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मंदिर में किसिंग सीन: MP में गृहमंत्री ने Netflix के खिलाफ दिया जाँच का आदेश, निर्माता-निर्देशक पर हो सकती है कार्रवाई

मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार ने Netflix की उस सीरीज के खिलाफ जाँच का आदेश दिया है, जिसमें एक मुस्लिम युवक एक हिन्दू युवती को मंदिर में किस कर रहा है और बैकग्राउंड में भजन बज रहा है। गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने रविवार (नवंबर 22, 2020) को जानकारी दी कि मध्य प्रदेश पुलिस को इसकी जाँच करने को कहा है कि क्या Netflix का ‘द सूटेबल बॉय’ धार्मिक भावनाओं को आहत करता है।

मिश्रा ने इस ओर इशारा किया कि इस सीरीज के निर्माताओं के खिलाफ क़ानूनी कार्रवाई भी जा सकती है। भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) ने बताया है कि राज्य के महेश्वर शहर में स्थित एक मंदिर में इस दृश्य को फिल्माया गया था। संगठन ने रेवा पुलिस थाने में इसे खिलाफ शिकायत भी दर्ज कराई है। नरोत्तम मिश्रा ने स्पष्ट कहा कि ये आपत्तिजनक है और उनकी सोच है कि इससे धार्मिक भावनाएँ आहत होती हैं।

मिश्रा ने बताया कि उन्होंने पुलिस को निर्देश दिया है कि इस सीरीज के खिलाफ जाँच की जाए कि ये धार्मिक भावनाओं को आहत करता है या नहीं, ताकि निर्माता और निर्देशक के खिलाफ क़ानूनी कार्रवाई की जा सके। BJYM के महासचिव गौरव तिवारी ने बताया कि उन्होंने रेवा के एसपी राकेश कुमार सिंह को एक मेमोरेंडम देकर माँग की है कि निर्माता-निर्देशक को माफ़ी माँगने को कहा जाए और ये आपत्तिजनक दृश्य तुरंत हटाया जाए।

रेवा के एसपी ने बताया कि एक बार Netflix से इस सीरीज का वो फुटेज प्राप्त हो जाए, इसके बाद इस मामले में आगे की कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि जाँच के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। साथ ही तिवारी का मेमोरेंडम मिलने की भी पुष्टि की। इस सीरीज का निर्देशन मीरा नायर ने किया है, जो ‘सलाम बॉम्बे’, ‘मानसून वेडिंग’ और ‘दी नेमसेक’ जैसी फिल्मों के लिए जानी जाती हैं। इन फिल्मों को समीक्षकों ने सराहा था।

ताज़ा वेब सीरीज की कहानी के केंद्र में है 1951 की एक लड़की, जिसके लिए उसकी माँ एक योग्य लड़के की तलाश में है। इस तलाश के दौरान ही सीरीज में भारत विभाजन से उपजी त्रासदी से लेकर धर्म का झगड़ा, मंदिर-मस्जिद, उस वक्त की राजनीति और बड़ी-बड़ी उलझनें लिए बहुत से शेड्स दिखते हैं। जहाँ ये दृश्य फिल्माया गया, उस महेश्वर घाट को रानी अहिल्याबाई होल्कर ने शिवभक्तों के लिए समर्पित किया था। पाषाण युग के हजारों शिवलिंग उसकी पहचान हैं।

नेटफ्लिक्स की प्रवृत्ति हमेशा से हिंदू विरोधी नैरेटिव को बढ़ावा देने की रही है। इसने ‘Ghoul’, ‘Sacred Games’ और ‘लैला’ के रूप में ऐसी कई वेब सीरिज बनाई है, जो हिंदू विरोधी भावनाओं को जन्म दे रही है और साथ ही इससे विश्व में हिंदू धर्म की नकारात्मक छवि पेश की जा रही है। लैला वेब सीरीज में सनातन धर्म के अनुयायियों को सबसे हिंसक और दमनकारी मानसिकता वाले लोगों के तौर पर दिखाया गया है, जो सिर्फ लोगों को बाँटकर उन पर राज करना चाहते हैं। 

सीक्रेट ऑफिस, JNU मुस्लिम स्टूडेंट समूह को इमाम के जरिए ब्रेनवॉश: दिल्ली दंगों में उमर खालिद का रोल, चार्जशीट में खुलासा

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में गत फरवरी में हुई हिंसा की साजिश के आरोप में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने JNU के पूर्व छात्र उमर खालिद और शरजील इमाम के ख़िलाफ UAPA के तहत 200 पन्नों की सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल की है।

चार्जशीट के मुताबिक इन दंगों में खालिद का हाथ था। उसने दूर से इन दंगों को कंट्रोल किया था, जिसके कारण 53 लोगों की जान चली गई। उसने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारत दौरे के दौरान इन दंगों को भड़काया, ताकि इस पूरे मामले को अंतरराष्ट्रीय कवरेज मिले और सीएए को लेकर सरकार पर दबाव बने।

विशेष न्यायाधीश अमिताभ रावत की अदालत में दायर की गई इस चार्जशीट में दंगों के दौरान खालिद और शरजील की भूमिका पर विस्तार से बताया गया है। इनके अलावा एक फैजान खान को भी आरोपित बनाया गया है। चार्जशीट में फैजान खान पर हिंसा में शामिल लोगों को फर्जी सिम कार्ड दिलवाने का आरोप है।

यह चार्जशीट आईपीसी की धारा 13/16/17/18 UAPA act, 120B, 109, 114,201, 124A, 147,148,149, 153A, 186, 420 समेत कई गंभीर धाराओं में दाखिल की गई है। अनुमान लगाया जा रहा है पुलिस जल्द से जल्द शेष आरोपितों के ख़िलाफ़ भी चार्जशीट दायर कर देगी।

दिल्ली पुलिस की ओर से करकड़डूमा कोर्ट में तकरीबन 930 पेज की चार्जशीट दाखिल की गई है। 930 पेज की चार्जशीट में 197 पेज चार्जशीट है, तो 733 पेज में दस्तावेज हैं। इसमें कहा गया कि खालिद ने सीएए के संसद में पास होते ही अपनी जैसी मानसिकता वाले लोगों को बढ़ावा दिया।

उसने जेएनयू के मुस्लिम स्टूडेंट ऑफ जेएनयू समूह को इमाम के जरिए मेंटॉर किया और फिर इसी समूह का इस्तेमाल दक्षिणी दिल्ली में हिंसा भडकाने के लिए किया। आगे उसी ने केंद्र सरकार से नफरत करने वाले विरोधियों को एक साथ जोड़ा, जिसकी वजह से दिल्ली प्रोटेस्ट सपोर्ट ग्रुप व्हॉट्सएप पर तैयार हुआ।

गौरतलब है कि इस पूरे मामले में अब तक 21 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। पहली और मुख्य चार्जशीट सितंबर में दाखिल हुई थी। इसमें 15 लोगों को अलग-अलग आरोपों के लिए आरोपित बनाया गया था। इसमें दंगे करवाने के लिए रची गई साजिश की विस्तार से जानकारी थी।

बीते 28 अक्टूबर को दिल्ली सरकार ने इसी मामले में खालिद और इमाम के ख़िलाफ़ यूएपीए के तहत मुकदमा चलाने की मंजूरी दी थी। अब खालिद को लेकर पुलिस का दावा है कि उसका उत्तर-पूर्वी दिल्ली में एक सीक्रेट ऑफिस था, जहाँ उसने साजिशकर्ताओं और दंगाइयों के साथ देर रात में बैठके की और बाद में इसी जगह बड़े पैमाने पर हिंसा हुई व कॉन्सटेबल रतन लाल को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।

उसकी थ्योरी पर चर्चा करते हुए रिपोर्ट में बताया गया है, “उसका मानना था कि ट्रंप के साथ आ रहा अंतरराष्ट्रीय मीडिया दंगों को कवर करेगा, जिससे केंद्र सरकार की दुनिया भर में भारी फजीहत होगी। जाफराबाद और चांद बाद को दंगों का हॉटस्पॉट बनाने की साजिशकर्ताओं में उसकी शीर्ष भूमिका थी।”

यहाँ बता दें कि खालिद को क्राइम ब्रांच ने एक अन्य मामले में खजूरी खास से फरवरी में गिरफ्तार किया था। वह अपने भड़काऊ भाषण के बाद सबकी नजरों में आया था। उसके ख़िलाफ़ आर्म्स एक्ट के तहत फरवरी में भी मामला दर्ज हुआ था और 13 सितंबर से उसे तिहाड़ में रखा गया है।

पादरी के सामने ईसाई लड़की और मुस्लिम लड़के की शादी: गुस्से में चर्च, पादरी ने माँगी माफी

9 नवंबर 2020 को केरल के एक चर्च में शादी होती है। शादी की फोटो पेपर में छपती है। फोटो वायरल हो जाती है। इस शादी पर बवाल होता है। बवाल इतना कि पादरी को माफी माँगनी होती है।

और यह सब होता है इसलिए क्योंकि चर्च में हुई यह शादी दो ईसाइयों के बीच नहीं थी। इस शादी में लड़की तो ईसाई थी लेकिन लड़का मुस्लिम था। चर्च की ऊपरी सत्ता को इस शादी से आपत्ति होती है और वो जवाब भी माँगता है।

केरल के सिरो मालाबार चर्च (Syro Malabar Church) को इस शादी से दिक्कत होती है। कोच्चि में स्थित कदवंथरा सेंट जोसेफ चर्च में जिस पादरी ने यह शादी करवाई, उससे और इस शादी में भाग लेने वाले एक अन्य पादरी से सवाल-जवाब पूछा गया।

मामला इतना बढ़ गया कि पादरी को माफी तक माँगनी पड़ी। इसका कारण यह रहा कि सिरो मालाबार चर्च के अनुसार कैनन कानूनों (Canon laws, ऐसा कानून जो चर्च के मिशन को पूरा करता है) का पालन इस शादी (लड़की ईसाई लेकिन लड़का मुस्लिम) में नहीं किया गया।

माफी माँगने वाले पादरी

इस शादी में सतना के पूर्व बिशप मार मैथ्यू वानीकिजक्केल (Mar Mathew Vaniakizhakkel) ने हिस्सा लिया था। बिशप के साथ लड़का-लड़की की फोटो ही बवाल का कारण बनी। इसके बाद इस शादी की जमकर आलोचना की गई। बिशप मार मैथ्यू ने अपनी गलती मानते हुए माफी माँग ली है।

कार्डिनल मार जॉर्ज एलेनचेरी (Cardinal Mar George Alencherry) ने इसके बाद जाँच का आदेश दिया। एर्नाकुलम-अंगमाली डायोसेक (Ernakulam-Angamaly diocese) के आर्कबिशप मार एंटोनी कारिल (Mar Antony Kariyil) से रिपोर्ट माँगी गई।

इतना ही नहीं, केरल कैथोलिक बिशप काउंसिल (KCBC) ने दोनों पादरियों (एक जिसने शादी करवाई, दूसरा जो शादी में उपस्थित रहा) पर कैनन कानूनों की धज्जियाँ उड़ाने का आरोप लगाया।

केरल में ‘लव जिहाद’ और कैथोलिक पादरी

केरल में कैथोलिक पादरियों के एक संगठन ने कहा कि ‘लव जिहाद’ एक वास्तविक समस्या है। केरल के चर्च ने इसके पीछे ISIS का हाथ बताते हुए कहा था कि ‘लव जिहाद’ के जरिए कई महिलाओं का जबरन धर्मान्तरण हो रहा है। इसके जवाब में PFI जैसे मुस्लिम संगठनों ने पादरियों को चुप रहने की सलाह दी थी, क्योंकि उन्हें लगता था कि इससे CAA के खिलाफ चल रहे उपद्रव को लेकर जोश में कमी आ जाएगी।

केरल के चर्च का कहना था कि कुछ महीनों पहले केरल के जिन 21 लोगों को ISIS में शामिल कराया गया था, उनमें से आधे ईसाई थे। पादरियों का कहना था कि ‘लव जिहाद’ से सांप्रदायिक सद्भाव की भावना को ठेस पहुँच रही है। उनका ये भी आरोप था कि केरल का पुलिस-प्रशासन इस खतरे से निपटने को गंभीर नहीं है।

₹4000 करोड़ के घोटाले में गिरफ्तार हुए पूर्व मंत्री और विधायक BJP के? कॉन्ग्रेस छोड़ पकड़ा था भाजपा को? – फैक्ट चेक

CBI ने कर्नाटक के पूर्व मंत्री रौशन बेग को 4000 करोड़ रुपए के IMA स्कैम से जुड़े मामले में रविवार (नवंबर 22, 2020) को गिरफ्तार कर लिया। वो राज्य में कॉन्ग्रेस का सबसे बड़ा मुस्लिम चेहरा हुआ करते थे। सीबीआई ने पहले उन्हें समन किया और फिर सबूतों के आधार पर गिरफ्तार कर लिया। अब सोशल मीडिया में एक दुष्प्रचार फैलाया जा रहा है कि वो अब भाजपा के नेता हैं और कॉन्ग्रेस छोड़ कर वो भाजपा में आ गए थे।

उन्हें मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करने उनका कोरोना मेडिकल टेस्ट किया गया। उन्हें कोर्ट ने जुडिशल कस्टडी में भेज दिया, जिसके बाद उन्हें पराप्पना अग्रहारा स्थित बेंगलुरु सेन्ट्रल जेल में शिफ्ट कर दिया गया। उन्हें शाम के 7:45 बजे जेल के क्वारंटाइन सेंटर में भर्ती कराया गया। 14 दिनों बाद उन्हें रेगुलर बैरक में डाल दिया जाएगा। जुलाई 2019 में राज्य सरकार द्वारा गठित SIT ने उनसे पहली बार पूछताछ की थी, जिसके बाद ये मामला CBI के पास चला गया।

IMA के संस्थापक और एमडी मंसूर खान के बयानों के बाद इस मामले में रौशन बेग के शामिल होने के पक्के सबूत मिले थे और ये बह पता चला था कि उन्हें IMA से किकबैक भी मिले थे। तब फरार चल रहे मंसूर खान ने एक ऑडियो क्लिप जारी कर रौशन बेग को ही IMA प्रोजेक्ट के फेल होने के लिए जिम्मेदार ठहराया था। बाद में उसने SIT के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। जबकि रौशन बेग ने इसे मंसूर खान की साजिश बता दिया था।

रौशन बेग राजधानी बेंगलुरु के शिवजी नगर विधानसभा क्षेत्र से चुन कर आते रहे हैं। वो पहली बार 1985 में और दूसरी बार 1994 में जनता पार्टी के टिकट पर विधायक बने थे। इसके बाद उन्होंने कॉन्ग्रेस पार्टी के टिकट पर 2008, 13 और 18 का विधानसभा चुनाव जीत कर हैट्रिक लगाई। जुलाई 2019 में उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। तब राज्य में कॉन्ग्रेस-जेडीएस की सरकार चल रही थी। उससे पहले उन्हें पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में कॉन्ग्रेस ने निलंबित कर दिया था।

रौशन बेग के भाजपा में होने को लेकर खूब फैलाया गया झूठ

पत्रकार अरविन्द गुनसेकर ने ट्वीट किया है कि रौशन बेग ने 2019 में कॉन्ग्रेस छोड़ कर भाजपा जॉइन कर ली थी। इसी तरह से पत्रकार डीपी सतीश ने भी यही झूठ फैलाया। एक ट्विटर यूजर ने तो यहाँ तक लिख दिया कि वो IMA स्कैम मामले में गिरफ़्तारी से बचने के लिए ही भाजपा में शामिल हुए थे। कुछ लोगों ने तो यहाँ तक आवाज़ उठाई कि उन्हें खबरों में ‘भाजपा नेता’ कहने की बजाए ‘पूर्व कॉन्ग्रेस विधायक’ क्यों कहा जा रहा है?

सच्चाई जानने से पहले ये समझना ज़रूरी है कि कॉन्ग्रेस ने रौशन बेग को इसीलिए निलंबित नहीं किया था, क्योंकि उनका नाम IMA स्कैम में आया था। उन्हें राजनीतिक कारणों से निलंबित किया गया था। उन्होंने 2019 लोकसभा चुनाव में करारी हार के लिए पूर्व मुख्यमंत्री सिद्दारमैया को जिम्मेदार ठहराया था और लगातार बड़े कॉन्ग्रेस नेताओं की आलोचना की थी। हाँ, उन्होंने भाजपा में शामिल होने की कोशिश ज़रूर की थी।

नवंबर 2019 में खबर आई थी कि रौशन बेग ने भाजपा में शामिल होने के लिए खूब हाथ-पाँव मारे लेकिन भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर पार्टी ने उन्हें नहीं लिया। तब कर्नाटक के कुल 16 बर्खास्त विधायकों ने भाजपा का दामन थामा था और रौशन बेग उनमें अकेले थे, जिन्हें पार्टी ने एंट्री नहीं दी थी। भाजपा ने स्पष्ट कहा था कि वो रौशन बेग को पार्टी में नहीं चाहती। आलाकमान ने भी उनकी एंट्री बैन कर दी थी।

बावजूद इसके तीन बार कॉन्ग्रेस से विधायक बनने वाले और पार्टी की सरकार में मंत्री बनने वाले और हज समिति के अध्यक्ष के नाते पूरे राज्य में पार्टी का मुस्लिम चेहरा बनाए जाने वाले रौशन बेग को भाजपा से जोड़ा जा रहा है। उन्होंने सिनेमा के एक बड़े संगठन में भी स्थायी सदस्यता प्राप्त की और कई बड़े मंत्रालय संभाले। ये सब कॉन्ग्रेस राज में हुआ। भाजपा से उनका कभी कोई नाता रहा ही नहीं। इसीलिए उनके भाजपा में जाने वाली बातें झूठ हैं।

IMA ‘हलाल’ पोंजी घोटाले में आरोपित व वरिष्ठ आईएएस अधिकारी विजय शंकर ने बेंगलुरु के अपने आवास पर जून 23, 2020 को आत्महत्या कर ली थी। SIT ने विजय शंकर को पिछले साल ₹1.5 करोड की रिश्वत लेने के आरोप में गिरफ्तार किया था। इसके बाद उन्हें निलंबित कर दिया गया था। इस स्कैम कारण 40,000 से ज्यादा लोगों का नुकसान हुआ। लोगों को ज्यादा रिटर्न का लालच देकर फँसाया गया।

100 साल पहले देवी अन्नपूर्णा की जो अद्वितीय मूर्ति वाराणसी के मंदिर से चुराई गई थी, वो स्वदेश आने को तैयार

भारत से एक मूर्ति चोरी हुई थी। वो मूर्ति देवी अन्नपूर्णा की थी। यह प्राचीन मूर्ति चोरी होकर एक कैनेडियन विश्वविद्यालय पहुँच गई। लेकिन अब यह मूर्ति वापस भारत आएगी। कैनेडियन विश्वविद्यालय ने इस सांस्कृतिक चोरी को सुधारने का निर्णय किया है।

यह मूर्ति देवी अन्नपूर्णा की है, जो धान्य अर्थात अन्न की अधिष्ठात्री तथा वाराणसी की रानी हैं। इस मूर्ति के एक हाथ में चम्मच और दूसरे में खीर की कटोरी दिखाई गई है। रिपोर्टों के अनुसार, इस मूर्ति को करीब एक सदी पूर्व वाराणसी के एक मंदिर से चुराया गया था और तब से उसे ‘यूनिवर्सिटी ऑफ़ रिजायना’ के ‘मैकेंज़ी आर्ट गैलरी’ में रखा गया था।

एक बयान में यूनिवर्सिटी ने कहा कि इस मामले को उनकी नज़र में दिव्या मेहरा नाम की एक कलाकार ने लाया। दिव्या मेहरा को इसकी खबर पत्रकार और इतिहासकार रहे नॉर्मन मैकेंज़ी, जिनके नाम पर यह यूनिवर्सिटी है, के स्थाई संग्रह से मिली।

दरअसल दिव्या ने यह पाया कि मैकेंज़ी की नज़र इस मूर्ति पर उनके 1913 के भारत दौरे के वक़्त पड़ी। मैकेंज़ी की इस मूर्ति को पाने की इच्छा को जानकार एक व्यक्ति ने उसके इशारे पर, वाराणसी में गंगा किनारे बसे एक मंदिर से इसे चुरा लिया था। अब यूनिवर्सिटी ने इस सांस्कृतिक चोरी को सुधारने का निर्णय किया है।

यूनिवर्सिटी ने स्वेच्छा से मूर्ति वापस देने का किया निश्चय

19 नवम्बर को एक वर्चुअल समारोह के दौरान, यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर और इंटरिम प्रेसिडेंट डॉ थॉमस चेस कनाडा के भारतीय हाई कमिशनर अजय बिसारिया से मिले। यह इसलिए ताकि मूर्ति को आधिकारिक तौर पर स्वदेश भेजा जा सके। इस समारोह में कनाडा बॉर्डर सर्विसेज़ एजेंसी, मैकेंज़ी आर्ट गैलरी और ग्लोबल अफेयर्स कनाडा के कई प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

अजय बिसारिया ने कहा, “हम खुश हैं कि अन्नपूर्णा की यह अद्वितीय मूर्ति अब अपने घर जाने को है। भारत की इस सांस्कृतिक प्रतिमा को वापस करने की और यूनिवर्सिटी ऑफ़ रिजायना के इस सक्रिय जुड़ाव के लिए मैं इनका आभारी हूँ। स्वेच्छा से इस सांस्कृतिक निधि को लौटाने का कदम परिपक्वता तथा भारत-कनाडा के गहरे सम्बन्ध को दर्शाता है।”

यूनिवर्सिटी ऑफिशल्स का आधिकारिक बयान

वाइस चांसलर चेस ने कहा, “विश्वविद्यालय होने के नाते, ऐतिहासिक गलतियों को यथासंभव सुधारना हमारा कर्त्तव्य है। इस मूर्ति का एक सदी पहले यहाँ आने में जो गलती हुई, उसका प्रायश्चित तो नहीं हो सकता, परन्तु यह किया जाना आज सटीक एवं महत्वपूर्ण है। इसे संभव बनाने में मैकेंज़ी आर्ट गैलरी, भारतीय उच्चायोग तथा कनाडा के विरासत विभाग की भूमिका का मैं शुक्रगुज़ार हूँ।”

यूनिवर्सिटी ऑफ़ रिजायना के प्रेसिडेंट्स आर्ट कलेक्शन के संग्रहाध्यक्ष ऐलेक्स किंग ने कहा, “मूर्ति अन्नपूर्णा का प्रत्यावर्तन लम्बे समय से बातचीत का हिस्सा है। सांस्कृतिक विरासतों के प्रबंधक होने के नाते, सम्मानपूर्वक और नैतिक रूप से कार्य करना हमारा मौलिक कर्त्तव्य है और इसी प्रकार हमारे अपने संस्थागत इतिहास को गंभीर रूप से देखने की इच्छा भी।”

‘लव जिहाद’ की जगह ‘ग्रूमिंग जिहाद’ – आखिर क्यों ऑपइंडिया ने लिया इसे इस्तेमाल करने का फैसला

‘लव जिहाद’ के एक गंभीर मामले में सोनभद्र में एक लड़की के इस्लाम धर्म में परिवर्तित होने से इनकार करने पर उसका सिर काटकर दफना दिया गया। लड़की के विघटित शव के बारे में तब पता चला, जब एक महिला ने एक कुत्ते को लड़की के कटे हुए सिर को मुँह में दबाकर ले जाते देखा।

इसी तरह हरियाणा में, तौसीफ नाम के युवक ने निकिता तोमर की हत्या कर दी। आरोपित अपने दोस्तों के साथ कार में सवार होकर छात्रा के अपहरण के इरादे से आया था। आरोपित तौसीफ ने निकिता को गाड़ी में खींचने की कोशिश की लेकिन जब वो असफल रहा तो उसने गोली मार दी। यह पूरी घटना CCTV में भी कैद हो गई। मृतका निकिता बीकॉम फाइनल ईयर की छात्रा थी और अग्रवाल कॉलेज में एग्जाम देने आई थी।

पीड़िता के पिता ने दावा किया था कि आरोपित तौसीफ ही नहीं बल्कि उसकी माँ भी उनकी बेटी निकिता पर धर्म परिवर्तन का दबाव बनाती रहती थी। यह सिलसिला बीते दो साल से चल रहा था। छात्रा के पिता ने आरोपित तौसीफ की माँ पर आरोप लगाया कि वह बार-बार फोन कर के उनकी बेटी पर दबाव डालती थी कि तुम हमारा मजहब कबूल कर लो। कौशांबी रेप मामले में पीड़िता ने बलात्कारियों से अल्लाह के नाम पर रहम की भीख माँगी थी।

इनकी बर्बरता यहीं पर खत्म नहीं होती। ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जब मजहबी युवक हिंदू बनने का ढोंग करके अपनी पहचान छुपाकर हिंदू लड़की से शादी कर लेते हैं। और जब अचानक से या फिर उसके नाटक के अनुसार इसका खुलासा होता है तो वो लड़की पर इस्लाम में परिवर्तित होने के लिए दबाव डालते हैं, मना करने पर उनकी हत्या कर दी जाती है। सुभोलोग्ना चक्रवर्ती तो याद ही होगी आपको, जिसकी हत्या उसके होने वाले पति ने गोली मारकर कर दी थी। उसने भी हिंदू बनने का ढोंग रचा था।

हालाँकि वामपंथी इन घटनाओं को ‘दक्षिणपंथी कल्पना’ के रूप में खारिज करते हैं, लेकिन मामले वास्तविक हैं। शव भी असली हैं और खतरा व्याप्त है।

कैसे-कैसे मामले, देखें वर्गीकरण:

  1. एक व्यक्ति हिंदू होने का ढोंग करता है और हिंदू महिला को फँसाता है। इसके बाद, उसकी असली पहचान या तो एक दुर्घटनावश सामने आ जाती है या फिर इसका खुलासा तब होता है, जब वो महिलाओं को इस्लाम में परिवर्तित होने के लिए मजबूर करते हैं। इसके बाद इनकार करने पर वह हिंदू महिला की हत्या कर देता है।
  2. हिंदू युवती और दूसरे मजहब का युवक, दोनों एक दूसरे के धर्म के बारे में जानते हुए भी शादी करते हैं और फिर बाद में युवती को इस्लाम में परिवर्तित होने के लिए टॉर्चर किया जाता है।
  3. इस्लाम के नाम पर हिंदू महिला के साथ बलात्कार किया जाता है – यह मामला कौशांबी सामूहिक बलात्कार मामले में सबसे स्पष्ट था, जहाँ एक नाबालिग हिंदू लड़की के साथ बलात्कार किया गया था और अल्लाह के नाम पर रहम की भीख माँगने के लिए कहा गया था। अपराधियों ने विशेष रूप से लड़की को भगवान के नाम पर दया की भीख माँगने के लिए नहीं कहा। वायरल वीडियो में साफ सुनाई पड़ रहा था कि पीड़िता दलित नाबालिग लड़की उन दरिंदों को “भैया आप मुझे जानते हो, अल्लाह के लिए छोड़ दो” कह-कहकर गिड़गिड़ा रही थी। मगर फिर भी दरिंदों को रहम नहीं आया। वह रोती, चीखती, चिल्लाती रही और आदिल, नजिक जैसे दरिंदे उसकी चीख को फिल्माते रहे। इन मामलों में उद्देश्य या तो हिंदू महिला का रूपांतरण हो सकता है या फिर इसे काफिर महिलाओं को दंडित किए जाने के रूप में देखा जा सकता है।
  4. कई बार दूसरे मजहब के लड़कों का हिंदू लड़कियों के प्रति एकतरफा जुनून भी उनके लिए बलात्कार, हत्या जैसी बर्बरता का कारण बनता है। जब हिंदू लड़की दूसरे मजहब के लड़के के प्रपोजल को इनकार कर देती है तो इस तरह के कृत्यों को अंजाम दिया जाता है। इनकार करने वाले मामलों में इस्लाम में धर्मांतरण से इनकार भी शामिल है, जैसे निकिता तोमर के मामले में। हालाँकि इस्लाम में धर्मांतरण के बिना भी इन मामलों को व्यापक रूप से जिहाद के एक अधिनियम के रूप में देखा गया है।
  5. ऐसे मामले जब हिंदू महिला या कम उम्र की लड़कियों का बलात्कार करने के बाद समुदाय विशेष के पुरुषों से शादी कर उन्हें इस्लाम में परिवर्तित कर दिया जाता है। ऐसे मामले इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान और अन्य जगहों पर सबसे ज्यादा देखे जाते हैं। इस तरह के मामले में अक्सर देखा गया है कि शादी और धर्मांतरण के बाद लड़की कहती है कि उसने अपनी मर्जी से धर्म परिवर्तन किया है। ऐसा ही एक मामला हाल ही में पाकिस्तान में देखा गया था, जहाँ एक 13 वर्षीय ईसाई लड़की को उसके 44 वर्षीय अपहरणकर्ता को सौंप दिया गया और माता-पिता के विरोध के बाद उसने दावा किया कि उसने स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन किया था। इस तरह के मामलों में, ब्रिटेन के ग्रूमिंग गैंग के समानांतर यह समझना आवश्यक हो जाता है कि लड़की के बयान मात्र से हमें ऐसा नहीं मान लेना चाहिए कि यहाँ जिहाद का कोई एंगल नहीं था।

यहाँ बता दें कि ग्रूमिंग गैंग पूरे ब्रिटेन में फैला हुआ है। पिछले 40 वर्षों में अकेले ब्रिटेन में जिन करीब 5 लाख लड़कियों का बलात्कार किया गया, उनमें से अधिकतर गोरे हैं और उन्हें शिकार बनाने वाले मुख्य रूप से मजहब विशेष के एशियाई हैं। ग्रूमिंग गैंग जातीय और धार्मिक आधार पर रेप की वारदात को अंजाम देते हैं। ग्रूमिंग ग्रुप मुख्य रूप से कम उम्र की लड़कियों को निशाना बनाता है, लेकिन युवा और वृद्ध महिलाओं को भी अपना शिकार बनाते हैं।

दूसरे धर्म की महिलाएँ ऐतिहासिक रूप से इस्लामी अधीनता के केंद्र में रही हैं। महिलाओं को बंदी बनाए जाने या यहाँ तक ​​कि उनके शवों को हिंदू भूमि पर इस्लामिक विजय और हिंदू शासकों की हार के बाद भी बंधक बनाए जाने की कई कहानियाँ हैं। समकालीन परिवेश में भोला हत्याकांड दिमाग में आता है।

अक्टूबर 2001 में, भोला जिलों, लालमोहन क्षेत्र में, कट्टरपंथियों द्वारा हिंदुओं पर हमला किया गया था। हमलावर हिंदू घरों में घुस गए, उनके सामान लूट लिए, उनके पेड़ काट दिए, उनकी फसल नष्ट कर दी। भोला के चार फैसन में बीएनपी समर्थित कट्टरपंथियों ने 200 से अधिक हिंदू महिलाओं पर हमला किया और उनका बलात्कार किया। सबसे कम उम्र की पीड़िता 8 साल की थी और सबसे बड़ी 70 वर्षीय महिला थी।

इसके सालों बाद, बांग्लादेश में एक न्यायिक आयोग की जाँच ने निष्कर्ष निकाला था कि तत्कालीन सत्तारूढ़ बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी के 25,000 से अधिक नेता और स्थानीय पार्टी कार्यकर्ता हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों के खिलाफ हमले में शामिल थे, जिसके कारण सैकड़ों लोग मारे गए, घायल हुए और बांग्लादेश में हिंदुओं को भारत में भागने के लिए मजबूर किया था।

भोला एकमात्र उदाहरण नहीं है। भारत में ऐसे कई मामले हैं, जहाँ मजहब विशेष वाले दूसरे धर्म की महिलाओं को अपने जिहाद में एक आवश्यक मोहरे के रूप में इस्तेमाल करते हैं। 2018 में, एक व्यक्ति को अपनी पत्नी को इस्लाम में बदलने के लिए मजबूर करने और फिर उसे आईएसआईएस सेक्स स्लेव बनने के लिए बेचने के प्रयास के आरोप में हिरासत में लिया गया था। 2018 में केरल से कई ऐसे मामले सामने आए हैं। यहाँ तक कि ईसाई समुदाय ने भी आवाज उठाई है।

जर्मनी में समुदाय विशेष के पुरुषों के होर्ड्स ने छेड़छाड़ की और दूसरे धर्म की महिलाओं से बलात्कार करने का प्रयास किया। पुरुष पहले पीड़ित को घेरे में लेते हैं। कुछ लोग उसका यौन उत्पीड़न करते हैं।

यूनाइटेड किंगडम में ग्रूमिंग गैंग द्वारा किए जा रहे घटनाओं की काफी हद तक भारत में रिपोर्टिंग नहीं की जाती, जबकि भारत जिहाद का बड़ा शिकार बनता जा रहा है। ग्रूमिंग गैंग मुख्य रूप से ब्रिटेन में समुदाय विशेष के पुरुषों का गिरोह होता है, जो युवा लड़कियों और यहाँ तक कि महिलाओं का भी शिकार करते हैं। उनका धर्म जानने के बाद दूसरे धर्म का होने की सजा के रूप में बार-बार उनका बलात्कार करते हैं। ब्रिटेन में कई लोगों ने इसे ‘रेप जिहाद’ का नाम दिया लेकिन अधिकारियों ने नस्लभेदी होने के आरोपों के डर से इन गिरोहों के खिलाफ निर्णायक रूप से कार्य करने से इनकार कर दिया।

पीटर मैक्लॉघलिन ने अपनी पुस्तक ‘Easy Meat’ में बताया कि सिख समूह इस घटना से अवगत थे और वो सभी को चेतावनी देने की कोशिश कर रहे थे। सिख मध्यस्थता और पुनर्वास टीम के चैरिटी के एक अध्ययन के अनुसार, पाकिस्तानी पुरुष दशकों से ब्रिटेन में सिख लड़कियों को यौन शोषण और बलात्कार के लिए तैयार कर रहे हैं।

अध्ययन में यह भी दावा किया गया है कि पुलिस ने राजनीतिक शुद्धता के कारणों के बारे में ‘लापरवाही से शिकायतों’ की अनदेखी की है। इस रिपोर्ट को डेली मेल द्वारा एक्सेस किया गया था। इसमें कहा गया है, “शोध में पाया गया है कि 50 वर्षों से अधिक समय से युवा सिख महिलाओं को निशाना बनाने वाले पाकिस्तानी दूतावासों के इतिहास का प्रदर्शन किया जाता है।”

रिपोर्ट में कहा गया है कि खतरे को पहचानने में स्थानीय अधिकारियों की विफलता ने ऐसे नेटवर्क को पनपने दिया है। इसमें कहा गया है, “तीन दशकों के दौरान, वेस्ट मिडलैंड्स में सिख समुदाय के नेताओं ने बार-बार जोर देकर कहा कि जब परिवार या समुदाय के प्रतिनिधियों ने बच्चों के साथ दुर्व्यवहार के बारे में पुलिस से संपर्क किया, तो उनकी प्रतिक्रिया उदासीन ही रही।”

ग्रेटर मैनचेस्टर के मेयर एंडी बर्नहैम द्वारा पुलिस और सामाजिक कार्यकर्ताओं की ऐतिहासिक विफलताओं की जाँच करने के लिए अधिकृत रिपोर्ट के अनुसार, 2000 के दशक में दक्षिण मैनचेस्टर में 57 युवा लड़कियों का शोषण करने का आरोप है। रिपोर्ट में कहा गया है कि गैंग में मुख्य रूप से एशियाई पुरुष शामिल थे, जिन्होंने पीड़ितों को ड्रग्स दिया और फिर उनका यौन शोषण किया। एक 50 वर्षीय व्यक्ति द्वारा हेरोइन के इंजेक्शन लगाने के बाद 15 साल की एक लड़की की मौत हो गई। दो साल बाद इसकी रिपोर्ट आई।

ब्रिटेन में ग्रूमिंग गैंग में जो कुछ हुआ, वह सभी के लिए स्पष्ट था, लेकिन समुदाय विशेष के सदस्यों द्वारा किए गए अपराधों पर पानी फेरने की इच्छा रखने वाले – मुस्लिम पुरुष गैर-मुस्लिम लड़कियों और महिलाओं को ‘जिहाद’ के लिए उकसा रहे थे। कई लोगों ने इसे ‘रेप जिहाद’ कहा है।

इन लड़कियों, सिखों, हिंदुओं और सफेद लड़कियों का ब्रेनवॉश किया गया, बलात्कार किया गया, ड्रग्स का इंजेक्शन लगाया गया, कुछ को मार दिया गया या धर्मांतरित कर दिया गया। उन्हें अनिवार्य रूप से गैर-मुस्लिम होने के लिए दंडित किया गया। इसी तरह का एक मामला भारत में भी हुआ था – अजमेर दरगाह का, जहाँ 1992 में दूसरे धर्म की सैकड़ों लड़कियों का यौन शोषण किया गया था। इस मामले पर लोग अभी भी नि:शब्द हैं, इस तरह के मामलों की जड़ पर कोई वास्तविक चर्चा नहीं होती है। 

भारत में, अब हम जिस एकमात्र संगठित सिंडिकेट की बात करते हैं, वह ‘लव जिहाद’ की घटना है।

NIA ने 2017 में अपनी एक रिपोर्ट में कहा था, “केरल से रिपोर्ट किए गए मामलों से एक ही तरह के पैटर्न का इस्तेमाल किया गया है। कई मामलों में, जो व्यक्ति युवा लड़कियों के करीब आने में भूमिका निभाते हैं, वे उन्हें धर्मांतरण में मदद करते हैं, उन्हें आश्रय देते हैं और उनकी शादी समुदाय विशेष से करवाते हैं, वे एक ही शख्स होता है। वे ऐसे युवा लड़कियों से संपर्क करने लगते हैं, जो माता-पिता के साथ असहमति के कारण थोड़ी परेशान दिखाई देती हैं।

NIA ने ‘लव जिहाद’ को जिस तरह से परिभाषित किया, वह ब्रिटेन के ग्रूमिंग गैंग से काफी मेल खाती है। हालाँकि, अपराधों की कई अन्य श्रेणियाँ हैं, जो ‘लव जिहाद’ की संकीर्ण परिभाषा में फिट नहीं हैं।

अब, जब एक मजहब विशेष का पुरुष एक महिला को उसके साथ संबंध बनाने के लिए ‘लालच’ देता है, तो यह पूरी तरह से संभव है कि शादी के बाद वह लड़की कहती है कि वह स्वेच्छा से परिवर्तित हो गई। उदाहरण के लिए मान लीजिए कि 14 साल की एक लड़की आर्थिक रूप से बेहद कमजोर परिवार से आती है तो एक बड़े आदमी का उसे फुसलाना कितना मुश्किल है? भले ही वह उसे अच्छी जिंदगी देने में सक्षम हो और उसे विश्वास दिलाए कि वह वास्तव में उसका परवाह करता है तो भी इसका मतलब यह नहीं हो सकता है कि बच्ची का ब्रेनवॉश करके उसे इस्लाम में परिवर्तित करे।

क्या तहर्रुश जैसा अपराध, या ऐसा जैसा हमने भोला में देखा, ‘लव जिहाद’ माना जाएगा? यहाँ तक कि निकिता तोमर की हत्या को ‘लव जिहाद’ कहा जाएगा क्योंकि निकिता और उसका कातिल कभी भी रिश्ते में नहीं थे और उसकी हत्या न केवल इसलिए कर दी गई क्योंकि उसने उसके प्रपोजल को ठुकरा दिया बल्कि इस्लाम में परिवर्तित होने से भी इनकार कर दिया।

यह ‘लव जिहाद’ जैसे शब्द की संकीर्ण परिभाषा के कारण है कि वामपंथी अब यह आरोप लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि लव जिहाद शब्द का उपयोग केवल इसलिए किया जाता है क्योंकि ‘चरमपंथी हिंदू’ अंतर-धार्मिक विवाह के खिलाफ हैं, जबकि, यह इससे कोसों दूर है।

यही कारण है कि ऑपइंडिया ने अपनी रिपोर्ट में ‘लव जिहाद’ शब्द के इस्तेमाल से दूरी बनाने का फैसला किया है। जिहाद में कोई ‘लव’ नहीं है और अगर इस शब्द को इसके जटिल वाक्य-विन्यास के साथ स्वीकार करते हैं, तो यह जिहाद की गंभीरता को दिखाने में विफल रहता है, जो कट्टरपंथी वर्गों द्वारा विशेष रूप से दूसरे मजहब की महिलाओं को निशाना बनाता है। हमारा मानना है कि इसके लिए ‘ग्रूमिंग जिहाद’ शब्द कहीं अधिक उपयुक्त है क्योंकि यह उन सभी अपराधों की श्रेणी में आता है, जो महिलाओं को इस जिहाद के केंद्र में रखते हैं।

गैर-मुस्लिम महिलाओं को मजहब विशेष के पुरुषों के हाथों अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए तैयार किया जा रहा है। उनका अपहरण कर लिया जाता है, उनका बलात्कार किया जाता है, लालच दिया जाता है, उन्हें इस्लाम में परिवर्तित कर दिया जाता है, दंडित किया जाता है और उनका ब्रेनवॉश किया जाता है। मानवता के खिलाफ इन अपराधों में कोई ‘प्यार’ नहीं है। इसमें कोई अस्पष्टता नहीं है कि यह जिहाद का ही एक रूप है। अब यह कहने का समय आ गया है कि यह ग्रूमिंग जिहाद है।

हिंदू संस्कृति का मजाक उड़ाती है Netflix की वेब सीरीज: समय है इसके बहिष्कार का… और वो समय अभी ही है

इस दौर में ओटीटी प्लेटफॉर्म की कंपनियों की नीति केवल इतनी ही रह गई है कि उनका बिजनेस ज्यादा से ज्यादा होना चाहिए। उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन इसकी आलोचना करता है या कौन सराहना या फिर किसे इससे चोट पहुँचती है। 

विदेशी ओटीटी प्लेटफॉर्म Netflix का हाल भी कुछ ऐसा ही है, जिसमें आए दिन ऐसा कंटेंट दिखाया जाता है जो कि हिंदुओं की भावनाओं को आहत करता है, लेकिन फिर भी इस प्लेटफॉर्म के यूजर भारत में बढ़ रहे हैं। आलोचनाओं के सहारे ही सही, लेकिन इसकी पहुँच लोगों तक बढ़ रही है, जो कि लोगों के लिए भी एक रेड अलर्ट है कि अब इसे बहिष्कृत करने का सही समय आ चुका है।

Netflix के खिलाफ हिंदू भावनाओं को आहत करने की मुहिम छिड़ गई है। Netflix की वेब-सीरीज ‘A Suitable Boy’ को लेकर लोगों का गुस्सा भड़क पड़ा है। इसके एक दृश्य में लड़का और लड़की मंदिर में बेहद ही अश्लील हरकतें करते दिख रहे हैं। जबकि बैकग्राउंड में भगवान की पूजा अर्चना और भजन किए जा रहे हैं।

इस दृश्य से हिंदू समुदाय के लोगों की भावनाएँ आहत हुई हैं। लोग इसे तुरंत Netflix से हटाने के साथ ही कंपनी से इसके लिए माफी माँगने की बात करने लगे हैं। लोगों की इस मुहिम का असर ये हुआ है कि अब तक #BoyCottNetflix हैशटैग के तहत करीब 64 हजार ट्वीट किए जा चुके हैं।

इसको लेकर बीजेपी के युवा मोर्चा के मंत्री गौरव शर्मा ने मध्य प्रदेश पुलिस से शिकायत की है और केस दर्ज कराया है। यही नहीं ट्विटर पर लोगों ने सरकार से Netflix समेत सभी ओटीटी प्लेटफॉर्म को सरकारी नियमों के अंतर्गत लाने की माँग की है। जिससे इनके गलत कार्यक्रमों पर नियमों के तहत सख्त कार्रवाई की जा सके, ताकि इन्हें सबक मिल सके, और ये सभी ओटीटी प्लेटफॉर्म अपने कार्यक्रमों में लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने से बचें।

इस मामले में मध्य प्रदेश के गृह मंत्री भी काफी सख्ती से पेश आए हैं। उन्होंने इसको लेकर वीडियो संदेश के माध्यम से कहा है कि ओटीटी प्लेटफॉर्म Netflix में हिंदू मंदिर के अंदर इस प्रकार की अश्लील हरकतें आपत्तिजनक हैं और इसके खिलाफ अधिकारियों को कार्रवाई करने के आदेश दे दिए गए हैं। साथ ही उन्होंने कहा है कि Netflix को इस तरह से हिंदू भावनाओं को आहत करने से बचना चाहिए।

Netflix की वेब सीरीज का ये दृश्य विक्रम सेठ की किताब A Suitable Boy के दूसरे एपिसोड का है, जो कि मध्य प्रदेश के ही महेश्वर घाट स्थित शिव मंदिर का है। इसको लेकर बीजेपी नेता गौरव ने कहा है कि इसके खिलाफ जनता सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन करेगी।

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि Netflix ने कोई आपत्तिजनक कंटेंट प्रसारित किया हो। ये ओटीटी प्लेटफॉर्म आए दिन इसी तरह की वेब सीरीज प्रसारित करता रहता है जो कि हिंदू समुदाय और उसकी संस्कृति को नीचा दिखाती है।

Netflix पर सभी ने अनुराग कश्यप की सेक्रेड गेम्स देखी है, जो कि वामपंथी एजेंडा चलाती है। इस सीरीज में जिस तरह से अहम ब्रह्मास्मि का प्रयोग करके अपराध के दृश्य दिखाए गए, उससे हिन्दू समुदाय को धक्का लगा है। इसके अलावा एक सीरीज घोउल (Ghoul) भी है जो भारत के हिंदुओं को इस्लाम विरोधी प्रदर्शित करती है। Netflix ने ऐसी अनेक फिल्में प्रसारित की हैं, जिसमें किसी न किसी दृश्य में हिंदुओं या उनकी संस्कृति के प्रति नफरत भरी हो।

हिंदू विरोध के बावजूद लोग अभी भी इसे पसंद करते हैं। कुछ लोग ऐसे हैं, जो केवल इसके कंटेंट की आलोचना करने के लिए ही इसे देखते हैं। ऐसे कंटेंट को देखने के बाद वे Netflix की ट्विटर से लेकर सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर फजीहत करते हैं। वहीं ऐसे लोग भी हैं, जिन्हें हिन्दू विरोधी कंटेंट देखने में मजा आता है। इसलिए अब सरकार को ऐसे प्लेटफॉर्म के खिलाफ कार्रवाई करने के साथ ही कुछ नियम भी तय करने चाहिए, जिससे हिंदुओं को इस तरह से अपमानित करने वाले कंटेंट पर लगाम लग सके।

इससे पहले नेटफ्लिक्स की वेब सीरिज सेक्रेड गेस्स-2 को लेकर खूब विवाद हुआ था। शिरोमणि अकाली दल के नेता मनजिंदर सिंह सिरसा ने सेक्रेड गेम्स के डायरेक्टर अनुराग कश्यप के खिलाफ FIR दर्ज कराई थी। सेक्रेड गेम्स 2 में सिख पुलिस अधिकारी का किरदार निभाने वाले सैफ अली खान के एक सीन को लेकर अकाली दल के नेता ने अनुराग कश्यप पर सिख धर्म के अपमान करने का आरोप लगाया था।

बता दें कि पिछले कई सालों से इस्लामिक संगठनों द्वारा किए गए हमलों को सफेदजामा पहनाने की कोशिश की जा रही है और नेटफ्लिक्स इस प्रोपेगेंडा में सबसे आगे है। इन सभी हमलों को छिपाने के लिए इसने कई ऐसी सीरीज निकाली, जो हिन्दुओं की छवि को धूमिल करती है। लेकिन इनमें इतना साहस नहीं है कि वो इस्लामिक स्टेट, बोको हराम जैसे आतंकी संगठनों पर कोई वेब सीरीज बना कर दुनिया को दिखाए।

आतंकवाद पर पर्दा डालने के लिए इन निर्माता कंपनियों ने हिन्दुओं को निशाने पर लिया है तथा हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया है। उनकी छवि को नकारात्मक तरीके से पेश किया जा रहा है ताकि लोगों में दिखावटी डर को बढ़ावा दे सके, जिसका वास्तविकता से कोई नाता ही नहीं है। 

नेटफ्लिक्स की प्रवृत्ति हमेशा से हिंदू विरोधी नैरेटिव को बढ़ावा देने की रही है। इसने ‘Ghoul’, ‘Sacred Games’ और ‘लैला’ के रूप में ऐसी कई वेब सीरिज बनाई है, जो हिंदू विरोधी भावनाओं को जन्म दे रही है और साथ ही इससे विश्व में हिंदू धर्म की नकारात्म छवि पेश की जा रही है। लैला वेब सीरीज में सनातन धर्म के अनुयायियों को सबसे हिंसक और दमनकारी मानसिकता वाले लोगों के तौर पर दिखाया गया है, जो सिर्फ लोगों को बाँटकर उन पर राज करना चाहते हैं। 

वेब सीरीज में आर्यावर्त समाज को भयंकर जातिवाद, कट्टरवाद और असहिष्णुता से ग्रसित दिखाया गया है। जहां मामूली अपराध करने पर भी कड़ी सजा दी जाती है। यहाँ आपके लिए यह जानना जरूरी है कि यह वेब सीरीज प्रयाग अकबर द्वारा इसी नाम से लिखित विवादित किताब पर आधारित है जिसमें लेखक ने सच्चाई और तथ्यों की जगह सिर्फ अपने एजेंडे का ही प्रचार किया है। अब समय आ गया है कि भारतीय जनता ऐसी वेब सीरीज बनाने वाली कंपनियों का बहिष्कार करे और ऐसे कंटेंट के खिलाफ आवाज उठाए जिससे विश्व में हिंदुओं की छवि धूमिल हो।

लव जिहाद पर ‘संविधान पढ़ो’… लेकिन 3-तलाक पर ‘कानून से सामाजिक बुराई खत्म नहीं’ – ओवैसी का डबल स्टैंडर्ड

भारत में इन दिनों ‘लव जिहाद’ के खिलाफ कानून बनाने की चर्चा काफी हो रही है। मध्य प्रदेश के गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने अगले सत्र में कानून को लेकर बिल लाने की बात भी कही। वहीं, उत्तर प्रदेश सरकार भी इसके खिलाफ सख्त कदम उठाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। इस बीच AIMIM के राष्ट्रीय अध्यक्ष और लोकसभा सांसद असदुद्दीन ओवौसी ने इसे संविधान की भावना के खिलाफ बताया है।

ओवैसी ने कहा, “इस तरह का कानून संविधान की धारा 14 और 21 के खिलाफ है। स्पेशल मैरिज एक्ट को तब खत्म कर दें। कानून की बात करने से पहले उन्हें संविधान को पढ़ना चाहिए।” साथ ही उन्होंने कहा कि बीजेपी युवाओं का ध्यान बेरोजगारी से हटाने के लिए इस तरह के हथकंडे अपना रही है।

‘लव जिहाद’ को संविधान की भावना के खिलाफ बताने वाले ओवैसी लेकिन खुद तीन तलाक पर संविधान संशोधन क्यों नहीं पढ़ते? कानूनों को लेकर समाज में बेचैनी का या तो इन्हें अंदाजा नहीं है या जानबूझकर अपनी आँखें बंद किए हुए हैं। अपने वादे के मुताबिक मोदी सरकार ने समाज में सैकड़ों साल से चली आ रही ट्रिपल तलाक जैसी गलत प्रथा को रोकने के लिए एक सख्त कानून का विधेयक संसद के दोनों सदनों में पारित करा दिया, लेकिन इसका विरोध करने वालों ने इसे मजहब विशेष को परेशान करने वाला कानून बताया।

ट्रिपल तलाक का दंश झेल चुकी महिलाएँ इस कानून को लेकर बेहद खुश हुईं। उनकी खुशी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता था कि राज्यसभा में विधेयक पारित होने के बाद बड़ी संख्या में मजहबी महिलाओं ने कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद के घर जाकर उन्हें बधाई दी। समाज में महिलाओं का एक बड़ा तबका कानूनों में सुधार चाहता था, लेकिन मज़हबी रहनुमा और मजहबी नेता इसके हक़ में नहीं थे।

30 जुलाई 2019 का दिन इतिहास में दर्ज हो गया। तीन तलाक विधेयक को राज्य सभा ने अपनी मंजूरी दे दी। लोक सभा से इस बिल को पहले ही मंजूरी मिल गई थी। लगभग 34 साल के अंतराल के बाद मोदी सरकार ने समुदाय की महिलाओं को उनका हक दिला दिया। सचमुच, यह महिला सशक्तिकरण की दिशा में उठाया गया एक अभूतपूर्व कदम था। तुष्टीकरण के चलते जो न्याय पिछली सरकारें शाहबानो जैसी महिलाओं को नहीं दे पाईं थीं, वह चिर प्रतीक्षित न्याय वर्तमान सरकार ने शाहबानो के हवाले से समुदाय की महिलाओं को दिलाया।

विधेयक पेश किए जाने का तब विरोध करते हुए एआईएमआईएम के असदुद्दीन ओवैसी ने आरोप लगाया था कि यह विधेयक संविधान की अवहेलना करता है और कानूनी रूपरेखा में उचित नहीं बैठता। उन्होंने कहा था कि समुदाय की महिलाओं के साथ अन्याय के मामलों से निपटने के लिए घरेलू हिंसा कानून और आईपीसी के तहत अन्य पर्याप्त प्रावधान हैं और इस तरह के नए कानून की जरूरत नहीं है। ओवैसी ने कहा कि यह विधेयक पारित होने और कानून बनने के बाद महिलाओं को छोड़ने की घटनाएँ और अधिक बढ़ जाएँगी।

ओवैसी साहब जो राजनीति कर रहे हैं, उससे अब तक मजहब विशेष के भारतीयों को कितना लाभ पहुँचा? इस प्रश्न का उत्तर जरा हैदराबाद के समुदाय विशेष से माँगिए। लगभग तीन दशकों से अधिक समय से एआईएमआईएम पार्टी हैदराबाद में म्युनिसिपल एवं राज्य स्तर पर सत्ता में है। शैक्षणिक और वित्तीय स्तर पर वहाँ के समुदाय के लोगों का कितना भला हुआ, आज तक ऐसा कोई डेटा आया नहीं।

हाँ, यह जरूर सुनते हैं कि ओवैसी खानदान के वक्फ फल-फूल रहे हैं। पुराना हैदराबाद एआईएमआईएम की म्युनिसिपल सत्ता के बावजूद वैसे ही गंदा रहता है, जैसे दूसरे शहरों की मजहबी बस्तियाँ गंदी रहती हैं। फिर, ओवैसी साहब जिस डंके की चोट पर ‘समुदाय के हित’ की बात करते हैं, हम ‘समुदाय के नेतृत्व’ पर पिछले तीन दशकों के अधिक समय से उसी ऊँचे स्वर में मजहबी मुद्दों की बात सुनते आए हैं।

असदुद्दीन ओवैसी साहब जिस ‘सीधे समुदाय के हित की बात’ की जज्बाती रणनीति पर चल रहे हैं, वह मजहबी नेतृत्व की दशकों पुरानी रणनीति है। हाँ, इस जज्बाती सीधी बात की रणनीति से कुछ मुल्ला-मौलवियों और कुछ मजहबी नेताओं के हित तो जरूर चमके लेकिन समुदाय विशेष भारत में दूसरे दर्जे की नागरिकता के कगार पर पहुँच गया।

समुदाय विशेष को जज्बाती ‘सीधी बात’ की राजनीति से सावधान रहने और सद्बुद्धि से अपनी क्षति नहीं बल्कि अपने हित की राजनीति का रास्ता ढूँढना चाहिए।

दीवाली और गणेश चतुर्थी पर बहुत भीड़, लॉकडाउन को लेकर उठाएँगे कदम: महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार

तीन राजनीतिक दलों के गठबंधन से बनी महाराष्ट्र की महाविकास अगाड़ी सरकार का हिन्दू विरोधी चेहरा छुपा नहीं रहा है। चाहे वह कॉन्ग्रेस और एनसीपी हो या शिवसेना, इस सरकार ने हिन्दू संबंधी तमाम मुद्दों को हाशिये पर रखा है। ताज़ा मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ, जो महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार के बयान से समझा जा सकता है। अजित पवार ने अपने बयान में कहा है कि दीवाली के दौरान बहुत भीड़ हुई थी और गणेश चतुर्थी के समय भी यही हालात थे।   

हिन्दू त्यौहारों को निशाना बनाते हुए महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री ने अपने बयान में कहा, “दीवाली के दौरान काफी ज़्यादा भीड़ देखी गई थी और यही स्थिति गणेश चतुर्थी के वक्त भी बनी हुई थी। हम इस मुद्दे पर संबंधित विभागों से चर्चा कर रहे हैं, आगामी 8-10 दिनों तक हालातों की समीक्षा करेंगे। उसके बाद ही लॉकडाउन को लेकर कोई उचित कदम उठाएँगे। फ़िलहाल महामारी का ख़तरा बना हुआ है, इसलिए किसी भी तरह की लापरवाही करना ख़तरे से खाली नहीं होगा।”

इसके बाद अजित पवार ने कहा, “दीवाली के दौरान बहुत ज्यादा भीड़ इकट्ठा हो गई थी जैसे कि कोरोना वायरस भीड़ की वजह से ख़त्म हो जाएगा। अब इस बात का अनुमान लगाया जा रहा है कि महामारी की दूसरी लहर आ सकती है। सरकार ने विद्यालय शुरू करने के लिए दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं, जिसमें उन्हें सैनेटाइज़ करने के तमाम तरीके भी शामिल किए गए हैं। जल्द ही महाराष्ट्र सरकार महामारी को मद्देनज़र रखते हुए बनाए गए दिशा-निर्देशों का क्रियान्वन शुरू कर देगी।”     

हैरानी की बात यह है कि महाराष्ट्र की तथाकथित धर्म निरपेक्ष और उदारवादी सरकार अन्य धार्मिक और सांस्कृतिक समारोहों पर टिप्पणी नहीं करती है। अन्य धर्मों के आयोजनों में भी काफी भीड़ इकट्ठा होती है लेकिन फिर भी प्रदेश की सरकार को एक ही धर्म के त्यौहार नज़र आए। महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री द्वारा कही बात खुद में कितनी हास्यास्पद है कि दीवाली और गणेश चतुर्थी में भीड़ नज़र आई।

बाँका में मिले नदी-घाटी सभ्यता के अवशेष: ईंटें किश्चियन तारीख से पहले के, ग्रीक लेखकों ने भी किया था वर्णन

बिहार के बाँका जिले के भदरिया गाँव के समीप चांदन नदी के बीच कुछ अति-प्राचीन घरों की शृंखला मिली है। घरों की दीवारें 20 से 30 फीट तक चौड़ी हैं। इनमें प्रयुक्त ईंटें किश्चियन तारीख के शुरू होने से पहले के बताए जा रहे हैं। यह स्थल नदी के मूल बहाव क्षेत्र में है। इसे नदी घाटी सभ्यता का दर्जा दिया गया है। इस नदी की पहचान ग्रीक लेखकों ने भी पौराणिक काल की पवित्र नदी ‘ईरणभव’ के रूप में की है।

हाथ से बनाई गई ईंट

वामपंथी इतिहासकारों ने कुविचारों का घोला मारकर हमारे सामने इतिहास को प्रस्तुत किया। इसमें हमारी सनातन सभ्यता को हीन बताया गया और अन्य सभ्यताओं का महिमामंडन करते हुए प्रस्तुत किया। लेकिन भारत के प्रांतों के सभी क्षेत्रों के स्थानीय इतिहासकारों ने अपार श्रम से इतिहास की कसौटी पर रखते हुए जो नए खोज किए हैं, उसने वामपंथी इतिहास की बखिया उधेड़ दी है। ऐसी ही खोज में यह ‘नदी-घाटी सभ्यता’ है, जो भदरिया में मिली है। इस परिघटना से आर्य-अनार्य तथा नृविज्ञान के सिद्धांतों के तय मिथक टूटने की उम्मीद है।

खुदाई के दौरान प्राप्त ईंट की नजदीक से तस्वीर

चांदन नदी के बीचों-बीच जलबहाव क्षेत्र में इस भवन शृंखला की नींव मिलने से इसे नदी घाटी सभ्यता के तौर पर चिह्नित किया गया है। यह शृंखला लगभग 50 फीट दूर तक नजर आती है। इससे आगे भी इसके निकलने की संभावना है लेकिन वहाँ भी बालू भरा हुआ है और उसके ऊपर नदी का जल बहाव है।

नदी घाटी सभ्यता की दीवार

यह खोज छठ पर्व के दौरान सूर्य देवता को अर्घ्य देने के लिए घाटों की सफाई और निर्माण के दौरान ग्रामीणों द्वारा हुई। नदी के बीच किसी प्रकार के भवनों की शृंखला मिलने की यह पहली ऐतिहासिक घटना है। जबकि नदी के किनारे छोटी-मोटी ऐसे कुछ संरचनाएँ पहले भी मिली हैं, जिन्हें नगर अवशेष के तौर पर चिह्नित नहीं किया गया है। कहा गया है कि वे अस्थाई प्रबंध थे। किन्तु, यहाँ इन नगरीय अवशेषों के बीच मिट्टी का एक छोटा घड़ा भी मिला है। कुछ लोग बताते हैं कि एक मानव खोपड़ी भी मिली थी, जिसे अज्ञानतावश गुम कर दिया गया।

नदी घाटी सभ्यता की दीवार की तस्वीर

भदरिया नामक यह गाँव बिहार के बाँका जिला के अमरपुर ब्लॉक में है। इस ब्लॉक की सीमा भागलपुर जिले से लगती है। भागलपुर प्राचीन काल में अंग महाजनपद के नाम से जाना जाता था। महात्मा बुद्ध के जन्म से पहले यह भारत के 16 महाजनपदों में से एक था। इस महाजनपद की राजधानी चंपा थी। यहाँ बुद्ध आए थे। इस चंपा नगरी में 7वीं सदी में चीनी यात्री ह्वेन्त्सांग भी आया था।

यह प्राचीन चम्पा अब चंपानगर कहलाता है। भदरिया गाँव से चंपानगर की दूरी लगभग 25 किलोमीटर है। जातकों में कहा गया है कि बुद्ध की पहली चारिका का नाम विशाखा था, जो भद्दई की थी। इसी भदरिया की पहचान भद्दई गाँव के तौर पर की गई है। पिता धनंजय और माता सुमना की पुत्री विशाखा के दादा मेंडक एक श्रेष्ठि थे, जिनके गाँव बुद्ध अपने 1200 शिष्यों के साथ आए थे। 2 वर्षों पूर्व इस गाँव में बुद्ध के चरण चिह्न की स्थापना की गई, जिसके लिए ग्रामीण लखनलाल पाठक ने जमीन दान में दी।   

इस गाँव के पास चांदन नदी की चौड़ाई 900 मीटर है। गाँव की ओर से लगने वाली नदी तट से लगभग 400 मीटर की दूरी पर यह अवशेष पाया गया है। यहाँ से प्राप्त अवशेष में 15 इंच लंबी, 10 इंच चौड़ी और 2.5 इंच मोटी ईंटों का प्रयोग किया गया है। ये ईंटें हाथों से थापकर बनाई गई हैं और पुआल से पकाए गए हैं। यहाँ से 1.3 इंच व्यास के मिट्टी से बनाए गए छोटे घड़े भी मिले हैं।

खुदाई के दौरान प्राप्त घड़ा

यह नदी आगे जाकर गंगा में मिलने से पहले 3 भागों में बँट जाती है। मूल धारा आगे जाकर चंपा नदी बन जाती है, जो प्राचीन काल में मगध और अंग महाजनपदों की सीमा रेखा मानी गई है। इसी नदी के तट पर अंग की राजधानी चंपा बसी हुई है, जहाँ से प्रतापी राजा दानवीर कर्ण की चर्चा जुड़ी है। इसी चम्पा से विक्रमशिला महाविहार की दूरी लगभग 54 किलोमीटर है, जिसे पाल राजा धर्मपाल ने बनवाया था। विदित हो कि ये दोनों जगह भागलपुर जिले में हैं। 

भदरिया गाँव से मंदार पर्वत की दूरी 46 किलोमीटर है। इस मंदार पर्वत की पहचान समुद्र मंथन में प्रयुक्त केंद्र वाले पर्वत से की गई है। यह स्थल प्राचीन अवशेषों के लिए विख्यात है। इतिहासज्ञों के अध्ययन और स्थल पर उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह स्थल नदी-घाटी सभ्यता मानी गई है। सम्पूर्ण भारत में अब तक सिर्फ राखीगढ़ी (हरियाणा) और लोथल (गुजरात) में ही ऐसी सभ्यताओं के प्रमाण मिले हैं।

नदी घाटी सभ्यता के प्रमाण

इस स्थल के अधिक अध्ययन के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पटना सर्किल को जिला प्रशासन के जरिए अनुरोध किया गया है। फिलहाल, इस स्थल के संरक्षण के लिए जिला अधिकारी ने प्रबंध कराया है लेकिन कुछ प्रभावी लोगों द्वारा ईंटें या अन्य वस्तुएँ स्थल से उठाकर ले जाने की खबरें बराबर आ रही हैं, जो इस साइट के संरक्षण में बाधा उत्पन्न कर रही है।

लेखक: उदय शंकर झा ‘चंचल’