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डोनाल्ड ट्रंप के ‘Kissing My A**’ बयान पर बवाल, भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों की प्रतिक्रिया से क्यों छिड़ी ‘उम्मा बनाम राष्ट्र’ की बहस?

जब सऊदी या ईरान के नेताओं का अपमान होता है, तो इसे मजहबी स्तर पर लिया जाता है। लेकिन जब अपने ही देश में आतंकी हमले होते हैं, तो वैसी प्रतिक्रिया नहीं दिखती।

मिडिल ईस्ट की जटिल राजनीति में एक और बड़ा मोड़ तब आया, जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ने कुछ बेहद खुलकर और विवादित बयान दिए। फ्लोरिडा में आयोजित फ्यूचर इन्वेस्टमेंट इनिशिएटिव कॉन्फ्रेंस में बोलते हुए ट्रंप ने सऊदी अरब के वास्तविक शासक और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) के साथ अपने रिश्तों को लेकर तीखी टिप्पणी की। उनका एक बयान वायरल हो गया, जिसमें उन्होंने कहा कि मौजूदा हालात में सऊदी नेता ‘Kissing my a**’ कर रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप ने अपने राष्ट्रपति कार्यकाल में अमेरिका की वापसी को लेकर एक बातचीत का जिक्र किया। उन्होंने दावा किया कि MBS को इतनी मजबूत अमेरिकी वापसी की उम्मीद नहीं थी। ट्रंप ने कहा, “उसे नहीं लगा था कि ऐसा होगा… उसे नहीं लगा था कि वो मेरी खुशामद करेगा… उसे लगा था कि मैं भी एक कमजोर अमेरिकी राष्ट्रपति ही रहूँगा… लेकिन अब उसे मेरे साथ अच्छा व्यवहार करना पड़ रहा है।” हालाँकि इन तीखे शब्दों के साथ ट्रंप ने MBS की तारीफ भी की और उन्हें ‘शानदार इंसान’ और ‘योद्धा’ बताया।

ये बयान ऐसे समय में आए हैं जब अमेरिका और इज़राइल, 28 फरवरी से ईरान के खिलाफ एक बड़े सैन्य अभियान में लगे हुए हैं। The New York Times की रिपोर्ट के अनुसार, अंदरखाने MBS ट्रंप को इस युद्ध को जारी रखने के लिए प्रेरित कर रहे हैं और इसे ईरान को कमजोर करने का ‘ऐतिहासिक मौका’ बता रहे हैं। हालांकि, सार्वजनिक तौर पर सऊदी अरब ने शांति की बात की है और अपने सीमाओं की सुरक्षा पर ध्यान दिया है। इसके बावजूद ट्रंप के इस बयान ने खासकर भारतीय उपमहाद्वीप के मुस्लिम समुदाय में नाराजगी पैदा कर दी।

भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों की प्रतिक्रिया

भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों की प्रतिक्रिया तेज रही और ‘उम्मा’ (वैश्विक मुस्लिम समुदाय) की भावना से जुड़ी हुई दिखी। पत्रकार सबा नकवी ने 28 मार्च को X पर एक लंबा पोस्ट लिखा। उन्होंने अपने पोस्ट में अल-कायदा आतंकी ओसामा बिन लादेन का जिक्र किया और सऊदी शासकों को ‘मक्का और मदीना के दो पाक मस्जिदों का संरक्षक’ कहा।

उन्होंने लिखा, “ओसामा बिन लादेन सऊदी अरब से निकला था, पहले सोवियत संघ के खिलाफ जिहाद के लिए और बाद में अपने ही देश के अमेरिका के करीब होने के खिलाफ। 9/11 हमले में कई सऊदी शामिल थे।” 9/11 जैसे आतंकी हमले को ‘ऑपरेशन’ कहना इस घटना को वैध ठहराने जैसा माना गया।

नक़वी यहीं नहीं रुकीं। उन्होंने सऊदी शाही परिवार के भारत दौरे का जिक्र करते हुए कहा कि वे अक्सर गाँधी समाधि या सूफी दरगाहों पर नहीं जाते। लेकिन उनका मुख्य सवाल था, “क्या दो पाक मस्जिदों के संरक्षक इस अपमान को नजरअंदाज कर सकते हैं?” उनके शब्दों से ऐसा लगा कि वे धार्मिक आधार पर प्रतिक्रिया भड़काने की कोशिश कर रही हैं।

यह नाराजगी तेजी से फैली। X पर सक्रिय सानिया सैयद ने लिखा, “शर्मनाक और घटिया! ट्रंप सऊदी क्राउन प्रिंस के लिए बेहद अपमानजनक भाषा इस्तेमाल कर रहे हैं। क्या आप अपने सबसे बड़े सहयोगी देश के नेता के लिए ऐसे बोलते हैं?” इस तरह की प्रतिक्रियाओं में सऊदी नेता का अपमान, पूरी मुस्लिम दुनिया का अपमान माना गया।

पाकिस्तान में भी प्रतिक्रिया तेज रही। एक पाकिस्तानी पत्रकार ने ट्रंप का वीडियो शेयर किया, जिसमें उन्होंने कहा, “उसे नहीं लगा था कि वो मेरी खुशामद करेगा… अब उसे मेरे साथ अच्छा रहना होगा।” इस वीडियो को साझा करने का मकसद सऊदी नेतृत्व के कथित अपमान को दिखाना था।

पाकिस्तानी यूजर फैसल राँझा ने आर्थिक पहलू उठाते हुए कहा कि सऊदी अरब ने अमेरिका में भारी निवेश किया है, फिर भी ट्रंप उनका मजाक उड़ा रहे हैं। उन्होंने लिखा, “उम्मा को इससे सीख लेनी चाहिए और इस तरह की बदतमीजी से आगे बढ़ना चाहिए।” इस बयान में ‘उम्मा’ को प्राथमिकता दी गई।

खामेनेई के लिए शोक यानी सीमाओं से परे वफादारी

यह रुझान तब और साफ दिखा जब ईरान के सर्वोच्च नेता Ayatollah Ali Khamenei की मौत के बाद भारत के कुछ हिस्सों में शोक मनाया गया। खामेनेई अक्सर भारत की आलोचना करते थे, लेकिन उनकी मौत पर जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश और मुंबई में शोक प्रदर्शन हुए।

कश्मीर के लाल चौक में प्रदर्शनकारियों ने उन्हें ‘शेर’ बताया और कहा कि उनके जैसे और लोग पैदा होंगे। इमामबाड़ों पर काले झंडे लगाए गए, जो आमतौर पर करबला जैसी बड़ी धार्मिक त्रासदी में ही किया जाता है।

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में छात्रों ने ग़ायबाना नमाज-ए-जनाजा पढ़ी। एक्टिविस्ट एसएम ताहिर हुसैन ने कहा कि कई लोगों के लिए खामेनेई सिर्फ शिया नेता नहीं, बल्कि पूरे मुस्लिम समुदाय का प्रतीक थे। यह दिखाता है कि ‘उम्मा’ से जुड़े नेताओं के लिए भावनात्मक प्रतिक्रिया काफी मजबूत होती है।

ईरान के लिए जकात और पहलगाम पर चुप्पी

‘उम्मा’ को प्राथमिकता देने का एक और उदाहरण कश्मीर में देखा गया, जहाँ ईरान के समर्थन में लोग घर-घर जाकर चंदा जुटा रहे हैं। लोगों ने सोना, पैसा और यहाँ तक कि मवेशी तक जकात (दान) में दे दिए। एक महिला ने 30 साल से रखा सोना दान कर दिया, जबकि गांदरबल के एक युवक ने अपनी Royal Enfield बाइक बेच दी।

एक स्थानीय निवासी ने कहा, “ईरान पर इस युद्ध से भारी तबाही हुई है, दुनिया को कम से कम मदद तो करनी चाहिए।”

हालाँकि यही उत्साह घरेलू घटनाओं में नहीं दिखा। पिछले साल 22 अप्रैल को हुए पहलगाम आतंकी हमले में मारे गए लोगों के लिए इस तरह का कोई चंदा अभियान या बड़ी मदद नहीं देखी गई।

वफादारी का सवाल

डोनाल्ड ट्रंप के MBS पर बयान, खामेनेई के लिए शोक और ईरान को दिए गए जकात… इन सभी घटनाओं में एक समान पैटर्न दिखता है। सबा नकवी जैसे लोगों के लिए उनकी प्राथमिक निष्ठा ‘उम्मा’ के साथ दिखती है, न कि अपने देश के साथ।

जब सऊदी या ईरान के नेताओं का अपमान होता है, तो इसे मजहबी स्तर पर लिया जाता है। लेकिन जब अपने ही देश में आतंकी हमले होते हैं, तो वैसी प्रतिक्रिया नहीं दिखती। इससे यह सवाल उठता है कि क्या धार्मिक पहचान और ‘उम्मा’ की भावना राष्ट्रीय एकता से ऊपर रखी जा रही है।

(मूल रूप से ये लेख अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

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Shriti Sagar
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