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9 साल में ₹150 करोड़ की कमाई, 13 साल में गूगल में ₹20 करोड़ की जॉब: ‘वुल्फ गुप्ता’ का क्यों हुआ मर्डर?

बच्चों को कोडिंग सिखाने वाली वेबसाइट WhiteHatJr के सीईओ करण बजाज ने शनिवार (नवंबर 21, 2020) को एक आलोचक के खिलाफ 17 करोड़ रुपए का मानहानि का मुकदमा दायर किया था। इस कम्पनी का स्वामित्व BYJU’s के पास है। सॉफ्टवेयर प्रदीप पूनिया, जिनके खिलाफ ये मुकदमा दायर हुआ, ट्विटर पर उनका अकाउंट WhiteHatSnr नाम से है। सोमवार को ‘Wolf Gupta’ के इस मामले में कोर्ट में सुनवाई हुई।

पूनिया पर ‘ट्रेड मार्किट एक्ट 1999’, ‘कॉपीराइट एक्ट 1957’ और ‘सिविल प्रक्रिया संहिता 1908’ के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है। रजिस्टर्ड और अनरजिस्टर्ड ट्रेडमार्क के उल्लंघन के मामले में ये केस दर्ज कराया गया है। कम्पनी ने आरोप लगाया है कि उसके खिलाफ इंजीनियर ने आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की। साथ ही कम्पनी के कर्मचारियों की निजता के उल्लंघन का भी आरोप लगाया गया है।

असल में ये पूरा मामला WhiteHatJr के एक एड के इर्द-गिर्द घूमता है, जिसमें वो एक काल्पनिक बच्चे ‘Wolf Gupta’ के बारे में बताते हैं। उनके प्रचार में बताया जाता है कि 12 साल का ‘Wolf Gupta’ कोडिंग सीख कर करोड़ों कमा रहा है। किसी एड में उसे गूगल में जॉब करता हुआ बताया जाता है। यहाँ हम चार अलग-अलग एड का उदाहरण देकर आपको समझाते हैं कि असल में वो क्या करता है:

  • मात्र 9 साल के ‘Wolf Gupta’ ने कम्प्यूटर सीख कर गूगल वीडिओज़ बना कर 150 करोड़ रुपए की कमाई शुरू कर दी, जबकि उसकी उम्र के बाकी बच्चे यूट्यूब वीडियो ही सर्फ़ करने में लगे हुए हैं।
  • 13 साल के ‘Wolf Gupta’ ने स्कूल के बाद AI कोड सीख कर गूगल में 1.2 मिलियन डॉलर (8.88 करोड़ रुपए) का जॉब प्राप्त कर लिया।
  • जब उसकी उम्र के अन्य बच्चों को पता तक नहीं था कि स्कूल के बाद करना क्या है, ‘Wolf Gupta’ ने AI कोड सीख कर गूगल में 1.2 करोड़ रुपए की नौकरी पा ली।
  • 13 साल के ‘Wolf Gupta’ को गूगल से 20 करोड़ रुपए का जॉब मिला, जबकि उसकी उम्र के अन्य बच्चों को पता तक नहीं कि स्कूल के बाद करना क्या है।
‘Wolf Gupta’ को लेकर WhiteHatJr की प्रचार सामग्री

ऊपर लिखी सारी बातें WhitHatJr की प्रचार सामग्रियों का हिस्सा होती हैं, जिन्हें सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों तक पहुँचाया जाता है और फिर बच्चों को कोडिंग सीखने के लिए रजिस्टर करने को कहा जाता है। पूनिया के कई आरोपों के बाद WhiteHatJr ने ‘Wolf Gupta’ वाला एड हटा दिया था, जिसके बाद पूनिया ने आरोप लगाया कि कम्पनी ने ‘Wolf Gupta’ की हत्या कर दी है। साथ ही उन पर कम्पनी का स्लैक अकाउंट हैक कर के गोपनीय वार्तालाप को सार्वजनिक करने का आरोप लगाया।

प्रदीप पूनिया ने ट्विटर थ्रेड के जरिए WhiteHatJr के स्लैक अकाउंट का स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए आरोप लगाया कि उसकी एक कर्मचारी पूजा ने जब रात को अवसाद में होने को लेकर ट्वीट किया तो पूरी टीम ने मिल कर रिपोर्ट कर उसके अकाउंट को सस्पेंड करवा दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि मीडिया BYJU’s के हाथों बिका हुआ है। उन्होंने आरोप लगाया कि चैट में उनके वीडियो को हटाने की भी बात की गई, जिससे पता चलता है कि आरोप पुष्ट थे।

साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि एक लड़की जब कम्पनी में काम के लिए इंटरव्यू देने आई तो उसकी तस्वीर क्लिक कर चैट में उसके बारे में गलत बातें की जा रही थीं। वहीं एक अन्य लड़की को ‘चाइनीज’ बताया गया, ऐसा उनका आरोप है। वहीं जब एक व्यक्ति ने कम्पनी के एक एड में पाया कि एक 10 साल के बच्चे ने फेस डिटेक्टिंग एप बनाया और उसका CEO बन गया, तो फिर उसने उस एप को देखने की इच्छा प्रकट की।

आरोप है कि कम्पनी के लोगों ने आपस में बात किया कि एप बना लिया जाए और करण बजाज ने कहा कि वो इसे लेकर कम्पनी भी बना लेंगे। हाल ही में Tekie नामक एक प्रतिद्वंद्वी कम्पनी ने आरोप लगाया था कि WhitHatJr ने गलत तरीकों से उसके मॉडल को कॉपी किया। कम्पनी ने बताया कि उसके एक क्लास के दौरान कैमरा ऑफ था और उधर से किसी 30 साल के आदमी की आवाज़ आ रही थी, जो उसके पढ़ाने के स्टाइल को कॉपी करने के लिए किया गया था।

दिल्ली हाईकोर्ट में अब इस मामले की अगली सुनवाई जनवरी 6, 2021 को होगी। कोर्ट में कम्पनी की तरफ से पेश हुए अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि करण बजाज एक शिक्षक हैं, योग भी पढ़ाते हैं और उनके खिलाफ आरोप लगाने वाले प्रदीप पूनिया के बारे में कुछ नहीं पता कि वो कौन हैं और क्या उसके बच्चे WhiteHatJr के छात्र थे या नहीं? आरोप लगाया कि वो लगातार कम्पनी के कंटेंट्स को ट्रोल कर रहे हैं।

साथ ही आरोप लगाया कि वो ट्विटर के साथ-साथ टेलीग्राम पर भी ‘WhiteHat Poonia’ नाम से अकाउंट बना कर नक़ल कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि पूनिया ने अपने 13 साल के कजन के माध्यम से WhiteHatJr की क्लासेज लेकर वीडियो रिकॉर्ड कर फैलाया। उन्होंने कहा कि पूनिया आरोप लगाते हैं कि हम गृहणियों के माध्यम से कोडिंग सिखाते हैं, जबकि हमारे पास PhD स्कॉलर शिक्षक हैं।

साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि वो अपने यूट्यूब चैनल ‘WhiteHatSr’ के माध्यम से WhiteHatJr के सारे क्लासेज ऑनलाइन मुफ्त में कराने का दावा भी करते हैं। साथ ही कम्पनी ने खुद पर पोर्नोग्राफिक कंटेंट्स को बढ़ावा देने के आरोपों पर भी आपत्ति जताई। वहीं पूनिया की तरफ से पेश वकील स्वाति सुकुमार ने पूछा की ये ‘Wolf Gupta’ कौन है? साथ ही जवाब दिया ये एक काल्पनिक पात्र है, जिसके नाम पर लिंक्डइन अकाउंट तक बनाया गया है। लेकिन कम्पनी ने अपने इस झूठ के बारे में कहीं भी डिस्क्लेमर नहीं लगाया।

उन्होंने कहा कि ये न बताना कि ‘Wolf Gupta’ एक काल्पनिक पात्र है, जनता के साथ धोखा है। दिल्ली हाईकोर्ट ने माना कि ये एक काल्पनिक पात्र है और इसके प्रचार से बच्चों की मानसिक अवस्था पर ज़रूर प्रभाव पड़ेगा। लेकिन, साथ ही पूछा कि स्वस्थ विमर्श की बजाए इस तरह से आरोप लगाने का कारण क्या है? अधिवक्ता सुकुमार ने कहा कि स्वस्थ आलोचना का एक भाग ‘Parody’ भी हो सकता है।

साथ ही उन्होंने सबूतों के साथ दिखाया कि WhiteHatJr उन कमेंट्स को हटा देता है, जिसमें उसकी आलोचना की जाती है। इसके बाद उन्होंने एक 12 साल की बच्ची का उदाहरण दिया, जिन्होंने ‘एडवर्टाइजमेंट रोस्ट’ के जरिए प्रचार समाग्रियों का मजाक बनाया था। उन्होंने कहा कि जिस तरह से गूगल और टेस्ला के साथ कम्पनी अपना जुड़ाव दिखती है, भारत के ‘एडवर्टाइजमेंट कैम्पेन’ के पास उससे जुड़ी 15 शिकायतें प्राप्त हुई हैं।

दिल्ली हाईकोर्ट ने माना कि दोनों पक्षों को सुनना जरूरी है, क्योंकि पूनिया ने ऐसा कर के किसी प्रकार का वित्तीय लाभ नहीं कमाया था। कम्पनी की तरफ से पेश वकील राजशेखर राव ने कहा कि अभिव्यक्ति की आज़ादी है, लेकिन वो कम्पनी को पोंजी स्कीम बताते हैं, जो ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि पूनिया ने भले ऐसा कर के रुपए नहीं कमाए हों, लेकिन वो WhiteHatJr के कंटेंट्स का इस्तेमाल तो कर ही रहे हैं।

दिल्ली हाईकोर्ट ने अंत में आदेश दिया कि प्रदीप पूनिया अपने यूट्यूब चैनल से वो कंटेंट्स हटाएँ, जिनमें कम्पनी के प्राइवेट वार्तालाप को हैक कर उसकी सामग्रियाँ दिखाई गई हैं। साथ ही उन्हें ‘WhiteHatSr’ नाम से यूट्यब चैनल न चलाने को भी कहा। इसके बाद उन्होंने उन ट्वीट्स की भी लिस्ट दी, जो पूनिया को हटाने हैं। साथ ही उन्हें WhiteHatJr के शिक्षकों की योग्यता या नंबर पर टिप्पणी करने से मना किया।

गाड़ी को धक्का लगाते भगवान शंकर और महाकाली… हिंदूफोबिया का एक अवतार अनुराग बासु की ‘लूडो’ भी

हिंदूफोबिया को लेकर चर्चित ओटीटी प्लेटाफॉर्म नेटफ्लिक्स इस समय वेब सीरिज ‘ए सूटेबल बॉय (A Suitable Boy)’ को लेकर विवादों के केंद्र में है। इस वेब सीरीज पर मंदिर प्रांगण में अश्लील दृश्य फिल्माने और लव जिहाद को बढ़ावा देने का आरोप है। इसी प्लेटफॉर्म पर आई अनुराग बासु की फिल्म ‘लूडो’ में भी इस बात का पूरा ख्याल रखा गया है कि कैसे हिंदुओं को नीचा दिखाना है और उनकी भावनाओं को आहत करना है। इससे पहले रवींद्रनाथ टैगोर की कहानी काबुलीवाला पर आधारित वेब सीरीज में भी ऐसा कर चुके हैं।

ढाई घंटे की बेसिरपैर की फिल्म ‘लूडो’ का एक ही मकसद है। सीधे-सीधे हिन्दू धर्म का उपहास। सांकेतिक रूप से पूरी फिल्म में हिन्दू संस्कृति को चोट पहुँचाने की कोशिश की गई है।

आए दिन लगभग सभी बॉलीवुड फिल्मों में आपको ऐसा सीन देखने को मिल जाएँगे, जिसे देखकर आपको अंदाजा हो जाएगा कि ये गलती से नहीं हुआ है, अनजाने में नहीं हुआ है। इसे जबरदस्ती डाला गया है। किसी भी वेब सीरीज या फिल्म को बनाने से पहले के पीछे कई महीनों की मेहनत होती है, हरेक सीन पहले से तैयार होता है, हर एक डायलॉग लिखी होती है। ऐसा नहीं है कि कोई भी सीन ऑन द स्पॉट तैयार किया जाता है। यानी कि फिल्म में ऐसे सीन जान-बूझकर डाले जाते हैं, ताकि लोग उस पर ऊँगली उठाएँ और फिल्म या वेब सीरीज को सुर्खियाँ मिल जाए।

‘पीके’ की शैली में बनाया मजाक

ऐसा ही कुछ किया है अनुराग बसु ने। इस फिल्म में हिन्दू त्रिदेवों का बेशर्मी से मजाक बनाया गया है और उसको बिलकुल उस ढंग से ही फिल्माया गया है, जिस ढंग से आमिर खान की ‘पीके’ फिल्म में दिखाया गया था। स्वांग रचने वाले तीन लोग ब्रह्मा, विष्णु, महेश का भौंडा सा रूप धरे सड़क पर नाच-कूद कर रहे हैं, जिन्हें देख कर फिल्म का हीरो आदित्य रॉय कपूर वितृष्णा के भाव से मुँह बना रहा है। एक सीन में तो भगवान शंकर और महाकाली गाड़ी को धक्का भी दे रहे हैं।

जान-बूझकर इस तरह से कुछ हिन्दी फिल्मों में हिन्दुओं के देवी-देवताओं को फूहड़ स्वांग रचा कर पेश किया जा रहा है और उनको तरह-तरह की घटिया हरकतें करते दिखाया जा रहा है जो भारत में हिन्दू धर्म-संस्कृति के विरुद्ध चली आ रही पुरानी फिल्मी साजिश को आगे बढ़ाने की नीच कोशिश है।

एक सीन में हीरो-हीरोइन पर बेड सीन फिल्माया जाता है। इसमें दिखाया गया है कि लड़की के पास उसकी माँ का फोन आता है। माँ पूछती है कि वह कहाँ पर है तो वह कहती है कि वह मंदिर में है। फिल्म में इस डायलॉग को लेकर काफी आलोचना हो रही है। फिल्म में रामलीला और गाय को लेकर भी मजाक बनाया जाता है।

महाभारत के प्रसंग पर बोला झूठ

महाभारत के कौरवों के विषय में कहने की आवश्यकता नहीं, यह सर्वविदित है कि वे नायक नहीं खलनायक थे। इसके विपरीत हिन्दुओं की इस धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत को झूठ बोल कर झूठा दिखाने की कोशिश की गई। ऊबड़-खाबड़ और बेसिर-पैर की इस फिल्म के एक सीन में अनुराग बसु और राहुल बग्गा लूडो खेल रहे होते हैं। यही दोनों फिल्म के सूत्रधार हैं। लूडो खेलने के दौरान अनुराग बसु, राहुल को जीवन की फिलॉसफी समझाते हैं। 

वह पाप और पुण्य को समझाते हुए कहते हैं कि इतने लोग कोरोना में मर गए, वो सब के सब पापी थे क्या? वह पाप और पुण्य का समझाने के लिए महाभारत के अंतिम सार का उदाहरण देते हैं। महाभारत का युद्ध खत्म होने के बाद पांडव जब स्वर्ग पहुँचे तो दुर्योधन पहले से ही स्वर्ग में बैठा था। जबकि दुर्योधन दुनिया की नजरों में पापी था। इस तरह उन्होंने कौरवों को नायक और पांडवों को खलनायक सिद्ध किया। अपने इस अ-धार्मिक झूठ के पाँव लगाने के लिए वह एक झूठा प्रसंग भी स्वयं ही गढ़ कर सुना देते हैं।

अर्नब गोस्वामी का मजाक

फिल्म के एक सीन में रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क के एडिटर-इन-चीफ अर्नब गोस्वामी का मजाक उड़ाया गया है। फिल्म में एक जगह पर अर्नब गोस्वामी और उनकी टीम की जमकर बैंड बजाई गई है, जो कि लोगों को रास नहीं आ रहा। आपको याद होगा कि तकरीबन एक महीना पहले कपिल शर्मा के शो में भी अर्नब का मजाक उड़ाया गया था, लेकिन वह मजाक चैनल को काफी भारी पड़ गया। आज तक कपिल शर्मा शो की टीआरपी लगातार गिरती जा रही है।

अब बड़ा सवाल यह है कि अनुराग बसु जैसे बड़े डायरेक्टर को फिल्म में इस तरह के कंटेंट को डालने की क्या जरूरत पड़ गई? वो इस तरह का कंटेंट क्योंं दिखा रहे हैं? क्या इसके अलावा उनके पास ऐसे कंटेंट नहीं हैं, जिससे इन्हें सुर्खियाँ मिले। हिंदुओं की ही भावनाओं को क्यों ठेस पहुँचाया जाता है?

हालाँकि अच्छी बात यह है कि बॉलीवुड के इस निम्न स्तर की मानसिकता के विरुद्ध धीरे-धीरे ही सही जनता में जागरूकता बढ़ी है। उदाहरण के तौर पर पिछले वर्ष सेक्यूलरिज़्म के नाम पर हिंदुओं को अपमानित करने वाली फिल्में जैसे ‘कलंक’, ‘व्हाइ चीट इंडिया’ जैसी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुँह गिरी, तो वेब सीरीज ‘सेक्रेड गेम्स’ का प्रदर्शन पहले सीज़न के मुक़ाबले काफी फीका रहा।

पुराने हैदराबाद में रोहिंग्या मुसलमानों को घुसाया, उनको दिया गया हर वोट भारत के खिलाफ: ओवैसी पर तेजस्वी सूर्या

बिहार विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा का ध्यान अब दक्षिण के राज्यों पर है। तेलंगाना में होने वाले नगर निगम चुनावों के लिए वहाँ जोर-शोर से प्रचार चल रहा है। भाजपा के सांसद तेजस्वी सूर्या ने AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और उनके भाई अकबरुद्दीन ओवैसी पर निशाना साधा है।

उन्होंने मीडिया से बात करते हुए कहा, “यह हास्यास्पद है कि अकबरुद्दीन और असदुद्दीन ओवैसी विकास की बात कर रहे हैं। उन्होंने पुराने हैदराबाद में विकास की अनुमति नहीं दी। उन्होंने केवल रोहिंग्या मुसलमानों के प्रवेश को अनुमति दी। ओवैसी को दिया गया हर वोट भारत के ख़िलाफ़ और भारत से जुड़े हर फैसले के ख़िलाफ़ है।”

भाजपा नेता ने कहा, ” वे (असदुद्दीन ओवैसी) केवल इस्लाम, अलगाववाद और कट्टरपंथ की भाषा बोलते हैं, जिसे मोहम्मद अली जिन्ना भी बोला करते थे।”

तेजस्वी सूर्या ने हैदराबाद में प्रचार करते हुए कहा, “ये सिर्फ एक निगम चुनाव नहीं है, अगर आप यहाँ ओवैसी को वोट देते हैं तो वे महाराष्ट्र, कर्नाटक, बिहार, यूपी जैसे राज्यों में मजबूत होते हैं।” उन्होंने केसीआर पर निशाना साधते हुए कहा कि वो हैदराबाद को इस्तांबुल बनाना चाहते हैं।

उन्होंने केसीआर के लिए कहा कि तुर्की के राष्ट्रपति लगातार भारत के खिलाफ बोलते हैं और केसीआर हैदराबाद को ही तुर्की की राजधानी इस्तांबुल जैसा बनाना चाहते हैं। यही कारण है कि वे AIMIM के साथ गठबंधन में हैं। वे पाकिस्तान जैसा हैदराबाद चाहते हैं।

ओवैसी ने भी साधा भाजपा पर निशाना

तेजस्वी सूर्या के इस बयान से पहले ओवैसी ने भी कल मीडिया से बात करते हुए भाजपा पर निशाना साधा था। उन्होंने कहा था “अगर आप किसी भी बीजेपी नेता को नींद से जगाएँगे और कुछ नाम लेने को कहेंगे तो वो कहेंगे- ओवैसी। इसके बाद आतंकवाद और पाकिस्तान का नाम लेंगे। बीजेपी को इसपर बात करनी चाहिए कि उन्होंने 2019 के बाद से तेलंगाना, खासकर हैदराबाद को क्या आर्थिक सहायता दी है।”

उन्होंने हैदराबाद बाढ़ का मुद्दा उठाते हुए कहा था, “”हैदराबाद में बाढ़ आई थी। मोदी सरकार ने उस वक्त हैदराबाद को क्या आर्थिक मदद दी? वो अब इस चुनाव को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश कर रहे हैं क्योंकि उस वक्त उन्होंने कोई मदद नहीं दी थी। यहाँ ऐसा नहीं चलेगा, जनता जानती है।”

कोरोना से बचने के लिए ढपली बजाकर सुनाई कविता, याद दिलाया PM मोदी का संदेश; Video वायरल

कोरोना महामारी से बचने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान का पिछले दिनों कई लोगों ने अपनी तरह से प्रचार-प्रसार किया। किसी ने इस पर अपने विचार लिखे तो किसी ने दो चार बातें और जोड़कर उस पर अपनी राय दी। कविता के जरिए भी कई लोगों ने पीएम मोदी की बात को जन-जन का पहुँचाने का काम किया। 

इसी क्रम में सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुई है। एक व्यक्ति इसमें कोरोना पर लिखी कविता को लयबद्ध प्रस्तुत कर रहा है और ढपली बजाकर मनोरंजन भी कर रहा है। इस वीडियो को उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री के सूचना सलाहकार शलभमणि त्रिपाठी ने अपने अकाउंट से शेयर किया है।

अभी तक इस वीडियो को केवल शलभमणि त्रिपाठी के अकाउंट से ही 6 हजार के करीब लाइक और 1.3 हजार रीट्वीट मिल चुके हैं। कई यूजर्स ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। संभाव नाम का यूजर लिखता है कि यह साबित करता है कि कम पढ़े-लिखे लोग सच्चाई के ज्यादा करीब होते हैं।

एक अन्य यूजर वीडियो में नजर आ रहे व्यक्ति की तारीफ में लिखता है, “अति उत्तम। गायकी भी और ढपली का इस्तेमाल भी! हमारे देश/प्रदेश की इन दबी हुई प्रतिभाओं का सदुपयोग होना चाहिए और इनका जीवन भी सुधरना चाहिए! इनकी अद्भुत गायकी और मोदी जी की बातों को फैलाने के लिए इनका इस्तेमाल चुनाव रैलियों में भी होना चाहिए और पारितोषिक भी मिलना चाहिए।”

दिलीप लांबा लिखते हैं, “जागरूक अभियान चलाने के लिए इससे अच्छा रास्ते में उदाहरण देखने को नहीं मिला। कोटि-कोटि साधुवाद इस गीत बजाने वाले को, गीत गाने वाले को। जय हिंद। जय श्री राम।”

वीडियो में व्यक्ति को गाते सुना जा सकता है:

तापे तपाई मुँह पर पट्टी, मोदी का है कहना…
गरम गरम पानी से नहाना दूर दूर तुम रहना
इसका नाम है कोरोना, इसका नाम है कोरोना
नाम है कोरोना इसका नाम है कोरोना।

भूखे को खिलाना हाँ…प्यासे को पिलाना हाँ..-2
भूखे को खिलाना भैया..प्यासे को पिलाना …

मात-पिताओं की सेवा कर, कोरोना से मत तू डर-2
मात पिता की सेवा करियो कोरोना से न तू डरियो
मोदी का है कहना, समझाना, समझाना भैया
भारत को है…भारत को बचाना।

तापे तपाई मुँह पर पट्टी..मोदी का है कहना…
गरम गरम पानी से नहाना, दूर दूर तुम रहना।
इसका नाम है कोरोना, इसका नाम है कोरोना 
नाम है कोरोना…इसका नाम है कोरोना।

रुखी-सूखी खा लेना, ठंडा पानी पी लेना
रुखी सूखी खाना भैया..ठंडा पानी पी लेना
घर में ही रहना भैया,घर में ही रहना
घर में ही रहना,घर में ही रहना।

तापे तपाई मुँह पर पट्टी..मोदी का है कहना…
गरम गरम पानी से नहाना दूर दूर तुम रहना
इसका नाम है कोरोना, इसका नाम है कोरोना। 

बोल भारत माता की जय!

‘चीन से नहीं, तिब्बत से सीमा साझा करता है अरुणाचल प्रदेश; इस ऐतिहासिक तथ्य को कोई नहीं बदल सकता’

चीन के साथ हालिया तनाव के बीच अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने बड़ी बात कही है। उन्होंने द हिंदू को दिए साक्षात्कार में कहा है कि अरुणाचल प्रदेश अपनी सीमा सिर्फ तिब्बत के साथ साझा करता है, चीन के साथ नहीं।

इस साक्षात्कार में उन्होंने फ्रंटियर हाइवे को लेकर मुख्य रूप से बात की है। उन्होंने कहा कि इस हाइवे के होने से युद्ध की स्थिति में सैनिकों को आवाजाही में दिक्कत नहीं आएगी। उन्होंने बताया है कि इस हाइवे का काम पहले धीमा था। लेकिन सशस्त्र बलों, बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन और अन्य स्टेकहोल्डर एजेंसियों के एक साथ आने के कारण 1,100 किमी LAC के साथ हाईवे बनाने के कार्य को गति मिली है। 

गौरतलब है कि पेमा खांडू हमेशा से ही LAC को इंडो-तिब्बत बॉर्डर कहते आए हैं। यह पूछे जाने पर कि वह LAC को इंडो-तिब्बत बॉर्डर क्यों कहते हैं, उन्होंने कहा कि अरुणाचल प्रदेश ने अपनी सीमा सिर्फ तिब्बत के साथ साझा करता है। यह ऐतिहासिक तथ्य है और इसे कोई बदल नहीं सकता। पूरी दुनिया जानती है कि चीन ने तिब्बत पर कब्जा किया है।

उन्होंने कहा कि यदि कोई 1962 के संघर्षों को देखता है और निराधार दावे करता है तो उनके लिए अपनी मातृभूमि को बचाना अनिवार्य है। उनकी मानें तो सीमा के कई खंड वास्तव में दुर्गम हैं। यही कारण है कि वह 1,100 किमी एलएसी के साथ फ्रंटियर हाईवे को बढ़ावा देने में जुटे हैं, जिससे सैनिकों की आवाजाही तेज हो।

उन्होंने बताया कि यह हाईवे पहले कई एजेंसियों के कारण सही दिशा में नहीं था। लेकिन अब इसमें बदलाव किया गया है ताकि सेना, इंडो-तिब्बत पुलिस, बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन और स्टेट एजेंसियों के पास इसकी क्वालिटी पर सोचने का समय हो। उन्होंने कहा कि पूर्वी हिमालय की नाजुक पारिस्थितियों के मद्देनजर कहना है कि इस बिंदु पर कॉर्डिनेशन बहुत ज्यादा जरूरी है।

मुख्यमंत्री के अनुसार भूस्खलन जैसे प्राकृतिक कारणों से यह प्रोजेक्ट काफी लागत वाला है। कई विदेशी फंडिंग एजेंसियाँ हैं जो कम ब्याज पर लोन देती हैं। इनसे भारत के कई राज्यों को फायदा हो रहा है। लेकिन चीन यह दावा करके कि अरुणाचल प्रदेश पर उसका अधिकार है लगातार फंड ब्लॉक करवा रहा है। मुख्यमंत्री के मुताबिक चीन के हस्तक्षेप के कारण एशियन डेवलपमेंट बैंक और अन्य बैंक उन्हें लोन देने से मना कर चुके हैं। हालाँकि केंद्र सरकार उन्हें मदद मुहैया करवा रही है।

इंटरव्यू में सीएम खांडू ने सुदूर क्षेत्रों में डिजिटल कनेक्टिविटी पर भी बात की और बताया कि टूरिज्म उनके प्रदेश की ताकत है। इसको बढ़ावा देने के लिए अच्छी सड़कें चाहिए। इंवेस्ट इंडिया के तहत एक स्पेशल डेस्क अरुणाचल प्रदेश के लिए बनाने का उन्हें भरोसा दिलाया गया है।

साक्षात्कार में उन्होंने अनुसूचित जातियों और पर्यावरण पर भी बात की। उन्होंने बताया कि सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी की ओर से प्रदेश को कहा गया था कि यहाँ 50,000 मेगावाट हाइड्रोपावर प्रोड्यूस करने की क्षमता है जो औद्योगिक सपने को पूरा करने की जरूरत है, लेकिन उन्हें प्रकृति की चिंता है। उन्होंने कई ऐसे प्रोजेक्ट्स को खत्म किया है जिन्हें सालों पहले साइन किया गया था, मगर वह सही नहीं थे या उनमें प्रोग्रेस नहीं हो रही थी। वह उन कार्यों पर अपना फोकस कर रहे हैं जो राज्य के लिए ठीक हैं।

‘युद्ध छेड़ सकते हैं नए अमेरिकी राष्ट्रपति जो बायडेन, अच्छे दिन चले गए’: चीन सरकार के सलाहकार ने दी चेतावनी

जहाँ वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प पहले से ही चीन की नाक में दम कर के रखे हुए हैं, वहीं अब वहाँ के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति जो बायडेन से भी उसे डर लगने लगा है। कम्युनिस्ट सरकार के एक सलाहकार का कहना है कि चीन को इस ग़लतफ़हमी को दूर कर लेना चाहिए कि जो बायडेन प्रशासन के अंतर्गत उसके अमेरिका के साथ रिश्ते अपने-आप सुधरने लगेंगे। उसने चेताया कि उनके अंतर्गत अमेरिका अब चीन के खिलाफ और ज्यादा सख्त रवैया अपना सकता है।

‘साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट (SCMP)’ की खबर के अनुसार, शेनझेन स्थित थिंक टैंक ‘एडवांस इंस्टिट्यूट ऑफ ग्लोबल एंड कंटेम्पररी चाइना स्टडीज’ के डीन झेंग योंगनियाँ ने कहा कि चीन की सरकार को अमेरिका के साथ रिश्ते बेहतर करने के हर मौके का भरपूर इस्तेमाल करना चाहिए। उन्होंने कहा कि चीन को इस सोच से बचना चाहिए कि अमेरिका के साथ उसके रिश्ते वैसे ही हो जाएँगे, जैसे डोनाल्ड ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने से पहले थे।

गुआंगझोउ में ‘अंडरस्टैंडिंग चाइना कॉन्फ्रेंस’ के इतर एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा, “वो अच्छे और पुराने दिन अब चले गए हैं। अमेरिका में जो शीत युद्ध की स्थिति है, वो कई वर्षों में अभी सबसे ज्यादा सक्रिय स्थिति में है। ये सब कुछ एक रात में नहीं ख़त्म होगा।”

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने यूएस-चीन रिश्तों को लेकर लम्बी रणनीति बनाने के लिए झेंग योंगनियाँ को विचार-विमर्श हेतु बुलाया था। SCMP के अनुसार, 40 साल पहले एक-दूसरे के देश में दूतावास स्थापित होने के बाद दोनों के रिश्ते सबसे बुरी स्थिति में हैं।

व्यापार, मानवाधिकार और कोरोना वायरस सहित कई मुद्दों पर दोनों देशों में नहीं बन रही है। Pew के सर्वे में पाया गया था कि 70% अमेरिकी चीन को पसंद नहीं करते हैं। चीनी सरकार के सलाहकार का कहना है कि व्हाइट हाउस में घुसते ही जो बायडेन जनता की इन भावनाओं का फायदा उठा सकते हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिका के समाज के टुकड़े हो गए हैं और जो बायडेन अब कुछ नहीं कर सकते हैं। उन्होंने कहा:

“वो सचमुच एक काफी कमजोर राष्ट्रपति होंगे। वो तो घरेलू मुद्दों तक को भी नहीं सुलझा सकते हैं। इसी कारण वो कुछ कूटनीतिक स्तर पर करना चाहेंगे और वो होगा चीन के खिलाफ कुछ कार्रवाई करना। अगर हम कहते हैं कि ट्रम्प लोकतंत्र और आज़ादी को बढ़ावा देने में रुचि नहीं रखते हैं, बायडेन हैं। ट्रम्प युद्ध की इच्छा नहीं रखते हैं। लेकिन, नया डेमोक्रेट अमेरिकी राष्ट्रपति युद्ध शुरू कर सकता है। अंतर सिर्फ इतना है कि ट्रम्प एक कारोबारी हैं, जो ऐसे निर्णय लेते हैं जिसकी उम्मीद किसी को न हो। बायडेन क्या करेंगे, इसका अनुमान लगाया जा सकता है। वो इलीट कूटनीतिज्ञ हैं।”

उन्होंने आगे कहा कि जहाँ ट्रम्प चीन के प्रति बिना सोच-विचार किए ही सख्त हैं, बायडेन तर्कपूर्ण ढंग से सख्त रहेंगे। उन्होंने अमेरिका-चीन के बिगड़ते रिश्तों के लिए वहाँ के घरेलू मुद्दों को जिम्मेदार ठहराया। झेंग ने कहा कि अमेरिका ने जिस ‘नियो-लिबरल’ आर्थिक विकास मॉडल को अपनाया और बढ़ावा दिया, उसके कारण वहाँ संपत्ति का अंतर बढ़ता चला जा रहा है और उसने समाज को विभाजित कर दिया है।

उन्होंने दावा किया कि अमेरिका के आंतरिक मामले चीन के साथ रिश्तों को खराब करने के लिए जिम्मेदार हैं। उन्होंने हुवाई का उदाहरण दिया, जो चिप्स के लिए पहले अमेरिका पर निर्भर था लेकिन अब उसे नुकसान हो रहा है। उन्होंने याद दिलाया कि चीन की कई कम्पनियाँ अमेरिका से ही कंपोनेंट्स लेकर वैश्विक बाजार में उससे तैयार उपकरण बेचती हैं। उन्होंने कहा कि चीन कई क्षेत्रीय व्यापारिक समझौतों के जरिए आगे रहने की कोशिश कर रहा है।

बता दें कि जो बायडेन ने तुर्की को लेकर भी कहा था कि वो एक ‘असली समस्या’ है और इसे लेकर वो उसे सख्त हिदायत जारी करते। जो बायडेन ने कहा था कि वो तुर्की को सबक सिखाते, भले ही इसके लिए उन्हें ‘सिचुएशन रूम’ में हजारों घंटे ही क्यों न व्यतीत करना पड़े या फिर सीरिया या ईराक में स्थिति सुधारने के लिए क्यों न कुछ भी करना पड़े। चुनाव प्रचार के समय ही उन्होंने साफ़ कर दिया था कि वो तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआँ (Erdogan) से बात कर उन्हें चेता देते कि उन्होंने जो कुछ भी किया है, इसके लिए उन्हें बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी।

TRP केस में इंडिया टुडे को सबसे पहले समन भेजेगी ED, हंसा रिसर्च के बयान के बाद होगी पूछताछ

TRP मामले की जाँच ईडी (ED) के पास पहुँचने के बाद इस केस में बड़ी डेवलपमेंट सामने आ रही है। ईडी के सूत्रों से पता चला है कि इंडिया टुडे पहला चैनल होगा, जिसे इस मामले पर वह समन भेजेगी और पूछताछ करेगी।

बता दें कि यह पूछताछ मुंबई पुलिस के पास दर्ज एफआईआर पर आधारित होगी, जिसमें इंडिया टुडे का नाम लिखा हुआ है। ईडी पहले शिकायतकर्ता (हंसा रिसर्च) का बयान दर्ज करेगी और फिर इंडिया टुडे के एग्जीक्यूटिव्स को पूछताछ के लिए बुलाएगी।

गौरतलब है कि शुक्रवार (नवंबर 20, 2020) को केंद्रीय जाँच एजेंसी ईडी ने टीआरपी केस में प्रवर्तन मामला सूचना रिपोर्ट यानी ECIR दर्ज की थी। रिपब्लिक टीवी ने बताया था कि अब ईडी मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों के साथ-साथ उन सभी चैनल की जाँच करेगी, जिनका उल्लेख ओरिजनल एफआईआर (FIR) में किया गया है।

ईडी के अलावा इस केस में सीबीआई की जाँच भी चल रही है यानी ईडी दूसरी केंद्रीय जाँच एजेंसी है, जिसने केस दर्ज किया।

TRP केस

8 अक्टूबर को आयोजित एक प्रेस वार्ता में मुंबई पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह ने टीआरपी घोटाले मामले में रिपब्लिक टीवी और उसके एडिटर इन चीफ अर्णब गोस्वामी पर कई गम्भीर आरोप लगाए थे। उन्होंने दावा किया था कि चैनल ने टीआरपी से जुड़ी जानकारी में बदलाव करने के लिए आम लोगों को पैसे दिए थे और उनसे कहा गया था कि वह उनका चैनल चलाकर अपना टीवी ऑन रखें।

हालाँकि, उसी दिन देर शाम तक रिपब्लिक टीवी ने सबूतों के साथ अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को खारिज करते हुए बताया कि असली रिपोर्ट में उनके चैनल का नाम कहीं भी नहीं है, बल्कि उन पर सवाल उठाने वाले इंडिया टुडे का नाम ओरिजनल एफआईआर में है। इसके बाद इंडिया टुडे और मुंबई पुलिस की मंशा पर सवाल खड़े हो गए थे। बाद में मुंबई पुलिस कमिशनर को मानना भी पड़ा था कि एफआईआर में इंडिया टुडे का नाम है।

पर्यावरण के नाम पर वसूले ₹883 करोड़, खर्चे बस ₹14 करोड़: केजरीवाल सरकार ने RTI में खोली खुद की पोल

दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार प्रदूषण की समस्या को लेकर कितनी ‘गंभीर’ है यह एक आरटीआई जवाब से फिर उजागर हुआ है। द संडे गार्जियन की खबर के अनुसार केजरीवाल सरकार ने बीते चार साल में पर्यावरण के नाम पर 883 करोड़ रुपए इकट्ठे किए हैं। लेकिन, प्रदूषण रोकने पर इस राशि का केवल 1.6 फीसदी ही खर्च किया गया है। यानी 883 करोड़ रुपए में से केवल 141,280,000 रुपए खर्च किए गए हैं।

यह चौंकाने वाला खुलासा दिल्ली सरकार के ट्रांसपोर्ट विभाग ने स्वयं संडे गार्जियन की आरटीआई के जवाब में किया है। विभाग द्वारा मुहैया करई गई जानकारी के मुताबिक दिल्ली सरकार ने साल 2017 में पर्यावरण कर के नाम पर 503 करोड़ रुपए, साल 2018 में 228 करोड़ रुपए और साल 2019 में 110 करोड़ रुपए इकट्ठा किए। इसके अलावा सरकार पर्यावरण उपकर के नाम पर साल 2020 में सितंबर तक 4 करोड़ रुपए जमा कर चुकी है।

रिपोर्ट बताती है कि पर्यावरण कर को दिल्ली सरकार क्षतिपूर्ति शुल्क के रूप में एकत्रित करती है। इसका एक बड़ा हिस्सा उन ट्रकों से लिया जाता है जो आए दिन दिल्ली में घुसते हैं और जिनके कारण प्रदूषण फैलता है। इस सूचना में आगे कहा गया है कि दिल्ली सरकार पर्यावरण उपकर का केवल बहुत छोटा हिस्सा सालों से प्रदूषण रोकने के लिए इस्तेमाल कर रही है।

आरटीआई यह भी बताती है कि दिल्ली सरकार ने पिछले चार सालों में सिर्फ 15 करोड़ 58 लाख रुपए पर्यावरण संरक्षण और साफ हवा के लिए खर्च किया है, जबकि साल 2017 में इकट्ठा हुए उपकर में से केजरीवाल सरकार ने एक रुपया भी खर्च नहीं किया है।

साल 2018 के कर में से 15 लाख रुपए एनएमवी (नॉन-मोटर व्हीकल) लेन के सुधार और रखरखाव के लिए खर्च किए गए थे और शहर में मार्शल के रूप में नागरिक सुरक्षा स्वयंसेवकों की तैनाती के लिए 43 करोड़ रुपए खर्च किया गया।

यहाँ याद दिला दें कि साल 2017 में आम आदमी पार्टी सरकार ने हाइड्रोजन पावर बस लाने का वादा किया था, लेकिन आरटीआई जवाब में बताया गया है कि साल 2019 तक इस पर सिर्फ 15 करोड़ खर्च हुआ है और 265 करोड़ रुपए दिल्ली-मेरठ रैपिड रेल ट्रांसपोर्ट प्रणाली के सुधार के लिए खर्च किया गया है।

साल 2017 में द न्यूज इंडियन एक्सप्रेस पर प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक फंड का सही उपयोग न कर पाने के कारण AAP सरकार को कॉन्ग्रेस तक घेर चुकी है। कॉन्ग्रेस नेता अजय माकन ने उस समय आरोप लगाया था कि दिल्ली सरकार फंड का सही प्रयोग नहीं कर पा रही है और न ही ट्रांसपोर्ट सुविधा सुधार रही है।

अब सोचने वाली बात है कि दिल्ली में आए दिन प्रदूषण के नाम पर पड़ोसी राज्यों को दोषी ठहराने वाली केजरीवाल सरकार का मकसद क्या है? आखिर क्यों हमें भ्रम में रख कर ऐसा दर्शाया जा रहा है कि सरकार प्रदूषण के लिए नित नए कदम उठा रही है, लेकिन उसे दूसरे लोग सहयोग नहीं कर रहे।

‘ऑड-ईवन’ से लेकर ‘रेड लाइट ऑन गाड़ी ऑफ’ तक का आह्वान करवाने के लिए दिल्ली सरकार जोर-शोर से जनता के सामने विज्ञापन करती है। लेकिन ऐसे प्रयोगों के नतीजे जब देने होते हैं तो दिल्ली की जनता का आभार व्यक्त करके उससे उनका ध्यान भटका दिया जाता है। 

संडे गार्जियन की यह रिपोर्ट सवाल उठाती है कि आखिर क्यों प्रदूषण जैसी व्यापक समस्या से उभरने के लिए सरकार ने पर्याप्त कदम नहीं उठाए? आखिर क्यों आम आदमी पार्टी ने एक भी बार पर्यावरण के नाम पर इकट्ठा धनराशि का जवाब देना सही नहीं समझा? क्या केवल दिवाली पर पटाखे बैन से समस्या का समाधान हो जाएगा? क्या केवल ग्रीन दिल्ली एप लॉन्च करने से दिल्ली का AQI सुधर जाएगा?

इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों का दिल्ली सरकार से पूछना है कि आखिर जब इस तरह जनता के पैसे खाने थे तो फिर ऑड-ईवन का नाटक क्यों किया गया था? एक यूजर तंज कसते हुए कहता है कि 1% प्रदूषण रोकने के लिए इस्तेमाल किया गया, क्योंकि बाकी का विज्ञापन पर यूज होना था।

गरीब परिवारों को 66257 गायें, 1071 कुपोषित बच्चों के अभिभावकों को, 900 रुपए प्रतिमाह भी: UP की सहभागिता योजना

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ रविवार (नवंबर 22, 2020) को मिर्जापुर के दौरे पर थे और उन्होंने इस दौरान 11 गरीब परिवारों को गायें दान में दी। इन सभी गरीब परिवारों में कुपोषित बच्चे थे, जिनके भरण-पोषण और खान-पान के लिए सीएम योगी ने गायें दान में दी। गोपाष्टमी के मौके पर उन्होंने एक गोशाला में पूजा भी की। मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य में फ़िलहाल विभिन्न गोशाला में 5 लाख गायें हैं।

मुख्यमंत्री ने बताया कि इनमें से 65,000 से अधिक गाय पहले ही राज्य के कई गरीब परिवारों को दे दिए गए हैं। उन्होंने कहा कि गोपाष्टमी को हमें गायों की सेवा के प्रति हमारी जिम्मेदारियों को याद करने के मौके के रूप में लेना चाहिए। एक अधिकारी ने बताया कि गरीबों को गाय देने से दो उद्देश्य पूरे होंगे – पहला, गायों के संरक्षण का काम होगा और दूसरा, कुपोषित बच्चों का खान-पान ठीक हो जाएगा। बच्चों का स्वास्थ्य ठीक होगा।

‘सहभागिता योजना’ के तहत उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार गाय की देखरेख करने वाले परिवारों को 900 रुपए प्रतिमाह की सहायता राशि देती है। अब तक इस योजना के तहत 66,257 गायें दान की जा चुकी हैं, जिनमें से 1071 गायें उन 1069 गरीब परिवारों को दी गईं, जिनमें कुपोषित बच्चे थे। मुख्यमंत्री ने मिर्जापुर में कहा कि ये अभियान समाज और राष्ट्र को के भविष्य को उज्जवल बनाने की प्रक्रिया का हिस्सा है।

उन्होंने बताया कि इस अभियान के तहत सभी बेसहारा गायों को सरकारी गोशालों में लाया जा रहा है और अगर कोई भी किसान उनकी देखभाल के लिए उन्हें ले रहा है तो उसे 900 रुपए प्रतिमाह की सहायता राशि भी दी जा रही है। साथ ही हर महीने इस सिस्टम की समीक्षा भी की जाएगी। उन्होंने कई योजनाओं को जनता तक पहुँचाने के लिए महिलाओं और महिला स्वयंसेवी संस्थाओं की भी सराहना की। सीएम ने कहा कि समाज में सकारात्मक बदलाव के लिए महिला सशक्तिकरण आवश्यक है।

मुख्यमंत्री ने मिर्जापुर के साथ-साथ सोनभद्र का भी दौरा किया। उन्होंने गोशाला में ही आयोजित कार्यक्रमों में स्वयंसेवी संस्थाओं की महिलाओं को चेक वितरण किया। उन्होंने कहा कि सरकारी योजनाओं के बारे में जानकारी न होने पर लोग इनका लाभ नहीं ले पाते। केंद्रीय जलशक्ति मंत्री राजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि हम अपनी पुरानी सभ्यता की ओर लौट रहे हैं और हमारे पूर्वज गाय को माता मान कर पूजते आए हैं और आज फिर इसी का आवश्यकता है। 

इसी तरह मध्य प्रदेश में भी गौ कैबिनेट का गठन हुआ। भाजपा ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विकल्प के रूप में गौ पालन के पीछे का कारण बताते हुए कहा कि ये एक ऐसा विकल्प है जो टिकाऊ है, क्योंकि पिछले 2000 वर्षों से भी अधिक समय से ऐसा होता आ रहा है। नई गाय आधारित अर्थव्यवस्था के जरिए मध्य प्रदेश की सरकार एक टिकाऊ इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण करेगी, जिसके लिए गौ कैबिनेट का गठन किया गया है। साथ ही ग्रामीण सेटअप की आमदनी बढ़ाने में भी मदद मिलेगी।

‘मुस्लिमों ने मुस्लिम उम्मीदवारों और इस्लामी पार्टियों को कभी वोट नहीं दिया’ – आँकड़े और पटेल दोनों को झुठला रहे योगेंद्र यादव

असदुद्दीन ओवैसी ने हैदराबाद के बाहर अपने पाँव पसारने क्या शुरू किए, जो वामपंथी पहले उनकी तारीफ करते नहीं थकते थे वो अब उनके खिलाफ हो गए। कोई उन्हें वोटकटवा कह रहा है तो कोई AIMIM की वजह से अन्य तथाकथित सेक्युलर पार्टियों को हो रहे नुकसान से चिंतित है। अब इस चर्चा में योगेंद्र यादव भी कूद गए हैं। BBC के एक वीडियो में उन्होंने भारत में मुस्लिम मतदाताओं की पसंद को लेकर भ्रामक दावे किए हैं।

महाराष्ट्र में AIMIM के विधायक रहे इम्तियाज जलील के हवाले से इस वीडियो में बताया गया है कि अगर देश में आज मुस्लिमों का कोई नेता है तो वो असाउद्दीन ओवैसी हैं। साथ ही वो पूछते हैं कि अगर उनके टक्कर में देश में कोई मुस्लिम नेता आया हो तो बताएँ। बिहार विधानसभा चुनाव में उनके हालिया प्रदर्शन का जिक्र करते हुए बताया कि अब वो एक महानगर की पार्टी न होकर देश भर में पाँव पसार रही है।

बता दें कि बिहार में AIMIM ने 5 सीटें जीती हैं, जो हैदराबाद के बाहर उसके लिए सबसे ज्यादा है। इसके बाद उन्होंने पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव में पूरी ताकत के साथ उतरने का फैसला लिया है, जिसके बाद कुछ लोग इसलिए परेशान हैं क्योंकि उन्हें आशंका है कि इससे ममता बनर्जी की तृणमूल कॉन्ग्रेस को नुकसान होगा। ममता ने अपने 10 साल के कार्यकाल में मुस्लिम तुष्टिकरण का एक भी मौका नहीं छोड़ा है।

अब ओवैसी ने तो TMC को गठबंधन के लिए न्यौता देकर अपना पास फेंक दिया है। ऐसे में BBC के इस वीडियो में बताया गया है कि कैसे CAA, NRC, बाबरी मस्जिद और इस्लाम से जुड़े अन्य मुद्दों पर वो संसद में सबसे ज्यादा ठीक तरीके से बात रखते हैं। वहीं कुछ मुस्लिम विश्लेषकों के हवाले से बताया गया है कि उनका आगे बढ़ना खतरनाक है और भारतीय मुस्लिमों को एक सेक्युलर सिस्टम ही चाहिए।

एक मुस्लिम विश्लेषक के हवाले से दावा किया गया है कि भाजपा चाहती है कि विपक्ष उसकी पसंद का ही होना चाहिए और असदुद्दीन ओवैसी के रूप में वो अपने लिए अपना पसंदीदा विपक्ष पैदा कर रही है। बताया गया कि ये एक ‘आज्ञाकारी विपक्ष’ है, और इसके लिए भाजपा ही जिम्मेदार है। अब आते हैं योगेंद्र यादव पर, जिन्होंने असदुद्दीन ओवैसी के प्रभाव के बढ़ने को ‘सेक्युलर राजनीति की हार’ और ‘सेक्युलर पार्टियों की विफलता’ करार दिया।

योगेंद्र यादव का कहना है कि बँटवारे के बाद मुस्लिमों ने कभी भी मुस्लिम पार्टियों को वोट नहीं दिया और न ही अपने प्रतिनिधित्व के लिए मुस्लिम नेताओं का सहारा लिया। बकौल योगेंद्र यादव, मुस्लिमों का मानना था कि जो पार्टी बहुसंख्यकों का ख्याल रख सकती है, वो मुस्लिमों के हितों के भी ख्याल रख सकती है। उन्होंने इसे ‘लोकतंत्र की खूबसूरती’ बताते हुए कहा कि इस देश की ‘सेक्युलर’ पार्टियों ने मुस्लिमों को ‘वोट का बंधक’ बनाने का प्रयास किया।

योगेंद्र यादव ने यहाँ बड़ी चालाकी से स्वतंत्रता के बाद की बात की है लेकिन आज़ादी से पहले की बात की भी चर्चा ज़रूरी है। 1945-46 में ब्रिटिश इंडिया में प्रांतीय चुनाव हुए थे। इस चुनाव में मुस्लिम लीग ने 87% मुस्लिम बहुल सीटें जीती थीं। अब इस बात पर सोचना चाहिए कि आखिर 1 साल में ही ऐसा क्या बदल गया, जो भारत के मुस्लिम अचानक से सेक्युलर हो गए और उन्होंने इस्लामी पार्टियों को वोट देना बंद कर दिया?

बीबीसी ने ओवैसी के बिहार में प्रदर्शन का किया विश्लेषण

तब बंगाल और पंजाब में मुस्लिम लीग ने क्रमशः 113 और 73 सीटें जीती थीं। अब ये तर्क दिया जा सकता है कि इन प्रांतों के बड़े हिस्से पाकिस्तान में चले गए। लेकिन, लीग ने बिहार में 34, असम में 31, बॉम्बे में 30 और मद्रास में 28 सीटों पर विजय प्राप्त की थी। ये प्रान्त तो आज भी भारत का हिस्सा हैं? क्या एक साल में ही भारत के मुस्लिम अचानक से सेक्युलर होकर इस्लामी पार्टियों के खिलाफ हो गए, ये सवाल तो बनता है।

मद्रास, ओडिशा और बॉम्बे की तो सारी की सारी मुस्लिम बहुल सीटें मुस्लिम लीग ने ही जीती थीं। अब योगेंद्र यादव, जो खुद को सेफोलॉजिस्ट बताते हैं, उनके दूसरे तर्कों पर आते हैं। आज़ादी के बाद भी जहाँ भी मौका मिला, वहाँ मुस्लिम पार्टियों ने मुस्लिम बहुल इलाकों में वोट पाया। हाँ, कई सीटों पर इस्लामी पार्टियों को इसीलिए सफलता नहीं मिली क्योंकि बड़े दलों के मुस्लिम उम्मीदवार मजबूत थे और उनके चेहरे पर ही वोट हुआ।

अब बिहार के किशनगंज सीट को ही ले लीजिए, जहाँ मुस्लिमों का सबसे ज्यादा प्रभाव है। यहाँ मुख्यतः कॉन्ग्रेस और उसके बाद राजद का ही कब्ज़ा रहा। लेकिन, अब तक हुए 16 चुनावों में मात्र एक बार ही यहाँ से कोई हिन्दू विजयी हुआ, वो भी 1967 में। क्यों? क्या ये नहीं माना जाए कि यहाँ मुस्लिमों ने अपने प्रतिनिधित्व के लिए हमेशा किसी मुस्लिम को ही पसंद किया? फिर ये एक मुस्लिम बहुल सीट तो योगेंद्र यादव के दावे को फेल ही कर देती है।

बिहार को छोड़िए, अब असम चलते हैं। वहाँ जब मुस्लिमों को विकल्प मिला तो उन्होंने बदरुद्दीन अजमल की पार्टी AIUDF पर खूब प्यार बरसाया। खुद बदरुद्दीन अजमल जिस डुबरी लोक सभा क्षेत्र से जीते हैं, उसका ही इतिहास देख लीजिए। यहाँ अब तक हुए 16 चुनावों में एक बार भी कोई नॉन-मुस्लिम जीतने में कामयाब नहीं हो सका है। बदरुद्दीन खुद यहाँ से हैट्रिक लगा कर नाबाद खेल रहे हैं। इसे क्या समझा जाए? जहाँ कॉन्ग्रेस के मुस्लिम चेहरे जीतते थे, वहाँ मौका मिलते ही इस्लामी पार्टी को मुस्लिमों ने जिताया या नहीं?

खुद असदुद्दीन ओवैसी को ही देख लीजिए। हैदराबाद लोकसभा क्षेत्र से 1980 से इस परिवार का कब्ज़ा है। हैदराबाद की 7 विधानसभा सीटें असदुद्दीन ओवैसी के खाते में जाती रही हैं। यहाँ भी मुस्लिमों को जैसे ही मौका मिला, उन्होंने मुस्लिम चेहरे की पार्टी पर विश्वास जताया। इसलिए, ये कहना कि बिहार में ओवैसी की पार्टी की मुस्लिम बहुल सीटों पर सफलता एक अचानक हुई घटना है, तो ऐसा नहीं है। हैदराबाद में वो इसी बल पर अपना प्रदर्शन दोहराते रहे हैं।

2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 482 में से 7 मुस्लिम उम्मीदवार दिए, एक भी नहीं जीत पाया। क्या ये ध्रुवीकरण का सबूत नहीं? बाद में यही विश्लेषक पूछते हैं कि फलाने सरकार में एक भी मुस्लिम मंत्री क्यों नहीं है? क्या 2014 में भाजपा ने आकर ध्रुवीकरण कर दिया, अचानक से? ऐसा नहीं है। भाजपा के उम्मीदवार मुस्लिम भले ही हों, मुस्लिमों के एक बड़े वर्ग के मन में ये बैठा रहता है कि इसके जीतने से बढ़ेगी तो भाजपा के सीटों की संख्या ही।

हिंदी बेल्ट और उत्तर-पूर्व के बाद अब दक्षिण भारत से भी एक उदाहरण देख लेते हैं। यहाँ केरल में पिछले 70 वर्षों से भी अधिक समय से ‘इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML)’ नामक पार्टी सक्रिय है। क्या आप यकीन करेंगे कि इस पार्टी के पास केरल में 18 विधानसभा सीटें और 3 लोकसभा सीटें हैं। वायनाड में इसके समर्थन से राहुल गाँधी जीते। क्या योगेंद्र यादव इसे भी ‘मुस्लिम बहुल इलाके में नॉन-मुस्लिम’ की जीत मानते हैं?

कल को इस पार्टी के पास भी ओवैसी जैसा कोई बड़ा विवादित चेहरा मिल जाता है और ये किसी अन्य राज्य में चुनाव जीत जाती है तो इसे भी भाजपा की बी-टीम ही माना जाएगा? ऐसा हो सकता है, क्योंकि इस पार्टी के खिलाफ वामपंथी और लिबरल गिरोह तब तक चुप रहेंगे, जब तक ये कॉन्ग्रेस के साथ UDF गठबंधन में है। जैसे ही ये पाँव पसारेगी, कॉन्ग्रेस का वोट छिटकने के लिए इसे जिम्मेदार ठहराते हुए गालियाँ दी जाएँगी।

इसीलिए, इन तथाकथित विश्लेषकों की दिक्कत किसी मुस्लिम पार्टी के उभार से बिलकुल नहीं है। उन्हें असली दिक्कत भाजपा की जीत से है। उन्हें दिक्कत इस बात से है कि मुस्लिम कट्टरवादियों का प्रभाव बढ़ने के कारण हिन्दू भी एकजुट हुए हैं, जिसकी वो कभी उम्मीद नहीं करते थे। दिक्कत इस बात से है कि ये मुस्लिम समाज उन इस्लामी पार्टियों को समर्थन क्यों दे रहा है, जो कॉन्ग्रेस या किसी भाजपा-विरोधी बड़े दल के साथ गठबंधन में नहीं हैं।

असली परेशानी इससे है कि मुस्लिमों को जानबूझ कर हाशिए पर रख कर खुद को उनका रहनुमा बताने वाली पार्टियाँ हिन्दुओं के खिलाफ फैसले ले-ले कर मुस्लिम समाज को खुश करने की कोशिश करते रहे, और उनके दशकों के प्रयासों को भुला कर मुस्लिमों ने इस्लामी पार्टियों को वोट देना शुरू कर दिया है। मुस्लिम तुष्टिकरण की हदें पार चुकी ये पार्टियाँ और उनके चमचे इसे बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं।

मुस्लिम बहुल सीटों पर अगर कोई नॉन-मुस्लिम पार्टी जीती भी तो उसने वहाँ की मुस्लिम जनसंख्या के हिसाब से उम्मीदवार खड़े किए और अपने किसी बड़े मुस्लिम चेहरे को तरजीह देकर पार्टी कैडर को उसे जिताने में लगाया। आप गौर कीजिए, कॉन्ग्रेस, राजद, सपा, बसपा या तृणमूल जैसी पार्टियाँ मुस्लिम बहुल इलाकों में नॉन-मुस्लिम उम्मीदवार नहीं देती। क्यों? क्योंकि उन्हें पता है कि मुस्लिम समाज अपने बीच में ही प्रतिनिधित्व ढूँढता है। योगेंद्र यादव को भी पता होगा, लेकिन प्रपंच जो फैलाना है। योगेंद्र यादव तो सरदार पटेल के इस वीडियो को भी देखे होंगे लेकिन जनता को सब कुछ बताना क्यों?