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इराक से वेनेजुएला तक हर ऑपरेशन में NYT, WaPo और दूसरे US मीडिया के बड़े चैनल फैलाते रहे प्रोपेगैंडा: करते रहे अमेरिका के लिए काम, जानिए कैसे

US मिलिट्री ने वेनेजुएला के खिलाफ 3 जनवरी 2026 की सुबह, ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिज़ॉल्व नाम का एक बड़ा ऑपरेशन चलाया। इस दौरान US एयरक्राफ्ट ने वेनेजुएला के अहम सैन्य ठिकानों पर गोला-बारूद बरसाए, जबकि डेल्टा फोर्स की एक टीम वेनेजुएला के प्रेसिडेंट निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को पकड़ कर ले गई।

मादुरो और फ्लोरेस को कस्टडी में लेकर वेनेजुएला से न्यूयॉर्क ले जाया गया, और US प्रेसिडेंट ट्रंप ने जल्द ही घोषणा की कि उन पर नार्को-टेररिज्म और दूसरे आपराधिक मामले चलेंगे।

इस ऑपरेशन ने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया, सिर्फ इसलिए नहीं कि यह अचानक हुआ, बल्कि इसलिए कि ये एक देश की संप्रुत्ता के खिलाफ आक्रमण था।

ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिज़ॉल्व में एलीट डेल्टा फोर्स कमांडो, 150 से ज़्यादा एयरक्राफ्ट, एयरस्ट्राइक के अलावा महीनों से CIA द्वारा की जा रही निगरानी का परिणाम था। मादुरो को हथकड़ी पहनाकर US फोर्स द्वारा घुमाए जाने की तस्वीरें दशकों तक लोगों को अमेरिकी दादागिरी की याद दिलाती रहेगी। इसके जियोपॉलिटिकल असर को अभी पूरी तरह से समझना बाकी है।

ट्रंप प्रशासन की दुस्साहस के बीच, कई सवाल उठ रहे हैं। कई देशों ने इस घटना की निंदा की है। मादुरो चाहे कितने भी बड़े तानाशाह क्यों न हों, वह एक आज़ाद देश के मुखिया थे। US का मादुरो को पकड़ना उस आज़ादी की अनदेखी थी।

मजे की बात यह है कि US मीडिया, जो ह्यूमन राइट्स, डेमोक्रेसी और जस्टिस का ग्लोबल चैंपियन है और नियमित रूप से पूरी दुनिया को उपदेश देता है, इस काम की तारीफ कर रहा है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक, US मीडिया के कुछ बड़े मीडिया को मादुरो को पकड़ने के प्लान के बारे में पहले से पता था, लेकिन उन्होंने ‘नेशनल सिक्योरिटी’ के लिए चुप रहना पसंद किया। सेमाफोर की एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट से पता चला है कि NYT और वाशिंगटन पोस्ट दोनों को रेड शुरू होने से पहले ही इसकी जानकारी थी, लेकिन उन्होंने चुप रहना चुना और ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन के ‘रिक्वेस्ट’ पर इसके बारे में कुछ भी पब्लिश करने में देरी की।

NYT और वॉशिंगटन पोस्ट का यह फैसला साफ तौर पर उनकी ‘पत्रकारिता की परंपराओं’ के हिसाब से था। सेमफ़ोर लिखते हैं, “ यह अमेरिकी नेशनल सिक्योरिटी के कुछ सबसे बड़े मुद्दों पर संपर्क और यहाँ तक कि सहयोग की एक अनोखी झलक दिखाता है।”

NYT और वॉशिंगटन पोस्ट ने जो बात मानी है, वह अहम है। असल में USA का पुराना मीडिया पहले दिन से ही ट्रंप के खिलाफ आवाज उठाता रहा है। साथ ही, क्योंकि USA का वही पुराना मीडिया पूरी दुनिया के लिए न्याय, नैतिकता और डेमोक्रेटिक मूल्यों का खुद को उपदेशक बताता है।

लेकिन, ये ​​कोई नई बात नहीं है। ऐसे कई उदाहरण हैं, जब US के पुराने मीडिया ने US प्रोपेगैंडा की तरह काम किया है, US के फ़ायदे के लिए US का ढिंढोरा पीटा है और जब अमेरिका को सबसे अच्छा लगा तो चुप रहा, जबकि वे आम तौर पर बोलने की आज़ादी और मीडिया की आज़ादी के पक्ष में होने का दिखावा करते थे।

बे ऑफ़ पिग्स पर हमला: 1961 में, NYT को कथित तौर पर क्यूबा से निकाले गए लोगों के क्यूबा पर हमला करने के CIA के सपोर्ट वाले प्लान के बारे में पहले से पता था। उस समय के व्हाइट हाउस अधिकारियों के कहने पर, NYT ने पहले पेज की स्टोरी को हल्का कर दिया और CIA के शामिल होने को कम दिखाने की पूरी कोशिश की।

NYT और WaPo का यह फैसला साफ तौर पर उनकी ‘पत्रकारिता की परंपराओं’ के हिसाब से था। सेमफ़ोर लिखते हैं, “ यह अमेरिकी नेशनल सिक्योरिटी के कुछ सबसे बड़े मुद्दों पर सहमति और यहाँ तक कि सहयोग की एक अनोखी झलक दिखाता है।”

NYT और WaPo ने जो बात मानी है, वह ज़रूरी है, क्योंकि असल में USA का पुराना मीडिया पहले दिन से ही ट्रंप के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता रहा है। साथ ही, क्योंकि USA का वही पुराना मीडिया पूरी दुनिया के लिए न्याय, नैतिकता और डेमोक्रेटिक मूल्यों का खुद को उपदेशक बताता है।

हालाँकि, यह बात मानना ​​कोई नई बात नहीं है। ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ US के पुराने मीडिया ने US प्रोपेगैंडा की तरह काम किया है, US के फ़ायदे के लिए US का ढिंढोरा पीटा है और जब व्हाइट हाउस को सबसे अच्छा लगा तो चुप रहा, जबकि वे आम तौर पर बोलने की आज़ादी और मीडिया की आज़ादी के चैंपियन होने का दिखावा करते थे।

बे ऑफ़ पिग्स पर हमला: 1961 में, NYT को कथित तौर पर क्यूबा से निकाले गए लोगों के क्यूबा पर हमला करने के CIA के सपोर्ट वाले प्लान के बारे में पहले से पता था। उस समय के व्हाइट हाउस अधिकारियों के कहने पर, NYT ने पहले पेज की स्टोरी को हल्का कर दिया और CIA के शामिल होने को कम दिखाने की पूरी कोशिश की।

इराक पर US का हमला और ‘बड़े पैमाने पर तबाही मचाने वाले हथियार’ का झूठ: US में पुराने मीडिया ने न सिर्फ व्हाइट हाउस के लिए ‘सीक्रेट कीपर’ का रोल निभाया है, बल्कि वे US सरकार के लिए भी बहुत एक्टिव होकर ढोल पीटने वाले रहे हैं।

2000 के दशक की शुरुआत में, USA में पुराने मीडिया ने दुनिया में हर किसी को उस दशक के सबसे बड़े झूठ के बारे में समझाने के लिए अपने सारे रिसोर्स लगा दिए, कि इराक बड़े पैमाने पर तबाही मचाने वाले हथियार छिपा रहा था, और सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाना बहुत ज़रूरी था।

कवरेज इतना वफ़ादार था कि US मीडिया के बड़े नामों ने कभी भी US सरकार से उन दावों की सच्चाई पर सवाल उठाने की जहमत नहीं उठाई।

उन्होंने इराक में जिन लोगों को सद्दाम हुसैन ने ‘देश निकाला’ दे दिया था, उनके हवाले से अमेरिका ने जो कुछ भी कहा, उसका समर्थन किया। वॉशिंगटन पोस्ट ने तो ऐसी स्टोरीज़ भी चलाईं जिनमें रोकी गई एल्युमिनियम ट्यूब्स को इराक के न्यूक्लियर प्रोग्राम का ‘सबूत’ बताया गया। दूसरे बड़े नाम, जैसे फॉक्स वगैरह, पूरे जोश में देशभक्ति दिखाते हुए चिल्लाने लगे कि USA के लिए इराक पर हमला करना और ‘दुनिया को बचाना’ कितना जरूरी है।

ऊपर दिए गए उदाहरण तो बस एक सैंपल हैं। US मीडिया के बड़े नाम, जैसे NYT और WaPo असल में US सरकार के प्रोपेगैंडा के हथियार रहे हैं। उनका यकीन और पत्रकारिता का स्टैंड अक्सर US की सुविधा, US के हितों और यहाँ तक कि व्हाइट हाउस की शॉर्ट और लॉन्ग टर्म प्राथमिकताओं के मुताबिक होता है।

ऑपरेशन मॉकिंगबर्ड के दौरान, CIA ने कोल्ड वॉर की कहानी बनाने में मदद के लिए पत्रकारों को हायर किया। COVID के सालों में, बड़ी चिंताओं और एक्सपर्ट एनालिसिस के बावजूद, पुराने मीडिया ने बस वही दोहराया जो बाइडेन एडमिनिस्ट्रेशन ने कहा। इसने न सिर्फ लैब-लीक की बात को खारिज कर दिया, बल्कि कुछ नामों को बचाने के लिए गलत जानकारी फैलाने में भी लग गया, वुहान में US सरकार की चल रही गेन-ऑफ-फंक्शन रिसर्च में फौसी और पीटर दासजक के शामिल होने के किसी भी दावे को खारिज कर दिया। साथ ही सभी विरोधियों को झूठा करार दे दिया।

एलन मस्क के ट्विटर, जिसे अब X के नाम से जाना जाता है, को खरीदने के बाद, कई खुलासों ने पूरी दुनिया को बताया कि कैसे बड़े सोशल मीडिया दिग्गज बाइडेन एडमिनिस्ट्रेशन से सीधे ऑर्डर ले रहे थे। यहाँ तक ​​कि अपने ही देश के नागरिकों को गुमराह भी किया जा रहा था।

इन बड़े मीडिया हाउस के विदेशी कवरेज भी US के हितों का ध्यान रखते थे। जबकि दूसरे देशों को ‘पिछड़ा’ करार देते थे। भारत को अक्सर इन मीडिया हाउस ने बदनाम करने की कोशिश की। इसके लिए कैंपेन चलाया गया। भारत अमेरिका की हाँ में हाँ मिलाने के बजाए खुद की फॉरेन पॉलिसी पर चलना जारी रखा। ये अमेरिका को नागवार गुजरा।

इराक, लीबिया, वेनेजुएला, सीरिया जैसे देशों में सरकार बदलने वाले ऑपरेशन्स अमेरिका ने सीधी तौर पर चलाए। इसमें तथाकथित ‘फ्री प्रेस’ का सपोर्ट इन्हें मिला।

शब्दोत्सव: भारत अभ्युदय की वैचारिक क्रांति का प्रारंभ, एक नया साहित्यिक मंच-एक स्पष्ट दिशा

नई दिल्ली के मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम में 02 से 04 जनवरी 2026 तक आयोजित ‘दिल्ली शब्दोत्सव 2026’ केवल तीन दिनों का सांस्कृतिक-साहित्यिक आयोजन नहीं था। यह भारत की सांस्कृतिक और वैचारिक चेतना के पुनर्जागरण का शंखनाद था। दिल्ली सरकार तथा सुरुचि प्रकाशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस महोत्सव ने साहित्यिक उत्सवों की दुनिया में एक नया मानदंड स्थापित किया।

जहाँ दशकों से कुछ साहित्यिक मंचों पर एक विशेष विचारधारा का वर्चस्व रहा है, वहाँ शब्दोत्सव ने राष्ट्रप्रेम, भक्ति, एकता और भारतीयता को केंद्र में रखकर एक वैकल्पिक दृष्टि प्रस्तुत की। यह न जश्न-ए-रेख्ता की नकल था, न जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की, न ही अन्य किसी मौजूदा आयोजन की। यह अपना स्वतंत्र शब्दोत्सव था – एक स्पष्ट दिशा और मंशा वाला मंच।

इस आयोजन की थीम ‘भारत अभ्युदय’ थी, जो वैदिक काल से डिजिटल युग तक भारत की यात्रा का प्रतीक बनी। उद्घाटन समारोह में दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि यह भारत के बौद्धिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का समय है।

मंच से गूँजी राष्ट्रप्रेम और हिंदुत्व की पुकार

शब्दोत्सव की सबसे बड़ी विशेषता थी इसकी स्पष्ट दिशा। यहाँ कोई विभाजनकारी स्वर नहीं गूँजा, कोई देशविरोधी एजेंडा नहीं था। बच्चे और युवा ‘दम मारो दम’ जैसे गीतों पर नहीं, बल्कि श्रीराम, शिव और राधा रानी के भक्ति गीतों पर झूमते नजर आए। साधो बैंड और हंसराज रघुवंशी जैसे कलाकारों की प्रस्तुतियों ने स्टेडियम को भक्ति और देशप्रेम की लहर से भर दिया। लोकगीतों और नृत्यों ने भारतीय संस्कृति की विराटता को जीवंत किया।

कार्यक्रम में शामिल हुए सुनील आंबेकर, दिल्ली मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, दिल्ली मंत्री कपिल मिश्रा और हर्षवर्धन त्रिपाठी

पहले दिन का मुख्य सत्र ‘संघे शक्ति कलियुगे’ था, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने भाग लिया। उन्होंने वंदे मातरम को बंगाल विभाजन के समय का मंत्र बताते हुए कहा कि डॉ. हेडगेवार ने संघ की स्थापना सामाजिक सुधार और एकता के लिए की थी। हिंदुत्व को भारत को एकता के सूत्र में बाँधने वाला बताया। आंबेकर जी ने स्पष्ट किया कि संघ सबसे बड़ा संगठन बनने की लालसा नहीं रखता, बल्कि समाज में समरसता स्थापित करना चाहता है। पंच परिवर्तन के माध्यम से सामाजिक सुधार पर जोर दिया।

शब्दोत्सव में पहुँचे वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु जैन

अन्य सत्रों में न्यायिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर गहन विमर्श हुआ। ‘ऑब्जेक्शन मी लॉर्ड’ सत्र में वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन, विक्रमजीत बनर्जी, अमन लेखी और सिद्धार्थ लूथरा ने भाग लिया। विष्णु शंकर जैन ने मथुरा जन्मभूमि और ज्ञानवापी जैसे मुद्दों पर बात की, साथ ही संविधान में आपातकाल के दौरान जोड़े गए ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्द को सबसे बड़ा छल बताया। अमन लेखी ने हिंदुत्व को विराट विचार करार दिया। विक्रमजीत बनर्जी ने समान नागरिक संहिता की वकालत की।

‘जनरेशन जी: विकसित भारत के सारथी’ सत्र में चंद्रप्रकाश द्विवेदी, विशाल चौरसिया, भाषा संभाली और अभिलिप्सा पांडा जैसे युवा हस्तियों ने भाग लिया। द्विवेदी जी ने प्राचीन युवा नायकों जैसे प्रहलाद और ध्रुव का उदाहरण दिया। विशाल चौरसिया ने आदि शंकराचार्य को पहला इंटरप्रेन्योर बताया। अभिलिप्सा पांडा ने भक्ति और लक्ष्य निर्धारण पर जोर दिया।

कपिल मिश्रा ने बताया- वैचारिक आतंकवाद पर सर्जिकल स्ट्राइक

दिल्ली सरकार के कला, संस्कृति, भाषा एवं पर्यटन मंत्री कपिल मिश्रा की प्रमुख भूमिका रही।। वे इस उत्सव के मुख्य सहयोगी एवं संरक्षक थे। कपिल मिश्रा ने इसे वैचारिक आतंकवाद पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की संज्ञा दी तथा राष्ट्रवाद को मजबूत करने वाले आयोजन के रूप में प्रस्तुत किया।

उन्होंने उद्घाटन समारोह में सक्रिय भागीदारी निभाई तथा युवाओं को नक्सली एवं जिहादी विचारधारा से दूर रखने की बात कही। उन्होंने कहा,

“जब कोई पत्थर उठता है सेना के ऊपर, पुलिस के ऊपर या मंदिर के ऊपर, वो पत्थर हाथ में बाद में आता है दिमाग में पहले आता है। कोई नक्सलवादी, जिहादी जब बंदूक उठाता है या कोई डॉक्टर फट जाता है, तो उनके पास बम हाथ में बाद में दिमाग में पहले आता है। इस वैचारिक आतंकवाद पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की जरूरत है।”

धर्मरक्षक धामी के साथ संवाद

एक सत्र में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी मुख्य अतिथि थे। ‘धर्मरक्षक धामी’ विषय पर संवाद में उन्होंने देवभूमि की सांस्कृतिक चेतना और लैंड जिहाद के खिलाफ कार्रवाई की बात की। 600 से अधिक अवैध ढांचों को हटाने और समान नागरिक संहिता लागू करने का उल्लेख करते हुए कहा कि शब्दोत्सव भारतीय संस्कृति का संवाहक बनेगा।

शब्दोत्सव में शामिल हुए उत्तराखंड मुख्यमंत्री पुष्कर धामी

कुतुब मीनार पर नया विमर्श सनातन विरासत की पुकार

शब्दोत्सव में एक महत्वपूर्ण चर्चा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के पूर्व निदेशक धर्मवीर शर्मा के दावों पर केंद्रित रही। उन्होंने कुतुब मीनार को प्राचीन विष्णु वेदशाला बताया। आधार आयताकार होने, 27 खिड़कियों, दक्षिणायन सूर्य की छाया और छठी शताब्दी के श्लोकों का हवाला देते हुए कहा कि यह सनातन वास्तुकला का प्रमाण है। मरम्मत के दौरान मिली गणेश जी की आकृति जैसे प्रमाणों ने दर्शकों को चकित किया।

इस दावे के बाद काशी के संतों ने माँग उठाई कि कुतुब मीनार सनातनियों को सौंपा जाए और वहाँ भव्य विष्णु मंदिर का निर्माण हो। पातालपुरी मठ के पीठाधीश्वर बालक देवाचार्य महाराज ने कहा कि मुस्लिम शासन में मंदिर तोड़कर संरचनाएँ बनाई गईं, लेकिन आज भी हिंदू देवताओं के चिह्न मौजूद हैं। सरकार से सनातन भावनाओं का सम्मान करने की अपील की। यह विमर्श शब्दोत्सव की वैचारिक गहराई को दर्शाता है, जहाँ इतिहास के मिथकों को तोड़कर नया विमर्श मुखर हुआ।

युवाओं का उत्साह और भविष्य की चुनौती

शब्दोत्सव में युवाओं की बड़ी भागीदारी देखी गई। ओपन माइक ने उन्हें अपनी रचनाएँ प्रस्तुत करने का मंच दिया। दिल्ली-एनसीआर के 40 विश्वविद्यालयों के छात्र-छात्राओं ने उत्साह दिखाया। यह आयोजन साबित करता है कि सोशल मीडिया के युग में भी युवा अपनी जड़ों से जुड़ना चाहते हैं, बशर्ते उन्हें सकारात्मक और राष्ट्रवादी मंच मिले।

शब्दोत्सव में शामिल हुए बड़ी तादाद में लोग

कुछ आलोचक ऐसा कह सकते हैं कि इसके पीछे कोई स्पष्ट योजना या दृष्टि नहीं है। लेकिन यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा। शब्दोत्सव दिशाहीन नहीं है; इसकी दिशा बिल्कुल साफ और स्पष्ट है। जब कोई आयोजन अपनी निर्धारित दिशा में आगे बढ़ता है, तो उस पर विश्वास स्वतः जागृत हो जाता है। यदि चुना हुआ रास्ता सही है, तो यात्रा अवश्य मंजिल तक पहुँचेगी। अभी उत्सव अपनी शैशवावस्था में है।

यदि यह आयोजन बिना बाधा के पाँच वर्ष तक जारी रहता है, तो यह अन्य साहित्यिक उत्सवों के लिए मिसाल बनेगा। लोग जयपुर या अन्य फेस्टिवलों की तुलना शब्दोत्सव से करेंगे।

एक नई शुरुआत, एक मजबूत विकल्प

शब्दोत्सव केवल आयोजन नहीं, बल्कि एक दिशा है। यह साबित करता है कि साहित्य और संस्कृति का उत्सव विभाजनकारी स्वरों के बिना, राष्ट्रप्रेम और भक्ति के साथ मनाया जा सकता है। आने वाले वर्षों में यह अन्य आयोजनों के लिए प्रेरणा और प्रतिस्पर्धी मानक बनेगा। यह किसी की नकल नहीं, बल्कि अपनी स्वतंत्र पहचान वाला मंच है। यदि चुना रास्ता सही है, तो मंजिल अवश्य मिलेगी। शब्दोत्सव भारत अभ्युदय का प्रतीक बनकर उभरा है – एक वैचारिक परिवर्तन का आरंभ।

आयोजन की सफलता में सुरुचि प्रकाशन के प्रमुख राजीव तुली का विशेष योगदान रहा, जिन्होंने समन्वय एवं संगठन की जिम्मेदारी संभाली। इसके अलावा दिल्ली सरकार में विधायक राजकुमार भाटिया, सामाजिक कार्यकर्ता अनिल पांडेय तथा वरिष्ठ पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी ने आयोजन समिति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसमें कार्यक्रमों की रूपरेखा, वक्ताओं का चयन एवं सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का प्रबंधन शामिल था। इनके समर्पित प्रयासों से शब्दोत्सव दिल्ली की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में स्थापित होने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हुआ।

तीन दिनों में 100 से अधिक वक्ताओं ने भाग लिया, 40 से ज्यादा पुस्तकों का विमोचन हुआ, लोकनृत्य, भक्ति संगीत और ओपन माइक जैसे कार्यक्रमों ने युवाओं को आकर्षित किया। हजारों दर्शकों की उपस्थिति ने साबित किया कि राष्ट्रवादी और आध्यात्मिक मूल्यों पर आधारित आयोजन भी व्यापक स्वीकार्यता प्राप्त कर सकता है।

बिहार में किया पैसे देने का विरोध अब खुद ₹3000-₹3000 बाँट रहे स्टालिन, पोंगल गिफ्ट के नाम पर दे रहे पैसा: जानें- कैसे DMK ने ‘रेवड़ी कल्चर’ से बर्बाद की तमिलनाडु की अर्थव्यवस्था

चुनाव आते ही राज्यों में योजनाओं की बाढ़ आ जाती है। तमिलनाडु सरकार ने भी 2026 शुरू होते ही कई योजनाओं का ऐलान कर जनता को ‘खुश’ करने की कोशिश की है। डीएमके सरकार ने नई पेंशन योजना से लेकर पोंगल पर 3000 रुपए नकद, छात्रों को लैपटॉप और परिवार की महिला मुखिया को 1000 रुपए नकद खाते में डालने की योजना का विस्तार करने का ऐलान किया है। मुफ्त की ये योजनाएँ सरकार की नाकामी को छिपाने का अच्छा तरीका है।

INDI गठबंधन ने बिहार चुनाव से ऐन पहले जब महिलाओं के खातों में 10 हजार रुपए डाले थे, तो उसका विरोध किया था, लेकिन डीएमके सरकार जब तमिलनाडु में एक के बाद एक रेवड़ियाँ बाँटती रही है, तो उन्हें ये समाज कल्याण नजर आता है। देश में सबसे ज्यादा सब्सिडी पर खर्च तमिलनाडु में है। इसके अलावा देश में सबसे ज्यादा मुफ्त रेवड़ी देने वाले राज्यों में ये अव्वल है।

यहाँ तक कि सीएम स्टालिन ने बिहार में महिलाओं को 10000 रुपए देने की आलोचना करते हुए इसे ‘वोट खरीदने’ का तरीका बताया था। उनका कहना था कि ये आदर्श चुनाव संहिता का उल्लंघन है। लेकिन चुनाव के ऐन पहले भले ही चुनाव के तारीख का ऐलान नहीं हुआ है, लेकिन ऐन पहले जनता को पोंगल के नाम पर 3000 रुपए हर परिवार को ‘गिफ्ट’ के नाम पर देना और एक अन्य योजना में परिवार की महिला मुखिया को 1000 रुपए देना क्या वोट खरीदने का तरीका नहीं है।

डीएमके ने तमिलनाडु में शुरू किया था मुफ्त रेवड़ी बांटना

तमिलनाडु में डीएमके के संस्थापक अन्नादुरई ने ही 1 रुपए में 1 किलो चावल देने की शुरुआत की थी। लेकिन 2006 में पार्टी ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में कलर टीवी देना का वादा किया। इसका फायदा चुनाव में मिला और डीएमके सत्ता पर काबिज हो गई। इसके बाद मुफ्त की रेवड़ियाँ बांटने की परंपरा चल पड़ी। 2011 में डीएमके ने छात्रों को मुफ्त लैपटॉप देने का वादा किया। 2021 के बाद तो डीएमके ने जमकर रेवड़ियाँ बांटी हैं।

हाल में सीएम स्टालिन ने सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए नई पेंशन योजना लागू करने का ऐलान किया। इसके अलावा पोंगल पर 22 लाख आरसी फैमिली कार्ड धारकों को पोंगल पर 3000 रुपए कैश दिए जाएँगे। इससे पहले पोंगल पर 1 किलो भूरा चावल, 1 किलो चीनी और साबुत गन्ने को बतौर गिफ्ट देने की घोषणा की गई थी।

मुख्यमंत्री स्टालिन चेन्नई में 20 लाख कॉलेज छात्रों को लैपटॉप उपलब्ध कराने की योजना भी शुरू की। पहले चरण में सरकारी इंजीनियरिंग, कला, विज्ञान, चिकित्सा, कृषि, विधि, पॉलिटेक्निक और आईटीआई के 10 लाख छात्र-छात्राओं को लैपटॉप दिया जा रहा है। इस दौरान डेल, एसर, एचपी जैसी बड़ी कंपनियों के लैपटॉप भी छात्रों को दिए जाएँगे।

तमिलनाडु पर देनदारी का बोझ

मुफ्त की योजनाओं पर होने वाला खर्च राजकोषीय घाटे का अहम कारण है। आरबीआई की रिपोर्ट के अनुसार, तमिलनाडु की कुल बकाया देनदारी काफी अधिक हैं। मार्च 2025 के अंत में ₹9,55,690.5 करोड़ की देनदारी का अनुमान लगाया गया था।

मुफ्त की रेवड़ियों का विरोध इसलिए होता है, क्योंकि यह अर्थव्यवस्था पर बोझ डालती हैं। इससे लोगों की न्यूनतम जरूरतें पूरी हो जाती हैं और लोग काम नहीं करने की ओर प्रोत्साहित होते हैं। यही वजह है कि अर्थशास्त्री से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने रेवड़ी कल्चर पर चिंता जताई है और इसे लंबे वक्त के लिए नुकसानदायक बताया है।

दरअसल इससे राजनीतिक लाभ तो सीधा मिलता है, लेकिन राज्य का भला नहीं हो सकता। राज्य पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ उसके आत्मनिर्भर बनने की दिशा में बड़ी बाधा है।

मिटाने की मानसिकता वाले खत्म हो जाते हैं, मंदिर पूरे गौरव के साथ खड़ा: सोमनाथ मंदिर पर हमले के 1000 साल पर PM मोदी, कहा- पुनर्निमाण से उत्साहित नहीं थे नेहरू

सोमनाथ… ये शब्द सुनते ही हमारे मन और हृदय में गर्व और आस्था की भावना भर जाती है। भारत के पश्चिमी तट पर गुजरात में, प्रभास पाटन नाम की जगह पर स्थित सोमनाथ, भारत की आत्मा का शाश्वत प्रस्तुतिकरण है। द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम में भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों का उल्लेख है। ज्योतिर्लिंगों का वर्णन इस पंक्ति से शुरू होता है…”सौराष्ट्रे सोमनाथं च…यानि ज्योतिर्लिंगों में सबसे पहले सोमनाथ का उल्लेख आता है। ये इस पवित्र धाम की सभ्यतागत और आध्यात्मिक महत्ता का प्रतीक है। 

शास्त्रों में ये भी कहा गया है:
“सोमलिङ्गं नरो दृष्ट्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते।
लभते फलं मनोवाञ्छितं मृतः स्वर्गं समाश्रयेत्॥”

अर्थात्, सोमनाथ शिवलिंग के दर्शन से व्यक्ति अपने सभी पापों से मुक्त हो जाता है। मन में जो भी पुण्य कामनाएं होती हैं, वो पूरी होती हैं और मृत्यु के बाद आत्मा स्वर्ग को प्राप्त होती है।

दुर्भाग्यवश, यही सोमनाथ, जो करोड़ों लोगों की श्रद्धा और प्रार्थनाओं का केंद्र था, विदेशी आक्रमणकारियों का निशाना बना, जिनका उद्देश्य विध्वंस था।

वर्ष 2026 सोमनाथ मंदिर के लिए बहुत महत्व रखता है क्योंकि इस महान तीर्थ पर हुए पहले आक्रमण के 1000 वर्ष पूरे हो रहे हैं। जनवरी 1026 में गजनी के महमूद ने इस मंदिर पर बड़ा आक्रमण किया था, इस मंदिर को ध्वस्त कर दिया था। यह आक्रमण आस्था और सभ्यता के एक महान प्रतीक को नष्ट करने के उद्देश्य से किया गया एक हिंसक और बर्बर प्रयास था।

सोमनाथ हमला मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में शामिल है। फिर भी, एक हजार वर्ष बाद आज भी यह मंदिर पूरे गौरव के साथ खड़ा है। साल 1026 के बाद समय-समय पर इस मंदिर को उसके पूरे वैभव के साथ पुन:निर्मित करने के प्रयास जारी रहे। मंदिर का वर्तमान स्वरूप 1951 में आकार ले सका। संयोग से 2026 का यही वर्ष सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूरे होने का भी वर्ष है। 11 मई 1951 को इस मंदिर का पुनर्निर्माण सम्पन्न हुआ था। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में हुआ वो समारोह ऐतिहासिक था, जब मंदिर के द्वार दर्शनों के लिए खोले गए थे।

1026 में एक हजार वर्ष पहले सोमनाथ पर हुए पहले आक्रमण, वहाँ के लोगों के साथ की गई क्रूरता और विध्वंस का वर्णन अनेक ऐतिहासिक स्रोतों में विस्तार से मिलता है। जब इन्हें पढ़ा जाता है तो हृदय काँप उठता है। हर पंक्ति में क्रूरता के निशान मिलते हैं, ये ऐसा दुःख है जिसकी पीड़ा इतने समय बाद भी महसूस होती है।

हम कल्पना कर सकते हैं कि इसका उस दौर में भारत पर और लोगों के मनोबल पर कितना गहरा प्रभाव पड़ा होगा। सोमनाथ मंदिर का आध्यात्मिक महत्व बहुत ज्यादा था। ये बड़ी संख्या में लोगों को अपनी ओर खींचता था। ये एक ऐसे समाज की प्रेरणा था जिसकी आर्थिक क्षमता भी बहुत सशक्त थी। हमारे समुद्री व्यापारी और नाविक इसके वैभव की कथाएं दूर-दूर तक ले जाते थे।

सोमनाथ पर हमले और फिर गुलामी के लंबे कालखंड के बावजूद आज मैं पूरे विश्वास के साथ और गर्व से ये कहना चाहता हूं कि सोमनाथ की गाथा विध्वंस की कहानी नहीं है। ये पिछले 1000 साल से चली आ रही भारत माता की करोड़ों संतानों के स्वाभिमान की गाथा है, ये हम भारत के लोगों की अटूट आस्था की गाथा है।

1026 में शुरू हुई मध्यकालीन बर्बरता ने आगे चलकर दूसरों को भी बार-बार सोमनाथ पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया। यह हमारे लोगों और हमारी संस्कृति को गुलाम बनाने का प्रयास था। लेकिन हर बार जब मंदिर पर आक्रमण हुआ, तब हमारे पास ऐसे महान पुरुष और महिलाएं भी थीं जिन्होंने उसकी रक्षा के लिए खड़े होकर सर्वोच्च बलिदान दिया। और हर बार, पीढ़ी दर पीढ़ी, हमारी महान सभ्यता के लोगों ने खुद को संभाला, मंदिर को फिर से खड़ा किया और उसे पुनः जीवंत किया।

महमूद गजनवी लूटकर चला गया लेकिन सोमनाथ के प्रति हमारी भावना को हमसे छीन नहीं सका। सोमनाथ से जुड़ी हमारी आस्था, हमारा विश्वास और प्रबल हुआ। उसकी आत्मा लाखों श्रद्धालुओं की भीतर साँस लेती रही। साल 1026 के हजार साल बाद आज 2026 में भी सोमनाथ मंदिर दुनिया को संदेश दे रहा है, कि मिटाने की मानसिकता रखने वाले खत्म हो जाते हैं जबकि सोमनाथ मंदिर आज हमारे विश्वास का मजबूत आधार बनकर खड़ा है। वो आज भी हमारी प्रेरणा का स्रोत है, वो आज भी हमारी शक्ति का पुंज है।

ये हमारा सौभाग्य है कि हमने उस धरती पर जीवन पाया है, जिसने देवी अहिल्याबाई होलकर जैसी महान विभूति को जन्म दिया। उन्होंने ये सुनिश्चित करने का पुण्य प्रयास किया कि श्रद्धालु सोमनाथ में पूजा कर सकें।

1890 के दशक में स्वामी विवेकानंद भी सोमनाथ आए थे, वो अनुभव उन्हें भीतर तक आंदोलित कर गया। 1897 में चेन्नई में दिए गए एक व्याख्यान के दौरान उन्होंने अपनी भावना व्यक्त की।

उन्होंने कहा, “दक्षिण भारत के प्राचीन मंदिर और गुजरात के सोमनाथ जैसे मंदिर आपको ज्ञान के अनगिनत पाठ सिखाएँगे। ये आपको किसी भी संख्या में पढ़ी गई पुस्तकों से अधिक हमारी सभ्यता की गहरी समझ देंगे। इन मंदिरों पर सैकड़ों आक्रमणों के निशान हैं, और सैकड़ों बार इनका पुनर्जागरण हुआ है। ये बार बार नष्ट किए गए और हर बार अपने ही खंडहरों से फिर खड़े हुए। पहले की तरह सशक्त। पहले की तरह जीवंत। यही राष्ट्रीय मन है, यही राष्ट्रीय जीवन धारा है। इसका अनुसरण आपको गौरव से भर देता है। इसको छोड़ देने का मतलब है, मृत्यु। इससे अलग हो जाने पर विनाश ही होगा।”

ये सर्वविदित है कि आजादी के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का पवित्र दायित्व सरदार वल्लभभाई पटेल के सक्षम हाथों में आया। उन्होंने आगे बढ़कर इस दायित्व के लिए कदम बढ़ाया। 1947 में दीवाली के समय उनकी सोमनाथ यात्रा हुई। उस यात्रा के अनुभव ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया, उसी समय उन्होंने घोषणा की कि यहीं सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण होगा। अंततः 11 मई 1951 को सोमनाथ में भव्य मंदिर के द्वार श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए।

उस अवसर पर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद उपस्थित थे। महान सरदार साहब इस ऐतिहासिक दिन को देखने के लिए जीवित नहीं थे लेकिन उनका सपना राष्ट्र के सामने साकार होकर भव्य रूप में उपस्थित था।

तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू इस घटना से अधिक उत्साहित नहीं थे। वो नहीं चाहते थे कि माननीय राष्ट्रपति और मंत्री इस समारोह का हिस्सा बनें। उन्होंने कहा कि इस घटना से भारत की छवि खराब होगी लेकिन राजेंद्र बाबू अडिग रहे, और फिर जो हुआ, उसने एक नया इतिहास रच दिया।

सोमनाथ मंदिर का कोई भी उल्लेख के.एम. मुंशी जी के योगदानों को याद किए बिना अधूरा है। उन्होंने उस समय सरदार पटेल का प्रभावी रूप से समर्थन किया था। सोमनाथ पर उनका कार्य, विशेष रूप से उनकी पुस्तक ‘सोमनाथ, द श्राइन इटरनल’ अवश्य पढ़ी जानी चाहिए।

जैसा कि मुंशी जी की पुस्तक के शीर्षक से स्पष्ट होता है, हम एक ऐसी सभ्यता हैं जो आत्मा और विचारों की अमरता में अटूट विश्वास रखती है। हम विश्वास करते हैं- नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। सोमनाथ का भौतिक ढांचा नष्ट हो गया लेकिन उसकी चेतना अमर रही।

इन्हीं विचारों ने हमें हर कालखंड में, हर परिस्थिति में फिर से उठ खड़े होने, मजबूत बनने और आगे बढ़ने का सामर्थ्य दिया है। इन्हीं मूल्यों और हमारे लोगों के संकल्प की वजह से आज भारत पर दुनिया की नजर है। दुनिया भारत को आशा और विश्वास की दृष्टि से देख रही है। वो हमारे इनोवेटिव युवाओं में निवेश करना चाहती है। हमारी कला, हमारी संस्कृति, हमारा संगीत और हमारे अनेक पर्व आज वैश्विक पहचान बना रहे हैं। योग और आयुर्वेद जैसे विषय पूरी दुनिया में प्रभाव डाल रहे हैं। ये स्वस्थ जीवन को बढ़ावा दे रहे हैं। आज कई वैश्विक चुनौतियों के समाधान के लिए दुनिया भारत की ओर देख रही है।

अनादि काल से सोमनाथ जीवन के हर क्षेत्र के लोगों को जोड़ता आया है। सदियों पहले जैन परंपरा के आदरणीय मुनि कलिकाल सर्वज्ञ हेमचंद्राचार्य यहाँ आए थे और कहा जाता है कि प्रार्थना के बाद उन्होंने कहा कि वबीजाङ्कुरजनना रागाद्याः क्षयमुपगता यस्य। अर्थात्, उस परम तत्व को नमन जिसमें सांसारिक बंधनों के बीज नष्ट हो चुके हैं। जिसमें राग और सभी विकार शांत हो गए हैं।

आज भी दादा सोमनाथ के दर्शन से ऐसी ही अनुभूति होती है। मन में एक ठहराव आ जाता है, आत्मा को अंदर तक कुछ स्पर्श करता है, जो अलौकिक है, अव्यक्त है।

1026 के पहले आक्रमण के एक हजार वर्ष बाद 2026 में भी सोमनाथ का समुद्र उसी तीव्रता से गर्जना करता है और तट को स्पर्श करती लहरें उसकी पूरी गाथा सुनाती हैं। उन लहरों की तरह सोमनाथ बार-बार उठता रहा है।

अतीत के आक्रमणकारी आज समय की धूल बन चुके हैं। उनका नाम अब विनाश के प्रतीक के तौर पर लिया जाता है। इतिहास के पन्नों में वे केवल फुटनोट हैं, जबकि सोमनाथ आज भी अपनी आशा बिखेरता हुआ प्रकाशमान खड़ा है। सोमनाथ हमें ये बताता है कि घृणा और कट्टरता में विनाश की विकृत ताकत हो सकती है, लेकिन आस्था में सृजन की शक्ति होती है। करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए सोमनाथ आज भी आशा का अनंत नाद है। ये विश्वास का वो स्वर है, जो टूटने के बाद भी उठने की प्रेरणा देता है।

अगर हजार साल पहले खंडित हुआ सोमनाथ मंदिर अपने पूरे वैभव के साथ फिर से खड़ा हो सकता है, तो हम हजार साल पहले का समृद्ध भारत भी बना सकते हैं। आइए, इसी प्रेरणा के साथ हम आगे बढ़ते हैं। एक नए संकल्प के साथ, एक विकसित भारत के निर्माण के लिए। एक ऐसा भारत, जिसका सभ्यतागत ज्ञान हमें विश्व कल्याण के लिए प्रयास करते रहने की प्रेरणा देता है।

जय सोमनाथ!

(प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह लेख अपने ब्लॉग पर लिखा है, आप इस लिंक पर क्लिक कर इसे पढ़ सकते हैं)

‘भारत के सबसे स्वच्छ शहर’ से हेल्थ इमरजेंसी तक: जानें- इंदौर में कैसे दूषित जल ने लोगों की सेहत पर खड़ा किया संकट

कई वर्षों से भारत का सबसे स्वच्छ शहर होने का खिताब जीत रहा मध्य प्रदेश का इंदौर 2026 की शुरुआत में गंभीर स्वास्थ्य संकट की स्थिति में पहुँच गया है। जिले के भगीरथपुरा इलाके में पानी दूषित होने के कारण कम से कम 15 लोगों की मौत हो चुकी है और 200 से ज्यादा लोग अब भी अस्पतालों में भर्ती हैं।

लोगों ने बताया कि नगर निगम के नल से आने वाला पानी बदबू मार रहा था और दिखने में भी गंदा था। इसी पानी को पीने के बाद लोगों की तबीयत खराब होने लगी। बीमार लोगों में उल्टी, दस्त, बुखार और शरीर में पानी की कमी जैसे लक्षण देखे गए। दूषित पानी पीने की वजह से यह बीमारी तेजी से फैली और कई लोगों को इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।

संकट कैसे बढ़ा: जानें पूरी टाइमलाइन

दिसंबर 2025 के मध्य में सबसे पहले भगीरथपुरा इलाके के लोगों को अपने नल के पानी में गड़बड़ी महसूस हुई। करीब 15 हजार आबादी वाले इस इलाके में नल का पानी रंग बदला हुआ था, उसमें सीवर जैसी बदबू आ रही थी और स्वाद भी कड़वा था। लोगों ने नगर निगम के अधिकारियों से लगातार शिकायत की लेकिन समय पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। 25 दिसंबर तक भी मजबूरी में कई परिवार इसी पानी का इस्तेमाल खाना बनाने और पीने के लिए करते रहे।

27 और 28 दिसंबर को हालात तेजी से बिगड़ गए। दूषित पानी पीने से लोगों को पेट से जुड़ी गंभीर बीमारियाँ होने लगीं। स्थानीय क्लीनिकों में कमजोरी और डिहाइड्रेशन से जूझते मरीज पहुँचने लगे। इसके बाद स्वास्थ्य विभाग की टीमों ने घर-घर जाकर जाँच करनी शुरू की। इसके बाद 29 दिसंबर को मामलों में अचानक भारी बढ़ोतरी हुई। मेयर पुष्यमित्र भार्गव ने बताया कि खराब पानी से फैले दस्त के कारण कम से कम तीन लोगों की मौत हुई जबकि बड़ी संख्या में मरीजों को बड़े अस्पतालों में भर्ती कराया गया।

30 दिसंबर तक 100 से ज्यादा लोगों को अस्पताल में भर्ती करना पड़ा और रिपोर्ट्स के अनुसार कुल मिलाकर 1,100 से ज्यादा लोग बीमार हो चुके थे। मरीजों के लक्षण साफ तौर पर पानी से फैलने वाली बीमारियों की ओर इशारा कर रहे थे। इसके बाद घर-घर सर्वे और तेज कर दिए गए। 31 दिसंबर तक मौतों की संख्या को लेकर स्थिति साफ नहीं थी। अधिकारियों ने 4 से 7 मौतों की बात कही जबकि कुछ परिवारों ने छह महीने के एक बच्चे की मौत को भी उसी दूषित पानी से बने दूध से जोड़कर देखा।

राज्य सरकार ने मृतकों के परिजन को 2 लाख रुपए मुआवजा देने की घोषणा की। प्रशासनिक स्तर पर भी कार्रवाई हुई। एक जोनल अधिकारी और एक सहायक इंजीनियर को निलंबित किया गया जबकि एक सब-इंजीनियर को बर्खास्त कर दिया गया।

1 और 2 जनवरी को लैब की रिपोर्ट से स्थिति पूरी तरह साफ हुई। पानी की सप्लाई में ई. कोलाई, साल्मोनेला और विब्रियो कॉलरा जैसे खतरनाक बैक्टीरिया पाए गए। जाँच में पता चला कि पास के पुलिस चौकी के नजदीक एक सार्वजनिक शौचालय के नीचे से गुजर रही करीब 30 साल पुरानी पाइपलाइन टूट गई थी, जिससे सीवर का गंदा पानी सप्लाई लाइन में मिल गया।

इसके बाद टूटी पाइपलाइन को ठीक किया गया, उस हिस्से को अलग कर सफाई का काम शुरू हुआ। इलाके में रोजाना 20 से ज्यादा टैंकरों से साफ पानी की आपूर्ति की गई। अधिकारियों ने लोगों को सलाह दी कि जाँच पूरी तरह साफ होने तक नल का पानी उबालकर ही इस्तेमाल करें या उसका उपयोग न करें। कुल मिलाकर 1,400 से 2,000 लोग इस संकट से प्रभावित हुए और लोगों को राज्यभर में पानी की व्यवस्था को ठीक करने का का भरोसा दिया गया।

NHRC ने लिया संज्ञान

1 जनवरी 2026 को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने मीडिया में आई खबरों के आधार पर इस मामले का स्वतः संज्ञान लिया। आयोग ने कहा कि अगर खबरें सही हैं, तो यह पीड़ितों के स्वास्थ्य और जीवन के अधिकार का गंभीर उल्लंघन है। एनएचआरसी ने मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव को नोटिस जारी करते हुए दो हफ्ते के भीतर पूरी रिपोर्ट माँगी है। आयोग ने माना कि इस तरह की लापरवाही ने लोगों उनमें भी खासकर कमजोर वर्गों के ‘सुरक्षित जीवन’ के अधिकार को नुकसान पहुँचाया है।

जल जीवन मिशन की रिपोर्ट से बढ़ी चिंता

इसी बीच केंद्र सरकार की जल जीवन मिशन के तहत जारी एक नई रिपोर्ट ने मध्य प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में पेयजल की स्थिति को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। रविवार (4 जनवरी 2026) को जारी इस रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण क्षेत्रों से लिए गए पानी के सैंपल में से 36.7% पीने के लायक नहीं पाए गए। यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है, जब इंदौर में शहर की जल आपूर्ति से जुड़ी समस्या के कारण अब तक 15 मौतों की पुष्टि हो चुकी है।

इंदौर जिले के ग्रामीण इलाकों में केवल 33% घरों तक ही सुरक्षित पीने का पानी पहँच रहा है और यह तय मानकों से काफी कम है। कुछ जिलों जैसे अलीराजपुर में स्थिति बेहतर रही और 100% घरों में पानी मिला जबकि अनूपपुर में यह आँकड़ा शून्य रहा। ग्वालियर में 20.9%, मुरैना में 25.2% घरों को ही पीने लायक पानी मिला। भोपाल में यह आँकड़ा 56.9% और जबलपुर में 54.3% रहा।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि करीब 23.4% घरों को नियमित जल आपूर्ति नहीं मिल रही थी। जाँच के दौरान 36.7 प्रतिशत जगहों पर नल खराब पाए गए। हालाँकि सिर्फ 3.7% लोगों ने पानी के स्वाद की शिकायत की लेकिन 22% लोगों ने कहा कि उन्हें पर्याप्त मात्रा में पानी नहीं मिलता।

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की चेतावनियाँ वर्षों तक रहीं अनसुनी

यह संकट अचानक नहीं आया। मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने साल 2016-17 में इंदौर में 60 जगहों पर भूजल की जाँच की थी, जिनमें भगीरथपुरा भी शामिल था। जाँच में लगभग सभी जगहों पर टोटल कोलिफॉर्म बैक्टीरिया की मात्रा 100 मिलीलीटर में 10 MPN से ज्यादा पाई गई। यह साफ संकेत था कि खराब पाइपलाइन और ड्रेनेज के जरिए मल-मूत्र से जुड़ा सीवर का पानी पीने के पानी में मिल रहा है।

बोर्ड ने इंदौर नगर निगम को साफ निर्देश दिए थे कि इन हैंडपंपों और कुओं को असुरक्षित घोषित किया जाए, वहाँ चेतावनी बोर्ड लगाए जाएँ और सीवर के पानी को सप्लाई लाइन में मिलने से रोका जाए। इसके बावजूद शहर के बड़े हिस्से में लगातार दिक्कतें बनी रहीं।

इंदौर की जल व्यवस्था पर चिंता 2019 में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट में भी सामने आई थी। यह रिपोर्ट इंदौर और भोपाल के जल प्रबंधन पर थी। इसमें बताया गया कि 2004 में एशियन डेवलपमेंट बैंक से 200 मिलियन डॉलर का कर्ज मंजूर किया गया था ताकि भोपाल, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर में पानी और स्वच्छता ढाँचे को सुधारा जा सके और सभी को साफ व नियमित पानी मिले।

2019 की कैग रिपोर्ट ने हालात की पोल खोल दी। रिपोर्ट के मुताबिक, इंदौर में रोजाना सिर्फ 4 जोन में ही पानी की सप्लाई होती थी, जबकि भोपाल में यह संख्या 5 जोन तक सीमित थी। कुल 9.41 लाख परिवारों में से करीब 5.30 लाख परिवारों के पास ही नल कनेक्शन था।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि पानी की लीकेज ठीक करने में 22 से लेकर 108 दिन तक लग जाते थे। साल 2013 से 2018 के बीच 4,481 पानी के सैंपल खराब पाए गए। इसी दौरान भोपाल में 3.62 लाख और इंदौर में 5.33 लाख परिवारों को साफ पानी नहीं मिला। इन वर्षों में पानी से फैलने वाली बीमारियों के करीब 5.45 लाख मामले दर्ज हुए।

पानी की भारी बर्बादी भी सामने आई। नगर निकायों की टैक्स वसूली भी कमजोर रही और बकाया राशि 470 करोड़ रुपए तक पहुँच गई। पानी की उपलब्धता भी बेहद कम थी। भोपाल में प्रति व्यक्ति रोजाना सिर्फ 9 से 20 लीटर और इंदौर में 36 से 62 लीटर पानी की सप्लाई हो रही थी।

कैग रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि पानी की टंकियों की नियमित सफाई नहीं होती थी और न ही पानी की बर्बादी रोकने के लिए कोई ऑडिट किया गया। विशेषज्ञों ने इसे आपराधिक लापरवाही बताया। उनका कहना है कि सीवर लाइनों को पीने के पानी की पाइपलाइनों के बेहद पास और लापरवाही से बिछाया गया। एक सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा कि अगर सिर्फ एक भी पाइपलाइन सही हालत में होती, तो शायद किसी की जान नहीं जाती।

सरकारी कार्रवाई और आधिकारिक प्रतिक्रिया

मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इस पूरे मामले की जिम्मेदारी लेते हुए X पर सख्त कार्रवाई की जानकारी दी। उन्होंने इंदौर नगर निगम आयुक्त और अतिरिक्त आयुक्त को कारण बताओ नोटिस जारी करने के आदेश दिए। साथ ही अतिरिक्त आयुक्त को पद से हटा दिया गया और जल कार्य विभाग के अधीक्षण अभियंता (सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर) को भी उनके पद से हटा दिया गया। खाली हुए पदों पर तुरंत अधिकारियों की तैनाती कर व्यवस्था सुधारने के निर्देश दिए गए।

31 दिसंबर को शुरुआती स्तर पर ही मृतकों के परिजनों को 2 लाख रुपए मुआवजा देने की घोषणा की गई। मुख्य चिकित्सा अधिकारी माधव प्रसाद हसानी ने कहा कि मरीजों को बेहतर से बेहतर इलाज देना सरकार की प्राथमिकता है। दूषित पाइपलाइन को तुरंत ठीक किया गया और रोजाना 20 से ज्यादा टैंकरों के जरिए सुरक्षित पानी की सप्लाई शुरू की गई। घर-घर जाकर जाँच करने पर सैकड़ों नए मरीज सामने आए जबकि अस्पतालों में अब भी करीब 200 मरीज भर्ती हैं और उनका इलाज जारी है।

हसानी ने ANI से कहा, “फिलहाल वरिष्ठ डॉक्टर और जिला प्रशासन के अधिकारी लगातार अस्पतालों में हालात पर नजर रखे हुए हैं और यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि मरीजों को सही इलाज मिले। अभी रिकॉर्ड के अनुसार चार मौतें हुई हैं। हालाँकि, अगर आगे कोई अतिरिक्त डेटा या सबूत मिलता है तो आँकड़ों को अपडेट किया जाएगा।”

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में श्रीति सागर ने लिखी है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।)

सबसे बड़ा तेल भंडार और बेशुमार दौलत, फिर महँगाई-भुखमरी-पलायन के दलदल में जा धँसा वेनेजुएला: जानें- कैसे वामपंथ और रेवड़ी पॉलिटिक्स ने किया बर्बाद

आज वेनेजुएला की तस्वीरें देखकर यह यकीन करना मुश्किल होता है कि यही देश कभी दुनिया के सबसे अमीर देशों में गिना जाता था। जिस देश के पास पृथ्वी का सबसे बड़ा कच्चे तेल का भंडार है, वहाँ लोग खाने के लिए लाइन में खड़े हैं, अस्पतालों में दवाएँ नहीं हैं और लाखों लोग जान जोखिम में डालकर देश छोड़ चुके हैं। यह तबाही किसी युद्ध, विदेशी कब्जे या प्राकृतिक आपदा का नतीजा नहीं है। यह एक ऐसी आर्थिक और राजनीतिक विफलता है, जिसे आधुनिक इतिहास में बिना युद्ध के ‘सबसे बड़ा आर्थिक पतन’ माना जा सकता है।

वेनेजुएला की कहानी यह समझने का मौका देती है कि कैसे वामपंथी विचारधारा, लोकलुभावन राजनीति और मुफ्तखोरी पर आधारित नीतियाँ किसी भी देश को अंदर से खोखला कर सकती हैं, चाहे उसके पास कितनी ही प्राकृतिक संपदा क्यों न हो। कभी यहाँ के लोग वीकेंड पर शॉपिंग करने के लिए प्लेन से सीधे मियामी जाते थे। यहीं नहीं वेनेजुएला को दुनिया के सबसे महँगे स्कॉच व्हिस्की और शैंपेन के सबसे बड़े खरीदार में से एक माना जाता था।

जब वेनेजुएला था लैटिन अमेरिका का सबसे अमीर देश

बीसवीं सदी के मध्य तक वेनेजुएला विकास और समृद्धि का प्रतीक था। 1950 के दशक में जब यूरोप और एशिया के कई देश दूसरे विश्व युद्ध के बाद दोबारा खड़े होने की कोशिश कर रहे थे, तब वेनेजुएला तेल की बदौलत आर्थिक ऊँचाइयों को छू रहा था।

1952 तक यह देश दुनिया का चौथा सबसे अमीर राष्ट्र बन चुका था। कराकस की सड़कों पर अमेरिकी और यूरोपीय शहरों जैसी चमक दिखती थी। आधुनिक इमारतें, शानदार इंफ्रास्ट्रक्चर और बेहतरीन जीवनशैली आम बात थी।

उस दौर में वेनेजुएला की प्रति व्यक्ति आय कई विकसित यूरोपीय देशों से ज्यादा थी। देश में यह धारणा बनने लगी थी कि तेल एक ऐसा वरदान है जो कभी खत्म नहीं होगा। यही सोच आगे चलकर सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुई।

तेल की दौलत और भविष्य को नजरअंदाज करने की आदत

1960 के दशक में वेनेजुएला ने वैश्विक तेल राजनीति में अपनी ताकत दिखाई और सऊदी अरब व ईरान जैसे देशों के साथ मिलकर OPEC की स्थापना में अहम भूमिका निभाई। 1970 के दशक में जब दुनिया तेल संकट से जूझ रही थी और कीमतें रिकॉर्ड ऊँचाई पर थीं, तब वेनेजुएला के खजाने में डॉलर की बाढ़ आ गई।

इसी दौर में वेनेजुएला ने एक गंभीर गलती कर दी। उसने यह मान लिया कि तेल ही उसकी तकदीर है और बाकी आर्थिक क्षेत्रों पर ध्यान देना जरूरी नहीं है। खेती, मैन्युफैक्चरिंग और निर्यात आधारित उद्योग धीरे-धीरे हाशिए पर चले गए। देश आयात पर निर्भर होता गया। पैसे की भरमार थी तो खाने से लेकर रोजमर्रा की जरूरतों तक के लिए विदेशी सामान मँगाया जाने लगा।

तेल की आसान कमाई ने मेहनत और सुधार की जरूरत को खत्म कर दिया। यही वह स्थिति थी जिसे अर्थशास्त्र में ‘डच डिजीज’ कहा जाता है, जहाँ एक सेक्टर इतना हावी हो जाता है कि पूरी अर्थव्यवस्था असंतुलित हो जाती है।

1999 के बाद का मोड़: वामपंथ और लोकलुभावन राजनीति

1999 में ह्यूगो चावेज के सत्ता में आने के साथ ही वेनेजुएला की राजनीति और अर्थव्यवस्था ने एक नया मोड़ लिया। चावेज ने समाजवादी और वामपंथी मॉडल को अपनाया और खुद को गरीबों का रक्षक घोषित किया। तेल से होने वाली कमाई को उन्होंने सामाजिक योजनाओं और सब्सिडी में झोंक दिया।

पेट्रोल इतना सस्ता कर दिया गया कि वह लगभग मुफ्त हो गया। बिजली और दूसरी सेवाओं पर भारी सब्सिडी दी गई। शुरुआत में इन नीतियों से गरीबी में कमी आई और चावेज बेहद लोकप्रिय हो गए। लेकिन यह लोकप्रियता टिकाऊ विकास पर नहीं बल्कि मुफ्त सुविधाओं पर आधारित थी।

सबसे बड़ी समस्या यह थी कि सरकार ने अच्छे समय में बुरे समय के लिए कोई तैयारी नहीं की। तेल की कमाई को बचाने या निवेश करने के बजाय उसे तुरंत खर्च कर दिया गया। यह रेवड़ी पॉलिटिक्स थी, जिसमें वर्तमान की लोकप्रियता के लिए भविष्य को गिरवी रख दिया गया।

निजी सेक्टर से दुश्मनी और संस्थागत तबाही

चावेज और बाद में निकोलस मादुरो की सरकारों ने निजी उद्योग और बाजार को शोषण का प्रतीक बताया। हजारों कंपनियों और लाखों हेक्टेयर जमीन का राष्ट्रीयकरण किया गया। कई बार यह सब बिना किसी मुआवजे के हुआ। इससे निवेशकों का भरोसा पूरी तरह टूट गया।

सरकार ने कीमतों और मुनाफे पर नियंत्रण लगाया। रोजमर्रा के सामान की कीमतें सरकारी आदेश से तय होने लगीं। नतीजा यह हुआ कि कंपनियों के लिए लागत निकालना मुश्किल हो गया। उत्पादन घटा, बाजार में सामान की कमी हुई और ब्लैक मार्केट फलने-फूलने लगा।

निजी सेक्टर के कमजोर होने से रोजगार खत्म हुए और देश की उत्पादन क्षमता लगभग ठप हो गई। वेनेजुएला, जो कभी कई कृषि उत्पादों का निर्यातक था, अब आयात पर पूरी तरह निर्भर हो गया।

PDVSA: जब राजनीति ने विशेषज्ञता को कुचल दिया

वेनेजुएला की सरकारी तेल कंपनी PDVSA कभी दुनिया की सबसे कुशल तेल कंपनियों में गिनी जाती थी। लेकिन वामपंथी शासन में इसे भी राजनीतिक नियंत्रण में ले लिया गया। अनुभवी इंजीनियरों और तकनीकी विशेषज्ञों को हटाकर राजनीतिक रूप से वफादार लोगों को नियुक्त किया गया।

तेल उद्योग में जरूरी निवेश और मेंटेनेंस को नजरअंदाज किया गया। इसका असर धीरे-धीरे दिखने लगा। उत्पादन गिरता चला गया और इंफ्रास्ट्रक्चर जर्जर होता गया। जिस देश की पहचान तेल थी, वही तेल निकालने की क्षमता खोने लगा।

तेल की कीमत गिरी और ढह गई झूठी समृद्धि

2014 में जब वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें अचानक गिर गईं, तब वेनेजुएला पूरी तरह असुरक्षित था। जिन देशों ने अच्छे समय में बचत की थी, वे इस झटके को झेल पाए। वहीं वेनेजुएला ने सब पैसा उड़ा दिया था और ऊपर से भारी कर्ज भी ले रखा था।

इस संकट से उबरने के लिए सरकार को सुधार करने चाहिए थे लेकिन उसने इसके बजाय आसान और खतरनाक रास्ता चुना। घाटा पूरा करने के लिए केंद्रीय बैंक से नोट छपवाए जाने लगे। इससे मुद्रा की कीमत तेजी से गिरने लगी।

हाइपरइन्फ्लेशन: जब पैसा खो बैठा अपनी कीमत

नोट छापने का नतीजा हाइपरइन्फ्लेशन (बहुत तेजी से बढ़ती महँगाई) के रूप में सामने आया। कीमतें इतनी तेजी से बढ़ने लगीं कि लोगों की सैलरी और बचत बेकार हो गई। एक समय ऐसा आया जब लोग सामान खरीदने के लिए नोट गिनते नहीं थे, बल्कि तौलते थे। मध्यम वर्ग पूरी तरह तबाह हो गया। गरीबी इतनी बढ़ी कि लाखों लोग देश छोड़कर पड़ोसी देशों की ओर पलायन करने लगे। यह आधुनिक इतिहास का सबसे बड़ा शांतिपूर्ण पलायन बन गया।

अमेरिकी प्रतिबंध और पहले से टूटी अर्थव्यवस्था: दुनिया को बड़ा सबक

2019 के बाद अमेरिका ने वेनेजुएला और उसकी तेल कंपनी पर सख्त प्रतिबंध लगाए। इससे हालात और बिगड़े, जब वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था को संभालने जाने की जरूरत थी तब अमेरिकी ने उसे और गर्त में पहुँचाने का काम किया। यानी पहले से गिरे वेनेजुएला को एक और लात अमेरिका ने मार दी।

वेनेजुएला आज अपनी 80 प्रतिशत से ज्यादा अर्थव्यवस्था खो चुका है। यह कहानी बताती है कि प्राकृतिक संसाधन किसी देश को अमीर नहीं बनाते, बल्कि सही नीतियाँ और मजबूत संस्थाएँ बनाती हैं। वामपंथी लोकलुभावन वाद और रेवड़ी पॉलिटिक्स अल्पकाल में लोकप्रिय हो सकती हैं लेकिन लंबी अवधि में देश को बर्बाद कर देती हैं। वेनेजुएला की त्रासदी एक चेतावनी है कि अगर नीति, अनुशासन और संस्थागत संतुलन खत्म हो जाए, तो समृद्ध से समृद्ध देश भी भूखा हो सकता है।

पालतू जानवरों की जासूसी, 150 प्लेन से अटैक और मादुरो को बेडरूम से घसीटकर निकाला: जानें- कैसे US की डेल्टा फोर्स ने दिया ‘ऑपरेशन ऐब्सोल्यूट रिजोल्व’ को अंजाम, Live निगरानी करते रहे ट्रंप

अमेरिका ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो के घर के अंदर की खबर से लेकर देश के अहम ठिकानों और लोगों की महीनों से जासूसी की गई। ऑपरेशन के दौरान सीआईए की एक सीक्रेट टीम वेश बदलकर वेनेजुएला में दाखिल हुई। मादुरों की डेली रूटीन पर नजर रखना, उनसे जुड़ी हर छोटी-बड़ी बात की जानकारी ले रही थी।

ये रोजाना रूटीन को ट्रैक करते, सुबह कहाँ जाते हैं मादुरो, किससे मिलते हैं। कब क्या करते हैं। यहाँ तक कि उनके घर के कुत्ते-बिल्लियों की आदतों की भी जानकारी ली गई।
घर से लेकर बाहर तक की हर जानकारी लेने के लिए अमेरिकी जासूस काराकस की गलियों में छिप कर रह रहे थे। आसमान से भी कई अमेरिकी स्टेल्थ ड्रोन उड़ते रहते, जो वीडियो और फोटो भेजते थे। 2019 में अमेरिका और वेनेजुएला के रिश्तों में इतनी खटास आ गई थी कि अमेरिका ने अपना दूतावास वहाँ बंद कर दिया था। वेनेजुएला का दूतावास भी अमेरिका में बंद किया गया था। ऐसे में जासूस अगर पकड़े जाते, तो मौत निश्चित थी।

मादुरों का करीबी एक ऐसा व्यक्ति था, जो अमेरिका को पूरी खबर देता था। मादुरो को पकड़ने की जिम्मेदारी अमेरिका के सबसे खतरनाक और स्पेशल यूनिट डेल्टा फोर्स को सौंपा गया। स्पेशल टीम ने स्पेशल ट्रेनिंग की। ट्रेनिंग के दौरान हर संभव आने वाली दिक्कतों की ट्रेनिंग दी गई, जैसे- अंधेरे में हमला करना, लोहे के दरवाजे तोड़ना आदि। ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व’ नाम से ये ऑपरेशन चलाया गया।

डेल्टा फोर्स को बता दिया गया था कि राष्ट्रपति मादुरो अपने घर बदलते रहते हैं और 6 से 8 ठिकाने हैं, जहाँ वे परिवार के साथ रहते हैं। ऑपरेशन के दिन अमेरिका को शाम तक नहीं पता चल पाया था कि राष्ट्रपति मादुरो रात कहाँ गुजारने वाले हैं। ऑपरेशन के लिए ये जानना जरूरी था, ताकि उस परिसर में ही अमेरिकी सैनिक उतरे, जहाँ वे ठहरे हों।

विमानों और हेलीकॉप्टरों की तैनाती बढ़ाई गई

ऑपरेशन से कई दिनों पहले अमेरिका ने अपने क्षेत्र में लड़ाकू विमानों, हेलीकॉप्टरों की संख्या काफी बढ़ा दी थी। इस दौरान इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, रीपर ड्रोन, खोजी ड्रोन और दूसरे हथियार तैनात किए गए। हमले से एक हफ्ते पहले सीआईए ने वेनेजुएला के एक बंदरगाह पर ड्रोन स्ट्राइक की, जो ड्रग से भरे नौकाओं और जहाजों को नष्ट करने के लिए थी।

राष्ट्रपति ट्रंप ने इसकी जानकारी दी थी कि नौका में ड्रग्स भरे थे इसलिए इस पर हमला किया गया और इस दौरान 115 लोग मारे गए।

क्रिसमस पर होने वाला था हमला

वेनेजुएला पर छिटपुट हमले महीनों से जारी थे। अमेरिकी हमलों को रोकने के लिए राष्ट्रपति मादुरो ने अमेरिका के सामने एक प्रस्ताव रखा। हमले को रोकने के बदले में वेनेजुएला के तेल तक अमेरिका की पहुँच को स्वीकार किया जाने वाला था। हालाँकि राष्ट्रपति ट्रंप ने मादुरो को देश छोड़कर तुर्किए जाने को कहा। इसके बाद मादुरो ने प्रस्ताव वापस ले लिया। अमेरिका ने इस पर कहा कि मादुरो डील को लेकर सीरियस नहीं हैं।

राष्ट्रपति ट्रंप ने 25 दिसंबर को ही हमले की अनुमति दे दी थी। लेकिन हमले का वक्त निश्चित करने का अधिकार सेना और डेल्टा फोर्स की अगुवाई करने वाले सेना के अधिकारी को दे दिया गया। अमेरिकी सेना ने क्रिसमस का वक्त चुना था क्योंकि उस वक्त कई वेनेजुएलाई अधिकारी छुट्टी पर थे, लेकिन मौसम खराब होने की वजह से ऑपरेशन टल गया।

3 जनवरी की रात वेनेजुएला का आसमान साफ था। इसको देखते हुए शाम 4.30 बजे उपकरणों को व्यवस्थित कर दिया गया। एयरक्राफ्ट, रीपर ड्रोन, सर्च एंड रेस्क्यू हेलीकॉप्टर और फाइटर जेट तैनात कर दिए गए।

हमले का पूरा लाइव टेलीकास्ट राष्ट्रपति ट्रंप ने देखा

राष्ट्रपति ट्रंप मार ए लागो क्लब में डिनर कर रहे थे। इस वक्त कैबिनेट के सदस्य और दूसरे नजदीकी लोग मौजूद थे। कमरे में एक बड़ा स्क्रीन लगा हुआ था, जिस पर पूरा ऑपरेशन राष्ट्रपति ट्रंप ने सेना के अधिकारियों और अहम लोगों के साथ देखा। रात 10.46 बजे ट्रंप ने डिनर करने के बाद ऑपरेशन शुरू करने की इजाजत दी।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने देखा कि कैसे हाई-ट्रेंड अमेरिकन डेल्टा फ़ोर्स के सैनिक काराकस में निकोलस मादुरो के घर में घुसे। उस वक्त वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति मादुरो और उनकी पत्नी सो रहे थे। अमेरिकी सैनिक करीब 2 बजे हेलीकॉप्टर से परिसर में उतरे। राष्ट्रपति मादुरो के सिक्योरिटी को हमले का अंदाज लग गया था। इसलिए दोनों तरफ से फायरिंग हुई। इस फायरिंग में एक अमेरिकी हेलीकॉप्टर डैमेज हुआ। इस बीच विस्फोटक का इस्तेमाल कर दरवाजा तोड़ा गया।

3 मिनट के अंदर सैनिक पहुँच गए। उन्हें पहले से ही चप्पे चप्पे का पता था इसलिए तुरंत ये राष्ट्रपति मादुरो के कमरे तक पहुँच गए। राष्ट्रपति मादुरो और उनकी पत्नी अपने सेफ रूम में जाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन अमेरिकी सैनिकों ने उन्हें पकड़ लिया।

दरअसल स्टील-एनफ़ोर्स्ड सेफ रूम में वे दोनों चले भी गए थे, लेकिन उसे बंद नहीं कर पाए, इसलिए अमेरिकी सैनिक उन्हें पकड़ने में कामयाब रहे। यह पूरा घटनाक्रम बड़े से पर्दे पर अमेरिका में बैठे राष्ट्रपति ट्रंप और उनके साथियों ने लाइव देखा।

यह महीनों तक चले कैंपेन का नतीजा था । राष्ट्रपति ट्रंप वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो को हटाना चाहते थे, लेकिन बड़ी लड़ाई में फँसे बिना। इसलिए महीनों की मेहनत के बाद क्रिसमस से कुछ दिन पहले ऑपरेशन को हरी झंडी दी गई।

साउथ फ्लोरिडा में अपने शानदार प्राइवेट क्लब में इकट्ठा हुए नेशनल सिक्योरिटी अधिकारियों से ट्रंप ने कहा, “गुड लक, और गॉडस्पीड।”

अमेरिकी हेलीकॉप्टर जल्द ही समुद्र के पार, पानी से 100 फीट ऊपर काराकास की ओर उड़ने लगी। शनिवार सुबह ट्रंप ने सोशल मीडिया ट्रुथ सोशल पर मादुरो की तस्वीर पोस्ट की। तस्वीर में मादुरो अमेरिकी सैनिकों की कस्टडी में थे। उन्हें हथकड़ी लगाई गई थी। वे ग्रे स्वेटपैंट पहने हुए थे और ब्लैकआउट गॉगल्स लगा रखी थी।

(राष्ट्रपति मादुरो की तस्वीर ,फोटो साभार- ट्रंप/ ट्रूथ सोशल)

पहले बिजली काटी, फिर एयरक्राफ्ट ने बोला धावा

ऑपरेशन की शुरुआत साइबर अटैक से की गई। सबसे पहले काराकस की बिजली काट दी गई। 150 से ज्यादा मिलिट्री एयरक्राफ्ट 20 अलग अलग बेस और नेवी शिप्स से उड़े और एक साथ कई ठिकानों पर हमला कर दिया। ये लोग समुद्र से थोड़ी ही ऊपर उड़ रहे थे। जैसे ही विमान कराकस की ओर बढा, अमेरिकी सेना ने ये सुनिश्चित किया कि सबकुछ सही से हो। किसी को ऑपरेशन की भनक न लगे।

अमेरिका ने ज्यादातर अटैक रेडियो टावर और ऐसी जगहों पर किए, जिससे जनहानि कम हो। हेलीकॉप्टर ने 160 स्पेशल ऑपरेशन एविएशन रेजिमेंट के नाइट स्टॉकर्स, जो रात में कम ऊंचाई पर उड़ने के लिए मााहिर हैं, उनका इस्तेमाल किया गया।

मादुरो को न्यूयॉर्क लाया गया

मादुरो को न्यूयॉर्क नेशनल गार्ड बेस लाया गया। फिलहाल उन्हें ब्रुकलिन जेल में रखा गया है। पूरे ऑपरेशन में अमेरिका के करीब आधा दर्जन सैनिक घायल हुए जबकि वेनेजुएला के करीब 40 लोगों की जान गई। इनमें सैनिक के साथ-साथ आम जनता भी शामिल है।

अमेरिका की नजर वेनेजुएला के तेल भंडार पर है। राष्ट्रपति ट्रंप ने घोषणा कर दी है कि अमेरिका अब तेल इंफ्रास्ट्रक्चर को ठीक करेगा। साथ ही कहा है कि वेनेजुएला को अमेरिका चलाएगा। हालाँकि इस तरह चलाना है इसकी जानकारी नहीं दी है। दूसरी तरफ वेनेजुएला की सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिग्ज को कार्यभार संभालने के लिए कहा है।

DRDO के पास ‘गौरव’ बम, फिर क्यों पड़ी इजरायल से SPICE-1000 खरीदने की जरूरत: समझें क्यों सैन्य ताकत के संतुलन के लिए जरूरी है यह खरीद

भारत की रक्षा अधिग्रहण परिषद यानी डिफेन्स एक्विजिशन काउंसिल (DAC) ने हाल ही में तीनों सेनाओं को 79,000 करोड़ रुपए के हथियार खरीदने की मंजूरी दी है। इन हथियारों में इजरायल से SPICE-1000 ग्लाइड बम किट की खरीद को मंजूरी दी है। यह निर्णय ऐसे समय पर सामने आया है जब भारत का रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) अपने स्वदेशी लॉन्ग-रेंज ग्लाइड बम ‘गौरव’ के विकास पर वर्षों से काम कर रहा है और अब वो बनकर भी तैयार है।

इसी कारण यह फैसला रक्षा मामलों से जुड़े विशेषज्ञों और रणनीतिक विश्लेषकों के बीच चर्चा का विषय बन गया है। इसे केवल एक एक्सपोर्ट से जुटे निर्णय के रूप में नहीं बल्कि भारत की डिफेंस नीति के बड़े दृष्टिकोण के तौर पर देखा जा रहा है। इस निर्णय में साफ तौर पर यह दिखता है कि सरकार ने तत्काल सैन्य जरूरतों, खर्च और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है।

SPICE-1000 क्या है?

SPICE-1000 का पूरा नाम ‘स्मार्ट, प्रिसाइस इम्पैक्ट, कॉस्ट-इफेक्टिव’ (SPICE) है। यह एक आधुनिक स्टैंड-ऑफ प्रिसिजन स्ट्राइक ग्लाइड बम किट है जो किसी सामान्य 1,000 पाउंड के एयरक्राफ्ट बम को अत्याधुनिक गाइडेड हथियार में बदल देती है। इस किट की खास बात यह है कि यह पारंपरिक बम को ऐसा हथियार बना देती है जो अपने लक्ष्य तक खुद पहुँच सकता है और उसे पहचान भी सकता है।

SPICE-1000 में एक खास तरह की ग्लाइड बॉडी होती है, जो बम को हवा में काफी दूर तक जाने में मदद करती है। इसके साथ ही इसमें INS और SATNAV आधारित नेविगेशन सिस्टम लगाया गया है और अंतिम चरण में लक्ष्य को सटीक तरीके से निशाना बनाने के लिए इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इन्फ्रारेड सीकर भी मौजूद होता है। इन सभी तकनीकों के मेल से यह हथियार बेहद सटीक हमला करने में सक्षम बनता है।

SPICE-1000 की टेक्नोलॉजी और ऑपरेशनल खूबियाँ

SPICE-1000 की सबसे बड़ी ताकत इसका ऑटोनॉमस टारगेट एक्विजिशन सिस्टम है। यह सिस्टम रियल-टाइम में मिलने वाली EO तस्वीरों की तुलना पहले से मिशन के लिए सेव किए गए डेटा से करता है और बिना किसी बाहरी मदद के अपने लक्ष्य को पहचान लेता है। यानी बम को छोड़ने के बाद भी वह खुद तय कर सकता है कि उसे कहाँ वार करना है।

इसके अलावा इसमें टू-वे डेटा लिंक की सुविधा भी दी गई है, जिससे उड़ान के दौरान पायलट या वेपन सिस्टम ऑफिसर हथियार से संपर्क बनाए रख सकता है और जरूरत पड़ने पर आखिरी समय में भी जरूरी बदलाव कर सकता है।

सटीकता के मामले में SPICE-1000 को बेहद भरोसेमंद हथियार माना जाता है। इसका सर्कुलर एरर प्रोबेबल तीन मीटर से भी कम बताया जाता है यानी लक्ष्य से चूकने की संभावना बहुत कम होती है। यह क्षमता दिन और रात दोनों समय काम करती है और खराब मौसम में भी इसकी प्रभावशीलता बनी रहती है।

इसकी स्टैंड-ऑफ रेंज करीब 125 किलोमीटर तक है जिससे लड़ाकू विमान दुश्मन की एयर डिफेंस रेंज से बाहर रहते हुए ही हमला कर सकते हैं। भारतीय वायुसेना पहले ही SPICE-2000 और SPICE-250 जैसे वेरिएंट का इस्तेमाल कर चुकी है और 2019 के बालाकोट एयरस्ट्राइक में इनके सफल उपयोग ने इस हथियार प्रणाली पर वायुसेना का भरोसा और भी मजबूत कर दिया है।

DRDO का ‘गौरव’ बम

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने 8 से 10 अप्रैल 2025 के बीच भारतीय वायुसेना के Su-30 MKI लड़ाकू विमान से ‘गौरव’ के रिलीज ट्रायल को सफलतापूर्वक पूरा किया था। ट्रायल्स के दौरान गौरव बम को विमान के अलग-अलग स्टेशनों पर और विभिन्न वॉरहेड कॉन्फिगरेशन के साथ लगाया गया था। इन परीक्षणों के दौरान गौरव बम ने लगभग 100 किलोमीटर के करीब की दूरी से बेहद सटीक निशाना लगाने की क्षमता को सफलतापूर्वक साबित किया।

LRGB (Long Range Glide Bomb) ‘गौरव’ एक 1000 किलोग्राम श्रेणी का ग्लाइड बम है जिसे पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से डिजाइन और विकसित किया गया है। इसका विकास रिसर्च सेंटर इमारत, आर्मामेंट रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट और इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज, चांदीपुर द्वारा किया गया है। इसके विकास में अदाणी डिफेंस और भारत फोर्ज जैसी निजी भारतीय कंपनियाँ भी सहयोग कर रही हैं। गौरव को खास तौर पर 1,000 किलोग्राम के हाई-स्पीड लो ड्रैग बम के लिए एक ग्लाइड और नेविगेशन किट के रूप में तैयार किया गया है, ताकि मौजूदा बमों को अपेक्षाकृत कम लागत में लंबी दूरी के सटीक हथियार में बदला जा सके।

‘गौरव’ की ताकत और उसकी सीमाएँ

गौरव बम में INS और SATNAV पर आधारित नेविगेशन सिस्टम लगाया गया है, जिसकी मदद से यह तय किए गए रास्ते पर उड़ते हुए सीधे अपने लक्ष्य तक पहुँच सकता है। इसके साथ ही इसमें सेमी-एक्टिव लेजर होमिंग सीकर लगाने की सुविधा भी है। इसका मतलब यह है कि जब लक्ष्य को लेजर से लाइट किया जाता है, तो गौरव बम बहुत सटीक तरीके से उस पर हमला कर सकता है। Su-30MKI लड़ाकू विमान से किए गए परीक्षणों में इस बम ने करीब 100 किलोमीटर तक मार करने की क्षमता दिखाई है। सही तरीके से लेजर टारगेटिंग होने पर इसकी सटीकता काफी बेहतर मानी जाती है।

हालाँकि, गौरव बम की कुछ सीमाएँ भी हैं। अभी इसमें SPICE-1000 की तरह अपना अलग EO या IR सीकर नहीं है। इस वजह से यह अपने आप लक्ष्य को पहचान नहीं सकता। इसकी सटीकता बाहरी लेजर डिजिग्नेशन पर निर्भर करती है, जो आमतौर पर ड्रोन या किसी दूसरे प्लेटफॉर्म के जरिए किया जाता है। इससे ऐसे प्लेटफॉर्म पर खतरा भी बढ़ सकता है और खराब मौसम में लेजर गाइडेंस पर असर पड़ने की संभावना रहती है।

रणनीतिक रूप से इसलिए जरूरी है SPICE-1000

SPICE-1000 और गौरव के बीच यही बुनियादी फर्क भारत की हथियार खरीद की रणनीति को समझने में मदद करता है। SPICE-1000 में मौजूद EO/IR सीकर उसे पूरी तरह आत्मनिर्भर बना देता है, जिससे बम अपने आप लक्ष्य को पहचान सकता है और हमले के तरीके में ज्यादा लचीलापन मिलता है। इसके उलट, गौरव को लक्ष्य पर सटीक हमला करने के लिए बाहर से लेजर सपोर्ट की जरूरत होती है।

इसका मतलब यह है कि लेजर से निशाना दिखाने वाले ड्रोन या दूसरे प्लेटफॉर्म को दुश्मन की एयर डिफेंस के करीब जाना पड़ता है और इससे उनका जोखिम बढ़ जाता है। इसके साथ ही, बादल, धूल, धुआँ या खराब मौसम जैसी स्थितियों में लेजर गाइडेंस ठीक से काम न करे तो पूरे मिशन की सफलता पर असर पड़ सकता है।

लागत और क्षमता के संतुलन के जरूरी SPICE-1000

रक्षा खरीद में लागत और क्षमता के बीच संतुलन बनाना हमेशा एक अहम चुनौती रहता है, खासकर तब जब देश के पास स्वदेशी विकल्प भी मौजूद हों। रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक SPICE-1000 किट की कीमत करीब 4.8 लाख अमेरिकी डॉलर यानी लगभग चार करोड़ रुपए बताई जाती है। इतनी ज्यादा कीमत होने के कारण इसे पूरी वायुसेना में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करना व्यावहारिक नहीं माना जाता। फिर भी भारतीय वायुसेना इसे उन खास अभियानों के लिए जरूरी समझती है, जहाँ बहुत अहम और भारी सुरक्षा वाले लक्ष्यों को बेहद सटीक तरीके से नष्ट करना होता है।

वहीं, दूसरी तरफ ‘गौरव’ जैसी स्वदेशी प्रणाली कम लागत में तैयार की जा सकती है और इसे बड़ी संख्या में तैनात करना संभव है। यह खास तौर पर स्थायी बुनियादी ढाँचे जैसे ठिकानों पर हमले के लिए उपयोगी मानी जाती है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत इस समय एक मिश्रित रणनीति अपना रहा है, जिसमें सीमित संख्या में SPICE-1000 जैसे महँगे लेकिन बेहद सक्षम हथियार रखे जाएँगे जबकि बड़ी मात्रा में गौरव जैसे स्वदेशी और किफायती सिस्टम इस्तेमाल किए जाएँगे ताकि लागत और क्षमता दोनों के बीच संतुलन बना रहे।

रणनीतिक सोच और आत्मनिर्भर बनने की दिशा में बढ़ते कदम

SPICE-1000 की खरीद को DRDO की अनदेखी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसे तत्काल ऑपरेशनल जरूरतों को पूरा करने, मौजूदा क्षमता के अंतर को भरने और भविष्य में स्वदेशी प्रणालियों को समय के साथ और मजबूत होने का समय देने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। SPICE-1000 पहले से युद्ध में परखा हुआ भरोसेमंद हथियार है जबकि ‘गौरव’ जैसे स्वदेशी बम अभी विकास और परिपक्वता के चरण में हैं। आने वाले समय में गौरव में EO या IR सीकर और उन्नत मिशन प्रोफाइल जैसी क्षमताओं के जोड़े जाने की संभावना है। यह आने के बाद इसकी सटीकता और बढ़ जाएगी।

भारत की रक्षा नीति आत्मनिर्भरता पर जोर दे रही है लेकिन यह भी सुनिश्चित किया जा रहा है कि अगर किसी हथियार को डेवलप कर उसे उन्नत बनाने में समय लग रहा है तो इसका असर सेना पर ना पड़ने पाए। DRDO द्वारा विकसित गौरव जैसे स्वदेशी सिस्टम धीरे-धीरे भारत को रक्षा तकनीक में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में आगे ले जा रहे हैं।

इस तरह भारत की रणनीति साफ है कि एक ओर आवश्यक हथियारों के आयात से तत्काल सैन्य जरूरतों को पूरा किया जा रहा है तो वहीं दूसरी ओर स्वदेशी प्रणालियों के विकास के जरिए भविष्य में पूरी तरह आत्मनिर्भर बनने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं।

हिंदुओं की मौत पर भी चुप्पी, मुस्तफिजुर रहमान के सिर्फ IPL से जाने पर छलका दर्द: जहाँ रोज मर रहे हिंदू, उस बांग्लादेशी खिलाड़ी के लिए आँसू बहा रहा लेफ्ट-लिबरल गैंग

3 जनवरी 2025 को लेफ्ट-विंग लिबरल इकोसिस्टम को मोदी सरकार के खिलाफ बोलने का एक और कारण मिल गया, जब बोर्ड ऑफ कंट्रोल फॉर क्रिकेट इन इंडिया (BCCI) ने कोलकाता नाइट राइडर्स (KKR) को बांग्लादेशी क्रिकेटर मुस्तफिज़ुर रहमान को आने वाले इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) सीजन से रिलीज करने का निर्देश दिया।

यह फैसला ऐसे समय में आया है जब बांग्लादेश में हिंदुओं को अगस्त 2024 में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को हटाए जाने के बाद से टारगेटेड हिंसा का सामना करना पड़ रहा है। बांग्लादेशी खिलाड़ी रहमान को शामिल किए जाने पर लोगों में काफी गुस्सा था। इस राजनीतिक उथल-पुथल के बाद बेकाबू इस्लामी भीड़ ने हिंदुओं के घरों, मंदिरों पर हमला किया। हिन्दुओं की मॉब लिंचिंग हुई। इसके बाद बांग्लादेशी खिलाड़ियों को आईपीएल की टीम में सेलेक्शन का विरोध हुआ और बैन करने की माँग उठने लगी।

BCCI सेक्रेटरी देवजीत सैकिया ने कन्फ़र्म किया कि बोर्ड ने KKR को अपने फैसले के बारे में ऑफ़िशियली बता दिया था और अगर फ़्रैंचाइज़ी चाहे तो उसे रिप्लेसमेंट खिलाड़ी साइन करने की इजाज़त दे दी थी। KKR ने बाद में साफ़ किया कि उसने मुस्तफ़िज़ुर रहमान को अपनी टीम से रिलीज कर दिया है।

हिन्दुओं पर अत्याचारों की वजह से लोगों का गुस्सा

शेख हसीना को हटाए जाने के बाद लगातार भारत-बांग्लादेश के रिश्ते खराब होते जा रहे हैं, लेकिन हिंदू युवक दीपू चंद्र दास की मॉब लिंचिंग और ‘ईशनिंदा’ का आरोप लगा कर लगातार हिंदुओं पर हो रहे हमलों ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। ये घटनाएँ धार्मिक ज़ुल्म के एक बड़े पैटर्न का हिस्सा थीं, जिसे बांग्लादेशी सरकार पूरी तरह से रोकने में नाकाम रही है।

NDTV की गार्गी रावत ने इस कदम पर सवाल उठाते हुए ट्वीट किया: “सोचिए कि इससे हमारे पड़ोसी बांग्लादेश को कैसा मैसेज जाएगा। संगीत सोम ने अपने घरेलू दर्शकों के लिए पॉइंट्स बनाए होंगे, लेकिन इससे भारत की डिप्लोमेसी और रिश्तों को नुकसान होगा।”

राम गुहा, जो खुद को इतिहासकार बताते हैं और जिन्हें फैक्ट्स को तोड़-मरोड़कर पेश करने और कहानी गढ़ने का हुनर ​​है, ने बीसीसीआई के फैसले को ‘बहुत ही बेवकूफी भरा’ बताया। उन्होंने कहा कि ढाका के साथ अच्छे रिश्तों के लिए क्रिकेट के रिश्ते बहुत जरूरी हैं। इस तरह का कदम बांग्लादेश को इस्लामाबाद के और करीब ला सकता है।

विदेशी मामलों की एडिटर सुहासिनी हैदर ने कहा कि विदेश मंत्री एस जयशंकर बांग्लादेश जा सकते हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बांग्लादेशी नेताओं से मिल सकते हैं, लेकिन एक क्रिकेटर को भारत में खेलने का हक नहीं दिया जा रहा है।

इसी बात में और जोड़ते हुए, ‘कॉलमिस्ट’ सबा नकवी ने भी BCCI के निर्देश के कुछ घंटों बाद कहा कि भारत ने दक्षिण एशिया में अपनी सारी ‘नैतिक प्रतिष्ठा’ खो दी है और एक बांग्लादेशी खिलाड़ी को कमर्शियल लीग में खेलने की इजाजत न देकर ‘मतलबी’ बन गया है।

X पर एक लंबे पोस्ट में, नकवी ने कहा कि बांग्लादेश की आजादी में भारत की ऐतिहासिक भूमिका रही है। बांग्लादेश का राष्ट्रगान रवींद्रनाथ टैगोर का लिखा हुआ है। भारत में अभी भी बांग्लादेशी की पूर्व प्रधानमंत्री की मेजबानी कर रहा है, ऐसे हालात में ये फैसला नहीं होना चाहिए था।

उन्होंने आगे दावा किया कि भारत एक ‘बड़ी ताकत की तरह नहीं, बल्कि घटिया और असभ्य स्क्रिप्ट’ चुन रहा है, जो कथित तौर पर आने वाले राज्यों के चुनावों और ‘हिंदू कट्टरपंथियों’ की वजह से हो रहा है। अंत में उन्होंने दुख जताया कि भारत एक ‘नैतिक ताकत जिसकी दुनिया तारीफ़ करती थी’ को गिरा दिया है।

यह तर्क नैतिकता की चिंता के लिए नहीं, बल्कि बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार को महत्वहीन बनाने के लिए दिया गया है। एक बार फिर हिन्दुओं के साथ हो रही हिंसा को एक छोटी सी परेशानी माना गया, जबकि एक विदेशी एथलीट को प्राइवेट लीग से बाहर करने को सभ्यता का संकट बना दिया गया।

नैतिकता में ‘चुनाव’ और पाखंड

नैतिकता पर ये उपदेश सिर्फ भारत की सरकार के लिए होते हैं। अगर विराट कोहली को राजनीतिक कारणों से किसी विदेशी देश में खेलने से रोक दिया जाता, तो वही वामपंथी विचारक तुरंत इसे भारत की विदेश नीति की नाकामी बता देते। कोई भी बैन लगाने वाले देश पर सवाल नहीं उठाता। इसके बजाय, नई दिल्ली से खुद को समझाने के लिए कहा जाता।

यह तरीका सिर्फ खेलों तक ही सीमित नहीं है। जब डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर टैरिफ लगाए, तो लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम भारत की विदेश नीति पर सवाल खड़े करने लगा। कुछ लोगों ने पूछा कि अमेरिका भारत को वॉशिंगटन के फायदे वाले ट्रेड डील के लिए मजबूर क्यों कर रहा था। हमेशा की तरह, सबसे पहले भारत पर इल्जाम लगाया गया।

चाहे मुद्दा डिप्लोमेसी हो, ट्रेड हो, या क्रिकेट, स्क्रिप्ट में कोई बदलाव नहीं होता। भारत का खुद को साबित करना एक नैतिक नाकामी के तौर पर दिखाया जाता है। भारत का जनता की भावनाओं पर प्रतिक्रिया देना मेजॉरिटी की दादागिरी के तौर पर दिखाया जाता है। इसके अलावा सरकार जब अपने फैसले ‘एलीट क्लास’ की मंज़ूरी के बगैर लेती है तो इसे सभ्यता का पतन बताया जाता है।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है, इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

अमेरिकी हमले के बाद डेल्सी रोड्रिगेज के हाथों में वेनेजुएला की कमान, SC ने बनाया अंतरिम राष्ट्रपति: जानें कौन हैं तेल से लेकर विदेश जैसे मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाल चुकीं ‘टाइगर’

अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को पकड़कर न्यूयॉर्क ले जाए जाने के बाद वेनेजुएला में सत्ता की जिम्मेदारी डेल्सी रोड्रिगेज के हाथों में आ गई है। देश के सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें तत्काल अंतरिम राष्ट्रपति घोषित किया है ताकि प्रशासनिक कार्यों और राष्ट्रीय सुरक्षा में निरंतरता बनी रहे।

हालाँकि, मादुरो ने पहले ही कहा था कि वे देश के राष्ट्रपति हैं लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि डेल्सी रोड्रिगेज ने राष्ट्रपति पद की शपथ ले ली है और वे अमेरिका के निर्देशानुसार देश को चलाने में सहयोग कर रही हैं।

कौन हैं डेल्सी रोड्रिगेज?

डेल्सी रोड्रिगेज का जन्म 18 मई 1969 को वेनेजुएला की राजधानी काराकास में हुआ। उनके पिता, जॉर्ज एंटोनियो रोड्रिगेज, 1970 के दशक में लेफ्ट-विंग गेरिल्ला फाइटर और लीगा सोशलिस्टा पार्टी के संस्थापक थे। डेल्सी ने कैराकास स्थित सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ वेनेजुएला से लॉ की पढ़ाई की और बाद में विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के रूप में भी काम किया।

56 साल की डेल्सी रोड्रिगेज दो दशक से अधिक समय से वेनेजुएला की राजनीति में सक्रिय हैं और चैविज्म (Hugo Chavez द्वारा स्थापित राजनीतिक आंदोलन) की प्रमुख समर्थक हैं। मादुरो भी चैविज्म के अनुयायी हैं और उन्होंने 2013 में ह्यूगो चावेज की मृत्यु के बाद इसे आगे बढ़ाया है।

उनकी राजनीतिक यात्रा उनके भाई जॉर्ज रोड्रिगेज के साथ करीबी सहयोग पर आधारित रही है, जो वर्तमान में नेशनल असेंबली के अध्यक्ष हैं। डेल्सी ने देश में कई अहम पदों पर काम किया है। 2014 से 2017 तक उन्होंने वेनेजुएला की कम्युनिकेशन और इंफॉर्मेशन मिनिस्ट्री संभाली।

इसके बाद उन्होंने विदेश मंत्रालय की जिम्मेदारी भी संभाली, जहाँ उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर मादुरो सरकार का समर्थन किया और मानवाधिकार उल्लंघनों और चुनावी विवादों की आलोचना का जवाब दिया।

राजनीतिक करियर और अहम पद

डेल्सी रोड्रिगेज 2017 में प्रॉ-गवर्नमेंट कांस्टीट्यूएंट असेंबली की अध्यक्ष बनीं थी, इससे पहले 2015 में उन्होंने चुनावों में मादुरो का समर्थन किया था। 2018 में मादुरो ने उन्हें अपने दूसरे कार्यकाल में उप-राष्ट्रपति बनाया। मादुरो ने उन्हें ‘एक युवा, बहादुर, अनुभवी, क्रांतिकारी और हजारों संघर्षों में जाँची परखी महिला’ बताया है।

मादुरो के जुलाई 2024 में हुए चुनावों के विवाद के बाद 2025 में डेल्सी ने तीसरे कार्यकाल में भी उप-राष्ट्रपति पद संभाला। विपक्ष ने इन चुनावों को धोखाधड़ी करार दिया और दावा किया कि देश के वास्तविक राष्ट्रपति एम्बेसडर एडमुंडो गोंजालेज उरूतिया हैं। इसके बावजूद डेल्सी रोड्रिगेज मादुरो के शासन में लगातार बनी रहीं।

वे वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था और तेल मंत्रालय की प्रमुख भी रही हैं। अगस्त 2024 में मादुरो ने तेल मंत्रालय का काम उन्हें सौंपा ताकि वे अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद देश की सबसे महत्वपूर्ण उद्योग शाखा को संभाल सकें। उन्होंने बढ़ती महँगाई को काबू करने के लिए परंपरागत आर्थिक नीतियों को अपनाया।

राजनीतिक विशेषज्ञ जोस मैनुअल रोमानो के अनुसार, डेल्सी को मादुरो का पूर्ण विश्वास प्राप्त है। उनके पास पूरे सरकारी तंत्र और रक्षा मंत्रालय पर भी काफी प्रभाव है।

सुप्रीम कोर्ट की भूमिका

वेनेजुएला के सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार (3 जनवरी 2026) को डेल्सी रोड्रिगेज को अंतरिम राष्ट्रपति घोषित किया और आदेश दिया कि वे राष्ट्रपति के सभी अधिकारों और कर्तव्यों का निर्वहन करें। कोर्ट ने मादुरो को स्थायी रूप से अनुपस्थित घोषित नहीं किया, जिसके लिए 30 दिनों के भीतर चुनाव कराना अनिवार्य है।

मादुरो के पकड़े जाने के तुरंत बाद डेल्सी ने राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की बैठक की अध्यक्षता की। इस बैठक में कई वरिष्ठ अधिकारी और मंत्री शामिल हुए। उन्होंने राष्ट्रपति और प्रथम महिला की तुरंत रिहाई की माँग की और अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की आलोचना की।

वेनेजुएला के संविधान के अनुच्छेद 233 और 234 के अनुसार, राष्ट्रपति की अस्थायी या स्थायी अनुपस्थिति में उप-राष्ट्रपति को सभी कार्यकारी जिम्मेदारियों का निर्वाह करना होता है। डेल्सी ने देश के कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों पर नियंत्रण रखने के कारण इस समय सत्ता के केंद्र में हैं।

डेल्सी रोड्रिगेज का प्रभाव और अंतरराष्ट्रीय पहचान

डेल्सी रोड्रिगेज को कई देशों ने प्रतिबंधित किया है और पड़ोसी कोलंबिया में प्रवेश पर रोक है। वे वेनेजुएला की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय और प्रभावशाली रही हैं। मादुरो ने उन्हें उनके साहस के चलते ‘टाइगर’ का नाम दिया था।

डेल्सी ने सरकार में अपने करियर की शुरुआत 2003 में की। उन्होंने वेनेजुएला के उप-राष्ट्रपति कार्यालय के जनरल कॉर्डिनेशन विभाग में काम करना शुरू किया। 2006 में उन्होंने राष्ट्रपति ह्यूगो चावेज के कार्यकाल में मिनिस्टर फॉर प्रेसीडेंशियल अफेयर्स के रूप में काम किया। 2013 में मादुरो ने उन्हें कम्युनिकेशन और इंफॉर्मेशन मिनिस्ट्री का जिम्मा दिया। 2014 में वे विदेश मंत्री बनीं और वेनेजुएला में यह पद संभालने वाली पहली महिला बनीं।

उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और तेल मंत्रालय में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 2017 में उन्होंने कांस्टीट्यूएंट नेशनल असेंबली में प्रवेश किया, जिसने मादुरो के शक्तियों को और बढ़ाया। 2018 में उन्हें उप-राष्ट्रपति बनाया गया।

वेनेजुएला में डेल्सी रोड्रिगेज का प्रभाव

निकोलस मादुरो को अचानक अमेरिका द्वारा पकड़े जाने के बाद वेनेजुएला की कमान अब डेल्सी रोड्रिगेज को सौंप दी गई है। वह लंबे समय से मादुरो की करीबी रही हैं और सरकार में अहम जिम्मेदारियाँ संभाल चुकी हैं। राजनीति और प्रशासन का उन्हें अच्छा अनुभव है, इसलिए मौजूदा संकट के समय में उनकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो गई है।

कानून, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश का पक्ष रखने में वह काफी माहिर मानी जाती हैं। अमेरिका की सैन्य कार्रवाई और देश में बने सत्ता के खालीपन के बीच अब डेल्सी रोड्रिगेज के हर फैसले पर न सिर्फ वेनेजुएला बल्कि पूरी दुनिया की नजर टिकी रहेगी।