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उर्दू चलेगी, पर हिंदी नहीं… सुप्रीम कोर्ट वाले मी लॉर्ड हम क्या कहें आप खुद बुधियार हैं, फिर भारत की भाषाओं को स्वीकार करने में परेशानी क्या

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (15 अप्रैल 2025) को महाराष्ट्र में एक नगरपालिका के साइनबोर्ड में उर्दू के इस्तेमाल को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया। उर्दू को गंगा-जमुनी या हिंदुस्तानी तहजीब का सबसे अच्छा नमूना बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भाषा एक संस्कृति है और इसे लोगों को विभाजित करने का कारण नहीं बनना चाहिए। वहीं, शीर्ष न्यायालय ने अदालती कार्यवाही में अंग्रेजी को आधिकारिक भाषा बताया है।

महाराष्ट्र के मामले में दरअसल बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। बॉम्बे हाई कोर्ट ने अकोला जिले के पातुर स्थित नगर परिषद की नई इमारत के साइनबोर्ड पर उर्दू के इस्तेमाल की अनुमति दी थी। इस याचिका को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने खारिज कर दिया।

बेंच ने कहा कि किसी अतिरिक्त भाषा का प्रदर्शन महाराष्ट्र स्थानीय प्राधिकरण (राजभाषा) अधिनियम 2022 का उल्लंघन नहीं है। इस अधिनियम में उर्दू के उपयोग पर भी कोई प्रतिबंध नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि साइनबोर्ड पर उर्दू के प्रयोग का उद्देश्य सिर्फ ‘प्रभावी संचार’ है। इसलिए भाषा की विविधता का सम्मान किया जाना चाहिए।

न्यायमूर्ति धूलिया ने अपने आदेश में कहा, ” नगर परिषद का काम क्षेत्र के स्थानीय समुदाय को सेवाएँ प्रदान करना और उनकी रोज़मर्रा की ज़रूरतों को पूरा करना है। अगर नगर परिषद के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र में रहने वाले लोग या लोगों का समूह उर्दू से परिचित हैं तो कम से कम नगर परिषद के साइनबोर्ड पर आधिकारिक भाषा यानी मराठी के अलावा उर्दू का इस्तेमाल करने पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।”

न्यायाधीश धूलिया ने कहा, ठभाषा विचारों के आदान-प्रदान का एक माध्यम है, जो अलग-अलग विचारों और मान्यताओं वाले लोगों को करीब लाती है। यह उनके बीच विभाजन का कारण नहीं बननी चाहिए।आइए हम उर्दू और हर भाषा से दोस्ती करें। उर्दू भारत के लिए विदेशी नहीं है। इसका जन्म भारत में हुआ और यहीं इसका विकास हुआ है।”

कोर्ट ने कहा, “उर्दू के खिलाफ पूर्वाग्रह इस गलत धारणा से उपजा है कि उर्दू भारत के लिए विदेशी है। यह राय गलत है, क्योंकि मराठी और हिंदी की तरह उर्दू भी एक इंडो-आर्यन भाषा है। यह एक ऐसी भाषा है, जिसका जन्म इसी देश में हुआ है। उर्दू भारत में अलग-अलग सांस्कृतिक परिवेश से जुड़े लोगों की ज़रूरत के कारण विकसित और फली-फूली।”

शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि देश के आम लोगों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली भाषा उर्दू भाषा के शब्दों से भरी पड़ी है, भले ही किसी को इसकी जानकारी न हो। कोर्ट ने कहा, “हिंदी में रोज़मर्रा की बातचीत उर्दू के शब्दों या उर्दू से निकले शब्दों का इस्तेमाल किए बिना नहीं हो सकती। ‘हिंदी’ शब्द खुद फ़ारसी शब्द ‘हिंदवी’ से आया है!”

कोर्ट ने कहा कि शब्दावली का आदान-प्रदान दोनों तरफ़ होता है, क्योंकि उर्दू में संस्कृत समेत कई अन्य भारतीय भाषाओं से भी कई शब्द उधार लिए गए हैं। कोर्ट ने कहा, “भाषा धर्म नहीं है। भाषा धर्म का प्रतिनिधित्व भी नहीं करती। भाषा किसी समुदाय, क्षेत्र, लोगों की होती है किसी धर्म की नहीं। भाषा संस्कृति है। भाषा किसी समुदाय और उसके लोगों की सभ्यता की यात्रा को मापने का पैमाना है।”

शीर्ष न्यायालय ने आगे कहा, “उर्दू का मामला भी ऐसा ही है, जो गंगा-जमुनी तहजीब या हिंदुस्तानी तहजीब का बेहतरीन नमूना है। उत्तरी और मध्य भारत के मैदानी इलाकों की मिश्रित सांस्कृतिक प्रकृति है। हालाँकि, भाषा सीखने का साधन बनने से पहले, इसका सबसे पहला और प्राथमिक उद्देश्य हमेशा संचार ही रहेगा।”

न्यायालय ने कहा, “जब हम उर्दू की आलोचना करते हैं तो हम एक तरह से हिंदी की भी आलोचना कर रहे होते हैं, क्योंकि भाषाविदों और साहित्यिक विद्वानों के अनुसार उर्दू और हिंदी दो भाषाएँ नहीं, बल्कि एक ही भाषा हैं। हिंदी और उर्दू के बीच दोनों तरफ़ से कट्टरपंथियों द्वारा एक बाधा उत्पन्न हुई और हिंदी ज़्यादा संस्कृतनिष्ठ और उर्दू ज़्यादा फ़ारसी बन गई।”

कोर्ट ने आगे कहा कि औपनिवेशिक शक्तियों ने धर्म के आधार पर दोनों भाषाओं को विभाजित करके इस विभाजन का फ़ायदा उठाया। अब हिंदी को हिंदुओं की भाषा और उर्दू को मुस्लिमों की भाषा समझा जाने लगा। कोर्ट ने कहा कि वास्तविकता में विविधता में एकता और सार्वभौमिक भाईचारे की अवधारणा से अलग करने का यह प्रयास है।

अदालत ने यह भी बताया कि उर्दू किस तरह से अदालती कार्यवाही में भी प्रयोग होता है। इसको लेकर उच्चतम न्यायालय ने कहा, “उर्दू शब्दों का न्यायालय की भाषा पर बहुत प्रभाव है, चाहे वह फौजदारी हो या दीवानी कानून। अदालत से लेकर हलफ़नामा और पेशी तक, भारतीय न्यायालयों की भाषा में उर्दू का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।”

अदालती कार्यवाही में अंग्रेजी के इस्तेमाल को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की। उसने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 348 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों की आधिकारिक भाषा अंग्रेज़ी है, लेकिन आज भी इस न्यायालय में कई उर्दू शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है। इनमें वकालतनामा, दस्ती आदि शामिल हैं।

अदालती कार्यवाही की भाषा अंग्रेजी: सुप्रीम कोर्ट

वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कह दिया कि अदालती कार्यवाही की भाषा हिंदी नहीं, बल्कि अंग्रेजी है। यह बात सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2024 में कही थी। इसके पहले मार्च 2023 में तत्कालीन कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट की अदालती कार्यवाही में क्षेत्रीय भाषाओं के इस्तेमाल करने पर सहमति नहीं दी थी।

दरअसल, पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिकाकर्ता द्वारा हिंदी में दलील पेश करने पर आपत्ति जताई थी। शीर्ष न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया था कि अदालत की आधिकारिक भाषा अंग्रेजी है। जस्टिस ऋषिकेश रॉय और जस्टिस एसवीएन भट्टी की पीठ इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक आदेश के खिलाफ दायर एक विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई कर रही थी।

सुनवाई के दौरान जस्टिस रॉय ने कहा, “यह अदालत अपनी कार्यवाही अंग्रेजी में करती है। आपने व्यक्तिगत रूप से पेश किया, और हमने आपको अपनी बात पूरी तरह से कहने के लिए बाधित नहीं किया। दो जज मौजूद हैं। आप यह सुनिश्चित किए बिना हिंदी में दलीलें पेश नहीं कर सकते कि अदालत आपकी बात को समझती है।” इसके बाद, याचिकाकर्ता ने अंग्रेजी में अपनी दलीलें पेश की।

यह पहली बार नहीं है, जब सुप्रीम कोर्ट में भाषा को लेकर रोक लगाई। साल 2022 में एक याचिकाकर्ता ने हिंदी में दलीलें पेश करने का प्रयास किया तो जस्टिस केएम जोसेफ और हृषिकेश रॉय ने उन्हें याद दिलाया था कि सुप्रीम कोर्ट की भाषा अंग्रेजी है। उस मामले में याचिकाकर्ता को उचित भाषा में अपनी दलीलें पेश करने में सहायता करने के लिए एक वकील नियुक्त किया गया था।

मार्च 2023 में तत्कालीन केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु, गुजरात, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और कर्नाटक की सरकारों के उन प्रस्तावों को स्वीकार नहीं किया, जिनमें इन राज्यों के हाई कोर्ट की कार्यवाही में तमिल, गुजराती, हिंदी, बंगाली और कन्नड़ के इस्तेमाल की अनुमति देने की बात कही गई है।

दरअसल, रिजिजू ने यह बात लोकसभा में विल्लुपुरम के सांसद डी रविकुमार के प्रश्न के लिखित उत्तर में दिया था। उन्होंने कहा था, “इन प्रस्तावों पर भारत के मुख्य न्यायाधीश की सलाह माँगी गई थी और यह बताया गया कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्ण न्यायालय ने उचित विचार-विमर्श के बाद फैसले को अस्वीकार कर दिया।”

रिजिजू ने बताया था कि केंद्र सरकार आदेशों और अन्य कानूनी सामग्री का क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद करके कानूनी मामलों को आम नागरिकों के समझने योग्य बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि कानून और न्याय मंत्रालय के तहत बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे की अध्यक्षता में ‘भारतीय भाषा समिति’ का गठन किया है।

कोर्ट की भाषा को लेकर क्या कहता है संविधान

भारत के संविधान में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में कार्यवाही की भाषा का जिक्र है। संविधान के अनुच्छेद 348 के तहत, संसद द्वारा कोई दूसरा प्रावधान किए जाने तक सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में सभी कार्यवाही अंग्रेजी में होगी। यह प्रावधान हाई कोर्ट की कार्यवाही में हिंदी या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के उपयोग की अनुमति देता है, लेकिन इसके लिए राष्ट्रपति की पूर्व सहमति की आवश्यकता होती है।

अनुच्छेद 348 के अनुसार, कानूनों और निर्णयों के आधिकारिक पाठ भी अंग्रेजी में होने चाहिए। हालाँकि, पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने न्यायिक शिक्षा और कार्यवाही को क्षेत्रीय भाषाओं में आयोजित करने की वकालत की थी, ताकि न्याय प्रणाली को और अधिक सुलभ बनाया जा सके। उन्होंने वकीलों के लिए अपनी पसंदीदा भाषाओं में मामले पेश करने की संभावना पर जोर दिया था।

सेवानिवृत्ति के बाद पूर्व CJI ने चंद्रचूड़ ने आगे सुझाव दिया था कि स्थानीय भाषाएँ देश में न्याय वितरण को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। हालाँकि, जिस समय सरकार द्वारा हाई कोर्ट में स्थानीय भाषा में अदालती कार्यवाही के लिए सुप्रीम कोर्ट से राय माँगी गई थी, उस समय भारत के मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ ही थे।

भाषा जोड़ने वाली है तो सुप्रीम कोर्ट अंग्रेजी क्यों नहीं छोड़ना चाहता?

महाराष्ट्र में उर्दू के साइनबोर्ड को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने तमाम टिप्पणी की है, जिसमें भाषा को जोड़ने वाला बताया गया है। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भाषा प्रभावी संचार का एक माध्यम है। ऐसे में स्थानीय राज्यों के हाई कोर्ट में स्थानीय भाषा का इस्तेमाल और सुप्रीम कोर्ट में हिंदी भाषा का इस्तेमाल आम आदमी को न्यायिक व्यवस्था से और अधिक जोड़ेगा।

माना जाता है कि भारत की कुल जनसंख्या का सिर्फ 10 से 15 प्रतिशत लोग अंग्रेजी समझते हैं। ये संख्या भी शहरी क्षेत्रों की है। ग्रामीण इलाकों में स्थानीय भाषा, जैसे कि तमिल, बंगाली, कन्नड़, मराठी आदि ही अधिक समझी जाती है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट प्रभावी संचार को महत्वपूर्ण मानता तो सरकार द्वारा साल 2022 में हाई कोर्ट में स्थानीय भाषा में कार्रवाई पर रोक नहीं लगाता।

कानून में साफ कहा गया है कि जब तक संसद कोई विकल्प नहीं देती, तभी तक अंग्रेजी अदालती कार्यवाही का माध्यम है। ऐसे में उर्दू को भारत में जन्मा और पनपा बताकर उसकी उसे जोड़ने वाली भाषा बताया जा रहा है, जबकि अंग्रेजी तो विदेशी भाषा है, जिसे अधिकांश लोग समझते भी नहीं, फिर सर्वोच्च न्यायालय इसे अदालतों में कार्यवाही का माध्यम क्यों बनाए रखना चाहता है, यह प्रमुख सवाल है।

दरअसल, भारत में एक भ्रम है कि जो लोग अंग्रेजी बोलते हैं वे अपने आपको एलीट वर्ग का समझते हैं। उन्होंने लगता है कि वे आम भारतीयों से बहुत ऊपर हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का अंग्रेजी के प्रति दीवानगी भी इस भ्रम को और स्थापित करने की कोशिश करेगा। इस देश में हर भारतीय को न्यायिक व्यवस्था को अपनी भाषा में जानने और समझने का हक है। इसलिए इस पर सुप्रीम कोर्ट को फिर से विचार करना चाहिए।

मुंडन, गंगाजल से स्नान… अनवर शेख बने राधेश्याम, घर वापसी के बाद बोले- इस्लाम में महिलाओं का सम्मान नहीं, सनातन में देवियों की भी होती है पूजा

हिन्दू धर्म के वैभव से प्रभावित होकर अनवर शेख ने इस्लाम छोड़कर सनातन धर्म अपनाया। मध्यप्रदेश के खंडवा के रहने वाले शेख अनवर अब राधेश्याम बन गए हैं। इस दौरान उनका मुंडन हुआ और गंगाजल से स्नान कराया गया। इसके बाद पूरे विधि विधान से सनातन धर्म में शामिल कर राधेश्याम नाम दिया गया।

मंदिर पर हुए अनुष्ठान के दौरान भगवान शिव के जयकारे हुए। इस मौके पर लोगों ने राधेश्याम को बधाई दी। राधेश्याम ने हिन्दू धर्म की अच्छाईयों की चर्चा की।

राधेश्याम का कहना है कि हिन्दू धर्म में वैभव और परंपराएं हैं। सभी लोगों को समान भाव से देखा जाता है। सनातन धर्म में धार्मिक स्थलों और अनुष्ठान सभी के लिए एक जैसे हैं। राधेश्याम का कहना है कि बचपन से ही उसके मन में सनातन धर्म की परंपरा का असर पड़ने लगा था।

महिलाओं के प्रति हिन्दू धर्म में जितनी श्रद्धा है, देवी के रूप में महिलाओं की पूजा की जाती है। महिलाओं के प्रति जितनी श्रद्धा है वो दूसरे किसी धर्म में नहीं है। यहां तक कि धरती और नदियों को भी माँ का दर्जा दिया जाता है। राधेश्याम का पेड़-पौधों से भी गहरा लगाव है।

अनवर शेख यानी राधेश्याम ने लक्ष्मी नाम की हिन्दू लड़की से शादी किया। पत्नी का हिन्दू धर्म के प्रति लगाव ने भी अनवर को राधेश्याम बनने के लिए आकर्षित किया। हालाँकि 23 साल तक उन्होने धर्म परिवर्तन नहीं किया था। इस बीच सनातन को समझा।

राधेश्याम का कहना है कि खंडवा के महादेवगढ़ में इससे पहले 5 अन्य लोग भी हिन्दू धर्म में शामिल हो चुके हैं। फिरोज राहुल बन गया था जबकि इमरान का नाम ईश्वर पड़ा। आदिल को आदित्य नाम दिया गया जबकि मुस्तफा को मारुति नंदन के नाम से अब जाना जाता है। इनलोगों ने जीवन की नई शुरुआत की। इस्लाम छोड़कर सनातन की शरण में आए इनलोगों के दिनचर्या में भी काफी परिवर्तन आ गया।

बिहार के लखीसराय में ‘अशरफ’ ने सुमित बन हिन्दू लड़की को फँसाया, 13 साल तक किया यौन शोषण: गोमांस खाने और नमाज़ पढ़ने को किया मजबूर, FIR दर्ज

बिहार के लखीसराय में एक मुस्लिम ने एक हिन्दू लड़की का यौन शोषण किया। उससे निकाह करने के लिए धर्मांतरण करने को कहा गया। उसने हिन्दू युवती से गोमांस खाने को भी कहा। यह सिलसिला 14 वर्ष तक चलता रहा। आरोपित मुस्लिम सरकारी कर्मचारी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, लव जिहाद के आरोपित का नाम अशरफ है जो कि खुद को सुमित बताता था। इसी सहारे उसने एक हिन्दू युवती को प्रेमजाल में फंसाया। हिन्दू लड़की 16 वर्ष की उम्र से उसके साथ है। उसे बाद में अशरफ की सच्चाई का पता चला है। अब इस मामले में लखीसराय पुलिस ने FIR दर्ज कर ली है।

बच्चे के जन्म के बाद सुमित ने ‘अशरफ’ का सच उगला

मामला वर्ष 2012 से शुरू होता है। जब पीड़िता 16 साल की थी। उसे अशरफ ने खुद को राजस्थान निवासी सुमित कुमार बताकर लड़की को जबरदस्ती प्रेमजाल में फँसाया। उस समय अशरफ जनता उच्च विद्यालय अलीनगर में कार्यरत था। इसके बाद कथित सुमिल उसे बहला-फुसलाकर अपने साथ भगा ले गया।

वह हिन्दू पीड़िता के साथ बालिग होने तक जमुई, आसनसोल और मुंगेर में रखकर उसका लगातार यौन शोषण करता रहा। पीड़िता को लिपिक के मुस्लिम होने की जानकारी तब मिली जब वह बालिग हो गई। पीड़िता के मुताबिक, 2014 में पीड़िता गर्भवती हुई लेकिन वो ये बच्चा नहीं चाहती थी।

पीड़िता ने गर्भपात करने की बात अशरफ को बताई लेकिन उसने इनकार कर दिया। पीड़िता के बालिग़ होने के बाद अशरफ ने लखीसराय न्यायालय ले जाकर धारा 164 के तहत उसका बयान दर्ज कराया। जिसमें पीड़िता से शादी करने की बात स्वीकार की। इसके बाद मामला कुछ समय के लिए शांत हो गया।

जनवरी 2015 में पीड़िता बिन शादी के माँ बन गई। 19 वर्ष की आयु में उसने बेटे को जन्म दिया। अब पीड़िता ने शादी की बात कही तो अशरफ ने उसे पूरा सच बताया। उसने कहा कि वह सुमित नहीं बल्कि कमाल अशरफ है। उसने के इसके बाद युवती पर इस्लाम कबूल करने का दबाव डाला।

अशरफ ने बेरहमी से पीटा, पूजा पाठ करने से मना किया : पीड़िता

पीड़िता ने बताया कि कमाल अशरफ हिंदू लड़कियों को सिर्फ भोग की वस्तु समझता है। उसने हिन्दू लड़की से कहा कि बीवी का दर्जा पाने के लिए उसे धर्म बदलना होगा। कमाल ने हिन्दू युवती को हिंदू रीति-रिवाजों को छोड़ने, इस्लाम अपनाने, गोमाँस खाने और यहाँ तक कि अन्य लोगों के साथ शारीरिक संबंध बनाने के लिए भी मजबूर किया।

जब उसने इन माँगों का विरोध किया तो अशरफ ने उसके साथ गलत सलूक किया। आए दिन उसके साथ मारपीट करता। 12 सितंबर 2024 को अशरफ ने उसे इतनी बेरहमी से पीटा, जिससे उसके हाथ और पैर में फ्रैक्चर हो गया। हालाँकि उत्पीड़न झेलने के बाद भी पीड़िता ने इस्लाम कबूल नहीं किया।

पीड़िता के मुताबिक, 20 फरवरी 2025 को लिपिक कमाल अशरफ उस पर प्राथमिक विद्यालय मकतब बालगुदर के शिक्षक इब्राहिम अहमद उर्फ शमशाद आलम के साथ शारीरिक संबंध बनाने का दबाव डाल रहा था। इसके साथ ही उसे पूजा-पाठ सहित बाकि सनातनी परंपराओं का विरोध करने के लिए भी मजबूर करता था।

पुलिस ने चार लोगों पर मामला दर्ज किया

पुलिस अधीक्षक अजय कुमार ने बताया कि पीड़िता के बयान के आधार पर लिपिक कमाल अशरफ, शिक्षक इब्राहिम अहमद उर्फ शमशाद आलम और दो अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। पुलिस मामले की जाँच कर रही है और जल्द कार्रवाई की जाएगी।

आरोपित नंबर 1: सोनिया गाँधी, आरोपित नंबर 2: राहुल गाँधी..₹2000 करोड़ की संपति हड़पने की साजिश, ₹414 करोड़ की टैक्स चोरी: जानिए ED ने चार्जशीट में क्या-क्या बताया?

प्रवर्तन निदेशालय ने कॉन्ग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी समेत कई नेताओं पर चार्जशीट दाखिल की है. ये चार्जशीट नेशनल हेराल्ड मामले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग का है। इस मामले की अगली सुनवाई 25 अप्रैल को होगी। चार्जशीट में कई अहम बातें कही गई है।

पहला आरोपित सोनिया गाँधी, दूसरा आरोपित राहुल गाँधी, तीसरा आरोपित सुमन दूबे, चौथा आरोपित सैम पित्रोदा और पाँचवाँ आरोपित यंग इंडिया को बनाया गया है।

दरअसल इस मामले में ईडी की जाँच, पटियाला हाउेस कोर्ट में 26.06.2014 के आदेश के आधार पर शुरू की गई है। 2013 में सुब्रमण्यम स्वामी ने सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी, मोतीलाल वोरा, ऑस्कर फर्नांडिस, सुमन दुबे, सैम पित्रोदा और मेसर्स यंग इंडियन के खिलाफ धोखाधड़ी का आरोप लगाया था। मोतीलाल वोरा और ऑस्कर फर्नांडिस का निधन हो चुका है इसलिए उनका नाम चार्जशीट में शामिल नहीं है।

ईडी की जाँच को आरोपियों ने दिल्ली उच्च न्यायालय और फिर सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। हालाँकि दोनों अदालतों ने मुकदमे की प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

आरोप के मुताबिक 2010 में एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल), यंग इंडियन (वाईआई) के प्रमुख अधिकारियों और कॉन्ग्रेस के पदाधिकारियों ने मिल कर एजेएल की 2,000 करोड़ रुपए की संपत्तियाँ हड़पने के लिए 99% शेयर यंग इंडियन नामक एक निजी कंपनी को सिर्फ 50 लाख रुपये में स्थानांतरित कर दिए। यंग इंडिया में सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी के पास कुल मिलाकर 76% शेयर थे।

ईडी का कहना है कि आरोपियों ने एआईसीसी द्वारा एजेएल को दिए गए 90.21 करोड़ रुपए के बकाया कर्ज को 9.02 करोड़ इक्विटी शेयरों में बदल दिया और इन सभी शेयरों को यंग इंडियन के पक्ष में सिर्फ 50 लाख रुपए में ट्रांसफर कर दिया। इस तरह से एजेएल की हजारों करोड़ रुपए की संपत्तियों को सोनिया गांधी और राहुल गांधी को ट्रांसफर कर दिया गया।

यंग इंडिया पर राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी का नियंत्रण था क्योंकि इनके पास 76% शेयर थे। बाकी 24% शेयर दिवंगत मोतीलाल वोरा और दिवंगत ऑस्कर फर्नांडीस के पास थे, जो सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी के करीबी माने जाते थे।

चार्जशीट में कहा गया है कि प्रवर्तन निदेशालय ने 20.11.2023 को अंतरिम कुर्की आदेश जारी करके एजेएल की 752 करोड़ रुपए की संपत्तियाँ कुर्क की।

एजेंसी का कहना है कि पीएमएलए के तहत ईडी ने जो जाँच में पाया है वो 27.12.2017 के आयकर विभाग के मूल्यांकन की तरह ही है। आयकर विभाग ने इस मामले में 414 करोड़ रुपए टैक्स में धोखाधड़ी पाया था।

ईडी ने इस मामले में कमाई के रूप में 988 करोड़ रुपए और संपत्तियों की मौजूदा कीमत 5000 रुपए बताया है। ईडी के मुताबिक यंग इंडिया को 23.11.2010 को एसपीवी के रूप में शामिल किया गया था। एजेएल ने 2008 में अपनी प्रकाशन गतिविधि बंद कर दी । ईडी का कहना है कि आरोपियों ने यंग इंडिया के मालिकों सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी को एजेएल की सैकड़ों करोड़ रुपए की संपत्तियों का नियंत्रण देने के लिए एक आपराधिक साजिश रची थी। वाईआई यानी यंग इंडिया ने एजेएल से एआईसीसी द्वारा उसे सौंपे गए 90.21 करोड़ रुपए के ऋण को चुकाने या इस ऋण को इक्विटी में बदलने के लिए कहा। एजेएल, वाईआई और एआईसीसी में एक ही लोगों की नियुक्ति हुई। जांच एजेंसी का कहना है कि इन तीनों संस्थाओं में पदों पर बैठे लोगों के एक ही समूह द्वारा प्रस्ताव पारित करके वाईआई को 50 लाख रुपए की मामूली राशि के लिए 90.21 करोड़ रुपए का ऋण सौंपा गया था। ईडी का आरोप है कि यंग इंडियन को एजेएल के 9.021 करोड़ शेयर आवंटित किए गए।

यंग इंडिया कथित तौर पर एजेएल की होल्डिंग कंपनी बन गई, जिसके पास 99% शेयर थे और अन्य शेयरधारकों की इक्विटी घटकर 1% रह गई। जाँच में मिले कई दस्तावेज, अभियुक्तों और गवाहों के बयान की रिकॉर्डिंग के आधार पर ईडी ने 5,000 करोड़ रुपये से अधिक के मौजूदा बाजार मूल्य के आधार पर आरोप पत्र तय किया गया।

ED ने जब्त की सहारा की ₹1400 करोड़ की प्रॉपर्टी, आंबी वैली सिटी भी हुई सीज: निवेशकों को पैसा ना लौटाने पर हुई कार्रवाई

सहारा ग्रुप के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने बड़ी कार्रवाई की है। ये कार्रवाई ED की कोलकाता शाखा की तरफ की गई है। ED ने महाराष्ट्र के लोनावला में मौजूद एंबी वैली की 707 एकड़ जमीन को जब्त कर लिया है, जिसकी अनुमानित कीमत ₹1460 करोड़ बताई जा रही है। यह कार्रवाई सहारा समूह के निवेशकों को उनकी धनराशि वापस करने में विफल रहने के चलते की गई है।

सहारा ने लगाया लोगों को चूना

मामले की छानबीन में पता चला है कि सहारा ग्रुप ने लोगों को पैसे इन्वेस्ट करने के लिए मजबूर किया था, इस काम में लोगों की सहमति नहीं ली गई थी। जब लोगों ने अपनी जमा पूँजी माँगी, तो पैसे वापस नहीं किए गए।

बताया गया है कि सहारा समूह पोंजी स्कीम चला रहा था, इसमें सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड, सहारा इंडिया कमर्शियल कॉर्पोरेशन लिमिटेड, सहारा क्रेडिट कोऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड, सहारा समूह , सहारायन यूनिवर्सल मल्टीपर्पज कोऑपरेटिव सोसाइटी आदि कम्पनियाँ शामिल थीं।

ED का कहना है कि सहारा ग्रुप ने पैसा वापस तो नहीं किया बल्कि जमाकर्ताओं की अपना पैसा फिर से जमा करने के लिए मजबूर किया और एक योजना से दूसरी योजना में लगाया। खातों की कॉपी को छुपाने में हेराफेरी भी की। कई ऐसे ऑफर देकर निवेश का नाम देकर लोगों के पैसों की ठगी की।

क्या है पूरा मामला?

सहारा समूह ने 2007-2008 में ऑप्शनली फुली कन्वर्टिबल डिबेंचर्स (OFCD) के माध्यम से लगभग 3 करोड़ निवेशकों से ₹17400 करोड़ की राशि जुटाई थी। हालाँकि, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने इन योजनाओं को अवैध घोषित किया और निवेशकों को पैसा वापस करने का आदेश दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने 2012 में सहारा को ₹24000 करोड़ निवेशकों को लौटाने का निर्देश दिया था, जिसमें से अब तक केवल ₹11000 करोड़ ही वापस किए गए हैं।

नेटवर्क 18 की रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में मामला दर्ज हुआ था। ED की जाँच 4 FIR के आधार पर हुई थी, जिसमें ओडिशा, बिहार और राजस्थान की पुलिस ने हमारा इंडिया क्रेडिट को-ऑपरेटिव सोसाईटी लिमिटेड और अन्य के खिलाफ दर्ज की थी। 500 से ज्यादा मामले इस केस में दर्ज किए जा चुके है, जिसमें 300 से ज्यादा मामले मनी लॉन्ड्रिंग को लेकर है।

क्यों की गई कानूनी कार्रवाई?

सुप्रीम कोर्ट ने सहारा समूह को निवेशकों की बकाया राशि चुकाने के लिए एंबी वैली की संपत्तियों को अटैच करने का आदेश दिया था। बॉम्बे हाईकोर्ट के ऑफिशियल लिक्विडेटर ने एंबी वैली की नीलामी प्रक्रिया शुरू की, जिसका रिजर्व प्राइस 37392 करोड़ रुपये निर्धारित किया गया। ईडी को पता चला है कि ये भूखंड बेनामी नामों से खरीदने के लिए सहारा समूह की कंपनियों से पैसे निकाले गए थे। यह फैसला निवेशकों को उनकी धनराशि वापस दिलाने के प्रयासों का हिस्सा है।

दुबई में 2 हिंदुओं को पाकिस्तानी ने तलवार से काटा, मजहबी नारे भी लगाए: तेलंगाना के रहने वाले थे मृतक, बेकरी में करते थे काम

संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के दुबई में एक पाकिस्तानी ने मजहबी नारे लगाते हुए 3 भारतीय हिन्दू कामगारों पर हमला कर दिया। उसने तलवार से 2 भारतीयों को काट दिया, इस हमले में उनकी मौत हो गई। 1 घायल का इलाज चल रहा है। मृतक तेलंगाना के रहने वाले थे। हत्या का कारण मजहबी विवाद बताया गया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह घटना दुबई की एक बेकरी में शुक्रवार (11 अप्रैल, 2025) को हुई है। यहाँ काम करने वाले अष्टपु प्रेमसागर और श्रीनिवास की हत्या एक पाकिस्तानी ने कर दी। प्रेमसागर तेलंगाना के निर्मल जिले के जबकि श्रीनिवास निजामाबाद के रहने वाले थे।

पाकिस्तानी के हमले में एक और भारतीय गंभीर रूप से घायल हो गया, उसका नाम सागर है। बताया गया कि किसी छोटी बात से विवाद चालू हुआ और फिर पाकिस्तानी ने मजहबी नारे लगाते हुए इन लोगों पर हमला बोल दिया। उसने अष्टपु प्रेमसागर और श्रीनिवास को कई बार चाकुओं से गोदा।

हमलावर पाकिस्तानी इन भारतीयों का सहकर्मी था। मृतक प्रेमसागर के घर में 2 छोटी बेटियाँ और पत्नी हैं। वह आखिरी बार 2 वर्ष पहले घर आए थे। प्रेमसागर 5 वर्ष पूर्व दुबई काम करने गए थे। वह जल्द ही घर लौटने वाले भी थे। उनके परिवार का तेलंगाना में बुरा हाल है।

प्रेमसागर के भाई संदीप ने मीडिया से बताया, “मेरे भाई की हत्या सिर्फ इसलिए कर दी गई क्योंकि वो एक भारतीय थे, मैं इस मामले में विदेश मंत्रालय से जल्द एक्शन लिए जाने की माँग करता हूँ।” उन्होंने बताया कि हत्या से पहले प्रेमसागर ने पाकिस्तानी से छोड़ देने की गुहार लगाई और अपने परिवार के विषय में भी बताया लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ।

पीड़ितों के परिवार ने बताया है कि उन्हें अभी दुबई की पुलिस या सरकारी एजेंसियों की तरफ से कोई जानकारी नहीं मिली है। उन्होंने बताया है कि किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए वह अपने रिश्तेदारों पर निर्भर हैं। दोनों मृतकों के शवों के लाने के लिए प्रयास चल रहे हैं।

मामले में केन्द्रीय मंत्री बंडी संजय कुमार और जी किशन रेड्डी ने भी दुख जताया है। उन्होंने विदेश मंत्रालय से पूरी सहायता दिए जाने का आश्वासन दिया है। जी किशन रेड्डी, “दुबई में तेलंगाना के दो तेलुगु युवकों, निर्मल जिले के अष्टपु प्रेमसागर और निजामाबाद जिले के श्रीनिवास की नृशंस हत्या से मैं स्तब्ध हूँ।”

उन्होंने आगे लिखा, “इस मामले में विदेश मंत्री श्री डॉक्टर जयशंकर जी से बात की और उन्होंने शोक संतप्त परिवारों को पूर्ण सहायता और पार्थिव शरीर को तत्काल वापस भारत भेजने का आश्वासन दिया है। विदेश मंत्रालय भी इस मामले में शीघ्र न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में काम करेगा। मैं जयशंकर जी के समर्थन और सहायता के लिए उनका आभार व्यक्त करता हूँ।”

मामले में अभी हत्यारे पाकिस्तानी पर क्या कार्रवाई हो रही है, इसकी कोई जानकारी सामने नहीं आई है।

AFP-AL Jazeera ने मुर्शिदाबाद में मुस्लिम भीड़ की हिंसा को बताया ‘विरोध प्रदर्शन’, हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार को ढँकने की कोशिश

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में हिन्दुओं पर लगातार हिंसा के मामले सामने आए। इस बीच ‘अल जज़ीरा’ और AFP जैसे विदेशी मीडिया पोर्टलों ने हिंसक मुस्लिम भीड़ का बचाव किया है। इन्होंने हिन्दुओं के खिलाफ हुई हिंसा को प्रदर्शन करार दिया। इन पोर्टल ने ‘गोएबल्स’ जैसे प्रचार का सहारा लिया, जिसमें झूठ को दोहराने, जनता को गुमराह करने और दुश्मनी पैदा करने जैसे पैंतरे शामिल हैं।

ऑपइंडिया ने मामले को विस्तार से रिपोर्ट किया कि कैसे यहाँ हिंदुओं को चुन-चुनकर निशाना बनाया गया। हिंसा में उनके घर, दुकानों और हिंदू मंदिरों को तोड़ा गया। 11 अप्रैल, 2025 को जुमे की नमाज़ के तुरंत बाद नए वक्फ कानून के खिलाफ ‘विरोध’ के नाम पर नरसंहार शुरू हुआ। ये अगले दिन भी जारी रहा।

हालत यहाँ तक खराब हो गए कि हज़ारों हिंदुओं को मुर्शिदाबाद में अपने घरों को छोड़कर भागना पड़ा। लोग नावों के जरिए पास के मालदा जिले में पलायन को मजबूर हो गए।

‘अल जज़ीरा’ ने मुस्लिमों को दर्शाया ‘पीड़ित’

13 अप्रैल, 2025 को ‘अल जज़ीरा’ ने ‘मुस्लिम बंदोबस्ती बिल पर घातक विरोध के बाद भारत ने सेना तैनात की’ शीर्षक से एक रिपोर्ट पब्लिश की। रिपोर्ट में असल हिंदू पीड़ितों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, कतर से फंड लेने वाली इस वेबसाइट ने मुस्लिम अपराधियों को ‘पीड़ित’ के रूप में दर्शाया। बड़े पैमाने में हुए दंगों को हाल ही में पारित ‘विवादित विधेयक के खिलाफ विरोध प्रदर्शन’ बताकर इसे मामूली करार दिया।

‘अल जज़ीरा’ की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

यहाँ तक की मुस्लिम भीड़ द्वारा की गई हिंसा को ये सुझाव देकर मामूली बताया कि वक्फ संशोधन अधिनियम में ‘धार्मिक बंदोबस्त (वक्फ) के प्रबंधन के लिए मुस्लिमों के अधिकारों को कमजोर कर दिया गया है।’ इस जानलेवा हिंसा को रिपोर्ट करने के लिए ‘विरोधों का बढ़ना’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया है।

‘अल जजीरा’ ने अपनी रिपोर्ट में वक्फ में गैर-मुस्लिमों को शामिल करने पर भी ध्यान केंद्रित किया और कथित ‘धार्मिक भेदभाव’ के खिलाफ मुर्शिदाबाद में मुस्लिमों द्वारा दंगे भड़काने का समर्थन किया।

रिपोर्ट में हिंदू समुदाय के खिलाफ हिंसा को सही बताते हुए कहा गया है, “मुस्लिमों को डर है कि 1995 के कानून में बदलाव से ऐतिहासिक मस्जिदों, दुकानों, दरगाहों, कब्रिस्तानों और हजारों एकड़ जमीन सहित वक्फ संपत्तियों पर कब्ज़ा, विवाद और विध्वंस का खतरा हो सकता है।”

‘अल जज़ीरा’ ने ‘गोएबल्स’ जैसे प्रोपेगेंडा का सहारा लिया। मुर्शिदाबाद में हुए नरसंहार के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कसूरवार ठहराने की कोशिश की। जबकि दंगाई मुस्लिम भीड़ ने हिंदुओं के घरों को आग लगा दी, आजीविका को नष्ट कर दिया, मौत और बलात्कार को धमकियाँ दी और पानी की टंकियों में जहर डाल दिया।

‘अल जज़ीरा’ ने दावा किया है, “प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी के एक दशक के कार्यकाल में उन्होंने देश के बहुसंख्यक हिंदू धर्म के आक्रामक चैंपियन के तौर पर अपनी छवि बनाई है और रिपोर्ट बताती है कि धार्मिक ध्रुवीकरण से उनकी पार्टी को चुनावी लाभ हासिल करने में मदद मिली है।”

कतर से फंड लेने वाले इस आउटलेट ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कॉन्ग्रेस के पक्ष में तर्क देने की कोशिश की, जिन्होंने हिन्दुओं को निशाना बनाने के लिए चरमपंथियों को अनुकूल माहौल दिया। और कहा कि राज्य में वक्फ संशोधन अधिनियम लागू नहीं किया जाएगा और टीएमसी नेता प्रदेश में मुस्लिमों को सक्रिय रूप से शांत करने में लगे हुए हैं।

AFP ने दंगाइयों के अपराध को ‘घातक विरोध’ करार दिया

समाचार ‘एजेंसी फ़्रांस प्रेस’ (AFP) ने भी एक वायर कॉपी प्रकाशित की थी, जिसमें नए वक्फ कानून का विरोध करने वाली उन्मादी मुस्लिम भीड़ द्वारा मुर्शिदाबाद में हिंदुओं के खिलाफ की गई हिंसा की भयावहता को कम करके दिखाया।

मुर्शिदाबाद के सुनियोजित दंगों को ‘घातक विरोध’ की तरह पेश किया। हिंसा को उचित ठहराने के लिए एक आधार तैयार किया गया, जिसमें दावा किया गया कि विरोध प्रदर्शन एक ऐसे कानून के खिलाफ थे, जिसने ‘मुस्लिमों के स्वामित्व वाली संपत्तियों के प्रबंधन के तरीके’ को बदल दिया।

AFP की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

न्यूज एजेंसी ने रिपोर्ट में दावा किया, “वक्फ संशोधन अधिनियम के चलते विरोध प्रदर्शन शुरू हुए थे, जिसे इसी महीने बहस के बावजूद पारित किया गया था।”

विपक्षी नेताओं का हवाला देते हुए AFP ने वक्फ संशोधन अधिनियम की एक गलत छवि प्रस्तुत की, जिससे ‘विरोध प्रदर्शन’ करना जरूरी हो गया और कानून के अधिनियम के बाद हुई हिंसा के लिए एक आधारभूत तर्क को और अधिक प्रासंगिक बना दिया गया।

एजेंसी ने दावा किया, “पुलिस ने मुर्शिदाबाद जिले में शुक्रवार (11 अप्रैल, 2025) को हज़ारों प्रदर्शनकारियों पर आँसू गैस के गोले भी फेंके गए। पुलिस ने शनिवार (12 अप्रैल, 2025) को AFP को बताया कि एक बच्चे सहित तीन लोगों की मौत हो गई।” एजेंसी ने ये गलत धारणा दी कि कानून प्रवर्तन अधिकारी केवल ‘प्रदर्शनकारियों (वास्तव में दंगाइयों)’ के खिलाफ घातक बल को इस्तेमाल कर रहे हैं।

AFP की रिपोर्ट में मुर्शिदाबाद में हिंसा को लेकर मोदी सरकार पर भी निशाना साधा गया। एजेंसी ने दावा किया,”प्रधानमंत्री के रूप में मोदी के एक दशक ने उन्हें देश के बहुसंख्यक हिंदू धर्म के चैंपियन के रूप में अपनी छवि बनाने का मौका दिया है। उनकी सरकार ने भारत के मुस्लिम बहुल भारतीय अवैध रूप से कब्जे वाले जम्मू और कश्मीर की संवैधानिक स्वायत्तता को रद्द कर दिया और उस जमीन पर मंदिर के निर्माण का समर्थन किया, जहाँ सदियों से एक मस्जिद खड़ी थी, जिसे 1992 में हिंदू चरमपंथियों ने गिरा दिया था।”

AFP की यह रिपोर्ट पाकिस्तान के कई बड़े मीडिया पोर्टलों जैसे डॉन, जियो और ‘द न्यूज इंटरनेशनल‘ में भी हूबहू प्रकाशित हुई। इन पोर्टलों ने भी मुर्शिदाबाद की हिंसा को ‘प्रदर्शन’ कहकर पेश किया और हिन्दुओं पर हुए हमलों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया।

मुर्शिदाबाद में हिंदूओं के साथ हुई हिंसा

  • मुर्शिदाबाद जिले के सूटी और शामशेरगंज इलाकों में शुक्रवार (11 अप्रैल, 2025) को जुमे की नमाज के बाद बड़े पैमाने पर हिंसा, तोड़फोड़, आगजनी और हिन्दू समुदाय के लोगों पर हमले की घटनाएँ सामने आईं। यह सब वक्फ संशोधन कानून के विरोध के नाम पर हुआ लेकिन इसके पीछे सुनियोजित हिंसा की आशंका जताई जा रही है।

प्रदर्शन के नाम पर उग्र भीड़ ने पहले शांतिपूर्ण नारेबाज़ी की लेकिन जल्द ही हालात बेकाबू हो गए। हिंसक भीड़ ने एक हिन्दू दंपति की मिठाई की दुकान को पूरी तरह से तहस-नहस कर डाला। दुकान का नाम था ‘सुभा स्मृति होटल’। दुकान मालिक आँसू बहाते हुए बस इतना ही कह सके, “यहीं मेरी मिठाई की दुकान थी…” उनकी पत्नी ने रोते हुए कहा, “सारा सामान, दुकान में रखे पैसे, सब लूट लिया… अब हम खाएँगे क्या?”

इतना ही नहीं, ‘श्री हरि हिन्दू होटल एंड लॉज’ नामक एक और प्रतिष्ठान को भी निशाना बनाया गया। समाचार एजेंसी ANI ने इसके नुकसान की तस्वीरें साझा की हैं।

रिपोर्ट्स के अनुसार, हिंसक तत्वों ने कई हिन्दू मंदिरों को भी नुकसान पहुँचाया और मूर्तियों को खंडित किया। ‘रिपब्लिक बांग्ला’ चैनल द्वारा साझा किए गए एक वीडियो में तृणमूल कांग्रेस के सांसद खलीलुर रहमान यह स्वीकार करते नजर आए कि जंगीपुर इलाके में एक मंदिर तोड़ा गया है।

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, “अल्पसंख्यक बहुल इस जिले में कई हिन्दू परिवारों के घरों और दुकानों को चुन-चुनकर निशाना बनाया गया।” रिपोर्ट में यह भी कहा गया, “हिंसा के दौरान एक एम्बुलेंस को भी नहीं बख्शा गया। उसे आग के हवाले कर दिया गया और उसके ड्राइवर की बेरहमी से पिटाई की गई।” एक प्रत्यक्षदर्शी ने कहा, “हम डर के मारे अपने घरों में छुपे हुए थे। मैंने अपने माता-पिता, पत्नी और बच्चों को अंदर ही बंद कर रखा था।”

उन्होंने साफ तौर पर बताया कि हमला करने वाले कोई बाहरी नहीं बल्कि आसपास के ही लोग थे। इसी बीच एक सीसीटीवी फुटेज भी सामने आया है, जिसमें एक दंगाई को एक हिन्दू परिवार की गाड़ी तोड़ते हुए देखा जा सकता है।

ANI से बात करते हुए एक और पीड़ित ने बताया, “इन्होंने बाइक जला दी, हमारा सामान लूट लिया और दुकानों में आग लगा दी।” उन्होंने कहा कि पूरी रात वे सो नहीं पाए। “हम जागते रहे, डरते रहे। जब हिंसा हो रही थी, तब इलाके में कोई पुलिस नहीं थी। जो पुलिस आई भी वो अपनी जान बचाकर भाग रही थी। अब देखना है कि सरकार हमें मुआवजा देती है या नहीं।”

आज तक से बातचीत में एक व्यापारी की पत्नी मनजू भगत नाम की महिला ने बताया, “वे लोग सामने के दरवाज़े से अंदर आने की कोशिश कर रहे थे। जब नहीं आ पाए तो पीछे के दरवाज़े से घुसने लगे।” उन्होंने बताया, “हमारे घर में बाइक तोड़ दी गई, सामान फेंका गया और कुर्सी, गद्दा, टीवी जैसे कीमती सामान तक लूट ले गए।”

मनजू ने अपने दर्द को साझा करते हुए कहा, “हम पूरा परिवार ऊपर छत पर छुपा हुआ था। भगवान का नाम ले रहे थे कि कैसे भी ये लोग हमारे घर से चले जाएँ। उस वक्त मेरी बेटी के साथ कुछ हो जाता तो मैं क्या करती?”

कोर्ट के आदेश के 7 महीने बीते, लेकिन अब टूट नहीं पाई संजौली की मस्जिद: अवैध 3 मंजिलें गिराने का दिया गया था आदेश, कमेटी हर बार बना रही कोई न कोई बहाना

शिमला के संजौली इलाके में बनी पाँच मंजिला मस्जिद की तीन मंजिलें टूटनी हैं। अक्टूबर 2024 में नगर निगम आयुक्त कोर्ट ने इस मस्जिद की ऊपरी तीन मंजिलों को अवैध घोषित कर उन्हें गिराने का आदेश दिया था। सात महीने बीत चुके हैं, लेकिन ये मंजिलें अब तक पूरी तरह नहीं टूटीं। मस्जिद कमेटी हर सुनवाई में नए-नए बहाने पेश कर रही है। ताजा सुनवाई में कोर्ट ने कमेटी को 26 अप्रैल, 2025 तक का आखिरी समय दिया है। लेकिन सवाल वही है – क्या इस बार आदेश का पालन होगा, या फिर मामला और लंबा खिंचेगा?

रिपोर्ट्स के मुताबिक, नगर निगम आयुक्त कोर्ट की ताजा सुनवाई में मस्जिद कमेटी ने दावा किया कि अवैध निर्माण को हटाने का काम चल रहा है, लेकिन अभी तक केवल 50 फीसदी हिस्सा ही टूट पाया है। कमेटी का कहना है कि रिहायशी इलाके में मस्जिद होने की वजह से तेजी से काम करना मुश्किल है। कोर्ट ने इस दलील को सुनने के बाद भी सख्त रुख अपनाया और 26 अप्रैल तक बाकी बचे निर्माण को पूरी तरह हटाने का आदेश दिया। आयुक्त ने साफ कहा कि हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने भी इस मामले को जल्द निपटाने के निर्देश दिए हैं।

स्थानीय निवासी राम लाल बताते हैं, “पिछले साल से सुन रहे हैं कि मस्जिद की मंजिलें टूटेंगी, लेकिन काम इतना धीमा है कि लगता है सालों लग जाएँगे।” वहीं, मस्जिद कमेटी के एक सदस्य ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “हम कोर्ट के आदेश का सम्मान कर रहे हैं, लेकिन आसपास घर होने की वजह से सावधानी बरतनी पड़ रही है। मलबा हटाने में भी समय लग रहा है।”

इस बीच, कोर्ट ने मस्जिद की निचली दो मंजिलों की वैधता पर भी सवाल उठाए हैं। आयुक्त ने वक्फ बोर्ड से इन मंजिलों के नक्शे और राजस्व रिकॉर्ड माँगे हैं। अगर ये दस्तावेज पेश नहीं किए गए, तो इन दो मंजिलों को भी अवैध घोषित कर हटाने का आदेश जारी हो सकता है। सुनवाई में मस्जिद कमेटी के अध्यक्ष मोहम्मद लतीफ मौजूद नहीं थे, जिस पर कोर्ट ने नाराजगी जताई। वक्फ बोर्ड ने रिकॉर्ड अपडेट करने के लिए और समय माँगा है।

संजौली के स्थानीय निवासियों में इस मामले को लेकर गुस्सा साफ दिखता है। देवभूमि संघर्ष समिति के संयोजक भारत भूषण का कहना है, “मस्जिद कमेटी जानबूझकर देरी कर रही है। पहले कहा था कि फंड की कमी है, अब कह रहे हैं कि मलबा हटाने में समय लग रहा है। ये सब बहाने हैं।” समिति ने यह भी दावा किया है कि मस्जिद जिस जमीन पर बनी है, वह सरकार की है, न कि वक्फ बोर्ड की। उन्होंने आशंका जताई कि रेवेन्यू रिकॉर्ड में अब छेड़छाड़ हो सकती है।

दूसरी ओर ऑल हिमाचल मुस्लिम ऑर्गेनाइजेशन ने इस मामले में हाईकोर्ट का रुख करने की बात कही है। संगठन के एक सदस्य ने कहा, “हम चाहते हैं कि मामला कानूनी तरीके से सुलझे। अगर निचली मंजिलों को भी हटाने का आदेश आया, तो हम उसका जवाब कोर्ट में देंगे।”

बता दें कि यह विवाद 2010 से चला आ रहा है, जब मस्जिद के निर्माण पर पहली बार सवाल उठे थे। 2012 में वक्फ बोर्ड ने दो मंजिलों को मंजूरी दी थी, लेकिन 2018 तक बिना अनुमति के पाँच मंजिलें बन गईं। पिछले साल सितंबर में दो समुदायों के बीच झगड़े के बाद यह मामला फिर गरमाया। तब से कोर्ट में 46 से ज्यादा सुनवाइयाँ हो चुकी हैं। नगर निगम ने 35 बार नोटिस जारी किए, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

हिंदू जागरण मंच के कमल गौतम का कहना है कि सरकार की हीला-हवाली की वजह से मामला तेज गति से नहीं बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि सरकार चाहे तो ये काम जल्द से जल्द हो सकता है। हालाँकि उन्होंने समस्या भी बता कि मस्जिद ऐसी जगह पर है, जहाँ बुलडोजर या कोई बड़ी मशीनरी नहीं ले जाई जा सकती और पूरी मस्जिद को हाथ से ही तोड़ा जा सकता है।

नगर निगम कोर्ट ने इस सुनवाई में संजौली मस्जिद के अलावा शिमला के सात अन्य भवन मालिकों को भी अवैध निर्माण हटाने के आदेश दिए। इनमें माल रोड, कच्चीघाटी, लाल पानी, और छोटा शिमला जैसे इलाकों के मकान शामिल हैं। कोर्ट ने साफ किया कि बिना मंजूरी के बनाए गए छज्जे, सीढ़ियाँ या अतिरिक्त निर्माण को तुरंत हटाना होगा।

संजौली में मस्जिद के आसपास रहने वाली शांति देवी कहती हैं, “हमें कोई झगड़ा नहीं चाहिए। बस कोर्ट का आदेश पूरा हो, ताकि शांति बनी रहे।” लेकिन जिस रफ्तार से काम चल रहा है, उसे देखकर लगता है कि 26 अप्रैल की समयसीमा भी शायद पूरी न हो। स्थानीय लोग अब हाईकोर्ट की अगली सुनवाई का इंतजार कर रहे हैं, जहाँ इस मामले में बड़ा फैसला आ सकता है।

₹50 लाख से कैसे बनाया ₹2000 करोड़? ‘नेशनल हेराल्ड’ केस में सोनिया-राहुल गाँधी के खिलाफ चार्जशीट, ED ने लैंड स्कैम में दामाद से भी की पूछताछ: जानिए सबकुछ

कॉन्ग्रेस मुखपत्र ‘नेशनल हेराल्ड’ से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में पार्टी के पूर्व अध्यक्षों सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी के विरुद्ध ED (प्रवर्तन निदेशालय) ने चार्जशीट दायर की है। कॉन्ग्रेस नेता जयराम रमेश ने इसे बदले की राजनीति करार दिया है। अब इस मामले की अगली सुनवाई गुरुवार (25 अप्रैल, 2025) को होगी। YIL (यंग इंडिया लिमिटेड) नामक कंपनी ‘नेशनल हेराल्ड’ को संचालित करती है। इस कंपनी में 76% शेयर सोनिया व राहुल गाँधी के हैं। दोनों के इसमें 38-38% शेयर हैं।

क्या है ‘नेशनल हेराल्ड’ का मामला, जिसमें सोनिया-राहुल गाँधी के ख़िलाफ़ चार्जशीट

इससे पहले ‘नेशनल हेराल्ड’ का स्वामित्व AJL (एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड) के पास था, लेकिन YIL ने इसका अधिग्रहण कर लिया। 11 फरवरी को ED ने इस मामले से जुड़ी 661 करोड़ रुपए की संपत्तियों की ज़ब्ती की कार्रवाई शुरू की थी। ये संपत्तियाँ दिल्ली, मुंबई और लखनऊ जैसे बड़े शहरों में था। इसमें दिल्ली में बहादुरशाह ज़फर मार्ग स्थित ‘हेराल्ड हाउस’ भी शामिल है। YIL के बचे हुए 24% शेयर कॉन्ग्रेस नेताओं मोतीलाल वोरा और ऑस्कर फर्नांडिस के नाम था।

अब ये दोनों ही नेता इस दुनिया में नहीं हैं। उनके निधन के बाद उनके शेयरों पर किसी ने दावा नहीं ठोका। ED का कहना है कि ये शेयर भी सोनिया और राहुल के पास ही चले गए, यानी दोनों माँ-बेटे 100% शेयरों के मालिक बन गए। YIL का गठन 23 नवंबर, 2010 को हुआ था। कॉन्ग्रेस ने AJL को 90 करोड़ रुपए का ऋण दे रखा था, जिसे मात्र 50 लाख रुपए में सेटल करते हुए YIL ने संस्था के 2000 करोड़ रुपए की संपत्तियों पर नियंत्रण स्थापित कर लिया।

जाँच एजेंसी का कहना है कि मनी लॉन्ड्रिंग के लिए फर्जी डोनेशन और फर्जी रेंट अग्रीमेंट्स का जुगाड़ किया गया। करोड़ों रुपयों की हेराफेरी हुई। 2012 में सुब्रमण्यन स्वामी द्वारा दी गई शिकायत के आधार पर इस मामले की जाँच शुरू की गई थी। 2022 में राहुल गाँधी इस मामले में पूछताछ के लिए 5 बार ED के समक्ष उपस्थित हुए थे। CBI भी इस मामले की जाँच कर रही है, इसका मनी लॉन्ड्रिंग वाला हिस्सा ED के पास है। पूरा मामला आपराधिक साजिश का भी बताया गया है।

भोपाल से भी जुड़ा है YIL और AJL का झोल

बता दें कि भोपाल के प्रेस कॉम्प्लेक्स में AJL को 1981 में 1.14 एकड़ जमीन महज 1 लाख रुपए में 30 साल के लिए लीज पर आवंटित की गई थी। AJL ने उस समय अंग्रेजी दैनिक ‘नेशनल हेराल्ड’, हिंदी दैनिक ‘नवजीवन’ और उर्दू दैनिक ‘कौमी आवाज़’ प्रकाशित की थी। 2011 में लीज समाप्त होने के बाद ‘भोपाल विकास प्राधिकरण’ (BDA) यहाँ मालिकाना हक लेने पहुँचा तो पाया कि इसका इस्तेमाल समाचार पत्रों के प्रकाशन के बजाय व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए किया जा रहा था।

समाचार पत्रों का प्रकाशन तो 1992 में ही बंद हो चुका था और उसके बाद से इसका कॉमर्शियल इस्तेमाल हो रहा था। प्रेस को दिए गए प्लॉट पर व्यवसायिक कॉम्प्लेक्स बनने का पता चलने के बाद भोपाल विकास प्राधिकरण ने इसे अपने कब्जे में लेने की कार्रवाई शुरू की लेकिन इसी बीच कई खरीददार सामने आ गए और मामला अदालत पहुँच गया। इस वजह से कार्रवाई बीच में ही अटक गई। हालाँकि, 2012 में भोपाल विकास प्राधिकरण ने इस प्लॉट की लीज को रद्द कर दिया था लेकिन तब से लेकर अब तक इस प्लॉट के अलग-अलग खरीददार और भोपाल विकास प्राधिकरण के बीच मालिकाना हक को लेकर मामला कोर्ट में विचाराधीन है।

‘जीजा जी’ रॉबर्ट वाड्रा से भी ED ने की है पूछताछ

हरियाणा के गुरुग्राम के एक जमीन घोटाले के मामले में सोनिया गाँधी के दामाद और राहुल गाँधी के बहनोई रॉबर्ट वाड्रा से भी प्रवर्तन निदेशालय ने पूछताछ की है। रॉबर्ट वाड्रा की पत्नी प्रियंका गाँधी केरल के वायनाड से सांसद हैं, ये सीट उनके भाई राहुल गाँधी ने उनके लिए छोड़ दी थी। उनसे 6 घंटे पूछताछ हुई है। इससे पहले 8 अप्रैल को उन्हें समन भेजा गया था लेकिन वो पेश नहीं हुए थे। दूसरे समन के बाद वो पेश हुए। उन्हें बुधवार को फिर से पूछताछ के लिए बुलाया गया है।

रॉबर्ट वाड्रा ने केंद्र सरकार पर बदले की राजनीति व जाँच एजेंसियों के दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए कहा कि वो हमेशा से सारे सवालों के जवाब देते रहे हैं और आगे भी देंगे। 2008 में गुरुग्राम के शिकोहपुर रॉबर्ट वाड्रा की कंपनी ‘स्काइलाइट हॉस्पिटैलिटी’ ने जमीन ख़रीदी थी। 7.5 करोड़ में क़रीब 3 एकड़ की जमीन ली गई। हरियाणा की तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने कॉलोनी बनाने की अनुमति दी। इसके बाद ये जमीन रॉबर्ड वाड्रा की कंपनी ने DLF को 58 करोड़ रुपए में बेच दी।

गिरफ्तार हुआ मेहुल चोकसी तो चर्चा में आई बारबरा जबारिका, ‘राज’ बनकर मिला था भगोड़ा: अगवा, नाव, टॉर्चर… जानिए ‘हनी ट्रैप’ की पूरी कहानी

करीब 14,000 करोड़ के PNB घोटाले का आरोपित भगोड़ा मेहुल चोकसी को बेल्जियम में गिरफ़्तार किए जाने के बाद उसे भारत लाने की तैयारी चल रही है। वहीं हीरा व्यापारी ने प्रत्यर्पण से बचने के लिए बीमारी का बहाना बनाना शुरू कर दिया है।

मेहुल चोकसी की गिरफ़्तारी के बाद बारबरा जबारिका नामक महिला एक बार फिर से चर्चा में आ गई है। बता दें कि चोकसी को लेकर ये बात सुर्ख़ियों में आई थी कि उसे ‘हनी ट्रैप’ में फँसाया गया था और उसका अपहरण किया गया था। इसी दौरान उसने बारबरा जबारिका नामक हंगरी की एक महिला का नाम भी लिया था।

दरअसल, 2018 में चोकसी भारत से फरार हो गया और बैंक धोखाधड़ी के बाद कार्रवाई से बचने के लिए एंटीगुआ और बारबुडा में उतरा। उसने कुछ निवेश करके वहाँ की नागरिकता हासिल की। ​​2021 में वह डोमिनिका में दिखाई दिया और अवैध तरीके से प्रवास के लिए गिरफ्तार किया गया। हालाँकि कुछ दिनों तक जेल में रहने के बाद उसे रिहा कर दिया गया।

तभी बारबरा जबारिका का मामला सामने आया था। चोकसी ने दावा किया था कि उसे अगवा किया गया, प्रताड़ित किया गया और एक नाव पर बिठाया गया जो उसे एंटीगुआ से डोमिनिका ले गई और बारबरा पूरी साजिश का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थी।

कौन है बारबरा जबारिका?

जानकारी के मुताबिक हंगरी की नागरिक बारबरा जबारिका एक ‘प्रॉपर्टी इन्वेस्टमेंट एजेंट’ है। खुद को सेल्स नेगोशिएटर बताती है। बारबरा रियल एस्टेट और डायरेक्ट सेल्स के क्षेत्र में काम कर चुकी है।

मेहुल चोकसी ‘हनी ट्रैप’ में फँसा था

मेहुल चोकसी ने खुद को ‘हनी-ट्रैप’ और अपहरण की साजिश का शिकार बताया था। इस दौरान उसने बारबरा जबारिका का नाम लिया। चोकसी ने कहा, ” हंगरी की रहने वाली बारबरा जबारिका ने हनी-ट्रैप में फँसाया।” वहीं 2020 में मेहुल चौकसी की पत्नी प्रीति चौकसी के दावा किया था कि बारबरा जबारिका के प्यार में मेहुल चोकसी फँस गए हैं।

मैं चौकसी की गर्लफ्रेंड नहीं- बारबरा

मेहुल चोकसी ने दावा किया था कि बारबरा जबारिका ने उससे झूठी दोस्ती की और उसका अपहरण करवाया। चौकसी के मुताबिक अपहरण से ठीक पहले उसे रात के डिनर पर बुलाया गया और जबरन पकड़ कर ले जाया गया। हालाँकि बारबरा ने इन दावों को खारिज कर दिया और कहा कि वह चौकसी की गर्लफ्रेंड नहीं है।

‘राज’ बन कर मिला चौकसी- बारबरा

बारबरा ने दावा किया कि उसके पास नौकरी है, पैसे है। उसे किसी की मदद की कोई जरूरत नहीं है। उसने आगे दावा किया कि मेहुल चोकसी ने अपनी पहचान को गलत बताया और खुद को ‘राज’ कहा।

बारबरा ने ये भी दावा किया, “राज ने ही सबसे पहले मुझसे संपर्क किया था। उसने मेरा नंबर माँगा और मुझसे दोस्ती की। उसकी पत्नी जो कह रही हैं, वो सच नहीं है।”