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ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर पैट कमिंस ने पीएम केयर्स में दिए ₹38 लाख: बिलबिलाए लिबरलों ने कोसा, जमकर फैलाया झूठ

कोलकाता नाइट राइडर्स के ऑस्ट्रेलियाई तेज गेंदबाज पैट कमिंस सोमवार को कोरोना महामारी से जूझ रहे भारत के लिए आगे आए हैं। उन्होंने यहाँ के अस्पतालों में ऑक्सीजन की सप्लाई के लिए पीएम केयर्स फंड में 50,000 डॉलर (लगभग 38 लाख रुपए) दान देने की घोषणा की है। कमिंस ने इस मदद का ऐलान सोशल मीडिया पर किया है।

उन्होंने ट्वीट किया, “भारत एक ऐसा देश है, जहाँ पिछले कुछ वर्षों से मुझे बहुत प्यार मिला है और यहाँ के लोग भी बहुत प्यारे और सपोर्टिंग हैं। मैं जानता हूँ कि पिछले कुछ समय से इस देश में कोरोना वायरस की वजह से काफी दिक्कतें पैदा हो गई हैं, जिससे यहाँ के अस्पतालों में ऑक्सीजन की भारी कमी देखने को मिली है। ऐसे में एक खिलाड़ी होने के नाते मैं पीएम केयर्स फंड में 50 हजार यूएस डॉलर (लगभग 38 लाख रुपए) सहायता राशि के रूप में देना चाहता हूँ और मैं अपने साथी खिलाड़ियों से भी गुजारिश करता हूँ कि वे भी मदद के लिए आगे आएँ।”

कमिंस की इस घोषणा के बाद से सोशल मीडिया पर काफी सकारात्मक रिएक्शन देखने को मिले थे, लेकिन ट्विटर पर कुछ लिबरल ने पैट कमिंस के इस कदम को लेकर हो रही राजनीति और अभद्र जवाब देने वालों का विरोध तक नहीं किया। ईएसपीएन के पत्रकारों से लेकर ऑनलाइन फिल्म समीक्षकों तक सभी रूपों में लिबरल्स लोग पीएम केयर्स फंड के फाउन्डेशन में कमिंस के दान को पचा नहीं पा रहे हैं, जबकि यह विशेष रूप से COVID-19 संकट से निपटने के लिए बनाया गया फंड है।

कमिंस के दान पर फ्यूमिंग लिबरल प्रतिक्रिया

बेंगलुरु स्थित एक ईएसपीएन पत्रकार अर्जुन नम्बूथरी ने ट्विटर पर बेहद नफरत फ़ैलाने वाली प्रतिक्रिया दी। उसने लिखा कि पीएम केयर्स फंड गलत जगह है दान करने के लिए। इतना ही नहीं नम्बूथरी ने Google डॉक का लिंक शेयर करते हुए कमिंस को पीएम केयर फंड की बजाय Google डॉक में सूचीबद्ध संगठनों को दान करने के लिए कहा।

एक अन्य लिबरल अपने भीतर की पीड़ा को छुपाने की कोशिश कर रहे थे। उन्होंने खिलाड़ी को तथाकथित योग्य, प्रामाणिक मूवमेंट को जोड़ने के लिए आगे बढ़ने की सलाह दी, जहाँ उन्हें लगता है कि पैट कमिंस को वास्तव में दान करना चाहिए। यह एक और उदाहरण है अपने देश को नीचा दिखाने का।

एक कॉन्ग्रेस समर्थक ने पैट कमिंस को उनकी उदारता के लिए सराहते हुए भी अपनी तुच्छता पर उतर आया। उसने कहा कि उन्होंने इसे गलत हाथों में दे दिया है। वह व्यक्ति बिना किसी तथ्य के दावा कर रहा है कि पीएम केयर्स फंड का इस्तेमाल मुख्य रूप से चुनाव जीतने के लिए किया जाता है।

ट्विटर पर एक यूजर ने काफी बेरूखी से जवाब देते हुए कमिंस का दान स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

पर्ल शाह ने ट्विटर पर कमिंस के इस काम के लिए उन्हें धन्यवाद दिया, लेकिन पीएम केयर फंड में जाने वाले इस धन पर सवाल उठाया।

सुचरिता त्यागी, जो एक छोटी सी YouTuber हैं और फिल्मों की समीक्षा करती हैं उन्होंने भी कमिंस से आग्रह किया कि वे पीएम केयर फंड में दान न करें। बाद में उसने भी अपना ट्वीट डिलीट कर दिया।

बता दें कि पैट कमिंस ने साथी क्रिकेटरों से भी कोरोनो वायरस महामारी के दौरान भारत को दान करने और मदद करने का आह्वान किया है। यह देखना दुखद है कि गैर भारतीय पिछले मतभेदों को भुलाकर आगे आ रहे हैं, ताकि भारत को कोरोना संकट से निपटने में मदद मिल सके, लेकिन हमारे भारतीय साथी इस मामले में बिल्कुल भी उदार नहीं हो सकते हैं।

संक्रमण काल की राजनीति में निचले पायदान पर उतरी कॉन्ग्रेस: झूठ, अफवाह, फेक न्यूज़ बना हथियार

राहुल गाँधी का वह प्रसिद्ध वक्तव्य कि; पॉलिटिक्स सब जगह है, आपके पैंट और शर्ट में भी है, आए दिन चरितार्थ होता रहता है। लोकतंत्र में सरकार और विपक्ष के बीच जिस समन्वय की बात अक्सर की जाती है, वह सरल नहीं होता, पर इतना कठिन भी नहीं होता जितना आए दिन हम अपने देश की राजनीति में देखते हैं।

एक आम भारतीय को लगता होगा कि पिछले एक वर्ष से दुनियाँ के अन्य देशों के साथ-साथ भारत जिस महामारी की चपेट में है, उससे लड़ने में जो प्रमुख बातें आड़े आ रही हैं, उनमें स्वास्थ्य व्यवस्था की कमियाँ ही प्रमुख हैं। पर यदि पिछले एक वर्ष में केंद्र और राज्य के बीच या फिर राजनीतिक दलों के बीच समन्वय के बिंदु देखे जाएँ तो समझ में आएगा कि कैसे राजनीतिक समन्वय का न रहना इस महामारी से लड़ने में एक प्रमुख कारण है।

इस एक वर्ष में विपक्षी दलों द्वारा शासित कई राज्यों और केंद्र सरकार के बीच समन्वय कई बार अपने निम्न स्तर पर दिखाई दिया। लॉकडाउन पर हुए फ़ैसले से लेकर टीकाकरण और मूलभूत सुविधाएँ बनाने की बात पर सरकारों के बीच कई बिंदुओं पर सहमति की कमी नज़र आई। कई राज्यों से प्रवासी मजदूरों का पलायन राजनीतिक समन्वय की इसी कमी का नतीजा था जिसमें कई राज्य सरकारें प्रवासी मजदूरों से अपना पल्ला झाड़ते हुए बरामद हुईं।

इसके अलावा टीके को लेकर विपक्षी राजनीतिक दलों द्वारा शंका व्यक्त करने से लेकर भारत में बनने वाले टीकों के प्रति देश के नागरिकों के मन में अपने बयानों से संदेह पैदा करने का काम भी हुआ। ऐसा भी हुआ कि विपक्ष के कई नेताओं ने कोरोना रोकने के लिए आविष्कार किए गए इन टीकों को भाजपा का टीका तक बता डाला। कई नेता अफ़वाहें फैलाते दिखे जिसका जिक्र केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन ने भूतपूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह को लिखे गए अपने पत्र में भी किया।

जबसे टीकाकरण के तृतीय चरण की घोषणा हुई है तब से बहस और अफवाहों का बाजार फिर से गर्म है। कभी टीके के निर्धारित मूल्यों को लेकर बहस और अफवाहें उड़ाई जा रही हैं तो कभी टीके बनाने वाली कम्पनियों पर आम भारतीय से अनुपयुक्त प्रॉफिट कमाने का आरोप लगाया जा रहा है। पहले से चल रही इन बहसों के बीच एक नया विषय आ गया जिसमें कॉन्ग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने टीकाकरण के तृतीय चरण के अभियान में अपने राज्यों की भागीदारी से इंकार कर दिया है। तृतीय चरण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें अट्ठारह से लेकर पैंतालीस वर्ष तक के नागरिकों को टीका लगेगा।

तृतीय चरण के टीकाकरण को लेकर जहाँ अन्य राज्यों ने समय पर टीका निर्माताओं जैसे सिरम इन्स्टिटूट ऑफ इंडिया और भारत बायोटेक को अपने ऑर्डर दे दिए हैं वहीं पंजाब, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे कॉन्ग्रेस शासित राज्यों ने इस चरण के टीकाकरण को शुरू करने से इंकार कर दिया है। इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों का कहना है कि वे अपने राज्य में तृतीय चरण इसलिए शुरू नहीं कर सकते क्योंकि टीका निर्माता कंपनियों ने उन्हें टीके का स्टॉक उपलब्ध न होने की जानकारी दी है। इन राज्यों ने केंद्र पर यह आरोप लगाया कि केंद्र ने पहले से ही सारे टीके खरीद लिए हैं जिसके चलते इन राज्यों के लिए टीके बचे ही नहीं हैं।

यह गंभीर आरोप है पर यहाँ प्रश्न यह है कि ऐसा आरोप केवल कॉन्ग्रेस शासित राज्यों से ही क्यों आ रहा है? जब तृतीय चरण के टीकाकरण का निर्णय हर राज्य को एक ही दिन बताया गया तो फिर ऐसा कैसे हैं कि बहुत से और राज्यों ने टीके की खरीद का अपना ऑर्डर निर्माता कम्पनियों को दे दिया पर वही निर्माता कॉन्ग्रेस शासित राज्यों को टीका देने से मना कर रहे हैं?

उत्तर प्रदेश और बिहार ने भी अपने ऑर्डर और उसके साथ एडवांस भी निर्माता कंपनियों को दे दिए हैं। ऐसी शिकायत ओड़िसा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना जैसे विपक्ष शासित राज्यों से नहीं आई है पर ऐसा क्यों है कि केवल कॉन्ग्रेस शासित राज्यों से आई?

ऐसे में इसके पीछे राजनीति नहीं तो और क्या है? राज्यों की माँग पर ही केंद्र सरकार ने अट्ठारह और पैंतालीस वर्ष के बीच के नागरिकों के लिए टीकाकरण की रज़ामंदी दी थी, इस शर्त के साथ कि इसका खर्च राज्य सरकारों को उठाना होगा क्योंकि केंद्र सरकार पहले से ही पैंतालीस वर्ष और उससे ऊपर के नागरिकों के लिए टीकाकरण का खर्च उठा रही है।

टीके को लेकर केंद्र सरकार की नीति एक मायने में स्पष्ट रही है जहाँ वह प्राथमिकता की दृष्टि से पैंतालीस वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों को हाई रिस्क ग्रुप मानती है और इसलिए इस ग्रुप को पहले टीका देना चाहती है।

अट्ठारह और पैंतालीस वर्ष की उम्र के नागरिकों के टीकाकरण के अलावा विपक्ष और कॉन्ग्रेस के नेता की ओर से विदेशी टीकों के आयात की अनुमति की माँग भी ज़ोर-शोर के साथ उठाई गई थी जिसे केंद्र सरकार ने मान ली थी। जिन भारतीय टीकों के निर्माताओं द्वारा समय पर टीके न दिए जाने का आरोप कॉन्ग्रेस शासित राज्यों के नेता लगा रहे हैं, उन्हीं टीकों के स्तर को लेकर एक कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्री और उनके मंत्री पहले बहुत हल्ला मचा चुके हैं। टीके की इस कमी की बात राजस्थान की सरकार ने भी किया है। राजस्थान के स्वास्थ्य मंत्री ने भी तृतीय चरण के टीकाकरण की शुरुआत एक मई से करने में अपनी असमर्थता जताई।

राहुल गाँधी ने एक ट्वीट अपील करके हर कॉन्ग्रेसी को दिन-रात काम करने के लिए प्रेरित करने की कोशिश भी की पर उसका असर दिखाई नहीं दे रहा।

देश में चीनी वाइरस की दूसरी लहर बहुत तेज रही है और उसकी वजह से हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर उसका व्यापक प्रभाव पड़ा है। ऐसे में यह आवश्यक है कि राज्य सरकारें अपने दायित्व का पालन करें और नागरिकों को मूलभूत सुविधाएँ मुहैया कराने के अलावा तृतीय चरण के टीकाकरण की शुरुआत अपने-अपने राज्यों में करें। संक्रमण के लगातार बढ़ते ख़तरे को देखते हुए यह आवश्यक है कि यह काम युद्ध स्तर पर हो ताकि देश जल्द से जल्द इस महामारी पर काबू पा सके।

‘दवाई भी-कड़ाई भी’ के सूत्र से मिली UP में 8 लाख लोगों को कोविड से मुक्ति: 24 घंटे में डिस्चार्ज हुए 25 हजार से ज्यादा लोग

उत्तर प्रदेश में योगी सरकार कोरोना की बेकाबू रफ्तार को रोकने के लिए जीतोड़ मेहनत कर रही है। राज्य सरकार की मेहनत रंग लाती भी नजर आ रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, बीते दिनों में प्रदेश में कोरोना के नए मामलों की तुलना में ठीक होकर घर वापस जाने वाले मरीजों की संख्या अधिक पाई गई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि पिछले 3 दिनों में उत्तर प्रदेश में COVID-19 के नए मामलों में कमी आई है। राज्य में बेड, ऑक्सीजन और जीवन रक्षक दवाओं की कोई कमी नहीं है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक मुख्यमंत्री ने सोमवार को टीम इलेवन के साथ कोरोना स्थिति की समीक्षा की। इस दौरान उन्होंने कहा कि प्रदेश में ऑक्सीजन और जीवन रक्षक दवाओं की कोई कमी नहीं है। बीते 24 घंटों में उत्तर प्रदेश में 25,633 लोग डिस्चार्ज हुए हैं।

प्रदेश में अब तक 8.04 लाख से अधिक लोग कोविड संक्रमण से ठीक हो चुके हैं। यह सब केवल ‘दवाई भी-कड़ाई भी’ के सूत्र को प्रभावी ढंग से अमल में लाने का परिणाम है। हमें टेस्टिंग और ट्रेसिंग को दोगुनी क्षमता में बढ़ाने की जरूरत है। इस दिशा में कार्रवाई की जाए।

योगी आदित्यनाथ ने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में प्रदेश के अस्पतालों में ओपीडी सेवाएँ स्थगित हैं। ऐसे में टेलीकन्सल्टेशन को बढ़ावा दिया जाए। कोविड होम आइसोलेशन और नॉन कोविड मरीजों के लिए विशेषज्ञ चिकित्सकों की सूची व संपर्क माध्यम का व्यापक प्रचार-प्रसार कराया जाए।

सीएम ने प्रत्येक जिले में कोविड संक्रमण से किसी भी मरीज की मृत्यु होने पर उसके अंतिम संस्कार के लिए कोई शुल्क न लिए जाने का भी निर्देश दिया है। उन्होंने कहा कि अंतिम संस्कार की क्रिया मृतक की धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप होगी। इसकी सभी आवश्यक व्यवस्था प्रशासन सुनिश्चित कराएगा।

गौरतलब है कि बीते 24 घंटों में उत्तर प्रदेश में कोरोना के 35,614 नए केस सामने आए हैं। यह आँकड़ा एक दिन पहले आए मरीजों से करीब 2500 कम है। सरकार का दावा है कि इस दौरान 25,633 मरीज ठीक हुए हैं। यानी प्रदेश में कोरोना को मात देने वालों का आँकड़ा बढ़ा है। 24 घंटे में यूपी में 2 लाख 30 हजार टेस्ट किए गए, जो अब तक का सबसे अधिक आँकड़ा है। इसमें 1 लाख 7 हजार से ज्यादा लोगों का RT-PCR टेस्ट हुआ है।

बता दें कि लखनऊ में लगातार चौथे दिन यानी नए संक्रमितों के मुकाबले ठीक होने वालों का आँकड़ा ज्यादा रहा। रविवार को यहाँ 5187 नए मामले मिले, जबकि 6247 मरीजों ने कोरोना को मात दी। वहीं, 14 मरीजों की मौत हुई।

महाराष्ट्र पुलिस बल सबसे अधिक भ्रष्ट, करप्शन में 26 फीसदी का इजाफा: ACB के आँकड़ों से खुलासा

2021 की शुरुआत से महाराष्ट्र राज्य में भ्रष्टाचार के मामलों में 26 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, यह जानकारी भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) द्वारा जारी सांख्यिकीय रिपोर्ट [पीडीएफ] से सामने आई है।

01 जनवरी, 2021 से 24 अप्रैल, 2021 तक के आँकड़ो का हवाला देने वाली रिपोर्ट के मुताबिक, भ्रष्टाचार के मामलों में अधिकतम गिरफ्तारी पुलिस विभाग से हुई और उसके बाद राजस्व विभाग के अधिकारियों का नंबर है।

एक चौंकाने वाले खुलासे के मुताबिक, पुलिस विभाग में शामिल रिश्वत की राशि 11,58,100 रुपए और उसके बाद नगर निगमों में 10,05,500 रुपए और राजस्व विभाग में 9,45,400 रुपए दर्ज की गई है।

254 दर्ज मामलों में रिश्वत की कुल राशि 61.89 लाख रुपए है।

आँकड़ों के अनुसार, एसीबी द्वारा इस साल जनवरी की शुरुआत से 24 अप्रैल तक 254 नए मामले दर्ज किए गए और इनमें शामिल 342 लोगों की गिरफ्तारी हुई जो पिछले साल की समान अवधि के 201 नए मामलों और 282 गिरफ्तारियों की तुलना में कहीं अधिक है।

दर्ज किए गए 254 मामलों में से 53 मामले राजस्व विभाग के खिलाफ दायर किए गए हैं, जिसके परिणामस्वरूप 73 अधिकारियों की गिरफ्तारी हुई है।

रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि भ्रष्टाचार के 50 मामलों में पुलिस विभाग से 77 गिरफ्तारियाँ की गई हैं, जबकि विभिन्न नगर निगमों के खिलाफ 22 मामले दर्ज किए गए हैं, जिनमें 33 अधिकारियों की गिरफ्तारी हुई है।

अधिकतम मामले औरंगाबाद (79), नासिक (58), पुणे (57), ठाणे (40) और मुंबई (32) जैसे शहरों से दर्ज किए गए हैं।

एसीबी के एक अधिकारी ने एक बयान में खुलासा किया, “पुलिस और राजस्व विभाग पिछले कुछ सालों से भ्रष्टाचार के मामलों में शीर्ष स्थान पर हैं। पिछले साल लॉकडाउन के कारण कम मामले दर्ज किए गए थे और जैसे ही लॉकडाउन हटाया गया, मामले फिर से बढ़ने लगे। हम नागरिकों से अपील करते हैं कि वे भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों द्वारा की जा रही माँगों में न पड़ें और आगे आकर एसीबी से शिकायतें करें ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ मामले दर्ज हो सकें। हम नियमित रूप से नागरिकों को भ्रष्टाचार को उखाड़ने के बारे में अधिक जागरूक बनाने के लिए जागरूकता अभियान चलाते हैं।”

CBI ने दर्ज की अनिल देशमुख के खिलाफ FIR

इस बीच, भ्रष्टाचार के आरोपों में महाराष्ट्र के पूर्व गृह मंत्री और एनसीपी नेता अनिल देशमुख के खिलाफ भी सीबीआई ने एफआईआर दर्ज की है।

पूर्व मुंबई पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह ने देशमुख के खिलाफ जबरन वसूली और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने डॉ. जयश्री पाटिल द्वारा दायर जनहित याचिका के आधार पर सीबीआई जाँच के आदेश के बाद प्रारंभिक जाँच की जा रही है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने मामले को ‘असाधारण और अभूतपूर्व’ करार देते हुए यह भी कहा था कि उसके आदेश के बाद शुरू की गई प्रारंभिक जाँच के बाद सीबीआई कार्रवाई का फैसला करने के लिए स्वतंत्र होगी। इसलिए, इसने सीबीआई को तब मामले में एफआईआर दर्ज करने की अनुमति दी, यदि उसे परमबीर सिंह द्वारा लगाए गए आरोपों में अनिल देशमुख के खिलाफ सबूत मिला हो।

कोरोना संकट के बीच UP में क्‍यों हो रहे पंचायत चुनाव? जानिए योगी सरकार ने क्या दिया जवाब

देशभर में कोरोना वायरस का संक्रमण तेजी से फैल रहा है। इस बीच राज्य में पंचायत चुनाव कराने के योगी सरकार के फैसले की आलोचना का सरकार ने जवाब दिया है। इस फैसले को लेकर योगी सरकार ने कहा है कि वो महामारी के मद्देनजर राज्य में चुनाव नहीं कराना चाहती है, लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के चलते ये करना पड़ रहा है।

यूपी सरकार के खिलाफ विनोद उपाध्याय ने याचिका दायर की थी, इस पर हाई कोर्ट ने 4 फरवरी 2021 को राज्य चुनाव आयोग को 30 अप्रैल तक पंचायत चुनाव को कराने का आदेश दिया था। कोर्ट ने राज्य को बीते 15 अप्रैल तक आवंटन और आरक्षण की प्रक्रिया को पूरा करने को कहा था।

योगी सरकार के प्रवक्ता ने जानकारी दी कि कोर्ट के आदेश के कारण ही महामारी के बीच चुनाव कराने का फैसला लेना पड़ा। ताकि इसे 10 मई तक पूरा किया जा सके। पिछले साल दिसंबर में ही चुनाव होने थे, कोरोना कारण पंचायतों के पुनर्गठन और परिसीमन में देरी हुई। लेकिन, कोर्ट के आदेश ने चुनाव के लिए बाध्य कर दिया।

15 अप्रैल से शुरू हुआ था चुनाव

उत्तर प्रदेश में 15 अप्रैल से पंचायत इलेक्शन शुरू हुए थे, जिसके रिजल्ट 2 मई को आएँगे। राज्य सरकार के स्पोक्सपर्सन ने कहा कि सरकार मतदाताओं की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। इसी कारण इस दौरान ग्राम पंचायतों में उचित स्वच्छता, सैनिटाइजेशन और संक्रमण की रोकथाम के लिए राज्य के 75 जिलों के गाँवों में विशेष सैनिटाइजेशन अभियान चलाया गया।

प्रदेश में पंचायत चुनावों के बीच शनिवार (24 अप्रैल 2021) को उत्तर प्रदेश प्राथमिक शिक्षक प्रशिक्षित स्नातक एसोसिएशन ने मुख्य चुनाव आयुक्त और राज्य निर्वाचन आयुक्त से त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के शेष चरणों को स्थगित करने की माँग की थी। साथ ही कोरोना के कारण अपनी जान गँवाने वाले मतदान कर्मियों को कोरोना वॉरियर्स की तरह 50 लाख रुपए की धनराशि देने की भी माँग की।

कोरोना से जंग में उतरेंगे 2 साल पहले रिटायर हुए सेना के डॉक्टर, पीएम मोदी से मिले CDS बिपिन रावत

भारत में कोरोना वायरस की दूसरी लहर बेहद घातक साबित हो रही है। देश भर में कोरोना के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। इससे निपटने के लिए केंद्र सरकार हरसंभव कदम उठा रही है। इसी बीच चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत ने सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। एएनआई के मुताबिक इस बैठक में प्रधानमंत्री मोदी ने कोरोना महामारी से निपटने के लिए सशस्त्र बलों द्वारा की जा रही तैयारियों और ऑपरेशन की समीक्षा की। 

प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से जारी बयान के मुताबिक सीडीएस रावत ने प्रधानमंत्री मोदी को जानकारी दी कि सशस्त्र बलों से पिछले 2 साल में सेवानिवृत्त हुए सभी मेडिकल कर्मचारी अपने घरों के पास स्थित कोविड-19 केन्द्रों में काम करेंगे।

उन्होंने बताया कि अस्पतालों में डॉक्टरों की मदद के लिए बड़ी संख्या में नर्सिंग स्टाफ को तैनात किया जा रहा है। सशस्त्र बलों के विभिन्न प्रतिष्ठानों के पास उपलब्ध ऑक्सीजन सिलेंडर अस्पतालों को दिए जाएँगे।

रावत ने पीएम मोदी को यह भी बताया कि वे कोरोना मरीजों के इलाज के लिए बड़ी संख्या में मेडिकल सुविधाएँ तैयार कर रहे हैं। जहाँ संभव होगा वहाँ सेना की मेडिकल सुविधाएँ आम लोगों को उपलब्ध कराई जाएँगी। बैठक में मोदी ने भारत और विदेशों में ऑक्सीजन एवं अन्य जरूरी वस्तुओं के परिवहन के लिए भारतीय वायुसेना की ओर से चलाए जा रहे ऑपरेशनों की भी समीक्षा की। प्रधानमंत्री मोदी को सूचित किया गया कि कमांड हेड क्‍वार्टर, कॉर्प्स हेडक्‍वार्टर, डिवीजन मुख्यालय, नौसेना और वायुसेना के मुख्यालयों में काम करने वाले चिकित्सा अधिकारियों को अस्पतालों में तैनात किया जाएगा।

बता दें कि देश में कोरोना वायरस संक्रमण से निपटने के लिए युद्धस्तर पर टीकाकरण अभियान चलाया जा रहा है। देश में अब तक कोरोना की कुल 14.19 करोड़ लोगों को वैक्सीन की डोज दी जा चुकी हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि 25 अप्रैल को अभियान का 100वां दिन पूरा हो गया। रिपोर्ट के मुताबिक 20,44,954 सत्रों के माध्यम से कुल मिलाकार टीकों की 14,19,11,223 खुराकें दी जा चुकी हैं।

ममता बनर्जी ने नए सिरे से चुनाव की माँग के बाद अब किया केंद्रीय सुरक्षा बलों को पश्चिम बंगाल से हटाने की माँग

ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में जारी विधानसभा चुनावों से केंद्रीय बलों को हटाने की माँग एक बार फिर दोहराई है। बंगाल की मुख्यमंत्री राज्य में 8 चरणों के समापन से पहले ही दोबारा चुनाव कराए जाने की माँग भी कर चुकी हैं। हार के डर से, ममता बनर्जी ने अब मद्रास HC के आदेश का सहारा लेते हुए कहा है कि केंद्रीय सुरक्षा बल ही हैं जो राज्य में कोविड-19 का प्रसार कर रहे हैं और इसलिए,केंद्र सरकार द्वारा उन्हें वापस बुलाया जाना चाहिए।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ममता बनर्जी ने कहा, ”मैं मद्रास उच्च न्यायालय के आदेश का स्वागत करती हूँ, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि चुनाव आयोग अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चुनाव आयोग दोनों (वर्तमान) स्थिति (राज्य में फैले कोविड के) के लिए जिम्मेदार हैं।” बनर्जी ने ये आरोप उत्तरी कोलकाता में कार्यकर्ताओं की एक बैठक में लगाया, जहाँ पार्टी के उम्मीदवार और कार्यकर्ता मौजूद थे।

75 फीसदी केंद्रीय बल कोरोना संक्रमित: ममता बनर्जी

उन्होंने आगे कहा, “मैं अनुरोध कर रही हूँ कि कृपया कोविड-प्रभावित राज्यों से लाई गई लगभग 2 लाख- मजबूत केंद्रीय सेनाओं, जो स्कूलों और कॉलेजों में सुरक्षित घरों में डेरा डाले हुए हैं और कोविड प्रबंधन कार्यों में बाधा डाल रहे हैं, उनमें से 75 प्रतिशत वायरस से संक्रमित हो सकते हैं। कृपया उन्हें अंतिम चरण से हटा दें।”

ध्यान देने वाली बात ये है कि मद्रास हाईकोर्ट ने अपनी राय देते हुए कहा कि केंद्रीय बलों और चुनाव आयोग को देश में में कोविड-19 के प्रसार के लिए अकेले दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

लेकिन, ममता बनर्जी ने हाई कोर्ट के विचार को एक बार फिर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए तैनात किए गए केंद्रीय बलों को राज्य से हटाए जाने की अपनी माँग को दोहराने के अवसर में तब्दील कर दिया।

यह पहली बार नहीं है कि ममता बनर्जी ने इस तरह की माँग की है, लेकिन सीआरपीएफ की उपस्थिति के कारण चुनावों में निष्पक्षता बरकरार है।

ममता बनर्जी ने दी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की अनुमति

विधानसभा चुनावों के परिणाम का (2 मई) के करीब आने के साथ ही, ममता बनर्जी ने घोषणा की कि चुनाव समाप्त होने के बाद वह सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगी। यह दावा करते हुए कि चुनाव आयोग ने अधिकारियों को विधानसभा चुनावों के दौरान टीएमसी नेताओं को गिरफ्तार करने का निर्देश दिया था, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने कहा कि वह राज्य में नए ‘तटस्थ चुनावों’ को कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगी।

वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में, ममता बनर्जी ने राज्य चुनावों में चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग बीजेपी की मदद करने के लिए काम कर रहा है। सीएम ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहा है कि टीएमसी कार्यकर्ता बीजेपी के खिलाफ वोट न कर पाएँ।

चुनाव आयोग के खिलाफ लड़ें लड़ाई: टीएमसी समर्थकों से ममता

टीएमसी सुप्रीमो ने चुनाव आयोग के खिलाफ अपने समर्थकों को उकसाते हुए कहा, ”मैं बीरभूम, मुर्शिदाबाद, मालदा, जहाँ हर जगह चुनाव होने हैं, सभी से अपील कर रही हूँ कि सावधान रहें, अभी से एहतियात बरतें, एक तरफ हमें कोविड के खिलाफ जंग लड़नी है, तो दूसरी तरफ हमें चुनाव आयोग के खिलाफ लड़ना है, जो यह सुनिश्चित करने की साजिश कर रहा है कि हमारे लोग मतदान न कर पाएँ।”

उन्होंने आगे कहा, ”अगर पुलिस किसी को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में लेती है, तो उनके परिवार के सदस्य पुलिस स्टेशन जाएँ और वहाँ बैठें, पुलिस स्टेशन का घेराव करें, पूछिए अवैध तरीके से हिरासत में क्यों लिया गया, अगर जरूरत पड़े तो कोर्ट जाएँ, हम हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक हर जगह जाएँगे। जैसे ही किसी को अवैध रूप से हिरासत में लिया जाता है, वैसे ही FIR दर्ज कराएँ।”

कोरोना नियमों की केजरीवाल ने उड़ाई धज्जियाँ, किया राधा स्वामी व्यास कोविड सेंटर का दौरा: 5 दिन पहले हुए थे आइसोलेट

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की पत्नी सुनीता केजरीवाल 5 दिन पहले कोरोना पॉजिटिव पाई गई थीं। ऐसे में उन्हें आईसोलेशन में होना चाहिए था। लेकिन, वह तो खुलेआम कोरोना के बेसिक नियमों की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं। अनपेक्षित तरीके से केजरीवाल ने सोमवार को छतरपुर में आईटीबीपी द्वारा संचालित सरदार पटेल कोविड केयर सेंटर का दौरा किया।

इस दौरान उनके साथ डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया और स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन भी कोविड सेंटर के निरीक्षण के लिए आए थे।

बीते 20 अप्रैल 2021 को मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की पत्नी सुनीता की कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी। फिलहाल होम आईसोलेशन में उनका इलाज चल रहा है।

दिलचस्प बात ये है कि सुनीता केजरीवाल के पॉजिटिव पाए जाने के कुछ ही समय बाद केजरीवाल ने घोषणा की थी कि वह खुद को आईसोलेट कर लेंगे। उन्होंने लोगों से भी 6 दिन के लॉकडाउन के दौरान घर पर ही रहने की अपील की थी।

हालाँकि, होम क्वारंटाइन का उल्लंघन करते हुए खुद अरविंद केजरीवाल ने ही राधा स्वामी ब्यास कोविड केयर सेंटर की तस्वीरें शेयर की थी, जहाँ उन्हें कम से कम 10 लोगों के साथ बेहद नजदीक देखा गया था। इस दौरान सोशल डिस्टेंसिंग का नामोनिशान नहीं था।

500 ऑक्सीजन बेड वाले कोविड केयर सेंटर को आज से चालू कर दिया गया है, जिसे 200 आईसीयू बेड के साथ बढ़ाकर 700 बेड किया जा सकता है।

दिल्ली सरकार की डैमेज कंट्रोल की कोशिश

कोरोना के कुप्रबंधन के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट की कड़ी फटकार के बाद दिल्ली सरकार अब डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश कर रही है।

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ऑक्सीजन की कमी की शिकायत के बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली सरकार से केंद्र सरकार द्वारा उसे अलॉट किए गए ऑक्सीजन को लेकर सवाल किया था। कोर्ट ने टिप्पणी की, “प्रत्येक राज्य अपने स्वयं के टैंकरों की व्यवस्था कर रहा है, यदि आपके पास अपने स्वयं के टैंक नहीं हैं, तो उसका प्रबंध करें। आपको यह करना होगा, केंद्रीय सरकार के अधिकारियों से संपर्क करें। हम अधिकारियों के बीच संपर्क की सुविधा के लिए यहाँ नहीं हैं। ”

इसके बाद अब अरविंद केजरीवाल अब राष्ट्रीय राजधानी में ऑक्सीजन की आपूर्ति की क्रायोजेनिक टैंकरों के लिए लोगों और संस्थाओं से इसके लिए विज्ञापनों के जरिए निवेदन कर रहे हैं।

32 घंटे से मिजोरम के लुंगलेई के जंगलों में लगी भीषण आग, 12 घर जलकर खाक: वायुसेना मदद के लिए पहुँची

पूर्वोत्तर राज्य मिजोरम के लुंगलेई और लॉन्गटाई जिलों के जंगलों में बीते 32 घंटे से लगी आग भयावह रूप धारण कर चुकी है। आग इंसानी बस्तियों तक पहुँच गई है।

अधिकारियों के मुताबिक असम राइफल्स, बीएसएफ के जवानों के साथ स्थानीय स्वयंसेवी समूहों के लोग राज्य सरकार के दमकल विभाग के साथ आग बुझाने के लिए कड़ी मशक्कत कर रहे हैं।

रविवार की शाम तक आग लगातार जाल रही थी। मिजोरम सरकार की माँग पर भारतीय वायुसेना ने आग बुझाने के लिए दो एमआई -17 वी 5 हेलीकॉप्टरों को तैनात कर दिया है। इसे विशेष बाँबी बाल्टी से लैस किया गया है। इस बात की जानकारी रक्षा मंत्रालय ने दी है।

कथित तौर पर लुंगलेई कस्बे के पास की जंगली पहाड़ियों में शनिवार सुबह 7 बजे आग लगी थी। रविवार तक यह न केवल लुंगलेई टाउन के 10 गाँवों में फैल गई, बल्कि यह पड़ोसी जिले लॉन्गटेई तीन ब्लॉक्स को भी अपनी चपेट में ले लिया।

इस भयावह जंगली आग को लेकर लुंगलेई जिले के कलेक्टर कुलोथुंगन ने कहा, “कल शाम को हमने आग को पूरी तरह से कंट्रोल कर लिया था, लेकिन यह आज सुबह फिर से भड़क गई और अभी भी जल रही है। हम इस पर काबू पाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन हवाएँ और सूखी वनस्पतियों के कारण यह तेजी से फैल रही है। इसी कारण यह काफी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।”

मिजोरम डीआईपीआर के द्वारा प्रेस को दिए गए बयान के मुताबिक, लुंगलेई शहर के जोटलंग, सेरकॉन, चनमरी जैसे इलाकों में आग कुछ घरों तक पहुँच गई है। इससे बड़ा नुकसान हो सकता है।

जिलाधिकारी कुलोथुंगन ने कहा, “आग मानव बस्तियों के करीब फैल गई थी, प्रशासन ने लोगों के घरों को खाली करा दिया है। किसी भी व्यक्ति को न तो किसी प्रकार की कोई हानि हुई है और न ही संपत्तियों को नुकसान पहुँचा है।”

हालाँकि, लॉंग्टलाई जिले में आग से जानमाल के नुकसान की खबर सामने आई है। जिले की एडीसी मर्लिन रुलजखुमथंगी ने कहा, “बुंगटलाँग दक्षिण में, आग से 12 घर पूरी तरह से जलकर खाक हो गए हैं, जबकि दो को आंशिक नुकसान हुआ है। अच्छी बात यह रही कि किसी भी व्यक्ति को कोई नुकसान नहीं हुआ है। लेकिन पशुधन की हानि हुई है।” उन्होंने कहा कि जिला प्रशासन ने अधिकारियों के साथ ही राहत आपूर्ति को तत्काल गाँव में भेज दिया है।

एडीसी मर्लिन रुलजखुमथंगी ने कहा, “छोटी-मोटी आग अभी भी लगी हुई है। यह माना जा रहा है कि इससे इंसानों के लिए कोई खतरा नहीं होगा, लेकिन इसे खारिज भी नहीं किया जा सकता है। “

डीसी कुलोथुंगन ने कहा कि आग के कारणों का अभी पता नहीं चल पाया है। हम शाम तक इसे कंट्रोल कर पाने की उम्मीद कर रहे हैं। यह पूछे जाने पर कि क्या यह झूमिग खेती के कारण हो सकता है? इस पर डीसी ने कहा कि वह इस मामले की फिलहाल पुष्टि नहीं कर सकते हैं, क्योंकि अभी इसकी जाँच चल रही है।

फरवरी में मिजोरम के वन अधिकारियों ने कहा था कि राज्य में 2020 में लगभग 1,300 जंगल की आग की सूचना मिली थी, जिसमें से झूम खेती के कारण लगभग 1,090 घटनाएँ हुई थीं। इसके अलावा 210 आग की घटनाएं प्राकृतिक कारणों से हुई थीं। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक मिजोरम के ग्रामीण इलाके का बड़ा तबका झूम खेती करता है। साथ ही ये लोग स्लेश-एंड-बर्न पद्धति का इस्तेमाल करते हैं। इसमें जमीन के टुकड़े को साफ करके जला दिया जाता है, ताकि जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ जाए। ऐसे में कई बार हवा के झोंके के कारण आसपास के इलाकों में आग लग जाती है।

फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (एफएसआई), देहरादून के अनुसार, पूर्वोत्तर और मध्य भारत के वन जंगल की आग के लिहाज से बहुत ही असुरक्षित हैं। असम, मिजोरम और त्रिपुरा के जंगलों की आग को अत्यधिक खतरनाक माना गया है।

एफएसआई की इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट (आईएसएफआर) -2019 के मुताबिक मिजोरम में 85.41 प्रतिशत फॉरेस्ट एरिया है।

जानिए किन-किन देशों ने की भारत की मदद, कहाँ से आया क्या: पैट कमिंस ने पीएम केयर्स में ₹37 लाख देकर कहा- सभी करें योगदान

भारत में कोरोना की दूसरी लहर इतनी बढ़ गई है कि कई राज्यों में ऑक्सीजन और हॉस्पिटल बेड्स के लिए हाहाकार मचा हुआ है। ऐसे में कई देशों ने आगे आकर मदद की पेशकश की है तो कइयों ने मदद भेज भी दी है। अब IPL में पिछले साल सबसे महँगे बिकने वाले ऑस्ट्रेलिया के तेज़ गेंदबाज पैट कमिंस ने पीएम केयर्स फण्ड में 50,000 डॉलर (37.36 लाख रुपए) का योगदान दिया है। उन्होंने अन्य IPL खिलाड़ियों से भी ऐसा करने की अपील की।

अब तक सिंगापुर, यूरोपियन यूनियन, UAE, रूस और सऊदी अरब ने भारत की सहायता की है। सिंगापुर से भारतीय वायुसेना ने 4 क्रायोजेनिक ऑक्सीजन टैंक्स को एयरलिफ्ट किया। इसे सिंगापुर के चंगी से पश्चिम बंगाल के पणगढ़ लाया गया। ये इस तरह का पहला इम्पोर्ट था। भारत के केंद्रीय मंत्री एस जयशंकर ने भी दुनिया भर के देशों से साथ आने की अपील की है। सऊदी अरब से भी 800 मीट्रिक टन लिक्वीड अक्सीजन आया है।

कई देशों में भारतीय दूतावास वहाँ के ऑक्सीजन उत्पादक कंपनियों के साथ संपर्क में हैं। UAE भी भारत में ऑक्सीजन भेज रहा है। रूस और यूरोपियन यूनियन ने ऑक्सीजन के साथ-साथ कई दवाओं की खेप भी भेजने का निर्णय लिया है। पाकिस्तान के भी एक चैरिटी संस्थान ने पीएम मोदी को पत्र लिख कर 50 एम्बुलेंस और इमरजेंसी स्टाफ्स भेजने की पेशकश की। जर्मनी में भारतीय दूतावास भी वहाँ से सहायता के लिए बातचीत कर रहे हैं।

जर्मनी के दूतावास ने कहा है कि कोरोना वैक्सीन बनाने के लिए मैटेरियल्स बनाने वाली कंपनियों के साथ वो संपर्क में है और दुनिया भर में कोरोना टीकाकरण और अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए भारत में वैक्सीनेशन की प्रक्रिया का सफल होना ज़रूरी है। भारत ने फ़िलहाल मेडिकल सप्लाई की एक्सपोर्ट भी रोक दी गई। 10 दिन पहले अल्बानिया और सीरिया में बड़ी सप्लाई भेजी गई थी, उसके बाद से बड़े शिपमेंट्स पर लगभग रोक है।

मंगलवार को यूके से भी मेडिकल सहायता आएगी। इनमें 495 ऑक्सीजन कॉन्सेंट्रेटर्स आ रहे हैं, जो अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी होने पर हवा में से ऑक्सीजन खींच सकते हैं। 120 नॉन-इनवेसिव वेंटिलेटर और 20 मैन्युअल वेंटलेटर आ रहे हैं। यूरोपियन कमिशन ने भी कहा है कि वो जल्द से जल्द संसाधन जुटा कर भारत भेज रहा है। उधर पहले मना करने के बाद अब अमेरिका ने भी रॉ मैटेरियल्स की सप्लाई की घोषणा कर दी।

कोलकाता नाइटराइडर्स (KKR) के पैट कमिंस ने कहा, “मैं पिछले 10 वर्षों से भारत आ रहा हूँ और इससे काफी प्यार करता हूँ। यहाँ के लोग दयालु और अच्छे हैं। इस पर खासी चर्चा हो रही थी कि इस त्रासदी में IPL हो या नहीं। लेकिन, कइयों का मानना है कि इससे घरों में बैठे लोगों को रोज कुछ घंटे का मनोरंजन मिलेगा। हमें एक खिलाड़ी के रूप में ऐसा प्लेटफॉर्म मिला है, जिससे हम लाखों लोगों तक पहुँच सकते हैं। मेरा योगदान बड़ा नहीं है, लेकिन आइए हम सब मिल कर लोगों के जीवन में उजाला लाएँ।”

यूनाइटेड स्टेटस ने थेराप्यूटिक्स, रैपिड डायग्नोसिस टेस्ट किट्स, वेंटिलेटर्स और PPE भी उपलब्ध कराने की बात कही है। 2022 के अंत तक भारत में वैक्सीन बनाने वाली BioE कम से कम 100 करोड़ वैक्सीन के डोज का निर्माण कर सके, इसके लिए US का डेवलपमेंट फाइनेंस कॉर्पोरेशन (DFC) वित्तीय सहायता मुहैया कराएगा। इसके अलावा वहाँ के सेंटर ऑफ डिजीज कंट्रोल (CDC) और USAID के विशेषज्ञों की एक टीम भारत के साथ मिल कर काम करेगी।