अहमदाबाद एअर इंडिया विमान के हादसे को लेकर अंततोगत्वा पायलटों को दोषी ठहरा दिया गया है। 12 जून, 2025 को AI-171 फ्लाइट हादसे को लेकर पायलट को ही कुर्बानी का बकरा बनाने का प्रयास प्रारम्भिक जाँच रिपोर्ट सामने आने से पहले से ही चालू हो गया था। पहले इस विषय में दावे किए गए थे, रिपोर्ट आने के बाद इस पर आशंका जताई गई और कुछ दिनों के बाद विदेशी मीडिया के सहारे पायलटों को पूर्ण रूप से दोषी ठहरा दिया गया है। विदेशी मीडिया के इस कोरस गाने में भारतीय मीडिया भी शामिल हो गया है।
WSJ ने अब पायलटों को ही ठहरा दिया दोषी
इसकी शुरुआत अमेरिकी समाचार पत्र वॉल स्ट्रीट जनरल (WSJ) ने की है। WSJ ने गुरुवार (16 जुलाई, 2025) को एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। इसमें बताया गया है कि अब एअर इंडिया हादसे की जाँच सीधे तौर पर AI-171 के मुख्य पायलट सुमीत सभरवाल पर केन्द्रित हो गई है। इस रिपोर्ट में 3 दशक से विमान उड़ा रहे पायलट सुमीत सभरवाल को फ्यूल कंट्रोल स्विच बंद करने का दोषी ठहरा दिया गया है, जिसकी वजह से हादसा हुआ।
पायलटों को दोषी ठहराती WSJ की रिपोर्ट
WSJ की रिपोर्ट में कहा गया है कि हादसे के बाद बरामद हुए विमान के ब्लैक बॉक्स में सेव हुई आवाज की रिकॉर्डिंग इशारा करती है कि कैप्टन सुमीत सभरवाल ने ही फ्यूल कंट्रोल स्विच बंद किए। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि अहमदाबाद एयरपोर्ट से विमान को लेकर फर्स्ट ऑफिसर क्लाइव कुंदर उड़े थे और फ्यूल कंट्रोल स्विच बंद होने के बाद संभवतः उन्होंने ही कैप्टन सुमीत सभरवाल से पूछा था, “तुमने ये स्विच क्यों बंद किया?”
WSJ की रिपोर्ट में पायलटों को दोषी ठहराने के साथ यह नहीं स्पष्ट बताया गया है कि इसी आवाज की रिकॉर्डिंग में सुमीत सभरवाल ने फ्यूल कंट्रोल स्विच बंद करने से इनकार किया था। WSJ की रिपोर्ट के बाद विदेशी मीडिया के बाकी संस्थान भी इसी सुर में गाने लगे हैं। रायटर्स, ब्लूमबर्ग, CNN और न्यू यॉर्क पोस्ट समेत बाक़ी अमेरिकी मीडिया संस्थानों ने सीधे तौर पर अपनी हेडलाइंस और खबर में कैप्टन सुमीत सभरवाल को फ्यूल कंट्रोल स्विच बंद करने का दोषी मान लिया है।
विदेशी मीडिया कैप्टन सुमीत सभरवाल को लेकर एक साथ खबरें प्रकाशित हुई हैं
विदेशी मीडिया के साथ भारतीय मीडिया भी मिला रहा सुर
ऐसा नहीं है कि भारतीय पायलट के नाम दोष डालने का काम सिर्फ अमेरिकी या बाकी विदेशी मीडिया ही कर रहा हो। इस काम में भारतीय मीडिया संस्थान भी शामिल हैं। बिजनेस स्टैण्डर्ड से लेकर ऑनमनोरमा तक ने WSJ की रिपोर्ट के हवाले से पायलटों की कथित गलती की बात को हेडलाइन्स में चलाया है। इन संस्थानों ने भी वह महत्वपूर्ण तथ्य नजरअंदाज कर दिया है कि जिसमें पायलट ने फ्यूल कंट्रोल स्विच को बंद करने से इनकार किया है।
बोइंग को बचने की पटकथा का अंतिम अध्याय भी पूरा
WSJ समेत तमाम संस्थानों ने अब पायलटों को अंतिम तौर पर पायलटों को दोषी ठहरा दिया ही है। हालाँकि इसकी पटकथा कई दिनों पहले से ही लिखी जा रही थी। अमेरिकी अखबार WSJ ने गुरुवार (10 जुलाई,2025) को इसी संबंध में एक खबर प्रकाशित की थी। इस खबर में दावा किया गया था कि जाँचकर्ता अब एअर इंडिया हादसे की जाँच इंजन या अन्य फेलियर के एंगल से नहीं परंतु पायलटों की ‘भूल’ के एंगल से कर रहे हैं।
यह खबर तब प्रकाशित की गई थी जब AAIB की जाँच रिपोर्ट सामने नहीं आई थी। बाद में जब AAIB की रिपोर्ट सामने आई तो इसमें पायलटों की भूल की बात तक नहीं की गई। यह प्रयास सिर्फ वॉल स्ट्रीट जनरल ने ही नहीं किया था। वॉल स्ट्रीट जनरल के अलावा ब्लूमबर्ग, रॉयटर्स, ABC न्यूज और विमानन पर रिपोर्ट करने वाली वेबसाइट एयर करेंट ने भी विमान हादसे का कारण इंजन को ईंधन पहुंचाने वाले फ्यूल स्विच के ‘गलती से बंद होना’ बताने का प्रयास किया था।
इन सभी मीडिया पोर्टल में यह खबरें 8 जुलाई से 10 जुलाई के बीच प्रकाशित हुई थी जबकि AAIB की जाँच रिपोर्ट 12 जुलाई को प्रकाशित हुई थी। यह प्रयास AAIB रिपोर्ट के बाद रुके नहीं थे। AAIB रिपोर्ट को भी विदेशी मीडिया संस्थानों जैसे रॉयटर्स, बीबीसी, डेली मेल आदि ने इस रिपोर्ट को जानबूझकर गलत तरीके पेश किया। AAIB रिपोर्ट में पायलटों की गलती को लेकर कोई बात नहीं कही गई थी। फिर भी इन मीडिया संस्थानों ने पायलटों को ही को दोषी ठहराने की कोशिश की।
WSJ जाँच रिपोर्ट आने से पहले, जाँच रिपोर्ट के बाद और अब भी पायलटों को दोषी बता रहा है
इस कड़ी में FAA की वह नोटिफिकेशन भी सामने आई थी जिसमे बोइंग को क्लीन चिट दी गई। अब इसी कहानी के अंतिम अध्याय में पायलटों को दोषी ठहराते हुए कैप्टन सुमीत सभरवाल को फ्यूल कंट्रोल स्विच बंद करने का दोषी बता दिया गया है। यह सब तब हो रहा है जब AAIB ने स्वयं कहा है कि इस हादसे की जाँच अभी पूरी नहीं हुई है और जो भी रिपोर्ट सामने आई है वह प्रारम्भिक है। लेकिन बोइंग को क्लीन चिट देने के चक्कर में एक के बाद एक ऐसी पायलटों की गलती को लेकर रिपोर्ट्स गढ़ी जा रही हैं।
सरकार, एक्सपर्ट, पायलट… सभी ने खारिज किए दावे
WSJ समेत बाकी देसी-विदेशी मीडिया संस्थानों की बोइंग को बचाने की कोशिश हालाँकि ना ही पायलटों की यूनियन को रास आई है और ना ही भारत सरकार इस मामले में अधपकी बातों पर विश्वास करने को तैयार है। यहाँ तक कि अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ तक हवा में तीर चलाने की इन कोशिशों को स्वीकार नहीं कर रहे हैं और खारिज कर दे रहे हैं। इस रिपोर्ट पर सरकार ने कैप्टन सुमीत सभरवाल को कटघरे में खड़े करने से इनकार कर दिया है।
NEWS18 इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी सूत्रों ने WSJ रिपोर्ट को खारिज करते हुए कहा है कि कॉकपिट में रिकॉर्ड हुई आवाज के आधार पर कैप्टन सभरवाल को दोषी ठहराया जाना ठीक है। सरकार ने कहा है कि दोनों पायलटों की बातचीत को तोड़-मरोड़ का पेश किया जा रहा है। यह भी सरकारी सूत्रों ने कहा है कि कैप्टन सभरवाल तनाव में थे इसका कोई सबूत नहीं है और उनके पिता तक नागरिक उड्डयन मंत्रालय से रिटायर हुए थे।
इसी तरह भारतीय पायलट फेडरेशन (FIP) के मुखिया कैप्टन CS रंधावा ने कैप्टन सभरवाल को दोषी ठहराने की रिपोर्ट्स खारिज कर दी हैं। उन्होंने कहा है कि अब तक AAIB और नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने यह नहीं कहा है कि हादसे का कारण कैप्टन सुमीत सभरवाल थे। उन्होंने कहा कि इस मामले में ANA NH985 फ्लाइट को याद किया जाना चाहिए, जिसमें पायलट के बिना कुछ किए ही फ्यूल कंट्रोल स्विच बंद हो गए थे।
#WATCH | Mumbai: On Aircraft Accident Investigation Bureau (AAIB) preliminary report on the Air India plane crash, Captain CS Randhawa, President of the Federation of Indian Pilots (FIP), says, "Neither the report nor the Civil Aviation Minister has said that it was pilot… pic.twitter.com/ZKx4CNLAjv
FIP मुखिया कैप्टन रंधावा ने कहा है कि यह घटना भी वैसी ही गड़बड़ का दोहराव है। उन्होंने बोइंग पर भी प्रश्न उठाए है कि उसने अभी तक इस मामले में ना कोई एक्शन लिया है और ना ही कोई सलाह जारी की है। कैप्टन रंधावा ने जाँच समिति में अनुभवी पायलटों को शामिल किए जाने की माँग की है। उन्होंने इस समिति में पायलटों के साथ ही हादसे वाले विमान मॉडल के अनुभवी इंजीनियर्स को भी जाँच में शामिल करने की अपील केन्द्रीय नागरिक उड्डयन मंत्रालय से की है।
अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ मैरी शिवाओ ने भी यह मानने से इनकार किया है कि कैप्टन सभरवाल ने फ्यूल कंट्रोल स्विच बंद किए थे। उन्होंने कहा कि इस दावे का समर्थन करने के लिए कोई भी सबूत मौजूद नहीं है। उन्होंने कहा, CVR में मौजूद आवाज़ों, शब्दों और ध्वनियों का सावधानीपूर्वक विश्लेषण किया जाना चाहिए। इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे पायलट के आत्महत्या या हत्या का संकेत मिले। CVR की पूरी कॉपी जल्द से जल्द जारी की जानी चाहिए ताकि उलटी सीधी व्याख्या से बचा जा सके।
मैरी शिवाओ ने भी 2019 के ही ANA एयरलाइन घटना का जिक्र किया है। शिवाओ अमेरिका में कई विमान हादसों को लेकर जाँच में शामिल रही हैं और वह अमेरिकी ट्रांसपोर्ट बोर्ड की मुखिया रही हैं जो अमेरिका में विमान हादसों की जाँच करता है। शिवाओ के अलावा हवाई यातायात से जुड़े तमाम लोग पायलट को दोषी ठहराने की थ्योरी को खारिज कर रहे हैं लेकिन अमेरिकी मीडिया लगातार ऐसी खबरें छाप रहा है। ऐसे में बोइंग को बचाने की साजिश के प्रश्न उठे हैं।
क्यों नहीं पचती कैप्टन सभरवाल की गलती की बात
WSJ समेत बाकी मीडिया संस्थान भले ही कैप्टन सुमीत सभरवाल को इस हादसे का दोषी मान चुके हों लेकिन यह दावे गले नहीं उतरते। सरकार और विशेषज्ञों के खारिज करने के अलावा सामान्य तौर पर यह बात गले नहीं उतरती है। जिन कैप्टन सभरवाल को इस हादसे का दोषी बताया जा रहा है वह तीन दशक से विमान उड़ा रहे थे। 54 वर्षीय कैप्टन सुमीत सभरवाल 8000 घंटों से अधिक विमान उड़ा चुके थे। उनका एक हँसता खेलता परिवार है।
एअर इंडिया की हादसे वाली फ्लाइट के पायलट सुमीत सभरवाल (बाएँ) और क्लाइव कुंदर (दाएँ)
ना ही अनुभव के हिसाब से उनमें कोई कमी थी और ना ही वह मानसिक तौर पर अस्थिर व्यक्ति थे। ऐसे में उनके जानबूझ कर विमान को क्रैश करने की थ्योरी कहीं नहीं टिकती। जिस कॉकपिट की आवाज के आधार पर उन्हें दोषी ठहराया बता जा रहा है, उसी में उन्होंने स्पष्ट तौर पर फ्यूल कंट्रोल स्विच बंद करने से इनकार किया है। इसके अलावा उनकी आत्महत्या के कथित दावे भी हवा हवाई दिखाई पड़ते हैं। क्योंकि अगर उन्हें जानबूझ कर ही विमान क्रैश करना होता तो वह उसे टेकऑफ के तुरंत बाद ही क्यों गिराते।
वर्ष 1999 में इसी तरह इजिप्ट एयर का एक विमान अटलांटिक महासागर में जाकर क्रैश हो गया था। फ्लाइट 990 नाम से जाने वाली यह फ्लाइट अमेरिकी शहर लॉस एंजिल्स से मिस्र की राजधानी काहिरा जा रही थी। यह बोइंग का 767-300ER विमान था। इस हादसे में 217 लोग मारे गए थे। जाँच में सामने आया था कि इसके पायलट गमील अल बतूती ने जान बूझ कर यह विमान महासागर में क्रैश कर दिया था। इस हादसे की जाँच में सामने आया था कि बतूती ने फ्लाइट के कंट्रोल गड़बड़ किए, जिससे हादसा हुआ।
एयर इजिप्ट फ्लाइट 990 क्रैश, फोटो साभार : Medium
इस उदाहरण से स्पष्ट होता है कि पायलट ने तब तक इन्तजार किया जब तक किसी के बचने की संभावना शून्य ना हो जाए और फिर विमान को क्रैश हो जाए। यहाँ कैप्टन सुमीत सभरवाल ने ऐसा कोई कृत्य नहीं किया। ना ही जाँच में यह बात सामने आई है। दूसरी बात फ्यूल कंट्रोल स्विच से जुड़ी है। हादसे के बाद कई विशेषज्ञों ने बताया है कि धोखे से हाथ लगने पर कंट्रोल स्विच बंद या चालू नहीं हो सकते, क्योंकि यह इस तरह डिजाइन किए गए हैं।
2019 का हादसा तकनीकी गड़बड़ी का कर रहा इशारा
पायलटों के ऊपर पूरा दोष मढ़ रहे मीडिया और बाकी लोगों को 2019 का ANA एयर का इंसिडेंट भी याद करना चाहिए, जिसकी बात लगातार कई विशेषज्ञ कर रहे हैं। दरअसल, 2019 में आल निप्पन एयरवेज (ANA) का एक 787 ड्रीमलाइनर जापान की राजधानी टोक्यो से ओसाका शहर को जा रहा था। लैंडिंग के कुछ ही सेकंड्स पहले इसके भी फ्यूल कंट्रोल स्विच बंद हो गए थे। इसमें पायलटों का कोई हस्तक्षेप नहीं था और जाँच में सामने आया था कि यह घटना एक सॉफ्टवेयर फेलियर थी।
एअर इंडिया हादसा भी कुछ-कुछ वैसा ही है। हालाँकि, अभी जाँच पूरी नहीं हुई है और यह सामने नहीं आया है कि क्या यहाँ भी तकनीकी खराबी के चलते AI171 फ्लाइट के इंजनों की सप्लाई बंद हो गई। यह कोई बात सामने आए, इससे पहले ही कैप्टन सुमीत सभरवाल के रूप में एक कुर्बानी का बकरा ढूंढ लिया गया है और उसी पर दोष डाल कर बोइंग को बचाने का प्रयास चल रहा है। बोइंग को सीधे तौर पर पायलट को दोषी बताए जाने वाली रिपोर्ट्स से फायदा भी हो रहा है।
बोइंग के शेयर पर रिपोर्ट्स का सीधा फायदा
अहमदाबाद में विमान हादसे, इसकी जाँच और इससे जुड़ी रिपोर्ट्स का सीधा असर बोइंग के शेयर पर दिख रहा है। जब 12 जून, 2025 को हादसा हुआ था तो बोइंग के शेयर ने तेज गोता लगाया था। हादसे के दौरान जिस बोइंग का शेयर $215 से गोता लगाते हुए सीधे तौर पर $198 तक आ गया था। लगभग 7%-8% की यह गिरावट बोइंग के लिए एक बड़ा झटका थी। हालाँकि, इसके बाद जैसे ही बोइंग हादसा मामले में पायलटों पर दोष मढ़ा जाना चालू हुआ, इसका शेयर वापस चढ़ने लगा।
WSJ की हालिया रिपोर्ट सामने आने के बाद यह शेयर $229 तक चढ़ चुका है। यह एक वर्ष में इसका उच्चतम स्तर है। यानी अमेरिकी अखबारों में आई इन खबरों का सीधा फायदा बोइंग को वित्तीय मोर्चे पर है। इस एंगल से देखने पर स्पष्ट नजर आता है कि बोइंग के इस हादसे में पाक साफ़ निकलने का सीधा कारण क्या है। यह कोई नई बात नहीं है कि बोइंग अपने वित्तीय फायदे के लिए पायलटों को दोषी बताए, इससे पहले 2019 में भी यही कहानी हो चुकी है। इसलिए फिर से इसके होने पर कोई आश्चर्य नहीं होता।
बेंगलुरु के एम. चिन्नास्वामी स्टेडियम के बाहर 4 जून 2025 को हुए भयानक हादसे में 11 लोगों की जान चली गई और 50 से ज्यादा लोग घायल हो गए। इस हादसे के लिए कर्नाटक सरकार ने अपनी रिपोर्ट में रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु (आरसीबी) को जिम्मेदार ठहराया है।
सरकार का कहना है कि आरसीबी ने बिना पुलिस की इजाजत और बिना किसी तैयारी के विजय जुलूस और उत्सव का आयोजन किया, जिसके चलते इतना बड़ा हादसा हुआ। इस मामले में विराट कोहली का एक वीडियो भी चर्चा में है, जिसे आरसीबी ने अपने सोशल मीडिया पर डाला था। आइए, इस पूरे मामले को समझते हैं।
भगदड़ से पहले और बाद में क्या हुआ
आरसीबी ने 3 जून 2025 को पहली बार आईपीएल का खिताब जीता। इसके जश्न में बेंगलुरु में चिन्नास्वामी स्टेडियम के बाहर विजय जुलूस और उत्सव का आयोजन किया गया। लेकिन इस आयोजन के लिए जरूरी इजाजत नहीं ली गई थी। सरकार की रिपोर्ट के मुताबिक, आरसीबी, उनके इवेंट पार्टनर डीएनए नेटवर्क्स प्राइवेट लिमिटेड और कर्नाटक स्टेट क्रिकेट एसोसिएशन (केएससीए) ने बिना पुलिस से बात किए और बिना लाइसेंस लिए यह आयोजन कर डाला।
केएससीए के सीईओ शुभेंदु घोष ने 3 जून 2025 को शाम 6:30 बजे कब्बन पार्क पुलिस स्टेशन को एक पत्र दिया था। पत्र में कहा गया कि अगर आरसीबी फाइनल जीतती है, तो अगले दिन विजय जुलूस निकाला जाएगा। लेकिन पुलिस ने इसकी इजाजत नहीं दी, क्योंकि आयोजकों ने न तो भीड़ के आकार की जानकारी दी और न ही कोई तैयारी बताई।
इसके बावजूद 4 जून 2025 को सुबह 7:01 बजे आरसीबी ने अपने सोशल मीडिया पर जुलूस की घोषणा कर दी। सुबह 8:55 बजे एक वीडियो पोस्ट किया, जिसमें विराट कोहली ने लोगों को जश्न में शामिल होने का न्योता दिया। इस पोस्ट को 16 लाख लोग देख चुके थे। दोपहर 3:14 बजे एक और पोस्ट में बताया गया कि जुलूस शाम 5 से 6 बजे तक होगा और स्टेडियम में सीमित मुफ्त पास उपलब्ध हैं।
“I’m going to feel the real side of it when we get to Bengaluru tomorrow and celebrate this with the city” – Virat Kohli ❤️?
King Kohli walks into the dressing room with ABD, talks about Rajat’s leadership, Jitesh’s smartness, and the team coming together to achieve this… pic.twitter.com/aqLY7LHvvE
— Royal Challengers Bengaluru (@RCBTweets) June 4, 2025
इन पोस्ट्स की वजह से लाखों लोग स्टेडियम के बाहर जमा हो गए। सरकार का अनुमान है कि करीब 3 से 5 लाख लोग वहां पहुंचे, जबकि स्टेडियम की क्षमता सिर्फ 35,000 है। दोपहर 3:14 बजे अचानक यह घोषणा की गई कि स्टेडियम में प्रवेश के लिए पास जरूरी है, जिससे भीड़ में भगदड़ मच गई। लोग गेट तोड़कर अंदर घुसने की कोशिश करने लगे। गेट नंबर 1, 2, 2A, 6, 7, 15, 17, 18 और 21 पर भगदड़ हुई, जिसमें 11 लोगों की जान चली गई और 50 से ज्यादा घायल हो गए। घायलों को बौरिंग और व्यदेही अस्पताल ले जाया गया।
जिम्मेदारी से साफ-साफ बच के निकली सरकार
कर्नाटक सरकार ने अपनी रिपोर्ट में सारा दोष आरसीबी पर डाला। सरकार का कहना है कि आरसीबी ने पुलिस से कोई इजाजत नहीं ली और सोशल मीडिया पर जुलूस की घोषणा करके लाखों लोगों को बुला लिया। सरकार ने कोहली के वीडियो का भी जिक्र किया, जिसमें उन्होंने लोगों को जश्न में शामिल होने के लिए कहा था। सरकार के मुताबिक, आयोजकों ने सिर्फ एक पत्र देकर सूचना दी, लेकिन जरूरी अनुमति के लिए कोई आवेदन नहीं किया, जो कि 2009 के लाइसेंसिंग और कंट्रोलिंग ऑफ असेंबलीज एंड प्रोसेसन्स (बेंगलुरु सिटी) ऑर्डर के तहत जरूरी है।
हालाँकि कर्नाटक हाई कोर्ट ने इस हादसे को गंभीरता से लिया और अपने आप इसकी जाँच शुरू की (सुओ मोटो पीआईएल)। कोर्ट ने सरकार से स्टेटस रिपोर्ट माँगी। सरकार ने पहले इस रिपोर्ट को गोपनीय रखने की माँग की, लेकिन कोर्ट ने इसे सार्वजनिक करने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि इसमें कोई गोपनीय जानकारी नहीं है और यह सिर्फ तथ्यों का ब्यौरा है। कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकार को यह रिपोर्ट आरसीबी, केएससीए और डीएनए नेटवर्क्स को देनी होगी।
पुलिस ने भी झटका हाथ
पुलिस का कहना है कि उन्हें आयोजन की पूरी जानकारी नहीं दी गई थी। कब्बन पार्क पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर ने बताया कि 3 जून को केएससीए ने सिर्फ एक पत्र दिया, जिसमें जुलूस की बात थी, लेकिन कोई ठोस जानकारी नहीं थी। पुलिस ने समय कम होने की वजह से इजाजत देने से मना कर दिया। इसके बावजूद, आरसीबी ने सोशल मीडिया पर जुलूस का ऐलान कर दिया। पुलिस ने कहा कि इतनी बड़ी भीड़ को संभालना मुश्किल था, क्योंकि रात में भी लोग सड़कों पर जश्न मना रहे थे। फिर भी, पुलिस ने सात घायल जवानों की मदद से स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश की।
RCB बोली – अनुमति समेत बाकी जिम्मेदारी DNA, KCCA की
आरसीबी ने कर्नाटक हाई कोर्ट में सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (सीएटी) के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें उसे हादसे का जिम्मेदार ठहराया गया था। आरसीबी का कहना है कि सीएटी ने बिना उनकी बात सुने यह फैसला दिया, जो कि गलत है। आरसीबी ने कहा कि मुख्यमंत्री का पोस्ट ने भीड़ को आकर्षित किया। वे मानते हैं कि सोशल मीडिया प्रमोशन किया, लेकिन पुलिस को सूचना दी थी। आरसीबी ने कहा कि अनुमति लेने और आयोजन की जिम्मेदारी डीएनए और केएससीए की थी। आरसीबी ने यह भी दावा किया कि हादसे के बाद उन्होंने पीड़ित परिवारों को आर्थिक की मदद दी और ‘आरसीबी केयर्स’ फंड बनाया।
बिना जानकारी के ही स्टेडियम में पहुँचे मुख्यमंत्री और डिप्टी मुख्यमंत्री?
हैरानी की बात है कि कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ने इस हादसे में अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह पल्ला झाड़ लिया। क्या पूरा सरकारी तंत्र इतना लापरवाह था कि बिना पुलिस की जानकारी, बिना किसी ठोस तैयारी और बिना इजाजत के स्टेडियम में उत्सव का आयोजन कर लिया गया? लोग स्टेडियम के बाहर मर रहे थे, घायल हो रहे थे, लेकिन मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार स्टेडियम में जश्न मना रहे थे।
इतना ही नहीं, हादसे के बाद भी आरसीबी की पूरी टीम को विधानसभा ले जाया गया और वहाँ सम्मानित किया गया, जबकि उसी वक्त 11 परिवार अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा नुकसान झेल रहे थे और दर्जनों लोग अस्पतालों में जिंदगी की जंग लड़ रहे थे।
क्या यह सरकार की संवेदनहीनता नहीं है? एक तरफ लोग अपनी जान गँवा रहे थे, दूसरी तरफ सरकार और उसके नेता फोटो खिंचवाने और वाहवाही लूटने में व्यस्त थे। सरकार ने पुलिस अधिकारियों को निलंबित कर दिया, लेकिन क्या यह सिर्फ अपनी गलतियों को छिपाने की कोशिश नहीं थी? अगर पुलिस को पहले से जानकारी नहीं थी, तो फिर मुख्यमंत्री और उनके साथी स्टेडियम और विधानसभा में क्या कर रहे थे?
यह सवाल उठता है कि क्या सरकार ने सिर्फ अपनी छवि चमकाने के लिए इस आयोजन को बढ़ावा दिया, बिना यह सोचे कि इसका नतीजा क्या हो सकता है? यह हादसा सिर्फ आरसीबी की लापरवाही का नहीं, बल्कि कॉन्ग्रेस सरकार की गैर-जिम्मेदारी का भी नतीजा है। जनता के सामने अब यह सवाल है कि आखिर जिम्मेदार कौन है – क्या सिर्फ आरसीबी, या फिर वह सरकार जो अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए दूसरों पर ठीकरा फोड़ रही है?
तमिलनाडु के कीलाडी (Keeladi) में हुई खुदाई ने दक्षिण भारत में एक प्राचीन और शहरीकृत सभ्यता के अस्तित्व का प्रमाण दिया है। यह खुदाई 2014 में शुरू हुई थी और इसकी शुरुआती जिम्मेदारी पुरातत्वविद् के. अमरनाथ रामकृष्ण को सौंपी गई थी।
हालाँकि, इस खुदाई के दौरान एक बड़ा राजनीतिक विवाद सामने आया। मामले में के. अमरनाथ के कई बार तबादले हुए। इस वजह से राज्य सरकार और केंद्र सरकार के बीच टकराव की स्थिति बन गई। वहीं भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने भी उनकी खुदाई वाली रिपोर्ट पर आपत्ति जताई। ASI ने अमरनाथ से कहा कि वे अपनी रिपोर्ट में बदलाव करें, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया। इस इंकार के बाद केंद्र और राज्य सरकारों के बीच एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया।
अब के. अमरनाथ रामकृष्ण को ग्रेटर नोएडा में स्थित ‘राष्ट्रीय स्मारक और पुरावशेष मिशन’ (National Mission on Monuments and Antiquities – NMMA) का निदेशक नियुक्त किया गया है। इससे पहले वे इसी मिशन के नई दिल्ली कार्यालय में निदेशक के रूप में कार्यरत थे। अपने पिछले कार्यकाल से छह महीने बाद उनका यह तबादला हुआ है। इससे पहले वे उत्खनन एवं अन्वेषण निदेशक के तौर पर तीन महीने तक काम कर चुके थे।
यह सब कैसे शुरू हुआ: कीलाडी की खोज और उसका महत्व
कीलाडी, जिसे कीझाडी भी कहा जाता है, तमिलनाडु के शिवगंगा जिले में स्थित है। यह मदुरै से लगभग 12 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में वैगई नदी के किनारे है। यहाँ खुदाई का कार्य लगभग दस साल पहले अमरनाथ रामकृष्ण के नेतृत्व में शुरू हुआ था। रामकृष्ण उस समय ASI के अधीक्षक पुरातत्वविद थे। उनके नेतृत्व में इस कार्य की शुरुआत पल्लिचंथई नामक स्थान से हुई थी।
यहाँ पहले 100 एकड़ का नारियल का एक बाग था। वैगई नदी के किनारे 100 से अधिक स्थानों को खुदाई के लिए चिन्हित किया गया था, जिनमें कीलाडी सबसे महत्वपूर्ण साबित हुआ। शुरू में खुदाई के तीन चरण ASI ने किए, उसके बाद कार्यभार तमिलनाडु राज्य पुरातत्व विभाग (TNSDA) ने सँभाला।
कीलाडी से अब तक 18,000 से अधिक प्राचीन वस्तुएँ मिल चुकी हैं। इनमें कुएँ, जल निकासी प्रणाली, ईंटों से बने भवन, तमिल ब्राह्मी लिपि में लेख लिखे मिट्टी के बर्तन, सोने के आभूषण, ताँबे की वस्तुएँ, अर्ध-कीमती पत्थर और रत्न, शंख और हाथी दाँत से बनी चूड़ियाँ, काँच की मोतियाँ, कताई और बुनाई के उपकरण, मिट्टी की मुहरें और अन्य वस्तुएँ शामिल हैं।
इन खोजों से यह सिद्ध होता है कि कीलाडी में एक समृद्ध, उन्नत और योजनाबद्ध नगरी बसती थी। यहाँ व्यापार, बुनाई, रंगाई, मिट्टी के बर्तन और मोती बनाने जैसे कई व्यवसाय मौजूद थे। यहाँ मिले कार्नेलियन और अगेट जैसे विदेशी पत्थरों से बने गहनों से यह भी पता चलता है कि यहाँ समुद्री व्यापार भी होता था। इसके साथ ही खुदाई में मिली ताँबे की सुई, सूत लटकाने के पत्थर, कताई के चक्के और मिट्टी के बर्तन इस क्षेत्र में कपड़ा उद्योग की समृद्धता को दर्शाते हैं।
इसके अलावा, हॉप्सकॉच जैसे खेलों के चिह्न, पासे और गोटियों जैसी वस्तुएँ उच्च वर्गीय समाज की उपस्थिति और उनके मनोरंजन के साधनों को दर्शाती हैं। क्षेत्र की उपजाऊ भूमि और पशुपालन ने यहाँ के लोगों को समृद्ध किया और समुद्री व्यापार में सक्षम बनाया।
कार्बन डेटिंग के अनुसार कीलाडी की सभ्यता लगभग 2160 साल (द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व) पुरानी है। लेकिन 2019 में तमिलनाडु राज्य पुरातत्व विभाग की एक रिपोर्ट में बताया गया कि यहाँ की सांस्कृतिक परतें छठी से पहली शताब्दी ईसा पूर्व के बीच की हैं। अमेरिका भेजे गए छह नमूनों में से एक नमूने को 353 सेंटीमीटर गहराई से लिया गया था। इस पर तारीख 580 ईसा पूर्व पाई गई। इसका अर्थ यह है कि कीलाडी की सभ्यता पहले माने गए समय से लगभग 300 साल पुरानी है।
इससे संगम युग की शुरुआत अब लगभग 800 ईसा पूर्व मानी जा सकती है, जो पहले के 300 ईसा पूर्व के अनुमान से कहीं पहले है। संगम युग तमिल इतिहास में साहित्य और संस्कृति के उत्कर्ष का काल माना जाता है और कीलाडी से मिले साक्ष्य इस युग की ऐतिहासिकता को पुष्ट करते हैं।
यहाँ के भवनों की दिशा चारों दिशाओं के अनुसार तय की गई थी, जिससे नगर नियोजन की समझ दिखाई देती है। बर्तनों पर ब्राह्मी लिपि में लेख मिलना यह दर्शाता है कि उस समय कीलाडी के लोग साक्षर थे। सूरज और चाँद की आकृतियाँ यह संकेत देती हैं कि वे खगोल विज्ञान के ज्ञान से भी परिचित थे।
कीलाडी में मिले कुछ प्रतीक सिंधु घाटी सभ्यता से मिलते-जुलते हैं। हालाँकि दोनों के बीच लगभग 1000 वर्षों का अंतर है, इसलिए इस संबंध पर और शोध की आवश्यकता है। तमिलनाडु राज्य पुरातत्व विभाग के अनुसार कीलाडी एक पूर्ण रूप से विकसित नगरीय सभ्यता थी, जहाँ ईंटों से बने भवन, शिल्पकला, घरेलू और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के प्रमाण मिलते हैं।
इसने स्पष्ट रूप से यह सिद्ध किया कि तमिलनाडु में प्रारंभिक ऐतिहासिक काल में नगरीय जीवन और बस्तियाँ मौजूद थीं। कीलाडी ने न केवल तमिल संगम साहित्य की प्रामाणिकता को बल दिया बल्कि दक्षिण भारत के इतिहास को भी और पीछे ले जाकर समृद्ध किया।
रामकृष्ण की खोज और उनका ट्रांसफर
कीलाडी की खुदाई की शुरुआत 2014 में पुरातत्वविद् अमरनाथ रामकृष्ण की अगुवाई में हुई थी। उन्होंने 2014 से 2016 के बीच पहले दो चरणों की खुदाई करवाई और इस दौरान मिली जानकारी को 982 पन्नों की रिपोर्ट में संकलित किया। इस रिपोर्ट को उन्होंने ASI की महानिदेशक वी. विद्यावती को सौंपा। इस रिपोर्ट के बारह अध्यायों में खुदाई के उद्देश्यों और उसके ऐतिहासिक महत्व को समझाया गया।
एक अलग अध्याय में अमेरिका के फ्लोरिडा स्थित बीटा एनालिटिकल लैब में 23 नमूनों की AcceleratorMass Spectrometry (AMS) तकनीक से की गई कार्बन डेटिंग का विवरण दिया गया। इस अध्याय में पौधों और जानवरों के अवशेषों के विश्लेषण और अन्य विश्वविद्यालयों से मिली जानकारियों के आधार पर कीलाडी की सभ्यता की समय-सीमा तय की गई।
केवल पहले दो चरणों में करीब 5,800 वस्तुएँ मिली थीं, जिससे यह स्थान ऐतिहासिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ। लेकिन इसके बाद अमरनाथ रामकृष्ण का तबादला असम कर दिया गया। इसे कई लोगों ने खुदाई कार्य में एक बड़ा झटका माना।
आलोचकों ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया कि उन्होंने खुदाई को जानबूझकर रोकने की कोशिश की। ऐसा इसलिए क्योंकि पहले खुदाई के लिए फंड और सहयोग देने का वादा किया गया था, लेकिन फिर उसे टाल दिया गया। इस बीच, खुदाई का तीसरा चरण शुरू हो चुका था, जिसकी जिम्मेदारी पुरातत्वविद् पी.एस. श्रीरामन को दी गई। तीसरे चरण में 400 वर्ग मीटर तक खुदाई करने के बाद श्रीरामन ने कहा कि पहले मिले ईंटों के निर्माण में कोई निरंतरता नहीं पाई गई।
इस बयान के बाद तमिलनाडु में यह आरोप लगे कि केंद्र सरकार कीलाडी की ऐतिहासिकता को कमतर दिखाने की कोशिश कर रही है। इस मामले ने राजनीतिक रूप भी ले लिया और तमिल राजनीति में अक्सर उठने वाले उत्तर भारत-विरोधी भावनाओं को इससे जोड़ा जाने लगा।
ASI को रोके जाने के बाद तमिलनाडु सरकार ने शुरू की खुदाई परियोजना, मिलीं 13,000 वस्तुएँ
कीलाडी खुदाई स्थल पर ASI ने तीसरे चरण के बाद खुदाई को यह कहकर रोक दिया था कि कोई विशेष खोज नहीं हुई है। लेकिन 2017 में तमिलनाडु राज्य पुरातत्व विभाग ने खुदाई का काम सँभाला और तब से अब तक हजारों पुरावशेष मिल चुके हैं। अप्रैल 2023 में मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने खुदाई के नौवें चरण की शुरुआत की थी। यह सितंबर 2023 में पूरा हुआ।
अब तक राज्य पुरातत्व विभाग 13,000 से अधिक वस्तुएँ खोज चुका है, और कार्बन डेटिंग से यह पता चला है कि यह क्षेत्र लगभग 580 ईसा पूर्व से 200 ईस्वी के बीच सक्रिय था। वर्ष 2024-2025 में खुदाई का दसवाँ चरण भी शुरू हो चुका है, जिसमें सैकड़ों और प्राचीन वस्तुएँ मिली हैं।
हाल ही में कीलाडी खुदाई स्थल की तीसरी खाई (ट्रेंच) में एक नई 30 फीट लंबी संरचना मिली है, जबकि पहले ASI ने इस क्षेत्र में कोई बड़ी खोज की संभावना को नकार दिया था। यह संरचना जमीन से 90 सेंटीमीटर नीचे पश्चिमी हिस्से में मिली और इसकी लंबाई लगभग 10 मीटर आँकी गई है। यह पूर्व-पश्चिम दिशा में बनी है।
इस संरचना में जो ईंटें इस्तेमाल हुई हैं, वे कीलाडी की दूसरी खोजों में मिली ईंटों के जैसी ही हैं। यह समानता इस खोज की प्रामाणिकता को और मजबूत करती है। इतिहास के प्रोफेसर वी. मरप्पन (प्रेसीडेंसी कॉलेज) के अनुसार, पहले की टीम ने यह अनुमान लगाया था कि यह क्षेत्र कभी औद्योगिक क्षेत्र रहा होगा।
उन्होंने यह भी कहा, “नई खोजों से यह सवाल उठता है कि क्या अभी भी जमीन के नीचे के कई हिस्से खुदाई की प्रतीक्षा कर रहे हैं।” खुदाई करने वाले पुरातत्वविदों का मानना है कि यह संरचना संभवतः किसी कार्यशाला या औद्योगिक इमारत की हो सकती है।
मद्रास हाई कोर्ट का हस्तक्षेप
कीलाडी में चल रही पुरातत्विक खुदाई के मामले में कुछ समय के लिए मामला कोर्ट तक पहुँच गया। इस दौरान मद्रास हाई कोर्ट के जजों ने भी खुदाई स्थल का दौरा किया और ASI को खुदाई जारी रखने का आदेश दिया। साथ ही तमिलनाडु पुरातत्व विभाग को खुदाई में शामिल होने की अनुमति भी दी गई।
तमिलनाडु का पुरातत्व विभाग तीसरे चरण से खुदाई में सक्रिय रूप से शामिल रहा। इसके कारण पूरी घटना ने एक महत्वपूर्ण मोड़ ले लिया। 2019 में मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने यह फैसला सुनाया कि खुदाई को रोका नहीं जाना चाहिए क्योंकि इससे तमिल सभ्यता के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियाँ सामने आई हैं।
जस्टिस डी. कृष्णकुमार और जस्टिस आर. विजयकुमार की पीठ ने कहा कि खुदाई से जनता को तमिल सभ्यता के बारे में और जानकारी मिलेगी, इसलिए संबंधित अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि खुदाई में कोई रुकावट न आए। कोर्ट ने केंद्र सरकार को आदेश दिया कि पुरातत्वविद् अमरनाथ रामकृष्ण को 15 दिनों के भीतर तमिलनाडु वापस भेजा जाए ताकि वह खुदाई का कार्य जारी रख सकें। उन्हें राज्य वापस बुलाए जाने के बाद जनवरी 2023 में खुदाई के पहले दो चरणों की रिपोर्ट पेश की गई।
2023 में ही मदुरै निवासी पी. प्रभाकर पांडियन की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने केंद्र को नोटिस जारी की और कहा कि ASI की पहले दो चरणों की रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। उसी साल कोर्ट ने राज्य और केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वे खुदाई से संबंधित डाली गईं कई जनहित याचिकाओं पर जवाबी हलफनामे दाखिल करें।
इनमें 2016 और 2017 की वे याचिकाएँ भी शामिल थीं जिनमें खुदाई को बंद करने के बजाय उसे आगे कैसे बढ़ाया जाए, इस पर मार्गदर्शन माँगा गया था। एक याचिका में सरकार से कीलाडी में ‘साइट म्यूजियम’ बनाने की माँग की गई थी। इसके बाद मार्च 2023 में मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने दो एकड़ में बने 18.43 करोड़ की लागत वाले कीलाडी संग्रहालय का उद्घाटन किया।
2016 में कोर्ट ने ASI को खुदाई में मिले अवशेषों के वैज्ञानिक परीक्षण के लिए देहरादून स्थित प्रयोगशाला ले जाने की अनुमति दी। हालाँकि साथ ही यह भी कहा कि राज्य के पुरातत्व आयुक्त को इसकी जानकारी पहले दी जाए। आयुक्त को निर्देश दिया गया कि वे वस्तुओं के वीडियो और फोटो लें और ASI को आदेश दिया गया कि परीक्षण के बाद सभी अवशेष तमिलनाडु वापस लाए जाएँ और कोर्ट को रिपोर्ट सौंपी जाए।
केंद्र और तमिलनाडु सरकार के बीच छिड़ा विवाद
जनवरी 2023 में पुरातत्वविद अमरनाथ रामकृष्ण ने कीलाडी खुदाई पर तैयार 982 पन्नों की एक अंतिम रिपोर्ट सौंपी थी। इससे पहले उन्होंने 2016 और 2017 में प्रारंभिक और अंतरिम रिपोर्ट्स भी दी थीं। यह रिपोर्ट लगभग ढाई साल तक ASI के पास रही। उसके बाद ASI ने रामकृष्ण को इसे संशोधित करने के लिए कहा।
ASI ने रिपोर्ट में दिये गए कुछ कालखंडों और निष्कर्षों की वैज्ञानिक पुष्टि पर सवाल उठाए। ASI ने कहा कि प्रारंभिक काल यानी 8वीं सदी ईसा पूर्व से 5वीं सदी ईसा पूर्व के दावे के लिए ठोस प्रमाण नहीं दिये गए हैं। संस्था ने कहा कि सिर्फ गहराई का जिक्र करना पर्याप्त नहीं, परत (लेयर) नंबर भी देना जरूरी है ताकि तुलनात्मक अध्ययन किया जा सके।
ASI ने कहा कि रिपोर्ट्स में तारीखें जिस तरह से दी गई हैं, उन्हें और वैज्ञानिक रूप में पेश करने की जरूरत है। लेकिन अमरनाथ रामकृष्ण ने रिपोर्ट में कोई बदलाव करने से इंकार कर दिया। उन्होंने कहा कि उनका शोध वैज्ञानिक मानकों पर आधारित है और उसमें मैटीरियल कल्चर (सामग्री संस्कृति), परत दर परत विश्लेषण और AMS (Accelerator Mass Spectrometry) जैसे वैज्ञानिक तरीकों से तारीखों की पुष्टि की गई है।
इस विवाद ने राजनीतिक रंग भी ले लिया। तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK), विदुथलै चिरुथैगल काच्ची (VCK) और इतिहासकार आर. बालकृष्णन ने ASI के कदम को तमिल संस्कृति को दबाने की कोशिश बताया। उनका आरोप था कि केंद्र सरकार कीलाडी की ऐतिहासिकता को राजनीतिक कारणों से नहीं मान रही है।
वहीं केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि रिपोर्ट को मान्यता देने से पहले और वैज्ञानिक प्रमाण जरूरी हैं। उन्होंने कहा कि सिर्फ एक खोज से पूरे ऐतिहासिक विमर्श को नहीं बदला जा सकता। उनका कहना था कि तमिलनाडु भारत का अहम हिस्सा है और उसका इतिहास विज्ञान के आधार पर सम्मानित होना चाहिए, न कि भावनात्मक राजनीति के जरिए।
शेखावत ने यह भी सवाल उठाया कि क्या यह विवाद इसलिए बढ़ा है, क्योंकि तमिलनाडु सरकार केंद्र के साथ सहयोग करने को तैयार नहीं है? उन्होंने कहा, “ऐसे पदों पर बैठे लोग अगर क्षेत्रीय भावनाएँ भड़काएँगे, तो यह उचित नहीं होगा। हमें विशेषज्ञों को फैसला लेने देना चाहिए, न कि नेताओं को।”
तमिलनाडु के पुरातत्व मंत्री थंगम थेनारासु ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार तमिलों के साथ निचले दर्जे के नागरिकों जैसा व्यवहार कर रही है। उन्होंने कहा, “दो साल तक रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया, कोई फंड नहीं दिया गया, और अब कहा जा रहा है कि पर्याप्त सबूत नहीं हैं।”
MDMK नेता वायको ने आरोप लगाया कि केंद्र एक ‘काल्पनिक संस्कृत सभ्यता’ को बढ़ावा देना चाहता है और तमिल सभ्यता को दबा रहा है। मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने भी सोशल मीडिया पर लिखा, “हमें नहीं बदलना है, बदलनी हैं कुछ सोच। हम तमिलों ने हजारों वर्षों से हर रुकावट का सामना किया है और विज्ञान की मदद से अपने इतिहास को साबित किया है।”
मदुरै से CPI (M) के सांसद एस. वेंकटराजन ने कहा कि रामकृष्ण को रिपोर्ट लिखने से रोका गया, उन्हें ट्रांसफर किया गया और वे कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद ही रिपोर्ट तैयार कर सके। उन्होंने कहा कि ASI ने संसद और कोर्ट में कहा था कि 11 महीने में रिपोर्ट प्रकाशित होगी, लेकिन वह वादा भी पूरा नहीं हुआ। उनका आरोप था, “यह सिर्फ एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि तमिलनाडु और दक्षिण भारतीय इतिहास पर हमला है।”
रामकृष्ण की रिपोर्ट के समय तमिलनाडु में ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK) की सरकार थी। AIADMK ने लंबे समय तक इस विवाद पर चुप्पी साधे रखी। लेकिन 18 जून को उसके वरिष्ठ नेता आर.बी. उधयकुमार ने कहा कि केंद्र सिर्फ और वैज्ञानिक प्रमाणों की माँग कर रहा है। उन्होंने कहा कि अगर रिपोर्ट खारिज की जाती है, तो उनकी पार्टी सबसे पहले विरोध करेगी।
DMK ने AIADMK पर भी निशाना साधा और कहा कि उन्होंने केंद्र के आगे झुककर तमिल पहचान से समझौता किया है। AIADMK के एक और वरिष्ठ नेता माफोई पंडियाराजन ने खुद को ‘कीलाडी नायकर’ कहकर तमिल पुरातनता को सिद्ध करने का श्रेय लिया, लेकिन DMK नेताओं ने इसे दिखावा कहा और आरोप लगाया कि AIADMK ने गठबंधन की राजनीति को तमिल गौरव से ऊपर रखा।
केंद्र सरकार ने माँगी उत्खनन रिपोर्ट
ASI ने सेवानिवृत्त अधीक्षण पुरातत्वविद् पी. एस. श्रीरामन से कीलाडी खुदाई के तीसरे चरण की आधिकारिक रिपोर्ट तैयार करने को कहा है। वर्ष 2017 में रामकृष्ण के अचानक तबादले के बाद श्रीरामन को यह खुदाई सौंपी गई थी, लेकिन उस चरण में कोई बड़ी खोज नहीं हुई थी।
श्रीरामन वर्ष 2019 में रिटायर हो गए थे। अब उन्हें ASI ने अनुमति दी है कि वे अपने कार्यकाल के दौरान किए गए कीलाडी और कोडुमनाल खुदाई कार्यों की रिपोर्ट तैयार करें। उन्होंने ‘द हिंदू’ को बताया कि वे चेन्नई स्थित ASI कार्यालय से रिपोर्ट तैयार करेंगे क्योंकि खुदाई से जुड़ा सारा रिकॉर्ड और सामग्री वहीं पर है। उन्होंने कहा, “चूंकि मैं सेवानिवृत्त हो चुका हूँ, दोनों रिपोर्टें लंबित थीं। मैंने ASI से सामग्री तक पहुँच की अनुमति माँगी थी और वह अब मिल गई है। मैं जल्द ही रिपोर्ट तैयार करना शुरू करूँगा।”
श्रीरामन को 2017-18 में कोडुमनाल में भी एक सीजन तक खुदाई कार्य का अनुभव है। कोडुमनाल, नॉयल नदी के उत्तर तट पर इरोड जिले में स्थित है। पुरातत्व विशेषज्ञों के अनुसार, कोडुमनाल को दो सांस्कृतिक कालों, प्रागैतिहासिक युग और मेगालिथिक युग में बाँटा जा सकता है। उस समय के लोग कुशल कारीगर थे, टिकाऊ ढाँचे बनाते थे और कई देशों से व्यापार करते थे।
डेक्कन हेराल्ड से बातचीत में श्रीरामन ने कहा, “मैंने रिपोर्ट पूरी करने के लिए ASI से औपचारिक अनुमति माँगी है। ASI ने मुझे निर्देश दिया है कि इसे जल्द से जल्द पूरा करूँ। मैं कोडुमनाल की रिपोर्ट पर ज्यादा ध्यान दे रहा हूँ क्योंकि वह मेरी व्यक्तिगत कार्य था, जबकि कीलाडी में मेरा कार्यकाल सीमित था और यह पहले से चल रहे कार्य का हिस्सा था।”
यह घटनाक्रम तब सामने आया है जब एक महीने पहले ASI ने रामकृष्ण को उनके द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट में विशेषज्ञों की सिफारिशों के अनुसार बदलाव कर दोबारा जमा करने के लिए कहा था।
भारत के इतिहास में नया सवेरा: समानांतर सभ्यता के निशान
तमिलनाडु के कीलाडी पुरातत्व स्थल ने राज्य के इतिहास का एक नया अध्याय सामने रखा है। अमेरिका की बीटा एनालिटिक्स (Beta Analytics) लैब द्वारा की गई रेडियोकार्बन डेटिंग से यह पता चला कि यहाँ से मिली एक वस्तु 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व की है। यह समय वही है जब गंगा घाटी में भारत का दूसरा शहरीकरण शुरू हो रहा था।
तमिलनाडु राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा 2017-18 से अब तक 29 वस्तुओं की रेडियोकार्बन डेटिंग करवाई गई है। सबसे पुरानी वस्तु 580 ईसा पूर्व की पाई गई है और सबसे नई 200 ईस्वी की। इसका मतलब है कि यह इलाका लगभग 800 वर्षों तक एक जीवंत शहरी और औद्योगिक सभ्यता का केंद्र था।
यहाँ संगम युग (Sangam Age) की बड़ी ईंटों से बनी इमारतें मिली हैं, जो संगम साहित्य में वर्णित शहरी विकास की पुष्टि करती हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार पुरातत्वविद् के. राजन ने बताया कि ईंट की इमारतों के ऊपर की परतों से मिली चीजें तीसरी सदी ईसा पूर्व के बाद की हैं, जबकि नीचे की परतें छठी सदी ईसा पूर्व तक जाती हैं।
कीलाडी के पास कोन्डगई (Kondagai) में एक कब्र स्थल से एक मानव खोपड़ी मिली है। आधुनिक 3D तकनीक और खोपड़ी की माप के जरिये वैज्ञानिक उस व्यक्ति का चेहरा, उम्र, खानपान, और लिंग जानने की कोशिश कर रहे हैं। राजन ने बताया कि यह सब दर्शाता है कि कीलाडी भी गंगा घाटी की तरह ही एक प्राचीन शहरी सभ्यता का हिस्सा था। 29 डेटिंग में से 12 नमूने अशोक के समय से भी पहले के हैं।
भारत और विदेश के 20 से अधिक शोध संस्थान कीलाडी पर शोध कर रहे हैं, जैसे लिवरपूल यूनिवर्सिटी (UK), यूनिवर्सिटी ऑफ पीसा (Italy), फील्ड म्यूजियम (Chicago), फ्रेंच इंस्टिट्यूट ऑफ पांडिचेरी, IIT गांधीनगर, और डेक्कन कॉलेज। कीलाडी में खुदाई के दौरान बैल, भैंस, बकरी, गाय, कुत्ते, सूअर, हिरण और अन्य जानवरों की हड्डियाँ भी मिली हैं। डेक्कन कॉलेज में इनका विश्लेषण चल रहा है। मदुरै कामराज यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक प्राचीनमानव और पशु DNA का अध्ययन कर रहे हैं ताकि यहाँ के लोगों के जीवन और प्रवास के बारे में और जानकारी मिल सके।
पुरातत्व विभाग के संयुक्त निदेशक आर. शिवानंदम ने बताया कि इतने अधिक नमूनों की डेटिंग से यह साफ है कि कीलाडी एक साक्षर समाज था, जहाँ कारीगर रहते थे और यह एक औद्योगिक केंद्र था। यह जगह मदुरै होते हुए पूर्वी तट के अलागनकुलम और पश्चिमी तट के मुजिरिस बंदरगाह को जोड़ने वाले प्राचीन व्यापार मार्ग पर स्थित थी।
हालाँकि इस बस्ती का प्राचीन नाम अभी तक ज्ञात नहीं है। संगम साहित्य में नगरों, सड़कों, महलों, गहनों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार का वर्णन मिलता है। कीलाडी की खोज से यह साफ हो गया है कि संगम साहित्य केवल कल्पना नहीं बल्कि वास्तविक जीवन का चित्रण था।
यहाँ से मिट्टी और हाथी दाँत के पासे भी मिले हैं, जो संगम साहित्य के ‘कलीथोगई’ ग्रंथ में वर्णित हैं। राजन ने यह भी बताया कि कीलाडी ही नहीं, बल्कि कोडुमनाल, पोरुन्थल, सिवगलाई, आदिचनाल्लूर और कोरकाई जैसे अन्य स्थल भी छठी सदी ईसा पूर्व के हैं। कोरकाई से तो 785 ईसा पूर्व की भी एक तिथि मिली है, जो दिखाता है कि उस समय तमिल क्षेत्र में नगरीकरण व्यापक रूप से फैला हुआ था।
कीलाडी में 110 एकड़ के क्षेत्र में अब तक सिर्फ 4% खुदाई हुई है। राज्य सरकार आगे और खुदाई कराएगी और यहाँ एक ऑन-साइट म्यूजियम भी बनाएगी, जो देश का पहला ऐसा संग्रहालय होगा।
पुरातत्वविद् बालकृष्णन ने कहा, “तमिलनाडु में लंबे समय से पुरातत्व की उपेक्षा होती रही, लेकिन कीलाडी ने तमिल समाज में नई जागरूकता पैदा की है।” राजन ने अंत में कहा, “कीलाडी वह पहली साइट है जिसने तमिलनाडु में पुरातत्व की सोच ही बदल दी है।”
कीलाडी से प्राप्त चेहरे
मदुरै कामराज विश्वविद्यालय और ब्रिटेन की लिवरपूल जॉन मूर्स यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों ने मिलकर एक अनोखा फॉरेंसिक फेस रिकंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट किया, जिसमें उन्होंने करीब 2500 साल पहले के दो व्यक्तियों के चेहरे फिर से बनाए। ये दोनों कंकाल तमिलनाडु के कीलाडी क्षेत्र के पास कोंडगई में पाए गए थे। यह एक प्राचीन कब्रिस्तान है और मुख्य खुदाई स्थल से 800 मीटर दूर स्थित है।
चेहरे के लक्षणों को देखकर वैज्ञानिकों ने बताया कि इन लोगों के चेहरे दक्षिण भारतीय जैसे थे, लेकिन उनमें प्राचीन ऑस्ट्रो-एशियाटिक जनजातियों और पश्चिम ईरानी (ईरान क्षेत्र के शिकारी) समुदाय के भी कुछ संकेत मिले हैं। इससे पता चलता है कि उस समय के तमिल लोगों का मिश्रित वंश (genetic ancestry) रहा होगा। हालाँकि वैज्ञानिकों ने कहा है कि और अधिक DNA रिसर्च की जरूरत है ताकि वंश के बारे में पक्के तौर पर बताया जा सके।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार लिवरपूल यूनिवर्सिटी के फेस लैब की निदेशक प्रोफेसर कैरोलाइन विल्किंसन ने बताया कि उन्होंने कंप्यूटर की मदद से एक 3D फेशियल रिकंस्ट्रक्शन सिस्टम का इस्तेमाल किया, जिससे खोपड़ी की संरचना और माँसपेशियों के आधार पर चेहरे तैयार किए गए। हालाँकि दोनों खोपड़ियों के निचले जबड़े गायब थे, इसलिए उन्होंने सिर की नाप और आकार के आधार पर दाँतों और जबड़े की बनावट का अनुमान लगाया।
मदुरै कामराज विश्वविद्यालय में जेनेटिक्स विभाग के प्रोफेसर जी. कुमारेशन ने कहा, “ये प्रक्रिया 80% विज्ञान और 20% कला है।” उन्होंने बताया कि DNA की जानकारी और ये बनाए गए चेहरे संगम काल के समय के तमिल लोगों की नस्ल और पहचान समझने में मदद कर सकते हैं।
भारत की सभ्यता यात्रा में महत्वपूर्ण क्षण
यहाँ पर एक 90 x 60 मीटर क्षेत्र में खुदाई की गई है, जहाँ पासे, अज्ञात ताँबे के सिक्के, काँच, शंख, हाथीदाँत, मोती, मिट्टी के मनके, मुहरें और सोने की सजावटी वस्तुएँ मिली हैं। यह क्षेत्र तमिलनाडु के कुछ गिने-चुने स्थानों में से एक है जैसे कि अरिकामेडु, कावेरीपट्टिनम और कोरकाई। यहाँ विभिन्न प्रकार की संरचनाएँ पाई गई हैं, जैसे कि जटिल ईंटों से बनी इमारतें, टैंक जैसी जल निकासी प्रणाली, दोहरी दीवार वाले भट्ठी और टेराकोटा के कुएँ।
ये खोजें यह दर्शाती हैं कि यहाँ एक समृद्ध, शिक्षित और उन्नत शहरी सभ्यता थी। इससे यह भी पता चलता है कि भारत की सभ्यता केवल गंगा घाटी तक सीमित नहीं थी, बल्कि उत्तर और दक्षिण दोनों क्षेत्रों में अनेक प्राचीन और विकसित समुदाय बसे हुए थे। इसके अलावा इन खोजों से यह भी साफ होता है कि उस समय के लोग बाहरी दुनिया से भी जुड़े हुए थे।
इन बातों से यह साबित होता है कि भारत की सभ्यता की जड़ें बहुत गहरी हैं। यह उन मिथकों को भी खारिज करता है जो कहते हैं कि भारत में विदेशी आकर बसे और सभ्यता की शुरुआत की। इसके विपरीत यह स्पष्ट होता है कि भारत में पहले से ही उन्नत नगर नियोजन, व्यापार, मनोरंजन और एक जीवंत सांस्कृतिक जीवन था।
इस तरह की खोजें न केवल गर्व का विषय हैं बल्कि हमारे अतीत को समझने, उसकी निरंतरता को महसूस करने और हमारी सांस्कृतिक पहचान को जानने में भी मदद करती हैं। हमारे पूर्वजों की सोच और उन्होंने जिस तरह के समाज को बनाया और सदियों तक सँजोया, वे वास्तव में प्रशंसा के पात्र हैं।
कीलाडी अब इतिहासकारों, पुरातत्वविदों, शिलालेख विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया है। यहाँ की खोजों ने कई शोधों को प्रेरित किया है और यह जगह अब धीरे-धीरे विश्व के प्रमुख पुरातात्विक स्थलों में अपनी जगह बना रही है
इस खबर को मूल रूप से अंग्रेजी में रुकमा राठौर ने लिखा है। इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें। इसका अनुवाद किया है सौम्या सिंह ने।
बलरामपुर में अवैध धर्मांतरण रैकेट के सरगना जलालुद्दीन उर्फ छांगुर पीर और उसकी सहयोगी नीतू उर्फ नसरीन की गिरफ्तारी के बाद सनसनीखेज खुलासे हो रहे हैं। ED ने कार्रवाई करते हुए 14 ठिकानों पर छापेमारी की है। इसमें यूपी के बलरामपुर के 12 और मुंबई के 2 ठिकाने शामिल हैं।
इस बीच, नसरीन और गुलाम रब्बानी के बीच दुबई पैसे भेजने की साजिश का भी पर्दाफाश हुआ है, जो इस रैकेट के इंटरनेशनल कनेक्शन को उजागर करता है। ED को छांगुर पीर के UAE में 5 विदेशी खाते भी मिले हैं।
ED की जाँच में पता चला कि छांगुर पीर के 30 में से 18 बैंक खातों में ₹68 करोड़ का ट्रांजैक्शन हुआ। 3 महीने में 7 करोड़ की विदेशी फंडिंग खातों में आई। नवीन के बैंक खाते से शहजाद शेख के खाते में ₹2 करोड़ ट्रांसफर किए गए थे। शहजाद शेख से ED पूछताछ कर रही है।
#WATCH उत्तर प्रदेश | छांगुर धर्मांतरण मामले में प्रवर्तन निदेशालय 14 परिसरों की तलाशी ले रहा है, जिनमें उत्तर प्रदेश के बलरामपुर के उतरौला में 12 और मुंबई में 2 परिसर शामिल हैं।
गुलाम रब्बानी की मदद से होता था करोड़ों का ट्रांसफर
गिरोह की गतिविधियों से जुड़े आतंकी नेटवर्क के दस्तावेज मिले हैं। एक बड़ी इमारत को आतंकी ट्रेनिंग कैंप के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा था। हालाँकि यह अभी स्पष्ट नहीं हुआ है कि वह इमारत कहाँ है।
यूपी ATS की पूछताछ में सामने आया है कि नसरीन ने अपनी गिरफ्तारी से पहले सारी जमीन गुलाम रब्बानी की मदद से हिबानामा (गिफ्ट डीड) के जरिए ट्रांसफर करने की योजना बनाई थी। इसका मकसद करोड़ों की रकम को हवाला के जरिए दुबई भेजना था।
नसरीन ने दुबई में अवैध धर्मांतरण का पूरा काम संभाला था। वह दिल्ली-एनसीआर और महानगरों से लड़कियों को दुबई भेजती और वहाँ उनका धर्मांतरण करवाती। जाँच में सामने आया है कि उसने 19 बार दुबई की यात्रा की थी।
छांगुर गैंग से आतंकी कनेक्शन
पूछताछ में नसरीन ने बताया कि छांगुर पीर धर्मांतरण के लिए कई मौलानाओं को बुलाता था, जिनमें दुबई से आने वाले मौलाना भी शामिल थे। छांगुर और नसरीन ने कबूला कि उनका मकसद सिर्फ लव जिहाद नहीं, बल्कि पूरे परिवार का धर्मांतरण कराना था।
छांगुर पीर का नेटवर्क नेपाल बॉर्डर के जरिए विदेशी फंडिंग लाकर मिशनरी संगठनों को देता था। यूपी के बलरामपुर, श्रावस्ती, संतकबीर नगर और महाराजगंज जैसे सीमावर्ती जिलों में 16 ऐसी मिशनरी संस्थाएँ पाई गई हैं।
प्रशासनिक मिलीभगत
2019 से 2024 के बीच बलरामपुर में तैनात एक एडीएम, दो सीओ और एक इंस्पेक्टर की भूमिका भी संदिग्ध है। इन पर छांगुर पीर की गतिविधियों पर जानबूझकर आँख मूंदने का आरोप है। दो तहसीलदार और कई राजस्व कर्मी भी जाँच के दायरे में हैं, जिन्होंने जमीन के कागजों में गड़बड़ी की।
छांगुर पीर ने पुलिसकर्मियों को भारी रकम, गाड़ियाँ और अन्य उपहार देकर मामले को दबाने की कोशिश की थी। इन अधिकारियों के खिलाफ जल्द ही कार्रवाई होने की संभावना है।
महान फिल्म निर्माता सत्यजीत रे के पैतृक निवास को बांग्लादेश में तोड़ने के काम को रोक दिया गया है। अब घर के पुनर्निमाण के लिए एक कमेटी का गठन किया गया है। यह कदम बांग्लादेश में सत्यजीत रे के पैतृक घर को ढहाए जाने को लेकर भारत की प्रतिक्रिया के बाद आई है।
ये घर सत्यजित रे के दादा उपेन्द्र किशोर रे चौधरी की थी। वे एक प्रसिद्ध बांग्ला लेखक थे।
भारत ने जताई चिंता
भारत ने घर को सांस्कृतिक धरोहर करार देते हुए इसे गिराने को लेकर चिंता वक्त की थी। साथ ही बांग्लादेश से कहा था कि इसकी मरम्मत और संरक्षण का जिम्मा भारत सरकार उठाने के लिए तैयार है। बंगाल की राजनीतिक पार्टियाँ भी इस मकान को गिराए जाने का विरोध कर रही हैं।
इनका कहना है कि यह मकान बंगाल के सांस्कृतिक इतिहास से जुड़ा हुआ है। हालाँकि बांग्लादेशी अधिकारियों ने इस इमारत को जर्जर कहते हुए इसे ‘नशेड़ियों का अ्डडा’ बताया था।
एनडीटीवी से बात करते हुए बांग्लादेश के मंत्री फैजल महमूद ने कुछ अलग ही दावा किया है। उनका कहना है कि सत्यजीत रे के दादा उपेन्द्र किशोर रे चौधरी मैमनसिंह वाले घर में कभी नहीं रहे।
उन्होंने कहा, ” वह बगल के किशोरगंज जिले के कोटियाडी में रहते थे। उनका घर का संरक्षण पहले ही किया जा चुका है। हमारी विरासत सूची में 531 संरक्षित इमारतें हैं। यह घर उपेंद्र किशोर राय चौधरी के पूर्वज का है। यह मैमनसिंह प्रशासन की चूक है कि इसे उस विरासत सूची में शामिल नहीं किया गया, इसलिए यह संरक्षित इमारत नहीं थी। “
टैगौर के पैतृक घर को भी तोड़ा गया
दरअसल जब से बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार गई है और जब से अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद यूनुस बने हैं, तभी से बांग्लादेश के कट्टरपंथी अपनी ही विरासत को मिटाने में लगे हैं। इससे पहले महान लेखक रविन्द्रनाथ टैगोर के पैतृक घर में तोड़फोड़ की गई थी।
ये सिराजगंज जिले के शहजादपुर में मौजूद है। यहाँ मुस्लिम भीड़ ने घर के मुख्य हॉल को क्षतिग्रस्त कर दिया। इस दौरान एक अधिकारी पर हमला किया गया और संग्रहालय को अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया।
भारतीय शख्सियतों की विरासत तो छोड़िए बांग्लादेश अपनी विरासत भी संभाल नहीं पा रहा। कट्टरपंथी इस्लामिक भीड़ ने बांग्लादेश के निर्माता शेख मुजीबुर्रहमान की जगह जगह लगी प्रतिमा तोड़ डाली। हिन्दू देवी देवताओं की प्राचीन मूर्तियाँ और मंदिरों को नहीं बख्शा। आज भी इन मंदिरों को तोड़ने, हड़पने की साजिश चल रही है।
सत्यजीत रे का फिल्मों में अमूल्य योगदान
सत्यजीत रे विश्व सिनेमा के बड़े फिल्मकारों में से एक रहे हैं। उनकी फिल्मों ने भारतीय सिनेमा को वैश्विक पहचान दिलाई। वह फिल्म डायरेक्टर होने के साथ-साथ लेखक, संगीतकार और चित्रकार भी थे। रे की फिल्मों में बंगाल की सामाजिक, सांस्कृतिक गहराई है। ये दुनिया के दिलों को छू लेती है।
उन्हें 1992 में ऑस्कर का मानद पुरस्कार मिला जिसे लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड” के नाम से भी जाना जाता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के साथ व्यापार समझौता जल्द होने के आसार जताए हैं। ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका, इंडोनेशिया की तर्ज पर भारत से जल्द ही व्यापार समझौता कर सकता है। ट्रंप का एक मकसद भारत के बाजार में अमेरिकी पहुँच को बढ़ाना भी है।
बहरीन के क्राउन प्रिंस और प्रधानमंत्री सलमान बिन हमद अल खलीफा के साथ ओवल ऑफिस में बुधवार (16 जुलाई 2025) को हुई एक बैठक के दौरान ट्रंप ने कहा, “अमेरिका भारत के साथ जल्द ही ट्रेड डील कर सकता है।” उन्होंने कुछ नए ट्रेड एग्रीमेंट्स की घोषणा करने की बात कही है।
व्यापार समझौते पर बात करते हुए ट्रंप ने कहा कि भारत के साथ ट्रेड डील इंडोनेशिया के साथ हुए करार के जैसा ही होगा। मंगलवार (15 जुलाई 2025) को अमेरिका ने इंडोनेशिया के साथ नए व्यापार समझौते की घोषणा की थी। इसके तहत इंडोनेशिया के सामानों पर अमेरिका में 19% टैरिफ लगेगा। इसके बदले मअमेरिकी वस्तुएँ इंडोनेशिया के बाजारों में अप्रतिबंधित और बिना टैरिफ के उपलब्ध होंगी।
टर्ंप ने कहा, “हम बातचीत कर रहे हैं। सबसे अच्छा ट्रेड जो हम कर सकते हैं वो ये कि हमें एक पत्र भेजकर ये लिखना है कि आप 20, 25,30,35 फीसद का भुगतान करेंगे।”
#WATCH | Washington DC | US President Donald Trump says, "…We have another one (deal) coming up, maybe with India… We're very close to a deal with India where they open it up…"
"… We've brought in over $100 billion. The tariffs haven't kicked in that much, other than… pic.twitter.com/JD2FPiYcFM
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इंडोनेशिया ने अमेरिका से 50 बोइंग जेट, 15 अरब डॉलर (15000 करोड़ रुपए) की ऊर्जा खरीद, 4.5 अरब डॉलर के कृषि उत्पाद खरीदने का करार किया है। इसी की तर्ज पर ट्रंप ने कहा, “भारत इंडोनेशिया की तरह ही काम कर रहा है। ट्रेड डील के साथ ही हमें भारत के बाजार में एंट्री मिलेगी। यहाँ अब तक हमारी पहुँच नहीं थी। अब हमें वहाँ टैरिफ के जरिए प्रवेश मिल रहा है।”
भारत के साथ ट्रेड डील के बीच में ट्रंप ने ‘शायद’ भी जोड़ा। उन्होंने कहा, “कल भी एक समझौता हुआ है। एक और समझौता होने वाला है.. शायद भारत के साथ।” ट्रंप ने आगे कहा कि हमने 100 अरब डॉलर (10 हजार करोड़) का निवेश किया है। अब तक ऑटोमोबाइल, स्टील समेत कुछ क्षेत्रों में हमने टैरिफ अब तक नहीं लगाए हैं।
गौरतलब है कि भारत से वाणिज्य मंत्रालय का एक दल अमेरिका के साथ टैरिफ और ट्रेड डील पर द्विपक्षीय वार्ता के लिए अमेरिका में है। इस बातचीत का एक उद्देश्य वाहन और कृषि संबंधी क्षेत्रों में व्यापार को लेकर आने वाली अड़चनों को समय पर दूर करना है।
अमेरिका भारत के डेयरी समेत कई बाजारों में अपनी पहुँच बनाने को लालायित है। हालाँकि अब तक भारत ने अमेरिका को उन क्षेत्रों में प्रवेश नहीं दिया है।
भोपाल के जहांगीराबाद में एक पुरानी, खामोश बिल्डिंग खड़ी थी। बाहर एक बोर्ड लगा था – ‘सिटी मोंटेसरी स्कूल’। इस सुनसान इमारत में न तो क्लासरूम थे, न कोई शिक्षक। फिर भी इसी नाम पर 29 फर्जी छात्रों की लिस्ट बनाई गई। सरकार से ₹1.65 लाख की छात्रवृत्ति माँगी गई। पैसा भी मिल गया। मगर पढ़ाई कभी नहीं हुई।
ऐसे ही कई स्कूल और मदरसे सिर्फ कागज़ों पर थे। नाम, छात्रों की सूची और बैंक अकाउंट सब फर्जी थे। ये सिर्फ एक ही मकसद से बने थे, केंद्र सरकार की छात्रवृत्ति योजना से पैसा निकालना। कुछ स्कूलों की इमारतें अब दुकानों में बदल चुकी थीं। कुछ पूरी तरह गायब थे। कुछ चल रहे थे, मगर क्लास 5वीं तक। फिर भी उन्होंने 11वीं-12वीं के छात्रों के नाम से फर्जीवाड़ा किया।
इस पूरे नेटवर्क में 40 संस्थान शामिल हैं। इनमें 17 मदरसे भी हैं और 23 मिशनरी स्कूल भी। आँकड़ों के मुताबिक कुल ₹57.78 लाख का गबन हुआ।
ऐसे हुआ फर्जीवाड़ा: स्कूलों के नाम पर खाली इमारतें
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, जाँच में एक चौंकाने वाली बात सामने आई। जिन स्कूलों और मदरसों के नाम पर पैसे निकाले गए, वे असली में थे ही नहीं।
भोपाल के जहांगीराबाद में एक बोर्ड मिला। उस पर ‘सिटी मोंटेसरी स्कूल’ लिखा था। पर जब लोग उस जगह गए तो वहाँ कोई स्कूल नहीं था। सिर्फ एक खाली बिल्डिंग थी। वहाँ पढ़ाई-लिखाई का कोई काम नहीं होता था।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, एक पान वाले ने बताया कि यह बोर्ड दो साल से लगा है। उसने कभी कोई छात्र या टीचर नहीं देखा। इस ‘सिटी मोंटेसरी स्कूल’ ने 29 ऐसे छात्रों के नाम पर ₹1.65 लाख माँगे जो थे ही नहीं।
आगे जाँच में बेरसिया रोड पर एक बड़ी इमारत मिली। इसमें दो और स्कूल थे। एमजे कॉन्वेंट और सेंट डी’सूजा कॉन्वेंट स्कूल। इन स्कूलों ने 11वीं और 12वीं के छात्रों के लिए स्कॉलरशिप माँगी गई थी। लेकिन इन स्कूलों में ये कक्षा नहीं थी।
एमजे कॉन्वेंट ने 30 फर्जी छात्रों के लिए ₹1.7 लाख लिए। सेंट डी’सूजा ने दो छात्रों के लिए ₹11,400 लिए। एमजे कॉन्वेंट के एक कर्मचारी ने कबूल किया कि दिए गए नंबर फर्जी थे।
एक और मामला एंबर्ले कॉन्वेंट स्कूल का है। इसने 33 छात्रों के लिए ₹1.8 लाख का दावा किया। लेकिन यह स्कूल अब है ही नहीं। लिली टॉकीज के पास उसके पुराने पते पर अब एक क्लिनिक और दुकानें हैं। लोगों ने बताया कि वहाँ सालों से कोई स्कूल नहीं चला।
नकली छात्रों के बैंक खाते में पैसे
जानकारी के अनुसार, यह घोटाला बहुत आसान तरीके से किया जाता था। स्कूल और मदरसे झूठे छात्रों की जानकारी ऑनलाइन सरकारी पोर्टल पर डालते थे।
अधिकारी इन आवेदनों को बिना जाँचे ही आगे बढ़ा देते थे। ये आवेदन फिर जिले और राज्य के अधिकारियों से होते हुए केंद्र सरकार तक पहुँचते थे। जब आवेदन पास हो जाता था, तो ₹5,700 हर छात्र के हिसाब से बैंक खाते में आ जाते थे। पर ये खाते छात्रों के नहीं थे। ये स्कूल चलाने वालों के रिश्तेदारों या दोस्तों के थे।
जैसे ही पैसा खाते में आता था, उसे तुरंत निकाल लिया जाता था। इससे धोखाधड़ी को तुरंत पकड़ना मुश्किल हो जाता था।
मदरसे भी शामिल
इस घोटाले में 40 संस्थानों में से 17 मदरसे भी शामिल हैं। इन्होंने भी धोखाधड़ी में बड़ी भूमिका निभाई।
कुछ मदरसों ने लाखों रुपए हड़पे। जैसे- मदरसा मादुल उलूम ने ₹1,28,200 (एक लाख अट्ठाईस हजार दो सौ रुपए) का घोटाला किया। मदरसा दानिकी वसीरुल हयात ने ₹1,09,300 (एक लाख नौ हजार तीन सौ रुपए) हड़पे। होली फील्ड स्कूल ने ₹3,81,900 (तीन लाख इक्यासी हजार नौ सौ रुपए) का गबन किया।
Missionary and Madrasa Scholarship Fraud in MP:
Last month, an investigation was initiated in the minority schools of Bhopal following irregularities in central government scholarships.
It has now come to light that over 40 missionary schools and madrasas have siphoned off… pic.twitter.com/0Wh8QZhhwf
यूनिटी मिशन स्कूल ने ₹3,70,500 (तीन लाख सत्तर हजार पाँच सौ रुपए) का चूना लगाया। एफआर कॉन्वेंट स्कूल ने सबसे ज्यादा ₹5,45,100 (पाँच लाख पैंतालीस हजार एक सौ रुपए) का फर्जीवाड़ा किया। इनमें से कई मदरसे या तो चल नहीं रहे थे, या बड़ी कक्षाओं की पढ़ाई नहीं कराते थे। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या इन मदरसों को सिर्फ सरकारी पैसे लेने के लिए ही बनाया गया था।
मौजूदा जाँच
यह घोटाला तब सामने आया जब पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यक कल्याण बोर्ड ने 17 जून 2025 को शिकायत दर्ज कराई। मध्य प्रदेश राज्य बाल आयोग (MPSCPCR) भी इस मामले की जाँच शुरू करेगा और पूरे राज्य में नजर रखेगा। मंदसौर में भी कुछ मदरसों में गड़बड़ी मिली है।
वहीं, पुलिस ने धोखाधड़ी, जालसाजी और गबन की धाराओं में कानूनी कार्रवाई शुरू की है। यह रिपोर्ट राज्य सरकार और CBI को भी भेजी जाएगी ताकि मामले की और बड़ी जाँच हो सके।
यह घोटाला दिखाता है कि कैसे कुछ संस्थान सरकारी योजनाओं का गलत फायदा उठा रहे हैं। जिन संस्थानों को बच्चों की मदद करनी चाहिए थी, वे ही घोटाला कर रहे हैं। इससे उन छात्रों को नुकसान हुआ है जिन्हें छात्रवृत्ति मिलनी चाहिए थी और करदाताओं का पैसा बर्बाद हुआ है।
मंत्री का बयान
पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक कल्याण राज्य मंत्री कृष्णा गौर ने इस मामले से खुद को अलग कर लिया है। उन्होंने कहा कि यह घोटाला उनके मंत्री बनने से पहले का है।
हालाँकि, उन्होंने यह भी बताया कि विभाग ने जाँच शुरू कर दी है। मंत्री गौर ने भरोसा दिलाया कि दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी। उन्होंने कहा कि ‘किसी को भी छात्रों की छात्रवृत्ति का पैसा हड़पने का हक नहीं है।’ राज्य मंत्री कृष्णा गौर ने यह भी बताया कि सरकार अल्पसंख्यक और पिछड़े वर्गों की भलाई के लिए प्रतिबद्ध है।
आज से लगभग 14 साल पहले देश में कॉन्ग्रेस की अगुवाई वाली UPA सरकार थी। UPA की यह सरकार ‘अल्पसंख्यकों का संसाधनों पर पहला हक़’ वाली नीति पर चलती थी। मुस्लिम तुष्टिकरण की पिच पर रोज चौके-छक्के लगाने की मंशा रखने वाली कॉन्ग्रेस ने इसी दौरान सांप्रदायिक हिंसा बिल से देश का परिचय करवाया था। यह बिल देश की बहुसंख्यक हिन्दू आबादी को दंगाई घोषित करने का दस्तावेज था। तब यह पास नहीं हो पाया था। लेकिन 14 साल बाद ऐसा ही एक बिल कॉन्ग्रेस ने दूसरी शकल में पेश किया है।
कर्नाटक में रोहित वेमुला बिल के नाम से यह नया शिगूफा छेड़ा है। इस बिल के प्रावधानों को लगातार कुछ वैसा ही बताया जा रहा है, जैसा 14 वर्ष पहले सांप्रदायिक हिंसा बिल के प्रावधानों को बताया गया था। जैसे बिना किसी सुनवाई के तब बहुसंख्यक आबादी को दंगाई बताने का प्रयास हो रहा था, वैसे ही अब नए बिल में एक बाद वर्ग के बच्चों को डिफ़ॉल्ट तौर पर शोषक बताने का प्रयास किया गया है। एक बिल माँ सोनिया गाँधी के दौर में आया था, दूसरा उनके बेटे राहुल गाँधी के कहने पर लाया गया है।
जिस कानून से आज मैं इस कर्नाटक के नए कानून की तुलना कर रहा हूँ, इसका मसौदा राष्ट्रीय सलाहकार समिति (NAC) ने बनाया था। यह NAC असल में और कुछ नहीं बल्कि देश की चुनी सरकार के ऊपर की सरकार थी, जिसकी मुखिया सोनिया गाँधी थीं और सदस्यों में योगेन्द्र यादव और हर्ष मांदर जैसे लोग शामिल थे। अगर ये क़ानून बन गया होता तो बहुसंख्यक हिन्दू पीड़ित होकर भी अपराधी की श्रेणी में आते और कथित अल्पसंख्यक दंगे कर के भी पीड़ित कहे जाते। हिन्दुओं को बिना कुछ किए ही सज़ा मिलती।
इस कानून के पास होने के बाद जिस भी इलाके में दंगा हो, वहाँ बहुसंख्यक आबादी ही दोषी मानी जाती। अब इस देश में बहुसंख्यक हिन्दू हैं, तो सब जगह वही दोषी होते। यहाँ तक कि अगर कोई हिन्दू किसी समुदाय विशेष वाले को अपना मकान बेचने से मना कर दे, फिर भी घृणा जैसे आरोप लग जाते। जघन्य अपराध कर के भी दंगाई बच निकलते तो पत्थरबाजी, गोलीबारी और बमबारी करने वालों के लिए ये क़ानून कितने बड़े ढाल का काम करता।
हिन्दुओं के पीड़ित होने के बाद भी उन्हें दोषी माना जाता। पुलिस आपकी सुनवाई तक नहीं करती। अब ये सब ‘गुण’ ‘कर्नाटक के इस नए कानून में मौजूद हैं। कर्नाटक सरकार के इस नए शिगूफा बिल के अनुसार, सामान्य वर्ग के छात्रों को छोड़कर बाकी सभी के लिए, यानी SC, ST, OBC और अल्पसंख्यक समुदाय को ‘अन्याय से बचाने’ के लिए प्रावधान बनाए गए हैं। इसके प्रावधान कहते हैं कि कोई भी पीड़ित या फिर उसके परिवार का व्यक्ति सीधे पुलिस में शिकायत दर्ज कर सकता है और बिना किसी सबूत के आरोप लगाया जा सकता है।
इसके बाद तुरंत एक्शन का भी नए कानून में प्रावधान है। बिल में किसी भी तरह के भेदभाव को गैर-जमानती और संगीन अपराध माना गया है। यानी आरोप लगते ही किसी भी छात्र को दोषी मान लिया जाएगा। अब आपने जो कर्नाटक के नए कानून में पढ़ा और सांप्रदायिक हिंसा बिल के बारे में पढ़ा था, उसमे समानता नजर आई होगी। एक बिल मुस्लिमों के तुष्टिकरण के लिए हिन्दुओं को बिन सुनवाई दोषी बना रहा था, दूसरा छात्रों को बिन सुनवाई दोषी बनाता है।
यानी माँ सोनिया गाँधी जिस स्कीम को लागू करना चाहती थी उसे ही थोड़ा सा मोडिफाई करके अब बेटे राहुल गाँधी ने कर्नाटक में लागू करने का प्रयास किया है। दरअसल, बात यह है कि पहले कॉन्ग्रेस चाहती थी कि वह मुस्लिमों का तुष्टिकरण करके सत्ता हासिल करती रहे। 2014 के बाद देश की राजनीति ऐसी पलटी कि हिन्दू संगठित हो गए, वोटबैंक की राजनीति करने वालों को सर पकड़ना पड़ा। लगातार कई चुनाव हारने के बाद कॉन्ग्रेस को समझ आया कि उसकी राह का रोड़ा यह हिन्दू एकता है।
फिर चाहे जातिगत जनगणना की बात हो, या फिर आरक्षण को 50% से ऊपर ले जाना और अब ये रोहित वेमुला बिल, यह सभी उसकी इसी नीति का एक टूल हैं। कॉन्ग्रेस की प्लेबुक कभी भी बदलती नहीं है। कभी वह शाह बानो तो कभी सांप्रदायिक हिंसा बिल तो कभी रोहित वेमुला के नाम पर बनाए गए कानून के रूप में सामने आती है।
पत्रकारों का एक संगठन है प्रेस क्लब ऑफ इंडिया (PCI)। इस संस्था का एक बार फिर से ‘दर्द’ प्रेस की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए उभर आया है। वजह है- बिहार में प्रोपेगेंडाबाज पत्रकार/यूट्यूबर पर एफआईआर दर्ज होना।
अजीत अंजुम पर ये एफआईआर बिहार में चल रहे मतदाता सूची वेरिफिकेशन के कार्य में बाधा डालने को लेकर दर्ज की गई है। BLO अंसारुल हक अंसारी की शिकायत पर ये एफआईआर बेगुसराय के बलिया थाने में दर्ज की गई है। हक ने बताया है कि अजीत अंजुम कथित रिपोर्टिंग के दौरान इस प्रोपेगेंडा को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे थे कि ‘मुस्लिम मतदाताओं को परेशान किया जा रहा है।’
इस एफआईआर को लेकर प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने कहा है कि अजीत अंजुम जो कुछ भी कर रहे थे वो बतौर पत्रकार उनका ‘पेशेवर कार्य’ है। उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करना लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रेस की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
The Press Club of India and IWPC expresses deep concern over the lodging of a First Information Report (FIR) against senior journalist Ajit Anjum, reportedly in connection with his professional work, covering a series on Special Intensive Revision (SIR) of electoral rolls in… pic.twitter.com/Gu6JyOVVzb
एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने भी प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के तर्ज पर अजीत अंजुम के खिलाफ एफआईआर पर रोना रोया है। बिहार में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) जबसे शुरू हुआ है तभी से इसको लेकर विपक्ष, आंदोलनजीवी, NGO दुष्प्रचार अभियान चला रहे हैं। यह गैंग अपना अभियान लेकर सुप्रीम कोर्ट तक भी गया था। लेकिन देश की शीर्ष अदालत ने SIR पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। इसके बाद से अजीत अंजुम और रवीश कुमार जैसे कथित पत्रकारों की ‘सक्रियता’ काबिले गौर है।
रवीश कुमार ने दैनिक जागरण में प्रकाशित एक खबर का स्क्रीनशॉट एक्स/ट्विटर पर साझा किया है। यह खबर बिहार की मतदाता सूची से 35 लाख से अधिक नाम हटाने से संबंधित है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि जिन लोगों के नाम हटाए जाएँगे, उनमें से 12.56 लाख लोग ऐसे हैं, जो अब जीवित नहीं है। करीब 5.76 लाख लोग ऐसे हैं, जिनका नाम वोटर लिस्ट में एक से अधिक जगह पर दर्ज है। इसके अलावा करीब 17.38 लाख ऐसे लोग हैं, जो अस्थायी तौर पर बिहार से बाहर शिफ्ट हो चुके हैं।
अभी वोटर लिस्ट का ड्राफ्ट बना भी नहीं है,लोगों ने दस्तावेज़ भी नहीं दिए हैं, अपील का मौक़ा तक नहीं मिला है लेकिन जागरण लिख रहा है कि 35 लाख वोटर के नाम काटने की तैयारी। इतनी तैयारी हो चुकी है तो चुनाव क्यों करा रहे हैं, प्रिंट कमांड दीजिए और रिज़ल्ट छाप दीजिए। क्या जागरण की इस… pic.twitter.com/SR6KVOCcZw
रवीश कुमार ने अपने पोस्ट में कहा है, “35 लाख वोटर के नाम काटने की तैयारी है।” लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया है कि 35 लाख लोगों में एक बड़ी संख्या ऐसे लोगों है कि जो अब इस दुनिया में नहीं है। उन्होंने यह नहीं बताया है कि जो जीवित लोग नहीं है, उनका नाम वोटर लिस्ट में नहीं होना चाहिए। इसी तरह यह भी नहीं बताया है कि कोई भी व्यक्ति किसी एक ही जगह का मतदाता हो सकता है।
उन्होंने विपक्ष के प्रोपेगेंडा को हवा देते हुए यह बताने का प्रयास किया है कि चुनाव आयोग मनमर्जी से 35 लाख नाम काट रहा है। इसका कोई वैधानिक/संवैधानिक आधार नहीं है। आगे इसी पोस्ट में उन्होंने लिखा है कि आयोग को अब चुनाव नहीं करवाना चाहिए, सीधे रिजल्ट ही छाप देना चाहिए।
इसी तरह एक अन्य ट्वीट में रवीश कुमार ने एक वीडियो शेयर किया है। जिस वीडियो में लिखा गया है- दरभंगा में बीजेपी की महिला मोर्चा की जिलाध्यक्ष वोटर वेरिफिकेशन में BLO के साथ काम करते पाई गई। इस वीडियो को शेयर करते हुए रवीश कुमार ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से भी सवाल पूछ लिया है।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार क्या इस पर मिसलिडिंग का ठप्पा लगवाएंगे या जवाब देंगे कि यह कैसे हो गया? फिर कोई उनके आयोग पर क्यों भरोसा करे? ज्ञानेश कुमार ने एक प्रेस कांफ्रेंस तक नहीं की है लगता है थाने में बैठ कर FIR लिखवा रहे हैं। यह कैसे हो सकता है? कोई तो आयोग से बोले? https://t.co/aepBGbWIOB
यह बताने की कोशिश की है कि चुनाव आयोग के इस अभियान में सिर्फ बीजेपी नेताओं की सक्रियता है, जबकि हकीकत यह है कि बिहार क तमाम दल SIR अभियान का हिस्सा हैं। मुख्य विपक्षी दल इस 47 हजार से अधिक कार्यकर्ता इस अभियान से जुड़े हुए हैं।
यह जानकारी चुनाव आयोग ने भी साझा की है। इसे गूगल में सामान्य सर्च से भी यह अधिकारिक फैक्ट प्राप्त किए जा सकते हैं। जाहिर है कि रवीश कुमार को भी यह जानकारी होगी। लेकिन जो फैक्ट की बात करे वो रवीश कुमार कैसा!
असल में बिहार में जबसे वोटर वेरिफिकेशन शुरू हुआ है राहुल गाँधी से लेकर तेजस्वी यादव तक, पप्पू यादव से लेकर असदुद्दीन ओवैसी तक इसे पिछड़ा, दलित, मुस्लिम विरोधी अभियान बताने की कोशिश कर रहे हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि इस अभियान से ही यह बात सामने आई है कि बिहार के 4 जिलों कटिहार, पूर्णिया, किशनगंज और अररिया में जनसंख्या से अधिक आधार कार्ड बने हुए हैं।
ये वैसै जिले हैं जो बांग्लादेश की सीमा से सटे हुए हैं। बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुस्लिमों की घुसपैठ को लेकर बदनाम रहे हैं। पिछले कुछ दशकों में इन जिलों की डेमोग्राफी तेजी से बदली है। किशनगंज में तो 70 प्रतिशत तक आबादी अब मुस्लिम हो चुकी है। ये वही किशनगंज है, जहाँ महीने में औसतन 26 से 28 हजार आवेदन निवास प्रमाण पत्र को लेकर किए जाते थे।
लेकिन SIR शुरू होने के बाद जुलाई 2025 के शुरुआती 6 दिनों में ही निवास प्रमाण पत्र बनवाने के लिए किशनगंज 1.28 लाख से अधिक आवेदन आए थे। राज्य के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने ये आँकड़े सार्वजनिक करते हुए कहा था कि इससे पता चलता है कि किशनगंज में बड़ी संख्या में घुसपैठिए मौजूद हैं।
साफ है कि राजद-कॉन्ग्रेस जैसे विपक्षी दल हों या फिर उनके लिए पत्रकार का चोला पहनकर काम करने वाले अजीत अंजुम या रवीश कुमार, वे उसे प्रोपेगेंडा को बार-बार आगे बढ़ा रहे हैं। जिसे सुप्रीम कोर्ट खारिज कर चुका है, जिन भ्रमित दावों का चुनाव आयोग लगातार फैक्ट-चेक कर चुका है, जो दावें जमीनी वास्तविकताओं के आसपास भी नहीं टिकते हैं।
ऐसे में अजीत अंजुम पर कानूनी कार्रवाई से इस गैंग को दर्द होना ही था। PCI ने एक बयान जारी कर जो ‘दर्द’ छलकाया है, वह भी इसका ही प्रतीक है।
ये वही प्रेस क्लब ऑफ इंडिया है, जिसे अर्नब गोस्वामी जैसे पत्रकारों की गिरफ्तारी के बाद न प्रेस की स्वतंत्रता और न अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का खयाल आता है। ये वही प्रेस क्लब ऑफ इंडिया है, जो फिल्म निर्देशक विवेक अग्निहोत्री का ओपन प्रेस कॉन्फ्रेंस रद्द कर देता है, क्योंकि अग्निहोत्री ने ‘द कश्मीर फाइल्स’ जैसी फिल्म बनाकर कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार का सत्य दिखाया था।
वह सत्य जो इस्लाम का कट्टरपंथी और बर्बर चेहरा दिखाती है। वह सत्य जिसे दबाने की लिबरल गैंग पुरजोर कोशिश करता है। वह सत्य जिस पर यह चर्चा तक नहीं चाहता। ऐसा कर उन्हें कभी भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ध्यान नहीं आता।
अजीत अंजुम को लेकर प्रेस क्लब ऑफ इंडिया का ‘दर्द’ चोर-चोर मौसेरे भाई से अधिक कुछ भी नहीं है। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया को न प्रेस की स्वतंत्रता की चिंता है। न पत्रकारों की अभिव्यक्ति की आजादी की चिंता है। वह केवल और केवल अपने एजेंडा को बिहार में बेनकाब होते देख तिलमिला रही है।
कर्नाटक सरकार ने बेंगलुरु हवाई अड्डे के पास देवनहल्ली में प्रस्तावित एयरोस्पेस पार्क के लिए भूमि अधिग्रहण की योजना वापस ले ली है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने मंगलवार (15 जुलाई 2025) को घोषणा की कि यह योजना पूरी तरह से रद्द कर दी गई है और किसी भी किसान को जमीन देने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा।
सरकार ने पहले चन्नारायपटना और आसपास के गाँवों में 1777 एकड़ जमीन अधिग्रहण करने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन किसान शुरू से इसका विरोध कर रहे थे। उनका कहना था कि जमीन उपजाऊ है और यही उनकी आजीविका का जरिया है।
किसानों के 1198 दिनों से चल रहे विरोध के बाद सरकार ने यह फैसला लिया। मुख्यमंत्री ने कहा कि जो किसान जमीन देना चाहते हैं, सरकार उन्हें ज्यादा मुआवजा और विकसित भूखंड देगी। जो किसान खेती जारी रखना चाहते हैं, वे बिना रोकटोक ऐसा कर सकते हैं। यह फैसला किसानों के लिए एक बड़ी जीत मानी जा रही है।
आंध्र प्रदेश ने खुला निमंत्रण दिया
कर्नाटक द्वारा देवनहल्ली में एयरोस्पेस पार्क की योजना रद्द करने के तुरंत बाद, आंध्र प्रदेश ने इस मौके का फायदा उठाने की कोशिश की। आंध्र प्रदेश के मानव संसाधन विकास मंत्री नारा लोकेश ने सोशल मीडिया पर एयरोस्पेस कंपनियों को आंध्र आने का न्योता दिया। उन्होंने कहा कि आंध्र प्रदेश के पास एक आकर्षक एयरोस्पेस नीति है, जिसमें बेहतरीन प्रोत्साहन और 8000 एकड़ से ज्यादा तैयार जमीन मौजूद है, जो बेंगलुरु के पास ही है।
Dear Aerospace industry, sorry to hear about this. I have a better idea for you. Why don’t you look at Andhra Pradesh instead? We have an attractive aerospace policy for you, with best-in-class incentives and over 8000 acres of ready-to-use land (just outside Bengaluru)! Hope to…
उन्होंने कंपनियों से जल्द बातचीत की उम्मीद भी जताई। यह दिखाता है कि आंध्र प्रदेश इस परियोजना को अपने राज्य में लाकर खुद को एयरोस्पेस उद्योग का केंद्र बनाना चाहता है।
आंध्र प्रदेश का बड़ा औद्योगिक विकास
मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के नेतृत्व में आंध्र प्रदेश सरकार रक्षा, एयरोस्पेस और अंतरिक्ष तकनीक जैसे प्रमुख क्षेत्रों में बड़े उद्योगों को आकर्षित करने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रही है। राज्य की तटीय स्थिति, मजबूत बुनियादी ढाँचा और निवेशक-अनुकूल नीतियाँ मिलकर इसे निवेश के लिए एक आकर्षक स्थान बना रही हैं।
हाल ही में नायडू ने केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात की और सुझाव दिया कि उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु के बाद आंध्र प्रदेश को देश का तीसरा रक्षा औद्योगिक गलियारा बनाया जाए।
उन्होंने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) को लड़ाकू विमान AMCA और LCA के निर्माण के लिए जमीन देने की पेशकश की है। नायडू ने राज्य में कई रक्षा और एयरोस्पेस क्लस्टर स्थापित करने की योजना भी बनाई है।
इनमें जग्गय्यापेटा-डोलकोंडा क्षेत्र में गोला-बारूद और मिसाइल निर्माण केंद्र, श्रीहरिकोटा के पास 2000 एकड़ में प्रक्षेपण केंद्र और उपग्रह निर्माण सुविधा, तथा लेपाक्षी-मदकासिरा क्षेत्र में विमान और इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन क्लस्टर शामिल हैं।
राज्य सरकार ने इस दिशा में विशेषज्ञों को भी जोड़ा है, पूर्व DRDO प्रमुख जी सतीश रेड्डी को रक्षा और एयरोस्पेस सलाहकार और पूर्व ISRO अध्यक्ष एस सोमनाथ को अंतरिक्ष तकनीक के मानद सलाहकार के रूप में नियुक्त किया गया है। इसके अलावा, 2 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कृष्णा जिले में एक मिसाइल परीक्षण रेंज की आधारशिला रखी, जिससे भारत की रक्षा रणनीति में आंध्र प्रदेश की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
रक्षा ही नहीं अंतरिक्ष में भी आंध्र प्रदेश अग्रणी
आंध्र प्रदेश सिर्फ रक्षा ही नहीं, बल्कि अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी अग्रणी बनना चाहता है। मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने श्रीहरिकोटा और लेपाक्षी के पास दो ‘अंतरिक्ष शहर’ बसाने की योजना बनाई है।
इन शहरों में उपग्रह निर्माण, प्रक्षेपण यान तैयार करने और अंतरिक्ष अनुसंधान की सुविधाएँ होंगी, जो इसरो और निजी कंपनियों दोनों की जरूरतों को पूरा करेंगी। नायडू ने कहा कि आंध्र प्रदेश उपग्रह निर्माण से लेकर उन्नत अनुसंधान तक हर चीज के लिए पूरी तरह तैयार है और उन्होंने इस योजना में केंद्र सरकार से सहयोग की अपील की है।
यह पहल राज्य के औद्योगिक विकास की एक बड़ी रणनीति का हिस्सा है। नायडू के नेतृत्व में राज्य निवेश संवर्धन बोर्ड ने जून 2024 से अब तक 5 लाख करोड़ की 76 परियोजनाओं को मंजूरी दी है, जिससे हजारों लोगों को रोज़गार मिलेगा।
इसके अलावा आंध्र प्रदेश हरित ऊर्जा के क्षेत्र में भी आगे बढ़ रहा है और पिछले आठ महीनों में 4 ट्रिलियन (4 लाख करोड़) का निवेश आकर्षित कर चुका है। LG इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी कंपनियाँ श्री सिटी जैसे शहरों में अपने प्लांट लगा रही हैं, जिससे राज्य में इलेक्ट्रॉनिक्स और स्मार्ट उपकरणों का निर्माण तेजी से बढ़ रहा है।