Home Blog Page 4

हर दिन नई माँग, हर जवाब पर नई शर्त: राहुल गाँधी ने प्रोटेस्ट के नाम पर शुरू किया प्रोपेगेंडा, अपने ‘पेपर लीक’ इतिहास का दे पाओगे जवाब?

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने सरकार के सामने तीन माँगें रखी हैं। शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा, दिल्ली में छात्रों के साथ मारपीट के दोषियों के खिलाफ कार्रवाई और जवाबदेही तय हो और पीएम मोदी छात्रों से माँगी माँगें। राहुल गाँधी के इन माँगों में अंतिम दोनों माँग 22 जुलाई 2026 के प्रेस कॉन्ग्रेस में जुड़ गए हैं।

इससे पहले जब वे 21 जुलाई को पीएम आवास के सामने धरने पर बैठे थे तो उन्होंने दो माँगे रखी थीं। संसद में पेपर लीक पर चर्चा करने की माँग तो सरकार ने तुरंत मान ली थी। इसके बाद फिर दूसरी शर्त उन्होंने धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे का जोड़ दिया था। इस पर आज भी अड़े दिखे। लेकिन संसद में पेपर लीक को लेकर उनकी माँग नई फेहरिस्त से गायब दिखी। हालाँकि जब उनसे पूछा गया कि संसद में चर्चा के लिए सरकार राजी है तो उन्होंने कहा कि किस अनुच्छेद के अंतर्गत चर्चा होगी, इस पर विवाद है।

उन्होंने ये भी कहा कि लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से पेपर लीक मुद्दे पर बात की थी, लेकिन स्पीकर ने कहा कि वे सरकार से पूछ कर बताएँगे, लेकिन वे अब तक नहीं बता पाए हैं। दरअसल संसद की कार्यवाही लगातार बाधित रही है। विपक्ष ने पेपर लीक पर सदन में चर्चा और स्थगन प्रस्ताव की माँग की है, साथ ही शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा माँगा है। छात्रों के साथ मारपीट का मुद्दा भी उठाया है। सरकार पहले से ही पेपर लीक पर चर्चा के लिए तैयार है लेकिन विपक्ष नियमों के तहत चर्चा न कर लगातार हंगामा कर रहा है और कार्यवाही बाधित कर रहा है। इसलिए विपक्ष को संजीदा होने की जरूरत है, ताकि सदन चल सके और चर्चा हो सके।

राहुल गाँधी चाहते हैं कि पेपर लीक और छात्रों के साथ मारपीट के लिए प्रधानमंत्री मोदी माफी माँगें। ये वही कॉन्ग्रेस है जो आज तक आपातकाल के दौरान नेताओं को जेलों में ठूसने और जनता के मूलभूत अधिकारों को छीनने के लिए माफी नहीं माँगी है।

आपातकाल लगाने वाली राहुल गाँधी की दादी इंदिरा गाँधी ही थीं, इसके लिए कॉन्ग्रेस या गाँधी परिवार ने कभी कुछ नहीं कहा। इतना ही नहीं इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद हुए सिख दंगों में जिस तरह से सिखों का कत्लेआम किया गया, उसके लिए राहुल गाँधी ने कभी माफी नहीं माँगी।

जनता पर व्यापक बर्बरता करने वाली कॉन्ग्रेस आज प्रधानमंत्री से माफी की उम्मीद करती है और वह भी उस आंदोलन के लिए जिसमें छात्रों के नाम पर मुँह पर रुमाल बाँधे पुलिसवालों पर हमला करने वाले अराजक तत्व मौजूद थे। इनलोगों ने छात्र आंदोलन को बदनाम ही किया है।

संसद सत्र जब शुरू हो रहा हो और संसद मार्च की इजाजत इन्हें कोई सरकार नहीं दे सकती। सत्र के दौरान पूरे देश के प्रतिनिधि या यूँ कहें कि पूरा लीडरशिप, चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, वहाँ मौजूद रहता है। ऐसे में इनकी सुरक्षा को ताक पर नहीं रखा जा सकता।

10 सालों में 156 पेपर लीक हुए- राहुल गाँधी

राहुल गाँधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया कि पिछले 10 सालों में 152 पेपर लीक हुए और इनमें से एक में भी सजा नहीं मिली। इससे करीब 7.5 करोड़ छात्र प्रभावित हुए। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोगों का ग्रुप देश की शिक्षा व्यवस्था को बर्बाद कर रहा है और छात्रों का भविष्य अधर में लटका हुआ है।

लेकिन 2014 से पहले 2004 तक की बात करें तो कॉन्ग्रेस के शासनकाल में राष्ट्रीय और राज्य स्तर की कई महत्वपूर्ण परीक्षाओं के पेपर लीक हुए थे। इस दौरान 2004 का CBSE PMT, 2006 का AIIMS PG और 2011 की AIEEE परीक्षा, 2009 में हरियाणा शिक्षक भर्ती पेपर लीक, 2011 में यूपीपीसीएस पेपर लीक, 2012 में 6 परीक्षाओं के पेपर लीक हुए उसमें एम्स एमबीबीएस, रेलवे ग्रुप डी, तमिलनाडु पीएससी शामिल थे लेकिन कोई जिम्मेदारी तय नहीं हुई।

आज NEET के माध्यम से सभी राज्यों और केन्द्र के मेडिकल कॉलेजों में एडमिशन होता है, लेकिन उस वक्त हर राज्य और केन्द्र की परीक्षा अलग अलग होती थी और इनके पेपर लीक होते थे। मध्य प्रदेश का बहुचर्चित व्यापम घोटाला भी 2008-2013 के बीच हुआ था। इतने घोटालों के बाद भी कभी किसी शिक्षा मंत्री ने इस्तीफा नहीं दिया। किसी प्रधानमंत्री ने देश से माफी नहीं माँगी और न ही छात्रों से माफी माँगी।

इतना ही नहीं अगर राहुल गाँधी को राजस्थान में पेपर लीक को लेकर प्रियंका गाँधी ने क्या कहा था, जब कॉन्ग्रेस की सरकार थी, उसे भी सुनना चाहिए। उन्होंने कहा कि पेपर लीक पूरे देश की समस्या है। राजस्थान में इसे रोकने की कोशिश की। सीएम गहलोत ने भी की लेकिन वे सफल नहीं हो पाए।

राहुल गाँधी ने पीएम आवास के सामने धरना देने और हिरासत में लिए जाने की घटना को दरकिनार करने की कोशिश की। हालाँकि उन्होंने इस दौरान उनके मुँह से खून निकलने का जिक्र किया। लेकिन ये नहीं बताया कि प्रधानमंत्री आवास के बाहर जाकर जमावड़ा लगाने की कोशिश क्या कॉन्ग्रेस के जमाने में कभी हुई थी। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का ये धरना क्या लोकतंत्र के मूल्यों के खिलाफ नहीं है?

कपड़े फाड़े, मारा-पीटा, महिला रिपोर्टरों से की बदसलूकी: CJP के ‘संसद चलो’ प्रदर्शन में हिंसक भीड़ ने पत्रकारों को चुन-चुनकर बनाया निशाना, पढ़ें हमले की 10+ घटनाएँ

जंतर-मंतर पर पिछले डेढ़ महीने से ‘छात्र हितों’ के नाम पर धरना देकर बैठे ‘कॉकरोचों’ का असली चेहरा 20 जुलाई 2026 के ‘संसद चलो’ प्रदर्शन के वक्त सामने आ गया। इस दौरान उपद्रवियों ने न केवल सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती दी, बल्कि ग्राउंड जीरों पर सच दिखाने पहुँचे पत्रकारों को चुन-चुनकर निशाना भी बनाया।

कथित ‘प्रदर्शनकारियों’ में शायद इस बात का डर था कि जमीन पर मौजूद मीडियाकर्मी उनकी हकीकत देश के सामने ले आएँगे, इसलिए अपनी विचारधारा से अलग सवाल पूछने या तथ्यों पर रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को चुन-चुनकर निशाना बना लिया गया।

20 और 21 जुलाई से सोशल मीडिया पर लगातार ऐसे वीडियो सामने आ रहे हैं, जो CJP के प्रदर्शन में ग्राउंड रिपोर्टिंग करने गए पत्रकारों के साथ हुई बर्बरता को उजागर करते हैं। कहीं रिपोर्टरों को उग्र भीड़ बीच सड़क पर घेरकर धक्के दे रही है, तो कहीं उनके साथ मारपीट की जा रही है।

महिला पत्रकारों के साथ भी बदसलूकी और खींचतान की तस्वीरें सामने आई हैं। जो भी पत्रकार अपनी ड्यूटी निभाने वहाँ पहुँचा, उसे ‘गोदी मीडिया’ का टैग देकर डराने, रोकने और हाथापाई करने की कोशिश की गई- यहाँ तक कि उनके कपड़े फाड़े गए और चश्मे-कैमरे तक तोड़ दिए गए।

आइए आपको कम से कम ऐसी 10 घटनाओं के बारे में बताते हैं, जिनसे पता चले कि CJP प्रदर्शन के दौरान कवरेज करने गए पत्रकारों के साथ कैसे बर्बरता हुई।

ऑपइंडिया के अनुराग मिश्रा पर बार-बार हमले

ऑपइंडिया के निर्भीक पत्रकार अनुराग मिश्रा को इस प्रदर्शन की रिपोर्टिंग के दौरान बार-बार निशाना बनाया गया। 18 जुलाई को जब अनुराग जंतर-मंतर पर सामान्य सवाल पूछ रहे थे, तब भीड़ ने उन्हें घेरकर हाथापाई की। इसके बाद जब 20 जुलाई को ‘संसद चलो’ प्रदर्शन के दौरान उपद्रवियों ने उन्हें दोबारा निशाना बनाया और ‘गोदी मीडिया’ का कहकर, उन पर दोबारा हिंसक हमला किया।

Times Now के देव कोटक की शर्ट फाड़ी, चश्मा तोड़कर चेहरे पर मारा

टाइम्स नाऊ के रिपोर्टर देव कोटक पर हुआ हमला इस हिंसक भीड़ की क्रूरता को बयाँ करता है। अभिजीत दीपके का इंटरव्यू लेने जंतर-मंतर पहुँचे देव पर ‘गोदी मीडिया हाय-हाय’ के नारों के बीच अचानक चारों तरफ से लात-घूँसे, मुक्के और बोतलें बरसाई गईं। धक्का देकर उन्हें जमीन पर गिरा दिया गया, उनकी शर्ट फाड़ दी गई और घड़ी व मोबाइल छीन लिया गया। जब देव ने चिल्लाकर कहा कि चश्मे को न छुआ जाए, उन्हें उसके बिना धुंधला दिखता है, तो उपद्रवियों ने उनका चश्मा छीनकर तोड़ दिया और उसी टूटे चश्मे से उनके मुँह पर वार किया।

एबीपी न्यूज के वरुण भसीन और मीडिया गाड़ियों पर पथराव

अनुराग और देव की तरह ही एबीपी न्यूज के रिपोर्टर वरुण भसीन के साथ भी बदसलूकी हुई। रिपोर्टिंग के दौरान प्रदर्शनकारियों के झुंड ने घेरकर नारेबाजी की। वरुण ने अपनी आपबीती में बताया कि आंदोलन में शामिल युवा पूरी तरह हिंसक हो चुके थे। वे न केवल पत्रकारों को डरा रहे थे, बल्कि मीडिया की गाड़ियों पर पथराव कर रहे थे और कैमरे तोड़ने की फिराक में थे। सामने आई वीडियो में भीड़ को उनका पीछा करते हुए, उनपर स्प्रे मारते हुए देखा जा सकता है।

ऑपइंडिया की रितिका चंडोला को निशाना बनाया

महिला पत्रकारों के साथ इस भीड़ का रवैया बेहद शर्मनाक रहा। ऑपइंडिया की महिला पत्रकार रितिका चंडोला ने जब ग्राउंड पर जाकर शिक्षा के नाम पर शुरू हुए इस प्रदर्शन में छिपी गंदी राजनीति और ‘ब्राह्मणवाद’ के खिलाफ लग रहे नारों पर सहजता से सवाल पूछे, तो जय भीम का नारेबाजी करने वाले आंदोलनकारी बौखला गए। तर्क का जवाब तर्क से देने के बजाय रितिका पर ‘गोदी मीडिया’ का टैग लगाकर उन्हें चुप कराने और डराने का प्रयास किया गया।

बैंक में छिपकर ज्योति मिश्रा ने बचाई जान, शेफाली निगम से भी बदसलूकी

टाइम्स नाऊ की ज्योति मिश्रा जब जनता की बात दिखाने पहुँचीं, तो उग्र भीड़ उनके पीछे पड़ गई। मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों ने भांप लिया कि अगर ज्योति का सिर दिखा तो भीड़ पत्थर मारकर उनकी जान ले सकती है।

ज्योति को अपनी जान बचाने के लिए एक पास के बैंक में शरण लेनी पड़ी। बैंक कर्मी के अनुसार, हमलावरों की संख्या एक हजार से अधिक थी, जिन्होंने बैंक के अंदर घुसकर हमला करने की कोशिश की।

इसी तरह शेफाली निगम को भी प्रदर्शनकारियों द्वारा बदसलूकी करने का मामला सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि भीड़ पीछे से आकर शेफाली को घेरती है और फिर पीछे से मारा जाता है।

2 महिला पत्रकारों के साथ खींचतान और छेड़छाड़

सोशल मीडिया पर वायरल हुई एक और वीडियो में दो महिला पत्रकारों को भीड़ द्वारा घेरकर उनके साथ बदसलूकी हो रही है। दोनों पत्रकार भड़की हुई हैं। वह भीड़ से सवाल करती हैं, लेकिन उग्र भीड़ उन पर शारीरिक रूप से हावी होने लगती है और लोग उन्हें ज़बरदस्ती घसीटने लगते हैं। घटना की वीडियो हर जगह वायरल है।

NDTV पत्रकार को रिपोर्टिंग से रोका

प्रदर्शन के दौरान भीड़ इस कदर पत्रकारों पर हावी थी कि उन्होंने एनडीटीवी की महिला पत्रकार को भी बख्शा नहीं। लाइव कवरेज के दौरान भीड़ उनके पीछे खड़े होकर ‘गोदी मीडिया’ के नारे लगाती रही और उन्हें बोलने तक नहीं दिया। सोशल मीडिया पर इस हरकत को यह कहकर जायज ठहराया गया कि ‘एनडीटीवी को अडानी ने खरीद लिया है’।

NDTV के रवीश रंजन शुक्ला के साथ भी बदसलूकी

वरिष्ठ पत्रकार रवीश रंजन शुक्ला को भी इस उग्र भीड़ ने बख्शा नहीं। सोशल मीडिया पर आए वीडियो में दिखा कि रवीश सड़क पर बैठे हुए थे और चारों तरफ से भीड़ उन पर चीखते हुए ‘गोदी मीडिया हाय-हाय’ के नारे लगा रही थी तथा उनसे तेज आवाज में ये पूछा जा रहा था कि इतने दिन से वो लोग प्रोटेस्ट कवर करने क्यों नहीं आ रहे थे।

सोशल मीडिया पर रवीश रंजन की वीडियो देख लोगों ने कहा कि ये सब सिर्फ इसलिए हुआ क्योंकि उनके हाथ में एनडीटीवी का माइक था, जिसे अडाणी ग्रुप खरीद चुका है।

न्यूज 24 के राजीव रंजन की रिपोर्टिंग में अड़ंगा

न्यूज 24 के जाने-माने रिपोर्टर राजीव रंजन को छात्रों ने घेरकर ‘गोदी मीडिया वापस जाओ’ के नारे लगाए और उनका मज़ाक उड़ाया। हालाँकि, राजीव पीछे नहीं हटे, उन्होंने अपने कैमरामैन के साथ डटकर खड़े रहकर पूरी घटना और भीड़ की गुंडागर्दी को कैमरे में कैद किया।

गौरतलब हो कि 10+ घटनाएँ केवल चंद मामले हैं जिनकी वीडियोज वायरल हुईं, वरना जैसा पैटर्न इन पत्रकारों के साथ किए गए दुर्व्यवहार के वक्त दिख रहा है, उससे साफ है कि वहाँ सवाल पूछने वाले हर पत्रकार से भीड़ ने ऐसा ही बर्ताव किया होगा।

खबर है कि बिहार के पटना में भी छात्रों के नाम पर प्रदर्शन करने उतरी हिंसक भीड़ ने पत्रकारों को निशाना बनाया है।

पत्रकारों पर हमले की घटना पर एडिटर्स गिल्ड की चुप्पी

दुखद और शर्मनाक बात यह है कि इन घटनाओं को लेकर वो ‘एडिटर्स गिल्ड’ और वामपंथी धड़ा दिन-रात एकदम मौन है, जो समय-समय पर ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ और मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर ढोल पीटता है, लेकिन इन घटनाओं पर उससे कुछ नहीं बोला जा रहा- शायद इनके लिए पत्रकारों का अर्थ सिर्फ वामपंथी ईकोसिस्टम है। (खबर लिखने तक एडिटर गिल्ड की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।)

आरफा खानुम शेरवानी जैसी तथाकथित पत्रकार इन हमलों की निंदा करने के बजाय पत्रकारों की ही निंदा पर उतर आई हैं और पत्रकारों के साथ हुई मारपीट को जायज ठहरा रही हैं। वहीं, द हिंदू की विजेता सिंह जैसे लोग नफरत का बचाव करते हुए उलटे पत्रकारों पर ही ‘घृणा फैलाने’ का आरोप मढ़ रहे हैं।

वामपंथियों की ये समस्या पुरानी है कि जब उनके अनुकूल बात नहीं होती तो वो ऐसा ही रवैया अपनाते हैं। इस बार सीजेपी प्रदर्शन में यही देखने को मिला। उन पत्रकारों को जमकर एंट्री दी गई जो सीजेपी नैरेटिव को आगे बढ़ाने वाले लग रहे थे। वहीं राष्ट्रवादी मुद्दों की बात करने वाले पत्रकार, इन्फ्लुएंसर को भगाने का, धमकाने का खूब काम हुआ। 20-21 जुलाई के बाद सामने आई आंदोलन की तस्वीरों ने साफ कर दिया है कि यह विरोध प्रदर्शन किसी हक की लड़ाई नहीं, बल्कि वामपंथी नफरत और अराजकता का प्रायोजित खेल है।

अध्यात्म का रचा ढोंग, सनातन का उठाया फायदा और अब हिंदू धर्म को बक रही गाली: जानिए कौन है ‘Mana’ उर्फ ओमाना, जो CJP प्रदर्शन में पुलिस पर हमले के लिए दे रही भड़काऊ बयान

ऋषिकेश की पवित्र गंगा नदी के किनारे ‘योगी’ और ‘एस्ट्रोलॉजर’ बनकर ज्ञान बाँटने वाली ओमाना (Mana) का असली चेहरा अब धीरे-धीरे लोगों के सामने आ रहा है। जो महिला कल तक यूट्यूब पर माता लक्ष्मी, सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति का गुणगान करके लाखों फॉलोअर्स और फेम बटोरती थी, आज वही सोशल मीडिया पर बैठकर ‘हिंदू धर्म में क्यों पैदा हुई’ का रो-रोकर नाटक कर रही है।

ओमाना ने एक Video जारी कर खुलकर कहा, “मुझे हिंदू होने पर शर्म आ रही है, हिंदू धर्म में पैदा होना मेरा बहुत बड़ा पाप था।” इतना ही नहीं, ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के हिंसक प्रदर्शन के दौरान ओमाना खुद सड़कों पर उतरकर पुलिस और प्रशासन के खिलाफ भड़काऊ बातें करती और लोगों को हिंसा के लिए उकसाती नजर आई है।

कौन है ओमाना: बिजनेस, फिल्म मेकिंग और अध्यात्म का घालमेल

ओमाना (Mana) खुद को एक मल्टी-डायमेंशनल पर्सनैलिटी, स्पिरिचुअल मेंटॉर और बिजनेसमैन बताती है। वह उत्तराखंड के ऋषिकेश में हिमालय की तलहटी में गंगा नदी के किनारे एक बड़ा मेडिटेशन सेंटर चलाती है। उसने अपनी लाइफस्टाइल को इस तरह पेश किया है जैसे वह गृहस्थ और साधक के बीच का संतुलन बनाकर जी रही हो।

पढ़ाई और करियर के मामले में ओमाना के पास डिग्रियों की लंबी सूची है। उसने बिजनेस कम्यूनिकेशन में काम किया, एमबीए (MBA) में गोल्ड मेडल हासिल किया और निफ्ट (NIFT) परीक्षा पास कर आर्किटेक्चरल डिजाइनिंग और रियल एस्टेट डेवलपमेंट का काम शुरू किया।

इसके बाद उसने अमेरिका के लॉस एंजिल्स स्थित मशहूर यूनिवर्सिटी UCLA से फिल्म मेकिंग और डायरेक्शन की पढ़ाई की। उसने एक्टिंग और कथक डांस में भी हाथ आजमाया और कोविड काल के दौरान एक हेल्थकेयर कंपनी चलाकर आरटी-पीसीआर (RT-PCR) किट के रेट घटाने का दावा किया।

ओमाना (Mana) ने अपने ज्ञान, फिल्म मेकिंग की कला और एक्टिंग का इस्तेमाल सोशल मीडिया पर अपनी ‘गुरु’ वाली इमेज बनाने के लिए किया। वह इंस्टाग्राम पर ‘aumanafoundation‘ हैंडल चलाती है, जहाँ उसके 4 लाख 8 हजार से ज्यादा फॉलोअर्स हैं। उसने अपने बायो में ‘जय माँ दुर्गा, जय माँ काली, जय भैरव बाबा’ लिख रखा है ताकि लोग उसे विशुद्ध सनातनी समझें।

इसके अलावा ओमाना के फेसबुक पर उसके 13 हजार से ज्यादा फॉलोअर्स हैं। यूट्यूब पर वह दो चैनल चलाती है- ‘MANA‘ (अंग्रेजी में 41.4K सब्सक्राइबर्स) और ‘Mana Hindi‘ (35.4K सब्सक्राइबर्स)। उसने ‘rulesofdharma.com’ वेबसाइट बनाई है और ‘Rules of Lakshmi: The Blueprint of Abundance’ नाम से ई-बुक भी बेची है। ओमाना के माता लक्ष्मी पर बनाए गए नियमों को देश के बड़े FM रेडियो चैनल 93.5 FM पर भी जगह मिली थी।

यूट्यूब पर हिंदू देवी-देवताओं का गुणगान करके बनाई पहचान

यूट्यूब पर ओमाना के दोनों चैनलों को खंगालने पर पता चलता है कि उसने अपनी पूरी पहचान सनातन धर्म का सहारा लेकर बनाई है। उसने माता लक्ष्मी से जुड़े पवित्र नियमों, धन-समृद्धि पाने के उपायों, वैदिक परंपराओं और भारतीय संस्कृति पर सैकड़ों वीडियो बनाए। उसने हर वीडियो में यही दिखाया कि वह भारत को फिर से समृद्ध और ज्ञानी बनाने के मिशन पर निकली है।

उसके पुराने Videos में वह पर्यावरण बचाने की बात करती थी और कहती थी, “मोदी जी आपको हमने नारायण के रूप में चुना है, हमें बड़ी सड़कें नहीं बल्कि पेड़ और पशु चाहिए।” उसने लोगों को आकर्षित करने के लिए खुद को एक सनातनी विजनरी के रूप में स्थापित किया और लोगों के बीच में अपनी गहरी पैठ बनाई।

अचानक बदला पैंतरा: रोते हुए वीडियो में कहा- ‘हिंदू होना बहुत बड़ा पाप है’

जैसे ही ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के प्रदर्शन में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव बढ़ा, ओमाना का असली एजेंडा बाहर आ गया। उसने कैमरे के सामने मगरमच्छ के आँसू बहाते हुए 4 मिनट से ज्यादा का एक ड्रामा वीडियो रिकॉर्ड किया। इस वीडियो में उसने सीधे सनातन धर्म और हिंदू समाज पर हमला बोला।

वीडियो में ओमाना कहती है, “हिंदू होना बहुत बुरा है। हिंदू देश में हिंदुओं के बच्चों को पीटा जा रहा है। मैं हिंदू नहीं हूँ, मुझसे बहुत बड़ा पाप हो गया जो मैं इस देश में हिंदू बनकर पैदा हुई। मैं सोचती थी कि भारत में पैदा होना मेरे अच्छे कर्मों का फल है, लेकिन अब मुझे शर्म आ रही है।” उसने लोगों को सलाह दी कि महिलाएँ बच्चों को जन्म न दें, क्योंकि भारत में रहना और पैदा होना पाप है।

CJP के प्रदर्शन में उग्र रूप: दिल्ली पुलिस के जवानों पर हमला करने के लिए उकसा रही

एक तरफ सोशल मीडिया पर ओमाना ‘अहिंसा और शांति’ का नाटक कर रही थी, तो दूसरी तरफ ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के प्रदर्शन में उसका हिंसक और उग्र रूप कैमरे में सामने आया। वह भीड़ के बीच खड़ी होकर गंदी-गंदी गालियाँ दे रही थी और प्रदर्शनकारियों को कानून-व्यवस्था तोड़ने के लिए उकसा रही थी।

सामने आए वीडियो में ओमाना खुलेआम चिल्लाती है, “ये क्या चल रहा है? हम इन्हें जान से मारने जा रहे हैं, वर्दी पहन ली तो क्या खुद को पुलिस समझेंगे? मैं तुमसे कह रही हूँ कि जाकर इन्हें मारो, इनके लोगों को जाकर पीटो!” ये है ओमाना की भाषा, जो प्रदर्शनकारियों को शांति का पाठ नहीं, बल्कि हिंसा करना सीखा रही है। किसी को जीवनदान देना नहीं, बल्कि पुलिस के परिवार पर हमला करना सीखा रही है, भाषा में शुद्धता नहीं, बल्कि जहर घोलने जैसे बू आ रही है। छात्रों के हाथों में पुस्तकें नहीं बल्कि लाठी-डंडों के सहारे आगे बढ़ना सीखा रही है। पढ़ लिखकर भविष्य को उज्जवल बनाने की सीख ना देकर, ओमाना अनपढ़ और अंगूठा छाप रहकर सत्ता पर कैसे कब्जा किया जाता है वो सीखा रही है। अपनी छवि चमकाने के लिए ओमाना कुछ भी कर सकती है…

ओमाना के दो चेहरों की तुलना करें तो उसका दोगलापन साफ दिखाई देता है। 11 जुलाई 2026 को अपने चैनल ‘4Mana Talks’ पर पोस्ट किए गए वीडियो में वह अध्यात्म का ज्ञान छाँटते हुए कहती है कि ‘ईश्वर का कोई धर्म नहीं होता, आध्यात्मिकता धर्म से परे है।’ लेकिन असल जिंदगी में वह सीधे हिंदू धर्म को कटघरे में खड़ा कर देती है।

ऋषिकेश में आश्रम चलाकर, तंत्र-मंत्र और एस्ट्रोलॉजी के नाम पर लोगों से पैसे कमाने वाली ओमाना अब अचानक देश और धर्म विरोधी ताकतों की जुबान बोलने लगी है। जब तक सनातन धर्म से फेम और डॉलर मिल रहे थे, तब तक वह ‘माँ दुर्गा और काली’ की भक्त बनी रही, लेकिन मौका मिलते ही उसने पूरे सनातन धर्म को गालियाँ देना शुरू कर दिया।

ड्रामा क्वीन ओमाना का पाखंड

अरे ओमाना मैडम… लॉस एंजिल्स (UCLA) से फिल्म मेकिंग और डायरेक्शन की पढ़ाई क्या इसीलिए करके आई थीं कि ऋषिकेश के पवित्र गंगा तट पर बैठकर ‘अध्यात्म का घटिया नाटक’ रच सकें? वाह रे आपका ढोंग! जब तक यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर माता लक्ष्मी के फर्जी नियम और एस्ट्रोलॉजी का चूर्ण बेचकर धंधा चमक रहा था, तब तक यह देश, यह सनातन धर्म और यहाँ के देवी-देवता आपके लिए बहुत महान थे। आपने अपनी पूरी दुकान ही ‘जय माँ दुर्गा’ और ‘जय माँ काली’ का बोर्ड लगाकर सजाई थी।

लेकिन जैसे ही जंतर-मंतर पर आपकी ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के उपद्रवियों का भांडा फूटा, आपकी एक्टिंग का लेवल तो सीधे ऑस्कर के लायक हो गया। कैमरे के आगे बैठकर मगरमच्छ के आँसू बहाते हुए कहती हैं, “मुझे हिंदू होने पर शर्म आती है।” अरे मैडम, शर्म तो इस देश के लोगों को आ रही है कि उन्होंने आप जैसी बहरूपिया और ढोंगी महिला को सिर पर बिठाया।

एक तरफ कैमरे के सामने बैठकर ‘बेचारी माँ’ बनने की नौटंकी करती हो और कहती हो कि ‘मेरा दिल रो रहा है’, और दूसरी तरफ सड़कों पर उतरकर लफंगों की तरह गालियाँ बकती हो? खुलेआम भीड़ से कहती हो, “जाओ पुलिस वालों को मारो, इन्हें जान से मार दो!” क्या यही सिखाया है आपको UCLA के डायरेक्शन ने?

आपकी यह दोमुंही चाल अब पूरी तरह एक्सपोज हो चुकी है। एक तरफ अध्यात्म बेचकर नोट छापना और दूसरी तरफ मौका मिलते ही उसी हिंदू धर्म को गाली देना जिसने आपको पहचान दी… यह दोगलापन लोगों के सामने आ चुका है।

पंजाब फार्मेसी भर्ती परीक्षा में गड़बड़ी, पेन से स्कैन कर बाहर भेजे गए पेपर: उम्मीदवारों से ₹35 लाख तक वसूले, दिल्ली में हंगामा कर रही AAP ने साधी चुप्पी; जानें- कैसे खुला पूरा खेल

आम आदमी पार्टी के नेता नीट पेपर लीक मामले को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन को हाईजैक करने की कोशिश में लगे हैं। संसद मार्च के दौरान पूर्व सीएम आतिशी सिंह, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह समेत कई नेता पुलिस की बैरिकेटिंग फाँद कर आंदोलनकारियों को उकसाते नजर आए। उसी आम आदमी पार्टी की पंजाब सरकार की नाक के नीचे सरकारी फार्मा अधिकारी की नियुक्ति के लिए हुई परीक्षा में हाई टेक चीटिंग हुई है। ये परीक्षा 19 जुलाई 2026 को फरीदकोट, कोटकपुरा और फिरोजपुर में आयोजित की गई थी।

आम आदमी पार्टी की पूर्व नेता और राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल ने सीएम भगवंत मान और तथाकथित ‘सुपर सीएम’ अरविंद केजरीवाल को चीटिंग को लेकर जमकर लताड़ा है। उन्होंने कहा कि केजरीवाल भारत को नेपाल बनाने में बिजी हैं और जेन जी को दिल्ली में उकसा रहे हैं। सोशल मीडिया एक्स पर उन्होंने वीडियो भी शेयर किया है।

उन्होंने कहा कि पंजाब में फार्मेसी अधिकारी भर्ती परीक्षा में बड़ा घोटाला सामने आया है, हजारों छात्रों का भविष्य बर्बाद हो रहा है। कई छात्र पेन कैमरा और ब्लूट्रूथ का इस्तेमाल करते पकड़े गए। लाखों रुपए लेकर बच्चों को परीक्षा पास कराई जा रही है।

उन्होंने आगे कहा कि इन युवकों को हमारी आवाज की जरूरत है क्योंकि न तो भगवंत मान इसे सुन पा रहे हैं और न ही अरविंद केजरीवाल। उन्होने कहा कि शिक्षा में इतना बड़ा घोटाला हुआ है, लेकिन जवाबदेही किसी की नहीं?

इस मामले में अब तक पैंतीस लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इनमें सात मुख्य साजिशकर्ता और 28 उम्मीदवार शामिल हैं। आरोप है कि इनलोगों ने पगड़ी, मोजे और अंडरवेयर के अंदर छोटे ब्लूटूथ उपकरण छिपा कर रखे थे और उनका इस्तेमाल कर रहे थे।

दरअसल ये पेपर लीक पारंपरिक तरीके से नहीं बल्कि हाईटेक तरीके से किया गया था। उम्मीदवारों ने हिडन पेन कैमरे, ब्लूट्रूथ और माइक्रो ईयरपीस का इस्तेमाल किया। पुलिस ने नकल के लिए कथित तौर पर इस्तेमाल किए गए 27 बैटरी से चलने वाले वायरलेस उपकरण भी उम्मीदवारों के पास से जब्त किए हैं।

पंजाब के फार्मेसी परीक्षा में संगठित नकल का मामला

यह परीक्षा पंजाब सरकार में फार्मासिस्ट और फार्मा अधिकारी की भर्ती के लिए आयोजित की गई थी। परीक्षा का आयोजन बाबा फरीद यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंस यानी BFUHS ने किया था। परीक्षा के पेपर लीक में अंतरराज्यीय रैकेट के होने का पता चला है। पुलिस ने पंजाब, हरियाणा और राजस्थान से इस गिरोह के सात प्रमुख सदस्यों को गिरफ्तार किया है। गिरोह के बाकी सदस्यों को पकड़ने के लिए छापेमारी की जा रही है। राज्य सरकार ने अब तक इस परीक्षा को रद्द नहीं किया है।

ये परीक्षा 25 परीक्षा केंद्रों पर आयोजित की गई थी। ये केंद्र तीन शहरों- फरीदकोट, कोटकपुरा और फिरोजपुर में थे। फार्मेसी अधिकारी के 454 पदों के लिए कुल 7000 उम्मीदवारों ने हिस्सा लिया था। यह परीक्षा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के कहने पर बीएफयूएचएस ने आयोजित किया था।

परीक्षा के दौरान विश्वविद्यालय ने फरीदकोट, कोटकापुरा और फिरोजपुर के 18 परीक्षा केंद्रों का निरीक्षण करने के लिए हवाई दस्ते तैनात किए। इन हवाई दस्तों ने ही इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का पता लगाया। कई उम्मीदवारों के पास एक जैसे उपकरण मिले। इससे अंदाज लगाया गया कि जरूर इसके पीछे संगठित धोखाधड़ी गिरोह संलिप्त है।पूरी परीक्षा 100 अंकों की है, जिसमे लिखित परीक्षा 90 और व्यावसायिक अनुभव के लिए 10 अंक निर्धारित हैं।

फिरोजपुर में पेन कैमरे से फोटो खींच व्हाट्सएप से भेजा भिवानी

जाँच में सामने आया है कि फिरोजपुर के एक सेंटर में परीक्षा दे रहे आयुष ने कथित तौर पर एक गुप्त पेन कैमरे से प्रश्न पत्र को स्कैन किया और व्हाट्सएप के जरिए हरियाणा के भिवानी में मौजूद अपने साथी साजन को भेजा। साजन ने कथित तौर पर प्रश्न के उत्तर तैयार करवाए और एक दूसरे सहयोगी दीपक को भेजा।

फरीदकोट के सोसाइटी नगर में गुरमीत सिंह के आवास को गिरोह ने अस्थाई नियंत्रण कक्ष बना रखा था, वहीं दीपक मौजूद था। वहाँ से मुख्य आरोपी मनजीत सिंह और दीपक ने कथित तौर पर वायरलेस के माध्यम से परीक्षा हॉल में मौजूद कई उम्मीदवारों को सारे सवालों के जवाब उपलब्ध कराए।

आरोप है कि यह गिरोह कॉरपोरेट स्तर की व्यवस्थाओं के साथ काम करता था और परीक्षा में सफलता की गारंटी देते हुए उम्मीदवारों से 35 लाख रुपए से लेकर 13 लाख रुपए तक की भारी रकम वसूलता था। कई उम्मीदवारों ने गिरोह के सदस्यों ने पोस्ट-डेटेड चेक ले रखा था।

पंजाब पुलिस ने अपने बयान में कहा है कि जाँच में प्रश्नपत्र लीक होने या किसी अधिकारी की संलिप्तता का कोई सबूत नहीं मिला है। बयान में कहा गया है, “परीक्षा शुरू होने के तुरंत बाद यह घटना घटी। प्रारंभिक जाँच में पता चला है कि इस धोखाधड़ी का मास्टरमाइंड फाजिल्का स्थित संत कबीर पॉलिटेक्निक कॉलेज का कर्मचारी गुरमीत सिंह था।”

बयान में आगे कहा गया है, “19 जुलाई को परीक्षा के दिन सुबह सुबह कई ऑपरेटिव फरीदकोट-कोटकापुरा रोड पर मौजूद एक होटल में जमा हुए और उन्होंने उम्मीदवारों को विशेष बैटरी से चलने वाले वायरलेस माइक्रो-डिवाइस दिए।”

फरीदकोट और फिरोजपुर में इन उपकरणों का इस्तेमाल करने के आरोप में कुल 28 उम्मीदवारों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें से 27 के पास से एक जैसे वायरलेस बरामद किए गए।

हालाँकि परीक्षा में संलिप्तता के आरोप में अब तक किसी अधिकारी की गिरफ्तारी नहीं हुई है, लेकिन मामले पर आम आदमी पार्टी ने चुप्पी साध रखी है। इसका शिरोमणि अकील दल ने भी विरोध किया है। उन्होंने पंजाब अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड द्वारा आयोजित परीक्षाओं में धाँधली का भी आरोप लगाया और कहा कि भगवंत मान सरकार पेपर लीक पर एक्शन लेने और नकल गिरोह की लगाम कसने में नाकाम रही है।

पंजाब एकमात्र राज्य है जहाँ आम आदमी पार्टी की सरकार है। आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए पार्टी ने अपनी पूरी ताकत यहाँ झोंक दी है। ऐसे में राज्य में हुए इस भर्ती घोटाले पर साधी गई चुप्पी पर स्वाति मालीवाल ने टिप्पणी की है, क्योंकि अरविंद केजरीवाल समेत पूरी पार्टी दिल्ली में खोई हुई अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रहे हैं। यही वजह है कि पंजाब में पेपर लीक इन्हें दिखाई नहीं दे रहा है और नीट यूजी 2026 परीक्षा रद्द होने के बाद रिनीट होने और रिजल्ट आने के बाद भी ये छात्रों को उकसाने में लगे हुए हैं।

किसी को बेल मिली तो घर नहीं जा सका, कोई अब तक जेल में… संसद की सुरक्षा में सेंधमारी को सामान्य बनाना चाह रहे कॉकरोच, युवा समझें- भड़कावे में आने का क्या होता है अंजाम

किसी भी देश का भविष्य उसके युवाओं के कंधों पर टिका होता है। युवाओं की सोच, उनका जोश और उनकी वैचारिक शक्ति ही समाज को नई दिशा देती है। लेकिन जब इसी जोश को कुछ असमाजिक तत्व, अवसरवादी राजनीतिक दल और वामपंथी तंत्र अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करने लगते हैं, तो नतीजा केवल तबाही होता है।

आज युवाओं के मन में असंतोष का जहर इस कदर घोला जा रहा है कि वे कानून तोड़ने, संस्थाओं पर हमला करने और उपद्रव मचाने को ‘क्रांति’ समझने की भूल कर बैठते हैं। युवाओं को यह समझने की सख्त जरूरत है कि सोशल मीडिया के जरिए या सड़कों पर जो लोग उन्हें व्यवस्था के खिलाफ उकसाते हैं, वे वास्तव में उनका इस्तेमाल केवल मोहरे की तरह करते हैं।

संसद की सुरक्षा में हुई सेंधमारी से लेकर हाल ही में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के उग्र विरोध प्रदर्शनों तक, हर जगह यही पैटर्न देखने को मिल रहा है। जब तक युवा सड़कों पर नारा लगाते हैं, तब तक वे इन आकाओं के काम आते हैं। लेकिन जैसे ही उन पर पुलिस की लाठी गिरती है, जेल के दरवाजे खुलते हैं और भविष्य दांव पर लगता है, तब उकसाने वाले तमाम लोग गायब हो जाते हैं।

संसद की सुरक्षा में सेंध: एक साजिश जिसे सामान्य बनाने की हुई कोशिश

13 दिसंबर 2023 की तारीख देश के इतिहास में एक काले दिन की तरह दर्ज है। 2001 के संसद आतंकी हमले की 22वीं बरसी पर सागर शर्मा और मनोरंजन डी नाम के दो युवक मैसूर के सांसद से जारी पास के आधार पर लोकसभा की दर्शक दीर्घा में पहुँचे। दोपहर ठीक 1 बजकर 1 मिनट पर वे सदन के भीतर कूद गए। उन्होंने अपने जूतों में छिपाकर रखे स्मोक कनस्तर से पीला धुआँ फैलाया और नारेबाजी की। उसी समय संसद परिसर के बाहर नीलम आजाद और अमोल शिंदे ने भी रंगीन धुआँ छोड़कर उपद्रव किया।

जो युवा उकसावे में आकर यह सोचते हैं कि वे जेल जाकर रातों-रात हीरो बन जाएँगे, उन्हें अदालत की शर्तों और हकीकत को देखना चाहिए। जब दिल्ली हाई कोर्ट से नीलम आजाद को जमानत मिली, तो उस पर सख्त पाबंदियाँ लगाई गईं। कोर्ट का स्पष्ट आदेश था कि वह मीडिया या सोशल मीडिया पर कोई बयान नहीं दे सकती, जाँच एजेंसी के सामने नियमित पेश होगी और बिना अनुमति दिल्ली से बाहर नहीं जाएगी। 2 जुलाई 2025 को जाकर कोर्ट ने शर्तों में ढील दी और उसे अपने गृह जिले हरियाणा के जींद जाने की अनुमति मिली।

इस केस में उन पर गंभीर धाराएँ लगाईं गईं, UAPA सहित कई प्रावधानों के तहत मामला दर्ज हुआ, लंबी पूछताछ हुई, चार्जशीट दाखिल हुई और महीनों तक अदालतों में जमानत के लिए लड़ाई चलती रही। आज भी वह मामला पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। उस समय सोशल मीडिया पर क्रांति के गीत गाने वाले अधिकांश लोग अब उस बहस में दिखाई नहीं देते, लेकिन जिन युवाओं ने वह कदम उठाया, वे अब भी कानूनी प्रक्रिया का सामना कर रहे हैं। यही लोकतंत्र की वास्तविकता है- नारे कुछ मिनट चलते हैं, मुकदमे कई वर्षों तक।

भाषण कोई देता है, भविष्य किसी और का बिगड़ता है

भारत में शायद ही कोई बड़ा आंदोलन ऐसा रहा हो जिसमें सबसे बड़ा कानूनी बोझ नेताओं ने उठाया हो। मंच से जोश भरे भाषण देने वाले नेता कैमरे बंद होने के बाद अपनी राजनीतिक यात्रा पर आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन जिस छात्र ने बैरिकेड पार किया, जिसने पुलिस से धक्का-मुक्की की या जिसने भावनाओं में आकर कानून की सीमा लांघ दी, वही FIR में नामित होता है। वही अदालतों के चक्कर लगाता है, वही नौकरी के इंटरव्यू में अपने खिलाफ दर्ज मामलों का जवाब देता है, वही वर्षों तक जमानत और सुनवाई के बीच उलझा रहता है।

राजनीति में यह पैटर्न नया नहीं है, लेकिन सोशल मीडिया के दौर में यह और खतरनाक हो गया है। अब किसी युवा को ‘क्रांतिकारी’ घोषित करने में कुछ मिनट लगते हैं, लेकिन जब वही युवा कानूनी संकट में फँसता है तो उसकी मदद के लिए न सोशल मीडिया की भीड़ आती है और न मंच से भाषण देने वाले नेता। अदालत में लाइक्स और रीट्वीट नहीं चलते, वहाँ केवल कानून चलता है।

लोकतंत्र विरोध की आजादी देता है, लेकिन संस्थाओं पर दबाव बनाने की छूट नहीं

सरकार की आलोचना लोकतंत्र का आधार है। शिक्षा, रोजगार, पेपर लीक, भ्रष्टाचार या किसी भी सार्वजनिक मुद्दे पर आंदोलन करना नागरिकों का अधिकार है। लेकिन संसद की ओर बढ़ना, प्रतिबंधित क्षेत्र को राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का मंच बना देना या यह संदेश देना कि संसद तक पहुँच जाना ही संघर्ष की अंतिम मंजिल है, लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए स्वस्थ संकेत नहीं है। संसद केवल सांसदों की इमारत नहीं, बल्कि भारत की सर्वोच्च विधायी संस्था है।

2001 के आतंकी हमले के बाद इसकी सुरक्षा व्यवस्था इसलिए कठोर बनाई गई थी क्योंकि यह केवल एक भवन नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न भी है। यदि आज किसी एक आंदोलन के लिए संसद की सुरक्षा को चुनौती देना सामान्य बना दिया जाएगा, तो कल दूसरा संगठन भी यही करेगा और परसों तीसरा भी। इसका परिणाम यह होगा कि हर प्रदर्शन को सुरक्षा एजेंसियाँ संभावित खतरे की तरह देखेंगी और अंत में नुकसान शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक आंदोलनों का ही होगा।

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का प्रोटेस्ट: वही पुराना मोहरा बनाने का खेल

संसद की सेंधमारी का मामला हो या फिर सड़कों पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा किए जा रहे उग्र प्रदर्शन, युवाओं का इस्तेमाल करने का तरीका एक जैसा ही है। CJP के हालिया प्रदर्शनों में देखा गया कि कैसे युवाओं के हाथों में झंडे, डंडे, पत्थर थमाकर उन्हें पुलिस और आम जनता के सामने खड़ा कर दिया जाता है। प्रदर्शन के दौरान हिंसा होती है, पुलिसकर्मियों पर हमले किए जाते हैं और सरेआम कानून-व्यवस्था की धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं।

CJP के नेता पीछे बैठकर अपना राजनीतिक एजेंडा सेट करते हैं और आगे की पंक्ति में साधारण परिवारों के युवाओं को धकेल दिया जाता है। जब पुलिस की तरफ हिंसा को रोकने के लिए वाटर कैनन और लाठियाँ चलती हैं, तो चोट इन युवाओं को लगती है। CJP या किसी भी उग्र संगठन के बड़े नेता कभी जेल की सलाखों के पीछे सड़ने नहीं जाते। आज कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन की तस्वीरें सबके सामने है। युवाओं को भड़काने ये खेल कैसे चलता है, इसे भी आप आज (21 जुलाई 2026) के ही उदाहरण से समझिए।

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और AAP के संयोजक अरविंद केजरीवाल CJP के प्रदर्शन में पहुँचे थे। उन्होंने इन आंदोलनकारी छात्रों से जिस तरह बात की वो बताता है कि नेता इन छात्रों को किसी भी हद तक जाने के लिए उकसा रहे हैं। उन्होंने कहा, “अब इस्तीफा धर्मेंद्र प्रधान का नहीं मोदी का इस्तीफा होना चाहिए। पुलिस ने प्रेस रिलीज दी है कि जो लोग आंदोलन में आए थे उन पर केस करेंगे, मैं मोदी को चैलेंज करता हूँ केस करके दिखा तेरे मैं दम है तो। आप लोग केस से मत डरना। बड़े से बड़ा वकील खड़ा कर देंगे। आप लोगों को छुड़ा के ले आएँगे। अपना डर निकाल दो। जिस दिन डर निकल गया उस दिन कोई आपको जीतने से नहीं रोक सकता।”

क्या आपको वाकई लगता है कि अगर यही छात्र कल संसद में घुस जाएँ, वहाँ वितंडा करें तो ये नेता उनके लिए खड़े होंगे? केस तो छोड़िए, दिपके से लेकर सौरव दास और विजेता दहिया तक या इस आंदोलन के सहारे युवाओं को भड़काने की कोशिश करने वाले कितने नेता आपको पुलिस से भिड़ते दिखे?

जिसने युवाओं को भड़काया, आंदोलन के ना पर उकसाया और अपनी माँगों को पूरा करने के लिए जोश भरा, वो ही इस प्रदर्शन में कहीं दिखने को नहीं मिला। पुलिस से हाथापाई करते, हिंसा का शिकार होते और अपने भविष्य को बर्बाद करते केवल और केवल युवा ही दिखाई दे रहे हैं, जिन्हें ये भी मालूम नहीं है कि ये साजिश रचने वाले आराम से कुर्सी पर बैठकर, हाथ में चाय का गिलास लेते हुए आपकी इस दशा को देखकर ठहाके मारकर हँस रहे हैं।

ऐसा भी नहीं है कि युवा इन्हें नहीं समझ रहे हैं। जो छात्र या युवा इन तिलचट्टों के समर्थन के लिए जंतर-मंतर पहुँचे थे, उन्होंने इनके तौर-तरीकों को देखकर इन्हें जमकर खरी खोटी भी सुनाई है। इस युवा प्रदर्शनकारी को देखिए। ये इस बात से बेहद खफा है कि कुछ लोगों ने इस आंदोलन को VIP बना दिया है। एक युवती इनके VIP रवैया से नाराज होकर पूछ रही है, “किसने लाठियाँ खाई हैं, यहाँ पर इतने लोगों को लाठियाँ पड़ी हैं। वहाँ पर इतने लोगों को मार पड़ी है। लेकिन वो सब किसने किया है।”

युवाओं के लिए सबसे बड़ा सबक: आंदोलन खत्म हो जाते हैं, लेकिन केस साथ चलता है

हर पीढ़ी में ऐसे युवा होते हैं जो व्यवस्था बदलना चाहते हैं। यह लोकतंत्र के लिए अच्छी बात है। लेकिन उतना ही जरूरी यह समझना भी है कि व्यवस्था बदलने और कानून तोड़ने में अंतर होता है। यदि कोई नेता आपको यह विश्वास दिला रहा है कि संसद की ओर बढ़ना ही लोकतांत्रिक संघर्ष का सबसे बड़ा प्रतीक है, तो पहले उससे यह भी पूछिए कि यदि आपके खिलाफ FIR हुई, यदि आपकी पढ़ाई प्रभावित हुई, यदि सरकारी नौकरी का सपना खतरे में पड़ा या वर्षों तक अदालतों के चक्कर लगाने पड़े, तो क्या वह आपके साथ खड़ा रहेगा? भारतीय राजनीति का इतिहास बताता है कि अधिकांश मामलों में इसका उत्तर ‘नहीं’ होता है।

आंदोलन नए आ जाते हैं, मुद्दे बदल जाते हैं, नेता नए भाषण देने लगते है लेकिन मुकदमे में फँसा युवा वहीं रह जाता है। इसलिए लोकतंत्र में सबसे बड़ा साहस बैरिकेड तोड़ना नहीं, बल्कि भावनाओं के बजाय विवेक से निर्णय लेना है। विरोध कीजिए, सवाल पूछिए, सरकार को कठघरे में खड़ा कीजिए, लेकिन किसी भी राजनीतिक रणनीति का मोहरा बनने से पहले यह जरूर सोचिए कि जब भीड़ छँट जाएगी और कैमरे चले जाएँगे, तब आपके साथ कौन खड़ा होगा। यही सवाल आज हर उस युवा को खुद से पूछना चाहिए, जिसे किसी भी मंच से संसद की ओर बढ़ने का आह्वान सुनाई देता है।

PM की हत्या की साजिश, संसद में घुसने का प्रयास और पुलिस पर पथराव: Insta रील से इतर समझें ‘कॉकरोचों’ का एजेंडा, कैसे ठगे गए असली छात्र

20 जुलाई 2026 का दिन दिल्ली के लिए सिर्फ एक और प्रदर्शन का दिन नहीं था, यह एक ऐसी लड़ाई थी जो एकतरफा पेश की गई। एक तरफ इंस्टाग्राम की रील्स और कुछ तथाकथित पत्रकारों के दावे थे, जो कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के ‘संसद चलो’ प्रदर्शन को पूरी तरह पुलिस के खिलाफ और प्रदर्शनकारियों को क्लीनचिट देने के प्रयास से गढ़े गए थे। दूसरी तरफ, प्रदर्शन में जो पत्थरबाजी, गाली-गलौज, तोड़फोड़, हिंसक नारेबाजी के पीछे की साजिश थी, उस पर बात करने को कोई तैयार ही नहीं है।

यह प्रदर्शन जितना सड़कों पर व्यापक था हुआ, उतना ही सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर भी लड़ा जा रहा था, जहाँ नैरेटिव गढ़े जा रहे थे और सच्चाई को दबाने की कोशिश हो रही थी। इसी दूसरे मोर्चे को समझने के लिए एक छोटा-सा प्रयोग ही काफी है।

20 जुलाई 2026 यानी ‘संसद मार्च’ की रात करीब तीन से चार घंटे तक सोशल मीडिया पर रील स्क्रॉल करने पर जब मेरे सामने सिर्फ एकरफा नैरेटिव का कंटेन्ट सामने आता रहा, तो मुझे भी हैरानी हुई। पुलिस की कार्रवाई दिखाई गई, छात्रों के चेहरे में छिपे ‘हिंसक भीड़’ को विक्टिम घोषित कर दिया गया और यहाँ तक कि मौके पर मची अफरा-तफरी का सारा ठीकरा सरकार पर फोड़ दिया गया। यह सिर्फ मेरी टाइमलाइन नहीं थी, मेरे दोस्तों के एल्गोरिदम का भी यही हाल था जहाँ हर कोई इस एकतरफा नैरेटिव को आगे शेयर करता जा रहा था।

लेकिन इसमें जो मिसिंग था, वो घायल पुलिसकर्मियों की तस्वीर, हिंसक भीड़ द्वारा तोड़ी गई पुलिस वैन और आम गाड़िया या मंदिर जैसे पवित्र स्थिल पर हुए पथराव, इनमें से कुछ भी उस एल्गोरिदम के कंटेन्ट में जगह नहीं बना पाया। यही वह पल था जब समझ आया कि देश के GenZ (जेन जी) को किस तरह एकतरफा कंटेन्ट परोसकर ब्रेनवॉश किया जा रहा था।

इसीलिए मेरी यह रिपोर्ट जरूरी हो जाती है, ताकि दोनों पहलू सामने आएँ और वह हकीकत भी सामने आए जो रील्स के एल्गोरिदम में जगह नहीं बना पाई।

पुलिस पर हमला नहीं होने का झूठा दावा, देखें भयानक तस्वीरें

सोशल मीडिया पर वैसे तो ऐसे कई तथाकथित पत्रकार और सोशल मीडिया अकाउंट्स थे, जो एकतरफा नैरेटिव चला रहे थे। लेकिन इन नैरेटिव को गढ़ने की PhD कर चुके लोग अब नए युवाओं को भी इस नैरेटिव का हिस्सा बनाने की साजिश में थे। इसी में पुराना नाम है, आल्ट न्यूज के ‘फैक्टचेकर’ मोहम्मद जुबैर का। जुबैर ने प्रदर्शन में पुलिस पर हिंसा होने से ही साफ इनकार कर डाला, यह कहते हुए कि इसके कोई सबूत नहीं हैं।

लेकिन बिना ज्यादा छानबीन किए जुबैर ने दिल्ली पुलिस की जानकारी को भी अनदेखा कर दिया, जिसमें शुरुआत में पहले 50 पुलिसकर्मी के घायल होने और बाद में सही आँकड़ा बताते हुए 118 से ज्यादा पुलिसकर्मियों के घायल होने की बात कही गई। खुद दिल्ली के पुलिस कमिश्वर अनुराग कुमार इन घायल जवानों का हाल जानने अस्पताल पहुँचे थे।

इस जानकारी की पुष्टि मौके से सामने आए तस्वीरों और वीडियो से भी हो जाती है, जिन्हें देख तथाकथित पत्रकारों ने आँखों पर पट्टी बाँध ली और ‘मेटा’ के एल्गोरिदम ने इसे बेहतर कंटेन्ट का हिस्सा ही नहीं माना। इन वीडियो में किसी का सिर फटा हुआ दिख रहा है, किसी की आँख तो किसी की नाक फोड़ दी गई है, कईय़ों के सिर पर पट्टी बँधी नजर आई, तो किसी की हालत इतनी बुरी थी कि उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया।

ANI की तस्वीर में दिल्ली पुलिस का एक सब-इंस्पेकटर CATS एंबुलेंस के पास खड़ाई दिखाई दे रहा है और अपनी घायल आँख पर कपड़ा दबाए हुआ खून रोकने की कोशिश कर रहा है। न्यूज एजेंसी ने ही दो तस्वीरें और पोस्ट की, जिसमें नाक और सिर पर पट्टी बाँधे दो पुलिस कॉन्सटेबल अपनी ड्यूटी कर रहे हैं।

IANS की एक और तस्वीर में सुरक्षाकर्मी और मेडिकल स्टाफ़ दिल्ली पुलिस के एक घायल अधिकारी को इलाज के लिए गाड़ी में ले जाते हुए दिख रहे हैं, जिससे झड़प के दौरान लगी चोटों की गंभीरता का पता चलता है।

ANI की एक और तस्वीर में दिल्ली पुलिस का एक अधिकारी विरोध-प्रदर्शन वाली जगह पर चलता हुआ दिख रहा है, जिसकी यूनिफॉर्म की शर्ट के सामने वाले हिस्से पर खून के साफ़ धब्बे लगे हैं। यह उन दावों को और गलत साबित करता है कि कोई भी पुलिसकर्मी घायल नहीं हुआ था।

(साभार: X- Akshit Singh)

एक वीडियो ऐसी भी सामने आई, जिसमें सैंकड़ों प्रदर्शनकारियों की भीड़ एक पुलिसकर्मी को खदेड़ते हुए जमीन पर गिराकर बेरहमी से पीटते हुए दिखी, जिससे भीड़ की हिंसा का सीधा सबूत मिलता है। वीडियो में हिंसक भीड़ को पुलिसकर्मी पर कुचले देखा जा सकता है। भीड़ में जितना जिसको मौका मिल रहा है, वह उस अकेले पुलिसकर्मी को मार रहा है।

इतना ही नहीं हिंसक भीड़ ने पुलिस की गाड़ियों में जमकर तोड़फोड़ की, कुछ प्रदर्शनकारी पुलिस वैन पर चढ़कर फोटो खिंचवाते और व्लॉग बनाते दिखे। सिर्फ पुलिस वैन ही नहीं, आम नागरिकों की गाड़ियों को भी निशाना बनाया गया।

ये ऐसे कुछ चुनिंदा वीडियोज हैं जो लोगों ने रिकॉर्ड किए हैं। लेकिन मौके पर जो बर्बरता पुलिस के साथ की गई, उसके बारे में खुलकर कोई नहीं बात कर रहा है। चिंता की बात यह है कि खुद इन पीड़ित पुलिसकर्मी ने अपने ऊपर बीती को किसी मीडिया के सामने शेयर नहीं किया, न ही सोशल मीडिया पर आपबीती के वीडियो शेयर किए, जबकि दूसरी तरफ प्रदर्शनकारियों के समर्थन में कई पाकिस्तानी अकाउंट्स लगातार पोस्ट किए जा रहे थे।

(साभार: X-Newspinch)

दिल्ली पुलिस ने शुरुआती जाँच में ही खुलासा किया कि सोशल मीडिया पर कई पाकिस्तानी अकाउंट्स से प्रदर्शन को लेकर भ्रामक जानकारी फैलाई जा रही थी। इनमें झूठा दावा किया जा रहा था कि सात प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई, जबकि 391 घायल और 250 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। पुलिस अब इन विदेशी सोशल मीडिया अकाउंट्स की जाँच करेगी। वहीं पुलिस ने 70 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया है।

शांतिपूर्ण प्रदर्शन के नाम पर मंचित हिंसा

CJP के लीडर कहे जाने वाले अभिजीत दिपके के नेतृत्व में जंतर-मंतर पर 20 जून 2026 से प्रदर्शन शुरू किया गया था, और शुरू से ही यह दावा किया गया कि यह काफी ‘शांतिपूर्ण’ प्रदर्शन है और केवल ‘छात्रों के हित’ के लिए है। लेकिन एक महीने में सामने आईं इस प्रदर्शन की तस्वीरों में न तो कुछ ‘छात्रों के हित’ की कोई बात हुई, और ‘शांतिपूर्ण’ वाला टैग भी 20 जुलाई को मिट्टी में मिल गया।

‘संसद चलो’ मार्च में प्रदर्शनकारी हाथ में ईंट लेते चले तो कोई दीवार फाँदते दिखा, कोई पीएम मोदी को गाली दे रहा था, कोई झुंड में ‘गोदी मीडिया हाय-हाय’ के नारे लगा रहा था। और इसी एजेंडे के साथ ‘नेपाल जैसे हालात‘ का नैरेटिव वायरल कर डराने की कोशिश की गई।

प्रदर्शन में शामिल हुए एक पत्रकारिता के छात्र ने मौके का मंजर बताया कि पत्थरबाजी सबसे पहले प्रदर्शनकारियों की तरफ से शुरू हुई और ‘असल छात्रों’ को भी पथराव करने के लिए उकसाया गया, हिंसक प्रदर्शनकारियों ने उनसे कहा- “हम हैं पीछे तुम पत्थर फेंको।” न्यूज पिंच की इस वीडियो में पत्रकार अभिनव पांडे भी बता रहे हैं कि पथराव प्रदर्शनकारियों की तरफ से हुआ और उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था।

प्रदर्शनकारियों ने दिल्ली के कनॉट प्लेस (CP) स्थित हनुमान मंदिर पर भी पथराव किया। इस वीडियो में मुँह पर रुमाल बाँधे भीड़ का झुँड आगे बढ़ रहा है और बैरिकेट पर चढ़कर उत्पात मचाता रहा है।

केवल यही नहीं, सामने आए वीडियो में संसद की ओर मार्च कर रहे प्रदर्शनकारी हाथों में ईंट लिए चल रहे थे। चंड़ीगढ़ के एक फन्नी खान नाम के लड़का भी इस प्रदर्शन में शामिल होने पहुँचा था, उसने वीडियो में हाथ में ईंट लेकर धमकी दे रहा था कि अगर उसे संसद में घुसने से रोका गया तो वह उसी ईंट से हमला करेगा।

वीडियो में उसकी आवाज लड़खड़ा रही थी, जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह नशे में था। नशे के बात करें, तो ऐसे और भी वीडियोज सामने आए जिसमें कई प्रदर्शनकारी नशे में गुस्सा दिखाते और धमकी देते दिखे। ऑपइंडिया के पत्रकार आशीष नौटियाल ने भी खुद इसे अनुभव किया, वह 20 जुलाई की पूरी रात जंतर-मंतर पर थे, उन्होंने बताया कि मौके पर 100 में से 90 प्रतिशत लोगों ने नशा कर रखा था, और वहाँ शराब की बुरी गँध आ रही थी।

और अगर बात ‘अहिंसक प्रदर्शनकारियों’ की करें, तो वे छात्रों के इस प्रदर्शन में ‘मोदी मुर्दाबाद’ और ‘केजरीवाल जिंदाबाद’, ‘उमर खालिद-शरजील इमाम जिंदाबाद’, ‘असम देश से अलग हो जाना चाहिए’ जैसी नारेबाजी करने में व्यस्त थे। जो ‘अहिंसा’ की कैटेगरी में हिंसा भड़काने का काम कहलाता है।

वहीं प्रदर्शन में मौजूद असली छात्र इस सुनियोजित हिंसा को समझ नहीं पा रहे थे। उनका सवाल था कि प्रदर्शन तो शिक्षा व्यवस्था ठीक करने को लेकर सरकार से जवाबदेही माँगना था, जो अब हिंसा में तब्दील हो चुका था। राजस्थान से आए एक युवा ने कहा, “हम NEET पेपर लीक पर अपनी आवाज उठाए थे, लेकिन यहाँ सब उल्टा है… चारों ओर विपक्षी दल के छात्र संगठन दिख रहे हैं… कोई BJP को गाली दे रहे है, कोई हिंदुओं को गाली दे रहा है… असली छात्र जो आ रहा है वह ठगा जा रहा है।”

वायरल व्हाट्सऐप चैट्स से खुली पोल

और यह कोई अचानक भड़की हिंसा नहीं थी, यह एक रात पहले से रची गई पूरी पटकथा का नतीजा थी। 20 जुलाई से एक रात पहले ही व्हाट्सऐप ग्रुप्स पर प्रदर्शन की बकायदा योजना बनाई जा चुकी थी और असली छात्रों को इसी योजना के जरिए सोशल मीडिया को हथियार बनाकर उकसाया गया। उन्हें कदम दर कदम बताया गया कि करना क्या, अगर पुलिस रोकने की कोशिश करे तो क्या करना है, अगर बैरिकेडिंग लगा दे तो क्या करना है, संसद का गेट बंद कर दे तो क्या करना है और अपने साथ क्या पहनना है से लेकर क्या चीजें लेकर आनी है, सबकुछ।

(साभार: X-vijaygajeraO)

सोशल मीडिया पर कुछ संदिग्ध अकाउंट्स तो लोगों को जंतर-मंतर आने का खर्चा तक देने को तैयार थे। और सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इन्हीं चैट्स में छात्रों को यह कहकर उकसाया गया कि ‘मरने-मारने को भी तैयार रहना’ यानी जिन छात्रों को NEET पेपर लीक जैसे वाजिब मुद्दे के नाम पर बुलाया गया था, उन्हें ही हिंसा के लिए मानसिक रूप से तैयार किया जा रहा था।

(फोटो साभार: Instagram-chalo_sansad)

वायरल व्हाट्सऐप चैट्स में लिखा गया था, “भाई किसी की मौत होती है तो सरकार पर ज्यादा प्रेशर आएगा।” यही वह सोची समझी साजिश थी जिसके चलते प्रदर्शन के दौरान 7 मौतों की झूठी खबरें फैलाई गई थीं, हालाँकि दिल्ली पुलिस ने बाद में इस दावे का खंडन कर इस साजिश को नाकाम कर दिया था।

वहीं जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) के वामपंथी छात्र संगठनों के व्हाट्सऐप ग्रुप्स में तो योजना बनाई गई कि अगर इंटरनेट जैम लगाया गया तो Briar और Bitchat जैसे ब्लूटुथ ऐप्स का इस्तेमाल किया जाएगा। छात्रों को बताया गया कि सुबह पुलिस यूनिवर्सिटी के गेट बंद कर सकती है, इसलिए रात दो-तीन बजे ही जंतर-मंतर पहुँचना होगा।

(साभार: X-vijaygajeraO)

पत्रकारों पर हमले और गोदी मीडिया का शोर

प्रदर्शन के दौरान एक पैटर्न यह भी सामने आया कि प्रदर्शनकारी सिर्फ उन्हीं पत्रकारों से बात कर रहे थे जो एक तयशुदा नैरेटिव के साथ ‘पत्रकारिता’ करते हैं। जो भी पत्रकार प्रदर्शनकारी से उनकी मर्जी के अलावा सवाल पूछ रहा था, तो उन्हें वह या तो अपनी हिंसा का शिकार बना रहे थे या फिर ‘गोदी मीडिया’ की नारेजाबी कर प्रताड़ित किया जा रहा था।

एबीपी न्यूज के रिपोर्टर वरुण भसीन भी हिंसक भीड़ के हमले का निशाना बने। भसीन को प्रदर्शनकारियों के झुंड ने घेर लिया और ‘गोदी मीडिया हाय-हाय’ के नारे लगाए। भसीन ने आपबीती सुनाते हुए कहा कि प्रदर्शन कवर करने के दौरान उन्हें भीड़ में ऐसे कई युवा दिखे जो लगातार मीडिया की गाड़ियों पर हमला कर रहे थे, कैमरे तोड़ने की कोशिश कर रहे थे, और मीडिया पर पत्थर तक फेंके गए।

इन्हीं प्रदर्शनकारियों ने ऑपइंडिया के पत्रकार अनुराग मिश्रा को भी निशाना बनाया था, जब वह कवरेज करने जंतर-मंतर पहुँचे थे। प्रदर्शनकारियों ने उनके साथ धक्का-मुक्की की और ‘गोदी मीडिया हाय-हाय’ के नारेबाजी कर गाली-गलौज तक की।

अब यहीं से समझ लीजिए कि यह प्रदर्शन महिला के लिए कितना सुरक्षित रह जाएगा, और इस पर सवाल भी उठे जब PEEKTV की रिपोर्टर प्रियांशी के साथ भी यही हुआ, जब उन्होंने प्रदर्शनकारियों से लीडरशिप और आगे की रणनीति के बारे में सवाल पूछा तो भीड़ भड़क गई और उन पर मुद्दे से भटकाने का आरोप लगाते हुए वही ‘गोदी मीडिया’ की नारेबाजी करने लगी।

इन घटनाओं से यह भी साफ हो जाता है कि ऐसे माहौल में सिर्फ पुरुष ही नहीं महिला पत्रकारों के लिए प्रदर्शन की कवरेज करना कितना असुरक्षित हो चला था।

CJP के प्रदर्शन में AISF के झंडे, ‘जय भीम’ ने किया कब्जा

‘संसद चलो’ मार्च से एक दिन पहले ही ‘आंदोलनजीवी’ योगेंद्र यादव ने जंतर-मंतर पर CJP के मंच से ‘पंचशील‘ जारी किए थे। इनमें सबसे पहला था कि मार्च में सिर्फ तिरंगा झंडा लेकर आना है, लेकिन ग्राउंड पर इससे उलट देखा गया। ऑपइंडिया जब ग्राउंड पर पहुँचा तो प्रदर्शन में AISA, SFI और अन्य कम्युनिस्ट छात्र संगठनों के झंडे लहराए जा रहे थे।

इनमें भी सबसे ज्यादा जो झंडे फहराए जा रहे थे, वो चंद्रशेखर आजाद की ‘भीम आर्मी’ राजनीतिक दल के झंडे थे। ऑपइंडिया ने भी रिपोर्ट किया कि इस प्रदर्शन पर भीमा आर्मी के समर्थकों की भारी संख्या में भीड़ जुटी थी। वीडियोज भी सामने आए थे जिनमें चंद्रशेखर आजाद प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते दिखाई दे रहे थे।

यही नहीं प्रदर्शनकारियों में गैंगस्टर भी घुसे हुए थे। नॉर्थ ईस्ट दिल्ली का गैंगस्ट हाफी अफजल भी अपने साथ भारी संख्या में लोगों को लेकर प्रदर्शन में पहुँचा था और मौके पर ‘बीजेपी मुर्दाबाद’, ‘मोदी मुर्दाबाद’ और ‘जब-जब मोदी डरता है पुलिस को आगे करता है’ जैसे भड़काऊ नारे लगा रहा था।

निष्कर्ष

तो देखिए इस पूरे प्रदर्शन का निष्कर्ष क्या निकलकर आया है। 20 जुलाई को ‘संसद चलो’ प्रदर्शन को लेकर सोशल मीडिया, खासकर इंस्टाग्राम रील्स के जरिए जो एकतरफा तस्वीर गढ़ी गई, वह जमीनी हकीकत से मीलों दूर थी। इससे यह पता लगता है कि इस्टाग्राम कैसे युवाओं का ब्रेनवॉश कर रहा है। असली छात्र जो NEET पेपर लीक के मुद्दों पर आवाज उठाने पहुँचे थे, वे इस भीड़ में कहीं गुम हो गए, जबकि राजनीतिक दलों, वामपंथी छात्र संगठनों और उपद्रवियों ने प्रदर्शन को एक बिल्कुल अलग दिशा दे दी।

वहीं पुलिस पर हमले, मंदिर पर पथराव, पत्रकारों से बदसलूकी और हिंसा फैलाने की सुनियोजित साजिश के सबूत सामने आने के बावजूद एक बड़ा तबका इन तथ्यों को जानबूझकर नजरअंदाज करता रहा। यही वजह है कि दोनों पहलुओं को खुलकर सामने रखना जरूरी हो जाता है, ताकि जनता खुद तय कर सके कि उस दिन जंतर-मंतर की सड़कों पर हकीकत क्या थी।

वहीं प्रदर्शन का असली नेतृत्व की बात करें, तो वह मौके से ही गायब रहा। न तो अभिजीत दिपके की लीडरशिप दिखी, न सौरव दास, न आशुतोष रांका और न ही CJP के वॉलंटियर्स नजर आए। वहीं प्रदर्शन के वक्त प्रवक्ता विजेता दहिया को मेट्रो स्टेशन पर बर्गर खाते पकड़ा गया।

नतीजा यही निकलकर सामने आया कि महीने भर से ‘शांतिपूर्ण’ प्रदर्शन के नाम पर सिर्फ एक ढोंग चल रहा था, जब मौका मिला तो ‘कॉकरोचों’ के नाम पर हिंसकर भीड़ ने अपना असली रूप दिखा दिया। अब इसी भीड़ में एक-एक आदमी की पहचान दिल्ली पुलिस FRI तकनीक से करेगी।

और अपडेट यह है कि CJP अब भी जंतर-मंतर पर डेरा जमाए बैठी है। सरकार की तरफ से आश्वासन दिए जाने के बावजूद प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर खाली करने को तैयार नहीं है। वहीं दूसरी ओर CJP के भीतर दरार भी अब खुलकर सामने आने लगी है। अभिजीत दिपके के नेतृत्व को लेकर कुछ लोग पहले से ही नाराज थे और अब प्रदर्शन छोड़कर बर्गर खाने वाले विजेता दहिया को भी प्रवक्ता के पद से हटा दिया गया।

कुल मिलाकर निष्कर्ष यही निकलता है कि इस पूरे प्रदर्शन में सबसे ज्यादा नुकसान उन आम छात्रों का हुआ जो शुरू से ईमानदारी के साथ CJP को सपोर्ट कर रहे थे।

मुंबई में उद्धव ठाकरे, कोलकाता में ममता बनर्जी, दिल्ली में राहुल-अखिलेश और चंद्रशेखर: जानिए जगह-जगह कैसे राजनीतिक तमाशे में बदला कॉकरोचों का प्रोटेस्ट

देश में छात्रों और बेरोजगार युवाओं के नाम पर शुरू हुआ ‘कॉकरोच आंदोलन’ अब अपने मूल उद्देश्यों से भटकता दिख रहा है। जिन युवाओं ने रोजगार, निष्पक्ष परीक्षाओं और शिक्षा सुधारों को लेकर आवाज उठाई थी, उनके मंच पर अब राजनीतिक दलों का कब्जा, वैचारिक जंग और आपत्तिजनक नारों का बोलबाला हो चुका है।

देश के शीर्ष संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों (खासकर सीजेआई) की टिप्पणियों के विरोध में युवाओं ने सांकेतिक रूप से ‘कॉकरोच’ (कीड़ा) शब्द को अपने आत्मसम्मान से जोड़कर एक डिजिटल अभियान शुरू किया, तो देखते ही देखते इसने पूरे देश में तूल पकड़ लिया। सड़कों पर छात्र कॉकरोच के मास्क पहनकर और हाथ में अपनी डिग्रियाँ लेकर उतरे। उनका कहना था कि यदि रोजगार माँगने वाले युवाओं को व्यवस्था ‘कीड़ा-मकोड़ा’ समझती है, तो वे इसी पहचान के साथ सरकार से जवाब माँगेंगे।

इनकी शुरुआती माँगें थी-

  • NEET-UG और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में हुई धाँधली व पर्चा लीक मामलों पर सख्त कार्रवाई
  • केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की जवाबदेही और सुधार के साथ धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा
  • पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया और युवाओं के लिए गारंटीकृत रोजगार के अवसर

लेकिन जैसे-जैसे यह आंदोलन दिल्ली के जंतर-मंतर से निकलकर राज्यों की राजधानियों और प्रमुख शहरों तक फैला, इसकी दिशा पूरी तरह बदल गई। सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल पीछे छूट गई और सड़कों पर सियासी दलों के कार्यकर्ताओं ने जमकर सियासी रोटियाँ सेंकी। जो आज भी जारी है।

कॉकरोचों के नाम पर राजनीतिक दलों ने सेंकी सियासी रोटियाँ

महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, केरल और मध्य प्रदेश के अलग-अलग शहरों में हुए इन प्रदर्शनों में छात्रों की उपस्थिति कम होती गई और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बैनर ज्यादा दिखाई देने लगे।

महाराष्ट्र में मुंबई से लेकर पुणे, नागपुर और संभाजीनगर तक प्रदर्शन

महाराष्ट्र में आंदोलन की तीव्रता सबसे अधिक देखी गई, जहाँ छात्र संगठनों के साथ-साथ राजनीतिक दलों के कैडर भी सड़कों पर उतर आए। महाराष्ट्र के मुंबई, पुणे, छत्रपति संभाजीनगर, नागपुर जैसे शहरों में महाविकास आघाड़ी दल में शामिल एनसीपी-एसपी, शिवसेना-UBT के साथ ही वामपंथी छात्र संगठन, किसान संगठन भी इसमें शामिल हो गए।

मुंबई में राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) और युवा सेना (UBT) के कार्यकर्ताओं ने मुंबई विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर विरोध-प्रदर्शन किया। पुलिस ने परिसर की सुरक्षा बढ़ा दी और प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए हल्का बल प्रयोग किया।

खुद शिवसेना-यूबीटी के नेता उद्धव ठाकरे मैदान में उतरे और उन्होंने मंच से प्रदर्शन की कमान संभाली। पार्टी ने सार्वजनिक तौर पर सीजेपी का समर्थन किया है।

यहाँ शिवसेना-यूबीटी के कार्यकर्ताओं ने जमकर हंगामा किया और तोड़फोड़ की, जिसके बाद मुंबई पुलिस ने कार्रवाई भी की। इस हंगामे के दौरान 70 से अधिक लोगों को डिटेन भी किया गया था, जिसमें अधिकाँश छात्र बताए गए, हालाँकि शिवसेना-यूबीटी के नेताओं ने उन्हें पुलिस की हिरासत से छुड़ा लिया। वहीं, पार्टी ने दावा किया कि 150+ लोगों को डिटेन किया गया था।

मुंबई और महाराष्ट्र में एनसीपी-शरद पवार की पार्टी ने भी जमकर हंगामा किया।

एनसीपी-शरद पवार ने खुलकर सीजेपी का समर्थन भी किया।

छत्रपति संभाजीनगर के क्रांति चौक पर छात्रों, स्थानीय वकीलों और विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की माँग को लेकर रास्ता जाम (चक्का जाम) कर दिया। यहाँ पुलिस के साथ धक्का-मुक्की हुई और यातायात घंटों बाधित रहा।

इसके अलावा नागपुर में जिला कलेक्टरेट कार्यालय का घेराव करने की कोशिश की गई, जबकि लातूर में छात्रों ने सांकेतिक रूप से डिग्रियाँ जलाकर अपना विरोध दर्ज कराया।

FTII पुणे में भी प्रदर्शन

पुणे में फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टीट्यूट आफ इंडिया (FTII) के छात्र संघ ने कैंपस के भीतर और बाहर मार्च निकाला और सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल व CJP की माँगों का समर्थन किया।

गुजरात में भी खूब हुई सियासत

गुजरात के अहमदाबाद, बड़ौदा में आम आदमी पार्टी (AAP) युवा मोर्चा, स्थानीय नेताओं ने सरकार विरोधी हाई-वोल्टेज ड्रामा करते हुए गिरफ्तारियाँ दी हैं।

अहमदाबाद में लॉ गार्डन और एलिस ब्रिज के पास ‘संसद चलो’ मार्च और सोनम वांगचुक के समर्थन में विरोध प्रदर्शन कर रहे 150 से अधिक छात्रों और कार्यकर्ताओं को पुलिस ने हिरासत में लिया था। पुलिस के अनुसार, यह कार्रवाई बिना अनुमति के इकट्ठा होने और धारा 1 के तहत निषेधाज्ञा का उल्लंघन करने के कारण की गई थी।

दिल्ली में कॉन्ग्रेस और AAP में श्रेय लेने की होड़

दिल्ली में राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी के साथ ही मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रदर्शन की कमान संभाली और पीएम आवास तक मार्च किया। हालाँकि इसका आम आदमी पार्टी ने तीखा विरोध किया।

आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद और नेता संजय सिंह ने राहुल गाँधी पर सरकार का एजेंट होने का आरोप लगा दिया। उन्होंने कहा कि सरकार के कहने पर राहुल गाँधी इस तरह के प्रदर्शन में शामिल हुए हैं।

आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर और उनके समर्थकों ने मचाया हंगामा

दिल्ली में CJP के प्रदर्शन के दौरान हिंसा के मामले में सांसद चंद्रशेखर आजाद पर बड़े आरोप लगे हैं। चंद्रशेखर के साथ 8000 से 10000 लोग जय सिंह रोड पर इकट्ठा होकर संसद जाने की कोशिश कर रहे थे। पब्लिक के लिए रास्ता ब्लॉक कर दिया था। चंद्रशेखर के समर्थकों ने कॉपरेटिव सोसाइटी की टाइल पत्थर तोड़कर हमला किया, काँच की बोतलों से हमला किया, जूतों से हमला किया, पत्थर मारे।

जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के साथ ही AISA ने भी ताना था टेंट

जंतर-मंतर पर लंबे समय से कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले लोगों को बुलाया जा रहा था, तो दूसरी तरफ उस प्रोटेस्ट को संभालने की जिम्मेदारी AISA जैसे वामपंथी स्टूडेंट यूनियन ने उठा रखी थी। ताकि CJP के प्रदर्शन में राजनीति भी जमकर की जा सके और प्रदर्शन को गैर-राजनीतिक भी साबित किया जा सके। हालाँकि वांगचुक के साथ ही आईसा के भी 3 मेंबर्स भूख हड़ताल पर बैठे थे, लेकिन सोनाम के मोर्च से हटने के बाद वो सामने आए। अभी तक वो अपेक्षाकृत लो-प्रोफाइल तरीके से पूरे प्रदर्शन को मैनेज करने वाले रोल में रहे। ये अलग बात है कि ‘डफली गैंग’ के एक्सपोज होने के साथ ही दोनों का कनेक्शन भी एक्सपोज हो गया था।

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का CJP को खुला समर्थन, प्रदर्शन में शामिल होने का ऐलान

पश्चिम बंगाल के कोलकाता, जादवपुर में तृणमूल छात्र परिषद (TMCP), CPIM समर्थित संगठनोंने केंद्रीय एजेंसियों के खिलाफ नारेबाजी और राजनीतिक बयानबाजी करते हुए प्रदर्शन किए।

वहीं, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी (TMC) प्रमुख ममता बनर्जी ने दिल्ली में CJP (कॉकरोच जनता पार्टी) के विरोध प्रदर्शन और संसद मार्च को अपना खुला समर्थन दिया है। उन्होंने कोलकाता में आयोजित एक कार्यक्रम में स्पष्ट कहा कि उनकी पार्टी इस आंदोलन के साथ मजबूती से खड़ी है और जरूरत पड़ने पर वे खुद भी प्रदर्शन में शामिल होंगी।

कर्नाटक में भी प्रदर्शन के दौरान पुलिस से झड़प

बेंगलुरु में वामपंथी छात्र संगठनों और CJP समर्थकों ने फ्रीडम पार्क में रैली निकाली। प्रदर्शनकारियों की पुलिस के साथ बहस हुई जब उन्होंने राजभवन की ओर मार्च करने का प्रयास किया। कॉन्ग्रेस शासित पुलिस ने इन प्रदर्शनों को बेरहमी से कुचला और तुरंत इन्हें तितर-बितर करने में देरी नहीं लगाई।

केरल में पुलिस कार्रवाई और वॉटर कैनन का प्रयोग

केरल के तिरुवनंतपुरम और कोच्चि में CPM-समर्थित छात्र संगठनों (SFI और DYFI) ने प्रदर्शन को अपने वैचारिक एजेंडे की दिशा में मोड़ने का प्रयास किया। प्रदर्शनकारियों ने जब सचिवालय की ओर बढ़ने की कोशिश की और सुरक्षा बैरिकेड्स तोड़े, तो स्थिति हिंसक हो गई।

केरल की कॉन्ग्रेस सरकार ने इन प्रदर्शनों को बेदर्दी से कुचलने में कोई देरी नहीं की। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर वॉटर कैनन (जल बौछार) और लाठीचार्ज का इस्तेमाल किया, जिससे कई कार्यकर्ता घायल हुए।

गोवा में NGO लॉबी ने निकाला कैंडल लाइट मार्च

गोवा में गैर-सरकारी संगठन (NGO) ‘उजवाड’ के बैनर तले राजधानी पणजी में एक कैंडललाइट मार्च निकाला गया। मार्च में शामिल लोगों ने शिक्षा क्षेत्र में फैली कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के मामलों पर सरकार की खिंचाई की।

MP में भी CJP के नाम पर सरकार विरोधी प्रदर्शन

देश के कई अन्य राज्यों की तरह ही मध्य प्रदेश के कई शहरों में विरोध प्रदर्शन हुए। कहीं राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता छात्र बनकर प्रदर्शन करते नजर आए, तो कहीं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने व्यवस्था सुधार के नाम पर मोर्चा संभाला। मध्य प्रदेश में राजधानी भोपाल से लेकर खरगोन जिले तक ये प्रदर्शन हुए।

दरअसल, आगामी स्थानीय और राज्यस्तरीय चुनावों को देखते हुए विपक्षी दलों को छात्रों का यह गुस्सा एक तैयार वोट बैंक की तरह दिखा। NSUI, समाजवादी छात्र सभा और SFI जैसे संगठनों ने आंदोलन के मंचों पर कब्जा कर लिया, जिससे आम और गैर-राजनीतिक छात्र धीरे-धीरे किनारे होते चले गए।

जो आंदोलन कभी देश भर के करोड़ों बेरोजगार और प्रताड़ित छात्रों की बुलंद आवाज बनकर उभरा था, वह आज राजनीतिक रैलियों और टीवी बहसों का महज एक मसाला बनकर रह गया है। नेताओं ने इस मंच का इस्तेमाल एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने और राजनीतिक रोटियाँ सेकने के लिए तो खूब किया, लेकिन नतीजा यह रहा कि छात्र आज भी वहीं खड़े हैं हाथ में अपनी डिग्रियाँ लिए, अगली परीक्षा की तारीख और एक पारदर्शी तंत्र के इंतजार में।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भारत में छात्र आंदोलनों का भटकना कोई नई बात नहीं है। जब भी युवाओं का कोई स्वतःस्फूर्त आंदोलन खड़ा होता है, राजनीतिक पार्टियां उसमें अपना फायदा ढूँढने लगती हैं। ‘कॉकरोच आंदोलन’ भी उसी सियासत का शिकार हो गया।

किसान संगठनों को सच में है ‘अन्नदाताओं’ की चिंता या महापंचायत के नाम पर सिर्फ उठा रहे मौके का फायदा?

भारत-अमेरिका के बीच प्रस्तावित ट्रेड डील के विरोध में दिल्ली के किसान घाट पर 21 जुलाई 2026 (मंगलवार) को ‘देश बचाओ मोर्चा’ ने विरोध प्रदर्शन आयोजित किया है।

आयोजकों का कहना है कि देशभर से लगभग 550 किसान संगठनों और सामाजिक समूहों के प्रतिनिधि इस किसान महापंचायत में शामिल होंगे।

वहीं सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनजर पुलिस ने शंभू बॉर्डर को सील कर दिया है और घग्गर नदी के पुल पर बैरिकेड्स लगा दिए हैं, साथ ही सीमेंट से ब्लॉक भी बनाए गए हैं। किसी भी स्थिति को संभालने के लिए मौके पर पुलिस बल तैनात है।

किसान नेताओं के आरोप

किसान नेताओं का आरोप है कि पंजाब और हरियाणा, दोनों सरकारें उन्हें दिल्ली जाने से रोक रही हैं। उनका कहना है कि हरियाणा पुलिस ने पंजाब की सीमा में घुसकर रास्ते बंद कर दिए और पंजाब सरकार ने भी इसे नहीं रोका। पंजाब के अलग-अलग हिस्सों से किसानों को दिल्ली लाने के लिए बसों का इंतजाम किया गया था।

मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि 16 जुलाई (गुरुवार) की सुबह लगभग 1000 किसानों को लेकर एक काफिला गुरुद्वारा श्री फतेहगढ़ साहिब से रवाना हुआ था, जो जीटी रोड से होकर शंभू बॉर्डर की ओर बढ़ा, लेकिन वहाँ पहले से ही भारी पुलिस बल तैनात था और सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई थी।

इससे पहले, भारतीय किसान यूनियन (चढ़ूनी) के अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढ़ूनी को कुरुक्षेत्र में पुलिस ने दिल्ली जाते समय हिरासत में लिया था। वहीं संगठन के प्रवक्ता प्रिंस वरैच ने बताया था कि उनके कई कार्यकर्ताओं को पकड़ा जा रहा है ताकि वे इस प्रदर्शन में शामिल न हो सकें।

हरियाणा के अंबाला और कुरुक्षेत्र जैसे इलाकों से भी किसान दिल्ली के लिए निकले। किसान मजदूर संघर्ष कमेटी (KMSC) के नेता सरवन सिंह पंधेर ने बताया कि उनके संगठन के अलावा किसान मजदूर मोर्चा, आजाद किसान मोर्चा और भारतीय किसान मोर्चा (BKU), एकता संघर्ष के लोग भी पंजाब के अलग-अलग हिस्सों से दिल्ली कूच कर रहे हैं।

पंधेर का कहना है कि सरकार इस समझौते को बिना किसानों, कृषि संगठनों से चर्चा किए गुप्त रूप से आगे बढ़ा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार इस विषय पर कोई आधिकारिक जानकारी साझा नहीं कर रही है और उन्हें समझौते से जुड़ी जानकारी केवल अमेरिका की प्रेस विज्ञप्तियों के माध्यम से मिल रही है। उन्होंने कहा कि किसान दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस समझौते पर स्पष्ट जवाब माँगेंगे।

उनके अनुसार हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सहित कई राज्यों से किसान और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि एक दिवसीय रैली में भाग लेने के लिए दिल्ली पहुँच रहे हैं।

पंधेर ने बताया कि फरवरी में जारी एक बयान में दोनों देशों ने सहमति जताई थी कि वे जल्द ही एक द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करेंगे। ऐसे में उन्हें डर है कि इसमें खेती, डेयरी, डिजिटल ट्रेड, ई-कॉमर्स और सरकारी खरीद जैसे संवेदनशील सेक्टर भी शामिल हो सकते हैं।

उन्होंने अमेरिकी रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा कि अमेरिका लंबे समय से भारत के डेयरी और कृषि बाजार में अपनी पहुँच बढ़ाने का प्रयास कर रहा है। वह सोयाबीन, मक्का, कपास, सेब, बादाम, डेयरी और पोल्ट्री उत्पादों पर भारत के लगाए जाने वाले आयात शुल्क (टैरिफ) को कम करवाना चाहता है।

इसी तरह किसान मजदूर संघर्ष कमेटी के नेता जर्मनजीत सिंह बंदाला ने दावा किया कि इस समझौते से देश के मजदूरों, छोटे दुकानदारों और किसानों को भारी नुकसान होगा। उन्होंने कहा कि यह समझौता भारतीय किसानों के बजाय अमेरिकी कंपनियों और बड़े किसानों को फायदा पहुँचाएगा।

बंदाला ने तर्क दिया कि अमेरिका में खेती हजारों एकड़ के बड़े फार्म्स में होती है और वहाँ की सरकार किसानों को भारी सब्सिडी देती है। इसके विपरीत, भारत के ज्यादातर किसानों के पास सिर्फ दो-ढाई एकड़ जमीन है और उन्हें बहुत कम सरकारी मदद मिलती है। अगर अमेरिका से सस्ता सामान भारत के बाजारों में आने लगा, तो भारतीय किसान प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएँगे और उनकी आमदनी गिर जाएगी।

उन्होंने आरोप लगाया कि भारत सरकार अमेरिकी दबाव में यह समझौता कर रही है, जबकि पिछली सरकारों ने भारतीय कृषि क्षेत्र को विदेशी प्रभाव से बचाकर रखा था। किसान नेताओं ने चेतावनी दी कि अगर सरकार ने उनकी माँगें नहीं मानीं, तो वे इस आंदोलन को और तेज करेंगे।

क्या है दावों की असलियत

मालूम हो कि भले ही इस ट्रेड डील को कुछ किसान संगठन, बेहद खतरनाक दिखाकर हंगामा और विरोध कर रहे हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौता अभी तक तय नहीं हुआ है और इसकी वजह यही है कि ये मोदी सरकार किसानों के हितों को ताक पर रखकर किसी प्रकार का समझौता करने को तैयार नहीं है।

अब ऐसी स्थिति में तो साफ लगता है कि जो आरोप लगाए जा रहे हैं, वे तथ्यों पर कम और सिर्फ आशंकाओं और अफवाहों पर ज्यादा आधारित हैं। दरअसल, हकीकत यह है कि केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल और शिवराज सिंह चौहान बार-बार साफ कर चुके हैं कि बातचीत जारी है और भारत अपने किसानों या डेयरी सेक्टर के हितों से कोई समझौता नहीं करेगा। ऐसा कोई फैसला नहीं लिया जाएगा जिससे घरेलू बाजार को नुकसान पहुँचे।

इसके अलावा फरवरी में दोनों देशों द्वारा जारी बयान के अनुसार, जिन चीजों पर टैक्स घटाने की बात चल रही है (जैसे जानवरों का दाना, मेवे, वाइन, सोयाबीन तेल आदि), वे ऐसी चीजें हैं जिन्हें भारत अपनी जरूरत पूरी करने के लिए पहले से आयात करता रहा है। इस समझौते में चावल, गेहूँ या मक्के जैसी मुख्य खाद्य फसलों का कोई जिक्र नहीं है। यह छूट सिर्फ उन चीजों के लिए है जिनका भारतीय किसानों की मुख्य फसलों से कोई सीधा मुकाबला नहीं है।

अब यदि किसानों के हितों की चिंता करने वालों को केंद्रीय मंत्री के बयान पर भी भरोसा नहीं है तो उन्हें अमेरिकी कॉमर्स सेक्रेट्री हॉवर्ड लुटनिक का बयान भी सुनना चाहिए, जो उन्होंने एक समय में गुस्से में दिया था। उन्होंने पिछले साल कहा था, “भारत के पास 1.4 अरब लोग हैं, फिर भी वे हमसे एक बोरा मक्का तक नहीं खरीदते। वे अपनी हर चीज हमें बेचते हैं, लेकिन हमारे सामान पर भारी टैक्स लगा देते हैं।”

अमेरिकी मंत्री का यह बयान खुद साबित करता है कि वह भारतीय बाजार में पैठ बनाने के लिए आतुर हैं, लेकिन भारत सरकार किसी दबाव में नहीं झुक रही है और उनके लिए किसान हित सर्वोपरि है।

पीएम मोदी ने तो खुद दोहराया है, “हमारे लिए किसानों का हित सबसे ऊपर है। भारत अपने किसानों, पशुपालकों और मछुआरों के हितों से कभी समझौता नहीं करेगा, चाहे इसकी जो भी कीमत चुकानी पड़े।”

किसान हित या स्वार्थ का खेल?

अब ये समझने की जरूरत है कि कैसे किसानों का नाम लेकर बनाए गए ये संगठन अक्सर कृषि सुधारों के रास्ते और किसानों के विकास में सबसे बड़ी रुकावट बनकर सामने आते हैं। यही स्थिति तीनों कृषि कानूनों के समय भी देखी गई थी।

वे ऐसे कानून थे, जो किसानों को यह आजादी देते थे कि वे सरकारी मंडियों (APMC) के बिचौलियों से बचकर अपनी फसल सीधे कंपनियों या प्राइवेट खरीदारों को अच्छे दामों पर बेच सकें। लेकिन फर्जी प्रचार फैलाकर आंदोलन खड़ा किया गया कि सरकार किसानों की जमीन छीन लेगी, और अंततः हिंसा व दबाव के कारण उन प्रगतिशील कानूनों को वापस लेना पड़ा।

अब जब भारत एक बड़े व्यापारिक समझौते के जरिए अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की ओर बढ़ रहा है, तो ये संगठन एक बार फिर बिना पूरी बात समझे सड़कों पर उतर आए हैं।

अगर इनका मकसद सच में किसानों की भलाई होता, तो वे सरकार के साथ बैठकर बातचीत का रास्ता चुनते, न कि बार-बार रास्ते जाम करके आम जनता और यात्रियों के लिए मुसीबत खड़ी करते।

इनका उद्देश्य, कृषि कानून को नकारने से लेकर ट्रेड डील का विरोध करने तक साफ है कि ये लोग मौके का फायदा उठाकर केवल अपने राजनीतिक और आर्थिक स्वार्थ पूरे करने का प्रयास करते हैं।

(नोट: मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में रुकमा राठौड़ ने लिखी है। इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

UK में धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ विरोध प्रदर्शन स्वाभाविक नहीं, ये पूरी तरह प्रायोजित: जानिए The Wire के दावों की हकीकत, कैसे SFI ने पहले से बुलाया था भीड़ का जुटान

वामपंथी प्रचार पोर्टल ‘द वायर’ ने दावा किया कि भारत में छात्रों का विरोध प्रदर्शन ‘लंदन तक पहुँच गया है’ और दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व वाले प्रदर्शन पर पुलिस कार्रवाई की खबरों के बाद भारतीय उच्चायोग के बाहर जमा हुए लोगों की तस्वीरें साझा करते हुए कहा है कि यह स्वतःस्फूर्त था।

गौरतलब है कि दिल्ली पुलिस ने सीजेपी समर्थकों को संसद मार्च की अनुमति नहीं दी थी। इसके बावजूद इन लोगों ने बेहद संवेदनशील इस जगह पर मार्च निकाला और संसद तक जाने की कोशिश की। कई जगहों पर प्रदर्शनकारी हिंसक हो गए। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई। इस दौरान 5 आईपीएस अधिकारी समेत कई पुलिस वाले घायल हुए। पुलिस की जवाबी कार्रवाई में कई प्रदर्शनकारी भी घायल हुए हैं।

‘द वायर’ ने सोशल मीडिया पर अपनी पोस्ट में कहा, “युवाओं का विरोध प्रदर्शन लंदन तक पहुँचा, प्रदर्शनकारी भारतीय उच्चायोग के बाहर जमा हुए।” उसने दावा किया कि दिल्ली और दूसरे शहरों में पुलिसिया कार्रवाई की खबर मिलने के बाद ‘बड़ी संख्या में’ लोग उच्चायोग के बाहर इकट्ठा हुए।

पोर्टल ने इस जमावड़े को ब्रिटेन में रहने वाले भारतीयों की स्वतःस्फूर्त प्रतिक्रिया बताया और इस तथ्य को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया कि स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) की यूके शाखा ने पहले ही तय समय पर लंदन में भारतीय उच्चायोग के बाहर विरोध प्रदर्शन का आह्वान कर रखा था।

एसएफआई यूके ने विरोध प्रदर्शन की घोषणा पहले ही कर दी थी और इसकी विस्तृत जानकारी उसके सोशल मीडिया पर शेयर किया था। संगठन ने स्थान और समय पहले ही बता दिया था, पोस्टर चिपकाए थे और अपनी माँगों की फेहरिस्त बता कर समर्थकों से इसमें भाग लेने का आह्वान किया था। एसएफआई से जुड़ी शाखा पिछले कई हफ्तों से यूके के दूसरे जगहों मसनल लीड्स और एडिनबर्ग में विरोध प्रदर्शन कर रही हैं।

मैनचेस्टर में हुए विरोध प्रदर्शन में भाग लेने वाले एक सोशल मीडिया यूजर ने बाद में पुष्टि की कि वहाँ का प्रदर्शन भी एसएफआई यूके ने ही आयोजित किया था।

द वायर ने एसएफआई के विरोध प्रदर्शन को प्रवासी भारतीयों के प्रदर्शन के रूप में प्रस्तुत किया। दरअसल यह लोगों को गुमराह करने का तरीका है। द वायर ने दिल्ली में सीजेपी समर्थकों के साथ हुई पुलिसिया झड़प का लंदन में भारतीय दूतावास के सामने ‘जवाब के रूप में’ प्रस्तुत किया। जबकि इस विरोध प्रदर्शन का ऐलान दिल्ली में हुए घटना से एक दिन पहले यानी 19 जुलाई को ही कर दी गई थी।

(साभार-एक्स)

पोस्टर पर ‘लंदन के कॉकरोच एकजुट हों’ का आह्वान किया गया था और लोगों से 20 जुलाई को शाम 6 बजे लंदन के इंडिया हाउस के बाहर ‘विरोध प्रदर्शन’ करने का आग्रह किया गया था। पोस्टर में तीन बातें थी। इसमें समर्थकों से भूख हड़ताल पर बैठे छात्रों के साथ खड़े होने, सोनम वांगचुक का समर्थन करने और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग की गई थी।

सबसे नीचे स्पष्ट रूप से लिखा था कि लंदन में आयोजित यह सभा ‘दिल्ली में संसद तक 20 जुलाई को हुए मार्च के समर्थन में’ आयोजित की जा रही है। लेकिन जैसा कि द वायर ने बताया है उस तरह से लोग विरोध प्रदर्शन के लिए जमा नहीं हुआ थे, बल्कि पहले से विरोध प्रदर्शन के लिए बुलाए जाने पर ये जमा हुआ थे। ये स्वत: स्फूर्त तो कतई नहीं था, जैसा द वायर बताने की कोशिश कर रहा है।

एसएफआई यूके ने विरोध प्रदर्शन के बाद लिखा कि लंदन में हजारों भारतीयों ने ‘हमारे आह्वान’ का जवाब दिया। उसने कहा कि यह प्रदर्शन भारतीय छात्र आंदोलन के समर्थन में आयोजित किया गया था और भारत में अपने ‘साथियों’ के संघर्ष को सलाम करता है। हालाँकि एसएफआई यूके ने दावा किया कि ‘हजारों’ लोग इकट्ठा हुए थे, लेकिन उसने जो वीडियो शेयर किया, उसमें कुछ लोग एक छोटी सी जगह में ठसाठस भरे हुए दिखाई दिए।

ब्रिटेन में हुए विरोध प्रदर्शन में शामिल लोग एसएफआई के सदस्य थे या नहीं यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन आह्वान, प्रचार, आयोजन स्थल, संदेश और भाषण सभी एसएफआई यूके की ओर से ही किए गए थे। द वायर ने इन सभी संदर्भों को हटाकर एसएफआई द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम को भारतीय प्रवासी समुदाय के ‘स्वाभाविक समर्थन’ के रूप में प्रस्तुत किया।

एसएफआई यूके कई हफ्तों से समर्थकों को जुटाने में जुटा था

जंतर-मंतर पर हुई झड़प के बाद लंदन में हुआ प्रदर्शन कोई अचानक नहीं था। एसएफआई यूके कम से कम जून की शुरुआत से ही केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग करते हुए अभियान चला रहा था।

संगठन ने 4 जून को SFI लीड्स समिति के विरोध प्रदर्शन की तस्वीरें पोस्ट कीं, जिसमें राष्ट्रीय परीक्षाओं, जिनमें NEET, CUET, UGC NET और CBSE परीक्षाएं शामिल हैं, के कुप्रबंधन का विरोध किया गया। संगठन ने कहा कि यह प्रदर्शन भारतीय शिक्षा प्रणाली को लेकर युवाओं के गुस्से और निराशा को दर्शाता है।

(साभार-एक्स)

उसी दिन की एक अन्य पोस्ट में कहा गया कि एसएफआई यूके की सचिव सोमिहा समेत दूसरे सदस्यों ने धर्मेंद्र प्रधान के तत्काल इस्तीफे की माँग की है। संगठन ने वादा किया कि जब तक उनकी माँगें पूरी नहीं हो जातीं, तब तक वे अपना विरोध प्रदर्शन जारी रखेंगे।

एसएफआई के केंद्रीय नेतृत्व ने राष्ट्रव्यापी अल्टीमेटम जारी किया था

विदेशों में चल रही यह मुहिम भारत में एसएफआई के केंद्रीय संगठन के अभियान के साथ-साथ चल रही थी। 9 जून को एसएफआई की केंद्रीय कार्यकारी समिति ने केंद्र सरकार को दस दिन का अल्टीमेटम दिया। इसकी माँगों में धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा, एनटीए को समाप्त करना और परीक्षाओं का विकेंद्रीकरण शामिल था।

(साभार-एक्स)

इसमें सीबीएसई परीक्षाओं में ओएसएम मूल्यांकन प्रणाली को रद्द करने और नीट और सीबीएसई परीक्षा विवादों की स्वतंत्र न्यायिक जाँच कराने की भी माँग की गई थी।

संगठन ने ‘सड़कों पर मिलते है’ कहा

एसएफआई ने 14 जून को दावा किया कि 22 राज्यों में 623 केंद्रों पर विरोध प्रदर्शन हुए थे। संगठन के मुताबिक, 753 लोगों को गिरफ्तार किया गया और 16 लोगों को जेल भेजा गया। एसएफआई यूके ने इस संदेश को दोबारा साझा करते हुए घोषणा की कि संगठन का ‘साहस’ अभी भी बना हुआ है।

(साभार-एक्स)

ये पोस्ट लगातार चल रहे एसएफआई के संगठनात्मक अभियान का हिस्सा था। ब्रिटेन में हुए विरोध प्रदर्शन उस व्यापक लामबंदी का हिस्सा था, न कि खुद ब खुद मोदी सरकार के विरोध में आए प्रवासी भारतीयों का प्रदर्शन था।

(साभार-एक्स)

लीड्स और एडिनबर्ग समितियों ने अलग-अलग प्रदर्शनों का आयोजन किया

एसएफआई यूके की सोशल मीडिया गतिविधि से यह भी पता चलता है कि कैसे इसकी स्थानीय समितियाँ एक ही माँगों को लेकर एकजुट हुईं। 14 जुलाई को इसकी लीड्स समिति ने पार्किंसंस बिल्डिंग के बाहर विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया। पोस्टर पर हैशटैग ‘प्रधान गोबैक’ लिखा था और घोषणा की गई थी, ‘पार्किंसंस लीड्स में तिलचट्टे जमा हो रहे हैं।’ प्रचार सामग्री में प्रदर्शनकारियों की तस्वीरें, एसएफआई के प्रतीक चिन्ह और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की माँग शामिल थी।

एसएफआई यूके ने 18 जुलाई को कहा कि उसकी एडिनबर्ग समिति ने जंतर-मंतर भूख हड़ताल और भारत में छात्र आंदोलन के समर्थन में एक विरोध प्रदर्शन आयोजित किया था। संगठन ने अपने एडिनबर्ग अध्यक्ष को वक्ता के रूप में नामित किया और सभा में सामूहिक और संगठित आंदोलनों की आवश्यकता पर बल दिया।

(साभार-एक्स)

उसी दिन लीड्स समिति ने लीड्स विश्वविद्यालय में एक और प्रदर्शन आयोजित किया। एसएफआई यूके ने कहा कि प्रदर्शनकारियों ने सरकार से जवाबदेही और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग की।

(साभार-एक्स)

इसमें सचिव सोमिहा और लीड्स सचिव गायत्री ने भी अपनी बात रखी। संगठन ने कहा कि माँगें पूरी होने तक एकजुटता जारी रहेगी। ये दिल्ली में हुई घटनाओं की खबर सुनकर स्वतंत्र रूप से एकत्रित हुई भीड़ नहीं थी। ये समिति के नेतृत्व में किए गए प्रदर्शन थे जिनमें नामित पदाधिकारी, एक जैसे बैनर और बार-बार दोहराई जाने वाली राजनीतिक माँगें शामिल थीं।

मैनचेस्टर के प्रदर्शनकारी ने पुष्टि की कि एसएफआई यूके ने ही इस सभा का आयोजन किया था। कमल नाम के एक सोशल मीडिया यूजर ने मैनचेस्टर में हुए प्रदर्शन का फुटेज भी पोस्ट किया और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग की।

(साभार-एक्स)

जब एक अन्य यूजर ने पूछा कि क्या बर्मिंघम में भी इसी तरह का विरोध प्रदर्शन आयोजित किया जा सकता है, तो कमल ने जवाब दिया कि मैनचेस्टर में आयोजित कार्यक्रम एसएफआई यूके द्वारा आयोजित किया गया था और आगे की जानकारी के लिए उनके इंस्टाग्राम अकाउंट को फॉलो करने का सुझाव दिया।

इससे इस बात की और पुष्टि होती है कि एसएफआई अपने नेटवर्क का इस्तेमाल कई ब्रिटिश शहरों में प्रदर्शन आयोजित करने के लिए कर रहा था।

एसएफआई यूके दिल्ली विरोध प्रदर्शन के बाद गठित अनौपचारिक ग्रुप नहीं है

एसएफआई यूके खुद को स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया की पहली अंतरराष्ट्रीय समिति बताती है। इसकी वेबसाइट का दावा है कि ब्रिटेन में इसके 600 से अधिक सदस्य और दस से अधिक उपसमितियां हैं। यह ब्रिटिश विश्वविद्यालयों में सक्रिय इकाइयाँ संचालित करने का दावा करती है और कहती है कि यह नियमित रूप से अभियान, सांस्कृतिक कार्यक्रम, धन जुटाने की गतिविधियाँ और छात्र कल्याणकारी कार्यक्रम आयोजित करती है।

इसके संविधान में कहा गया है कि एसएफआई का उद्देश्य भारत में छात्रों के साथ-साथ विदेशों में पढ़ रहे भारतीय छात्रों को एक मंच पर लाना है। यह एक ‘लोकतांत्रिक और समाजवादी समाज’ के निर्माण को लेकर कटिबद्ध है। छात्रों को श्रमिकों, किसानों और अन्य ‘प्रगतिशील शक्तियों’ के साथ संगठित करने और विश्व भर में समाजवादी आंदोलनों के प्रति एकजुटता दिखाने का आह्वान करता है।

सीपीएम का छात्र संगठन एसएफआई है। सीपीआई(एम) के पूर्व महासचिव सीताराम येचुरी सहित कई वरिष्ठ नेता इसी संगठन से उभरे और पार्टी नेतृत्व में शामिल होने से पहले एसएफआई में वरिष्ठ पदों पर रहे।

इसलिए एसएफआई यूके जंतर-मंतर आंदोलन के दौरान उभरे छात्रों का कोई अनौपचारिक व्हाट्सएप समूह नहीं है। यह सदस्यों, समितियों, पदाधिकारियों और एक वैचारिक कार्यक्रम के साथ एक स्थापित वामपंथी राजनीतिक नेटवर्क का हिस्सा है।

बीबीसी और अल जजीरा ने इस आंदोलन को GEN Z के विद्रोह के रूप में पेश किया

जहाँ एक ओर ‘द वायर’ ने लंदन प्रदर्शन से एसएफआई को हटा दिया, वहीं अंतरराष्ट्रीय मीडिया संगठनों ने कहा कि दिल्ली में हुआ आंदोलन भारत में जेनरेशन जेड का विद्रोह है।

बीबीसी ने ‘जंतर मंतर: दिल्ली में जनरेशन Z का CJP विरोध प्रदर्शन किस बारे में है?’ शीर्षक से एक वीडियो विश्लेषण प्रसारित किया। साथ ही सोशल मीडिया पर पोस्ट कर पूछा कि राजधानी में हजारों लोग विरोध प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं।

एक दूसरे रिपोर्ट में, बीबीसी ने सीजेपी को शिक्षा और रोजगार सुधारों की माँग करने वाला युवाओं के नेतृत्व वाला विरोध आंदोलन बताया। इसने इस आंदोलन को हाल के वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ सार्वजनिक तौर पर ‘सबसे बड़ा असंतोष’ बताया।

अल जजीरा ने सनसनीखेज शीर्षक का इस्तेमाल किया , ‘अभी या कभी नहीं : छात्रों ने भारत की संसद की ओर मार्च करने के लिए दिल्ली के लॉकडाउन को तोड़ा’

इस रिपोर्ट में सीजेपी को मोदी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बताया गया और दावा किया गया कि हजारों लोगों ने संगठन के आह्वान पर अपनी भागीदारी दी है। रिपोर्ट में पुलिस कार्रवाई पर पूरा जोर दिखा, प्रदर्शनकारियों के बयान शामिल किए गए और मोदी विरोधी खेमे के मशहूर चेहरे की टिप्पणी का हवाला दिया गया। इसमें कहा गया कि यह आंदोलन शिक्षा, रोजगार, महँगाई और गरीबी को लेकर असंतोष का परिणाम है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच ने दमनकारी कार्रवाई की मनगढ़ंत कहानी बताई

अमेरिका की एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी भारत में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के दमन का आरोप लगाया । अपने बयान में उसने जंतर-मंतर के ‘तस्वीरों और रिपोर्टों’ का हवाला देते हुए कहा कि दिल्ली पुलिस ने ‘बेवजह और अत्यधिक बल’ का प्रयोग किया। रिपोर्ट में पुलिसिया लाठीचार्ज, आँसू गैस के गोले छोड़े जाने और पत्थरबाजी से आरोपों की जाँच की माँग की।

एमनेस्टी ने सीजेपी को नेतृत्वकर्ता माना और परीक्षा में अनियमितताओं, मुआवजे और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से संबंधित माँगों को दोहराया।

ह्यूमन राइट्स वॉच ने भी इस आंदोलन को हाल के वर्षों के सबसे बड़े सरकार विरोधी प्रदर्शनों में से एक बताया । उसने अधिकारियों से संयम बरतने, प्रदर्शन स्थल के पास मोबाइल इंटरनेट सेवाएँ बहाल करने और लोगों को शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन करने की व्यवस्था करने का आग्रह किया।

(साभार-एक्स)

एमनेस्टी और एचआरडब्ल्यू के रिपोर्टों में ये बताने की कोशिश की गई कि मोदी सरकार के खिलाफ युवा सड़कों पर हैं और उनका दमन किया जा रहा है।

भारतीय सरकार के खिलाफ एक सुनियोजित साजिश

एसएफआई यूके, लेफ्ट लिबरल गैंग, अंतरराष्ट्रीय मीडिया आउटलेट्स और एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच जैसे गैर-सरकारी संगठनों ने विरोध प्रदर्शनों को जिस तरह से बताने का प्रयास किया है, उससे लगता है कि भारत सरकार छात्रों के कल्याण के खिलाफ है। इस बात को मानने से पहले यह जानना आवश्यक है कि इन विरोध प्रदर्शनों को कैसे आयोजित किया गया और कैसे प्रस्तुत किया गया।

(साभार-एक्स)

जंतर-मंतर पर मौजूद सभी छात्र दुष्प्रचार का हिस्सा नहीं थे, लेकिन गैरकानूनी प्रदर्शनों में भाग लेने के कारण निर्दोष छात्रों को भी लाठीचार्ज और कानूनी मुकदमों को झेलना पड़ रहा है। अभिजीत दिपके, सौरभ दास और अन्य तथाकथित नेता या तो लाठियों और आँसू गैस से दूर खड़े थे या विरोध स्थलों पर मौजूद ही नहीं थे।

इन सबके बीच अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रचारित-प्रसारित की जा रही विरोध प्रदर्शन के कहानी की गहन जाँच-पड़ताल की आवश्यकता है और उसके पीछे मंशा को सामने लाने की जरूरत है।

प्रोपेगेंडा के खेल में The News Minutes ने छिपाए फैक्ट्स, एजेंडा था- ONGC के CSR फंड से ₹670 करोड़ का दान ‘RSS से जुड़े संगठनों’ को: पढ़ें- पड़ताल में कैसे खुल गई पोल

‘द न्यूज मिनट’ ने सरकारी स्वामित्व वाली तेल कंपनी ओएनजीसी के बारे में एक रिपोर्ट 19 जुलाई 2026 को प्रकाशित किया । रिपोर्ट में कहा गया है कि ओएनजीसी ने आरएसएस से जुड़े 20 संगठनों को 670.97 करोड़ रुपए दिए। 2013 में सबसे पहले पैसे दिए गए। हालाँकि इसका अधिकांश हिस्सा पिछले 10 वर्षों में यानी 2015 और 2025 के बीच दिए गए, जो 668.01 करोड़ रुपए था।

इसी अवधि में, ONGC ने CSR पर कुल ₹4531 करोड़ खर्च किए। पूरे सीएसआर फंड 2000 से अधिक संगठनों के बीच बांटा गया यानी कुल फंड का केवल 14.7% हिस्सा ही इन 20 संस्थाओं को गया।

(द न्यूज मिनट रिपोर्ट)

न्यूज मिनट ने 20 संगठनों को तीन समूहों में विभाजित किया। नौ संगठन सीधे आरएसएस से जुड़े हैं। जबकि नौ दूसरे संगठनों की स्थापना आरएसएस से जुड़े लोगों ने की है या उनका संचालन आरएसएस के कार्यकर्ता कर रहे हैं। दो ने अतीत में आरएसएस के साथ काम किया है।

जिन दो संगठनों को सबसे अधिक धनराशि प्राप्त हुई, वे थे बीएवीपी (डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर वैद्यकीय प्रतिष्ठान) और डीएटीएसएएस (डॉ. आबाजी थाट्टे सेवा और अनुसंधान संस्था)। बीएवीपी को असम के शिवसागर में 300 बिस्तरों वाला अस्पताल बनाने के लिए लगभग 434 करोड़ रुपए मिले, वहीं डीएटीएसएएस को नागपुर में कैंसर अस्पताल के लिए लगभग 140 करोड़ रुपए मिले।

ये आँकड़े सीधे ओएनजीसी की सीएसआर वार्षिक रिपोर्ट से लिए गए हैं। ये आँकड़े ओएनजीसी की वेबसाइट पर उपलब्ध है। ये तथ्य है और इसे समझना बेहद जरूरी है।

बाकी करीब 85% हिस्सा किन संगठनों को मिला

आरएसएस से जुड़े संगठनों को 14.7% ही मिला, बाकि 85% से थोड़ा अधिक हिस्सा यानी 4531 करोड़ रुपए के CSR खर्च में से लगभग 3863 करोड़ रुपए उन संगठनों को दिए गए, जिनका RSS से कोई संबंध नहीं है। इनकी संख्या 1980 से अधिक है।

अगर हम ONGC की वार्षिक CSR रिपोर्टों को देखें, तो ये पता चलता है कि ये खर्च कितना ज्यादा है। ये रिपोर्ट 2018-19 से सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं। अकेले वित्तीय वर्ष 2024-25 में ONGC ने असम के एसएम देव सिविल अस्पताल और करीमगंज सिविल अस्पताल के लिए चिकित्सा उपकरण उपलब्ध कराए। इनमें एनेस्थीसिया वर्कस्टेशन, आईसीयू वेंटिलेटर और डिजिटल रेडियोग्राफी सिस्टम शामिल हैं।

कंपनी ने इसके साथ-साथ हरिद्वार के एक नर्सिंग कॉलेज के लिए सभागार बनवाया। कोयंबटूर में बाल विकास सेवाओं के लिए सात आंगनवाड़ी भवन बनवाए। गुरुग्राम में ब्रह्मा कुमारिस के रिट्रीट सेंटर के लिए एक सौर ऊर्जा संयंत्र और ठाणे की एक झील से कचरा साफ करने में मदद करने वाली एक AI-सक्षम मशीन के लिए रकम उपलब्ध कराया। इनमें से किसी भी संगठन का RSS से कोई संबंध नहीं है। इनमें सरकारी सिविल अस्पतालों से लेकर पश्चिम बंगाल में एम्बुलेंस सेवा चलाने वाले एक सिख धर्मार्थ ट्रस्ट तक का नाम है।

ओएनजीसी के वित्त वर्ष 2018-19 के रिकॉर्ड भी इसी तरह के पैटर्न को दर्शाते हैं। हेल्पएज इंडिया को देशभर में बुजुर्ग नागरिकों की सेवा करने वाली मोबाइल मेडिकल यूनिटों के लिए 7 करोड़ रुपये से अधिक की राशि दी गई। अक्षय पात्र फाउंडेशन को राजस्थान और झारखंड में स्कूली बच्चों को भोजन पहुँचाने के लिए वाहनों की फंडिंग की गई।

केरल में आई बाढ़ के दौरान, ओएनजीसी ने हैबिटेट फॉर ह्यूमैनिटी के माध्यम से राहत कार्यों के लिए फंडिंग की और तमिलनाडु में चक्रवात गाजा जब तबाही मचा रहा था तो उस वक्त स्थानीय रिलीफ संगठनों के माध्यम से इमरजेंसी भोजन और लाइट के लिए फंडिंग की।

उसी वर्ष हजारों छोटे अनुदान बिहार, गुजरात और उत्तर प्रदेश के गाँवों में शौचालय बनाने, दूरदराज के क्षेत्रों में हैंडपंप और सौर स्ट्रीट लाइट लगाने और राष्ट्रीय स्तर पर केंद्रीय विद्यालय स्कूलों को सहायता प्रदान करने के लिए दिए गए। इनमें से अकेले केंद्रीय विद्यालय को एक वर्ष में 53 करोड़ रुपये से अधिक की राशि प्राप्त हुई।

इस कार्य में विचारधारा कभी आड़े नहीं आता। संरक्षण कार्यों के लिए वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया और वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन सोसाइटी इंडिया, प्रशिक्षण और अभियानों के लिए इंडियन माउंटेनियरिंग फाउंडेशन, कई राज्यों में स्वच्छता परियोजनाओं के लिए सुलभ इंटरनेशनल और विकलांगों के संगठनों को मदद की। कंपनी ने भगवान महावीर विकलांग सहायता समिति को भी मदद की थी, जो कम कीमत पर या फ्री में कृत्रिम अंग बाँटती हैं।

कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि ओएनजीसी का सीएसआर खर्च वास्तव में बड़ा है। कंपनी इसके माध्यम से स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, आपदा राहत, स्वच्छता, वन्यजीव संरक्षण और हाशिए पर पड़े समुदायों को मदद करती है। यह राष्ट्रीय गैर सरकारी संगठनों से लेकर स्थानीय ग्राम पंचायतों तक को मदद करती है। न्यूज़ मिनट ने अपनी रिपोर्ट में ₹668 करोड़ आरएसएस से जुड़े 20 संगठनों को देने की बात कही है वह सही है, लेकिन यह एक बहुत बड़े सीएसआर बजट का एक छोटा सा हिस्सा है।

न्यूज मिनट ने अधूरी जानकारी दी

यह देखना महत्वपूर्ण है कि 668 करोड़ रुपये की राशि वास्तव में 20 संगठनों के बीच कैसे वितरित की गई है। ₹668 करोड़ में से 574 करोड़ रुपए यानी लगभग 86% केवल दो संगठनों BAVP और DATSAS को दी गई। बाकी 18 संगठनों को करीब 94 करोड़ रुपए मिले। इस दौरान किसी संगठन को 1 करोड़ भी मिले तो किसी को 15.53 करोड़ रुपये भी दिए गए।

यह इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि अस्पताल और कैंसर संस्थान बनाना महँगा पड़ता है। एक बड़ी स्वास्थ्य परियोजना पर आसानी से सैकड़ों करोड़ रुपए खर्च हो सकते हैं, जबकि स्कूल, छात्रावास और आपदा राहत जैसे दूसरे सामाजिक सेवा संबंध (सीएसआर) कार्यों में काफी कम खर्च आता है। यही वजह है कि आरएसएस से जुड़े कुल दान का बड़ा हिस्सा दो अस्पताल से जुड़े परियोजनाओं पर खर्च किया गया। इसलिए 14.7% का आँकड़ा इस वजह से नहीं है कि ये आरएसएस से जुड़े हुए संगठन थे, बल्कि दो अहम परियोजनाओं को इसका बड़ा हिस्सा दिया गया। न्यूज मिनट की रिपोर्ट में इस जानकारी को छिपाने की कोशिश की गई।

मेडिकल सेवा से जुड़ा बीएवीपी-डीएटीएसएएस

बीएवीपी की स्थापना 1989 में हुई थी और यह कई कार्यरत अस्पतालों का संचालन करता है। इनमें औरंगाबाद स्थित डॉ. हेडगेवार अस्पताल और असम में स्थित नया अस्पताल शामिल है। असम में 300 बिस्तरों वाला अस्पताल है, जिसमें 21 विशेषज्ञ मौजूद हैं और यह सरकार की आयुष्मान भारत स्वास्थ्य बीमा योजना के अंतर्गत सूचीबद्ध है। यह कम खर्च पर आम जनता को चिकित्सा सेवा प्रदान करता है, जिसमें गरीबी रेखा से नीचे के रोगियों के लिए खास छूट भी शामिल है। डीएटीएसएएस ने नागपुर में राष्ट्रीय कैंसर संस्थान का निर्माण किया है, जो 470 बिस्तरों वाला अस्पताल है और 2023 में खोला गया था।

दोनों संगठन पंजीकृत हैं और चिकित्सा क्षेत्र में उनके काम जगजाहिर हैं। न्यूज मिनट ने रिपोर्ट किया कि दोनों संगठनों का आरएसएस से संबंध रहा है, लेकिन इन तथ्यों के साथ यह समझना भी जरूरी है कि ये कार्यरत संस्थाएँ हैं, जो मेडिकल सेवा कर रही हैं। आरएसएस से उनके पुराने संबंध भी हैं, तो इसमें दिक्कत क्या है।

संगठनों ने दी जानकारी

राष्ट्रीय सेवा भारती के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख उदय कुंतल का कहना है कि उन्हें द न्यूज मिनट की रिपोर्ट की विशिष्टताओं की पूरी जानकारी नहीं है और तथ्यों को देखे बिना वे इसके निष्कर्षों की पुष्टि करने की स्थिति में नहीं हैं।

उन्होंने इस बात का खंडन किया कि आरएसएस स्वयं जिला स्तर पर कार्यरत एक पंजीकृत संस्था नहीं है, बल्कि इससे संबद्ध संगठन जिनमें राष्ट्रीय सेवा भारती भी शामिल है, अलग-अलग पंजीकृत हैं। इन संगठनों की जानकारी इनकी वेबसाइटों पर उपलब्ध है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रवादी संगठनों को केवल इसलिए निशाना बनाना आसान हो जाता है, क्योंकि उन्हें ऐसा कहा जाता है। जबकि वास्तविकता में वे देश के लिए काम कर रहे होते हैं।

कुंतल ने कहा कि यह कहना भ्रामक है कि सीएसआर फंड आरएसएस से जुड़े संगठनों को सिर्फ इसलिए दिए गए थे क्योंकि वे आरएसएस से जुड़े हुए थे। उनके अनुसार, उनके जैसे संगठन अस्पताल और राहत कार्य जैसे क्षेत्रों में काम करते हैं। सीएसआर डेटा उनके द्वारा शुरू की गई परियोजनाओं को दर्शाता है, न कि किसी विचारधारा के आधार पर किए गए आवंटन को। उन्होंने कहा कि इसे जानबूझकर आरएसएस को पैसा भेजने के रूप में पेश करना गलत और भ्रामक है।

उन्होंने यह भी बताया कि उनका संगठन भारत भर में पहली बार सामाजिक कार्यों के लिए सीएसआर फंडिंग का प्रभावी ढंग से उपयोग करने के तरीके पर प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाता है। उन्होंने कहा कि कई बड़ी संस्थाओं ने पहले अपनी सीएसआर की फंडिंग नहीं भी की है और उनके आवेदन को अस्वीकार कर दिया।

दोनों बातें सच हैं। ONGC ने एक दशक के CSR खर्च का 14.7% यानी 668 करोड़ रुपये उन संगठनों को दिए, जिनके RSS से जुड़े होने के दस्तावेजी प्रमाण मौजूद हैं। यह कोई गलती या तकनीकी खामी नहीं है। यह एक बड़ी रकम है, और अकेले दो संगठनों- BAVP और DATSAS ने ही इसका अधिकांश हिस्सा खर्च किया। न्यूज मिनट के आँकड़े जाँच में खरे उतरते हैं, और किसी भी तरह से संदर्भ बदलकर इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

लेकिन, इसका दूसरा पहलू भी देखने की जरूरत है। दो अस्पताल निर्माण परियोजनाओं के लिए दिए गए ₹574 करोड़ की राशि का अलग महत्व है। भले ही बाकी 18 संगठनों को 92 करोड़ रुपए ही दिए गए। दोनों डोनेशन को एक साथ मिलाना पाठकों को वास्तविक स्थिति से गुमराह करता है। अस्पताल का इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े परियोजनाओं की लागत सैकड़ों करोड़ रुपए होती है। यह तथ्य है। वहीं कुल सीएसआर खर्च का 85 फीसदी हिस्सा यानी ₹3863 करोड़ की विशाल धनराशि स्वच्छता, स्कूलों, आपदा राहत और दिव्यांग कल्याण से जुड़े 1980 से अधिक ऐसे संगठनों को डोनेट किया गया, जिनका आरएसएस से कोई संबंध नहीं है।

दोनों में से कोई भी तथ्य दूसरे का खंडन नहीं करता। जो पाठक TNM की हेडलाइन और अपने पूर्वाग्रह के कारण केवल ‘ONGC ने RSS को पैसा दिया’ जैसे निष्कर्ष निकालते हैं, वे इसकी बारीकियों को नजरअंदाज करते हैं या समझने की कोशिश ही नहीं करते।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)