Home Blog Page 214

‘यमुना की बाढ़ में सबकुछ बर्बाद हो गया, खाने-पीने की भी कमी…’ : दिल्ली में राहत कार्यों में जुटी रेखा सरकार, 2 लापता-हजारों बेघर

देश के कई राज्य लगातार हो रही बारिश से बाढ़ की चपेट में हैं। एक तरफ जहाँ पहाड़ी इलाकों से भूस्खलन से भारी तबाही की भयावह तस्वीरें सामने आ रही हैं तो वहीं मैदानी इलाकों में फैले बाढ़ के पानी से परेशान लोग अपने घरों से पलायन करने को मजबूर हैं। वहीं दिल्ली में यमुना का पानी खतरे के निशान से ऊपर बह रहा है। इसी के चलते दिल्ली के कई इलाके बाढ़ की चपेट में हैं। इस बीच गढ़ी माडू गाँव से दो लोग लापता हैं जिनकी तलाश में NDRF की टीमें जुटीं हैं।

बाढ़ग्रस्त इलाकों से हजारों लोग बेघर हो चुके हैं। इस बीच ऑपइंडिया की टीम दिल्ली के उस बाढ़ग्रस्त इलाके में पहुँची, जहाँ लोग राहत शिविरों में अपनी रात बिता रहे हैं। हम बृहस्पतिवार (4 सितंबर 2025) सुबह को डीएनडी होते हुए यमुना पुल पहुँचे। यहाँ यमुना का वर्षों बाद विशाल रूप दिखाई दे रहा है।

पुल पर खड़े कुछ लोग इस दृश्य को अपने मोबाइल में कैद कर रहे हैं तो कुछ अपनी आँखों में समेटने की कोशिश कर रहे हैं। इससे आगे मयूर विहार की ओर बढ़ने पर देखा कि एमसीडी के बंद पड़े टोल के दोनों ओर बड़ी संख्या में डूब क्षेत्र से निकाले गए पालतू पशु बंधे हैं।

इससे आगे लाल बत्ती पर जाकर देखा कि चौराहे से लेकर मयूर विहार वन के मेट्रो स्टेशन तक सड़क के दोनों ओर बड़ी संख्या में सरकार द्वारा राहत शिविर के तहत टेंट लगाए गए हैं, जिसमें बाढ़ से प्रभावित हजारों लोग अपने दिन-रात काट रहे हैं। राहत शिविर के एक टेंट में रह रहे कासगंज निवासी चरन सिंह बताते हैं कि वह पिछले करीब 18 वर्षों से यहीं खादर के डूबा क्षेत्र में रहते हैं।

यहाँ करीब 4 बीधा खेत में सब्जी उगाते हैं और मेहनत मजदूरी करके परिवार का पालन पोषण करते हैं। हमारे खेत में भिंडी, तोरई और गोभी की फसल थी, लेकिन बाढ़ ने सारी फसल को बर्बाद कर दिया। अब तो सब्जी की फसल से ज्यादा अपने परिवार की चिंता है। सरकार ने टेंट तो दे दिया है, लेकिन पीने का पानी और खाना पर्याप्त नहीं मिल पा रहा है। सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए। 

झुग्गियों में वापस जाने में लगेगा एक माह का समय

7 साल से अपने परिवार के साथ डूब क्षेत्र में रहने वाले बदायूँ निवासी ओमपाल बताते हैं कि मैंने आठ बीघा खेत में सब्जी लगा रखी थी। बाढ़ से सब कुछ बर्बाद हो गया। सरकार ने सुरक्षित रहने और खाने का इंतजाम तो कर दिया है, लेकिन हम कब तक दूसरों के भरोसे रहेंगे। अगर आज भी पानी उतर जाता है को हमें फिर से अपनी झुग्गी जमाने और वापस उसी स्थान पर जाने में एक महीने से अधिक का समय लगेगा।

यहीं रहने वाली बुलंदशहर की लाली नाम की महिला बताती है कि वह करीब 20 वर्षों से डूब क्षेत्र में रहती है पहले खेतों में मजदूरी करती थी लेकिन अब वह अपनी नर्सरी चलाती है लेकिन बाढ़ के पानी से नर्सरी में बड़ा नुकसान हुआ है। पता नहीं कब तक पहले जैसी स्थिति होगी सब कुछ भगवान भरोसे है। उन्होंने सरकार से स्थाई समाधान की माँग की।

इस बीच एक बिस्किट का कार्टून लिए चल रही ऊषा नाम की महिला खुद को एनिमल लवर बताते हुए यहाँ कुत्तों को बिस्किट खिला रही है और बच्चों को पानी से दूर रहने और लोगों से सुरक्षित स्थान पर जाने की अपील कर रही है। वह कहती हैं कि हर एक-दो साल बाद दिल्ली में इस तरह की बाढ़ आती है और अस्थाई समाधान के तौर पर सरकार राहत शिविर लगाती है, लेकिन कभी स्थाई समाधान नहीं निकालती। ये हाल देश की राजधानी दिल्ली का है।

राहत शिविरों में खाना-पानी पहुँचा रही सरकार

दिल्ली में बाढ़ के बीच सरकार द्वारा सैकड़ों राहत शिविर लगाए गए हैं। इसी कड़ी में मयूर विहार पर भी बड़ी संख्या में टेंट लगाकर बाढ़ पीड़ितों को रहने की जगह मुहैया कराई गई है। मौके पर एनडीआरएफ की रेस्क्यू टीम भी तैनात की गई हैं। साथ ही सरकार उनको भोजन, पानी और दवा भी पहुँचा रही है। अस्थाई शौचालय लगाए गए हैं। यहाँ तक कि रात्रि के लिए प्रकाश की भी व्यवस्था की गई है। जगह-जगह पुलिस चौकियाँ बनाई गई हैं।

वर्तमान हालात की बात करें तो दिल्ली के यमुना बाजार, बुराड़ी, एमनेस्टी मार्केट, तिब्बती बाजार आदि इलाकों की सड़कों पर बाढ़ का पानी घूम रहा है। आईटीओ का छठ घाट और बासुदेव घाट पूरी तरह पानी से डूब गए हैं और यमुना खादर, यमुना वाटिका, आसिता जैसे रिवर फ्रंट से जुड़े पार्कों में भी पानी भर गया है। बड़े पैमाने पर झुग्गियाँ खाली करा दी गईं हैं। साथ ही हजारों लोगों को राहत शिविरों में शिफ्ट किया जा रहा है।

डीपस्टेट से जुड़े ऑस्ट्रियाई नेता ने X पर चलाया खालिस्तानी प्रोपेगेंडा, खुद विस्तारवादी नीतियों का समर्थक: PM मोदी को बताया ‘रशियन मैन’

ऑस्ट्रिया का अर्थशास्त्री, नेता और इन्फ्लुएंसर गुंथर फेलिंगर ने भारत को टुकड़ों में बाँटने की बात कही है। खालिस्तानी समर्थक हैंडल पर उसने आतंकवादियों को भारत को काटकर अलग देश बनाने का तरीका बताया। वह भारत और पीएम मोदी के खिलाफ जहर उगलता रहा है।

फेलिंगर ने एक्स पर लिखा कि उसने खालिस्तान नैरिटिव एक्स हैंडल के साथ 2 घंटे तक चर्चा की कि खालिस्तान की आजादी के लिए क्या किया जाए और रूस समर्थक भारतीय नेता नरेन्द्र मोदी के चंगुल से कैसे आजाद किया जाए। फेलिंगर ने आगे लिखा है कि उसने आज के ब्रिक्स और भारत की भयावह स्थिति और नरसंहार की प्रकृति से बहुत कुछ सीखा है। हालाँकि भारत में उसका पोस्ट प्रतिबंधित कर दिया गया है।

कौन है गुंथर फेलिंगर

गुंथर फेलिंगर एक ऑस्ट्रियन लॉबिस्ट है। वह इन्फ्लुएंसर, अर्थशास्त्री है और नाटो के विस्तार के लिए यूरोपीय कमेटी फॉर नाटो इनलार्जमेंट नाम से लॉबी ग्रुप चलाता है। उसका ये ग्रुप ऑस्ट्रिया, कोसोवो, यूक्रेन, आर्मेनिया, अल्बानिया, मोल्दोवो समेत कई यूरोपीय देशों में एक्टिव है। इन देशों को नाटो में शामिल करने की मुहिम इसने चला रखी है। वह नाटो का अधिकारी नहीं है और नाटो से सीधा कोई रिश्ता है। वह राजनेता नहीं हैं। लेकिन राजनेता की तरह व्यवहार करता है। वह दक्षिणी बाल्कन क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण ग्रुप समेत कई मल्टीनेशनल संगठन का सदस्य है। यूरोप के देशों की यात्रा कर वह सोशल मीडिया पर सेल्फी पोस्ट करता है। नाटो और यूरोपीय संघ के पक्ष में संदेश पोस्ट करता है। उसके बयान विश्वनेताओं के बयानों जैसे होते हैं।

यूक्रेन को नाटो का सदस्य बनाने की मुहिम में शामिल गुंथर रूस के खिलाफ जहर उगलता रहा है। उसने सोशल मीडिया पर लिखा कि कोसोवो 100 फीसदी नाटो का सदस्य बनने के लिए तैयार है। साथ ही रूस को चेतावनी देते हुए कहा कि रूस अब यूक्रेन से बाहर जाए। यहाँ तक कि उसने ब्राजील के राष्ट्रपति सिल्वा को रूस के साथ काम करने धमकी देते हुए कहा, “मैं यह बिल्कुल स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि अगर आप @LulaOficial नरसंहार करने वालों के साथ शामिल हो गए, तो मैं ब्राजील को तहस-नहस करने का आह्वान करूँगा।” उसने पीएम मोदी और भारत को भी रूस समर्थक बताते हुए कई बार आलोचना की है। नए विवाद में भी उसने पीएम मोदी को ‘रशियन मैन’ बताया है।

दरअसल ये ऑस्ट्रिया का डीप स्टेट के साथ रिश्ता काफी गहरा है। यहाँ की दो अहम पार्टियाँ फ्रीडम पार्टी यानी एफपीओ और ऑस्ट्रियाई पीपुल्स पार्टी पर डीप स्टेट से संबंधित होने के आरोप लगते रहे हैं।

क्या है डीप स्टेट?

डीप स्टेट खुफिया तंत्रों सीआईए, एफबीआई जैसे अमेरिकन इंटेलिजेंस एजेंसी का नेटवर्क है। इनमें दुनिया के सरकारी और गैर सरकारी अभिजात्य वर्ग शामिल हैं, जो लोकत्रांतिक रूप से चुनी गई सरकार से ज्यादा ताकतवर है। ये दुनिया के किसी भी कोने में सरकारों को बनाने- गिराने का माद्दा रखती है।

कौशांबी में 19 साल की हिंदू लड़की से गैंगरेप, नेहा खान ने अपने घर बुलाकर भाई सैफ-अनुज अहमद को सौंपा: मौलाना को बुलाकर पढ़वाया कलमा, अतीक-इसरार-छोटू समेत 7 पर केस

उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले में 19 साल की हिंदू लड़की से गैंगरेप और जबरन धर्म परिवर्तन कराने का मामला सामने आया है। पीड़िता की माँ की शिकायत पर पुलिस ने सैफ खान और अनुज अहमद समेत सात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर कार्रवाई शुरू कर दी है।

मामला कौशांबी थाना क्षेत्र के एक गाँव का है। पीड़िता की माँ ने पुलिस अधीक्षक को दी गई तहरीर में आरोप लगाया कि रविवार (31 अगस्त 2025) की रात आठ बजे गाँव की महिला नेहा बानो उसकी बेटी को बहाने से अपने घर बुला लाई।

वहाँ पहुँचने पर नेहा के भाई सैफ खान और अनुज अहमद ने युवती से दुष्कर्म किया। इस दौरान आरोपितों ने पीड़िता पर जबरन निकाह करने का दबाव भी डाला और जान से मारने की धमकी भी दी।

शिकायत के अनुसार, इसी दौरान गाँव के ही मस्जिद के मौलाना ने महिला और उसकी बेटी से दबाव डालकर कलमा पढ़वाया और जबरन धर्म परिवर्तन कराया। इस कृत्य में गाँव के अतीक अहमद, इसरार अहमद और छोटू खान भी मौजूद रहे और सक्रिय रूप से शामिल हुए।

घटना के बाद पीड़िता और उसकी माँ घर लौटीं और परिवार को पूरी जानकारी दी। परिजनों ने जब आरोपितों का विरोध किया तो महिला के बेटे की सार्वजनिक रूप से पिटाई कर दी गई और पूरे परिवार को जान से मारने की धमकी दी गई।

घटना की शिकायत मिलने के बाद पुलिस अधीक्षक राजेश कुमार सिंह के निर्देश पर सैफ खान, अनुज अहमद, नेहा बानो, छोटू खान, अतीक अहमद, इसरार अहमद और मौलाना समेत सात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया।

पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, पीड़िता का मेडिकल परीक्षण कराया गया है और अदालत में उसका बयान भी दर्ज कराया गया है। पुलिस ने कुछ आरोपितों को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू कर दी है और आगे की कार्रवाई जारी है।

लिपुलेख दर्रे के भारतीय क्षेत्र पर नेपाल ने ठोका दावा: क्या अमेरिकी डॉलर के दम पर आँखें दिखा रहा पड़ोसी देश, जानें विवाद का पूरा इतिहास

लिपुलेख दर्रे को लेकर विवाद एक बार फिर गरमा गया है। दिल्ली और बीजिंग लिपुलेख दर्रे के जरिए व्यापार को एक बार फिर शुरू करने पर सहमत हो गए हैं। इस पर नेपाल ने आपत्ति जताई है। नेपाल इसे ‘अपना क्षेत्र’ कह रहा है। लेकिन इसका न तो कोई ऐतिहासिक आधार है और न ही औचित्य।

दरअसल इसके पीछे अमेरिका है। नेपाल ने लिपुलेख विवाद को हाल ही में बढ़ाया है। अमेरिका ने हाल के वर्षों में उसे विदेशी सहायता उपलब्ध कराई है। नेपाल में उसका बोलबाला है।

क्या है लिपुलेख विवाद

लिपुलेख दर्रा एक त्रि-संधि क्षेत्र में स्थित है। यहाँ भारत, चीन और नेपाल की सीमा जुड़ी हैं। इस पर नेपाल और भारत दोनों अपना दावा करते हैं। नेपाल, लिपुलेख के साथ-साथ आस-पास के कालापानी और लिंपियाधुरा क्षेत्रों को अपने आधिकारिक मानचित्रों और संविधान में शामिल करता है और सुगौली संधि के अनुसार काली नदी को सीमांत क्षेत्र घोषित करता है।

2020 में, नेपाल ने एक राजनीतिक मानचित्र जारी करके कालापानी, लिंपियाधुरा और लिपुलेख को देश का हिस्सा दिखाया सीमा विवाद को पैदा किया था। भारत उस वक्त भी नेपाल के दावे का खंडन किया था और दावा किया था कि नदी का उद्गम नीचे की ओर है। इसलिए यह भूमि उत्तराखंड की है।

लिपुलेख को लेकर भारत और चीन के बीच ऐतिहासिक द्विपक्षीय समझौता है, जिसे हाल ही में नेपाल की आपत्तियों के बावजूद एक बार फिर सहमति बनी है। भारत का तर्क है कि नेपाल के दावों का कोई ऐतिहासिक और तथ्यात्मक आधार नहीं है। वह इस भूमि पर नियंत्रण बनाए रखते हुए बातचीत करना चाहता है।

यह समस्या अगस्त 2025 में फिर से शुरू हुई, क्योंकि भारत ने चीन के साथ लिपुलेख के माध्यम से व्यापार फिर से शुरू करने की घोषणा की। नेपाल ने उसी दिन आपत्ति जताई और इस क्षेत्र पर दावा किया।

भारत के तत्काल खंडन करते हुए इस बात पर जोर दिया कि ये दावे मनगढ़ंत और निराधार हैं। भारत और चीन को लिपुलेख मार्ग जोड़ता है, जो रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।

अमेरिकी आर्थिक मदद का नेपाल पर असर

लिपुलेख मुद्दे पर नेपाल के दावों के पीछे संयुक्त राज्य अमेरिका से जुड़े राजनयिक और वित्तीय सहायता को माना जा रहा है।

हालाँकि 2025 की शुरुआत में, संयुक्त राज्य अमेरिका ने नेपाल में USAID की मदद से चल रही प्रमुख विकास कार्यों को निलंबित कर दिया। इनमें करोड़ों डॉलर के स्वास्थ्य, कृषि और शिक्षा से जुड़े कार्यक्रम शामिल थे।

राष्ट्रपति ट्रम्प के पदभार ग्रहण करने के बाद इस सहायता राशि पर 90 दिनों के लिए रोक लगा दी थी, जिससे नेपाल में संचालित विभिन्न मानवीय कार्यक्रम और गैर-सरकारी संगठन प्रभावित हुए।

हालाँकि मिलेनियम चैलेंज कॉरपोरेशन (MCC) की करोड़ों डॉलर की परियोजनाएँ जारी रही। इस मदद को अमेरिका ने शर्तें लगा कर कूटनीतिक उपकरण की तरह इस्तेमाल किया और नेपाल को विवश किया।

लिपुलेख में तनाव बढ़ने के साथ ही, उसी महीने विकसित हो रहा रणनीतिक आर्थिक गठबंधन इन घटनाक्रमों पर भारी पड़ रहा था। हाल ही में अमेरिका की वित्तीय प्रौद्योगिकी कंपनी सुनो (Suno) ने नेपाल के सिद्धार्थ बैंक के साथ मिलकर बॉर्डरलेस बैंकिंग नामक एक अभिनव परियोजना की शुरुआत की है। इससे नेपाल-अमेरिका के आर्थिक रिश्ते और मजबूत हुए हैं।

अमेरिकी राजदूत डीन आर.थॉम्पसन भी इस मौके पर वहाँ मौजूद थे। इस परियोजना का फायदा अमेरिका में रहने वाले नेपालियों को भी होगा। अमेरिका में रहने वाले नेपाली बिना उड़ान भरे नेपाल में खाते खोल सकते हैं, और वे सुरक्षित और अधिक किफायती तरीके से पैसे भेज सकते हैं।

राजदूत थॉम्पसन के अनुसार, बॉर्डरलेस बैंकिंग कार्यक्रम से अमेरिका-नेपाल संबंध को मजबूती मिली है। साथ ही दुनिया भर में नेपाली समुदायों का फायदा हुआ है। वास्तव में ये डिजिटल बैंकिंग को “वास्तव में सीमा-रहित” बना रहा है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि अमेरिकी फिनटेक कंपनियाँ और नेपाली बैंक साइबर सुरक्षा और फिनटेक के क्षेत्रों में और अधिक मजबूती से मिलकर काम कर सकते हैं, जिससे उनके द्विपक्षीय आर्थिक संबंध और मजबूत होंगे।

एनएमबी बैंक के साथ मिलकर, नेपाल ने अप्रैल 2025 में अमेरिका से संबद्ध संगठनों इंटरनेशनल फाइनेंस कॉरपोरेशन (आईएफसी), ब्रिटिश इंटरनेशनल इन्वेस्टमेंट (बीआईआई) और मेटलाइफ के साथ 60 मिलियन डॉलर का ऐतिहासिक ग्रीन बॉन्ड समझौता किया।

इस समझौते का उद्देश्य नेपाल में निजी क्षेत्र का विकास और निरंतर विकास पर केन्द्रित है। इससे रोजगार पैदा करने और ग्रीन टेक्नोलॉजी को बढ़ावा मिलेगा।

क्षेत्रीय कूटनीति के साथ समन्वय

नेपाल विदेश व्यापार संघ के एक प्रतिनिधिमंडल ने 28 अगस्त 2025 को द्विपक्षीय व्यापार और आर्थिक संबंधों को बेहतर बनाने के तरीकों पर चर्चा करने के लिए बांग्लादेश के दूत से मुलाकात की। यह मुलाकात नेपाल में बांग्लादेश के राजदूत द्वारा नेपाल के प्रमुख नीतिगत थिंक टैंक, नेपाल आर्थिक मंच के अध्यक्ष सुजीव शाक्य से मुलाकात के एक दिन बाद हुई थी। यह दक्षिण एशियाई आर्थिक माहौल में सीमा विवाद के बावजूद क्षेत्रीय संपर्क बढ़ाने के लिए काठमांडू की सक्रिय भूमिका को दर्शाता है।

इसके अलावा इसी समय पेकिंग विश्वविद्यालय के शैक्षणिक प्रतिनिधिमंडलों ने बेल्ट एंड रोड पहल पर सहयोग को बढ़ाने के लिए बांग्लादेश और नेपाल की यात्रा की। यह इस क्षेत्र में चीन के निरंतर रणनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक प्रभाव को दर्शाता है, जो अमेरिका और भारत के संबंध में नेपाल के कार्यों को आंशिक रूप से प्रभावित करता है।

अमेरिका से प्रभावित है नेपाल की नीति

इन घटनाओं के क्रम और समय से ये समझा जा सकता है कि लिपुलेख के मुद्दे पर नेपाल का रुख अमेरिका से प्रभावित है। वाशिंगटन, यूएसएआईडी पहलों को रोकने और फिर से शुरू करने के दौरान बारगेन कर नेपाल के राजनीतिक और कूटनीतिक रुख को प्रभावित कर रहा है।

साथ ही, बांग्लादेश और चीन के साथ नेपाल के क्षेत्रीय कूटनीतिक जुड़ाव उसके रणनीतिक संबंधों में विविधता लाने के एक सुनियोजित प्रयास का संकेत देते हैं, जिसका उद्देश्य आंशिक रूप से भारत और चीन के क्षेत्रीय प्रभुत्व को संतुलित करना है।

ऐसा लगता है कि अमेरिका सामरिक रूप से अहम नेपाल में अपनी उपस्थिति को मजबूत कर रहा है और उसकी शह पर नेपाल लिपुलेख जैसी भारत से जुड़े विवाद पर आक्रामक रुख अपना रहा है।

नेपाल की बढ़ती बाहरी सहायता के विपरीत, जिसे संभवतः अमेरिकी कूटनीतिक और आर्थिक सहयोग से सुगम या प्रोत्साहित किया गया है, भारत द्विपक्षीय वार्ता के माध्यम से सीमा विवादों को सुलझाने पर जोर देता है।

नेपाल के लिपुलेख पर किए दावों को अमेरिका मजबूत कर रहा है, ताकि चीन, भारत और नेपाल से जुड़े इस सीमा क्षेत्र को विवादित बनाया जा सके और भारत-नेपाल संबंधों को तनावपूर्ण बनाया जा सके।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

‘द बंगाल फाइल्स’ विवाद में पल्लवी जोशी ने राष्ट्रपति को लिखा पत्र, फिल्म को रोकने के लिए TMC के राजनीतिक दबाव और धमकियों का किया जिक्र: डायरेक्टर विवेक अग्निहोत्री ने माँगी सुरक्षा

फिल्म ‘द बंगाल फाइल्स’ की निर्माता पल्लवी जोशी ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखकर फिल्म की रिलीज और टीम की सुरक्षा की माँग की है। उन्होंने आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के राजनीतिक दबाव और धमकियों के कारण मल्टीप्लेक्स फिल्म दिखाने से डर रहे हैं। कई FIR दर्ज हुईं, ट्रेलर ब्लॉक किया गया और थिएटर मालिकों को धमकी मिल रही है।

The Bengal Files फिल्म के निर्देशक विवेक रंजन अग्निहोत्री ने गुरुवार (4 सितम्बर 2025) को अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर यह पत्र साझा किया। यह पोस्ट चर्चा का विषय बन गया है क्योंकि इसमें फिल्म की रिलीज को रोकने के पीछे राजनीतिक दबाव और धमकियों का मुद्दा उठाया गया है।

पत्र की शुरुआत में पल्लवी जोशी ने स्पष्ट किया कि यह पत्र किसी विशेष सुविधा के लिए नहीं, बल्कि केवल सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए लिखा गया है। उन्होंने लिखा कि द बंगाल फाइल्स भारत के इतिहास के एक दर्दनाक अध्याय हिंदू नरसंहार और विभाजन की त्रासदियों को सामने लाती है।

उनके अनुसार यह केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि सच की आवाज है, जिसे जनता तक पहुँचाना जरूरी है। पल्लवी जोशी ने पत्र में आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने पहले ही फिल्म का विरोध किया था और उसके बाद से इस पर राजनीतिक दबाव लगातार बढ़ रहा है।

कई पुलिस FIR दर्ज हो चुकी हैं, ट्रेलर ब्लॉक कर दिया गया है और थिएटर मालिकों को धमकियाँ दी जा रही हैं, जिससे वे फिल्म दिखाने से डर रहे हैं। उनका कहना है कि यह सब फिल्म की रिलीज रोकने की कोशिश का हिस्सा है।

उन्होंने आगे बताया कि उनका परिवार भी इन धमकियों से प्रभावित हो रहा है। इसलिए उन्होंने राष्ट्रपति से निवेदन किया है कि फिल्म और इससे जुड़े कलाकारों को सुरक्षा प्रदान की जाए ताकि सत्य की आवाज दब न सके।

पत्र में उन्होंने इस बात का भी उल्लेख किया कि पद्म भूषण से सम्मानित अभिनेता विक्टर बनर्जी समेत कई बंगाली संगठनों ने पहले ही राष्ट्रपति को पत्र लिखकर फिल्म का समर्थन किया है। इससे यह साबित होता है कि सच के पक्ष में खड़े लोग मौजूद हैं, लेकिन राजनीतिक दबाव अब भी सबसे बड़ी बाधा है।

विवेक अग्निहोत्री ने इस पत्र को साझा करते हुए इसे ‘तत्काल अपील’ बताया। अपने कैप्शन में उन्होंने राष्ट्रपति से मामले में हस्तक्षेप करने और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने का आग्रह किया।

उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्रालय, सूचना और प्रसारण मंत्रालय और केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव को भी टैग किया, ताकि यह मुद्दा जल्द सुलझाया जा सके और फिल्म बंगाल में रिलीज हो पाए।

हिन्दुओं नरसंहार था ‘डायरेक्ट एक्शन डे’

यह फिल्म 1946 में अविभाजित बंगाल में हुई हिन्दू नरसंहार को दर्शाती है। इसमें 1946 का डायरेक्ट एक्शन डे और 1946 का ही नोआखली दंगा शामिल है। ये नरसंहार 5 दिनों तक चला था। कोलकत्ता में ही सिर्फ 72 घंटों में करीब 6000 हिन्दू मार दिए गए थे।

इस मजहबी दंगे में करीब 20,000 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए। 100000 लोगों को अपना सबकुछ छोड़कर पलायन करना पड़ा। हिंदुओं को चुन-चुन कर मारा गया, हिन्दू महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया, हिंदुओं की संपत्तियों को जला दिया गया।

पूर्वी बंगाल के नोआखाली में हिन्दुओं का कत्लेआम इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज है। ये कई महीनों तक चलता रहा। इस दौरान हजारों हिन्दुओं की हत्या कर दी गई।

एक अनुमान के मुताबिक करीब 75 हजार हिन्दुओं ने सिर्फ नोआखली में घर- बार छोड़ा जबकि टिप्परा से 20 हजार से ज्यादा लोग अपना सबकुछ छोड़ कर चले गए। फिल्ममेकर विवेक अग्निहोत्री ने बताया कि फिल्म हिन्दुओं के नरसंहार पर आधारित है और इसमें उस इतिहास को दिखाया गया है जिसको अब तक दबा कर रखा गया था।

बता दें कि 1946 में बंगाल में हुए ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के नाम से हिन्दुओं के नरसंहार को सामने लाने जा रही फिल्म के डायरेक्टर विवेक रंजन अग्निहोत्री हैं। बंगाल की टीएमसी सरकार इस फिल्म को रोकने का प्रयास कर रही है। इसके लिए पश्चिम बंगाल के कई शहरों में विवेक अग्निहोत्री के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई है। ये फिल्म 5 सिंतबर 2025 को रिलीज होने वाली है। इसे रोकने के लिए टीएमसी ने पूरा जोर लगा दिया है। पश्चिम बंगाल के मल्टीप्लेक्स ने इस फिल्म को दिखाने से मना कर दिया है।

हिंदुओं के देवी-देवता होते हैं नकली…उन्हें मानोगे तो नर्क में जाओगे: अलवर के मिशनरी हॉस्टल में 50+ गरीब बच्चों का हो रहा था ब्रेनवॉश, 2 गिरफ्तार

राजस्थान के अलवर जिले में एक ईसाई मिशनरी हॉस्टल पर धर्म परिवर्तन के आरोप में बुधवार (3 सितंबर 2025) की शाम को पुलिस ने छापा मारा। हॉस्टल के बच्चों ने बताया कि उनसे कहा जाता था, “अगर भगवान को मानोगे तो नर्क में जाओगे, आग में जलाए जाओगे।” इस मामले की शिकायत विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल की ओर से की गई थी।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जब पुलिस मौके पर पहुँची तो हॉस्टल में भगदड़ मच गई। वहाँ मौजूद 50 से ज्यादा बच्चे डर के मारे 10 फीट ऊँची दीवार फाँदने लगे। पुलिसकर्मियों को बच्चों को नीचे उतारने और शांत करने में काफी मशक्कत करनी पड़ी। वे बच्चों को समझाते रहे, “डरो मत, हम तुम्हारे लिए आए हैं, नीचे आ जाओ।” कुछ बच्चे रोने लगे और डर के कारण चीखने भी लगे।

हॉस्टल के कर्मियों पर गंभीर आरोप

हॉस्टल में रह रहे 6 से 17 साल की उम्र के बच्चों ने पुलिस को बताया कि उन्हें भगवान को मानने से रोका जाता है। कहा जाता था, “अगर भगवान को मानोगे तो नर्क में जाओगे, आग में जलाए जाओगे।” केवल बाइबल पढ़ने के लिए मजबूर किया जाता था। हिंदू देवी-देवताओं को नकली बताया जाता था।

बच्चों ने कहा, “फादर मूर्ति और क्रॉस को पानी में डालकर अंतर दिखाते थे और कहते थे, देखो, तुम्हारा भगवान डूब गया, वो तुम्हें कैसे बचाएगा?” बच्चों ने बताया कि उन्हें पढ़ाई और रहने का खर्चा मुफ्त देने का लालच दिया गया। मौत और नर्क का डर दिखाकर ईसाई धर्म की बातें सिखाई जाती थी।

एक प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि सिल्वा चरण नामक शख्स यहाँ पर 16 वर्ष से ईसाई मिशनरी के रूप में काम कर रहा है और वो गरीब बच्चों का धर्मांतरण कराता है। धार्मिक शिक्षा के नाम पर सुबह और शाम हॉस्टल में बच्चों से हिंदू देवी-देवताओं की बुराई कर धर्म परिवर्तन की बात कही जाती है।

पुलिस की कार्रवाई

पुलिस ने मौके से अहमदाबाद निवासी अमृत और अलवर के सोनू रायसिख को गिरफ्तार किया है। हॉस्टल से ईसाई धर्म से जुड़ी किताबें और धार्मिक सामग्री भी जब्त की गई हैं।

हॉस्टल का संचालन ‘नया जीवन संस्था’ द्वारा किया जा रहा है, जिसका मुख्यालय तमिलनाडु में है। हॉस्टल में अलवर, हनुमानगढ़ और दिल्ली के बच्चे रहते हैं जो अलग-अलग स्कूलों में पढ़ते हैं।

बच्चों ने बताया कि उन्हें साल में 3000 रुपए देने होते हैं और बाकी सारा खर्च संस्था उठाती है। यह मामला धार्मिक स्वतंत्रता, बच्चों की मानसिक सुरक्षा और कानून व्यवस्था से जुड़ा बेहद संवेदनशील विषय बन गया है। पुलिस अब पूरे मामले की जाँच कर रही है और आगे की कानूनी कार्रवाई की तैयारी में है।

झूठे केस में कई साल बर्बाद, नौकरी गई, जमा-पूँजी खत्म… दिल्ली दंगा केस में जिन निर्दोष हिंदुओं को खानी पड़ी जेल की हवा, उन लोगों ने बताई आपबीती

2020 के दिल्ली दंगे में कई निर्दोष हिंदू नागरिकों को बिना सबूत और सही जाँच के दंगों में फँसाया गया। इन आरोपों के आधार पर पुलिस ने कई गिरफ्तारियाँ कीं, लेकिन बाद में अदालत ने यह स्पष्ट किया कि ये मामले झूठे थे और पुलिस ने बिना ठोस सबूत के आरोपितों को फँसाया।

कड़कड़डूमा कोर्ट ने इन लोगों को 25 अगस्त 2025 को बरी कर दिया, लेकिन इन निर्दोष हिंदू लोगों का जीवन हमेशा के लिए प्रभावित हो गया। किसी को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया, किसी को एक के बजाय 4 केस में अपराधी बना दिया, तो किसी की जमा-पूँजी केस लड़ते-लड़ते खत्म हो गई।

नौकरी गई, लाखों खर्च हुए, जीवन बर्बाद हुआ

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, 29 वर्षीय ईशु गुप्ता एक प्राइवेट बैंक कर्मचारी थे, जो 2020 में दंगों से जुड़े मामले में गिरफ्तार हुए थे। उनकी गिरफ्तारी के बाद न केवल उनकी बैंक की नौकरी चली गई, ब्लैकलिस्ट हो गए और पूरा करियर भी बर्बाद हो गया। ईशु गुप्ता बताते हैं कि जेल में रहते हुए जिंदगी उलट-पुलट हो गई, कहीं नौकरी नहीं मिली। इस झूठे केस को लड़ते-लड़ते लाखों रुपए खर्च हो गए। ईशु गुप्ता ने बताया कि पुलिस उनके अलावा 10 और लोग चाहती है। पुलिस ने ईशु को धमकाते हुए कहा कि सभी केस में फँसा दूँगा।

इसके अलावा, 31 वर्षीय प्रेम प्रकाश भी इसी दंगे में निर्दोष पाए गए थे। प्रेम प्रकाश ने बताया कि उन्हें दंगों में शामिल होने का आरोप लगाकर 4 महीने तक जेल में बंद रखा। पुलिस ने बिना जाँच-परख कई केस बना दिए। लेकिन कोर्ट में कोई सबूत तक नहीं दे पाए। इस केस में उनके 3 लाख से ज्यादा खर्च हुए।

दिल्ली दंगे केस में एक अन्य निर्दोष हिंदू मनीष शर्मा है, जिन्हें कोर्ट ने बरी किया था। मनीष शर्मा ने बताया कि पुलिस ने बिना कुछ बताए गिरफ्तार किया। इसके बाद 1 साल तक वे जेल में बंद रहे। पुलिस ने दिल्ली दंगों को सही साबित करने के लिए झूठी कहानी गढ़ी थी।

वकीलों की राय: पुलिस की लापरवाही और जाँच प्रक्रिया में खामियाँ

वकील प्रवीण यादव और अशोक कुमार का मानना है कि दिल्ली पुलिस ने जानबूझकर गरीब और कमजोर लोगों को निशाना बनाया था। वकील ने बताया कि पुलिस को सब पता था कि इन लोगों के पास न तो पर्याप्त साधन हैं और न ही कोई ताकत, इसलिए इन्हें आसानी से फँसाया जा सकता था। अशोक कुमार ने भी कहा कि अगर पुलिस सही तरीके से जाँच करती तो इतने निर्दोष लोग सालों तक जेल में नहीं होते।

इसी मसले में पुलिस ने जितने गवाह और सबूत कोर्ट में पेश किए थे वो विरोधाभास पाए गए। कोर्ट ने हेड कॉन्स्टेबल विकास की गवाही को भी बेबुनाद बताया। कोर्ट ने कहा कि पुलिस की मदद करने के लिए आरोपितों को पहचानना सही नहीं है। कोर्ट ने पुलिस के खिलाफ कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह की जाँच से कानून और न्याय व्यवस्था पर लोगों का विश्वास कमजोर होता है।

अलीगढ़ में SC-ST एक्ट का इस्तेमाल कर चंद्रावती एंड फैमिली ने वसूली ₹46 लाख की रकम, मुआवजे के लिए 10 साल में कराए 15 फर्जी केस: NCW ने की सख्त कार्रवाई की माँग

उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। जिले के हस्तपुर गाँव की रहने वाली चंद्रावती देवी और उनके परिवार पर आरोप है कि उन्होंने अनुसूचित जाति (SC) के लिए बनाई गई सरकारी योजनाओं का गलत फायदा उठाकर करीब 46 लाख रुपए की रकम हड़प ली।

क्या है मामला?

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस का कहना है कि पिछले 10 सालों में चंद्रावती देवी और उनके परिवार के खिलाफ 15 अलग-अलग केस दर्ज किए गए हैं। इनमें से कई मामले SC/ST (अत्याचार निवारण) एक्ट, 1989 के तहत दर्ज हुए हैं।

इस कानून के तहत, पीड़ितों को आर्थिक सहायता और कानूनी सुरक्षा दी जाती है। आरोप है कि चंद्रावती और उनका परिवार बार-बार झूठे केस दर्ज कर इन योजनाओं का लाभ उठाता रहा और अब तक करीब 46 लाख रुपए की रकम हासिल कर चुका है।

राष्ट्रीय महिला आयोग की सख्ती

राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की सदस्य डॉ अर्चना मजूमदार ने इस पूरे मामले को गंभीर मानते हुए, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) के अध्यक्ष किशोर मकवाना को पत्र लिखा है। उन्होंने इस मामले की गहन जाँच और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग की है। आयोग ने सभी दस्तावेज और पुलिस रिपोर्ट्स भी NCSC को सौंप दी हैं।

जानिए क्या कहता है कानून?

SC/ST एक्ट का दुरुपयोग करने पर कड़ी सजा का प्रावधान है। यदि कोई व्यक्ति झूठा मुकदमा दर्ज कराता है या सरकारी मदद लेता है, तो उसे 6 महीने से 7 साल तक की जेल और जुर्माना हो सकता है। इसके अलावा, यदि वित्तीय धोखाधड़ी साबित होती है, तो उस पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत कार्रवाई हो सकती है, जिसमें 7 साल की सजा और संपत्ति जब्ती भी शामिल है।

इस घटना से स्थानीय लोगों में भी आक्रोश है। मामले में आगरा निवासी रामवीर सिंह ने कहा, “जो लोग झूठे मामलों के जरिए पैसा लेते हैं, वे असली गरीब और दलित परिवारों का हक छीनते हैं।” सामाजिक कार्यकर्ता राजेश कुमार ने बताया कि ये कोई पहला मामला नहीं है। 2018 में भी अलीगढ़ में ऐसा ही एक मामला सामने आया था, जहाँ एक दलित परिवार ने झूठे केस से 3 लाख रुपए मुआवजा लिया था।

NCSC अब इस मामले की जाँच करेगा। आयोग को सिविल कोर्ट जैसी शक्तियाँ प्राप्त हैं, जैसे किसी को बुलाना, दस्तावेज मँगवाना और शपथ पर पूछताछ करना। अध्यक्ष किशोर मकवाना पहले भी SC योजनाओं के दुरुपयोग पर सख्त रुख अपना चुके हैं।

यह मामला सिर्फ एक गाँव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे देश में SC/ST योजनाओं के दुरुपयोग की गंभीरता को उजागर करता है। विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार को योजनाओं की सख्त निगरानी और सत्यापन प्रक्रिया अपनानी चाहिए, ताकि वास्तव में जरूरतमंद लोगों तक मदद पहुँचे और धोखेबाजों पर लगाम लग सके।

झारखंड में कॉन्ग्रेस के पूर्व मंत्री ने दलित कॉन्स्टेबल को थप्पड़ जड़कर कहे जातिसूचक शब्द, SC-ST एक्ट में FIR दर्ज; जाम में गाड़ी फँसने से नाराज थे केएन त्रिपाठी

झारखंड के मंत्री रहे कॉन्ग्रेस नेता कृष्णानंद त्रिपाठी ने अपने दलित बॉडीगार्ड को थप्पड़ मारा और गालियाँ दी। बात सिर्फ इतनी थी कि लातेहार के जाम में पूर्व मंत्री और उनका काफिला फँस गया था और बॉडीगार्ड के रूप में कार्यरत कॉन्स्टेबल उनकी गाड़ी निकलवाने में असफल रहा। इससे नेताजी को गुस्सा आ गया और उन्होंने बॉडीगार्ड को थप्पड़ जड़ दिया और जातिसूचक शब्द कहे।

पीड़ित कॉन्स्टेबल रविन्द्र रिकियासन के मुताबिक, 3 सितंबर दोपहर करीब 1.30 बजे जब वह पूर्व मंत्री के साथ लातेहार से जा रहा था, तो रास्ते पर भारी भीड़ थी। उन्हें कार से उतर कर जाम हटाने के लिए कहा गया। ये जाम जनजातियों के महापर्व करमा के जुलूस की वजह से लगा था। इस पर्व में जनजातीय समुदाय के लोग ढोल- नगाड़ों के साथ सड़कों पर नाचते-गाते निकलते हैं। इसकी वजह से सड़क पर काफी भीड़ हो गई थी।

ट्रैफिक पुलिस पहले से ही इसे दुरुस्त करने में लगी हुई थी। लेकिन भीड़ नियंत्रित नहीं हो पा रही थी। इससे नाराज होकर पूर्व मंत्री के एन त्रिपाठी निकले और बॉर्डीगार्ड को थप्पड़ मार दिया। इतना ही नहीं कॉन्स्टेबल रिकियासन को ‘आदिवासी’ और ‘हरिजन’ जैसे जातिसूचक शब्द कह कर अपमानित किया।

आमतौर पर ऐसा होता है कि कोई नेता जब जाम में फँसते हैं, तो उनके बॉडीगार्ड समेत ट्रैफिक पुलिस जाम को हटाने में लग जाती है। यहाँ भी ऐसा हुआ, लेकिन भीड़ ज्यादा थी इसलिए इसमें वक्त लग रहा था।

घटना के खिलाफ कॉन्स्टेबल ने डालटेनगंज नगर थाना में एफआईआर दर्ज कराई है। थाना प्रभारी ज्योति लाल राजवार के मुताबिक, एफआईआर एससी/ एसटी एक्ट 1989 के तहत दर्ज की गई है।

हालाँकि पूर्व मंत्री त्रिपाठी ने इसे ‘बदले की भावना’ से की गई कार्रवाई कहा है। उनका दावा है कि उन्होंने किसी के साथ बदसलूकी नहीं की है, बल्कि गाड़ी से उतर कर खुद रास्ता खाली कराने में मदद की।

लातेहार पुलिस मेंस एसोसिएशन ने घटना की कड़ी निंदा की है और राज्य के पुलिस महानिदेशक को खत लिख कर कॉन्स्टेबल को न्याय देने की माँग की है। एसोसिएशन का कहना है कि ये वर्दीधारी पुलिस की गरिमा पर हमला है। पत्र में सीसीटीवी फुटेज के आधार पर साक्ष्य जुटाने और निष्पक्ष जाँच कर दोषी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की गई है।

चीन से किम जोंग उन का जूठा गिलास ले गए अधिकारी, जिस कुर्सी पर बैठा था डिक्टेटर उसकी भी की सफाई: क्यों विदेश में अपना DNA नहीं छोड़ते हैं नेता

उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन की एक वीडियो इन दिनों काफी चर्चा में है, जिसमें उनकी टीम उनके इस्तेमाल किए हुए गिलास, कुर्सी और आसपास की हर चीज को बड़े एहतियात से साफ करती दिख रही है। यह सब चीन में उनकी पुतिन के साथ मुलाकात के बाद हुआ।

दरअसल, यह पहली बार नहीं है- किम हर विदेश यात्रा में अपने साथ पर्सनल टॉयलेट, सिगरेट बट कलेक्टर और क्लीनिंग स्टाफ लेकर चलते हैं ताकि उनका DNA या जैविक सबूत किसी और के हाथ न लग जाए। ऐसा ही कुछ रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की अलास्का यात्रा के दौरान भी देखा गया था। इस सबका मकसद है ‘DNA को हथियार बनने से रोकना।’

किम जोंग की ‘साफ-सफाई टीम’ की नई क्लिप

हाल ही में सामने आए एक वीडियो में साफ देखा गया कि बीजिंग में पुतिन से मुलाकात के बाद किम के स्टाफ ने कमरे की पूरी सफाई की। उनके पीने का गिलास एक ट्रे में ले जाया गया, कुर्सी की पीठ, आर्मरेस्ट और साइड टेबल को कपड़े से पोंछा गया।

रूसी रिपोर्टर अलेक्जेंडर युनाशेव ने बताया कि ‘किम के जाने के बाद उनकी टीम ने हर उस जगह को साफ किया, जहाँ उनके DNA का कोई अंश रह सकता था। दरअसल, ये एक सोची-समझी रणनीति है ताकि कोई भी देश उनके स्वास्थ्य से जुड़ी निजी जानकारी हासिल न कर पाए। यही वजह है कि जब वो किसी होटल में रुकते हैं तो उनके बाल, थूक या उंगलियों के निशान तक साफ किए जाते हैं।

हर दौरे में साथ होता है किम का टॉयलेट

किम अपने हर वाहन में एक निजी शौचालय रखते हैं और यहाँ तक कि जब वे किसी फैक्ट्री या सैन्य प्रतिष्ठान का दौरा करते हैं तो उनके लिए एक खास बाथरूम भी तैयार किया जाता है। इसके अलावा, उनकी टीम हर उस चीज को इकट्ठा कर लेती है, जिसे किम ने छुआ होता है। 2019 में जब वे हनोई गए थे, तो उनकी टीम ने सिगरेट के बचे हुए टुकड़ों और यहाँ तक कि इस्तेमाल की हुई माचिस की तीलियों को भी संभाल कर रखा था।

उनका मानना है कि इन चीजों में मौजूद लार या दूसरे जैविक पदार्थ से उनकी सेहत के बारे में पता लगाया जा सकता है। यहाँ तक कि वे दस्तावेज़ों पर दस्तखत करते समय भी अपनी ही कलम का इस्तेमाल करते हैं, ताकि उनके फिंगरप्रिंट न लिए जा सकें। जब वे किसी होटल में रुकते हैं, तो उनके सहायक उनके कमरे के हर सामान को साफ करते हैं, उनके बाल और लार जैसी हर चीज़ को हटा देते हैं ताकि कोई उनके DNA के नमूने न ले सके।

DNA से खतरा: सिर्फ बीमारी नहीं, ब्लैकमेलिंग का जरिया भी

आज के दौर में DNA से जुड़ी जानकारी बहुत शक्तिशाली साबित हो सकती है। हालाँकि, वैज्ञानिकों का मानना है कि DNA से किसी व्यक्ति को सीधे तौर पर नुकसान पहुँचाना या उस पर हमला करना अभी संभव नहीं है। लेकिन, DNA के ज़रिए किसी व्यक्ति के स्वास्थ्य से जुड़ी गोपनीय जानकारी जैसे – कोई आनुवंशिक बीमारी या कमजोरी का पता लगाया जा सकता है। यह जानकारी बाद में ब्लैकमेल या राजनयिक दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल की जा सकती है।

यही वजह है कि दुनिया के बड़े नेता, जैसे जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मेर्ज़ और फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन भी, जब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मिले तो उन्होंने रूस की तरफ से दिए गए कोरोना टेस्ट को करवाने से मना कर दिया था। ऐसा इसलिए किया गया ताकि उनके नाक के स्वैब के जरिए उनका DNA रूस के हाथ न लगे।

हालाँकि, इस बारे में कोई पुख्ता सबूत नहीं हैं कि रूस या कोई और देश DNA का इस्तेमाल जासूसी या ब्लैकमेलिंग के लिए करता है, लेकिन इस तरह की आशंकाएँ मौजूद हैं। जानकारों का कहना है कि यह सब राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से एक नया मैदान है, जहाँ जैविक जानकारी एक नया हथियार बन सकती है। यह सब दिखाता है कि आने वाले समय में DNA की सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा बन सकता है।

पुतिन की सीक्रेट ‘पूप सूटकेस’ डिप्लोमेसी

इससे पहले 15 अगस्त 2025 को अलास्का में हुई बैठक के दौरान पुतिन ने अपना मल एक पूप सूटकेस में इकट्ठा करवाया, जिसे बाद में रूस वापस लाया गया। और 2017 में भी फ्रांस यात्रा के दौरान ऐसा ही किया गया था। उनके स्वास्थ्य के बारे में अफवाहें और विदेशी ताकतों के द्वारा स्वास्थ्य जानकारी लीक होने का डर, पुतिन को यह कदम उठाने के लिए मजबूर करता है।

यह सुरक्षा प्रोटोकॉल सालों से चल रहा है। 1999 में राष्ट्रपति बनने के बाद से पुतिन हर यात्रा में अपने मल को इकट्ठा कर रूस वापस ले जाते हैं, ताकि किसी भी विदेशी देश में उनका स्वास्थ्य सम्बंधित जानकारी न पहुँच सके। पुतिन का स्वास्थ्य कई बार चर्चा में रहा है और उनके बारे में थायराइड कैंसर, पार्किंसोन और दिल के दौरे जैसे कई कयास लगाए गए हैं।