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अंबेडकर मंदिर के खिलाफ नहीं थे: सोमनाथ मंदिर से जुड़ा उनका पत्र बताता है असली इतिहास, लेखक अनुज धर ने शेयर किया दस्तावेज

गुजरात में समंदर के किनारे भारत का गौरव बनकर शान से खड़े सोमनाथ मंदिर पर महमूद गजनवी के आक्रमण को 1000 साल हो गए हैं। 8 जनवरी से गुजरात में सोमनाथ स्वाभिमान पर्व भी मनाया जाना है। इस बीच मंदिर से जुड़े पुराने किस्से लगातार चर्चा में हैं। सोशल मीडिया पर डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का मंदिर से जुड़ा एक पत्र वायरल हो रहा है जो उन्होंने कन्हैयालाल माणिकलाल (केएम) मुंशी को लिखा था।

सरदार पटेल ने नवंबर 1947 में जनता से वादा किया था कि वह सोमनाथ मंदिर का पुनर्निमाण करवाएँगे दिसंबर 1950 में उनके निधन के बाद तत्कालीन खाद्य मंत्री मुंशी ने यह जिम्मेदारी अपने कंधे पर ले थी। वह मंदिर के पुनर्निमाण की देख रेख कर रहे थे। मई 1951 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा नए मंदिर में ज्योतिर्लिंग की प्राण-प्रतिष्ठा की जानी थी उससे पहले मार्च 1951 में मुंशी को अंबेडकर ने पत्र लिखा था।

देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस मंदिर के पुनर्निमाण से विचलित थे यह तथ्य किसी से छिपा नहीं हैं। नेहरू ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के प्रस्ताव का ‘हिंदू पुनरुत्थानवाद‘ कहकर विरोध भी किया था। वहीं, अंबेडकर के पत्र से यह स्पष्ट होता है कि वह इस मंदिर के पुनर्निर्माण के ना केवल समर्थक थे बल्कि उसमें अपने सुझाव भी दे रहे थे।

अंबेडकर ने पत्र में क्या लिखा है?

एक वर्ग द्वारा अंबेडकर की यह छवि बनाई गई है कि हिंदू विरोधी थे लेकिन यह पत्र अंबेडकर की छवि को लेकर एक नई दृष्टि भी देता है। Conundrum और Your Prime Minister is Dead जैसी चर्चित किताबों के लेखक अनुज धर ने ‘X’ पर यह पत्र शेयर किया है।

27 मार्च 1951 के इस पत्र में अंबेडकर मुंशी को लिखते हैं, “मुझे यह जानकारी मिली है कि सोमनाथ में मूर्ति की स्थापना की तिथि 11 मई तय की गई है। मैं चाहता हूँ कि इस अवसर पर मेरे मित्र अनिरुद्धाचार्य जी को समारोह में आमंत्रित किया जाए। वे बड़ौदा जिले के चंदोदा स्थित मठ के प्रमुख हैं। मैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ और मुझे पूरा विश्वास है कि वे इस निमंत्रण के पूर्णतः योग्य हैं।”

GROK ने लेटर को बताया AI जेनरेटेड, जानें क्या है सच?

अनुज धर के पोस्ट शेयर करने के बाद कई X यूजर्स इस पत्र को नकली और AI द्वारा बनाया गया बताने लगे। कई यूजर्स ने मस्क की कंपनी xAI के चैटबॉट GROK को टैग कर इस लैटर को लेकर सवाल पूछे तो चैटबॉट ने इसे AI द्वारा बनाया गया पत्र बता दिया।

चैटबॉट ने X पोस्ट में लिखा, “यह पत्र अंबेडकर की आधिकारिक लेखों या ऐतिहासिक अभिलेखागारों में नहीं मिलता है। 2026 से पहले की खोजों में इसका कोई ज़िक्र नहीं मिला। ‘Antrudhachary’ नाम का 1951 के ऐतिहासिक रिकॉर्ड से कोई मेल नहीं खाता। ऐसा लगता है कि यह मनगढ़ंत है, हो सकता है कि AI द्वारा बनाया गया हो।”

इसके बाद तो इसे AI द्वारा बनाया गया बताने वालों की बाढ़ सी ही आ गई। हमने खुद अनुज धर से इस पत्र को लेकर बात की। उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा, “इन सभी रिकॉर्ड्स का सोर्स नेशनल आर्काइव्स है। जो कोई भी इन्हें नकली समझता है, उसे आर्काइव्स में केएम मुंशी के पेपर्स देखने चाहिए।” साथ ही, उन्होंने इस पत्र से जुड़े और पत्र भी साझा किए हैं।

यानी AI चैटबॉट के भरोसे जो लोग आर्काइव्स पढ़ने या उससे समझने की कोशिश करते हैं और मानते हैं कि AI है तो सब जानता है होगा, उनके लिए यह समझना भी जरूरी है कि AI शब्द नहीं जानता है। AI पर पूरी तरह भरोसा करना समस्या है।

चैटबॉट आर्काइव्स को इसलिए नहीं पढ़ पाता क्योंकि ऐतिहासिक अभिलेखों का बहुत बड़ा हिस्सा आज भी डिजिटल रूप में मौजूद ही नहीं है। भारत ही नहीं, दुनिया भर के आर्काइव्स में करोड़ों दस्तावेज कागज पर तो सुरक्षित हैं कि पुराने सरकारी फाइलें, निजी पत्र, हस्तलिखित डायरी, रिपोर्टें और रजिस्टर। ये दस्तावेज अक्सर न तो स्कैन किए गए हैं और न ही ऑनलाइन उपलब्ध हैं। चैटबॉट केवल उसी सामग्री तक पहुँच सकता है जो पहले से डिजिटल और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हो।

इसमें भी कई तरह की दिक्कतें हैं, जो आर्काइव्स डिजिटाइज किए भी गए हैं, वे अधिकतर स्कैन की गई तस्वीरों के रूप में होते हैं, न कि साफ-सुथरे टेक्स्ट फाइल की तरह। इनमें स्याही के धब्बे, फटे पन्ने, धुंधले अक्षर और पुरानी लिपियाँ होती हैं। ऐसी सामग्री को पढ़ने के लिए सिर्फ भाषा ज्ञान का नहीं बल्कि पैलियोग्राफी और ऐतिहासिक दस्तावेज पढ़ने का अभ्यास चाहिए जो चैटबॉट के लिए संभव नहीं है।

इस लेटर से जुड़े अन्य पत्र

अनुज धर ने अंबेडकर के इस पत्र से जुड़े दो अन्य पत्र भी साझा किए हैं जिनमें एक अंबेडकर को मुंशी का जवाब और दूसरे में स्वामी अनिरुद्धाचार्य को निमंत्रण है। 30 मार्च 1951 को मुंशी ने डॉक्टर अंबेडकर को लिखा, “27 मार्च के आपके पत्र के लिए धन्यवाद। मुझे अनिरुद्धाचार्य को समारोह के लिए आमंत्रित करके बहुत खुशी होगी। मैं आपसे यह भी अनुरोध करूँगा कि आप भी प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में शामिल हों।”

अंबेडकर को मुंशी का पत्र (साभार: अनुज धर)

30 मार्च 1951 को ही मुंशी ने स्वामी अनिरुद्धाचार्य को निमंत्रण देते हुए पत्र लिखा था। मुंशी ने लिखा, “आपको यह जानकारी होगी कि सोमनाथ लिंग की स्थापना 11 मई 1951 को प्रभास पाटन में तय की गई है। इसी दौरान अखिल भारतीय संस्कृत परिषद का आयोजन भी किया जाएगा। हम इस अवसर पर देश के सभी धार्मिक संस्थानों के प्रमुखों को आमंत्रित कर रहे हैं। हमें बहुत खुशी होगी यदि आप अपनी सुविधा के अनुसार इस पावन अवसर पर उपस्थित होकर कार्यक्रम की शोभा बढ़ाएँ। आप चाहें तो कार्यक्रम से दो दिन पहले भी पधार सकते हैं।”

स्वामी अनिरुद्धाचार्य को मुंशी का पत्र (फोटो साभार: अनुज धर)

अंबेडकर के पत्र के अलावा इन दोनों को पढ़ने के बाद अनुज धर का यह दावा पुख्ता हो जाता है कि यह पत्र कोई इकलौता पत्र नहीं है जो AI से बना लिया गया है बल्कि पत्रों की एक पूरी सीरीज है। इससे उन लोगों की भी पोल खुल जाती है जो अंबेडकर को हिंदुओं को खिलाफ खड़ा करने पर तुले रहते हैं।

‘डेमोक्रेसी’ के नाम पर गिराई सरकारें, तानाशाहों को किया मजबूत: जानिए कैसे दुनियाभर में दोगलापन करता है अमेरिका

शनिवार (3 जनवरी) की सुबह, काराकास की नींद रात के आसमान में फाइटर जेट्स के उड़ने की आवाज़ से खुली। सुबह तक यह साफ हो चुका था कि वेनेज़ुएला एक जाने-पहचाने अमेरिकी ड्रामे का नया मंच बन चुका है। यहाँ अमेरिकी सेना की टुकड़ी को ‘डेमोक्रेसी वापस लाने’ के एक मिशन पर लगाया गया था।

US के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कन्फर्म किया कि अमेरिकी सेना ने वेनेज़ुएला में कई हमले किए हैं और प्रेसिडेंट निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को पकड़कर यूनाइटेड स्टेट्स ले गए हैं। ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर ऑपरेशन की घोषणा की, और इसे ‘नारकोटिक टेररिज्म’ कहे जाने वाले सिस्टम के खिलाफ अभियान बताया।

(साभार- ट्रंप/ ट्रूथ सोशल)

इसके तुरंत बाद, US अटॉर्नी जनरल पामेला बोंडी ने बताया कि मादुरो और फ्लोरेस पर न्यूयॉर्क में नार्को-टेररिज्म की साजिश में शामिल होने से लेकर लोकतंत्र को खत्म करने जैसे आरोप लगाए गए थे।

ट्रंप ने मादुरो सरकार पर प्रवासियों को US के दक्षिणी बॉर्डर की ओर धकेलने, जेलों और मेंटल इंस्टीट्यूशन को खाली करने और ड्रग कार्टेल और आतंकवादी ग्रुप्स के साथ मिलकर काम करने का आरोप लगाया। ट्रंप के मुताबिक, वेनेजुएला अमेरिका में कोकेन लाने का एक बड़ा रास्ता बन गया है, जहाँ कैरिबियन और पैसिफिक के रास्ते नशीले पदार्थों की तस्करी होती है।

यह वजह जानी-पहचानी लग रही थी क्योंकि पहले भी अमेरिका ऐसे आरोप लगाकर कई देशों के साथ ऐसा व्यवहार कर चुका है। कई सालों से अमेरिका अपने विरोधी देशों और उनकी सरकारों पर मानवाधिकार उल्लंघन करने, लोगों पर जुल्म करने और दुनिया की सुरक्षा के लिए खतरा बताता रहा है।

वेनेज़ुएला के मामले में सितंबर 2025 में ट्रंप प्रशासन ने कई नावों पर हमला किया था और उसमें ड्रग्स होने की बात कही थी। यह एक संकेत था, जो अमेरिका ने दुनिया को दिया था।

हालाँकि मादुरो ने हमेशा ऐसे आरोपों से इनकार किया और उन्हें वेनेजुएला के बड़े तेल भंडार को कंट्रोल के लिए एक कवर बताया। हमलों से कुछ दिन पहले मादुरो ने प्रवासियों और ड्रग ट्रैफिकिंग पर US के साथ सहयोग की पेशकश की थी। लेकिन अमेरिका ने मादुरो के सामने देश छोड़ने की शर्त रख दी थी। इससे मादुरो उखड़ गए। इस पर अमेरिका ने मादुरो पर ‘गंभीर’ नहीं होने का आरोप लगाया।

इसका खामियाजा वेनेजुएला को उठाना पड़ा। अमेरिकी जेट बिना कॉन्ग्रेस की मंजूरी के उड़ गई। इसपर अमेरिका में भी सवाल किए जा रहे हैं। यूएन को बताना तो दूर की बात है।

वेनेज़ुएला में जो हुआ वह एक ऐसे पैटर्न से मेल खाता है, जिसे दुनिया ने पहले भी कई बार देखा है। डेमोक्रेसी, सिक्योरिटी और नैतिक जिम्मेदारी में लिपटा हुआ एक शासन बदलने का ऑपरेशन।

डेमोक्रेसी बहाल करने के नाम पर शासन बदलना

वेनेज़ुएला में US का दखल यूँ ही नहीं हुआ। यह दुनिया भर में अमेरिका की लीडरशिप में हुए तख्तापलट का एक और उदाहरण है। वियतनाम से लेकर इराक तक, अफगानिस्तान से लेकर सीरिया तक अमेरिका ने बार-बार मिलिट्री एक्शन को ‘खराब राज’ हटाने और उनकी जगह ‘डेमोक्रेटिक सिस्टम’ लाने के तौर पर इस्तेमाल किया। इसकी वजह से दुनिया में अस्थिरता का दौर आया और व्यापक हिंसा हुई।

2001 के आखिर में US के समर्थन वाली सेना काबुल में घुसी और कुछ ही हफ्तों में तालिबान सरकार को गिरा दिया। हामिद करजई को अमेरिकी समर्थन मिला और उन्हें अफगानिस्तान का लीडर बनाया गया। उस वक्त तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने सेंट्रल एशिया में डेमोक्रेसी की जड़ें जमने की बात कही। दो दशक बाद, US सैनिक वापस चले गए और तालिबान लगभग रातों-रात सत्ता में वापस आ गया। अमेरिका की बनाई सरकार गिर गई। इससे पता चलता है कि वह हमेशा से कितनी खोखली और परजीवी थी।

इराक ने भी ऐसा ही रास्ता अपनाया गया। 2003 में US सैनिकों ने सद्दाम हुसैन को सत्ता से बाहर कर दिया। इराक को मिडिल ईस्ट में लोकतंत्र का अगुआ करार दिया। लेकिन इराक के सिक्योरिटी सिस्टम को खत्म करने से लाखों हथियारबंद लोग बेरोजगार हो गए। देश बगावत, सांप्रदायिक हिंसा और सिविल वॉर में डूब गया। ईरान के सपोर्ट वाले मिलिशिया का असर बढ़ा, और इस अफ़रा-तफ़री से आखिरकार इस्लामिक स्टेट बना, जिसने इलाके के सिक्योरिटी माहौल को इस तरह से बदल दिया जो आज भी उसे परेशान करता है।

सीरिया, लीबिया और पहले वियतनाम एक ही कहानी के अलग-अलग रूप हैं। US नैतिकता की दुहाई देते हुए मौजूदा सरकार को सत्ता से बाहर करता है। सिस्टम खत्म कर देता है और टूटे-फूटे समाज को पीछे छोड़ जाता है। जानकार इस पैटर्न को विदेशियों द्वारा थोपा गया शासन परिवर्तन कहते हैं।

पिछले 120 सालों में यूनाइटेड स्टेट्स ने करीब 35 देशों के नेताओं को सत्ता से जबरदस्ती बाहर किया है। ये आंकड़ा पूरी दुनिया में हुए ऐसे सभी दखलदांजी का लगभग एक-तिहाई है। चिंता की बात यह है कि इनमें से लगभग एक-तिहाई देशों में शासन परिवर्तनों के बाद एक दशक के अंदर सिविल वॉर हुआ।

यहाँ तक ​​कि ट्रंप, जिन्होंने अमेरिका में अपनी राजनीति ही दुनिया के युद्ध बंद करने के नाम पर शुरू की, वे भी इस परंपरा से बाहर नहीं निकल पा रहे। हालाँकि उन्होंने बार-बार इराक हमले की निंदा की है और नियोकंज़र्वेटिव विदेश नीति की आलोचना की है, उनका वेनेजुएला दखल उनके ‘शांतिदूत’ होने के अपने दावों से मेल नहीं खाता।

बांग्लादेश: बिना बम के US ने बदली सरकार

जहाँ वेनेज़ुएला में फाइटर जेट और मिसाइलें देखी गईं, वहीं बांग्लादेश में अमेरिकी दखल अलग तरीके से हुआ। बांग्लादेश में सैनिक नहीं भेजे गए, बल्कि पॉलिटिकल प्रेशर, इंटेलिजेंस नेटवर्क और सड़क पर विरोध प्रदर्शनों के जरिए लोकतांत्रिक सरकार को हटाया गया।

एक किताब, इंशाअल्लाह बांग्लादेश: द स्टोरी ऑफ़ एन अनफिनिश्ड रेवोल्यूशन के मुताबिक, शेख हसीना के पूर्व होम मिनिस्टर असदुज्जमां खान कमाल ने CIA पर उन्हें सत्ता से हटाने की साज़िश रचने का आरोप लगाया है। उन्होंने इन घटनाओं को ‘CIA की एक परफेक्ट साज़िश’ बताया।

(फोटो- Hindu e shop)

कमाल ने दावा किया कि देश के आर्मी चीफ जनरल वाकर-उज़-ज़मान इस साज़िश के सेंटर में थे। हैरानी की बात यह है कि उन्होंने कहा कि बांग्लादेश की टॉप इंटेलिजेंस एजेंसियों ने भी हसीना को चेतावनी नहीं दी, जिससे लगता है कि सीनियर अधिकारियों की मिलीभगत रही होगी। कमाल के मुताबिक, वाकर ने आर्मी चीफ का पद संभालने के कुछ ही हफ़्तों बाद 5 अगस्त, 2024 को हसीना को देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया, यह एक ऐसा पद था जिस पर हसीना ने खुद उन्हें अपॉइंट किया था।

हसीना के गिरने से पहले हुए विरोध प्रदर्शनों को इंटरनेशनल लेवल पर तथाकथित जेन जी लीड और डेमोक्रेटिक बताया गया, लेकिन कमाल ने कहा कि जमात-ए-इस्लामी जैसे कट्टर इस्लामी ग्रुप, जो पहले से बँटे हुए थे, पहली बार विदेशी इंटेलिजेंस नेटवर्क के सपोर्ट से एक हो गए। उन्होंने आगे दावा किया कि पाकिस्तान की ISI ने इसमें अहम भूमिका निभाई। इस दौरान विदेश में ट्रेंड आतंकवादी प्रदर्शनकारियों के साथ मिल गए और पुलिस पर हमला किया।

कमाल ने तर्क दिया कि इसका मोटिवेशन स्ट्रेटेजिक था। उन्होंने कहा कि अमेरिका एक ही समय में साउथ एशिया में बहुत सारे मजबूत लीडर नहीं चाहता। भारत में नरेंद्र मोदी और चीन में शी जिनपिंग के होने से, हसीना का इंडिपेंडेंट रुख उनके लिए असुविधाजनक हो गया। एक और मुख्य वजह बंगाल की खाड़ी में सेंट मार्टिन आइलैंड था, जो अमेरिका चाहता था। हिन्द महासागर में जियोपॉलिटिक्स के लिए ये बहुत जरूरी है।

हसीना ने खुद सार्वजनिक तौर पर कहा था कि US ने उन पर सत्ता में बने रहने के बदले आइलैंड का एक्सेस माँगा था। उन्होंने इसे बांग्लादेश की संप्रभुता का उल्लंघन बताते हुए मना कर दिया। शेख हसीना को हटाए जाने के बाद इकॉनमिस्ट मुहम्मद यूनुस को सत्ता की जिम्मेदारी सौंपी गई, जो अमेरिका के करीबी थे।

तानाशाह के दोस्त, लोकतंत्र के दुश्मन

अमेरिका ने ‘डेमोक्रेसी’ के नाम पर कई देशों और उसके राष्ट्राध्यक्षों को बर्बाद किया। वहीं दूसरी ओर तानाशाही सरकारों के साथ उसके करीबी रिश्ते रहे, बशर्ते वे US के लिए फायदेमंद हों। सऊदी अरब इसका सबसे अच्छा उदाहरण है।

सऊदी में कोई चुनाव नहीं होता, कोई पॉलिटिकल पार्टी नहीं है और कोई राजनीतिक आजादी नहीं है। फिर भी अमेरिका उसे एक अहम साथी मानता है।

हाल ही में, US ने सऊदी अरब को $1.4 बिलियन की सैन्य साजोसामान की बिक्री को मंज़ूरी दी। इसमें उसकी आर्मी को ट्रेनिंग देने के लिए करोड़ों डॉलर शामिल हैं। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के व्हाइट हाउस दौरे के नतीजे में F-35 फाइटर जेट की बिक्री और एक स्ट्रेटेजिक डिफेंस एग्रीमेंट को मंजूरी मिली। इस व्यापार से US और सऊदी अरब के रिश्ते और ‘मधुर’ हुए।

यह वही सऊदी लीडरशिप है, जिसे मानवाधिकार के उल्लंघन, यमन में युद्ध और पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या पर दुनिया भर में गुस्से का सामना करना पड़ा है। फिर भी, ऐसा नहीं लगता कि इनमें से कोई भी बात रियाद को अमेरिकी सपोर्ट के लिए अयोग्य ठहराती है।

सऊदी अरब के अलावा, US के मिडिल ईस्ट, अफ्रीका और एशिया में दूसरे तानाशाही देशों के साथ मजबूत रिश्ते हैं। मिस्र, जहाँ मिलिट्री तख्तापलट के बाद प्रेसिडेंट अब्देल फत्ताह अल-सिसी का राज है, को US से अरबों की मिलिट्री मदद मिलती है।

यूनाइटेड अरब अमीरात, जहाँ पूरी तरह से राजशाही है, US का एक और करीबी पार्टनर है। इन रिश्तों को शायद ही कभी डेमोक्रेसी के लिए समस्या के तौर पर देखा जाता है। इसके बजाय, उन्हें ‘स्टेबिलिटी’, ‘सिक्योरिटी,’ और ‘रीजनल बैलेंस’ के तौर पर देखा जाता है।

जब ये सरकारें विरोध को दबाती हैं या विरोधियों को जेल में डालती हैं, तब भी अमेरिका चुप रहता है।

अमेरिका का दोगलापन

वेनेजुएला, अफगानिस्तान, इराक, बांग्लादेश के साथ और तानाशाही सरकारों के साथ अमेरिका के रिश्ते, उसके दोहरे चरित्र को उजागर करते हैं। डेमोक्रेसी का इस्तेमाल चुनिंदा तरीके से किया जाता है, दुश्मनों के खिलाफ हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है और दोस्तों के साथ डील करते समय नजरअंदाज कर दिया जाता है।

जो सरकारें US के असर का विरोध करती हैं, उन्हें क्रिमिनल, गैर-कानूनी या खतरनाक करार दिया जाता है। जो लोग बात मानते हैं, भले ही वे बिना चुनाव के राज करें या तानाशाही रवैया अपनाएँ, उन्हें ‘इनाम’ दिया जाता है।

इस पैटर्न को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है। सरकार बदलना डेमोक्रेसी के बारे में नहीं है, यह कंट्रोल के बारे में है। यह तेल, मिलिट्री बेस, शिपिंग रूट और जियोपॉलिटिकल फायदे के बारे में है। लैटिन अमेरिका से लेकर साउथ एशिया तक, यूनाइटेड स्टेट्स ने बार-बार दिखाया है कि उसका कमिटमेंट डेमोक्रेटिक वैल्यूज़ के लिए नहीं, बल्कि स्ट्रेटेजिक फायदे के लिए है।

(मूलरूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों का साजिशकर्ता अब्बा के लिए ‘इंटरनेशनल हीरो’, मजहबी ‘पत्रकार’ के लिए भगत सिंह: प्रोपेगेंडा फैलाते-फैलाते आरफा खानम के रोंगटे हुए खड़े

“जब इस दौर का इतिहास लिखा जाएगा, नाइंसाफी की दास्तान लिखी जाएगी तो उमर खालिद का नाम सबसे ऊपर होगा। क्योंकि वे पिछले 10 से 15 साल में मोदी सरकार की भगवा राजनीति का शिकार हुए हैं।”

तो कुछ इस तरीके से आरफा खानुम शेरवानी अपने नए यूट्यूब वीडियो में दिल्ली दंगा 2020 के साजिशकर्ता उमर खालिद का परिचय देती हैं। नए वीडियो में आरफा ने प्रतिबंधित संगठन SIMI से जुड़े उमर खालिद के अब्बा एस कासिल रसूल इलियास का साक्षात्कार लिया है। खालिद के अब्बा से बातचीत में आरफा ने अपने ‘प्रिय’ जोहरान को भी याद किया, और उमर खालिद की तुलना स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह से भी की। यह साक्षात्कार कुछ और नहीं, बल्कि उमर खालिद को ‘स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ने वाले क्रांतिकारी का तबका’ देने का पूरा प्रयास है, जिससे एक और भारत-विरोधी उमर खालिद का जन्म हो।

पूरे इंटरव्यू में काफी अटपटी बातें कही गई हैं। जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उमर खालिद के नाम को बढ़ावा मिलने पर खुशी जताई गई है, तो वहीं बाहरी देशों में पीएम मोदी की छवि को बेकार बताया गया है। न्यूयॉर्क के नवनिर्वाचित मेयर जोहरान ममदानी की उमर खालिद को लिखी उस चिट्ठी की बारे में भी बात की गई। उमर खालिद को लेकर भारत की मोदी सरकार और न्यायपालिका को भी घेरे में रखा गया। कुल मिलाकर आरफा और उमर खालिद के अब्बा के बीच उस राजनीति और विजन की बात हुई, जिसे जेल में बैठे उमर खालिद ने साल 2020 में सुलगाने की कोशिश की थी।

जोहरान ममदानी से मुलाकात की बात छिपाई

हाल ही में उमर खालिद के अब्बा इलियास ने खुलासा किया था कि उन्होंने न्यूयॉर्क में नवनिर्वाचित मेयर जोहरान ममदानी से दिसंबर 2025 में मुलाकात की थी। आरफा के साथ इंटरव्यू में भी उन्होंने यह बात दोहराई और जोहरान की उमर खालिद के नाम चिट्ठी पर भी बात की।

इलियास कहते हैं कि उन्होंने जोहरान ममदानी से मुलाकात की बात को छिपाकर रखा, क्योंकि वह ‘मुनासिब’ समझते थे कि जोहरान के शपथ लेते ही इस बात को दुनिया के सामने लाया जाए। यहाँ अब्बा ने पूरी रणनीति के साथ जोहरान की उमर खालिद के नाम चिट्ठी को दुनिया के सामने पेश किया है।

वह जानते थे कि यह बात जोहरान के चुनाव जीतने के बाद सामने आनी ही बेहतर है, क्योंकि तब वह ‘रौला’ दिखा सकते थे कि विदेश तक से उमर खालिद को समर्थन मिल रहा है। वह भी उस व्यक्ति से जो भारत के इस्लामी कट्टरपंथी और लेफ्ट-लिबरल के बीच खूब चर्चित है। इसीलिए पूरी बातचीत में बार-बार जोर देकर कह रहे हैं कि देखो उमर खालिद को जोहरान जैसे ‘महान व्यक्ति’ का समर्थन मिल रहा है, और वह ऐसे व्यक्ति से भारतीय राजनेताओं को सबक लेने की सीख भी देते हैं।

आरफा खानुम और जोहरान ममदानी की जबरदस्ती वाली दोस्ती

यहाँ जोहरान के ‘अनपेड कैंपियन’ का हिस्सा आरफा खानुम भी हमेशा की तरह जोहरान का राग अलापते हुए कहती हैं कि उमर खालिद को जोहरान ममदानी ने खत इसीलिए लिखा, क्योंकि वे दुनियाभर में नाइंसाफी की परवाह करते हैं।

आरफा यहाँ बिल्कुल सही है। दुनियाभर की परवाह तो करते हैं जोहरान ममदानी। बिल्कुल उसी तरह जिस तरह आरफा करती हैं। मुस्लिमों की हिंसा पर चुप्पी और हिंदुओं से जुड़े मामूली सी बात पर खूब बवाल। इसीलिए तो आरफा की तरह ही जोहरान को एक भारत-विरोधी और मोदी-विरोधी उमर खालिद की परवाह हैं, लेकिन बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार पर बोलना वह मुनासिब नहीं समझते।

असल में जोहरान और आरफा दुनिया के सामने एक मनगढ़ंत कहानी पेश करते हुए जबरदस्ती दोस्त बने बैठे हैं। क्योंकि एक ने मोदी-विरोधी छवि बनाकर न्यूयॉर्क में इस्लामी कट्टरपंथियों के वोट हासिल किए और दूसरी यहाँ भारत में बैठकर इस्लामी कट्टरपंथियों और आतंकवादियों की छवि सुधारती है। बदले में जोहरान मेयर तो बना, लेकिन आरफा तो अब भी आए दिन न्यूयॉर्क में तस्वीरें खिंचवाती है और वहाँ की नागरिकता मिलने का इंतजार करती है।

पीएम मोदी की छवि खराब, बेटा उमर विदेशों में ‘हीरो’

इंटरव्यू के दौरान आरफा खानुम सवाल करती हैं कि यह जानने के बाद भी कि जोहरान ‘एंटी-मोदी’ हैं और वे पीएम मोदी को ‘वॉर क्रिमिनल’ तक कह चुके हैं। तो ऐसे व्यक्ति से मिलने का क्या कारण था? तो खालिद के अब्बा का जवाब आता है, “मोदी को प्रधानमंत्री बनने से पहले अमेरिका का वीजा तक नहीं मिला था, बाहर के देशों में मोदी के बारे में अच्छी राय तो पाई नहीं जाती है।”

उधर, अपने बेटे को अंतरराष्ट्रीय स्तर का ‘हीरो’ बताने में अब्बा ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। उनके लिए देश का प्रधानमंत्री, जिसकी अमेरिका और रूस जैसे ताकतवर देशों से दोस्ती है वह मायने नहीं रखता। लेकिन एक भारत-विरोधी होने के नाते बेटे को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलना उनके लिए उपलब्धि हो जाती है। वह ऐसे कुछ किस्से भी सुनाते हैं, जिससे दर्शक उमर खालिद को अंतरराष्ट्रीय ‘हीरो’ मानने लगें।

एक किस्सा सुनाते हुए इलियास कहते हैं कि एक बार उनकी बीवी इंग्लैंड गई थी, उस दौरान बीवी ने जब टैक्सी ड्राइवर को बताया कि वह उमर खालिद की ‘मदर’ हैं, तो वह टैक्सी ड्राइवर तुरंत उमर को पहचान गया और कहने लगा- वही JNU वाला लड़का। लेकिन इलियास के इन किस्सों में एक बात अधूरी है कि उमर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोग पहचानते किस भाव से हैं? जिस छात्र पर देश-विरोधी धाराएँ लगी हो, उसे लोग अच्छी छवि के कारण तो पहचानते नहीं होंगे। ऐसे तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विजय मालया को भी लोग जानते हैं, लेकिन है तो वह ‘भगौड़ा’ ही न।

तो गुजारिश यह है कि उमर खालिद के अब्बा लोगो को न समझाए कि पीएम मोदी की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कैसी छवि है, क्योंकि यह पूरी दुनिया जानती है कि वह विश्व के ताकतवर नेताओं में गिने जाते हैं। यहाँ आपको स्पष्ट करने की जरूरत है कि उमर खालिद को किस छवि से विदेशों में जाना जाता है, बेशक है तो वह भारत-विरोधी तत्व ही।

आरफा के खुशी के आँसू और उमर के अब्बा की फेंकू बातें

पूरे इंटरव्यू में उमर खालिद के अब्बा इलियास लंबी-लंबी फेंकू बातें करते हैं। और उधर आरफा इन बातों को सुनकर खुशी के आँसू टपकाने ही वाली होती हैं। दोनों ने उमर को क्रांतिकारी साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। आरफा खानुम को उमर खालिद की आजादी वाली स्पीच को एक स्वतंत्रता आंदोलनकारी के नजरिए से देखती हैं। उधर, अब्बा कहते हैं कि कभी बेटे को रोकने की कोशिश नहीं की।

यहाँ तक कि आरफा खानुम ने उमर की तुलना स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह से तक कर दी। उमर खालिद को वे युवाओं का प्रेरणास्रोत बताते हैं। अगर उमर खालिद जैसा प्रेरणास्रोत युवाओं को मिल गया, तो शायद हर कॉलेज और यूनिवर्सिटी में टुकड़े-टुकड़े गैंग बन जाएगा। जैसे JNU में आए दिन जान से मारने की धमकी वाले सरकार-विरोधी नारे लगते हैं, ऐसा ही पूरे देश में दहशत फैलेगी। तब भी ये लोग सारा इल्जाम सरकार पर ही लगाएँगे कि सरकार ने समय पर युवाओं को क्यों नहीं रोका?

तिहाड़ जेल में बैठकर VIP ट्रीटमेंट ले रहे उमर खालिद के संघर्ष की गाथा तो उनके अब्बा इलियास ने आरफा खानुम के साथ इंटरव्यू में सुना दी। लेकिन कितने लोग इस पर यकीन करेंगे, यह एक बड़ा सवाल है। भारत-विरोधी नारे लगाने वाला उमर खालिद जब क्रांतिकारी और आजादी के लिए लड़ने वाला युवा बनकर पेश किया जाता है, तो कितने लोग चाहेंगे कि वह एक जेल में बैठे युवा से प्रेरणा लें। तो Gen Z को भी समझने की जरूरत है कि उमर खालिद को क्रांतिकारी दर्शाने वाला यह इंटरव्यू मात्र एक प्रोपेगेंडा है। वह चाहते हैं कि एक और उमर खालिद पैदा हो, जो भारत कि खिलाफ आवाज बने लेकिन यह नहीं बताते कि उस आवाज में सुर भारत-विरोधी नहीं, बल्कि भगत सिंह की तरह राष्ट्रहित में होने चाहिए।

तो आरफा खानुम को यह जानने की जरूरत है कि इस दौर का इतिहास जब लिखा जाएगा तो उमर खालिद का नाम नाइंसाफी की दास्तान में नहीं, बल्कि भारत-विरोधी तत्वों में सबसे ऊपर होगा। ये लोग देश का खाते हैं और उसी से छल करते हैं। उमर खालिद इसी तरह के तत्व हैं और पत्रकारिता का चोला पहनकर ऐसे लोगों का महिमामंडन करने वाली आरफा खानम भी इनसे कम नहीं हैं।

असम के पुराने स्कूलों में डिजिटल क्रांति, PM-DevINE से बच्चों को शहर जैसी शिक्षा की गारंटी: जानें- सड़क से क्लासरूम और एयरपोर्ट्स तक कैसे यह योजना बदल रही राज्य की तस्वीर

प्रधानमंत्री पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास पहल जिसे ‘पीएम-डिवाइन’ (PM-DevINE) कहा जाता है, असम और पूरे पूर्वोत्तर भारत के लिए एक गेम-चेंजर साबित हो रही है। यह केंद्र सरकार की 100% फंडिंग वाली योजना है, जिसे अक्टूबर 2022 में शुरू किया गया था ताकि पूर्वोत्तर के राज्यों में विकास की उन कमियों को दूर किया जा सके जिन्हें दशकों से नजरअंदाज किया गया था।

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के मुताबिक, इस योजना ने राज्य की शिक्षा व्यवस्था का चेहरा बदल दिया है। पुराने और जर्जर सरकारी स्कूलों को अब आधुनिक स्मार्ट क्लासरूम और बेहतरीन सुविधाओं में बदला जा रहा है, जिससे गरीब बच्चों को भी निजी स्कूलों जैसी शिक्षा अपने घर के पास ही मिल रही है।

PM-DevINE योजना क्या है और क्यों लाई गई

पीएम-डिवाइन (PM-DevINE) को आप केंद्र सरकार की एक ऐसी खास योजना समझ सकते हैं, जिसका पूरा खर्चा यानी 100% पैसा केंद्र सरकार खुद उठाती है। इसे साल 2022-23 के बजट में खास तौर पर भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों (जैसे असम, मेघालय, मणिपुर आदि) की जरूरतों को ध्यान में रखकर शुरू किया गया था। अक्सर देखा गया है कि देश के अन्य हिस्सों के मुकाबले इन राज्यों में कुछ बुनियादी सुविधाओं की कमी रह गई थी।

इसी ‘डेवलपमेंट गैप’ यानी विकास की खाई को पाटने के लिए सरकार ने यह कदम उठाया है। इस योजना की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सड़क बनाने से लेकर, बच्चों की पढ़ाई (शिक्षा), लोगों के इलाज (स्वास्थ्य), नए कारखाने लगाने (उद्योग) और महिलाओं व युवाओं को रोजगार देने (आजीविका) तक के हर जरूरी प्रोजेक्ट के लिए पैसा मुहैया कराती है।

सरकार ने इस योजना को चलाने के लिए एक लंबा रोडमैप तैयार किया है। साल 2022-23 से शुरू होकर 2025-26 तक के चार सालों के लिए सरकार ने कुल 6,600 करोड़ रुपए का एक बड़ा फंड सुरक्षित कर दिया है। योजना की शुरुआत को मजबूती देने के लिए पहले ही साल में 1,500 करोड़ रुपए जारी कर दिए गए थे। इस पूरे काम की देखरेख की जिम्मेदारी ‘उत्तर-पूर्वी क्षेत्र विकास मंत्रालय’ (DoNER) को सौंपी गई है।

यह मंत्रालय यह सुनिश्चित करता है कि पैसा सीधे उन कामों में लगे जिनसे वहाँ के लोगों का जीवन आसान हो सके, जैसे कि सरकारी स्कूलों को स्मार्ट बनाना या दूर-दराज के गाँवों तक पक्की सड़कें पहुँचाना। यह योजना किसी पुरानी स्कीम की जगह नहीं लेती, बल्कि उन कमियों को पूरा करती है जो बाकी योजनाओं से छूट गई थीं।

PM-DevINE कैसे काम करती है?

पीएम-डिवाइन योजना के तहत काम करने का तरीका बहुत ही व्यवस्थित और पारदर्शी रखा गया है ताकि सरकारी पैसे का एक-एक रुपया सही जगह इस्तेमाल हो सके। इस योजना की सबसे खास बात यह है कि इसके तहत छोटे-मोटे नहीं, बल्कि 20 करोड़ रुपए से लेकर 500 करोड़ रुपए तक के बड़े और असरदार प्रोजेक्ट्स ही हाथ में लिए जाते हैं।

यह योजना किसी दूसरी चल रही सरकारी स्कीम को बंद नहीं करती या उसकी जगह नहीं लेती, बल्कि इसका असली काम उन जरूरी सुविधाओं को पूरा करना है जो किसी कारणवश दूसरी योजनाओं से छूट गई थीं। नियमों के मुताबिक, इस पैसे का इस्तेमाल जमीन खरीदने, दफ्तर के स्टाफ की सैलरी देने या किसी खास व्यक्ति को निजी फायदा पहुँचाने के लिए नहीं किया जा सकता, बल्कि यह सिर्फ समाज के सामूहिक विकास के लिए है।

किसी भी प्रोजेक्ट को मंजूरी देने से पहले उसकी बारीकी से जाँच की जाती है और बड़े संस्थानों से तकनीकी टेस्ट करवाया जाता है। साथ ही, काम को एक तय समय सीमा के भीतर पूरा करने की सख्त शर्त होती है, ताकि जनता को मिलने वाली सुविधाओं में देरी न हो और हर प्रोजेक्ट का पूरा फायदा स्थानीय लोगों को समय पर मिल सके।

असम में स्कूल शिक्षा में कैसे आया बड़ा बदलाव

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का कहना है कि PM-DevINE योजना का सबसे शानदार और सीधा फायदा राज्य के उन बच्चों को मिल रहा है जो सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं। पहले जहाँ सरकारी स्कूलों का नाम आते ही टूटी दीवारें या पुराने कमरों की तस्वीर सामने आती थी, अब वह पूरी तरह बदल रही है। इस योजना की मदद से स्कूलों का कायाकल्प किया जा रहा है।

अब वहाँ सिर्फ बोर्ड और चौक वाली पुरानी पढ़ाई नहीं होती, बल्कि स्कूलों में ‘स्मार्ट क्लासरूम’ बनाए गए हैं। इसका मतलब है कि अब बच्चे कंप्यूटर और बड़े डिजिटल पर्दों की मदद से पढ़ रहे हैं। इसके साथ ही स्कूलों की इमारतों को नया रूप दिया गया है और वहाँ साफ पानी, शौचालय जैसी जरूरी सुविधाएँ भी बेहतर की गई हैं।

यह सब इसलिए किया जा रहा है ताकि गाँव और कस्बों में रहने वाले बच्चों को भी वही आधुनिक सुविधाएँ मिलें जो बड़े शहरों के महँगे प्राइवेट स्कूलों में मिलती हैं। इस बदलाव को समझने के लिए मुख्यमंत्री ने पलाशबाड़ी में स्थित एक बहुत पुराने सरकारी स्कूल का उदाहरण दिया। यह स्कूल आजादी के कुछ साल बाद, यानी 1953 में बना था।

दशकों पुराना होने की वजह से इसकी हालत वैसी नहीं थी जैसी आज के दौर में होनी चाहिए, लेकिन पीएम-डिवाइन योजना ने इस स्कूल की पूरी शक्ल ही बदल दी है। अब वहाँ का माहौल इतना आधुनिक हो गया है कि देखकर लगता ही नहीं कि यह वही पुराना स्कूल है। मुख्यमंत्री का मानना है कि जब स्कूल की इमारत और वहाँ मिलने वाली सुविधाएँ अच्छी होती हैं, तो बच्चों का मन भी पढ़ाई में ज्यादा लगता है।

उनका कहना है कि यह सिर्फ दीवारों की मरम्मत या नई पेंटिंग का काम नहीं है, बल्कि यह बच्चों की सोच को बड़ा बनाने की कोशिश है। जब बच्चे एक आधुनिक माहौल में पढ़ेंगे, तो उनमें आत्मविश्वास जागेगा और वे देश की तरक्की में अपना बड़ा योगदान दे पाएँगे।

गाँव के बच्चों के लिए शहर जैसी सुविधा अब घर के पास

सरकारी अधिकारियों का कहना है कि PM-DevINE योजना का सबसे बड़ा फायदा असम के उन इलाकों को हुआ है जो शहरों से दूर हैं। पहले गाँव और छोटे कस्बों (अर्ध-शहरी इलाकों) में रहने वाले बच्चों के पास पढ़ाई के अच्छे साधन नहीं होते थे। अगर किसी बच्चे को अच्छी और आधुनिक शिक्षा चाहिए होती थी, तो उसे मजबूरी में अपना घर छोड़कर बड़े शहरों का रुख करना पड़ता था। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है।

इस योजना के तहत सरकार ने शहर की भीड़-भाड़ के बजाय सीधे गाँव के स्कूलों को ‘अपग्रेड’ करना शुरू कर दिया है। इसका मतलब है कि अब गाँव का बच्चा भी अपने घर के पास ही उन्हीं सुविधाओं के साथ पढ़ रहा है जो पहले सिर्फ बड़े शहरों के बड़े स्कूलों में मिलती थीं। अब माता-पिता को भी इस बात की चिंता नहीं रहती कि अच्छी पढ़ाई के लिए उनके बच्चों को दूर जाना पड़ेगा।

स्कूलों में जो डिजिटल टूल्स और स्मार्ट क्लासरूम लगाए गए हैं, उन्होंने पढ़ाई के तरीके को बहुत मजेदार बना दिया है। पहले बच्चे सिर्फ किताबों को रटते थे, लेकिन अब स्मार्ट बोर्ड और वीडियो की मदद से वे मुश्किल से मुश्किल पाठ को देख और समझ सकते हैं। इससे पढ़ाई अब उबाऊ नहीं लगती, बल्कि बच्चों के लिए एक रोचक अनुभव बन गई है।

जब स्कूल में कंप्यूटर, इंटरनेट और अच्छी लैब जैसी सुविधाएँ मिलने लगती हैं, तो बच्चों में स्कूल जाने का उत्साह बढ़ जाता है। अधिकारियों का मानना है कि जब पढ़ाई आसान और खेल-खेल में होने लगती है, तो बच्चे बेहतर तरीके से सीखते हैं। कुल मिलाकर, पीएम-डिवाइन योजना ने शिक्षा को केवल किताबों तक सीमित नहीं रखा है, बल्कि इसे आधुनिक और हर बच्चे की पहुँच में ला खड़ा किया है।

शिक्षा सुधार के साथ नए स्कूलों की तैयारी

मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में PM-DevINE योजना असम सरकार के उन बड़े लक्ष्यों को पूरा करने में मददगार साबित हो रही है, जिससे राज्य की पूरी शिक्षा व्यवस्था को जड़ से सुधारा जा सके। मुख्यमंत्री ने साझा किया कि राज्य कैबिनेट ने असम भर में 100 नए सरकारी स्कूल खोलने का एक बड़ा फैसला लिया है, ताकि शिक्षा का नेटवर्क हर कोने तक फैल सके।

इस पूरी मुहिम का सबसे बड़ा मकसद यह है कि चाहे बच्चा अमीर हो या गरीब, उसे पढ़ाई के एक जैसे और बेहतरीन मौके मिलें। सरकार चाहती है कि आज के इन बच्चों को इतना काबिल बनाया जाए कि वे भविष्य में राज्य और देश की तरक्की के लिए एक मजबूत ‘मानव संसाधन’ बन सकें।

शिक्षा के जानकारों का भी यही कहना है कि जब केंद्र सरकार की पीएम-डिवाइन जैसी बड़ी योजनाएँ और राज्य सरकार की नीतियाँ एक साथ मिलकर काम करती हैं, तो जमीन पर इसके नतीजे बहुत शानदार निकलते हैं। जब अच्छे टीचरों के साथ-साथ स्कूलों में स्मार्ट क्लास और बढ़िया इमारत जैसी सुविधाएँ जुड़ जाती हैं, तो बच्चों के सीखने का स्तर अपने आप ऊपर चला जाता है।

सिर्फ स्कूल नहीं, हर क्षेत्र में विकास

पीएम-डिवाइन योजना का दायरा सिर्फ स्कूल और पढ़ाई-लिखाई तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे असम और उत्तर-पूर्व की तस्वीर बदलने वाला एक बड़ा अभियान है। आँकड़ों की बात करें तो अक्टूबर 2022 से लेकर 30 नवंबर 2025 तक इस योजना के तहत कुल 44 बड़े प्रोजेक्ट्स को हरी झंडी दी जा चुकी है, जिन पर सरकार लगभग 5,728.79 करोड़ रुपए खर्च कर रही है।

इन पैसों से न केवल सड़कें और अस्पताल बन रहे हैं, बल्कि नए बिजनेस शुरू करने के लिए ‘स्टार्टअप इकोसिस्टम’ को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। इन सब कामों का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ है कि इलाके के युवाओं और महिलाओं के लिए रोजगार के नए रास्ते खुल गए हैं, जिससे लोगों की कमाई बढ़ी है और स्थानीय बाजार मजबूत हुए हैं।

इतना ही नहीं, इलाके में बाहरी निवेश लाने के लिए ‘राइजिंग नॉर्थईस्ट इन्वेस्टर्स समिट 2025’ जैसा बड़ा आयोजन भी किया गया, जिसमें खेती, पर्यटन, IT, खेल और बिजली जैसे कई क्षेत्रों पर खास जोर दिया गया। साथ ही, कनेक्टिविटी को आसान बनाने के लिए ‘उड़ान’ योजना के तहत 90 हवाई रास्ते शुरू किए गए हैं, जिनसे अब 12 एयरपोर्ट और हेलीकॉप्टर स्टेशन (हेलीपोर्ट) आपस में जुड़ गए हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि अब असम और उसके पड़ोसी राज्यों में आना-जाना और व्यापार करना पहले से कहीं ज्यादा आसान और तेज हो गया है।

दो से निकाह, तीसरी को झाँसा देकर 16 साल तक किया उत्पीड़न: बोलता हिंदुस्तान के ‘पत्रकार’ हसीन रहमानी ने ब्लैकमेल कर किया रेप, पीड़िता बोली- आपबीती सुन रूह काँप जाएगी; जानें- FIR में क्या-क्या आरोप

बोलता हिंदुस्तान’ के पत्रकार मोहम्मद हसीन रहमानी पर रेप, छेड़खानी, ब्लैकमेल, दो लड़कियों से एक ही वक्त में निकाह करने और कई लड़कियों को धोखा देने जैसे कई संगीन आरोप लगे हैं। पीड़िता ने दिल्ली के जाकिर नगर थाने में एफआईआर दर्ज करवाई है। एफआईआर में 29 जनवरी 2010 से 3 जनवरी 2026 यानी 16 साल तक उत्पीड़न का आरोप है।

सोशल मीडिया पर पीड़िता ने अपनी लड़ाई की जानकारी दी है और कहा है कि अगर हसीन रहमानी को जमानत मिल जाती है तो उसकी जान को खतरा है, क्योंकि उसने पहले ही पीड़िता को धमकी दे चुका है।

पीड़िता का शिकायत पत्र

पीड़िता ने आरोप लगाया है कि कई लड़कियों को ट्रैप कर हसीन रहमानी अपने मनमाने काम करवाता था और उसे नेताओं और करीबियों को ‘खुश’ करने के लिए कहता था। जब तक लड़कियाँ उसकी बात मानती थी, तब तक वह प्रेमिका बनाकर साथ रखता था।

पीड़िता को जान का खतरा, माँगी सुरक्षा

पीड़िता ने हसीन रहमानी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई है, जिसके आधार पर उसे दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया। उसने दिल्ली पुलिस से अपनी सुरक्षा की गुहार भी लगा रही है। पीड़िता ने अपनी शिकायत में कहा है कि उसके साथ रेप किया गया। मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। धोखाधड़ी और ठगी की गई। निकाह का झूठा वादा कर शारीरिक शोषण किया गया।

(सोशल मीडिया पर पीड़िता का बयान)

शिकायत के मुताबिक, पीड़िता 2010 में जामिया मिलिया इस्लामिया में पढ़ाई कर रही थी। उसी वक्त उसकी दोस्ती हसीन रहमानी से हुई। धीरे धीरे दोस्ती गहरी हो गई। इस दौरान एक दिन रहमानी ने पीड़िता को अपने जाकिर नगर स्थित फ्लैट पर बुलाया। पीड़िता के जाने पर उसे बेडरूम में ले गया और निकाह का वादा कर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। पीड़िता को अच्छा नहीं लगा और वह उससे कटी-कटी रहने लगी।

इस पर रहमानी ने आपत्तिजनक तस्वीरों और वीडियो का हवाला देकर ब्लैकमेल करने लगा। उसने अपने भाई मुस्तफा रहमानी के जरिए कहा कि वह पीड़िता से निकाह करेगा। इसके बाद दोनों में मिलने लगे। 2014 तक इसी तरह चलता रहा।

निकाह का भरोसा देकर घरवालों से मिलवाया

2014 में तस्वीर वाली बात पूछने और दूसरे रिश्ते का शक होने पर रहमानी ने उसे पीटा और कमरे में बंद कर जबरदस्ती की। तस्वीरों का सच पता नहीं चला, इसलिए वह ब्लैकमेल होती रही। 25 जुलाई 2025 को रहमान ने पीड़िता से अपनी बहन रेशमा और बहनोई सरवर हुसैन से लाजपतगनर के मजार कैफे में मिलवाया।

पीड़िता के मुताबिक, इस दौरान रहमानी ने कहा कि वह उसके साथ निकाह करेगा। यहाँ तक कि भाई मुस्तफा रहमानी ने कई बार यकीन दिलाने की कोशिश की कि पीड़िता के साथ ही निकाह होगी। हालाँकि पीड़िता को पता चल चुका था कि हसीन रहमानी के कई लड़कियों के साथ रिश्ते हैं। उसने एक शिफा उर्फ शालू नाम की लड़की के साथ निकाहनामा बनवाया था। रूबा नाम की लड़की के साथ ही निकाह कर चुका था।

पीड़िता के मुताबिक, उसे अंधेरे में रख कर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए गए। 27 अप्रैल 2025 को रहमानी अपने दोस्त आमिर के साथ पीड़िता के घर पहुँचा और उससे सगाई की। इन सालों में वह पैसे भी माँगता रहा।

रहमानी की साजिश में उसके घरवाले भी शामिल

पीड़िता के मुताबिक रहमानी के घरवालों को सबकुछ पता था। उनलोगों ने दहेज में कार की डिमांड की। जब पीड़िता ने इनकार किया तो वे लोग संपर्क तोड़ने लगे। यहाँ तक कि रहमानी के दूसरे रिश्तों की जानकारी भी उसे पता चलने लगे। हो सकता है कि साजिश के तहत इनलोगों ने जानकारी पीड़िता तक पहुँचाई हो। 6 दिसंबर 2025 को पीड़िता के भाई के मोबाइल पर एक निकाहनामा आया, जो हसीन रहमानी और शालू सिद्दीकी का था। यूपी की रहने वाली शालू सिद्दीकी पिछले 5-6 साल से उसके साथ रिलेशनशिप में है।

वहीं पीड़िता को एक और निकाहनामा रूबा सिद्दीकी का भी मिला। रूबा ने उससे कहा कि हसीन रहमानी उसके साथ रहता है। एक बच्चा रहमानी के फोटो को देखकर अब्बू कह रहा था।

पीड़िता का कहना है कि न सिर्फ हसीन रहमानी बल्कि उसका पूरा परिवार साजिश में शामिल है। दो-दो निकाह होने की बात उससे छिपाई गई। दहेज माँगे और धोखाधड़ी की। उसके करतूतों का सारा सच उसके भाई मुस्तफा रहमानी, बहन रेशमा और उसका शौहर समेत सभी को पता है। इसलिए इनलोगों को भी हवालात भेजा जाए। पीड़िता का कहना है कि उसके साथ न सिर्फ धोखा हुआ है बल्कि ब्लैकमेल कर रेप किया गया, आर्थिक धोखाधड़ी की गई और दहेज माँगे गए।

जिसके पास परमाणु बम, वो देश सुरक्षित?: जानें- बेडरूम से घुसकर मादुरो को पकड़ने वाला अमेरिका, किम जोंग उन से क्यों नहीं टकराता

दुनिया ने हमेशा ताकत को सलाम किया है, लेकिन आज की दुनिया में कमजोरों को सजा भी दी जाती है। ऐसे समय में जब संसाधनों को हड़पने की होड़ और बड़ी ताकतों के बीच दुश्मनी जगजाहिर है, यूएन चार्टर और नैतिकता की बात करना बेमानी है।

जो बचा है वह एक लेन-देन वाली सच्चाई है। ताकतवर देश, छोटे देशों को बर्बाद कर सकते हैं। लेकिन जो मजबूत देश हैं, उनका कुछ खास नहीं बिगाड़ सकते। उन पर हमला नहीं कर सकते। उन्हें झुकने के लिए मजबूर भी नहीं किया जा सकता। यहाँ तक कि यूएन भी कुछ नहीं बिगाड़ पाता। इस क्रम में सबसे ऊपर न्यूक्लियर पावर वाले देश हैं।

वेनेजुएला में US मिलिट्री एक्शन

वेनेजुएला में US का ऑपरेशन, जिसका परिणाम प्रेसिडेंट निकोलस मादुरो की किडनैपिंग के रूप में सामने आया, लैटिन अमेरिकन जियोपॉलिटिक्स में सिर्फ़ एक घटना नहीं है। यह एक केस स्टडी है कि आज की दुनिया में ताकत का इस्तेमाल कैसे किया जाता है? कैसे न्यूक्लियर पावर नहीं होना देश की संप्रभुता के लिए नुकसानदायक है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 3 जनवरी को ऐलान किया कि यूनाइटेड स्टेट्स की सेना ने मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को पकड़ लिया है और उन्हें देश से बाहर ले जाया गया है। यह ऑपरेशन बिना किसी शर्मिंदगी के एकतरफ़ा किया गया।

लोकल टाइम के हिसाब से सुबह करीब 2 बजे काराकास जोरदार धमाकों से दहल उठा। आसमान में काफी नीचे उड़ रहे फाइटर प्लेन की आवाज से लोग दहशत में थे। बिजली चली गई थी। चारों तरफ मची अफरा-तफरी के बीच नेशनल इमरजेंसी घोषित कर दिया गया, लेकिन इतनी देर में ही आजाद देश वेनेजुएला पर अमेरिकी प्रभुत्व स्थापित हो चुका था।

वॉशिंगटन ने इस कार्रवाई को कैरिबियन और पूर्वी प्रशांत महासागर के रास्ते कथित तौर पर नशीली दवाओं की तस्करी का हवाला देते हुए, एक बड़े ‘ड्रग्स के खिलाफ युद्ध’ का हिस्सा बताया। न तो अमेरिकी कॉन्ग्रेस से सलाह ली गई और न ही यूनाइटेड नेशंस से पूछा गया। लॉजिक आसान था- यूनाइटेड स्टेट्स मादुरो को सजा देना चाहता था, उसने ऐसा किया भी। नशीली दवाएँ और ड्रग्स शायद राष्ट्रपति मादुरो और वेनेजुएला के खिलाफ गैर-कानूनी सैन्य कार्रवाई को सही ठहराने के सिर्फ बहाने हैं।

वेनेज़ुएला को जिस चीज ने खास तौर पर कमजोर बनाया, वह सिर्फ आर्थिक, अंदरूनी नाराज़गी या डिप्लोमैटिक अकेलापन नहीं था। वह था न्यूक्लियर छतरी का न होना। अगर वेनेजुएला के पास न्यूक्लियर छतरी होती, तो अमेरिका किसी भी हाल में अपने पड़ोसी देश के साथ ऐसा व्यवहार नहीं करता।

वेनेज़ुएला की तुलना नॉर्थ कोरिया से करें तो ये और भी साफ हो जाता है। सालों से नॉर्थ कोरिया को एक ऐसा दुष्ट देश कहा जाता रहा है जिसे सुधारा नहीं जा सकता। इसके नेता किम जोंग पर कई आरोप हैं। बिना किसी कानूनी कार्रवाई के हत्याएँ करने, टॉर्चर करने और दमनकारी नीति अपनाने के आरोप हैं।

न्यूक्लियर पॉवर होना शांति लाता है या तबाही

नॉर्थ कोरिया ने बार-बार अमेरिका और उसके साथी देशों, मसलन साउथ कोरिया और जापान को धमकी दी है। इनदोनों ही देशों में अमेरिका के बड़े मिलिट्री बेस हैं। इसके जवाब में नॉर्थ कोरिया ने जापानी इलाके के ऊपर मिसाइलों का टेस्ट किया है और दावा किया है कि उसके पास अमेरिका के वेस्ट कोस्ट पर हमला करने की काबिलियत है। नॉर्थ कोरिया ने रेगुलर ICBM का टेस्ट किया है। इस दौरान उसने जापान के ऊपर से ले जाकर प्रशांत महासागर में क्रैश कर दिया। इसके बाद अमेरिका को चुनौती देते हुए कहा कि वह अमेरिका की सिलिकॉन वैली के दिल, सैन फ्रांसिस्को पर हमला करने की क्षमता रखता है।

ट्रंप और अमेरिका लंबे समय से नॉर्थ कोरिया के राष्ट्राध्यक्ष किम जोंग उन को एक क्रूर तानाशाह कहता आ रहा है, जो सिर्फ सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए अपने ही लोगों पर ज़ुल्म करता है।

फिर भी उकसावे के बावजूद, नॉर्थ कोरिया पर अमेरिका ने कोई हमला नहीं किया। प्योंगयांग पर आधी रात को कोई रेड नहीं हुई। किम जोंग उन को पकड़कर किसी इंटरनेशनल ट्रिब्यूनल के सामने पेश करने की कोई कोशिश नहीं हुई। इसका कारण नॉर्थ कोरिया पर अमेरिकी मेहरबानी नहीं है, बल्कि बदले की कार्रवाई का डर है।

वेनेजुएला पर आक्रमण, न्यूक्लियर हथियारों से लैस नॉर्थ कोरिया पर नहीं

नॉर्थ कोरिया के पास न्यूक्लियर हथियार हैं। एक छोटा जवाबी हमला भी सियोल पर हमलों की बौछार कर सकता है, पैसिफिक में US सेना को कमजोर कर सकता है, और किसी के भी कंट्रोल से बाहर तनाव बढ़ा सकता है। यह अकेली बात वाशिंगटन को नॉर्थ कोरिया की सरकार बदलने के सपने छोड़ने के लिए मजबूर करती है। वह सिर्फ पाबंदियाँ ही लगा सकता है।

यही लॉजिक चीन पर भी लागू होता है, जिसके पास दुनिया में न्यूक्लियर हथियारों का तीसरा सबसे बड़ा स्टॉक है। चीन में अक्सर मानवाधिकार का उल्लंघन, मिलिट्री दबाव और आक्रामक विस्तार का रवैया अपनाता रहा है। साउथ चाइना सी में, चीन ने अपने हर पड़ोसी देश के साथ टकराव की स्थिति में है।

उसने आर्टिफिशियल आइलैंड बनाना शुरू कर दिया है, दुनिया के सबसे बिज़ी समुद्री कॉरिडोर में से एक को सैनिक छावनी में तब्दील कर दिया है। इंटरनेशनल पानी में चलने वाले मछली पकड़ने वाले जहाजों को परेशान करता रहा है। ताइवान के साथ उसका हमेशा से झगड़ा रहा है और उसने गलत तरीके से भारतीय इलाकों पर अपना दावा किया है।

ट्रेड वॉर, डिप्लोमैटिक दबाव, ताइवान पर कब्ज़ा करने की धमकियों और नौसेना की खतरनाक चालों के बावजूद, US ने अभी तक सीधी मिलिट्री कार्रवाई नहीं की है। चीन ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हाउस भी है, जो इलेक्ट्रिक गाड़ियाँ बनाने में इस्तेमाल होने वाले रेयर-अर्थ मिनरल से लेकर हाई-एंड इलेक्ट्रॉनिक्स सामान तक, हर प्रोडक्ट के लिए ग्लोबल सप्लाई चेन को लगभग कंट्रोल करता है।

न्यूक्लियर पावर होना देश के लिए जरूरी

जून 2025 में ईरान पर US और इजराइली हमलों को देखें तो अंतर और भी साफ हो जाता है। 21 जून को ट्रंप ने घोषणा की कि यूनाइटेड स्टेट्स ने ईरान की तीन न्यूक्लियर ठिकानों, फोर्डो, नतांज और एस्फाहान पर हमला किया है। इस दौरान पहाड़ों के अंदर बने ठिकानों को निशाना बनाया गया। GBU-57 मैसिव ऑर्डनेंस पेनेट्रेटर्स, 30,000 पाउंड के बंकर-बस्टर बमों से लैस B-2 स्टेल्थ बॉम्बर्स पहाड़ों के नीचे जाकर उन जगहों को नष्ट किया।

ट्रंप का मैसेज साफ था, “दुनिया में कोई दूसरी मिलिट्री नहीं है जो ऐसा कर सकती थी। अब शांति का समय है।” यह डिप्लोमेसी नहीं थी। यह ज़बरदस्ती थी जिसे अमेरिका ने अंजाम दिया। इससे साफ जाहिर होता है कि ताकत, ताकत का सम्मान करती है।

ईरान की फोर्डो संवर्धन सुविधा (Fordo enrichment facility) जमीन के नीचे 80-90 मीटर की गहराई पर स्थित है। तेहरान के दक्षिण में एक पहाड़ी के अंदर स्थित यह ईरान की सबसे सुरक्षित परमाणु ठिकानों में एक है।

ईरान ने लगातार कहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है, जबकि पश्चिमी देशों ने चिंता व्यक्त की है कि इसका उपयोग हथियार विकसित करने के लिए किया जा सकता है। इस आशंका के मद्देजनर यूनाइटेड स्टेट्स ने एयर अटैक किया। यह एक युद्ध जैसा काम था, जिसे पश्चिमी देशों ने सही ठहराया, क्योंकि ईरान वेपन-ग्रेड यूरेनियम के करीब पहुँच रहा था।

न्यूक्लियर युग की यही उलझन है: कब्ज़ा करने से संयम आता है; पीछा करने से मिलिट्री हमले होते हैं।

इज़राइल ने पहले ही ईरान के खिलाफ ‘ऑपरेशन राइजिंग लायन’ शुरू कर दी थी। ईरान ‘ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस 3’ से इसका जवाब दे रहा था। इस दौरान ड्रोन और मिसाइल से इजरायली एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया, लेकिन ईरान के पास मिडिल ईस्ट में US बेस पर हमला करने और होर्मुज स्ट्रेट को बाधित करने की क्षमता नहीं थी, जिससे दुनिया भर की तेल सप्लाई का लगभग 30% गुजरता है।

ऐसे में अमेरिका को बढ़त मिली हुई थी। वॉशिंगटन ने ध्यान से हिसाब लगाया। ईरान के पास अभी न्यूक्लियर हथियार नहीं हैं। इसलिए अमेरिका ने सीधे तौर पर ईरान के ठिकानों को निशाना बनाया।

इसकी तुलना नॉर्थ कोरिया से करें तो साफ होता है कि न्यूक्लियर छतरी जरूरी है, साथ ही अमेरिका को नुकसान पहुँचाने की क्षमता। इकॉनमी टूटी हुई है, डिप्लोमेसी पसंद नहीं है, ये मायने नहीं रखता।

यूनाइटेड नेशंस, जिसपर सभी देशों की रक्षा करने की जिम्मेदारी है, उसके सेक्रेटरी-जनरल एंटोनियो गुटेरेस ने ईरान पर US के हमलों पर ‘गंभीर चिंता’ जताई। खतरनाक नतीजों की चेतावनी दी और डिप्लोमेसी की अपील की। लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा। UN नैतिकता की बात करता है, लेकिन नतीजा ताकत के बल पर मिलती है।

वेनेजुएला के बाद कोलंबिया को ट्रंप की धमकियाँ

वेनेजुएला और मादुरो को जबरन उठा ले जाने के ऑपरेशन के बाद लैटिन अमेरिका अस्थिर हो चुका है। ट्रंप ने खुलेआम अब कोलंबिया को धमकी दी है। उसके प्रेसिडेंट गुस्तावो पेट्रो को ‘सुधरने’ को कहा वरना वेनेजुएला वाला हश्र होने की बात कही। यहाँ एक बार फिर कोलंबिया की संप्रुभता को चुनौती दी गई।

खास बात यह है कि वेनेजुएला पर हुए अमेरिकी हमले की कोलंबिया ने निंदा की और इसे लैटिन अमेरिका की संप्रभुता पर हमला करार दिया। इससे अमेरिका बिदक गया और ट्रंप ने ‘अपने पीछे देखने’ के लिए कहा।

वेनेजुएला और राष्ट्रपति मादुरो के साथ हुए बदसलूकी ने दुनिया को परेशान कर दिया है। न्यूक्लियर हथियार अब सिर्फ़ स्ट्रेटेजिक एसेट नहीं रहे, बल्कि देश की ढाल हैं। ये दुनिया के सबसे ताकतवर देश को भी रुकने, हिसाब लगाने और फिर से सोचने पर मजबूर करते हैं। इसके बिना देश की संप्रभुता की कीमत नहीं रह जाती। ताकतवर देश अपने फायदा-नुकसान के हिसाब से ट्रीट करते हैं।

यह सच्चाई यह भी बताती है कि देशों में न्यूक्लियर पावर बनने का दबाव क्यों बढ़ रहा है, कम क्यों नहीं हो रहा है। दुनिया के छोटे-छोटे देश देख रहे हैं कि लीबिया के साथ क्या हुआ, जब उसने अपना न्यूक्लियर प्रोग्राम छोड़ दिया। वे देखते हैं कि इराक के साथ क्या हुआ, जिसके पास कभी न्यूक्लियर प्रोग्राम नहीं था। वे देखते हैं कि वेनेज़ुएला के साथ क्या हुआ। और वे देखते हैं कि नॉर्थ कोरिया के साथ क्या नहीं हुआ।

नतीजा लॉजिकल होता है, आइडियोलॉजिकल नहीं।

ऐसी दुनिया में जहाँ मानवाधिकार की बात सेलेक्टिव होता है, जहाँ ‘रूल्स-बेस्ड ऑर्डर’ सिर्फ कमजोर लोगों पर लागू होता है और जहाँ अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ मूकदर्शक बन जाती है, उनकी सोच कोई मायने नहीं रखता, वहाँ न्यूक्लियर पॉवर होना संप्रभुता की आखिरी गारंटी बन जाती है।

यह न्यूक्लियर वॉर का सपोर्ट नहीं है। बल्कि शांति और संतुलन के लिए ‘न्यूक्लियर’ का होना जरूरी है। ये तबाही मचा सकता है, लेकिन शांति भी यही लाता है।

अजीब बात है कि आज शांति अच्छी नीयत या ग्लोबल नियमों से नहीं, न्यूक्लियर ताकत की मोहताज बन गई है। क्योंकि बदले की कार्रवाई का डर इतना खतरनाक है कि ताकतवर देश भी खौफ खाते हैं।

उस डर ने नॉर्थ कोरिया को बचाया। इसने चीन को बचाया। इसने अमेरिका को ईरान में ‘हिसाब लगाने’ पर मजबूर किया और इसकी गैरमौजूदगी ने काराकास को बर्बाद कर दिया।

(ये लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

विकास के बाद अब जातिवाद की राजनीति की ओर धकेला जा रहा गुजरात, कौन हर मुद्दे में जबरन जोड़ रहा जाति का गणित

गुजरात के बाहर पत्रकारों और राजनीतिक हस्तियों से बात करते समय एक शिकायत हमेशा सुनने को मिलती है कि गुजरात राजनीतिक रूप से बहुत ‘हैपनिंग’ राज्य नहीं रहा है। यह शिकायत काफी हद तक सही है। हम इन सभी मामलों में मूल रूप से शांतिप्रिय लोग हैं। चुनाव 5 साल में एक बार होते हैं और चुनाव के दौरान ही कुछ हंगामा होता है। एक बार नई सरकार बन जाती है तो हमारा ध्यान काम पर लौट आता है। जब चुनाव 5 साल बाद आते हैं, तो उस पर बात करने का समय होता है। पिछले कुछ वर्षों से ऐसा ही हो रहा था। अब यह ट्रेंड बदल रहा है। हालाँकि, हमाम में सब नंगे हैं लेकिन इस सब में एक बड़ा योगदान विपक्ष और उनके इकोसिस्टम का है। क्योंकि तीन दशकों तक सत्ता से अलग-थलग रहने के बाद शायद उनके लिए सत्ता तक पहुँचने का यही एकमात्र रास्ता है।

कुछ राज्यों में अभी भी जाति की राजनीति हावी है। हालाँकि, वहाँ भी जाति की राजनीति धीरे-धीरे अपना असर खो रही है और दूसरे मुद्दे ज्यादा अहम होते जा रहे हैं। समीकरण धीरे-धीरे बदल रहे हैं। इसके उल्ट गुजरात पिछले कुछ सालों में गलत दिशा में जाने लगा है। बल्कि, चीजों को गलत दिशा में ले जाने के लिए सिस्टमैटिक, प्लान्ड कोशिशें चल रही हैं।

अगर हम इतिहास पढ़ें तो हमें पता चलता है कि गुजरात में एक समय ऐसा रहा था। माधव सिंह की ‘खाम’ थ्योरी बहुत मशहूर है। यह सब 2001 तक चलता रहा लेकिन नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद राजनीति के केंद्र ‘जाति’ धीरे-धीरे हटती गई और विकास, अर्थव्यवस्था आदि केंद्र में आते गए। यही एक वजह है कि मोदी के 13 साल के ऐतिहासिक शासन में गुजरात का कायापलट हो गया। मोदी जानते थे कि नतीजे तभी मिल सकते हैं जब हम इन सभी विषयों से ध्यान हटाकर उन पर ध्यान दें जो करने की जरूरत है। जब सरकार और समाज का ध्यान एक ही मुद्दे पर होता है, तो विपक्ष को न चाहते हुए भी उसी पिच पर खेलते रहना पड़ता है और वह कहीं भी बराबरी नहीं कर पाता।

2014 में मोदी के गुजरात छोड़ने के बाद अलग पिच पर खेलने के मौके तलाशने शुरू हो गए। 2014 के लोकसभा चुनाव के ठीक अगले साल यानी 2015 में गुजरात में आंदोलनों का एक सिलसिला शुरू हुआ जिसके केंद्र में समुदाय और जातियाँ थीं। सामाजिक मुद्दों पर शुरू हुए इन आंदोलनों के बाद कई और आंदोलन हुए और आखिर में वही हुआ जो ऐसे आंदोलनों में होता है: सरकार पर खतरा मंडराने लगा। अंतत: आनंदीबेन पटेल को इस्तीफा देना पड़ा और विजय रूपाणी के नेतृत्व में नई सरकार बनी।

इस सरकार के सामने भी कई चुनौतियाँ थीं। जाति की राजनीति अभी भी हावी थी। दो साल बाद 2017 के विधानसभा चुनाव आए और उनमें BJP सत्ता से बाहर होने से सिर्फ 7 सीट दूर थी। 99 सीटों ने सरकार बचा ली लेकिन हालात अच्छे नहीं थे। विपक्ष दो दशकों में सत्ता के सबसे करीब था।

BJP 99 सीटों के साथ सत्ता में तो रही लेकिन उसकी पकड़ मजबूत नहीं थी। 2015 में अलग-अलग समुदायों को आगे करके राज्य में अस्थिरता और अराजकता लाने के बाद से ही सरकार के लिए परिस्थितियाँ मुश्किल होती गई हैं। 2017 में उन्हें इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा। यह कहना ज्यादा नहीं होगा कि अगर 2017 के चुनाव के नतीजे अलग होते तो केंद्र में हालात अलग होते लेकिन अब यह सब ‘अगर-मगर’ की बात है।

2017 के इन नतीजों के बाद BJP ने नए सिरे से काम करना शुरू किया और पार्टी लगातार मजबूत होती गई। दूसरी तरफ, कॉन्ग्रेस पूरी तरह से कमजोर हो गई थी इसलिए 2017 से पहले चल रही जबरदस्त लड़ाई पूरी तरह से बंद हो गई। 2022 आते-आते माहौल वैसा ही रहा। पिछले अनुभवों से सीखते हुए बीजेपी ने अपने समीकरणों को फिर से ठीक किया, कई दूसरे मुद्दों ने भी भूमिका निभाई और 2022 के चुनावों में ऐसा नतीजा आया जो पहले कभी नहीं देखा गया था। बीजेपी ने 156 सीटें जीतीं और यह संख्या अब कुल 182 सीटों में से बढ़कर 162 हो गई है।

अगर ध्यान से देखें तो गुजरात में यह पैटर्न काफी समय से देखने को मिल रहा है। जब भी कोई मामला पूरे राज्य में चर्चा का विषय बनता है या जानबूझकर बनाया जाता है, तो उसके साथ जाति का एंगल भी जोड़ दिया जाता है। समाज के कुछ नेता सामने आ जाते हैं। इंसान की यह स्वाभाविक आदत होती है कि वह खुद को आगे दिखाना चाहता है, यह साबित करना चाहता है कि वह समाज के लिए काम कर रहा है। इसलिए इसमें सिर्फ उन लोगों की गलती नहीं होती लेकिन इसका नुकसान पूरे समाज को उठाना पड़ता है। ऐसे नेता बीच में कूद पड़ते हैं, राजनीति घुस जाती है और आखिरकार पूरा माहौल खराब हो जाता है।

अगर कोई मुद्दा वास्तव में जाति से जुड़ा हो तो उस पर बात करना समझ में आता है। लेकिन कई बार ऐसे मामलों में भी जाति का रंग चढ़ा दिया जाता है जिनका जाति से कोई लेना-देना नहीं होता। कुछ दिन पहले अंबाजी मंदिर ट्रस्ट और राज परिवार के बीच विवाद में हाईकोर्ट ने फैसला दिया और नवरात्रि में राज परिवार के विशेष पूजा अधिकार को खत्म करने का आदेश दिया। इस मामले में भी सोशल मीडिया पर कुछ जगह इसे जाति से जोड़ने की कोशिश की गई।

हाल ही में सौराष्ट्र के बगदाणा में एक सरपंच पर हमला हुआ और ऐसा माहौल बना दिया गया कि दो जातियाँ आमने-सामने आ गईं। इसके बाद सुरेंद्रनगर में एक जमीन घोटाला पकड़ा गया जिसमें कलेक्टर की गिरफ्तारी हुई तो उस पर ED की कार्रवाई को भी उसकी जाति से जोड़ दिया गया। यहाँ तक कि शादी-ब्याह, प्रेम संबंध जैसे छोटे-छोटे मामलों को भी पूरे राज्य का मुद्दा बना दिया गया और उनमें भी समाज को घसीटा गया। कुछ समय पहले गोंडल के मामलों में भी यही देखने को मिला था।

समाज, जाति जैसे मुद्दे ऐसे होते हैं, जिन पर सरकार और राजनीतिक दल बहुत संभल-संभलकर चलते हैं। अब गुजरात में अगर किसी का नुकसान होना है, तो वह सत्ताधारी पार्टी का ही होना है। विपक्षी दलों के पास इस समय खोने के लिए कुछ खास बचा नहीं है। इसी वजह से वे समय-समय पर ऐसे मुद्दों को हवा देने की कोशिश करते रहते हैं।

विपक्षी दल और उनका पूरा इकोसिस्टम अच्छी तरह जानता है कि विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर अगले दस साल तक गुजरात में बीजेपी को हराना आसान नहीं है। ऐसे में उनके पास एक ही आखिरी रास्ता बचता है- समाज और जातियों को आगे रखकर राजनीति करना। यही कारण है कि हर मुद्दे में किसी न किसी तरह जाति का एंगल जोड़ दिया जाता है और किसी भी तरह से उस मुद्दे को जिंदा रखने की कोशिश की जाती है।

यूट्यूब के पत्रकारों से लेकर तथाकथित इन्फ्लुएंसर्स तक पूरा इकोसिस्टम लगातार ऐसा माहौल बनाने में लगा हुआ है। किसी न किसी रूप में उनकी ज्यादातर खबरें जातियों के इर्द-गिर्द ही घूमती हैं। किसी न किसी तरीके से हमें इन्हीं मुद्दों पर चर्चा करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। चर्चा करना गलत नहीं है लेकिन इसके नतीजों और साइड इफेक्ट्स को समझना भी उतना ही जरूरी है। क्योंकि 2027 तक इस तरह की गतिविधियाँ और ज्यादा देखने को मिलेंगी।

डोनाल्ड ट्रंप के खेल से अमेरिका के कब्जे में वेनेजुएला का ‘काला सोना’, भारत को सस्ता तेल मिलेगा या मिलेगी नई मुसीबत?

सारी दुनिया हैरान है। जनवरी 2026 की शुरुआत में अमेरिका ने वेनेजुएला पर बड़ा सैन्य ऑपरेशन किया। अमेरिकी फोर्सेस ने राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को गिरफ्तार कर न्यूयॉर्क ले जाया। ट्रंप प्रशासन ने साफ कहा कि यह कार्रवाई नार्को-टेररिज्म और ड्रग तस्करी के आरोपों पर हुई, लेकिन असल नजर वेनेजुएला के विशाल तेल भंडार पर है। दुनिया के सबसे बड़े प्रमाणित कच्चे तेल भंडार (करीब 303 अरब बैरल) वाले इस देश पर अब अमेरिका का नियंत्रण हो गया है।

डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की कि अमेरिकी तेल कंपनियाँ वहाँ अरबों डॉलर निवेश करेंगी, खराब हो चुके इंफ्रास्ट्रक्चर को ठीक करेंगी और उत्पादन बढ़ाएँगी। सवाल यह है कि वेनेजुएला के तेल का अब क्या होगा? अमेरिका इसे कैसे निकालेगा और बेचेगा? भारत जैसे देशों को क्या फायदा या नुकसान होगा? आइए विस्तार से समझते हैं।

वेनेजुएला के पास तेल का खजाना, लेकिन बदहाली का शिकार

वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा कच्चा तेल भंडार है, जो करीब 303 अरब बैरल का है। यह सऊदी अरब (267 अरब) और ईरान (208 अरब) से भी ज्यादा है। ज्यादातर तेल ओरिनोको बेल्ट में है, जो एक्स्ट्रा-हेवी क्रूड है। यह गाढ़ा और सल्फर युक्त होता है, इसलिए निकालना और रिफाइन करना महँगा पड़ता है। फिर भी यह डीजल, जहाजों के ईंधन और हेवी इंडस्ट्री के लिए बेहतरीन है।

लेकिन तेल होने के बावजूद वेनेजुएला गरीब और अस्थिर है। ह्यूगो चावेज और मादुरो के शासन में भ्रष्टाचार, गलत नीतियाँ और अमेरिकी प्रतिबंधों ने देश को खोखला कर दिया। कभी रोज 32 लाख बैरल उत्पादन करने वाला देश अब मुश्किल से 8-10 लाख बैरल निकाल पाता है। PDVSA (सरकारी तेल कंपनी) का बुरा हाल है, इंफ्रास्ट्रक्चर जर्जर है, कुशल कर्मचारी भाग गए हैं। अमेरिका ने 2017-2019 से सख्त प्रतिबंध लगाए, जिससे वेनेजुएला ने डिस्काउंट पर चीन, रूस और ईरान को तेल बेचा। इससे अमेरिका नाराज हुआ और तनाव बढ़ा गया।

निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी और तेल पर अमेरिकी कब्जे की कार्रवाई

अमेरिकी स्पेशल फोर्सेस ने 3 जनवरी 2026 को वेनेजुएला की राजधानी काराकास में ऑपरेशन किया। मादुरो दंपति को उनके घर से पकड़ा और न्यूयॉर्क लाया गया। ट्रंप ने कहा कि यह नार्को-टेररिज्म के आरोपों पर हुआ, लेकिन जल्दी ही तेल की बात सामने आई। डोनाल्ड ट्रंप ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “हमारी बड़ी अमेरिकी तेल कंपनियाँ वहाँ जाएँगी, अरबों डॉलर खर्च करेंगी, खराब हो चुके तेल ढाँचे को ठीक करेंगी और देश के लिए पैसा कमाना शुरू करेंगी। हम तेल के कारोबार में हैं, हम जानते हैं कैसे कंपनियां मुनाफे में आती हैं।”

डोनाल्ड ट्रंप ने आगे कहा, “जमीन से निकलने वाला तेल और पैसा बहुत महत्वपूर्ण है। हम जो खर्च करेंगे, उसकी भरपाई हो जाएगी।” उन्होंने चीन को भी आश्वासन दिया कि सप्लाई जारी रहेगी- “उन्हें तेल मिलेगा, हम लोगों को तेल लेने देंगे।” अमेरिका ने अंतरिम सरकार में डेल्सी रोड्रिगेज को रखा है, लेकिन साफ है कि वाशिंगटन ही फैसले लेगा।

अमेरिका वेनेजुएला का तेल कैसे निकालेगा?

वेनेजुएला का तेल ज्यादातर हेवी क्रूड है, जिसे निकालने के लिए विशेष तकनीक चाहिए। पुराना इंफ्रास्ट्रक्चर (पाइपलाइन, पंप, रिफाइनरी) सालों से खराब है। अमेरिकी कंपनियाँ जैसे एक्सॉनमोबिल, शेवरॉन, कोनोकोफिलिप्स अरबों डॉलर निवेश करेंगी। पहले चरण में सर्वे और रिपोर्ट बनेगी, फिर पुराने कुओं को ठीक किया जाएगा, नए ड्रिलिंग शुरू होंगे।

अमेरिका की गल्फ कोस्ट रिफाइनरियाँ इसी हेवी क्रूड के लिए बनी हैं, इसलिए यह उनके लिए परफेक्ट मैच है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि 1-2 साल में उत्पादन 20-25 लाख बैरल रोज तक पहुँच सकता है। लेकिन चुनौतियाँ भी बहुत हैं, खासकर वेनेजुएला से जुड़े पुराने कानूनी विवाद, राष्ट्रीयकरण के पुराने केस, स्थानीय विरोध और राजनीतिक अस्थिरता। अगर सब ठीक रहा तो 5-10 साल में पूरा भंडार सक्रिय हो सकता है। निवेश की भरपाई भविष्य की बिक्री से होगी।

अमेरिका तेल कैसे और किसे बेचेगा?

डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि तेल वैश्विक बाजार में बेचा जाएगा। मुख्य रूप से डॉलर में ट्रेड होगा, जो अमेरिकी डॉलर की ताकत बढ़ाएगा। अमेरिका खुद आयात करेगा, क्योंकि उनकी रिफाइनरियाँ ठप पड़ी हैं। बाकी तेल यूरोप, एशिया (चीन, भारत) को जाएगा। चीन पहले बड़ा खरीदार था, ट्रंप ने कहा कि सप्लाई जारी रहेगी, शायद बेहतर शर्तों पर।

बिक्री का तरीका: अमेरिकी कंपनियां प्रोडक्शन कंट्रोल करेंगी, PDVSA को साइडलाइन कर। तेल स्पॉट मार्केट, लॉन्ग-टर्म कॉन्ट्रैक्ट्स या नए ऑक्शन से बेचा जाएगा। अगर उत्पादन बढ़ा तो वैश्विक कीमतें गिरेंगी (अभी 57-60 डॉलर प्रति बैरल), जो अमेरिकी उपभोक्ताओं को फायदा देगा, लेकिन उनकी शेल इंडस्ट्री को नुकसान। ट्रंप का प्लान है कि सस्ता तेल रूस और ओपेक की कमाई घटाएगा।

रूस-चीन-ओपेक पर कितना असर पड़ेगा?

यह डोनाल्ड ट्रंप की बड़ी रणनीति है। रूस की अर्थव्यवस्था तेल पर निर्भर है, सस्ता तेल होने से उसकी कमाई घटेगी। ऐसे में यूक्रेन युद्ध पर असर पड़ेगा। ओपेक (सऊदी सहित) की कीमत कंट्रोल करने की ताकत कम होगी। चीन को तेल मिलता रहेगा, लेकिन अमेरिकी कंट्रोल में.. जो चीन को परेशान करेगा। कुल मिलाकर अमेरिका ऊर्जा बाजार में सुपरपावर बनेगा।

भारत को क्या फायदा या नुकसान?

भारत दुनिया का तीसरा बड़ा तेल आयातक है, 85% तेल बाहर से लाता है। पहले वेनेजुएला से सस्ता हेवी क्रूड मिलता था (रिलायंस, नायरा एनर्जी प्रोसेस करती थीं)। लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से वेनेजुएला से होने वाला आयात रुक गया। हालाँकि भारत के पास रूसी तेल की खरीदी का जब तक मौका था, इन कंपनियों को ज्यादा दिक्कत नहीं हुई, लेकिन आने वाले समय में अगर उत्पादन बढ़ा और भारतीय कंपनियों के लिए सप्लाई आसान होगी, तो भारत के लिए अच्छा मौका बन भी सकता है। हालाँकि इन सबमें अभी काफी समय है।

फायदा: वैश्विक कीमतें गिरेंगी तो भारत को सस्ता तेल मिलेगा। हेवी क्रूड भारत की रिफाइनरियों के लिए अच्छा है, इससे डीजल सस्ता होगा। फर्क ट्रांसपोर्ट-कृषि और कृषि पर सकारात्मक रूप से पड़ेगा। भारत के लिए सप्लाई अच्छी होगी, तो मिडिल ईस्ट-रूस पर से निर्भरता भी घट जाएगी।

नुकसान: शुरुआती अस्थिरता से कीमतें ऊपर जा सकती हैं। अगर अमेरिका प्राथमिकता खुद और सहयोगियों को दे तो भारत को देरी। पुराने कॉन्ट्रैक्ट्स प्रभावित हो सकते हैं। लेकिन कुल मिलाकर लंबे समय में फायदा ज्यादा है, जिसमें महँगाई कंट्रोल में रहेगी और जीडीपी को भी बूस्ट मिलेगा।

वेनेजुएलन तेल के साथ जोखिम और चुनौतियाँ क्या हैं?

वेनेजुएला के तेल संसाधनों पर भले ही अमेरिका ने कब्जा कर लिया हो, लेकिन अभी ये सब आसान बिल्कुल भी नहीं है। सबसे बड़ी समस्या तो अभी वेनेजुएला की अस्थिरता ही है। लोग भी विरोध पर उतर सकते हैं। वेनेजुएला के पुराने फैसलों के कानूनी रास्ते निकालने होंगे। बहुत बड़े पैमाने पर निवेश करना होगा।

ऐसे में अमेरिकी तेल कंपनियों को मुनाफे में आने में लंबा समय लग सकता है। फिर, ट्रंप का कार्यकाल बामुश्किल 3 साल बचा है, ऐसे में अमेरिका में अगर सरकार बदलती है, तो सारे इक्वेशन भी बदल सकते हैं। वेनेजुएला के तेल संसाधनों पर कब्जे के मामले में यूएन में भी बहस चल ही रही है, वहीं अमेरिका का अपना इतिहास भी इतना अच्छा नहीं रहा है कि दुनिया उस पर आँख बंद करके भरोसा कर ले।

नया ऊर्जा युग या नया संकट?

डोनाल्ड ट्रंप का यह कदम दुनिया की ऊर्जा राजनीति बदल देगा। वेनेजुएला का तेल अमेरिकी हाथ में आया तो अमेरिका अजेय हो जाएगा। उसके सस्ते तेल से न सिर्फ रूस बल्कि ओपेक पर भी दबाव बढ़ेगा, ऐसे में डॉलर मजबूत होता जाएगा। हालाँकि भारत जैसे देशों को सस्ती ऊर्जा मिलेगी, तो अर्थव्यवस्था को भी बूस्ट मिलेगा, लेकिन इसके साथ जोखिम भी बढ़ जाएगा। फिलहाल दुनिया नजर रखे हुए है कि यह खेल कैसे खत्म होता है। तेल आज भी दुनिया का सबसे बड़ा हथियार है और वेनेजुएला उसका सबसे बड़ा खजाना।

आरक्षित उम्मीदवार ओपन मेरिट से अधिक नंबर लाने पर जनरल सीट के हकदार, बशर्ते ना लिया हो रिजर्वेशन का अतिरिक्त लाभ: जानें- ‘डबल बेनिफिट’ और ‘माइग्रेशन’ पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि अगर कोई उम्मीदवार SC, ST या OBC जैसे आरक्षित वर्ग से है लेकिन उसके नंबर जनरल कैटेगरी की कट-ऑफ से अधिक हैं, तो उसे जनरल (ओपन) कैटेगरी में ही माना जाएगा। हालाँकि, कोर्ट ने इसमें एक शर्त भी बताई है।

कोर्ट का कहना है कि सिर्फ इसलिए कि कोई शख्स आरक्षित वर्ग से आता है उसे जनरल सीट से बाहर नहीं किया जा सकता। यह नियम चयन की शॉर्टलिस्टिंग के चरण में भी लागू होता है। कोर्ट ने जो शर्त बताई है, उसे समझना बहुत जरूरी है। इस शर्त का आधार अतिरिक्त आरक्षण लाभ के तर्क पर रखा गया है, जिसे नीचे डिटेल में बताया गया है।

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने राजस्थान हाईकोर्ट प्रशासन की अपील खारिज करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि जनरल या ओपन कैटेगरी किसी खास जाति या वर्ग की नहीं होती बल्कि काबिलियत के आधार पर सभी के लिए खुली होती है।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा अगस्त 2022 में शुरू की गई भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा है। यह भर्ती राजस्थान हाईकोर्ट स्टाफ सर्विस रूल्स 2002 और राजस्थान जिला न्यायालय मंत्रिस्तरीय स्थापना नियम 1986 के तहत निकाली गई थी। इसमें कुल 2,756 पदों पर भर्ती होनी थी जिनमें जूनियर ज्यूडिशियल असिस्टेंट और क्लर्क ग्रेड-II के पद शामिल थे। ये पद राजस्थान हाई कोर्ट, जिला न्यायालयों और न्यायिक अकादमी जैसी संस्थाओं के लिए थे।

यह भर्ती प्रक्रिया दो चरणों में तय की गई थी। पहले चरण में 300 अंकों की लिखित परीक्षा हुई और दूसरे चरण में 100 अंकों की कंप्यूटर आधारित टाइपिंग परीक्षा रखी गई थी। नियम यह था कि लिखित परीक्षा में न्यूनतम तय अंकों से ऊपर अंक लाने वाले उम्मीदवारों में से हर कैटेगरी में पदों की संख्या के 5 गुना उम्मीदवारों को टाइपिंग टेस्ट के लिए शॉर्टलिस्ट किया जाएगा। अंतिम चयन लिखित परीक्षा और टाइपिंग टेस्ट के कुल अंकों के आधार पर होना था।

लिखित परीक्षा का परिणाम मई 2023 में घोषित हुआ। इसके बाद भर्ती प्राधिकरण ने कैटेगरी टाइपिंग टेस्ट के लिए शॉर्टलिस्ट तैयार की। इसमें सामान्य वर्ग का कट-ऑफ लगभग 196 अंक रहा लेकिन अनुसूचित जाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अति पिछड़ा वर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग जैसी कई आरक्षित कैटेगरी का कट-ऑफ इससे काफी ज्यादा रहा। कुछ मामलों में तो यह 230 अंकों से भी ऊपर चला गया। इसका असर यह हुआ कि कुछ रिजर्व वर्ग के उम्मीदवार जिन्होंने सामान्य वर्ग के कट-ऑफ से ज्यादा अंक हासिल किए थे लेकिन अपनी ही कैटेगरी के कट-ऑफ से कम अंक लाए थे, उन्हें टाइपिंग टेस्ट के लिए बुलाया ही नहीं गया।

अलग-अलग श्रेणी के लिए कट-ऑफ मार्क्स

इन उम्मीदवारों की शिकायत यह थी कि वे कई ऐसे सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों से बेहतर अंक लाने के बावजूद आगे की प्रक्रिया से बाहर कर दिए गए। वहीं, सामान्य वर्ग के कम अंक वाले उम्मीदवार टाइपिंग टेस्ट में शामिल हो गए। इससे उन्हें टाइपिंग टेस्ट देने का मौका ही नहीं मिला। इसी आधार पर इससे प्रभावित हुए उम्मीदवारों ने राजस्थान हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और तर्क दिया कि इस तरह की शॉर्टलिस्टिंग प्रक्रिया सामान्य या ओपन कैटेगरी को अनारक्षित उम्मीदवारों के लिए ही मानती है। उम्मीदवारों ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता और समान अवसर के अधिकार का उल्लंघन बताया था।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

इस मामले में राजस्थान हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने साफ किया कि कैटेगरी के हिसाब से शॉर्टलिस्ट करना गलत नहीं है लेकिन उसका तरीका और समय बहुत अहम है। अदालत ने कहा कि अगर कोई आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार बिना किसी विशेष छूट या रियायत के सामान्य वर्ग के कट-ऑफ से अधिक अंक लाता है, तो उसे उसी स्तर पर ओपन या सामान्य श्रेणी की सूची में शामिल किया जाना चाहिए।

अदालत ने यह भी आदेश दिया कि पूरी मेरिट लिस्ट को दोबारा तैयार किया जाए और जिन उम्मीदवारों को गलत तरीके से टाइपिंग टेस्ट से बाहर कर दिया गया था, उन्हें टाइपिंग टेस्ट में शामिल होने का मौका दिया जाए। साथ ही, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि वह न तो आरक्षण व्यवस्था को खत्म कर रही है और न ही यह कह रही है कि श्रेणीवार शॉर्टलिस्टिंग हमेशा गलत है। समस्या इस बात की थी कि श्रेणी का इस्तेमाल किस चरण पर और किस तरीके से किया गया।

हाईकोर्ट ने माना कि रिजर्व कैटेगरी के उम्मीदवार को जनरल/ओपन कैटेगरी के कट-ऑफ मार्क्स से अधिक नंबर लाने के बाद भी कैटेगरी की वजह से बाहर करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन होगा। हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 16(1), 16(4) और अनुच्छेद 14 की व्याख्या करते हुए कहा कि अनुच्छेद 16(1) सरकारी नौकरी में समान अवसर की गारंटी देता है जबकि अनुच्छेद 16(4) सामाजिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए आरक्षण की अनुमति देता है। इन दोनों का आधार अनुच्छेद 14 है, जो मनमाने और भेदभावपूर्ण वर्गीकरण को रोकता है।

हाईकोर्ट ने कैटेगरी-वाइज लिस्ट को रिवाइज करने का निर्देश दिया जिसमें सबसे पहले जनरल/ओपन कैटेगरी की लिस्ट मेरिट के आधार पर तैयार की जाएगी। कोर्ट ने कहा कि इसमें आरक्षित कैटेगरी के उन उम्मीदवारों को शामिल किया जाएगा जिन्होंने अनारक्षित कट-ऑफ से ज्यादा नंबर हासिल किए थे, बशर्ते उन्होंने किसी विशेष लाभ (उम्र या अटेम्प्ट आदि में छूट भी शामिल) का फायदा न उठाया हो।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले में राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले की चर्चा

सुप्रीम कोर्ट के सामने सवाल?

इस मामले में जब राजस्थान हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई तो हाई कोर्ट प्रशासन की ओर से तीन मुख्य दलीलें रखी गईं। दावा किया गया कि काबिल रिजर्व कैटेगरी के कैंडिडेट को जनरल कैटेगरी में एडजस्ट करने का नियम फाइनल सिलेक्शन के स्टेज पर लागू होना चाहिए यानी जब फाइनल मेरिट लिस्ट तैयार हो, न कि परीक्षा के दूसरे स्टेज के लिए शॉर्टलिस्टिंग के बीच के स्टेज पर। अगर ऐसा होता है तो उन्हें दोहरा लाभ मिला जाएगा।

दूसरी दलील दी गई कि आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों के ओपन कैटेगरी में आने से जुड़ा जो न्यायिक सिद्धांत पहले से मौजूद है और वह केवल अंतिम चयन के चरण पर लागू होता है, बीच के चरणों पर नहीं। तीसरी दलील यह थी कि जो उम्मीदवार भर्ती प्रक्रिया में शामिल हुए वे बाद में उसी प्रक्रिया को चुनौती नहीं दे सकते क्योंकि उन्होंने भाग लेकर उसे स्वीकार कर लिया था। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस सभी दलीलों को खारिज कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कई फैसले बताते हैं कि जो उम्मीदवार सिलेक्शन प्रोसेस में हिस्सा लेते हैं, वे बाद में अपनाए गए तरीके को सिर्फ इसलिए चुनौती नहीं दे सकते क्योंकि नतीजा उनके मन मुताबिक नहीं है। हालाँकि, यह नियम पक्का नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “एडवर्टाइजमेंट सरकारी नौकरी के उम्मीदवारों के लिए एक रिप्रेजेंटेशन था कि कैटेगरी के हिसाब से लिस्ट तैयार की जाएँगी। कोई भी ऐसी शर्त पर सवाल नहीं उठाएगा। लेकिन इस बात का कोई संकेत नहीं था कि काबिल रिजर्व कैटेगरी के कैंडिडेट को जनरल/ओपन कैटेगरी के कैंडिडेट नहीं माना जाएगा।”

सुप्रीम कोर्ट ने दोहरे लाभ के सवालों को भी खारिज कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “आवेदन में अपनी आरक्षित श्रेणी बताने से उम्मीदवार अपने-आप आरक्षित पद पर चयनित नहीं हो जाता बल्कि इससे उसे अन्य आरक्षित उम्मीदवारों के बीच अपनी आपसी (इंटर-से) मेरिट के आधार पर दावा करने का अवसर मिलता है।”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को ‘डबल लाभ’ मिलने की जो आशंका जताई जाती है, वह इस गलत धारणा पर आधारित है कि आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार कई स्तरीय चयन प्रक्रिया के हर या एक से अधिक चरणों में आरक्षण का लाभ ले रहा है। ‘डबल लाभ’ की आशंका गलत और निराधार है।”

माइग्रेन के मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “हमने निष्कर्ष निकाला है कि ‘ओपन’ शब्द का अर्थ केवल और केवल ‘खुला’ ही है यानि जिन रिक्त पदों को ‘ओपन’ के रूप में चिह्नित करके भरा जाना है, वे किसी भी श्रेणी में नहीं आते। इन पर किसी भी उपयुक्त उम्मीदवार की नियुक्ति की जा सकती है चाहे उसकी जाति, जनजाति, वर्ग या लिंग कुछ भी हो।”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “आरक्षित वर्ग का कोई उम्मीदवार अगर ‘बिना किसी छूट या रियायत के’ केवल अपनी मेहनत के दम पर प्रारंभिक या स्क्रीनिंग परीक्षा में ना केवल आरक्षित उम्मीदवारों बल्कि बल्कि सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों से भी अधिक अंक ले आता है तो ऐसे उम्मीदवार को आगे की परीक्षा (दूसरे चरण) में जाने का हक मिलता है तो वहाँ ‘माइग्रेशन’ की जरूरत ही नहीं है।”

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हिस्सा

हालाँकि, कोर्ट ने कहा कि ऊपर बताई गई हमारी बातें सिर्फ इसी सिलेक्शन प्रोसेस पर लागू होती हैं। अगर किसी भर्ती के नियम कुछ और बताते हैं तो भर्ती नियमों को प्राथमिकता मिलेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “शॉर्टलिस्टिंग के चरण में किसी आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार का ओपन मेरिट लिस्ट में शामिल होना ‘माइग्रेशन’ नहीं माना जा सकता क्योंकि इसमें आरक्षण से जुड़ी किसी भी तरह की छूट या लाभ नहीं लिया गया है। अपीलकर्ताओं के तर्क को स्वीकार कर लिया जाए तो इसका न केवल वंचित वर्गों के उम्मीदवारों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा बल्कि संविधान में निहित मूल सिद्धांतों को भी कमजोर करेगा।”

हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में एक कावेयट भी दर्ज कराई है। कोर्ट ने कहा, “इन सिद्धांतों से ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है कि कोई आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार अपने प्रदर्शन के आधार पर सामान्य/ओपन वर्ग के उम्मीदवारों से बेहतर हो जाए और सामान्य मेरिट सूची में आ जाए लेकिन उसके पास विकल्प सीमित रह जाएँ। ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि उसे सामान्य वर्ग का उम्मीदवार मान लिया गया हो और जिस सेवा या पद को वह चाहता हो, वह आरक्षित कोटे के लिए निर्धारित हो।”

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए अपीलों को खारिज कर दिया है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता उम्मीदवारों के मामलों पर विचार करते समय हाईकोर्ट को यह प्रयास करना चाहिए कि पहले से नियुक्त कर्मचारियों को उनके पदों से न हटाया जाए।

फैसले के बड़े मायने

यह सुप्रीम कोर्ट का फैसला सिर्फ राजस्थान हाईकोर्ट की एक भर्ती से जुड़ा तकनीकी निर्णय नहीं है बल्कि यह उस सामाजिक और संवैधानिक बहस को भी स्पष्ट करता है, जो वर्षों से ‘जनरल बनाम रिजर्व कैटेगरी कट-ऑफ’ को लेकर चलती रही है। सोशल मीडिया पर बार-बार ऐसे स्क्रीनशॉट्स दिखाए जाते हैं जिसमें यह दावा किया जाता है कि किसी परीक्षा में SC, ST या OBC का कट-ऑफ जनरल से ज्यादा चला गया है। इसे सहारे मैरिट की बहस शुरू करने की कोशिश की जाती है। यह जजमेंट दरअसल बताता है कि ऐसी स्थिति कैसे पैदा होती है, क्यों पैदा होती है और सबसे महत्वपूर्ण बात कि यह क्यों पूरी तरह वैध और संवैधानिक है।

इस फैसले का दूसरा पहलू और भी ज्यादा महत्वपूर्ण है, जिसे नजरअंदाज कर दिया जाता। इसमें कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि कोई भी उम्मीदवार जो बिना किसी रियायत के परीक्षा में बैठा है उसके लिए यह नियम पूरी तरह लागू होगा। यानी अगर कोई आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार किसी प्रकार की रियायत लेकर परीक्षा में बैठा होता जैसे- उम्र में छूट, अटेम्पट में छूट या फिजिकल छूट तो शायद स्थिति बदल जाती। ऐसे उम्मीदवार के ज्यादा अंक होने के बावजूद, वह जनरल सीट के लिए दावा नहीं कर सकता।

आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को सामान्य श्रेणी के पदों पर नियुक्त इस शर्त के साथ किया जाता कि आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार ने परीक्षा में आरक्षण से जुड़ी अन्य सुविधाओं का लाभ ना लिया हो। चूँकि अधिकांश आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार इन सुविधाओं का लाभ लेते हैं और इसलिए भले ही वे सामान्य वर्ग के कट-ऑफ से अधिक अंक क्यों न ले आए हों, उन्हें सामान्य श्रेणी के लिए पात्र नहीं माना जाता। यही वह वजह हैं जिनके चलते सामान्य वर्ग का कट-ऑफ से आरक्षित वर्ग का कट-ऑफ से ऊपर चला जाता है।

असल में होता यह है कि कुछ आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार उम्र या अन्य रियायत लेकर परीक्षा देते हैं और अच्छा स्कोर करते हैं। लेकिन क्योंकि उन्होंने रियायत ली है इसलिए कानून उन्हें जनरल मेरिट में गिनने की अनुमति नहीं देता। वे अपनी ही श्रेणी में गिने जाते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि आरक्षित श्रेणी की मेरिट लिस्ट ऊपर खिसक जाती है और उसका कट-ऑफ कभी-कभी जनरल से भी ज्यादा हो जाता है।

यह जजमेंट इस बात को रेखांकित करता है कि आरक्षण व्यवस्था को दंड या विशेषाधिकार के चश्मे से नहीं बल्कि समावेशन के संतुलन के रूप में समझा जाना चाहिए। आरक्षित वर्ग का अधिक कट-ऑफ दिखना इस संतुलन के टूटने का नहीं बल्कि उसके सही ढंग से लागू होने का ही संकेत है। यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी स्थिति को न केवल स्वीकार्य माना बल्कि उसे पूरी तरह वैध और संवैधानिक ठहराया।

हिंदू मंदिर की जमीन 30 साल पहले अवैध तरीके से बेची, मुस्लिमों ने खड़ी कर दी 2-2 मस्जिदें: मद्रास HC ने सौदे को किया रद्द, देवता को वापस मिलेगी ₹110 करोड़ की संपत्ति

मद्रास हाईकोर्ट ने 15 दिसंबर 2025 को अरुलमिगु अन्नामलाईनाथर मंदिर की 3.93 एकड़ जमीन की बिक्री को रद्द कर दिया। कोर्ट ने माना कि 1990 के दशक में हुई यह बिक्री अवैध थी, प्रक्रिया में गंभीर खामियाँ थीं और धार्मिक संपत्तियों की सुरक्षा के मकसद के पूरी तरह खिलाफ थी।

इस मामले में कई पक्षकार थे, जिनमें करीब 90 लोग मुस्लिम थे और इसमें कम से कम दो मस्जिदें भी शामिल थीं। ऑपइंडिया के पास मद्रास हाई कोर्ट के फैसले की कॉपी मौजूद है।

मद्रास हाई कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि मंदिर की जमीन को निजी संपत्ति की तरह बेचा नहीं जा सकता। इसे देवता और भक्तों के फायदे के लिए संरक्षित रखना जरूरी है। कोर्ट ने आगे आदेश दिया कि यह जमीन मंदिर को वापस लौटाई जाए। इस फैसले के साथ करीब 30 साल से चल रहा विवाद खत्म हो गया।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्त विभाग (HR&CE) के तहत काम करने वाले ट्रस्टी और अधिकारी मंदिर की संपत्ति के मालिक नहीं, बल्कि सिर्फ उसके संरक्षक होते हैं। अगर कानून में तय सुरक्षा प्रावधानों का उल्लंघन किया गया हो, तो बाद में सरकार के आदेश भी ऐसी अवैध बिक्री को वैध नहीं बना सकते।

फैसले में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ संपत्ति विभाग (एचआरएंडसीई) के ट्रस्टी और अधिकारी सिर्फ मंदिर संपत्ति के संरक्षक हैं। कानूनी सुरक्षा प्रावधानों से कोई विचलन, भले ही बाद में सरकारी आदेशों से समर्थित हो, अवैध बिक्री को वैध नहीं बना सकता। फैसले ने दोहराया कि एचआरएंडसीई एक्ट के अनिवार्य प्रावधान सिर्फ औपचारिकताएँ नहीं हैं। ये धार्मिक संपत्तियों के दुरुपयोग और क्षरण को रोकने के लिए ठोस सुरक्षा हैं।

कौन सी जमीन थी शामिल और वह मंदिर की क्यों थी?

यह विवाद कडयनल्लूर में स्थित 3.93 एकड़ जमीन को लेकर था। यह जमीन लंबे समय से अरुलमिगु अन्नामलाईनाथर मंदिर की दर्ज थी। यह मंदिर की दान में दी गई संपत्तियों का हिस्सा थी और धार्मिक व धर्मार्थ कार्यों के लिए आय या उपयोग उत्पन्न करने के लिए थी। खास बात यह है कि ये दान देवता के नाम पर होते हैं, न कि किसी व्यक्तिगत ट्रस्टी या प्रशासक के नाम पर।

कोर्ट ने कहा कि मंदिर की जमीनों को विशेष कानूनी दर्जा प्राप्त है। इन्हें मनमाने ढंग से बेची जाने वाली व्यावसायिक संपत्ति नहीं माना जा सकता। ये धार्मिक संपत्तियां हैं जिन्हें कानून, परंपरा और सार्वजनिक विश्वास से संरक्षण मिला है। ऐसी जमीन बेचने का फैसला जरूरत, पारदर्शिता और मंदिर को स्पष्ट लाभ के सख्त परीक्षणों से गुजरना पड़ता है।

इसी पृष्ठभूमि में 30 साल पहले हुई बिक्री की जाँच की गई। सुनवाई में कोर्ट ने देखा कि जमीन कैसे बेची गई और क्या किसी चरण में कानून का पालन हुआ। ऐसी किसी भी भूमि की बिक्री तभी संभव है, जब वह अत्यंत आवश्यक हो, पूरी तरह पारदर्शी हो और उससे मंदिर को स्पष्ट और प्रत्यक्ष लाभ हो। इस तथ्य पर ये सौदा खरा नहीं उतरा।

ट्रस्टी ने मंदिर की जमीन बेचने का निर्णय कैसे लिया?

इस विवाद की शुरुआत 1990 के शुरुआती वर्षों में हुई जब मंदिर के वंशानुगत ट्रस्टी वी सुब्रमण्या अय्यर ने मंदिर की कुछ जमीन बेचने का फैसला लिया। बिक्री का तर्क दिया गया कि पैसा जमा कराया जाएगा और उसका ब्याज मंदिर के खर्चों के लिए इस्तेमाल होगा। लेकिन बाद में इस तर्क की गहराई से जाँच हुई क्योंकि मंदिर संपत्तियों का कानून बिक्री की इजाजत सिर्फ तभी देता है जब वह अनिवार्य हो और संस्था को स्पष्ट लाभ हो।

कोर्ट ने देखा कि रिकॉर्ड में कोई सामग्री नहीं थी जो दिखाती कि मंदिर को ऐसी आर्थिक तंगी थी कि जमीन बेचनी पड़ी। बल्कि प्रस्ताव प्रशासनिक सुविधा से प्रेरित लगता था, न कि वास्तविक जरूरत से। कोर्ट ने जोर दिया कि ट्रस्टी का काम अल्पकालिक नकदी बढ़ाना नहीं बल्कि भावी पीढ़ियों के भक्तों के लिए मंदिर संपत्ति संरक्षित रखना है।

इसी पृष्ठभूमि में कोर्ट ने करीब 30 साल पहले हुई इस जमीन की बिक्री की जाँच की। सुनवाई के दौरान यह परखा गया कि जमीन किन परिस्थितियों में बेची गई, किस प्रक्रिया का पालन किया गया और क्या किसी भी स्तर पर कानून का सही तरीके से अनुपालन किया गया था या नहीं।

1995 की सार्वजनिक नीलामी और कम मूल्यांकन के आरोप

ट्रस्टी द्वारा जमीन बेचने का फैसला लेने के बाद वर्ष 1995 में एक सार्वजनिक नीलामी कराई गई। कागजों में यह प्रक्रिया नियमों के अनुसार दिखाई गई, लेकिन इसके तरीके पर जल्द ही गंभीर सवाल खड़े हो गए। नीलामी में सबसे अधिक बोली लगाने वाला आर सुब्रमणियम निकला, जो मंदिर के वंशानुगत ट्रस्टी का भतीजा था। यह बात सामने आते ही हितों के टकराव (कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट) के आरोप लगने लगे।

उस समय यह जमीन करीब 10.17 लाख रुपए में बेच दी गई, जबकि कई संबंधित लोगों का कहना था कि यह कीमत बाजार मूल्य से बहुत कम थी। आज उसी जमीन की कीमत लगभग 110 करोड़ रुपए आँकी जा रही है। बाद में कोर्ट ने टिप्पणी की कि जब मंदिर की जमीन बेची जाती है, तो अधिकारियों की जिम्मेदारी होती है कि संस्था को सबसे बेहतर और उचित कीमत मिले। यदि किसी बिक्री से मंदिर को नुकसान पहुँचता है और निजी लोगों को फायदा होता है, तो यह HR&CE एक्ट के तहत मंदिर की संपत्तियों की रक्षा के उद्देश्य के खिलाफ है।

नीलामी के बाद आपत्तियाँ कानूनी समस्या क्यों बन गईं?

पूरी जमीन बिक्री प्रक्रिया में एक गंभीर खामी थी, खासकर आपत्तियाँ आमंत्रित करने के समय को लेकर। नियमों के अनुसार, मंदिर की संपत्ति की नीलामी को अंतिम रूप देने से पहले भक्तों, किराएदारों और अन्य हितधारकों से आपत्तियाँ माँगी जानी चाहिए थीं। इसका उद्देश्य यह होता है कि नीलामी की आवश्यकता, जमीन का सही मूल्य और प्रक्रिया की निष्पक्षता पर पहले ही विचार किया जा सके।

लेकिन इस मामले में अधिकारियों ने पहले नीलामी कर दी और उसके बाद आपत्तियाँ आमंत्रित कीं। यह पूरी प्रक्रिया को उल्टा करने जैसा था। मद्रास हाई कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि नीलामी के बाद आपत्तियाँ बुलाना कोई छोटी या सुधारी जा सकने वाली गलती नहीं है, बल्कि यह कानून में तय सुरक्षा प्रावधानों का गंभीर उल्लंघन है।

कोर्ट के अनुसार, आपत्तियाँ पहले बुलाने का मकसद ही यही होता है कि कोई भी चिंता या आपत्ति समय रहते सुनी जाए, ताकि कोई गलत या नुकसानदेह फैसला होने से रोका जा सके। जब यह मौका ही नहीं दिया गया, तो संबंधित लोगों को अपनी बात रखने का वास्तविक अधिकार नहीं मिला। इसी वजह से पूरी बिक्री प्रक्रिया को अवैध और कानून के खिलाफ माना गया।

2001 में दीवानी अदालत के फैसले में बिक्री को घोषित किया गया अमान्य

नीलामी में हुई गड़बड़ियों के कारण यह मामला अंततः सिविल कोर्ट तक पहुँचा। वर्ष 2001 में सिविल कोर्ट ने नीलामी के जरिए खरीदार के पक्ष में बनाए गए सभी बिक्री विलेखों को अमान्य और शून्य घोषित कर दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि यह बिक्री कानून की अनिवार्य शर्तों का उल्लंघन करके की गई थी और केवल इसे ‘सार्वजनिक नीलामी’ बताकर वैध नहीं ठहराया जा सकता।

यह फैसला इसलिए भी अहम था क्योंकि इसे न तो खरीदारों ने और न ही संबंधित अधिकारियों ने कभी चुनौती दी। परिणामस्वरूप यह निर्णय अंतिम (फाइनल) हो गया। कानूनी रूप से इसका अर्थ यह हुआ कि बिक्री स्वतः रद्द मानी गई और वह जमीन मंदिर की ही संपत्ति बनी रही।

बाद में हाई कोर्ट ने भी स्पष्ट किया कि जब एक सक्षम सिविल कोर्ट पहले ही इस लेन-देन को अवैध घोषित कर चुका है, तो उसे किसी प्रशासनिक या कार्यकारी आदेश के जरिए दोबारा जीवित या वैध करने का कोई कानूनी आधार नहीं है।

सिविल कोर्ट के मौजूदा फैसले के बावजूद यह मामला दोबारा कैसे आया सामने?

सिविल कोर्ट के फैसले को कभी चुनौती नहीं दी गई थी और वह अंतिम रूप ले चुका था, फिर भी विवाद खत्म नहीं हुआ। कई वर्षों बाद नीलामी में जमीन खरीदने वाले व्यक्ति ने HR&CE कानून के तहत सरकार से हस्तक्षेप की माँग की। हैरान करने वाली बात यह रही कि सरकार ने एक आदेश जारी कर विभाग को बिक्री विलेख (सेल डीड) के निष्पादन की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का निर्देश दे दिया। इस तरह सरकार ने उस लेन-देन को फिर से जीवित करने की कोशिश की, जिसे सिविल कोर्ट पहले ही अवैध घोषित कर चुका था।

इस पर हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट ने साफ कहा कि कोई भी कार्यपालिका या सरकारी प्राधिकारी न्यायालय के फैसले के ऊपर अपील की तरह काम नहीं कर सकता, खासकर तब जब वह फैसला अंतिम हो चुका हो। यदि किसी सरकारी आदेश को सिविल कोर्ट के निर्णय पर हावी होने दिया जाए, तो यह न केवल कानून के शासन को कमजोर करेगा, बल्कि धार्मिक संपत्तियों के प्रबंधन के लिए एक खतरनाक मिसाल भी कायम करेगा।

धारा 34 के तहत सरकारी हस्तक्षेप और इसके कानूनी निहितार्थ

सरकार ने अपने आदेश को HR&CE अधिनियम की धारा 34 का सहारा लेकर सही ठहराने की कोशिश की। इस धारा के तहत विशेष परिस्थितियों में मंदिर की संपत्ति बेचने की अनुमति दी जा सकती है। लेकिन हाई कोर्ट ने इस तर्क को साफ तौर पर खारिज कर दिया।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 34 कोई खुली छूट नहीं देती। इस अधिकार का प्रयोग कड़े नियमों और शर्तों के तहत ही किया जा सकता है। इसका इस्तेमाल न तो कानून में तय सुरक्षा प्रावधानों को दरकिनार करने के लिए किया जा सकता है और न ही किसी न्यायिक फैसले को अनदेखा या निष्प्रभावी करने के लिए।

कोर्ट ने यह भी कहा कि धारा 34 के तहत सरकार पहले से अवैध घोषित की जा चुकी बिक्री को बाद में वैध नहीं बना सकती। किसी भी तरह की सरकारी मंजूरी से पहले यह अनिवार्य है कि सभी जरूरी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया जाए।

इनमें यह साबित करना शामिल है कि बिक्री वास्तव में आवश्यक थी, संबंधित लोगों को पहले से नोटिस दिया गया हो और उनकी आपत्तियों पर विचार किया गया हो। मौजूदा मामले में कोर्ट ने पाया कि इनमें से कोई भी बुनियादी कानूनी प्रक्रिया सही तरीके से पूरी नहीं की गई थी, इसलिए धारा 34 का सहारा लेकर सरकारी आदेश को सही नहीं ठहराया जा सकता।

हाई कोर्ट ने HR&CE अधिनियम में कानूनी खामियों को भी किया दूर

कोर्ट ने इस मामले की जाँच करते हुए HR&CE अधिनियम में बनाए गए सुरक्षा उपायों का विस्तार से विश्लेषण किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये नियम इसलिए बनाए गए हैं ताकि मंदिर की संपत्तियों का दुरुपयोग उन लोगों द्वारा न हो जो उनकी देखभाल के लिए जिम्मेदार हैं।

ट्रस्टी और अधिकारी इस बात के लिए जिम्मेदार हैं कि वे मंदिर और भक्तों के हित की रक्षा करें, न कि मंदिर की संपत्ति को अपनी मर्जी से बेचने या इस्तेमाल करने के लिए। कोर्ट ने कहा कि कानून में तय किया गया क्रम पूरी तरह उलट दिया गया था।

सार्वजनिक सूचना देना, आपत्तियों पर विचार करना और आवश्यकताओं का मूल्यांकन करना या तो नहीं किया गया, या केवल औपचारिकता के रूप में किया गया। ऐसे उल्लंघन मामूली गलती नहीं हैं, बल्कि वे उस लेन-देन की वैधता की जड़ को ही कमजोर कर देते हैं।

ट्रस्टी की शक्तियों की आवश्यकता, लाभ और दुरुपयोग पर कोर्ट के निष्कर्ष

कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या मंदिर की जमीन को बेचना वास्तव में आवश्यक था या उससे मंदिर को कोई वास्तविक लाभ होने वाला था। ट्रस्टी ने यह तर्क दिया कि जमीन बेचकर जो धन मिलेगा, उसे जमा कर दिया जाएगा और उस पर मिलने वाले ब्याज से मंदिर के खर्च चलाए जाएँगे। लेकिन कोर्ट ने इस तर्क को पूरी तरह अपर्याप्त और अस्वीकार्य माना।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि इस तरह की दलील को स्वीकार कर लिया जाए, तो किसी भी मंदिर की जमीन को केवल ब्याज कमाने के बहाने बेचा जा सकता है। ऐसा होने पर मंदिर संपत्तियों की रक्षा के लिए बनाए गए कानूनों और सुरक्षा प्रावधानों का कोई अर्थ ही नहीं रह जाएगा।

फैसले में यह भी कहा गया कि ट्रस्टियों को मंदिर की संपत्ति बेचने की खुली छूट नहीं है। मंदिर की जमीन धार्मिक और परोपकारी उद्देश्यों के लिए ट्रस्ट के रूप में रखी जाती है, इसलिए उसके प्रबंधन पर सख्त कानूनी नियंत्रण होता है। बिना किसी ठोस और अनिवार्य आवश्यकता के ऐसी संपत्ति को बेचना, जिससे उसका स्थायी नुकसान हो, ट्रस्ट की जिम्मेदारी का उल्लंघन माना जाएगा।

मंदिर की भूमि पर कब्जा करने वालों की स्थिति और अधिकारियों द्वारा उठाए गए कदम

अपने फैसले में कोर्ट ने इस तथ्य पर ध्यान दिया कि विवाद के अंतिम चरण तक पहुँचते-पहुँचते जमीन के कुछ हिस्सों पर कई लोग कब्जा कर चुके थे। कोर्ट ने सीधे सभी को हटाने का आदेश देने के बजाय एक व्यावहारिक रास्ता अपनाया। कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद प्रशासन ने कब्जाधारियों को दो विकल्प दिए, या तो वे मंदिर के अधीन किराएदार बनकर जमीन को नियमित करें, या फिर उसे खाली करें।

कोर्ट के सामने रखे गए अभिलेखों के अनुसार, कई लोगों ने मंदिर प्रशासन के तहत किराएदार के रूप में बने रहने पर सहमति जताई। जिन लोगों ने सहयोग करने से इनकार किया, उनके खिलाफ स्थानीय प्रशासन की मदद से बेदखली की कार्यवाही शुरू की गई।

हाई कोर्ट ने इन तथ्यों का उल्लेख यह दिखाने के लिए किया कि मंदिर की संपत्ति की बहाली केवल कागजी प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि उसे जमीन पर वास्तव में लागू किया जा रहा था।

इस संदर्भ में जमीन पर कब्जा किए लोगों की पहचान का भी उल्लेख हुआ, हालाँकि यह बात कोर्ट के कानूनी निर्णय का आधार नहीं बनी। मामले के रिकॉर्ड से पता चलता है कि जिन लोगों को प्रतिवादी बनाया गया था, वे वही थे जिन्होंने मूल बिक्री के बाद जमीन खरीदी थी या बाद में खरीद के जरिए कब्जे में आए थे।

कार्यवाही में दर्ज नामों से यह भी सामने आया कि इनमें से अधिकांश लोग स्थानीय मुस्लिम समुदाय से थे और विवादित भूमि पर कम से कम दो मस्जिदें भी मौजूद थीं, जिन्हें भी मुकदमे में पक्षकार बनाया गया था। हालाँकि इन धार्मिक ढाँचों की मौजूदगी या कब्जा करने वालों की पहचान को कोर्ट ने निर्णायक नहीं माना।

हाई कोर्ट ने खुद को केवल इस प्रश्न तक सीमित रखा कि मूल बिक्री कानूनी थी या नहीं और जिन अनुमतियों के आधार पर बिक्री की गई थी वे वैध थीं या नहीं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमीन पर बाद में हुए निर्माण या कब्जा करने वाले लोगों की पहचान, मंदिर की संपत्ति से जुड़े वैधानिक संरक्षणों और कानूनी प्रावधानों को निष्प्रभावी नहीं कर सकती।

कोर्ट द्वारा जारी अंतिम निर्देश और उनका व्यावहारिक प्रभाव

मामले का निपटारा करते हुए हाई कोर्ट ने बिक्री को रद्द करने के फैसले को बरकरार रखा और स्पष्ट किया कि संबंधित भूमि मंदिर के पास ही बनी रहेगी। कोर्ट ने उन सरकारी आदेशों को भी रद्द कर दिया, जिनके माध्यम से अवैध लेन-देन को दोबारा जीवित करने की कोशिश की गई थी।

कोर्ट ने दो टूक कहा कि कोई भी कार्यपालिका आदेश न तो कानून में तय प्रावधानों से ऊपर हो सकता है और न ही कोर्ट के अंतिम निर्णय को निष्प्रभावी कर सकता है।

कोर्ट ने यह भी साफ संदेश दिया कि धार्मिक न्यासों (मंदिर संपत्ति) के मामलों में समय बीत जाने से अवैधता वैध नहीं हो जाती। यदि कोई लेन-देन कानून का उल्लंघन करके किया गया है, तो भले ही वह कई दशकों पुराना क्यों न हो, उसकी जाँच की जा सकती है और उसे निरस्त किया जा सकता है।

निष्कर्ष

यह फैसला इस बात को स्पष्ट करता है कि मंदिर की संपत्ति कोई साधारण सरकारी या प्रशासनिक संपत्ति नहीं होती। यह एक पवित्र न्यास (ट्रस्ट) है, जिसे कानून के अनुसार और श्रद्धालुओं के हित में ही संचालित किया जाना चाहिए। कोर्ट ने लगभग तीन दशक पुराने एक अवैध बिक्री सौदे को रद्द करके यह दोहराया कि HR&CE अधिनियम में जो कानूनी सुरक्षा प्रावधान दिए गए हैं, उनका उद्देश्य मंदिर संपत्तियों को धीरे-धीरे और चुपचाप खत्म होने से बचाना है।

ये प्रावधान इसलिए बनाए गए हैं ताकि प्रक्रियाओं के नाम पर मंदिर की जमीन या संपत्ति का दुरुपयोग न हो सके। इस निर्णय में कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि मंदिर के ट्रस्टी हों या सरकार, सभी देवी-देवता और भक्तों के प्रति जवाबदेह हैं। कोई भी गैरकानूनी काम केवल समय बीत जाने से वैध नहीं बन जाता। यदि कोई लेन-देन कानून के खिलाफ है, तो उसे वर्षों बाद भी रद्द किया जा सकता है।

यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।