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क्या है अमेरिका का गोल्डन डोम? जिसके लिए दुनिया के सबसे बड़े द्वीप ग्रीनलैंड पर कब्जा चाहते हैं डोनाल्ड ट्रंप: जानें- इसके बिना कैसे खतरे में है US की सुरक्षा

दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप ग्रीनलैंड इन दिनों अंतरराष्ट्रीय राजनीति का केंद्र बना हुआ है। वजह है अमेरिका की द्वीप को खरीदने में दिलचस्पी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की इस बर्फीली जमीन पर नजर बार-बार खुलकर सामने आ रही है। ट्रंप ने ग्रीनलैंड को खरीदने के पीछे का सबसे अहम कारण अमेरिका के ‘गोल्डन डोम एयर डिफेंस सिस्टम’ को बताया है।

ग्रीनलैंड को लेकर उठे इस विवाद ने कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर गोल्डन डोम एयर डिफेंस सिस्टम क्या है, जिसे ट्रंप अमेरिका की सुरक्षा की रीढ़ बता रहे हैं? आखिर इस सिस्टम के लिए ग्रीनलैंड को ही क्यों चुना गया है, और क्या इसके बिना अमेरिका अपने हवाई क्षेत्र को पूरी तरह सुरक्षित नहीं कर सकता? इसके अलावा रूस और चीन की भूमिका? इन सभी सवालों के जवाब तलाशने के लिए जरूरी है कि गोल्डन डोम सिस्टम के बारे में विस्तार से समझते हुए ग्रीनलैंड की अहमियत के बारे में बात की जाए।

कब-कब डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड खरीदने को गोल्डन डिफेंस सिस्टम बताई वजह?

तो नए साल पर वेनेजुएला पर कब्जा करने के बाद जनवरी 2026 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपना अगला निशाना ग्रीनलैंड को बताया और खुली धमकियाँ देनी शुरू कर दीं। इन धमकियों में ट्रंप ने ग्रीनलैंड को बार-बार गोल्डन डोम एयर डिफेंस सिस्टम से जोड़ा और उसे अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अनिवार्य बताया।

14 जनवरी 2026 सोशल मीडिया ‘ट्रुथ सोशल’ पर डोनाल्ड ट्रंप ने साफ शब्दों में लिखा, “अमेरिका को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ग्रीनलैंड की जरूरत है। जो गोल्डन डोम एयर डिफेंस सिस्टम हम बना रहे हैं, उसके लिए ग्रीनलैंड ‘बेहद जरूरी’ है।” अपनी दिलचस्पी को NATO के लिए जरूरी बताते हुए ट्रंप ने कहा, “इस काम में NATO को अमेरिका का साथ देना चाहिए। अगर हमने ग्रीनलैंड नहीं लिया, तो रूस या चीन वहाँ पहुँच जाएँगे और ऐसा होने नहीं दिया जाएगा।”

डोनाल्ड ट्रंप के ट्वीट का स्क्रीनशॉट (फोटो साभार: X-Truth Social)

ग्रीनलैंड की खरीद पर NATO पर दबाव डालते हुए ट्रंप यह भी कह चुके हैं कि अमेरिका के बिना NATO कुछ नहीं है। ट्रंप ने कहा, “सैन्य तौर पर देखें तो अमेरिका की ताकत के बिना NATO कोई मजबूत या असरदार ताकत नहीं बन सकता। अपने पहले कार्यकाल में मैंने अमेरिकी सेना को मजबूत किया था और अब उसे और ऊँचे स्तर पर ले जा रहा हूँ। अमेरिका के बिना NATO न तो प्रभावी रह पाएगा और न ही किसी खतरे को रोक पाएगा।”

ट्रंप ने आगे कहा, “ग्रीनलैंड अगर अमेरिका के हाथ में होता है, तो NATO और ज्यादा मजबूत और असरदार बन जाता है। इससे कम कुछ भी मंजूर नहीं है।”

इसके बाद 17 जनवरी 2026 को ‘ग्रीनलैंड की खरीद’ पर समर्थन न देने वाले यूरोपीय देशों पर टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी। इस फैसले को भी उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा कदम बताया। ट्रंप ने कहा कि आधुनिक हथियार प्रणालियों और गोल्डन डोम एयर डिफेंस सिस्टम के दौर में ग्रीनलैंड की रणनीतिक अहमियत पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ट्वीट का स्क्रीनशॉट (फोटो साभार: X- Truth Social)

ग्रीनलैंड के इस सौदे को 150 साल पुराना बताते हुए ट्रंप ने कहा, “अब गोल्डन डोम और आधुनिक हथियार प्रणालियों, हमले और रक्षा दोनों तरह की वजह से यह खरीदना और भी जरूरी हो गया है। सैकड़ों अरब डॉलर इस सुरक्षा कार्यक्रम पर खर्च किए जा रहे हैं, जिसमें कनाडा की सुरक्षा का भी ध्यान रखा गया है।”

गोल्डन डोम सिस्टम के लिए ग्रीनलैंड को महत्वपूर्ण बताते हुए ट्रंप आगे कहते हैं, “यह बहुत ही शानदार, लेकिन बहुत जटिल सिस्टम तभी अपनी पूरी क्षमता और दक्षता से काम कर पाएगा, जब ग्रीनलैंड भी इसमें शामिल हो। इसमें जमीन की सही स्थिति और दिशा बहुत मायने रखती है।”

क्या है गोल्डन डोम एयर डिफेंस सिस्टम?

तो अब जानना जरूरी है कि जिस ‘गोल्डन डोम एयर डिफेंस सिस्टम‘ के लिए डोनाल्ड ट्रंप ग्रीनलैंड को खरीदने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं, आखिर वह क्या है? जानकारी के अनुसार, गोल्डन डोम एयर डिफेंस सिस्टम अमेरिका की सबसे महत्वाकांक्षी और उन्नत मिसाइल रक्षा परियोजना है जो देश को भविष्य के हथियारों और मिसाइल खतरों से बचाने के लिए डिजाइन की जा रही है।

गोल्डन डोम को 20 मई 2025 को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आधिकारिक रूप से लॉन्च किया था और उन्होंने बताया कि यह प्रोजेक्ट लगभग 175 अरब डॉलर (लगभग ₹14.52 लाख करोड़) की लागत से बनाया जाएगा। यह डिफेंस सिस्टम दुश्मन की मिसाइलों, हाइपरसोनिक हथियारों, ड्रोन और उन्नत हवाई खतरों को पहचानकर उन्हें उनके उड़ान के शुरुआती चरण में ही रोक देगा और जरूरत पढ़ने पर जवाबी कार्रवाई भी कर सकता है।

ट्रंप का कहना है कि यह सिस्टम अब तक की किसी भी रक्षा ढाल से कहीं अधिक व्यापक और तकनीकी रूप से उन्नत होगी और यह इजरायल के आयरन डोम (Iron Dome) जैसा है, लेकिन उससे कई गुना बड़ा और जटिल है।

गोल्डन डोम की खासियत क्या है?

गोल्डन डोम की सबसे बड़ी खासियत है कि मल्टी लेयर सुरक्षा और इंटरसेप्शन: यह एयर डिफेंस सिस्टम एक मल्टी-लेयर सुरक्षा कवच तैयार करेगा, जिसमें सैटेलाइन नेटवर्क, उच्च स्तरीय रडार सिस्टम और इंटरसेप्टर मिसाइलें शामिल होंगी। इसका मतलब यह है कि सिस्टम मिसाइल को उसके लॉन्च से पहले, उड़ान के बीच और लक्ष्य तक पहुँचने से पहले ही ट्रैक कर रोक सकता है।

ऐसा करने के लिए अंतरिक्ष में तैनात किए जाने वाले सैटेलाइट दुश्मन मिसाइलों का पता लगाएँगे और जमीन पर मौजूद सेंसर और इंटरसेप्टर सिस्टम उनके रास्ते को रोकेंगे। इसी तकनीक के जरिए अमेरिका अपेक्षा करता है कि वह बैलिस्टिक, हाइपरसोनिक, क्रूज और अन्य उन्नत मिसाइल खतरों को विफल कर सके।

एर्ली वार्निंग और सटीकता: गोल्डन डोम की ताकत इसका एर्ली वार्निंग सिस्टम है। इसका मतलब है कि जब भी कोई मिसाइल, ड्रोन या हाइपरसोनिक हथियार अमेरिका पर हमला करेगा, तो देश पहले ही आगाह हो जाएगा।

इसके अलावा यह सिस्टम बहुत सटीक लक्ष्य निर्धारण करता है। यह मिसाइल की गति, दिशा और दूरी को देखकर उसे हवा में ही मार सकता है। यही वजह है कि गोल्डन डोम न सिर्फ हमला रोकता है बल्कि जवाबी कार्रवाई की भी तैयारी करता है, जिससे अमेरिका की रक्षा और मजबूत हो जाती है।

गोल सुरक्षा कवच: गोल्डन डोम में ‘डोम’ शब्द इसीलिए है क्योंकि यह पूरे अमेरिका को एक गोल सुरक्षा ढाल की तरह घेर सकता है। इसका असर सिर्फ अमेरिका पर ही नहीं बल्कि कनाडा और उत्तरी गोलार्ध के रणनीतिक हिस्सों पर भी पड़ता है।

इस सिस्टम की वजह से दुश्मन के लिए हमला करना और खतरा पैदा करना मुश्किल हो जाता है। यानी गोल्डन डोम बहु-स्तरीय, तकनीकी रूप से उन्नत और व्यापक रक्षा प्रणाली है, जो अमेरिका को हर तरह के आधुनिक हथियारों और मिसाइल खतरों से सुरक्षित रखती है।

भविष्य में अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए कितना जरूरी?

इस गोल्डन डोम एयर डिफेंस सिस्टम को ट्रंप ने भविष्य के युद्धों और मिसाइल खतरों से लड़ने वाला ‘नेक्स्ट जनरेशन शील्ड’ कहा है। इसका मतलब है कि यह ढाँचा न सिर्फ जमीन पर बल्कि अंतरिक्ष में भी आने वाले खतरों को पहचानने और रोकने की क्षमता रखता है।

पेंटागन के विशेषज्ञों के अनुसार, गोल्डन डोम में चार प्रमुख सुरक्षा स्तर होंगे- पहले खतरे की पहचान, फिर शुरुआती रोकथाम उसके बाद मध्य मार्ग में कार्रवाई और अंत में लक्ष्य को नष्ट करना। यानी मिसाइल को उसके किसी भी चरण में रोका जा सकता है।

यह परियोजना तकनीकी तौर पर इतनी जटिल है कि यह अमेरिका के मौजूदा रक्षा सिस्टम को भी नई ऊँचाइयों तक ले जाएगी। ट्रंप इसे ‘अभेद्य रक्षा कवच’ कहते हैं, यानी ऐसा सिस्टम जो दुश्मन के हमले को कामयाब नहीं होने देती। इस सिस्टम को साल 2029 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इसमें और समय और संसाधन लग सकते हैं।

अगर इसके महत्व पर बात करें तो गोल्डन डोम सिस्टम सिर्फ मिसाइल रोकने का सिस्टम नहीं है। यह भविष्य के युद्ध की रणनीति और सुरक्षा के तरीके बदलने वाला ढाँचा भी है। इसका उद्देश्य सभी प्रकार के आधुनिक और परिष्कृत हथियारों से रक्षा करना है। चाहे वे पारंपरिक मिसाइल हों, हाइपरसोनिक हथियार हों या अंतरिक्ष से आने वाले खतरे हों। इसीलिए अमेरिका इसे मल्टी-डोमेन सुरक्षा कवच के रूप में विकसित कर रहा है, जो जमीन, हवा और अंतरिक्ष तीनों जगह काम कर सके।

गोल्डन डोम सिस्टम के लिए ग्रीनलैंड ही क्यों?

गोल्डन डोम जैसे उन्नत डिफेंस सिस्टम तभी पूरी तरह काम कर सकती है, जब इसे भौगोलिक रूप से सही जगह पर लॉन्च किया जाए। अमेरिका ने इसके लिए ग्रीनलैंड को चुना है, क्योंकि यह रूस और अमेरिका के बीच आर्कटिक इलाके के पास वाला क्षेत्र है।

इसका मतलब है कि अमेरिका का सबसे बड़ा दुश्मन रूस अगर मिसाइल से हमला करेगा, तो अमेरिका को ग्रीनलैंड से ही चेतावनी मिल जाएगी। अगर गोल्डन डोम को कहीं और रखा जाए, तो मिसाइल या हाइपरसोनिक हथियारों के आने का समय कम हो जाएगा और खतरा बढ़ जाएगा।

इसी के साथ ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति सिर्फ जल्दी चेतावनी देने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यहाँ से अमेरिका अपने उत्तर और आर्कटिक क्षेत्र के हवाई रास्तों पर नजर रख सकता है। इस इलाके में हवाई और अंतरिक्ष दोनों खतरों की निगरानी करना आसान हो जाता है। यही वजह है कि ट्रंप ने बार-बार कहा कि ग्रीनलैंड अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है और गोल्डन डोम को धरातल पर लाने के लिए इसे हाथ से जाने नहीं दिया जा सकता है।

बिना ग्रीनलैंड के अमेरिका की सुरक्षा को खतरा?

अब सवाल यह उठता है कि क्या अमेरिका बिना ग्रीनलैंड के अपने हवाई क्षेत्र को पूरी तरह सुरक्षित नहीं रख सकता है? जवाब है- मुश्किल है। अमेरिका के पास बहुत सारे मिसाइल डिफेंस सिस्टम हैं जैसे THAAD और Aegis, जो दुश्मन की मिसाइलों को रोकने में मदद करते हैं।

लेकिन गोल्डन डोम की खासियत यह है कि यह सिर्फ हमला रोकने तक सीमित नहीं है। यह सिस्टम सबसे पहले चेतावनी देता है और कई स्तरों पर हमले को रोकता भी है। इसका मतलब है कि मिसाइल के प्रक्षेपण से लेकर उड़ान और लक्ष्य तक पहुँचने के हर चरण में इसे ट्रैक और नष्ट किया जा सकता है।

और इस गोल्डन डोम को सही जगह पर तैनात करना भी उतना ही जरूरी है, जिसके लिए ग्रीनलैंड से बेहतर जगह कोई और नहीं हो सकती है। यही वजह है कि अमेरिका गोल्डन डोम के बिना हवाई क्षेत्र की रक्षा नहीं कर सकता है, और इसीलिए ग्रीनलैंड भी उसके लिए जरूरी है।

वैदिक सूर्य पूजा और खगोलीय ज्ञान की जीवंत परंपरा, गुजरात के मोढेरा सूर्य मंदिर में ‘उत्तरार्ध महोत्सव’ का आयोजन

गुजरात के ऐतिहासिक मोढेरा सूर्य मंदिर में 17 और 18 जनवरी 2026 को दो दिवसीय ‘उत्तरार्ध महोत्सव’ का आयोजन किया गया। यह उत्सव सूर्य पूजा और गुरु-शिष्य परंपरा को समर्पित है, जिसमें ओडिसी, भरतनाट्यम, कथक, मणिपुरी, कुचिपुड़ी, कथकली और सतरिया जैसे प्रमुख शास्त्रीय नृत्यों की प्रस्तुतियाँ हुई।

यह आयोजन केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम तक सीमित नहीं है। मोढेरा का सूर्य मंदिर भारतीय परंपरा का जीवंत प्रतीक है, जहाँ धर्म, विज्ञान, खगोल विज्ञान, समय की गणना और कला एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

उत्तरार्ध महोत्सव जैसे आयोजनों के माध्यम से मोढेरा केवल पर्यटन स्थल नहीं रहता, बल्कि सूर्य उपासना और ऋतु चक्रों पर आधारित उस भारतीय संस्कृति को आधुनिक रूप में प्रस्तुत करता है, जिसकी जड़ें वैदिक काल तक जाती हैं।

उत्तरार्द महोत्सव क्या है?

मोढेरा में आयोजित यह उत्सव भारत की उस प्राचीन परंपरा की याद दिलाता है, जिसमें सूर्य को जीवन, समय और ऋतुओं के चक्र का आधार माना गया है। इस आयोजन में भले ही शास्त्रीय नृत्य प्रस्तुतियाँ हों, लेकिन इसका असली महत्व सूर्य और समय की भारतीय समझ से जुड़ा हुआ है।

दरअसल, ‘उत्तरार्ध’ शब्द संस्कृत से लिया गया है। उत्तर का अर्थ है उत्तर दिशा और अर्ध का मतलब है आधा या मध्य भाग। उत्तरार्ध महोत्सव उत्तरायण के बाद, सूर्य के उत्तर दिशा में बढ़ते मार्ग के मध्य चरण में मनाया जाता है। यह समय शीत ऋतु के अंत का होता है, जब दिन धीरे-धीरे लंबे होने लगते हैं।

उत्तरायण के बाद सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है और उत्तर की ओर अपनी यात्रा शुरू करता है। जब यह यात्रा अपने मध्य या आधे हिस्से में पहुँचती है, उसी काल को उत्तरार्ध कहा जाता है। यह वह समय है जब ठंड कम होने लगती है, प्रकृति में नई ऊर्जा का संचार होता है और जीवन के नए अंकुर दिखाई देने लगते हैं।

भारतीय परंपरा में समय को हमेशा सूर्य की गति से जोड़ा गया है। दिन-रात, ऋतुएँ, महीने और वर्ष सब कुछ सूर्य की यात्रा पर आधारित रहा है। इसी कारण भारत के अधिकांश त्योहार, जैसे मकर संक्रांति और ऋतु परिवर्तन से जुड़े पर्व, सूर्य से जुड़े हुए हैं।

यह समझना जरूरी है कि ‘उत्तरार्ध महोत्सव’ किसी एक धार्मिक ग्रंथ में दर्ज विशेष पर्व नहीं है, बल्कि यह समय के उस शाश्वत चक्र का प्रतीक है, जिसमें सूर्य को ‘समय का स्वामी’ माना गया है। मोढेरा सूर्य मंदिर में आयोजित यह महोत्सव भी इसी सूर्य उपासना और काल-चक्र की भारतीय परंपरा को समर्पित है।

‘अयन’ क्या है? उत्तरायण-दक्षिणायन की परिभाषा

भारतीय पंचांग और धार्मिक परंपरा में सूर्य की गति को दो मुख्य भागों में समझा गया है, उत्तरायण और दक्षिणायन। सरल भाषा में कहें तो वर्ष के एक हिस्से में सूर्य उत्तर दिशा की ओर और दूसरे हिस्से में दक्षिण दिशा की ओर चलता है। इसी वजह से भारतीय परंपरा में उत्तरायण को बदलाव और शुभ शुरुआत का समय माना जाता है।

उत्तरायण का आध्यात्मिक महत्व महाभारत में भी दिखाई देता है। भीष्म पर्व के अनुसार, भीष्म पितामह ने अपनी इच्छा से उत्तरायण आने तक देह त्यागने की प्रतीक्षा की थी। यह कथा बताती है कि उस समय को आत्मिक दृष्टि से विशेष और पवित्र माना जाता था।

यह मान्यता दर्शाती है कि भारतीय संस्कृति में समय को केवल तिथियों या कैलेंडर के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि सूर्य की गति के साथ जुड़े उसके आध्यात्मिक अर्थ को भी गहराई से समझा गया है।

वैदिक काल से ही सूर्य पूजा का प्रचलन रहा है

सूर्य पूजा भारत में केवल एक आस्था नहीं, बल्कि वैदिक जीवन-पद्धति की एक मजबूत आधारशिला रही है। ऋग्वेद (ऋग्वेद 1.50.4) में सूर्य को प्रत्यक्ष देवता माना गया है, जो प्रकाश देता है, जीवन को चलायमान रखता है और सही मार्ग दिखाता है। वैदिक दृष्टि में सूर्य केवल भौतिक रोशनी का स्रोत नहीं है, बल्कि ब्रह्मांडीय व्यवस्था, सत्य और अनुशासन का प्रतीक भी है।

इसी कारण भारत में सूर्य का स्मरण केवल पूजा तक सीमित नहीं रहा। यह एक अनुशासित जीवनशैली का हिस्सा बना, जिसमें दैनिक दिनचर्या, ऋतुओं के अनुसार जीवन, धर्म और कर्म का संतुलन शामिल है। उपनिषदों में भी सूर्य को प्रकाश, जीवन और चेतना का प्रतीक माना गया है। यह निरंतर परंपरा बताती है कि भारतीय संस्कृति में धर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि प्रकृति और जीवन के साथ सामंजस्य है।

पुराणों में सूर्य को आदित्य कहा गया है और नौ ग्रहों में इसे सबसे प्रमुख माना गया है। सूर्य को सिर्फ ऊष्मा या ऊर्जा का स्रोत नहीं, बल्कि धर्म का साक्षी, प्रत्यक्ष देवता और प्रकाश का आधार माना गया। इसी विश्वास के कारण भारत के अलग-अलग हिस्सों में सूर्य पूजा की परंपराएँ अलग रूपों में विकसित हुईं, कहीं अर्घ्य देने की परंपरा, कहीं उपवास, कहीं विशेष पूजा और कहीं सूर्य मंदिरों का निर्माण।

इसी सूर्य उपासना की परंपरा से मोढेरा में आयोजित होने वाला उत्तरार्ध महोत्सव भी जुड़ा है। उत्तरायण के बाद जब सूर्य उत्तर दिशा की ओर बढ़ते हुए शीत ऋतु के अंत का संकेत देता है और दिन लंबे होने लगते हैं, तब मोढेरा सूर्य मंदिर में यह उत्सव मनाया जाता है। इसका नाम किसी नई कल्पना से नहीं, बल्कि सूर्य की गति और ऋतु परिवर्तन के गहरे सांस्कृतिक अर्थ से प्रेरित है।

मोढेरा सूर्य मंदिर: धर्म और विज्ञान का संगम

मोढेरा का सूर्य मंदिर भारत की उस परंपरा का जीवंत उदाहरण है, जहाँ मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं थे, बल्कि खगोल विज्ञान और उत्कृष्ट स्थापत्य ज्ञान के केंद्र भी हुआ करते थे। ऐसे मंदिरों में दिशा, सूर्य का प्रकाश, समय और ऋतुओं का विशेष ध्यान रखा जाता था।

इससे यह स्पष्ट होता है कि भारतीय सनातन परंपरा में आस्था और विज्ञान के बीच कोई टकराव नहीं था, बल्कि दोनों एक-दूसरे के पूरक थे। यही कारण है कि मोढेरा जैसे मंदिर आज भी केवल पत्थर की इमारत नहीं, बल्कि पूरी सभ्यता का संदेश देते हैं।

वैदिक काल और रामायण-महाभारत में मोढेरा का उल्लेख अन्य नामों से मिलता है, लेकिन वर्तमान सूर्य मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी में हुआ माना जाता है। यह मंदिर सोलंकी वंश के राजा भीमदेव प्रथम के शासनकाल में बना था।

राजा भीमदेव स्वयं को सूर्यवंशी मानते थे और यह पहचान केवल शासन तक सीमित नहीं थी, बल्कि मंदिर की वास्तुकला और धार्मिक भाव में भी साफ दिखाई देती है। मंदिर की दीवारों पर बारह आदित्यों की सुंदर नक्काशी की गई है, जो वैदिक परंपरा में सूर्य के बारह रूपों का प्रतीक हैं।

मंदिर की वास्तुकला का सबसे खास पहलू इसका खगोलीय संरेखण है। वसंत विषुव के दिन, जब दिन और रात बराबर होते हैं, सूर्य की पहली किरणें सीधे मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करती हैं और भगवान सूर्य के मुकुट पर पड़ती हैं।

इससे पूरा मंदिर प्रकाश से भर उठता है। यह उस समय के वैदिक खगोल विज्ञान और वैज्ञानिक समझ का अद्भुत उदाहरण है। मंदिर की दिशा, संरचना और सूर्य की गति के बीच यह सामंजस्य दिखाता है कि प्राचीन भारत में धर्म, विज्ञान और वास्तुकला को एक साथ जोड़ा गया था।

आज मोढेरा में आयोजित होने वाला उत्तरार्ध महोत्सव इसी परंपरा को आधुनिक समय से जोड़ता है। यह उत्सव सूर्य पूजा, जीवन चक्र और समय की भारतीय समझ को नए संदर्भ में प्रस्तुत करता है।

यह संदेश देता है कि भारतीय सभ्यता में समय केवल कैलेंडर तक सीमित नहीं, बल्कि संस्कृति का अहम हिस्सा है। मोढेरा सूर्य मंदिर और यहाँ होने वाला उत्तरार्ध महोत्सव इस जीवंत परंपरा की निरंतरता का प्रतीक हैं, जहाँ सूर्य उपासना, भारतीय कालगणना और शास्त्रीय कला एक साथ दिखाई देती हैं।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से गुजराती में भार्गव राज्यगुरु ने लिखी है, मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)





बीएमसी चुनाव 2026 में कॉन्ग्रेस ने कैसे डुबोई ठाकरे परिवार की लुटिया, जानें- अगर ‘पंजे’ ने नहीं छुड़ाया होता हाथ, तो क्या हो सकते थे नतीजे

ब्रुहनमुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) चुनाव 2026 के नतीजे ठाकरे परिवार के लिए बेहद करारा झटका लेकर आए हैं। 227 सीटों वाली इस महानगरपालिका में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अकेले 89 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनने का गौरव हासिल किया। उद्धव ठाकरे की शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) 65 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही, जबकि एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना को 29 सीटें मिलीं। लेकिन इस पूरे चुनावी दंगल का सबसे बड़ा सवाल यही है कि उद्धव और राज ठाकरे की जोड़ी आखिर बहुमत से क्यों दूर रह गई? इसका सबसे सीधा जवाब है कॉन्ग्रेस का साथ न मिलना और सबसे पहले कॉन्ग्रेस का ही गठबंधन तोड़ना।

कॉन्ग्रेस की रणनीति ने डुबोई ठाकरे परिवार की लुटिया

इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम की सबसे पहली और सबसे बड़ी गलती कॉन्ग्रेस द्वारा गठबंधन तोड़ने का फैसला था। बीएमसी चुनाव से पहले महा विकास अघाड़ी (MVA) को फिर से एकजुट करने की कोशिशें चल रही थीं, लेकिन कॉन्ग्रेस ने साफ कर दिया कि वह इस चुनाव में अकेले उतरेगी। खासतौर पर कॉन्ग्रेस ने राज ठाकरे की मनसे के साथ किसी भी तरह के गठबंधन से इनकार कर दिया। कॉन्ग्रेस का तर्क था कि मनसे की राजनीति उत्तर भारतीयों और अल्पसंख्यकों के लिए असहज है और नगर निगम जैसे चुनाव में सामाजिक संतुलन बेहद जरूरी होता है।

कॉन्ग्रेस के इस फैसले का सीधा असर यह हुआ कि विपक्षी वोट पूरी तरह बँट गया। एक तरफ उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की जोड़ी, दूसरी तरफ अकेली कॉन्ग्रेस और सामने पहले से मजबूत बीजेपी-शिंदे महायुति। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर कॉन्ग्रेस शुरुआत में ही गठबंधन नहीं तोड़ती और एमवीए एकजुट रहता, तो मुकाबला बेहद करीबी हो सकता था। लेकिन अलग-अलग लड़ने के फैसले ने ठाकरे परिवार की चुनावी जमीन कमजोर कर दी।

साल 2017 में अलग थे चुनाव के नतीजे

अगर बीते इतिहास को देखें तो 2017 का बीएमसी चुनाव बेहद अलग तस्वीर दिखाता है। उस वक्त बीजेपी और शिवसेना साथ थे। शिवसेना ने 84 सीटें जीती थीं और बीजेपी को 82 सीटें मिली थीं। दोनों पार्टियों के बीच जबरदस्त टक्कर थी, लेकिन सत्ता ठाकरे परिवार के हाथ में ही रही। 2019 के विधानसभा चुनाव में भी एनडीए को बहुमत मिला, लेकिन उद्धव ठाकरे ने बीजेपी का साथ छोड़कर कॉन्ग्रेस और एनसीपी के साथ एमवीए सरकार बना ली।

साल 2022 तक चली एमवीए सरकार के बाद शिवसेना टूट गई। एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बड़ा शिवसैनिक धड़ा अलग हो गया। इसके बाद उद्धव ठाकरे की राजनीतिक ताकत लगातार कमजोर होती चली गई। बीएमसी चुनाव इस कमजोरी की सबसे बड़ी परीक्षा थी। यह चुनाव यह भी साबित करता है कि उद्धव ठाकरे जब तक बीजेपी के साथ थे, तब तक उनकी सत्ता मजबूत थी। जैसे ही उन्होंने बीजेपी से दूरी बनाई, संगठन और वोट दोनों कमजोर होते चले गए।

शिवसैनिकों का स्वार्थ गठबंधन से दूर जाना भी रहा अहम

शिवसैनिक दशकों से कॉन्ग्रेस का विरोध करते आए हैं। ऐसे में उद्धव ठाकरे के लिए कॉन्ग्रेस के साथ वैचारिक तालमेल बनाना पहले से ही मुश्किल था। ऊपर से राज ठाकरे के साथ गठबंधन ने स्थिति और उलझा दी। राज ठाकरे के कट्टर मराठी और उत्तर भारतीय विरोधी बयानों ने मुस्लिम और गैर-मराठी वोटरों को उद्धव से दूर कर दिया। इसका सीधा फायदा बीजेपी को मिला, जो खुद को स्थिर और भरोसेमंद विकल्प के तौर पर पेश कर रही थी।

बीजेपी ने ठाकरे भाइयों की जुगलबंदी को ‘स्वार्थी गठजोड़’ करार दिया और जमीन पर इसका असर भी दिखा। शिवसेना (UBT) का संगठन भ्रम और श्रेय की लड़ाई में कमजोर पड़ा। ठाकरे विरासत को लेकर पार्टी के अंदर ही असमंजस बना रहा। वहीं, शिंदे गुट ने खुद को असली शिवसेना बताकर पारंपरिक शिवसैनिकों को अपनी ओर खींच लिया।

आँकड़ों में बीएमसी चुनाव के नतीजे

अब अगर बीएमसी चुनाव 2026 के फाइनल आँकड़ों पर नजर डालें, तो तस्वीर और साफ हो जाती है। कुल वोटों में बीजेपी को 11,79,273 वोट मिले, जो 45.22 फीसदी हैं। शिवसेना (उद्धव) को 7,17,736 वोट (27.52 फीसदी) और कॉन्ग्रेस को 2,42,646 वोट (4.44 फीसदी) मिले। यानी अगर उद्धव ठाकरे और कॉन्ग्रेस साथ होते, तो उनके संयुक्त वोट 9,60,382 हो जाते, जो बीजेपी के बेहद करीब पहुँचते।

सीटों के आँकड़े भी यही कहानी कहते हैं।

  • बीजेपी – 89 सीटें
  • शिवसेना (उद्धव) – 65 सीटें
  • शिवसेना (शिंदे) – 29 सीटें
  • कॉन्ग्रेस – 24 सीटें
  • मनसे – 6 सीटें
  • एनसीपी (अजित) – 3 सीटें
  • एआईएमआईएम – 8 सीटें

अगर सिर्फ गणित के लिहाज से देखें तो उद्धव ठाकरे, कॉन्ग्रेस और मनसे का गठबंधन 95 सीटों तक पहुँचता दिखता है। लेकिन असल खेल वोट ट्रांसफर का था, जहाँ गठबंधन होता तो 40–50 वार्डों में नतीजे पलट सकते थे।

बीएमसी चुनाव के नतीजे

कॉन्ग्रेस के वोटों ने छीनी शिवसेना-UBT से जीत

मुंबई के कई ऐसे वार्ड रहे, जहाँ हार-जीत का अंतर बेहद कम था। अंधेरी ईस्ट, गोरेगांव, मालाड जैसे इलाकों में कॉन्ग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक रहा है। इन इलाकों में उद्धव ठाकरे के उम्मीदवार सिर्फ इसलिए हार गए क्योंकि वोट बंँट गया। अगर कॉन्ग्रेस साथ होती, तो ये सीटें आसानी से ठाकरे खेमे में जा सकती थीं।

शिवसेना (UBT) कई ऐसे वार्डों में हारी, जहाँ कॉन्ग्रेस ने 3 से 6 हजार वोट काट लिए। ये वही वार्ड थे, जिन्हें दशकों से शिवसेना का गढ़ माना जाता रहा है। दादर, परेल जैसे इलाकों में भी यही ट्रेंड देखने को मिला। यहां महायुति को फायदा सिर्फ इसलिए मिला क्योंकि विपक्ष बंटा हुआ था।

कॉन्ग्रेस की 24 सीटें यह साबित करती हैं कि पार्टी अभी भी मुंबई में पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। लेकिन अकेले लड़ने का फैसला उसके लिए भी घाटे का सौदा साबित हुआ। अगर वह उद्धव ठाकरे के साथ जाती, तो उसकी सीटें भी 35–40 तक पहुँच सकती थीं और सत्ता की तस्वीर ही बदल जाती।

मनसे से गठबंधन ने उद्धव को किया बर्बाद

राज ठाकरे के साथ गठबंधन उद्धव ठाकरे की सबसे बड़ी रणनीतिक भूल साबित हुई। मनसे का वोट शेयर सिर्फ 5 फीसदी के आसपास रहा और उसे केवल 6 सीटें मिलीं। इसके उलट, कॉन्ग्रेस के पास 4.44 फीसदी वोट और 24 सीटें थीं, जो कहीं ज्यादा असरदार थीं। उद्धव ठाकरे अगर मनसे की बजाय कॉन्ग्रेस को प्राथमिकता देते, तो मराठी वोट के साथ अल्पसंख्यक और सेकुलर वोट भी उनके साथ आता।

यहाँ यह कहना भी जरूरी है कि गलती सिर्फ उद्धव ठाकरे की नहीं थी। फैक्ट यह है कि सबसे पहले कॉन्ग्रेस ने ही ‘एकला चलो रे’ की नीति अपनाई। कॉन्ग्रेस नेतृत्व ने उद्धव ठाकरे को यह भरोसा नहीं दिलाया कि वह हर हाल में गठबंधन में रहेगी। इसी वजह से उद्धव ठाकरे ने मजबूरी में मनसे का रास्ता चुना।

कॉन्ग्रेस के पंजे ने दिखाया ठेंगा, तो ठह गया ठाकरे परिवार का किला

अगर एमवीए एकजुट रहता, तो बीएमसी में महायुति के लिए बहुमत पाना बेहद मुश्किल होता। आँकड़े बताते हैं कि विपक्ष की संयुक्त ताकत बीजेपी के बेहद करीब थी। लेकिन अलग-अलग लड़ने से यह ताकत बिखर गई और बीजेपी-शिंदे गठबंधन को सीधा फायदा मिल गया।

बीएमसी हारना उद्धव ठाकरे के लिए सिर्फ एक चुनावी हार नहीं, बल्कि राजनीतिक ताकत के केंद्र का छिन जाना है। बीएमसी से मिलने वाला आर्थिक और सांगठनिक बल ही शिवसेना की असली ताकत रहा है। 25 साल बाद यह किला हाथ से निकलना ठाकरे परिवार के लिए बड़ा झटका है।

वहीं, कॉन्ग्रेस के लिए यह नतीजा चेतावनी है। 24 सीटें यह दिखाती हैं कि पार्टी प्रासंगिक है, लेकिन अकेले लड़कर वह सत्ता तक नहीं पहुँच सकती। अगर वह गठबंधन की राजनीति को नहीं समझेगी, तो उसका असर आगे विधानसभा और लोकसभा चुनावों में भी दिख सकता है।

कुल मिलाकर बीएमसी चुनाव का नतीजा यही सिखाता है कि विपक्ष का बिखराव सत्ता पक्ष के लिए वरदान बन जाता है। कॉन्ग्रेस द्वारा सबसे पहले गठबंधन तोड़ना, उद्धव ठाकरे की मनसे के साथ गलत प्राथमिकता और शिंदे-बीजेपी की मजबूत जमीन… इन तीनों ने मिलकर ठाकरे परिवार की लुटिया डुबो दी।

उद्धव ठाकरे और कॉन्ग्रेस इस हार से लेंगे सबक?

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या उद्धव ठाकरे और कॉन्ग्रेस इस हार से सबक लेंगे? क्या एमवीए फिर से एकजुट होगा या विपक्ष ऐसे ही बिखरा रहेगा? अगर जवाब नहीं में रहा, तो आने वाले चुनावों में भी तस्वीर कुछ अलग नहीं होगी।

कुल मिलाकर बीएमसी चुनाव 2026 ने यह साबित कर दिया कि मुंबई जैसे जटिल शहर में ‘एकला चलो’ की नीति काम नहीं करती। वैसे भी, राजनीति में भावनाओं से ज्यादा गणित चलता है। और इस गणित में इस बार सबसे बड़ी गलती कॉन्ग्रेस की रही, जिसने सबसे पहले गठबंधन तोड़ा और ठाकरे परिवार की सबसे मजबूत सत्ता को इतिहास बना दिया। कॉन्ग्रेस ने न सिर्फ खुद को नुकसान पहुँचाया, बल्कि ठाकरे परिवार की राजनीतिक नाव भी डुबो दी। अब मुंबई की सत्ता पर महायुति का पूरा कब्जा है और विपक्ष को एकजुट होने की नई चुनौती मिल गई है।

‘गाजा पीस प्लान’ में शामिल होने के लिए ₹8,300 करोड़ की रंगदारी? UN का अल्टरनेटिव खड़ा करने के चक्कर में ट्रंप ने शुरू कर दी वसूली?: जानिए पूरा मामला

अमेरिका राष्ट्रपति ट्रंप ने गाजा के विकास के लिए नेशनल कमेटी फॉर द एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ गाजा यानी एनसीएजी के गठन के साथ-साथ इसकी निगरानी के लिए ‘बोर्ड ऑफ पीस’ के गठन का ऐलान किया है। इसकी स्थाई सदस्यता के लिए किसी भी देश को 1 बिलियन डॉलर यानी करीब ₹8,300 करोड़ नकद देना होगा।

गाजा के लिए एनसीएजी का गठन

गाजा संघर्ष को पूरी तरह रोकने और फिलिस्तीनी एन्क्लेव के पुनर्निमाण के लिए एनसीएजी बनाया गया है। साथ ही इसके सहयोग के लिए गाजा एग्जीक्यूटिव बोर्ड भी गठित किया गया है।

NCAG की अध्यक्षता डॉ. अली शाथ करेंगे। डॉ. शाथ एक तकनीकी विशेषज्ञ (टेक्नोक्रेट) हैं। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, अली शाथ गाजा में बुनियादी सुविधाओं- जैसे पानी, बिजली, स्वास्थ्य और शिक्षा को बहाल करने, नागरिक संस्थाओं को मजबूत करने और रोजमर्रा की जिंदगी को स्थिर करने की जिम्मेदारी संभालेंगे।

गाजा एग्जीक्यूटिव बोर्ड के सदस्यों की जिम्मेदारी भी बंटी हुई होगी। आने वाले कुछ हफ्तों में इसके सदस्यों की घोषणा की जाएगी।

इस कमेटी की देखरेख और धन जुटाने के लिए उन्होंने ‘बॉर्ड ऑफ पीस’ का गठन किया गया है। इसके अध्यक्ष राष्ट्रपति ट्रंप होंगे। ब्लूमबर्ग न्यूज के मुताबिक, बोर्ड की स्थाई सदस्यता के लिए देशों से 1 बिलियन डॉलर यानी करीब ₹8,300 करोड़ के नकद Entry Fee की माँग की गई है।

हालाँकि अमेरिका ने ब्लूमबर्ग न्यूज को गुमराह करने वाला बताया है। व्हाइट हाउस के मुताबिक, रिपोर्ट गुमराह करने वाला है। बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने के लिए कोई न्यूनतम सदस्यता फीस नहीं है। ये सिर्फ उन देशों के लिए है, जो स्थाई सदस्य होंगे और शांति समृद्धि के प्रति गहरी प्रतिबद्धता दिखाते हैं।

बोर्ड ऑफ पीस का गठन

चार्टर के मुताबिक, बोर्ड ऑफ पीस के सदस्य राष्ट्रों का कार्यकाल बोर्ड के अध्यक्ष यानी राष्ट्रपति ट्रंप की इच्छा पर 3 साल का होगा। हालाँकि 3 साल की सदस्यता वाली बात उन देशों पर लागू नहीं होगी, जो चार्टर के लागू होने के पहले साल के भीतर बोर्ड ऑफ पीस को 1 अरब अमेरिका डॉलर यानी ₹8,300 करोड़ दे देंगे यानी सदस्य देशों के लिए पैसा देना पहली शर्त है।

बोर्ड के अध्यक्ष राष्ट्रपति ट्रंप होंगे। गाजा में युद्धविराम के बाद वहाँ की जर्जर हालत को सुधारना और विकास सुनिश्चित करना, पुनर्निर्माण के लिए धन जुटाना और उसकी निगरानी करना बोर्ड का कार्य है। गाजा में रोजमर्रा के विकास कार्यों की भी देखभाल करेगा। इसकी सुरक्षा के लिए इंटरनेशनल स्टेबलाइजेशन फोर्स की तैनाती की जाएगी। इस फोर्स को बोर्ड का समर्थन प्राप्त होगा।

व्हाइट हाउस की ओर से मिले संकेतों के मुताबिक, इस बोर्ड का काम सिर्फ गाजा तक ही सीमित नहीं होगा, बल्कि दुनियाभर में चल रहे संघर्षों की रोकथाम में ‘नया नजरिया’ सामने लाएगा।

इजरायल ने अमेरिकी पहल की आलोचना की

इजरायल ने प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने गाजा के लिए बनाए गए बॉर्ड ऑफ पीस की आलोचना की है। उनका कहना है कि अमेरिका ने बगैर उनसे बातचीत किए, इसकी घोषणा की। इजरायल का कहना है कि यह फैसला उसकी सरकारी नीति के खिलाफ है।

दरअसल पीस बोर्ड के अलावा गाजा एग्जीक्यूटिव बोर्ड बनाया गया है जिसके शुरुआती सदस्यों में यूएई के मंत्री रीम अल हाशिमी, तुर्किए के विदेश मंत्री हकान फिदान अली अल थावादी, बुल्गेरिया के नेता निकोलास म्लाडेनोव को शामिल किया गया है।

इजरायल के विदेश मंत्री गिदोन सार अमेरिकी विदेश मंत्री के सामने तुर्किए को शामिल किए जाने का मुद्दा उठाएँगे। इजरायल ने हालाँकि आधिकारिक तौर पर तुर्किए को लेकर कुछ नहीं कहा है, लेकिन मीडियो रिपोर्ट के मुताबिक, तुर्किए के विदेश मंत्री हाकान फिदान को बोर्ड में रखने पर इजरायल खफा है।

तुर्किए हमास का समर्थन करता रहा है इसलिए इजरायल से उसके संबंध अच्छे नहीं हैं। इजरायल का मानना है कि गाजा को किसी कार्यकारी बोर्ड की जरूरत नहीं है। वहाँ से हमास को खत्म करना और स्वैच्छिक पलायन को समर्थन करना जरूरी है।

कई समीक्षकों का मानना है कि ट्रंप हो सकता है संयुक्त राष्ट्र का विकल्प तलाश रहे हैं, जिसकी वे काफी दिनों से आलोचना करते रहे हैं।

ड्राफ्ट में बोर्ड को ‘एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन’ बताया गया है। यह स्थिरता को बढ़ावा देगा। भरोसेमंद और कानूनी शासन बहाल करने में भूमिका निभाएगा। अस्थिर इलाकों में स्थायी शांति सुनिश्चित करेगा।

‘बोर्ड ऑफ पीस’ के सदस्य

राष्ट्रपति ट्रंप बोर्ड ऑफ पीस के अध्यक्ष होंगे। इसके अलावा उन सदस्यों के नाम जारी किए गए हैं, जो गाजा के लिए ट्रंप प्रशासन के नए ‘बोर्ड ऑफ पीस‘ में शामिल होंगे।

अजय बंगा- बोर्ड के सदस्य में भारतीय मूल के अजय बंगा का नाम शामिल है, जो विश्व बैंक के अध्यक्ष हैं। 1959 में पुणे में पैदा हुए अजयपाल सिंह बंगा के पिता भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट जनरल थे। 2007 में बंगा अमेरिका के नागरिक बने। 2023 में बाइडेन प्रशासन ने उनका नाम विश्व बैंक के अध्यक्ष के तौर पर नामित किया था। इससे पहले वे एक्सोर के चेयरमैन थे।

सर टोनी ब्लेयर- ब्रिटेन के पूर्व पीएम टोनी ब्लेयर को बोर्ड ऑफ पीस का सदस्य बनाया गया है। वे 1997 से 2007 तक ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहे। इस दौरान 2003 में इराक युद्ध में ब्रिटेन को शामिल किया था। ये इस बोर्ड के एकमात्र गैर अमेरिकी नागरिक हैं।

मार्को रुबियो- अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो को ट्रंप का सबसे करीबी माना जाता है। उन्होंने इजरायल-हमास युद्धविराम समझौते का समर्थन किया था। उन्होंने अक्टूबर में इजरायल के संसद के उस पहल का भी विरोध किया था जिसमें वेस्ट बैंक के कब्जे वाले क्षेत्र को इजरायल में मिला लेने को कहा गया था।

स्टीव विटकॉफ- अमेरिका के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ भी बोर्ड ऑफ पीस में शामिल हैं। मध्यपूर्व क्षेत्र के लिए स्टीव विटकॉफ काफी एक्टिव रहे। हमास को हथियार डालने के लिए तैयार करना और गाजा के पुनर्निर्माण की योजना में इनका बड़ा हाथ है।

विटकॉफ रूस और यूक्रेन के बीच शांति समझौता कराने की अमेरिका के कोशिशों में भी अहम भूमिका निभा चुके हैं। दिसंबर में मॉस्को में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की हुई 5 घंटे की बैठक भी शामिल थे।

जेरेड कुश्नर- राष्ट्रपति ट्रंप के दामाद और जेरेड कुश्नर अमेरिकी विदेश नीति से जुड़े मुद्दों में अहम भूमिका निभाते रहे हैं। इजरायल -गाजा युद्ध में अमेरिका की ओर से मध्यस्थ की भूमिका निभा चुके हैं। उन्होंने नवबंर 2025 में इजरायल के पीएम नेतन्याहू से मुलाकात की थी। इन्होंने कहा था कि गाजा के समुद्र किनारे की जमीन काफी कीमती है, अगर इसे विकसित किया जाए तो।

मार्क रोवन- अमेरिकी इक्विटी कंपनी अपोलो ग्लोबल मैनेजमेंट के सीईओ मार्क रोवन हैं। इन्हें अमेरिका का वित्त मंत्री बनाए जाने की संभावना भी थी।

रॉबर्ट गैब्रियल- अमेरिका राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार गैब्रियल को बॉर्ड ऑफ पीस में जगह मिली है। 2016 से ये राष्ट्रपति ट्रंप के साथ जुड़े रहे हैं और उनके करीबी माने जाते हैं।

निकोले म्लादेनोव- बुल्गारिया के राजनेता और संयुक्त राष्ट्र के मध्य पूर्व के दूत निकोले म्लादेनोव बोर्ड ऑफ पीस के सदस्य हैं। ये दूसरे ऐसे नागरिक हैं, जो अमेरिकन नहीं हैं। गाजा में जमीनी स्तर पर बोर्ड का कामकाज ये देखेंगे। ये एनसीएजी की निगरानी भी करेंगे।

गाजा में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने की जिम्मेदारी अमेरिकी के मेजर जनरल जैस्पर जेफर्स को इंटरनेशनल स्टेबिलाइजेशन फोर्स का कमांडर बनाकर सौंपा गया है। वे गाजा के पुनर्निर्माण में इस्तेमाल की जानेवाली चीजों की सुरक्षा देखेंगे।

VGRC, समुद्री रोजगार और करोड़ों का निवेश: कैसे राज्य की विस्तारित तटरेखा को ‘ब्लू इकोनॉमी’ से जोड़ रही गुजरात सरकार

गुजरात को अब तक देश के औद्योगिक इंजन के रूप में पहचाना जाता रहा है लेकिन आने वाले समय में उसकी पहचान सिर्फ जमीन आधारित विकास तक सीमित नहीं रहेगी। राज्य सरकार अब गुजरात की लंबी तटरेखा को विकास कर इसे ‘ब्लू इकोनॉमी’ से जोड़ने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है।

हाल ही में आधुनिक और उन्नत मानचित्रण तकनीक के जरिए किए गए एक नए आकलन में सामने आया है कि गुजरात की तटरेखा पहले मानी गई तुलना में कहीं अधिक विस्तृत है। यह बदलाव समुद्र के स्तर में वृद्धि की वजह से नहीं बल्कि अधिक सटीक और वैज्ञानिक मापन के कारण सामने आया है।

इस नए आकलन के साथ ही गुजरात के लिए आर्थिक विकास, निवेश और रोजगार के नए अवसर खुलने की उम्मीद जगी है। वाइब्रेंट गुजरात रीजनल कॉन्फ्रेंस (VGRC) के मंच पर सरकार ने निजी क्षेत्र के सहयोग से समुद्री अर्थव्यवस्था में निवेश बढ़ाने और तटीय क्षेत्रों की संभावनाओं को विकास में बदलने का रोडमैप भी पेश किया है।

अब तक तटरेखा का मापन सीधी रेखा के आधार पर किया जाता था, इस वजह से कई तटीय इलाकों को गिनती में शामिल नहीं किया जा पाता था। नए और बेहतर मापन से यह साफ हो गया है कि गुजरात ही नहीं बल्कि पूरे भारत में समुद्री अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की बहुत बड़ी संभावनाएँ हैं।

गुजरात की तटरेखा का नया आकलन क्यों जरूरी?

दशकों तक भारत की तटरेखा से जुड़े आँकड़े पुराने सर्वे तरीकों और सीमित संसाधनों पर आधारित थे। अब उपग्रह इमेजरी, GIS विश्लेषण और हाई-रिजॉल्यूशन डेटा ने तटीय भूगोल की कहीं अधिक सटीक और स्पष्ट तस्वीर सामने रखी है।

इन नई तकनीकों के आधार पर गुजरात की तटरेखा का ताजा आकलन किया गया है, जिसमें इसकी लंबाई पहले माने जा रहे लगभग 1600 KM के बजाय 2340 KM से भी अधिक आंकी गई है।

इस नए और अधिक सटीक मापन को अब नीति-निर्माण, अवसंरचना विकास और निवेश योजनाओं में आधार बनाया जा सकता है। तटरेखा के बढ़े दायरे का मतलब सिर्फ नक्शे में बदलाव नहीं, बल्कि तटीय विकास की संभावनाओं का विस्तार है।

इससे समुद्री जैव विविधता संरक्षण, मत्स्य पालन, बंदरगाह व्यापार, लॉजिस्टिक्स और तटीय औद्योगिक परियोजनाओं को नई गति मिलेगी। सरल शब्दों में कहें तो गुजरात का समुद्री विस्तार अब पहले से ज्यादा व्यापक, मजबूत और भविष्य के लिए कहीं अधिक संभावनाओं से भरा दिखता है।

‘ब्लू इकोनॉमी’ का मतलब: समुद्र से विकास की ओर कदम

‘ब्लू इकोनॉमी’ कोई नया या दिखावटी शब्द नहीं है। इसका सीधा मतलब है समुद्री संसाधनों का समझदारी से उपयोग करते हुए आर्थिक विकास करना, रोजगार पैदा करना और पर्यावरण संतुलन बनाए रखना। ब्लू इकोनॉमी में सिर्फ बंदरगाह और जहाज ही नहीं बल्कि मछली पालन, समुद्री पर्यटन, तटीय ढांचा, समुद्र से जुड़ी नई तकनीक और माल ढुलाई जैसे क्षेत्र भी शामिल हैं।

भारत सरकार इसे भविष्य की एक अहम रणनीतिक प्राथमिकता मान रही है। इसकी वजह भारत की लंबी तटरेखा और प्रमुख वैश्विक व्यापार मार्गों पर उसकी मजबूत भौगोलिक स्थिति है, जो देश को अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखलाओं का बड़ा केंद्र बना सकती है। इस पूरे संदर्भ में गुजरात की भूमिका और भी अहम हो जाती है। राज्य पहले से एक मजबूत औद्योगिक केंद्र है और अब इसी ताकत को तटीय इलाकों में बंदरगाह-आधारित विकास के साथ जोड़ा जा सकता है।

हाल में हुए व्यापक और उन्नत मानचित्रण ने यह संभावना और मजबूत कर दी है कि गुजरात आने वाले समय में ‘समुद्र-आधारित विकास’ के अगले चरण का नेतृत्व करने में अहम भूमिका निभाएगा।

नई तटरेखा, नई संभावनाएँ: ‘ब्लू इकोनॉमी’ पर सरकार का फोकस

गुजरात में ‘ब्लू इकोनॉमी’ को नई गति देने के लिए सरकार की नीति और निवेश प्रयासों का अहम उदाहरण सौराष्ट्र–कच्छ क्षेत्र के लिए आयोजित वाइब्रेंट गुजरात रीजनल कॉन्फ्रेंस (VGRC) है। यह सम्मेलन 11 और 12 जनवरी 2026 को राजकोट के मारवाड़ी विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित किया गया, जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया।

इस क्षेत्रीय सम्मेलन का मुख्य फोकस सौराष्ट्र–कच्छ के 12 जिलों के औद्योगिक और आर्थिक विकास पर रहा। खास तौर पर बंदरगाह और लॉजिस्टिक्स, मछली पालन, सिरेमिक, इंजीनियरिंग और समुद्री अर्थव्यवस्था से जुड़े अन्य क्षेत्रों में निवेश और विस्तार की संभावनाओं को रेखांकित किया गया।

VGRC का आयोजन वाइब्रेंट गुजरात मॉडल को स्थानीय और क्षेत्रीय विकास से जोड़ने के उद्देश्य से किया गया था, ताकि निवेश के अवसर सीधे जमीनी स्तर तक पहुँच सकें। यह सम्मेलन राज्य सरकार की आधिकारिक योजना के तहत ‘विकसित भारत 2047’ के विजन को ध्यान में रखते हुए आयोजित किया गया, जिससे यह साफ संकेत मिलता है कि गुजरात समुद्र-आधारित विकास को भविष्य की आर्थिक रणनीति के रूप में आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह तैयार है।

VGRC: नीति, उद्योग और निवेश को जोड़ने वाला एक मंच

वाइब्रेंट गुजरात रीजनल कॉन्फ्रेंस (VGRC) को सिर्फ एक औपचारिक आयोजन के रूप में देखना सही नहीं होगा। यह एक ऐसे विकास मॉडल का हिस्सा है, जिसमें सरकार निवेशकों, उद्योग जगत, विशेषज्ञों और क्षेत्रीय क्षमताओं को एक मंच पर लाकर विकास के लिए एक ठोस और व्यावहारिक रोडमैप तैयार करती है।

VGRC के दौरान बड़ी संख्या में समझौता ज्ञापनों (MoU) पर हस्ताक्षर होने को लेकर आई हालिया खबरें इस बात का संकेत हैं कि गुजरात सरकार क्षेत्रीय स्तर पर निवेश को तेजी से बढ़ाने के लिए एक सक्रिय और योजनाबद्ध रणनीति पर काम कर रही है।

इस पूरे संदर्भ में ‘ब्लू इकोनॉमी’ की भूमिका बेहद अहम हो जाती है। गुजरात के तटीय क्षेत्रों के नए और विस्तृत आकलन ने राज्य को एक नई समुद्र-आधारित विकास योजना की ओर अग्रसर कर दिया है।

इसके तहत सरकार निजी क्षेत्र के साथ साझेदारी में बंदरगाह, लॉजिस्टिक्स और मछली पालन जैसे अहम क्षेत्रों में निवेश आकर्षित कर सकती है। इससे न सिर्फ आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ेंगी, बल्कि राज्य में रहने वाले करोड़ों लोगों को रोजगार और आय के नए अवसरों के रूप में सीधा लाभ भी मिलेगा।

समझौता ज्ञापन और निवेश

दो दिवसीय सम्मेलन के दौरान कुल 5492 समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए गए, जिनमें लगभग ₹5.78 लाख करोड़ के संयुक्त निवेश का प्रस्ताव है। यह निवेश रोजगार सृजन, बुनियादी ढाँचा के विस्तार और क्षेत्रीय विकास के लिए एक बड़ा आधार बन सकता है।

विशेष रूप से सौराष्ट्र–कच्छ क्षेत्र में हुए निवेश प्रस्तावों की बात करें तो कच्छ जिले में ₹1.25 लाख करोड़ के निवेश के लिए समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए गए हैं। वहीं, भावनगर में ₹60,000 करोड़ के निवेश का प्रस्ताव सामने आया है। अमरेली जिले में ₹36,000 करोड़ के निवेश से जुड़े समझौते किए गए हैं जबकि राजकोट में कुल 2,921 परियोजनाओं के लिए करीब ₹23,000 करोड़ के समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर हुए हैं।

ये आँकड़े साफ तौर पर बताते हैं कि सबसे लंबी तटरेखा वाले कच्छ क्षेत्र में सबसे अधिक निवेश प्रस्तावित हुआ है, जो कुल समझौता ज्ञापनों के निवेश का आधे से भी अधिक हिस्सा है। यह स्थिति ब्लू इकोनॉमी के नजरिये से बेहद अहम है, क्योंकि इससे यह साफ होता है कि समुद्री अवसरों और तटीय विकास को सीधे निवेश से जोड़ा जा रहा है और राज्य समुद्र-आधारित विकास को आर्थिक रणनीति के केंद्र में ला रहा है।

समुद्री क्षेत्र की भूमिका और ‘ब्लू इकोनॉमी’ का महत्व

गुजरात में भारत की सबसे लंबी तटरेखा है, खासकर सौराष्ट्र–कच्छ तट, जिसका भौगोलिक और आर्थिक दृष्टि से बहुत महत्व है। यह विशाल तटीय क्षेत्र अरब सागर और कच्छ की खाड़ी से जुड़ा हुआ है, जो स्वाभाविक रूप से बंदरगाह, जहाजरानी, रसद, मत्स्य पालन और समुद्री उद्योगों के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करता है।

‘ब्लू इकोनॉमी’ का मतलब है समुद्र से जुड़ी सभी आर्थिक गतिविधियों का सतत, व्यवस्थित और दीर्घकालिक विकास, जिसमें जहाजरानी, बंदरगाह, मछली पालन, समुद्री पर्यटन, समुद्री प्रौद्योगिकी और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्र शामिल हैं।

गुजरात की विस्तृत तटरेखा इस पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को और अधिक संभावना से भारी हुई बनाती है। सरकार इस अवसर का उपयोग निवेश और रोजगार के नए अवसरों को बढ़ावा देने के लिए करना चाहती है, ताकि राज्य के स्थानीय लोग सीधे तौर पर काम और आर्थिक भागीदारी से लाभान्वित हो सकें।

निजी क्षेत्र की भूमिका

गुजरात मॉडल की सबसे बड़ी खासियत सरकार और निजी क्षेत्र के बीच मजबूत सहयोग है। यही वजह है कि गुजरात में उद्योग, बुनियादी ढांचा और रोजगार सृजन की गति अन्य राज्यों से अलग और तेज है।

यह मॉडल ‘ब्लू इकोनॉमी’ के संदर्भ में भी उतना ही प्रासंगिक है, क्योंकि समुद्री बुनियादी ढांचा और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में भारी निवेश, तकनीकी दक्षता और दीर्घकालिक संचालन की आवश्यकता होती है। इस दिशा में प्रधानमंत्री मोदी को कई बार आलोचना का सामना करना पड़ा है, लेकिन निजी क्षेत्र के सहयोग से ही देश आज इस मुकाम पर पहुँचा है।

VGRC के दौरान सबसे चर्चित निवेश घोषणा अडानी समूह द्वारा की गई, जो अगले कुछ सालों में कच्छ क्षेत्र में बड़े निवेश करने जा रहा है। अडानी समूह पहले से ही बंदरगाह और लॉजिस्टिक्स क्षेत्र में मजबूत उपस्थिति रखता है और कच्छ–मुंद्रा क्षेत्र को भारत की समुद्री अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।

यह निवेश घोषणा सीधे तौर पर गुजरात के समुद्री विकास रोडमैप से जुड़ी है क्योंकि बंदरगाह, माल ढोने का नेटवर्क, फैक्ट्रियों के समूह और निर्यात से जुड़ा विकास इस पूरे सिस्टम पर निर्भर करता है।

निजी कारोबारी और उनके निवेश

VGRC जैसे मंचों पर समुद्री और ‘ब्लू इकोनॉमी’ को लेकर कई बड़ी निजी कंपनियों ने निवेश करने की घोषणा की है। इन निवेशों का मकसद बंदरगाह, रसद, ऊर्जा और इससे जुड़े बुनियादी ढाँचे को मजबूत करना है।

अडानी समूह की ओर से करण अडानी ने अगले पाँच साल में गुजरात के कच्छ क्षेत्र में करीब ₹1.5 लाख करोड़ के निवेश की बात कही है। यह पैसा बंदरगाहों के विकास, लॉजिस्टिक्स को बेहतर करने, नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं (खौड़ा में 37 गीगावाट का रिन्यूएबल एनर्जी पार्क) और बंदरगाहों की क्षमता बढ़ाने में लगाया जाएगा। इससे गुजरात देश और दुनिया के लिए एक बड़ा लॉजिस्टिक्स हब बन सकता है।

इसके अलावा एस्सार फ्यूचर एनर्जी जैसी कंपनियों ने भी करीब ₹5,100 करोड़ के निवेश के लिए समझौते किए हैं। यह निवेश जैव-ईंधन और स्वच्छ ऊर्जा से जुड़ा है, जिसका फायदा समुद्री परिवहन और ऊर्जा नेटवर्क को भी मिलेगा। इन सभी निवेशों से समुद्री उद्योग, बंदरगाह, परिवहन और ऊर्जा ढाँचे का विकास होगा। साथ ही स्थानीय लोगों के लिए रोजगार और कौशल विकास के नए मौके पैदा होंगे।

हालाँकि, ‘ब्लू इकोनॉमी’ का असली विकास तभी होगा जब बड़ी कंपनियों के साथ-साथ छोटे और मध्यम निजी उद्यम भी आगे आएँ। मत्स्य पालन और समुद्री आपूर्ति से जुड़े समझौते यह दिखाते हैं कि अब सिर्फ बड़ी परियोजनाएँ ही नहीं, बल्कि छोटे कारोबार भी समुद्री अर्थव्यवस्था में अपनी भूमिका निभा रहे हैं।

विभिन्न उद्योगों की भागीदारी

VGRC में शामिल होने वाली कंपनियाँ सिर्फ बंदरगाह और लॉजिस्टिक्स तक ही सीमित नहीं रहीं। इस सम्मेलन में इलेक्ट्रॉनिक्स, ऊर्जा, इंजीनियरिंग, औद्योगिक क्लस्टर, पेट्रोकेमिकल्स और कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण जैसे कई क्षेत्रों में भी निवेश की घोषणाएँ हुईं। ये सभी क्षेत्र सीधे तौर पर नहीं, लेकिन लॉजिस्टिक्स, सप्लाई चेन और निर्यात आधारित उद्योगों के जरिए ब्लू इकोनॉमी से जुड़े हुए हैं।

इन निवेशों से स्थानीय उद्योगों को मजबूती मिलेगी और पूरी वैल्यू चेन बेहतर होगी। बंदरगाहों के जरिए आने-जाने वाला माल अब वैश्विक बाजारों तक तेजी और आसानी से पहुँच सकेगा। साथ ही, इससे तटीय इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए रोजगार, कारोबार और विकास के नए मौके भी खुलेंगे।

इससे क्या लाभ होगा?

अब सबसे अहम सवाल यह है कि इन निवेशों से गुजरात और यहाँ के लोगों को क्या मिलेगा। किसी भी निवेश की असली कीमत तभी समझ में आती है, जब उसका सीधा फायदा आम लोगों तक पहुँचे। ब्लू इकोनॉमी में इसकी पूरी संभावना है, क्योंकि इससे बंदरगाह, लॉजिस्टिक्स, मत्स्य पालन, मछली प्रसंस्करण, कोल्ड स्टोरेज, समुद्री पर्यटन और परिवहन जैसे क्षेत्रों में बड़ी संख्या में सीधे और परोक्ष रोजगार पैदा होते हैं।

अगर राज्य सरकार निजी क्षेत्र के साथ मिलकर तटीय ढाँचा, मछली प्रसंस्करण इकाइयाँ, निर्यात आधारित उद्योग और बंदरगाह से जुड़े औद्योगिक क्लस्टर विकसित करती है, तो इसका लाभ सिर्फ बड़े उद्योगों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे स्थानीय युवाओं को हुनर आधारित नौकरियाँ मिलेंगी, मछुआरा समुदाय की आय बढ़ेगी और तटीय क्षेत्रों में नए बाजार विकसित होंगे।

साथ ही तटरेखा से जुड़े सटीक और विस्तृत आँकड़े होने से तटीय सुरक्षा, आपदा प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण और विकास योजनाओं को बेहतर ढंग से लागू किया जा सकेगा। यानी यह विकास केवल आर्थिक नहीं बल्कि प्रशासनिक और रणनीतिक रूप से भी गुजरात को अधिक मजबूत बनाएगा।

गुजरात के विकास का अगला अध्याय

गुजरात की नई तटीय मैपिंग रिपोर्ट से साफ है कि राज्य को अब अपने समुद्री संसाधनों और तटीय विकास की संभावनाओं की पहले से कहीं बेहतर समझ मिल गई है। राजकोट में हुई VGRC बैठक यह दिखाती है कि सरकार समुद्री योजनाओं को कागज़ से निकालकर जमीनी निवेश, निजी भागीदारी और स्थानीय रोजगार में बदलने पर काम कर रही है। इसी दिशा में 5492 परियोजनाओं के लिए करीब ₹5.78 लाख करोड़ के निवेश प्रस्ताव सामने आए हैं।

कच्छ जैसे क्षेत्रों को खास प्राथमिकता दी जा रही है, जहाँ देश की सबसे लंबी तटरेखा और मुंद्रा जैसे बड़े बंदरगाह मौजूद हैं। इससे संकेत मिलता है कि आने वाले समय में समुद्री अर्थव्यवस्था और लॉजिस्टिक्स हब गुजरात की विकास कहानी का अगला बड़ा आधार बनेंगे।

मत्स्य पालन जैसे क्षेत्रों में निजी निवेश और छोटे-मध्यम समझौते बताते हैं कि यह मॉडल केवल बड़ी परियोजनाओं तक सीमित नहीं रहेगा। इससे एक ओर मजबूत ढांचा बनेगा, तो दूसरी ओर स्थानीय स्तर पर रोजगार भी बढ़ेगा। इसी रफ्तार से आगे बढ़ने पर गुजरात आने वाले वर्षों में न सिर्फ औद्योगिक बल्कि भारत की समुद्री अर्थव्यवस्था का भी बड़ा केंद्र बन सकता है।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट गुजराती में भार्गव राज्यगुरु ने लिखी है, जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)











तितली की लय में असम की सांस्कृतिक आत्मा: जानें- पारंपरिक ‘बागुरुम्बा दोहो’ नृत्य का इतिहास, जिसका वीडियो PM मोदी ने किया शेयर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हालिया असम दौरा केवल एक राजनीतिक यात्रा नहीं बल्कि असम की आत्मा, उसकी संस्कृति और उसकी जनजातीय विरासत को राष्ट्रीय फलक पर प्रतिष्ठित करने का सांस्कृतिक उत्सव बनकर सामने आया। गुवाहाटी पहुँचने पर मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा द्वारा स्वागत और इसके बाद प्रधानमंत्री का भव्य रोड शो तथा ‘बागुरुम्बा दोहो’ सांस्कृतिक उत्सव में शामिल होना असम की जनजातीय परंपराओं, विशेषकर बोडो समाज की सांस्कृतिक विरासत को सम्मान देने का प्रतीक बना।

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में साफ कहा कि असम की कला और संस्कृति को देश-दुनिया में पहचान दिलाना उनकी प्राथमिकता रही है। प्रधानमंत्री ने बागुरुम्बा नृत्य की छवियों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर साझा कर यह संदेश दिया कि असम की संस्कृति सीमाओं में बंधी नहीं बल्कि विश्व पटल पर पहचान पाने की क्षमता रखती है। ऐसे में बागुरुम्बा नृत्य और उसके सांस्कृतिक मूल्यों को समझना अधिक अर्थपूर्ण हो गया है क्योंकि यह नृत्य केवल कला नहीं बल्कि असम की आत्मा की लय है।

बागुरुम्बा नृत्य की उत्पत्ति और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि

बागुरुम्बा असम और पूर्वोत्तर भारत के बोडो समुदाय का पारंपरिक लोकनृत्य है। इसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक परंपरा के जरिए आगे बढ़ाया गया है। यह नृत्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि बोडो समाज के जीवन, विश्वास और प्रकृति के साथ उनके गहरे संबंध का प्रतिबिंब है।

बागुरुम्बा को अक्सर ‘तितली नृत्य’ कहा जाता है, क्योंकि इसमें नर्तकियों की मुद्राएँ और कोमल गतियाँ तितली के उड़ने जैसी प्रतीत होती हैं। यह नृत्य बोडो पहचान का एक मजबूत प्रतीक बन चुका है और समय के साथ इसमें बदलाव आते हुए भी इसकी आत्मा आज तक सुरक्षित है।

ब्विसागु पर्व और बागुरुम्बा का संबंध

बागुरुम्बा नृत्य मुख्य रूप से बोडो नववर्ष के अवसर पर मनाए जाने वाले ब्विसागु पर्व से जुड़ा है। यह पर्व अप्रैल के मध्य में, विषुवा संक्रांति के आसपास मनाया जाता है और वसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक है।

ब्विसागु की शुरुआत गायों की पूजा से होती है, इसके बाद युवा अपने माता-पिता और बुजुर्गों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेते हैं। इस दौरान बाथौ देवता की पूजा की जाती है, जिन्हें सिजू पौधे के प्रतीक रूप में माना जाता है। बागुरुम्बा नृत्य इसी धार्मिक और सामाजिक वातावरण में प्रस्तुत किया जाता है, जहाँ उल्लास, श्रद्धा और सामूहिकता एक साथ दिखाई देती है।

नृत्य की शैली, वेशभूषा और प्रतीकात्मकता

बागुरुम्बा नृत्य की शैली सरल लेकिन अत्यंत संवेदनशील मानी जाती है। इसे आमतौर पर युवा महिलाएँ समूह में प्रस्तुत करती हैं। नर्तकियाँ रंग-बिरंगे पारंपरिक वस्त्र पहनती हैं, जिनमें डोखना, ज्वमग्रा (या फासरा) और अरोनाई प्रमुख हैं।

कंधों पर डाले गए कपड़े को दोनों हाथों से पकड़कर नृत्य करते समय उसे तितली के पंखों की तरह फैलाया जाता है। पीले, हरे और लाल रंग प्रकृति के विभिन्न रूपों का प्रतिनिधित्व करते हैं। धीमे कदम, फैले हुए हाथ और लयबद्ध गतियाँ इस नृत्य को सौम्य और आकर्षक बनाती हैं, मानो प्रकृति स्वयं उसमें जीवंत हो उठी हो।

संगीत और वाद्य यंत्रों की भूमिका

बागुरुम्बा नृत्य में संगीत की भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी नृत्य की। बोडो समुदाय के पारंपरिक वाद्य यंत्र इसकी आत्मा माने जाते हैं। सिफुंग, जो लंबी बांसुरी जैसी होती है, गहरे और मधुर स्वर पैदा करती है। सेरजा, जो देखने में वायलिन जैसी लगती है, नृत्य में भावनात्मक गहराई जोड़ती है।

खाम एक लंबा ढोल है, जिसे लकड़ी और चमड़े से बनाया जाता है और यह ताल को गति देता है। इसके अलावा थारखा, जो दो बाँस के टुकड़ों से बना होता है, जोटा जैसे लोहे के वाद्य और गोंगना जैसे बाँस आधारित वाद्य भी प्रयोग में लाए जाते हैं। इन सभी के सामूहिक स्वर से नृत्य जीवंत हो उठता है।

आधुनिक समय में बागुरुम्बा और ‘बागुरुम्बा दोहो’

समय के साथ बागुरुम्बा नृत्य में कुछ परिवर्तन आए हैं। आज यह दो रूपों में देखने को मिलता है, एक संगीत के साथ और दूसरा बिना संगीत के। स्कूलों, कॉलेजों और सांस्कृतिक मंचों पर भी यह नृत्य प्रस्तुत किया जाता है, जिससे नई पीढ़ी भी इससे जुड़ी रहे।

कोकराझार, बोंगाईगाँव, नलबाड़ी, दर्रांग और सोनितपुर जैसे बोडो बहुल जिलों में इसका विशेष महत्व है। ‘बागुरुम्बा दोहो’ जैसे बड़े आयोजन, जहाँ हजारों कलाकार एक साथ प्रस्तुति देते हैं, इस बात का संकेत हैं कि पारंपरिक कला रूपों को संरक्षित करने और मुख्यधारा में लाने के प्रयास तेज हो रहे हैं।

PM मोदी की मौजूदगी में हुआ यह आयोजन न केवल असम बल्कि पूरे देश के लिए सांस्कृतिक एकता और विविधता का संदेश देता है। बागुरुम्बा नृत्य केवल एक लोकनृत्य नहीं, बल्कि बोडो समाज की आत्मा, प्रकृति के प्रति सम्मान और सामूहिक जीवन दर्शन का प्रतीक है।

प्रधानमंत्री मोदी के असम दौरे और ‘बागुरुम्बा दोहो’ जैसे आयोजनों ने इस परंपरा को नई पहचान दी है। यह प्रयास आने वाली पीढ़ियों तक इस सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखने में अहम भूमिका निभाएँगे और असम की विविध संस्कृति को विश्व पटल पर और मजबूती से स्थापित करेंगे।

बीजेपी में कैसे होता है राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव: जानें- प्रक्रिया, नियम, वोटर और अब तक के अध्यक्षों की पूरी सूची

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के केंद्रीय कार्यालय में इन दिनों खासी हलचल है। कल, 19 जनवरी को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए नामांकन दाखिल होंगे और परसों, 20 जनवरी को नए अध्यक्ष की औपचारिक घोषणा होगी।

सूत्रों के मुताबिक कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन निर्विरोध चुने जाने की दहलीज पर हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और निवर्तमान अध्यक्ष जेपी नड्डा जैसे दिग्गज उनके प्रस्तावक होंगे।

ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि बीजेपी में राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव होता कैसे है? क्या इसमें वोटिंग होती है? कौन वोट डालता है? क्या चुनाव आयोग की कोई भूमिका होती है? और क्या यह सिर्फ औपचारिक प्रक्रिया है या वास्तव में एक संगठित लोकतांत्रिक ढाँचा? और इस प्रक्रिया की जड़ें पार्टी के संविधान में कहाँ तक जाती हैं?

इस लेख में हम बीजेपी के संविधान, संगठनात्मक परंपराओं और पिछले अनुभवों के आधार पर पूरी प्रक्रिया को विस्तार से समझते हैं।

बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत है उसका संगठन

बीजेपी का संगठनात्मक ढाँचा दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी होने का दावा करने वाली इस पार्टी की असली ताकत है। पार्टी का दावा है कि उसके पास 18 करोड़ से ज्यादा प्राथमिक सदस्य हैं। लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव आम कार्यकर्ता सीधे नहीं लड़ता और न ही जनता वोट डालती है।

यह पूरी तरह एक आंतरिक, संगठनात्मक प्रक्रिया है, जिसमें चुनाव आयोग की कोई भूमिका नहीं होती। यह पार्टी का निजी मामला है, ठीक वैसे ही जैसे किसी क्लब या सोसाइटी का अध्यक्ष चुना जाता है।

सबसे नीचे से शुरू होती है चुनाव की प्रक्रिया

बीजेपी का संविधान में बहुत स्पष्ट है कि संगठनात्मक चुनाव बूथ या स्थानीय स्तर से शुरू होते हैं। धारा-7 में संगठनात्मक ढांचा दिया गया है- ग्राम केंद्र/शहरी केंद्र, स्थानीय समिति, मंडल, जिला, प्रदेश और फिर राष्ट्रीय स्तर।

सबसे पहले सदस्यता अभियान चलता है। कोई भी 18 साल से ऊपर का भारतीय नागरिक, जो पार्टी के उद्देश्य (धारा-2), मूल दर्शन (एकात्म मानववाद, धारा-3) और निष्ठाओं (धारा-4) को स्वीकार करता हो, प्राथमिक सदस्य बन सकता है (धारा-9)। सदस्यता सामान्यतः छह साल के लिए होती है और नवीनीकरण जरूरी है।

इसके बाद सक्रिय सदस्य बनने की प्रक्रिया है (धारा-12)। सक्रिय सदस्य वही होता है जिसने कम से कम तीन साल पार्टी में काम किया हो, पार्टी कोष में 100 रुपए जमा किए हों, आंदोलनों में हिस्सा लिया हो और पार्टी पत्रिका का ग्राहक हो। केवल सक्रिय सदस्य ही ऊपरी स्तर के चुनाव लड़ या वोट डाल सकते हैं।

चुनाव की शुरुआत स्थानीय समिति से होती है (धारा-13)। एक स्थानीय समिति में कम से कम 25 सदस्य जरूरी हैं। सदस्यों की संख्या के आधार पर समिति की श्रेणी तय होती है और उसी आधार पर अध्यक्ष व सदस्यों की संख्या। फिर मंडल समिति (धारा-14), जिला समिति (धारा-15), प्रदेश परिषद व कार्यकारिणी (धारा-16 व 17) और अंत में राष्ट्रीय परिषद (धारा-18) का गठन होता है।

यह पूरी प्रक्रिया ‘संगठन पर्व’ के नाम से जानी जाती है, जो हर छह साल में होती है। वर्तमान संगठन पर्व 2024-25 में शुरू हुआ और अब इसका अंतिम चरण चल रहा है।

राष्ट्रीय परिषद और निर्वाचक मंडल

राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव पार्टी संविधान की धारा-19 के तहत होता है। धारा-19(1) स्पष्ट कहती है कि चुनाव एक विशेष निर्वाचक मंडल (Electoral College) द्वारा होगा, जिसमें शामिल हैं-

  • राष्ट्रीय परिषद के धारा 18(1)(क) और (ख) में वर्णित सदस्य (यानी प्रदेशों से लोकसभा सीटों के बराबर चुने गए प्रतिनिधि और संसद सदस्यों द्वारा चुने गए 10%)।
  • प्रदेश परिषदों के धारा 16(1)(क), (ख) और (ग) में वर्णित सदस्य (जिला इकाइयों से विधानसभा सीटों के बराबर चुने गए, विधायक व सांसदों द्वारा चुने गए प्रतिनिधि)।

इस बार निर्वाचक मंडल में करीब 5700 मतदाता हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव तभी हो सकता है जब कम से कम आधे राज्यों (लगभग 19) में संगठनात्मक चुनाव पूरे हो चुके हों।

बीजेपी के संविधान की कॉपी का स्क्रीनशॉट

कौन लड़ सकता है अध्यक्ष पद का चुनाव?

बीजेपी के पार्टी संविधान की धारा-19(3) के अनुसार उम्मीदवार को कम से कम 15 साल प्राथमिक सदस्य और कम से कम चार कार्यकाल (यानी करीब 12 साल) सक्रिय सदस्य रहना जरूरी है। नामांकन के लिए निर्वाचक मंडल के कम से कम 20 सदस्यों का संयुक्त प्रस्ताव जरूरी है, और यह प्रस्ताव कम से कम पाँच अलग-अलग राज्यों (जहाँ राष्ट्रीय परिषद के चुनाव हो चुके हों) से आना चाहिए। उम्मीदवार की लिखित सहमति अनिवार्य है।

नामांकन, जाँच और मतदान की प्रक्रिया

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर चुनाव का इस बार शेड्यूल कुछ ऐसा है-

  • 16 जनवरी: निर्वाचक मंडल की सूची जारी।
  • 19 जनवरी (दोपहर 2 से 4 बजे): नामांकन दाखिल।
  • उसी दिन शाम 4 से 5 बजे: नामांकन पत्रों की जाँच।
  • शाम 5 से 6 बजे: नाम वापसी का समय।
  • अगर एक से ज्यादा वैध उम्मीदवार बचे तो 20 जनवरी को सुबह 11:30 से दोपहर 1:30 बजे तक गुप्त मतदान।
  • उसी दिन नतीजे।

अगर केवल एक वैध नामांकन रह जाए तो उसे निर्विरोध घोषित कर दिया जाता है।

सर्वसम्मति की परंपरा और RSS की छाया

बीजेपी के 45 साल के इतिहास में राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए कभी गुप्त मतदान नहीं हुआ। हमेशा सर्वसम्मति बनी। कारण? पार्टी में ऊपर से नीचे तक सहमति बनाने की मजबूत संस्कृति। और इस सहमति में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की अनौपचारिक लेकिन महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।

पार्टी संविधान में RSS का कोई जिक्र नहीं है, लेकिन व्यवहार में संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी और बीजेपी के शीर्ष नेता (खासकर प्रधानमंत्री और गृह मंत्री) मिलकर नाम तय करते हैं। संगठन महामंत्री (जो परंपरागत रूप से संघ से आते हैं) इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण सेतु की भूमिका निभाते हैं।

यह सर्वसम्मति इसलिए भी जरूरी है क्योंकि अध्यक्ष का पद सिर्फ औपचारिक नहीं होता। वह संगठन की दिशा तय करता है, चुनावी रणनीति बनाता है और सरकार के साथ तालमेल रखता है। टकराव पार्टी को कमजोर कर सकता है।

कार्यकाल और एक्सटेंशन की प्रथा

बीजेपी के पार्टी संविधान की धारा-21 के अनुसार कोई व्यक्ति लगातार दो कार्यकाल (प्रत्येक तीन साल का) तक अध्यक्ष रह सकता है, यानी अधिकतम छह साल। उसके बाद ब्रेक जरूरी है। लेकिन हाल के वर्षों में एक्सटेंशन की परंपरा बनी है। जेपी नड्डा जनवरी 2020 में अध्यक्ष बने, उनका कार्यकाल जनवरी 2023 में खत्म हुआ, लेकिन लोकसभा चुनाव 2024 के बाद भी उन्हें एक्सटेंशन मिलता रहा। अब 2026 में नया अध्यक्ष आ रहा है।

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्षों की सूची (1980 से अब तक)

  1. अटल बिहारी वाजपेयी (1980-1986) – पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष, जिन्होंने जनसंघ से बीजेपी का सफर शुरू किया।
  2. लालकृष्ण आडवाणी (1986-1991) – पहली बार, रथ यात्रा और राम मंदिर आंदोलन के दौर में।
  3. मुरली मनोहर जोशी (1991-1993)
  4. लालकृष्ण आडवाणी (1993-1998) – दूसरी बार
  5. कुशाभाऊ ठाकरे (1998-2000)
  6. बंगारू लक्ष्मण (2000-2001)
  7. के. जना कृष्णमूर्ति (2001-2002)
  8. एम. वेंकैया नायडू (2002-2004)
  9. लालकृष्ण आडवाणी (2004-2005) – तीसरी बार
  10. राजनाथ सिंह (2006-2009) – पहली बार
  11. नितिन गडकरी (2009-2013)
  12. राजनाथ सिंह (2013-2014) – दूसरी बार
  13. अमित शाह (2014-2020) – सबसे लंबा और सबसे प्रभावी कार्यकाल, जिसमें पार्टी 300+ सीटों तक पहुँची।
  14. जगत प्रकाश नड्डा (2020-2026 तक) – वर्तमान, जिनके कार्यकाल में 2024 लोकसभा चुनाव लड़ा गया।

(नोट: 2026 में नया अध्यक्ष चुना जा रहा है, जिसके बारे में 20 जनवरी को आधिकारिक घोषणा होगी।)

यह प्रक्रिया दिखाती है कि बीजेपी कितनी अनुशासित और केंद्रीकृत पार्टी है। ऊपर से सहमति बनती है, नीचे तक लागू होती है। यही उसकी संगठनात्मक ताकत का राज है। लेकिन सवाल बना रहता है कि क्या इतनी बड़ी पार्टी में कभी अध्यक्ष पद के लिए खुला मुकाबला देखने को मिलेगा? फिलहाल तो सर्वसम्मति की परंपरा बरकरार है।

किताबों से कूटनीति तक: विश्व पुस्तक मेला 2026 में दिखा भारत-रूस संबंधों का बौद्धिक और सांस्कृतिक सेतु

नई दिल्ली के भारत मंडपम में 10 से 18 जनवरी तक आयोजित दिल्ली विश्व पुस्तक मेला 2026 केवल पुस्तकों की प्रदर्शनी नहीं बल्कि देशों के बीच सांस्कृतिक संवाद और वैचारिक साझेदारी का जीवंत मंच बनकर उभरा है। इस वर्ष मेले में भारत–रूस मित्रता की सशक्त उपस्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया कि दोनों देशों का रिश्ता केवल कूटनीति या राजनीति तक सीमित नहीं बल्कि साहित्य, संस्कृति और साझा मूल्यों से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।

अंतरराष्ट्रीय आयाम में रूस की मजबूत मौजूदगी

मेले में रूस की भागीदारी ने आयोजन को एक विशिष्ट अंतरराष्ट्रीय आयाम दिया। भारत मंडपम में स्थापित रूसी मंडप (पैवेलियन) आकर्षण का केंद्र रहा, जहाँ रूस से जुड़े प्रकाशक, साहित्यिक संस्थान और सांस्कृतिक प्रतिनिधि सक्रिय रूप से शामिल हुए। प्रसिद्ध रूसी लेखक रोमन सेंचिन, इल्या कोचेरगिन और चर्चित नाटककार यारोस्लावा पुलिनोविच की उपस्थिति ने भारतीय पाठकों और साहित्य प्रेमियों को रूसी साहित्य से सीधे संवाद का अवसर दिया।

राजनीति से आगे, विचारों का रिश्ता

विश्व पुस्तक मेले के मंच से यह संदेश उभरकर सामने आया कि भारत–रूस संबंध केवल रणनीतिक या राजनीतिक सहयोग नहीं हैं, बल्कि यह रिश्ता विचारों, इतिहास और सांस्कृतिक समझ पर आधारित है। रूसी लेखकों और भारतीय साहित्यकारों के बीच हुई चर्चाओं में समाज, युद्ध और शांति, मानवीय संवेदनाएं, बच्चों का साहित्य और वैश्विक प्रकाशन जैसे विषयों पर गहन विमर्श हुआ। इन संवादों ने दोनों देशों की साझा चिंताओं और समान दृष्टिकोण को रेखांकित किया।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस मंच ने मेले की अंतरराष्ट्रीय भूमिका को और अधिक सुदृढ़ किया और दर्शाया कि विश्व साहित्य में भारतीय मंच भी सक्रिय और प्रभावशाली भागीदार बन सकता है। रूसी लेखक और वन अधिकारी इल्या कोचेर्गिन ने लेखन को प्राकृतिक जगत के साथ संवाद के रूप में देखा। उनकी पुस्तक ‘इमरजेंसी एग्जिट’ के संदर्भ में, जो एक वृद्ध घोड़े के साथ उनके संबंधों का वृत्तांत है, ने साहित्य को ऐसे क्षेत्र के रूप में स्थापित किया जहाँ मानव और गैर-मानव जीवन एक-दूसरे से मिलते हैं। जहाँ समकालीन पाठकों तक पहुँच बनाए रखने के लिए भाषा का निरंतर विकसित होना आवश्यक है।

नई पीढ़ी तक पहुँचती मित्रता

मेले में छात्रों और Gen-Z युवाओं की उल्लेखनीय उपस्थिति यह संकेत देती है कि भारत–रूस मित्रता केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि भविष्य की साझेदारी भी है। युवा पाठकों की रूसी साहित्य, अनुवादित पुस्तकों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में रुचि यह दर्शाती है कि यह संबंध अगली पीढ़ी तक सहज रूप से स्थानांतरित हो रहा है। कई युवा पाठक रूसी बच्चों के साहित्य और समकालीन लेखन को लेकर विशेष उत्सुकता दिखाते नजर आए।

दशकों पुराने सांस्कृतिक संबंधों का पुनर्पाठ

भारत और रूस के बीच दशकों पुराने सांस्कृतिक संबंधों को इस पुस्तक मेले में किताबों, अनुवादों और विचार-विमर्श के माध्यम से नए संदर्भ में प्रस्तुत किया गया। 17 जनवरी को आयोजित एक विशेष सत्र में भारतीय प्रकाशन उद्योग में रूसी पुस्तकों की भूमिका और भविष्य की संभावनाओं पर चर्चा हुई। यह मंच दोनों देशों के प्रकाशकों के लिए सहयोग के नए द्वार खोलने वाला साबित हुआ।

साहित्य के माध्यम से मजबूत होती दोस्ती

इस वर्ष मेले की थीम भारतीय सैन्य इतिहास रही, जिसमें 35 से अधिक देशों ने भाग लिया। ऐसे में रूस की उपस्थिति ने यह भी रेखांकित किया कि ऐतिहासिक अनुभवों और संघर्षों को समझने में साहित्य की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है। रूस और भारत दोनों ही देशों के इतिहास में संघर्ष, बलिदान और राष्ट्रीय चेतना की गहरी छाप रही है, जिसे साहित्य ने पीढ़ियों तक जीवित रखा है।

कुल मिलाकर, दिल्ली विश्व पुस्तक मेला 2026 में भारत-रूस मित्रता शब्दों और विचारों के माध्यम से और अधिक सशक्त होती दिखाई दी। यह आयोजन इस बात का प्रमाण है कि जब किताबें संवाद का माध्यम बनती हैं, तो देशों के बीच की दूरियाँ स्वतः ही कम हो जाती हैं और रिश्ते समय के साथ और गहरे होते जाते हैं।

जले नोटों पर चुप्पी, सवालों पर ‘मीडिया ट्रायल’ का लेबल: क्या न्यायपालिका खुद को कानून से ऊपर मानती है?

14 मार्च 2025। होली का दिन। दिल्ली की एक कोठी में आग बुझाने दमकलकर्मी पहुँचते हैं। अंदर से जले हुए नोटों के बंडल मिलते हैं। यह कोई आम निजी आवास नहीं था, बल्कि उस समय दिल्ली हाई कोर्ट में पदस्थ जस्टिस यशवंत वर्मा का सरकारी निवास था।

इसके बाद घटनाओं की एक श्रृंखला शुरू होती है। जस्टिस वर्मा का तबादला इलाहाबाद हाई कोर्ट के लिए कर दिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट की ‘इन हाउस जाँच’ से लेकर संसद में महाभियोग प्रस्ताव तक की चर्चा सुनाई पड़ती है।

लेकिन 2026 में प्रवेश कर चुके भारत में एक तथ्य अडिग है- जस्टिस यशवंत वर्मा आज भी न्यायिक सेवा में हैं। इस बीच पूरे मामले को दूसरा रंग देने की कोशिशें भी शुरू हो गई है। इसी कड़ी में वरिष्ठ अधिवक्ता और पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी, जो इससे जुड़े एक मामले में जस्टिस वर्मा की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पैरवी कर चुके हैं, ने एक किताब के विमोचन के अवसर पर टिप्पणी की है।

रोहतगी ने जस्टिस वर्मा का नाम लिए बिना कहा है,

जिस तरह से मीडिया ट्रायल हुआ है, उसमें अगर वह जज बरी भी हो जाएँ, तो कोई नहीं मानेगा कि वे ईमानदार थे। उनका करियर खत्म हो चुका है।

सुनने में यह बात संवेदनशील लगती है। लेकिन यही वह बिंदु है, जहाँ भावना और तथ्य अलग हो जाते हैं।

मीडिया ट्रायल न्यायिक करियर नष्ट कर देता है- यह तर्क नया नहीं है। यह वही घिसा-पिटा हथियार है, जिसका इस्तेमाल तब किया जाता है, जब सवाल असुविधाजनक हो।

असल समस्या मीडिया नहीं है। असल समस्या यह है कि न्यायपालिका आलोचना से असहज होती है। भारतीय अभिजात वर्ग को मीडिया ट्रायल की चिंता चुनिंदा मौकों पर ही सताती है। खासकर जब ऊँगली न्यायपालिका या उसके भीतर बैठे प्रभावशाली चेहरे पर उठती है।

यह केवल संयोग है या फिर संस्थागत आत्मरक्षा की प्रवृत्ति?

एक समय था जब मुख्यधारा मीडिया न्यायपालिका को लगभग पवित्र मानती थी। कोर्ट की अवमानना का डर न्यूजरूम को खामोश रखता था। न्यायिक आचरण पर सवाल उठाना ईशनिंदा के समान माना जाता था।

वह दौर अब खत्म हो चुका है। सोशल मीडिया के युग में न्यायिक व्यवहार जनता की निगरानी में आ गया है। अब सवाल पूछने की जिम्मेदारी सिर्फ संपादकों की नहीं, नागरिकों की भी है।

यह सत्य है कि न्यायपालिका लोकतंत्र का स्तंभ है। लेकिन वह लोकतांत्रिक निगरानी से ऊपर नहीं हो सकती। यदि किसी न्यायाधीश पर गंभीर आरोप लगते हैं, तो क्या जनता को यह जानने का अधिकार नहीं है कि मामला क्या है? क्या ‘न्यायिक गरिमा’ का अर्थ पूर्ण मौन होता है?

मुकुल रोहतगी का यह कथन कि ‘बरी होने के बाद भी कोई नहीं मानेगा’ दरअसल मीडिया पर आरोप नहीं, बल्कि संस्थागत अविश्वास की स्वीकारोक्ति है। यदि अदालत का फैसला जनता को आश्वस्त नहीं कर पाता है तो दोष कैमरे का नहीं, प्रक्रिया की अपारदर्शिता का है।

यह स्थिति न्यायपालिका ने खुद बनाई है। भारतीय न्यायपालिका संभवतः दुनिया की इकलौती ऐसी संस्था है जो अपनी नियुक्ति खुद तय करती है। अपनी जाँच खुद करती है। अपनी जवाबदेही की सीमा खुद खींचती है।

कॉलेजियम सिस्टम संविधान में नहीं है। संसद ने इसे नहीं बनाया। यह 1993 के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से उपजा एक आत्म-नियुक्त ढाँचा है। इस व्यवस्था में RTI लागू नहीं है। लोकपाल लागू नहीं है। संपत्ति की घोषणा अनिवार्य नहीं है।

यह स्थिति लोकतांत्रिक असंतुलन पैदा करती है। जब सरकार और संसद ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) के जरिए सुधार की कोशिश की तो सुप्रीम कोर्ट ने उसे ‘संविधान के मूल ढाँचे पर हमला’ बताकर खारिज कर दिया।

क्या जवाबदेही सुनिश्चित करना भी न्यायपालिका के मूल ढाँचे के खिलाफ है?

यह भी तथ्य है कि नोटों के बंडल मिलने से पहले भी जस्टिस वर्मा का न्यायिक व्यवहार विवादों से अछूता नहीं था। चाहे वह सिंभावली शुगर्स से जुड़ा मामला हो या प्रकाश इंडस्ट्रीज से। लेकिन इन पर गंभीर सार्वजनिक बहस कभी नहीं हुई, क्योंकि तब तक ‘गरिमा’ का कवच सलामत था।

यह भी सत्य है की मुख्यधारा की मीडिया में सनसनी है। टीआरपी की होड़ है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि कई संस्थागत सड़ाँध इसी मीडिया के कारण उजागर हुई है। यदि मीडिया पूरी तरह चुप रहती तो देश कभी उन सवालों से रूबरू ही नहीं हो पाता।

समस्या मीडिया ट्रायल नहीं है। समस्या यह है कि न्यायपालिका आलोचना के लिए तैयार नहीं है। ऐसे में मुकुल रोहतगी का बयान बहस छेड़ता है, लेकिन अधूरी।

असली प्रश्न यह नहीं है कि मीडिया न्यायिक करियर नष्ट करती है या नहीं। असली प्रश्न यह है कि क्या भारतीय न्यायपालिका सार्वजनिक जाँच और आलोचना का सामना करने को तैयार है?

यदि नहीं, तो ‘गरिमा’ के नाम पर जवाबदेही से बचना लोकतंत्र नहीं, संस्थागत आत्मरक्षा है।

सनद रहे लोकतंत्र में गरिमा बचाई नहीं जाती, कमाई जाती है।

मुस्लिम वोटबैंक की नई दिशा, कॉन्ग्रेस की छाया से निकलकर ‘अपनी’ पार्टियों की ओर बढ़ते कदम: महाराष्ट्र में दिखा ट्रेलर, असम-पश्चिम बंगाल में दिखने वाला है पूरा शो

महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों ने भारतीय राजनीति में एक नया संकेत दिया है। मुस्लिम बहुल इलाकों में अब कॉन्ग्रेस या अन्य सेकुलर दलों की छाया में रहकर वोट देने की पुरानी आदत टूट रही है। इसके बजाय मुस्लिम मतदाता खुलकर अपनी पहचान वाली पार्टियों के पीछे खड़े हो रहे हैं। असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने जहाँ राज्य भर में 114 से 125 सीटें जीतकर सबको चौंका दिया, वहीं मालेगांव जैसे शहर में स्थानीय स्तर की ‘इस्लाम पार्टी’ ने सबसे बड़ी पार्टी बनकर इतिहास रच दिया।

यह सिर्फ महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है। पश्चिम बंगाल में भी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) से निष्कासित विधायक हुमायूँ कबीर अपनी नई पार्टी लेकर मैदान में उतर रहे हैं और ओवैसी से गठबंधन की बात कर रहे हैं। उनका दावा है कि 2026 के विधानसभा चुनाव में वह किंगमेकर बनेंगे। तो वहीं असम में AIUDF भी वही काम कर रही है। यह सब मिलाकर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है कि क्या मुस्लिम वोटबैंक अब पूरी तरह से अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाने की ओर बढ़ रहा है?

महाराष्ट्र निकाय चुनाव में AIMIM का दमदार उभार

महाराष्ट्र के 29 नगर निकाय चुनावों में 15 जनवरी 2026 को हुए AIMIM ने अपेक्षा से कहीं बेहतर प्रदर्शन किया। पार्टी ने कुल 114 से 125 वार्डों में जीत हासिल की, जो पिछले चुनावों की तुलना में दोगुनी से ज्यादा है। छत्रपति संभाजीनगर (पहले औरंगाबाद) में पार्टी ने 33 सीटें जीतकर खुद को दूसरी सबसे बड़ी ताकत बना लिया।

यहाँ भाजपा के बाद AIMIM ही सबसे मजबूत दिखी। मालेगांव में 21, नांदेड़ में 13-14, धुले में 10, सोलापुर में 8, मुंबई (BMC) में 8, अमरावती में 11-12, नागपुर में 7 और ठाणे-मुंब्रा में 5-5 सीटें जीतीं। कुल मिलाकर पार्टी ने समाजवादी पार्टी (SP), महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) और एनसीपी (शरद पवार गुट) को पीछे छोड़ दिया।

AIMIM के राष्ट्रीय प्रवक्ता वारिस पठान ने कहा, “वॉर्ड के चुनाव बुनियादी मुद्दों पर होते हैं। जनता को लग रहा था कि इतने सालों से वह जिन्हें वोट देकर जिता रहे थे, वह उनके लिए काम ही नहीं कर रहे। ऐसे में उन्होंने ओवैसी साहब पर यकीन जताया।” समाजवादी पार्टी पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि SP का महाराष्ट्र में सूपड़ा साफ हो गया और जनता ने उनके घमंड को चकनाचूर कर दिया।

महाराष्ट्र अध्यक्ष इम्तियाज जलील ने भी इस जीत का श्रेय ओवैसी की रैलियों और पार्टी के काम को दिया। उन्होंने कहा कि अब AIMIM का समर्थन सिर्फ मुसलमानों तक सीमित नहीं है। अनुसूचित जाति, जनजाति और कुछ हिंदू मतदाता भी पार्टी के पक्ष में आ रहे हैं। संभाजीनगर के गुलमंडी वार्ड जैसे इलाके, जो पहले शिवसेना-भाजपा का गढ़ थे, वहां भी AIMIM के उम्मीदवार जीते। मुंबई में जीतीं खैरुन्निसा अकबर हुसैन ने कहा, “यह जीत जनता की है। हम उन मुद्दों पर काम करेंगे जो हमने उठाए थे।”

यह प्रदर्शन इसलिए भी खास है क्योंकि पार्टी में चुनाव से पहले आंतरिक कलह थी। मुंबई इकाई के अध्यक्ष ने इस्तीफा दे दिया था और जलील को धमकियां मिली थीं। फिर भी ओवैसी और उनके भाई अकबरुद्दीन की रैलियों ने माहौल बना दिया। कई जगहों पर AIMIM किंगमेकर की भूमिका में आ गई है, जहां महायुति या महाविकास अघाड़ी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला।

मालेगांव में इस्लाम पार्टी का तूफान

मालेगांव की कहानी इससे भी आगे की है। पावरलूम और बुनकरों के शहर मालेगांव में राष्ट्रीय दलों की लहर नहीं चली। यहाँ ‘इस्लाम पार्टी’ (फुल फॉर्म: Indian Secular Largest Assembly of Maharashtra) ने 84 सीटों वाली नगर निगम में 35 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बन गई। बहुमत के लिए 43 सीटें चाहिए, इसलिए अब समाजवादी पार्टी (5 सीटें) और कॉन्ग्रेस (3 सीटें) की ओर नजरें हैं। अगर ये साथ आए तो इस्लाम पार्टी का पहला मेयर बनना तय है।

इस्लाम पार्टी की स्थापना 2024 में पूर्व कॉन्ग्रेस विधायक आसिफ शेख ने की थी। पार्टी का मुख्य एजेंडा स्थानीय मुद्दे हैं – पावरलूम उद्योग बचाना, बिजली-पानी की सुविधाएं और बुनकरों की समस्याएं। नाम भले धार्मिक लगे, लेकिन फोकस सेकुलर और लोकल है। यहां भाजपा सिर्फ 2 सीटों पर सिमट गई, कॉन्ग्रेस 3 पर और एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने 18 सीटें जीतकर तीसरा स्थान पाया। AIMIM, जो पहले मजबूत थी, इस बार 21 सीटों पर रुक गई। मुफ्ती इस्माइल जैसे नेता का जादू नहीं चला।

स्थानीय लोग कहते हैं कि राष्ट्रीय दल बड़े वादे करते हैं लेकिन जमीन पर काम नहीं करते। इस्लाम पार्टी ने यही गैप भरा। यह जीत साबित करती है कि मुस्लिम बहुल इलाकों में अब ‘बाहरी’ पार्टियों से ज्यादा ‘अपनी’ और लोकल पहचान वाली पार्टियां पसंद की जा रही हैं।

कॉन्ग्रेस और सेकुलर दलों का नुकसान

इन नतीजों से सबसे बड़ा नुकसान कॉन्ग्रेस, समाजवादी पार्टी और एनसीपी जैसे दलों को हुआ। मुस्लिम वोटबैंक, जो दशकों से इन दलों का मजबूत आधार था, अब बंट रहा है। ओवैसी लगातार उन मुद्दों पर बोलते हैं जिन पर सेकुलर दल चुप रहते हैं- अल्पसंख्यक अधिकार, असुरक्षा की भावना और स्थानीय समस्याएँ। युवा मुस्लिम मतदाताओं में उनकी दमदार बोलने की शैली लोकप्रिय है।

राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि अल्पसंख्यकों में बढ़ती असुरक्षा और पारंपरिक दलों की नाकामी ने यह बदलाव लाया है। अब मुस्लिम मतदाता खुद तय कर रहे हैं कि उन्हें अपनी पहचान वाली पार्टी चाहिए।

पश्चिम बंगाल में अगला ट्रेलर तैयार

महाराष्ट्र का यह ट्रेलर पश्चिम बंगाल में पूरा शो बन सकता है। TMC से निष्कासित विधायक हुमायूँ कबीर ने नई पार्टी लॉन्च की। कबीर मुर्शिदाबाद में अयोध्या की बाबरी मस्जिद जैसी मस्जिद बना रहे हैं। उनका दावा है कि 2026 विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी 135 सीटों पर लड़ेगी और वह किंगमेकर बनेंगे।

पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी करीब 30% है और 120-126 सीटों पर निर्णायक। 45 सीटें ऐसी हैं जहाँ 50% से ज्यादा मुस्लिम वोटर हैं। कबीर का कैलकुलेशन है कि अगर TMC का वोटबैंक बंटे तो वह फायदा उठा सकते हैं। 2021 में TMC को 215 सीटें मिली थीं, जो बहुमत से काफी ज्यादा थीं। अगर TMC को 100 सीटों का नुकसान हो और कबीर 40-50 जीत लें तो वह किंगमेकर बन सकते हैं। इससे भाजपा को भी फायदा हो सकता है, जो सबसे बड़ी पार्टी बन जाएगी।

कबीर ने ‘मस्जिद, मुसलमान और ओवैसी’ का कॉकटेल बनाया है। बिहार के बाद ओवैसी की स्वीकार्यता बढ़ी है। 2021 में बंगाल में AIMIM अकेले लड़ी थी लेकिन मुस्लिम वोट TMC के पास रहा था। अब लोकल लीडर कबीर के साथ गठबंधन और बाबरी मस्जिद का इमोशनल फैक्टर नया प्रयोग है। अगर मुस्लिम वोट ध्रुवीकृत हुआ तो TMC को बड़ा नुकसान हो सकता है।

असम में मुस्लिम राजनीति की बदलती तस्वीर, अपनी पहचान की ओर बढ़ते कदम

असम में मुस्लिम वोटबैंक की राजनीति लंबे समय से AIUDF (ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट) के इर्द-गिर्द घूमती रही है। बदरुद्दीन अजमल की यह पार्टी मुस्लिम बहुल इलाकों में मजबूत आधार रखती है और कॉन्ग्रेस की छाया से बाहर अपनी अलग पहचान बना चुकी है। 2026 विधानसभा चुनाव से पहले यह ट्रेंड और मजबूत होता दिख रहा है।

हालिया खबरों में अजमल ने असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM के साथ गठबंधन का संकेत दिया है, जिससे कॉन्ग्रेस काफी बैचेन है। अजमल ने दावा किया कि उनकी पार्टी कॉन्ग्रेस को पीछे छोड़ सकती है, जबकि कॉन्ग्रेस ने AIUDF से किसी गठबंधन की संभावना को साफ खारिज कर दिया।

यह बदलाव ऊपर वाले मुद्दे से जुड़ता है- मुस्लिम मतदाता अब पारंपरिक सेकुलर दलों की बजाय अपनी पहचान वाली पार्टियों को तरजीह दे रहे हैं। असम में बांग्लादेशी घुसपैठ, NRC और CAA जैसे मुद्दों ने मुस्लिम राजनीति को और ध्रुवीकृत किया है। BJP इसे ‘लोकल vs माइग्रेंट मुस्लिम’ के रूप में पेश कर रही है, जबकि हिमंता बिस्वा सरमा की लोकप्रियता सर्वे में ऊंची है।

AIUDF-AIMIM का संभावित टाइ-अप कॉन्ग्रेस के मुस्लिम वोटबैंक में सेंध लगा सकता है। अगर यह हुआ तो असम में भी महाराष्ट्र जैसा ट्रेंड दिखेगा, जहाँ मुस्लिम वोट अपनी पार्टियों के पीछे एकजुट हो रहा है। हालाँकि, BJP की मजबूत पकड़ और इंडिजिनस मुद्दों के कारण विपक्ष के लिए चुनौती बड़ी है।

भविष्य के मायने: नई मुस्लिम राजनीति का उदय

ये सारे घटनाक्रम एक बड़ा बदलाव दिखाते हैं। मुस्लिम मतदाता अब कॉन्ग्रेस, सपा या TMC जैसे दलों की छाया में नहीं रहना चाहते। वे अपनी पार्टियों के साथ खुलकर खड़े हो रहे हैं- चाहे वह AIMIM हो, इस्लाम पार्टी हो, AIUDF हो या हुमायूँ कबीर की नई पार्टी। यह बदलाव कई कारणों से हुआ है। एक तो पारंपरिक सेकुलर दलों की नाकामी- वे मुद्दे उठाते तो हैं लेकिन जमीन पर काम नहीं करते। दूसरा, ओवैसी जैसे नेताओं की दमदार आवाज और युवाओं में लोकप्रियता। तीसरा, स्थानीय मुद्दों पर फोकस करने वाली नई पार्टियां।

यह बदलाव सेकुलर दलों के लिए खतरे की घंटी है। मुस्लिम वोट बंटने से विपक्ष कमजोर होगा और सत्तारूढ़ दलों को फायदा मिल सकता है। लेकिन लंबे समय में यह मुस्लिम राजनीति को मजबूत बनाएगा। मुस्लिम समुदाय अब खुद अपनी राजनीतिक पहचान गढ़ रहा है, न कि दूसरों की छाया में रहकर। महाराष्ट्र ने ट्रेलर दिखाया, पश्चिम बंगाल में पूरा शो आने वाला है। अन्य राज्य जैसे बिहार, उत्तर प्रदेश, केरल और कर्नाटक में भी ऐसे संकेत मिल रहे हैं। भारतीय राजनीति का यह नया अध्याय दिलचस्प होगा।