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जॉर्ज सोरोस की फंडिंग वाली RSF ने ‘ऑपइंडिया’ को बनाया निशाना, ‘प्रेस की आजादी’ के नाम पर प्रोपेगेंडा: विदेशी फेक न्यूज फैक्ट्रियों के निशाने पर भारत की राष्ट्रवादी आवाज

2025 के आखिर में अचानक एक मोड़ आया, जब RSF ने भारत के हिंदू राष्ट्रवादी न्यूज़ आउटलेट OpIndia को अपनी सालाना ‘प्रेस फ्रीडम प्रिडेटर्स’ लिस्ट में एलन मस्क और अडानी ग्रुप जैसे ग्लोबल कॉर्पोरेट दिग्गजों के साथ शामिल किया। इस की वजह से RSF की न्यूट्रैलिटी और पॉलिटिकल एजेंडा पर बड़े पैमाने पर चर्चा हुई। OpIndia राष्ट्रवादी और सॉवरेन नैरेटिव का एक घोर समर्थक है।

कई लोगों ने OpIndia को शामिल करने को राष्ट्रवादी आवाजों को बदनाम करने की बड़ी योजना के रूप में देख रहे हैं। यह लिस्टिंग RSF की पिछली रिपोर्टों की वजह से हुआ है। इनमें राष्ट्रवादियों को प्रेस की आजादी के लिए खतरा बताया गया था और मोदी सरकार के दौरान मीडिया के माहौल की आलोचना की गई थी।

UK की टेलीग्राफ ने बताया कि कैसे RSF ने दुनिया को भारत के डेमोक्रेटिक माहौल और प्रेस लैंडस्केप को बताया। इसमें दुनिया भर में आलोचना के साथ अलग-अलग भारतीय मीडिया और कॉर्पोरेट हस्तियों के गठबंधन को हाईलाइट किया गया।

यह रिसर्च RSF के फाइनेंसिंग सोर्स को ट्रैक करके इसकी जाँच करती है। इनमें से ज्यादातर पश्चिमी सरकारी संगठनों और शासन परिवर्तन से जुड़े फाउंडेशन हैं। जैसे- US कांग्रेस द्वारा फंडेड नेशनल एंडोमेंट फॉर डेमोक्रेसी (NED)।

यह बेलिंगकैट (Bellingcat) जैसे जाँच संगठनों के साथ RSF के कनेक्शन की भी जाँच करता है। स्टडी से पता चलता है कि RSF स्वतंत्र पत्रकारिता का निष्पक्ष संरक्षक नहीं है, बल्कि भारत की संप्रभुता और लोकतंत्र पर दुनिया भर में चल रही वैचारिक लड़ाई को हवा देता है।

RSF: इमेज बनाम इकोसिस्टम

RSF द्वारा पब्लिश वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स (WPFI) की चर्चा पश्चिमी सरकारों, मल्टीलेटरल संगठनों और लेगेसी मीडिया द्वारा किया जाता है। RSF खुद को एक इंटरनेशनल NGO के रूप में पेश करता है, जो दुनिया भर में प्रेस फ्रीडम का बचाव करता है।

यह इंडेक्स बिना किसी जानकारी के, सोच-समझकर किए गए सर्वे पर निर्भर करता है। इसमें जवाब देने वालों का नाम नहीं बताया जाता और कैटेगरी के हिसाब से स्कोरिंग नहीं होती। भारत के ऑफिशियल पॉलिसी थिंक टैंक नीति आयोग ने भी इसकी जानकारी दी है।

भारत और दूसरी जगहों के आलोचकों के मुताबिक, ऐसा इंडेक्स एक न्यूट्रल असेसमेंट के बजाय एक जियोपॉलिटिकल टूल बनने का खतरा रहता है। यह एक सब्जेक्टिव सवालों के जवाबों पर आधारित होता है।

असल में RSF देशों के नैरेटिव अक्सर पश्चिमी ह्यूमन राइट्स ऑर्गनाइज़ेशन और उनसे जुड़े मीडिया की बातों को दिखाते हैं। खासकर जब बात भारत, हंगरी और दूसरे देशों की आती है, जिन्हें ‘इलीबरल’ या ‘नेशनलिस्ट’ माना जाता है। कॉर्पोरेट कंसोलिडेशन, इंटेलिजेंस लीक और सर्विलांस स्कैंडल जैसी पश्चिमी स्ट्रक्चरल समस्याओं को आम तौर पर छोटी-मोटी गड़बड़ियाँ बताया जाता है। RSF अक्सर भारत के हिंदू राष्ट्रवाद को जर्नलिज़्म के लिए खतरा बताते हैं।

फंडिंग: पश्चिमी सरकारें, NED और शासन बदलने वाली समाज सेवा

RSF को पश्चिमी सरकारों और डेमोक्रेसी को बढ़ावा देने वाले संगठनों से मदद मिलती है। OpIndia-CSDS डॉक्यूमेंट में बताई गई रिसर्च बताती है कि RSF को इनसे फंडिंग मिली है:

  1. फ्रांस की सरकारी एजेंसियां, जिनमें फ्रेंच डेवलपमेंट एजेंसी (AFD), विदेश मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, गृह मंत्रालय, संस्कृति मंत्रालय और बेयूक्स शहर शामिल हैं।
  2. यूरोपियन कमीशन का यूरोपियन इंस्ट्रूमेंट फॉर डेमोक्रेसी एंड ह्यूमन राइट्स (EIDHR)।
  3. इसी तरह के यूरोप के मदद करने वाले संगठन, जैसे स्वीडिश इंटरनेशनल डेवलपमेंट एजेंसी (SIDA)।
  4. नेशनल एंडोमेंट फॉर डेमोक्रेसी (NED), जिसे US कांग्रेस से फंड मिलता है। यह संगठन स्पष्ट तौर पर बताता है कि यह डेमोक्रेसी को बढ़ावा देता है। इसे मुख्य रूप से US सरकार का सपोर्ट है।

फोर्ड फाउंडेशन जैसे बड़े US फाउंडेशन, जिनका भारत में पॉलिटिकल एक्शन और लॉबिंग को सपोर्ट करने का लंबा और विवादित इतिहास रहा है। इसमें वे संगठन भी शामिल हैं, जिन पर बाद में फाइनेंशियल गड़बड़ियों और भारत विरोधी कैंपेन के आरोप लगे, वे भी RSF से जुड़े हैं। ऑपइंडिया पेपर में बताई गई इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग के मुताबिक, RSF ने US-EU के रिजीम चेंज इनिशिएटिव्स के टारगेटेड सरकारों, जैसे वेनेजुएला के खिलाफ लगातार सख्त रुख अपनाया है। उन देशों में US फंडेड ऑर्गनाइजेशन्स और अमीरों के मालिकाना हक वाले विपक्षी मीडिया को सपोर्ट किया है।

यह डोनर प्रोफाइल साफ तौर पर RSF को जाने-माने ‘डेमोक्रेसी प्रमोशन’ नेटवर्क में रखती है। NGOs, मीडिया इनिशिएटिव्स, इंडेक्स और लॉबिंग कैंपेन जो वेस्टर्न जियोपॉलिटिकल पसंद के खिलाफ सरकारों में ‘अथॉरिटेरियनिज्म’ को खास तौर पर हाईलाइट करते हैं, जिनमें से भारत भी एक है। उन्हें वेस्टर्न सरकारों और उनसे जुड़े इंस्टीट्यूशन्स द्वारा फंड दिया जाता है।

वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स का विवादास्पद तरीका

RSF के इंडेक्स की तीन मुख्य समस्याएँ हैं – ओपेसिटी, सब्जेक्टिविटी और सेलेक्टिव एम्फेसिस, जो कई इंडियन और इंटरनेशनल समीक्षा पर आधारित हैं।

ओपेसिटी: यह ऑडिट करना मुश्किल है कि भारत के लिए खास स्कोर कैसे बनाए गए? वैसी ही स्थिति वाले देशों से कैसे की जाए, क्योंकि RSF सवाल के हिसाब से स्कोर या अपने जवाब देने वालों की पहचान और इंस्टीट्यूशनल लोकेशन नहीं बताता है।

सब्जेक्टिविटी: इंडेक्स सोच पर आधारित है। ‘एक्सपर्ट्स’ ‘ओनरशिप प्रेशर’, ‘हेट कैंपेन’, और ‘सेल्फ-सेंसरशिप’ जैसे मुद्दों पर सर्वे पूरा करते हैं। एक्सपर्ट्स का यह ग्रुप ज़्यादातर लिबरल-प्रोग्रेसिव, वेस्टर्न सोच वाले होते हैं। खासकर कंजर्वेटिव या नेशनलिस्ट सरकारों के विरोध में इनकी राय होती है।

सिलेक्टिव : आलोचकों का कहना है कि जहाँ भारत जैसे देशों को ‘हिंदू नेशनलिस्ट प्रेशर’ और सोशल मीडिया ट्रोलिंग जैसे नैरेटिव की वजह से कड़ी सज़ा मिलती है, वहीं गंभीर स्ट्रक्चरल दिक्कतों वाले वेस्टर्न डेमोक्रेसी में मीडिया ओनरशिप, सिक्योरिटी कानूनों का अग्रेसिव इस्तेमाल और इंटेलिजेंस मिलीभगत काफी ज्यादा है।

भारत सरकार के एक डिस्कशन पेपर के मुताबिक, RSF का तरीका पॉलिसी बेंचमार्क के तौर पर काफ़ी नहीं है, क्योंकि इसमें ‘प्रेस की आज़ादी की आम सहमति वाली परिभाषा की कमी है।’ ‘सैंपल साइज बहुत कम है,’ ‘पैरामीटर्स का नॉन-ट्रांसपेरेंट वेटिंग है।’

इनको देखते हुए ऑपइंडिया ने इंडेक्स को ‘ग्लोबल लेफ्ट की कहानी को फैलाने के लिए बनाया गया एक बायस्ड टूल’ बताया है। दरअसल RSF का पुराना डेटा बताता है कि कॉन्ग्रेस के सालों में भारत का मीडिया माहौल गिरा, लेकिन यह बहस मोदी सरकार के कार्यकाल पर ज्यादा हमला करती है।

RSF और भारत: राष्ट्रवादी राजनीति के खिलाफ मनगढ़ंत बातें बनाना

RSF की भारत फैक्ट शीट और प्रेस रिलीज में अक्सर एक तय टेम्पलेट को हाईलाइट किया जाता है। ‘हिंदू राष्ट्रवादी भीड़,’ ‘मोदी समर्थक,’ ‘भक्त’ और ‘राइट-विंग इकोसिस्टम’ को पत्रकारों के सामने आने वाले मुख्य खतरों के तौर पर हाईलाइट किया जाता है।

स्थानीय या राष्ट्रवादी बैकग्राउंड के पत्रकारों के खिलाफ हिंसा को ज़्यादातर उन घटनाओं और कहानियों के पक्ष में नजरअंदाज कर दिया जाता है, जिन्हें अंग्रेजी भाषा की लिबरल साइटों के एक खास ग्रुप द्वारा मजबूत किया जाता है। इनमें से कई पश्चिमी फाउंडेशन से जुड़ी हैं।

लगभग ‘कब्जा किए गए मीडिया’ की इमेज के साथ मेल न खाने के बावजूद, भारत के मीडिया में स्ट्रक्चरल वैरायटी, हजारों पत्रकारों, सैकड़ों चैनलों और कई बड़े प्लेटफॉर्म पर मोदी सरकार की तीखी आलोचना वाली कवरेज इन्हें कम दिखता है।

CSDS-लोकनीति की ‘इंडियन मीडिया, ट्रेंड्स और पैटर्न’ पर रिपोर्ट को OpIndia ने अपने रिसर्च में शामिल किया है। भारतीय मीडिया की आज़ादी के बारे में RSF नकारात्मक वर्णन करता है। इसमें यह दावा किया जाता है कि ज्यादातर पत्रकारों का मानना ​​है कि मीडिया आउटलेट सत्ताधारी BJP को सपोर्ट करते हैं। हालाँकि, सर्वे के नतीजे, जैसे कि ‘85% महिला पत्रकारों को मेंटल हेल्थ की दिक्कतें’ थीं और 1.4 बिलियन की आबादी वाले देश में से 206 पत्रकारों के एक छोटे से सैंपल से लिए गए थे।

OpIndia के अनुसार, ग्लोबल इंडेक्स भारत की बुराई करता है, एक घरेलू विदेशी फंडेड थिंक टैंक इंडेक्स पर आधारित है और फिर ‘मीडिया में लोकतंत्र की कमी’ के तौर पर पेश करता है। यह फीडबैक लूप RSF की सब्जेक्टिव स्टोरी और CSDS के कम डेटा की वजह से होता है।

RSF OpIndia को एक ‘हिंदू राष्ट्रवादी वेबसाइट’ बताता है जो सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों को ‘बदनाम’ करती है। ये तकनीक या विचारधारा पर की गई आपत्ति को प्रेस की आजादी से जोड़कर देखती है। यह एक स्ट्रैटेजी है, जिसमें इंडेक्स को चुनौती देने वालों को पत्रकारिता का दुश्मन बताया जाता है, जिससे असल में असली मुद्दा कहीं खो जाता है।

बेलिंगकैट: OSINT, NED का पैसा और इंटेलिजेंस शैडो

नीदरलैंड्स का एक ‘ओपन सोर्स इन्वेस्टिगेशन’ ग्रुप माना जाता है बेलिंगकैट। इसकी रूस, सीरिया जैसे देशों में काम करने को लेकर वेस्टर्न मीडिया ने तारीफ़ की है। यह OpIndia-CSDS स्टडी में बताए गए नेटवर्क का एक ज़रूरी हिस्सा है।

पब्लिक रिकॉर्ड के मुताबिक, बेलिंगकैट को नेशनल एंडोमेंट फॉर डेमोक्रेसी (NED) से डोनेशन मिला है। यह एक US कॉन्ग्रेस फंडिंग संगठन है, जिसे खास तौर पर उन संगठन की मदद के लिए बनाया गया है, जो विदेशों में US के हितों को बढ़ावा देते हैं। इसके अलावा, इसे कई पश्चिमी सरकार से जुड़े संस्थानों से फंडिंग मिलती है। खासकर यूरोपियन और ब्रिटिश सोर्स से।

यहाँ तक ​​कि इनके प्रति हमदर्दी रखने वाले सोर्स भी मानते हैं कि इस तरह की फंडिंग अक्सर उन स्टडीज़ को बढ़ावा देने के लिए दी जाती है, जो पश्चिम की विदेश नीति के हिसाब से हों, जैसे- रूस में सेना की मूवमेंट को ट्रैक करना या सीरिया में केमिकल हथियारों के आरोप। ये आरोप आसानी से NATO की बातों से मेल खाते हैं।

इसलिए, क्रिटिकल ऑब्ज़र्वर NED को US विदेश नीति के लिए एक ‘फ्रंट’ मानते हैं, जिसे खुले तौर पर वही करने के लिए बनाया गया था, जो CIA कभी चुपके से करती थी। बेलिंगकैट उस इकोसिस्टम का हिस्सा है, जो पश्चिमी स्ट्रेटेजिक मैसेजिंग के लिए फायदेमंद जानकारी के फ्लो को बढ़ाता और ढोता है। बेलिंगकैट पर रूसी सरकार और दूसरों ने सीधे तौर पर पश्चिमी इंटेलिजेंस का पिछलग्गू होने का आरोप लगाया है। इन देशों ने ऐसे उदाहरण भी दिए हैं।

ग्लोबल इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म नेटवर्क (GIJN), OCCRP, फॉरबिडन स्टोरीज, इंटरन्यूज, ICIJ, DRFLab, फ्रीडम हाउस, NED, और दूसरे संगठन जिन्हें पश्चिमी सरकारों, सोरोस के ओपन सोसाइटी फाउंडेशन, ओमिडयार नेटवर्क, फोर्ड फाउंडेशन और इसी तरह के दूसरे लोगों से फंडिंग मिलती है।

ये सभी जानकारी OpIndia–CSDS पेपर में शामिल हैं। विदेशी फंडेड स्टोरी को ‘इंडिपेंडेंट इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म’ की आड़ में चलाया जाता है। इसकी वजह ये भी है कि उनमें से कई भारतीय मीडिया आउटलेट्स और एक्टिविस्ट्स के साथ मिलकर काम किया गया होता है, जो मोदी सरकार और हिंदुत्व के सख्त खिलाफ हैं।

इस तरह, बेलिंगकैट उस बड़े इकोसिस्टम के लिए एक मॉडल का काम करता है। यह एक ऑफिशियली मान्यता प्राप्त गैर सरकारी संगठन है। यह काफी हद तक वेस्टर्न सिक्योरिटी और फॉरेन पॉलिसी एजेंडा के हिसाब से है। इसे अक्सर वही वेस्टर्न मीडिया आउटलेट्स निष्पक्ष जानकारी वाले सोर्स के तौर पर पेश करते हैं। साथ ही इसे फंड करते हैं।

RSF का सीरियाई मीडिया प्रोजेक्ट्स और नैरेटिव

ऑपइंडिया रिपोर्ट में सीरिया केस स्टडी दिखाती है कि कैसे RSF जैसे संगठन विवादित क्षेत्रों में वेस्टर्न देशों के साथ मिलकर काम करते हैं। दस्तावेज के मुताबिक, कैनाल फ्रांस इंटरनेशनल (CFI), एक फ्रेंच मीडिया-सपोर्ट संगठन है, जिसे फ्रेंच फॉरेन मिनिस्ट्री का सपोर्ट है।

यह रेडियो रोज़ाना को फंडिंग देता है। यह एक सीरियाई चैनल है, जिसे RSF ने ‘इंडिपेंडेंट’ बताया। डेनमार्क, स्वीडन और नॉर्वे की सरकारें इंटरनेशनल मीडिया सपोर्ट के लिए फंडिंग देती हैं। RSF खुद दूसरे वेस्टर्न डोनर्स के साथ मिलकर फंडिंग करता है।

रेडियो रोज़ाना ने आरा पैसिस इनिशिएटिव के ‘सीरियाज़ा’ नैरेटिव प्रोजेक्ट के साथ मिलकर काम किया है। इसे खास तौर पर इटैलियन फॉरेन मिनिस्ट्री ने फंड किया था और इटैलियन सरकार और प्रेसिडेंसी के समर्थन में ऑपरेट किया गया था।

सीरिया में और उसके बारे में लोगों की राय को प्रभावित करने के लिए ‘नैरेटिव’ और ‘स्टोरीटेलिंग’ बनाने का जिक्र प्रोजेक्ट में किया गया है।

जब इसे पूरा देखा जाए, तो यह एक मॉडल दिखाता है। पश्चिमी सरकारें RSF और CFI जैसे बिचौलियों के जरिए मीडिया आउटलेट्स को फाइनेंस करती हैं, फिर उन पत्रकारों के लिए कंटेंट और ‘कैपेसिटी बिल्डिंग’ करती हैं, जिनका काम उनके नेरेटिव से मेल खाता है।

आम तौर पर इसमें ‘टारगेट की गई सरकार’ और ‘तानाशाह शासक’ होते हैं, जबकि पश्चिमी देशों के समर्थन वाली विपक्षी ताकतें डेमोक्रेट होती हैं।

ऐसे देशों में RSF ‘प्रेस की आज़ादी’ की घोषणा करता है, तो वह असल में उन जानकारियों का मूल्यांकन कर रहा होता है, जहाँ डोनर का हित हो।

भारत में काम करने वाला नेटवर्क: CSDS, KAS, RSF और GIJN

OpIndia रिसर्च से पता चलता है कि RSF का भारत के एक बड़ा नेटवर्क है। ये कई संस्थानों को फंडिंग करती है और उसकी पार्टनर है या विचारधारा को शेयर करती हैं।

1.पेपर में कहा गया है कि दिल्ली का थिंक टैंक कहलाने वाला CSDS और उसका प्रोग्राम अक्सर पश्चिमी संगठनों और सरकार से जुड़े डोनर्स के साथ मिलकर ‘हिंदू बहुसंख्यकवाद,’ दलित-मुस्लिम जुड़ाव और जाति विभाजन की बातों को सिस्टमैटिक तरीके से बढ़ाता है।

2.कोनराड एडेनॉयर स्टिफ्टंग (KAS) एक जर्मन फाउंडेशन है जो CDU से राजनीतिक तौर पर जुड़ा हुआ है। यह लगभग पूरी तरह से जर्मन पब्लिक फंड से स्पॉन्सर है और इसने 2016 से CSDS को ₹2.6 करोड़ से ज़्यादा की ‘सहायता’ दी। यह एक खास ‘मीडिया प्रोग्राम एशिया’ भी चलाता है जो युवाओं और इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज़्म पर केन्द्रित है।

3.’अनकवरिंग एशिया’ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज़्म कॉन्फ्रेंस के स्पॉन्सर GIJN, OCCRP, फोर्ड फाउंडेशन, ओपन सोसाइटी फाउंडेशन, ओक फाउंडेशन समेत कई थे। इसमें शामिल होने वाले भारतीय लोगों में वे पत्रकार और मीडिया आउटलेट थे, जो लगातार मोदी सरकार और हिंदुत्व की बुराई करते रहे हैं।

स्टडी के मुताबिक, RSF इस वेब के लिए एक अच्छा सोर्स है। इंटरनेशनल इन्वेस्टिगेटिव नेटवर्क एक-दूसरे के काम को क्रॉस-प्रमोट करते हैं। इंटरनेशनल डोनर्स इनकी फंडिंग के लिए एक ही पूल का इस्तेमाल करते हैं। CSDS इंडियन मीडिया के पतन पर RSF का रेफरेंस देता है, और RSF वेस्टर्न-फंडेड इंडियन आउटलेट्स के नैरेटिव्स पर निर्भर रहता है।

इनका एक छोटा सा सर्किट है, जिसमें वेस्टर्न-फंडेड संगठन प्रश्नावली तैयार करते हैं। स्टोरी गढ़ते हैं, डेटा को एनालाइज करते हैं, और फिर एक-दूसरे को रैंकिंग और रिवॉर्ड देते हैं। इनका इस्तेमाल घरेलू पॉलिटिकल डिस्कशन और इंटरनेशनल डिप्लोमेसी दोनों में हथियार के तौर पर किया जाता है।

    नैरेटिव इम्पैक्ट: नेशनलिस्ट इंडिया को गलत साबित करना

    मुद्दा यह नहीं है कि RSF इंडिया की आलोचना करता है, बल्कि यह लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को कमज़ोर करता है। इसके लिए वह मुश्किल मीडिया इकोसिस्टम को ‘साहसी लिबरल जर्नलिस्ट्स’ और ‘अथॉरिटेरियन हिंदू नेशनलिस्ट्स’ के बीच एक मोरैलिटी प्ले में बदल देता है।

    यह उन जर्नलिस्ट्स के खिलाफ धमकियों और हिंसा के कामों को नजरअंदाज करता है या उसे कम करके आँकता है, जिन्हें राष्ट्रवादी, हिंदुत्व समर्थक या ग्लोबल लिबरल नैरेटिव्स की आलोचना करने वाला माना जाता है।

    इसे वही वेस्टर्न मीडिया भी बढ़ावा देता है। किसान आंदोलन, CAA, कश्मीर और ‘ अल्पसंख्यकों पर ज़ुल्म’ जैसे टॉपिक पर भारत की आलोचना करता है और अक्सर RSF, फ्रीडम हाउस और ऐसे ही दूसरे इंडेक्स को आधार बनाकर ‘लोकतंत्र कमजोर’ होने की दुहाई देता है।

    यह सिर्फ एक चर्चा नहीं है, जैसा कि OpIndia-CSDS रिपोर्ट में बताया गया है। जब इंडेक्स दिखाते हैं कि भारत तानाशाही की ओर बढ़ रहा है, तो इसे सही ठहराना आसान हो जाता है।

    1.भारतीय कानूनों और नीतियों का विरोध करने वाले एक्टिविस्ट नेटवर्क और गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) के लिए विदेशी फंडिंग में बढ़ोतरी।

    2.इंटरनेशनल फोरम पर, डिप्लोमैटिक दबाव और ‘नाम लेकर शर्मिंदा करना’।

      3.भारत की इंटरनेशनल इमेज को जानबूझकर कमजोर करने की कोशिशें, खासकर तब जब नई दिल्ली रूस, चीन, क्लाइमेट या व्यापार के मुद्दे पर अलग स्टेंड लेती है और पश्चिमी देशों के रुख को चुनौती देती है। US-EU अलायंस के संबंध में स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी का दावा करती है।

      दूसरे शब्दों में कहें तो, भारत पर RSF की कवरेज असल में एक ‘जियोपॉलिटिकल’ टूल है। यह भारत को एक कट्टर, गैर-उदारवादी , बहुसंख्यक देश के रूप में दिखाने की कोशिश करता है, जिसे लगातार पश्चिमी गाइडेंस और ‘सिविल सोसाइटी करेक्शन’ की जरूरत है।

        जब इन बातों को एक चश्मे से देखा जाता है, तो एक अलग पैटर्न नजर आता है। पश्चिमी सरकारी संस्थाएँ और NED जैसे US-स्टाइल डेमोक्रेसी को बढ़ावा देने वाले संगठन और शासन परिवर्तन से जुड़े बड़े फाउंडेशन RSF की ज्यादातर फंडिंग को बढ़ावा देते हैं।

        दुनिया भर में एक निष्पक्ष मानक के तौर पर प्रचारित किए जाने के बावजूद ये भेदभावपूर्ण है। RSF भारत में एकतरफ़ा स्टोरी को बढ़ावा देने के लिए ज़्यादातर वेस्टर्न फ़ंडेड, लेफ़्ट लिबरल मीडिया इकोसिस्टम पर निर्भर है। यह हिंदू राष्ट्रवाद को खतरे के तौर पर दिखाता है।

        OpIndia–CSDS स्टडी RSF को एक बड़े नेटवर्क में रखती है, जिसमें CSDS, KAS, IDRC, सोरोस से जुड़े फ़ाउंडेशन, और भारतीय एक्टिविस्ट या पत्रकार ग्रुप शामिल हैं। ये सभी संगठन एक ही लक्ष्य के लिए काम कर रहे हैं, जो है हिंदू पहचान, भारतीय लोकतंत्र और राष्ट्रवादी राजनीति के बारे में लगातार खराब खबरें फैलाना।

        एक राष्ट्रवादी भारतीय नजरिए से, RSF प्रेस की आज़ादी का एक निष्पक्ष रखवाला कम और एक ट्रांसनेशनल स्टोरी फैलाने वाले सिस्टम का एक जरूरी हिस्सा है। इसके रिसोर्स, पार्टनरशिप और प्रोडक्ट लगातार भारत की चुनी हुई सरकार और सभ्यता के खिलाफ काम करते हैं।

        जब दूर-दराज की पश्चिमी राजधानियों में तय इंडेक्स में भारत की कीमत धीरे-धीरे कम हो जाती है, तो सही मायने में सॉवरेन जवाब के लिए यह ज़रूरी है कि इस बात की अच्छी तरह जाँच की जाए कि स्कोरबोर्ड कौन बनाता है, सवाल कौन बनाता है, और आखिर में किसके स्ट्रेटेजिक फायदे पूरे होते हैं।

        (यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है, इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

        ₹331cr मनी लॉन्ड्रिंग केस में गुजरात कॉन्ग्रेस नेता तक पहुँची ED, राहुल गाँधी का है करीबी: Rapido ड्राइवर के ‘म्यूल अकाउंट’ से लेनदेन

        दिल्ली की गलियों में रैपिडो जैसे ट्रांसपोर्ट ऐप के जरिए अपनी बाइक चलाकर परिवार का गुजारा करने वाले एक ड्राइवर की जिंदगी में तूफान आ चुका है। रोजाना ₹500-₹600 कमाने वाले इस बाइक राइडर की जिंदगी 2 कमरों की झोपड़ी में कटती है, लेकिन उसके बैंक खाते में आठ महीनों में 331 करोड़ रुपए से ज्यादा का लेन-देन हो गया। दरअसल, ये कोई किस्मत का खेल नहीं था, बल्कि मनी लॉन्ड्रिंग का बड़ा जाल था, जिसके बाद में उसे खुद ही नहीं पता था।

        प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जाँच ने खुलासा किया है कि ये ‘म्यूल अकाउंट’ अवैध सट्टेबाजी ऐप 1xBet से जुड़े काले धन को सफेद करने के लिए इस्तेमाल हुआ। और सबसे चौंकाने वाली बात इसी खाते से गुजरात यूथ कॉन्ग्रेस के नेता आदित्य जुला की नवंबर 2024 वाली उदयपुर की लग्जरी शादी पर 1 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च हुए। जुला पर फर्जी सिग्नेचर और 17 अलग-अलग PAN नंबर्स इस्तेमाल करने का आरोप है।

        ईडी की ये जाँच 1xBet के अवैध ऑनलाइन बेटिंग नेटवर्क से शुरू हुई, जो दिसंबर 2023 में भारत सरकार द्वारा बैन कर दिया गया था। जाँच एजेंसी ने पाया कि 1xBet ने 6,000 से ज्यादा म्यूल अकाउंट्स का इस्तेमाल किया, जिनमें यूजर्स से पैसे इकट्ठा कर उन्हें मल्टीपल पेमेंट गेटवे से घुमाया जाता था। कुल ₹1000 करोड़ रुपए से ज्यादा की लॉन्ड्रिंग का अनुमान है।

        इसी चेन में दिल्ली के इस ड्राइवर का खाता फंस गया। 19 अगस्त 2024 से 16 अप्रैल 2025 तक उसके अकाउंट में अनजान सोर्स से बड़े-बड़े डिपॉजिट आते रहे, जो तुरंत संदिग्ध खातों में ट्रांसफर हो जाते।

        ईडी अधिकारियों ने कहा, “ये क्लासिक म्यूल अकाउंट है। असली मालिक को पता भी नहीं चलता, लेकिन कानूनी कार्रवाई का खतरा हमेशा रहता है।” ड्राइवर को शायद कमीशन के लालच में या अनजाने में फँसाया गया।

        युवा कॉन्ग्रेसी नेता की शादी में ₹1 करोड़ का खर्च

        उदयपुर शादी का कनेक्शन सबसे बड़ा ट्विस्ट है। ताज अरावली रिसॉर्ट में हुई इस ‘डेस्टिनेशन वेडिंग’ पर 1 करोड़ से ज्यादा का खर्च इसी म्यूल अकाउंट से हुआ। ईडी ने पाया कि जुला ने रिसॉर्ट को कॉन्ट्रैक्ट देने के लिए फर्जी सिग्नेचर इस्तेमाल किए। साथ ही ट्रैवल एजेंट को 18 लाख रुपये कैश और 17 फर्जी PAN नंबर्स दिए, ताकि बुकिंग एडजस्ट हो सके।

        गुजरात यूथ कॉन्ग्रेस के अहम चेहरों में से एक है जुला

        जुला गुजरात यूथ कॉन्ग्रेस के प्रमुख चेहरों में से एक हैं और राहुल गाँधी के करीबी माने जाते हैं। भाजपा आईटी सेल हेड अमित मालवीय ने सोमवार (01 दिसंबर 2025) को एक्स (पूर्व ट्विटर) पर पोस्ट कर इसे हाईलाइट किया। उन्होंने लिखा, “ईडी जाँच में उदयपुर रॉयल वेडिंग का बड़ा खुलासा। रैपिडो ड्राइवर के खाते से 331 करोड़ का ट्रांजेक्शन और अब गुजरात यूथ कॉन्ग्रेस लीडर आदित्य जुला का नाम। फर्जी सिग्नेचर से टाज रिसॉर्ट को कॉन्ट्रैक्ट, 18 लाख कैश और 17 PAN नंबर्स। ये लॉन्ड्रिंग चेन का हिस्सा है।” मालवीय ने जुला की राहुल गाँधी के साथ फोटो भी शेयर की, जो वायरल हो गई।

        फिलहाल, ईडी ने जुला को पूछताछ के लिए समन भेजा है और शादी से जुड़े परिवारों की जाँच तेज कर दी है। जाँच में ये भी पता लगाया जा रहा है कि क्या ये शादी लॉन्ड्रिंग का एंडपॉइंट थी या कवर-अप।

        कैसे होता है म्यूल अकाउंट्स के जरिए पूरा खेल

        म्यूल अकाउंट फ्रॉड का ये केस पूरे देश में फैले साइबर क्राइम का आईना है। म्यूल अकाउंट क्या है? सरल शब्दों में ये वो बैंक खाता होता है जो अपराधी काले धन को घुमाने के लिए ‘किराए’ पर लेते हैं। गरीब या बेरोजगार लोगों को 5-7% कमीशन का लालच देकर आधार, PAN, मोबाइल नंबर और बैंक डिटेल्स हासिल कर लेते हैं। फिर OTP चुराकर या पासवर्ड से कंट्रोल ले लेते। छोटे ट्रांजेक्शन से शुरू कर बड़े पैसे घुसेड़ते हैं।

        ड्राइवर के केस में भी यही पैटर्न दिखा- अनजान सोर्स से डिपॉजिट और तुरंत सारे पैसे ट्रांसफर। ईडी अधिकारियों के मुताबिक, 1xBet ने ऐसे हजारों अकाउंट्स का नेटवर्क बनाया था। भारत में ऑनलाइन बेटिंग का बाजार 2023 में 1 लाख करोड़ का था, लेकिन ये ज्यादातर अवैध रूप से था। सरकार ने बैन भी लगाया लेकिन लॉन्ड्रिंग चेन शायद अब भी बरकरार है।

        कई बड़े सितारे भी लपेटे में

        ये पहला केस नहीं। 1xBet जाँच में ही पूर्व क्रिकेटर शिखर धवन और सुरेश रैना के करोड़ों के एसेट्स अटैच हो चुके हैं। ईडी ने कई क्रिकेटरों और सेलिब्रिटीज से पूछताछ की थी। एक रिपोर्ट के अनुसार, 1xBet ने सरोगेट ब्रैंडिंग और ऐड्स से भारतीय यूजर्स को टारगेट किया। कुल लॉन्ड्रिंग ₹1,000 करोड़ से ऊपर।

        सामने आ चुके हैं म्यूल अकाउंट से जुड़े कई केस

        म्यूल अकाउंट से जुड़े कई केस सामने आ चुके हैं। इसी तरह के केस में हैदराबाद में 120 म्यूल अकाउंट्स का गैंग पकड़ा गया था, जिसमें बैंक अफसर भी शामिल थे। वहीं, बेंगलुरु साइबर पुलिस ने गुजरात के एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया, जो फेक कंपनियाँ बनाकर डॉक्यूमेंट्स इकट्ठा करता था। सीबीआई ने 8.5 लाख म्यूल अकाउंट्स का पर्दाफाश किया, जिसमें बैंक स्टाफ ने मदद की थी।

        इसी तरह वाराणसी के स्लम एरिया में SIM फ्रॉड से लोग फँसाए गए और कश्मीर में 7,000 अकाउंट्स सीज हुए। एक अन्य मामला चाइनीज हैंडलर्स से जुड़ा था, जिसमें 250 करोड़ फ्रॉड में तीन लोग पकड़े गए ते। ये लोग म्यूल अकाउंट्स सप्लाई करते थे। ऐसे ही एक मामले में लखनऊ में ‘युवा ग्लोबल नेटवर्क’ का हिस्सा बने युवा जेल पहुँच चुके हैं, तो मुंबई में 3.81 करोड़ के केस में KYC उल्लंघन केस में भी तीन गिरफ्तार हो चुके हैं।

        अपराधियों के जाल में कैसे फँसते हैं आम लोग?

        आम आदमी ज्यादातर लालच या अनजान में ऐसे मामलों में फँस जाते हैं। गाँवों और छोटे शहरों में ये ज्यादा होता है। किसी व्यक्ति का फोन आता है, “भाई, खाली खाता इस्तेमाल करेंगे, कमीशन मिलेगा।” और फिर लोग अपनी जानकारियाँ उनके साथ शेयर कर देते हैं। थोड़े से रुपयों यानी कमीशन के लालच में वो ऐसे गिरोह के हाथों फँस जाते हैं, जिसकी वजह से उन्हें जेल की हवा तक खानी पड़ती है। सर्वे बताते हैं कि ग्रामीण भारत में 40% फ्रॉड कमीशन के चक्कर में होते हैं।

        ईडी का कहना है, “ये चेन रिएक्शन है। एक म्यूल से पैसे दूसरे में घूमते हैं, ट्रेल गुम हो जाती है।” डिजिटल बैंकिंग के जमाने में रेगुलेटरी होल्स से ये आसान हो गया है।

        इस केस से सवाल भी उठ रहे हैं कि एनजीओ फंडिंग से लेकर पॉलिटिकल शादियों तक काला धन कैसे घुसता है। ईडी अब बड़े नेटवर्क की तह तक पहुँच रही है। इस मामले में जुला जैसे नाम आने से राजनीतिक घमासान तेज हो गया हो गया है। बहरहाल, अभी जाँच चल रही है, जो जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी, इस मामले की व्यापकता सामने आती जाएगी।

        कौन हैं 19 साल के देवव्रत महेश रेखे जिन्होंने दंडक्रम पारायण का पाठ कर हासिल की ‘वेदमूर्ति’ की उपाधि, PM मोदी ने भी की तारीफ

        धार्मिक नगरी वाराणसी में करीब 50 दिनों तक दंडक्रम पारायण करने वाले देवव्रत महेश रेखे का नाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘X’ पोस्ट के बाद अचानक चर्चा में आ गया है। महाराष्ट्र के छोटे से गांव में जन्मे 19 साल के देवव्रत ने 200 वर्ष बाद यह कारनामा किया है। देवव्रत को वेदमूर्ति की उपाधि भी दी गई है। उनके सम्मान में काशी में भव्य शोभायात्रा भी निकाली गई है।

        प्रधानमंत्री मोदी ने क्या कहा?

        प्रधानमंत्री मोदी ने X पर लिखा, “19 वर्ष के देवव्रत महेश रेखे जी ने जो उपलब्धि हासिल की है, वो जानकर मन प्रफुल्लित हो गया है। उनकी ये सफलता हमारी आने वाली पीढ़ियों की प्रेरणा बनने वाली है।”

        उन्होंने आगे लिखा, “भारतीय संस्कृति में आस्था रखने वाले हर एक व्यक्ति को ये जानकर अच्छा लगेगा कि श्री देवव्रत ने शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन शाखा के 2000 मंत्रों वाले ‘दण्डकर्म पारायणम्’ को 50 दिनों तक बिना किसी अवरोध के पूर्ण किया है। इसमें अनेक वैदिक ऋचाएं और पवित्रतम शब्द उल्लेखित हैं, जिन्हें उन्होंने पूर्ण शुद्धता के साथ उच्चारित किया। ये उपलब्धि हमारी गुरु परंपरा का सबसे उत्तम रूप है।”

        PM ने लिखा, “काशी से सांसद के रूप में, मुझे इस बात का गर्व है कि उनकी यह अद्भुत साधना इसी पवित्र धरती पर संपन्न हुई। उनके परिवार, संतों, मुनियों, विद्वानों और देशभर की उन सभी संस्थाओं को मेरा प्रणाम, जिन्होंने इस तपस्या में उन्हें सहयोग दिया।”

        कौन हैं देवव्रत महेश रेखे?

        देवव्रत महेश रेखे ने महाराष्ट्र के छोटे से गांव से काशी तक का सफर और यहां वेदमूर्ति की उपाधि पाने का एक लंबा सफर तय किया है। रेखे महाराष्ट्र के अहिल्यानगर जिले के एक साधारण ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए। उनके पिता महेश चंद्रकांत रेखे खुद बड़े विद्वान हैं और उनके पहले गुरु भी हैं। मात्र 5 साल की उम्र से देवव्रत ने वेद मंत्र बोलना शुरू कर दिया था। अब 19 साल की उम्र में उन्होंने शुक्ल यजुर्वेद की माध्यंदिनी शाखा को पूरा कंठस्थ कर लिया और ‘वेदमूर्ति’ की उपाधि पा ली है।

        वे वाराणसी के सांगवेद विद्यालय के बटुक हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अब तक इससे पहले केवल एक बार दंडकर्म का पारायण हुआ है। 200 साल पहले नासिक में वेदमूर्ति नारायण शास्त्री देव ने दंडक्रम पारायण किया था। दंडक्रम पारायण वल्लभराम शालिग्राम सांगवेद विद्यालय, रामघाट, काशी में हुआ और पूर्णाहुति बीते शनिवार (29 अक्टूबर 2025) को हुई। टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, शृंगेरी पीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी भारती तीर्थ महाराज के आशीर्वाद से यह आयोजन हुआ। शंकराचार्य जी की ओर से देवव्रत को सोने का कंगन, 1 लाख 1 हजार 116 रुपए नकद दिए जाएँगे।

        क्या होता है ‘दंडक्रम पारायण’?

        शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन शाखा के लगभग 2000 मंत्रों के पाठ को दंडक्रम पारायण कहा जाता है। इस दौरान सभी मंत्रों को कंठस्थ कर सुनाना होता है। इस दंडक्रम को अपने जटिल स्वर पैटर्न और फोनेटिक कॉम्बिनेशन की वजह से वैदिक पाठ का मुकुट माना जाता है। इस दंडक्रम पारायण में पदों का पाठ विशिष्ट शैली में उल्टा और सीधा एक साथ किया जाता है।

        कौन था दलित बौद्ध सक्षम टेट जिसकी OBC प्रेमिका के परिवार ने कर दी हत्या, कैसे वीभत्स हत्या तक पहुँचा मामला: जानें अब तक इस बारे में क्या पता है?

        महाराष्ट्र के नांदेड़ जिले में 27 नवंबर 2025 को एक 20 साल के युवक सक्षम गौतम टेट की हत्या कर दी गई। यह घटना उसके 21वें जन्मदिन से कुछ दिन पहले हुई। सक्षम की हत्या उसकी प्रेमिका आँचल मामिलवाड के पिता और भाइयों ने की। पुलिस ने इसे अलग-अलग समुदाय के बीच प्रेम संबंध से जुड़ी ऑनर किलिंग (सम्मान के नाम पर हत्या) बताया है।

        मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह मामला गुरुवार (27 नवंबर 2025) को तब बढ़ा, जब आँचल का छोटा भाई उसे इटवारा पुलिस स्टेशन ले जाने लगा। आँचल का दावा था कि वे सक्षम के खिलाफ झूठी शिकायत दर्ज कराने वाले थे। जब आँचल ने इसका विरोध किया, तो उसने आरोप लगाया कि वहाँ मौजूद दो पुलिसकर्मियों (धीरेज कोमलवार और महीत असरवार) ने उसके परिवार को झूठा केस दर्ज करने के बजाय ‘उसे (सक्षम) मारकर वापस आने’ के लिए उकसाया।

        उसी दिन शाम को, आँचल के पिता गजानन मामिलवाड और उसके भाइयों (हिमेश और साहिल) ने जुनागंज के मिनिडनगर इलाके में सक्षम को रोक लिया। पुलिस के बयान के अनुसार, उन्होंने यह सुनिश्चित करने के लिए कि वह मौके पर ही मर जाए पहले सक्षम को गोली मारी और फिर पत्थर से उसका सिर कुचल दिया।

        पुलिस ने घटना के कुछ ही घंटों के भीतर आठ आरोपितों को हिरासत में ले लिया, जिसमें एक नाबालिग और एक महिला भी शामिल हैं। नाबालिग को किशोर गृह भेज दिया गया है, जबकि महिला को न्यायिक हिरासत में रखा गया है। चार मुख्य आरोपितों को पुलिस हिरासत में भेजा गया है।

        पुलिस ने इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की कई धाराएँ, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धाराएँ, और भारतीय शस्त्र अधिनियम की धारा 3/25 के तहत मामला दर्ज किया है।

        इस मामले में आरोपित और मारे गए युवक (सक्षम) दोनों का पहले से आपराधिक रिकॉर्ड रहा है, और उनमें से कुछ पर मकोका (MCOCA) के तहत भी आरोप थे। सहायक पुलिस आयुक्त (ACP) प्रशांत शिंदे इस पूरे मामले की जाँच कर रहे हैं। आँचल ने पुलिसकर्मियों पर मिलीभगत के जो आरोप लगाए हैं, उसकी जाँच अलग से की जा रही है।

        दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार, जहाँ एक तरफ आँचल के पिता शादी का विरोध कर रहे थे, वहीं उनकी खुद की शादी भी प्रेम विवाह थी। आँचल की माँ, जयश्री, राजपूत समुदाय से हैं। बताया जाता है कि जब जयश्री गजानन के संपर्क में आईं, तब उनकी पहले से शादी हो चुकी थी और उनका एक बेटा भी था।

        एक वीडियो भी सामने आया है जिसमें गजानन सक्षम के साथ नाचते हुए दिख रहे हैं। सक्षम अक्सर आँचल के घर आता-जाता था, इसी दौरान दोनों के बीच रिश्ता शुरू हुआ। जब गजानन को इस रिश्ते के बारे में पता चला, तो वह बहुत गुस्सा हुए और उन्होंने सक्षम को आँचल से दूर रहने की कई बार धमकी दी थी।

        इस मामले के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए ऑपइंडिया ने पुलिस से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने कोई भी टिप्पणी करने से मना कर दिया क्योंकि यह मामला अभी जाँच के अधीन है।

        एक प्रतीकात्मक शादी और गम में डूबा परिवार

        सक्षम की हत्या के अगले ही दिन, जब पोस्टमॉर्टम के बाद उसके शव को अंतिम संस्कार के लिए ले जाया जा रहा था, तब आँचल ने एक बहुत ही भावुक और नाटकीय कदम उठाया। आँचल सक्षम के घर पहुँची और सांकेतिक रूप से उससे शादी करते हुए उसके शव पर हल्दी और सिंदूर लगाया। एक बयान में, उसने बताया कि उन दोनों ने सक्षम के 21वें जन्मदिन के बाद भागकर शादी करने की योजना बनाई थी। आँचल के मुताबिक, सक्षम को उम्मीद थी कि वह उसके परिवार को समझा लेगा और दोनों की शादी परिवार की मर्जी से हो जाएगी।

        बीएससी (BSc) की फर्स्ट ईयर की छात्रा आँचल ने दावा किया कि सक्षम उसकी पढ़ाई में मदद करता था और चाहता था कि वह सिविल सेवा में जाए। उसने यह भी बताया कि सक्षम खुद भी सिविल सेवा में शामिल होना चाहता था। हालाँकि, सक्षम के पिछले रिकॉर्ड की जाँच में पता चला कि वह कई आपराधिक गतिविधियों में शामिल था, जिसके कारण उसके लिए सिविल सेवा तो दूर, कोई भी सरकारी नौकरी पाना असंभव था। आँचल ने सक्षम की हत्या करने वाले अपने परिवार के सदस्यों के लिए फाँसी की सजा की माँग की है।

        ऑनलाइन बढ़ता हुआ ब्राह्मण-विरोधी प्रोपेगेंडा

        जैसे ही इस हत्या की खबर फैली, सोशल मीडिया पर तुरंत एक समांतर कहानी चलने लगी। कई सोशल मीडिया अकाउंट्स ने इस घटना को तथाकथित ब्राह्मणवादी उत्पीड़न के एक और उदाहरण के रूप में पेश करने की कोशिश की। यह सब तब हुआ जब लड़की (आँचल) ने खुद स्पष्ट किया था कि सक्षम बौद्ध समुदाय से था और उसका (आँचल का) परिवार ओबीसी (OBC) समुदाय से संबंध रखता है। मामले के तथ्यों से अलग हटकर, ब्राह्मण विरोधी एंगल थोपने की इस जल्दबाजी ने ऑनलाइन गुस्से को और बढ़ा दिया।

        मीडिया से बात करते हुए, आँचल ने कहा, “हम तीन साल से रिश्ते में थे। मेरे परिवार को इस बारे में पता चल गया था। चूँकि वह ‘जय भीम’ (बौद्ध समुदाय) से थे, इसलिए मेरा परिवार हमारी शादी के लिए तैयार नहीं हुआ। मेरे परिवार ने सक्षम से कहा था कि अगर वह मुझसे शादी करना चाहता है, तो उसे हिंदू धर्म अपनाना होगा और वह इसके लिए भी तैयार था।” हालाँकि, सोशल मीडिया पर एक ऐसा अभियान चलाया जा रहा है जिसमें इस मामले को एक उच्च जाति के परिवार द्वारा दलित लड़के को मारे जाने के रूप में पेश किया जा रहा है।

        आँचल मामिलवाड जाति से संबंध रखती हैं, जो पुलिस भर्ती दस्तावेजों के अनुसार महाराष्ट्र में विशेष पिछड़ा वर्ग (SBC) के अंतर्गत आती है।

        X (पहले ट्विटर) पर, प्रचारक हर्ष मंदर ने पोस्ट करते हुए लिखा, “दो भाइयों ने अपनी बहन के प्रेमी को इसलिए मार डाला क्योंकि वह ‘निचली जाति’ का था। सदमे में डूबी लड़की ने अपने प्रेमी के शव से ‘शादी’ कर ली। यह हमारी सोसायटी में गहरे तक फैले हिंसा और पूर्वाग्रह पर इससे ज़्यादा विनाशकारी टिप्पणी और क्या हो सकती है?”

        एक पोस्ट में, सैब बिलावल ने खुलकर टिप्पणी तो नहीं की, लेकिन इस हत्या के पीछे का कारण ‘जाति’ को बताया।

        प्रचार करने वाले हैंडल ‘द दलित वॉयस’ ने लिखा, “ऑनर किलिंग। महाराष्ट्र के नांदेड़ में सक्षम टेट की हत्या उनके अंतर-जातीय संबंध के कारण बेरहमी से की गई। लड़का दलित था और लड़की उच्च जाति की थी। उनका परिवार इस रिश्ते को बर्दाश्त नहीं कर सका और उन्होंने सक्षम की हत्या कर दी।”

        सक्षम का आपराधिक अतीत

        इस मामले की जाँच के दौरान सरकारी कागजात देखने पर, ऑपइंडिया को एक कोर्ट का दस्तावेज मिला। इस दस्तावेज में सक्षम टेट के खिलाफ पिछले कुछ सालों में दर्ज किए गए कई अपराधों की लिस्ट है। रिकॉर्ड के मुताबिक, सक्षम के नाम पर कम से कम आठ आपराधिक मामले दर्ज थे। अब ये पुराने मामले भी जाँच का हिस्सा बन गए हैं, जिनसे पता चलता है कि हत्या से पहले सक्षम का पुलिस के साथ कैसा इतिहास था और वह किस तरह की गतिविधियों में शामिल था।

        एक दिलचस्प बात यह है कि दिसंबर 2024 में, आँचल ने सक्षम के खिलाफ इटवारा पुलिस स्टेशन में एक शिकायत दर्ज कराई थी। उसने आरोप लगाया था कि सक्षम ने उसके साथ छेड़छाड़ की। उस समय आँचल की उम्र 18 साल से कम थी, इसलिए सक्षम पर POCSO अधिनियम की धारा 8 और 12 के साथ-साथ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 74 और 78 भी लगाई गई थीं। आँचल ने अपनी शिकायत में कहा था कि 22 नवंबर 2024 को सक्षम ने उसका पीछा किया और उसकी मर्ज़ी के बिना उसे एक कमरे में ले गया। वहाँ उसने उसकी आपत्तिजनक तस्वीरें लीं, जिससे उसकी मर्यादा भंग हुई। खास बात यह है कि उस समय आँचल के 18 साल पूरे होने में केवल तीन दिन बाकी थे।

        लेकिन, जब सक्षम की जमानत पर कोर्ट में सुनवाई हो रही थी, तो सक्षम के वकील ने जज को बताया कि सक्षम ने आँचल पर कोई जोर-जबरदस्ती नहीं की थी और वह अपनी मर्ज़ी से उसके साथ गई थी। साथ ही, वकील ने कहा कि सक्षम ने आँचल की मर्जी के खिलाफ कुछ भी नहीं किया। सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि आँचल जमानत का विरोध करने के लिए खुद कोर्ट में पेश नहीं हुई।

        कोर्ट ने गौर किया कि पहली शिकायत (FIR) में यह बात साफ नहीं थी कि सक्षम ने लड़की के साथ कोई यौन शोषण किया है। उसकी उम्र देखते हुए, कोर्ट ने माना कि वह इतनी समझदार हो चुकी थी कि यह समझा जाए कि वह सक्षम के साथ अपनी मर्जी से गई थी। इसलिए सक्षम को कुछ शर्तों पर जमानत दे दी गई, जिनमें जाँच में सहयोग करना शामिल था। यह विशेष मामला अभी भी नांदेड़ कोर्ट में चल रहा था।

        सक्षम को हिरासत में रखने के एक पुराने आदेश (जो 8 सितंबर 2025 का था) पर कोर्ट ने टिप्पणी की थी। उसमें बताया गया था कि सक्षम नांदेड़ के अलग-अलग पुलिस स्टेशनों में आठ आपराधिक मामलों में शामिल था। इसमें शिवाजी नगर पुलिस स्टेशन, भोकर पुलिस स्टेशन और उमरी पुलिस स्टेशन में दर्ज एक-एक चोरी (डकैती) का मामला शामिल था। हालाँकि, बाकी मामलों की जानकारी उस आदेश में नहीं दी गई थी।

        कोर्ट के कागजात बताते हैं कि सक्षम को 15 मई 2025 को एहतियाती हिरासत (Preventive Detention) में ले लिया गया था। महाराष्ट्र सरकार ने उसे ‘खतरनाक व्यक्ति’ बताया था। उसे महाराष्ट्र के एक कानून के तहत हिरासत में लिया गया, जिसका नाम MPDA Act यानि महाराष्ट्र खतरनाक गतिविधियाँ निवारण अधिनियम, 1981 है।

        सरकार ने कोर्ट में यह तर्क दिया कि ‘सक्षम ने इतना डर पैदा कर रखा है कि लोग उसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराने के लिए आगे नहीं आ रहे हैं और इस वजह से इलाके की शांति (कानून व्यवस्था) बिगड़ रही है।’ सक्षम ने अपनी इस हिरासत के खिलाफ कोर्ट में अर्जी (अपील) डाली थी। उसकी इस अर्जी का विरोध करते हुए, पुलिस ने उन सभी पुराने मामलों का हवाला दिया जिनमें वह शामिल था।

        हाई कोर्ट ने सक्षम टेट की एहतियाती हिरासत (MPDA Act के तहत) के आदेश को रद्द कर दिया था। कोर्ट ने पाया कि हिरासत का आदेश बिना सोचे-समझे दिया गया था और यह साबित नहीं हो पाया था कि सक्षम की वजह से इलाके की शांति को खतरा था।

        जजों ने कहा कि सक्षम के खिलाफ भले ही आठ मामले दर्ज थे, लेकिन जिला मजिस्ट्रेट ने सिर्फ दो मामलों पर ही भरोसा किया। उन्होंने इस बात को नजरअंदाज कर दिया कि सक्षम को पहले ही जमानत मिल चुकी थी। साथ ही, हिरासत का आधार बहुत कमजोर सबूतों पर टिका था। कोर्ट का मानना था कि सक्षम की हरकतों से ज्यादा से ज्यादा ‘कानून-व्यवस्था’ बिगड़ सकती थी, न कि ‘आम जनता की शांति’ को खतरा हो सकता था। इसलिए, उसे इतने कड़े कानून के तहत ‘खतरनाक व्यक्ति’ कहना सही नहीं था।

        ये सारी बातें दिखाती हैं कि यह मामला उतना सीधा नहीं है, जितना ऑनलाइन ‘जातिवाद की कहानी’ बनाकर फैलाया जा रहा है। परिवार का विरोध, पुलिस पर लगे मिलीभगत के आरोप, आँचल का सांकेतिक विवाह और अब सक्षम का पुराना लंबा आपराधिक रिकॉर्ड और उसकी रद्द की गई हिरासत- हर बात इस मामले को बहुत जटिल बना रही है। जैसे-जैसे जाँच आगे बढ़ेगी, यह जरूरी है कि हम भावनाओं से हटकर सबूतों पर ध्यान दें। यह त्रासदी सिर्फ एक साधारण कहानी नहीं है, बल्कि कई उलझे हुए सच का नतीजा है।

        बांग्लादेश में HIV का एपिसेंटर बना रोहिंग्या कैंप, देशभर में रिकॉर्ड संख्या में बढ़े केस: जानें कैसे प्रवासी मजदूर से ट्रांसजेंडर तक AIDS विरोधी अभियान के लिए बने मुसीबत

        बांग्लादेश में HIV संक्रमण के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। इससे स्वास्थ्य विशेषज्ञों और मानवीय संगठनों में गंभीर चिंता पैदा हो गई है। विश्व एड्स दिवस (1 दिसंबर) पर जारी सरकारी आँकड़ों के अनुसार, नवंबर 2024 से अक्टूबर 2025 के बीच 1,891 नए मामले दर्ज किए गए। यह हाल के वर्षों में दर्ज हुई सबसे बड़ी वार्षिक वृद्धि है। पिछले वर्ष से तुलना करें तो यह संख्या 453 अधिक है।

        इन नए मामलों में 217 संक्रमण अकेले कॉक्स बाजार स्थित रोहिंग्या शरणार्थी कैंपों में मिले और विशेषज्ञ ‘गंभीर रूप से चिंताजनक’ बता रहे हैं। यह इसलिए भी जोखिम की बात है कि विस्थापित आबादी पहले से ही संवेदनशील और जोखिमग्रस्त मानी जाती है।

        बांग्लादेश में AIDS के आँकड़े

        रिपोर्ट्स के मुताबिक, बांग्लादेश में HIV का पहला मामला 1989 में सामने आया था। इस साल तक HIV पॉजिटिव मामलों की कुल संख्या 14,313 थी। इनमें से 2,666 की मौत हो गई है। स्वास्थ्य अधिकारियों का मानना है कि HIV से संभावित रूप से संक्रमित लगभग 18% लोग अपनी स्वास्थ्य स्थिति से अनजान हैं यानी उन्हें संक्रमण का अंदाजा ही नहीं है। ऐसे मामलो की संख्या करीब 17,480 है।

        बांग्लादेश के स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (DGHS) के तहत चलते वाले राष्ट्रीय एड्स और यौन संचारित रोग नियंत्रण कार्यक्रम की रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में AIDS के 1,438 नए मामले और 195 मौतें दर्ज हुई थीं जबकि 2023 में संक्रमण के 1,276 मामले और 266 मौतें हुईं। हालाँकि, आधिकारिक रूप से जिन मरीजों की पहचान की गई है, उनकी संख्या काफी कम है।

        नए आँकड़ों से पता चलता है कि पिछले एक साल में 14.21 लाख लोगों ने HIV टेस्ट कराया जो पिछले वर्ष की तुलना में 1.91 लाख कम है। इसके अलावा, इसी अवधि के दौरान स्वास्थ्य जाँच के तहत 10.72 लाख लोगों का HIV टेस्ट किया गया जो पिछले वर्ष की तुलना में 10.34 लाख अधिक है।

        अस्पतालों की कमी और स्वास्थ्य सुविधाओं का संकट

        रिपोर्ट्स के मुताबिक, बांग्लादेश में HIV रोगियों के लिए केवल एक ही विशेष अस्पताल, ढाका स्थित मोहाखाली संक्रामक रोग अस्पताल है। और यहाँ भी HIV/AIDS मरीजों के लिए सिर्फ 40 बेड उपलब्ध हैं। ये बेड लगभग पूरे साल भरे रहते हैं, जिसके चलते कई मरीजों को फर्श पर इलाज करवाना पड़ता है।

        सर्जरी की ज़रूरत वाले मरीजों को लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है और डॉक्टरों का कहना है कि बुनियादी ढाँचे की कमी मरीजों की जान पर खतरा बन रही है। कार्यक्रम के निदेशक डॉ. एम. खैरुज्जमान के अनुसार इसकी जाँच के लिए टेस्टिंग किटों की भी कमी है। साथ ही, इलाज करने के लिए प्रशिक्षित कर्मियों की भी जरूरत है।

        प्रवासी श्रमिक और सामाजिक कलंक का डर

        इन सबके अलावा HIV/AIDS से जुड़ा कलंक भी एक बड़ी बाधा है। बड़ी संख्या में लोग समाज में बदनामी के डर से इसकी जाँच तक कराने या फिर इलाज कराने से बचते हैं। बांग्लादेश में रहने वाले प्रवासी श्रमिकों को भी HIV का बड़ा वाहक माना जाता है। मध्य पूर्वी देशों से लौटने वाले कई श्रमिक HIV के साथ लौटते हैं और अंतत: बांग्लादेश में HIV के मामलों में बढ़ोतरी की वजह बनते हैं।

        बांग्लादेश में ‘खास आबादी’ के कारण बढ़ रहे HIV के केस

        बांग्लादेश में नैशनल AIDS/STD कंट्रोल प्रोग्राम की डिप्टी डायरेक्टर जुबैदा नसरीन देश में बढ़ते मामलों के लिए ‘खास आबादी’ में की गई टेस्टिंग को जिम्मेदारी बताती हैं। इस खास आबादी में ‘ड्रग्स लेने वाले लोग, महिला और पुरुष सेक्स वर्कर और ट्रांसजेंडर लोग’ शामिल हैं। नवंबर-अक्टूबर के दौरान इस आबादी के 1.17 लाख लोगों का टेस्ट किया गया जो पिछले साल से करीब 20,000 अधिक है।

        बांग्लादेश में नई अंतरिम सरकार के बाद भी दिक्कतें बढ़ी हैं। अधिकारियों ने कहा कि पिछले साल मध्य में सरकारी प्रोग्राम के खत्म होने से खास आबादी के बीच कंडोम, सुई और सिरिंज बांटने जैसी बचाव सेवाओं में रुकावट आई है।

        डेटा के मुताबिक, नए मामलों में 56% मुख्य आबादी के, 12% माइग्रेंट, 11% रोहिंग्या और बाकी आम लोग थे। इनमें भी 81% पुरुष, 18% महिलाएँ और 1% ट्रांसजेंडर थे। आँकड़ों को और गहराई से देखने पर पता चलता है कि इनमें भी शादीशुदा लोगों की संख्या अधिक थी। 52% शादीशुदा और 42% सिंगल थे जबकि अन्य लोग विधवा या तलाकशुदा थे।

        बांग्लादेश में नहीं कम हो रहे HIV के मामले

        बांग्लादेश के स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी देश में HIV इन्फेक्शन और मौतों को लेकर परेशान हैं। 2010 से दुनिया भर में HIV इन्फेक्शन में 40% और AIDS से जुड़ी मौतों में 56% की कमी आई है। हालाँकि, बांग्लादेश के लिए इस सफलता को दोहराना अभी भी चुनौती ही बना हुआ है। हाल के वर्षों में टेस्टिंग बढ़ी है लेकिन सरकार के रोकथाम के उपाय अभी भी बढ़ती मौतों की संख्या में दिखाई देने वाली तेजी को कम नहीं कर पा रहे हैं।

        DGHS अब डेडिकेटेड सेंटर्स पर HIV मरीजों के लिए टेस्टिंग जारी रखने और दवा देने के लिए विदेशी डोनर्स पर निर्भर है। हालाँकि, यहाँ भी फंडिंग की कमी के कारण 25 जिले इन सेवाओं की कवरेज से बाहर हैं। बांग्लादेश में HIV के केसों की संख्या बढ़ती जा रही है लेकिन इनके लिए बचाव की सेवाओं की भारी कमी है और इसके चलते हेल्थ एक्सपर्ट्स में चिंता बढ़ गई है।

        बांग्लादेश ने 2030 तक AIDS को खत्म करने का टारगेट रखा है लेकिन जिस तरह मामलों में कमी की जगह बढ़ोतरी हो रही है इस लक्ष्य का हासिल होना लगभग नामुमकिन ही लग रहा है। इसके उलट डर है कि प्रिवेंटिव सर्विस के लिए कम फंडिंग से पॉजिटिविटी रेट और बढ़ सकता है।

        मोटापा कम करने वाली दवाइयों से आ रहे आत्महत्या के खयाल, भारत में रिकॉर्ड बिक्री वाली दवा भी बन रही मुसीबत: ऑस्ट्रेलिया की चेतावनी और WHO की गाइडलाइंस के बीच भारत के लिए क्या हैं चुनौतियाँ?

        विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने हाल में GLP-1 ड्रग्स जैसे- सेमाग्लूटाइड, लिराग्लूटाइड, टिरजेपाटाइड/Mounjaro आदि को मोटापे के लंबी अवधि के इलाज के लिए एक बड़ा ‘ब्रेकथ्रू’ मानते हुए पहली वैश्विक गाइडलाइन जारी की, लेकिन इसे ‘कंडीशनल’ यानी सावधानी के साथ लागू करने की सिफारिश भी दी है।

        ऑस्ट्रेलिया में इन दवाओं की एक तरफ भारी डिमांड और शॉर्टेज है तो दूसरी तरफ रेगुलेटर ने इन दवाओं से मानसिक स्वास्थ्य और सुयसाइडल थॉट्स से जुड़े संभावित जोखिम को लेकर चेतावनी जारी की है। भारत में Mounjaro के अक्टूबर में हुए रिकॉर्ड सेल के बीच यही मुद्दे भविष्य की बड़ी पॉलिसी और पब्लिक-हेल्थ बहस को जन्म दे रहे हैं।

        WHO ने गाइडलाइंस में किन बातों को किया शामिल

        WHO की पहली GLP-1 गाइडलाइन में कहा गया है कि इन्हें वयस्कों में मोटापे के लंबे इलाज के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। हालाँकि गर्भवती महिलाओं को इससे बाहर रखा गया है और फैसले को ‘कंडीशनल’ रखा गया है, क्योंकि लंबे समय की सुरक्षा, कीमत और हेल्थ सिस्टम की तैयारी पर डेटा सीमित है।

        Mounjaro असल में एक इंजेक्शन है। यह एक प्री-फिल्ड इंजेक्शन पेन के रूप में आता है। इसे डॉक्टर की सलाह पर लिया जा सकता है। इसका उपयोग टाइप-2 मधुमेह वाले लोगों में शुगर को नियंत्रित करने और वजन प्रबंधन के लिए किया जाता है। खुराक के लिहाज से इसे हर सप्ताह एक बार इंजेक्शन के रूप में लिया जाता है।

        गाइडलाइन यह भी जोर देती है कि ये दवाएँ इकलौती ‘मैजिक शॉट’ नहीं हैं, बल्कि इनके साथ इंटेंसिव बिहेवियरल थेरेपी जैसे डाइट, एक्सरसाइज और काउंसिलिंग आदि को अनिवार्य हिस्से के तौर पर जोड़ी जानी चाहिए, ताकि वजन घटने के साथ जीवनशैली में स्थायी बदलाव भी हों।

        गाइडलाइंस में WHO ने मोटापे को ‘क्रॉनिक, रिलैप्सिंग डिजीज’ मानते हुए देशों से कहा है कि वे एक पूरा ‘obesity ecosystem’ बनाएँ। इसमें पब्लिक हेल्थ नीतियाँ, प्रिवेंशन, शुरुआती स्क्रीनिंग और जरूरतमंदों के लिए दीर्घकालिक, सस्ते इलाज तक पहुँच शामिल हो।

        क्या कहते हैं आधिकारिक आँकड़े?

        दुनिया में एक अरब से ज्यादा लोग मोटापे से प्रभावित हैं और 2024 में मोटापे के कारण 37 लाख से अधिक मौतों से जुड़ा माना गया, ऐसे में WHO की नजर में GLP-1 दवाएँ एक बड़े पब्लिक-हेल्थ टूल की तरह हैं, लेकिन इन तक असमान पहुँच से हेल्थ इक्विटी और भी बिगड़ सकती है।​

        भारत जैसे देशों के लिए यह चुनौती दोहरी है। एक ओर शहरी और मिडिल-क्लास आबादी में तेजी से मोटापा और मेटाबॉलिक सिंड्रोम बढ़ रहा है। दूसरी ओर, पब्लिक हेल्थ बजट और इंफ्रास्ट्रक्चर की सीमाएँ महँगी इंजेक्टेबल थेरेपी को वैश्विक बनाने में बाधा बनती हैं।

        WHO की नीति क्या कहती है

        WHO के मुताबिक GLP-1 थेरेपीज को तीन चर्णों वाली व्यापक नीति का हिस्सा होना चाहिए। इसमें पहला, ऐसा वातावरण बनाना जहाँ अस्वस्थ खाद्य विकल्प और सिडेंटरी लाइफस्टाइल को पॉलिसी स्तर पर प्रोत्साहन न दिया जाए।

        दूसरा, हाई-रिस्क आबादी की शुरुआती स्क्रीनिंग और टारगेटेड इंटरवेंशन किए जाएँ और तीसरा, जिन लोगों को मोटापा है, उनके लिए लाइफ-लॉन्ग, पर्सन-सेंट्रिक केयर की व्यवस्था की जानी शामिल है।

        WHO ने यह भी चेतावनी दी है कि अगर मूल्य, सप्लाई और हेल्थ सिस्टम की तैयारी पर ध्यान नहीं दिया गया तो GLP-1 ड्रग्स सिर्फ अमीर देशों और अमीर वर्गों के लिए ही उपलब्ध रहेंगे। इससे हेल्थ इक्विटी और ज्यादा खराब हो सकती है।​

        ऑस्ट्रेलिया में GLP-1 का क्या पड़ा असर?

        ऑस्ट्रेलिया में अचानक बढ़ी डिमांड ने Ozempic और दूसरे GLP-1 इंजेक्शनों की सप्लाई चेन को बुरी तरह झकझोर दिया। खासकर तब जब इन्हें डायबिटीज के बजाय वजन घटाने के लिए बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाने लगा।

        ऑस्ट्रेलिया में Ozempic (सेमाग्लूटाइड) जैसी दवाओं की कमी पिछले कुछ साल से गंभीर मुद्दा रही है। रेगुलेटर TGA ने इसे ग्लोबल डिमांड और मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी की सीमाओं से जुड़ा बताया है, और Mounjaro तथा Trulicity जैसे विकल्पों पर भी आपूर्ति का दबाव ( सप्लाई प्रेशर) बताया है।​

        वजन घटाने के लिए हाई-प्रोफाइल सोशल मीडिया प्रचार ने डायबिटीज मरीजों के लिए जरूरी डोज की उपलब्धता को प्रभावित किया। इससे डॉक्टरों पर ऑल्टरनेट ड्रग्स प्रिस्क्राइब करने और क्लिनिकल प्रायोरिटी तय करने का दबाव भी बढ़ा।​

        नवंबर 2025 में TGA ने पूरे GLP-1 RA क्लास (Ozempic, Wegovy, Saxenda, Trulicity, Mounjaro आदि) पर नई सेफ्टी अलर्ट जारी किए। इनमें गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल साइड इफेक्ट्स और पैंक्रीटाइटिस के साथ आत्महत्या के खयाल या बिहेवियर के जोखिम को लेकर चेतावनी को प्रमुख माना गया है ताकि डॉक्टर और मरीज दोनों हाई-रिस्क केस को पहचान कर समय पर दवा रोक सकें।​

        मानसिक स्वास्थ्य के मोर्चे पर अब भी खोज जारी

        वैज्ञानिकों की ओर से किए गए शोध के अनुसार, कुछ डेटा में GLP-1 लेने वालों में डिप्रेशन या आत्महत्या-संबंधी घटनाओं का जोखिम हल्का बढ़ा दिखता है। हालाँकि यह अब तक साफ नहीं है कि दवा इसका सीधा कारण है या फिर मोटापे, तेजी से वजन घटने, बॉडी-इमेज प्रेशर और पहले से मौजूद मानसिक बीमारियों का मिला-जुला असर है।

        इसी के कारण WHO और रेगुलेटर्स दवाओं को बैन करने के बजाय ‘कड़े मॉनिटरिंग मोड’ में रखना चाह रहे हैं। इसका मतलब है कि प्रिस्क्रिप्शन से पहले मानसिक स्वास्थ्य का बेसलाइन असेसमेंट और उपचार के शुरुआती महीनों में मूड, एंग्जायटी और आत्महत्या के खयालों की सक्रिय स्क्रीनिंग की जाए।​

        क्या पड़ रहा है GLP-1 दवा का मानसिक स्वास्थ्य पर असर

        अभी तक की मनोवैज्ञानिक रिसर्च यह बताती है कि GLP-1 ड्रग्स लेने वाले मोटापे से ग्रस्त लोगों में अवसाद या सुसाइड-रिलेटेड इवेंट्स का जोखिम कुछ स्तर पर बढ़ा हुआ दिखा है। हालाँकि इसके कारण और असर (कैजुअलिटी) पर अब तक कोई ठोस बातें सामने नहीं आ सकी हैं।

        WHO और रेगुलेटर्स का मानना है कि जैसे-जैसे लाखों लोग ये दवाएँ ले रहे हैं, वैसे वैसे ही दुर्लभ लेकिन गंभीर न्यूरोसाइकेट्रिक साइड इफेक्ट्स की निगरानी भी जरूरी हो गई है। ऐसे में इन दवाओं पर तुरंत बैन लगाने के बजाय लेबल पर वार्निंग्स और फार्माकोविजिलेंस रिपोर्टिंग को मजबूत किया जा रहा है।​

        क्लिनिकल प्रैक्टिस में विशेषज्ञ दो स्तर पर सावधानी की बात कहते हैं। पहली, प्रिस्क्रिप्शन से पहले मरीज का मानसिक स्वास्थ्य इतिहास जाँचना जिसमें डिप्रेशन, पुरानी सुसाइडल आइडिएशन, सब्स्टेंस यूज के बारे में पूरी जानकारी शामिल हो। दूसरी, थेरेपी के शुरुआती महीनों में मूड, एंजायटी, इरिटेबिलिटी और सेल्फ-हार्म थॉट्स की सक्रिय स्क्रीनिंग की जाए और जरूरत पड़ने पर दवा रोकी जाए।

        भारत में Mounjaro की बिक्री और इससे जुड़ी चुनौती

        अक्टूबर 2025 में Eli Lilly की GLP-1 दवा Mounjaro (टिरजेपाटाइड) भारत में ‘वैल्यू टर्म्स’ में सबसे ज्यादा बिक्री वाली दवा बन गई। एक महीने में लगभग 1 अरब रुपये की बिक्री हुई और रिपोर्टों के मुताबिक इसकी खपत Wegovy की तुलना में डोज वॉल्यूम में कई गुना अधिक रही।​

        देश GLP-1 ट्रेंड का एक बड़ा बाजार बन चुका है और मोटापा उपचार का यह मॉडल तेजी से मेनस्ट्रीम हो रहा है। भारतीय GLP-1 बाजार 2025 तक लगभग 27 प्रतिशत वार्षिक दर से बढ़कर 6.06 अरब रुपये के आसपास पहुँच चुका है। 2030 तक ये 34 प्रतिशत से ज्यादा की कंपाउंड ग्रोथ की संभावना जताई जा रही है। इससे पता लगता है कि ये सिर्फ ‘फैड’ नहीं, बल्कि स्ट्रक्चरल ट्रेंड बन चुका है।​

        Eli Lilly कंपनी ने भारत में करीब 1 अरब डॉलर का निवेश किया। हैदराबाद में मैन्युफैक्चरिंग और क्वालिटी हब बनाकर कंपनियाँ सप्लाई शॉर्टेज से सीख लेकर लोकल प्रोडक्शन और कॉस्ट कंट्रोल के जरिए इस माँग को स्थिर करने की कोशिश कर रही हैं।

        हालाँकि इसे लेकर चुनौतियाँ भी हैं। ये चुनौती तीन स्तरों पर है- पहली, इसकी कीमत काफी अधिक है और इंश्योरेंस कवरेज सीमित है। इससे इलाज शहरी और समृद्ध वर्ग तक ही सिमट जाता है।

        दूसरी चुनौती, अगर ऑस्ट्रेलिया के जैसा ‘कॉस्मेटिक वेट लॉस’ का ट्रेंड बढ़ा तो डायबिटीज और गंभीर मोटापे वाले मरीजों के लिए भविष्य में आपूर्ति संकट पैदा हो सकता है।

        इसके अलावा तीसरी चुनौती ये है कि मानसिक स्वास्थ्य पर इसका असर पड़ेगा। डिप्रेशन, बॉडी-इमेज डिस्ट्रेस और आत्महत्या की सोच से जुड़े केस बढ़े तो पहले से दबाव में चल रही मानसिक स्वास्थ्य प्रणाली के लिए यह बड़ा बोझ बन सकता है।​

        भारत के रेगुलेटर और नीति नियानकों के लिए सवाल यह नहीं है कि GLP-1 ड्रग्स ‘चमत्कार’ हैं या ‘खतरा’, बल्कि यह है कि इन्हें किस फ्रेमवर्क के तहत अपनाया जाए। कठोर इंडिकेशन, लॉन्ग-टर्म फॉलो-अप, मानसिक स्वास्थ्य मॉनिटरिंग और कीमत-सप्लाई पर स्पष्ट पब्लिक-इंटरेस्ट पॉलिसी के साथ या फिर मार्केटिंग और सोशल मीडिया ट्रेंड्स के भरोसे जैसे कई बिंदुओं पर फ्रेमवर्क करना पड़ेगा।

        मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना जरूरी

        मोटापा कम करने की दवा की भारी माँग के बीच इस बात पर गौर करना जरूरी है कि भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली में मानसिक स्वास्थ्य संसाधन पहले से ही काफी सीमित हैं। ऐसे में अगर GLP-1 के उपयोग के साथ मूड में बदलाव, बॉडी-इमेज डिस्ट्रेस या सुसाइडल आइडिएशन जैसे केस बढ़ते हैं, तो इंटरडिसिप्लिनरी केयर मॉडल यानी एंडोक्राइनोलॉजिस्ट, साइकियाट्रिस्ट और काउंसलर की संयुक्त टीम की आवश्यकता बढ़ जाएगी।

        रिसर्च में ये भी सामने आया है कि कुछ मरीज तेजी से वजन घटने के साथ सोशल प्रेशर, बॉडी-डिस्मॉर्फिक टेंडेंसी और रिबाउंड वेट गेन के डर से भी मानसिक तनाव अनुभव करते हैं। ये असल में बायोलॉजिकल साइड इफेक्ट के बजाय कॉम्प्लेक्स साइकोसोशल डायनेमिक्स की ओर इशारा करते हैं।

        WHO की नई गाइडलाइन असल में भारत जैसे देशों को यह संकेत देती है कि अगर मोटापा और उससे जुड़े रोगों को गंभीरता से लेना है तो GLP-1 जैसी दवाएँ जरूरी टूल तो हो सकती हैं, लेकिन असली काम हेल्थ इक्विटी सुनिश्चित करने, हेल्थ सिस्टम को तैयार करने और मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षा के मजबूत ढाँचे खड़े करने में है।

        अगर आत्महत्या के खयाल दिल में तेजी से घर करते हैं या आगे के शोध में इस चेतावनी के व्यापक असर सामने आते हैं तो भारत के लिए दवा की आपूर्ति के साथ ही साइकियाट्रिक साइड-इफेक्ट के मुद्दे से भी दो- चार होना पड़ेगा।

        बंगाल में वक्फ और SIR पर नरमी, ममता बनर्जी की दलीय राजनीति या वोट बैंक पैंतरा?

        पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाल-ही में अपनी पॉलिसी में बदलाव दिखाया है। वह वक्फ संशोधन कानून (Waqf Amendment Act) और वोटर लिस्ट पुनरीक्षण (SIR) जैसे संवेदनशील मसलों पर नरम रुख अपना रही हैं।

        यह नरमी केवल विचारधारा या प्रशासनिक विवेक का नहीं, बल्कि स्पष्ट चुनावी रणनीति प्रतीत होती है। 2026 की विधानसभा चुनावी तैयारी के मद्देनज़र बंगाल के मुस्लिम वोटरों को संतुष्ट करने और धर्म-आधारित वोट बैंक को सुरक्षित रखने का यह कदम है जिसकी मंशा और असर दोनों पर हमें विचार करना चाहिए। 

        पहले जब वक्फ संशोधन कानून आया, तो ममता ने इसे ‘मुसलमानों के अधिकारों पर हमला’ करार दिया। उन्होंने कहा कि यह विधेयक एक धर्म विशेष के खिलाफ है, एक एंटी-फेडरल और एंटी-सेक्युलर साजिश है।

        मसले की संवेदनशीलता को देखते हुए, वक्फ संपत्तियों के नियंत्रण और प्रबंधन में पारदर्शिता लाना कानून का उद्देश्य था। हालाँकि, इस बिल के विरोध ने हिंसा और सांप्रदायिक अस्थिरता को जन्म दिया मुर्शिदाबाद व मालदा जैसे मुस्लिम बहुल जिलों में हिंदुओं की दुकानों पर हमले हुए थे।

        फिर भी, चुनाव से पहले ममता ने अचानक कहा कि वक्फ कानून पश्चिम बंगाल में लागू नहीं किया जाएगा। यह अचानक नरमी बिल्कुल उसी तरह जैसे वोटर लिस्ट पुनरीक्षण (SIR) पर उनकी भाषा बदली।

        पहले उन्होंने SIR की मुखर आलोचना की थी, और इसका लक्ष्य ‘छुपे हुए’ नागरिकता रजिस्टर (NRC) लाना माना था। पर अब वही सरकार राज्य में SIR को आगे बढ़ा रही है और मतदाता सूची में संशोधन कराने में जुटी है। 

        यह बदलाव सहज या विचार-परिवर्तन प्रतीत नहीं होता बल्कि स्पष्ट राजनीतिक गणना जैसा नजर आता है। बंगाल में कम से कम 27% मुस्लिम मतदाता हैं और कम-से-कम 100 सीटें ऐसी हैं जहाँ बिना मुस्लिम वोटों के जीतना मुमकिन नहीं।

        चुनाव के पहले ऐसे महत्वपूर्ण फैसलों के माध्यम से ममता बनर्जी साफ संदेश दे रही हैं कि वे अपनी ‘मुस्लिम मददगार’ वोट-बैंक को अहमियत दे रही हैं और साथ ही, अपनी पार्टी के लिए असुरक्षित हिंदू मतदाताओं को भी अस्थिरता की चिंता में छोड़ रही हैं।

        लेकिन सवाल उठता है- क्या यह ‘सौहार्द’ है या सत्ता बचाने का समीकरण? वक्फ कानून के केस में पारदर्शिता और जवाबदेही लाने का प्रयास था जिससे अवैध कब्जे, संपत्ति के दुरुपयोग और धार्मिक निधियों के भ्रष्ट प्रयोग को रोका जा सके।

        इधर किसी भी तथ्य-आधारित बीच-बचाव के बजाय, राजनीतिक समीकरण के चलते कानून को ठेंगा दिखाना, राज्य प्रशासन की जवाबदेही और संवैधानिक धर्म-निरपेक्षता दोनों के लिए खतरनाक precedent हो सकता है।

        साथ ही, SIR वोटर लिस्ट पुनरीक्षण प्रक्रिया, जिसपर पहले यह आरोप लगाया जाता था कि यह ‘छुपा NRC’ है, अब उसी प्रक्रिया को प्रोत्साहित करना, खासकर ऐसी आबादी वाले जिलों में जहाँ पिछले 50 सालों से अवैध प्रवास और अव्यवस्थित वोटर नामांकन को लेकर विवाद रहे हैं, यह साफ संकेत है कि वोट बैंक बदलने की कोशिश हो रही है।

        बिना पूरी पारदर्शिता, सुनियोजित जनगणना और नागरिकता व दस्तावेजों की सत्य-जाँच के, यह प्रक्रिया तर्कसंगत लोकतंत्र के लिए खतरा बन सकती है।

        इसमें सबसे महत्वपूर्ण, बंगाल जैसे राज्य में, जहाँ विभाजनकारी ताकतों का दायरा हमेशा रहा है, अल्पसंख्यकों के नाम पर वोट बैंक और धर्मनिरपेक्षता दोनों का इस्तेमाल करना- यह रणनीति कहीं न कहीं सामाजिक सामंजस्य और असली हिन्दू–बंगाली पहचान को तहस-नहस कर रही है।

        चुनावों से पहले कोई भी जनाधार वाला नेता नहीं चाहेगा कि उसके कोर वोटर्स उससे खफा हो जाएँ और ममता बनर्जी ने ठीक वही किया है। हमारे देश के लिए यह चिंता की बात है कि लोकतंत्र मात्र वोटों तक सीमित न रह जाए उसकी आत्मा यानी संविधान, नागरिकता, एकता और धर्म-निरपेक्षता की रक्षा पहले हो।

        हालाँकि जब राजनीतिक फायदे के लिए संवेदनशील मसलों पर नरमी, कानून की अवहेलना और वोट बैंक की राजनीति हो, तो इससे सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता को घात हो सकता है।

        इसलिए बंगाल में वक्फ कानून और SIR के प्रति ममता बनर्जी के बदलते रुख को केवल चुनावी जुगाड़ नहीं, बल्कि राजनैतिक सोची हुई चाल समझना चाहिए जो कि यदि रुकी नहीं गई, तो आने वाले दिनों में कई तरह की विभाजनात्मक राजनीति और सामाजिक अस्थिरता की जड़ बन सकती है।

        साउथ कोरिया में 1.20 लाख ‘होम कैमरे’ हैक, अश्लील कंटेंट बनाकर करोड़ों में बेचा: जानें हैकर्स ने कैसे IP में लगाई सेंध और कैसे खुद को ऑनलाइन अटैक से बचाएँ?

        साइबर सुरक्षा आज के दौर की सबसे बड़ी चुनौती है। हाल ही में साउथ कोरिया में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहाँ हैकर्स ने घरों और व्यवसायों में लगे 1,20,000 से अधिक इंटरनेट प्रोटोकॉल (IP) कैमरों को हैक कर लिया। हैकर्स ने इन कैमरों की फुटेज का इस्तेमाल करके अश्लील सामग्री बनाई और उसे एक विदेशी वेबसाइट पर बेचकर करोड़ों रुपए कमाए। यह घटना दिखाती है कि कैसे हमारी छोटी सी लापरवाही हमारी निजता (प्राइवेसी) और सुरक्षा पर भारी पड़ सकती है। इस मामले में पुलिस ने चार मुख्य आरोपितों को गिरफ्तार किया है और वेबसाइट को बंद करने की कार्रवाई कर रही है।

        क्या है मामला और कैसे हुई हैकिंग?

        यह पूरा मामला IP कैमरों (इंटरनेट प्रोटोकॉल कैमरे), जिन्हें आमतौर पर ‘होम कैम’ कहा जाता है, की सुरक्षा में मौजूद बड़ी कमियों से जुड़ा है। IP कैमरे, सुरक्षा के लिए इस्तेमाल होने वाले पुराने CCTV कैमरों का एक सस्ता और नया विकल्प हैं। इनकी खासियत यह है कि ये सीधे आपके इंटरनेट नेटवर्क से जुड़े होते हैं, जिससे आप दुनिया के किसी भी कोने से अपने मोबाइल फोन पर अपने घर, बच्चों या पालतू जानवरों पर नजर रख सकते हैं। साउथ कोरिया में चार लोगों ने इसी सुविधा का गलत फायदा उठाया। पुलिस ने उन्हें 1 लाख 20 हजार से ज्यादा IP कैमरों को हैक करने के आरोप में गिरफ्तार किया है।

        इन हैक किए गए कैमरों की फुटेज निजी घरों, मनोरंजन स्थलों (कराओके रूम), व्यायामशालाओं (पिलेट्स स्टूडियो) और यहाँ तक कि डॉक्टरों के निजी क्लीनिकों जैसे संवेदनशील स्थानों से ली गई थी। हैकर्स ने इन निजी फुटेज को चुराया और उनका इस्तेमाल करके यौन शोषण से जुड़ी आपत्तिजनक सामग्री तैयार की। उन्होंने यह सामग्री एक विदेशी एडल्ट वेबसाइट पर बेच दी, जिससे उन्हें बड़ी कमाई हुई।

        उदाहरण के लिए, एक आरोपित ने अकेले 63,000 कैमरे हैक करके 545 वीडियो बेचे और करीब ₹21 लाख की कमाई की। दूसरे आरोपित ने भी 70,000 कैमरे हैक करके लगभग ₹11 लाख कमाए। चौंकाने वाली बात यह है कि पिछले एक साल में उस अवैध वेबसाइट पर डाले गए वीडियो में से 62% इन्हीं दो आरोपितों ने बेचे थे, जिससे पता चलता है कि यह कितनी बड़े पैमाने पर किया गया अपराध था।

        हैकिंग कैसे हुई?

        IP कैमरों को हैक करने के लिए अपराधियों ने कोई बहुत बड़ी तकनीकी चालाकी नहीं दिखाई, बल्कि उन्होंने एक आम गलती का फायदा उठाया। इन कैमरों को हैक करने का मुख्य कारण था कमजोर और पहले से सेट किए गए पासवर्ड (डिफ़ॉल्ट पासवर्ड)। जब कोई नया IP कैमरा खरीदकर लगाता है, तो वह अक्सर ‘123456’, ‘0000’ या ‘ABCD’ जैसे बहुत ही आसान पासवर्ड के साथ आता है। बहुत से लोग इन डिफॉल्ट पासवर्ड को बदलना भूल जाते हैं और हैकर्स इन्हीं सरल पासवर्ड को निशाना बनाते हैं क्योंकि वे आसानी से अनुमान लगाए जा सकते हैं।

        इसके अलावा, हैकिंग की दूसरी वजह यह थी कि बहुत से सस्ते या पुराने कैमरों के सॉफ्टवेयर में सुरक्षा की कमियाँ (Security Holes) होती हैं। अगर कैमरे के सॉफ्टवेयर को समय पर अपडेट नहीं किया जाए, तो ये कमियाँ खुली रह जाती हैं। हैकर्स इंटरनेट पर ऐसे सभी कैमरों को स्कैन करते हैं जिनकी सुरक्षा कमजोर है। एक बार उन्हें कमजोर पासवर्ड या सॉफ्टवेयर की खामी वाला कैमरा मिल जाता है तो वे रिमोट हैकिंग (दूर बैठे) के जरिए कहीं से भी कैमरे के पूरे सिस्टम तक पहुँच बना लेते हैं और उसकी लाइव फुटेज को रिकॉर्ड कर लेते हैं।

        पुलिस ने बताया कि इस मामले में पकड़े गए चारों अपराधी किसी एक बड़े गिरोह का हिस्सा नहीं थे, बल्कि वे अलग-अलग काम कर रहे थे। हालाँकि, उन सभी का तरीका और लक्ष्य एक ही था- कमजोर सुरक्षा वाले IP कैमरों को निशाना बनाना और अवैध फुटेज बेचकर पैसा कमाना। यह साफ दिखाता है कि हमारी छोटी सी लापरवाही (पासवर्ड न बदलना) हैकर्स के लिए कितनी बड़ी कमाई का जरिया बन सकती है।

        यौन शोषण और हैकिंग से खुद को कैसे बचा सकते हैं?

        IP कैमरों की हैकिंग और यौन शोषण जैसे साइबर अपराधों से खुद को बचाना बहुत मुश्किल नहीं है, इसके लिए बस थोड़ी सी सावधानी और जागरूकता दिखानी होगी। आपको अपनी ऑनलाइन आदतों में कुछ बदलाव लाने होंगे ताकि अपराधी आपकी सुरक्षा में सेंध न लगा सकें।

        IP कैमरा हैकिंग से बचाव के आसान तरीके- अपनी सुरक्षा को और पक्का करने के लिए, आपको हर छह महीने में अपना पासवर्ड बदलते रहना चाहिए और एक ही पासवर्ड का इस्तेमाल अलग-अलग डिवाइस या अकाउंट के लिए कभी न करें। अगर आपके कैमरे के ऐप या वेबसाइट में टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन (MFA) की सुविधा है, तो उसे हमेशा ऑन रखें। इससे लॉगिन के लिए पासवर्ड के साथ-साथ आपके मोबाइल पर आया एक कोड भी डालना जरूरी होगा।

        कैमरे को सुरक्षित रखने के लिए, उसके मैन्युफैक्चरर द्वारा जारी किए गए सॉफ्टवेयर अपडेट को समय पर इंस्टॉल करें, क्योंकि ये अपडेट सुरक्षा की कमियों को दूर करते हैं। इसके अलावा, अपने वाई-फाई राउटर का पासवर्ड भी जटिल रखें और WPA2 या WPA3 एन्क्रिप्शन का उपयोग करें। हमेशा भरोसेमंद और हाई-क्वालिटी ब्रांड के कैमरे ही खरीदें जो मजबूत सुरक्षा सुविधाएँ, जैसे एन्क्रिप्शन, देते हों। अंत में, अगर आपको लगे कि आपका कैमरा अपने आप हिल रहा है या ज़ूम हो रहा है (जिसे संदिग्ध गतिविधि कहते हैं), तो तुरंत अलर्ट हो जाएँ, पासवर्ड बदलें और कैमरा इंटरनेट से डिसकनेक्ट कर दें।

        यौन शोषण और सेक्सटॉर्शन से खुद को बचाना- यौन शोषण और सेक्सटॉर्शन (ब्लैकमेलिंग) जैसे खतरों से बचने के लिए, आपको अपनी ऑनलाइन आदतों में बहुत सावधानी बरतनी होगी। किसी भी अनजान व्यक्ति से, खासकर डेटिंग ऐप्स या सोशल मीडिया पर, अपनी संवेदनशील तस्वीरें या वीडियो कभी भी साझा न करें। अपनी निजी फुटेज को क्लाउड स्टोरेज (जैसे गूगल ड्राइव) पर या इंटरनेट से जुड़े डिवाइस पर बिना मजबूत सिक्योरिटी के स्टोर न करें।

        अगर कोई अजनबी आपको वीडियो कॉल करता है या संदिग्ध व्यवहार करता है तो उसमें शामिल होने से बचें, क्योंकि साइबर अपराधी अक्सर पहले आपका वीडियो रिकॉर्ड करते हैं और फिर आपको ब्लैकमेल करते हैं। अगर आप ब्लैकमेल के शिकार हो जाते हैं तो डरकर कभी भी पैसे न दें, क्योंकि इससे ब्लैकमेलिंग रुकती नहीं, बल्कि और बढ़ जाती है। ऐसी स्थिति में, तुरंत अपने नजदीकी पुलिस स्टेशन के साइबर सेल में जाकर रिपोर्ट करें। माता-पिता के लिए यह जरूरी है कि वे अपने बच्चों को ऑनलाइन सुरक्षा, निजता के महत्व और आपत्तिजनक सामग्री से दूर रहने के बारे में सही जानकारी दें, ताकि वे खुद को सुरक्षित रख सकें।

        जागरूकता के लिए साइबर सुरक्षा वेबसाइट और हेल्पलाइन

        साइबर अपराधों से बचाव के लिए जागरूकता सबसे बड़ा और ज़रूरी हथियार है। भारत सरकार ने लोगों को जागरूक करने और उनकी मदद करने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। ऐसी ही कुछ वेबसाइटें और हेल्पलाइन यहाँ दी गई हैं।

        सबसे पहले है साइबर दोस्त (Cyber Dost)। यह भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा चलाई गई एक पहल है, जिसका मुख्य काम लोगों को साइबर सुरक्षा के बारे में जागरूक करना है। ‘साइबर दोस्त’ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लगातार साइबर सुरक्षा से जुड़े छोटे-छोटे टिप्स, सलाह और नई खतरों के बारे में चेतावनियाँ साझा करता रहता है, ताकि लोग ऑनलाइन फ्रॉड से बच सकें।

        दूसरा महत्वपूर्ण साधन है भारत सरकार का आधिकारिक पोर्टल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल (cybercrime.gov.in)। अगर आपके साथ कोई भी ऑनलाइन धोखाधड़ी, यौन शोषण, या किसी भी तरह का साइबर अपराध होता है तो आप इस पोर्टल पर जाकर तुरंत अपनी शिकायत दर्ज कर सकते हैं। यह पोर्टल सीधे पुलिस से जुड़ा हुआ है।

        इसके अलावा, डिजिटल सेक्स क्राइम पीड़ित सहायता केंद्र (Digital Sex Crime Victim Support Center) विशेष रूप से डिजिटल यौन अपराधों के शिकार लोगों के लिए बनाया गया है। यह केंद्र पीड़ितों को भावनात्मक परामर्श (काउंसलिंग) देता है, उनकी आपत्तिजनक ऑनलाइन सामग्री को हटाने या ब्लॉक करने में मदद करता है और उन्हें जरूरी कानूनी सहायता भी देता है। ये सभी संसाधन मिलकर यह सुनिश्चित करते हैं कि नागरिक साइबर दुनिया में सुरक्षित रहें और जरूरत पड़ने पर उन्हें तुरंत मदद मिल सके।

        निजता पर बढ़ता हमला

        साउथ कोरिया में IP कैमरों की यह बड़ी हैकिंग सिर्फ एक चोरी या अपराध की घटना नहीं है, बल्कि यह एक बहुत बड़ी चेतावनी है कि इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) के इस दौर में हमारी निजी ज़िंदगी (प्राइवेसी) कितनी खतरे में है। यह घटना साफ तौर पर दिखाती है कि जिन कैमरों और उपकरणों को हम अपने घर की सुरक्षा के लिए लगाते हैं, वे ही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी बन सकते हैं और हमारी निजी फुटेज को बाहर लीक कर सकते हैं।

        सभी स्मार्टफोन्स में संचार साथी ऐप, साइबर अपराध रोकना मकसद-जरूरत न हो तो कर सकते हैं डिलीट: जानें- इससे क्या होगा फायदा

        भारत सरकार ने साइबर सुरक्षा को मजबूत करने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। दूरसंचार मंत्रालय ने शुक्रवार (28 नवंबर 2025) को एक आदेश जारी किया, जिसमें सभी नए स्मार्टफोन्स पर ‘संचार साथी’ ऐप को प्रीलोड करने का निर्देश दिया गया है। हालाँकि केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा है कि जो लोग ये ऐप नहीं रखना चाहते, वो इसे डिलीट कर सकते हैं। ये वैकल्पिक है।

        आदेश के मुताबिक, एप्पल, सैमसंग, वीवो, ओप्पो और शाओमी जैसी प्रमुख कंपनियों को 90 दिनों के अंदर यह सुनिश्चित करना होगा। सप्लाई चेन में पहले से मौजूद डिवाइसेज पर ओटीए (ओवर-द-एयर) अपडेट के जरिए ऐप पुश किया जाएगा। यह पहली बार है जब भारत में किसी सरकारी ऐप को हर डिवाइस पर अनिवार्य किया गया है, हालाँकि यूजर चाहे तो इसे बंद कर सकता है या डिलीट कर सकता है।

        संचार साथी ऐप की क्या है खासियत?

        संचार साथी ऐप जनवरी 2024 में लॉन्च हुआ था और अब तक 50 लाख से ज्यादा डाउनलोड हो चुके हैं। यह ऐप यूजर्स को फ्रॉड कॉल्स रिपोर्ट करने, चोरी या खोए हुए फोन को आईएमईआई नंबर से ब्लॉक करने, डिवाइस की वैधता जाँचने और फर्जी सिम कनेक्शन्स काटने जैसे कई काम करता है। एक केंद्रीय रजिस्ट्री के जरिए यह सभी टेलीकॉम नेटवर्क पर काम करता है।

        सरकार के आँकड़ों के मुताबिक, इस ऐप ने 7 लाख से ज्यादा खोए फोन रिकवर कराए हैं, जिसमें अक्टूबर में अकेले 50,000 फोन शामिल हैं। साथ ही, 3.7 करोड़ चोरी के फोन ब्लॉक किए गए और 30 मिलियन फर्जी कनेक्शन बंद हुए।

        इस फैसले से साइबर सुरक्षा के लिहाज से बड़ा फायदा होगा। भारत में 1.2 अरब से ज्यादा मोबाइल सब्सक्राइबर्स हैं और साइबर क्राइम में तेजी से इजाफा हो रहा है। डुप्लीकेट या स्पूफ्ड आईएमईआई नंबर्स से स्कैम और नेटवर्क दुरुपयोग आम हो गया है। ऐप से यूजर्स को फोन ट्रैकिंग, पुलिस को डिवाइस ट्रेस करने में मदद मिलेगी और ब्लैक मार्केट में नकली फोनों की बिक्री रुकेगी।

        साइबर सुरक्षा के लिए बेहद अहम, चोरियों पर लगेगी लगाम

        विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम साइबर थ्रेट्स को रोकने में मील का पत्थर साबित होगा। काउंटरपॉइंट रिसर्च के डायरेक्टर तरुण पाठक ने कहा, “यह ऐप साइबर अपराधों को रोकने के लिए जरूरी है, लेकिन कंपनियों की ओर से चुनौतियाँ जरूर मिलेंगी।”

        फोन खोने या चोरी की स्थिति में यह ऐप बेहद सहायक साबित होगा। यूजर ऐप के जरिए तुरंत आईएमईआई ब्लॉक कर सकता है, जिससे चोर फोन का इस्तेमाल न कर सके। केंद्रीय डेटाबेस से ट्रैकिंग आसान हो जाती है और पुलिस को लोकेशन ट्रेस करने में मदद मिलती है। सरकार का दावा है कि इससे नुकसान कम होगा और यूजर्स की सुरक्षा बढ़ेगी।

        कुछ कंपनियाँ कर सकती हैं सरकार के फैसले का विरोध

        हालाँकि, यह फैसला कई कंपनियों को नागवार गुजर रहा है। भारत में 4.5% स्मार्टफोन मार्केट शेयर रखने वाली एप्पल ने पहले ही सरकारी एंटी-स्पैम ऐप के लिए असहमति जताई थी। एप्पल की पॉलिसी में सेल से पहले किसी थर्ड-पार्टी ऐप इंस्टॉल करना मना है।

        सूत्रों के मुताबिक, एप्पल ऐसी माँगों को हमेशा ठुकराती रही है। काउंटरपॉइंट के तरुण पाठक ने रॉयटर्स को बताया, “एप्पल मध्य मार्ग तलाशेगी, जैसे यूजर्स को इंस्टॉल के लिए नोटिफाई करना।” सैमसंग, वीवो, ओप्पो और शाओमी भी चुप्पी साधे हुए हैं, लेकिन इनका विरोध प्राइवेसी और यूजर चॉइस पर केंद्रित है।

        प्राइवेसी एडवोकेट्स ने भी कड़ी आलोचना की है। टेक्नोलॉजी वकील मिशी चौधरी ने कहा, “सरकार यूजर कंसेंट को खत्म कर रही है। यह यूजर चॉइस को नजरअंदाज करता है।” हालाँकि अब सरकार की सफाई के बाद ये तय हो गया है कि यूजर चाहे तो इस ऐप को हटा भी सकता है।

        वैसे, एंड्रॉयड स्मार्टफोन्स में पहले से ही गूगल की तरफ से ‘Find My Device’ जैसे ऐप हैं, लेकिन इन तक सरकार की पहुँच नहीं थी, जिसका साइबर क्रिमिनल फायदा उठाते रहे हैं, क्योंकि ये ऐप फैक्ट्री री-सेट मारने के साथ ही गायब भी हो जाता है। ऐसे में इस ऐप का फायदा ग्राहकों को नहीं मिल पाता।

        रूस में मैक्स मैसेंजर ऐप किया जा चुका है अनिवार्य

        रूस में अगस्त 2025 में मैक्स मैसेंजर ऐप को अनिवार्य करने पर भी इसी तरह विरोध हुआ था। आलोचक कहते हैं कि बिना पब्लिक कंसल्टेशन के यह सर्विलांस का खतरा बढ़ा सकता है। लेकिन सरकार का तर्क है कि साइबर खतरे इतने गंभीर हैं कि यह कदम जरूरी है।

        सिम-वॉट्सऐप को लेकर जारी डायरेक्शन के बाद ये कितना अहम कदम

        यह फैसला हाल के सिम बाइंडिंग और वॉट्सऐप पर डायरेक्शन के बाद आया है, जो यूजर वेरिफिकेशन को मजबूत कर रहा है। सिम को बायोमेट्रिक से लिंक करने के बाद यह ऐप अगला कदम है, जो डिवाइस लेवल पर सुरक्षा लाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह वैश्विक ट्रेंड का हिस्सा है, जहाँ रूस के बाद भारत भी स्टेट ऐप्स को पुश कर रहा है। दूरसंचार मंत्रालय ने कहा, “यह टेलीकॉम साइबर सिक्योरिटी को बचाने के लिए अनिवार्य है।”

        बता दें कि अब वॉट्सऐप अपने फोन से दूसरी किसी जगह चलाने के लिए हर 6 घंटे में लॉगिन करने की जरूरत पड़ेगी। अब तक डेस्कटॉप पर लॉगिन करने के बाद बार-बार लॉगिन करने की जरूरत नहीं पड़ती थी और बिना सिम-नंबर के भी लंबे समय तक वॉट्सऐप का इस्तेमाल लैपटॉप-डेस्कटॉप पर किया जा सकता था। लेकिन इसका फायदा साइबर अपराधी उठाने लगे थे, जिसके बाद सरकार ने इस पर रोक लगा दी है।

        कुल मिलाकर देखा जाएगा तो सरकार के आदेश के बाद सभी स्मार्टफोन में मौजूद संचार साथी ऐप से साइबर फ्रॉड कम होंगे, लेकिन प्राइवेसी बहस तेज हो गई है। बहरहाल, कंपनियाँ 90 दिनों में सरकार के आदेश का अनुपालन करेंगी या कोर्ट जाएँगी, यह देखना दिलचस्प होगा।

        क्या है J&K का रूबिया सईद अपहरण कांड जिसमें 35 साल बाद शफत अहमद को CBI ने दबोचा, आतंकी यासीन मलिक का था मददगार

        केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) ने सोमवार (01 दिसंबर 2025) को 1989 के रूबिया सईद अपहरण कांड में नई गिरफ्तारी की है। CBI ने 35 साल बाद इस केस में श्रीनगर के हवाल इलाके से शफत अहमद शुंगलू को धर दबोचा। पहले शुंगलू को निशात पुलिस स्टेशन ले जाया गया, फिर सीबीआई (CBI) ने हिरासत में ले लिया। अधिकारियों का कहना है कि पूछताछ से कई राज खुल सकते हैं।

        रूबिया अपहरण केस क्या था, जिसने हिला दिया था पूरा देश

        शफत अहमद शुंगलू की ताजा गिरफ्तारी रूबिया सईद अपहरण कांड की जाँच को नई जान दे रही है, जो कश्मीर के आतंकवाद के इतिहास का एक काला अध्याय है। 8 दिसंबर 1989 को तब के गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रूबिया को जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के आतंकियों ने अगवा कर लिया था।

        लाल डीड अस्पताल में डॉक्टर रूबिया बस से घर लौट रही थीं जब बंदूक की नोक पर उन्हें किडनैप कर लिया गया। यह खबर दिल्ली पहुँचते ही हड़कंप मच गया। पूरे देश में सन्नाटा छा गया, क्योंकि यह पहली बार था जब आतंकी केंद्र सरकार के मंत्री के घर तक सेंध लगा बैठे।

        अपहरण के पीछे साफ मकसद था- जेल में बंद अपने साथियों को रिहा कराना। आतंकियों ने शर्त रखी: रूबिया की जान चाहिए तो पाँच खूँखार सदस्यों को छोड़ो। सरकार मुश्किल में फँस गई। एक तरफ मंत्री की बेटी की जिंदगी, दूसरी तरफ राष्ट्रीय सुरक्षा। कई दिनों तक पर्दे के पीछे बातचीत चली।

        आखिरकार 13 दिसंबर को वीपी सिंह सरकार झुक गई। पाँच आतंकियों को रिहा किया गया, बदले में रूबिया घर लौट आईं। लेकिन इस सौदे ने कश्मीर का चेहरा हमेशा के लिए बदल दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि इसी घटना ने आतंकियों के हौसले बुलंद कर दिए।

        यासीन मलिक था अपहरण केस का मास्टरमाइंड, खुद रूबिया ने की थी पहचान

        इस सौदे के केंद्र में था जेकेएलएफ का चीफ यासीन मलिक। मलिक पर अपहरण का मास्टरमाइंड होने का आरोप है। सीबीआई की चार्जशीट के मुताबिक, दिसंबर 1989 के पहले हफ्ते में मलिक और उसके साथियों ने साजिश रची। रूबिया को निशाना बनाकर सरकार को ब्लैकमेल करने का प्लान था।

        मलिक ने खुद को अपहरण की योजना का सूत्रधार बताया। 2022 में रूबिया ने टाडा कोर्ट में मलिक समेत चार आरोपितों की पहचान की। उन्होंने कहा, “यही वो लोग थे जिन्होंने मुझे अगवा किया।” रूबिया का यह बयान केस को मजबूत करने वाला साबित हुआ। “

        यासीन मलिक की भूमिका सिर्फ अपहरण तक सीमित नहीं थी। वह जेकेएलएफ का चेहरा था, जो पाकिस्तान समर्थित आतंक को कश्मीर में फैला रहा था। मलिक ने अपहरण को एक राजनीतिक हथियार बनाया। रिहाई के बाद रिहा हुए आतंकी जैसे अली मोहम्मद मीर, मोहम्मद यासिन फतेह और इकबाल अहमद गंदरू ने जेकेएलएफ को नई ताकत दी। मलिक ने इन्हें हथियारों से लैस किया और हमलों की साजिशें रचीं।

        मलिक की गिरफ्तारी के बाद दोबारा खुली फाइल

        साल 2019 में मलिक की गिरफ्तारी के बाद सीबीआई ने पुरानी फाइलें खोलीं। जनवरी 2024 में मलिक समेत 10 के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई। इसमें अपहरण, साजिश और बंधक बनाने के आरोप हैं। अब उम्रकैद की सजा काट रहे आतंकी मलिक ने कभी अपराध नहीं माना, लेकिन गवाहों के बयानों ने उसे आखिरकार न्याय के कटघरे में खड़ा कर दिया।

        रूबिया अपहरण केस के बाद कश्मीर में हिंदुओं पर हुआ जुल्म

        इस अपहरण ने कश्मीर में आतंकवाद को तेजी से बढ़ावा दिया। पहले कश्मीर में अलगाववाद था, लेकिन 1989 के बाद यह हिंसा का सैलाब बन गया। रिहा हुए आतंकियों ने नई भर्तियाँ कीं, हथियारों का जखीरा बढ़ाया। विशेषज्ञ कहते हैं कि इस सौदे ने आतंकियों को संदेश दिया- सरकार झुक सकती है। नतीजा? 1990 में कश्मीरी पंडितों का पलायन शुरू हो गया।

        जेकेएलएफ ने हिंदू परिवारों पर हमले किए, हजारों घर जलाए। मलिक पर कश्मीरी पंडितों के नरसंहार का भी आरोप है। सरकार ने 2019 में जेकेएलएफ को आतंकी संगठन घोषित किया। गृह मंत्रालय ने कहा, “यह संगठन 1989 के पंडित जेनोसाइड, आईएएफ अधिकारियों की हत्या और रूबिया अपहरण के लिए जिम्मेदार है।”

        कश्मीर में आई अपहरण की बाढ़, हर तरफ आतंकी ही आतंकी

        अपहरण के बाद किडनैपिंग की होड़ लग गई। 1991 में आईएएस अधिकारी ए.के. भट्टाचार्य का बेटा अपहरण हुआ। 1992 में वीसी चिल्टन का बेटा। ये सभी जेकेएलएफ की साजिशें थीं। मलिक ने इनसे फंडिंग और हथियार जुटाए। कश्मीर घाटी में ग्रेनेड हमले, सड़क किनारे बम विस्फोट आम हो गए। 1989 से 1990 के बीच आतंकी घटनाएं दोगुनी हो गईं।

        पीआईबी के अनुसार, 1989 में 200 से ज्यादा हमले हुए, जो 1990 में 1000 पार कर गए। मलिक की रणनीति थी- हाई-प्रोफाइल टारगेट चुनो, सरकार को मजबूर करो। इसने अलगाववाद को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाकर पाकिस्तान को मजबूत किया।

        कश्मीर में आतंकवाद के बढ़ने की वजह सिर्फ अपहरण नहीं, बल्कि मलिक जैसी साजिशें थीं। 1989 के बाद जेकेएलएफ ने आईएएफ के चार अधिकारियों की हत्या की। मलिक पर यह केस भी चल रहा है। एनआईए ने 2019 में मलिक को टेरर फंडिंग में उम्रकैद दी। ओपन मैगजीन के अनुसार, मलिक ने अपहरण से कश्मीर को ‘कॉन्सपिरेटर’ बना दिया।

        इस अपहरण कांड के बाद बढ़ा था कश्मीर में आतंकवाद

        सीबीआई की यह कार्रवाई दिखाती है कि कानून कभी सोता नहीं। शुंगलू की पूछताछ से बाकी फरार जैसे अली मोहम्मद मीर तक पहुँच बन सकती है। मलिक की साजिश ने कश्मीर को आग में झोंक दिया, लेकिन अब न्याय की बारी है। कश्मीर के इतिहासकार कहते हैं कि अपहरण ने ‘अलगाववाद से आतंकवाद’ का रास्ता खोला। 1990 में 1 लाख पंडित बेघर हुए। जेकेएलएफ ने 1000 से ज्यादा हमले किए। मलिक ने पाकिस्तान से ट्रेनिंग ली, हथियार मँगवाए।

        बहरहाल, ताजा गिरफ्तारी से केस में नया मोड़ आ गया है। शफत अहमद शुंगलू पर अपहरण में सहयोग का आरोप है। एक चश्मदीद गवाह ने कहा, “मैंने 1989 के बाद सोपोर में शुंगलू को देखा।” कुछ आरोपित धारा 164 के तहत जुर्म कबूल कर चुके हैं। वहीं, सीबीआई इस केस को टाडा कोर्ट में चला रही है। जिसमें जनवरी 2021 में कोर्ट ने मलिक समेत 10 के खिलाफ आरोप तय किए थे। अब अगली सुनवाई में शुंगलू की भूमिका खुल सकती है।