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CAA के खिलाफ प्रदर्शन करने वाली फ्रांसिस्का ओर्सिनी का डिपोर्टेशन कानूनी मामला, राजनीति से जोड़कर हल्ला मचा रहे लेफ्ट-लिबरल: कथित ‘विद्वान’ की विचारधारा भी जानिए

हिंदी भाषा पर काम करने वाली ब्रिटिश प्रोफेसर फ्रांसिस्का ओर्सिनी को 21 अक्टूबर 2025 को भारत में एंट्री नहीं मिली और दिल्ली के इंदिरा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से डिपोर्ट कर दिया गया, हालाँकि उनके पास 5 साल का वैध ई-वीजा था। भारत पहुँचते ही इमिग्रेशन अधिकारियों ने उन्हें रोका और कुछ घंटों में हॉन्गकॉन्ग भेज दिया।

इस घटना से कुछ वामपंथी अकादमिक और राजनीतिक हलकों में गुस्सा फैला। कई लोगों ने बिना कारण बताए सरकार की आलोचना की और इसे ‘अकादमिक विरोधी’ कदम बताया। लेकिन सरकार ने साफ किया कि मार्च 2025 में ही ओर्सिनी को वीजा नियम तोड़ने के लिए ब्लैकलिस्ट किया गया था। डिपोर्टेशन कानूनी कार्रवाई थी, विचारधारा से इसका कोई लेना-देना नहीं। फिर भी उनकी भारत और हिंदू धर्म के बारे में विचारधारा की जाँच जरूरी है।

सरकार ने की कानूनी कार्रवाई, विचारधारा से कोई लेना-देना नहीं

गृह मंत्रालय ने बताया कि ओर्सिनी पहले टूरिस्ट वीजा पर भारत आई थीं और उन्होंने अनधिकृत अकादमिक काम किया, जो वीजा नियमों का उल्लंघन है। भारत के नियमों के मुताबिक, टूरिस्ट वीजा पर कोई पेशेवर काम, शोध या अकादमिक गतिविधि की इजाजत नहीं है। अधिकारियों ने पुष्टि की कि इस उल्लंघन की वजह से उन्हें ब्लैकलिस्ट किया गया। सिस्टम ने ऑटोमेटिक तरीके से उनकी एंट्री रोक दी, चाहे वीजा वैध हो या न हो, क्योंकि उनकी एंट्री ब्लैकलिस्टेड की जा चुकी थी।

मंत्रालय ने साफ किया कि यह कोई टारगेटेड कार्रवाई नहीं थी। इसमें कोई ‘राजनीतिक साजिश’ या नीति में बदलाव नहीं था, जैसा कि वामपंथी मीडिया और लोग दावा कर रहे हैं। यह सामान्य वीजा नियम लागू करना था, जो हर विदेशी नागरिक पर लागू होता है, चाहे उनका पेशा या विचारधारा कुछ भी हो। ओर्सिनी ने इन नियमों को नजरअंदाज किया, जिसके कारण उनकी एंट्री रोकी गई।

ऑपइंडिया की रिसर्च में पता चला कि ओर्सिनी की हिंदू विरोधी और भारत सरकार विरोधी विचारधारा का लंबा इतिहास है। फिर भी मार्च तक उन्हें भारत आने की अनुमति थी, जो दिखाता है कि प्रतिबंध का कोई वैचारिक कारण नहीं था।

CAA विरोध, कश्मीर पर सरकार की आलोचना और अकादमिक रुख

फ्रांसिस्का ओर्सिनी को गैर-राजनीतिक विद्वान के रूप में पेश किया जा रहा है, जो वो नहीं हैं। उन्होंने CAA विरोधी प्रदर्शनों में भारतीय पुलिस की कार्रवाई की निंदा की और सरकार पर सांप्रदायिकता का आरोप लगाया। वह हमेशा भारत की नीतियों और शासन की आलोचना करने वाली लेफ्ट-लिबरल विचारधारा के साथ रहीं।

कश्मीर पर उनके विचारों की बात करें तो, मार्च 2016 में वह 150 से ज्यादा हस्ताक्षरकर्ताओं में थीं, जिन्होंने नक्सल समर्थक प्रोफेसर निवेदिता मेनन की तथाकथित ‘बदनामी’ के खिलाफ खुला पत्र साइन किया। उस समय मेनन को JNU में कश्मीर के राजनीतिक दर्जे पर सवाल उठाने के लिए मीडिया में हंगामा हुआ था।

ओर्सिनी ने इस पत्र पर हस्ताक्षर किए और मेनन को ‘राष्ट्र-विरोधी’ कहने वाली ‘दक्षिणपंथी मीडिया मुहिम’ की निंदा की। इस पत्र में कश्मीर पर चर्चा की अकादमिक स्वतंत्रता का समर्थन किया गया और JNU प्रशासन से मेनन के बोलने के अधिकार की रक्षा करने को कहा गया।

एक्टिविज्म के अलावा ओर्सिनी ने अपनी लेखनी में बार-बार वैचारिक झुकाव दिखाया। उदाहरण के लिए, साल 2002 के एक लेख में उन्होंने रामायण और महाभारत को ‘नैतिकता-रहित’ ग्रंथ बताया और आधुनिक उदारवादी साहित्य से उनकी तुलना की। उन्होंने नाराजगी जताई कि उस समय भारत में भगवान राम की आलोचना मुश्किल थी। उस समय केंद्र में NDA की भाजपा सरकार थी।

‘ए मल्टीलिंगुअल नेशन’ किताब में अपने अध्याय ‘ना तुर्क ना हिंदू’ में ओर्सिनी ने भाषाविदों पर भाषाओं को सांप्रदायिक बनाने का आरोप लगाया। उन्होंने एक काल्पनिक सिद्धांत पर हंगामा मचाया, लेकिन खुद वही किया जिसके खिलाफ वह चेतावनी दे रही थीं-यानी ‘हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान’ का भूत बनाकर इसे ऐतिहासिक आलोचना के रूप में पेश किया।

ओर्सिनी ने लिखा, “आधुनिक भाषा विचारधाराएँ मानती हैं कि भाषाएँ खास समुदायों की होती हैं, चाहे वे जातीय, क्षेत्रीय या धार्मिक हों। बेनेडिक्ट एंडरसन ने हमें सिखाया (1991) कि ये काल्पनिक समुदाय अतीत, वर्तमान और भविष्य में प्रक्षेपित होते हैं। उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी की शुरुआत में ‘हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान’ नारे ने हिंदी (नागरी लिपि में) को उत्तर भारत के हिंदुओं की भाषा के रूप में शुरू से पेश किया, समकालीन हिंदुओं से इसे अपनाने को कहा और दावा किया कि हिंदी सभी भारतीयों, खासकर हिंदुओं की राष्ट्रीय भाषा बनेगी।”

लेख में उन्होंने आगे कहा, “इस आधुनिक कल्पना ने स्क्रिप्ट-भाषा-समुदाय का एक सिलसिला बनाया, जबकि लंबे समय से बहु-लिपीय और बहुभाषी परंपराएँ थीं, जहाँ भाषाएँ एक से ज्यादा लिपियों में लिखी जाती थीं और लोग एक से ज्यादा भाषाएँ सीखकर बहुभाषी सामाजिक दुनिया में काम कर लेते थे।” उन्होंने हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान नारे को जटिल, बहुल भाषाई वास्तविकताओं को राष्ट्रवादी ढाँचे में ढालने की कोशिश बताया।

लिबरल्स की नौटंकी पुराने पैटर्न पर ही, कुछ नया नहीं

जैसे ही ओर्सिनी का डिपोर्टेशन खबरों में आया, हमेशा की तरह बिना तथ्यों के पड़ताल के ही लोग भड़क उठे। किसी ने भी कानूनी हकीकत पर बात नहीं की, ओर्सिनी ने वीजा नियम तोड़े और उनके साथ वही हुआ जो किसी और के साथ होता।

‘द वायर’ के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन ने सवाल उठाया कि पिछली यात्रा में शोध करने के लिए उन्हें क्यों डिपोर्ट किया गया। उन्होंने कहा कि हिंदी की प्रोफेसर होने के नाते वह हिंदी में लोगों से बात कर सकती हैं या हिंदी विद्वानों से मिल सकती हैं। वह वीजा उल्लंघन को छिपा रहे थे और यह नहीं बताया कि ओर्सिनी टूरिस्ट वीजा पर आई थीं न कि वर्क वीजा पर, जो शोध के लिए जरूरी था।

सोर्स-एक्स

पत्रकार कुणाल पुरोहित ने इसे ‘राष्ट्रीय शर्म’ बताया और कहा कि ओर्सिनी ने हिंदी भाषा के लिए उस छोटे सोच वाले सिस्टम से ज्यादा किया, जो उन्हें खतरा मानता है।

राजदीप सरदेसाई ने लिखा, “विडंबना: एक सरकार जो हिंदी को बढ़ावा देने का दावा करती है, उसने एक प्रमुख विद्वान को डिपोर्ट किया, जिसने जीवन भर हिंदी पर शोध किया!”

रामचंद्र गुहा ने तो सरकार को ‘असुरक्षित, पागल और बेवकूफ’ करार दे दिया।

प्रोपेगेंडा फैलाने वाली पूर्व पत्रकार और टीएमसी सांसद सागरिका घोष ने लिखा, “हैरान करने वाला और दुखद। फ्रांसिस्का ओर्सिनी दक्षिण एशियाई साहित्य और हिंदी की विश्व प्रसिद्ध विद्वान हैं, जिन्हें वैध वीजा के बावजूद डिपोर्ट किया गया। नरेंद्र मोदी का संकीर्ण और पिछड़ा शासन भारत की खुले दिमाग वाली विद्वता और उत्कृष्टता को नष्ट कर रहा है।”

ये प्रतिक्रियाएँ अकादमिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि एक नैरेटिव को बढ़ावा देने के लिए हैं। यह नैरेटिव हर इमिग्रेशन जाँच और कानून लागू करने को दमन का कृत्य बताता है। गुस्सा चुनिंदा है, तथ्यों को नजरअंदाज किया गया, और मकसद साफ है-यानी अलग-थलग घटनाओं को हथियार बनाकर उस सरकार को बदनाम करना, जिसका वे राजनीतिक विरोध करते हैं।

पहला मामला नहीं, और भी लोगों को नहीं मिली भारत में एंट्री

ओर्सिनी अकेली विदेशी विद्वान नहीं हैं, जिन्हें वीजा दुरुपयोग या भारत विरोधी रुख के लिए परिणाम भुगतना पड़ा। हाल के वर्षों में फिलिपो ओसेला और निताशा कौल को भी नियम तोड़ने के कारण भारत में प्रवेश नहीं मिला। इन सभी मामलों में कानूनी प्रक्रिया का पालन हुआ। फिर भी हर बार इसे असहमति के खिलाफ अभियान के रूप में पेश किया जाता है।

किसी भी संप्रभु देश की तरह भारत भी अपने इमिग्रेशन नियम लागू करने का पूरा हक रखता है। उसे उन लोगों को स्वतः प्रवेश देने की जरूरत नहीं जो नियम तोड़ते हैं, चाहे वे संस्कृत ग्रंथों को गलत अर्थ दे या हिंदी साहित्य पर पेपर प्रकाशित करें। ओर्सिनी का ‘प्रतिष्ठित विद्वान’ होना उन्हें वीजा नियम तोड़ने, गलत तरीके से प्रवेश करने और फिर पीड़ित बनने का अधिकार नहीं देता।

भावनाओं से ज्यादा मायने रखते हैं तथ्य

फ्रांसिस्का ओर्सिनी को CAA की आलोचना या हिंदू ग्रंथों पर उनके अकादमिक विचारों के कारण नहीं डिपोर्ट किया गया। उन्हें इसलिए डिपोर्ट किया गया क्योंकि उन्होंने कथित तौर पर वीजा नियम तोड़े, बस इतना ही। इसके बाद जो लिबरल गुस्सा दिखा, वह तथ्यों पर नहीं, बल्कि प्रशासनिक फैसलों को राजनीतिक रंग देने की जिद पर आधारित था। अंत में यह भारतीय सरकार नहीं, बल्कि इसके आलोचक हैं, जो कानूनी प्रक्रिया को एक वैचारिक तमाशा बनाकर कमजोर कर रहे हैं।

असल सवाल यह नहीं कि ओर्सिनी को क्यों डिपोर्ट किया गया। सवाल यह है कि उनके समर्थक क्यों सोचते हैं कि उन्हें बाकी सभी की तरह कानूनी मानकों पर नहीं परखा जाना चाहिए।

मूल रूप से ये रिपोर्ट अनुराग ने अंग्रेजी में लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

भावनगर में समीर-रियाज-असलम ने दिवाली पर पटाखे फोड़ने पर 2 हिंदू भाइयों पर किया जानलेवा हमला, चाकू और तलवार से बनाया निशाना: गुजरात पुलिस ने दो को दबोचा

गुजरात के भावनगर में दिवाली के दिन दो हिंदू भाइयों पर मुस्लिम युवकों द्वारा जानलेवा हमला किए जाने का मामला सामने आया है। बोरतलाव पुलिस स्टेशन में समीर, रियाज और असलम के खिलाफ मामला दर्ज कर आगे की कार्रवाई शुरू कर दी गई है। पुलिस ने इस मामले में दो लोगों को गिरफ्तार भी किया है।

ऑपइंडिया के पास मौजूद इस मामले की FIR कॉपी के मुताबिक, यह पूरी घटना कुंभारवाड़ा इलाके में मढिया रोड मोहम्मदी मस्जिद के पास माफनगर में हुई। शिकायत के अनुसार, शिकायतकर्ता को 19 अक्टूबर को उसके एक दोस्त ने बताया कि दो-तीन मुस्लिम युवक गली के नुक्कड़ पर उसके छोटे भाई को पटाखे फोड़ने को लेकर गालियाँ दे रहे हैं। इसके बाद जब शिकायतकर्ता वहाँ पहुँचा, तो आरोपियों ने उसके साथ भी मारपीट शुरू कर दी।

शिकायत में आगे कहा गया है कि आरोपित रियाज पठान, समीर हुसैन सैयद और असलम पठान हाथों में पाइप, तलवार और पाइप लिए खड़े थे। आरोप है कि असलम पठान ने शिकायतकर्ता को गालियाँ देनी शुरू कर दीं जिसके बाद जब शिकायतकर्ता ने उन्हें गालियाँ देने से मना किया, तो रियाज पठान नाम के आरोपित ने उनके सिर पर पाइप से वार किया। शिकायत में आगे कहा गया है कि समीर और असलम नाम के आरोपियों ने भी उन्हें पाइप से पीटना शुरू कर दिया।

इसके बाद, शिकायतकर्ता चिल्लाया और उसका भाई उसे बचाने दौड़ा लेकिन आरोपितों ने उसे भी पीटना शुरू कर दिया। आरोप है कि समीर नाम का एक और आरोपित हाथ में तलवार लेकर वहाँ पहुँचा और उसने शिकायतकर्ता के भाई के सिर पर तलवार मार दी। इसके बाद विवाद बढ़ने पर शिकायतकर्ता के दोस्त मौके पर पहुँच गए और दोनों शिकायतकर्ताओं को बचा लिया गया। शिकायतकर्ता और उसके भाई का अभी अस्पताल में इलाज चल रहा है।

मुस्लिम आरोपित ने पटाखे फोड़ने पर जताई थी आपत्ति- FIR

FIR में पूरी घटना का कारण भी बताया गया है। शिकायत में कहा गया है कि रात करीब 11:15 बजे शिकायतकर्ता का छोटा भाई पटाखे फोड़ रहा था। जिसके बाद आरोपित समीर ने पटाखे फोड़ने से मना कर दिया और दोनों के बीच बहस हो गई। इसके बाद शिकायतकर्ता समीर को समझाने पहुँचा और इस दौरान आरोपित ने मारपीट भी की। फिलहाल पुलिस ने इस मामले में FIR दर्ज कर ली है और आगे की कार्रवाई कर रही है।

पुलिस ने हमले में शामिल ‘कॉन्ग्रेस नेता’ के खिलाफ मामला दर्ज नहीं किया: शिकायतकर्ता का दावा

ऑपइंडिया से बातचीत में शिकायतकर्ता ने पूरी घटना का ब्यौरा दिया है। शिकायतकर्ता ने बार-बार दावा किया कि यह घटना दिवाली के त्योहार पर पटाखे फोड़ने की अनुमति न देने के मुद्दे पर हुई। उसने यह भी कहा कि शुरुआत में मोहम्मदी मस्जिद के आसपास 10-15 लोग थे और फिर 40-45 मुस्लिम लोग हथियारों के साथ इकट्ठा हो गए और उसे पीटना शुरू कर दिया।

शिकायतकर्ता ने पुलिस पर पक्षपात का आरोप लगाया है और दावा किया है कि जिन आरोपियों के नाम उसने पुलिस शिकायत और बयान में बताए हैं, उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई है। दावा किया गया है कि सभी मुख्य आरोपियों ने ही हमला किया था लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की है। शिकायतकर्ता ने यह भी कहा है कि हमले में शामिल खतीजा खातून नाम की एक महिला स्थानीय कॉन्ग्रेस नेता है और उस इलाके में कॉन्ग्रेस के कार्यक्रम का प्रबंधन करती है।

हालाँकि, बोरतलाव पुलिस स्टेशन के PI डाभी ने ऑपइंडिया से बातचीत में इन सभी आरोपों का खंडन किया और स्पष्ट किया कि एफआईआर दर्ज करते समय शिकायतकर्ता के हस्ताक्षर लिए गए थे और उस दौरान शिकायतकर्ता ने इन नामों का जिक्र नहीं किया था। पुलिस ने यह भी कहा है कि अगर शिकायतकर्ता आरोपियों के नाम बताती है तो पुलिस को कार्रवाई करने में कोई आपत्ति नहीं है।

गौरतलब है कि पुलिस ने इस मामले में दो अलग-अलग शिकायतें दर्ज की हैं। पहली FIR शिकायतकर्ता द्वारा मुस्लिम व्यक्तियों के खिलाफ दर्ज कराई गई थी, जिसमें कहा गया है कि दिवाली के त्योहार पर पटाखे न फोड़ने देने को लेकर मुस्लिमों से झगड़ा हुआ। इसके अलावा, दूसरी शिकायत मुस्लिम युवकों द्वारा घटना के शिकायतकर्ताओं के खिलाफ दर्ज की गई है, जिसमें कहा गया है कि शिकायतकर्ताओं द्वारा पटाखे फोड़ने और गाली-गलौज को लेकर बहस हुई थी।

पुलिस ने रियाज पठान, असलम पठान, समीर हुसैन सैयद और समीर के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 117(2), 118(1), 115(2), 352, 54 और गुजरात पुलिस अधिनियम की धारा 135 के तहत मामला दर्ज किया है। पुलिस ने बताया है कि इस मामले में असलम पठान और समीर सैयद नाम के दो आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है और इस मामले में कार्रवाई अभी भी जारी है।

‘मोदी के भारत में सबके लिए जगह नहीं’: जोहरान ममदानी ने फिर से हिंदुओं के खिलाफ उगली आग, कुछ दिन पहले दिखा था ‘आतंकी मौलाना’ के साथ

न्यूयॉर्क सिटी मेयर पद के उम्मीदवार और हिंदू विरोधी विचारधारा रखने वाले जोहरान ममदानी एक बार फिर चर्चा में हैं। ममदानी अब वह चुनाव जीतने के लिए भारतीय-अमेरिकी वोटरों को लुभाने के लिए दाँव खेल रहे हैं। दिवाली के मौके पर ममदानी ने हिंदू समुदाय से मुलाकात की और पहले दिए अपने विवादित बयानों पर सफाई दी। एक दिन पहले ही वह एक विवादित मौलवी के साथ भी ममदानी ने तस्वीर डाली थी, जिस पर आतंकी गतिविधियों से जुड़े होने का आरोप था। ममदानी आखिर कैसे नेता हैं और अपने हिंदू विरोधी बयानों के बावजूद वह चुनाव जीतने के लिए क्या-क्या तरीके अपना रहे हैं, आइए जानते हैं।

चुनावी जीत के लिए ममदानी के हथकंडे

ममदानी को लगता है कि हिंदू-अमेरिकी वोट निर्णायक हो सकता है, इसलिए वह मंदिर-मंदिर जाकर अपने बयानों पर सफाई दे रहे हैं। ममदानी ने एक बार फिर पीएम मोदी पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी और उनकी पार्टी बीजेपी का यह नजरिया है कि देश में ‘केवल कुछ खास तरह के भारतीयों के लिए ही जगह है।’

ममदानी ने खुद को ‘बहुलवादी’ बताया। उन्होंने कहा कि वह ऐसे भारत में बड़े हुए हैं जहाँ सभी धर्मों के लोग साथ रहते थे। वह अपने पुराने हिंदू विरोधी बयानों को बहुलवाद के पक्ष में उठाया गया कदम बता रहे हैं। ममदानी ने यह भी कहा कि भले ही बहुत से लोग पीएम मोदी को लेकर उनसे असहमत हों, फिर भी मेयर बनने के बाद वह सभी का समान रूप से प्रतिनिधित्व करेंगे। यह बयान भारतीय-अमेरिकी वोटरों को शांत करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है, जो हिंदू विरोधी बयानबाजी करने पर ममदानी पर भड़के थे।

ममदानी हाल ही में इमाम सिराज वहाज से मिले थे। वहाज पर 1993 के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर बम धमाके के साजिशकर्ताओं से जुड़े होने का आरोप है। इस मुलाकात के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और कई नेताओं ने ममदानी की कड़ी आलोचना की थी।

पुराने विवाद, जो बताते हैं उनकी सोच

मेयर चुनाव से पहले ममदानी का एक पुराना वीडियो सामने आया था, जिसमें उन्होंने 2002 के गुजरात दंगों को लेकर पीएम मोदी पर निशाना साधा था और उन्हें ‘युद्ध अपराधी’ बताया था। एक और पुराने वीडियो में ममदानी ने आरोप लगाया था कि गुजरात से मुस्लिमों को ‘मिटा’ दिया गया, और ‘अब लोगों को लगता ही नहीं कि हम मौजूद हैं।’ ममदानी ने एक कार्यक्रम में पीएम मोदी की तुलना इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से करते हुए दोनों को ‘युद्ध अपराधी’ कहा था।

इसके अलावा, ममदानी ने अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन को ‘मस्जिद के विध्वंस का उत्सव’ और ‘उत्पीड़न का हथियार’ बताया था। यह बयान करोड़ों हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाला था।

सच नहीं बोल पा रहे ममदानी

जोहरान ममदानी के भारत पर दिए गए बयान सिर्फ झूठ नहीं हैं, बल्कि उनकी रणनीति का हिस्सा हैं। उनका दावा है कि गुजरात के मुसलमान ‘गुजरात छोड़ चुके हैं,’ जबकि वहाँ आज भी 50 लाख से ज्यादा मुस्लिम है। ममदानी ऐसा क्यों कहते हैं? यही कारण है कि वह मोदी विरोधी कट्टरपंथियों को खुश करने के लिए झूठ फैलाते हैं, फूट डालने का खेल खेलते हैं और अपने कट्टरपंथ को साफ करने की कोशिश करते हैं।

ममदानी का खेल सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। वे BDS (बॉयकॉट, डिवेस्टमेंट, और सैंक्शन्स) की आलोचना करने से बचते हैं, आतंकी समूहों की तारीफ करते हैं और ‘इंतिफ़ादा’ को ग्लोबलाइज करने की बात करते हैं, जो न्यू यॉर्क में यहूदी समुदाय के लिए खतरनाक हो सकता है।

ममदानी का विजन खासतौर पर भारत में अफरा-तफरी फैलाना और विदेशों में तोड़फोड़ करने का है। इस सच को झुठलाया नहीं जा सकता कि मोदी एक राष्ट्र का नेतृत्व कर रहे हैं और बेहतरीन लीडर के रूप में साबित हो रहे है, लेकिन ममदानी सच बोलने की बजाय बस भ्रम और विवाद फैलाने में व्यस्त हैं।

डाटा ने लिबरल प्रोपेगेंडा को फिर किया धुआँ-धुआँ, बताया- दिवाली से नहीं प्रदूषित हुई दिल्ली की हवा: हर साल की तरह इस बार भी पराली जलाने से AQI बिगड़ा

दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) सालों से दिवाली के दौरान ‘बेहद खराब’ और ‘गंभीर’ श्रेणियों के बीच रहा, चाहे पटाखों पर पूरी तरह प्रतिबंध हो, सीमित अनुमति हो या इस साल की तरह ‘ग्रीन पटाखों’ की इजाजत हो।

लिबरल्स और प्रोपेगेंडा फैलाने वालों के लिए दिवाली ‘मजाक का पर्व’ बन गया है। हर साल वे हिंदुओं पर पटाखे जलाने का दोष लगाते हैं, कहते हैं कि इससे हवा की गुणवत्ता खराब होती है।

फूड शो से मशहूर हुए रॉकी सिंह नाम के यूजर ने लिखा, “दिल्ली में कल हवा का प्रदूषण खतरनाक स्तर पर था।”

फोटोग्राफर अतुल कासबेकर ने लिखा, “धर्म के नाम पर उत्तर भारत के लोग अपनी सेहत को जानबूझकर नष्ट कर रहे हैं।”

एक्स यूजर द प्रोटागोनिस्ट ने लिखा, “तुम सब बेवकूफों ने जिंदगी दूभर कर दी। जानकारी के लिए बता दूँ, भारत में दमा से होने वाली वैश्विक मौतों का लगभग 46% हिस्सा है और हर साल भारत में करीब 2 लाख लोग दमा से मरते हैं।” इसके साथ ही उसने अस्थमा इनहेलर की एक तस्वीर भी शेयर की।

एक्स यूजर जतिन गुप्ता ने लिखा, “दिल्ली मूर्खों और बेवकूफों से भरा शहर है। हवा अब साँस लेने लायक नहीं रही क्योंकि कुछ नासमझ लोग सोचते हैं कि पटाखे जलाना=दिवाली। बस बेवकूफी। साफ-साफ बेवकूफी।”

पटाखों पर प्रतिबंध के बावजूद AQI में कोई बदलाव नहीं: दिल्ली AQI डेटा

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के 21 अक्टूबर के बुलेटिन के अनुसार, दिल्ली का AQI 351 था, जबकि 20 अक्टूबर को यह 345 था। ऑपइंडिया ने 2021 से लेकर दिवाली के एक दिन पहले और अगले दिन के डेटा की जाँच की।

साल 2024 में दिवाली 31 अक्टूबर को मनाई गई। उस दिन AQI 328 था और अगले दिन यानी 1 नवंबर को AQI 339 था, जैसा कि CPCB के डेटा में है।

साल 2023 में दिवाली 12 नवंबर को मनाई गई। उस दिन AQI 218 था और अगले दिन यानी 13 नवंबर को AQI 358 था।

साल 2022 में दिवाली 24 अक्टूबर को मनाई गई। उस दिन AQI 312 था और अगले दिन यानी 25 अक्टूबर को AQI 302 था।

साल 2021 में दिवाली 4 नवंबर को मनाई गई। उस दिन AQI 382 था और अगले दिन यानी 5 नवंबर को AQI 462 था।

प्रतिबंधों में बदलाव के बावजूद डेटा में कोई खास सुधार नहीं दिखता, जो बताता है कि दिल्ली की जहरीली हवा के लिए दिवाली उत्सव से ज्यादा अन्य कारक जिम्मेदार हैं।

भाजपा ने AAP शासित पंजाब पर हवा खराब करने का आरोप लगाया

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 21 अक्टूबर 2025 को आम आदमी पार्टी (AAP) की पंजाब सरकार पर आरोप लगाया कि उसने पराली जलाने की अनियंत्रित घटनाओं से दिल्ली के प्रदूषण को और बढ़ाया। भाजपा के आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने एक्स पर पोस्ट किया कि पंजाब के किसान दिवाली के दौरान अपनी पराली जलाते हैं ताकि इसे पटाखों का धुआँ समझा जाए और पुलिस कार्रवाई से बचा जाए।

मालवीय ने लिखा, “दिल्ली-एनसीआर की खराब हवा की गुणवत्ता के लिए दीपावली को दोष मत दो।” उन्होंने कहा कि AAP पराली जलाने को प्रोत्साहन देकर हिंदू पर्व को बदनाम कर रही है।

पराली जलाने के बारे में डेटा क्या कहता है?

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के CREAMS डेटा के अनुसार, पिछले कुछ दिनों में पराली जलाने की घटनाएँ काफी बढ़ी हैं। 21 अक्टूबर को 268 पराली जलाने की घटनाएँ दर्ज की गईं, जिनमें से 62 पंजाब से और 103 उत्तर प्रदेश से थीं।

इसी तरह 20 अक्टूबर को 217 घटनाएँ थीं, जिनमें 45 पंजाब से और 77 उत्तर प्रदेश से थीं। 19 अक्टूबर को पंजाब में 67 और उत्तर प्रदेश में 12 घटनाएँ थीं। साफ है कि पराली जलाने की घटनाएँ बढ़ी हैं और पंजाब के अलावा उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों के किसानों ने भी हवा के प्रदूषण में बड़ा योगदान दिया है।

खास बात यह है कि पराली जलाने का पीक सीजन अभी शुरू हुआ है और अगर राज्य नियमों को लागू करने में नाकाम रहे तो आने वाले दिनों में स्थिति और खराब होगी।

हालाँकि इस साल पंजाब में उत्तर प्रदेश की तुलना में पराली जलाने की घटनाएँ कम हैं, लेकिन पिछले साल के डेटा से पता चलता है कि पंजाब इस मामले में शीर्ष राज्य था। इसके अलावा ‘पराली जलाने का सीजन’ अभी शुरू हुआ है और आने वाले दिनों में पंजाब उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों को पीछे छोड़ सकता है।

‘ग्रीन दिवाली’ का मिथक और AQI स्तरों में कोई बदलाव नहीं

सालों से डेटा साफ तस्वीर पेश करता है। जब कोर्ट ने पटाखों पर पाबंदी लगाई और दिल्ली ने ‘ग्रीन दिवाली’ को बढ़ावा दिया, तब भी प्रदूषण के स्तर में कोई खास बदलाव नहीं आया। AQI के आँकड़ों में बहुत कम अंतर दिखता है।

विशेषज्ञों ने बताया कि दिवाली का समय पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने के पीक सीजन के साथ मेल खाता है। फसल के अवशेषों की आग अक्टूबर और नवंबर में कम हवा की गति और तापमान उलटने की स्थिति के साथ मिलकर, प्रदूषकों को वातावरण में फंसाती है, जिससे दिल्ली की हवा और खराब होती है। दिवाली से पहले भी AQI ‘खराब’ श्रेणी में रहता है, जो दिखाता है कि शहर का प्रदूषण संकट सिर्फ पटाखों की वजह से नहीं है।

सोशल मीडिया पर सैकड़ों नहीं बल्कि हजारों संदेश हिंदुओं और दिवाली को खराब हवा की गुणवत्ता के लिए दोषी ठहराते हैं। लेकिन डेटा एक अलग कहानी कहता है। हिंदू पर्व को प्रदूषण के लिए दोष देने के बजाय राष्ट्रीय राजधानी में बढ़ते वायु प्रदूषण और हवा की गुणवत्ता गिरने के असली कारण की जाँच जरूरी है। दिल्ली सरकार ने 24 से 26 अक्टूबर के बीच क्लाउड सीडिंग करके प्रदूषण कम करने की योजना बनाई है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या आर्टिफिशियल बारिश उत्तर भारत में बढ़ती पराली जलाने की घटनाओं के बीच प्रदूषण को कम करने में मदद करेगी।

मूल रूप से ये रिपोर्ट अनुराग ने अंग्रेजी में लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

क्या है हलाल? जानिए किसे माना गया इस्लाम में ‘हराम’: CM योगी ने कहा- धर्मांतरण-लव जिहाद-आतंकवाद के लिए होती है फंडिंग, कैसे मिलता है हलाल-सर्टिफिकेशन?

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक बार फिर हलाल सर्टिफिकेशन को लेकर सरकार का रुख साफ किया। सीएम योगी ने कहा कि हलाल सर्टिफिकेशन पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। उन्होंने कहा, “सामान खरीदते समय हलाल सर्टिफिकेट जरूर चेक करें। इसके नाम पर साजिश चल रही है। हलाल के नाम पर आतंकवाद के लिए पैसे जुटाए जाते हैं। इसका इस्तेमाल धर्मांतरण और लव जिहाद के लिए होता है।”

सीएम योगी ने ये बात गोरखपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी समारोह के तहत विचार-परिवार कुटुम्ब स्नेह मिलन कार्यक्रम में कही। उन्होंने कहा, “आपको आश्चर्य होगा कि साबुन और कपड़ों का भी हलाल। दियासलाई का भी हलाल। मैं भौचक था।मैंने कहा कि ये तो कडयंत्र है। मैंने कहा कि माचिस तो झटका वाला है, आप एक झटके में लगाएँगे, तभी जलेगा। आप हलाल करते रहेंगे तो कभी नहीं जलेगी माचिस।”

सीएम योगी ने कहा, “जब हमने कार्रवाई की तो देखा कि ₹25 हजार करोड़ देश के अंदर हलाल सर्टिफिकेशन से होता है। और भारत सरकार या राज्य सरकार की किसी भी एजेंसी ने उसे मान्यता नहीं दी है। ये सारा का सारा पैसा आतंकवाद के लिए, लव जिहाद के लिए, धर्मांतरण के लिए दुरुपयोग होता है। इसीलिए यूपी सरकार ने इसके खिलाफ बड़ी कार्रवाई की है। हलाल सर्टिफिकेशन के नाम पर एक फूटी-कौड़ी भी नहीं देना चाहिए।”

हलाल क्या होता है?

हलाल या झटका मीट किसी जानवर के माँस को नहीं बल्कि काटने के तरीके को कहा जाता है। हलाल सिर्फ एक अरबी शब्द है जिसका मतलब मुस्लिमों के लिए जायज होता है। यानी जायज ढंग से काटा गया जानवर ही वो लोग खा सकते हैं।

क्या है हलाल सर्टिफिकेशन?

जब किसी खाने या प्रोडक्ट को हलाल सर्टिफिकेट मिलता है तो इसका मतलब है कि उसे बनाने में कोई ऐसी चीज इस्तेमाल नहीं हुई जो इस्लाम में हराम (मना) है। अगर बात मांस की हो तो हलाल सर्टिफिकेशन तब मिलता है जब जानवर को इस्लामी तरीके से जबह किया गया हो।

भारत में जमीयत उलमा-ए-हिंद हलाल ट्रस्ट नाम की संस्था है, जो ये सर्टिफिकेशन देती है। ये लोग जाँचते हैं कि कोई प्रोडक्ट इस्लामिक नियमों के हिसाब से बना है या नहीं। जाँच में प्रोडक्ट के हर हिस्से को देखा जाता है, उसमें क्या-क्या चीजें डाली गई, उसे बनाने का तरीका क्या था, पैकिंग का तरीका आदि।

कैसे होता है जानवर हलाल

जानवर को हलाल करने का एक खास तरीका होता है। इस प्रक्रिया में छुरी से जानवर की गर्दन की नस और सांस लेने वाली नली को काटा जाता है। इस वक्त एक दुआ भी पढ़ी जाती है। गर्दन पर छुरी चलाने के बाद जानवर का पूरा खून निकलने का इंतजार किया जाता है। हलाल करने के दौरान जानवर की गर्दन को फौरन अलग नहीं किया जाता बल्कि जब जानवर मर जाता है तो उसके हिस्से किए जाते हैं। इस्लाम में इसे ‘ज़िबाह’ करना भी कहते हैं।

हलाल कानून के नियम

हलाल मीट का अर्थ केवल जानवर को उस ढंग से काटना नहीं होता बल्कि उस माँस की पैकेजिंग के भी नियम होते हैं। जैसे एक नियम होता है कि केवल एक मुस्लिम व्यक्ति ही जानवर को मार सकता है। जानवर हलाल करते हुए तेज चाकू की मदद से गर्दन की नस इस तरह काटी जाती है कि जानवर का सिर धड़ से अलग न हो। जानवर मारने के बाद उसकी नसों से अधिक से अधिक खून निकलने दिया जाता है।

इसके अलावा इस्लाम में मीट खाने का यह भी नियम है कि मुस्लिम ऐसा जानवर नहीं खा सकते हैं जो कि हलाल प्रक्रिया के अनुसार न मारा गया हो।

कौन-सी वस्तुएँ इस्लाम में ‘हराम’?

इस्लाम में कई चीजों को ‘हराम’ माना गया है, जिन्हें हलाम प्रमाण-पत्र नहीं दिया जाता है। उनमें शामिल हैं:

  • सूअर, जंगली सूअर, कुत्ते और इनकी नस्लों वाले सभी जानवर
  • पंजे और दाँतों से शिकार करने वाले जानवर जैसे शेर, बाघ, भालू, साँप, बंदर आदि
  • शिकारी पक्षी जैसे चील, गिद्ध और इसी तरह के दूसरे पक्षी
  • हानिकारक या गंदे जीव-जंतु जैसे चूहे, बिच्छू, सेंटीपीड आदि
  • वो जानवर जिन्हें इस्लाम में मारना मना है, जैसे चींटी, मधुमक्खी और कठफोड़वा (लकड़हारा पक्षी) भी हराम हैं
  • गंदे या घृणित कीड़े-मकोड़े जैसे जुएँ, मक्खियाँ, कीड़े और मैगॉट्स (सड़ने वाले कीड़े)
  • जो जीव जमीन और पानी दोनों में रहते हैं (उभयचर) जैसे मेंढक, मगरमच्छ आदि
  • घोड़े-खच्चर और घरेलू गधे
  • सभी जहरीले और खतरनाक समुद्री जीव
  • वो जानवर जो इस्लामी तरीके से ज़बह नहीं किए गए, उनका मांस हराम है
  • जो जानवर गला घोंटने, चोट लगने, गिरने, प्राकृतिक मौत या किसी जानवर के हमले से मरे हों
  • खून का सेवन
  • इंसान के शरीर का कोई हिस्सा या उससे बने पदार्थ (जैसे प्लेसेंटा)
  • इंसान या जानवर के शरीर से निकली चीजें जैसे पेशाब, मल, उल्टी, मवाद (पस) आदि
  • नशे वाले या जहरीले पौधे, जब तक उनका जहर या हानिकारक असर पूरी तरह हटाया न जाए
  • शराब और सभी तरह के मादक पेय जैसे वाइन, एथिल अल्कोहल, स्पिरिट आदि
  • सभी नशे वाले और खतरनाक पेय पदार्थ
  • हराम चीजों से बने फूड एडिटिव्स (खाद्य पदार्थों में मिलाए जाने वाले तत्व)
  • नशे वाले या हानिकारक रसायन और प्राकृतिक खनिज

यूपी में हलाल उत्पादों पर बैन क्यों?

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने साल 2023 में हलाल-सर्टिफाइड उत्पादों पर बैन लगा दिया था। यूपी सरकार ने तय किया था कि राज्य की सीमा के भीतर हलाल उत्पादों के उत्पादन, वितरण, भण्डारण पर संपूर्ण बैन लागू हो। ये बैन 18 नवंबर 2023 से लागू है।

हलाल-सर्टिफाइड उत्पादों को बैन करने के पीछे यूपी सरकार की मंशा उपभोक्ताओं के बीच फैला भ्रम था। सरकार का कहना था कि हलाल-सर्टिफिकेशन एक अलग पंथी-प्रणाली बन गई है, जिसमें खाद्य पदार्थों के लिए पहले से मौजूद मानक और प्रक्रिया FSSAI के अलावा दूसरी जाँच प्रमाणन हो रहा था, जिससे सामान्य उपभोक्ता को भ्रम हो रहा था।

सरकार ने यह भी कहा था कि कुछ संस्थाएँ बिना मान्यता के हलाल सर्टिफिकेशन जारी कर रही थीं। इनमें अधिकतर खाद्य, दवाइयाँ और कॉस्मेटिक्स के सामान शामिल थे। सरकार ने कहा कि यह व्यापार-मानदंज और सामाजित संतुलन के लिए समस्या पैदा कर रहा था।

जिनको खुश करने के लिए इमरान मसूद ने कहा था- ‘मोदी को बोटी-बोटी कर देंगे’, उन्होंने मुस्लिम MP की बेटी को भी नहीं बख्शा: दीवाली पोस्ट से टूट पड़े इस्लामी कट्टरपंथी

कॉन्ग्रेस सांसद इमरान मसूद तो आपको याद होंगे, वही मसूद जो आज से करीब 10 साल पहले तब प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या करने की धमकी देकर राष्ट्रीय सुर्खियों में आ गए थे। उनके जहरीले बयान ने तब उन्हें कट्टरपंथियों का ‘ब्लू आइड बॉय’ यानी दुलारा बना दिया था।

लेकिन अब कट्टरपंथी सहारनपुर से कॉन्ग्रेस सांसद मसूद और उसके परिवार से खफा हो गए हैं। यहाँ तक की उनकी बेटी को निशाना बनाने का मौका नहीं चूक रहे हैं। हुआ यूँ कि इमरान मसूद की बेटी हिबा मसूद ने दीपावली पर लोगों को बधाई देते हुए इंस्टाग्राम पर एक रील अपलोड की।

हिबा ने रील शेयर करते हुए लिखा, “मेरी तरफ से आपको दिवाली की हार्दिक शुभकामनाएँ। पापा को (वीडियो के लिए) मजबूर नहीं किया गया है।” इस रील में हिबा मसूद के साथ उनके पिता इमरान मसूद भी नजर आए। इस रील में हिबा इमरान से पूछती हैं कि वह कैसी लग रही हैं और इसके बाद वह लोगों को दीपावली की बधाई देती हैं।

इस वीडियो में सांसद इमरान मसूद भी दीपावली की बधाई देते नजर आते हैं। लेकिन यही बात अब कट्टरपंथियों को रास नहीं आ रही है। कट्टरपंथी इस बात को नहीं पचा पा रहे हैं कि कैसे इमरान या उनकी बेटी ‘काफिरों’ के त्योहार पर बधाई दे सकते हैं।

इस रील के कमेंट्स में कई लोगों ने जहाँ अच्छी बातें लिखीं तो कुछ कट्टरपंथियों को यहाँ भी जहर उगलने का मौका मिल गया। जिस इमरान को कट्टरपंथियों ने अपना पोस्टर ब्यॉय बनाना चाहा था, उनमें अब जिहादियों को अपना जानी दुश्मन नजर आ रहा है।

सरफराज ओवैसी नामक एक यूजर ने हिबा के वीडियो पर कमेंट करते हुए कहा, “अल्लाह इन सब को हिदायत दे।” यानी सरफराज को लगता है कि इमरान और उनका परिवार भटक गया है तो अल्लाह उनको सही रास्ते पर लाएँ।

हिबा के पोस्ट पर कमेंट

ऐसी टिप्पणी करने वाला सरफराज अकेला नहीं है, कट्टरपंथियों की एक पूरी फौज हिबा के विरोध में उतर आई है। शाह फहद इकबाल नामक एक यूजर के लिए तो यह पूरा समुदाय के खतरे की बात हो गई हैं। शाह फहद ने लिखा, “अल्लाह उम्मते की हिफाजत फरमाए” यानी जितने भी मुसलमान हैं, उनको कोई नुकसान ना हो।

हिबा के पोस्ट पर कमेंट

एक यूजर ने तो इमरान मसूद को असदुद्दीन ओवैसी से कम कट्टर समझते हुए उनसे अपनी नाराजगी जाहिर की। समीर बरकत नाम के इस यूजर ने लिखा, “इसलिए मुझे मेरे सदर बैरिस्टर असद ओवैसी पर नाज है।” यानी अगर कट्टरता कम हुई तो आप किसी भी तरह से इन कट्टरपंथियों के ‘हीरो’ नहीं रह सकते हैं।

हिबा के पोस्ट पर कमेंट

यूसुफ नाम के एक यूजर ने दावा कर दिया कि दीवाली की बधाई देना ही गलत है। उसने लिखा, “दूसरे धर्मों के त्योहारों पर बधाई देने पर इस्लाम में सख्त मनाही है।”

एक यूजर ने लिखा कि मसूद और उसकी परिवार केवल नाम के मुसलमान हैं। मुजफ्फर खान नामक इस यूजर ने लिखा, “तुम लोग सिर्फ नाम के मुसलमान हो, हरकतें सारी शैतानों वाली हैं। सहारनपुर की जनता ने बहुत गलत नेता चुन लिया है।”

हिबा के पोस्ट पर कमेंट

रजवी नाम के एक यूजर ने लिखा कि इन्ही सब कामों की वजह से मुस्लिम कौम आज बदनाम और बर्बाद है।

हिबा मसूद के पोस्ट पर ऐसे 2-4 कमेंट नहीं है बल्कि ऐसे कमेंट्स की भरमार है। कट्टरपंथियों की कमेंट्स से साफ है कि उनके लिए इमरान मसूद या उनका परिवार का कोई आदमी तभी तक उनका अपना है जब तक वो उनकी बात को आँख बंद कर मान रहा है।

इन कट्टरपंथियों के लिए इस्लाम का मायना बस एक है कि तुम हमारे झंडे के नीचे रहो, हमारे तौर-तरीके अपनाओ, हमारी हर सलाह को बिना सवाल माने स्वीकार करो तभी कोई उनके लिए सच्चा मुसलमान हो सकता है।

जो इस्लाम से हटा, जो शरीयत से जरा सा टस से मस हुआ बस वही इन कट्टरपंथियों की आँखों में खटकने लगता है। इस कट्टर विचारधारा में बस एक जैसी सोच और एक जैसे विचारों की ही जगह है। अगर कोई इनका ‘अपना’ भी इससे टस से मस होता है तो ये उस पर टूट पड़ते हैं जैसे इमरान मसूद के मामले में हुआ था।

सऊदी अरब में करोड़ों मजदूरों की ‘गुलामी की जंजीर’ टूटी, खत्म हुआ 50 साल पुराना कफाला सिस्टम: जानें कामगारों को क्या मिलेगा फायदा?

सऊदी अरब ने 50 साल से चले आ रहे कफाला सिस्टम को आधिकारिक तौर पर खत्म कर दिया है। अरबी में कफाला का मतलब ‘संरक्षण’ होता है। इस कानून ने खाड़ी देशों में काम करने वाले लाखों विदेशी मजदूरों की जिंदगी को पूरी तरह से कंट्रोल किया हुआ था। यह सिस्टम तय करता था कि मजदूर नौकरी बदल सकते हैं या नहीं, देश छोड़ सकते हैं या नहीं, और अपने साथ हो रहे बुरे बर्ताव के खिलाफ आवाज उठा सकते हैं या नहीं। आलोचक इस व्यवस्था को ‘आधुनिक गुलामी’ जैसा बताते थे। सऊदी अरब में करीब 1 करोड़ 30 लाख विदेशी मजदूर काम करते हैं, जिनके लिए यह ऐतिहासिक बदलाव है।

कफाला सिस्टम क्या था?

कफाला सिस्टम एक कानूनी ढाँचा था जो खाड़ी देशों में विदेशी मजदूरों की नौकरी और रहने के नियमों को तय करता था। इसकी शुरुआत 1950 के दशक में हुई थी। तेल से अमीर बने देशों को सस्ते मजदूरों की जरूरत थी, लेकिन वे उन्हें देश की नागरिकता या हमेशा रहने का हक नहीं देना चाहते थे। इस सिस्टम में विदेशी मजदूर का कानूनी दर्जा पूरी तरह से उसके मालिक या ‘कफील’ से जुड़ा होता था।

मालिक ही मजदूर का वीजा, देश में रहने का अधिकार, नौकरी बदलने का अधिकार और यहाँ तक कि देश छोड़ने का अधिकार भी कंट्रोल करता था। मालिक की मंजूरी के बिना मजदूर न तो नौकरी बदल सकता था, न देश छोड़ सकता था और न ही बुरे बर्ताव पर कानूनी मदद ले सकता था। इस सिस्टम से मालिक बहुत ताकतवर हो गए थे। वे मजदूरों के पासपोर्ट जब्त कर लेते थे, सैलरी रोक लेते थे और उन्हें देश से निकालने की धमकी देते थे। मजदूरों के पास इसका विरोध करने का कोई रास्ता नहीं था।

सऊदी अरब ने अब यह क्यों बदला?

कफाला को खत्म करने का फैसला क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के ‘विजन 2030’ का हिस्सा है। सऊदी अरब अपनी अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता से हटाकर आधुनिक बनाना चाहता है और विदेशी निवेश को आकर्षित करना चाहता है। मानवाधिकार समूहों के बढ़ते दबाव और अंतर्राष्ट्रीय आलोचना के कारण भी यह बदलाव जरूरी था। उदाहरण के लिए, कतर ने भी 2022 फीफा विश्व कप से पहले अपने कानून में कुछ बदलाव किए थे।

नए सिस्टम में क्या-क्या बदला?

कफाला को हटाकर अब अनुबंध-आधारित (Contract-Based) नौकरी का सिस्टम लाया गया है। मजदूर अब अपने मौजूदा मालिक की मंजूरी के बिना ही नई नौकरी कर सकते हैं। उन्हें अब देश छोड़ने के लिए मालिक के ‘एग्जिट वीजा’ या सहमति की जरूरत नहीं होगी। मजदूरों को अब लेबर कोर्ट और शिकायत दर्ज करने के बेहतर तरीके मिलेंगे। सरकार का कहना है कि इससे काम करने वालों का शोषण कम होगा और सऊदी अरब की छवि सुधरेगी।

जिंदगी में कितना बदलाव आएगा?

यह कानून में एक बड़ी सफलता है, लेकिन जानकारों का कहना है कि सिर्फ कानून बदलने से रातों-रात दुर्व्यवहार खत्म नहीं होगा। मानवाधिकार समूहों का कहना है कि कई मालिक अभी भी नौकरी बदलने या देश छोड़ने के लिए मजदूरों की सहमति माँगते हैं। घरेलू कामगारों जैसे सबसे कमजोर लोगों को नए नियमों का बराबर फायदा शायद न मिले।

कई देशों में भर्ती के दौरान होने वाले शोषण (जैसे ज़्यादा फीस लेना) को सऊदी कानून में अभी भी ठीक से नहीं निपटा गया है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि कानून बदलना तो पहला कदम है, लेकिन जमीन पर हकीकत बदलने में अभी बहुत समय लगेगा।

यह सिस्टम इतना विवादित क्यों था?

दशकों से कफाला दुनिया के सबसे ज़्यादा आलोचित श्रम कानूनों में से एक बन गया था। मानवाधिकार समूह और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) ने कहा कि यह सिस्टम जबरदस्ती काम कराने और मानव तस्करी को बढ़ावा देता है। मजदूर बिना इजाजत नौकरी छोड़ने पर गिरफ्तारी या देश से निकाले जाने का जोखिम उठाते थे। इसलिए, वे बुरे हालात में भी काम करते रहने को मजबूर थे।

यह समस्या खासकर घरेलू काम, निर्माण और खेती से जुड़े मजदूरों में ज़्यादा थी। सऊदी अरब में 1 करोड़ 34 लाख प्रवासी मजदूर हैं, जो वहाँ की आबादी का लगभग 42% हैं। इनमें लाखों लोग भारत, बांग्लादेश और फिलीपींस से हैं।

कभी बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज को टक्कर देती थी कोलकाता स्टॉक एक्सचेंज, ऐतिहासिक CSE ने 117 साल बाद समेटा काम: केतन पारेख घोटाला बना बर्बादी की वजह

कभी बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) से मुकाबला करने वाली 117 साल पुरानी कोलकाता स्टॉक एक्सचेंज (CSE) ने अपना काम समेट लिया है। कई सालों के कानूनी और नियामक अड़चनों के बाद CSE ने अपनी आखिरी काली पूजा और दिवाली का जश्न मनाया और सोमवार (20 अक्टूबर 2025) को स्थाई रूप से काम करना बंद कर दिया।

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने 2013 में CSE का ट्रेडिंग निलंबित कर दिया था क्योंकि यह नियामक मानकों का पालन नहीं कर पा रही थी। पिछले दस साल में ट्रेडिंग को पुनर्जीवित करने और SEBI के फैसले को चुनौती देने के प्रयासों के बावजूद एक्सचेंज ने पूरी तरह से बंद होने का निर्णय लिया।

पहले CSE ने SEBI के आदेशों को अदालत में चुनौती देने का इरादा रखा था, लेकिन अनुकूल फैसला पिछले साल तक संभव नहीं था। दिसंबर 2024 में CSE बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट और कोलकाता हाई कोर्ट में लंबित मामलों को वापस लेने का निर्णय लिया। इसके बाद उसने स्वयं से बाहर निकलने का अनुरोध किया।

CSE के चेयरमैन दीपंकर बोस ने कहा, “25 अप्रैल 2025 को आयोजित EGM (विशेष आम सभा) में शेयरधारकों से एक्सचेंज व्यवसाय से बाहर निकलने की मंजूरी प्राप्त की गई। इसके बाद CSE ने SEBI को बाहर निकलने के लिए आवेदन सौंपा, जिसने अब स्टॉक एक्सचेंज का मूल्यांकन करने के लिए एक वैल्यूएशन एजेंसी नियुक्त की है, जो फिलहाल प्रगति पर है।”

अगर SEBI CSE को बाहर निकलने की अनुमति दे देता है, तो CSE सिर्फ एक होल्डिंग कंपनी के रूप में ही बनी रहेगी। इसके तहत आने वाली सहायक कंपनी CSE कैपिटल मार्केट्स प्राइवेट लिमिटेड (CCMPL) अब भी NSE (नेशनल स्टॉक एक्सचेंज) और BSE (बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज) पर कारोबार करती रहेगी।

इसके अलावा, CSE की तीन एकड़ की EM बाईपास संपत्ति को सृजन ग्रुप को 253 करोड़ रुपए में बेचने की योजना को भी SEBI ने मंजूरी दे दी है। यह बिक्री तब पूरी होगी जब CSE का बाहर निकलना आधिकारिक रूप से पूरा हो जाएगा।

व्यापार के एक युग का अंत

CSE की स्थापना 1908 में हुई थी और यह कभी बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) की प्रतियोगी थी। यह कोलकाता के वित्तीय इतिहास और लाइयन्स रेंज के हब का भी प्रतीक माना जाता था।

CSE के लिए सबसे बड़ा झटका 2013 में आया, जब SEBI ने ट्रेडिंग रोकने का फैसला लिया। एक्सचेंज ने कई महत्वपूर्ण नियमों का उल्लंघन किया था, जिससे यह कदम उठाना पड़ा। इसके खिलाफ CSE ने कई बार अदालतों का रुख किया, लेकिन इसका नतीजा आर्थिक दबाव और ट्रेडिंग में गिरावट के रूप में सामने आया। यह गिरावट उस समय और भी ज्यादा महसूस हुई जब NSE और BSE पर ट्रेडिंग का बूम चल रहा था।

CSE के पतन के मुख्य कारणों में BSE और NSE का प्रभुत्व, प्रासंगिकता का कम होना और तकनीकी उन्नति के साथ तालमेल न बिठा पाना शामिल है। विशेष रूप से 2000 के दशक की शुरुआत में डॉट कॉम बूम के बाद, CSE तेजी से बदलती वित्तीय दुनिया में खुद को ढाल नहीं पाया और पीछे रह गया।

केतन पारेख घोटाले का खुलासा 2001 में CSE के लिए आखिरी बड़ा झटका साबित हुआ। पेशे से एक स्टॉक ब्रोकर पारेख ने कुछ स्टॉक्स जिन्हें K-10 स्टॉक्स कहा जाता था की कीमतें बढ़ाने के लिए एक्सचेंज की कमजोरियों का फायदा उठाया। इससे सख्त नियम लागू हुए और निवेशकों का विश्वास काफी घट गया। अंततः CSE का पतन इस कारण हुआ कि समय के साथ यह नियमों का पालन नहीं कर सका।

सीनियर स्टॉक ब्रोकरेर सिद्धार्थ थिरानी ने द टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया, “हम हर दिन ट्रेडिंग शुरू करने से पहले देवी लक्ष्मी की पूजा करते थे, यह परंपरा अप्रैल 2013 तक चली जब ट्रेडिंग को रेगुलेटर ने निलंबित कर दिया। इस दिवाली का मतलब हमारे उस वैभवपूर्ण समय को अलविदा कहना है।”

शेयरधारकों ने औपचारिक प्रस्ताव को 25 अप्रैल को मंजूरी दी, जिसे पहले 18 फरवरी को SEBI को भेजा गया था। SEBI ने इसे पूरा करने के लिए राजवंशी एंड एसोसिएट्स को नियुक्त किया है और यह प्रक्रिया बाहर निकलने की अंतिम मंजूरी से पहले की आखिरी स्टेज है।

CSE में 1,749 सूचीबद्ध कंपनियाँ और 650 पंजीकृत सदस्य थे। चेयरमैन दीपंकर बोस ने FY25 रिपोर्ट में कहा कि एक्सचेंज ने भारत के पूँजी बाजारों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 2024-2025 के दौरान उन्हें डायरेक्टर की बैठक फीस के रूप में 5.9 लाख रुपए मिले।

बाहर निकलने से पहले एक्सचेंज ने सभी कर्मचारियों को एक वॉलंटरी रिटायरमेंट स्कीम (VRS) का लाभ दिया। इसके तहत कर्मचारियों को एक बार का भुगतान 20.95 करोड़ रुपए और सालाना लगभग 10 करोड़ रुपए की बचत सुनिश्चित की गई। कुछ कर्मचारियों को केवल अनुपालन कार्यों के लिए अनुबंध पर रखा गया, लेकिन सभी ने इस ऑफर को स्वीकार कर लिया।

CSE के बाहर निकलने के साथ ही भारत के क्षेत्रीय स्टॉक एक्सचेंजों का एक युग खत्म हो रहा है। पहले ये एक्सचेंज बहुत सक्रिय थे, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म्स के आने के बाद बाजार का केंद्र मुंबई चला गया।

CSE जैसी संस्थाएँ आज भी वित्तीय इतिहास की पहचान हैं, जो भारत के पूँजी बाजारों के विकास, तकनीकी आधुनिकीकरण और नियमों के सुदृढ़ीकरण का प्रतीक हैं। FY25 वार्षिक रिपोर्ट में चेयरमैन बोस ने कहा, “CSE ने भारत के पूँजी बाजारों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।”

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में रुक्मा राठौर ने लिखी है। इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है।)

पंजाब के जिस पूर्व DGP मुस्तफा मोहम्मद पर बेटे की हत्या का आरोप, उसकी बीवी रजिया कॉन्ग्रेस सरकार में रही मंत्री: नवजोत सिंह सिद्धू का करीबी, हिंदुओं के खिलाफ उगल चुका है आग

पंजाब के पूर्व DGP मोहम्मद मुस्तफा और उनकी बीवी पंजाब की पूर्व मंत्री रजिया सुल्ताना अपने ही 35 साल के बेटे अकील अख्तर की हत्या के आरोप में फँस चुके हैं। दोनों मियाँ-बीवी पर हरियाणा के पंचकूला में FIR दर्ज हो गई है। हत्या में बहू और बेटी को भी आरोपित बनाया गया है। यह भी सामने आया कि पूर्व DGP के बहू के साथ अफेयर की बात भी सामने आई है।

दरअसल, 16 अक्टूबर 2025 को हरियाणा के पंचकूला के सेक्टर-4 इलाके में अखील अख्तर को बेहोशी की हालत में पाया गया था। अकील को अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टर ने उसे मृत घोषित कर दिया। शुरुआत में परिवार ने दावा किया यह ड्रग ओवरडोज का मामला है।

लेकिन अब सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें मृतक अकील अख्तर ने अपने अम्मी-अब्बा और बहन के खिलाफ बयान दिया है। यह वीडियो 27 अगस्त 2025 का बताया गया है। इस वीडियो में अकील कहता है कि उसके अब्बा मोहम्मद मुस्तफा का उसकी पत्नी के साथ अफेयर है। इसीलिए परिवार के लोग उसकी हत्या की साजिश रच रहे हैं। इसमें उसकी अम्मी रजिया सुल्ताना और बहन निशात अख्तर भी शामिल हैं।

इस वीडियो के आधार पर अकील के पहचान वाले शमशुद्दीन ने पंचकूला पुलिस से शिकायत दर्ज कराई है। पुलिस ने शिकायत पर आरोपितों पर BNS की धारा 103(1) और 61 के तहत FIR दर्ज की है। पंचकूला की DCP ने बताया कि ACP रैंक के अधिकारी की अगुआई वाली SIT गठित कर जाँच शुरू कर दी है।

कौन है मोहम्मद मुस्तफा?

मोहम्मद मुस्तफा मूलरूप से उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के निवासी हैं। मुस्तफा पंजाब कैडर के 1985 बैच के IPS अधिकारी हैं। वह साल 2021 में पंजाब पुलिस सेरिटायर हो गए। सेवानिवृत्ति के बाद मुस्तफा ने राजनीति में आने का फैसला किया और वे कॉन्ग्रेस से जुड़े। वह पूर्व क्रिकेटर और कॉन्ग्रेस नेता नवजोत सिंद सिद्धू के करीबियों में गिने जाते हैं।

पंजाब के पूर्व सीएम कैप्टन अमरेंद्र सिंह से तनातनी

पूर्व DGP मुस्तफा मोहम्मद के पंजाब के पूर्व सीएम कैप्टन अमरिंद्रर सिंह से रिश्ते खराब रहे। यही वजह है कि मुस्तफा ने साल 2021 में पंजाब में चरणजीत सिंह चन्नी के नेतृत्व में पंजाब कॉन्ग्रेस की सरकार के दौरान पार्टी ज्वाइन की।

अमरिदंर सिंह की सरकार के दौरान पूर्व DGP ने कई बार उनका विरोध किया, जिसका उन्हें खामियाजा भुगतना पड़ा। साल 2019 में जब पंजाब में नए DGP का नामांकन किया गया तो मुस्तफा को उस प्रक्रिया में शामिल नहीं किया गया और उसको लेकर विवाद भी हुआ था। मुस्तफा ने सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही और अपनी ‘मान-बहाली’ की माँग की थी। बाद में कैप्टन अमरिंदर सरकार ने उन्हें DGP के पद से हटाकर दिनकर गुप्ता को तैनात किया।

मुस्तफा की हिंदू समुदाय के विरोध में टिप्पणी

पंजाब विधानसभा चुनाव 2022 के दौरान मुस्तफा और उनकी बीवी कॉन्ग्रेस उम्मीदवार रजिया सुल्ताना पर सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने के आरोप में FIR भी दर्ज हुई थी। चुनाव के दौरान भाषण में मुस्तफा ने हिंदू समुदाय के खिलाफ टिप्पणी की थी और आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं को मारने की धमकी दी थी।

मुस्तफा ने कहा था, “मैं किसी भी जुलूस को नहीं होने दूँगा… मैँ कौमी फौजी हूँ, RSS का एजेंट नहीं।” इस बयान का वीडियो काफी वायरल हुआ था। मुस्तफा ने यह भी दावा किया था कि उनके इस बयान में हिंदू-मुस्लिम का संदर्भ नहीं था बल्कि यह ‘फितने’ कर रहे AAP कार्यकर्ताओं के खिलाफ था।

मुस्तफा की बीवी पंजाब कॉन्ग्रेस सरकार में पूर्व कैबिनेट मंत्री

मुस्तफा की बीवी रजिया सुल्ताना भी पंजाब कॉन्ग्रेस सरकार में मंत्री रह चुकी है। रजिया साल 2002, 2007 और 2017 में मालेरकोटला सीट से विधायक रही हैं। साल 2012 में पंजाब विधानसभा चुनावों में रजिया हार गई थीं। लेकिन 2017 में उसी सीट पर अपने भाई AAP के मुहम्मद अरशद को हराकर दोबारा विधायक बनीं।

2017 से 2022 तक पंजाब सरकार में कैबिनेट मंत्री के रूप में भी काम किया है। इस दौरान वह महिला एवं बाल विकास, जल आपूर्ति आदि विभागों के साथ रहीं। 28 सितंबर 2021 को उन्होंने नवजोत सिंह सिद्धु से एकजुटता में कैबिनेट मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया।

बेटे अकील अख्तर का नया वीडियो

अकील अख्तर का अब एक और नया वीडियो सामने आया है, जिसमें वह कहता दिखाई दे रहा है कि उसने जो पुराना वीडियो बनाया था, उस समय उसकी दिमागी हालत ठीक नहीं थी। हालाँकि, उसने परिवार पर लगाए आरोपों को खारिज नहीं किया है।

केवल इतना कह रहा है कि वह मानसिक रूप से बीमार है और परिवार वाले उसके दवाई खिलाते रहते हैं।

तमिलनाडु-पश्चिम बंगाल को दिखाया ठेंगा, ‘शिक्षा में भगवा रंग घोलने’ का शोर मचाने के बाद केरल ने लिया U-Turn: PM SHRI योजना में शामिल हुई वामपंथी सरकार

कभी संसद की चौखट पर खड़े होकर ‘शिक्षा का भगवाकरण’ चिल्लाने वाली केरल सरकार ने आखिरकार अपनी जिद तोड़ दी है। रविवार को ये खबर फटाफट फैली थी और मंगलवार (21 अक्टूबर 2025) तक शिक्षा मंत्री वी. सिवनकुट्टी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसे पक्का कर दिया– राज्य प्रधानमंत्री उभरते भारत के लिए स्कूल (पीएम श्री) योजना के समझौते पर दस्तखत करेगा।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, डेढ़ हजार करोड़ रुपए से ज्यादा के केंद्रीय फंड्स अब केरल की ओर बहेंगे, जो टीचरों की बढ़ती बकाया तनख्वाहें चुकाने, स्टूडेंट्स को ग्रांट्स पहुँचाने और शिक्षा विभाग के चरमराते बजट को साँस देने के लिए बेहद जरूरी हो चुके हैं। लेकिन ये यू-टर्न केरल की राजनीति में भूचाल ला चुका है। सहयोगी दल सीपीआई के नेता कैबिनेट में चर्चा न होने का रोना रो रहे हैं, कॉन्ग्रेस वाले ‘सीपीएम-बीजेपी का सीक्रेट गठजोड़’ चिल्ला रहे हैं, जबकि एबीवीपी जैसे संगठन अपनी सड़क-प्रदर्शनों की जीत का बिगुल बजा रहे हैं। सोशल मीडिया पर तो बहस का सैलाब उमड़ पड़ा है – कोई इसे ‘आर्म-ट्विस्टिंग की जीत’ बता रहा है, तो कोई ‘बेहतर लेट देन नेवर’ कहकर ताली बजा रहा।

आखिर ये पीएम श्री योजना है क्या, जो इतने बड़े विवाद का केंद्र बनी हुई है? केरल ने इसे इतने जोर-शोर से क्यों ठुकराया था और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) का ये पुराना झगड़ा अब कहाँ खड़ा है? चलिए इस पूरी घटना को धीरे-धीरे खोलते हैं। हम योजना की बारीकियों से शुरू करेंगे, फिर विरोध की जड़ों तक जाएँगे, फंडिंग के खेल को समझेंगे और आखिर में एनईपी के उस बड़े कैनवास को देखेंगे जो इस सबका बैकग्राउंड है।

क्या है पीएम श्री योजना?

पीएम श्री (प्रधानमंत्री स्कूल फॉर राइजिंग इंडिया) केंद्र सरकार की एक मेगा पहल है, जो 2022 के केंद्रीय बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने घोषित की थी। इसका मकसद देशभर के मौजूदा सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों को ‘मॉडल स्कूल’ में बदलना है। कुल 14,500 स्कूलों को टारगेट किया गया है – हर जिले के हर ब्लॉक में कम से कम दो स्कूल। ये स्कूल बाकी सरकारी स्कूलों के लिए लीडरशिप रोल निभाएंगे, यानी ये मिसाल बनेंगे कि अच्छी शिक्षा कैसे दी जा सकती है।

योजना का कोर कनेक्शन है राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 से। पीएम श्री स्कूल्स एनईपी के हर लक्ष्य को शोकेस करेंगे। एनईपी क्या है, वो थोड़ी देर में डिटेल में बताएँगे। अभी योजना की बात करें। फंडिंग का मॉडल साफ है: केंद्र 60% पैसा देगा, राज्य 40%। हर चुने गए स्कूल को 5 साल के लिए औसतन 1 करोड़ रुपये सालाना मिलेंगे। कुल बजट? करीब 27,000 करोड़ रुपये का आउटले। ये पैसा कहाँ जाएगा?

अब सवाल ये कि ये पैसा कहाँ-कहाँ लगेगा?

इंफ्रास्ट्रक्चर: स्मार्ट क्लासरूम जहाँ ब्लैकबोर्ड की जगह टचस्क्रीन और प्रोजेक्टर होंगे, डिजिटल लैब जहाँ बच्चे कोडिंग और साइंस एक्सपेरिमेंट्स करेंगे, लाइब्रेरी जहाँ किताबों का पूरा समंदर होगा और स्पोर्ट्स ग्राउंड जहाँ फिजिकल फिटनेस को बढ़ावा मिलेगा। खासकर केरल जैसे तटीय राज्य में ये सुविधाएँ और भी उपयोगी साबित होंगी – पानी से बचाव वाली मजबूत इमारतें, मछली पालन और पर्यावरण से जुड़े लोकल वोकेशनल कोर्स।

टीचर ट्रेनिंग पर फोकस: जहाँ टीचरों को सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं सिखाने की ट्रेनिंग दी जाएगी, बल्कि क्रिटिकल थिंकिंग, इमोशनल इंटेलिजेंस और लाइफ स्किल्स पर जोर होगा।

एनईपी की यही खूबी है कि ये टीचिंग को रटने से आगे ले जाती है। बच्चों के लिए तो जैसे स्वर्णिम अवसर खुले पड़े हैं – वोकेशनल ट्रेनिंग कोर्स जहाँ कारपेंटरी से लेकर डिजिटल मार्केटिंग तक सिखाया जाएगा, कल्चरल एक्टिविटीज जहाँ लोकल फेस्टिवल्स और आर्ट्स को जगह मिलेगी, योगा और स्पोर्ट्स क्लासेस जहाँ बॉडी और माइंड दोनों मजबूत होंगे। और इंक्लूजन का ख्याल रखते हुए एससी-एसटी, लड़कियों और डिसेबल्ड बच्चों के लिए स्पेशल छात्रवृत्तियाँ, हॉस्टल फैसिलिटी, फ्री मील्स और ट्रांसपोर्ट की व्यवस्था।

तकनीक का चलेगा जादू: आईसीटी टूल्स से ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म्स, ऑनलाइन क्लासेस जहाँ गाँव का बच्चा शहर के लेवल पर पढ़ सके। हर स्कूल पर ‘पीएम श्री स्कूल’ का बोर्ड लगेगा, जो ब्रांडिंग से ज्यादा गर्व की बात बनेगा।

निगरानी का सिस्टम भी सख्त: केंद्र की टीमें रेगुलर विजिट करेंगी, रिपोर्ट्स चेक करेंगी कि एनईपी के 100 फीसदी गोल्स पूरे हो रहे हैं या नहीं। केरल के संदर्भ में देखें तो ये योजना 260 से ज्यादा स्कूलों पर लागू होगी।

केरल में ये योजना 260 से ज्यादा स्कूलों में रोलआउट होगी। मिनिस्टर सिवनकुट्टी के मुताबिक, ये फंड्स टेक्स्टबुक प्रिंटिंग, क्वेश्चन पेपर सेटिंग, कोस्टल रीजन की जरूरतों और एससी-एसटी स्टूडेंट्स की सुविधाओं पर खर्च होंगे। राज्य में 7,000 से ज्यादा टीचर्स की सैलरी राज्य खुद देता है, लेकिन बकाये चढ़ रहे थे। समग्र शिक्षा केरल (एसएसके) प्रोग्राम रुका पड़ा था – डिसेबल्ड बच्चों को एड इक्विपमेंट नहीं मिला। साफ है, ये योजना सिर्फ एक स्कीम नहीं, बल्कि शिक्षा के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को बदलने वाली क्रांति है। लेकिन राजनीतिक चश्मे ने इसे विवाद की भेंट चढ़ा दिया।

केरल में क्यों हो रहा था पीएम श्री का विरोध?

अब बात करते हैं केरल के उस लंबे विरोध की, जो 2022 से ही एक नाटकीय धारावाहिक की तरह चल रहा था। केरल की सीपीआई(एम)-नीत सरकार ने शुरू से ही पीएम श्री को एनईपी का ‘हथियार’ बताया, और इसका विरोध एक आइडियोलॉजिकल स्टैंड की तरह पेश किया। मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन ने कई बार अपनी आवाज बुलंद करते हुए कहा कि ‘एनईपी राष्ट्र के लिए खतरा है’। उन्होंने इसे ‘कम्युनल एजेंडा’ का हिस्सा ठहराया, जहाँ शिक्षा को सांप्रदायिक रंग दिया जा रहा है।

शिक्षा मंत्री वी. सिवनकुट्टी ने मार्च 2025 में एक प्रेस रिलीज में साफ-साफ कहा था कि सरकार एमओयू (मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग) पर दस्तखत नहीं करेगी, क्योंकि ये योजना राज्य की शिक्षा परंपराओं और वैल्यूज को कुचल देगी। उनका मुख्य इल्जाम था ‘साफ्रनाइजेशन ऑफ एजुकेशन’ का। सिवनकुट्टी ने कहा, ‘जब केंद्र सरकार ने टेक्स्टबुक्स से महात्मा गाँधी की हत्या जैसे ऐतिहासिक घटनाक्रमों को मिटा दिया, तो केरल ने वैकल्पिक अध्याय इंट्रोड्यूस किए। पीएम श्री साइन करने से राज्य के स्कूलों में दोहरी सिलेबस हो जाएँगे – एक एनईपी वाली, जो भगवा रंग से रंगी लगती है और दूसरी राज्य की अपनी। इससे बच्चे कन्फ्यूजन में पड़ जाएँगे और हमारी इंक्लूसिव, सेकुलर वैल्यूज खतरे में पड़ेंगी।’

एजुकेशन एक्टिविस्ट और ऑल इंडिया सेव एजुकेशन कमिटी के स्टेट वाइस प्रेसिडेंट एम. शजार खान ने चेतावनी भरी आवाज में कहा, ‘अगर योजना को हरी झंडी मिल गई, तो केंद्र राज्य के स्कूलों पर पूरा कंट्रोल हथिया लेगा। सिलेबस और टीचिंग मेथड्स पर राज्य का कोई असर नहीं बचेगा। ये कोऑपरेटिव फेडरलिज्म का उल्लंघन है।’

केरल स्टूडेंट्स यूनियन (केएसयू) के स्टेट प्रेसिडेंट अलोशियस जेवियर ने तो एक प्रेस स्टेटमेंट में तंज कसते हुए कहा, ‘ये मुद्दा सीपीएम और बीजेपी के अंदरूनी कनेक्शंस को उजागर करता है। लंबे विरोध के बाद यू-टर्न – ये सब संयोग नहीं लगता।’ विरोध सिर्फ बयानों तक सीमित न रहा, बल्कि प्रैक्टिकल चिंताओं पर भी टिका।

केरल का शिक्षा तंत्र तो पहले से ही दुनिया का एक मॉडल है – साक्षरता दर 94 फीसदी से ऊपर, ASER और अन्य रिपोर्ट्स में टॉप रैंकिंग। राज्य का सिलेबस मल्टीलिंगुअल है, लोकल कल्चर और भाषा पर फोकस्ड। एनईपी का 5+3+3+4 स्ट्रक्चर राज्य के मौजूदा बोर्ड सिस्टम को बिगाड़ सकता था, तीन भाषाओं का फॉर्मूला मलयालम को नेगलेक्ट कर सकता था। वोकेशनल एजुकेशन को प्राइवेटाइजेशन का रास्ता खुलने का डर। और सबसे बड़ा मुद्दा ‘पीएम’ प्रिफिक्स वाले बोर्ड का – इसे राज्य ‘केंद्रीय ब्रांडिंग’ और दखलअंदाजी मानता था। ये सब मिलाकर विरोध एक मजबूत दीवार की तरह खड़ा था, लेकिन फंडिंग की दीवार ने उसे तोड़ दिया।

शतरंज के खेल में जीती केंद्र सरकार

फंडिंग का ये खेल तो जैसे एक चालाकी भरा शतरंज का मैच था, जहाँ केंद्र सरकार ने हर मोहरे को सही जगह रखा। केंद्र ने साफ शर्त रख दी- पीएम श्री का एमओयू साइन करो, वरना समग्र शिक्षा अभियान (एसएसए) के फंड्स नहीं मिलेंगे। एसएसए क्या है? ये 2018 में शुरू हुआ वो व्यापक प्रोग्राम है, जो बच्चों के शिक्षा के अधिकार (आरटीई) 2009 को जमीनी स्तर पर लागू करता है। इसमें टीचरों की सैलरी, स्कूलों की बुनियादी सुविधाएँ, आईसीटी इंटरवेंशंस, टीचर ट्रेनिंग – सब कुछ शामिल। फंडिंग का रेशियो 60:40 – केंद्र 60 फीसदी, राज्य 40। लेकिन 2021 में इसे एनईपी से अलाइन कर दिया गया, और 2022 में पीएम श्री को इसमें शामिल कर लिया।

केरल के लिए ये झटका था। 2023-24 में एसएसए के तहत राज्य को 141.66 करोड़ रुपए मिले थे, लेकिन 2024-25 में शून्य। कुल अटके फंड्स 1,466 करोड़ रुपए (कुछ रिपोर्ट्स में इसे 1,500 करोड़ बताया गया)। संसद में 21 जुलाई 2025 को लोकसभा के स्टार्ड क्वेश्चन नंबर 9 के लिखित जवाब में शिक्षा मंत्रालय ने कन्फर्म किया कि तमिलनाडु और केरल को 2024-25 में एसएसए या पीएम श्री के तहत कोई फंड नहीं दिया गया।

क्योंकि दोनों राज्यों ने एनईपी 2020 को एंडोर्स करने वाला एमओयू साइन नहीं किया। तमिलनाडु को 2023-24 में 1,876.16 करोड़ मिले थे, लेकिन अब जीरो। जबकि उत्तरी राज्य फायदा उठा रहे थे – उत्तर प्रदेश को 6,264.79 करोड़ एसएसए + 246.86 करोड़ पीएम श्री, मध्य प्रदेश को 3,434.71 करोड़ एसएसए + 145.32 करोड़ पीएम श्री।

ये डिस्पैरिटी देखकर दक्षिणी राज्यों ने ‘पॉलिटिकल बायस’ का आरोप लगाया। एक सीनियर तमिलनाडु एजुकेशन ऑफिशियल ने कहा, ‘ये कुछ नहीं बल्कि पनिटिव फेडरलिज्म है। हमारे बच्चे सजा भुगत रहे हैं क्योंकि राज्य सरकार केंद्र की आइडियोलॉजिकल लाइन पर नहीं चली।’

साउथ फर्स्ट की 22 जुलाई 2025 की रिपोर्ट ने इसे ‘साइन ऑर स्टार्व’ की नीति बताया – मतलब दस्तखत करो वरना भूखे मरो। 36 स्टेट्स और यूटी में से 33 ने एमओयू साइन कर लिया, सिर्फ पश्चिम बंगाल, केरल और एक अन्य ने नहीं। दिल्ली और पंजाब ने फंड क्रंच से दबाव में मान लिया। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी सरकार ने आउटराइट रिजेक्ट कर दिया, जिससे 1,500 करोड़ अटक गए।

मिनिस्टर ऑफ स्टेट फॉर एजुकेशन सुकांता मजूमदार ने संसद में 10 मार्च 2025 को लिखित जवाब में कहा, ‘कई रिमाइंडर्स के बावजूद – 15 सितंबर 2022, 6 फरवरी 2023, 13 मार्च 2023, 9 अक्टूबर 2023, 23 फरवरी 2024 और 7 मार्च 2024 – टीएमसी सरकार ने एक भी एमओयू साइन नहीं किया।’

और फिर आया वो मोमेंट जब यू-टर्न का ऐलान हुआ। रविवार को सिवनकुट्टी ने प्रेस मीट में कहा, ‘फंड्स वर्थ 1,466 करोड़ रुपए, जो सही मायने में राज्य के बच्चों के हैं, केंद्र द्वारा रिलीज नहीं किए गए। हम इस स्थिति को क्यों स्वीकार करें? ये पैसे बीजेपी सरकारों के नहीं, बच्चों के हैं।’ उन्होंने फेस-सेविंग के लिए जोड़ा, ‘योजना राज्य की एजुकेशनल वैल्यूज और ट्रेडिशन्स को नुकसान नहीं पहुँचाएगी। हमने कंसल्टेशंस किए हैं, और ये फैसला बच्चों के हित में है।’

एनईपी 2020 का विवाद तो इस सारे ड्रामे का मूल है। 2020 में लॉन्च हुई ये पॉलिसी 34 साल पुरानी 1986 वाली नीति को बदलने का दावा करती है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का पूरा झगड़ा

स्कूल का ढाँचा: 10+2 से 5+3+3+4। 3-8 साल आधारभूत (खेल+प्राथमिक), 8-11 तैयारी, 11-14 मध्य, 14-18 उच्च।

भाषा: तीन भाषाओं का फॉर्मूला – स्थानीय+हिंदी+अंग्रेजी। लेकिन दक्षिण में हिंदी थोपने का डर।

मूल्यांकन: बोर्ड परीक्षाएँ कम, लगातार जाँच। ग्रेड सिस्टम।

उच्च शिक्षा: बहु-विषयी विश्वविद्यालय, 50 फीसदी नामांकन लक्ष्य।

समावेश: नामांकन 100 फीसदी, लड़कियाँ/अल्पसंख्यक पर जोर।

बहरहाल, केरल का पीएम श्री योजना में शामिल होना केंद्र सरकार की दूरदर्शी नीति की जीत है। पहले ‘साफ्रनाइजेशन’ का शोर मचाने वाली सरकार ने समझ लिया कि बच्चों का भविष्य राजनीति से बड़ा है। 1,466 करोड़ के फंड्स से 260 स्कूल मॉडल बनेंगे, शिक्षकों की तनख्वाहें चुकेंगी, और स्मार्ट क्लासरूम व हुनरमंद कोर्स बच्चों को नई उड़ान देंगे। तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों को भी केरल से सीख लेनी चाहिए। एनईपी 2020 और पीएम श्री भारत की शिक्षा को वैश्विक स्तर पर ले जाएँगे। ये यू-टर्न बच्चों की जीत है, जिसका फायदा भविष्य में मिलेगा।