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शुद्ध पेट्रोल गायब, E10 का विकल्प नहीं और हर गाड़ी पर E20 का बोझ: एथेनॉल नीति अच्छी, लेकिन आम आदमी को ईंधन चुनने की आजादी क्यों नहीं?

भारत सरकार ने 1 अप्रैल 2026 से देश के हर पेट्रोल पंप के लिए केवल E20 पेट्रोल बेचना अनिवार्य कर दिया है। E20 का मतलब है ऐसा पेट्रोल, जिसमें 20 प्रतिशत एथेनॉल मिला हो और जिसकी न्यूनतम ऑक्टेन रेटिंग 95 हो। बिना एथेनॉल वाला शुद्ध पेट्रोल बाजार से लगभग गायब हो चुका है। केवल कुछ प्रीमियम ब्रांड, जैसे इंडियन ऑयल का XP100, अब भी उपलब्ध हैं। यह 100-ऑक्टेन सुपर-प्रीमियम पेट्रोल है जिसकी कीमत ₹150 प्रति लीटर से ज्यादा है।

इस अचानक और पूरी तरह किए गए बदलाव से कार और दोपहिया वाहन मालिकों में काफी नाराजगी और चिंता है। कच्चे तेल के आयात पर भारत की निर्भरता घटाना और एथेनॉल उत्पादन के जरिए किसानों की मदद करना अच्छे उद्देश्य हैं। लेकिन जिस तरीके से यह नीति लागू की जा रही है यानी लोगों से विकल्प छीनकर एक ही तरह का पेट्रोल सबके लिए अनिवार्य कर दिया गया है, उससे आम नागरिकों के सामने कई समस्याएँ खड़ी हो रही हैं। खासकर उन लोगों के लिए जो हर कुछ साल में अपना वाहन बदलने की स्थिति में नहीं हैं।

पुराने वाहन ज्यादा एथेनॉल वाले पेट्रोल के लिए नहीं बने

यह याद रखना जरूरी है कि भारत में पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने का विचार बिल्कुल नया नहीं है। पिछली UPA सरकार ने E10 कार्यक्रम शुरू किया था, जिसमें पेट्रोल में 10 प्रतिशत एथेनॉल मिलाया जाता था। लेकिन उस समय इसे आज की तरह अनिवार्य नहीं किया गया था। देशभर के पेट्रोल पंपों पर बिना मिलावट वाला शुद्ध पेट्रोल भी मिलता रहा। इस कारण पुराने वाहनों के मालिक 100 प्रतिशत पेट्रोल खरीद सकते थे, अगर उनका वाहन 10 प्रतिशत एथेनॉल वाले पेट्रोल पर भी ठीक से नहीं चल रहा था।

भारत में 2011 के बाद बिके अधिकतर वाहन E10 के अनुकूल हैं। इसलिए ऐसे वाहन E10 पेट्रोल पर बिना किसी बड़ी दिक्कत के चलते रहे। लेकिन अब जब E20 ही हर जगह उपलब्ध एकमात्र पेट्रोल बन गया है और शुद्ध पेट्रोल हटा दिया गया है, तो वही पुराने वाहन और यहाँ तक कि 2022 या 2023 की शुरुआत तक बने कई वाहन भी मुश्किल में आ गए हैं। इसकी वजह यह है कि E20 के अनुकूल अधिकतर वाहन अप्रैल 2023 से ही बाजार में आने शुरू हुए, जब BS6 Phase 2 उत्सर्जन नियम लागू किए गए। इसका मतलब है कि 2011 के बाद और अप्रैल 2023 से पहले बने ज्यादातर वाहन E10 के अनुकूल थे लेकिन उन्हें 20 प्रतिशत एथेनॉल मिले पेट्रोल पर चलाने के लिए नहीं बनाया गया था।

नुकसान और माइलेज को लेकर चिंता

चिंता यह है कि एथेनॉल (भले ही कम मात्रा में हो) उन वाहनों को धीरे-धीरे नुकसान पहुँचा सकता है जिन्हें इसे झेलने के हिसाब से बनाया ही नहीं गया था। एथेनॉल हवा से नमी को आसानी से सोख लेता है। यह नमी पुराने वाहनों के मेटल फ्यूल टैंक, फ्यूल लाइन, इंजेक्टर और दूसरे हिस्सों में जंग और खराबी पैदा कर सकती है। यह रबर की पाइप, प्लास्टिक पार्ट्स, सील और गैसकेट पर भी असर डालता है। जिन वाहनों में कार्बोरेटर है या पुराने फ्यूल सिस्टम हैं, जो एथेनॉल के हिसाब से कैलिब्रेट नहीं किए गए हैं, उनमें एयर-फ्यूल मिक्सचर ज्यादा लीन हो सकता है। इससे पावर कम हो सकती है, इंजन झटके दे सकता है, स्टार्ट होने में दिक्कत आ सकती है और फिल्टर चोक हो सकते हैं।

सरकार ने कुछ अध्ययनों का हवाला देते हुए कहा है कि E20 पुराने वाहनों को नुकसान नहीं पहुँचाता लेकिन उसने कुछ नुकसान की बात स्वीकार भी की है।

माइलेज भी घटता है, क्योंकि एथेनॉल में शुद्ध पेट्रोल की तुलना में ऊर्जा कम होती है। पुराने वाहनों में यह कमी कई बार 3 से 6 प्रतिशत या उससे भी ज्यादा हो सकती है। अप्रैल 2023 के बाद बने नए वाहन E20 के हिसाब से डिजाइन किए गए हैं लेकिन भारतीय सड़कों पर अभी भी बड़ी संख्या में पुराने कार, बाइक और थ्री-व्हीलर चल रहे हैं, जिन्हें ज्यादातर E10 या उससे कम मिश्रण तक के लिए ही प्रमाणित किया गया था। ऐसे वाहनों पर जबरन E20 थोपना गलत है और इससे कई वाहन मालिकों के लिए मरम्मत का खर्च बढ़ेगा और पार्ट्स जल्दी बदलवाने पड़ेंगे।

मिले हुए पेट्रोल पर कोई छूट नहीं

इन तकनीकी समस्याओं के बावजूद सरकार का यह फैसला भी सवाल खड़े करता है कि एथेनॉल मिले पेट्रोल पर कोई छूट या कीमत में कमी नहीं दी जा रही है। एथेनॉल भारत में ही बनता है और आयातित कच्चे तेल की तुलना में सस्ता होता है। इसलिए पेट्रोल में इसे मिलाने से तेल कंपनियों की कुल लागत कम होनी चाहिए। इसके बावजूद पेट्रोल पंप पर कीमत इस तरह कम नहीं हुई कि उपभोक्ताओं को वास्तविक राहत मिले। दूसरी तरफ माइलेज कम होने के कारण अब लोगों को वही दूरी तय करने के लिए ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ रहा है।

आम आदमी दोहरा बोझ उठा रहा है। एक तरफ उसके वाहन को नुकसान होने की आशंका है और दूसरी तरफ प्रति किलोमीटर चलने की वास्तविक लागत बढ़ रही है। इसके बदले उसे कोई मुआवजा या राहत नहीं मिल रही। ऐसा लगता है कि फायदा कहीं और जा रहा है, जबकि कीमत आम नागरिक चुका रहा है।

केंद्र सरकार ने मिश्रित पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी माफ करने का फैसला किया है लेकिन हैरानी की बात यह है कि इसमें E20 पेट्रोल शामिल नहीं है जिसे फिलहाल हर व्यक्ति खरीदने के लिए मजबूर है। यह छूट E22, E25, E27 और E30 फ्यूल ब्लेंड्स पर लागू होती है जिनमें क्रमशः 22 प्रतिशत, 25 प्रतिशत, 27 प्रतिशत और 30 प्रतिशत एथेनॉल मिला होता है। ये मिश्रण अभी बाजार में उपलब्ध नहीं हैं। ये फिलहाल पाइपलाइन में हैं और जल्द लाए जाएँगे।

उपभोक्ताओं को विकल्प मिलना चाहिए

इसका सही समाधान सरल है और कई देशों में पहले से काम कर रहा है। सरकार को बाजार में अलग-अलग एथेनॉल मिश्रण एक साथ उपलब्ध कराने चाहिए जैसे E10, E20, E30 और नए फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के लिए इससे भी ऊँचे ग्रेड। इन्हें पेट्रोल पंपों पर अलग-अलग डिस्पेंसर या विकल्पों के रूप में बेचा जाना चाहिए और इनके दामों में भी अंतर होना चाहिए। जैसे आज लोग अपने वाहन और बजट के हिसाब से रेगुलर और प्रीमियम पेट्रोल चुनते हैं, वैसे ही वाहन मालिकों को यह आजादी होनी चाहिए कि वे अपनी कार या बाइक के लिए उपयुक्त ब्लेंड चुन सकें।

पुराने वाहनों को E10 या उस कम एथेनॉल मिश्रण पर चलते रहने की सुविधा मिलनी चाहिए, जो उनके लिए सुरक्षित हो। नए वाहन चाहें तो ज्यादा एथेनॉल वाले मिश्रण का इस्तेमाल कर सकते हैं, अगर उससे बेहतर प्रदर्शन मिलता हो या किफायती हो तो।

कई देशों में लोगों को अपने वाहन के लिए सही ईंधन चुनने की आजादी है। एक ही पेट्रोल पंप पर अलग-अलग कीमतों पर अलग-अलग मिश्रण उपलब्ध होते हैं, ठीक वैसे ही जैसे हमारे यहाँ आज रेगुलर पेट्रोल, प्रीमियम पेट्रोल और हाई-ऑक्टेन पेट्रोल मिलते हैं। अमेरिका में सामान्य पेट्रोल ज्यादातर E10 होता है लेकिन फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के लिए E85 भी बड़े पैमाने पर उपलब्ध है। ब्राजील में पेट्रोल पंपों पर आमतौर पर लगभग 27 प्रतिशत एथेनॉल मिला सामान्य गैसोलीन और लगभग शुद्ध एथेनॉल यानी E100, दोनों उपलब्ध होते हैं।

सरकार ने E22, E25, E27 और E30 के मानक पहले ही अधिसूचित कर दिए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, पेट्रोल पंपों पर एक साथ पेट्रोल के कई मिश्रण उपलब्ध कराए जाएँगे और वाहन मालिक अपने वाहन के लिए सबसे बेहतर विकल्प चुन सकेंगे। लेकिन पुराने वाहनों के लिए E10 जैसे कम एथेनॉल मिश्रण का कोई प्रस्ताव नहीं है। ज्यादा एथेनॉल वाले ये मिश्रण कम एथेनॉल वाले विकल्पों के साथ विकल्प के रूप में आने चाहिए, न कि उन्हें पूरी तरह हटाकर उनकी जगह लेने चाहिए। इससे उन करोड़ों लोगों की सुरक्षा होगी जो अब भी पुराने लेकिन पूरी तरह चलने योग्य वाहन चला रहे हैं।

जब शुद्ध पेट्रोल अब लगभग नहीं मिल रहा और पुराने वाहनों के लिए कोई सुरक्षित विकल्प नहीं बचा है, ऐसे में सभी लोगों पर एक ही तरह का E20 पेट्रोल थोपना सही नहीं है। यह न तो आम लोगों के साथ न्याय है और न ही व्यावहारिक फैसला।

सरकार को चाहिए कि वह जल्द से जल्द पेट्रोल के अलग-अलग विकल्प उपलब्ध कराए। जैसे E10, E20 और दूसरे मिश्रण जिससे लोग अपने वाहन और अपनी जेब के हिसाब से सही ईंधन चुन सकें। दुनिया के कई विकसित देशों में यही व्यवस्था है। लंबे समय में भारत के वाहन मालिकों के लिए भी यही बेहतर होगा। आम आदमी को इतनी राहत और विकल्प मिलना चाहिए।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

चलाता था बच्चियों से रेप करने वाला ‘ग्रूमिंग गैंग’, सजा पूरी होने से पहले ही छोड़ा: जानिए कौन है ‘डैडी’ शब्बीर अहमद, ब्रिटेन में क्यों मचा है बवाल?

ब्रिटेन में बच्चों के यौन शोषण के सबसे चर्चित मामलों का दोषी शबीर अहमद 14 साल जेल में रहने के बाद रिहा हो गया है। उसकी रिहाई के बाद पूरे ब्रिटेन में विरोध शुरू हो गया है। लोग उसे पाकिस्तान भेजने की माँग कर रहे हैं।

लेकिन ब्रिटेन के पुराने कानून और पाकिस्तान के रुख की वजह से यह मामला उलझ गया है। इस स्थिति के चलते ब्रिटेन की सड़कों पर तनाव है और पीड़ितों में गहरा खौफ बना हुआ है। जानते हैं कि शबीर अहमद कौन है और उसकी रिहाई पर इतना विवाद क्यों हो रहा है।

कौन है रेपिस्ट शबीर अहमद और क्या थे उस पर आरोप?

शबीर अहमद मूल रूप से पाकिस्तान में जन्मा एक अपराधी है। वह कई दशक पहले ब्रिटेन आया था और वहाँ रहने लगा था। साल 2012 में ब्रिटिश अदालत ने उसे रोशडेल शहर में नाबालिग और बेसहारा लड़कियों के साथ दरिंदगी करने वाले 9 लोगों के एक गिरोह का मुख्य सरगना (रिंगलीडर) घोषित किया था।

शबीर अहमद को लड़कियों से रेप और गंभीर यौन अपराधों के 30 मामलों में दोषी पाते हुए 22 साल की जेल की सजा सुनाई गई थी। अदालत की कार्यवाही के दौरान यह सामने आया था कि शबीर अहमद और उसका गैंग बेहद शातिर था। वे मासूम लड़कियों को मुफ्त खाना, सिगरेट और शराब का लालच देकर अपने जाल में फँसाते थे।

इसके बाद उनका बार-बार शारीरिक और मानसिक शोषण किया जाता था। लड़कियाँ इस आरोपित से इस कदर डरती थीं कि उसे ‘डैडी’ कहकर बुलाने पर मजबूर थीं। इस मामले को आधुनिक ब्रिटिश इतिहास के सबसे घिनौने और काले अध्यायों में से एक माना जाता है, जिसने ब्रिटेन के पुलिस सिस्टम की कमियों को उजागर किया था।

जेल से रिहाई के बाद पीड़ितों में खौफ और सड़कों पर गुस्सा

शबीर अहमद को हाल ही में एक ‘अर्ली रिलीज स्कीम’ (जल्दी रिहाई योजना) के तहत 14 साल जेल में बिताने के बाद छोड़ दिया गया। हालाँकि, जेल से बाहर आने के बाद भी उस पर चौबीस घंटे कड़ी नजर रखी जा रही है। अधिकारियों ने उसके पैर में एक GPS इलेक्ट्रॉनिक टैग लगा दिया है, जिससे उसकी हर हरकत ट्रैक हो रही है।

शबीर अहमद को रोशडेल और ओल्डहैम जैसे इलाकों में जाने की पूरी तरह मनाही है, ताकि वह पीड़ितों के आसपास न फटक सके। इसके बावजूद, इस दरिंदे की रिहाई की खबर मिलते ही पीड़ितों के जख्म फिर हरे हो गए हैं। एक पीड़िता ने मीडिया को बताया कि वह अपने और अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर डरी हुई है।

पीड़िता ने आगे कहा कि वे लोग डर के मारे घर से बाहर नहीं कदम रख पा रहे है। वहीं दूसरी तरफ, रोशडेल के स्थानीय युवाओं और प्रदर्शनकारियों ने पीड़ितों की सुरक्षा के लिए खुद ही सड़कों पर उतरकर रात में गश्त (विजिलेंटे पेट्रोलिंग) शुरू कर दी है। जनता का मानना है कि ऐसे समाज के दुश्मन को खुले में रहने का कोई हक नहीं है।

इमिग्रेशन एक्ट 1971 का वो पेंच, जो बना अहमद का ढाल

शबीर अहमद को दोषी ठहराए जाने के बाद ब्रिटिश सरकार ने उसकी ब्रिटिश नागरिकता को रद्द कर दिया था। इस फैसले के बाद वह कानूनी रूप से सिर्फ एक पाकिस्तानी नागरिक रह गया है। इसके बावजूद, ब्रिटिश सरकार चाहकर भी उसे तत्काल प्रभाव से पाकिस्तान डिपोर्ट यानी देश से बाहर नहीं निकाल पा रही है।

इसके पीछे ब्रिटेन का 55 साल पुराना एक कानून आड़े आ रहा है, जिसने सरकार के हाथ बांध दिए हैं। दरअसल, ब्रिटिश इमिग्रेशन एक्ट 1971 के तहत कॉमनवेल्थ (राष्ट्रमंडल) देशों के उन नागरिकों को डिपोर्ट करने से सुरक्षा मिली हुई है, जो साल 1973 से पहले ब्रिटेन आए थे।

इस नियम के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति 1973 से पहले आया और कम से कम 5 साल तक वहाँ कानूनी रूप से रहा, तो उसे वापस नहीं भेजा जा सकता। चूंकि पाकिस्तान उस दौर में कॉमनवेल्थ का हिस्सा था और अहमद 1960 के दशक के आखिरी सालों में ब्रिटेन आ गया था, इसलिए वह इस कानूनी खामी का फायदा उठाकर ब्रिटेन में ही टिका हुआ है।

पाकिस्तान का अड़ंगा और ब्रिटिश सरकार की अगली रणनीति

ब्रिटिश सरकार इस समय इस मामले को लेकर चौतरफा दबाव में है। देश के बड़े राजनीतिक नेताओं का कहना है कि यह कानून गंभीर अपराधियों को बचाने के लिए नहीं बनाया गया था। प्रधानमंत्री की ओर से गृह मंत्रालय को इस मामले की समीक्षा करने के आदेश दिए गए हैं।

ब्रिटिश संसद में चल रहे नए इमिग्रेशन बिल के जरिए इस पुराने कानून को बदलने या इसमें संशोधन करने की कोशिशें तेज कर दी गई हैं ताकि कानूनी रास्ता साफ हो सके। हालाँकि, कानून बदल जाने के बाद भी सरकार के सामने एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती खड़ी है।

ब्रिटिश अधिकारियों ने इस मुद्दे पर पाकिस्तान सरकार से बातचीत शुरू की है, लेकिन पाकिस्तान अपने ऐसे अपराधियों को वापस लेने में हमेशा आनाकानी करता रहा है। इससे पहले भी रोशडेल गैंग के 2 अन्य अपराधियों की नागरिकता छीनी गई थी, लेकिन पाकिस्तान ने उन्हें अपने देश में एंट्री देने से साफ मना कर दिया था।

अब ब्रिटेन के कुछ नेताओं का कहना है कि अगर पाकिस्तान इस बार भी अहमद को स्वीकार नहीं करता है, तो ब्रिटेन को उसे दी जाने वाली विदेशी मदद में कटौती कर देनी चाहिए।

FIFA World Cup Round of 32: स्पेन, पुर्तगाल और स्विट्जरलैंड की जीत, अब आगे क्या?

पिछली रात से लगातार बारिश हो रही है। मुंबई के कई इलाकों में पानी भर गया है। इसके चलते पिछले तीन घंटों से बिजली भी नहीं है। मैंने जो मोमबत्तियाँ जलाई थीं, अब उनकी लौ मद्धम होने लगी है। टेबल पर गुज़रे दिन के टाइम्स ऑफ इंडिया का खेल-पृष्ठ फड़फड़ा रहा है, जिसमें एमबाप्पे की तारीफों के पुल बाँधे गए हैं। खिड़की के बाहर बरसात का शोर है। रह-रहकर बिजली की गड़गड़ाहट सुनाई देती है। मैं किचन में जाकर चाय बनाने लगता हूँ। अदरक की महक पूरे किचन में फैल चुकी है।

अचानक मेरा ध्यान टेबल पर पड़े अखबार की उस खबर पर जाता है, जिसमें लिखा था कि भारी बारिश के चलते नवी मुंबई में कॉलेज जाने वाली दो छात्राओं की मौत हो गई थी, क्योंकि सड़क पर भरे पानी में करंट दौड़ रहा था। किसी ने सच ही कहा है कि बारिश सबके लिए खुशियाँ लेकर नहीं आती। वह सभी के लिए एक-सी नहीं होती। और यहाँ बात सिर्फ बारिश तक ही सीमित नहीं है।

फुटबॉल विश्व कप का कारवाँ जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा है, वैसे-वैसे वह हमें कई बेहतरीन मुकाबलों की सौगात देता जा रहा है। खूबसूरत किस्सों और कहानियों का सिलसिला लगातार जारी है। गुज़री रात हमने सेनेगल को टूर्नामेंट से बाहर होने से पहले शानदार फुटबॉल खेलते देखा।

किसे मालूम था कि मैदान के बाहर भी सेनेगल की टीम कई मुश्किलों से जूझ रही थी। कोच पापे थियाव का नया अनुबंध महीनों तक अधर में लटका रहा। खिलाड़ियों के बोनस और भुगतान को लेकर भी विवाद चलता रहा। कैंप की व्यवस्थाओं और भोजन की गुणवत्ता को लेकर भी असंतोष की खबरें सामने आती रहीं। मगर मजाल है कि मैदान पर उनके प्रदर्शन में कहीं कोई कमी दिखाई दी हो। जब भी वे मैदान पर उतरे, अपने देश के लिए अंतिम क्षण तक जान लगा दी। मैदान पर वे सचमुच शेर की तरह लड़े। वे राउंड ऑफ 16 में जगह तो नहीं बना सके, लेकिन अपने जज़्बे के लिए उन्हें दुनिया भर के खेलप्रेमियों का सम्मान और स्नेह मिला। यही कहानियाँ इस खेल को इतना खूबसूरत बना देती हैं।

बीती रात साढ़े बारह बजे लॉस एंजेलिस स्टेडियम में स्पेन को इस टूर्नामेंट के अपने पहले नॉकआउट मुकाबले में ऑस्ट्रिया से भिड़ना था। स्पेनिश कोच लुई डे ला फुएन्ते ने पिछले मैच की विजयी प्लेइंग इलेवन में सिर्फ एक बदलाव करते हुए अपनी टीम को मैदान में उतारा। पिछले मुकाबले में राइट बैक की भूमिका में मार्कोस लोरेन्ते थे, लेकिन इस बार उनकी जगह पेड्रो पोर्रो को मौका मिला। बाकी टीम पिछले मैच जैसी ही थी।

मैच के शुरुआती पलों से ही स्पेनिश टीम ग्रुप स्टेज के मुकाबले कहीं अधिक आत्मविश्वास से भरी दिखाई दी। छोटे-छोटे जादुई पासों के साथ वह लगातार विपक्षी गोलपोस्ट की ओर बढ़ती रही। दाहिने फ्लैंक पर अपने शानदार ड्रिबल्स से लामीन यमाल ऑस्ट्रियाई खिलाड़ियों की नाक में दम किए हुए थे। वहीं बाएँ छोर से एलेक्स बाएना भी लगातार गोल के अवसर तैयार कर रहे थे। नतीजा यह हुआ कि मैच के छत्तीसवें मिनट में सेंट्रल फॉरवर्ड मिकेल ओयारजाबाल ने गोल दागकर स्पेन को बढ़त दिला दी।

ऑस्ट्रिया ने बराबरी करने की पूरी कोशिश की, लेकिन स्पेन की रक्षापंक्ति में मौजूद उन्नीस वर्षीय पाऊ कुबार्सी और अनुभवी आयमेरिक लापोर्त के सामने उनकी एक न चली। सच तो यह था कि ऑस्ट्रिया इस मैच में कभी पूरी तरह संभल ही नहीं पाया। स्पेन ने लगभग पैंसठ प्रतिशत समय गेंद अपने कब्जे में रखी और विपक्षी गोलपोस्ट पर कुल बाईस शॉट लगाए। आगे चलकर पेड्रो पोर्रो और ओयारजाबाल ने एक-एक और गोल दागते हुए स्पेन को 3-0 की शानदार जीत दिला दी। पूरे मुकाबले में ऑस्ट्रिया एक भी शॉट लक्ष्य पर नहीं लगा सका, जो स्पेन के रक्षात्मक प्रदर्शन की मजबूती को दिखाता है।

इस जीत के साथ स्पेन राउंड ऑफ 16 में पहुँच गया। साथ ही, 2010 विश्व कप जीतने के बाद पहली बार स्पेन ने FIFA विश्व कप के नॉकआउट चरण का कोई मुकाबला अपने नाम किया।
अगले मैच में टोरंटो के मैदान पर पुर्तगाल का सामना क्रोएशिया से होना था। दुनिया भर से हजारों दर्शक अपने सबसे चहेते खिलाड़ी को खेलते देखने पहुँचे थे। मैच से पहले क्रिस्टियानो रोनाल्डो की बहन ने यह संकेत दिया था कि संभव है विश्व कप के बाद रोनाल्डो इस खूबसूरत खेल को हमेशा के लिए अलविदा कह दें। यह सुनते ही समर्थकों का उत्साह और भी बढ़ गया।

कोच रॉबर्टो मार्टिनेज़ अपनी टीम को 4-2-3-1 की फॉर्मेशन के साथ आक्रामक सोच लेकर मैदान में उतारते हैं। अटैकिंग लाइन में क्रिस्टियानो रोनाल्डो का साथ राफेल लिआओ और पेड्रो नेटो दे रहे थे। वहीं मिडफ़ील्ड में ब्रुनो फर्नानदेज़ के साथ विटिन्हा और होआओ नेवेश मौजूद थे।
ईवान पेरिसिच, लुका मॉद्रिच और मातेओ कोवाचिच जैसे अनुभवी खिलाड़ियों के नेतृत्व में क्रोएशिया भी इस मुकाबले को हल्के में लेने के मूड में नहीं था। रेफरी की सीटी बजते ही टोरंटो स्टेडियम में हजारों दर्शकों के शोर के बीच यह हाई-वोल्टेज मुकाबला शुरू हो गया। यह मैच शायद क्रिस्टियानो रोनाल्डो या उनके पुराने साथी लुका मॉद्रिच में से किसी एक का राष्ट्रीय जर्सी में आखिरी विश्व कप मुकाबला भी हो सकता था।

मैच के तीसरे मिनट में ही आंते बुदीमीर का नीचा शॉट गोलकीपर रोक लेते हैं। इसके जवाब में पुर्तगाल की ओर से ब्रुनो फर्नानदेज़ तुरंत जवाबी हमला करते हैं, लेकिन उनका प्रयास भी सफल नहीं हो पाता। खेल आगे बढ़ता है। राफेल लिआओ एक सटीक पास बॉक्स के भीतर ब्रुनो फर्नानदेज़ की ओर बढ़ाते हैं, मगर क्रोएशियाई रक्षापंक्ति फिर शानदार बचाव करती है। दोनों टीमें लगातार आक्रमण करती रहीं, लेकिन किसी को सफलता नहीं मिली। इसी के साथ पहले हाफ का खेल समाप्त हुआ और स्कोर 0-0 से बराबरी पर रहा।

दूसरे हाफ का खेल शुरू होता है। मातेओ कोवाचिच पुर्तगाल के गोलपोस्ट की दिशा में एक सटीक निशाना साधते हैं, लेकिन गोलकीपर शानदार बचाव करते हुए उसे रोक लेते हैं। मगर मैच के तिरेपनवें मिनट में ईवान पेरिसिच, जोसिप स्टानिसिक के शानदार पास को गोल में तब्दील कर देते हैं। इसके साथ ही क्रोएशिया मुकाबले में 1-0 की बढ़त हासिल कर लेता है। मैदान में मौजूद लगभग 44 हजार दर्शकों में बड़ी संख्या पुर्तगाली समर्थकों की थी। उन सभी को मानो एक बड़ा झटका लग चुका था।

इस गोल के दस मिनट के भीतर ही क्रोएशिया दो बार फिर हमला करता है, लेकिन वह अपनी बढ़त को दोगुना नहीं कर पाता। दबाव में दिख रही पुर्तगाली टीम के कोच रॉबर्टो मार्टिनेज़ तुरंत दो बदलाव करते हैं। विटिन्हा, ब्रुनो फर्नानदेज़ और पेड्रो नेटो की जगह क्रमशः बरनार्डो सिल्वा, नेल्सन सेमेडो और फ्रांसिस्को कोन्सेकाओ को मैदान में भेजा जाता है। लेकिन इन बदलावों के साथ एक और बड़ा फैसला देखने को मिलता है। डिफेंडर होआओ कैंसेलो की जगह स्ट्राइकर गोंकालो रामोस को उतारा जाता है। मकसद बिल्कुल साफ था; अब पुर्तगाल पूरी ताकत के साथ लगातार आक्रमण करने वाला था।

इन सब्स्टीट्यूशन्स के बाद पुर्तगाल नई ऊर्जा से भर उठता है। तुरंत ही वह एक गोल भी दाग देता है, लेकिन VAR उसे अमान्य कर देता है। खेल आगे बढ़ता है। पुर्तगाल को एक कॉर्नर मिलता है, जिसे लेने नूनो मेंडेस आगे आते हैं। इसी दौरान क्रोएशियाई बॉक्स में एक फाउल हो जाता है। क्रोएशिया के खिलाड़ियों के विरोध के बावजूद VAR की समीक्षा के बाद पुर्तगाल को पेनाल्टी मिल जाती है।

क्रिस्टियानो रोनाल्डो, जो अब तक FIFA विश्व कप के किसी भी नॉकआउट मुकाबले में गोल नहीं कर सके थे, गेंद के पीछे खड़े होते हैं। गोलकीपर तैयार थे। रेफरी सीटी बजाते हैं। रोनाल्डो गेंद को गोलकीपर की दाईं ओर भेजते हुए पेनाल्टी को गोल में बदल देते हैं। स्कोर 1-1 से बराबर हो जाता है। यह टूर्नामेंट में उनका तीसरा गोल था।

खेल फिर आगे बढ़ता है। मातेओ कोवाचिच एक बार फिर पुर्तगाल के गोलपोस्ट की दिशा में शानदार शॉट लगाते हैं, लेकिन गोलकीपर फिर बेहतरीन बचाव करते हैं। आज कोवाचिच शानदार लय में दिखाई दे रहे थे। कुछ ही देर बाद क्रोएशिया को कॉर्नर मिलता है। लुका मॉद्रिच गेंद के पास खड़े होते हैं। उनकी किक पर मातानोविच ऊँची छलांग लगाकर हेडर लगाते हैं, लेकिन गेंद क्रॉसबार के ऊपर से निकल जाती है। अगले ही पल मातानोविच फिर गेंद को कोवाचिच की ओर बढ़ाते हैं। वह एक और दमदार शॉट लगाते हैं, मगर पुर्तगाल का गोलकीपर फिर शानदार सेव कर लेता है।

अस्सी मिनट का खेल पूरा हो चुका था। कोच रॉबर्टो मार्टिनेज़ क्रिस्टियानो रोनाल्डो को बाहर बुलाकर उनकी जगह रुबेन नेवेश को मैदान में उतारते हैं। दोनों ही टीमें लगातार विपक्षी गोलपोस्ट पर हमले करती रहती हैं, लेकिन स्कोर अब भी 1-1 से बराबरी पर था। निर्धारित नब्बे मिनट पूरे होने के बाद रेफरी दस मिनट का स्टॉपेज टाइम देते हैं।

90+2 मिनट पर क्रोएशियाई कोच एक मिडफील्डर को बाहर बुलाकर डिफेंडर योश्को ग्वार्डियोल को मैदान में भेजते हैं। इस बदलाव का उद्देश्य साफ था—स्टॉपेज टाइम में अपनी रक्षापंक्ति को और मजबूत करना। लेकिन जैसे ही ग्वार्डियोल मैदान पर आते हैं, पुर्तगाल के स्थानापन्न खिलाड़ी गोंकालो रामोस गोल दाग देते हैं। 90+4 मिनट में राफेल लिआओ बाईं ओर से शानदार क्रॉस डालते हैं, जिसे गोंकालो रामोस बेहतरीन हेडर के साथ गोल में बदल देते हैं। टूर्नामेंट में अपने पहले गोल के साथ वह स्टॉपेज टाइम में पुर्तगाल को 2-1 की बढ़त दिला देते हैं।
क्या सेनेगल के बाद अब क्रोएशिया भी शानदार खेल दिखाने के बावजूद अंतिम क्षणों में टूर्नामेंट से बाहर होने जा रहा था?

पूरी पुर्तगाली टीम अब अपने बॉक्स के आसपास सिमटकर रक्षण करने लगती है। 90+14 मिनट में क्रोएशिया एक गोल दाग देता है। पुर्तगाली डगआउट में सन्नाटा छा जाता है। लाल जर्सी पहने उनके समर्थक भी हैरान रह जाते हैं। इस मुकाबले में हर कुछ मिनट बाद नया मोड़ आ रहा था। क्या अब मैच एक्स्ट्रा टाइम में जाएगा?

लेकिन तभी VAR हस्तक्षेप करता है और रेफरी गोल का फैसला पलट देते हैं। क्रोएशियाई खिलाड़ी इस फैसले का विरोध करते हैं, लेकिन रेफरी का निर्णय अंतिम होता है। खेल फिर शुरू होता है। 90+19 मिनट पर हर पल नया मोड़ लेता यह हाई-वोल्टेज मुकाबला आखिरकार समाप्त हो जाता है।

यह एक शानदार मैच था। विवादित फैसलों से भरे इस रोमांचक मुकाबले को किसी तरह पुर्तगाल जीतकर अगले दौर में अपनी जगह बना लेता है। अब राउंड ऑफ 16 में उसका सामना अपने चिर-प्रतिद्वंद्वी स्पेन से होगा। यह ऐसा मुकाबला होगा जिसे फुटबॉल प्रेमी शायद ही मिस करना चाहेंगे।

उधर, क्रोएशिया का सफर यहीं समाप्त हो जाता है। इस दर्दनाक हार के साथ शायद लुका मॉद्रिच और क्रोएशिया की राष्ट्रीय टीम का साथ भी हमेशा के लिए समाप्त हो गया।

फिर दिन के अगले मुकाबले की बिसात वैंकूवर में सजती है, जहाँ स्विट्जरलैंड का सामना अल्जीरिया से था। स्विट्जरलैंड के स्ट्राइकर ब्रील एम्बोलो ने मैच के दसवें मिनट में ही गोल दागकर अपनी टीम को शुरुआती बढ़त दिला दी। लगभग तीस से चालीस मीटर तक जोहान मनजाम्बी अकेले गेंद लेकर आगे बढ़ते हैं। मौका मिलते ही वह गेंद गोलपोस्ट की दिशा में बढ़ाते हैं, जिसे वहाँ मौजूद एम्बोलो शानदार अंदाज़ में गोल में बदल देते हैं।

दूसरे हाफ की शुरुआत होते ही स्विस विंगर दान न्दोए दाईं ओर से शानदार किक लगाते हैं। अल्जीरिया के गोलकीपर के पास उसका कोई जवाब नहीं था। स्विट्जरलैंड दूसरे हाफ की शुरुआत में ही अपना दूसरा गोल कर चुका था। स्कोर 2-0 हो जाता है। आखिर तक यही स्कोर बना रहता है और स्विट्जरलैंड राउंड ऑफ 16 में अपनी जगह पक्की कर लेता है, जहाँ अगले सप्ताह उसका सामना कोलंबिया और घाना के बीच होने वाले मुकाबले की विजेता टीम से वैंकूवर में ही होगा।

आज खेले गए मुकाबलों में पुर्तगाल और क्रोएशिया का मैच सबसे रोमांचक रहा। कभी क्रोएशिया हावी दिखाई दिया तो कभी पुर्तगाल। यह मुकाबला आखिरी सीटी तक दर्शकों को अपनी सीटों से बाँधे रखने में सफल रहा।

अब आज रात डलास स्टेडियम में मिस्र का सामना ऑस्ट्रेलिया से होगा। दोनों ही टीमें यह मुकाबला जीतकर टूर्नामेंट में अपनी उम्मीदें ज़िंदा रखना चाहेंगी। ऑस्ट्रेलिया अपने ड्रीम रन को बरकरार रखते हुए आज एक और बड़ा शिकार करने की कोशिश करेगी।

फिर कल, भारतीय समयानुसार रात साढ़े तीन बजे, मियामी के मैदान पर 2022 विश्व विजेता अर्जेंटीना और काबो वर्दे के बीच मुकाबले का किक-ऑफ होगा। छोटे से द्वीपीय देश काबो वर्दे के खिलाड़ियों ने विराट हौसले के साथ खेलते हुए यहाँ तक का सफर तय किया है। वे एक और बड़ा उलटफेर करने के इरादे से मैदान में उतरेंगे।

हालांकि अर्जेंटीना के कोच लियोनेल स्कालोनी ने मैच से पहले साफ कहा है कि काबो वर्दे को हल्के में लेने की भूल नहीं की जा सकती। स्पेन और उरुग्वे जैसी टीमों को रोक चुकी यह टीम किसी भी बड़े देश के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है।

इस मुकाबले में लियोनेल मेस्सी के सामने होंगे वोज़िन्हा। यह सचमुच देखने लायक टक्कर होगी। एक ओर होंगे मेस्सी, जो मैदान के किसी भी कोने से गोल करने की क्षमता रखते हैं। दूसरी ओर होंगे वोज़िन्हा, जिनके सामने गोल करने में बड़ी-बड़ी टीमों के पसीने छूट चुके हैं।

मेस्सी इस समय शानदार फॉर्म में हैं। वह इस विश्व कप में छह गोल के साथ गोल्डन बूट की दौड़ में किलियन एमबाप्पे के बराबर चल रहे हैं।

इसके बाद कल सुबह सात बजे घाना का सामना कोलंबिया से होगा। अपने ग्रुप में, जिसमें पुर्तगाल भी शामिल था, शीर्ष स्थान पर रहने वाली कोलंबिया इस मुकाबले में निश्चित रूप से फेवरेट होगी। लेकिन नॉकआउट मुकाबलों में कुछ भी हो सकता है।

घाना की कोशिश होगी कि वह बेहद मजबूत रक्षापंक्ति के सहारे पूरे 120 मिनट तक ‘लॉस कैफेटेरोस’ को गोल करने से रोके रखे। अगर वह ऐसा करने में सफल रहता है, तो शानदार फॉर्म में चल रही कोलंबिया भी बड़े उलटफेर का शिकार हो सकती है। वहीं कोलंबिया को बेहद सतर्क रहना होगा और ‘ब्लैक स्टार्स’ को बिल्कुल भी कमतर आँकने की भूल नहीं करनी चाहिए।

हर विश्व कप में तरह-तरह की भविष्यवाणियाँ भी चर्चा का विषय बनती रही हैं। वर्ष 2010 के विश्व कप में ‘पॉल बाबा’ नाम के ऑक्टोपस ने दुनिया भर में सुर्खियाँ बटोरी थीं। कभी कोई तोता, तो कभी कोई सफेद बिल्ली ऐसी भविष्यवाणियों के कारण चर्चा में आ जाती है।

इस बार घाना के पारंपरिक आध्यात्मिक गुरु नाना क्वाकू बोनसाम सुर्खियों में हैं। उन्होंने दावा किया था कि उन्होंने अपनी राष्ट्रीय टीम के खिलाफ होने वाले मुकाबले से पहले इंग्लैंड के स्टार स्ट्राइकर हैरी केन पर आध्यात्मिक बंधन लगा दिया था, जिसके कारण हैरी केन उस मैच में गोल नहीं कर सके। लेकिन बंधन हटने के बाद अगले ही मुकाबले में केन ने गोल दागकर अपनी टीम को अगले दौर में पहुँचा दिया।

अब नाना क्वाकू बोनसाम ने एक और बड़ी भविष्यवाणी कर दी है। उनका दावा है कि अर्जेंटीना काबो वर्दे के खिलाफ होने वाला मुकाबला हार जाएगा। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा है कि लियोनेल मेस्सी अब इस विश्व कप में आगे कोई गोल नहीं कर पाएँगे।

इसके बाद दुनिया भर में अर्जेंटीना के समर्थकों के बीच इस भविष्यवाणी को लेकर खूब चर्चा शुरू हो गई है। हालांकि, इन भविष्यवाणियों में कितना सच है और कितना अंधविश्वास, इसका फैसला तो मैदान पर होने वाला खेल ही करेगा। खैर, उस मुकाबले में क्या होगा, यह तो वक्त ही बताएगा।

आगे की खबरों के लिए हमारे साथ बने रहिए। यूँ ही हमारे चहेते खेल के बेहतरीन किस्से आपके सामने आते रहेंगे।

छत्तीसगढ़ के नारायणपुर में सुलझा धर्मांतरण विवाद, 26 परिवारों ने की घर वापसी: पढ़ें- साय सरकार ने मिशनरियों पर कैसे कसी नकेल, पहले कॉन्ग्रेस देती थी विवादों को हवा

छत्तीसगढ़ का बस्तर और जशपुर अंचल लंबे समय से ईसाई मिशनरियों के धर्मांतरण के खेल का केंद्र रहा है। भोले-भाले जनजातीय लोगों को बहला-फुसलाकर, तरह-तरह के प्रलोभन देकर या नए जमाने के डिजिटल माध्यमों से जाल में फंसाकर उनकी मूल संस्कृति से दूर करने की साजिशें यहाँ लंबे समय से आम रही हैं।

ताजा मामला छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले के भरंडा और खड़का गाँवों से सामने आया, जहाँ धर्मांतरण को लेकर जनजातीय समाज और मतांतरित ईसाइयों के बीच तनाव चरम पर पहुँच गया था। स्थिति इतनी बिगड़ गई थी कि ईसाई मजहब को मानने वाले 26 परिवारों को ग्रामीणों ने सामाजिक बहिष्कार कर गाँव छोड़ने का अल्टीमेटम दे दिया था।

सालों से सुलग रही इस चिंगारी को जहाँ पिछली कॉन्ग्रेस सरकार के समय हिंसक होने के लिए खुला छोड़ दिया जाता था, वहीं मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की भाजपा सरकार और प्रशासनिक मुस्तैदी ने इसका समाधान निकाला।

नारायणपुर के खड़का गाँव में दिनभर चले तनाव के बाद प्रशासनिक मध्यस्थता के बीच मतांतरित परिवारों ने ईसाई मजहब का त्याग कर अपनी मूल जनजातीय संस्कृति और दूमा हांडी को छूकर सनातनी जड़ों में घर वापसी की है।

आइए जानते हैं कि आखिर नारायणपुर में यह विवाद क्यों भड़का, ईसाई मिशनरियाँ किस तरह ग्रामीण इलाकों में जहर घोल रही हैं और कैसे भाजपा सरकार छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026 के जरिए इस समस्या की जड़ पर प्रहार कर रही है।

नारायणपुर के भरंडा और खड़का गाँव का पूरा विवाद

नारायणपुर जिले के भरंडा थाना क्षेत्र के भरंडा गाँव और उससे लगे खड़का गाँव में मतांतरण को लेकर उपजा असंतोष अचानक नहीं भड़का था, बल्कि इसकी पृष्ठभूमि दिसंबर 2025 से ही तैयार हो रही थी। गाँव में बड़ी संख्या में जनजातीय समुदायों को ईसाई मिशनरियों द्वारा कनवर्ट किया जा रहा था।

इससे मूल सनातन परंपरा और पेन संस्कृति को मानने वाले ग्रामीण बेहद आक्रोशित थे। 9 जून 2026 के बाद स्थिति तब और ज्यादा बिगड़ गई जब दोनों पक्षों के बीच जमकर मारपीट हुई और इस झड़प में कई महिलाओं के घायल होने की भी सूचना मिली।

इस घटना के बाद ग्रामीणों का विरोध लगातार बढ़ता गया और गाँव के गयता तथा पटेल समेत प्रमुख लोगों ने ईसाई मजहब मानने वाले 26 परिवारों को एक-एक कर घरों से बाहर निकाल दिया। घर से निकाले जाने के बाद ये परिवार गाँव के बाहर पेड़ों की छाँव में और खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हो गए।

ग्रामीणों का स्पष्ट आरोप था कि ये मतांतरित लोग गाँव की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था, रीति-रिवाजों और सामुदायिक संस्थाओं का पालन नहीं कर रहे थे, जिससे पूरा सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो रहा था।

दूमा हांडी स्पर्श और आगा देवता की पूजा से निकला शांतिपूर्ण समाधान

जहाँ कॉन्ग्रेस के शासनकाल में ऐसे मामलों में केवल लीपापोती की जाती थी और मिशनरियों को मौन संरक्षण दिया जाता था, वहीं भाजपा सरकार के प्रशासन ने मध्यस्थता का ऐसा रास्ता निकाला जो पूरी तरह जनजातीय संस्कृति की रक्षा करता है। खड़का गाँव में दिनभर चले गतिरोध और तनाव के बाद प्रशासन, पुलिस और ग्रामीणों के बीच मैराथन बैठक हुई।

अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक और तहसीलदार सहित बड़ी संख्या में पुलिस बल की मौजूदगी में मतांतरित परिवारों ने स्वीकार किया कि उनसे बड़ी चूक हुई थी और वे अपनी मूल संस्कृति में लौटना चाहते हैं। इसके बाद बस्तर की अति-पारंपरिक आदिवासी रीति-नीति के अनुसार मतांतरित परिवार के सदस्यों ने पितरों की पवित्र मटकी यानी दूमा हांडी का स्पर्श किया।

इसके बाद ग्राम आगा देवता की विशेष पूजा-अर्चने में भाग लेकर सामाजिक रूप से पुनः गाँव में शामिल होने की प्रक्रिया पूरी की। इस सामाजिक शुद्धि और घर वापसी के बाद ग्रामीणों ने अपना विरोध समाप्त कर दिया।

वहीं भरंडा गाँव में भी यह लिखित समझौता हुआ कि ईसाई परिवार बस्ती के भीतर कोई भी चंगाई सभा, घर पर सामूहिक प्रार्थना या ईसाई पद्धति से अंतिम संस्कार जैसी धार्मिक गतिविधि नहीं करेंगे, साथ ही गाँव वालों ने उन्हें मूल धर्म में लौटने के लिए एक महीने का समय दिया है।

ईसाई मिशनरियों का घिनौना खेल और ग्रामीण इलाकों में गहराया तनाव

छत्तीसगढ़ के सुदूर वनांचल क्षेत्रों में ईसाई मिशनरियों की सक्रियता कोई मजहबी प्रचार का सामान्य मामला नहीं है, बल्कि यह देश के जनसांख्यिकीय ढाँचे को बदलने का एक सुविचारित एजेंडा है। मिशनरियाँ यहाँ के सीधे-साधे जनजातीय लोगों की गरीबी, बीमारी और कम पढ़े-लिखे होने का अनुचित फायदा उठाती हैं।

जनजातीय समाज प्रकृति पूजक और हिंदू सनातन व्यवस्था का अटूट हिस्सा रहा है, लेकिन मिशनरियाँ जब इनका धर्मांतरण कराती हैं, तो सबसे पहले वे जनजातीय लोगों को उनकी पारंपरिक पेन व्यवस्था, बुढ़ादेव की पूजा और पुरखों के रीति-रिवाजों को छोड़ने के लिए उकसाती हैं।

इससे गाँवों में सदियों पुराना आपसी भाईचारे का सामाजिक ताना-बाना बिखर जाता है। इसके अलावा जादुई इलाज और चंगाई सभाओं के नाम पर बड़ा फ्रॉड किया जाता है। कनवर्ट होने के बाद ये लोग अपने ही सगे भाइयों से नफरत करने लगते हैं, जिससे गृह-युद्ध जैसी स्थिति पैदा होती है।

जशपुर के हर्रापाठ गाँव का उदाहरण भी सामने आया था, जहाँ राष्ट्रपति की दत्तक संतान कहे जाने वाले पहाड़ी कोरबा जनजाति की 24 एकड़ से अधिक जमीन पर ईसाई बन चुके लोगों द्वारा चर्च बनाने के लिए अवैध कब्जे की कोशिश की गई थी, जिसे बाद में भारी राजनीतिक और सामाजिक दबाव के बाद मुक्त कराया जा सका।

जब मिशनरियों के इशारे पर फूटा था जनजातीय और SP का सिर

नारायणपुर में हुआ यह विवाद कोई पहली घटना नहीं है, क्योंकि छत्तीसगढ़ में ईसाई मिशनरियों के आक्रामक धर्मांतरण के खिलाफ जनजातीय समाज का आक्रोश पहले भी हिंसक रूप ले चुका है। दिसंबर 2022 और जनवरी 2023 का नारायणपुर के एड़का गाँव का दंगा इसका सबसे बड़ा प्रमाण है।

एड़का पंचायत के गोर्रा गाँव में नए-नए ईसाई बने मतांतरितों ने चर्च के पादरियों के नेतृत्व में जनजातीय समाज के लोगों पर लाठी, डंडों, रॉड और धारदार हथियारों से जानलेवा हमला कर दिया था। इसके विरोध में जब जनजातीय समाज ने पाँच हजार से अधिक लोगों की महा-रैली निकाली, तो चर्च के इशारे पर बाहर से बुलाए गए करीब 700 से 800 ईसाइयों की उग्र भीड़ ने भारी पत्थरबाजी की थी।

इस दौरान स्थिति को शांत कराने पहुँचे नारायणपुर के तत्कालीन SP सदानंद कुमार पर चर्च के भीतर ही हमला किया गया, जिससे उनका सिर फट गया था। इस हिंसक झड़प में थाना प्रभारी भुनेश्वर जोशी और कई अर्धसैनिक बलों के जवान भी लहूलुहान हुए थे, जिससे साफ पता चलता है कि मिशनरी किस हद तक कानून व्यवस्था को चुनौती देने की तैयारी के साथ काम करते हैं।

कॉन्ग्रेस राज में तुष्टिकरण और खुली छूट बनाम भाजपा राज में त्वरित न्याय

छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन के साथ ही धर्मांतरण के खिलाफ लड़ाई का दृष्टिकोण पूरी तरह बदल गया है और दोनों सरकारों के रवैये में जमीन-आसमान का अंतर साफ देखा जा सकता है। कॉन्ग्रेस के शासनकाल में वोट बैंक की राजनीति के कारण अवैध धर्मांतरण पर आँखें मूंद ली गई थीं।

यहाँ तक कि तत्कालीन सरकार के मंत्रियों के रिश्तेदारों पर ही जनजातीय लोगों की कीमती जमीनें ठग कर अपने नाम कराने के गंभीर आरोप लगे थे। उस दौर में जब जनजातीय समाज शिकायत लेकर जाता था, तो जिला प्रशासन मूकदर्शक बना रहता था, जिसके कारण छोटे विवाद अंततः बड़े हिंसक दंगों में बदल जाते थे।

इसके विपरीत, वर्तमान विष्णु देव साय की भाजपा सरकार स्पष्ट रूप से जनजातीय संस्कृति और सनातन अस्मिता की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। नारायणपुर, भरंडा और खड़का के मामलों में जैसे ही विवाद की भनक लगी, एएसपी और तहसीलदार भारी पुलिस बल के साथ खुद मौके पर पहुँचे और चौबीस घंटे के भीतर कानून का डर दिखाते हुए शांतिपूर्ण समाधान निकाला।

कड़े प्रशासनिक रुख के कारण अब मतांतरितों को भी समझ आ गया है कि सरकार पूरी तरह जनजातीय समाज के साथ खड़ी है, इसलिए वे स्वेच्छा से घर वापसी का मार्ग चुन रहे हैं।

छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026 के सख्त कानूनी प्रावधान

विष्णु देव साय सरकार केवल तात्कालिक प्रशासनिक समझौतों पर भरोसा नहीं कर रही है, बल्कि वह इस सामाजिक बीमारी को जड़ से खत्म करने के लिए छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026 लेकर आई। यह कानून वर्ष 1968 के पुराने मध्य प्रदेश के कानून की जगह लेगा, जिसकी कमजोरियों का फायदा उठाकर मिशनरी गिरोह आसानी से बच निकलते थे।

नए कानून के तहत सामूहिक धर्मांतरण को राज्य की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती माना गया है, इसलिए इसके दोषियों को कम से कम दस साल से लेकर आजीवन कारावास यानी पूरी जिंदगी जेल में काटने की सजा मिलेगी और साथ ही देश में सर्वाधिक पच्चीस लाख रुपए का भारी जुर्माना भी लगाया जाएगा।

यदि कोई व्यक्ति किसी नाबालिग, महिला, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति का अवैध तरीके से धर्म बदलवाता है, तो उसे दस से बीस साल तक की जेल काटनी होगी। इसके अतिरिक्त, सोशल मीडिया या ऑनलाइन गेमिंग के जरिए किए जाने वाले डिजिटल धर्मांतरण को भी इस कानून के दायरे में लाया गया है।

इसके तहत सभी अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती होंगे, जिससे पुलिस बिना वारंट के पादरियों या दलालों को गिरफ्तार कर सकेगी और विशेष अदालतों में इसकी त्वरित सुनवाई होगी।

घर वापसी को मिला कानूनी कवच और जड़ों की ओर लौटना हुआ आसान

इस नए कानून की सबसे क्रांतिकारी और बहुप्रशंसित विशेषता यह है कि यह धर्मांतरण और अपनी जड़ों की ओर लौटने यानी घर वापसी के बीच के अंतर को पूरी तरह स्पष्ट करता है। कानून के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति अपना मौजूदा बाहरी धर्म छोड़कर वापस अपने पैतृक धर्म या अपने पूर्वजों के मूल धर्म यानी सनातन अथवा जनजातीय संस्कृति में लौटता है, तो इसे कानूनी रूप से धर्मांतरण नहीं माना जाएगा।

इसका सबसे बड़ा व्यावहारिक लाभ यह है कि नारायणपुर के खड़का गाँव के जनजातीय समाज ने जो दूमा हांडी छूकर अपनी मूल परंपरा में वापसी की है, उसके लिए उन्हें किसी जिला मजिस्ट्रेट को पहले से सूचना देने या तीस दिनों तक किसी सरकारी आपत्ति का इंतजार करने की कोई आवश्यकता नहीं होगी।

सरकार ने अपनी मूल संस्कृति और धर्म में वापस आने वाले लोगों के लिए कानूनी दरवाजे पूरी तरह से अड़चन-मुक्त और खुले रखे हैं, जबकि नया धर्म अपनाने वालों के लिए कठोर स्क्रूटनी की व्यवस्था की है ताकि कोई भी लाचारी या मजबूरी का फायदा न उठा सके।

नारायणपुर का खड़का और भरंडा विवाद देश के सामने एक जीवंत उदाहरण है कि जब शासन और प्रशासन की नीयत साफ हो, तो बिना किसी खून-खराबे के सनातन संस्कृति की रक्षा की जा सकती है। ईसाई मिशनरियों ने सुदूर वनांचलों में जनजातीय समाज को बाँटने और समाज में जहर घोलने का जो धंधा चला रखा था, उस पर अब भाजपा सरकार के कड़े रुख और नए कानून ने पूरी तरह से पूर्णविराम लगा दिया है।

छत्तीसगढ़ सरकार का यह रवैया साफ संदेश देता है कि राज्य के हर नागरिक की परंपरा, संस्कृति और उसके विश्वास को सुरक्षित रखना उनकी प्राथमिकता है और अब राज्य में धोखे या प्रलोभन के जरिए धर्मांतरण का खेल खेलने वालों के लिए कोई जगह नहीं बची है।

गया में मोमोज खिलाकर नाबालिग हिंदू लड़कियों के अश्लील वीडियो बनाने वाला रेहान गिरफ्तार, दिल्ली तक पहुँची पुलिस: ग्राउंड रिपोर्ट में पढ़ें पूरी ट्रेन की तलाशी से आत्मसमर्पण तक की कहानी

बिहार के गया जिले के बांकेबाजार में नाबालिग और अन्य युवतियों के अश्लील वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल करने के सनसनीखेज मामले में मुख्य आरोपित मोहम्मद रेहान को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। आरोपित गिरफ्तारी से बचने के लिए लगातार अपनी लोकेशन बदल रहा था और पुलिस की विशेष जाँच टीम (SIT) को चकमा देकर दिल्ली से बिहार तक भागता फिर रहा था। आखिरकार पुलिस के चौतरफा बढ़ते दबाव और लगातार की जा रही छापेमारी के बाद आरोपित ने पटना के फुलवारी शरीफ थाने में आत्मसमर्पण कर दिया।

गया पुलिस की टीम उसे ट्रांजिट रिमांड पर लेकर गया आई, जहाँ उसका मेडिकल कराने और अदालत में पेश करने के बाद उसे गया मंडल कारागार (जेल) भेज दिया गया है। इस घटना के बाद स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश था, जिसे देखते हुए पुलिस अब इस मामले में त्वरित सुनवाई (स्पीडी ट्रायल) सुनिश्चित करने की तैयारी कर रही है।

मोमोज खिलाकर शोषण का क्या है पूरा मामला?

यह पूरा मामला गया जिले के बाँकेबाजार थाना क्षेत्र का है, जहाँ सोशल मीडिया पर कुछ आपत्तिजनक और अश्लील वीडियो प्रसारित होने के बाद विवाद की शुरुआत हुई। आरोपित मोहम्मद रेहान पर आरोप है कि वह इलाके की लड़कियों को रील बनाने के बहाने अपने जाल में फंसाता था, उनसे दोस्ती करता था और फिर उनके अश्लील वीडियो बना लेता था। इन वीडियो के जरिए वह लड़कियों को ब्लैकमेल करता था और उनके साथ जबरन संबंध बनाता था। बताया जा रहा है कि उसके निशाने पर लगभग 20 हिंदू लड़कियाँ थीं, जिनके वीडियो और तस्वीरें उसके पास होने की बात सामने आई है।

मामला तब उजागर हुआ जब एक पीड़ित नाबालिग लड़की के भाई को इस घिनौनी करतूत की भनक लगी। पीड़िता महादलित वर्ग से आती है। भाई ने हिम्मत दिखाते हुए बाँकेबाजार थाने में मुख्य आरोपित मोहम्मद रेहान के खिलाफ नामजद प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराई। पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए आरोपित के खिलाफ पॉक्सो एक्ट (POCSO Act), आईटी एक्ट (IT Act) और अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम (SC/ST Act) समेत कई अन्य गंभीर धाराओं में केस दर्ज किया।

मामले की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक अन्य पीड़ित युवती, जिसका एक साल पहले विवाह हो चुका था, आरोपित रेहान ने उसके ससुराल तक इन अश्लील वीडियो को भेजकर उसका घर उजाड़ने की कोशिश की थी।

इस घटना के सामने आने के बाद पूरे बांकेबाजार इलाके में जबरदस्त तनाव और आक्रोश फैल गया। स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने आरोपित की अविलंब गिरफ्तारी और सख्त से सख्त सजा की माँग को लेकर बाँकेबाजार को पूरी तरह बंद रखा। बाजार बंद के दौरान लोगों ने पुलिस प्रशासन के खिलाफ प्रदर्शन भी किया, जिसके बाद पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया और आरोपित को पकड़ने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान शुरू किया गया।

बिहार पुलिस ने SIT गठित कर की ताबड़तोड़ छापेमारी

मामले की संवेदनशीलता और जनता के भारी आक्रोश को देखते हुए गया के वरीय पुलिस अधीक्षक (SSP) सुशील कुमार ने तुरंत एक्शन लिया। उन्होंने शेरघाटी के डीएसपी संदीप कुमार के नेतृत्व में चार सदस्यीय विशेष जाँच दल (SIT) का गठन किया। एसआईटी ने तकनीकी और वैज्ञानिक अनुसंधान का सहारा लेते हुए आरोपित की तलाश शुरू की।

जाँच के शुरुआती चरण में पुलिस ने सबसे पहले नाबालिग पीड़िता का अदालत में धारा 164 के तहत बयान दर्ज कराया, ताकि कानूनी तौर पर केस मजबूत रहे। इसके साथ ही फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) की टीम को कथित घटनास्थल पर भेजा गया, जहाँ से टीम ने कई महत्वपूर्ण वैज्ञानिक साक्ष्य एकत्र किए।

इंटरनेट और सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रहे वायरल वीडियो की डिजिटल जाँच भी शुरू की गई ताकि यह पता लगाया जा सके कि मुख्य आरोपित के अलावा इस वीडियो को आगे फैलाने में और किन-किन लोगों की भूमिका रही है। तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर पुलिस इस रैकेट से जुड़े अन्य संदिग्धों की भी सरगर्मी से तलाश कर रही है।

ऑपइंडिया से बातचीत में बाँकेबाजार पुलिस का बड़ा खुलासा

इस पूरे घटनाक्रम और आरोपित को पकड़ने के लिए किए गए ‘कैट एंड माउस चेस’ (चूहे-बिल्ली के खेल) को लेकर बाँकेबाजार थाना के पदाधिकारी पवन कुमार ने ‘ऑपइंडिया’ से एक्सक्लूसिव बातचीत में कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। उन्होंने बताया कि यह पूरा मामला 29 जून 2026 को तब प्रकाश में आया, जब पीड़ित नाबालिग के भाई ने थाने आकर पुलिस को एक पेन-ड्राइव सौंपी। इस पेन-ड्राइव में 5 से 6 बेहद आपत्तिजनक और अश्लील वीडियो मौजूद थे। वीडियो देखते ही पुलिस ने तुरंत केस दर्ज कर आरोपित रिहान की तलाश शुरू कर दी।

थाना पदाधिकारी पवन कुमार ने ऑपइंडिया को बताया कि तकनीकी निगरानी (सर्विलांस) के दौरान पुलिस को सूचना मिली कि आरोपित दिल्ली भाग गया है। बांकेबाजार थाना की एक विशेष टीम तुरंत दिल्ली के लिए रवाना हुई। इसी बीच पुलिस को खुफिया जानकारी मिली कि आरोपित दिल्ली से ‘पुरुषोत्तम एक्सप्रेस’ ट्रेन में सवार होकर वापस बिहार लौट रहा है। पुलिस टीम ने मुस्तैदी दिखाते हुए उत्तर प्रदेश के प्रयागराज रेलवे स्टेशन पर तगड़ी घेरेबंदी की। चलती ट्रेन में पूरी छानबीन की गई, बोगियों को खंगाला गया और पुरुषोत्तम एक्सप्रेस के टीटीई (TTE) की मदद लेकर पूरी रिजर्वेशन लिस्ट भी देखी गई, लेकिन रेहान वहाँ नहीं मिला।

ट्रेन में तलाशी अभियान के बाद पुलिस टीम मिर्जापुर स्टेशन पर उतरी और वापस दिल्ली के लिए रवाना हुई। दिल्ली पहुँचने पर पुलिस को पता चला कि रिहान को पुलिस की भनक लग चुकी थी और वह महज 5 घंटे पहले ही वहाँ से अपनी भाभी के साथ फरार हो गया था। थाना पदाधिकारी ने बताया कि रेहान बेहद शातिर तरीके से पुलिस से बच रहा था; वह गिरफ्तारी से बचने के लिए लगातार अपना मोबाइल बंद रखता था और पूरे दिन में सिर्फ दो-तीन घंटे में एक बार कुछ मिनटों के लिए फोन ऑन करता था। दिल्ली से भागकर वह अयोध्या के रास्ते वाराणसी पहुँचा और फिर वहाँ से बिहार में दाखिल हुआ।

पुलिस टीम ने इस दौरान तकनीकी लोकेशन के आधार पर आरोपित की भाभी से संपर्क साधा और फोन पर उसे सख्त निर्देश दिया कि वे आरोपित को तुरंत आत्मसमर्पण करने के लिए कहें, क्योंकि पुलिस ने उसे चारों तरफ से घेर लिया है और भागने का कोई रास्ता नहीं बचा है। पुलिस के इसी चौतरफा तकनीकी और सामाजिक दबाव के आगे घुटने टेकते हुए आखिरकार मोहम्मद रेहान ने पटना के फुलवारी शरीफ थाने में जाकर सरेंडर कर दिया।

थाना पदाधिकारी पवन कुमार ने आगे स्पष्ट किया कि आरोपित मोहम्मद रेहान की उम्र 18 वर्ष से अधिक है (यानी वह कानूनी रूप से बालिग है) और उस पर लगे आरोप बेहद संगीन हैं। पुलिस ने आरोपित का मोबाइल फोन अपने कब्जे में ले लिया है, जो इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सबूत है। इस फोन को फॉरेंसिक ऑडिट के लिए भेजा जा रहा है ताकि डिलीट किए गए डेटा और अन्य वीडियो को भी रिकवर किया जा सके और यह साफ हो सके कि उसने और कितनी लड़कियों को अपनी हवस और ब्लैकमेलिंग का शिकार बनाया था।

आईजी विकास वैभव बोले- महिला अपराध पर होगी कड़ी कार्रवाई

इस संवेदनशील मामले पर मगध रेंज के महानिरीक्षक (IG) विकास वैभव ने कड़ा रुख अपनाया है। आईजी विकास वैभव ने स्पष्ट रूप से कहा कि महिलाओं की गरिमा, सम्मान और सुरक्षा को ठेस पहुँचाने वाले किसी भी अपराध को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। ऐसे अपराधों में शामिल लोगों के खिलाफ पुलिस बेहद कड़ी कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित कर रही है।

आईजी ने यह भी आश्वासन दिया कि मामले की गंभीरता को देखते हुए गया पुलिस इस केस में त्वरित सुनवाई (स्पीडी ट्रायल) सुनिश्चित करने का पूरा प्रयास करेगी। पुलिस का लक्ष्य है कि वैज्ञानिक और तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर अदालत में जल्द से जल्द चार्जशीट दाखिल की जाए, ताकि न्यायिक कार्यवाही बिना किसी देरी के पूरी हो सके और आरोपित को कानून के तहत निर्धारित अधिकतम व उचित सजा दिलाई जा सके।

बेटियों की सुरक्षा और उनके डिजिटल स्पेस को लेकर चिंता

गयाजी के बाँकेबाजार की इस घटना ने एक बार फिर सोशल मीडिया के दुरुपयोग और ग्रामीण इलाकों में पैर पसार रहे डिजिटल अपराधों की ओर ध्यान खींचा है। हालाँकि इस मामले में पुलिस की तत्परता, दिल्ली से लेकर उत्तर प्रदेश और पटना तक की गई घेरेबंदी और तकनीकी सूझबूझ की सराहना हो रही है। मुख्य आरोपित मोहम्मद रेहान के जेल जाने के बाद स्थानीय बाजार तो खुल गए हैं और लोगों का गुस्सा कुछ शांत हुआ है, लेकिन इलाके के अभिभावकों में अब भी अपनी बेटियों की सुरक्षा और उनके डिजिटल स्पेस को लेकर चिंता बनी हुई है। अब सबकी नजरें कोर्ट के ट्रायल पर टिकी हैं, जहाँ इस बात का फैसला होगा कि पीड़ित बेटियों को कितनी जल्दी न्याय मिलता है।

‘इस अव्यवस्था के जिम्मेदार गोपाल राव हैं’: राम मंदिर चंदा चोरी केस में निर्मोही अखाड़े के निशाने पर ‘बिना पद वाले सबसे पॉवरफुल’ शख्स, जानिए- कौन हैं नागरकट्टे?

अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावा चोरी का मामला सामने आने के बाद हर दिन इससे जुड़े नए-नए विवाद सामने आ रहे हैं। अब निर्मोही अखाड़ा ने गोपाल राव नागरकट्टे को इस विवाद का सबसे बड़ा चेहरा बताया है। गोपाल राव नागरकट्टे ट्रस्ट में किसी आधिकारिक प्रशासनिक पद पर न होते हुए भी मंदिर प्रबंधन के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति माने जाते हैं।

चंदा चोरी विवाद गहराने के बाद अब ट्रस्ट के आजीवन सदस्य और निर्मोही अखाड़ा के प्रमुख महंत दिनेंद्र दास ने गोपाल राव पर सीधे और गंभीर आरोप लगाए हैं। वहीं दूसरी तरफ, विश्व हिंदू परिषद (VHP) के अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार ने साफ कर दिया है कि इस मामले में किसी को बख्शा नहीं जाएगा और चाहे कोई भी हो, उसकी भूमिका की पूरी जाँच होगी।

‘गोपाल राव राजनीति कर रहे’: निर्मोही अखाड़ा का आरोप

राम मंदिर ट्रस्ट के सदस्य और निर्मोही अखाड़ा के प्रमुख महंत दिनेंद्र दास ने गोपाल राव को इस पूरे विवाद और अव्यवस्था के लिए जिम्मेदार ठहराया है। महंत दिनेंद्र दास ने कहा कि गोपाल राव राम मंदिर की पुरानी वैष्णव परंपराओं को ताक पर रखकर ‘राजनीति खेल रहे हैं’। वे उत्तर प्रदेश की राम परंपरा को छोड़कर जबरन दक्षिण की परंपरा थोपने का प्रयास कर रहे हैं, जिससे मंदिर में अव्यवस्था फैली है।

महंत दिनेंद्र दास ने आपत्ति जताई कि गर्भगृह में राम लला की सेवा के लिए केवल उन्हीं लोगों को जाने की अनुमति होनी चाहिए जो कंठी पहनते हैं और दीक्षित हैं, लेकिन ट्रस्ट में इन नियमों का पालन ठीक से नहीं हो रहा है। निर्मोही अखाड़ा के प्रमुख ने चंदा चोरी मामले में गिरफ्तार आरोपित टिन्नू यादव का जिक्र करते हुए कहा कि गोपाल राव ने ऐसे गलत लोगों को शह दी है।

उन्होंने आगे कहा, “हमने गोपाल राव को ट्रस्ट में लाकर गलती की। उन्हें अनिल मिश्रा ने पेश किया था और अब हम ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।” महंत दिनेंद्र दास ने माँग की है कि गोपाल राव को तुरंत उनके पद और ट्रस्ट के आंतरिक कामकाज से दूर किया जाना चाहिए। हालाँकि, उन्होंने चंपत राय का बचाव करते हुए कहा कि चंपत राय के साथ उनके अपने लोगों ने ही धोखा किया है।

‘चंपत राय का इस्तीफा हुआ, गोपाल राव की भी हो जाँच’: VHP नेता का बयान

विश्व हिंदू परिषद के वरिष्ठ नेता और कानूनी विशेषज्ञ आलोक कुमार ने एक टीवी इंटरव्यू में इस पूरे विवाद पर अपनी बात रखी है। आलोक कुमार ने दावा किया कि उन्हें पक्का मालूम है कि चंपत राय और अनिल मिश्रा दोनों ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया है। ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरी जी ने उनके इस्तीफे को स्वीकार किया है और आगामी ट्रस्ट की बैठक में इस पर चर्चा होगी।

इंटरव्यू में जब आलोक कुमार से पूछा गया कि चंपत राय ने 7 जून को बयान दिया था कि ‘चोरी का कोई सबूत नहीं है और ऑडिट चल रहा है’, जबकि पुलिस 4 जून को ही रिकवरी कर चुकी थी, तो आलोक कुमार ने कहा, “मैं चंपत जी के उस बयान का समर्थन नहीं कर सकता। वह बयान नहीं आना चाहिए था। सत्य के साथ कोई समझौता नहीं होना चाहिए।” हालाँकि, उन्होंने चंपत राय की तारीफ करते हुए यह भी कहा कि अयोध्या में क्या हो रहा है, यह चंपत जी से छुपा नहीं रहता था।

इसके अलावा, जब आलोक कुमार से पूछा गया कि गोपाल राव ट्रस्ट में न होते हुए भी वहाँ क्या कर रहे थे, तो उन्होंने कहा कि गोपाल राव वहाँ अन्य ट्रस्टियों की व्यवस्थाओं में सहायता कर रहे थे। उन्होंने स्पष्ट कहा, “जो भी आरोपित है, उसकी गहन जाँच होनी चाहिए। पुलिस को बिना किसी परिणाम की परवाह किए पूरी छूट के साथ जाँच करनी चाहिए, किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा।”

अयोध्या के संतों के हाथ में मंदिर सौंपने की माँग पर आलोक कुमार ने असहमति जताई। उन्होंने कहा कि संतों को भगवान की पूजा के लिए समय चाहिए। इतने बड़े संगठन और परिसर को चलाने के लिए प्रशासनिक अनुभव और प्रबंधन की विशेषज्ञता रखने वाले लोगों की भी जरूरत होती है, इसलिए उन्हें ट्रस्ट से बाहर नहीं रखा जा सकता।

कौन हैं गोपाल राव नागरकट्टे?

गोपाल राव मूल रूप से कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ जिले के निवासी हैं। वे शैक्षणिक योग्यता में भौतिकी विज्ञान (Physics) से परास्नातक (M.Sc.) हैं। गोपाल राव लंबे समय तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के समर्पित पदाधिकारी रहे हैं और कर्नाटक में संघ के प्रांत प्रचारक की भूमिका निभा चुके हैं। वर्तमान में वे विश्व हिंदू परिषद (VHP) के केंद्रीय सह मंत्री पद पर कार्यरत हैं।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जब अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण शुरू हुआ, तो उन्हें पहले निर्माण प्रभारी बनाया गया और बाद में राम मंदिर का व्यवस्थापक (एडमिनिस्ट्रेटर) नियुक्त किया गया। पिछले साल उन्हें ट्रस्ट में एक विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में भी शामिल किया गया, हालाँकि इसकी कोई आधिकारिक घोषणा कभी नहीं की गई।

ट्रस्ट में बिना पद के भी अपार शक्तियाँ और ‘पावरफुल’ रसूख

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय के बाद गोपाल राव को मंदिर प्रबंधन में दूसरा सबसे प्रभावशाली व्यक्ति माना जाता है। ट्रस्ट में कोई बड़ा प्रशासनिक पद न होने के बावजूद मंदिर की लगभग सभी गतिविधियों में उनका सीधा हस्तक्षेप रहता है। मंदिर परिसर का कोई भी आयोजन हो, भगवान के भोग की सामग्री की खरीद हो या पुजारियों का प्रबंधन… सब कुछ इन्हीं के जिम्मे है।

इसके अलावा, दर्शन और वीवीआईपी (VVIP) आरती पास जारी करने की बेहद संवेदनशील जिम्मेदारी भी वही संभालते हैं। नियमतः यह अधिकार केवल चंपत राय, अनिल मिश्रा या जिले के वरिष्ठ अधिकारियों (DM, SSP) के पास है, लेकिन गोपाल राव भी अपने नाम से VVIP पास जारी करते रहे हैं। यही नहीं, उन्होंने अपने एक रिश्तेदार को भी मंदिर के कार्यों से जोड़ रखा था, जो कथित तौर पर गोपाल राव की ID का इस्तेमाल कर VVIP बुकिंग और मंदिर के अन्य कार्यों में हस्तक्षेप करता था। मंदिर निर्माण के वक्त पत्थरों की खरीदारी कहाँ से होनी है, इसमें भी गोपाल राव की अपरोक्ष भूमिका थी।

अगर विधायिका भी माँगने लगे जस्टिस जामदार जैसी छूट तो… बॉम्बे हाई कोर्ट की ‘वॉशिंग मशीन’ और ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ जैसी टिप्पणी कितनी सही?

बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस माधव जामदार की एक मामले में की गईं मौखिक टिप्पणियों की खूब चर्चा हो रही है। यह मामला मुंबई पुलिस के उस एक्सटर्नमेंट ऑर्डर से जुड़ा था जिसमें SDPI के पदाधिकारी सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी को विरोध-प्रदर्शनों और नारों के चलते शहर से बाहर करने की कार्रवाई का सामना करना पड़ा था। इस मामले में जस्टिस माधव जामदार की टिप्पणियों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि न्यायपालिका की सीमा कहाँ खत्म होनी चाहिए है?

जस्टिस जामदार ने तीखे अंदाज में पुलिस से कहा कि नागरिकों को सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है, वे विरोध नहीं कर सकते, वे सरकार के खिलाफ नारे नहीं लगा सकते और लोग प्रदर्शन करेंगे तो आप केस लगा देंगे। इस हिस्से तक अदालत की चिंता बिल्कुल सही थी क्योंकि शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र का मूल अधिकार है और विरोध प्रदर्शन या आलोचना लोकतंत्र की आत्मा में बसी हुई है।

लेकिन बात इससे आगे की है। जस्टिस जामदार ने इससे आगे बढ़कर महाराष्ट्र की राजनीति, दल-बदल, ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ और ‘वॉशिंग मशीन’ जैसे राजनीतिक मुहावरों का जिक्र कर दिया। लाइव लॉ की रिपोर्ट में जस्टिस जामदार का बयान छपा है। वे कहते हैं, “आपको (सईद) भी पाला बदल लेना चाहिए… वैसे भी पूरे महाराष्ट्र में हॉर्स ट्रेडिंग चल रही है। आपके खिलाफ कुछ FIR हैं… पाला बदलने के बारे में सोचिए, वहाँ एक ‘वॉशिंग मशीन’ है।”

यही वह जगह है जहाँ सवाल उठता है कि क्या अदालत कानून की भाषा में बोल रही थी या वो ऐसी टिप्पणी कर रही थी जिससे बचा जा सकता था? पुलिस की कार्रवाई को गलत ठहराना न्यायिक काम है। नागरिक के विरोध के अधिकार की रक्षा करना अदालत का कर्तव्य है। लेकिन किसी प्रदेश की राजनीतिक संस्कृति पर कटाक्ष करना, दल-बदल पर टिप्पणी करना या ‘वॉशिंग मशीन’ जैसा शब्द इस्तेमाल करना न्यायिक मर्यादा के लिहाज से क्या सही लगता है?

लोकतंत्र में अदालतें सरकार पर अंकुश लगाने के लिए हैं, सरकार की जगह लेने के लिए नहीं। न्यायपालिका का काम यह देखना है कि प्रशासन संविधान और कानून के भीतर काम कर रहा है या नहीं। अगर पुलिस विरोध करने वाले व्यक्ति पर मनमानी कार्रवाई करती है, तो कोर्ट को उसे रोकना चाहिए। यहाँ यह बात भी हम लोगों को याद रखनी चाहिए कि कोर्ट की शक्ति उसकी राजनीतिक चुटकी में नहीं बल्कि उसके आदेश की संवैधानिक मजबूती में है।

यह समस्या इसलिए और बड़ी लगती है क्योंकि न्यायपालिका खुद अपनी छवि को लेकर बहुत संवेदनशील रहती है। हाल ही में NCERT की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की किताब में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ को लेकर चैप्टर दिए जाने का सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान तक ले लिया था। यहाँ तक की कोर्ट ने उन 3 लोगों पर बैन तक लगा जिन्होंने यह चैप्टर लिखा था। हालाँकि, बाद में यह बैन हटा दिया गया।

बाद में NCERT को किताब का वितरण रोकना पड़ा और इसे अपनी ओर से ‘त्रुटिपूर्ण निर्णय’ माना। कोर्ट ने तब कहा था, “इससे व‍िद्यार्थ‍ियों के मन में, उन्हें पढ़ाने वाले शिक्षकों, छोटे बच्चे-बच्‍च‍ियों के माता-पिता, पूरे समाज में और अंततः अगली पीढ़ी तक… न्‍यायपाल‍िका जैसी संस्‍था के प्रति भरोसे के धीरे-धीरे कमजोर पड़ने का खतरा पैदा होता है।”

यहीं असली प्रश्न खड़ा होता है। अगर न्यायपालिका चाहती है कि उसके बारे में लिखते या बोलते समय समाज संयम रखे, तो क्या वही संयम न्यायपालिका की अपनी भाषा पर लागू नहीं होना चाहिए? अगर किताब में न्यायपालिका पर आलोचनात्मक टिप्पणी बच्चों के मन में कोर्ट के प्रति अविश्वास पैदा कर सकती है, तो क्या अदालत की कुर्सी से आई राजनीतिक टिप्पणी जनता के मन में यह धारणा नहीं बना सकती है कि जज किसी खास राजनीतिक विमर्श से प्रभावित हैं? यह सवाल हम आप पर छोड़ देते हैं।

इस मामले में एक सवाल यह भी खड़ा होता है कि अगर अदालत से ‘वॉशिंग मशीन’, ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ और ‘साइड बदल लो’ जैसी राजनीतिक टिप्पणियाँ की जा सकती हैं, तो क्या यही स्वतंत्रता कार्यपालिका और विधायिका को भी मिलेगी? क्या कोई मंत्री, विधायक या सांसद किसी जज या कोर्ट के फैसले पर इसी अंदाज में टिप्पणी कर सकता है? हम और आप जानते हैं कि ऐसा होते ही बात तुरंत ‘न्यायपालिका की गरिमा’ और ‘अवमानना’ तक पहुँच जाती है। फिर सवाल यह है कि न्यायपालिका आलोचना सहने में क्या उतनी उदारता दिखाएगी जितनी वह इस मामले में आक्रामक हो रही है?

एक गंभीर मुद्दा और भी है जिस पर ध्यान देना जरूरी है। याचिकाकर्ता SDPI से जुड़ा हुआ था, SDPI उस PFI का अंग है जिसे गृह मंत्रालय ने बैन कर दिया है। PFI और उसके 8 सहयोगी संगठनों को 28 सितंबर 2022 को UAPA के तहत प्रतिबंधित कर दिया गया था। इन पर टेरर फंडिंग और देश विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप है।

जब किसी व्यक्ति की पृष्ठभूमि ऐसे संगठन से जुड़ी हों जिसके आसपास कट्टरता, हिंसा, टेरर फंडिंग और दंगा-संबंधी आशंकाएँ हों तो उसे बिल्कुल सामान्य राजनीतिक प्रदर्शन की तरह देखना भी शायद पूरा ठीक दृष्टिकोण नहीं होगा। ऐसे में इसे केवल सामान्य राजनीतिक विरोध मान लेना भी कहाँ तक सही होगा यह भी सोचने की बात है। क्योंकि SDPI-PFI संदर्भ में मामला केवल ‘फ्री स्पीच’ का नहीं रह जाता है?

भारत में न्यायिक आचरण को लेकर ‘Restatement of Values of Judicial Life’ जैसे सिद्धांत भी मौजूद हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 1997 में इस 16-सूत्रीय चार्टर को अपनाया था। इसमें कहा गया है कि जजों को राजनीतिक विषयों पर सार्वजनिक बहस में शामिल नहीं होना चाहिए और उन्हें अपने फैसलों को बोलने देना चाहिए। यह बात केवल भाषणों या इंटरव्यू पर लागू नहीं होती बल्कि अदालत की मौखिक टिप्पणियों पर भी नैतिक रूप से लागू होनी चाहिए।

Uber, ओला, Rapido… एक ही जगह का किराया बार-बार क्यों बदलता रहता है?, कैसे बचाएँ अपनी जेब के पैसे

क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि आप और आपका दोस्त एक ही जगह खड़े होकर एक ही मंजिल के लिए कैब बुक कर रहे हों, लेकिन दोनों के फोन में किराया अलग-अलग दिख रहा हो? या कल तक जिस 5 किलोमीटर के सफर के लिए आपने 120 रुपए दिए थे, आज उसी रूट पर ऐप 300 रुपए माँग रहा हो? कभी बारिश आ जाए या ऑफिस छूटने का समय हो, तो कैब और बाइक टैक्सियों का किराया आसमान छूने लगता है।

अक्सर उपभोक्ताओं को लगता है कि ये कंपनियाँ अपनी मनमर्जी से पैसे वसूल रही हैं। सोशल मीडिया पर भी इसे लेकर कई तरह के दावे किए जाते हैं। लेकिन इसके पीछे एक पूरा गणित, तकनीकी एल्गोरिदम और सरकार के नए नियम काम करते हैं। आइए समझते हैं कि टैक्सियों के किराए का यह पूरा खेल क्या है और आप एक स्मार्ट उपभोक्ता बनकर अपने पैसे कैसे बचा सकते हैं।

किराए के उतार-चढ़ाव का असली गणित: सर्ज प्राइसिंग और सरकारी नियम

टैक्सी ऐप्स का किराया कभी कम तो कभी ज्यादा क्यों होता है, इसका सबसे बड़ा कारण ‘सर्ज प्राइसिंग‘ (Surge Pricing) या ‘डायनेमिक प्राइसिंग’ है। Uber, ओला और Rapido जैसी कंपनियाँ पूरी तरह डिमांड (माँग) और सप्लाई (ड्राइवर्स की उपलब्धता) के सिद्धांत पर काम करती हैं।

जब किसी खास इलाके में एक ही समय पर कैब बुक करने वाले लोग (डिमांड) बहुत ज्यादा हो जाते हैं और वहाँ गाड़ियाँ या ड्राइवर्स (सप्लाई) कम होते हैं, तो ऐप का कंप्यूटर सिस्टम अपने आप किराया बढ़ा देता है।

कंपनियों का तर्क है कि वे ऐसा इसलिए करती हैं ताकि बढ़े हुए किराए को देखकर दूसरे इलाकों से ड्राइवर्स उस हाई-डिमांड वाले इलाके की तरफ आएँ और यात्रियों को जल्दी गाड़ी मिल सके। सुबह 8 से 11 बजे का ऑफिस टाइम, शाम 5 से 9 बजे का घर लौटने का वक्त, तेज बारिश, त्योहार या एयरपोर्ट-रेलवे स्टेशन जैसे भीड़भाड़ वाले इलाकों में अक्सर यही स्थिति बनती है।

इसके अलावा, सरकार के नए नियमों ने भी इस खेल को बदल दिया है। केंद्र सरकार की मोटर व्हीकल एग्रीगेटर गाइडलाइंस के तहत Uber, उबर और Rapido जैसी कंपनियों को पीक आवर्स (ज्यादा भीड़ वाले समय) में बेस किराए का दोगुना (2x) तक वसूलने की कानूनी मंजूरी दी गई है।

पहले यह सीमा केवल डेढ़ (1.5) गुना थी। हालाँकि, सरकार ने ड्राइवरों की सुरक्षा और आय सुनिश्चित करने के लिए नॉन-पीक आवर्स (कम माँग वाले समय) में न्यूनतम किराया बेस किराए का कम से कम 50% रखने का नियम भी बनाया है, जिससे कंपनियाँ अब बहुत ज्यादा सस्ती राइड्स नहीं दे सकती हैं।

स्मार्ट उपभोक्ता कैसे बनें: पैसे बचाने के व्यावहारिक तरीके

अगर आप रोज-रोज के बढ़े हुए किराए से परेशान हैं, तो थोड़ा स्मार्ट बनकर अपनी जेब का बोझ कम कर सकते हैं। इसके लिए कुछ बेहद आसान और व्यावहारिक तरीके नीचे दिए गए हैं।

5 से 10 मिनट का इंतजार करें: अगर आपको कहीं पहुँचने की बहुत ज्यादा जल्दी नहीं है, तो किराया बहुत हाई दिखने पर तुरंत बुक न करें। थोड़ी देर रुक जाएँ। जैसे ही उस इलाके में माँग थोड़ी कम होगी या ड्राइवर्स बढ़ेंगे, सर्ज प्राइसिंग अपने आप खत्म हो जाएगी और किराया अचानक कम हो जाएगा।

मल्टी-ऐप स्ट्रेटेजी (Multi-App Strategy) अपनाएँ: कभी भी केवल एक ऐप के भरोसे न बैठें। बुकिंग करने से पहले अपने फोन में Uber, उबर और Rapido और इनड्राइव (InDrive) जैसी कम से कम दो-तीन ऐप्स पर किराया जरूर चेक करें। कई बार एक ही समय पर दोनों ऐप्स के किराए में 100 रुपए से लेकर 150 रुपए तक का अंतर देखने को मिल जाता है।

हाई-डिमांड जोन से थोड़ा बाहर निकलें: अगर आप किसी बड़े मॉल, एयरपोर्ट या रेलवे स्टेशन के ठीक एग्जिट गेट पर खड़े हैं, तो वहाँ ऐप का एल्गोरिदम बहुत ज्यादा किराया दिखाएगा। ऐसे में थोड़ा सा पैदल चलकर मुख्य सड़क या थोड़ी आगे की लोकेशन डालकर सर्च करें। हाई-डिमांड जोन से बाहर आते ही कीमत काफी गिर जाती है।

पूल या शेयर्ड राइड का इस्तेमाल करें: जहाँ भी संभव हो, शेयर्ड राइड का विकल्प चुनें। यह अकेले सफर करने के मुकाबले आपकी जेब पर काफी हल्का पड़ता है।

क्या वाकई iphone और Android का रेट अलग है?

हाल ही में सोशल मीडिया पर कई ऐसे स्क्रीनशॉट वायरल हुए, जिसमें देखा गया कि एक ही जगह के लिए आईफोन (iPhone) पर ज्यादा और एंड्रॉयड (Android) फोन पर कम किराया दिखाया जा रहा था। या कभी आईफोन पर कम और एंड्रॉयड पर ज्यादा दिखाने लगता है।

इस मामले ने इतना तूल पकड़ा कि सेंट्रल कंज्यूमर प्रोटेक्शन अथॉरिटी (CCPA) ने ओला और Uber को नोटिस भेजकर किराया तय करने की पूरी प्रक्रिया का जवाब माँगा है। हालाँकि कंपनियाँ इस बात से इनकार करती हैं कि वे फोन देखकर किराया बदलती हैं, लेकिन तकनीकी एक्सपर्ट्स इसके पीछे ‘यूजर बिहेवियर’ (User Behavior) यानी उपभोक्ता के व्यवहार को बड़ी वजह मानते हैं।

ये ऐप्स आपकी पुरानी राइड्स, आपकी लोकेशन और आपकी हर एक्टिविटी को ट्रैक करते हैं। यदि आप एक रेगुलर कस्टमर हैं और ऐप को पता है कि आप इस रूट पर रोज सफर करते हैं, तो आपको थोड़ा ज्यादा किराया दिख सकता है, चाहे आपके पास कोई भी फोन हो।

ऐप का एल्गोरिदम यह भांप लेता है कि आप जरूरत में हैं और भुगतान करने के लिए तैयार हैं। इसके अलावा, फोन की बैटरी कम होने पर ज्यादा किराया दिखाने का दावा भी सोशल मीडिया पर बहुत किया जाता है, लेकिन इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और कंपनियाँ इसे सिर्फ एक अफवाह बताती हैं।

कौन सी टैक्सी है सबसे फायदेमंद?

आजकल बाजार में टैक्सी बुक करने के कई नए विकल्प आ गए हैं। हाल ही में दिल्ली जैसे शहरों में ‘भारत टैक्सी’ की शुरुआत हुई है। यह सर्विस ओला और Uber से बिल्कुल अलग तरीके से काम करती है। जहाँ ओला, उबर और रैपिडो का किराया समय और भीड़ के हिसाब से बदलता रहता है, वहीं भारत टैक्सी का किराया हमेशा एक समान (फिक्स्ड) रहता है।

ओला-उबर में बारिश या ऑफिस के समय किराया दोगुना तक बढ़ जाता है, लेकिन भारत टैक्सी में ऐसा कोई बदलाव नहीं होता है। अगर आप ऑफिस के समय या भारी बारिश में 12 किलोमीटर से ज्यादा दूर जा रहे हैं, तो आपके लिए ‘भारत टैक्सी‘ सबसे बेस्ट है।

इसमें कोई सर्ज प्राइसिंग (बढ़ा हुआ किराया) नहीं लगती है। इस वजह से यह ओला और उबर के मुकाबले करीब 20% से 30% तक सस्ती पड़ती है। वहीं सामान्य दिनों में कम दूरी के लिए ओला मिनी या उबर गो भी अच्छे विकल्प हैं।

अगर आप अकेले सफर कर रहे हैं, तो आपके लिए ‘Rapido’ या ‘उबर मोटो’ जैसी बाइक टैक्सी सबसे बढ़िया हैं। दिल्ली जैसे भीड़भाड़ वाले शहरों में ये बाइक टैक्सियाँ तंग गलियों से आसानी से निकल जाती हैं। इससे आपके पैसे और समय दोनों की बचत होती है। इलेक्ट्रिक स्कूटरों के आने से अब इनका किराया भी काफी कम और किफायती हो गया है।

भारतीय और विदेशी टैक्सी मॉडल में क्या अंतर है?

भारत और विदेशों (जैसे अमेरिका या यूरोप) के टैक्सी सिस्टम में नियमों, ड्राइवरों की कमाई और लोगों की जरूरतों का बड़ा अंतर है। विदेशी देशों में लेबर कानून बहुत कड़े होते हैं और वहाँ ड्राइवरों के लिए एक न्यूनतम मजदूरी तय होती है। इस वजह से वहाँ टैक्सियों का शुरुआती (बेस) किराया हमेशा बहुत ज्यादा होता है।

इसके विपरीत, भारत में ओला और Uber जैसी कंपनियाँ ड्राइवरों की कुल कमाई का 20% से 25% तक हिस्सा कमीशन के रूप में खुद रख लेती हैं। लेकिन अब भारत में रैपिडो जैसी देसी ऐप्स ने एक नया ‘ज़ीरो कमीशन मॉडल’ शुरू किया है। इसमें ड्राइवर कंपनियों को रोज का सिर्फ 20 या 30 रुपए का छोटा सा चार्ज देते हैं और बाकी की पूरी कमाई अपने पास रखते हैं।

साथ ही, भारत की सड़कों और ट्रैफिक को देखते हुए यहाँ बाइक टैक्सी और ऑटो बुक करने का चलन विदेशों से कहीं ज्यादा बड़ा और सफल है। एक और अच्छी बात यह भी है कि भारत सरकार ने ड्राइवरों की सुरक्षा के लिए 5 लाख रुपए का हेल्थ इंश्योरेंस और 10 लाख रुपए का लाइफ इंश्योरेंस अनिवार्य किया है, जो कि पूरी दुनिया में एक बहुत बड़ा और सराहनीय कदम है।

जब ड्राइवर माँगे ऐप से ज्यादा किराया, तो???

कई बार कैब या बाइक टैक्सी से सफर करते समय ग्राहकों को धोखाधड़ी का सामना करना पड़ता है। जैसे, एक यात्री ने अपनी आपबीती बताते हुए कहा कि Rapido बुक करते समय उसका किराया 450 रुपए तय हुआ था, लेकिन सफर खत्म होने पर ड्राइवर ने अपने फोन में एक फर्जी मीटर ऐप दिखाकर जबरन 784 रुपए वसूल लिए।

अगर आपके साथ भी कभी ऐसी स्थिति बनती है, तो आपको कुछ बातों का खास ख्याल रखना चाहिए। सबसे पहले तो ड्राइवर को ऐप में दिखाए गए किराए से एक भी रुपया अतिरिक्त कैश न दें। बुकिंग के समय ऐप जो ‘अपफ्रंट फेयर’ यानी तय किराया दिखाता है, हमेशा उसी के हिसाब से भुगतान करें और ड्राइवर के किसी भी बाहरी ऐप या अलग मीटर की रीडिंग को पूरी तरह से खारिज कर दें।

इस तरह की धोखाधड़ी से बचने का एक और बेहतरीन तरीका यह है कि आप हमेशा ऑनलाइन पेमेंट को ही प्राथमिकता दें। जब आप ऐप के माध्यम से सीधे डिजिटल पेमेंट (UPI या वॉलेट) करते हैं, तो ड्राइवर आपसे जबरदस्ती नकद पैसे नहीं माँग पाता है। इसके अलावा, अगर आप परिवार के साथ सफर कर रहे हैं और सुरक्षा के लिहाज से आपको उस समय मजबूरी में ड्राइवर को माँगे गए पैसे देने भी पड़ जाएँ, तो बिल्कुल घबराएँ नहीं।

आप सफर खत्म होने के तुरंत बाद ऐप के ‘हेल्प’ सेक्शन में जाएँ और ‘ट्रिप इश्यूज’ के तहत अपनी शिकायत दर्ज कराएँ। इसके साथ ही, आप भारत सरकार की नेशनल कंज्यूमर हेल्पलाइन के टोल-फ्री नंबर 1915 पर कॉल करके भी इस धोखाधड़ी की रिपोर्ट आसानी से दर्ज करा सकते हैं।

तकनीक के इस दौर में समझदारी ही सबसे बड़ा डिस्काउंट है

सीधे शब्दों में कहें तो ओला, Uber या Rapido जैसी ऐप्स कोई चैरिटी नहीं चला रही हैं। उनका पूरा सिस्टम एक ऐसे दिमाग (एल्गोरिदम) से चलता है जिसे सिर्फ मुनाफा और संतुलन समझ आता है। वो आपकी मजबूरी, आपका समय और यहाँ तक कि आपके फोन के ब्रांड को भी भाँपने की ताकत रखता है। ऐसे में खीझने या परेशान होने से बेहतर है कि आप खुद एक ‘स्मार्ट यूजर’ बनें।

अपने फोन में दो-तीन विकल्प हमेशा तैयार रखिए। जब कंपनियों के पास एल्गोरिदम की ताकत है, तो आपके पास ‘तुलना करने और चुनने’ की आजादी है। थोड़ा रुककर, ऐप्स बदलकर और सही गाड़ी का चुनाव करके आप हर महीने अपनी जेब से होने वाले फिजूल खर्च को आसानी से रोक सकते हैं। डिजिटल दौर का यही नियम है, जो सतर्क है, वही फायदे में है।

सिनेमाई परदे पर यूरोप की सुलगती हकीकत है Citizen Vigilante Movie: समझें- क्यों परेशान हैं दुनिया भर के इस्लामी कट्टरपंथी और लेफ्ट लिबरल?

सिनेमा हमेशा से समाज का आईना रहा है, लेकिन जब कोई फिल्म समाज के उस हिस्से को दिखाती है जिसे राजनीतिक व्यवस्था और मुख्यधारा का मीडिया छिपाना चाहता है, तो विवाद होना तय है। साल 2026 में आई निर्देशक उवे बोल की फिल्म ‘सिटीजन विजिलांते’ (Citizen Vigilante) इसी तरह के एक बेहद संवेदनशील, कड़वे और सुलगते हुए मुद्दे पर चोट करती है।

यह फिल्म आज के यूरोप की उस जमीनी हकीकत को बयाँ करती है, जिससे वहाँ का आम नागरिक रोज जूझ रहा है यानी अनियंत्रित अवैध अप्रवासन (Illegal Migration), बढ़ता हुआ अपराध और इस्लामी कट्टरपंथ के आगे घुटने टेकती प्रशासनिक व्यवस्था।

यह फिल्म एक साधारण ‘एक्शन-थ्रिलर’ नहीं है, बल्कि यह यूरोप के आम लोगों की उस दबी हुई चीख और हताशा का प्रतिनिधित्व करती है, जिसे ‘वोक’ (Woke) राजनीति और लिबरल एजेंडे के तहत दबा दिया गया है। यही वजह है कि रिलीज होते ही इस फिल्म को जर्मनी और यूरोपीय संघ (EU) के कई हिस्सों में अघोषित रूप से प्रतिबंधित या सेंसर कर दिया गया। लेकिन इंटरनेट के इस दौर में सच को दबाना नामुमकिन था और यही कारण है कि एलोन मस्क जैसी वैश्विक शख्सियतों के समर्थन के बाद यह फिल्म दुनिया भर में चर्चा का विषय बन गई है।

क्या है ‘सिटीजन विजिलांते’ की कहानी और क्यों वामपंथियों को हो रहा दर्द?

‘सिटीजन विजिलांते’ की कहानी एक अनाम यूरोपीय शहर की पृष्ठभूमि पर आधारित है, जो आज के किसी भी बड़े यूरोपीय शहर (जैसे पेरिस, बर्लिन या लंदन) की स्थिति को दर्शाता है। फिल्म की शुरुआत एक बेहद विचलित करने वाले दृश्य से होती है, जहाँ एक युवा माँ को उसके मासूम बच्चे के सामने ही एक अप्रवासी (Migrant) द्वारा सरेआम चाकू मारकर मार दिया जाता है। यह दृश्य ही फिल्म का टोन सेट कर देता है और दिखाता है कि कैसे कभी सुरक्षित माने जाने वाले यूरोपीय शहर अब असुरक्षा के गर्त में जा चुके हैं, जहाँ महिलाएँ शाम के बाद बाहर निकलने से डरती हैं।

फिल्म का मुख्य किरदार ‘माइकल सैंडर्स’ (आर्मी हैमर द्वारा अभिनीत) एक पूर्व अमेरिकी सैन्य अधिकारी है। वह अपने दिवंगत पिता के रियल एस्टेट व्यवसाय को संभालने के लिए यूरोप आता है, लेकिन वहां के बिगड़ते हालात और कानून-व्यवस्था के पतन को देखकर उसका खून खौल उठता है। जब वह देखता है कि पुलिस, अदालतें और सरकारी तंत्र अपराधियों को सजा देने के बजाय उनके मानवाधिकारों और ‘इंटीग्रेशन’ (समाज में घुलने-मिलने) के नाम पर उन्हें छोड़ रहे हैं, तो वह खुद कानून अपने हाथ में लेने का फैसला करता है। वह बनता है ‘सिटीजन विजिलांते’।

माइकल सैंडर्स का निशाना केवल वो अपराधी नहीं हैं जो सड़कों पर महिलाओं का उत्पीड़न करते हैं या अपराध फैलाते हैं, बल्कि उसका असली गुस्सा उन जजों, वकीलों और नेताओं पर है जो अपनी तुष्टिकरण की राजनीति और ‘वोक’ विचारधारा के कारण इन अपराधियों को बचाते हैं। पूरी फिल्म में माइकल एक-एक करके ऐसे अपराधियों और उनके संरक्षकों का खात्मा करता है, जो कानून की कमियों का फायदा उठाकर खुलेआम घूम रहे हैं।

इस्लामी कट्टरपंथ, वामपंथ और लिबरलों की नाराजगी का असली कारण

इस फिल्म को लेकर वामपंथी (Leftists), लिबरल (Liberals) और इस्लामी संगठन इस कदर नाराज क्यों हैं? इसका सीधा जवाब यह है कि यह फिल्म उनके बरसों से बनाए गए नैरेटिव को पूरी तरह ध्वस्त कर देती है। लिबरल और वामपंथी ताकतों ने हमेशा ‘खुली सीमाओं’ (Open Borders) और बिना किसी जाँच-परख के अप्रवासियों के स्वागत की वकालत की है। लेकिन जब इन अप्रवासियों के बीच से निकले कुछ चरमपंथी और अपराधी तत्व वहां के मूल नागरिकों पर हमले करते हैं, तो यही लिबरल गैंग इसे ‘अपवाद’ बताकर दबाने की कोशिश करता है।

‘सिटीजन विजिलांते’ में ऐसी कई बातें दिखाई गई हैं जो इस लॉबी को सीधे तौर पर चुभती हैं-

अपराधियों को ‘विक्टिम’ बताने वाले तंत्र पर चोट: फिल्म का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा वह है जहां एक नाबालिग बलात्कार पीड़िता न्याय के लिए भटक रही है। छह अप्रवासी उपद्रवियों ने उसका सामूहिक बलात्कार किया, लेकिन अदालत के जज ‘रेनहोल्ड’ ने उन अपराधियों को यह कहकर छोड़ दिया कि “ये लोग बाहरी हैं, इन्हें समाज में घुलने-मिलने में दिक्कतें आ रही हैं, इसलिए ये भी एक तरह से पीड़ित हैं।”

यह दृश्य सीधे तौर पर यूरोप के वास्तविक कोर्ट फैसलों पर करारा व्यंग्य है, जहाँ अपराधियों के सीरियाई/अफ्रीकी/मिडिल ईस्ट की हिंसक बैकग्राउंड का हवाला देकर उन्हें हल्की सजा या माफी दे दी जाती है। जब माइकल सैंडर्स उस जज को उसके घर में घुसकर सजा देता है, तो यह वामपंथी न्याय प्रणाली के मुँह पर एक तमाचा है।

बिना लाग-लपेट के हकीकत दिखाना: फिल्म में यह साफ दिखाया गया है कि कैसे कुछ खास समुदाय के लोग बस में बिना टिकट यात्रा करते हैं, सड़कों पर गुंडागर्दी करते हैं और महिलाओं को वस्तु की तरह समझते हैं। जब माइकल सैंडर्स एक अपराधी ‘यूसुफ’ के घर पहुंचता है, तो उसका परिवार अपने बेटे के अपराध पर शर्मिंदा होने के बजाय उलटा पीड़िता को ही दोषी ठहराता है और अपने मजहब या सामाजिक स्थिति की दुहाई देता है। यह दृश्य दिखाता है कि कट्टरपंथ की जड़ें कितनी गहरी हैं, जहां अपराध को भी सही ठहराने की कोशिश की जाती है।

राजनीतिक गलियारों का पाखंड: फिल्म यह भी उजागर करती है कि कैसे सरकारें जनता के टैक्स के पैसे का इस्तेमाल करके खाली पड़ी संपत्तियों को अप्रवासियों के आवास के लिए हथियाना चाहती हैं, जबकि अपने ही देश के गरीब या बेघर नागरिकों को नजरअंदाज कर दिया जाता है। माइकल सैंडर्स का किरदार इस सरकारी नीति का डटकर विरोध करता है।

यूरोपीय नागरिकों की मनोस्थिति और जमीनी सच्चाई

यह फिल्म आज के समय में इतनी प्रासंगिक इसलिए है क्योंकि यह यूरोप के बहुसंख्यक मूल निवासियों की वास्तविक मनोस्थिति को दर्शाती है। आज का आम यूरोपीय नागरिक डरा हुआ भी है और गुस्से में भी। सोशल मीडिया और पब्लिक डोमेन में ऐसे हजारों मामले मौजूद हैं जो इस फिल्म की कहानी को पूरी तरह सच साबित करते हैं।

ग्रूमिंग गैंग्स का कड़वा सच: अगर हम वास्तविक दुनिया की बात करें, तो यूनाइटेड किंगडम (UK) में ‘पाकिस्तानी ग्रूमिंग गैंग्स‘ का मामला इसका सबसे बड़ा और भयानक उदाहरण है। रॉदरहैम (Rotherham), रोशडेल और ब्रिटेन के कई अन्य शहरों में सालों तक पाकिस्तानी मूल के गिरोहों ने हजारों श्वेत ब्रिटिश लड़कियों का यौन शोषण किया, उन्हें नशा दिया और उनकी जिंदगी बर्बाद कर दी।

सबसे शर्मनाक बात यह थी कि वहाँ की स्थानीय पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने केवल इसलिए कार्रवाई नहीं की क्योंकि उन्हें डर था कि उन पर ‘नस्लवादी’ (Racist) या ‘इस्लामोफोबिक’ होने का ठप्पा लग जाएगा। राजनीतिक शुद्धता (Political Correctness) के चक्कर में मासूम बच्चियों को दरिंदों के हवाले छोड़ दिया गया।

अवैध घुसपैठ और अपराधों में बाढ़: जर्मनी, फ्रांस, स्वीडन और इटली जैसे देशों में पिछले एक दशक में अप्रवासियों द्वारा किए जाने वाले चाकूबाजी (Stabbing), बलात्कार और दंगों के मामलों में अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई है। स्वीडन, जिसे कभी दुनिया का सबसे सुरक्षित देश माना जाता था, आज यूरोप की ‘गैंग वार राजधानी’ बन चुका है। फ्रांस के कई इलाकों में पुलिस जाने से डरती है, जिन्हें ‘नो-गो जोन्स’ कहा जाता है।

जब ‘सिटीजन विजिलांते’ में इन वास्तविकताओं को हूबहू दिखाया गया, तो यूरोपीय अभिजात वर्ग (Elites) सिहर उठा। उन्हें लगा कि अगर यह फिल्म आम लोगों ने देख ली, तो उनका बनाया हुआ ‘मल्टीकल्चरलिज्म’ (बहुसंस्कृतिवाद) का महल ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा। इसी डर के कारण जर्मनी के सेंसर बोर्ड ने इस फिल्म को एज रेटिंग देने से मना कर दिया, जिसका सीधा मतलब था कि इसे न तो सिनेमाघरों में दिखाया जा सकता था और न ही इसका विज्ञापन किया जा सकता था। यह सीधे तौर पर अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंटने जैसा था।

एक्स पर एलन मस्क ने सच को दिया मंच

जब यूरोप के पारंपरिक तंत्र ने फिल्म का रास्ता रोकने की कोशिश की, तब डिजिटल दुनिया के सबसे बड़े मंच ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) और उसके मालिक एलन मस्क ने इस सेंसरशिप के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। मस्क ने न सिर्फ इस फिल्म की तारीफ की, बल्कि इसे अपने हैंडल से पूरे 48 घंटों के लिए मुफ्त में प्रसारित कर दिया।

मस्क का तर्क सीधा था कि अगर आप किसी फिल्म को इसलिए प्रतिबंधित कर रहे हैं क्योंकि वह समाज के एक कड़वे सच को दिखाती है, तो यह ‘स्ट्रैसैंड इफेक्ट’ (Streisand Effect) को जन्म देगा, यानी जिसे आप छिपाना चाहेंगे, लोग उसे और ज्यादा देखेंगे। और हुआ भी यही। मस्क के इस कदम के बाद फिल्म को X पर करोड़ों व्यूज मिले। देखते ही देखते यह फिल्म एप्पल टीवी और अमेजन प्राइम वीडियो पर नंबर-1 डिजिटल परचेज बन गई।

सोशल मीडिया पर आम नागरिकों ने इस कहानी का पुरजोर समर्थन किया। लोगों का कहना था कि जो बात उनके राजनेता संसद में स्वीकार करने से डरते हैं, उसे उवे बोल ने बड़े पर्दे पर खुलकर रख दिया है। फिल्म के अंत में माइकल सैंडर्स का यह संदेश कि “जब तक नागरिक खुद की रक्षा करना नहीं सीखेंगे, तब तक यह स्थिति नहीं बदलेगी” आज के यूरोप के लिए एक चेतावनी की तरह गूँज रहा है।

डायरेक्टर से लीड एक्टर तक झेल रहे थे निजी जीवन में समस्याएँ

फिल्म के निर्माण की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। निर्देशक उवे बोल ने इस फिल्म को बनाने के लिए भारी जोखिम उठाया। उन्होंने स्वयं स्वीकार किया कि फिल्म के अंतिम हिस्से में एक मुस्लिम परिवार की भूमिका निभाने के लिए कलाकार ढूँढना उनके लिए सबसे कठिन काम था। उन्होंने सैकड़ों अभिनेताओं से संपर्क किया, लेकिन इस संवेदनशील और यथार्थवादी भूमिका को करने के लिए कोई तैयार नहीं हो रहा था, क्योंकि सभी को अपने करियर और सुरक्षा का डर था।

आखिरकार क्रोएशिया के जगरेब में इस फिल्म की शूटिंग बेहद कड़े सुरक्षा इंतजामों के बीच पूरी की गई। फिल्म का शुरुआती नाम ‘The Dark Knight’ रखा गया था, लेकिन वार्नर ब्रदर्स के कानूनी नोटिस के बाद इसे बदलकर ‘Citizen Vigilante’ किया गया।

फिल्म के मुख्य अभिनेता आर्मी हैमर (Armie Hammer) का इस फिल्म से जुड़ना भी उनके करियर का एक बड़ा टर्निंग पॉइंट है। आर्मी हैमर कभी हॉलीवुड के ए-लिस्ट सितारों में शुमार थे, लेकिन कुछ साल पहले उनके निजी जीवन से जुड़े गंभीर विवादों और आरोपों के कारण हॉलीवुड उद्योग ने उन्हें पूरी तरह दरकिनार (Cancel) कर दिया था। लंबे समय तक काम न मिलने और मानसिक व सामाजिक रूप से कटे रहने के बाद, हैमर ने इस फिल्म के जरिए वापसी की कोशिश की।

हालाँकि मुख्यधारा के आलोचकों ने उनके अभिनय और इस फिल्म की यह कहकर आलोचना की कि यह उनके करियर को और नुकसान पहुँचाएगी, लेकिन जनता के एक बड़े वर्ग ने हैमर के अभिनय की सराहना की है। फिल्म में उनके चेहरे की हताशा, गुस्सा और अकेलापन कहीं न कहीं उनके वास्तविक जीवन के संघर्षों को भी दर्शाता है।

ठीक इसी तरह निर्देशक उवे बोल को भी हॉलीवुड और मुख्यधारा के समीक्षकों द्वारा हमेशा एक विवादित और ‘खराब’ निर्देशक के रूप में पेश किया गया है, लेकिन इस फिल्म के जरिए उन्होंने साबित कर दिया कि वे बिना किसी डर के कड़े फैसले लेने वाले फिल्मकार हैं।

हालाँकि उन्होंने 2010 में होलोकास्ट पर एक बहुत जबरदस्त फिल्म Auschwitz बनाई थी, जो सच्चाई के बेहद करीब थी। उस फिल्म में भी Citizen Vigilante जैसा एकदम रॉ फुटेज एक्शन और डॉक्यूमेंट्री से जुड़े असली फुटेज इस्तेमाल किए गए थे, तब भी उन्हें ‘एकदम’ असली और परेशान करने वाले सीन दिखाने के लिए आलोचना झेलनी पड़ी थी। इस बार उन्होंने असली तो नहीं, लेकिन सिनेमाई कला के जरिए ऐसी साफगोई दिखाई है, जो हैरान-परेशान और रोंगटे खड़ी खरने वाली है।

सिटीजन विजिलांते ने कर दिया काम, छाती पीटता रहे इस्लामी कट्टरपंथी और लेफ्ट लिबरल गैंग

‘सिटीजन विजिलांते’ फिल्म न्याय प्रणाली की विफलता पर कानून को हाथ में लेने का समर्थन करती है, जो नैतिक रूप से बहस का विषय हो सकता है, लेकिन यह उस गुस्से को पूरी तरह से वैध ठहराती है जो आज यूरोप का आम नागरिक महसूस कर रहा है।

लिबरल और वामपंथी समीक्षक ‘सिटीजन विजिलांते’ फिल्म को चाहे कितनी भी कम रेटिंग क्यों न दें, इस फिल्म ने अपना काम कर दिया है। इसने यूरोप के तुष्टिकरण, अवैध अप्रवासन के खतरों और प्रशासनिक रीढ़हीनता को दुनिया के सामने पूरी तरह नंगा कर दिया है। यह फिल्म आने वाले समय में एक ऐसी ‘कल्ट क्लासिक’ (Cult Classic) के रूप में याद की जाएगी, जिसने सिनेमा के जरिए एक वैश्विक राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन को हवा दी। यदि आप आज के बदलते वैश्विक परिदृश्य और यूरोप के संकट को समझना चाहते हैं, तो ‘सिटीजन विजिलांते’ एक बेहद जरूरी और आँखें खोल देने वाली फिल्म है।

कुल मिलाकर एक बात तो साफ है कि ‘सिटीजन विजिलांते’ कोई ऐसी फिल्म नहीं है जिसे देखकर आप मुस्कुराते हुए थिएटर से बाहर आएँ। बल्कि यह एक ऐसी फिल्म है जो आपको परेशान करती है, सोचने पर मजबूर करती है और आपके भीतर एक गुस्सा भर देती है। बंदूकों के रॉ एक्शन, तेज रफ्तार कहानी और हकीकत के ठोस धरातल पर टिकी यह फिल्म उन लोगों के मुँह पर एक करारा तमाचा है जो सच को दबाना चाहते हैं। यह आधुनिक सिनेमा का एक ऐसा साहसिक मोड़ है, जिसे नजरअंदाज करना अब किसी के बस की बात नहीं है।

फिल्म समीक्षा: सिटीजन विजिलांते (Citizen Vigilante)

निर्देशक: उवे बोल (Uwe Boll)

मुख्य कलाकार: आर्मी हैमर, कोस्टास मैंडिलोर, डेसिरी जियोर्गेटी

स्टार : ****1/2

BAT-BMS ऐप से ई-रिक्शा हैक हो सकता है तो EVM क्यों नहीं हैक हो सकती? लेफ्ट-लिबरल्स के ‘लॉजिक’ पर माथा गरम करने से पहले पढ़ लीजिए दोनों सिस्टम में कितना अंतर

BAT-BMS मोबाइल ऐप को लेकर विवाद क्या सामने आया, सोशल मीडिया पर लेफ्ट-लिबरल गैंग ने फिर से EVM वाला अपना पुराना घिसा-पिटा एजेंडा बाहर निकाल लिया। ई-रिक्शा की बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम (BMS) से जुड़े एक अलग तकनीकी मामले को ऐसे पेश किया जा रहा है, मानो इससे सीधे चुनाव आयोग, सरकार और EVM पर कोई बड़ा खुलासा हो गया हो।

हर चुनाव के बाद जनता के जनादेश को पचा न पाने वाला यही इकोसिस्टम अब एक मोबाइल ऐप के बहाने फिर से EVM पर शक पैदा करने की बदनाम मुहिम चलाता दिख रहा है। दावा किया जा रहा है कि यदि एक मोबाइल ऐप के जरिए चलते हुए ई-रिक्शा को नियंत्रित किया जा सकता है तो EVM को हैक न किए जा सकने की बात कैसे कही जा सकती है।

हालाँकि BAT-BMS से जुड़ा मामला कुछ ब्लूटूथ-सक्षम लिथियम बैटरियों के बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम (BMS) में मौजूद सुरक्षा कमियों से जुड़ा है, जबकि EVM पूरी तरह अलग उद्देश्य और तकनीकी संरचना वाली प्रणाली है। इसके बावजूद सोशल मीडिया पर दोनों की तुलना करते हुए सोशल मीडिया पर प्रोपेगेंडा फैलाया जा रहा है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक यूजर ने लिखा, “मेरा देश के पढ़े लिखे लोगों से एक सवाल है। जब एक चाइनीज App से E- रिक्शा कंट्रोल किया जा सकता है तो EVM क्यों नहीं, क्या EVM इतनी सुरक्षित है कि दुनिया की कोई भी ताकत उसे हैक नहीं कर सकती..? अंधभक्त दूर रहें।”

जैकी यादव नाम के एक इन्फ्लुएंसर यूजर ने लिखा, “वैसे से एक बात सोचने वाली है कि चलता हुआ E-Rickshaw मोबाइल ऐप से बंद हो सकता है मगर EVM Hack नहीं हो सकती।”

इसी तरह एक अन्य यूजर ने पोस्ट किया, “पूछना ये था कि अगर चलता हुआ E-Rickshaw मोबाइल ऐप BAT-BMS से बंद हो सकता है तो फिर EVM Hack क्यों नहीं हो सकती?”

एक ने लिखा, “दूर बैठकर मोबाइल से एक व्यक्ति चलते वाहन को कंट्रोल कर रहा है लेकिन EVM हैक नहीं हो सकती? ये भी एक तरह का मजाक ही है! सच तो ये है हर इलेक्ट्रिक मशीन हैक हो सकती है?”

एक अन्य ने लिखा, “क्या यह सच में काम करता है? अगर काम करता है तब यह बहुत चिंता की बात है बताओ एक बैटरी रिक्शा एक app के माध्यम से कंट्रोल किया जा सकता है वो भी चीनी app से चिंता की बात है। अब E रिक्शा कंपनी वालों को EVM बनाने वाली टेक्नोलॉजी का उपयोग करना चाहिए ताकि उसे हैक करना संभव ही न हो?”

इन सभी पोस्ट में समान रूप से BAT-BMS ऐप और EVM के बीच तुलना करते हुए सीधे-सीधे चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए गए हैं। हालाँकि सरकार और आयोग पर सवाल उठाने वाले इन तथाकथित बुद्धिजीवियों ने अपने दावों में यह नहीं बताया है कि BAT-BMS और EVM का उद्देश्य, तकनीक और कार्यप्रणाली पूरी तरह अलग है।

इनसे बताया भी नहीं जाएगा क्योंकि इससे इनके दावे निर्रथक साबित हो जाएँगे लेकिन हम आपको बताते हैं कि कैसे इसकी तुलना EVM से करना गलत है और ऐप कैसे काम करता है।

क्या है BAT-BMS ऐप और सरकार ने क्यों लिया एक्शन?

BAT-BMS (Battery Management System) एक स्मार्टफोन एप्लिकेशन है, जिसे ब्लूटूथ-सक्षम लिथियम बैटरी पैक की निगरानी और प्रबंधन के लिए विकसित किया गया है। इसे चीन की कंपनी शेन्जेन ग्रेनर्जी टेक्नोलॉजी (Shenzhen Grenergy Technology) ने बनाया है।

इस ऐप का मुख्य उद्देश्य बैटरी की तकनीकी जानकारी को मोबाइल फोन पर उपलब्ध कराना है, ताकि उपयोगकर्ता अलग से किसी मॉनिटरिंग डिवाइस के बिना बैटरी की स्थिति की जाँच कर सके। इस ऐप के जरिए बैटरी का वोल्टेज, तापमान, चार्जिंग स्टेटस, करंट फ्लो, बैटरी की क्षमता और उसकी सेहत (Battery Health) जैसी जानकारियाँ देखी जा सकती हैं।

कुछ कम्पैटिबल बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम (BMS) में यह ऐप बैटरी के कुछ फंक्शन को नियंत्रित भी कर सकता है। उदाहरण के तौर पर, यदि बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम इसकी अनुमति देता है तो ऐप के जरिए बैटरी के डिस्चार्ज फंक्शन को ऑन या ऑफ किया जा सकता है।

यदि किसी ई-रिक्शा में ब्लूटूथ-सक्षम BMS लगा हो और उसमें पर्याप्त पासवर्ड सुरक्षा या ऑथेंटिकेशन न हो, तो करीब 10 से 15 मीटर की दूरी के भीतर मौजूद व्यक्ति BAT-BMS जैसे ऐप के जरिए उससे कनेक्ट हो सकता है। कनेक्ट होने के बाद वह बैटरी की जानकारी देख सकता है और कुछ कम्पैटिबल सिस्टम में डिस्चार्ज फंक्शन को बंद भी कर सकता है।

हाल के दिनों में BAT-BMS ऐप तब चर्चा में आया, जब सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो वायरल हुए जिनमें कुछ लोग ब्लूटूथ के जरिए ई-रिक्शा की बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम से कनेक्ट होकर उसका डिस्चार्ज फंक्शन बंद कर देते थे। इससे चलते हुए ई-रिक्शा की बिजली आपूर्ति रुक जाती थी और वाहन वहीं रुक जाता था।

इसी का इस्तेमाल कर कुछ लोग ई-रिक्शा के पास जाकर मोबाइल ऐप के जरिए उसकी बैटरी का डिस्चार्ज सिस्टम बंद कर दे रहे थे। बाद में BAT-BMS ऐप में कुछ मामलों में पासवर्ड सुरक्षा जोड़ी गई। हालाँकि जाँच में यह भी सामने आया कि इसी तरह के फीचर वाले दूसरे बैटरी मैनेजमेंट ऐप के जरिए भी असुरक्षित सिस्टम तक पहुँच बनाई जा सकती है।

यानी समस्या किसी एक ऐप से ज्यादा कुछ असुरक्षित बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम की सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ी है। यही वजह रही कि सरकार ने BAT-BMS ऐप को हटाने के निर्देश दिए और बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम की सुरक्षा व्यवस्था की जाँच शुरू की। मध्य प्रदेश के उज्जैन में पुलिस ने एक 18 वर्षीय युवक को हिरासत में लिया है।

वह मोबाइल ऐप के जरिए ई-रिक्शा बंद कर देता था और फिर उसे दोबारा चालू करने के नाम पर चालकों से 200 से 300 रुपए वसूलता था। इन सब के बाद केंद्र सरकार ने सख्त कदम उठाया और IT मंत्रालय ने गूगल प्ले स्टोर और एप्पल ऐप स्टोर से इस ऐप को हटाने का निर्देश दिया।

BAT-BMS और EVM अलग कैसे हैं?

सोशल मीडिया पर BAT-BMS ऐप के मामले को EVM से जोड़कर दावे किए जा रहे हैं, लेकिन तकनीकी रूप से दोनों प्रणालियाँ पूरी तरह अलग हैं। BAT-BMS एक बैटरी मैनेजमेंट एप्लिकेशन है, जबकि EVM का उद्देश्य मतदान प्रक्रिया को संचालित करना है। दोनों का डिजाइन, कार्यप्रणाली और उपयोग एक-दूसरे से बिल्कुल अलग है।

EVM यानी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन भारत निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव कराने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली इलेक्ट्रॉनिक मतदान प्रणाली है। इसका उपयोग मतदाता का वोट दर्ज करने और मतदान प्रक्रिया को संचालित करने के लिए किया जाता है। एक EVM मुख्य रूप से तीन हिस्सों से मिलकर बनी होती है।

बैलेट यूनिट (BU), जिस पर मतदाता अपने पसंदीदा उम्मीदवार के सामने बटन दबाता है। कंट्रोल यूनिट (CU), जिसे मतदान अधिकारी संचालित करता है और जिसमें सभी वोट सुरक्षित रूप से रिकॉर्ड होते हैं तथा VVPAT (वोटर वेरिफिएबल पेपर ऑडिट ट्रेल), जो कुछ सेकंड के लिए मतदाता को यह दिखाती है कि उसका वोट किस उम्मीदवार के पक्ष में दर्ज हुआ।

मतदान पूरा होने के बाद मशीनों को सील कर दिया जाता है और मतगणना के समय कंट्रोल यूनिट से परिणाम निकाले जाते हैं। वहीं BAT-BMS (Battery Management System) एक स्मार्टफोन एप्लिकेशन है, जिसे ब्लूटूथ-सक्षम लिथियम बैटरी पैक की निगरानी और प्रबंधन के लिए विकसित किया गया है।

यह ऐप मोबाइल फोन को बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम (BMS) से जोड़कर बैटरी का वोल्टेज, तापमान, चार्जिंग स्टेटस, करंट फ्लो और बैटरी की स्थिति जैसी जानकारी दिखाता है। कुछ कम्पैटिबल बैटरी सिस्टम में यह बैटरी के कुछ फंक्शन, जैसे डिस्चार्ज को ऑन या ऑफ करने की सुविधा भी देता है।

हालिया विवाद इसलिए सामने आया क्योंकि कुछ ई-रिक्शा में इस्तेमाल हो रहे ब्लूटूथ-सक्षम बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम में पर्याप्त पासवर्ड सुरक्षा या ऑथेंटिकेशन नहीं था। इसी कमजोरी का फायदा उठाकर कुछ लोग BAT-BMS जैसे ऐप के जरिए बैटरी से कनेक्ट हो गए और डिस्चार्ज फंक्शन बंद कर दिया, जिससे ई-रिक्शा रुक गया।

विशेषज्ञों के अनुसार, यह समस्या किसी एक ऐप की नहीं, बल्कि कुछ असुरक्षित बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम की सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ी है। यहीं से BAT-BMS और EVM के बीच सबसे बड़ा अंतर सामने आता है। BAT-BMS को शुरुआत से ही ब्लूटूथ के जरिए बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम से कनेक्ट होने के लिए बनाया गया है।

इसके काम करने का आधार ही मोबाइल फोन और बैटरी के बीच ब्लूटूथ कनेक्शन है। इसके विपरीत, भारत निर्वाचन आयोग के अनुसार EVM एक स्टैंडअलोन (Standalone) इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली है। इसमें ब्लूटूथ, वाई-फाई, इंटरनेट, मोबाइल नेटवर्क या किसी अन्य वायरलेस संचार तकनीक का उपयोग नहीं किया जाता है।

यानी BAT-BMS जिस तरीके से किसी बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम से जुड़ता है, वैसी कनेक्टिविटी EVM में होती ही नहीं है। इसके अलावा दोनों प्रणालियों का उद्देश्य भी पूरी तरह अलग है। BAT-BMS का काम बैटरी की निगरानी और उसके संचालन से जुड़ा है, जबकि EVM केवल मतदान कराने और वोट रिकॉर्ड करने के लिए बनाई गई है।

एक सिस्टम ऊर्जा प्रबंधन (Battery Management) के लिए विकसित किया गया है जबकि दूसरा चुनाव प्रक्रिया के संचालन के लिए। इसी वजह से BAT-BMS ऐप से जुड़े मामले को आधार बनाकर EVM के बारे में समान निष्कर्ष निकालना तकनीकी रूप से पूरी तरह गलत है।

दोनों प्रणालियाँ अलग-अलग उद्देश्य, अलग तकनीकी ढाँचे और अलग कार्यप्रणाली पर आधारित हैं। यानी BAT-BMS जिस तरह के सिस्टम के लिए बनाया गया है, EVM उस श्रेणी की तकनीक का हिस्सा ही नहीं है। यही वजह है कि BAT-BMS ऐप को आधार बनाकर EVM के बारे में समान निष्कर्ष निकालना पूरी तरह गलत ही नहीं निराधार भी है।