Home Blog Page 4272

भारत ने कनाडा के उच्चायुक्त को किया तलब, ‘किसानों के प्रदर्शन’ पर जस्टिन ट्रूडो ने की थी बयानबाजी

भारत के विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार को कनाडा के उच्चायुक्त को तलब कर कहा कि किसानों के आंदोलन के संबंध में कनाडाई प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो और वहाँ के अन्य नेताओं की टिप्पणी देश के आंतरिक मामलों में “अस्वीकार्य हस्तक्षेप” के समान है।

MEA ने एक प्रेस बयान जारी करते हुए कहा कि अगर इस तरह की कार्रवाई जारी रहती है तो इसका भारत और कनाडा के बीच के संबंधों पर प्रभाव पड़ेगा। बयान में आगे कहा गया कि इस तरह के बयानों से चरमपंथी समूहों को प्रोत्‍साहन मिला है और वे कनाडा स्‍थित हमारे उच्‍चायोग व काउंसलेट तक पहुँच सकते हैं, जो हमारी सुरक्षा के लिए चुनौती है। भारत यह भी उम्मीद करता है कि कनाडा उन घोषणाओं से परहेज करेगा जो चरमपंथी सक्रियता को वैध बनाती हैं।

MEA का बयान

दरअसल, कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो और उनके मंत्रियों ने 1 दिसंबर को भारत में चल रहे किसानों के विरोध पर चिंता व्यक्त की थी। वर्चुअल गुरपुरब 2020 समारोह के दौरान पीएम ट्रूडो ने अपने संबोधन की शुरुआत में भारत में किसानों के विरोध प्रदर्शनों के बारे में बात की थी। इस बातचीत में नवदीप एस बैंस, हरजीत सज्जन और बर्दिश चग्गर सहित सिख समुदाय के मंत्री शामिल हुए थे।

ट्रूडो ने विरोध-प्रदर्शनों के बारे में बात करते हुए कहा, “भारत से किसानों के आंदोलन के बारे में खबर आ रही है। स्थिति चिंताजनक है और सच्चाई यह है कि आप भी अपने दोस्तों और परिवारों को लेकर फिक्रमंद हैं। मैं याद दिलाना चाहता हूँ कि कनाडा ने हमेशा शांतिपूर्ण तरीके से विरोध-प्रदर्शन के अधिकार का समर्थन किया। हम बातचीत में विश्वास करते हैं। हमने भारतीय अधिकारियों के सामने अपनी चिंताएँ रखी हैं।” जस्टिन ट्रूडो ही नहीं कनाडा के कई अन्य मंत्रियों ने भी किसानों के विरोध पर टिप्पणी करके भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप किया था।

वहीं इस मामले में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने कहा, “हमने कनाडाई नेताओं द्वारा भारत में किसानों से संबंधित कुछ ऐसी टिप्पणियों को देखा है जो भ्रामक सूचनाओं पर आधारित हैं। इस तरह की टिप्पणियाँ अनुचित हैं, खासकर जब वे एक लोकतांत्रिक देश के आंतरिक मामलों से संबंधित हों।”

गौरतलब है कि भारत में हो रहे किसान विरोध-प्रदर्शन को काफी हद तक खालिस्तानी तत्वों द्वारा हाईजैक किया गया है। ऑपइंडिया ने रिपोर्ट किया था कि पाकिस्तान द्वारा वित्त पोषित संगठन SFJ ने पहले खालिस्तान के समर्थन के बदले पंजाब और हरियाणा में किसानों के लिए $ 1 मिलियन का अनुदान घोषित किया था। बता दें इसके अलावा सितंबर में ही, प्रतिबंधित प्रो-खालिस्तानी समूह सिख फॉर जस्टिस (एसएफजे) ने अपने अलगाववादी एजेंडे का समर्थन करने वाले मतदाताओं के पंजीकरण के लिए एक डोर-टू-डोर अभियान की घोषणा की थी जिसे ‘रेफरेंडम 2020’ का नाम दिया गया था।

बता दें एक तरफ जहाँ इस प्रदर्शन को खालिस्तानी समर्थकों द्वारा हाइजैक किया गया है तो वहीं इस प्रदर्शन में पीएम मोदी को जान से मारने की धमकी और उनके विरोध में नारे भी लगाए जा रहे है। किसानों द्वारा किए जा रहे इस प्रदर्शन में खालिस्तानी समर्थकों ने जरनैल सिंह भिंडरावाले के समर्थन में भी नारे लगाए हैं।

‘इंदिरा सरकार के कारण देश छोड़ना पड़ा, पति ने दम तोड़ दिया’: आपातकाल के जख्म लेकर 94 साल की विधवा पहुँचीं सुप्रीम कोर्ट

आजाद भारत के इतिहास में आपातकाल का काला दौर आज भी लोगों की स्मृतियों से धुँधला नहीं हुआ है। यही वजह है कि 94 साल की विधवा वीरा सरीन 45 साल बाद इंसाफ माँगने सुप्रीम कोर्ट पहुँची हैं। इस विधवा की गुहार है कि साल 1975 में इंदिरा गाँधी के शासन के दौरान लागू किया गया आपातकाल असंवैधानिक घोषित किया जाए और उन्हें मुआवजे के तौर पर 25 करोड़ रुपए दिलवाए जाएँ।

94 साल की वीरा सरीन चाहती हैं कि चार दशक पहले उनका और उनके बच्चों का जो भी आपातकाल की वजह से नुकसान हुआ, उसकी अब भरपाई हो। सुप्रीम कोर्ट में डाली गई याचिका के अनुसार, तत्कालीन सरकार (इंदिरा सरकार) ने उनके पति और उन पर ‘अनुचित और मनमाने ढंग से डिटेंशन के आदेश’ जारी किए। इसके कारण उन्हें देश छोड़ना पड़ा। सरकार के आदेशों से उनका बिजनेस ठप्प हो गया। वहीं कई मूल्यवान वस्तुओं को अपने कब्जे में ले लिया। 

याचिका में कहा गया है कि सरकार का यह अत्याचार याचिकाकर्ता के पति बर्दाश्त नहीं कर पाए और उन्होंने दबाव में आकर दम तोड़ दिया। इसके बाद वह अकेले हर परेशानी को झेलती रहीं और उन कार्रवाइयों को खुद ही सामना किया जो उनके ख़िलाफ़ आपातकाल में शुरू हुई थीं।

साल 2014 में उस मामले से जुड़ी सारी प्रोसीडिंग को खत्म किया गया, लेकिन उनके पति की अचल संपत्ति उन्हें अब तक वापस नहीं मिली है जो उनसे आपातकाल के समय अवैध रूप से छीनी गई थी।। दुखद यह है कि कुछ समय पहले याचिकाकर्ता के बेटे ने अपनी माँ के जेवरों के कुछ चोरी हुए हिस्सों को नई दिल्ली की एक सेल में देखा था।

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एस के कौल के समक्ष उनके मामले पर अब 7 दिसंबर को सुनवाई होगी। यहाँ बता दें कि वीरा की शादी 1957 में एचके सरीन से हुई थी। सरीन करोल बाग और कनॉट प्लेस में उत्कर्ष कला व रत्न का व्यवसाय करते थे। जब आपातकाल लागू हुआ तो सरीन की बेशुमार दौलत को सरकार ने जब्त कर लिया। लंबे समय तक उनके परिवार के लोग सरकार के अत्याचार का शिकार बने रहे।

अब वीरा कीमती रत्नों का व्यावसाय करने वाले अपने पति की दौलत की लूट को लेकर अधिकारियों पर सारी जिम्मेदारी तय करते हुए 25 करोड़ की हर्जाना माँग रही हैं। महिला फिलहाल देहरादून में अपने बेटे के साथ रहती हैं और उनके द्वारा दायर याचिका में गृह मंत्रालय को भी एक पक्षकार बनाया गया है। वह चाहती हैं कि उनकी माँग पर सुनवाई हो, ताकि जीवन भर वह जिस पीड़ा से गुजरीं और दुख उठाया, उन सब पर विराम लगे।

‘विरोध-प्रदर्शन से कोरोना भयावह होने का खतरा’: दिल्ली बॉर्डर से प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका

प्रदर्शनरत किसानों को दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र की सीमा के नज़दीक से हटाए जाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है। दिल्ली में कोविड 19 महामारी के ख़तरे का हवाला देते हुए याचिका में प्रदर्शन करने वाले किसानों को वहाँ से हटाने की माँग की गई है। अधिवक्ता ओमप्रकाश परिहार द्वारा दायर की गई याचिका में कहा गया है कि प्रदर्शनकारियों की वजह से ‘आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाएँ’ बाधित हो रही हैं। 

याचिका के अनुसार, “जैसा कि पिछले कुछ समय में देखा गया है कि राजधानी में महामारी अपने चरम है और इसका दायरा लगातार बढ़ता ही जा रहा है। इस बात को मद्देनज़र रखते हुए यह बेहद आवश्यक हो चुका है कि किसानों के इस विरोध-प्रदर्शन को जल्द से जल्द रुकवाया जाना चाहिए। प्रदर्शन करने वालों को उस जगह पर विरोध करना चाहिए, जहाँ उनके लिए जगह सुनिश्चित की गई है और इस दौरान उन्हें कोरोना महामारी के संबंध में जारी किए गए दिशा-निर्देशों का पालन भी करना चाहिए।”

याचिका में इस बात का अनुरोध किया गया है कि राजधानी की सीमा पर जिस तरह प्रदर्शन की सूरत में इतनी भीड़ इकट्ठा हो रही है वह कोरोना महामारी के दृष्टिकोण से भयावह है। इस ख़तरे का संज्ञान लेते हुए प्रदर्शनकारियों को जल्द से जल्द उस जगह पर भेजा जाए जो उनके लिए सरकार द्वारा तय की गई है। 

बीते 26 नवंबर से हज़ारों की तादाद में किसान दिल्ली के सीमावर्ती इलाकों में केंद्र सरकार द्वारा पारित किए गए ‘कृषि सुधार विधेयकों’ को लेकर विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं। विरोध-प्रदर्शन बढ़ने के बाद केंद्र सरकार ने किसानों के समक्ष बातचीत का प्रस्ताव रखा था। फ़िलहाल इस बातचीत को लेकर नतीजे आने में समय है। किसानों का प्रदर्शन जारी है और उनका कहना है कि यह क़ानून वापस लिया जाए। 

याचिकाकर्ता का कहना है कि दिल्ली पुलिस ने शुरुआत में इन प्रदर्शनकारियों को रोका था, लेकिन बाद में इन्हें राजधानी स्थित निरंकारी मैदान, बुराड़ी में विरोध-प्रदर्शन जारी रखने की अनुमति दी थी। इसके बावजूद प्रदर्शनकारियों ने दिल्ली की सीमा को बंद कर रखा है और किसी को भी वहाँ से जाने नहीं दे रहे हैं। उल्लेखनीय है कि सीएए और एनआरसी के विरोध में शाहीन बाग़ में हुए प्रदर्शन को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि प्रदर्शन के दौरान रोड ब्लॉक करना असंवैधानिक है। 

सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता ने कहा कि रास्ता जाम करने और आम नागरिकों को असुविधा पहुँचाने वाले विरोध-प्रदर्शन को अनुमति नहीं मिलनी चाहिए। याचिका में कहा गया है, “इस प्रदर्शन की वजह से दिल्ली के लाखों लोगों की जान ख़तरे में पड़ सकती है, क्योंकि कोरोना संक्रमण से होने वाली महामारी है। अगर इस बीच कम्युनिटी स्प्रेड होता है तो उससे हालात भयावह हो जाएँगे, इसलिए अदालत से अनुरोध है कि इस मामले में जल्द से जल्द उचित कदम उठाया जाए।”   

टेरर फंडिंग वाले विदेशी संगठनों से AIUDF के अजमल फाउंडेशन को मिले करोड़ों, असम में कॉन्ग्रेस की है साथी

बदरुद्दीन अजमल (Badruddin Ajmal) की पार्टी AIUDF (ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक फ्रंट) असम में कॉन्ग्रेस की साझेदार रही है। इसी AIUDF से जुड़े अजमल फाउंडेशन (Ajmal Foundation) पर विभिन्न संदिग्ध स्रोतों से 69.55 करोड़ रुपए की विदेशी फंडिंग लेने का आरोप लगा है।

संस्था पर यह आरोप लीगल एक्टिविस्ट समूह, लीगल राइट्स ऑब्जर्वेटरी (LRO) ने लगाया है। इनका कहना है कि अजमल फाउंडेशन को मिला फंड ऐसे स्रोतों से मिले हैं जो टेरर फाइनेंसिंग और मनी लॉन्ड्रिंग की गतिविधियों में संलिप्त हैं।

LRO ने कहा है कि एनजीओ को मिली फंडिंग में से वह 2.05 करोड़ रुपए खर्च ‘शिक्षा’ पर कर चुके हैं और बाकी का पैसा AIUDF को पहुँचाया जा चुका है, ताकि वह असम की राष्ट्रवादी पार्टियों को टक्कर दे सकें।

अपने थ्रेड में LRO ने तुर्की, फिलिस्तान और ब्रिटेन के इस्लामी आतंकी समूहों के नाम खुलासा किया, जो अजमल फाउंडेशन को फंडिंग दे रहे हैं।

विदेश के आतंकी संगठनों से AIUDF के लिंक

यूके का अल इम्दाद फाउंडेशन (Al Imdaad Foundation) इनमें से एक है। इस फाउंडेशन के संबंध फिलिस्तीनी टेरर ग्रुप हमस (Hamas) से जुड़े हैं, जो इजरायल के ख़िलाफ कई बार बमबारी कर चुका है। ये फाउंडेशन हलाल सर्टिफिकेशन फीस लाखों में इकट्ठा करता है और फिर वही पैसा आतंकी गतिविधियों में लगाता है।

अगला समूह उम्माह वेल्फेयर ट्रस्ट ( Ummah Welfare Trust) है। इस इस्लामी संगठन पर मनी लॉन्ड्रिंग और टेरर फाइनेंसिंग के आरोप हैं। गल्फ आधारित अखबार अल अरबिया की रिपोर्ट में पिछले दिनों इस बात का उल्लेख हुआ था कि यूएस ने इसे आतंकवादी ईकाई के रूप में नामित किया है।

अजमल फाउंडेशन को तुर्की के इंसानी यरदीम वक्फी (Insani Yardim Vakfi) से भी पैसा आता है। इसका संबंध अल-कायदा और ग्लोबल जिहाद नेटवर्क से है। रिपोर्ट बताती हैं कि साल 2014 में इस ग्रुप ने अल-कायदा को हथियार दिए थे। इस समूह के संबंध PFI से भी हैं।

उल्लेखनीय है कि देश के पीएफआई और सिमी जैसे कट्टरपंथी समूह कई राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में पैसा लगाने के कारण कुख्यात हैं। हाल में इनके संबंध ISIS से मालूम हुए थे, लेकिन इससे जुड़े लोग फिर भी अल-कायदा से जुड़े संगठनों से मिलते रहे। तुर्की के इंसानी यरदीम वक्फी समूह ने पीएफआई नेताओं से साल 2018 में मुलाकात की थी।

तुर्की के इंसानी यरदीम वक्फी के नेताओं ने की पीएफआई सदस्यों से मुलाकात (साभार: www.ournortheast.com)

अजमल फाउंडेशन को डोनेशन देने वाले अगले समूह का नाम Muslim Aid UK है। इसके संबंध भी कश्मीर में आतंक मचाने वाले आतंकी समूह हिजबुल मुजाहिद्दीन से हैं। असम के एक स्थानीय अखबार में ही इसके आतंकी कनेक्शन का उल्लेख पढ़ने को मिल जाता है।

यहाँ बता दें कि LRO ने इस पूरे मामले पर अपने पास इकट्ठा हुई सारी जानकारी गृह मंत्रालय को भेजी है और आरोप लगाया है कि इन्हें मिलने वाली फंडिग FCRA के रूल्स का उल्लंघन करती है, इसलिए इनके लाइसेंस को रद्द किया जाना चाहिए।

AIUDF और कई विवाद

बदरुद्दीन अजमल और उनकी पार्टी कई बार अवैध गतिविधियों के कारण विवादों का कारण बनी है। हाल में असम में ग्रूमिंग जिहाद (लव जिहाद) के ख़िलाफ़ कानून लाने पर बात करते हुए भाजपा नेता हिमंत बिस्व शर्मा ने बदरुद्दीन अजमल की पार्टी व समर्थकों पर आरोप लगाए थे।

उन्होंने कहा था कि असम की बच्चियाँ अजमल कल्चर का फेसबुक पर निशाना बन रही हैं। इस्लामी कट्टरपंथियों को अजमल जैसे नेताओं का प्रोत्साहन मिल रहा है कि वह असम की हिंदू लड़कियों को निशाना बनाएँ और झूठी पहचान के साथ अपने जाल में फँसाएँ।

इसके अलावा साल 2012 में AIUDF पर जिहादी फोर्स को असम में ट्रेनिंग देने का इल्जाम लग चुका है। मगर तब भी कॉन्ग्रेस पार्टी साल 2021 में इनके साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ने को तैयार है। 

कुछ समय पहले नेता प्रतिपक्ष देवव्रत सैकिया (Debabrata Saikia ) ने कहा था कि कॉन्ग्रेस पार्टी उन सभी लोगों से हाथ मिलाने के लिए तैयार है, जिन्होंने नागरिकता संशोधन अधिनियम का विरोध किया था। उन्होंने अपनी बात में जोर देकर कहा था कि अकेले AIUDF के साथ गठबंधन से पार्टी को फायदा हो सकता है।

भाजपा ने इस बयान के बाद गठबंधन की बात पर सवाल उठाए थे और AIUDF के राष्ट्रविरोधी चेहरे का खुलासा किया था। भाजपा ने कहा था कि ऐसी साजिशें राज्य को नुकसान पहुँचा सकती हैं। भाजपा ने बताया था कि कॉन्ग्रेस शासन में कई अवैध प्रवासी यहाँ आए जिससे यहाँ की डेमोग्राफी बदली और कई स्थानीय लोग अपनी जगह छोड़ने को मजबूर हुए।

3 दिन में 3 मर्डर: अररिया का मुहम्मद रजी गुरुग्राम में बन गया सीरियल किलर, पहले लूटता था फिर निर्मम तरीके से करता था कत्ल

साइबर सिटी में सिलसिलेवार हत्या और लूट की वारदात को अंजाम देने वाले एक सीरियल किलर को गुरुग्राम पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। आरोपित का नाम मुहम्मद रजी है और वह मूलरूप से बिहार के अररिया जिले के रहने वाला है। जाँच के दौरान मुहम्मद रजी ने लूट के बाद पकड़े जाने के डर से लगातार 3 दिन में 3 हत्याएँ करने की बात कबूल कर ली है।

रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली से सटे हरियाणा के गुरुग्राम में सीरियल किलर मुहम्मद रजी ने 24, 25 और 26 नवंबर की रात को 3 लोगों की निर्मम हत्या कर दी थी। पुलिस पूछताछ में रजी ने खुलासा किया कि वह लूटपाट के इरादे से राह चलते लोगों को शिकार बनाता था। फिर पकड़े जाने के डर से लूटने के बाद उनकी हत्या कर देता था।

दैनिक जागरण की रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस ने 24 नवंबर को सेक्टर-29 थाना इलाके से एक लाश बरामद की थी। उसके अगले दिन 25 नवंबर की शाम को दिल्ली-जयपुर हाइवे किनारे गाँव झाड़सा के नजदीक पार्क से एक शव बरामद किया गया था। तीसरी लाश पुलिस ने 26 नवंबर को सेक्टर-47 इलाके की झाड़ियों से बरामद की थी, जिसका सर धड़ से अलग था।

25 और 26 नवंबर को मिली लाशें उत्तरप्रदेश के रहने वाले दो युवकों की थी। पुलिस पूछताछ में मुहम्मद रजी ने कबूल किया कि यह हत्याएँ उसी ने लूटपाट करने के बाद पकड़े जाने के डर से की थी। दरअसल पुलिस को तलाशी के दौरान मुहम्मद रजी का पता चला था। शक होने पर पुलिस ने दबिश देते हुए उसे धर दबोचा और पूछताछ करने पर उसने वारदातें अंजाम देने की बात स्वीकार कर ली।

गौरतलब है कि लगातार 3 दिनों में तीन शव मिलने पर पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया था। इसके बाद क्राइम ब्रांच की पालम विहार एवं सेक्टर-40 टीम को मामले के जानकारी दी गई। जाँच के दौरान दोनों टीमों ने संयुक्त ऑपरेशन चलते हुए आरोपित को अपने गिरफ्त में कर लिया। बता दें कि इससे पहले वर्ष 2006 एवं 2018 के दौरान भी गुरुग्राम में सीरियल किलर कांड सामने आया था।

हिजाब वाली पहली मॉडल का इस्लाम पर करियर कुर्बान, कहा- डेनिम पहनने के बाद खूब रोई; नमाज भी कई बार छोड़ी

इस्लाम को बढ़ावा देने के नाम पर एक और मुस्लिम लड़की ने अपने करियर की कुर्बानी दे दी है। इस लड़की का नाम हलीमा अदन (Halima Aden) है। हलीमा 23 वर्ष की मुस्लिम अमेरिकन मॉडल थीं। हाल में उन्होंने इस्लाम के लिए फैशन इंडस्ट्री को अलविदा कहने का फैसला किया। उनका कहना है कि इस इंडस्ट्री में कई ऐसी चीजें होती हैं जो उनके मजहब के ख़िलाफ़ है।

हलीमा के इस तरह फैशन इंडस्ट्री छोड़ने की जानकारी इंस्टाग्राम के फेमस अकाउंट डाइट प्राडा (Diet Prada ) ने दी है। सोमाली अमेरिकन मॉडल सबसे पहले चर्चा में साल 2016 में आई थीं। वह केन्या के रिफ्यूजी कैंप में पली-बढ़ी थीं। साल 2016 के Miss Minnesota USA pageant में उन्होंने हिजाब पहनकर भाग लिया। इसके बाद वह American Vogue, Vogue Arabia, Elle and Allure का फीचर कवर बनीं। इसके अलावा हलीमा पहली मॉडल थीं, जिन्होंने स्पोर्ट्स इलस्ट्रेटेड स्विमसूट एडिशन के लिए भी हिजाब पहना।

अमेरिकी मॉडल हलीमा अदन
हलीमा अदन

‘रैंप से बुरी ऊर्जा आती है, मुझे हिजाब के नाम पर डेनिम पहनने को किया मजबूर‘

अपने इंस्टाग्राम स्टोरी की पूरी एक श्रृंखला में 23 साल की हिजाब पहनने वाली मॉडल ने फैशन रैंप के बारे में अपनी राय रखी थी। इसमें उन्होंने बताया था कि फैशन रैंप से बुरी ऊर्जा निकलती है। इसके कारण कई बार उन्हें अपनी नमाज छोड़नी पड़ी। कई बार वह अपने मजहबी कार्य नहीं कर पाईं, क्योंकि उन्हें प्रोजेक्ट करने होते थे।

अपने 1.2 मिलियन फॉलोवर्स को अदन ने बताया कि इस कोरोना महामारी के समय में उन्हें अपने मूल्यों पर ध्यान देने का अवसर मिला और उन्हें एहसास हुआ कि उन्हें अपना मार्ग छोड़ना चाहिए।

अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी में अदन ने अपनी पुरानी फोटो डाली और दावा किया कि वह फैशन इंडस्ट्री में बहुत असहज थीं। उन्होंने ये भी बताया कि कैसे उन्हें पहले सिर पर डेनिम पहनने के लिए फोर्स किया गया और फिर कैसे सिर पर हिजाब इस तरह बाँधने के लिए मजबूर किया गया कि जिससे उन्हें लगा वह अपने मजहब को धोखा दे रही हैं।

अदन कहती हैं कि अमेरिकन इगेल आउटफिटर्स के साथ डेनिम फोटोशूट के बाद वह खुद को कमरे में बंद करके बहुत देर तक रोईं। इससे पहले उन्होंने कभी जींस नहीं पहनी थी। इससे उनका उद्देश्य न केवल पराजित हुआ, बल्कि उनके विश्वास (faith) को भी चोट लगी।

उन्होंने लिखा, “लेकिन..ये मेरा स्टाइल नहीं था? कभी नहीं। मैंने उन्हें क्यों इजाजत दी कि मेरे सिर पर जींस रखें जब मैंने सिर्फ स्कर्ट या लंबी ड्रेस ही पहनती थी?” आगे उन्होंने कहा, “मैं अपने होटल के कमरे में आई और उस शूट के बाद खूब रोई। मैं जानती थी वो मैं नहीं हूँ। लेकिन बोलने में मुझे बहुत डर लगा।”

उनके अनुसार, इस फोटोशूट के बाद उन्होंने खुद को बहुत असहज पाया। उन्हें ऐसा लगा जैसे उन्होंने खुद को खो दिया। अदन मानती हैं कि सब गलती उनसे हुई कि उन्होंने ऐसे प्रोजेक्ट उठाए। लेकिन फिर भी फैशन इंडस्ट्री को कोसती हैं कि इस उद्योग में मुस्लिम स्टाइलिस्ट नहीं है जो निजी रूप से इस बात को समझें कि हिजाब पहनना उनके लिए सब कुछ है।

मॉडल कहती है, “मुझे याद है कि मेरे पास रास्ता दिखाने वाला कोई नहीं था। मैंने अपनी गलतियों से, अपने अनुभव से सीखा। मैंने अच्छा किया लेकिन वह काफी नहीं। हम ये वार्तालाप कर रहे हैं ताकि सिस्टम को सही तरीके से बदल सकें।”

हलीमा के मुताबिक अगर कोई प्रोजेक्ट उन्हें उनकी मजहबी मूल्यों के समझौता करने को कहेगा तो वह उसे कभी नहीं लेंगी, चाहे उसके बदले उन्हें 10 मिलियन डॉलर ही क्यों न दिए जाएँ। उनका कहना है कि अब वह समझ चुकी हैं कि एक हिजाबी होने के नाते उन्होंने क्या गलतियाँ की।

ध्यान दिला दें कि अदन पहली मुस्लिम महिला नहीं है, जिनके करियर पर इस्लाम हावी हुआ हो। भारत में दंगल फिल्म की कलाकर जायरा वसीम ने भी पिछले साल इंस्टाग्राम पर ऐसी घोषणा की थी। इस्लाम को वजह बताकर उन्होंने भी बॉलीवुड को अलविदा कहा था। इसके बाद सना खान ने भी इस्लाम का हवाला देकर मनोरंजन इंडस्ट्री को छोड़ दिया था।

लखनऊ: प्रशासन को बताए बिना हिन्दू युवती से मुस्लिम युवक कर रहा था शादी, नए अध्यादेश का हवाला देकर पुलिस ने रोकी

हाल ही में उत्तर प्रदेश की योगी सरकार धर्म परिवर्तन को लेकर नया अध्यादेश लेकर आई है। इस अध्यादेश के उल्लंघन का हवाला देते हुए पुलिस ने उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में बुधवार (2 दिसंबर 2020) को एक अंतर धार्मिक विवाह रुकवाया। लखनऊ के पारा क्षेत्र में हिन्दू युवती और मुस्लिम युवक शादी करने जा रहे थे। इसकी सूचना हिन्दू संगठनों ने पुलिस को दी। इसके बाद मौके पर पहुँच पुलिस ने शादी रुकवाई। 

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ युवक और युवती ने आपसी सहमति के बाद शादी करने का निर्णय लिया था। पुलिस ने विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश का हवाला देते हुए कहा कि शादी के पहले दोनों को जिलाधिकारी से ‘अनुमति’ लेनी होगी। हिन्दू युवती का नाम रैना गुप्ता (22) है, वह रसायन शास्त्र से पोस्ट ग्रेजुएट है और मुस्लिम युवक मोहम्मद आसिफ (24) फार्मासिस्ट है। 

इस घटना के संबंध में जानकारी देते हुए एडिशनल डीएसपी साउथ सुरेश चन्द्र रावत ने कहा, “लखनऊ के पारा क्षेत्र में यह शादी होनी थी। तय योजना के मुताबिक़ पहले हिन्दू परम्पराओं के आधार पर शादी होनी थी। इसके बाद मुस्लिम रिवाजों से निकाह भी होना था। युवक और युवती के परिजन इससे सहमत भी थे, लेकिन पुलिस ने घटना की जानकारी मिलते ही शादी रोक दी।” उन्होंने यह भी कहा कि इस विवाह को उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश 2020 की धारा 3 और 8 (खंड दो) के आधार पर रोका गया है।  

घटना के संबंध में विस्तार से जानकारी देते हुए इंस्पेक्टर त्रिलोकी सिंह ने कहा कि नरपतखेड़ा के डूडा कॉलोनी निवासी विजय गुप्ता की बेटी रैना की शादी मोहम्मद आसिफ के साथ हो रही थी। राष्ट्रीय युवा वाहिनी के प्रदेश संयोजक (अल्पसंख्यक मोर्चा) मोहम्मद यासिर खान और अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के जिलाध्यक्ष ब्रजेश कुमार शुक्ला ने इस विवाह के बारे में सूचित किया।

इसके बाद पुलिस ने बुधवार शाम लगभग 4 से 5 बजे के बीच मौके पर पहुँच कर शादी रोकने की बात कही। पुलिस ने दोनों पक्षों को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा हाल ही में लाए गए अध्यादेश के बारे में बताया। पुलिस ने दोनों पक्षों को इसकी पूरी प्रक्रिया भी समझाई और कहा इसके बिना शादी संभव नहीं है। 

इस बात पर युवक और युवती दोनों ने सहमति जताई। लड़की के परिजनों का कहना था कि उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी कि अंतर धार्मिक विवाह के लिए दोनों पक्षों के सहमत होने के बावजूद जिला मजिस्ट्रेट की मंज़ूरी के बाद ही शादी हो सकती है। उन्होंने कहा कि अब वह मजिस्ट्रेट से अनुमति लेकर शादी करेंगे।  

राहुल गाँधी की क्षमता पर शरद पवार ने फिर उठाए सवाल, कहा- उनमें निरंतरता की कमी, पर ओबामा को नहीं कहना चाहिए था

राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (राकांपा) केंद्र और महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली सरकारों का हिस्सा रही है। महाराष्ट्र की मौजूदा सरकार में भी दोनों दल शामिल हैं। फिर भी राकांपा प्रमुख शरद पवार समय-समय पर कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाते रहते हैं। उन्होंने कहा है कि राहुल गाँधी में एक राष्ट्रीय नेता के रूप में कुछ हद तक ‘निरंतरता’ की कमी लगती है। इससे पहले चीन को लेकर राहुल गाँधी की बयानबाजी पर सवाल उठाते हुए पवार ने कहा था कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर राजनीति नहीं की जानी चाहिए।

लोकमत मीडिया के अध्यक्ष और पूर्व सांसद विजय दर्डा को दिए हालिया साक्षात्कार में पवार ने राहुल गाँधी की निरंतरता को लेकर बयान दिया। यह पूछे जाने पर कि क्या वायनाड के सांसद को देश का नेता मानने के लिए तैयार है, पवार ने जवाब दिया, “ इस संबंध में कुछ सवाल हैं। उनमें निरंतरता की कमी लगती है।”

गौरतलब है कि शरद पवार की राकांपा महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस पार्टी और शिवसेना के साथ गठबंधन में है और वर्तमान में राज्य में शासन कर रही महा विकास अघाड़ी सरकार का हिस्सा भी है।

हालाँकि पवार ने राहुल पर बराक ओबामा की टिप्पणियों को लेकर आपत्ति जताई। दरअसल, ओबामा ने अपने हाल ही में प्रकाशित संस्मरण में कहा है कि राहुल गाँधी शिक्षक को प्रभावित करने के लिए उस उत्सुक छात्र की तरह लगते हैं जिसमें विषय में महारत हासिल करने के लिए योग्यता और जुनून की कमी है। इसको लेकर पवार ने कहा कि यह जरूरी नहीं है कि हम सभी के विचार को स्वीकार करें।

पवार ने कहा, “मैं अपने देश के नेतृत्व के बारे में कुछ भी कह सकता हूँ। लेकिन मैं दूसरे देश के नेतृत्व के बारे में बात नहीं करूँगा। सभी को उस सीमा को बनाए रखना चाहिए। मुझे लगता है कि ओबामा ने उस सीमा को पार कर लिया।”

कॉन्ग्रेस के भविष्य और यह पूछे जाने पर कि क्या राहुल गाँधी पार्टी के लिए ‘बाधा’ बन रहे हैं तो पवार ने वायनाड सांसद का बचाव करते हुए कहा कि किसी भी पार्टी का नेतृत्व इस बात पर निर्भर करता है कि संगठन के भीतर उन्हें कैसे स्वीकार किया जाता है। एनसीपी प्रमुख ने कहा,”कॉन्ग्रेस प्रमुख सोनिया गाँधी और उनके परिवार के साथ मेरे मतभेद हैं, लेकिन आज भी कॉन्ग्रेसियों में गाँधी परिवार के प्रति स्नेह की भावना है।”

उल्लेखनीय है कि राहुल गाँधी पर पवार द्वारा की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देने के लिए कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता सचिन सावंत सबसे पहले सामने आए। सावंत ने कहा, “हमें नहीं पता कि पवार साहब ने किस संदर्भ में टिप्पणी की है। हालाँकि, कॉन्ग्रेस और हमारे नेता राहुल गाँधी आरएसएस और मोदी सरकार के विरोध में किसी भी अन्य पार्टी की तुलना में अधिक सुसंगत रहे हैं।”

शरद पवार की टिप्पणी के बचाव में भले कॉन्ग्रेस नेता सामने आए हों लेकिन 2019 के आम चुनावों में करारी हार के बाद से राहुल गाँधी के नेतृत्व को लेकर पार्टी की भीतर भी लगातार सवाल उठ रहे हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने अगस्त 2020 में सोनिया गाँधी को पत्र लिखकर पार्टी में व्यापक बदलाव की माँग की थी।

जब नक्सलियों की ‘क्रांति के मार्ग’ में डिल्डो अपनी जगह बनाने लगता है तब हथियारों के साथ वाइब्रेटर भी पकड़ा जाता है

कल सुरक्षा बलों ने पलामू के सलामदिरी में माओवादी आतंकियों के साथ हुई मुठभेड़ में ‘हथियार’ पकड़े। पीआईबी त्रिपुरा ने इसकी जानकारी देते हुए दो तस्वीरें शेयर की जिसमें पिस्तौल-बंदूक, गोली और मोबाइल फोन आदि के साथ दो और भी ‘क्रांतिकारी’ वस्तुएँ नजर आईं जो हल्के गुलाबी और गहरे गुलाबी रंग की थीं।

आम तौर पर माओवंशी वामपंथी छात्राओं को नशा खिला कर बलात्कार करने से ले कर जंगलों में नव-वामपंथनों को सेक्स गुलाम बना कर इस्तेमाल करने के लिए कुख्यात रहे हैं, अतः गुलाबी रंग के दो शेड में दिख रहे इन दो वस्तुओं को देख कर लोगों की जिज्ञासा जगी तो उस पर सबका ध्यान गया।

एक वस्तु जो आकार में छोटी है, और उससे तार जुड़े दिख रहे हैं, कथित तौर पर उसे ‘वाइब्रेटर’ कहा जा रहा है। हालाँकि, कुछ लोग उसे यूएसबी/बैटरी संचालित पंखा भी कह रहे हैं। दूसरे लोग ऐसे लोगों को ‘भोला-भाला’ बताते हुए कह रहे हैं कि बगल में जो दूसरा यंत्र है, उसे शायद कूलर या एसी न कह दिया जाए।

सॉल्ट न्यूज की तकनीक द्वारा जाँच

हमने सॉल्ट न्यूज की पेटेंटेड उन्नत तकनीक का प्रयोग कर के गूगल पर रीवर्स इमेज सर्च किया तो उसे ‘सेक्स ट्वॉय’ यानी कि ‘यौन आनंद प्रदान करने वाला यंत्र’ कहा गया। फिर हमने पंचर और रबर मामलों के जानकार मोहम्मद जुबैर को फोन कर के पता किया कि फोटो में जो दिख रहा है, वो वही है क्या।

जुबैर ने फोन पर बात करते हुए बताया, “देखिए, मेरा तो दिन-रात का काम रबर का ही है। मैं देख कर ही पहचान जाता हूँ कि कौन से ट्यूब की रबर किस क्वालिटी की है, और कितनी चलेगी। इसमें जब पॉलिथीन में लिपटी वस्तु पर मैंने ज़ूम किया तो मैंने पाया कि वह वस्तु रबर की ही बनी हुई है, और लचीली भी है।”

हमने जब उनसे पूछा कि इतने विश्वास से कैसे कह रहे हैं तो उन्होंने बताया कि कभी-कभी वह स्वयं भी ऐसे यंत्रों का सहारा लेते हैं तो उसका अनुभव भी काम आया है। हालाँकि, हमें किसी के निजी मामलों में ज्यादा दिलचस्पी नहीं है तो काम की बातें करने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि फोटो में दिखने वाली वस्तु ‘डिल्डो’ है जिसका प्रयोग यौन आनंद पाने हेतु लोग-बाग करते हैं।

वामपंथियों का क्रांतिकारी इतिहास

पिछले कुछ समय में वामपंथियों की विकृत कामवासना अपने ही विचारधारा की लड़कियों का बलात्कार करने से ले कर उन्हें जंगलों में सर्वहारा की लड़ाई के नाम पर ‘सेक्स स्लेव’ बनाने की खबरों के रूप में सामने आती रही हैं। जेएनयू के अनमोल रतन हों, या फिर गढ़चिरौली पुलिस को आत्मसमर्पण करने वाली मोती उर्फ राधा हो, लड़कियों के बलात्कार और वामपंथियों का चरित्र गुँथा हुआ मिलता है।

चाहे जलना जंगल (बोकारो) का संतोष महतो हो, सपन तुडु हो, हजारीबाग इलाके के सुदर्शन और विनय हों, मनीष और करम हों, राँची के गुरुपीरा का कुंदन प्रधान हो, लक्खीसराय का सिधु कोड़ा हो, माओवादी नक्सली आतंकियों ने आदिवासी लड़कियों को, नाबालिग बच्चियों को, अपने काडर के निचले स्तर के कार्यकर्ताओं की पत्नियों तक का लगातार बलात्कार किया है और आवाज उठाने पर सबके सामने गला भी रेता है।

मँजे हुए वामपंथी अक्सर जेएनयू की पाठशाला में सेक्स पर आलेख लिखने से ले कर, नई छात्राओं को इसके फायदे गिनाते हुए, उसे शारीरिक स्वतंत्रता से जोड़ कर पहले इन्हें बरगलाते हैं और फिर लगातार उनका शारीरिक शोषण होता रहता है।

एक बहुत बड़े कामपंथी नेता बताते हैं, “अमूमन, सर्वहारा की क्रांति में लड़कियों का इतना ही महत्व है। लेकिन ‘इतना ही’ का मतलब कम न समझें। जंगलों में भी शरीर की जरूरतें होती ही हैं। फासीवादियों से हमारी लड़ाई लम्बी चलेगी, इसलिए हमें जंगल में भी कॉलेज जैसा माहौल चाहिए। क्रांति तो होती रहेगी, लेकिन माहौल में किसी भी तरह की कमी होने से सीनियर नेता दुखी हो जाते हैं।”

हमने एक नववामपंथन को डेढ़ सौ फेसबुक शेयर का विश्वास दिलाया तो उन्होंने कहा, “मूल बात तो यह है कि ज्योंहि आप वामपंथी पार्टी की प्राथमिक सदस्यता लेते हैं, या फिर फेसबुक पर मोदी को फासीवादी कह कर, नारी देह पर लम्बे लेख लिखने लगती हैं, तभी से आपकी देह तो कम्यून की प्रॉपर्टी हो जाती है। जब देह ही आपकी नहीं रही तो फिर उससे मोह कैसा?”

आगे उन्होंने कहा, “डिल्डो के मिलने से इतनी बात क्यों हो रही है? बवाल करना बैकवर्ड लोगों और ट्रोलों का कार्य है। क्या जंगल में शारीरिक भूख पेड़ों से मिटाई जाएगी? कुछ लोग यह भी मजे ले रहे हैं कि नक्सली मर्द आखिर डिल्डो से कर क्या रहे हैं? अरे भाई! उनका डिल्डो, उनका शरीर, उनकी क्रांति, उनकी इच्छा कि वो अपने किस हथियार का क्या प्रयोग करते हैं। यह किसी की निजी पसंद है, समाज या फासीवादी सरकार यह तय नहीं करेगी कि कौन सा नक्सली किस वस्तु को कैसे प्रयोग में लाए।”

जंगल के नक्सली ‘डिल्डो’ से करते क्या हैं?

आम तौर पर इस ‘खिलौने’ का प्रयोग स्त्रियों में ज्यादा देखा गया है, लेकिन माओवादियों से हुई मुठभेड़ में इसका मिलना बताता है कि बात गंभीर है। मैं तो ऐसे मामलों में खुली दृष्टि रखता हूँ, अतः मैं इसे लिंग के दर्शन में नहीं बाँधना चाहता। इसलिए मैंने डिल्डो मामलों के जानकार अनमोल वामरतन से बात करने की कोशिश की।

“हम सब जानते हैं कि जंगलों से माओवादी कम होते जा रहे हैं। वामपंथनों की सप्लाय भी कम पड़ गई है क्योंकि विश्वविद्यालयों में राष्ट्रवादी विचारधारा के सुसंस्कृत लोग पहुँच रहे हैं। सीडी देने के बहाने आप उन्हें बुला नहीं सकते क्योंकि टोरेंट पर सब कुछ उपलब्ध है।”

“ऐसे में जब कोई सिधु कोडा, करम दा, कामरेड कुंदन, कामरेड सपन आदि कैंपस रिक्रूटमेंट हेतु कैंप लगाते हैं तो वामपंथनें उतनी संख्या में नहीं आतीं। जो आती हैं, उनको सीनियर नेता अपना शिकार बनाते हैं। ऐसे में जूनियरों में आंदोलन को ले कर काफी उदासीनता दिखने लगती है। इसी को जागृत रखने के लिए, क्रांति की मशाल जलाए रखने के लिए ऐसे यंत्रों का सहारा लिया जाता है।” अनमोल वामरतन ने बताया।

अब बात यह है कि ‘डिल्डो’ का प्रयोग वामपंथनों की जगह वामपंथी क्रांतिकारी तो नहीं कर रहे?

अनमोल बताते हैं, “हाँ करते हैं, इसमें दिक़्क़त क्या है? जंगल है, लोग एडवेंचरस हो ही जाते हैं। दूसरी बात, वामपंथी कौन सा विश्वविद्यालयों में पढ़ाई करते हैं कि उन्हें पता चले कि कौन-सी चीज का क्या काम है! कई बार सीनियर नेता भी उन्हीं से अपनी दैहिक जरूरतें पूरी कर लेते हैं, तो उन्होंने भी सोचा होगा कि क्रांति के मार्ग में ‘डिल्डो’ भी अपनी जगह बना ही लेगा।”

क्या है दूसरा पक्ष?

हमने दूसरा पक्ष जानने की कोशिश की तो मुझे कपूर्वानंद और फैजान भाई ही उचित लगे क्योंकि ये लोग धरती पर दिखती हर चीज या चर्चित विषय पर जानकारी रखते हैं। खास कर जब बात वामपंथियों की हो रही हो तो ये लोग टीवी पर इस पक्ष पर सारगर्भित वचनामृत से आम जन तक ज्ञानवृष्टि कर देते हैं। फोन किया तो दोनों ने मेरा नाम सुनते ही ‘भाग #₹& के’ कह कर गरियाते हुए फोन काट दिया।

फिर मैंने ‘नक्सली सेक्स मामलों के नए जानकार’ धैर्यकांत मिश्रा से बात की। उन्होंने तीन ‘ज्वाइंट’ का पैसा लेने के बाद कहा, “अजीत भारती जी, क्या एक नक्सली को शारीरिक सुख लेने का अधिकार नहीं है? आप भी तो अखंड सिंगल हैं, आपको तो कम-से-कम उस नक्सली का दर्द समझ में आना चाहिए। लानत है महाराज! आप उस नक्सली के मनोविज्ञान को समझिए जो एक तरफ़ फ़ासिवादी सरकार से लड़ भी रहा है और दूसरी तरफ़ अपने शरीर को वो सुख भी दे रहा जो उसका शरीर डिज़र्व करता है। ये डिल्डो सिर्फ़ डिल्डो नहीं, एक तमाचा है देश की मोड़ी सरकार पर जो अपने नक्सली नागरिकों को उसके सेक्सुअल राइट से कोसों दूर रखता है।”

“क्या इस डिल्डो के मिल जाने के बाद हमें सरकार से सवाल नहीं पूछना चाहिए? ‘जंगल में मंगल’ कह कर उपहास किया जा रहा है। एक डर का माहौल बनाया जा रहा है। मुझे तो डर है कि कल को अगर CRPF को नकली हाथ मिल जाए तो लोग उसका भी मजाक उड़ाएँगे लेकिन कोई भी एक नक्सली की पीड़ा को नहीं समझेगा। इस डिल्डो के मिलने के बाद मेरा दिल रो रहा है, मैं सो नहीं पा रहा हूँ और एक नागरिक होने के कारण आपको भी नहीं सोना चाहिए।”

“मुझे तो नींद नहीं आएगी क्योंकि मैं उस नक्सली की पीड़ा को अपनी पीड़ा से जोड़ कर देख रहा हूँ कि कितनी मेहनत से उसने यह वस्तु किसी वामपंथन के बैग से टपाई होगी, और अब वो भी पकड़ ली गई। आप यह सोचिए कि एक ही पकड़ी गई, बंदूकें तो कई हैं। इसका मतलब यह है कि कई लोग एक से ही काम चला रहे थे। यहाँ कोई मनरेगा नहीं है कि सबको इतने दिन संतुष्टि की गारंटी मिलेगी ही। सरकारों ने इस बुनियादी अधिकार के लिए कोई नीति नहीं बनाई है, जो कि दुर्भाग्यपूर्ण है।”

“2014 से पहले ऐसा नहीं होता था, जंगल में पूरी व्यवस्था रहती थी। लेकिन इस सरकार ने अडानी-अम्बानी को सारे जंगल बेच दिए हैं। कल को वहाँ नेचर फ़्रेश का तेल मिल जाए तो ज़्यादा हैरानी नहीं होगी। आखिर क्या हो रहा है इस देश में? पवन सिंह ने एक बार एक गीत गाया था – ‘ए राजा! चलऽ ना पिपरवा के तरवा ओहि जे सारा काम हो जाई’, लेकिन किसको पता था कि पिपरवा के तरवा फासीवादी सरकार की दमनकारी पुलिस पहले से बैठी होगी, निंदनीय!”

चूँकि धैर्यकांत ने ‘अखंड सिंगल’ वाली बात कह कर मेरी दुखती रग पर हाथ रख दिया, तो मैंने उसकी पेमेंट काट ली और ज्वाइंट में मंगोलियाई घोड़े की लीद मिला दी।

क्या कहते हैं संघी ट्रोल

चंदन नाम के एक स्वघोषित संघी ट्रोल ने नाम छपवाने की शर्त पर कहा, “मेरा नाम छापिएगा तब ही बोलूँगा। आपने यह देखा कि डिल्डो जंगल में मिलने का मतलब क्या है? इसका सीधा मतलब है कि वामपंथी न तो क्रांति कर पा रहे हैं न ही वामपंथनों को संतुष्ट कर पा रहे हैं। मैं ऊपर के लोगों की तरह यह मानने को तैयार नहीं हूँ कि पुरुष लोग इसका इस्तेमाल कर रहे होंगे।”

“इसका एक ही अर्थ है कि इस सरकार ने वामपंथियों का मनोबल ही नहीं, पौरुष भी तोड़ दिया है। अब, ऐसे टूटे हुए पौरुष वालों का जंगल के वीराने में वामपंथनें क्या करेंगी? इसलिए उन्होंने विश्वविद्यालय से आने वाली नई वामपंथनों से यह यंत्र मँगवाया और अपनी दैहिक जरूरतों को पूरा कर रही थीं। मैं उनका सम्मान करता हूँ कि उन्होंने खराब क्वालिटी के वामपंथियों से संसर्ग करने की जगह एक रबर के यंत्र को चुना। यही तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है।”

“साथ ही, यूँ तो वामपंथियों को मच्छर भी काट ले तो मैं प्रसन्न होता हूँ, पर नारीवादी होने के कारण मेरा हृदय फफक-फफक कर चीत्कार रहा है कि पूरे जंगल में एक ही यंत्र से काम लेने वाली वामपंथनें अब क्या करेंगी? यह एक विचारणीय प्रश्न है। संभव है कि जेएनयू में इस पर एक सेमिनार आयोजित करवाया जाए और इसके समाधान पर प्रकाश डाला जाए।”

आगे क्या होगी वामपंथियों की नीति?

सीताराम केंचुली ने मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, “सरकार ने अपने विचारों से अलग लोगों को नई तरह की हिंसा से दबाने की कोशिश की है। ठीक है कि फंड के अभाव में हमारे कार्यकर्ता थोड़े कमजोर हो गए हैं, तो शारीरिक संतुष्टि के लिए ये सब उपाय किए जा रहे हैं। आप ही बताइए कि बंदूक पकड़ने का तो समझ में आता है, मोबाइल का भी समझ सकते हैं कि षड्यंत्र रचने में सहयोगी होता है, लेकिन एक अदद डिल्डो को पकड़ कर इस फासीवादी सरकार ने कौन सी बहादुरी दिखाई है?”

वहीं, वरिष्ठ वामपंथन निंदा करैत ने केंचुली जी की बातों का समर्थन करते हुए कहा, “आगे से हमारे काडरों को हाशमी दवाखाना और अलीगढ़ के हकीम एम जान से सर्टिफिकेट ले कर ही फील्ड में पोस्टिंग दी जाएगी। ये सब पकड़ा जाता है, फिर न्यूज बना दी जाती है तो कार्यकर्ताओं में हीनभाव आ जाता है। जरूरत पड़े तो रामदेव जी के योग की वीडियो भी दिखाई जाएगी। क्रांति के मार्ग में मेन काम पर ही बाधा हो जाना, हर तरह से गलत है। चुनाव जीतें न जीतें, सरकारी कर्मचारियों के नरसंहार आदि के लिए तो काडर को मजबूत होना ही होगा।”

वहीं, अंधकार करैत ने भी अपनी राय देते हुए सरकार को जम कर कोसा, “मेरी तो उमर नहीं रही कि ऐसी तस्वीरें देख सकूँ, लेकिन मैं इतना अवश्य ही जानता हूँ कि सरकार को समझना चाहिए कि विरोध अपनी जगह है, और डिल्डो-वाइब्रेटर तक पकड़ कर प्रदर्शन करवा देना अलग। थोड़ा तो लिहाज करते मोदी जी… वामपंथ तो संख्या बल में भी कमजोर है, अब आप हमें कितना कोने में ढकेलिएगा साहब? हाँ हैं हम सेक्सुअली कमजोर, नहीं संतुष्ट कर पाते वामपंथनों को… हो गए खुश? क्या मिल गया इससे? 2024 में दस सीट और जीत जाओगे, लेकिन जिसका डिल्डो छिन गया है, उसकी हाय जरूर लगेगी।”

करैत द्वय ने जिस तरह से अपनी बात कही, कई लोगों को शक हुआ कि कहीं इन्हीं का तो नहीं पकड़ लिया गया। लेकिन, स्थानीय पुलिस ने बताया कि जाँच चल रही है, कई लोगों के फिंगर प्रिंट पाए गए हैं, अतः सही मालिक तक पहुँचने में समय लगेगा। उन्होंने आगे कहा, “हालाँकि, हमारी जाँच के दायरे में ये सब नहीं आता, न ही हमारी प्राथमिकता है ये सब सुलझाना।”

निष्कर्ष

कुल मिला कर बात यह है कि मैं जब वामपंथियों को कामपंथी कहा करता था, तो उसका आधार उनके ही भागे हुए महिला काडरों द्वारा अपने सीनियर माओवादियों के हाथों सेक्स स्लेव बन कर, बलात्कार और व्यवस्थित शारीरिक शोषण करने की खबरें हुआ करती थीं। लेकिन पिस्तौल-बंदूक के साथ दूसरे तरह की ‘बंदूकों’ का मिलना बताता है कि क्रांति की राह में सर्वहारा कभी प्राथमिकता होती ही नहीं, वामपंथी वस्तुतः सेक्स के भूखे, फ़्रस्ट्रेटेड, बलात्कारी और स्त्रियों को वासना की वस्तु समझने वाले लोग हैं, जिनकी सारी क्रांति एक डिल्डो या फिर किसी आदिवासी लड़की की योनि में सिमट कर जबरन स्खलित हो जाती है।

हमने छठ पर भी संयम रखा, लेकिन दिल्ली को बार-बार बंधक बनाया जा रहा: राष्ट्रपति कोविंद से कहा- जीवन के साथ खिलवाड़ रोकें

साल 2020 की शुरुआत से ही राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के हालात किसी से छिपे नहीं हैं। पहले शाहीन बाग का प्रदर्शन, फिर उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगे, बाद में कोरोना की मार और अब किसान आंदोलन, दिल्ली की सड़कें यहाँ के निवासियों के लिए आए दिन असुविधा पैदा कर रही हैं।

ऐसे में भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को पत्र लिखा है। पत्र में उन्होंने राष्ट्रपति से गुहार लगाई है कि दिल्लीवासियों को बार-बार बंधक बनाया जाना अब बंद हो और यहाँ की सड़कें खोली जाएँ।

भाजपा नेता ने इस पत्र को दिल्ली के लोगों की ओर से लिखने का दावा किया है। इसमें उन्होंने कहा है कि वह अत्यंत असहाय होकर इस पत्र को एक आशा की किरण के रूप में लिख रहे हैं। उन्होंने राष्ट्रपति से कहा है कि दिल्ली के निवासी देश की राजधानी के नागरिक होने के बावजूद अपने मूल अधिकारों से वंचित हो रहे हैं। यहाँ बार-बार उनसे दफ्तर जाने, दुकान खोलने, इलाज के लिए अस्पताल जाने, जैसे साधारण अधिकार छीने जा रहे हैं। 

पत्र में कपिल मिश्रा ने दिल्ली की वास्तविक स्थिति पर गौर करवाते हुए कहा कि कोरोना महामारी से बचने के लिए दूरी बनाना और भीड़भाड़ को एकत्रित न होने देना बेहद जरूरी है, लेकिन यहाँ इसका सरेआम उल्लंघन चल रहा है।

उन्होंने लिखा कि दिल्ली में स्थिति पहली बार ऐसी नहीं हुई है, बल्कि यहाँ बार-बार ऐसा हो रहा है। साल की शुरुआत में दिल्ली को जगह-जगह शाहीन बाग आंदोलन के नाम पर बंधक बनाया गया और राजधानी में नफरत व हिंसा का माहौल बनाया गया। बाद में स्वंय उच्चतम न्यायालय ने भी इस प्रकार सड़कों को बंद करने को गैर कानूनी घोषित किया। लेकिन, अब पिछले दिनों से कई राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता दिल्ली को दोबारा बंधक बना रहे हैं, जिससे दिल्ली वासियों की बुनियादी जरूरतें प्रभावित हो रही हैं।

कपिल मिश्रा ने कोरोना महामारी में दिल्ली की स्थिति पर चिंता जाहिर की और राष्ट्रपति को बताया कि यहाँ लगातार सरकार व कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन करके बुजुर्ग माता-पिता और छोटे-छोटे बच्चों के जीवन के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है।

उन्होंने राष्ट्रपति से कहा कि दिल्ली वालों ने बहुत संयम का परिचय दे दिया। सरकारी निर्देशों को मानते हुए छठ के त्योहार तक को सार्वजनिक तौर पर नहीं मनाया। मगर, आज दिल्ली वालों को चारों ओर से बंद कर दिया गया है। शहर में बिना टेस्टिंग के भीड़ की इकट्ठा हो रही है और दिल्ली सरकार पोस्टर, बैनर, होर्डिंग लगाकर लोगों को दिल्ली में बुला रही है।

पत्र में उन्होंने कहा है कि दिल्ली वासियों का जीवन भी उतना ही महत्व रखता है, जितना अन्य राज्य के लोगों की जिंदगी। यहाँ के नागरिकों के मूल अधिकारों को भी अन्य राज्यों के लोगों की तरह संविधान का संरक्षण प्राप्त है। लिहाजा दिल्ली वासियों की जिंदगी को इस प्रकार मौत के मुँह में बार-बार फेंके जाने के ख़िलाफ ठोस व निर्णायक निर्णय लिए जाएँ। साथ ही राजनीति के लिए करोड़ों लोगों की जिंदगी से ख़िलवाड़ न किया जाए।