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विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान: 2047 के विकसित भारत का शैक्षणिक रोडमैप, औपनिवेशिक ढाँचे से मुक्त हो उच्च शिक्षा के भारतीयकरण का प्रयास

अपने दूसरे कार्यकाल के प्रारंभ से ही मोदी सरकार शिक्षा क्षेत्र में आधारभूत परिवर्तनों के लिए प्रयत्नशील है। हालाँकि, इन परिवर्तनों की पृष्ठभूमि पहले कार्यकाल में ही तैयार होने लगी थी। इस क्रम में भारतीय उच्च शिक्षा आयोग (विश्व विद्यालय अनुदान आयोग की समाप्ति) विधेयक–2018 के मसौदे को विभिन्न हितधारकों से परामर्श और प्रतिक्रिया लेने के लिए सार्वजनिक किया गया था। व्यापक विचार-विमर्श और जनभागीदारी से निर्मित राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 उच्च शिक्षा क्षेत्र में सुधार का अगला महत्वपूर्ण कदम था।

मैकॉले और मैकॉले-पुत्रों द्वारा निर्मित-विकसित भारत का शिक्षा-तंत्र भारत और भारतीयों की आवश्यकताओं और अपेक्षाओं को पूरा करने में असफल रहा है। इसलिए इस औपनिवेशिक तंत्र में आमूलचूल परिवर्तन करते हुए उसे भारत केंद्रित बनाने और उसके भारतीयकरण पर जोर दिया जाता रहा है। भारतीय ज्ञान परंपरा का पुनराविष्कार और प्रतिष्ठा राष्ट्रीय शिक्षा नीति की केंद्रीय चिंता रही है। शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाकर और उसकी पहुँच सर्वसाधारण तक सुनिश्चित करके ही भारत में अंतर्निहित अपरिमित  संसाधनों और भारतवासियों की असीम क्षमताओं का पूर्ण विकास संभव है।

गुणवत्तापूर्ण और सर्वसुलभ शिक्षा, समाजोपयोगी नवाचारी शोध तथा युवा पीढ़ी के कौशल विकास द्वारा ही राष्ट्रीय विकास का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। पिछले दिनों केंद्र सरकार ने उपरोक्त विधेयक में आंशिक परिवर्तन करते हुए उसके कार्यान्वयन का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा पारित ‘विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक–2025’ को संयुक्त संसदीय समिति को विचारार्थ प्रेषित किया गया है। यह सम्पूर्ण उच्च शिक्षा क्षेत्र का एकमात्र नियामक तंत्र होगा। हालाँकि, चिकित्सा शिक्षा, फार्मेसी और विधि की शिक्षा इसके दायरे में नहीं होगी।

अभी उच्च शिक्षा क्षेत्र में अनेक नियामक संस्थाएँ कार्यरत हैं। उनके अपने–अपने मानदंड व मापदंड हैं। UGC, AICTE, NCTE, वास्तु परिषद, कृषि विज्ञान अनुसंधान परिषद, दूरस्थ और मुक्त शिक्षा, ऑनलाइन और डिजिटल शिक्षा तंत्र, ICSSR, ICAR, नैक, NIRF जैसी एक दर्जन से अधिक नियामक संस्थाएँ देश के कला, विज्ञान, व्यवसाय, अभियांत्रिकी, शिक्षा, प्रबंधन, कृषि शिक्षा आदि अनुशासनों से सम्बंधित उच्च शिक्षण संस्थानों व शोध-संस्थानों की संबद्धता, मूल्यांकन, प्रत्यायन, रैंकिंग, वित्तपोषण और नियंत्रण आदि काम करती हैं।

इन अलग-अलग नियामक संस्थाओं के अधीन उच्च शिक्षा पृथक्करण और बहुपरतीय नियंत्रण का शिकार थी। देश भर में ऐसे अनेक उच्च शिक्षण संस्थान व शोध-संस्थान हैं, जहाँ एक साथ कई प्रकार के पाठ्यक्रम पढ़ाए जाते हैं एवं इनसे सम्बद्ध शोध-कार्य किया जाता है। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में सभी संस्थानों को क्रमशः बहु-अनुशासनिक बनाने पर जोर दिया गया है। विभिन्न पेशेवर और परम्परागत संस्थानों की आपसी दूरी और अलगाव के ‘स्टील फ्रेम’ की क्रमिक समाप्ति की जा रही है।

इन बहु-अनुशासनिक उच्च शिक्षण संस्थानों व शोध-संस्थानों को अपनी मान्यता, मूल्यांकन, प्रत्यायन, रैंकिंग एवं वित्तपोषण आदि के लिए अलग-अलग नियामक संस्थाओं का दरवाजा खटखटाना पड़ता था। इस प्रक्रिया में ये संस्थान अनेक प्रकार की समस्याओं का सामना करते रहे हैं। कई बार इन नियामक संस्थाओं में अनियमितता एवं पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने का दोषारोपण भी होता रहा है। पाठ्यक्रमों के निर्माण एवं उनके कार्यान्वयन में भी ये नियामक संस्थाएँ दोषमुक्त नहीं रही हैं। ये स्वायत्त नियामक संस्थाएँ आपसी टकराव और अंतर्विरोध का भी शिकार रही हैं। इससे संबंधित संस्थानों को अनावश्यक अड़चन और अवरोध का सामना करना पड़ता है। 

इसीलिए केंद्र सरकार ने इन सभी नियामक संस्थाओं की कार्यशैली का मूल्यांकन करते हुए इन्हें एक सर्वसक्षम निकाय के अधीन लाने का निर्णय लिया है। अब अलग-अलग नियामक संस्थाओं में बँटी-बिखरी हुई उच्च शिक्षा एक ही नियामक संस्था ‘विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक–2025, जो कि सीधे तौर पर शिक्षा मंत्रालय की निगरानी में काम करेगा। यह UGC एक्ट–1956, AICTE एक्ट–1987  और NCTE–1993 का स्थान लेगा। इस तरह के एकल और केंद्रीकृत निकाय की संस्तुति राष्ट्रीय ज्ञान आयोग (2009) और यशपाल समिति (2010) ने भी की थी। यह आयोग विभिन्न संस्थाओं के आपसी सामंजस्य, समन्वय और सक्रियता के अभाव और लालफीताशाही के प्रभाव की समाप्ति और जवाबदेही और पारदर्शिता और समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित करेगा।

इस आयोग की विशेषता यह है कि यह एक साथ देश के तमाम केंद्रीय विश्वविद्यालयों और शीर्षस्थ उच्च शिक्षण संस्थानों जैसे IIT, NIT, IIIT आदि का नियमन और नियंत्रण करते हुए उनके मूल्यांकन, प्रत्यायन एवं रैंकिंग आदि का काम करेगा। चेयरमैन के अलावा इसके 12 सदस्य और होंगे।

इस आयोग के विकसित भारत शिक्षा विनियमन परिषद, विकसित भारत मानक परिषद और विकसित भारत शिक्षा गुणवत्ता परिषद जैसे तीन आयाम (वर्टिकल) होंगे। यह आयाम नियमन, मान्यता और व्यावसायिक मानक निर्धारण का कार्य करेंगे। अब तक इन संस्थानों के वित्तपोषण का काम यूजीसी आदि कई एजेंसियां करती थीं। अब यह कार्य सीधे शिक्षा मंत्रालय के अधीन होगा। अब देश के उच्च शिक्षण संस्थानों को मौजूदा अलग-अलग नियामक संस्थाओं के चक्कर काटने से मुक्ति मिलेगी एवं ये शिक्षण संस्थान राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लक्षित उद्देश्यों की प्राप्ति की दिशा में तत्पर हो सकेंगे। 

यह आयोग भारत में उच्च शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण और सर्वसुलभ बनाने के लिए उत्तरदायी होगा। यह एकीकृत निकाय देशभर की उच्च शिक्षा प्रणाली का पाठ्यक्रम, अधिगम और मानकों में स्तरीकरण सुनिश्चित करेगा। संस्कारपूर्ण, कौशल संवर्द्धक  और रोजगारपरक शिक्षा देने वाले सर्वसमावेशी उच्च शिक्षण संस्थानों को स्वायत्तता, संरक्षण और प्रोत्साहन देने का काम भी यह आयोग करेगा। इसके अलावा निर्धारित मानकों, प्रक्रियाओं और गुणवत्ता का अनुपालन न करने वाले संस्थानों पर 10 लाख से लेकर 2 करोड़ रुपए तक जुर्माना लगाने का भी प्रावधान किया गया है।

यह आयोग उच्च शिक्षण संस्थानों के दोहरे-तिहरे नियमन की वर्तमान व्यवस्था का सरलीकरण और स्तरीकरण करेगा, ताकि शिक्षण संस्थानों के प्रबंधन में दोहरा/तिहरा हस्तक्षेप न हो। इस आयोग द्वारा उच्च शिक्षा में मानकों और गुणवत्ता के संबंध में पारदर्शी तरीके से सार्वजनिक प्रस्तुतीकरण और योग्यता आधारित निर्णय के माध्यम से विनियमन किया जायेगा।

इस आयोग को अधिगम परिणामों (लर्निंग आउटकम) पर विशेष ध्यान देने के अलावा शैक्षणिक मानकों में सुधार, संस्थानों के शैक्षणिक प्रदर्शन का मूल्यांकन, संस्थानों का परामर्श, शिक्षकों का प्रशिक्षण, अधुनातन शैक्षिक पद्धतियों और प्रौद्योगिकी के उपयोग को बढ़ावा देने आदि का काम भी करना होगा। यह आयोग संस्थानों के नियमन और संचालन के लिए अनुकूलित वातावरण बनाते हुए अधिक लचीलेपन के साथ स्वायत्तता प्रदान करेगा। इस आयोग के पास उच्च शिक्षण संस्थानों में शैक्षणिक गुणवत्ता मानकों का अनुपालन सुनिश्चित करवाने तथा स्तरहीन और कागजी संस्थानों को बंद कराने की शक्ति भी होगी।

औपनिवेशिक काल से ही जनसंख्या के अनुपात में उच्च शिक्षण संस्थानों की संख्या एवं गुणवत्ता की दृष्टि से भारत की स्थिति सुखद नहीं है। भारत लगभग एक हजार विश्वविद्यालयों एवं चालीस हजार कॉलेजों के साथ दुनिया की सबसे बड़ी उच्च शिक्षा प्रणाली है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली के अनुपात में यह बहुत सीमित है। भारत में सार्वजनिक उच्च शिक्षा का स्तर भी चिंताजनक है। भारत में उच्च शिक्षा क्षेत्र के स्तरीकरण, विस्तार और विकास की अत्यधिक आवश्यकता एवं असीम संभावनाएँ हैं। 

उच्च शिक्षा की वर्तमान दशा स्वतंत्रता के बाद देश में अपनाई गयी उच्च शिक्षा नीति के मूलभूत दोषों को उजागर करती है। किंतु अब यह नव निर्मित आयोग उच्च शिक्षा की खामियों को चिह्नित करते हुए उन्हें दूर करने तथा शिक्षा के स्तरीकरण और भारतीयकरण का काम करेगा। यह शिक्षा तंत्र के विस्तार को भी सुनिश्चित करेगा।

यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति का पूर्ण कार्यान्वयन सुनिश्चित करते हुए भारत को ज्ञान अर्थव्यवस्था बनाने में सहायक होगा। उच्च शिक्षण संस्थानों को योग्य शिक्षक और सक्षम नेतृत्व प्रदान करने में भी इस आयोग द्वारा निर्मित नीतियों और मानकों की निर्णायक भूमिका होगी। इस एकीकृत और सर्वसक्षम आयोग के गठन से समय, श्रम–ऊर्जा, संसाधन और धन की भी बचत होगी।

उपरोक्त लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए सरकार को उच्च शिक्षा तंत्र में भारी निवेश करने की भी आवश्यकता होगी। 

भारत सरकार ने इस आयोग के साथ ही विगत 04 अगस्त, 2023 को ‘राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन अधिनियम’ को  भी संसद से पारित कराया है। भारतीय उच्च शिक्षा आयोग की भांति यह फाउंडेशन भी अनुसंधान की दशा व दिशा को बदलने की युगांतकारी पहल है। यह फाउंडेशन गणित, प्राकृतिक विज्ञान, इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी, पर्यावरण और पृथ्वी विज्ञान, स्वास्थ्य और कृषि तथा मानविकी और सामाजिक विज्ञान की अंतर्क्रिया और अभिक्रिया को संभव करेगा। यह अनुसंधान, नवाचार एवं उद्यमिता के लिए रणनीतिक दिशा एवं आवश्यक संसाधन और ढांचागत सुविधाएं प्रदान करने वाला देश का सर्वोच्च निकाय होगा।

आज भारत चाँद के दक्षिणी ध्रुव पर तिरंगा लहरा रहा है। यह भारत के वैज्ञानिकों की गंभीर अनुसंधान-वृति का प्राप्य है। भारत की प्राचीनतम अनुसंधान-वृत्ति का पुनराविष्कार, प्रोत्साहन इस फाउंडेशन के ध्येय है। संसाधनों की कमी और लालफीताशाही को समाप्त करके और अनुसंधान को समाज और उद्योग जगत से जोड़कर ही भारत को 2047 में विकसित राष्ट्र बनाया जा सकता है। सन् 2021 में केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय का दायित्व संभालने के बाद से ही शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने भारत के विकास में शिक्षा क्षेत्र की भूमिका को पहचानते हुए उसमें आमूलचूल बदलाव की पहल की है।

भारतीय शिक्षा तंत्र को अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार होने की भी आवश्यकता है क्योंकि बहुत से प्रतिष्ठित विदेशी विश्वविद्यालय भारत में अपने परिसर स्थापित कर रहे हैं। हमारे कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को इनके साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए इच्छाशक्ति, गुणवत्ता और साधन– संसाधनों की महती आवश्यकता होगी। इस आयोग के गठन को लेकर अकादमिक जगत में संशय और असुरक्षा का वातावरण है।

इसे सार्वजनिक उच्च शिक्षा के ध्वस्तीकरण के द्वारा शिक्षा के निजीकरण और व्यवसायीकरण की कोशिश बताया जा रहा है। इस विधेयक में शुल्क के निर्धारण और नियंत्रण का प्रावधान नहीं होने से शिक्षा के बाजारीकरण का भी खतरा है। उच्च शिक्षा में महँगे होने और अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, महिलाओं, गांवों और गरीबों के लिए वहनीय और स्तरीय शिक्षा का द्वार बंद होने की आशंका व्यक्त की जा रही है। ऐसी आशंका व्यक्त की जा रही है कि शिक्षा जैसी मानव समाज की अनिवार्य आवश्यकता को कॉरपोरेटों के हवाले कर दिया जाएगा।

अनुदान को लेकर राज्य विश्वविद्यालयों और राज्य सरकारों को भी चिंता हो रही है। उनका मानना है कि इस उच्च शिक्षा तंत्र में केंद्रीकरण बढ़ेगा और एक ही संस्था सर्वशक्तिप्रधान हो जाएगी। इन चिंताओं का इसका संज्ञान लेते हुए सार्वजनिक शिक्षा में निवेश बढ़ाकर और उसे समावेशी और सर्वसुलभ बनाकर ऐसी आशंकाओं और आलोचनाओं पर पूर्ण विराम लगाने की आवश्यकता है। उच्च शिक्षा फंडिंग एजेंसी को लेकर भी बौद्धिक जगत आशंकित और असुरक्षित है। जबकि यह योजना सार्वजनिक शिक्षा–तंत्र के आधारभूत ढांचे को बेहतर बनाने, भागीदारी और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए लाई गई है।

यह सच है कि शिक्षा तंत्र को सिर्फ सरकार का दायित्व न मानकर सभी हितधारकों को उसमें भागीदारी और जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए। नियुक्ति–प्रक्रिया में गुणवत्ता और पारदर्शिता, संचालन में दूरदर्शिता और सक्षमता, आधारभूत ढांचे के निर्माण में आंशिक और आनुपातिक भागीदारी और उत्पादकता में वृद्धि करने के लिए सभी हितधारकों को अपना सर्वोत्तम योगदान देने के बारे में

गंभीरतापूर्वक विचार करने की आवश्यकता है। दायित्व–विमुख और अधिकार–सचेत बौद्धिक समाज उच्च शिक्षा तंत्र न तो सरकार से प्रश्न पूछने का नैतिक साहस रखता है, और न ही देश और समाज का कल्याण करने की सामर्थ्य रखता है। यह हास्यास्पद ही है कि कुछ विपक्षी और दक्षिण भारत के सांसदों ने इस अधिष्ठान के नाम पर तंज कसते हुए इसे हिंदी थोपने की कोशिश बताया है। यह सकारात्मक सुधारों को स्वीकारते हुए उनके बेहतर कार्यान्वयन की दिशा में संगठित प्रयास करने का समय है, अन्यथा उच्च शिक्षा तंत्र भी स्कूली शिक्षा तंत्र की गति को प्राप्त हो जाएगा।

‘सट्टेबाजी का साम्राज्य’ बनाया, युवराज-रैना-धवन जैसे सितारों को फँसाया: अब ED कर रही सबकी संपत्तियाँ अटैच, जानें क्या है 1xBet जिसके चंगुल में आई बड़ी-बड़ी हस्तियाँ

भारत में अवैध ऑनलाइन सट्टेबाजी और उससे जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय यानी ED ने अब तक की सबसे सख्त कार्रवाइयों में से एक को अंजाम दिया है। हालिया कार्रवाई में शुक्रवार (19 दिसंबर 2025) को ED ने अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन बेटिंग प्लेटफॉर्म 1xBet से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग केस में नामी क्रिकेटरों, फिल्मी सितारों और सार्वजनिक हस्तियों की 7.93 करोड़ रुपए की संपत्तियाँ अस्थायी रूप से अटैच कर दीं।

इससे पहले भी इसी मामले में अक्टूबर 2025 में कार्रवाई हो चुकी थी। अब तक कुल मिलाकर 19.07 करोड़ रुपए की संपत्तियाँ इस केस में ED के शिकंजे में आ चुकी हैं। यह कार्रवाई सिर्फ सेलेब्रिटीज तक सीमित नहीं है बल्कि इसके तार म्यूल अकाउंट्स, शेल कंपनियों, लग्जरी शादियों और राजनीतिक कनेक्शन तक जुड़ते नजर आ रहे हैं।

क्या है 1xBet मामला और क्यों हुई ताजा कार्रवाई?

ED की जाँच के मुताबिक, 1xBet एक अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन सट्टेबाजी और जुए के खेल वाला प्लेटफॉर्म है, जो भारत में बिना किसी वैध लाइसेंस या सरकारी अनुमति के काम कर रहा था। भारत में ऑनलाइन सट्टेबाजी को लेकर कानून बेहद सख्त हैं और इसके बावजूद 1xBet ने क्रिकेट, फुटबॉल, ई-स्पोर्ट्स और वर्चुअल गेम्स पर बड़े पैमाने पर बेटिंग करवाई।

ED का कहना है कि इस अवैध गतिविधि से जो कमाई हुई, उसे सीधे भारत में लाने के बजाय विदेशी कंपनियों, डिजिटल वॉलेट्स और कई स्तरों में ट्रांजैक्शन करके वैध दिखाने की कोशिश की गई। इसी अवैध कमाई को कानून की भाषा में ‘प्रोसीड्स ऑफ क्राइम’ कहा जाता है। ED ने इन्हीं पैसों से खरीदी गई संपत्तियों को PMLA कानून के तहत अस्थायी रूप से अटैच किया है।

किन-किन नामी हस्तियों पर गिरी गाज?

ED की इस कार्रवाई में कई बड़े और चर्चित नाम सामने आए हैं। इनमें पूर्व भारतीय क्रिकेटर युवराज सिंह और रॉबिन उथप्पा शामिल हैं। इसके अलावा फिल्म और एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री से अभिनेता सोनू सूद, अभिनेत्री उर्वशी रौतेला, नेहा शर्मा, तृणमूल कॉन्ग्रेस की पूर्व सांसद और अभिनेत्री मिमी चक्रवर्ती और अभिनेता अंकुश हाजरा का नाम भी इस केस में जुड़ा है।

इससे पहले अक्टूबर 2025 में ED ने इसी 1xBet मामले में शिखर धवन और सुरेश रैना से जुड़ी 11.14 करोड़ रुपए की संपत्तियाँ अटैच की थीं। इस तरह यह साफ हो गया है कि जाँच का दायरा लगातार बढ़ रहा है और आने वाले समय में और भी नाम सामने आ सकते हैं।

किसकी कितनी संपत्ति अटैच की गई?

ED द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, युवराज सिंह की करीब 2.5 करोड़ रुपए की संपत्तियाँ अटैच की गई हैं। रॉबिन उथप्पा से जुड़ी संपत्तियों का मूल्य 8.26 लाख रुपए बताया गया है। अभिनेत्री उर्वशी रौतेला की 2.02 करोड़ रुपए की संपत्तियाँ अटैच हुई हैं, जो उनकी माँ के नाम पर रजिस्टर्ड थीं।

अभिनेता सोनू सूद की 1 करोड़ रुपए की संपत्तियाँ, मिमी चक्रवर्ती की 59 लाख रुपए, अंकुश हाजरा की 47.20 लाख रुपए और नेहा शर्मा की 1.26 करोड़ रुपए की संपत्तियाँ इस कार्रवाई में शामिल हैं। ED का दावा है कि ये सभी संपत्तियाँ सीधे या परोक्ष रूप से 1xBet से जुड़े अवैध पैसों से खरीदी गई थीं।

सेलेब्रिटीज पर ED के आरोप क्या हैं?

ED की जाँच में सामने आया है कि इन सभी सेलिब्रिटीज ने जानबूझकर विदेशी कंपनियों और एजेंट्स के जरिए विज्ञापन और एंडोर्समेंट एग्रीमेंट किए। सीधे 1xBet का प्रचार करने के बजाय इसके सरोगेट ब्रांड्स जैसे 1xBat और 1xBat Sporting Lines को प्रमोट किया गया।

इससे भारतीय कानूनों में सीधे प्रतिबंध से बचने की कोशिश की गई। इन प्रमोशन्स के बदले मिलने वाला पैसा भारत में सीधे न आकर विदेशी एंटिटीज और कई लेयर्ड ट्रांजैक्शन्स के जरिए भेजा गया, ताकि पैसों के असली स्रोत को छिपाया जा सके। ED का कहना है कि यह पूरा नेटवर्क मनी लॉन्ड्रिंग के क्लासिक पैटर्न पर काम कर रहा था।

भारत में कैसे काम करता रहा 1xBet नेटवर्क?

ED के मुताबिक, 1xBet ने भारत में अपने यूजर्स बढ़ाने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, ऑनलाइन वीडियो, डिजिटल विज्ञापन और यहाँ तक कि प्रिंट मीडिया का भी इस्तेमाल किया। सीधी ब्रांडिंग पर कानूनी खतरे को देखते हुए सरोगेट विज्ञापन को हथियार बनाया गया।

सेलेब्रिटीज और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के जरिए प्लेटफॉर्म को भरोसेमंद और लोकप्रिय दिखाने की कोशिश की गई, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इससे जुड़ें और सट्टेबाजी करें।

म्यूल अकाउंट, लग्जरी शादी और राजनीतिक एंगल

जाँच के दौरान ED को मनी लॉन्ड्रिंग का एक चौंकाने वाला पहलू भी मिला। दिल्ली के एक Rapido बाइक-टैक्सी ड्राइवर के बैंक अकाउंट में सिर्फ 8 महीनों के भीतर 331.36 करोड़ रुपए के लेनदेन का पता चला। ड्राइवर की आय और जीवनशैली इस रकम से बिल्कुल मेल नहीं खाती थी।

पूछताछ में उसने इन ट्रांजैक्शन्स की जानकारी से इनकार किया। ED को शक है कि यह एक म्यूल अकाउंट था, जिसका इस्तेमाल अवैध पैसों को इधर-उधर करने के लिए किया गया। इसी अकाउंट से राजस्थान के उदयपुर में एक हाई-प्रोफाइल डेस्टिनेशन वेडिंग पर 1 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च किए जाने के सबूत भी मिले हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस शादी में एक युवा राजनेता की मौजूदगी की भी जाँच हो रही है।

प्रॉपर्टी अटैच होने का मतलब क्या होता है?

ED द्वारा प्रॉपर्टी अटैच करने का मतलब तुरंत जब्ती नहीं होता। यह 180 दिनों की अस्थायी कार्रवाई होती है। इस दौरान संपत्ति मालिक के नाम पर ही रहती है लेकिन उसे बेचा या गिरवी नहीं रखा जा सकता। ED को इस अवधि में PMLA कोर्ट के सामने सबूत पेश करने होते हैं।

अगर कोर्ट में यह साबित हो जाता है कि संपत्ति मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ी है, तो उसे जब्त कर नीलाम किया जाता है और पैसा सरकारी खजाने में जाता है। अगर आरोप साबित नहीं होते, तो संपत्ति मालिक को वापस कर दी जाती है। 1xBet का नाम सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि कई देशों में विवादों से जुड़ा रहा है।

अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, स्पेन और रूस जैसे देशों में इसके खिलाफ कार्रवाई या जाँच चल चुकी है। इस पर मनी लॉन्ड्रिंग, नाबालिगों से जुड़ी बेटिंग, यूजर्स को भुगतान न करने और वित्तीय अनियमितताओं जैसे गंभीर आरोप लगे हैं। भारत में इसे किसी भी तरह की कानूनी मान्यता हासिल नहीं है।

VB-G RAM G में राज्य सरकारें भी देंगी 40% तक पैसा, जवाबदेही बढ़ाने के लिए बदला गया फंडिंग पैटर्न: समझिए- 2 गुना ज्यादा बजट से ग्रामीणों को कैसे मिलेगा फायदा

संसद में विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)- VB-G RAM G विधेयक या जी राम-जी विधेयक पास हो गया। विपक्ष ने इसका नाम बदलने को लेकर विरोध किया, जबकि सरकार ने इसे महात्मा गाँधी नेशनल रूरल एम्पलॉयमेंट गारंटी एक्ट (MGNREGA या मनरेगा) की जगह कई बदलावों के साथ ग्रामीण विकास को नई दिशा देने वाला कदम बताया।

लोकसभा में सरकार ने कहा कि मनरेगा 20 साल पहले बनाई गई योजना है, तब से अब तक ग्रामीण क्षेत्रों में कई परिवर्तन हुए हैं। इसीलिए मनरेगा की जगह जी राम-जी कानून विकसित ग्रामीण भारत को ध्यान में रखते हुए लाया गया है। केंद्र सरकार ने VB-G RAM G योजना की फंडिंग को लेकर बड़ा बदलाव किया है। अब केंद्र सरकार ने इसकी फंडिंग में राज्य सरकारों को भी भागीदार बनाया है, ताकि इससे राज्यों की जवाबदेही भी बढ़ सके।

राज्य सरकार की फंडिंग का क्या है नया पैटर्न?

नए जी राम-जी बिल के तहत रोजगार से जुड़ी योजनाओं का खर्च अब केवल केंद्र सरकार पर निर्भर नहीं रहेगा। इस नए प्रस्ताव में साफ किया गया है कि राज्य सरकारों को भी रोजगार उपलब्ध कराने के लिए अपने बजट से पैसा देना होगा। नए बिल में फंडिंग का नया पैटर्न सेट किया गया है।

पुराने मनरेगा स्कीम में राज्य सरकारों को मजदूरी से जुड़ी कोई भी धनराशि नहीं देनी पड़ती थी। हालाँकि योजना से जुड़े कामों में सामग्री और अन्य खर्च राज्य सरकार देते थे, पर मनरेगा के तहत पूरी फंडिंग केंद्र सरकार देती थी। लेकिन अब इसमें बदलाव किया गया है।

प्रस्ताव के अनुसार, पूर्वोत्तर राज्यों (अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघायल, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम), हिमालयी राज्यों (हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड) में रोजगार से जुड़े कुल खर्च का 90 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार देगी, जबकि 10 प्रतिशत राशि राज्य सरकार को अपने बजट से देनी होगी।

मनरेगा और जी राम-जी में मूलभूत अंतर (फोटो साभार: PIB)

वहीं अन्य सभी राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़, पंजाब, हरियाणा और केरल में रोजगार से जुड़े खर्च का 60 प्रतिशत केंद्र सरकार और 40 प्रतिशत राज्य सरकार वहन करेगी।

समझें- कितना खर्च करेगी सरकार? राज्यों का हिस्सा कितना होगा

केंद्र सरकार ने संसद में बताया है कि विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविक मिशन (ग्रामीण)- VB-G RAM G के लिए हर साल करीब ₹1,51,282 करोड़ का खर्च आएगा। ये राशि मजदूरी, सामग्री और प्रशासनिक कामों पर खर्च की जाएगी। इस राशि में राज्यों का हिस्सा भी शामिल है।

हालाँकि कुल ₹1,51,282 करोड़ में से केंद्र सरकार का अनुमानित हिस्सा ₹95,692.31 करोड़ होगा। इसके तहत केंद्र और राज्यों के बीच 60:40 के मानक लागत-साझाकरण अनुपात, पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों के लिए 90:10 की बढ़ी राशि और बिना विधायिका वाले केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 100 प्रतिशत केंद्रीय वित्त पोषण का प्रावधान है।

खास बात ये है कि केंद्र सरकार ने जो बजट इस योजना के लिए रखा है, वो मौजूदा 2025-26 में मनरेगा के लिए रखी गई ₹86,000 करोड़ के फंड से करीब 2 गुना होगा। अकेले केंद्र सरकार का खर्च भी पिछले खर्च से बढ़ेगा। जाहिर सी बात है कि अब तक लोगों को मिलने वाले 100 दिन के रोजगार की जगह जब 125 दिन का रोजगार मिलेगा, तो उनकी कमाई भी बढ़ेगी और सरकारों का खर्च भी।

राज्य पहले के ढाँचे के तहत, पहले से ही सामग्री और प्रशासनिक लागतों का एक हिस्सा वहन कर रहे थे, पर ये प्रक्रिया हमेशा विवादित रहती थी। राज्य अपने हिस्से के पैसों की माँग करते रहते थे, लेकिन अब केंद्र और राज्यों के खर्च का आँकड़ा साफ होने से न सिर्फ ये विवाद सुलझेगा, बल्कि फंड को लेकर पारदर्शिता भी आएगी।

राज्य की साझा फंडिंग से रोजगार में देरी का बहाना कैसे होगा खत्म?

अब रोजगार उपलब्ध कराने में देरी का बहाना खत्म हो जाएगा क्योंकि ‘जी राम-जी’ बिल में फंडिंग की जिम्मेदारी सिर्फ केंद्र सरकार तक सीमित नहीं रखी गई है। पहले मनरेगा में रोजगार के लिए पैसा पूरी तरह से केंद्र सरकार देती थी। लेकिन अब इस नई योजना के तहत केंद्र और राज्य सरकारों की अनिवार्य वित्तीय हिस्सेदारी तय की गई है।

यानी अगर किसी राज्य में रोजगार की माँग बढ़ती है, तो वह यह कहकर जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि केंद्र से पैसा नहीं आया है। राज्यों को भी अपने बजट से तय हिस्सा देना होगा, जिससे फंड की उपलब्धता बनी रहेगी और काम शुरू करने में अनावश्यक देरी नहीं होगी। सरकार का कहना है कि यह प्रावधान मनरेगा के दौरान सामने आने वाली फंडिंग से जुड़ी अड़चनों को दूर करेगा।

इसके अलावा में फंड जारी करने की समयसीमा और जवाबदेही को भी स्पष्ट रूप से तय किया गया है। केंद्र या राज्य, दोनों में से अगर कोई तय समय पर पैसा जारी नहीं करता है, तो उसकी जिम्मेदारी तय की जाएगी। इससे रोजगार के काम फाइलों में अटकने के बजाए जमीनी स्तर पर जल्दी शुरू हो सकेंगे।

रोजगार उपलब्ध कराने की प्रक्रिया कैसे होगी तेज और प्रभावशाली?

नए ‘जी राम-जी’ विधेयक में ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार मिलने में तेजी और प्रभावशीलता दोनों बढ़ेंगी क्योंकि इसमें मनरेगा की तुलना में कई बदलाव किए गए हैं। सबसे पहले रोजगार की गारंटी 100 दिनों से बढ़ाकर 125 दिनों तक कर दी गई है, यानी अब हर ग्रामीण परिवार के वयस्क सदस्यों को साल में 125 दिन मजदूरी का वैध अधिकार मिलेगा, जिससे काम के दिनों और आय दोनों में वृद्धि होगी। इससे गाँवों में ज्यादा दिन काम उपलब्ध किया जाएगा, जिससे ग्रामीणों को सालभर अधिक आमदनी हो सकेगी।

दूसरा, नए बिल में काम के भुगतान का तरीका भी सुधारा गया है। मजदूरी का भुगतान हफ्ते में एक बार या 15 दिनों के भीतर किया जाना अनिवार्य होगा, जिससे मजदूरों को पैसे जल्दी और नियमित तौर पर मिलेंगे और उन्हें लंबा इंतजार नहीं करना पड़ेगा।

इसके अलावा योजना को चार प्रमुख क्षेत्रों- जल सुरक्षा, ग्रामीण अवसंरचना, आजीविका से जुड़े काम और आपदा-रोधई ढाँचे में विभाजित किया गया है, जिससे कामों की विविधता और गुणवत्ता बढ़ेगी और ग्रामीणों को विभिन्न प्रकार के अवसर मिलेंगे। इसका उद्देश्य है कि अब काम बिखरे हुए नहीं होंगे, बल्कि गाँव की असली जरूरतों के हिसाब से तय किए जाएँगे।

कंडोम खरीदना हुआ पाकिस्तान की ‘औकात’ से बाहर, रेट सस्ते कराने IMF के पास पहुँचा तो मिली दुत्कार: बढ़ती आबादी के खतरे से PM तक चिंता में, जानें भारत पर क्या होगा असर

दुनिया के 5वें सबसे अधिक आबादी वाले मुल्क पाकिस्तान में बढ़ती आबादी का संकट लगातार गहराता जा रहा है। इस बीच आवाम के लिए गर्भनिरोधक साधन आज भी महँगे और पहुँच से दूर की चीज बने हुए हैं। पाई-पाई को मोहताज पाकिस्तान में हालात ऐसे हैं कि एक साधारण कंडोम का पैकेट भी बड़ी आबादी की पहुँच से बाहर है। इस संकट से निपटने के लिए पाकिस्तान ने एक योजना बनाई कि गर्भनिरोधक उत्पादों पर लगने वाला 18 प्रतिशत जनरल सेल्स टैक्स (GST) हटाकर उन्हें सस्ता किया जाए लेकिन अब यह योजना भी अधर में लटक गई है।

IMF ने कंडोम पर GST हटाने से किया मना

दरअसल, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने पाकिस्तान सरकार को बड़ा झटका देते हुए गर्भनिरोधक उत्पादों पर GST हटाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। यह फैसला उस समय आया है जब खुद प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ देश की तेजी से बढ़ती आबादी को लेकर खुले मंच से चिंता जता चुके हैं। पाकिस्तान की आबादी सालाना करीब 2.55 प्रतिशत की खतरनाक रफ्तार से बढ़ रही है और यह पहले से कमजोर अर्थव्यवस्था पर और भारी बोझ डाल रही है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, संघीय राजस्व बोर्ड (FBR) ने IMF के सामने प्रस्ताव रखा था कि कंडोम और अन्य गर्भनिरोधक साधनों से 18% GST हटाया जाए जिससे आने वाले बजट से पहले कीमतें कम की जा सकें। IMF ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया। नतीजा यह हुआ कि प्रधानमंत्री का अगस्त 2025 का निर्देश भी कागजों तक सीमित रह गया।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कई महीने पहले ही FBR को निर्देश दिया था कि वह IMF के साथ इस मुद्दे को गंभीरता से उठाए। इसके बाद पाकिस्तानी अधिकारियों ने कई दौर की बातचीत की लेकिन हर बार उन्हें निराशा ही हाथ लगी। हाल ही में प्रधानमंत्री कार्यालय में हुई एक उच्चस्तरीय बैठक में अधिकारियों ने साफ कर दिया कि IMF अपनी शर्तों से पीछे हटने को तैयार नहीं है।

IMF के अधिकारियों ने बंद दरवाजों के पीछे हुई बातचीत में साफ शब्दों में पाकिस्तानी प्रतिनिधियों को बता दिया कि गर्भनिरोधक उत्पादों पर किसी भी तरह की टैक्स राहत पर 2026-27 के बजट से पहले विचार ही नहीं किया जाएगा। यानी आम जनता को राहत देने की बात फिलहाल पूरी तरह टाल दी गई है।

पाकिस्तानी पक्ष ने बातचीत के दौरान सिर्फ कंडोम और गर्भनिरोधक साधनों पर ही नहीं बल्कि महिलाओं की जरूरत से जुड़े सैनिटरी पैड और शिशुओं के लिए इस्तेमाल होने वाले बेबी डायपर पर भी GST घटाने का प्रस्ताव रखा था। हालाँकि, IMF ने इन सभी सुझावों को सख्ती से खारिज कर दिया। IMF का तर्क था कि इन उत्पादों से सरकार को होने वाली टैक्स आय बहुत बड़ी है और इसे छोड़ना उनके हिसाब से ‘आर्थिक अनुशासन’ के खिलाफ होगा।

खास तौर पर बेबी डायपर को लेकर IMF ने कड़ा रुख अपनाया। अधिकारियों के मुताबिक, IMF ने यह दलील दी कि बेबी डायपर का टैक्स बेस करीब 100 अरब पाकिस्तानी रुपए के आसपास है और इसमें किसी भी तरह की छूट देने से सरकारी राजस्व को बड़ा झटका लग सकता है। यानी बच्चों की बुनियादी जरूरत भी पाकिस्तान में सिर्फ एक ‘रेवेन्यू आइटम’ बनकर रह गई है।

इस फैसले का सीधा असर आम पाकिस्तानी परिवारों पर पड़ रहा है। महँगाई पहले ही आसमान छू रही है, स्वास्थ्य सुविधाएँ बदहाल हैं और अब परिवार नियोजन के साधन भी महँगे बने रहेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि गर्भनिरोधक तक आसान पहुँच न होने से अनियोजित जन्म बढ़ेंगे, जिससे गरीबी, बेरोजगारी और कुपोषण जैसी समस्याएँ और गहराएँगी।

बढ़ती आबादी का ‘राष्ट्रीय आपातकाल’

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या फंड (UNPF) के आँकड़ों के मुताबिक, पाकिस्तान की मौजूदा जनसंख्या 25.5 करोड़ के आस-पास है। इसमें 36.4% आबादी 0-14 वर्ष के बीच है जबकि 59.6% आबादी 15-64 साल के बीच की है। वहीं, देश की 4% आबादी की उम्र 65 वर्ष से अधिक है।

सतही तौर पर पाकिस्तान में बढ़ती आबादी का खतरा ना दिखे लेकिन पाकिस्तान के आर्थिक हालात आबादी के बोझ को सहने लायक नहीं बचे हैं। विश्व बैंक के रिकॉर्ड के मुताबिक, पाकिस्तान की आबादी में करीब 45% आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन जीने को मजबूर है।

खुद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने आबादी के संकट को स्वीकार किया है। अगस्त 2025 में एक बैठक के दौरान उन्होंने देश में बढ़ती जनसंख्या दर को ‘चिंताजनक और खतरनाक रुझान’ बताया और कहा है कि इससे निपटने के लिए तुरंत राष्ट्रीय नीति की जरूरत है।

पाकिस्तान की आबादी के संकट को खुद सरकार ‘राष्ट्रीय आपातकाल’ मान रही है। जुलाई 2025 में पाकिस्तान के योजना, विकास और विशेष पहल मंत्री एहसान इकबाल ने जनसंख्या प्रबंधन पर हुई एक उच्चस्तरीय बैठक की अध्यक्षता करते हुए साफ शब्दों में कहा कि आबादी का मामला देश के लिए बेहद गंभीर और खतरनाक रूप ले चुका है। बैठक में बोलते हुए एहसान इकबाल ने माना कि जनसंख्या नियोजन का असर नागरिक के जीवन के हर पहलू पर पड़ता है अब चाहे वह स्वास्थ्य हो, शिक्षा हो या रोजगार।

इकबाल ने कहा कि मौजूदा 2.55% की सालाना जनसंख्या वृद्धि दर के हिसाब से 2050 तक पाकिस्तान की आबादी 38.6 करोड़ से भी ज्यादा हो सकती है। यह अनुमान साफ संकेत देता है कि आने वाले वर्षों में पाकिस्तान पर जनसंख्या का दबाव कई गुना बढ़ने वाला है। वह भी ऐसे समय में जब पाकिस्तान पहले से ही आर्थिक बदहाली, बेरोजगारी और संसाधनों की कमी से जूझ रहा है।

पाकिस्तान में बढ़ती आबादी से और बढ़ता संकट

पाकिस्तान की आबादी अब उसका संकट बनती जा रही है। स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार से लेकर खाद्य सुरक्षा और आर्थिक विकास पर इसका गंभीर असर दिखाई पड़ रहा है। जुलाई 2025 में पाकिस्तान के स्वास्थ्य मंत्री सैयद मुस्तफा कमाल ने विश्व जनसंख्या दिवस 2025 पर आयोजित एक कार्यक्रम में कहा कि पाकिस्तान में आबादी बढ़ने की रफ्तार ‘खतरनाक स्तर’ तक पहुँच चुकी है।

इसी दौरान स्वास्थ्य मंत्री ने जनसंख्या संकट के गंभीर नतीजों की ओर इशारा करते हुए चौंकाने वाले आँकड़े पेश किए। उन्होंने बताया कि देश में 2.5 करोड़ से अधिक बच्चे सिर्फ इसलिए स्कूल से बाहर हैं क्योंकि बढ़ती आबादी का दबाव शिक्षा व्यवस्था झेल नहीं पा रही। यह आँकड़ा अपने आप में पाकिस्तान के भविष्य पर बड़ा सवाल खड़ा करता है, जहाँ अगली पीढ़ी बिना शिक्षा के आगे बढ़ रही है।

सरकारी अस्पतालों की हालत पर टिप्पणी करते हुए मंत्री ने कहा कि वहाँ मरीजों की भीड़ किसी सार्वजनिक रैली जैसी दिखाई देती है। यह बयान पाकिस्तान की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था की सच्चाई बयान करता है, जहाँ अस्पताल इलाज के केंद्र कम और अव्यवस्था की तस्वीर ज्यादा बन चुके हैं। वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगजेब ने भी जनसंख्या वृद्धि के आर्थिक असर को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि अनियंत्रित आबादी देश के संसाधनों, सामाजिक ढाँचे और आर्थिक स्थिरता पर भारी दबाव डाल रही है।

पाकिस्तान में UNFPA के प्रतिनिधि Luay Shabaneh ने करीब एक हफ्ते पहले ‘डॉन’ में लिखा, “25 करोड़ से अधिक आबादी वाले देश में बेसिक रिप्रोडक्टिव हेल्थ सर्विस तक पहुँच लोगों के लिए आज भी एक संघर्ष है। 16% शादीशुदा महिलाओं को आज भी फैमिली प्लानिंग की सुविधा नहीं मिलती है और गर्भनिरोधक इस्तेमाल करने की दर लगभग 32% पर अटकी हुई है।” उन्होंने लिखा, “पाकिस्तान में सालाना 3.5 मिलियन अनचाही प्रेग्नेंसी होती हैं और इनमें से 61% का नतीजा इंड्यूस्ड अबॉर्शन (गर्भपात) होता है, जो अक्सर असुरक्षित होता है।”

पाकिस्तान में ‘प्रजनन संकट’

IMF से पाकिस्तान को मिला झटका इसलिए भी मुश्किलें बढ़ाने वाला है क्योंकि पाकिस्तान अनचाही प्रेग्नेंसी से जूझ रहा है। पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, हर साल पाकिस्तान में करीब 1 करोड़ 27 लाख गर्भधारण होते हैं। इनमें से लगभग 60 लाख गर्भ ऐसे होते हैं, जिनकी योजना पहले से नहीं बनाई गई होती। यानी औसतन हर साल होने वाला हर दूसरा गर्भ अनचाहा होता है। यह स्थिति साफ दिखाती है कि देश में प्रजनन स्वास्थ्य सेवाएँ, गर्भनिरोधक साधनों तक पहुँच और परिवार नियोजन को लेकर जागरूकता कितनी कमजोर है।

पाकिस्तान के फेडरल हेल्थ सेक्रेटरी हामिद याक़ूब शेख ने इसे राष्ट्रीय आपात स्थिति बताया है। उनके मुताबिक बिना योजना के होने वाले जन्म सिर्फ जनसंख्या का मसला नहीं हैं बल्कि यह शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण व्यवस्था पर सीधा असर डालने वाली विकास की बड़ी समस्या है। आजादी के 77 साल में पाकिस्तान की आबादी 7 गुना बढ़ गई है जबकि अर्थव्यवस्था, रोजगार और सामाजिक विकास की रफ्तार कछुए जैसी है।

पाकिस्तान में गर्भनिरोधकों की पहुँच को लेकर पहले से ही संकट है और IMF ने इसे और बढ़ा दिया है। ग्रामीण और गरीब इलाकों में रहने वाली लाखों महिलाओं तक आधुनिक गर्भनिरोधक साधन नहीं पहुँच सके हैं। पाकिस्तान में कम साक्षरता और स्वास्थ्य शिक्षा की कमी के चलते गर्भनिरोधक को लेकर कई गलत धारणाएँ फैली हुई हैं। बहुत-सी महिलाओं को लगता है कि परिवार नियोजन से हमेशा के लिए बाँझपन हो जाता है या फिर यह धर्म के खिलाफ है।

एक बड़ी समस्या महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को लेकर भी है। कब-कितने बच्चे पैदा हो महिलाओं को पाकिस्तान में इसका अधिकार ही नहीं है। आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण वो अपने फैसले खुद नहीं ले पाती हैं।

ऐसी अनचाही प्रेगनेंसी का असर हर स्तर पर दिखता है। अस्पतालों में भीड़ बढ़ रही है, मातृ-मृत्यु दर बढ़ी हुई है और करीब 40% बच्चे कुपोषण से जूझ रहे हैं। बेरोजगारी-गरीबी भी लगातार बढ़ती जा रही है। ऐसे में पहले से खस्ताहाल आर्थिक ढाँचे पर बोझ बढ़ता ही जा रहा है। अपने आर्थिक फैसलों के लिए IMF पर मजबूर पाकिस्तान की समस्याएँ दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही हैं।

क्या पाकिस्तान की बढ़ती आबादी भारत के लिए चिंता की बात है?

1944 में अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के फिलाडेल्फिया घोषणा पत्र में संगठन के सिद्धांतों में कहा गया था कि ‘कहीं भी गरीबी, हर जगह समृद्धि के लिए एक खतरा है’। यह बात आज भी लागू होती है। यही समस्या भारत के लिए भी है। पाकिस्तान की तेजी से बढ़ती आबादी भारत के लिए सबसे पहले सुरक्षा के लिहाज से चिंता पैदा करती है।

संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के अनुसार 2050 तक पाकिस्तान की जनसंख्या 35 करोड़ तक जा सकती है। इतनी बड़ी आबादी को रोजगार, शिक्षा और संसाधन न मिलने की स्थिति में आंतरिक अस्थिरता बढ़ना तय है। पड़ोसी होने के नाते इसका असर सबसे अधिक भारत पर ही पड़ने की संभावना है।

पाकिस्तान की बढ़ती आबादी के साथ पानी, जमीन और रोजगार का संकट गहराता जा रहा है। अधिकतर इलाकों में संसाधनों की कमी पहले से ही मुश्किलें पैदा कर रही है। आगे चलकर अगर परिस्थितियाँ बिगड़ती हैं तो में सीमावर्ती इलाकों में अवैध घुसपैठ, तस्करी और अपराध बढ़ने की आशंका रहती है। भारत-पाकिस्तान सीमा पहले ही संवेदनशील है और यदि पाकिस्तान में जनसंख्या दबाव और बढ़ता है, तो इसका सीधा असर भारत की आंतरिक सुरक्षा पर पड़ सकता है।

बांग्लादेश में भारत विरोध की आड़ में बड़ा खेल, लोकतंत्र को खत्म कर इस्लामी शासन लाने की तैयारी: यूनुस की शह पर हिंदुओं और ‘बंगालियों’ को खत्म कर रहे कट्टरपंथी

बांग्लादेश आजकल सड़कों पर खूनखराबे और आगजनी की आग में जल रहा है। एक तरफ छात्रों के नाम पर शुरू हुए आंदोलन ने शेख हसीना की सरकार को उखाड़ फेंका, तो दूसरी तरफ उसी आग में अब इस्लामी कट्टरपंथियों का उभार हो रहा है। लेकिन असली खेल क्या है? यह सब भारत से घृणा फैलाने की आड़ में चुनाव टालने और लोकतंत्र को खत्म करने की साजिश लगती है।

जमात-ए-इस्लामी, नेशनल सिटिजन पार्टी और छात्र शिबिर जैसे गुट सड़कों पर कोहराम मचा रहे हैं। वे हिंदुओं को निशाना बना रहे हैं, भारत से जुड़ी हर चीज को जलाने पर तुले हैं। शेख हसीना की आवामी लीग को बैन कर उसके नेताओं और कार्यकर्ताओं का सफाया हो रहा है। लोकतंत्र की बहाली को पीछे धकेलकर अब इस्लामी शासन लाने की कोशिश हो रही है और इसके लिए रेफरेंडम की ढाल इस्तेमाल की जा रही है।

बांग्लादेश में सेकुलरिज्म को जड़ से उखाड़ा जा रहा है। शेख मुजीबुर रहमान की मूर्तियाँ तोड़ी जा रही हैं, उनके परिवार की यादें मिटाई जा रही हैं और बांग्लादेश के जन्म की असली कहानी को भुला दिया जा रहा है।

जो देश कभी बांग्ला अस्मिता के नाम पर पाकिस्तान से अलग हुआ था, आज वही इस्लामी खिलाफत की ओर बढ़ रहा है। पाकिस्तान की जमात-ए-इस्लामी के साथ मिलकर जिसने 1971 में बंगालियों का कत्लेआम किया था, वही ताकतें अब आईएसआई के साथ हाथ मिलाकर बंगाली संस्कृति को नष्ट कर रही हैं।

बांग्लादेश में भारत विरोधी भावनाएँ चरम पर हैं और कट्टरपंथी ताकतें हावी हो रही हैं। मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस की अगुवाई वाली अंतरिम सरकार में शामिल युवा नेता बार-बार भारत के खिलाफ बयान दे रहे हैं। हिंदुओं पर हमले बढ़ रहे हैं, मंदिर तोड़े जा रहे हैं और अल्पसंख्यकों की जान-माल की रक्षा नहीं हो पा रही। अब जबकि फरवरी 2026 में चुनाव होने वाले हैं, ठीक दो महीने पहले हिंसा का दौर फिर शुरू हो गया है। सवाल यह है कि यह सब क्यों हो रहा है? क्या यह भारत से घृणा फैलाने की आड़ में चुनाव टालने की कोशिश है?

सत्ता बचाए रखने के लिए भारत विरोधी लहर को और भड़का रही यूनुस सरकार

सारे घटनाक्रमों के तार जोड़ें, तो साफ है कि बांग्लादेश में अस्थिरता पैदा करके चुनाव टालने की साजिश रची जा रही है। अगर चुनाव टल गए, तो यूनुस सरकार बिना वोट के ही सत्ता में बनी रहेगी। ऐसे में इस्लामी कट्टरपंथी लोकतंत्र को हमेशा के लिए खत्म कर देंगे। भारत विरोध का नैरेटिव इसी साजिश का हिस्सा है, जो राजनीतिक अस्थिरता बढ़ाता है और चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करता है।

साल 2024 के कथित छात्र विद्रोह के बाद से यूनुस सरकार के दौरान यह नैरेटिव तेज हुआ है, जहाँ प्रदर्शनकारियों ने भारत विरोधी नारे लगाए और आरोप लगाया कि हमलावर भारत भाग गए हैं। इससे देश में ध्रुवीकरण बढ़ता है और चुनाव का माहौल बिगड़ता है, जिससे चुनाव टालने का बहाना मिल जाता है।

भारत-पाक 1971 युद्ध और कट्टरपंथ की जड़ों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझना जरूरी

बांग्लादेश का इतिहास समझे बिना वर्तमान स्थिति को नहीं समझा जा सकता। 1971 में पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश बना था। उस समय पाकिस्तानी सेना ने बंगालियों पर अत्याचार किए थे। लाखों लोगों का कत्लेआम किया गया। लाखों महिलाओं का बलात्कार हुआ और संपत्ति का विनाश किया गया।

इन सबमें जमात-ए-इस्लामी जैसी इस्लामी पार्टियों ने पाकिस्तान का साथ दिया था। जमात के नेता और कार्यकर्ता पाकिस्तानी सेना के साथ मिलकर बंगाली राष्ट्रवादियों को मारते थे और वे रजाकार नामक मिलिशिया बनाकर अत्याचार करते थे। भारत ने मुक्ति वाहिनी का साथ देकर बांग्लादेश की आजादी में मदद की थी, जिससे लाखों बंगालियों की जान बची। लेकिन अब वही जमात-ए-इस्लामी फिर से सक्रिय हो गई है और पाकिस्तान की मदद से बांग्लादेश को अस्थिर करने की कोशिश कर रही है।

बांग्लादेशियों पर जुल्म ढाने वाले जमात को यूनुस सरकार ने दी है खुली छूट

जमात-ए-इस्लामी का इतिहास पाकिस्तान समर्थक रहा है। 1971 की युद्ध में इसने पाकिस्तानी सेना की मदद की थी और युद्ध अपराधों में शामिल थी। युद्ध के बाद शेख मुजीब ने इसे बैन किया था, लेकिन बाद में यह फिर उभरी। अब यूनुस सरकार ने जमात पर से बैन हटा लिया है, और इसके नेता जेल से बाहर हैं। इससे कट्टरपंथ को बल मिला है। पाकिस्तान की आईएसआई जमात के जरिए बांग्लादेश में अराजकता फैला रही है, ताकि भारत के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सके। पूर्व भारतीय राजनयिक वीना सिकरी ने कहा है कि जमात पाकिस्तान के इशारे पर काम कर रही है और भारत विरोधी प्रदर्शनों में इसकी भूमिका है।

अपनी पुरानी रणनीति पर काम कर रहा है पाकिस्तान

पाकिस्तान की पुरानी रणनीति है- भारत को दुश्मन बनाकर पड़ोसी देशों में अस्थिरता फैलाना। 1971 की हार की यादों को मिटाने के लिए पाकिस्तान इस्लामी ताकतों को मजबूत कर रहा है। शेख हसीना के बेटे ने भी कहा है कि पाकिस्तान बांग्लादेश को भारत के खिलाफ बेस बनाना चाहता है और यूनुस शासन में यह बढ़ रहा है।

यह ऐतिहासिक घाव अब फिर से खुल रहे हैं। शेख मुजीब की मूर्तियाँ तोड़ी जा रही हैं, जो बांग्लादेश के जन्म का प्रतीक हैं। बांग्ला संस्कृति और राष्ट्रवाद को दबाकर इस्लामी पहचान थोपी जा रही है। हेफाजत-ए-इस्लाम जैसी संगठन, जो मदरसों से जुड़े हैं, अब सड़कों पर हैं। वे शिया-सुन्नी झगड़ों में शामिल हैं और अल्पसंख्यकों को निशाना बना रहे हैं। इससे बांग्लादेश की सेकुलर छवि पूरी तरह से खतरे में आ चुकी है।

अशांति के दौर में यूनुस सरकार की भूमिका

पिछले साल अगस्त में शेख हसीना को सत्ता से हटाए जाने के बाद बांग्लादेश में हिंसा का सिलसिला शुरू हो गया। छात्र विद्रोह के नाम पर प्रदर्शन हुए, लेकिन जल्दी ही यह कट्टरपंथियों के हाथ में चला गया। यूनुस को अंतरिम सरकार का प्रमुख बनाया गया, लेकिन उन्होंने लोकतंत्र बहाल करने का वादा निभाया नहीं। इसके बजाय, इस्लामी समूहों को बढ़ावा दिया गया। जमात-ए-इस्लामी और छात्र शिबिर जैसे संगठन अब खुलेआम सक्रिय हैं। वे सड़कों पर हिंसा कर रहे हैं, अवामी लीग के दफ्तर जला रहे हैं और मीडिया पर हमले कर रहे हैं।

छात्र नेता शरीफ ओस्मान हादी की मौत के बाद हिंसा भड़क उठी। प्रदर्शनकारियों ने भारत विरोधी नारे लगाए, भारतीय उच्चायोग पर हमला किया और हिंदुओं को निशाना बनाया। मायमेंसिंह जिले में एक हिंदू मजदूर को ब्लासफेमी के आरोप में लिंच कर दिया गया। हिंदू मंदिरों पर हमले हो रहे हैं और अल्पसंख्यक डर के साए में जी रहे हैं। पत्रकारों, मीडिया दफ्तरों पर हमले हो रहे हैं, लेकिन यूनुस सरकार इस पर चुप है। यूनुस ने हिंसा को बढ़ा-चढ़ाकर बताते हुए इसे ‘फ्रिंज एलिमेंट्स की हरकत करार दिया है। हालाँकि यूनुस भारत पर फेक न्यूज फैलाने का आरोप लगाते रहे हैं।

अवामी लीग को बैन करने के खिलाफ प्रदर्शन हुए, लेकिन उन्हें दबाया जा रहा है। 2025 में अवामी लीग बैन विरोधी प्रदर्शन देशव्यापी हो गए, लेकिन सरकार ने उन्हें कुचला। इससे लोकतंत्र कमजोर हो रहा है। यूनुस पर आरोप है कि वे चुनाव में धांधली करके इस्लामी ताकतों को सत्ता सौंपना चाहते हैं। पाकिस्तान समर्थित समूह अराजकता फैला रहे हैं, ताकि चुनाव टल जाएँ। सड़कों पर प्रदर्शनकारियों का राज है, और हिंसा का उद्देश्य अस्थिरता पैदा करना है।

भारत विरोध के नैरेटिव को हवा दे रहा है पाकिस्तान

बांग्लादेश में चुनाव से पहले भारत विरोधी नैरेटिव तेज हो जाता है। इसका मुख्य कारण राजनीतिक अस्थिरता पैदा करना है। हाल की रिपोर्ट्स बताती हैं कि 2024 के छात्र विद्रोह के बाद से यह बढ़ा है। प्रदर्शनकारी भारत विरोधी स्लोगन लगा रहे हैं, और अवामी लीग के ऑफिसों पर हमले हो रहे हैं। इस आग को पाकिस्तान समर्थित तत्व और इस्लामी ग्रुप हवा दे रहे हैं। भारत ने पाकिस्तान की भूमिका को चिन्हित किया है।

पाकिस्तान की भूमिका पुरानी है। वह भारत को दुश्मन बनाकर बांग्लादेश में अराजकता फैलाता है। हाल की घटनाओं में पाकिस्तान का रोल बताया गया है, जो 1971 की यादों को मिटाने की कोशिश है। आईएसआई जमात-ए-इस्लामी के जरिए काम कर रही है। पूर्व राजदूत वीना सिकरी ने कहा कि पाकिस्तान ने शेख हसीना को हटाने में जमात का इस्तेमाल किया। बांग्लादेश में पाकिस्तान मजबूत सरकार नहीं चाहता, क्योंकि इससे भारत से रिश्ते मजबूत होते हैं। कमजोर सिस्टम से वह बांग्लादेश को भारत के खिलाफ इस्तेमाल कर सकता है।

इस्लामी कट्टरपंथ के उभार से लोकतंत्र और सेकुलरिज्म पर बढ़ा खतरा

बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथ तेजी से बढ़ रहा है। यूनुस सरकार ने जमात और अन्य समूहों पर बैन हटा लिया, जिससे वे मजबूत हुए। ये समूह पाकिस्तान समर्थित हैं और अराजक माहौल से फायदा उठा रहे हैं। वे खुलकर काम कर रहे हैं, और लोकतंत्र को कमजोर कर रहे हैं। हेफाजत-ए-इस्लाम जैसे संगठन मदरसों से जुड़े हैं, और वे शिया-सुन्नी झगड़ों में शामिल हैं। सेकुलरिज्म को खत्म किया जा रहा है। शेख मुजीब की यादों को मिटाया जा रहा है और बांग्ला संस्कृति दबाई जा रही है।

रेफरेंडम की आड़ में इस्लामी शासन लाने की कोशिश है। हिंदू, ईसाई और अहमदिया जैसे अल्पसंख्यकों पर हमले हो रहे हैं, लेकिन सरकार चुप है। यूनुस ने कहा कि बांग्लादेश में इस्लामी अतिवाद नहीं है, लेकिन पिछले दिनों चार मंदिरों पर हमले हुए और एक पुजारी की हत्या हुई। यह सब लोकतंत्र को निशाना बना रहा है। हिंसा से चुनावी प्रक्रिया बाधित हो रही है और जानकार कहते हैं कि यूनुस सरकार हिंसा का इस्तेमाल करके चुनाव टाल रही है।

हिंसा का असली मकसद है चुनाव को टालना

फरवरी 2026 के चुनाव से पहले हिंसा बढ़ना संयोग नहीं है। इसका उद्देश्य अराजकता फैलाकर चुनाव टालना है। आलोचक कहते हैं कि यह अस्थिरता को इस्तेमाल करके चुनाव असुरक्षित बताने की रणनीति है। यूनुस सरकार की चुप्पी मिलीभगत का संकेत है। वे हिंसा को फेक न्यूज कहते हैं, लेकिन इससे चुनाव में देरी हो सकती है। इस्लामी कट्टरपंथी छात्र पार्टियाँ चुनाव टालने की माँग कर रही हैं और पाकिस्तान की छाया में यह साजिश रची जा रही है।

बांग्लादेश में बज रही खतरे की घंटी

बांग्लादेश में जो हो रहा है, वह सिर्फ आंतरिक अस्थिरता नहीं, बल्कि क्षेत्रीय खतरा है। भारत-घृणा की आड़ में इस्लामी शासन लाने की साजिश सफल हुई, तो पूर्वोत्तर असुरक्षित हो जाएगा। हिंदू अल्पसंख्यकों का सफाया होगा और पाकिस्तान का प्रभाव बढ़ेगा। अंतरिम सरकार को सख्ती से कट्टरपंथियों पर अंकुश लगाना चाहिए। रेफरेंडम को बहाने न बनाएँ, चुनाव समय पर कराएँ।

बांग्लादेश के जो लोग 1971 में भारत के साथ मिलकर पाकिस्तानी अत्याचारों के खिलाफ लड़े थे, अब फिर से सेकुलर बांग्ला अस्मिता को बचाने के लिए खड़े हों। वरना जो देश बंगाली गौरव का प्रतीक था, वह इस्लामी तानाशाही का शिकार हो जाएगा। समय रहते सजग रहें, वरना इतिहास खुद को दोहराएगा।

साइकिल से लैंबोर्गिनी तक का सफर और अब ED का शिकंजा, जानें कैसे सट्टेबाजी के जाल में फँसा ‘फैंटेसी एक्सपर्ट’ नाम से मशहूर यूट्यूबर अनुराग द्विवेदी

यूट्यूब की दुनिया में ‘फैंटेसी एक्सपर्ट’ के नाम से मशहूर अनुराग द्विवेदी इन दिनों अपनी शोहरत नहीं, बल्कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) की कार्रवाई के कारण चर्चा में हैं। उत्तर प्रदेश के उन्नाव के एक साधारण गाँव से निकलकर दुबई में आलीशान जिंदगी जीने वाले अनुराग पर अब मनी लॉन्ड्रिंग और अवैध सट्टेबाजी के गंभीर आरोप लगे हैं।

जानकारी के मुताबिक, ED ने उनके कई ठिकानों पर छापेमारी कर करोड़ों की लग्जरी गाड़ियाँ जब्त की हैं और उनके ‘हवाला’ व ‘दुबई’ कनेक्शन की परतें खोलनी शुरू कर दी हैं।

सट्टे के खेल ने रातों-रात बनाया ‘रंक से राजा’

अनुराग द्विवेदी की कहानी किसी फिल्मी पटकथा जैसी है। उन्नाव के खजूर गाँव का रहने वाला अनुराग कुछ साल पहले तक साधारण साइकिल से चलता था। 2017-18 में क्रिकेट सट्टेबाजी में लाखों रुपए हारने के बाद वह दिल्ली चला गया।

वहाँ उसने ड्रीम-11 जैसे फैंटेसी ऐप्स के लिए ‘टिप्स’ देना शुरू किया और खुद को एक एक्सपर्ट के तौर पर स्थापित किया। देखते ही देखते अनुराग ने अपना खुद का फैंटेसी ऐप लॉन्च कर दिया और सोशल मीडिया के जरिए करोड़ों की दौलत और शोहरत बटोर ली।

दुबई की ‘शाही शादी’ ने खींचा जाँच एजेंसियों का ध्यान

अनुराग की बेहिसाब दौलत का प्रदर्शन तब चरम पर दिखा, जब नवंबर 2025 में उन्होंने दुबई में एक लग्जरी क्रूज पर बेहद भव्य शादी की। इस शादी में उन्होंने 100 से अधिक रिश्तेदारों को अपने खर्च पर हवाई जहाज से दुबई बुलाया और करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाए।

(फोटो साभार: NDTV)

सोशल मीडिया पर वायरल हुई इन तस्वीरों ने जाँच एजेंसियों को सतर्क कर दिया। सवाल उठा कि महज कुछ साल में एक यूट्यूबर के पास इतनी संपत्ति कहाँ से आई कि वह दुबई में अचल संपत्तियाँ खरीदने लगा।

यूट्यूब की शोहरत और विवाद

यूट्यूब और सोशल मीडिया पर फॉलोअर्स की संख्या तेजी से बढ़ने के बाद अनुराग द्विवेदी ने 7 जनवरी 2024 को लखनऊ के इंदिरा गाँधी प्रतिष्ठान में एक बड़ा मीट-अप आयोजित किया। इस कार्यक्रम का नाम ‘तू कर लेगा’ रखा गया था। इस आयोजन में सैकड़ों की संख्या में उनके प्रशंसक और युवा शामिल हुए। कार्यक्रम के जरिए अनुराग ने खुद को एक सफल फैंटेसी क्रिकेट एक्सपर्ट और मोटिवेशनल चेहरे के तौर पर पेश किया, जिससे उनकी लोकप्रियता और ज्यादा बढ़ गई।

लखनऊ के इंदिरा गाँधी प्रतिष्ठान में एक बड़ा मीट-अप आयोजित

इसके कुछ महीने बाद, दिसंबर 2024 में अनुराग द्विवेदी एक बार फिर सुर्खियों में आ गए। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा कर दावा किया कि उन्हें रंगदारी माँगे जाने और जान से मारने की धमकी मिली है। इस पोस्ट के बाद उनके समर्थकों और सोशल मीडिया यूजर्स के बीच हलचल मच गई और मामला तेजी से फैल गया। हालाँकि, कुछ समय बाद उन्होंने यह पोस्ट अपने अकाउंट से हटा ली, लेकिन तब तक यह मुद्दा चर्चा का विषय बन चुका था और अनुराग द्विवेदी का नाम और ज्यादा लोगों तक पहुँच गया।

ED की छापेमारी: लग्जरी कारों का जखीरा जब्त

मनी लॉन्ड्रिंग (PMLA) के तहत कार्रवाई करते हुए ED ने लखनऊ और उन्नाव समेत अनुराग के 9 ठिकानों पर धावा बोला। जाँच के दौरान करीब 5 करोड़ रुपए मूल्य की 5 लग्जरी गाड़ियाँ जब्त की गईं, जिनमें लैंबोर्गिनी, मर्सिडीज, बीएमडब्ल्यू और थार जैसी महँगी कारें शामिल हैं।

उन्नाव में उनके चाचा के घर से भी लैंबोर्गिनी उरुस और फोर्ड एंडेवर जैसी गाड़ियाँ बरामद कर ED दफ्तर में खड़ी कराई गई हैं।

हवाला और अवैध सट्टेबाजी का गंभीर आरोप

ED का दावा है कि अनुराग द्विवेदी अवैध ऑनलाइन सट्टेबाजी प्लेटफॉर्म्स के संचालन और प्रचार में मुख्य भूमिका निभा रहा था। आरोप है कि उसने सोशल मीडिया के जरिए इन प्लेटफॉर्म्स को प्रमोट किया और बदले में ‘हवाला’ ऑपरेटरों व बिचौलियों के माध्यम से बड़ी रकम हासिल की।

जाँच में उसके और उसके परिवार के बैंक खातों में करोड़ों रुपए मिले हैं, जिनका कोई कानूनी स्रोत नहीं है। वर्तमान में अनुराग दुबई में है और ED के कई समन जारी होने के बावजूद पेश नहीं हुआ है।

‘सर तन से जुदा’ का नारा भारत की संप्रभुता-अखंडता को खुली चुनौती: बरेली हिंसा मामले में इलाहाबाद HC ने रिहान की जमानत याचिका की खारिज, पढ़ें कोर्ट ने अपने आदेश में क्या-क्या कहा

बरेली हिंसा मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ‘गुस्ताख-ए-नबी की एक सजा, सर तन से जुदा’ नारे को भारत की संप्रभुता, अखंडता और भारतीय न्याय व्यवस्था के खिलाफ बताते हुए सख्त टिप्पणी की है। कोर्ट ने साफ कहा कि ऐसा नारा न केवल कानून के शासन को चुनौती देता है, बल्कि लोगों को सशस्त्र विद्रोह के लिए उकसाता है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि भारत एक संवैधानिक देश है जहाँ सजा का निर्धारण कानून करता है, न कि कोई भीड़। इसी आधार पर कोर्ट ने बरेली हिंसा का आरोपि रिहान की जमानत याचिका खारिज कर दी।

कानून और देश के खिलाफ नारा

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि ‘गुस्ताख-ए-नबी की एक सजा, सर तन से जुदा’ जैसा नारा, चाहे कोई अकेला व्यक्ति लगाए या कोई भीड़, यह सीधे तौर पर कानून की ताकत को चुनौती देता है। कोर्ट के मुताबिक, ऐसे नारे लोगों को हिंसा और हथियार उठाने के लिए उकसाते हैं, जिससे देश की एकता और सुरक्षा को खतरा होता है।

कोर्ट ने बताया कि इसी कारण ऐसा नारा लगाना भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 152 के तहत अपराध है। जस्टिस ने स्पष्ट किया कि कोई भी नारा जो कानून की प्रक्रिया के बाहर मौत की सजा की वकालत करता है, वह सीधे तौर पर भारतीय कानूनी व्यवस्था के अधिकार को चुनौती देता है।

नारों का धार्मिक और आपराधिक अंतर

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में साफ शब्दों में समझाया कि अलग-अलग धर्मों में बोले जाने वाले नारों का उद्देश्य क्या होता है और कब वे गलत माने जाते हैं। कोर्ट ने कहा कि आमतौर पर ये नारे ईश्वर या गुरु के प्रति श्रद्धा और सम्मान प्रकट करने के लिए होते हैं।

कोर्ट के अनुसार, इस्लाम में ‘नारा-ए-तकबीर, अल्लाहु अकबर’, सिख धर्म में ‘जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल’ और हिंदू धर्म में ‘जय श्रीराम’ या ‘हर-हर महादेव’ जैसे नारे श्रद्धा और भक्ति के प्रतीक हैं। इन्हें खुशी, आस्था और धार्मिक भावनाओं को व्यक्त करने के लिए बोला जाता है, इसलिए अपने आप में ये किसी भी तरह से अपराध नहीं हैं।

हालाँकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि इन्हीं नारों का इस्तेमाल किसी दूसरे धर्म के लोगों को डराने, धमकाने या हिंसा भड़काने के मकसद से किया जाए, तो वह अपराध की श्रेणी में आ जाता है। कोर्ट ने कहा कि नारे तभी तक स्वीकार्य हैं, जब तक उनका उपयोग गलत इरादे और कानून व्यवस्था को नुकसान पहुँचाने के लिए न किया जाए।

कुरान में नहीं है ‘सर तन से जुदा’ का जिक्र

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने साफ कहा कि ‘सर तन से जुदा’ जैसा नारा कुरान या इस्लाम के किसी भी प्रामाणिक मजहबी ग्रंथ में कहीं नहीं मिलता। अदालत के अनुसार, इस नारे को इस्लाम से जोड़ना गलत है, क्योंकि इसका कोई धार्मिक आधार नहीं है।

कुरान में नहीं है ‘सर तन से जुदा’ का जिक्र- कोर्ट

कोर्ट ने कहा कि पैगंबर मोहम्मद ने अपने जीवन में अपमान और तकलीफ सहने के बावजूद हमेशा दया, करुणा और क्षमा का रास्ता चुना। उन्होंने कभी भी किसी के खिलाफ हिंसा करने या सिर कलम करने की बात नहीं कही।

कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि पैगंबर के नाम पर हत्या या हिंसा की बात करना उनके आदर्शों के खिलाफ है। कोर्ट के मुताबिक, ऐसी सोच पैगंबर मोहम्मद की शिक्षाओं का पालन नहीं, बल्कि उनका अपमान है।

‘सर तन से जुदा’ नारे की जड़ें कहाँ से जुड़ी हैं

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में इस नारे की पृष्ठभूमि पर भी विस्तार से बात की। कोर्ट ने बताया कि अविभाजित भारत में ईशनिंदा से जुड़ा कानून वर्ष 1927 में अंग्रेजों द्वारा बनाया गया था, ताकि धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाले मामलों को रोका जा सके।

कोर्ट ने कहा कि भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद पाकिस्तान ने इसी कानून में बदलाव किए और उसमें ईशनिंदा के मामलों में मौत की सजा का प्रावधान जोड़ दिया। कोर्ट के अनुसार, ‘सर तन से जुदा’ का नारा वहीं से पैदा हुआ और धीरे-धीरे पाकिस्तान से भारत समेत अन्य देशों में फैल गया।

कोर्ट ने यह भी कहा कि कुछ असामाजिक तत्व इस नारे का इस्तेमाल धार्मिक भावना के नाम पर राज्य की सत्ता को चुनौती देने और दूसरे समुदायों में डर का माहौल बनाने के लिए कर रहे हैं, जो पूरी तरह गलत और कानून के खिलाफ है।

बरेली हिंसा और जमानत याचिका खारिज

यह पूरा मामला सितंबर में बरेली में हुई हिंसा से जुड़ा है, जहाँ इत्तेफाक मिन्नत काउंसिल (INC) के अध्यक्ष मौलाना तौकीर रजा के आह्वान पर भीड़ जमा हुई थी। आरोप है कि इस दौरान ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगाए गए, पुलिस पर हमला हुआ और संपत्तियों को नुकसान पहुँचाया गया।

आरोपित रिहान ने जमानत माँगते हुए खुद को निर्दोष बताया था, लेकिन कोर्ट ने केस डायरी के सबूतों को देखते हुए कहा कि आरोपित रिहान उस अवैध भीड़ का हिस्सा था जिसने न केवल आपत्तिजनक नारे लगाए बल्कि सार्वजनिक शांति को भी भंग किया। साक्ष्यों की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने कहा कि जमानत देने का कोई आधार नहीं बनता और याचिका खारिज कर दी।

जिहादियों का हीरो, भारत तोड़ने की ख्वाहिश और ग्रेटर बांग्लादेश का सपना: जानें- कौन था उस्मान हादी जिसकी मौत से सुलगा इस्लामी मुल्क

बांग्लादेश में एक बार फिर हिंसा का दौरा शुरू हो गया है। ढाका में शरीफ उस्मान हादी की मौत के बाद हिंसक विरोध प्रदर्शन जारी हैं। उस्मान हादी के समर्थकों ने मीडिया संस्थानों, शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग और भारतीय उच्चायोग को निशाना बनाया। जगह-जगह तोड़फोड़ और आगजनी की।

उस्मान हादी पर शुक्रवार (12 दिसंबर 2025) को गोलियों से हमला हुआ था, जिसके बाद से वह सिंगापुर के अस्पताल में भर्ती था। सिंगापुर के विदेश मंत्रालय ने गुरुवार (18 दिसंबर 20205) को बयान जारी कर कहा, “डॉक्टरों के तमाम कोशिशों के बावजूद, हादी ने अपने घावों के कारण दम तोड़ दिया।”

इस घोषणा के तुरंत बाद ही आक्रोशित उस्मान हादी के समर्थक सड़कों पर उतर आए और हादी की हत्या के लिए जिम्मेदार लोगों की गिरफ्तारी की माँग करने लगे। भारी संख्या में भीड़ जमा होने से तनाव फैल गया। देखते ही देखते प्रदर्शन ने हिंसक रूप ले लिया और भारत-विरोधी नारे तक लगने लगे। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि आखिर बांग्लादेश में हिंसा का कारण बना उस्मान हादी कौन है?

कौन है उस्मान हादी?

उस्मान हादी का जन्म बांग्लादेश के झलकाठी जिले के नलचिती उपजिला में एक मुस्लिम परिवार में हुआ था। उसके पिता मदरसा में पढ़ाते थे। हादी ने भी नेराबाद कामिल मदरसे से प्रारंभिक पढ़ाई पूरी की है। इसके बाद ढाका विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान विभाग का छात्र था।

वह करीब 32 वर्ष की उम्र में ही इस्लामी संगठन ‘इंकलाब मंच’ का प्रवक्ता बन गया था, जो कट्टरपंथी विचारधारा को प्रचार करता है।

शेख हसीना के तख्तापलट में उस्मान हादी की भूमिका?

शरीफ उस्मान बिन हादी बांग्लादेश में साल 2024 में उपजे छात्र आंदोलन का प्रमुख चेहरा बनकर उभरा था, जिसने शेख हसीना की सरकार का तख्तापलट कराया था। इसके चलते शेख हसीना को देश तक छोड़ना पड़ा था। उस्मान हादी बांग्लादेश के इस्लामी संगठन ‘इंकलाब मंच’ का संयोजक था। यह संगठन शेख हसीना की ‘अवामी लीग’ को खत्म करने में सबसे आगे रहा है।

उस्मान हादी बांग्लादेश में आगामी फरवरी 2026 में होने वाले चुनाव लड़ने की तैयारी में था। वह ढाका-8 सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में प्रचार कर रहा था।

उस्मान हादी का भारत-विरोधी रुख

उस्मान हादी ने भारत के खिलाफ भी कई भड़काऊ बयान दिए हैं। वो शेख हसीना की ‘अवामी लीग’ को भारत से प्रभावित होने के चलते कट्टर आलोचना करता था। वो अक्सर अवामी लीग को उसके भारत के साथ संबंधों को लेकर पार्टी को निशाना बनाता था।

कुछ जगहों पर वह BNP और यूनुस की अंतरिम सरकार पर भारत के नियंत्रण से मुक्त होने में विफल रहने का आरोप लगाता था। उस्मान की मौत के बाद ‘इंकलाब मंच’ ने फेसबुक पोस्ट में भारत का जिक्र करते हुए कहा, “भारतीय वर्चस्व के खिलाफ संघर्ष में, अल्लाह ने महान क्रांतिकारी उस्मान हादी को बलिदानी के रूप में स्वीकार किया है।”

हादी के भारत-विरोधी रुख ने ही साल 2024 के जुलाई विद्रोह के बाद युवा आंदोलनों को गति दी। अब हादी की मौत के बाद उसके समर्थकों ने भारत पर हमलावरों को शरण देने का आरोप लगाया और भारतीय उच्चायोग बंद करने की माँग की। हादी की बहन महफूजा ने भी हमले के लिए भारत के RAW पर उंगली उठाई।

बांग्लादेश के नक्शे में दिखाए भारत के पूर्वोत्तर राज्य

12 दिसंबर 2025 को उस्मान हादी पर हमले से पहले भी उस्मान हादी ने विवादित फेसबुक पोस्ट किया था। फेसबुक पोस्ट में उसने ‘ग्रेटर बांग्लादेश’ का नक्शा दिखाया था, जिसमें भारत के 7 पूर्वोत्तर राज्य भी शामिल थे। इस पोस्ट के कुछ घंटों बाद ही ढाका में हादी पर सड़क पर कुछ नकाबपोशों ने गोलियाँ बरसाईं थीं।

अब हादी की मौत के बाद उसके समर्थक भी भारत-विरोधी नारे लगा रहे हैं। समर्थकों का मानना है कि हादी की मौत का कारण भारत है और आरोप लगाया है कि हादी के हमलावर भारत भाग चुके हैं। गुस्साई भीड़ ने बांग्लादेश में भारत के उच्चायोग को निशाना बनाने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने समय रहते संभाल लिया। इसके बाद भीड़ ने भारत के उप उच्चायुक्त के घर के बाहर जमा हुई, जिसे हटाने के लिए पुलिस को आँसू गैस का इस्तेमाल करना पड़ा।

‘जो ईसाई के तौर पर रजिस्टर्ड हैं केवल उन्हीं को दें क्रिसमस इवेंट्स की इजाजत’: क्यों गुजरात के धरमपुर और कपराड़ा में हिंदुओं ने उठाई माँग- ग्राउंड रिपोर्ट

गुजरात के वलसाड जिले के धरमपुर और कपराड़ा तालुक के कई गाँवों में अवैध धर्मांतरण और प्रचार गतिविधियों के बढ़ते मामलों को लेकर स्थानीय लोगों ने चिंता जताई है। इसी को लेकर पिछले कुछ दिनों में इन गाँवों के हिंदुओं ने मामलतदार कार्यालय में आवेदन दिए हैं। ग्रामीणों की माँग है कि 25 दिसंबर को क्रिसमस मनाने की अनुमति केवल उन्हीं लोगों को दी जाए जिनका नाम सरकारी रिकॉर्ड में आधिकारिक रूप से ईसाई धर्म के फॉलोअर के रूप में दर्ज हो।

हिंदू संगठनों ने यह माँग रखते हुए आशंका जताई है कि इस तरह के आयोजनों से अवैध धार्मिक धर्मांतरण को बढ़ावा मिल सकता है। पिछले कुछ दिनों में धरमपुर और कपराड़ा तालुकाओं के दस से अधिक गाँवों के हिंदू नेताओं ने देव बिरसा सेना और आदिवासी संस्कृति बचाओ सेना जैसे संगठनों के माध्यम से मामलतदार कार्यालय में ज्ञापन सौंपे हैं।

इन आवेदनों में कहा गया है कि पिछले कई वर्षों से आदिवासी इलाकों के विभिन्न गाँवों में ईसाई समुदाय से जुड़े लोग बड़े पैमाने पर सभाएँ, शांति उत्सव, सेमिनार और अन्य कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं जिनका उद्देश्य धार्मिक धर्मांतरण करना बताया गया है। आरोप है कि दिसंबर महीने में मिशनरी और पादरी इन गाँवों में पहुँचते हैं और अलग-अलग स्थानों पर क्रिसमस कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं।

ज्ञापनों में यह भी दावा किया गया है कि इन क्रिसमस आयोजनों के जरिए आदिवासी समाज को उसकी मूल संस्कृति और परंपराओं से अलग करने की साजिश रची जा रही है, जिससे उनकी स्वदेशी पहचान खत्म होने का खतरा है। संगठनों ने इसे एक गंभीर मुद्दा बताया है।

साथ ही संगठनों ने स्पष्ट किया है कि वे किसी भी धर्म के खिलाफ नहीं हैं और सभी धर्मों व संप्रदायों का सम्मान करते हैं। उनका कहना है कि क्रिसमस कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति केवल उन्हीं लोगों को दी जानी चाहिए जो कानूनी रूप से सरकारी रिकॉर्ड में ईसाई के रूप में दर्ज हैं। हिंदू संगठनों ने माँग की है कि जो भी व्यक्ति या समूह क्रिसमस कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति मांगे, उससे पहले उससे ईसाई होने का वैध प्रमाण पत्र माँगा जाए और पूरी जाँच-पड़ताल के बाद ही अनुमति दी जाए।

स्थानीय हिंदू क्या कह रहे हैं?

जब ऑपइंडिया की टीम धरमपुर के कुछ गाँवों में जमीनी हकीकत जानने पहुँची, तो कई अहम बातें सामने आईं। जैसे-जैसे धरमपुर शहर से दूर, अंदरूनी इलाकों की ओर बढ़ते हैं तो वैसे-वैसे चर्चों की संख्या साफ तौर पर बढ़ती दिखती है। कई गाँवों में चर्च बनाए गए हैं। गौर करने वाली बात यह भी है कि इससे पहले इन्हीं इलाकों में सरकारी जमीन पर बिना अनुमति अवैध रूप से चर्च बनाए जाने के कई मामले सामने आ चुके हैं।

महाराष्ट्र सीमा से महज दो किलोमीटर दूर स्थित गडीना गाँव के हिंदू नेताओं ने भी धरमपुर मामलतदार कार्यालय में आवेदन दिया है। गाँव के नेताओं ने ऑपइंडिया को बताया कि गडीना की आबादी करीब 1,400 है लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में एक भी व्यक्ति ईसाई के रूप में दर्ज नहीं है। इसके बावजूद गाँव में एक चर्च बनाया गया है, जहाँ नियमित रूप से कार्यक्रम आयोजित होते हैं और हिंदू ग्रामीणों को भी इनमें शामिल किया जाता है।

धरमपुर के एक सुदूर इलाके में स्थित एक चर्च

स्थानीय हिंदुओं का आरोप है कि शुरुआत में भोले-भाले जनजातीय हिंदुओं को इन कार्यक्रमों में बुलाया जाता है। बाद में मिशनरी और पादरी उन्हें लालच देते हैं, चमत्कार के जरिए बीमारी ठीक करने का दावा करते हैं, पैसे का वादा करते हैं और ईसाई धर्म का प्रचार करते हैं। साथ ही उनसे कहा जाता है कि वे और लोगों को भी इन कार्यक्रमों में लाएँ।

गडीना के स्थानीय नेता पीलुभाई चौधरी ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा, “ज्यादातर चर्च बिना किसी अनुमति के अवैध रूप से बनाए गए हैं। बाद में यही चर्च धर्मांतरण की गतिविधियों के केंद्र बन जाते हैं। जब स्थानीय हिंदू जनजातीय लोग वहाँ जाने लगते हैं, तो धीरे-धीरे उन्हें हिंदू देवी-देवताओं की पूजा न करने, मंदिर और पारंपरिक पूजा स्थलों पर न जाने के लिए कहा जाता है। अंत में व्यक्ति पूरी तरह अपने धर्म और संस्कृति से कट जाता है।”

ऑपइंडिया ने ईसाई समूहों द्वारा चलाए जा रहे धर्मांतरण रैकेट के बारे में की स्थानीय लोगों से बात

पीलुभाई चौधरी ने आगे कहा कि अगर किसी गाँव में सरकारी रिकॉर्ड में एक भी व्यक्ति ईसाई के रूप में दर्ज नहीं है, तो वहाँ इस तरह के कार्यक्रम आयोजित करने का कोई औचित्य नहीं है। अगर अनुमति दी भी जाती है, तो प्रशासन को साफ तौर पर बताना चाहिए कि उस गाँव में कितने ईसाई रहते हैं।

गाँव के नेताओं का यह भी कहना है कि कई जगह लोगों का लालच देकर धर्मांतरण कराया जाता है लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में उनका नाम हिंदू ही बना रहता है और वे सरकारी योजनाओं का लाभ भी लेते रहते हैं। उनका कहना है कि यही कारण है कि कई गाँवों में बड़े-बड़े चर्च बन जाने के बावजूद, आधिकारिक रिकॉर्ड में ईसाई आबादी बेहद कम दिखाई देती है।

स्थानीय हिंदुओं को आशंका है कि क्रिसमस कार्यक्रमों के जरिए एक बार फिर धर्म प्रचार और धर्मांतरण की गतिविधियाँ तेज हो सकती हैं। इसी वजह से वे माँग कर रहे हैं कि क्रिसमस कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति केवल उन्हीं लोगों को दी जाए जो सरकारी रिकॉर्ड में पंजीकृत ईसाई हैं।

सिर्फ धरमपुर-कपराड़ा नहीं, पूरे दक्षिण गुजरात के पूर्वी इलाके में असर

यह मुद्दा केवल धरमपुर या कपराड़ा के कुछ गाँवों तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में दक्षिण गुजरात के पूरे पूर्वी पट्टी में तेजी से डेमोग्राफिक बदलाव देखे गए हैं। इसमें धरमपुर और कपराड़ा के साथ-साथ डांग, तापी और सूरत जिले के सबसे उत्तरी इलाके, जैसे उमरपाड़ा और देडियापाड़ा भी शामिल हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि जिन लोगों का धर्मांतरण कराया जाता है, वे अक्सर कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं करते। इसी कारण सरकारी रिकॉर्ड में उनका नाम हिंदू ही बना रहता है लेकिन उनके जीवन से धीरे-धीरे हिंदू धर्म और संस्कृति गायब हो जाती है।

हाल ही में ऑपइंडिया ने उमरपाड़ा में एक अवैध चर्च के निर्माण को लेकर एक विशेष रिपोर्ट की थी। इस रिपोर्ट से संकेत मिलता है कि यह समस्या अब दक्षिण गुजरात से बढ़कर धीरे-धीरे मध्य गुजरात की ओर भी फैल रही है।

जनसंख्या में आए इन बदलावों के चलते कई अन्य समस्याएँ भी सामने आई हैं। डांग और तापी के कई गाँवों में हिंदू धर्म के अनुयायी तौर पर अल्पसंख्यक बनते जा रहे हैं। गाँवों से मंदिर गायब हो रहे हैं और जनजातियों के पारंपरिक धार्मिक स्थल या तो नष्ट किए जा रहे हैं या उनका स्वरूप बदला जा रहा है। उदाहरण के तौर पर, वर्ष 2022 में सोंगध के एक गाँव में एक प्राचीन आदिवासी धार्मिक स्थल को तोड़कर वहाँ मदर मैरी के लिए धार्मिक ढाँचा बनाए जाने का मामला सामने आया था।

इन सभी कारणों से स्थानीय हिंदू इस बार क्रिसमस से पहले सतर्क हो गए हैं और अपनी माँगें प्रशासन के सामने रख रहे हैं। अब देखना होगा कि प्रशासन और सरकार इस पूरे मामले में क्या फैसला लेते हैं।

इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया जानने के लिए ऑपइंडिया ने धरमपुर के मामलतदार से संपर्क करने की कोशिश की लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका। जवाब मिलने पर रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा।

(यह खबर मूल रूप से गुजराती में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।)

128 FIR, 32 गिरफ्तारियाँ… जानिए कोडिन के काले साम्राज्य को कैसे खत्म कर रही योगी सरकार, अखिलेश यादव से आलोक की कितनी करीबी?

उत्तर प्रदेश में नशे के काले कारोबार को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए योगी आदित्यनाथ सरकार ने जो अभियान छेड़ा है, वह न सिर्फ राज्य की सीमाओं को पार करता है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय ड्रग माफिया के साम्राज्य को चूर-चूर करने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो रहा है। यूँ तो कोडिन से बने साधारण कफ सिरप फेन्सेडिल (Phensedyl) का इस्तेमाल खाँसी के इलाज के लिए होता है, लेकिन यह अवैध तस्करी के जरिए हेरोइन जैसी लत फैलाने वाला हथियार बन चुका है।

उत्तप्रदेश में इस दवा की अवैध ब्रिक्री का एक ऐसा रैकेट सामने आया जो राज्य या देश नहीं बल्कि विदेशों तक इसके अवैध कारोबार को फैला चुका था। साल 2024 में योगी आदित्यनाथ सरकार ने इस मामले की जाँच के लिए एक जॉइंट ऑपरेशन का आदेश दिया। Food Safety and Drug Administration और राज्य की Special Task Force को आदेश मिला कि कोडिन बेस्ड दवाओं और सिरप का अवैध स्टोरेज और स्मगलिंग किया जा रहा है।

साल 2024 से शुरू हुई इस जाँच ने 2025 तक एक विशालकाय नेटवर्क को उजागर किया है, जिसमें 128 FIR दर्ज हुईं, 280 ड्रग लाइसेंस रद्द किए गए, 3.5 लाख से ज्यादा शीशियाँ जब्त की गईं और 32 प्रमुख आरोपित गिरफ्तार हो चुके हैं। अनुमानित 425 करोड़ रुपये का यह काला साम्राज्य उत्तर प्रदेश के 28 जिलों से लेकर नेपाल, बांग्लादेश, दुबई और पाकिस्तान तक फैला था।

इसमें सुपर स्टॉकिस्ट फर्मों से लेकर शेल कंपनियाँ, राजनीतिक कनेक्शन और यहाँ तक कि टेरर फंडिंग का एंगल भी जुड़ गया। समाजवादी पार्टी के नेताओं और अखिलेश यादव के करीबियों के नाम आने से राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सख्त निर्देश पर STF, FSDA और ED की संयुक्त कार्रवाई ने इस ‘हलाल नशे’ के सिंडिकेट को धराशायी कर दिया, जो युवाओं को बर्बाद करने के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा को भी खतरे में डाल रहा था। अब SIT और ED की जाँच आगे बढ़ रही है, जो हजारों करोड़ के मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकी फंडिंग तक पहुँच सकती है।

क्या है कोडिन और उसकी सिरप

कोडिन दरअसल अफ़ीम से निकला हुआ एक पदार्थ है। सामान्य तौर पर जिन सिरप में इसका इस्तेमाल होता है वो खांसी का इलाज करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन यदि इसकी अधिक मात्रा ले लिया जाए तो दिमाग को सुन्न कर देता है। लंबे समय तक इस्तेमाल करने पर हेरोइन या अफीम जैसी ही लत पैदा करने की क्षमता रखता है। बीते कुछ वर्षों में तेजी के साथ सॉफ्ट ड्रग के तौर पर इसका इस्तेमाल लोगों ने करना शुरू किया है। 100 मिली सिरप में अगर 10 मिली कोडिन का इस्तेमाल किया जाए तो इसका सेवन करने वाला व्यक्ति इसका आदी बन सकता है।

कैसे सामने आया पहला मामला?

साल 2024 की फ़रवरी में लखनऊ की सुशांत गोल्फ सिटी इलाके में एक छापा पड़ा। Phensedyl नाम की एक सिरप, जो कोडिन बेस्ड सिरप थी… यूपी एसटीएफ को सूचना मिली कि यहाँ पर बड़ी मात्रा में उसका अवैध भंडारण किया जा रहा है। जब छापा पड़ा तो पता चला कि इसके कागजात फर्जी थे और इस सिरप की सप्लाई चेन संदेह को बढ़ा रही थी।

सुशांत गोल्फ सिटी थाने में NDPS और IPC की अलग-अलग धाराओं में इस मामले की FIR दर्ज हुई। जब इस मामले की सघनता से जाँच हुई तो ये मामला कहीं ज्यादा बड़ा नजर आने लगा। कई महीनों से मिल रहे इनपुट के आधार पर यह कार्रवाई की गई थी। इस छापे के बाद एक साल से भी ज्यादा वक्त तक इस मामले की हर कड़ी की जाँच हुई।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का सीधा आदेश था कि इस नशे के अवैध कारोबार के खिलाफ कोई कोताही नहीं बरतनी है। उत्तर प्रदेश की जाँच एजेंसियों ने किया भी ठीक वैसा ही। एक साल के करीब के वक्त में STF और FSDA ने पूरी तरह से जाँच की और हर कड़ी को खंगाला ताकि कोई भी गुनहगार एजेंसियों की नजरों से ना बच सके और इसके पीछे मौजूद पूरे रैकेट का भंडाफोड़ किया जा सके।

सुपर स्टॉकिस्ट और ड्रग माफिया का गठजोड़

इस केस में जब STF ने जाँच आगे बढ़ाई तो सामने आया कि कुछ ऐसी फर्म्स हैं जो सुपर स्टॉकिस्ट हैं। जो दवाओं को बड़ी मात्रा में स्टॉक करने का लाइसेंस रखती हैं। जांच में सामने आया कि, पहले इन्हीं सुपर स्टॉकिस्ट कंपनियों के नाम पर बड़ी मात्रा में कोडिन युक्त कफ सिरप की वैध खरीद दिखाई गई। फिर उन्हें अवैध रूप से बेचने के लिए फर्जी फर्म खड़ी कर दी गई।

रिकॉर्ड में हेराफेरी करके सिरप को दवा की बजाए नशे के सिरप के तौर पर काले बाजार में उतारा गया। उत्तर प्रदेश से सटे राज्यों- बिहार, झारखंड, बंगाल के रास्ते होते हुए इस नशे को नेपाल और बांग्लादेश तक सप्लाई किया जाने लगा। लखनऊ, लखीमपुर खीरी, बहराइच, बनारस, जौनपुर, सहारनपुर समेत प्रदेश के 28 जिलों और कई राज्यों में इस नशे के अवैध कारोबार के तार फैले हुए थे।

इसमें राजनीतिक कनेक्शन से लेकर ड्रग्स के अंतरराष्ट्रीय माफिया तक के नाम सामने आए। प्रदेश सरकार और प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी इसके किंगपिन को गिरफ्तार करना और इसके सिंडिकेट का खुलासा करना।

कैसे हुआ सिंडिकेट का खुलासा?

एक साल के करीब के समय की जाँच के बाद 18 अक्टूबर 2025 को उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में एक ट्रक पकड़ा गया। ट्रक के अंदर बड़ी संख्या में चिप्स के कार्टन थे। लेकिन जब इन कार्टन को खोला गया तो अंदर नशे का पूरा जखीरा रखा हुआ था। इन कार्टन के अंदर कोडिन युक्त कफ सिरप की शीशियाँ रखी हुई थी। जब इनकी कीमत का अंदाजा लगाया गया तो प्रशासन के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। इस ड्रग्स की कीमत करीब 3 करोड़ रुपये बताई गई। यहाँ मध्य प्रदेश के तीन तस्कर हेमंत पाल, बृजमोहन शिवहरे और रामगोपाल धाकड़ गिरफ्तार हुए।

पिछली फरवरी से ही STF इसी तरह की तस्करी की कड़ियाँ जोड़ रही थी। जब सोनभद्र से ये सूचना आई तो तार जुड़ने लगे। प्रारंभिक जाँच में पता चला कि यह खेप नेपाल के रास्ते पाकिस्तान जाने वाली थी। इसी के पंद्रह से बीस दिनों के भीतर झारखंड और राँची से भी नशीली दवा की बड़ी खेप पकड़ी गई।
इस मामले की सघन जाँच हुई तो एक नाम सामने आया। नाम था- शुभम जायसवाल। शुभम के नाम तक पहुँचने से पहले एजेंसियों ने 300 से अधिक फर्मों की स्क्रीनिंग की। उनमें से 133 ऐसी फर्म्स के नाम शॉर्टलिस्ट किए गए जो सामूहिक रूप से इस नशे के इस धंधे में या तो सीधे शामिल थे या डायवर्जन में मदद दे रहे थे। और सोनभद्र में ट्रक पकड़े जाने से कुछ महीनों से पहले ही इस तरह की छापेमारी की जाने लगी थी जिससे कि इस पूरे सिंडिकेट की कमर को एक झटके में ही तोड़ा जा सके।

बनारस से दुबई कनेक्शन और नशे का सिंडिकेट

एसटीएफ ने जाँच को तेजी से आगे बढ़ाया तो राज खुलने लगे। शुभम जायसवाल जो मूल रूप से बनारस का रहने वाला है, वो आज के समय में दुबई में रहता है। एसटीएफ ने 27 नवंबर को लखनऊ के विभूतिखंड इलाके में गौरी चौराहे के पास अमित कुमार सिंह उर्फ़ अमित टाटा को गिरफ्तार किया गया। पूछताछ में पता चला कि ये इस ड्रग्स के कारोबार की अहम कड़ी है और दुबई से शुभम जायसवाल के इशारे पर पूरे नेटवर्क को ऑपरेट करता है।

अमित टाटा के पास मिले डिजिटल उपकरणों से सप्लाई रूट, लेनदेन का रूट, सिंडिकेट का पूरा नेटवर्क मैप सब कुछ सामने आ गया। शुभम के इस नशीले कारोबार में उसका पिता भोला प्रसाद भी शामिल था। उसे कोलकाता एयरपोर्ट से उस समय गिरफ्तार किया गया जब वो उत्तर प्रदेश की STF की कार्रवाई से डरकर थाईलैंड भागने की फिराक में था।

STF और उत्तर प्रदेश के औषधि विभाग को मुख्यमंत्री ने आदेश दिया कि इस पूरे नेटवर्क पर कानून का बुलडोजर चलाया जाए। जाँच तेज हो गई। सामने आया कि कुछ बड़ी दवा निर्माता कंपनियों लेबोरेट, थ्री-बी हेल्थकेयर और एबॉट की सप्लाई चेन का इस्तेमाल किया गया।

उत्तर प्रदेश पुलिस के एक बर्खास्त सिपाही आलोक कुमार सिंह का नाम भी सामने आया, जिसकी सात हजार वर्ग फुट की कोठी को देखकर ED के अधिकारी भी सन्न रह गए थे। और बात तब और गहरी हो गई जब इसी बर्खास्त सिपाही के साथ समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव की तस्वीर भी निकल कर सामने आ गई। कई बाहुबली नेताओं के नामों को लेकर भी चर्चा हुई, हालाँकि अभी एजेंसियों ने किसी का नाम सामने नहीं किया है।

हालाँकि, इंटरनेट पर शुभम जायसवाल और अमित टाटा के साथ उनकी तस्वीरें और वीडियो तेजी से वायरल हो रहे हैं। इसके अलावा इतने बड़े कारोबार के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैल जाने की वजह से संदेह है कि इसमें कुछ बड़े नाम भी शामिल हो सकते हैं। और योगी आदित्यनाथ इसीलिए तेजी के साथ जीरो टॉलरेंस की नीति पर कार्रवाई करने का आदेश दे रहे हैं।

अभी तक क्या कार्यवाई हुई?

इन गिरफ्तारियों और सिंडिकेट के किंगपिन का नाम सामने आने के बाद जरूरी था इस पूरे नेटवर्क की कमर तोड़ना। 8 दिसंबर को लखनऊ में गृह विभाग के प्रमुख सचिव संजय प्रसाद, डीजीपी राजीव कुमार कृष्ण और FSDA कमिश्नर रौशन जैकब ने संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अब तक की कार्रवाई का पूरा ब्योरा दिया।

बताया गया कि अभी तक 128 FIR दर्ज की गई है, 280 ड्रग लाइसेंस कैंसिल हुए हैं, 3.5 लाख शीशियां जब्त की गई। 32 लोग जो इस तस्करी नेटवर्क से जुड़े हुए थे, उनको अभी तक गिरफ्तार किया गया है। इन गिरफ्तारियों में जो प्रमुख नाम सामने आए हैं वो कुछ इस प्रकार हैं- विभोर राणा, विशाल राणा, सौरभ त्यागी, भोला प्रसाद जायसवाल, आलोक प्रताप सिंह, अभिषेक शर्मा, आकाश पाठक और अमित सिंह उर्फ अमित टाटा।

इस पूरे रैकेट की जाँच के दौरान यूपी STF को दिखा कि ये मामला हजारों करोड़ का बन सकता है। करीब 425 करोड़ रुपए के काले धन का सीधा एस्टीमेट समझ में आने लगा। और इस मामले में एक SIT का भी गठन किया गया है। जो विशेष रूप से इस केस से जुड़े हर तथ्य की सघनता से जाँच करेगी।

3 दिसंबर को ED के द्वारा इस मामले में 67 आरोपितों के खिलाफ ECIR दर्ज किया गया। ED ने 25 ठिकानों पर एकसाथ तलाशी अभियान चलाया। उत्तर प्रदेश के लखनऊ, सहारनपुर, वाराणसी और गाजियाबाद और झारखंड और गुजरात की राजधानियों की लोकेशंस पर भी यह तलाशी अभियान चलाया गया।

तलाशी के दौरान पता चला कि 700 फर्जी फर्म्स 220 लोगों के नाम पर रजिस्टर हैं, जो सीधे तौर पर पैसों के हेरफेर के लिए बनाई गई हैं। ED का अनुमान है कि पैसों का कुल जोड़ हजार करोड़ के ऊपर भी जा सकता है और इसीलिए इस केस में PMLA के तहत कार्रवाई करने की तैयारी भी चल रही है।

बीते दिनों 8 दिसंबर को लखनऊ में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में यूपी पुलिस के डीजीपी राजीव कृष्ण ने बताया कि लखनऊ जोन में कुल 11 मुकदमे दर्ज किए गए हैं, बरेली जोन में 4 मुकदमे, गोरखपुर जोन में 10 मुकदमे, वाराणसी जोन में 2 मुकदमे दर्ज किए गए हैं। जिनके जरिए उस पूरे नेटवर्क को ध्वस्त करने की तैयारी की जा रही है जिसके जरिए ये नशे का अवैध कारोबार चल रहा था।

हलाल नशा है कफ़ सिरप और टेरर फंडिंग का एंगल भी आ रहा है सामने

कई मौकों पर भारत बांग्लादेश बॉर्डर पर बीएसएफ के द्वारा कफ़ सिरफ़ की तस्करी को रोकने और उन्हें जब्त करने की खबरें भी आती हैं। और अब ED की जाँच के दौरान इस तरह की बातें भी निकल कर सामने आ रही हैं कि तस्करी से होने वाली कमाई का इस्तेमाल टेरर फंडिंग के लिए किया जा रहा है।

दरअसल, उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के आसिफ और वसीम नाम के तस्करों का नाम भी इस मामले में सामने आ रहा है। जानकारी मिली है कि आसिफ बांग्लादेश के रास्ते अन्य खाड़ी देशों तक तस्करी करता है। और पैसों के हेरफेर में हवाला के जिस नेटवर्क का सहारा लिया जाता है, शक है कि वो आतंकवादियों को लाभ पहुँचाता हो।

इसके अलावा दावा यह भी किया जाता है कि चूँकि इस्लाम में शराब प्रतिबंधित है तो नशे के लिए इस तरह की कफ सिरप का इस्तेमाल तेजी के साथ बढ़ा है। कफ सिरप को हलाल नशे के तौर पर प्रचारित किया जाता है। और कई ऐसी सूचनाएँ हैं कि कफ सिरप का प्रसार उन क्षेत्रों में ज्यादा है जहाँ मुस्लिम जनसंख्या की बहुलता है।

विस्तार से जानिए उन 12 नामों के बारे में जो कोडिन कफ़ सिरफ़ मामले में मुख्य आरोपित हैं।

शुभम जायसवाल: वाराणसी का रहने वाला है, फ़िलहाल दुबई में रहता है। इस पूरे रैकेट का मास्टरमाइंड यही है।

भोला प्रसाद जायसवाल: वाराणसी का रहने वाला है। शुभम जायसवाल का पिता है। सैली ट्रेडर्स का मालिक है।100 करोड़ का टर्नओवर है।

मनोहर जायसवाल: शुभम जायसवाल के परिवार का सदस्य है। शेल कंपनियों को बनाने में अहम योगदान रहा है।

विभोर राणा: सहारनपुर का रहने वाला है। यह मुख्य सुपरस्टॉकिस्ट है। जीआर ट्रेडिंग कंपनी के ज़रिए इस सिरप की सप्लाई करवाता था।

सौरभ त्यागी: गाजियाबाद का रहने वाला है।इसके पास से 1.57 लाख बोतल पकड़ी गई। इसी ने शुभम जायसवाल का नाम एजेंसियों को बताया था।

विशाल राणा: सहारनपुर का रहने वाला है। विभोर राणा का भाई है। फर्जी बिलिंग और शेल फर्म के नेटवर्क को बनाया था।

पप्पन यादव: लखीमपुर खीरी/बहराइच का रहने वाला है। ट्रांसपोर्ट का काम करता था। नेपाल सप्लाई रूट पर काम करता था।

शादाब: वाराणसी/जौनपुर का रहने वाला है। फर्जी लाइसेंस के ज़रिए लोकल लेवल पर स्टॉकिंग का आरोपी है।

अभिषेक शर्मा: लखनऊ का रहने वाला है। फर्जी ड्रग लाइसेंस रखने का आरोप है। 80 लाख बोतल पकड़ी गई है।

विशाल उपाध्याय: लखनऊ का रहने वाला है। बोगस बिलिंग और पेपरवर्क को हैंडल करता था।

आकाश पाठक: वाराणसी का रहने वाला है। लोकल लेवल पर धंधे को हैंडल करता था।

विनोद अग्रवाल: लखनऊ/वाराणसी का रहने वाला है। पेशे से CA है। शेल कंपनियों के ज़रिए मनी ट्रेल को मैनेज करने का काम करता था।

सपा नेताओं का कनेक्शन आया सामने

इसके अलावा कई और नाम हैं जो सोशल मीडिया पर तैर रहे हैं। इनमें एक नाम समाजवादी पार्टी के जौनपुर जिले की मलहनी सीट से विधायक लक्की यादव के बेहद करीबी राहुल यादव का भी है। राहुल यादव की तस्वीर अखिलेश यादव के साथ हाथ मिलाते हुए दिख रही है।

इसके अलावा बर्खास्त यूपी पुलिस के सिपाही आलोक सिंह की अखिलेश यादव के साथ की तस्वीरें सोशल मीडिया हर जगह वायरल ही है। जिसका नाम ही इस पूरे रैकेट के भंडाफोड़ की जड़ बनी है। 28 जिलों में जो 128 FIR दर्ज की गई है, उनमें से कई नाम ऐसे बताए जा रहे हैं जिनको अखिलेश यादव के शासनकल में ड्रग लाइसेंस मिले थे। इस अवैध कारोबार को फैलाने में इनकी अहम भूमिका बताई जा रही है, SIT इनसे जुड़े मामलों की पड़ताल कर रही है। वो आज लोकल लेवल पर रिटेलर बने हुए हैं।

योगी आदित्यनाथ सरकार की कार्रवाई से समाजवादी पार्टी में तिलमिलाहट

जितनी तेजी के साथ उत्तर प्रदेश की एजेंसियाँ कोडिन के गुनहगारों को पकड़ रही हैं उसी रफ्तार से उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की तिलमिलाहट बढ़ती जा रही है। एक तरफ जहाँ सटीक प्लानिंग के साथ बड़े ड्रग्स माफिया के पूरे नेटवर्क को ध्वस्त किया जा रहा है, पूरे भारत में फैले इस ड्रग नेटवर्क को अकेले उत्तर प्रदेश की एजेंसियाँ ध्वस्त कर रही हैं, सरकार की तरफ से एजेंसियों को खुली छूट मिली हुई है तो दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी में तिलमिलाहट साफ नजर आ रही है।

हो भी क्यों ना? यूपी पुलिस के बर्खास्त सिपाही आलोक सिंह की सपा मुखिया अखिलेश यादव के साथ सुखद मुलाकात की तस्वीर अपने आप में कहानी बता रही है। अभी जाँच का दायरा जैसे-जैसे बढ़ रहा है समाजवादी पार्टी की तकलीफ बढ़ती जा रही है।

कोडिन एक बड़ी आबादी को बर्बाद करने वाला जहर बन चुका है। जिसके धंधे से लाभ कमाने वाले लोग समाजवादी पार्टी के करीबियों में गिने जा रहे हैं। अभी कई और नामों का खुलासा और उनका समाजवादियों से संबंध सामने आना बाकी है। उन माफियाओं का नाम भी सामने आ रहा है जिनके एक लंबे समय तक अखिलेश यादव के पिता मुलायम सिंह यादव के साथ अच्छे संबंध रहे हैं।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बीते दो वर्षों की सतत कार्रवाई से स्पष्ट कर दिया है कि इस मामले में कोई बचने वाला नहीं है। ED ने अपनी जाँच का दायरा टेरर फंडिंग तक बढ़ाया है और इस नशे के काले कारोबार से 200 करोड़ की कमाई करने वाले बर्खास्त सिपाही की तस्वीर अखिलेश यादव के साथ नजर आई है। सरकार और प्रशासन दोनों ने अपनी मंशा स्पष्ट कर दी है कि इस नशे के काले कारोबार को समूल नष्ट कर दिया जाएगा।