कई घाव थे। पुलिस ने शांतो दास का शव बरामद कर पोस्टमार्टम के लिए कोमिला मेडिकल कॉलेज अस्पताल भेज दिया।

मयमनसिंह में दीपू चंद्र दास की हत्या

18 दिसंबर को बांग्लादेश के मयमनसिंह जिले के भालुका गाँव में एक हिंसक मुस्लिम भीड़ ने एक हिंदू युवक की पीट-पीटकर हत्या कर दी । मृतक की पहचान 27 वर्षीय दीपू चंद्र दास के रूप में हुई है। पीड़ित को बुरी तरह पीटा गया, पेड़ से बाँध दिया गया और फिर आग लगा दी गई। इस घटना का दिल दहला देने वाला वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था।

दीपू चंद्र दास एक कपड़ा कारखाने में मजदूर के रूप में काम करते थे। विवाद के बाद, उन पर ईशनिंदा का झूठा आरोप लगाया गया। घटना के दिन उसे फैक्ट्री से निकाल दिया गया था और फ्लोर मैनेजर ने कट्टरपंथियों को बता दिया था। इसके बाद पुलिस की हिरासत में लेने के बाद उसे कट्टरपंथियों ने पीट-पीट कर मार डाला।

बोगुरा में पिंटू अकांडा की हत्या

23 दिसंबर को बांग्लादेश के बोगुरा जिले के आदमदिघी उपजिला में एक माइक्रोबस से पिंटू अकांडा नामक 35 वर्षीय हिंदू व्यक्ति का शव बरामद किया गया। उन्हें एक दिन पहले चार अज्ञात हमलावरों ने बंदूक की नोक पर अगवा कर लिया था। पीड़ित एक व्यवसायी और लॉटरी शोरूम के मालिक थे।

प्रारंभिक रिपोर्टों के अनुसार, पिंटू अकांडा की गला घोंटकर हत्या की गई थी। एक बयान में, एएसपी आसिफ हुसैन ने कहा, “हमारा प्राथमिक संदेह है कि पिंटू को बंदूक की नोक पर अगवा करने के बाद गला घोंटकर मार डाला गया था। हम फिलहाल जाँच कर रहे हैं।”

पीड़ित परिवार ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। अपहरण का सीसीटीवी फुटेज अब सोशल मीडिया पर सामने आया है। वीडियो में चार नकाबपोश लोग पिंटू पर हथियार ताने हुए और उसे उसके शोरूम से बाहर ले जाते हुए दिखाई दे रहे हैं। इसके बाद पीड़ित को जबरन गाड़ी में बैठाया गया।

राजबाड़ी में अमृत मंडल की हत्या

24 दिसंबर को अमृत मंडल नामक एक अन्य हिंदू व्यक्ति को उन्मादी भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। यह घटना बांग्लादेश के राजबारी जिले के पांग्शा उपजिला में घटी। पीड़ित की उम्र महज 29 वर्ष थी। वह होसेनडांगा गाँव का निवासी था। अमृत मंडल को गंभीर हालत में अस्पताल ले जाया गया लेकिन चोटों के कारण उसकी मृत्यु हो गई।

बाद में उनके शव को पोस्टमार्टम के लिए राजबारी सदर अस्पताल के मुर्दाघर भेजा गया। हिंदू व्यक्ति की हत्या के बाद, मोहम्मद यूनुस ने अमृत मंडल को ‘अपराधी’ बताकर उसकी पीट-पीटकर हत्या को उचित ठहराने की कोशिश की। इसके अलावा अंतरिम सरकार के मुखिया यूनुस ने भी इस मामले में सांप्रदायिक पहलू को कम करके आँका।

हबीगंज में कामदेव दास की हत्या

हबीगंज जिले में 18 वर्षीय हिंदू युवक कामदेव दास की हत्या ने इलाके में दहशत फैला दी। वह 25 दिसंबर से लापता था और 27 दिसंबर को उसका शव तालाब से मिला। उसके गले पर निशान भी मिले हैं। परिजनों और स्थानीय लोगों ने इस हत्या के पीछे इस्लामी कट्टरपंथियों का आरोप लगाया है। स्थानीय लोगों के अनुसार, कामदेव गुरुवार (25 दिसंबर 2025) से लापता था। उसके पिता ने थाने में गुमशुदगी की शिकायत दर्ज कराई थी, लेकिन परिवार का आरोप है कि पुलिस ने मामले को गंभीरता से नहीं लिया।

बजेन्द्र बिस्वास की मारी गोली

29 दिसंबर को बांग्लादेश के अर्धसैनिक सहायक बल अंसार वाहिनी के हिन्दू सदस्य बजेन्द्र बिस्वास को गोली मार दी गई। ये अर्धसैनिक सहायक बल देश में आंतरिक सुरक्षा और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिम्मेदार है। बिस्वास को मैनन सिंह इलाके में मारा गया। उसकी हत्या उसके दोस्त ने ही की। बांग्लादेशी मीडिया आउटलेट RTV ऑनलाइन ने बताया कि घटना के समय फैक्ट्री में कुल 20 अंसार सदस्य काम कर रहे थे। घटना के समय अंसार सदस्य नोमान मियाँ और बजेंद्र एक साथ बैठे थे। अचानक नोमान ने बजेंद्र की जांघ पर बंदूक (शॉटगन) तानी और कहा, ‘क्या मैं गोली मार दूँ?’ और फिर गोली चला दी। उसके बाद नोमान भाग गया।

खोकन चंद्र दास की हत्या

31 दिसंबर को को हिन्दू व्यवसायी खोकन चंद्र दास को घर लौटते समय हमलावरों ने चाकू से वार किया। इसके बाद पेट्रोल छिड़कर जिंदा जला दिया। खोकन दास अपने गाँव में एक छोटा मेडिकल स्टोर चलाते थे और मोबाइल बैंकिंग से भी जुड़ा काम करते थे। बुधवार (31 दिसंबर 2025) की रात, जब वह दुकान बंद कर घर लौट रहे थे, तभी रास्ते में कुछ लोगों ने उन्हें घेर लिया। पहले उन पर धारदार हथियार से हमला किया गया, जिससे उन्हें गंभीर चोटें आईं। इसके बाद हमलावरों ने उन पर ज्वलनशील पदार्थ डालकर आग लगा दी।

अपनी जान बचाने के लिए खोकन दास किसी तरह पास के तालाब में कूद पड़े, जिससे आग तो बुझ गई लेकिन वह बुरी तरह झुलस चुके थे और अत्यधिक खून बह चुका था। स्थानीय लोगों ने उन्हें तुरंत अस्पताल पहुँचाया, जहाँ से हालत नाजुक होने पर ढाका रेफर किया गया। हालाँकि, गंभीर चोटों और जलने के कारण डॉक्टर उन्हें बचा नहीं सके।

राणा प्रताप बैरागी की हत्या

जेस्सोर जिले के केशबपुर उपजिला स्थित अरुआ गाँव निवासी 38 वर्षीय राणा प्रताप बैरागी की सोमवार (05 जनवरी 2026) शाम को अज्ञात हमलावरों ने सिर में गोली मारकर हत्या कर दी गई। बैरागी की मोनिरामपुर के कोपलिया बाजार में बर्फ बनाने की फैक्ट्री थी। इसके अलावा ने ‘दैनिक बीडी खबर’ समाचार में नरैल क्षेत्र के कार्यवाहक संपादक भी थे।

पुलिस के अनुसार, सोमवार शाम लगभग 5.45 बजे बैरागी अपनी फैक्ट्री में थे। तभी तीन हमलावर मोटरसाइकिल पर आए और उन्हें फैक्ट्री से बाहर बुलाया और अपने साथ ले गए। रास्ते में हमलावरों ने बैरागी के सिर में तीन गोली मारी और भाग गए। बैरागी की मौके पर ही मौत हो गई।

हिंदू दुकानदार मणि चक्रवर्ती की चाकू घोंपकर हत्या

वहीं नरसिंदी जिले के पोलाश उपजिला क्षेत्र में एक हिंदू दुकानदार की सोमवार (05 जनवरी 2026) को चाकू से गोदकर बेरहमी से हत्या कर दी गई। वे चारसिंदुर बाजार में अपनी किराना दुकान चलाते थे। सोमवार शाम को भी वह अपनी दुकान पर बैठे थे, तभी अज्ञात हमलावरों ने अचानक उन पर हमला कर दिया।

उन्हें अस्पताल ले जाया गया, लेकिन रास्ते में ही उन्होंने दम तोड़ दिया। मणि चक्रवर्ती को इलाके में प्रतिष्ठित व्यापारी के रूप में जाना जाता था। घटना के बाद से इलाके में दहशत फैल गई है।

मिथुन सरकार की हत्या

6 जनवरी को नाओगाँव जिले के महादेवपुर में कट्टरपंथी भीड़ से बचने के लिए नहर में कूदे एक हिंदू युवक मिथुन सरकार की मौत हो गई। रिपोर्ट के मुताबिक, स्थानीय लोगों की भीड़ ने मिथुन पर चोरी का आरोप लगाते हुए उसका पीछा किया। जान बचाने के लिए वह चकगौरी बाजार इलाके में एक नहर में कूद गया लेकिन तैर न पाने के कारण डूब गया। मदद की गुहार के बावजूद उसे बचाया नहीं गया। पुलिस ने नहर से उसका शव बरामद किया। मिथुन भंडारपुर गाँव का रहने वाला था।

ये वे हिन्दू थे, जिनकी मौत को पुलिस ने दर्ज की और मीडिया के सामने आई। कई ऐसी हत्याएँ भी हुई जिन्हें न तो दर्ज किया गया और न ही मीडिया में इन्हें जगह मिली।

हत्याओं के अलावा हिन्दुओं के उत्पीड़न की कई खबरें सामने आई। 19 दिसंबर को सिलहट में एक हिंदू पत्रकार सुशांत दासगुप्ता के घर पर हमला किया गया, वहीं एक रिक्शा चालक को कलावा पहनने पर पीटा गया। उस पर RA&W एजेंट होने का आरोप लगाया गया और पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया।

हिन्दू महिलाओं के साथ रेप की घटनाएँ काफी बढ़ गई है। जमीन हड़पने के लिए अकेली महिला को निशाना बनाया जा रहा है। कालीगंज में एक हिन्दू विधवा महिला को शाहीन और हसन ने गैंगरेप किया और उसके दो मंजिला घर को हड़पने की कोशिश की। महिला को पेड़ से बाँधकर उसके बाल भी काट डाले। वहीं एक हिन्दू सुमन को चोरी के आरोप में जमकर पीटा और खंभे से बाँध दिया। वह भिखारी था और उसका कोई आपराधिक मामला भी नहीं था।

ये यूनुस सरकार की हकीकत है जो चीख चीखकर कह रही है कि बांग्लादेश में कट्टरपंथियों का राज है। सरकार सिर्फ मूकदर्शक है, उसे न तो कानून व्यवस्था की फिक्र है और न ही जनता की।

हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो इसकी पुष्टि करता है। इसमें एक युवक बेखौफ थाने के अंदर बैठकर कह रहा है कि उसने हिन्दू पुलिस अधिकारी को जिंदा जला दिया। सत्ता का घमंड और सिस्टम का खस्ताहाल इससे ज्यादा क्या हो सकता है। इसे देखकर यही कहा जा सकता है कि बेशर्म मोहम्मद यूनुस, अब तो जाग जाओ, जनता त्राहि त्राहि कर रही है।

कहीं दिए अरबों डालर, कहीं किया युद्ध और कहीं बनाई रणनीति: जानिए- लुइजियाना से अलास्का तक अमेरिका ने कैसे फैलाईं अपनी सीमाएँ, अब ग्रीनलैंड कब्जाने का प्लान

नए साल 2026 की शुरुआत में ही डोनाल्ड ट्रंप ने दुनियाभर में हलचल मचा दी है। अमेरिका वेनेजुएला पर हमला कर वहाँ के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को गिरफ्तार कर अपने साथ ले आया। इस कदम के बाद अमेरिका ने कहा कि वे वेनेजुएला के तेल के 30 से 50 मिलियन बैरल का इस्तेमाल करेंगे और स्पष्टीकरण दिया कि यह कार्रवाई लोकतंत्र बहाल करने और सुरक्षा की वजह से की गई है। लेकिन बहुत देशों ने इसे अतंरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया है।

वेनेजुएला के बाद ट्रंप प्रशासन ने ग्रीनलैंड को भी अपनी ‘राष्ट्रीय सुरक्षा प्राथमिकता’ बताया है और कहा कि वह इसे हासिल करने के लिए कई विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। इन विकल्पों में सैन्य कार्रवाई भी शामिल है, ताकि रूस और चीन जैसे देशों के बढ़ते प्रभाव को टाला जा सके। लेकिन ग्रीनलैंड डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है और दोनों ने साफ कहा है कि वे अमेरिका को अपना हिस्सा नहीं बनने देंगे।

अगर इन दोनों घटनाओं को अलग-अलग न देखकर इतिहास के साथ जोड़ा जाए, तो अमेरिकी का पुरानी कहानी सामने आती है। अमेरिका पहले भी कई बार पैसे, ताकत और मौके का इस्तेमाल करके अपना सीमा दायरे को बढ़ा चुका है। लुइजियाना की खरीद हो, अलास्का का सौदा हो या हवाई और प्रशांत द्वीपों पर पकड़। हर बार वजह अलग बताई गई, लेकिन तरीका लगभग वही रहा।

अब वेनेजुएला में असर बढ़ाने की कोशिश और ग्रीनलैंड को प्राथमिकता बताना उसी पुराने पैटर्न की याद दिलाता है। इसी पृष्ठभूमि में यह समझना भी जरूरी है कि अमेरिका कैसे सीमा दायरे बढ़ा रहा है और क्यों अगली बारी ग्रीनलैंड की हो सकती है।

लुइजियाना सौदा: पैसे से अमेरिका का सबसे बड़ा सीमा विस्तार

अमेरिका का दायरा बढ़ने की कहानी की शुरुआत लुइजियाना सौदे से होती है। यह घटना बताती है कि अमेरिका ने सबसे पहले पैसों के दम पर कैसे अपना आकार कई गुना बढ़ाया। साल 1803 में अमेरिका ने फ्रांस से लुइजियाना नाम का एक बहुत बड़ा इलाका खरीद लिया। उस समय यह इलाका आज के अमेरिका के करीब एक-तिहाई हिस्से के बराबर था।

उस दौर में फ्रांस के शासक नेपोलियन को यूरोप में युद्ध लड़ने के लिए पैसों की जरूरत थी। वहीं अमेरिका को डर था कि अगर यह इलाका किसी ताकतवर देश के हाथ में रहा, तो उसकी सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। इसी मजबूरी और मौके का फायदा उठाकर अमेरिका ने सिर्फ 15 मिलियन डॉलर में यह पूरा इलाका खरीद लिया। उस समय यह रकम बड़ी लगती थी, लेकिन बाद में यह सौदा अमेरिका के इतिहास का सबसे सस्ता और सबसे फायदेमंद सौदा साबित हुआ।

फ्लोरिडा, टेक्सास से अलास्का: एक ही सोच से अमेरिका का फैलाव

लुइजियाना सौदे के बाद धीरे-धीरे अमेरिका ने अपने कदम आगे बढ़ाए। अगली बारी फ्लोरिडा की आती है। फ्लोरिडा पहले स्पेन के कब्जे में था, लेकिन उस समय स्पेन कमजोर हो चुका था और इस इलाके को ठीक से संभाल नहीं पा रहा था। अमेरिका को डर था कि फ्लोरिडा उसके लिए खतरा बन सकता है। आखिरकार 1819 में Adams-Onis Treaty हुआ और फ्लोरिडा अमेरिका को मिल गया।

इसके बाद टेक्सास। टेक्सास पहले मैक्सिको का हिस्सा था, लेकिन वहाँ बड़ी संख्या में अमेरिकी नागरिक बस चुके थे। हालात ऐसे बने कि टेक्सास ने खुद को अलग देश घोषित कर दिया। कुछ साल बाद 1845 में टेक्सास अमेरिका में शामिल हो गया। यह कोई जमीन खरीदने का सौदा नहीं था, बल्कि राजनीतिक चाल और ताकत का इस्तेमाल से किया गया विस्तार था।

इसी दौर में ओरेगन टेरिटरी को लेकर अमेरिका और ब्रिटेन आमने-सामने थे। दोनों देशों के बीच टकराव हो सकता था, लेकिन अंत में बातचीत का रास्ता निकला। नतीजतन 1846 की Oregon Treaty के तहत यह इलाका बाँट लिया गया और आज का ओरेगन और वॉशिंगटन अमेरिका के हिस्से में आ गया।

फिर आया सबसे बड़ा और निर्णायक मोड़, मेक्सिको-अमेरिका युद्ध। यह युद्ध 1846 से 1848 तक चला। युद्ध खत्म होने के बाद अमेरिका को बहुत बड़ा इलाका मिला, जिसमें आज का कैलिफोर्निया, एरिजोना, न्यू मैक्सिको, नेवाडा और यूटा शामिल है। इसे Mexican Cession कहा जाता है। अमेरिका ने कुछ पैसा दिया, लेकिन असल में यह जमीन युद्ध के बाद उसकी ताकत के कारण मिली।

इसके कुछ साल बाद 1853 में Gadsden Purchase हुआ। अमेरिका ने मैक्सिको से एक छोटा-सा मेसिला वैली इलाका खरीदा। अमेरिका की वजह थी कि उसे रेलवे लाइन बिछानी थी। 78 हजार स्क्वायर किलोमीटर की जमीन भले ही छोटी थी, लेकिन अमेरिका ने भविष्य को देखते हुए यह सौदा किया।

अलास्का: कभी बेकार समझा गया, आज दुनियाभर की राजनीति का केंद्र

अलास्का को अमेरिका के विस्तार की कहानी में सबसे दिलचस्प अध्याय माना जाता है। साल 1867 में अमेरिका ने इसे रूस से खरीदा था। उस समय अमेरिका के भीतर ही लोग इस फैसले का मजाक उड़ाते थे। कहा जाता था कि अमेरिका ने बर्फ, बर्फ और सिर्फ बर्फ खरीद ली है। इसे ‘रूस की बेकार जमीन’ तक कहा गया। लेकिन समय ने साबित किया कि यह अमेरिका का यहा फैसला उसकी दूरगामी सोच का उदाहरण है।

अलास्का में बाद में सोना, तेल और गैस निकली। धीरे-धीरे यह इलाका अमेरिका की ऊर्जा सुरक्षा का बड़ा आधार बन गया। आज अमेरिका के पूरे तेल उत्पादन का बड़ा हिस्सा अलास्का से आता है। सिर्फ संसाधन ही नहीं, बल्कि इसकी भौगोलिक स्थिति भी बेहद अहम है। अलास्का सीधे ‘रूस के बेहद करीब’ है और आर्कटिक क्षेत्र में भी अमेरिका की मौजूदगी को मजबूत करता है।

यही वजह है कि अलास्का सिर्फ राज्य नहीं, बल्कि अमेरिका का रणनीतिक हथियार बन चुका है। हाल के समय में अलास्का एक बार फिर चर्चा में आया था, जब डोनाल्ड ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की बैठक के लिए इस जगह को चुना गया था।

अलास्का यह दिखाता है कि अमेरिका ने सिर्फ आज की जरूरत नहीं देखी, बल्कि भविष्य की ताकत को ध्यान में रखकर फैसले किए। जिस जमीन को कभी बेकार कहा गया, वही आज अमेरिका को ऊर्जा, सुरक्षा और वैश्विक राजनीति में बढ़त देती है।

अमेरिका की यही सोच आज ग्रीनलैंड को लेकर भी दिखाई देती है। जैसे अलास्का में बर्फ के नीचे खजाना निकला, वैसे ही ग्रीनलैंड में भी खनिज, तेल और रणनीतिक रास्ते छिपे हुए हैं। इतिहास बताता है कि अमेरिका जब किसी बर्फीली और दूर की जमीन में दिलचस्पी दिखाता है, तो उसके पीछे सिर्फ नक्शा नहीं, बल्कि आने वाले दशकों की योजना होती है।

द्वीपों और छोटे क्षेत्रों के जरिए अमेरिका का फैलाव: समुद्री क्षेत्र में पकड़ मजबूत

अमेरिका ने खुद को केवल महाद्वीपों तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि द्वीपों और छोटे-छोटे क्षेत्रों के जरिए भी दायरा बढ़ाया। ये इलाके रणनीतिक और समुद्री महत्व रखते थे। हर जगह अमेरिका ने अलग तरीका अपनाया। किसी को खरीदा, कभी युद्ध के बाद समझौता और कभी सीधे दबाव या कब्जा। इन इलाकों से अमेरिका ने नौसेना और व्यापार में अपनी पकड़ मजबूत की।

सबसे पहले बात हवाई द्वीप (Hawaiian Island) की। हवाई पहले स्वतंत्र राज्य था, जहाँ रानी का शासन था। लेकिन अमेरिकी व्यापारियों और सेना के दबाव में 1898 में हवाई को अमेरिका में मिला लिया गया। यहाँ न खरीद हुई, न खुला युद्ध, बल्कि राजनीतिक दबाव और सत्ता पलट के जरिए अमेरिका ने इसे अपने अधीन किया।

इसके बाद आते हैं फिलिपींस और प्रशांत क्षेत्र के बड़े द्वीप। 1898 का स्पेन-अमेरिका युद्ध के बाद अमेरिका को फिलिपींस, गुआम (Guam) और प्यूर्टो रिको (Puerto Rico) मिले। यह इलाके सीधे युद्ध और उसके बाद हुए समझौते से अमेरिका में शामिल हुए। यहाँ अमेरिका का मकसद समुद्री रास्तों और रणनीतिक बेस पर दबदबा बनाना था।

अमेरिका ने छोटे और दूरदराज के अटोल और द्वीप भी अपने अधीन किए। इनमें Midway Island, Wake Island, Johnston Atoll, Palmyra Atoll, Kingman Reef और American Samoa शामिल हैं। ये इलाके आकार में छोटे थे। अमेरिका ने इनमें सैन्य बेस बनाए, नौसेना के लिए रास्ते बनाए, जिससे प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका की पकड़ मजबूत हुई।

निष्कर्ष: वेनेजुएला और ग्रीनलैंड, अमेरिकी के विस्तार की वही पुरानी कहानी

अगर अब तक की पूरी कहानी को एक साथ जोड़कर देखा जाए, तो बात साफ समझ आती है। अमेरिका का विस्तार कभी अचानक नहीं हुआ और न ही किसी एक तरीके को अपनाने से हुआ। उसने कभी जमीन पैसे देकर खरीदी, कभी समझौते और दबाव से ली, कभी युद्ध के बाद अपने कब्जे में की और कभी छोटो-छोटे क्षेत्रों में धीरे-धीरे अपने पकड़ बनाई। अलास्का से लेकर हवाई द्वीप, हर जगह अमेरिका ने अपने फायदे को सबसे ऊपर रखा है।

ऐसे में आज जब वेनेजुएला की बात होती है, तो इतिहास अपने आप याद आता है। वेनेजुएला दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार वाले देशों में से एक है। अमेरिका लंबे समय से वहाँ की राजनीति और सत्ता बदलाव में दिलचस्पी दिखाता रहा है। भले ही आज सीधे जमीन लेने की बात न हुई हो, लेकिन सत्ता पर असर डालकर और संसाधनों को नुकसान पहुँचाकर अमेरिका वही पुरानी रणनीति से अपना दायरा बढ़ाने का काम जरूर कर सकता है।

इसी तरह ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका की दिलचस्पी भी नई नहीं लगती है। बर्फ से ढका यह इलाका दिखने में भले ही खाली लगे, लेकिन इसके नीचे खनिज, तेल और भविष्य में समुद्री रास्ते छिपे हैं। जैसे कभी अलास्का को बेकार समझा गया था और बाद में वही अमेरिका के लिए खजाना साबित हुआ, वैसे ही ग्रीनलैंड को भी अमेरिका भविष्य की बड़ी रणनीति के तौर पर देख रहा है।

इसीलिए वेनेजुएला और ग्रीनलैंड को अलग-अलग घटनाओं की तरह देखने के बजाए, अगर उन्हें अमेरिका के पुराने विस्तार के इतिहास से जोड़कर देखा जाए। तब तस्वीर ज्यादा साफ हो जाती है।

राजनीति के लिए कानून-व्यवस्था के नाम का डर फैलाया गया: पढ़ें- मद्रास HC ने कार्तिगई दीपम जलाने को सही ठहराते हुए स्टालिन सरकार से क्या-क्या कहा

मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन के उस आदेश को सही ठहराया जिसमें थिरुपरनकुंद्रम हिल पर दीपाथून पर कार्तिगई दीपम जलाने की इजाजत दी गई थी। कोर्ट ने स्टालिन के नेतृत्व वाली DMK सरकार की कड़ी आलोचना की। साथ ही सरकार के कानून व्यवस्था की समस्या के दावों को खारिज करते हुए इसे बेबुनियाद और राजनीति से प्रेरित बताया।

मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन के फैसले को बरकरार रखा, जिसमें मशहूर थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर बने पुराने पत्थर के खंभे पर दीया जलाने का आदेश दिया गया था। यह भगवान मुरुगन के छह घरों में से एक माना जाता है। यह आदेश 6 जनवरी को जस्टिस जी. जयचंद्रन और जस्टिस के.के. रामकृष्णन की खंडपीठ ने दी थी।

कोर्ट ने द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) सरकार के रवैये को लेकर नाराजगी जताई, क्योंकि उसने साल में एक दिन होने वाले रस्म को करने की इजाज़त नहीं दी। कोर्ट ने कहा कि इससे अशांति फैलेगी। बेंच ने कानून व्यवस्था के मुद्दे को ‘फिजुल और यकीन करने के लायक नहीं’ बताया।

मद्रास हाईकोर्ट ने सख्ती के साथ कहा कि ऐसा तभी हो सकता है जब ऐसी गड़बड़ी खुद राज्य द्वारा स्पॉन्सर की गई हो। हम प्रार्थना करते हैं कि कोई भी राज्य अपना पॉलिटिकल एजेंडा पूरा करने के लिए उस लेवल तक न गिरे। इससे सरकार को बड़ी शर्मिंदगी उठानी पड़ेगी।

अपील करने वाले सबूत नहीं दे पाए, वक्फ बोर्ड के पास अधिकार नहीं

जजों ने कहा कि अपील करने वालों जैसे- हज़रत सुल्तान सिकंदर बादुशा अवुलिया दरगाह और राज्य के अधिकारियों के पास सबूत नहीं हैं। इनलोगों के पास ऐसे सबूत नहीं हैं कि शैवों के ‘आगम शास्त्र’ में उस जगह पर दीया जलाने पर रोक है, जो सीधे गर्भगृह में भगवान की मूर्ति के ऊपर नहीं है।

कोर्ट ने जोर देकर कहा, “निर्देश का मकसद सुरक्षा पक्का करना है। इसलिए जज द्वारा सुझाई गई दूरी की पाबंदी दीपम जलाने की जगह तय करने के लिए ज़रूरी शर्त नहीं है। दीपम जलाने की जगह तय करते समय सिर्फ धार की प्रॉपर्टी की सुरक्षा ही अहम है।”

धार्मिक कामों का महत्व, पत्थर के खंभे पर दीपम जलाने की जरूरत

बेंच ने कहा कि दीपम जलाने के लिए सबसे अच्छी जगह पत्थर का खंभा है, जो एक अलग चट्टान की चोटी पर है और उस चोटी के नीचे है जहाँ धार है। जजों ने धार्मिक कामों का मकसद भी बताया और बताया कि कार्तिकेयदीपम और दूसरे त्योहारों के दौरान अच्छी जगहों पर दीपम जलाने का रिवाज है, ताकि पहाड़ी और आस-पास के इलाकों में रहने वाले भक्त देख सकें और पूजा कर सकें।

फिर उन्होंने संत थिरुमूलर का ज़िक्र किया, जिन्होंने कहा था कि ‘रोशनी भगवान शिव का रूप है।’ कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि देवस्थानम के पास अपने भक्तों की इच्छाओं को नज़रअंदाज़ करने का कोई कारण नहीं है। उसकी ज़मीन की सीमाओं के अंदर ऊँची जगहों पर दीये जलाने की परंपरा है।

इसने पिछले फ़ैसले को दोहराया कि पहाड़ी पर कोई भी गतिविधि तय सीमाओं के अंदर हो रहा है। कोर्ट ने फिर से कहा कि पहाड़ी प्राचीन स्मारक और पुरातत्व स्थल और अवशेष (AMASR) एक्ट के तहत एक सुरक्षित इलाका है। सभी को एक्ट, इसके नियमों और जस्टिस आर. विजयकुमार के फैसले के बाद जो निकल कर सामने आया है, उसका पालन करना चाहिए।

DMK सरकार की चिंता निराधार

अदालत ने DMK सरकार की खिंचाई करते हुए कहा कि कानून-व्यवस्था की आशंका ‘एक काल्पनिक डर’ है, जिसे राजनीतिक एजेंडे के लिए बनाया गया है। पीठ ने कहा, “यह मानना हास्यास्पद और मुश्किल है कि शक्तिशाली राज्य इस डर से दीपम जलाने की अनुमति नहीं दे रहा है कि इससे सार्वजनिक शांति भंग होगी”। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पहाड़ी पर स्थित दीपस्तंभ की जगह श्री सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर की संपत्ति है।

बेंच ने आरोप लगाया, “देवस्थानम से कुछ लोगों को दीया जलाने के लिए खंभे तक आने देना और भक्तों को पहाड़ी के नीचे ही रोककर पूजा करना कोई मुश्किल काम नहीं है। यह दिखाना कि इस तरह के जमावड़े से शांति भंग होगी, भगदड़ मचेगी, समुदाय के बीच वैमनस्य बढ़ेगा, वगैरह, या तो यह दिखाता है कि वे कानून-व्यवस्था बनाए रखने में नाकाम हैं या समुदायों के बीच सद्भाव लाने में हिचकिचा रहे हैं।”

इसने कहा कि राज्य को, जिला प्रशासन के जरिए इस मुद्दे पर हिन्दू मुस्लिम समुदायों के बीच भाईचारा और शांति लाने की कोशिश करनी चाहिए था। कोर्ट ने कहा कि इतने सालों में शांति वार्ता ने सिर्फ शक बढ़ाने का काम किया है, क्योंकि यकीन की कमी है।

कोर्ट ने थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर दीया जलाने को सही ठहराया

जजों ने कहा कि दीपाथॉन में दीया देवस्थानम को जलाना होगा। आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया (ASI) पहाड़ी के स्मारकों की सुरक्षा के लिए AMASR एक्ट में दी गई पाबंदियों और रोक के साथ-साथ जरूरी शर्तें भी लागू करेगा।

उन्होंने बताया, “देवस्थानम को अपनी टीम के जरिए, तमिल महीने कार्तिगई में पड़ने वाले कार्तिगईदीपम त्योहार के मौके पर दीपाथून में दीया जलाना होगा। किसी भी आम आदमी को देवस्थानम टीम के साथ जाने की इजाज़त नहीं होगी।” टीम के सदस्यों की संख्या पुलिस और ASI से सलाह-मशविरा करने के बाद चुनी जाएगी। पूरा इवेंट डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर की देखरेख में होगा।

हिंदू अधिकारों के लिए कानूनी लड़ाई

मद्रास हाई कोर्ट ने फैसला किया कि थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर पुराना पत्थर का खंभा कार्तिगई दीपम का दीया जलाने के लिए सही है। हालांकि, खंभे के सिकंदर बादुशा दरगाह के पास होने की वजह से इसका विरोध हुआ, और दीया आमतौर पर उचिपिलैयार मंदिर के पास एक अलग जगह पर जलाया जाता था।

हालाँकि, जस्टिस जीआर स्वामीनाथन ने दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि दीपाथून पर दीया जलाने से मुस्लिम समुदाय या दरगाह के अधिकारों पर कोई बुरा असर नहीं पड़ेगा। 3 नवंबर को पारंपरिक उचिपिलैयार मंदिर मंडपम में दीया जलाने के बाद पुलिस और हिंदू एक्टिविस्ट के बीच लड़ाई हो गई थी।

DMK ने कानून व्यवस्था को मुद्दा बनाते हुए कोर्ट के आदेश के खिलाफ मद्रास हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। वहीं याचिकाकर्ता रामा रविकुमार ने CISF की मदद से पहाड़ी पर चढ़ने की कोशिश की थी।

लेकिन मदुरै डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर ने लोगों की सुरक्षा का हवाला देते हुए रोक लगा दी। इस स्थिति में मदुरै कमिश्नर जे लोगनाथन की अगुवाई में राज्य पुलिस ने श्रद्धालुओं को रोक दिया। हिंदू मुन्नानी के सदस्य समेत तमाम श्रद्धालुओं ने मंदिर के सामने जमा होकर कोर्ट द्वारा तय जगह पर दीया जलाने की इजाज़त देने की माँग की।

कुछ लोगों ने पुलिस बैरिकेड पार करने की भी कोशिश की। धक्का-मुक्की और झगड़े की वजह से एक पुलिस ऑफिसर घायल हो गया। एक टॉप हिंदू मुन्नानी एक्टिविस्ट के मुताबिक, मंदिर एडमिनिस्ट्रेशन ने कोर्ट के आदेश का पालन करने के लिए ‘कोई भी इंतज़ाम’ नहीं किया था।

मंदिर के मैनेजमेंट ने पिछले फैसले को यह कहते हुए चुनौती भी दी थी कि इस कार्रवाई से सांप्रदायिक सद्भाव को खतरा हो सकता है। लेकिन, कोर्ट ने सख्त निर्देश दिया कि शाम 6 बजे तक दीया जलाना होगा, नहीं तो शाम 6:05 बजे कंटेम्प्ट की कार्रवाई शुरू होगी।
जस्टिस स्वामीनाथन ने कहा, “मैंने खास तौर पर पुलिस को यह पक्का करने का आदेश दिया था कि भक्तों का पिटीशन में बताई गई जगह पर कार्यक्रम मनाने और पूजा करने का अधिकार बना रहे, लेकिन इसका पालन नहीं किया गया।”

फिर भी, तमिलनाडु सरकार और मदुरै के अधिकारियों ने बाद में फैसले को चुनौती देने के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां भक्तों ने जस्टिस जी जयचंद्रन और केके रामकृष्णन की डिवीजन बेंच को बताया कि तमिलनाडु के हिंदू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एंडोमेंट्स डिपार्टमेंट (HR&CE डिपार्टमेंट) कमिश्नर ने 17 दिसंबर को सनातन धर्म का ‘खुलेआम अपमान और बेइज्जती’ की है।

हिंदुओं का पक्ष रख रहे सीनियर एडवोकेट एस श्रीराम ने कहा कि हर बार जब शांति बैठक में हिन्दुओं को अपने अधिकार छोड़ने के लिए मजबूर किया गया है। उन्होंने थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर गैर-कानूनी कब्जे के साथ-साथ वहां जानवरों की बलि देने, उसका नाम बदलकर सिकंदर हिल करने और एक इस्लामी त्यौहार पर उसे हरे रंग से रंगने की कोशिश की भी चर्चा की। यह भी बताया गया कि राज्य कोई ऐसा डॉक्यूमेंट नहीं दे पाया, जिससे पता चले कि वह खंभा दीपाथॉन नहीं है।

यह ध्यान देने वाली बात है कि इस मामले को लेकर विपक्षी नेताओं ने पार्लियामेंट से वॉकआउट भी किया। विदुथलाई चिरुथैगल काची के फाउंडर-प्रेसिडेंट थोल. थिरुमावलवन ने तो थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर दीया जलाने की कोशिश कर रहे हिंदू भक्तों को ‘आतंकवादी’ तक कह डाला। यहाँ तक कि जस्टिस स्वामीनाथन को पद से हटाने की माँग की।

मद्रास HC ने हिंदू अधिकारों को दबाने की राज्य सरकार की कोशिश को एक बड़ा झटका दिया है और एक मिसाल कायम की है। भले ही राज्य की मशीनरी बेशर्मी से हिंदू अधिकारों को दबाने और उनके धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन करने की कोशिश कर रही हो। फैसले में कहा गया कि कानून और व्यवस्था बनाए रखना राज्य की जिम्मेदारी है, न कि सांप्रदायिक सद्भाव के बहाने हिंदू भक्तों को उनके विश्वासों और प्रथाओं को मानने से रोकना।

इसने सांप्रदायिक सद्भाव की गलत व्याख्या की भी निंदा की गई है, जो सिर्फ हिंदुओं की धार्मिक आजादी पर हमला करके हासिल की जाती है। सबसे महत्वपूर्ण बात, कोर्ट ने राज्य सरकार के गलत इरादों को सामने लाया है, जिसका मकसद मुसलमानों को खुश करने के लिए हिंदू समुदाय के अधिकारों को रोकना था।

(ये लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)