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क्या एक एथेनॉल फैक्ट्री ने ही बर्बाद कर दी बर्नीहाट की हवा? असम-मेघालय सीमा पर बसे ‘दुनिया के सबसे प्रदूषित शहर’ और उमियाम डिस्टिलेशन की कहानी

असम-मेघालय सीमा पर बसा छोटा-सा औद्योगिक शहर बर्नीहाट (Byrnihat) इन दिनों हर जगह खबरों में बना हुआ है। कभी अपनी खूबसूरती के लिए तारीफें बटोरने वाला यह शहर अब दुनिया का ‘सबसे प्रदूषित महानगरीय इलाका’ घोषित किया गया है।

हाल ही में यह मामला और ज्यादा चर्चा में आ गया, जब पत्रकार सार्थक गोस्वामी की यूट्यूब डॉक्यूमेंट्री ‘दुनिया के सबसे प्रदूषित शहर से’ (Inside The World’s Most Polluted City) वायरल हो गई।

इस वीडियो में सार्थक एक स्थानीय अनुवादक के साथ बर्नीहाट का दौरा करते हैं, लोगों से बात करते हैं और पेड़ों की पत्तियों, घरों की छतों और सब्जियों पर जमी मोटी काली कालिख दिखाते हैं। वीडियो में प्रदूषण के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदारी एक खास फैक्ट्री एथेनॉल डिस्टिलरी पर डाली गई है।

इस वीडियो को अब तक 10 लाख से ज्यादा बार देखा जा चुका है। इसके बाद लोगों में गुस्सा बढ़ा, विरोध प्रदर्शन हुए और राज्य सरकार से सीधे सवाल पूछे जाने लगे। लोगों का गुस्सा पूरी तरह समझ में आता है।

बर्नीहाट का प्रदूषण बढ़ा-चढ़ाकर नहीं दिखाया गया है। यहाँ लोग सच में बीमार पड़ रहे हैं, हवा वाकई बेहद खराब है और स्थानीय लोग सालों से इस समस्या के साथ जी रहे हैं। लेकिन जब पूरे घटनाक्रम और समय क्रम को ध्यान से देखा जाता है, तो यह दावा कि सिर्फ एक एथेनॉल फैक्ट्री की वजह से बर्नीहाट दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर बना, तथ्यों के आधार पर सही नहीं ठहरता।

बर्नीहाट में एथेनॉल फैक्ट्री से प्रदूषण: टाइमलाइन जो दूर करती है सारे सवाल

सबसे पहले पूरे घटनाक्रम की टाइम लाइन समझ लेते हैं। इस पूरे मामले के केंद्र में उमियाम डिस्टिलेशन प्राइवेट लिमिटेड नाम की एक अनाज आधारित एथेनॉल डिस्टिलरी है, जो मेघालय के री-भोई जिले के बर्नीहाट स्थित एक्सपोर्ट प्रमोशन इंडस्ट्रियल पार्क (EPIP) में है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस प्लांट ने सितंबर 2024 में आधिकारिक तौर पर एथेनॉल का व्यावसायिक उत्पादन शुरू किया।

अब इसकी तुलना उस समय से कीजिए, जब बर्नीहाट में प्रदूषण की समस्या पहली बार सामने आई थी। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने 2022-23 में ही बर्नीहाट को गंभीर रूप से प्रदूषित क्षेत्र घोषित कर दिया था। यानी एथेनॉल प्लांट शुरू होने से करीब दो साल पहले ही इस इलाके में प्रदूषण की गंभीर स्थिति दर्ज की जा चुकी थी।

अब उस रिपोर्ट की बात करते हैं, जिसने बर्नीहाट को पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बना दिया। 2024 IQ एयर वर्ल्ड एयर क्वालिटी रिपोर्ट  के मुताबिक, यहाँ PM2.5 का सालाना औसत स्तर 128.2 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की सुरक्षित सीमा 5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से 25 गुना से भी ज्यादा है।

यह रिपोर्ट मार्च 2024 में प्रकाशित हुई थी, यानी एथेनॉल प्लांट के शुरू होने से पूरे छह महीने पहले। अब जरा सोचिए कि इसका क्या मतलब निकलता है। जो फैक्ट्री उस समय तक शुरू भी नहीं हुई थी, वह उस प्रदूषण संकट की वजह कैसे हो सकती है, जिसे नियामक एजेंसियाँ पहले ही दर्ज कर चुकी थीं और जिसकी जानकारी एक वैश्विक रिपोर्ट पहले ही दुनिया के सामने ला चुकी थी।

यह किसी राय या अलग-अलग व्याख्या का मामला नहीं है, बल्कि सिर्फ तारीखों का सवाल है। और इस मामले में तारीखें एक-दूसरे से मेल नहीं खातीं।

कहाँ से आई कोयले की राख?

यह पहली बार नहीं है जब बर्नीहाट के लोगों ने हर सुबह पूरे शहर पर औद्योगिक धूल और कालिख की मोटी परत जमी हुई देखी हो। एथेनॉल प्लांट चर्चा में आने से बहुत पहले ही बर्नीहाट का औद्योगिक इलाका कोयले से चलने वाले कोक ओवन और फेरो-अलॉय भट्टियों के लिए जाना जाता था। इसी तरह के उद्योग वही कालिख और राख जैसी परत पैदा करते हैं, जो आज भी डॉक्यूमेंट्री में पेड़ों की पत्तियों और घरों की छतों पर जमी हुई दिखाई गई है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने 2018 में ही बर्नीहाट औद्योगिक क्षेत्र को क्रिटिकली पॉल्यूटेड एरिया घोषित कर दिया था। उस समय यहाँ 34 छोटे, मध्यम और बड़े उद्योग चलते थे, जिनमें ज्यादातर कोक (कोयले से बनने वाला ईंधन) और सीमेंट का उत्पादन करते थे।

इलाके के रहने वालों के मुताबिक, कई सालों से यहाँ हर सुबह गाड़ियों, पौधों, घरों की छतों और बाहर सूखने के लिए डाले गए कपड़ों पर रात भर में राख और काली धूल की मोटी परत जम जाती थी।

हालिया डॉक्यूमेंट्री में भी यही दृश्य दिखाए गए हैं, लेकिन उन्हें ऐसे दिखाया है की मानो यह कोई नई समस्या हो। जबकि हकीकत यह है कि यह प्रदूषण का वही पुराना पैटर्न है, जो एथेनॉल प्लांट शुरू होने से कई साल पहले से मौजूद था और जिसकी मुख्य वजह कोयले का इस्तेमाल करने वाले उद्योग थे, न कि एथेनॉल डिस्टिलरी।

बाद में राज्य सरकार ने इस पर कार्रवाई भी की। सितंबर 2024 में मेघालय राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MSPCB) ने उत्सर्जन मानकों का पालन न करने पर बर्नीहाट की छह औद्योगिक इकाइयों को बंद करने का नोटिस जारी किया।

इनमें शिलांग इस्पात और रोलिंग मिल, श्याम सेंचुरी फेरस लिमिटेड, नलारी फेरो अलॉयज, जैंतिया फेरो अलॉयज, मैथन अलॉयज और खासी अलॉयज शामिल थीं। ये सभी कोयले पर आधारित कोक या फेरो-अलॉय उद्योगों से जुड़ी इकाइयाँ थीं।

इसके अलावा, मार्च 2025 में मुख्यमंत्री कॉनराड संगमा ने राज्य विधानसभा में बताया कि प्रदूषण नियमों का उल्लंघन करने पर सरकार ने इलाके की सात औद्योगिक इकाइयों को बंद कर दिया है। ये वही उद्योग थे, जिनसे स्थानीय लोगों के अनुसार कोयले की राख और काली धूल की परत बनती थी। इनमें से कई इकाइयाँ सितंबर 2024 में एथेनॉल प्लांट शुरू होने से पहले ही बंद हो चुकी थीं।

ऐसे में अगर आज भी किसी डॉक्यूमेंट्री में बर्नीहाट की सतहों पर काली कालिख या राख दिखाई देती है, तो उपलब्ध रिकॉर्ड और नियामक एजेंसियों के इतिहास को देखते हुए इसकी ज्यादा तार्किक वजह दशकों से चल रहे कोयला आधारित कोक और फेरो-अलॉय उद्योग माने जाएँगे, न कि वह एथेनॉल डिस्टिलरी, जो बाद में शुरू हुई और MSPCB की जून 2026 की जाँच के मुताबिक फिलहाल अपने तय उत्सर्जन मानकों के भीतर काम कर रही है।

बर्नीहाट: दर्जनों फैक्ट्रियों वाला शहर

डॉक्यूमेंट्री में यह दिखाने की कोशिश की गई है कि सिर्फ एक एथेनॉल फैक्ट्री ही बर्नीहाट के प्रदूषण की असली वजह है। इस तरह की कहानी लोगों को इसलिए आसानी से समझ आती है, क्योंकि यह बहुत सीधी लगती है, एक ही दोषी, एक ही वजह और एक साफ-सुथरी कहानी। लेकिन बर्नीहाट का औद्योगिक ढाँचा इतना आसान नहीं है।

खुद सार्थक गोस्वामी की डॉक्यूमेंट्री में उनका स्थानीय अनुवादक बताता है कि शहर और उसके आसपास करीब 80 फैक्ट्रियाँ चल रही हैं। इनमें सीमेंट प्लांट, चूना पत्थर (लाइमस्टोन) प्रोसेसिंग यूनिट, फेरो-अलॉय फैक्ट्रियाँ, स्टील प्लांट और कम से कम तीन अलग-अलग शराब और डिस्टिलरी इकाइयाँ शामिल हैं, सिर्फ वही एक फैक्ट्री नहीं जो वायरल वीडियो के बाद चर्चा में आई।

इसके अलावा, बर्नीहाट एक कटोरे जैसी घाटी में बसा हुआ है। इस भौगोलिक स्थिति की वजह से यहाँ निकलने वाला धुआँ और प्रदूषण आसानी से वातावरण में फैल नहीं पाता, बल्कि इलाके के ऊपर ही फंसा रहता है।

यानी इन दर्जनों उद्योगों से निकलने वाला धुआँ और बारीक प्रदूषक कण हवा में दूर जाने के बजाय शहर के ऊपर जमा होते रहते हैं और समय के साथ प्रदूषण बढ़ता जाता है।

इसके साथ ही, बर्नीहाट पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र का एक बड़ा औद्योगिक और परिवहन केंद्र भी है, इसलिए यहाँ हर समय भारी ट्रकों और अन्य वाहनों की आवाजाही बनी रहती है। ऐसे में यहाँ का प्रदूषण किसी एक फैक्ट्री की वजह से नहीं बल्कि कई अलग-अलग कारणों के एक साथ असर का नतीजा है।

मेघालय के स्वास्थ्य मंत्री वैलाडमिकी शायला भी सार्वजनिक रूप से इस जटिल स्थिति को स्वीकार कर चुके हैं। उनका कहना है कि बर्नीहाट के प्रदूषण में योगदान देने वाली ज्यादातर फैक्ट्रियाँ मेघालय नहीं बल्कि असम की सीमा में स्थित हैं। ऐसे में यह तय करना कि किस राज्य या किस फैक्ट्री से कितना प्रदूषण हो रहा है, आसान नहीं है, क्योंकि बर्नीहाट दो राज्यों की सीमा पर बसा हुआ शहर है।

जब अधिकारियों ने जाकर चेक किया तो क्या हुआ?

डॉक्यूमेंट्री वायरल होने और लोगों का दबाव बढ़ने के बाद मेघालय राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MSPCB) ने इंतजार नहीं किया। 29 जून 2026 को बोर्ड ने अपनी पहल पर ही उमियाम डिस्टिलेशन प्लांट का निरीक्षण करने के लिए एक विशेष टीम भेजी।

जाँच के नतीजे 1 जुलाई 2026 को सार्वजनिक किए गए। इस निरीक्षण में कई पहलुओं की जाँच की गई, जिनमें पार्टिकुलेट मैटर (PM) का स्तर, स्टैक वेलोसिटी, डिफरेंशियल प्रेशर और उत्सर्जन स्रोत का तापमान शामिल था।

बोर्ड के मुताबिक, जाँच के दौरान दर्ज किए गए पार्टिकुलेट मैटर के स्तर प्लांट को दिए गए कंसेंट टू ऑपरेट की तय सीमा के भीतर पाए गए। जाँच में यह भी सामने आया कि प्लांट में लगे प्रदूषण नियंत्रण उपकरण सही तरीके से काम कर रहे थे।

इनमें कैप्टिव पावर यूनिट के लिए लगाया गया इलेक्ट्रोस्टैटिक प्रीसिपिटेटर और डिस्टिलरी के लिए मल्टी-इफेक्ट इवैपोरेटर के साथ जीरो लिक्विड डिस्चार्ज प्रणाली शामिल है। अधिकारियों के अनुसार, कच्चे और शोधन किए गए अपशिष्ट जल (Effluent) के नमूनों की लैब में जाँच कराई गई, जिसमें पुष्टि हुई कि शोधन के बाद पानी को पर्यावरण में छोड़ने के बजाय प्लांट के कूलिंग टावर में दोबारा इस्तेमाल किया जा रहा है।

इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि बर्नीहाट की हवा पूरी तरह सुरक्षित है, और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने भी ऐसा कोई दावा नहीं किया है। राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के तहत बर्नीहाट आज भी आधिकारिक तौर पर नॉन-अटेनमेंट शहर की श्रेणी में है।

यानी यह अब भी राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानकों पर खरा नहीं उतर रहा है और इसी वजह से इसकी लगातार निगरानी की जा रही है। पिछले दो वर्षों में प्रदूषण मानकों का उल्लंघन करने पर कई अन्य औद्योगिक इकाइयों को बंद भी किया जा चुका है। लेकिन जहाँ तक इस एक एथेनॉल प्लांट का सवाल है, नियामक अधिकारियों ने जब इसकी कानूनी मानकों के आधार पर जाँच की, तो उन्हें किसी तरह का उल्लंघन नहीं मिला।

दोषी भले ही एक ना हो लेकिन त्रासदी तो वास्तविक

डॉक्यूमेंट्री की टाइमलाइन या निरीक्षण के नतीजे उस असल चीज को खत्म नहीं करते जो सार्थक गोस्वामी की वीडियो में दिखाया गया है। जो विजुअल्स हैं, वे वाकई परेशान करने वाले हैं, फसलों और घरों की छतों पर जमी मोटी काली धूल, लोगों का यह कहना कि सब्जियों को खाने से पहले कई बार धोना पड़ता है और परिवारों का अस्थमा, त्वचा की बीमारियों और सांस लेने की दिक्कतों के बढ़ते मामलों का जिक्र भी खौफनाक लगता है।

डॉक्यूमेंट्री के साथ उद्धृत सरकारी आँकड़ों के मुताबिक, इस इलाके में सांस संबंधी बीमारियों के मामले 2022 में 2082 से बढ़कर 2024 में 3681 हो गए हैं, यानी सिर्फ दो साल में लगभग 77 प्रतिशत की बढ़ोतरी। यह एक वास्तविक और गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है और इसे राष्ट्रीय स्तर पर मिल रही चर्चा पूरी तरह से जायज है।

असल सवाल यह नहीं है कि बर्नीहाट में प्रदूषण की समस्या है या नहीं यह तो साफ है कि है। असल सवाल यह है कि इस समस्या को जनता के सामने कैसे समझाया जा रहा है।

इसे सिर्फ एक एथेनॉल फैक्ट्री की गलती बताना कहानी को आसान और शेयर करने लायक जरूर बनाता है और लोगों को गुस्सा निकालने के लिए एक साफ लक्ष्य भी दे देता है। लेकिन इससे बाकी लगभग 79 फैक्ट्रियाँ, अनियंत्रित वाहन यातायात, दो राज्यों के बीच कमजोर नियामक व्यवस्था और सालों से चल रहा औद्योगिक विस्तार पूरी तरह से चर्चा से बाहर हो जाते हैं।

अगर सार्वजनिक चर्चा सिर्फ उस एक प्लांट पर केंद्रित रह जाती है, जो वैसे भी उस समय शुरू हुआ था जब प्रदूषण संकट पहले ही दर्ज किया जा चुका था, तो बाकी जिम्मेदार कारण आसानी से छिपे रह जाते हैं। इसमें एक और बड़ी विडंबना भी है।

एथेनॉल मिश्रित ईंधन को केंद्र सरकार बड़े पैमाने पर एक साफ और हरित विकल्प के रूप में बढ़ावा दे रही है और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी जैसे नेता इसे सुरक्षित, कम उत्सर्जन वाला और किसानों के लिए फायदेमंद बताते रहे हैं।

डॉक्यूमेंट्री के इस फ्रेमिंग के आलोचकों का कहना है कि बर्नीहाट की असली कहानी एथेनॉल उत्पादन को स्वाभाविक रूप से प्रदूषणकारी बताने की नहीं है, बल्कि एक ऐसे शहर में औद्योगिक विकास के खराब नियमन की है जो पहले से ही पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील था, और जहाँ कोई भी एथेनॉल प्लांट आने से बहुत पहले से यह समस्या मौजूद थी।

बर्नीहाट को CPCB ने 2022-2023 में ही पहले से क्रिटिकली पॉल्यूटेड क्षेत्र के रूप में चिन्हित कर दिया था। मार्च 2024 में प्रकाशित एक रिपोर्ट में इसे दुनिया का सबसे प्रदूषित महानगरीय क्षेत्र भी बताया गया। जिस एथेनॉल फैक्ट्री को अभी जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, उसने सितंबर 2024 में ही व्यावसायिक उत्पादन शुरू किया, यानी इन दोनों अहम घटनाओं के बाद।

जून 2026 में की गई एक सरकारी जाँच में पाया गया कि यह प्लांट अपने तय किए गए उत्सर्जन मानकों के भीतर ही काम कर रहा था और उसमें लगे प्रदूषण नियंत्रण उपकरण भी सही तरीके से कार्यरत थे। वहीं दूसरी तरफ, बर्नीहाट और उसके आसपास करीब 80 फैक्ट्रियाँ चलती हैं, जिनमें सीमेंट, स्टील, फेरो-अलॉय और कई डिस्टिलरी इकाइयाँ शामिल हैं, सिर्फ एक नहीं।

बर्नीहाट की हवा वाकई खतरनाक है और वहाँ रहने वाले लोगों को वास्तविक जवाब और वास्तविक जवाबदेही की जरूरत है। लेकिन उपलब्ध टाइमलाइन और सबूतों को देखें तो यह दावा कि सिर्फ एक एथेनॉल फैक्ट्री ही बर्नीहाट को दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर बनाने की जिम्मेदार है, तथ्यों के हिसाब से मेल नहीं खाता।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

‘यह आध्यात्मिक यात्रा परंपरा का एक शाश्वत अध्याय’: अमरनाथ यात्रा पर जा रहे श्रद्धालुओं को PM मोदी ने लिखा पत्र, ये 5 संकल्प अपनाने का किया आग्रह

प्रिय श्रद्धालु
हर हर महादेव!
जय बाबा बर्फानी!
 
जम्मू-कश्मीर में पवित्र अमरनाथ यात्रा में सम्मिलित होना, अपने आप में बहुत बड़ा सौभाग्य होता है। ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन हुई प्रथम पूजा के साथ ही भक्तों के लिए बाबा बर्फानी के दर्शन का क्रम शुरू हो जाता है। देश के कोने-कोने में श्रद्धालु इस पावन यात्रा में सम्मिलित होने के लिए तत्पर रहते हैं।
 
हर वर्ष बाबा बर्फानी के प्रत्यक्ष दर्शन का यह अवसर, लाखों शिवभक्तों के लिए जीवन का एक अत्यंत शुभ और अविस्मरणीय अनुभव होता है। मैं इस वर्ष, यात्रा के इस अवसर पर आप सभी शिवभक्तों को अपनी हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ।
 
बाबा अमरनाथ के दर्शन की यह यात्रा, भारत की आध्यात्मिक यात्रा परंपरा का एक शाश्वत अध्याय है। हर वर्ष पूरे विश्व से सनातन संस्कृति को मानने वाले लाखों श्रद्धालु इस यात्रा में सम्मिलित होने के लिए जम्मू-कश्मीर पहुँचते हैं। अलग-अलग प्रांतों से, अलग-अलग भाषाएँ बोलने वाले और विविध परंपराओं को मानने वाले लोग, महादेव के दर्शन का संकल्प लेकर इस यात्रा को पूरा करते हैं।
 
बीते कई दशकों से, श्री अमरनाथजी श्राइन बोर्ड और जम्मू-कश्मीर सरकार बहुत कुशलता और सेवा भाव से यात्रा का प्रबंधन करते आ रहे हैं। इसके साथ ही, यात्रा को सुरक्षित संपन्न कराने में हमारे प्रशासन और सुरक्षाबलों की भी बहुत बड़ी भूमिका रहती है। इस वर्ष भी हजारों साथी इस दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं।

मैं इस अवसर पर भारतीय सेना, CRPF, जम्मू-कश्मीर पुलिस, ITBP, BSF, NDRF, स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े चिकित्सकों और कर्मियों, प्रशासन के अधिकारियों, सफाई मित्रों तथा भक्तों की सेवा में जुटे हर साथी का हृदय से अभिनंदन करता हूँ।
 
इन दो महीनों के दौरान, बाबा बर्फानी के पवित्र धाम में भारत की विविधता में एकता का अद्भुत स्वरूप भी देखने को मिलता है।
 
बाबा बर्फानी के धाम की यह यात्रा, हमें जम्मू-कश्मीर के आतिथ्य भाव और देशभर से आए भक्तों के समर्पण का भी दर्शन कराती है। यात्रा के हर आयोजन में, जम्मू-कश्मीर के हजारों स्थानीय नागरिक श्रद्धालुओं का आत्मीय स्वागत करते हैं।

देश के अलग-अलग हिस्सों से आने वाले असंख्य भक्त भी, पवित्र गुफा और यात्रा मार्गों पर भंडारों और लंगरों का संचालन करते हैं। निःस्वार्थ सेवा की यह भावना, हमारी सनातन संस्कृति और सर्वे भवन्तु सुखिनः के आदर्श की सजीव अभिव्यक्ति है।
 
इस वर्ष मैं अमरनाथ यात्रा पर जा रहे सभी श्रद्धालुओं से कुछ संकल्पों का आग्रह करना चाहता हूँ।
 
पहला संकल्प – हम अमरनाथ यात्रा के दौरान स्वच्छता के नियमों का पालन करें और पूरे यात्रा मार्ग में स्वच्छता बनाए रखने में अपना योगदान दें।
 
दूसरा संकल्प – हम प्रशासन के सभी आदेशों, यातायात के नियमों और सुरक्षा संबंधी निर्देशों का पूरी निष्ठा से पालन करें। यात्रा के दौरान बारिश की वजह से फिसलन और ठंड का विशेष ध्यान रखें।
 
तीसरा संकल्प – हम ‘वोकल फॉर लोकल’ की भावना से यात्रा के खर्च का कम से कम 10 प्रतिशत उपयोग स्थानीय उत्पादों को खरीदने में करें। इससे जम्मू-कश्मीर के परिवारों और युवाओं की आजीविका को भी बल मिलेगा।
 
चौथा संकल्प – हम बाबा अमरनाथ यात्रा के समापन दिवस, अर्थात रक्षाबंधन के अवसर पर अपने भाई या बहन को एक पौधा भेंट करें और ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान को आगे बढ़ाएँ।
 
पाँचवाँ संकल्प – हम राष्ट्र प्रथम की भावना के साथ पूरे वर्ष अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करें और विकसित भारत के निर्माण में अपना सक्रिय योगदान दें।
 
मुझे विश्वास है कि बाबा अमरनाथ की दर्शन यात्रा, सनातन धर्म की आस्था, भारत की सांस्कृतिक एकता और सेवा की परंपरा का एक भव्य महोत्सव बनकर पूर्ण होगी।
 
मेरी कामना है, बाबा अमरनाथ की असीम कृपा हम सभी पर बनी रहे। आपकी यात्रा सुरक्षित हो, मंगलमय हो और आपके जीवन में नई ऊर्जा, नई चेतना तथा नई आध्यात्मिक शक्ति का संचार हो।
 
बाबा बर्फानी हम सभी को अपने कर्तव्यों के प्रति और अधिक समर्पित बनाएँ ताकि हम मिलकर विकसित भारत के संकल्प को सिद्ध कर सकें।
 
आप सभी को अमरनाथ यात्रा के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ।
 
आपका,
नरेंद्र मोदी

आतंकियों तक आधार पहुँचाने की साजिश किसकी? MP के ‘क्लोन Aadhar मशीन’ मामले ने बढ़ाई चिंता, अन्य राज्यों में भी फर्जी पंजीकरण के नेटवर्क पर उठे सवाल: पढ़ें पूरा मामला

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल एक बार फिर सुरक्षा से जुड़े सवालों के घेरे में आ गया है। इस बार मामला किसी आतंकी की गिरफ्तारी या हथियारों की बरामदगी का नहीं बल्कि देश की सबसे अहम पहचान व्यवस्था यानी आधार पंजीकरण से जुड़ा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, BSNL के आंतरिक दस्तावेजों में दावा किया गया था कि नवंबर 2023 में UIDAI ने मध्य प्रदेश में क्लोन आधार मशीनों के इस्तेमाल को लेकर चेतावनी जारी की थी। इन दस्तावेजों में कहा गया कि कुछ संदिग्ध मशीनों के जरिए आधार पंजीकरण की प्रक्रिया चलाई जा रही थी और इनके माध्यम से आतंकियों से जुड़े लोगों के आधार कार्ड बनवाने की कोशिश की जा रही थी।

(फोटो साभार – दैनिक भास्कर)

इसके बाद 6 दिसंबर 2023 को BSNL मध्य प्रदेश सर्किल ने अपने सभी संबंधित अधिकारियों को पत्र भेजा। पत्र में M/s रॉयल कम्युनिकेशन नाम के वेंडर का जिक्र करते हुए 79 आधार पंजीकरण किट को तत्काल डी-रजिस्टर करने का निर्देश दिया गया।

इन मशीनों का संबंध भोपाल, महाराष्ट्र (मालेगाँव), उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, विदिशा, सागर, जबलपुर, ग्वालियर, बालाघाट, मंडला, सतना, शहडोल, छिंदवाड़ा, शिवपुरी समेत कई अन्य जिलों से बताया गया। हालाँकि दस्तावेजों में कहीं यह पुष्टि नहीं है कि इन मशीनों से वास्तव में कितने फर्जी आधार बने या किसी आतंकी ने उनका इस्तेमाल किया।

क्लोन आधार मशीन क्या होती है और इस मामले में क्या कार्रवाई हुई?

आधार पंजीकरण केवल UIDAI से अधिकृत मशीनों और ऑपरेटरों के जरिए किया जाता है। यदि किसी मशीन का अनधिकृत या पैरेलल तरीके से इस्तेमाल हो, तो उसे आम तौर पर क्लोन मशीन कहा जाता है। ऐसी स्थिति में पहचान संबंधी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो सकते हैं।

इसी आशंका को देखते हुए UIDAI ने BSNL को सतर्क किया था। इसके बाद BSNL ने संबंधित मशीनों को डी-रजिस्टर किया और बाद में सभी मशीनों को स्थैतिक IP के साथ दोबारा पंजीकृत करने की प्रक्रिया अपनाई, ताकि भविष्य में दुरुपयोग की संभावना कम हो सके।

BSNL मध्य प्रदेश के मुख्य महाप्रबंधक मिथिलेश कुमार ने NDTV से कहा कि निगम ने अपनी जिम्मेदारी के तहत सभी एहतियाती कदम उठाए हैं। मशीनों को निष्क्रिय किया गया और UIDAI के निर्देशों के अनुसार दोबारा पंजीकरण किया गया।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आपराधिक जाँच करना BSNL के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। वहीं, फरवरी 2026 के एक अन्य पत्र में यह चर्चा सामने आई कि संबंधित वेंडर को ब्लैकलिस्ट करने का अधिकार किस स्तर पर है। इससे यह संकेत मिलता है कि प्रशासनिक स्तर पर प्रक्रिया आगे बढ़ती रही, जबकि जाँच से जुड़े कई सवाल अब भी खुले हैं।

भोपाल का सुरक्षा रिकॉर्ड क्यों चर्चा में है?

इस मामले की चर्चा इसलिए भी ज्यादा हो रही है क्योंकि पिछले कुछ सालों में भोपाल का नाम कई आतंकी मॉड्यूल की जाँच में सामने आया है। साल 2022 में ऐशबाग इलाके से जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (JMB) के संदिग्धों की गिरफ्तारी हुई थी।

इसके बाद हिज्ब-उत-तहरीर, PFI, ISIS और अन्य कट्टरपंथी संगठनों से जुड़े मामलों में भी जाँच एजेंसियों ने कार्रवाई की। हाल ही में मोहम्मद फराज की गिरफ्तारी के बाद भी सुरक्षा एजेंसियाँ सक्रिय हुईं।

मोहम्मद फराज के मामले में जाँच एजेंसियाँ ऑनलाइन कट्टरपंथ और पाकिस्तान स्थित आकाओं से जुड़े एंगल की भी जाँच कर रही हैं। इसी वजह से भोपाल एक बार फिर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चर्चाओं के केंद्र में आ गया।

आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, भोपाल केंद्रीय जेल में सिमी (SIMI), पीएफआई (PFI), हिज्ब-उत-तहरीर (HuT), आईएसआईएस (ISIS), जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (JMB) और सूफा (SUFA) जैसे संगठनों से जुड़े कुल 71 आतंकी संदिग्ध न्यायिक प्रक्रिया के तहत बंद हैं। इसी वजह से भोपाल का नाम लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों की निगरानी वाले शहरों में शामिल रहा है।

इसी पृष्ठभूमि में क्लोन आधार मशीनों से जुड़ी चेतावनी को गंभीर माना जा रहा है। हालाँकि मध्य प्रदेश ATS के एक वरिष्ठ अधिकारी ने मीडिया से कहा कि उनके पास ऐसी कोई सूचना नहीं थी कि मध्य प्रदेश के BSNL आधार केंद्रों से आतंकियों के आधार कार्ड बनाए गए हों।

अधिकारी के अनुसार 2022 में पकड़े गए JMB मॉड्यूल के सदस्यों ने पश्चिम बंगाल या असम के दस्तावेजों के आधार पर पहचान पत्र बनवाए थे। यानी इस मामले में अभी तक किसी आतंकी के आधार कार्ड बनने की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

किस-किस तरीके से फर्जी आधार कार्ड बनाए जाने के मामले आए सामने?

फर्जी आधार कार्ड बनने के मामले कई तरह के होते हैं। यह समझना जरूरी है कि आधार का पूरा केंद्रीय डेटाबेस (CIDR) हैक होने के प्रमाण नहीं हैं, लेकिन जाँच एजेंसियों ने अलग-अलग मामलों में आधार पंजीकरण प्रक्रिया, ऑपरेटर ID, बायोमेट्रिक और फर्जी दस्तावेजों के दुरुपयोग के तरीके सामने रखे हैं।

क्लोन आधार मशीनों का इस्तेमाल

इस मामले में सबसे बड़ा आरोप यही है। जाँच दस्तावेजों के अनुसार, अधिकृत आधार एनरोलमेंट किट की तरह काम करने वाली क्लोन मशीनों का इस्तेमाल समानांतर आधार पंजीकरण के लिए किया जा रहा था। ऐसी मशीनों के जरिए अधिकृत सिस्टम की तरह डेटा दर्ज करने की कोशिश की जाती है।

ऑपरेटर ID और पासवर्ड का गलत इस्तेमाल

कई मामलों में अधिकृत आधार ऑपरेटर की यूजर आईडी और पासवर्ड का गलत इस्तेमाल सामने आया है। जाँच  एजेंसियों के अनुसार, किसी अधिकृत ऑपरेटर की लॉग-इन जानकारी का उपयोग कर अनधिकृत व्यक्ति आधार पंजीकरण या अपडेट का काम करता था।

फर्जी बायोमेट्रिक

कुछ मामलों में सिलिकॉन या अन्य तकनीक से उंगलियों के निशान की नकली कॉपी तैयार कर बायोमेट्रिक सत्यापन को धोखा देने की कोशिश की गई। इससे बिना असली ऑपरेटर की मौजूदगी के सिस्टम में लॉग-इन करने के आरोप सामने आए हैं।

फर्जी दस्तावेजों के आधार पर आधार बनवाना

जाँच  एजेंसियों ने कई मामलों में पाया कि नकली राशन कार्ड, जन्म प्रमाणपत्र, निवास प्रमाणपत्र, वोटर आईडी या अन्य पहचान पत्रों के आधार पर आधार पंजीकरण कराने की कोशिश की गई।

आधार अपडेट प्रक्रिया का दुरुपयोग

कुछ मामलों में पहले से बने आधार कार्ड में नाम, पता, मोबाइल नंबर या अन्य जानकारी बदलने के लिए फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया। इससे किसी व्यक्ति की पहचान बदलने का प्रयास किया गया।

अनधिकृत आधार सेवा केंद्र

देश के कई राज्यों में ऐसे केंद्र पकड़े गए, जहाँ बिना वैध अनुमति के आधार पंजीकरण या अपडेट का काम किया जा रहा था। इन केंद्रों पर अधिकृत मशीनों या ऑपरेटरों के क्रेडेंशियल का गलत इस्तेमाल किया गया।

दूसरे राज्यों की मशीनों का इस्तेमाल

कुछ जाँचों में सामने आया कि एक राज्य के लिए अधिकृत आधार पंजीकरण किट या ऑपरेटर आईडी का उपयोग दूसरे राज्य में किया जा रहा था। इससे निगरानी व्यवस्था को प्रभावित करने की आशंका जताई गई।

वेंडर नेटवर्क के जरिए गड़बड़ी

कुछ मामलों में जाँच एजेंसियों ने आधार पंजीकरण का काम करने वाले वेंडरों और उनसे जुड़े ऑपरेटरों की भूमिका की भी जाँच  की। आरोप रहे हैं कि अधिकृत व्यवस्था के बाहर समानांतर तरीके से पंजीकरण कराने की कोशिश की गई।

फर्जी नाम और पहचान से पंजीकरण

कुछ मामलों में एक ही व्यक्ति के लिए अलग-अलग पहचान या अलग दस्तावेजों के आधार पर आधार बनवाने की कोशिश की गई। ऐसे मामलों में दस्तावेजों की सत्यापन प्रक्रिया जाँच का विषय बनी।

पहचान बदलकर नए दस्तावेज तैयार करना

कुछ आतंकी और अपराध से जुड़े मामलों की जाँच  में यह सामने आया कि पहले फर्जी पहचान से आधार या अन्य पहचान पत्र बनवाए गए, फिर उन्हीं दस्तावेजों के आधार पर बैंक खाता, सिम कार्ड या पासपोर्ट जैसे अन्य दस्तावेज तैयार किए गए। हालाँकि हर मामले में यह तरीका अपनाया गया हो, ऐसा नहीं है, यह अलग-अलग जाँचों में सामने आए पैटर्न हैं।

इन मामलों में क्या समानता रही?

जाँच एजेंसियों के सामने आए अधिकांश मामलों में केंद्रीय आधार डेटाबेस को हैक करने की बात नहीं, बल्कि आधार पंजीकरण की प्रक्रिया का दुरुपयोग, फर्जी दस्तावेज, ऑपरेटर ID, बायोमेट्रिक और अनधिकृत मशीनों के इस्तेमाल जैसे तरीके सामने आए हैं। इसलिए ऐसे मामलों में तकनीकी सुरक्षा के साथ-साथ दस्तावेजों और ऑपरेटर स्तर पर निगरानी भी महत्वपूर्ण मानी जाती है।

पुराने फर्जी पासपोर्ट केस

भोपाल में पहचान संबंधी दस्तावेजों का यह पहला चर्चित मामला नहीं है। इससे पहले फर्जी दस्तावेजों के आधार पर पासपोर्ट जारी होने का मामला भी सामने आ चुका है। उस मामले में तत्कालीन पासपोर्ट अधिकारियों, एक क्लर्क और एजेंट को अदालत ने दोषी ठहराया था।

आरोप था कि फर्जी राशन कार्ड, मार्कशीट और अन्य दस्तावेजों के आधार पर पासपोर्ट जारी किया गया। बाद में उस पासपोर्ट का इस्तेमाल कर आरोपित देश से बाहर गया और जाँच एजेंसियों के अनुसार पाकिस्तान पहुँचकर ISI के संपर्क में आया। इस मामले में अदालत फैसला भी सुना चुकी है।

क्लोन आधार मशीनों के मौजूदा मामले में भी कई सवालों के जवाब अभी सामने आने बाकी हैं। जैसे क्या इन मशीनों से किसी तरह का फर्जी आधार पंजीकरण हुआ? यदि हुआ तो उसकी संख्या कितनी थी? संबंधित ऑपरेटरों और वेंडर की जाँच किस स्तर तक पहुँची? क्या किसी जाँच एजेंसी को औपचारिक सूचना दी गई थी? फिलहाल उपलब्ध दस्तावेज बताते हैं कि मशीनों को बंद किया गया और तकनीकी स्तर पर सुधारात्मक कदम उठाए गए।

मध्य प्रदेश जैसी गंभीर चूक अन्य राज्यों में भी?

उत्तर प्रदेश (रायबरेली), अक्टूबर 2025: रायबरेली में पुलिस ने फर्जी आधार रैकेट का भंडाफोड़ किया। जाँच के अनुसार, आरोपितों ने अधिकृत आधार ऑपरेटर की ID और पासवर्ड का गलत इस्तेमाल कर आधार कार्ड, जन्म प्रमाणपत्र और अन्य पहचान दस्तावेज तैयार किए। मौके से लैपटॉप, बायोमेट्रिक उपकरण और बड़ी संख्या में आधार पंजीकरण से जुड़े दस्तावेज बरामद किए गए।

मध्य प्रदेश (बालाघाट), नवंबर 2025: बालाघाट पुलिस ने एक ऐसे नेटवर्क का खुलासा किया था, जिसमें आरोपित पर फर्जी बायोमेट्रिक क्लोन बनाकर अधिकृत आधार ऑपरेटरों की पहचान का इस्तेमाल करने का आरोप लगा।

पुलिस के अनुसार, आरोपित ने कई आधार सेवा केंद्रों के टेंडर अपने परिचितों के नाम पर हासिल किए और बाद में उन्हीं मशीनों तथा ऑपरेटर लॉग-इन का उपयोग कर आधार अपडेट का काम करता रहा। जाँच में फिंगरप्रिंट की क्लोन कॉपी बनाकर सिस्टम में लॉग-इन करने की बात भी सामने आई।

उत्तर प्रदेश (बहराइच), नवंबर 2025: उत्तर प्रदेश STF ने एक ऐसे मास्टरमाइंड को गिरफ्तार किया, जिस पर फर्जी आधार कार्ड बनाने वाले नेटवर्क को  चलाने का आरोप था। STF के अनुसार, आरोपित आधार एनरोलमेंट टूल और यूजर ID के जरिए हजारों फर्जी आधार कार्ड तैयार करने तथा दूसरे लोगों को भी ऐसी व्यवस्था उपलब्ध कराने के आरोप में जाँच के दायरे में आया।

महाराष्ट्र (मालेगाँव), नवंबर 2025: नासिक ग्रामीण पुलिस ने मालेगाँव में एक अनधिकृत आधार केंद्र पर छापा मारकर तीन लोगों को गिरफ्तार किया। पुलिस के अनुसार, यह केंद्र दूसरे राज्य के अधिकृत ऑपरेटर के लॉग-इन क्रेडेंशियल का इस्तेमाल कर संचालित किया जा रहा था। मामले में आधार अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत कार्रवाई की गई।

बीमारी के बहाने निशाने पर भारत… BBC ने ’38 परजीवी’ के सहारे 19 साल पुरानी घटना पर किया बदनाम: पढ़ें- कैसे पश्चिमी मीडिया ने फैलाया प्रोपेगेंडा

ब्रिटिश मीडिया चैनल BBC का भारत विरोधी रवैया एक बार फिर सबके सामने आ गया है। इस विदेशी चैनल ने पत्रकारिता के सारे नियम भूलकर एक ऐसी खबर छापी है, जो लोगों को गुमराह करती है। BBC ने अपनी एक रिपोर्ट की हेडलाइन में लिखा कि ‘भारत घूमने गई महिला के दिमाग में पहुँचे 38 कीड़े (परजीवी)’। यह पूरी रिपोर्ट न तो मेडिकल साइंस के हिसाब से सही है और न ही इसमें कोई सच्चाई है।

यह सिर्फ भारत का नाम खराब करने की एक सोची-समझी कोशिश है। जब इस खबर की गहराई से जाँच की गई, तो पता चला कि हेडलाइन में जो डर फैलाया गया है, उसका रिपोर्ट के अंदर कोई सबूत ही नहीं है। BBC ने केवल एक विदेशी महिला की कही-सुनी बातों और उसके डॉक्टर के एक छोटे से ‘अंदाजे’ को पूरी दुनिया के सामने ऐसे पेश कर दिया, जैसे यह कोई बहुत बड़ा सच हो।

हेडलाइन और हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर

BBC ने जिस चालाकी से इस खबर को बुना है, वह साफ तौर पर शरारत से भरा हुआ है। BBC के रिपोर्ट की हेडलाइन ‘A trip to India left me with 38 parasites in my brain’ है। कोई भी आम इंसान जब इस हेडलाइन को देखेगा, तो उसे पहली नजर में यही लगेगा कि भारत बहुत गंदा और असुरक्षित देश है, जहाँ जाते ही लोगों में भयंकर बीमारी पैदा हो जाती हैं। लेकिन जैसे ही आप इस खबर के अंदर का कंटेंट पढ़ेंगे, तो आपको पता चलेगा कि बीबीसी के अपने ही शब्द उसके झूठ की पोल खोल रहे हैं।

BBC की रिपोर्ट की मुख्य हेडलाइन

खबर के अंदर BBC ने खुद लिखा है कि ब्रिटिश महिला के डॉक्टर को केवल ऐसा ‘लगा’ या उनका ‘अंदाजा’ (Believes) था कि यह बीमारी भारत में हुई होगी। यहाँ न तो कोई लैब रिपोर्ट दी गई है और न ही कोई पक्का मेडिकल सबूत पेश किया गया है। डॉक्टर के पास इस बात का कोई प्रूफ नहीं है।

मेडिकल साइंस में किसी बात का ‘सिर्फ अंदाजा लगाने’ और ‘उसे सच साबित करने’ में जमीन-आसमान का फर्क होता है। BBC ने इसी फर्क को जानबूझकर छिपा लिया। एक डॉक्टर के तुक्के या निजी अंदाजे को दुनिया भर की बड़ी खबर बना देना यह साफ दिखाता है कि BBC का मकसद पत्रकारिता करना नहीं, बल्कि भारत की छवि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खराब करना और भारत के नाम पर सनसनी फैलाना था।

तीन साल का लंबा गैप और BBC की थ्योरी फेल

इस पूरी कहानी का सबसे कमजोर और हास्यास्पद पहलू वह समय सीमा है, जिसे BBC ने बड़ी ही चालाकी से दबाने की कोशिश की। लॉरी डेनमैन नाम की यह ब्रिटिश महिला साल 2007 में तीन महीने के लिए भारत घूमने आई थी। भारत से लौटने के पूरे तीन साल बाद, यानी साल 2010 में उसे पहली बार अपने पेट में टेपवर्म (फीताकृमि) होने का पता चला। इसके बाद साल 2011 में उसे गंभीर दौरे पड़ने शुरू हुए, जिसके बाद स्कैन में दिमाग के अंदर सिस्ट (परजीवी) होने की पुष्टि हुई।

अब कोई भी सामान्य समझ रखने वाला व्यक्ति यह सवाल पूछेगा कि इन तीन सालों के लंबे अंतराल में उस महिला ने ब्रिटेन या दुनिया के किसी अन्य हिस्से में क्या खाया-पिया? तीन साल के भीतर शरीर में पनपने वाले किसी भी बैक्टीरिया या पैरासाइट का सटीक स्रोत ढूँढना मेडिकल साइंस में बेहद पेचीदा और लगभग असंभव माना जाता है। लेकिन BBC के लिए 3 साल का यह अंतराल कोई मायने नहीं रखता, क्योंकि उन्हें तो बस अपनी स्टोरी में ‘भारत’ का नाम जोड़कर अपनी हेडलाइन को चमकाना था।

शाकाहारी महिला और ‘पोर्क’ से बीमारी का अनोखा दावा

चिकित्सीय तथ्यों के स्तर पर BBC की यह रिपोर्ट इतनी खोखली है कि हँसने का मन करता है। रिपोर्ट के अनुसार महिला ‘न्यूरोसिस्टिसरकोसिस’ नाम की बीमारी से पीड़ित थी। यह बीमारी मुख्य रूप से सूअर के अधपके मांस (Pork) को खाने से या उसके लावे से दूषित हुए भोजन के कारण होती है।

यहाँ सबसे बड़ा झोल यह है कि खुद उस महिला ने स्वीकार किया है कि जब वह 2007 में भारत आई थी, तो उसने फूड पॉइजनिंग से बचने के लिए पूरी यात्रा के दौरान मांस को छुआ तक नहीं था। वह पूरे 3 महीने भारत में शुद्ध शाकाहारी रही थी। भारत में वैसे भी आम तौर पर पोर्क (सूअर का मांस) मिलना और खाना बहुत सीमित है। यह आसानी से हर जगह उपलब्ध भी नहीं होता। इस पर महिला के डॉक्टर डॉ ब्रेंडन हीली ने एक बेहद अजीब थ्योरी दे दी कि महिला ने ‘अनजाने में’ ऐसा पोर्क खा लिया होगा जिसमें टेपवर्म के सूक्ष्म अंडे थे। जब एक महिला खुद कह रही है कि वह शाकाहारी थी, तो उसे जबरन पोर्क खिलाने पर आमादा डॉक्टर और BBC की यह जिद सिर्फ और सिर्फ एजेंडे का हिस्सा लगती है।

मेडिकल साइंस की समझ पर भी उठे गंभीर सवाल

BBC की इस रिपोर्ट में बीमारी के फैलने की वैज्ञानिक प्रक्रिया को भी बहुत गलत और सीधे तरीके से पेश किया गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, न्यूरोसिस्टिसरकोसिस की बीमारी सीधे तौर पर सूअर का मांस खाने से दिमाग में नहीं पहुँचती। अधपका सूअर का मांस खाने से व्यक्ति के पेट में वयस्क टेपवर्म विकसित हो सकता है। लेकिन दिमाग में कीड़े (परजीवी) या सिस्ट तब बनते हैं जब कोई व्यक्ति टेपवर्म के अंडों से दूषित पानी या बेहद अस्वच्छ भोजन का सेवन करता है।

यह समस्या दुनिया के किसी भी कोने में खराब पर्सनल हाइजीन या दूषित पानी के कारण हो सकती है। खुद ब्रिटेन और अमेरिका जैसे विकसित देशों में हर साल ऐसे कई मामले सामने आते हैं जो वहीं के स्थानीय होते हैं। लेकिन BBC ने अपनी पूरी रिपोर्ट में इस वैश्विक संदर्भ को पूरी तरह से गायब कर दिया। उन्होंने यह कहीं नहीं बताया कि यह बीमारी लातिनी अमेरिका, अफ्रीका और एशिया के दर्जनों देशों में आम है। संदर्भ को गायब करने का सीधा मकसद यही था कि पाठक का पूरा ध्यान सिर्फ और छोड़ सिर्फ भारत की नकारात्मक छवि पर टिका रहे।

एकतरफा रिपोर्टिंग: भारत का पक्ष पूरी तरह गायब

पत्रकारिता का एक बुनियादी नियम होता है कि अगर आप किसी देश या संस्था पर इतना गंभीर आरोप लगा रहे हैं, तो आपको उनका पक्ष भी शामिल करना चाहिए। BBC की इस लंबी-चौड़ी रिपोर्ट में आपको दूर-दूर तक किसी भी भारतीय डॉक्टर, भारतीय स्वास्थ्य अधिकारी या किसी मेडिकल एक्सपर्ट का बयान देखने को नहीं मिलेगा।

यह पूरी कहानी सिर्फ एक मरीज के व्यक्तिगत और डरावने अनुभवों पर आधारित है। BBC ने भारत के स्वास्थ्य तंत्र या यहाँ के आँकड़ों को शामिल करने की जरूरत ही नहीं समझी। यह दिखाता है कि यह एकतरफा प्रोपेगेंडा था, जिसे बेहद शातिर तरीके से तैयार किया गया था ताकि भारत के खान-पान और पर्यटन उद्योग को चोट पहुँचाई जा सके।

एक संतुलित हेडलाइन यह हो सकती थी कि ‘विदेशी यात्रा के सालों बाद महिला के दिमाग में मिला दुर्लभ परजीवी, डॉक्टर संक्रमण के स्रोत की कर रहे हैं जाँच’। लेकिन ऐसी संतुलित हेडलाइन से भारत की बदनामी कैसे होती?

पश्चिमी मीडिया की पूँछ बना भारतीय मीडिया: बिना सोचे-समझे देश पर उछाला कीचड़

BBC और ‘द इंडिपेंडेंट‘ जैसे पश्चिमी मीडिया घरानों का भारत विरोधी रवैया तो पुराना है और उनकी मजबूरी समझ आती है। लेकिन सबसे ज्यादा दुखद और शर्मनाक स्थिति तब पैदा हुई जब भारत के अपने नामचीन मीडिया हाउस भी इस बहकावे में आ गए।

द टाइम्स ऑफ इंडिया‘, ‘हिंदुस्तान टाइम्स‘ और ‘न्यूज18‘ जैसे बड़े भारतीय अखबारों और न्यूज पोर्टल्स ने बिना कोई दिमाग लगाए, बिना किसी फैक्ट-चेक के BBC की इस कूड़ा रिपोर्ट को ज्यों का त्यों अपनी वेबसाइट पर जगह दे दी।

भारतीय मीडिया ने भी अपनी हेडलाइंस में चिल्ला-चिल्ला कर लिखना शुरू कर दिया कि ‘ब्रिटिश महिला भारत से लौटी तो दिमाग में 38 कीड़े (परजीवी) थे’। हमारे देश के मठाधीश पत्रकारों ने एक बार भी यह सोचने की जहमत नहीं उठाई कि इस रिपोर्ट के पीछे कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। वे सिर्फ पश्चिमी मीडिया के टूलकिट का हिस्सा बनकर अपने ही देश के खान-पान, स्वच्छता और पर्यटन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम कर रहे थे।

जब देश का अपना मीडिया ही बिना सोचे-समझे विदेशी प्रोपेगेंडा की रील्स और खबरें फॉरवर्ड करने लगे, तो बाहरी दुश्मनों की जरूरत ही नहीं रह जाती। पश्चिमी मीडिया हमेशा से भारत की बढ़ती आर्थिक और वैश्विक ताकत से चिढ़ता रहा है और उसे दबाने के लिए ऐसी मनगढ़ंत कहानियाँ गढ़ता रहता है। लेकिन भारतीय मीडिया का इस आत्मघाती खेल में शामिल होना देश के साथ एक बड़ा वैचारिक धोखा है।

सोशल मीडिया पर नेटीजन्स ने BBC को बुरी तरह धोया

जैसे ही BBC की यह रिपोर्ट इंटरनेट पर लाइव हुई, दुनिया भर के सोशल मीडिया यूजर्स का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। ट्विटर (X) पर लोगों ने BBC की इस नफरत भरी पत्रकारिता की जमकर धज्जियाँ उड़ाईं और उसे बुरी तरह ट्रोल करना शुरू कर दिया।

सोशल मीडिया पर यूजर्स ने लिखा कि BBC के पास ब्रिटेन के अंदर चल रहे पाकिस्तानी ग्रूमिंग गैंग्स और वहाँ महिलाओं के खिलाफ हो रही ढाई लाख से ज्यादा यौन हिंसा की घटनाओं पर रिपोर्ट करने की हिम्मत नहीं है, लेकिन वे भारत को बदनाम करने के लिए 19 साल पुराना मामला ढूँढ लाए हैं।

एक यूजर ने तंज कसते हुए लिखा, “महिला 2007 में भारत आई, कीड़े (परजीवी) 2010 में मिले और BBC इस पर जहर 2026 में उगल रहा है, वाह!”

वहीं कुछ यूजर्स ने ब्रिटिश इतिहास की याद दिलाते हुए लिखा कि भारत में 200 साल के ब्रिटिश शासन ने UK को 38 से कहीं ज़्यादा परजीवी दिए। ब्रिटिश पूरे देश को लूटकर अपने साथ ले गए थे।

सोशल मीडिया पर लोगों ने साफ कहा कि BBC पूरी तरह से भारत विरोधी तत्वों के इशारे पर काम कर रहा है।

‘200 लोगों ने शमशान में पैरों से अस्थियाँ भी रौंद डालीं’: सरला भट्ट के भाई ने सुनाई दर्दनाक दास्ताँ, J&K में नर्स की बर्बर हत्या के बाद भी नहीं रुके इस्लामी कट्टरपंथी

जम्मू-कश्मीर में बर्बरता का शिकार हुई कश्मीरी पंडित नर्स सरला भट्ट के अपहरण और बर्बर हत्या का मामला एक बार फिर चर्चा में है। 36 साल बाद जम्मू-कश्मीर पुलिस की स्पेशल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (SIA) ने इस मामले में बड़ी कार्रवाई की है। एजेंसी ने 700 से अधिक पन्नों की चार्जशीट दाखिल की है जिसमें प्रतिबंधित संगठन जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) के प्रमुख यासीन मलिक को मुख्य आरोपित बनाया गया है।

737 पन्नों की चार्जशीट के मुताबिक, यासीन मलिक और उसके 4 साथियों ने मिलकर सरला भट्ट को अगवा करने और उनकी हत्या की साजिश रची थी। इस मामले के तीन अन्य आरोपित अब्दुल हमीद शेख, मोहम्मद युसूफ सोफी उर्फ इदरीस और गुलाम मोहम्मद टपलू की मौत हो चुकी है जबकि चौथा आरोपित और मुख्य शूटर खुर्शीद अहमद चालको फरार है। इस बीच सरला भट्ट के चचेरे भाई पीके भट्ट ने उनकी हत्या से जुड़ी भयावह घटनाओं को याद किया है।

बर्बर हत्या के बाद पैरों से रौंदी गईं अस्थियाँ

News18 J&K के साथ बातचीत के दौरान पीके भट्ट ने चार्जशीट दाखिल होने को लेकर कहा है कि इंसाफ तो तभी मिलना चाहिए था लेकिन अब वे इससे थोड़े संतुष्ट जरूर हैं। उन्होंने कहा, “अब सरला भट्ट की आत्मा को थोड़ा सा इंसाफ मिल जाएगा। उसकी आत्मा अभी भी भटकती होगी। अगर उस बेचारी को उसकी आत्मा को इंसाफ मिलेगा तब भी इंसाफ है।”

उन्होंने उस भयावह घटना को याद करते हुए बताया कि सरला को ड्यूटी से वापस आते समय किडनैप कर लिया गया था और उसके बाद रेप कर उनकी हत्या कर दी गई। पीके भट्ट ने अंतिम संस्कार के दौरान की गई बर्बरता को भी याद किया है। उन्होंने कहा, “दाह संस्कार करने के बाद जब हम अस्थियाँ उठाने गए, अस्थियाँ उठाते वक्त श्मशान घाट पर कम-से-कम 200 बंदे थे।”

पीके ने आगे कहा, “उन लोगों ने अस्थियाँ अपने पैरों से रौंद दी। वहाँ से हाथ जोड़कर हमने एक मुट्ठी राख उठाई। उसमें कोई अस्थि नहीं थी, खाली राख थी वो उठाई हमने फेरन में डाल दी और वहाँ से चले गए।” उन्होंने कहा, “वहाँ मौजूद लोग गालियाँ देते रहे, तुम सा*, हरा** यहाँ से निकले नहीं अभी तक। दूसरी दिन मकान का ब्लास्ट हो गया तो सब छोड़छाड़ कर वापस जम्मू आ गए।”

उन्होंने कॉन्ग्रेस के राज में यासीन मलिक को मिलने वाले वीआईपी ट्रीटमेंट पर भी अपना दुख व्यक्त किया है। उन्होंने कहा, “दर्द की बात है कि यासीन मलिक, मनमोहन सिंह के साथ बैठता था। इससे बड़ी दर्द की बात क्या होगी कि एक देश का प्रधानमंत्री, एक उग्रवादी को अपने साथ बिठा रहा है।”

कौन थीं सरला भट्ट?

27 साल की सरला भट्ट जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले में रहने वाली एक कश्मीरी पंडित थीं। शायद यही उनका गुनाह था। जब 1990 में घाटी में कश्मीरी पंडितों का जिहादियों ने नरसंहार किया, तब सरला भी उसका शिकार हुईं।

वे कश्मीर के सौरा स्थित शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (SKIMS) में एक नर्स के रूप में कार्यरत थीं। आतंकी उन्हें उठाकर ले गए 5 दिन बाद सड़क पर उनका शव पड़ा मिला था।

सरला भट्ट के शरीर के टुकड़े कर बाजार में फेंके गए

14 अप्रैल 1990 का दिन था। जब सरला भट्ट SKIMS के हब्बा खातून हॉस्टल से आतंकियों ने उन्हें बंदूक की नोक पर अगवा कर ले गए। सरला भट्ट का 5 दिन तक कुछ पता नहीं लगा। रिपोर्टों के अनुसार, उनके साथ गैंगरेप किया गया। उन्हें बुरी तरह टॉर्चर किया गया। 19 अप्रैल 1990 को उनका क्षत-विक्षत शव सड़क पर पड़ा मिला था।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, सरला भट्ट के शव के पास एक नोट भी मिला था, जिसमें उन्हें पुलिस का मुखबिर बताया गया था। द हिंदू के मुताबिक, इस मामले में निगीन पुलिस थाने में FIR दर्ज की गई थी। इसकी संख्या 56/1990 है। हालाँकि, इसमें हिंदू नर्स के साथ रेप का कोई जिक्र तक नहीं है। इस बर्बर मामले में JKLF के पूर्व नेता पीर नूरुल हक शाह उर्फ एयर मार्शल का भी नाम सामने आया था।

700 से अधिक कश्मीरी पंडितों की हुई हत्या

सरला भट्ट केवल एकलौता नाम नहीं है, जिनकी बर्बरता से हत्या की गई। 1980-90 तक ऐसे 700 कश्मीरी पंडितों की घाटी में हत्या कर दी गई। ये हत्या कश्मीरी पंडितों के बीच दहशत फैलाने के लिए की गई थी।

आतंकी सरेआम हिंदू महिलाओं को घर से उठा ले जाते थे, कई माँ-बाप के सामने उनके बच्चों की हत्या हुई, हिंदुओं का मकान चुनकर निशाना बनाया जाता था। इन सब से परेशान होकर उस समय लगभग 3.5 लाख कश्मीरी पंडितों ने घाटी से पलायन किया था।

रिपोर्ट के अनुसार साल 2024 तक घाटी में केवल 728 गैर-प्रवासी पंडित ही बचे हैं जबकि 2021 में 808 परिवारों की थी। ‘द कश्मीर फाइल्स’ भी कश्मीरी पंडितों पर हुए अत्याचार और उनके पलायन को दर्शाने वाली फिल्म थी, जिसमें घाटी की असलियत दिखाई गई थी।

किसी का हिंदू-घृणा फैलाना काम, किसी की हिंसा भड़काने की हिस्ट्री: जानिए कौन हैं CJP प्रोटेस्ट में शामिल हुए ये 6 आंदोलनजीवी, ‘NEET’ नहीं सरकार-विरोध पर रहा फोकस

आंदोलन जब तक सुधार के लिए हो तो क्रांति है, लेकिन जब वह सिर्फ विरोध के लिए हो तो केवल एक पेशा (प्रोफेशन) बन जाता है। इस पेशे को अपनी पहचान बना चुकी उस जमात को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भरी संसद में ‘आंदोलनजीवी’ नाम दे चुके हैं। आंदोलनजीवी की यही जमात अब जंतर-मंतर पर चल रहे सोशल मीडिया से सटायर के तौर पर उभरी कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रोटेस्ट (प्रदर्शन) में भी पहुँच चुकी है।

दरअसल, खुद को ‘युवाओं की आवाज’ बताने वाली CJP देश में शिक्षा व्यवस्था के मुद्दे पर, खासकर हाल ही में NEET पेपर लीक के खिलाफ विरोध कर रही है। इनकी मुख्य माँगों में से एक देश के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा है। पहले चरण में 06 जून 2026 को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया गया था, जब धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा माँगने के लिए CJP के प्रमुख होने का दावा करने वाले अभिजीत दिपके अमेरिका से भारत लौटे थे।

इसके बाद अभिजीत दिपके ने पुणे, बेंगलुरु, लखनऊ, जयपुर समेत कई शहरों में इसी मुद्दे के साथ प्रदर्शन आयोजित किए। इन प्रदर्शनों में अभिजीत दिपके को उतनी मीडिया कवरेज नहीं मिली, जितनी उनके 06 जून 2026 के दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान मिली थी। या यूँ कहें कि ‘आंदोलनजीवी’ की जो भीड़ अब राजधानी में अपना डेरा जमा चुकी है, वह देश के इन शहरों में प्रदर्शन का हिस्सा बनने नहीं पहुँच सकी।

इसीलिए अभिजीत ने 20 जून 2026 से दोबारा जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की घोषणा की। यहाँ आम छात्र तो पहुँचे ही पहुँचे, लेकिन लाइमलाइट में वो आंदोलनजीवी रहे जिनकी आड़ में अभिजीत और उनकी CJP गैंग को सरकार के विरोध में उतरने का लाइसेंस मिल जाता है। इनमें प्रमुख चेहरा बने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत जेल जा चुके क्लाइमेट एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक रहे, जो पिछले लगातार 5 दिन से भूख हड़ताल पर बैठे हैं। सिर्फ सोनम वांगचुक ही नहीं, इस प्रदर्शन में कई और नामित आंदोलनजीवी चेहरे भी सामने आए हैं। आइए CJP प्रदर्शन के इन 12 दिनों से चल रहे प्रदर्शन में शामिल हुए उन आंदोलजवियों का रिकॉर्ड हिस्ट्री के बारे में जानते हैं।

सोनम वांगचुक

सोनम वांगचुक ने CJP को तब ही अपने आंदोलनजीवी पेशे का क्लासवर्क समझ लिया था, जब खुद इन ‘कॉकरोचों’ को भी नहीं मालूम था कि ये ऐसा कोई प्रदर्शन शुरू करने जा रहे हैं। सोशल मीडिया पर मीम और कॉमेडी करने वाली CJP को सोनम वांगचुक ने पहले ही भाप लिया, उन्होंने इसे युवाओं की जनसंख्या वाला एक हुजूम माना और लग गए उसके पीछे उन्हें समर्थन देने। क्योंकि आज हर एक राजनीतिक पार्टी भी यही कर रही है, कोई भी कदम उठाने से पहले देश के लगभग 65% युवाओं के बारे में सोच रही है क्योंकि ये ही उनका वोट बैंक है।

इसी युवाओं की टोली को सोनम वांगचुक ने अपना एजेंडा चलाने के लिए इस्तेमाल किया। सबसे पहले 06 जून को जंतर-मंतर पर हुए CJP के प्रदर्शन में ‘सलाहकार’ के तौर पर काम किया और तभी से ही वह प्रदर्शन का मुख्य चेहरा बन गए। इसके बाद CJP प्रदर्शन के जंतर-मंतर पर 20 जून से शुरू हुए अगले प्रदर्शन के दौरान सोनम वांगचुक विदेश दौरे पर थे लेकिन उन्हें युवाओं के प्रदर्शन पर संदेह हुआ तो उन्होंने खुद मोर्चा संभाला और एक हफ्ते बाद 28 जून को लौटकर अनशन पर उतर गए। अब पिछले 5 दिन से CJP के मंच पर गद्दा बिछाकर भूखे लोटे रहते हैं।

बात करें सोनम वांगचुक के आंदोलनजीवी बनने के अनुभवों की तो वे पिछले साल लद्दाख में आमरण अनशन पर बैठे थे। इस दौरान सोनम वांगचुक ने मोदी सरकार पर टिप्पणी की थी, “ये ऐसे राम निकले जो सीता को रावण से छुड़ा कर लाए, लेकिन घर नहीं ले गए बल्कि भरी बाजार में बिकने के लिए रख दिया।” उनके इसी अनशन के दौरान शांति वाले क्षेत्र लद्दाख में हिंसा भड़की थी। रिपोर्ट्स में सामने आया था कि वांगचुक ने ही ‘हाथ में पत्थर लेने‘ के लिए लोगों को उकसाया था। वांगचुक को NSA के तहत गिरफ्तार किया गया था। लद्दाख से दूर जोधपुर सेंट्रल जेल में उन्हें रखा गया था, जहाँ वे 6 महीने जेल में रहे।

वांगचुक की संस्थाओं पर भी हेराफेरी मिली थीं। उनक प्रमुख संस्था हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव्स लद्दाख (HIAL) की फंडिंग में गड़बड़ियाँ पाई गई थीं और उनकी स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख (SECMOL) में पाए गए उल्लंघनों के बाद एफसीआरए (FCRA) रजिस्ट्रेशन भी रद्द कर दिया गया था।

योगेंद्र यादव

जैसे ही आंदोलन को राजनीतिक और वैचारिक समर्थन देने वाले चेहरों की जरूरत पड़ी, वैसे ही फेल राजनीति के बाद आंदोलनजीवी बने योगेंद्र यादव भी प्रदर्शन स्थल पर पहुँच गए। यहाँ उन्होंने मंच से अपने पुराने प्रदर्शनों को याद करते हुए जंतर-मंतर के साइज की बात की। उन्होंने कहा कि 15 साल पहले वह भी इसी जगह भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठा रहे थे, तब में और अब में फर्क सिर्फ यह है कि जंतर-मंतर का आकार छोटा हो गया है और पहले ये बैरिकेडिंग नहीं हुआ करते थे। उन्होंने जंतर-मंतर के सिकुड़े आकार को लोकतंत्र के सिकुड़ने जैसा बताया।

योगेंद्र यादव का इस प्रदर्शन स्थल के लिए भावुक होना बनता भी था क्योंकि बीते कई वर्षों का उनका रिकॉर्ड बताता है कि वे केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने दिल्ली में हिंदू-विरोधी प्रदर्शन, किसान आंदोलन, भारत जोड़ो यात्रा समेत कई बड़े आंदोलनों में शामिल होकर अपनी राजनीति चमकाई है।

किसान आंदोलन को योगेंद्र यादव ने लीड किया और भारत बंद का आह्वान तक किया और जब लोगों ने इसमें व्यापक भागीदारी नहीं दी तो लोगों को उकसाने लगे। इसके अलावा वे नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध प्रदर्शनों में भी सक्रिय दिखाई दिए। बाद में कॉन्ग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा में राहुल गाँधी के साथ उनकी मौजूदगी ने भी यह संदेश दिया कि चुनावी राजनीति से अलग होने के बावजूद वे लगातार विपक्षी राजनीतिक अभियानों के साथ खड़े रहे।

यानी लगभग हर बड़े सरकार-विरोधी आंदोलन में उनकी मौजूदगी दर्ज की जाती रही है। इसी वजह से CJP के जंतर-मंतर प्रदर्शन में उनकी मौजूदगी से आंदोलन की विचारधारा पर असर पड़ता है। क्योंकि यादव का हिंदू विरोधी रिकॉर्ड भी सबके सामने है। जब ज्ञानवापी विवाद पर उन्होंने कहा था कि कथित मस्जिद पर दावा करने के कारण 500 साल बाद इस्लामी कट्टरपंथियों के हाथों हिंदुओं को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। ये वही योगेंद्र यादव हैं जिन्होंने देश में ‘हिंदी, हिंदू और हिंदुस्तान’ का विरोध किया था।

बृंदा करात

सरकार-विरोधी प्रदर्शन हो और कम्युनिस्ट चेहरे सामने न आए यह तो उचित ही नहीं है। कम्युनिस्टों में CPI(M) नेता बृंदा करात CJP के प्रदर्शन में शामिल हुईं। करात ने मंच से कहा कि जब उन्होंने देखा कि NEET की परीक्षा को लेकर भ्रष्टाचार और लूट हो रही है तो वह खुद को रोक नहीं पाईं। ये वही बृंदा करात हैं जिन्हें 2023 में जब वह पहलवानों के प्रदर्शन में पहुँची और पहलवानों ने उन्हें प्रदर्शन से भगा दिया यह कहकर कि प्रदर्शन को राजनीति मत बनाइए।

वह हर मोर्चे पर सरकार का विरोध करती नजर आ जाती हैं। कभी संसद के बाहर, तो कभी ट्विटर पर तो कभी बिन बुलाए प्रदर्शनों में शामिल होकर। इनके भीतर भी आंदोलनजीवी में पाए जाने वाला वह हिंदुओं से घृणा करने वाला ‘गुण’ है। याद करें जब बृंदा करात अपनी पार्टी का नेतृत्व करते हुए राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा में जाने से इनकार कर दिया था और उस कार्यक्रम को राजनीतिकरण बताया था। अब खुद राजनेता के तौर पर छात्रों के प्रदर्शन का चेहरा बन रही हैं। मंच से सीधे सरकार को ललकारने की बात कह रही हैं।

प्रशांत भूषण

पेशे से वकील और कुकर्मों से राजनीति में शामिल होने की इच्छा जता चुके प्रशांत भूषण भी CJP प्रदर्शन का हिस्सा न बने, ऐसा हो ही नहीं सकता क्योंकि उन्होंने कहाँ कोई प्रदर्शन छोड़ा है। वे तो दिल्ली में CAA के विरोध के नाम पर प्रदर्शन कराने के मास्टरमाइंड रह चुके हैं। ऐसे में उनका CJP के प्रदर्शन में आकर प्रदर्शन करने की सीख देना बनता ही था।

उन्होंने तो राहुल गाँधी तक को ‘भारत जोड़ो यात्रा’ में जुड़कर अपने आंदोलनजीवी होने के सबूत पेश किए। व्यंग्य की बात यह रही कि राहुल गाँधी के साथ कदम मिलाते हुए प्रशांत भूषण ने देश में भतीजावाद के खिलाफ आवाज उठाई। ठीक इसी बेवकूफी के साथ वह CJP के मंच पर युवाओं और छात्रों को सीख देने पहुँचे थे।

क्योंकि अब तक CJP के प्रदर्शन में हिंदू-विरोधी स्वर सामने नहीं आए हैं तो प्रशांत भूषण प्रदर्शनकारियों को बताने गए होंगे कि कैसे किसी भी प्रदर्शन से पहले बैठक की जाती है जहाँ हिंसा भड़काने का प्लान बनाया जाता है और फिर प्रदर्शन की आड़ में हिंदुओं के खिलाफ माहौल बनाया जाता है। और प्रशांत भूषण जैसे वकील को उनके इन्हीं ‘कांडों’ पर सुप्रीम कोर्ट भी लताड़ लगाने से खुद को नहीं रोक पाता।

सागरिका घोष

बंगाल में सत्ता गवा चुकी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की स्टार नेता सागरिका घोष का राजनीतिक करियर डूबने को है लेकिन लाइमलाइट में आने के लिए वह भी CJP के मंच पर पहुँच गईं। बंगाल में पूरी पार्टी खत्म होने को है, पार्टी के सांसद बागी निकल गए, ममता बनर्जी को अब कोई सहारा नहीं बचा लेकिन तब सागरिका घोष सामने आकर ‘अपनों’ के समर्थन में नहीं जुटीं। अगर दो-तीन बयान या ट्वीट कहीं कर भी दिए तो उनमें भी पार्टी के आंतरिक विवाद को सरकार के ऊपर ही मढ़ दिया।

लेकिन यहाँ बात नहीं बनी तो अब सागरिका घोष CJP प्रदर्शन में शामिल होकर देश के युवाओं का समर्थन का बहाना लेकर सरकार-विरोधी बयानबाजी करने के लिए पहुँच गईं।

विजेंद्र चौहान

छात्रों के बीच मशहूर प्रोपेगेंडाबाज और हिंदू-विरोधी बयानों का बैकग्राउंड लेकर चलने वाले दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के प्रोफेसर विजेंद्र सिंह चौहान ने भी CJP का प्रदर्शन ज्वाइन किया। लेकिन एक शिक्षक के तौर पर जहाँ उन्हें NEET पेपर लीक के मुद्दे पर छात्रों की आवाज बनना था वहीं वो मंच से ‘निकोबार प्रोजेक्ट’ पर सरकार को घेरने लग गए।

विजेंद्र चौहान वही चेहरा हैं, जो शिक्षा क्षेत्र में अपना बड़ा नाम कमा कर हिंदू-विरोधी बयानबाजी और जातिवाद की बात करते हैं। उनका दावा है कि ChatGPT (Generative Pre-trained Transformer) हिंदू समाज के सवर्णों द्वारा प्रशिक्षित किया गया है, इसका डेटा सवर्णों की तरफ झुका हुआ है क्योंकि इसे ट्रेन करने वाले लोग उसी वर्ग से आते हैं।

‘आंदोलनजीवी’ से CJP के प्रदर्शन का सच

ये सिर्फ कुछ नाम हैं, इनके अलावा अंजली भारद्वाज, कम्युनिस्ट एमए बेबी, यूट्यूब टीचर अभिनय सर, किसान नेता गुरनाम सिंह चढूनी, काशिफ सर समेत कई आंदोलनजीवी इस प्रोटेस्ट का हिस्सा बने हैं। और इनके पास्ट रिकॉर्ड से साफ है कि ये हर उस आंदोलन में शामिल हुए हैं जिसमें मोदी सरकार के खिलाफ आवाज उठाई जा रही हैं, बाकी देश में तमाम मुद्दों पर इनके होंठ सिल जाते हैं।

लेकिन CJP जैसा प्रोटेस्ट इनके लिए खुद की राजनीति चमकाने का जरिया बन जाता है। ऐसे प्रोटेस्ट से ये युवाओं का समर्थन तो हासिल कर ही लेते हैं साथ ही उन विरोधी पार्टियों की नजर में भी आ जाते हैं जो खुद मोदी सरकार को आए दिन गालियाँ देती हैं। उदाहरण के लिए, कन्हैया कुमार को देख लीजिए। उन्होंने JNU में डफली बजाकर सरकार के लिए जहर उगला और यहाँ तक कि दिल्ली में हुए हिंदू-विरोधी दंगों में भी शामिल हुए और आज देखिए… भाईसाहब ठाठ से कॉन्ग्रेस पार्टी के लिए नेतागिरी कर रहे हैं।

ऐसे आंदोलनजीवियों को छात्रों और युवाओं के असल मुद्दों से कुछ फर्क नहीं पड़ता, इनके लिए लाइमलाइट में आना जरूरी है। इनके लिए आंदोलन अब पेशा बन चुका है इसीलिए जहाँ भी मोदी-विरोधी या सरकार विरोधी नारे सुनाई देने लगते हैं तो ये झोला उठाकर वहाँ की ओर मार्च करने लग जाते हैं।

कुल मिलाकर बात यह है कि अब अगर ‘कॉकरोचों’ का NEET पेपर लीक के विरोध में जो प्रदर्शन जारी है, उसमें अगर दो-तीन छात्र वाकई में अगर परेशान हैं तो इन आंदोलनजीवियों के चलते उन्हें भी गंभीर नहीं लिया जा सकता। क्योंकि कॉकरोच जनता पार्टी का हाईकमान का पास्ट रिकॉर्ड तो सबके सामने ही है, चाहे वह अभिजीत दिपके हो, सौरव दास हो, विजेता दाहिया हो या आशुतोष रांका हो… इन सभी चेहरों का जुड़ाव तो पहले से ही दिल्ली दंगों के साजिशकर्ता उमर खालिद से लेकर आम आदमी पार्टी (AAP) से रहा है। इसीलिए अब तक जंतर-मंतर के उस मंच से NEET पेपर लीक के समाधान की बात के बजाए जातिवाद, अंबेडकरवाद, सरकार-विरोधी बयान से लेकर हर प्रोपेगेंडा फैलाया जा रहा है।

सदियों पुराना रहस्यमयी शिवलिंग… नासिक के त्र्यंबकेश्वर मंदिर में ‘अमृत कुंड’ की सफाई के दौरान ASI को मिली धरोहर, जानिए- इस ऐतिहासिक ज्योतिर्लिंग की कहानी

महाराष्ट्र के नासिक में स्थित देश के प्रसिद्ध 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक श्री त्र्यंबकेश्वर मंदिर परिसर से एक बेहद चमत्कारी और ऐतिहासिक खबर सामने आई है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी ASI की टीम जब मंदिर के भीतर मौजूद प्राचीन और ऐतिहासिक जल निकाय ‘अमृत कुंड’ की सफाई कर रही थी, तब उसके तलवे से एक प्राचीन पत्थर का नक्काशीदार शिवलिंग मिला।

यह अद्भुत शिवलिंग अमृत कुंड की तलहटी में दशकों से जमा कीचड़ और मलबे के नीचे पूरी तरह से दबा हुआ था। पुरातत्व विशेषज्ञों के शुरुआती अनुमान के मुताबिक यह शिवलिंग कम से कम 240 साल पुराना है, लेकिन इसके इससे भी कहीं ज्यादा प्राचीन यानी लगभग 335 साल से भी पुराना होने की पूरी संभावना जताई जा रही है।

जब सूख गया कुंड और सामने आया इतिहास

रिपोर्ट के मुताबिक, यह पूरी घटना किसी कहानी जैसी लगती है, जहाँ एक ऐतिहासिक कुंड को सुखाया जाता है और उसके नीचे से कुछ ऐसा निकलता है जिसे आज की पीढ़ी के किसी भी जीवित भक्त ने अपनी आँखों से कभी नहीं देखा था। ASI की टीम पिछले कुछ समय से त्र्यंबकेश्वर मंदिर परिसर के भीतर बने लगभग 65 फीट गहरे पत्थर के इस ऐतिहासिक कुंड को खाली करके उसकी गाद निकालने के काम में जुटी हुई थी।

इस प्राचीन कुंड को स्थानीय लोग ‘अमृत कुंड’ या ‘अमृतवर्षिणी कुंड’ के नाम से भी जानते हैं। जैसे-जैसे कर्मचारियों ने आधुनिक पंपों की मदद से पानी को निकाला और सदियों से जमा कीचड़ को हटाना शुरू किया, वैसे-वैसे कुंड की तलहटी से काले पत्थर का एक सुडौल शिवलिंग आकार लेने लगा। इस शिवलिंग की मौजूदगी अब तक केवल स्थानीय बुजुर्गों की मौखिक कहानियों और यादों में ही जिंदा थी, लेकिन अब यह हकीकत बनकर सबके सामने आ चुका है।

क्या है इस अद्भुत शिवलिंग की उम्र का असली गणित

पुरातत्व विभाग ने अभी तक इस नए मिले शिवलिंग की कोई वैज्ञानिक जाँच जैसे पेट्रोग्राफिक स्टडी, लिथोलॉजी या तलछट विश्लेषण नहीं किया है। इसलिए अभी तक इसकी बिल्कुल सटीक और प्रमाणित उम्र की घोषणा किसी आधिकारिक रिसर्च पेपर में नहीं की गई है।

लेकिन इतिहास और वास्तुकला के जानकार इसके समय का एक पक्का दायरा जरूर तय कर रहे हैं। यह ऐतिहासिक अमृत कुंड जिस मुख्य मंदिर परिसर के भीतर स्थित है, उसका पुनर्निर्माण साल 1755 से 1786 के बीच मराठा साम्राज्य के तीसरे पेशवा बालाजी बाजीराव ने करवाया था। इस ऐतिहासिक तथ्य के आधार पर यह पत्थर और इस पर की गई नक्काशी कम से कम 240 साल पुरानी तो है ही।

औरंगजेब के हमले और शिवलिंग को छिपाने का रहस्य

इस खोज को लेकर इतिहासकार और स्थानीय लोग एक और बेहद दिलचस्प थ्योरी पर विचार कर रहे हैं। इतिहास बताता है कि साल 1690 में क्रूर मुगल शासक औरंगजेब की सेना ने यहाँ के प्राचीन मंदिर को पूरी तरह से तहस-नहस कर दिया था। स्थानीय मौखिक इतिहास और पीढ़ियों से चली आ रही कहानियों में यह दावा किया जाता है कि मुगलों के उस भीषण हमले के दौरान पवित्र मूर्तियों और शिवलिंग को खंडित होने से बचाने के लिए पुजारियों ने उन्हें चुपके से पानी के भीतर छिपा दिया था।

अगर यह शिवलिंग उसी काल का है, तो इसकी उम्र आसानी से 335 साल या उससे भी ज्यादा हो सकती है। हालाँकि त्र्यंबकेश्वर देवस्थान ट्रस्ट के अपने लिखित दस्तावेजों में केवल मंदिर के पुनर्निर्माण की तारीखों का जिक्र मिलता है, पानी में किसी पत्थर को छिपाने का कोई पुख्ता लिखित प्रमाण अभी तक नहीं मिला है। अब केवल प्रयोगशाला की जांच ही इस रहस्य पर से अंतिम पर्दा उठा पाएगी।

प्रकृति की मार से कैसे बचा रहा यह बेसाल्ट पत्थर

इस खोज का एक सबसे हैरान करने वाला पहलू यह है कि सदियों तक पानी और कीचड़ के नीचे दबे रहने के बावजूद यह शिवलिंग बिल्कुल सही सलामत और अपने मूल आकार में है। इसके पीछे एक गहरा भूवैज्ञानिक कारण काम कर रहा है। दरअसल पूरा नासिक और त्र्यंबकेश्वर का यह इलाका ‘दक्कन ट्रैप’ क्षेत्र में आता है, जहाँ करोड़ों साल पहले हुए भीषण ज्वालामुखी विस्फोटों के कारण मजबूत काले बेसाल्ट पत्थरों की मोटी परतें बन गई थीं।

यहाँ के स्थानीय कारीगरों ने पिछले 2,000 से अधिक वर्षों से इसी काले बेसाल्ट पत्थर को तराश कर कई भव्य मंदिरों, मजबूत किलों और गुफाओं का निर्माण किया है क्योंकि इस पत्थर पर पानी और मौसम की मार का असर बहुत कम होता है। पानी के अंदर डूबे होने के कारण यह पत्थर सीधे सूरज की रोशनी और तापमान के उतार-चढ़ाव से पूरी तरह बचा रहा, जिससे इसकी नक्काशी आज भी वैसी की वैसी ही चमक रही है।

गाद निकालना कैसे बन गया एक ऐतिहासिक उत्खनन

पुरातत्व विभाग के लिए यह काम केवल एक साधारण सफाई अभियान नहीं था, बल्कि यह एक बेहद नियंत्रित और वैज्ञानिक उत्खनन की तरह था। बारिश के हर मौसम में इस तरह के प्राचीन जल निकायों में मिट्टी, रेत और जैविक पदार्थों की एक नई परत जमा होती जाती है, जो समय के साथ ठोस गाद बन जाती है।

ASI के विशेषज्ञों ने बहुत ही धैर्य के साथ कीचड़ की एक-एक परत को हटाया ताकि नीचे छिपी किसी भी प्राचीन कलाकृति को नुकसान न पहुँचे। यह खोज दिखाती है कि बिना किसी बड़ी खुदाई के भी, केवल सही संरक्षण और देखरेख के जरिए हम भारत की समृद्ध और पवित्र सांस्कृतिक विरासत के खोए हुए हिस्सों को कैसे वापस पा सकते हैं।

श्री त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर का गौरवशाली इतिहास

श्री त्र्यंबकेश्वर मंदिर महाराष्ट्र के नासिक शहर से लगभग 28 किलोमीटर की दूरी पर बेहद खूबसूरत ब्रह्मगिरि पहाड़ी की तलहटी में स्थित है। समुद्र तल से लगभग 3,000 फीट की ऊंचाई पर बसी यह जगह बेहद पवित्र मानी जाती है क्योंकि इसी ब्रह्मगिरि पर्वत से दक्षिण की गंगा कही जाने वाली पवित्र गोदावरी नदी का उद्गम होता है।

इस मंदिर का इतिहास बेहद प्राचीन है, लेकिन वर्तमान भव्य मंदिर का निर्माण मराठा साम्राज्य के तीसरे पेशवा बालाजी बाजीराव (जिन्हें नानासाहेब पेशवा भी कहा जाता है) ने साल 1740 से 1760 के बीच एक पुराने मंदिर के स्थान पर ही शुरू करवाया था। इस मंदिर का भव्य उद्घाटन 16 फरवरी 1756 को महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर बकायदा पारंपरिक वाद्य यंत्रों जैसे शहनाई, चौघड़ा, तुतारी और रणसींग के मधुर और ओजस्वी स्वरों के साथ किया गया था।

इतिहास के झरोखों से देखें तो साल 1742 में मराठों ने इस पूरे क्षेत्र को निजाम के नियंत्रण से जीतकर अपने साम्राज्य में मिला लिया था। बाद में साल 1818 में मराठा साम्राज्य के पतन के बाद यह ऐतिहासिक मंदिर ब्रिटिश शासन के अधीन चला गया और आजादी के बाद अब यह भारत सरकार के संरक्षण में है। इस मंदिर का धार्मिक महत्व संत परंपरा से भी बहुत गहरा जुड़ा हुआ है।

महान संत श्री ज्ञानेश्वर महाराज के बड़े भाई और वारकरी संप्रदाय के प्रणेता संत निवृत्तिनाथ ने इसी पावन भूमि त्र्यंबकेश्वर में महज 24 वर्ष की आयु में संजीवन समाधि ली थी। संत निवृत्तिनाथ के कहने पर ही संत ज्ञानेश्वर ने आम जनमानस के कल्याण के लिए प्राकृत भाषा में भगवद्गीता पर अपनी प्रसिद्ध टीका ‘ज्ञानेश्वरी’ लिखी थी। आज भी हर साल संत निवृत्तिनाथ की पुण्यतिथि पर लाखों की संख्या में वारकरी श्रद्धालु इस पावन नगरी में जुटते हैं।

प्रशासनिक इतिहास की बात करें तो साल 1954 में इस पूरे संस्थान को पब्लिक ट्रस्ट रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत पंजीकृत किया गया था। इसके बाद साल 1995 से इस मंदिर के संचालन के लिए एक सुव्यवस्थित ‘बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज’ का गठन किया गया, जिसके अध्यक्ष जिला जज द्वारा नियुक्त माननीय न्यायाधीश होते हैं और त्र्यंबक नगर पालिका के मुख्य कार्यकारी अधिकारी इसके सचिव के रूप में काम करते हैं।

वर्तमान में मंदिर ट्रस्ट द्वारा श्रद्धालुओं के लिए आधुनिक सुविधाओं से लैस भक्त निवास और अन्य बेहतर व्यवस्थाएं संचालित की जा रही हैं। अमृत कुंड से मिले इस नए शिवलिंग ने इस पावन मंदिर के ऐतिहासिक और आध्यात्मिक गौरव को पूरी दुनिया में एक बार फिर से बढ़ा दिया है।

UP में माँ ने PCS अफसर बेटी के खिलाफ दर्ज कराया केस, कहा- मेरे खाते में डाले ‘काली कमाई’ के ₹15 लाख: पढ़ें- FIR की डिटेल्स

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से हैरान करने वाला मामला सामने आया है। हापुड़ में तैनात जिला पूर्ति अधिकारी सीमा चौधरी के खिलाफ उनकी ही माँ ने FIR दर्ज करा दी है। माँ मुनेश रानी ने अपनी बेटी पर धोखाधड़ी, फर्जी दस्तावेज बनवाने, जमीन हड़पने की साजिश और अपने बैंक खाते में कथित काली कमाई के 15 लाख रुपए जमा कराने जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं।

मामला सहारनपुर के सरसावा थाना क्षेत्र के मीरपुर-सीतापुर गाँव का है। 30 जून की शाम करीब 5 बजे मुनेश रानी ने थाने में तहरीर दी। इसके बाद पुलिस ने सीमा चौधरी समेत 5 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया। सीमा चौधरी एलाइड PCS अफसर हैं और फिलहाल हापुड़ में जिला पूर्ति अधिकारी यानी DSO के पद पर तैनात हैं।

FIR में क्या कहा गया है?

मुनेश रानी ने अपनी ही बेटी सीमा चौधरी समेत 5 लोगों के खिलाफ डीआईजी सहारनपुर को शिकायत दी है। FIR में संजीव कुमार चौधरी, राजेंद्र राणा, गंभीर, नरेश कुमार और सीमा चौधरी को आरोपित बनाया गया है। ऑपइंडिया के पास मौजूद FIR कॉपी के मुताबिक, उनकी बेटी सीमा चौधरी और अन्य आरोपित आपस में मिले हुए हैं और उनका एक भूमाफिया गिरोह है, जो उनकी जमीन पर जबरन कब्जा करना चाहता है।

FIR के मुताबिक, मुनेश रानी का आरोप है कि संजीव कुमार और राजेंद्र राणा ने उनके बैंक खाते में बिना बताए 15 लाख रुपए जमा किए। शिकायत के मुताबिक, यह खाता गाजियाबाद के ICICI बैंक में उनकी बेटी सीमा चौधरी ने खुलवाया था और वही खाते को संचालित करती थी। मुनेश रानी ने दावा किया है कि खाता खुलवाने में सीमा चौधरी ने अपनी ईमेल आईडी का इस्तेमाल किया था।

शिकायत में आगे कहा गया है कि सीमा चौधरी अपनी ‘काली कमाई’ मुनेश रानी के बैंक खाते में जमा करती है, जिसकी जानकारी मुनेश रानी को नहीं थी। उन्होंने कहा कि वह खुद न तो इस खाते में पैसा जमा करती हैं और न ही निकालती हैं।

FIR का एक हिस्सा

जमीन से जुड़े आरोप भी गंभीर हैं। FIR के मुताबिक, संजीव कुमार और राजेंद्र राणा ने गंभीर और नरेश कुमार के साथ मिलकर मुनेश रानी की ग्राम मीरपुर सीतापुर स्थित जमीन से जुड़ी एक फर्जी, जाली और फर्जी रसीद तैयार की। यह रसीद 16 सितंबर 2023 की बताई गई है। शिकायत के अनुसार, इस रसीद पर मुनेश रानी के फर्जी हस्ताक्षर किए गए।

मुनेश रानी ने कहा कि जब उन्हें इसका पता चला तो उन्होंने अपने साइन की जाँच मुजफ्फरनगर के हस्तलेख विशेषज्ञ संजय मलिक से कराई। शिकायत के मुताबिक, रिपोर्ट में फर्जी रसीद पर दिखाए गए हस्ताक्षर उनके असली हस्ताक्षरों से अलग पाए गए। मुनेश रानी का आरोप है कि आरोपियों ने धोखाधड़ी से फर्जी रसीद तैयार की और उसे असली दस्तावेज की तरह इस्तेमाल किया। उनके मुताबिक, आरोपित इसी रसीद के आधार पर उनकी जमीन हड़पना चाहते थे।

मुनेश रानी ने आरोप लगाया है कि आरोपित उन्हें डराते-धमकाते हैं। शिकायत के मुताबिक, आरोपितों ने कहा कि अगर उन्होंने विरोध किया तो वे उन्हें जान से मार देंगे। मुनेश रानी का कहना है कि इसी वजह से मजबूर होकर उन्होंने अपनी संपत्ति के दो बैनामे नैन्सी जोशी पत्नी अनुपम जोशी निवासी देहरादून के पक्ष में कर दिए।

शिकायत के अनुसार, उन्होंने इसके बदले पैसे लिए और दोनों बैनामों का दाखिल-खारिज भी हो चुका है और मौके पर कब्जा भी खरीदार का है। मुनेश रानी ने आरोप लगाया कि इसके बाद आरोपित उनसे और ज्यादा रंजिश रखने लगे। FIR के मुताबिक, आरोपित उन्हें खुलेआम धमकी दे रहे हैं कि वे उन्हें जान से मारकर उनकी लाश ऐसी जगह फेंक देंगे, जहाँ किसी को पता नहीं चलेगा।

मामले की जाँच जारी: पुलिस

पुलिस ने मुनेश रानी की तहरीर के आधार पर भारतीय दंड संहिता की धाराओं 420, 467, 468, 471 और 506 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया है। पुलिस के मुताबिक, मामले की निष्पक्ष जाँच की जा रही है और आरोपों की पुष्टि जाँच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी।

डीआईजी अभिषेक सिंह ने बताया कि उनके पास शिकायत आई थी, जिसे उन्होंने एसएसपी को आगे भेज दिया था और जाँच के बाद इस मामले में मुकदमा दर्ज किया गया है।

फिलहाल पूरा मामला जाँच के अधीन है। सीमा चौधरी या अन्य आरोपितों की तरफ से इस मामले पर अभी तक कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। पुलिस का कहना है कि जाँच में जो तथ्य सामने आएँगे, उसी आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

हर विश्व कप एक नया नायक चुनता है: 17 साल के लड़के ने विश्व कप लूट लिया, फिर शुरू हुई कमबैक्स की रात

ग्रुप स्टेज के दौरान आपने मोरक्को के अठारह वर्षीय मिडफील्डर अयूब बोउदादी को ब्राज़ील जैसी सितारों से सजी टीम के सामने बेखौफ़ होकर खेलते देखा था। विश्व कप केवल चैंपियन नहीं चुनता, वह नई किंवदंतियाँ भी गढ़ता है। हर संस्करण किसी नए सितारे को दुनिया के सामने लाता है। इस बार वह नाम है, गिल्बर्टो राफेल मोरा ज़ामब्रानो। बीती सुबह दुनिया ने उस नए नाम को पहचाना- गिल्बर्टो मोरा; यह नाम याद रखिए। आने वाले वर्षों में विश्व फुटबॉल की कई बड़ी कहानियाँ शायद इसी नाम के इर्द-गिर्द लिखी जाएँगी।

महज़ सत्रह वर्ष की आयु में, ‘मेक्सिकन पेड्री’ के नाम से पहचाने जाने वाले गिल्बर्टो मोरा ने उस मंच पर ऐसा प्रदर्शन किया, जहाँ अक्सर अनुभवी खिलाड़ी भी दबाव में बिखर जाते हैं। पेले (1958) के बाद विश्व कप के नॉकआउट मुकाबले में उतरने वाले दूसरे सबसे युवा खिलाड़ी बने मोरा ने यह एहसास ही नहीं होने दिया कि वह मैदान पर सबसे कम उम्र के फुटबॉलर थे। उनके खेल में परिपक्वता थी, आत्मविश्वास था और सबसे बढ़कर वह निर्भीकता थी, जो महान खिलाड़ियों की पहचान होती है।

इक्वाडोर के अनुभवी मिडफील्डरों के बीच गिल्बर्टो ने जिस सहजता से खेल को नियंत्रित किया, उसने हर दर्शक को प्रभावित किया। दो अवसर तैयार किए, पाँच रिकवरीज़ दर्ज कीं और अपने सभी लॉन्ग पास सफलतापूर्वक पूरे किए। आँकड़े केवल उनके प्रदर्शन की कहानी का एक हिस्सा हैं; असली कहानी उस आत्मविश्वास की थी, जिसके साथ उन्होंने पूरे मुकाबले की गति को प्रभावित किया। अंतिम सीटी बजते ही स्टेडियम तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। दर्शक जानते थे कि उन्होंने केवल एक बेहतरीन मैच नहीं देखा था, बल्कि विश्व फुटबॉल के एक संभावित भविष्य का जन्म देखा था।

मेक्सिको के टुक्सत्ला गुटिएरेज़ से निकला यह किशोर अब केवल अपने देश की उम्मीद नहीं रहा। यदि उसका विकास इसी गति से जारी रहा, तो आने वाले वर्षों में वह विश्व फुटबॉल के सबसे प्रभावशाली मिडफील्डरों में गिना जा सकता है।

विश्व कप के पिछले कुछ दिनों ने हमें चौंकाने वाले उलटफेरों का रोमांच दिया है, लेकिन कल रात खेले गए नॉकआउट मुकाबलों ने इस टूर्नामेंट को ऐसे यादगार कमबैक्स दिए, जिनका ज़िक्र आने वाले कई दशकों तक किया जाएगा।

अटलांटा की रात में स्टेडियम इंग्लैंड के समर्थकों से भरा था, लेकिन शुरुआती मिनटों से ही स्पष्ट हो गया कि डीआर कांगो यहाँ केवल भाग लेने नहीं, इतिहास रचने आया है।

अटलांटा में थॉमस टुकेल की इंग्लिश टीम के सामने थी डीआर कांगो- एक ऐसी टीम, जिसने पूरे टूर्नामेंट में अपने अनुशासित और संगठित खेल से बड़े-बड़े प्रतिद्वंद्वियों को परेशान किया था। कोच सेबास्टियन देसाब्रे अपनी स्पष्ट रणनीति के साथ मैदान में उतरे थे। उद्देश्य केवल एक था; किसी भी कीमत पर इंग्लैंड की आक्रमण पंक्ति की धार को कुंद करना, उन्हें गोल से दूर रखना और मुकाबले को जितना संभव हो सके उतना लंबा खींचना।

कोच सेबास्टियन देसाब्रे ने क्वालिफाइंग राउंड में अपनी चार डिफेंडरों वाली पारंपरिक 4-4-2 फॉर्मेशन के विपरीत, इस टूर्नामेंट में पुर्तगाल और कोलंबिया जैसी मजबूत टीमों के खिलाफ 5-3-2 की फॉर्मेशन अपनाई थी। इसी रणनीति के दम पर वह इन दोनों टीमों के विरुद्ध एक-एक अंक जुटाने में सफल रहे थे। लेकिन कल रात उन्होंने एक बार फिर अपनी टीम को 4-4-2 की फॉर्मेशन के साथ मैदान पर उतारा। उनका प्रयास यही था कि किसी भी तरह इंग्लैंड को गोल के लिए तरसाया जाए और मैच को पेनाल्टी शूटआउट तक खींचा जाए।

मगर इंग्लिश कोच थॉमस टुकेल भी क्लब फुटबॉल के एक उच्च स्तरीय कोच माने जाते हैं, जिन्हें अपनी चुस्त रणनीतियों के लिए जाना जाता है। वह चेल्सी के साथ चैंपियंस लीग का खिताब भी जीत चुके हैं। कोच थॉमस टुकेल ने इंग्लैंड की टीम को 4-3-3 की फॉर्मेशन के साथ मैदान पर उतारा। अटैकिंग लाइन में हैरी केन, नोनी मादुएके और मार्कस रैशफोर्ड मौजूद थे। इनके ठीक पीछे स्टार अटैकिंग मिडफील्डर ज्यूड बेलिंघम खेल रहे थे।

रेफरी की व्हिस्ल के साथ मैच का शंखनाद होता है। इंग्लैंड आज फेवरेट था। लेकिन तमाम दर्शकों को चौंकाते हुए डीआर कांगो ब्रायन सिपेंगा के गोल की बदौलत मैच के सातवें मिनट में ही इंग्लैंड पर बढ़त बना लेता है। यह क्या! क्या इस टूर्नामेंट में एक और बड़ा उलटफेर होने जा रहा था?

एक गोल से पिछड़ने के बाद इंग्लैंड लगातार प्रयास करता रहता है कि किसी तरह बराबरी का गोल दागकर मैच में वापसी की जाए, लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा था। वह मिले हुए मौकों को भुना नहीं पा रहे थे। पहला हाफ समाप्त हो जाता है। बढ़त अब भी डीआर कांगो के पास थी। लग रहा था कि आज ‘थ्री लायंस’ का सफर यहीं समाप्त हो जाएगा।

खैर, दूसरे हाफ की शुरुआत होती है। इंग्लैंड को 2016 में आइसलैंड जैसे छोटे राष्ट्र ने उलटफेर करते हुए टूर्नामेंट से बाहर कर दिया था। ऐसा लग रहा था कि आज फिर वैसा ही कुछ होने वाला है। जैसे-जैसे मैच आगे बढ़ रहा था, इंग्लिश टीम काफी दबाव में नज़र आ रही थी। कांगो के गोलकीपर लियोनेल मपासी आज अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ फुटबॉल खेलते दिखाई दे रहे थे। वह लगातार असाधारण सेव किए जा रहे थे। इंग्लिश अटैकिंग तिकड़ी के पास उनका कोई जवाब नहीं था। उनके शानदार बचावों की बदौलत कांगो अब तक मुकाबले में बढ़त बनाए हुए था।

मैच के 61वें मिनट में कोच टुकेल मार्कस रैशफोर्ड को बाहर बुलाते हुए, हाल ही में स्पेनिश क्लब बार्सिलोना से जुड़ने वाले एंथोनी गॉर्डन को मैदान में भेजते हैं। साथ ही बुकायो साका, नोनी मादुएके की जगह लेते हैं। इसके बाद मैच का रुख पूरी तरह बदल जाता है। एकाएक इंग्लैंड बेहद तेज़ गति से आक्रमण करने लगता है।

मैच के 75वें मिनट में आखिरकार वह गोल आ ही जाता है, जिसका स्टेडियम में सफेद जर्सी पहने हजारों दर्शकों को इंतज़ार था। एंथोनी गॉर्डन गेंद को अपने कप्तान की ओर बढ़ाते हैं और हैरी केन क्लोज़ रेंज से शानदार हेडर लगाते हुए स्कोर 1-1 कर देते हैं। बेहद मुश्किलों के बाद अंततः इंग्लैंड की टीम गोलकीपर लियोनेल मपासी के गोलपोस्ट में सेंध लगाने में सफल हो जाती है।

और फिर, महज़ दस मिनट के भीतर, मैच के 86वें मिनट में एक बार फिर एंथोनी गॉर्डन के ही असिस्ट को कप्तान हैरी केन गोल में बदल देते हैं। शुरुआती क्षणों में जो इंग्लिश टीम मैच में पिछड़ रही थी, अब वही बढ़त बना चुकी थी। केवल दस मिनट के भीतर कांगो का यह बेहद हसीन ख़्वाब टूट जाता है। कप्तान हैरी केन के दो गोलों की बदौलत इंग्लैंड शानदार वापसी करते हुए 2-1 के स्कोर से यह मैच जीत लेता है। इस मुकाबले को लियोनेल मपासी के असाधारण सेव्स के लिए भी याद किया जाएगा, जिन्होंने ज्यूड बेलिंघम और हैरी केन को कई मौकों पर बेहतरीन बचाव करते हुए गोल करने से वंचित रखा।

इंग्लैंड आज एक बड़े उलटफेर का शिकार होते-होते रह गया। उनके कप्तान ने आगे बढ़कर जिस अंदाज़ में खेल का रुख मोड़ा, उससे इस टूर्नामेंट में डीआर कांगो की ड्रीम रन का समापन हो गया। डीआर कांगो की टीम आज बहुत अच्छा खेली, मगर इस जीत के साथ इंग्लैंड ने अगले दौर में जगह बना ली, जहाँ उसका सामना होगा मेक्सिको से, वह भी उनके गढ़ एज़्टेका स्टेडियम में। मेक्सिको को उसके गढ़ एज़्टेका स्टेडियम में हराना निश्चित ही टेढ़ी खीर साबित होगा।

इसके बाद, भारतीय समयानुसार रात डेढ़ बजे सिएटल स्टेडियम में बेल्जियम बनाम सेनेगल का मैच खेला गया। तमाम फुटबॉल पंडित इस मुकाबले में रेड डेविल्स को ही फेवरेट मान रहे थे। बेल्जियम की स्टार्टिंग लाइन-अप में केविन डी ब्रुएने के नेतृत्व में लिआंड्रो ट्रोसार्ड और जेरेमी डोकू अटैकिंग जिम्मेदारियाँ निभाने वाले थे। मिडफील्ड में कप्तान यूरी टीलेमांस मौजूद थे और गोलपोस्ट की रक्षा का जिम्मा दुनिया के सर्वश्रेष्ठ गोलकीपरों में शुमार, रियल मैड्रिड के मुख्य गोलकीपर थिबो कूर्तुआ के कंधों पर था। वहीं, अपने स्टार खिलाड़ी सादियो माने के नेतृत्व में सेनेगल 4-3-3 की फॉर्मेशन के साथ मैदान पर उतरा था। सेनेगल पिछले दौर में इराक को 5-0 से रौंदते हुए यहाँ पहुँचा था।

मैच शुरू होता है। दोनों ही टीमें एक-दूसरे के गोलपोस्ट की दिशा में गेंद ले जाने की कोशिश करती नज़र आती हैं। शुरुआती क्षणों में दोनों टीमों के खिलाड़ी गोल करने के प्रयास करते हैं, मगर उन्हें सफलता नहीं मिलती। सेनेगल लगातार बेल्जियम के किले को भेदने के प्रयास करता रहता है।

लेकिन मैच के 24वें मिनट में हबीब दियारा एक शानदार गोल दाग देते हैं। सेनेगल मैच में बढ़त बना लेता है। केविन डी ब्रुएने लगातार कोशिश करते हैं कि उनकी टीम मैच में वापसी करे, लेकिन पहले हाफ की समाप्ति पर सेनेगल 1-0 के स्कोर के साथ बढ़त बनाए हुए था। उसने अब तक बेहद शानदार खेल का प्रदर्शन किया था और पूरी तरह बिना दबाव के खेल रहा था।

दूसरा हाफ शुरू होता है। बेल्जियम के कोच अनुभवी रोमेलू लुकाकू को मैदान में उतारते हैं। अचानक ही एक मौका मिलते ही सेनेगल की टीम गेंद के साथ बेल्जियम के गोलपोस्ट की ओर बढ़ती है। मूसा नियाखाते, इस्माइला सार को गोलपोस्ट के समीप खाली पाते ही गेंद उनकी ओर बढ़ाते हैं। इस्माइला सार तेज़ राइट फुटर के साथ इस पास को गोल में तब्दील कर देते हैं। सेनेगल 2-0 के स्कोर के साथ एक आरामदायक बढ़त बना लेता है।

खेल आगे बढ़ता है। इस बीच मैक्सिम डी क्यूपर, ट्रोसार्ड और केविन डी ब्रुएने लगातार सेनेगली गोलपोस्ट पर सेंध लगाने के प्रयास करते रहते हैं, लेकिन सेनेगल की रक्षापंक्ति पूरी तरह चौकस थी। जैसे-जैसे खेल आगे बढ़ता है, दोनों ही टीमें कुछ बदलाव करती हैं। ऐसा लगने लगा था कि जैसे सेनेगल ने 2002 विश्व कप में तत्कालीन विश्व चैंपियन फ्रांस को ग्रुप स्टेज में चौंकाया था, आज वैसे ही वह 2018 विश्व कप की कांस्य पदक विजेता बेल्जियम को घर का रास्ता दिखा देगा।

80 मिनट का खेल खेला जा चुका था। बेल्जियम 2-0 से पीछे थी। क्योंकि अब केवल दस मिनट का खेल बाकी था, ऐसे में बेल्जियम के कई समर्थक स्टेडियम से बाहर निकलने लगे थे। मगर रेड डेविल्स को उनका यह उपनाम यूँ ही नहीं मिला है।

लेकिन विश्व कप में अंतिम सीटी बजने से पहले कहानी कभी समाप्त नहीं होती। अगले चार मिनट में स्टेडियम ने वह देखा जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।

मैच के 86वें मिनट में थॉमस म्यूनियर से मिले पास को रोमेलू लुकाकू गोल में तब्दील कर देते हैं। स्कोर 2-1 हो जाता है। सेनेगल की टीम कुछ समझ पाती, उससे पहले ही महज़ तीन मिनट के भीतर लिआंड्रो ट्रोसार्ड के क्रॉस को बेल्जियम के कप्तान यूरी टीलेमांस गोलपोस्ट के भीतर पहुँचा देते हैं। स्कोर बराबर हो जाता है।

स्टेडियम में मौजूद दर्शकों को यकीन ही नहीं होता। अभी तीन मिनट पहले तक सेनेगल 2-0 की आरामदायक बढ़त बनाए हुए था और अचानक यह क्या हो गया! कोई कुछ समझ ही नहीं पा रहा था। कुछ ही मिनट पहले तक ऐसा प्रतीत हो रहा था कि सेनेगल अगले दौर में जगह बना चुका है और अब यह मुकाबला एक्स्ट्रा टाइम में जाता दिखाई दे रहा था।

90 मिनट का खेल समाप्त होता है। क्योंकि यह नॉकआउट चरण का मुकाबला था और दोनों टीमें बराबरी पर थीं, इसलिए मैच एक्स्ट्रा टाइम में चला जाता है। सभी की धड़कनें तेज़ हो चुकी थीं। अब कुछ भी हो सकता था।

दोनों ही टीमें एक बार फिर मैदान में उतरती हैं। इस बार दोनों टीमें काफी सतर्कता के साथ आगे बढ़ रही थीं। दर्शकों को अब भी यकीन नहीं हो रहा था कि कुछ मिनटों में मैच की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। खैर, दोनों टीमें सावधानी के साथ खेलते हुए मौका मिलने पर गोल करने का प्रयास भी करती दिखती हैं। 105 मिनट का खेल पूरा हो जाता है। स्कोर अब भी 2-2 ही था।

एक्स्ट्रा टाइम का दूसरा हाफ शुरू होता है। ऐसा लगने लगता है कि मैच का फैसला अब पेनाल्टी शूटआउट से ही निकलेगा। दबाव दोनों ही टीमों पर बराबर बना हुआ था। कोई भी अब हार का दर्द नहीं झेलना चाहता था। 117 मिनट का खेल पूरा हो चुका था। अब केवल तीन मिनट बाद रेफरी मैच समाप्त कर देंगे और फैसला पेनाल्टी शूटआउट से होगा। दोनों टीमों के कोच पेनाल्टी लेने वाले अपने पाँच खिलाड़ियों की सूची तैयार करने में जुट जाते हैं।

लेकिन तभी, 118वें मिनट में बेल्जियम के कप्तान यूरी टीलेमांस को सेनेगल के पेनाल्टी बॉक्स में फाउल कर दिया जाता है। लंबी बहस होती है। रेफरी VAR की सहायता लेते हैं। बेल्जियम को पेनाल्टी मिल जाती है। कप्तान यूरी टीलेमांस पूरे संयम के साथ पेनाल्टी लेने के लिए आगे बढ़ते हैं। शानदार किक के साथ वह गेंद को गोलपोस्ट के भीतर पहुँचा देते हैं। तमाम साथी खिलाड़ी उनसे लिपटने के लिए दौड़ पड़ते हैं। स्टेडियम में लाल जर्सी पहने हजारों दर्शकों की खुशी का ठिकाना नहीं रहता। वहीं, सेनेगल के समर्थकों की आँखें नम हो जाती हैं। मैच के 86वें मिनट तक उनकी टीम 2-0 से आगे थी, लेकिन अब वही टीम टूर्नामेंट से बाहर हो चुकी थी। यह वाकई बेहद क्रूर अंत था। इतना शानदार खेल दिखाने के बावजूद सेनेगल शायद इस तरह टूर्नामेंट से बाहर होने की हकदार नहीं थी। स्टेडियम में मौजूद तमाम समर्थक नम आँखों से सेनेगल के खिलाड़ियों का हौसला बढ़ा रहे थे। यह दृश्य सचमुच बेहद भावुक कर देने वाला था।

यह शायद एक अद्भुत संयोग था कि 2 जुलाई, 2018 को रूस में खेले गए विश्व कप के राउंड ऑफ 16 मुकाबले में जापान के विरुद्ध दूसरे हाफ के शुरुआती पलों में 2-0 से पिछड़ने के बावजूद बेल्जियम ने शानदार वापसी की थी और स्टॉपेज टाइम में गोल दागकर मुकाबला 3-2 से जीत लिया था। आज भी, 2 जुलाई, 2026 को, उन्होंने सेनेगल के खिलाफ मैच के 86वें मिनट तक पिछड़ने के बावजूद शानदार कमबैक करते हुए 3-2 के स्कोर से अपना नॉकआउट मुकाबला जीत लिया।

यह भी शायद संयोग ही था कि दोनों ही मुकाबलों में कमबैक की पटकथा 86वें मिनट में हुए गोल के साथ शुरू हुई। इंग्लैंड की जीत के नायक उनके कप्तान हैरी केन रहे, वहीं बेल्जियम को टूर्नामेंट में जीवित बनाए रखने का काम उनके कप्तान यूरी टीलेमांस ने किया। ऐसा बिल्कुल नहीं था कि उनकी विरोधी टीमों ने अच्छा खेल नहीं दिखाया, लेकिन कठिन परिस्थितियों में भी संयम बनाए रखते हुए दोनों टीमों ने जिस तरह शानदार वापसी की, वह लंबे समय तक याद रखी जाएगी। इन दोनों ही टीमों की जितनी प्रशंसा की जाए, वह कम है।

हालाँकि, ऐसा कुछ जर्मनी के अनुभवी खिलाड़ियों की ओर से देखने को नहीं मिला, जिसके चलते आज उनकी जमकर आलोचना हो रही है। गौरतलब है कि सडन-डेथ के दौरान जब कप्तान जोशुआ किमिख ने अपने अनुभवी साथियों से पेनाल्टी लेने का आग्रह किया, तो कई खिलाड़ियों ने पेनाल्टी लेने से इनकार कर दिया था। ऐसे में आज मैच में पिछड़ने के बावजूद वापसी करते हुए इंग्लैंड और बेल्जियम द्वारा दर्ज की गई ये जीतें और भी बड़ी हो जाती हैं। ये वही मुकाबले हैं, जो नन्हे बच्चों के दिलों में अमिट छाप छोड़ जाते हैं और इस खेल के प्रति उनके मन में आजीवन प्रेम जगा देते हैं।

अगले मैच में, आज सुबह साढ़े पाँच बजे सैन फ्रांसिस्को के स्टेडियम में अपने घरेलू समर्थकों के बीच अमेरिकी टीम का सामना बोस्निया एवं हर्ज़ेगोविना से हुआ। जैसा कि कल चर्चा हुई थी, यहाँ मॉरिसियो पोचेतीनो की अमेरिकी टीम का पलड़ा भारी नज़र आ रहा था। यूएसए ने मैच के दोनों हाफ में एक-एक गोल दागते हुए 2-0 से यह मुकाबला जीत लिया और राउंड ऑफ 16 में जगह बना ली, जहाँ उसका सामना बेल्जियम से होगा। गौरतलब है कि इस मैच में यूएसए का खाता खोलने वाले उनके स्टार सेंटर-फ़ॉरवर्ड फोलारिन बालोगन को मुकाबले के 64वें मिनट में रेफरी ने रेड कार्ड दिखा दिया, जिसके चलते वह अगले दौर के अहम मुकाबले में टीम का हिस्सा नहीं होंगे।

अब नज़रें अगले दो दिनों पर हैं, जहाँ विश्व कप का रोमांच एक बार फिर अपने चरम पर पहुँचने वाला है। फुटबॉल प्रेमियों के लिए कई ऐसे मुकाबले इंतज़ार कर रहे हैं, जो इस टूर्नामेंट की दिशा बदल सकते हैं।

आज रात भारतीय समयानुसार साढ़े बारह बजे लॉस एंजेलिस में स्पेन और ऑस्ट्रिया आमने-सामने होंगे। दोनों टीमें अपनी-अपनी शैली के लिए जानी जाती हैं और ऐसे में यह मुकाबला सामरिक कौशल की एक दिलचस्प परीक्षा साबित हो सकता है।

इसके बाद, कल सुबह साढ़े चार बजे टोरंटो में विश्व फुटबॉल की दो पारंपरिक ताकतों के बीच एक और बड़ा मुकाबला खेला जाएगा, जहाँ पुर्तगाल का सामना क्रोएशिया से होगा। कागज़ पर पलड़ा भले ही पुर्तगाल का भारी दिखाई देता हो, लेकिन नॉकआउट फुटबॉल में इतिहास बार-बार यह साबित कर चुका है कि एक छोटी-सी चूक भी पूरे अभियान का अंत कर सकती है।

यह मुकाबला पुर्तगाल के लिए केवल अगले दौर में पहुँचने की चुनौती नहीं होगा। ठीक एक वर्ष पहले इसी दिन उन्होंने अपने प्रिय साथी और स्टार फ़ॉरवर्ड डियोगो जोटा को एक दुखद कार दुर्घटना में खो दिया था। ऐसे में यह मानना कठिन नहीं कि जब पुर्तगाली खिलाड़ी मैदान पर उतरेंगे, तो उनके मन में केवल जीत का लक्ष्य ही नहीं, बल्कि अपने दिवंगत साथी की स्मृतियाँ भी होंगी। यदि पुर्तगाल विजयी होता है, तो वह जीत निश्चित ही जोटा को समर्पित सबसे भावनात्मक श्रद्धांजलियों में से एक होगी। विश्व कप अक्सर केवल ट्रॉफियाँ नहीं, भावनाएँ भी समेटे होता है। यह मुकाबला भी शायद उन्हीं दुर्लभ क्षणों में से एक बन सकता है।

इसके बाद भी रोमांच थमने वाला नहीं है। कल रात स्विट्ज़रलैंड का सामना अल्जीरिया से होगा, जबकि डलास में मिस्र के ‘फ़राओज़’ ऑस्ट्रेलिया की चुनौती का सामना करेंगे। चारों टीमें अगले दौर में जगह बनाने के लिए अपना सर्वस्व झोंक देंगी और यही विश्व कप की सबसे बड़ी खूबसूरती है- यहाँ हर नब्बे मिनट एक नई कहानी लिख सकते हैं।

विश्व कप अपने निर्णायक मोड़ पर पहुँच चुका है। अब हर मैच इतिहास लिख सकता है, हर गोल किसी देश का सपना बचा सकता है और हर रात किसी नए नायक को जन्म दे सकती है। यही कारण है कि फीफा विश्व कप केवल एक टूर्नामेंट नहीं, बल्कि दुनिया का सबसे महान खेल उत्सव कहलाता है।

बने रहिएगा साथ। ऑपइंडिया पर फीफा विश्व कप की हर बड़ी कहानी, हर ऐतिहासिक मुकाबला और हर यादगार पल आपके लिए इसी तरह लेकर आते रहेंगे।

‘द गार्जियन’ का लेख हो या कॉकरोचों की आवाज… सबका मकसद एक: जानिए कैसे CJP प्रदर्शन में पीछे छूटा NEET का मुद्दा, उमर खालिद की रिहाई बनी प्राथमिकता

‘द गार्जियन’ ने 30 जून 2026 को उमर खालिद पर एक भावनात्मक लेख प्रकाशित किया, जिसमें 2020 के हिन्दू विरोधी दिल्ली दंगों के साजिशकर्ता को भारत का सबसे प्रमुख ‘राजनीतिक कैदी’ बताते हुए असहमति की वजह से सरकारी कार्रवाई का शिकार बताया गया। जेल और बाहर निकलने की धूमिल होती उम्मीद के बीच इस लेख में कही भी दिल्ली दंगों को लेकर उस पर लगे आरोपों की पड़ताल नहीं की गई ।

इस लेख की पड़ताल न केवल इसमें कही गई बातों के लिए, बल्कि इसमें जानबूझकर छोड़ी गई बातों के लिए भी किया जाना चाहिए। यह प्रकाशन कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) द्वारा उमर खालिद को दिए गए समर्थन के बीच आया है। ये वही पार्टी है, जिसका विरोध प्रदर्शन नीट पेपर लीक और युवाओं के मुद्दों को लेकर शुरू हुआ था। हालाँकि प्रदर्शनकारियों और सीजेपी समर्थकों ने ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से उमर खालिद की रिहाई की माँग की है।

उमर खालिद के बारे में ‘द गार्जियन’ ने क्या कहा

‘द गार्जियन’ में प्रकाशित लेख का शीर्षक ‘मानवता एक विशेषाधिकार : उमर खालिद का बिना मुकदमे के भारतीय जेल में छह साल का सफर’ है। भारत विरोधी प्रचार के लिए मशहूर दिल्ली संवाददाता हन्ना एलिस-पीटरसन ने यह लेख लिया है। लेख में उन्होंने खालिद को एक वामपंथी मानवाधिकार कार्यकर्ता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुखर आलोचक के रूप में उल्लेख किया है। उन्होंने दावा किया कि वह सरकार के विरोधियों के खिलाफ न्यायिक प्रणाली के कथित दुरुपयोग का प्रतीक बन गए हैं।

(साभार- द गार्जियन)

लेखक ने उमर खालिद की मानसिक और शारीरिक पीड़ा का जिक्र किया, उनके अनुभव की तुलना फ्योदोर दोस्तोवस्की के कारागार संस्मरण से की और भगत सिंह के उस कथन के साथ अपनी बात समाप्त की जो उनकी कोठरी की दीवार पर लिखा था। खालिद से हिंदू राष्ट्रवाद, मुसलमानों की स्थिति जैसे मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की।

हालाँकि, प्रकाशन ने खुद स्वीकार किया कि उसने खालिद के कानूनी मामले पर चर्चा न करने पर सहमति जताई थी। प्रकाशन ने खालिद का सीधा साक्षात्कार भी नहीं लिया, बल्कि प्रश्न और उत्तर उनके रिश्तेदारों और दोस्तों के माध्यम से ही भेजे गए।

‘द गार्जियन’ के लेख में दिल्ली में हिन्दू विरोध दंगों की एक बड़ी साजिश के आरोप को कुछ ही वाक्यों में समेट दिया गया, जबकि हिंसा के समय उत्तर-पूर्वी दिल्ली में उसकी गैरमौजूदगी को प्रमुखता से बताया गया, मानो साजिश करने के लिए घटनास्थल पर होना आवश्यक हो।

जाहिर है द गार्जियन की इस रिपोर्ट ने देश के राजनीतिक और वैचारिक माहौल में गर्मी पैदा कर दी। कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर ने इसे ‘भावुक करने वाला लेख’ बताया और पूछा कि अदालत में ये आरोप साबित क्यों नहीं हुए।

इतिहासकार होने का ढोंग करने वाली प्रचारक रुचिका शर्मा ने कहा कि भारत की ‘सामूहिक चेतना’ मर चुकी है, जबकि द गार्जियन के लिए लिखने वाले कौशिक राज ने दावा किया कि दुनिया खालिद के खिलाफ ‘अन्याय’ पर ध्यान दे रही है।

सीजेपी के संस्थापक और प्रवक्ताओं ने खुले तौर पर खालिद का समर्थन किया

खालिद को मिलने वाला समर्थन केवल कुछ गिने-चुने सीजेपी अनुयायियों तक ही सीमित नहीं था। यह समर्थन संगठन के संस्थापक और दूसरे बड़े चेहरों का भी था।

इस साल की शुरुआत में, सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने सवाल उठाया था कि खालिद को बिना मुकदमे के जेल में क्यों रखा गया है और दावा किया था कि उसके साथ अलग तरह से व्यवहार किया जा रहा है।

समदिश भाटिया के साथ हाल ही में हुए एक साक्षात्कार में , ‘अनफिल्टर्ड बाय समदिश’ कार्यक्रम में, दिपके ने दावा किया कि उन्होंने अपने आंदोलन को शांतिपूर्ण, संविधान-केंद्रित और ‘बदनाम से बचा कर’ रखा है। हालाँकि उन्होंने कहा कि उनका उपनाम खालिद नहीं है, अगर वह खालिद, सैफी या मुस्लिम होते, तो जेल में होते।

ऐसा कह कर दिपके ने यह संकेत देने की कोशिश की कि उमर खालिद जैसे तथाकथित मुस्लिम ‘कार्यकर्ताओं’ को उनकी धार्मिक पहचान के कारण जेल में डाला गया और उनके खिलाफ लगे गंभीर आपराधिक और षड्यंत्र के आरोपों को जानबूझकर अनदेखा किया गया। कार्यक्रम में जबरदस्ती खालिद की चर्चा करना अजीब था, लेकिन इससे यह स्पष्ट हो गया कि वे वास्तव में क्या करने की कोशिश कर रहे थे।

प्रवक्ता सौरभ दास ने इससे भी आगे बढ़कर खालिद के खिलाफ लगे आरोपों को ‘झूठा’ और ‘मनगढंत’ बताया और उसकी कैद को भारत की न्यायपालिका पर एक कलंक करार दिया।

मुख्य न्यायिक परिषद की प्रवक्ता विजेता दहिया ने खालिद के खिलाफ मामले को महात्मा गाँधी के उद्धरण वाले भाषण और व्हाट्सएप ग्रुप में उनकी मौजूदगी तक सीमित करने की कोशिश की। जब उनसे दिल्ली दंगों में मारे गए 50 से अधिक लोगों और बड़े षड्यंत्र के मामले के बारे में सवाल किया गया, तो दहिया ने यह कहकर मामला टाल दिया कि कोई मुकदमा नहीं चला है और सवाल पूछने वाले पत्रकार पर ‘गोदी मीडिया’ होने का आरोप लगाया।

इस दौरान ये दलील दी गई कि मुकदमा चलने दो, दोषी पाए जाने पर उसे सजा दो और निर्दोष पाए जाने पर उसे रिहा कर दो। लेकिन बार बार दोषसिद्धि न होने पर आरोपों को झूठा करार दिया गया। साथ ही अदालती कार्यवाही को जल्द से जल्द खत्म करने की माँग की गई।

उमर खालिद की कानूनी कार्यवाही का इतिहास ‘छह साल बिना मुकदमे के’ नारे से कहीं अधिक जटिल रहा है। उनकी जमानत याचिकाएँ लगातार खारिज होती रही हैं। 24 मार्च 2022 में ट्रायल कोर्ट, 18 अक्टूबर 2022 में दिल्ली हाईकोर्ट, 5 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट में दायर अर्जी खारिज की गई। इसके अलावा 16 अप्रैल 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने उनकी पुनर्विचार याचिका खारिज की। 19 मई 2026 को दिल्ली की एक अदालत ने उनकी अंतरिम जमानत याचिका भी नामंजूर कर दी थी।

(उमर खालिद की तीसरी जमानत याचिका)

सुप्रीम कोर्ट ने अर्जी खारिज करते हुए दोहराया था कि इस मामले में कई आरोपित शामिल हैं, भारी मात्रा में दस्तावेजी और इलेक्ट्रॉनिक सबूत मौजूद हैं और आरोप एक सुनियोजित और निरंतर साजिश से संबंधित हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड से यह साबित नहीं होता कि उमर खालिद और अन्य आरोपी केवल अभियोजन में देरी के कारण जेल में हैं या उन्होंने इस देरी में कोई भूमिका नहीं निभाई है।

हालाँकि व्यापक संदर्भ में बात की जाए तो लंबे वक्त तक हिरासत पर बहस जायज है, लेकिन उमर खालिद के मामले में मुकदमे में देरी न्याय व्यवस्था की वजह से नहीं, बल्कि खुद आरोपितों की वजह से हुई। उमर खालिद और इस बड़े षड्यंत्र मामले के दूसरे आरोपितों ने मुकदमे में देरी करने के लिए हर संभव हथकंडा अपनाया और फिर इस देरी को जमानत माँगने का बहाना बनाया। बार-बार जमानत की अर्जी देने से लेकर मुकदमे की शुरुआत को रोकने की अर्जी देने तक, इस बात के पर्याप्त सबूत थे कि मुकदमे में छह साल की देरी के लिए भारत की न्याय व्यवस्था जिम्मेदार नहीं है।

सीजेपी के प्रदर्शनकारियों ने उमर खालिद को अपना नेता बताया

6 जून को जंतर-मंतर पर हुए सीजेपी के विरोध प्रदर्शन में भी खालिद का समर्थन स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। एक प्रदर्शनकारी को यह कहते हुए दिखाया गया कि उमर खालिद हमारे नेता हैं। एक अन्य ने कहा कि वह खालिद का समर्थन करता है और इसमें उसे कोई बुराई नहीं दिखती। सीजेपी के एक समर्थक ने खालिद और शरजील इमाम को देश के सर्वोच्च राजनीतिक पदों के संभावित भावी पदाधिकारी भी बताया।

जब एक महिला ने खालिद के बारे में एक बुजुर्ग समर्थक से सवाल किया, तो उसने आरोपों का जवाब देने के बजाय अभद्र और अपमानजनक टिप्पणी की। हालाँकि प्रदर्शनकारी फैजान अंसारी ने खालिद का समर्थन करने वाले सीजेपी सदस्यों की आलोचना की, जिससे पता चलता है कि यह मुद्दा प्रदर्शनों में मौजूद लोगों के बीच भी विवाद का विषय बन गया था।

फिर भी समर्थन की बार-बार की गई घोषणाएँ संगठन के उद्देश्य को दर्शाती हैं। इसके नेता- प्रवक्ता और सीजेपी के डिस्कोर्ड समुदाय के सदस्य जिस भाषा का इस्तेमाल कर रहे थे, उससे खालिद के प्रति उनका स्टेंड काफी साफ झलक रहा था।

उमर खालिद को रिहा करने की माँग के बाद सीजेपी के डिस्कोर्ड चैनल पर मैसेज की भरमार हो गई। रिपोर्ट के मुताबिक, लॉन्च होने के कुछ ही दिनों में 20,000 से अधिक सदस्य जुटा चुके CJP के डिस्कोर्ड चैनल ने आंदोलन के कुछ हिस्सों की वैचारिक दिशा की स्पष्ट तस्वीर पेश की। OpIndia की जाँच में खालिद के समर्थन में एक बेहद चिंताजनक प्रवृत्ति का खुलासा हुआ।

जब एक यूजर ने खालिद का समर्थन करने के लिए दिपके की आलोचना की, तो दूसरे सदस्य ने कहा कि खालिद के लिए दिपके का समर्थन ही वह कारण है जिसके चलते अब वह दिपके और सीजेपी दोनों का पूरी तरह से समर्थन करेगा। यूजर ने खालिद की कैद को मानवाधिकारों का उल्लंघन बताया।

ऐसे ही एक चर्चा में संगठन के एक सदस्य ने कहा, “उमर खालिद वही हैं जिनकी इस देश में हमें जरूरत है। इसीलिए तो मुख्य न्यायिक समिति (सीजेपी) का गठन हुआ है।” चैनल पर ‘उमर खालिद को रिहा करो’ के कई संदेश दिखाई दिए। खालिद को ‘क्रांतिकारी’ बताया गया, जबकि उन्हें और दिपके को ‘स्वतंत्रता सेनानी’ कहा गया। एक यूजर ने दिपके को भारत की प्रधानमंत्री और खालिद को रक्षा मंत्री बनाने की बात भी की।

कुछ लोगों ने खालिद के खिलाफ आरोपों को निराधार बताया, न्यायपालिका के भ्रष्ट होने का दावा किया और तर्क दिया कि उसे उसके धर्म के कारण आतंकवादी करार दिया गया है। एक यूजर ने तर्क दिया कि खालिद आतंकवादी नहीं हो सकता क्योंकि कई वर्षों बाद भी आरोप साबित नहीं हुआ है।

जब व्यापक षड्यंत्र के मामले पर सवाल उठे, तो चर्चा अक्सर सबूतों के आधार पर नहीं, बल्कि भावनाओं से होने लगती है। खालिद को एक छात्र, विद्वान, राजनीतिक कार्यकर्ता, पीड़ित, क्रांतिकारी और प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में उल्लेख किया गया। पुलिस, मीडिया और न्यायपालिका को उसके खिलाफ बताया गया। यह मामले की जाँच नहीं थी, बल्कि यह जाँच को ही अनैतिक दिखाने का एक तरीका था।

उमर खालिद कौन है और दिल्ली दंगों की साजिश में उसकी क्या भूमिका है?

कोर्ट में उमर खालिद के खिलाफ जो केस हैं, उसमें उसे ऐसे दंगाई के रूप में पेश नहीं किया गया है जिसने व्यक्तिगत रूप से पत्थर फेंके हों या संपत्ति में आग लगाई हो, बल्कि उस पर फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों की साजिश रचने, वैचारिक तौर पर संचालन करने और सबका समन्वय करने का आरोप है।

इसलिए बार-बार यह तर्क देना कि खालिद हिंसा के दौरान उत्तर-पूर्वी दिल्ली में शारीरिक रूप से मौजूद नहीं था, अपने आप में उसके खिलाफ लगे आरोपों का जवाब नहीं देता। किसी साजिश के मामले में, अभियोजन पक्ष को कथित योजना में भागीदारी साबित करनी होती है, न कि उस योजना को अंजाम दिए जाने वाले हर स्थान पर शारीरिक तौर पर मौजूदगी।

अभियोजन पक्ष ने खालिद के 20 फरवरी 2020 को अमरावती में दिए गए भाषण का हवाला दिया, जिसमें उन्होंने 24 फरवरी का जिक्र किया था, जिस दिन तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का भारत दौरा निर्धारित था। भाषण के चार दिन बाद दंगे शुरू हुए।

उसका नाम एफआईआर 59, एफआईआर 114 और व्यापक साजिश से जुड़ी आरोपपत्रों में दर्ज था। अभियोजन पक्ष ने 8 जनवरी को शाहीन बाग में हुई बैठक, उमर खालिद और ताहिर हुसैन के बीच कथित कड़ी के रूप में खालिद सैफी की भूमिका, नागरिकता संशोधन अधिनियम और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर पर ‘बड़ी कार्रवाई’ करने की चर्चा, कथित वित्तीय सहायता और रसद संबंधी सहायता, व्हाट्सएप समूह, पर्चे, भाषण, बैठकें, डिजिटल साक्ष्य और गवाहों के बयानों का हवाला दिया।

अभियोजन पक्ष ने दंगों के बाद कार्यकर्ताओं, मशहूर हस्तियों, पत्रकारों और मीडिया जगत की हस्तियों के साथ हुई बातचीत का हवाला देते हुए यह तर्क दिया कि हिंसा के बाद एक मनगढंत कहानी गढ़ने का प्रयास किया गया था।

खालिद को एक नेता के रूप में प्रस्तुत करने और उसके अतीत को छिपाने के लिए एक सुनियोजित अभियान चलाया गया।
‘द गार्जियन’ की रिपोर्ट और सीजेपी के अभियान ने एक ही तरह की रणनीति अपनाई। सबसे पहले आरोपों को उनके संदर्भ से अलग कर दिया गया। साजिश, गुप्त बैठक, आर्थिक मदद, समन्वय और लामबंदी के कार्यों को ‘एक भाषण’ और ‘एक व्हाट्सएप ग्रुप’ बोलकर हल्का करने की कोशिश की गई।

लेख में सारा ध्यान खालिद की पहचान और उसके कष्टों पर केंद्रित हो गया। जेल में बिताए उसके वर्षों को उत्पीड़न का प्रमाण माना गया, जबकि मामले से जुड़े सवालों को अमानवीय हमलों के रूप में प्रस्तुत किया गया।

तीसरा हर उस संस्था को अमान्य घोषित कर दिया गया जिसने पसंदीदा कहानी का समर्थन नहीं किया। पुलिस पर मनगढ़ंत बातें गढ़ने का आरोप लगाया गया, न्यायपालिका को भ्रष्ट बताया गया और असुविधाजनक सवाल उठाने वाले पत्रकारों को ‘गोदी मीडिया’ कहकर खारिज कर दिया गया।

अंततः खालिद जमानत की गुहार लगाने वाला एक आरोपी से एक क्रांतिकारी, स्वतंत्रता सेनानी, राष्ट्रीय नेता और यहाँ तक ​​कि देश का एक भावी मंत्री के तौर पर दिखाने की कोशिश की गई।

इसका उद्देश्य केवल यह तर्क देना नहीं था कि एक कैदी समय पर सुनवाई का हकदार है। बल्कि इसका उद्देश्य कानूनी राहत की माँग करने वाले आरोपी और एक राजनीतिक हस्ती के बारे में बताना था जो ‘निर्दोष’ है। उसने यह नहीं देखा कि दोषमुक्त साबित अभी नहीं हुआ है बल्कि गंभीर मामले में आरोपित है।

सीजेपी और खालिद के लिए चलाए जा रहे अभियान के बीच संबंध

सीजेपी ने 6 जून को जंतर-मंतर पर अपना पहला विरोध प्रदर्शन किया। खालिद की तीसरी जमानत याचिका भी जून की शुरुआत में ही दायर की गई थी, जिसके समर्थन में दिए गए हलफनामे पर 5 जून की मुहर लगी थी। याचिका में लंबी कैद और सुप्रीम कोर्ट के हालिया घटनाक्रमों के आधार पर नियमित या अंतरिम जमानत की माँग की गई थी।

विरोध प्रदर्शन में सीजेपी समर्थकों ने सार्वजनिक रूप से खालिद को अपना नेता बताया। डिस्कॉर्ड पर सदस्यों ने उनकी रिहाई की माँग की और उन्हें देश की जरूरत के हिसाब से ‘सही व्यक्ति’ बताया। संस्थापक और प्रवक्ताओं ने भी इसी व्यापक दृष्टिकोण का समर्थन किया था। कुछ हफ्तों बाद ‘द गार्जियन’ ने इस तर्क का अंतर्राष्ट्रीय मानवीय दृष्टिकोण प्रस्तुत किया और कॉन्ग्रेस- वामपंथी टिप्पणीकारों ने इसे और भी बल दिया।

सीजेपी खुद को उन युवाओं के लिए एक मंच के रूप में प्रस्तुत करती है जो नीट परीक्षा, परीक्षाओं, बेरोजगारी और राजनीतिक व्यवस्था से निराश हैं। ये मुद्दे इसे एक व्यापक और भावनात्मक रूप से प्रेरित भर्ती आधार प्रदान करते हैं। फिर भी इसके नेताओं के बयानों, विरोध प्रदर्शनों और ऑनलाइन मंचों में उमर खालिद को बार-बार पीड़ित, नायक और भावी नेता के रूप में पेश किया जाता है।

इससे एक गंभीर सवाल उठता है कि क्या NEET इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य है या फिर यह व्यापक वैचारिक लामबंदी के लिए महज एक ‘मुखौटा’ है।

भारतीय न्याय व्यवस्था के तहत हर आरोपित को जमानत माँगने, शीघ्र सुनवाई की माँग करने और अपने खिलाफ लगे हर आरोप का खंडन करने का अधिकार है। अभियोजन पक्ष द्वारा अपना मामला साबित किया गया है या नहीं, यह निर्धारित करना न्यायपालिका का कर्तव्य है। हालाँकि कानूनी बचाव का अधिकार और आरोपों को सार्वजनिक चर्चा से मिटाने का अधिकार एक समान नहीं हैं। न ही लंबे समय तक कारावास में रहने पर कोई निर्दोष साबित हो जाता है।

‘द गार्जियन’ में उमर खालिद का जेल संस्मरण, सीजेपी नेताओं के सार्वजनिक बयान, विरोध स्थल पर की गई घोषणाएँ, डिस्कॉर्ड अभियान और राजनीतिक प्रचार, ये सभी एक ही दिशा में आगे बढ़ते हैं।

पिछले छह वर्षों में उमर खालिद को एक नायक, एक उभरते नेता और भारत सरकार द्वारा सताए गए व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया है। दिल्ली दंगों में उसकी भूमिका और अफजल गुरु जैसे आतंकवादियों के बारे में उनके विचारों को द गार्जियन जैसे हर लेख के साथ धीरे-धीरे दबा दिया जा रहा है। मुकदमे में जानबूझकर की गई देरी ने इस तथाकथित ‘छात्र नेता’ को राजनीतिक क्षेत्र में एक प्रमुख व्यक्ति बनने का आसान रास्ता प्रदान कर दिया है।