दक्षिण कश्मीर के शोपियाँ जिले के CBSE संबद्ध मदरसे के 3 उलेमाओं (शिक्षक) को PSA के तहत मामला दर्ज करके सोमवार (अक्टूबर 12, 2020) को गिरफ्तार किया गया। इन पर 13 आतंकियों को तैयार करने का इल्जाम है।
इस मदरसे का नाम सिराज-उल-उलूम है। इसे कश्मीर के बड़े मदरसों में गिना जाता है। बीते कुछ समय से यह हिंसक घटनाओं और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के सिलसिले में किसी न किसी तरीके से सुर्खियों में था।
पुलिस की नजर भी इस पर काफी दिनों से थी। इसके तार प्रतिबंधित संगठन जमात-ए-इस्लामी से जुड़े बताए जा रहे हैं। इसके अतिरिक्त पुलवामा में शामिल आतंकी सज्जाद भट्ट भी इसी मदरसे का छात्र रह चुका है।
कश्मीर रेंज के आईजी विजय कुमार का कहना है कि पुलिस की काफी समय से इस स्कूल पर नजर थी। अब पुलिस की तरफ से कानूनी कार्रवाई के तहत तीन अध्यापकों पर मामला दर्ज किया गया है।
इन तीनों की पहचान अब्दुल अहाद भट्ट, रौफ भट्ट और मोहम्मद यूसुफ वानी के रूप में हुई है। पीएसए के अलावा इनके ख़िलाफ़ शांति का उल्लंघन करने के आरोप में सीआरपीसी की धारा 107 के तहत मामला दर्ज हुआ है।
आईजीपी ने इस संबंध में बताया कि मदरसे के 5-6 अन्य शिक्षक भी निगरानी में हैं। वर्तमान में प्रत्येक व्यक्ति के ख़िलाफ़ एक्शन लिया जा रहा है। मगर, आगे आवश्यकता पड़ी तो स्कूल के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई होगी।
मदरसे के संस्थापक मोहम्मद यूसुफ माटू ने तीन गिरफ्तारियों पर बयान दिया है। उन्होंने कहा कि इन तीनों में से कोई भी उनके मदरसे में टीचर नहीं है। माटू ने कहा कि सज्जाद जैसे पूर्व छात्रों के कारण पूरे संस्थान को दोष नहीं दिया जाना चाहिए।
मदरसे के अध्यक्ष कहना है, “हमारी इसमें कोई भूमिका नहीं है। सज्जाद, जिसे लेकर पुलिस का कहना है कि वह पुलवामा हमले में शामिल था, वह यहाँ केवल कुछ महीनों के लिए पढ़ा था। वह आतंकी बनने से पहले मेकैनिक का काम करता था। कैसे सोचा जा सकता है कि हमने उसे ऐसा बनाया है?”
यूसुफ पुलिस को चुनौती देते हैं कि वह सभी आरोपों को सिद्ध करके दिखाएँ। वह कहते हैं, “हमारा संस्थान जम्मू कश्मीर सरकार से संबद्ध है। यहाँ NCERT का पाठ्यक्रम पढ़ाया जाता है। यह ओरियंटल कॉलेज कश्मीर यूनिवर्सिटी से जुड़ा है। हम हर सवाल का जवाब देने के लिए तैयार हैं। कोई भी मीडिया समूह आ सकता है और हमारे पढ़ाने के तरीके और अन्य चीजों को जाँच सकता है। हमारे वित्तीय व पाठ्यक्रम स्रोत भी जाँचे जा सकते हैं। हम आयकर विभाग के साथ पंजीकृत हैं।”
गौरतलब है कि हाल ही में पुलिस को अपनी जाँच के दौरान मालूम चला था कि इस स्कूल से शिक्षा हासिल कर चुके 13 बच्चे आतंकवाद से जुड़े हैं जोकि इस समय अलग अलग आतंकी संगठनों में काम कर रहे है। इनमें से कई मारे भी जा चुके हैं।
इस मामले पर संबधित अधिकारियों ने बताया कि सिराज-उल-उलूस में कुलगाम, पुलवामा और अनतंनाग समेत पूरे प्रदेश से छात्र पढ़ने आते हैं। उत्तर प्रदेश, केरल और तेलंगाना के कई छात्र भी यहाँ दाखिला ले चुके हैं। सिर्फ सज्जाद भट्ट ही नहीं, इसी साल अगस्त में मारा गया अल-बदर का आतंकी जुबैर नेंगरु भी इसी मदरसे की पैदावार है।
इसके अतिरिक्त आतंकी नाजमीन डार और एजाज अहमद पाल भी यहीं से निकले हैं। पिछले दिनों जिहादी बनने वाला उत्तरी कश्मीर के बारामुला का एक युवक भी इसी संस्थान का छात्र है।
बता दें कि शोपियाँ के मदरसे से जुड़े छात्रों के आतंकी संगठनों में शामिल होने की घटना सामने आने के बाद वहाँ के कुछ अन्य धार्मिक संस्थान केंद्रीय एजेंसियों के रडार पर आ गए हैं। इलाके में आसपास कई ऐसे संस्थान बताए जा रहे हैं, जो जमात विचारधारा से प्रेरित हैं। माना जा रहा कि इन्हें पाक समर्थित संगठनों से पैसा मिलता है और एक बार बंद किए जाने के बाद इन्हें अलग नाम से संचालित किया जाने लगता है।
मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो इन पर नजर बनाए रखने का काम टेरर मॉनीटररिंग ग्रुप के तहत कई केंद्रीय एजेंसियाँ कर रही हैं। इनका (टेरर मॉनिटरिंग ग्रुप) उद्देश्य इस तरह की गतिविधियों के वित्तीय स्रोत को खंगालकर उस पर प्रहार करना है। इन टीमों में सीबीआई, एनआईए, ईडी, सीबीडीटी और सीबीआईसी शामिल हैं।
याद दिला दें कि पिछले वर्ष राज्य प्रशासन ने ‘फलाह-ए-आम ट्रस्ट’ से जुड़े कई स्कूलों को नोटिस जारी किया गया था और उन्हें बंद करने का आदेश दिया गया था। दरअसल FAT पहले जमात-ए-इस्लामी का ही हिस्सा हुआ करता था, लेकिन बाद में दोनों अलग हो गए। अब जमात और FAT के ग्राउंड वर्कर का डेटा तैयार करके इनकी गतिविधियों को खंगाला जा रहा है, ताकि पता लगे कि प्रतिबंध के बाद ये किन संगठनों के साथ जुड़े हुए हैं।
तनिष्क के विज्ञापन ने सोशल मीडिया पर बड़ी बहस छेड़ दी है। लोगों का कहना है कि अपने प्रचार के जरिए तनिष्क ने लव जिहाद को बढ़ावा देने का प्रयास किया है। इस वीडियो को देखकर लोगों का सवाल है कि इसमें आखिर क्यों हिंदु युवती की ही गोद भराई मुस्लिम परिवार में हो रही है, क्या ऐसी कल्पना भी मुस्लिम महिला को केंद्र में रख कर की जा सकती है।
कई स्वघोषित सेकुलर इस पर अपने सवाल खड़े कर रहे हैं। इनका पूछना है कि आखिर तनिष्क को इतना क्यों घेरा जा रहा है? क्या ऐसा तब भी होता जब प्रचार में धर्म को रिवर्स कर दिया जाता?
शायद ऐसे लोगों को यह ज्ञान नहीं है कि बीते समय में जब भी ऐसी कोशिशें हुईं तो ‘नाराज’ मजहबी भीड़ ने शहर के शहर जला डाले और अपना गुस्सा घरों पर बम फेंक कर निकाला है।
Would Tanishq be facing similar backlash if it had reversed the religions in it’s ad?
साल 1995 में फिल्म निर्माता मणिरत्नम ने अरविंद स्वामी और मनीषा कोएराला के साथ अपनी फिल्म ‘बॉम्बे’ बनाई थी। यह फिल्म साल 1992 में बाबरी घटना के बाद हुए दंगों पर आधारित थी। स्वामी ने इसमें हिंदू पत्रकार का रोल अदा किया था और मनीषा गाँव की एक मुस्लिम लड़की बनी थी। दोनों की प्रेम कहानी और उसके कारण उपजे पारिवारिक विरोध को इस फिल्म के जरिए दिखाया गया था।
इसमें बताया गया था कि दोनों एक दूसरे से शादी करके मुंबई आते हैं। वहाँ उनके दो बच्चे होते हैं और उन्हें दोनों धर्मों के मुताबिक पाला जाता है। कई भावनात्मक क्षणों के बाद यह फिल्म ह्यूमन चेन के साथ समाप्त होती है। कुल मिलाकर यदि लिबरल नजरिए से देखें तो इस फिल्म की भी पर्फेंक्ट सेकुलर एंडिंग होती है। मगर, वास्तविकता में समुदाय विशेष के बीच में संदेश वैसा नहीं जाता जिसे फिल्म निर्माता ने देने की कोशिश की।
समुदाय का विरोध और बॉम्बे फिल्म
रजा अकादमी के मुस्लिम नेता, जो आजाद मैदान में हुए दंगों के आरोपित हैं, उन्होंने इस फिल्म की रिलीज के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया था। हालत ऐसी हो गई थी कि फिल्म को आधिकारिक तौर पर रिलीज किए जाने से पहले उसकी स्पेशल स्क्रीनिंग हुई। मुस्लिम नेताओं ने आरोप लगाया कि ऐसी प्रेम कहानी दिखा कर उनकी संस्कृति और मजहब का अपमान किया जा रहा है। रजा अकादमी के मुख्य सचिव इब्राहिम ताय ने ऐसी हिंदू मुस्लिमों की शादियों को ‘नाजायज’ तक कहा था।
गौर दीजिए कि जावेद अख्तर जो अपने आप को नास्तिक बताते हैं, वह भी फिल्म में बदलाव लाने के समर्थन में खड़े हुए थे और कहा था, “मुझे लगता है कि सेंसर द्वारा पास की गई कोई भी फिल्म को रिलीज किया जाना चाहिए। लेकिन ठाकरे द्वारा सेंसर किए जाने के बाद रत्नम ने इस पर से अपना अधिकार खत्म कर दिया है। इसलिए वह कुछ मुल्लों के द्वारा भी इसे सेंसर करवा सकते हैं।”
दरअसल इस फिल्म में एक कैरेक्टर था, जो शिवसेना के बाल ठाकरे से जुड़ा था और अन्य फिल्मों की भाँति जरूरी था कि ठाकरे और शिवसेना को उस फिल्म को दिखाया जाए। इसमें दर्शाया गया था कि जो व्यक्ति पहले दंगों को भड़काता है, वह बाद में उसका पश्चताप करता है। पर, चूँकि बाल ठाकरे को अपने किए का पछतावा नहीं था और कथित तौर पर उन्होंने कहा भी था कि उन्हें किसी तरह का खेद नहीं है तो उन्होंने उस सीन को फिल्म से अल्टर करवा दिया था। इसी आधार पर जावेद ने अपना बयान दिया था।
उल्लेखनीय है कि इस फिल्म के खिलाफ़ प्रदर्शन केवल मुंबई और महाराष्ट्र में ही नहीं हुआ था । ठाणे, भोपाल, हुबली, मेरठ में भी इसका एक रूप देखने को मिला था। मणिरत्नम के घर तक पर बम फेंका गया था, जिसके कारण उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा था। बाद में पता चला कि हिंदू नेताओं पर हमला करने वाले अल उम्माह नाम का मुस्लिम समूह इस पूरे अटैक के पीछे था।
तो, शायद इस उदाहरण से यह बात समझी जा सकती है कि तथाकथित सेकुलर जिस ‘रिवर्स’ की बात कर रहे हैं, वो केवल सोशल मीडिया तक की बातें हैं, वास्तविकता में उतरते ही इनका भयानक रूप समय समय पर देखने को मिलता रहा है।
पश्चिमी बिहार में यूपी बॉर्डर से सटा जिला है सिवान। इस जिले ने देश को पहला राष्ट्रपति दिया। देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद का जन्म सिवान जिले के जीरादेई में हुआ था। वे दुनिया भर में अपनी विद्वता और स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका के लिए जाने जाते थे। उनके कारण सिवान जिले का नाम पूरे देश में हुआ, लेकिन आज बिहार का सिवान जिला अपराध, राजनीति में अपराधियों के दबदबे, गैंगवॉर और बाहुबलियों के इलाकों और वर्चस्व की जंग के लिए पूरे देश में कुख्यात है।
बिहार में चुनाव का माहौल है तो ऐसे में फिर से धनबल और बाहुबल का जोर है। तमाम दलों के नेता टिकट पाने की जोर आजमाइश में लगे हैं और बाहुबली अपने और अपने समर्थकों का वर्चस्व जमाने में। आज इस जिले में दो बाहुबलियों के बीच का सियासी टकराव चर्चा का केंद्रबिंदु बना रहता है। एक तरफ सिवान के ‘छोटे सरकार’ के नाम से मशहूर मोहम्मद शहाबुद्दीन का जलवा है तो दूसरी ओर अजय सिंह का रुतबा, जिनकी बीवी कविता सिंह ने शहाबुद्दीन की पत्नी को लोकसभा चुनाव में मात दी थी और अब सिवान की सांसद हैं।
जब लालू प्रसाद के ‘जंगलराज’ में बोलती थी शहाबुद्दीन की तूती
बिहार की बर्बादी और उसके पिछड़ेपन की जब भी कहानी लिखी जाएगी, लालू प्रसाद यादव के ‘जंगलराज’ की चर्चा सबसे पहले होगी। लालू प्रसाद यादव के इस ‘जंगलराज’ में शहाबुद्दीन का आतंक चरम पर था। शहाबुद्दीन और उसके गुर्गों पर कानून का कोई भय नहीं था। वे खुले तौर पर अपनी मनमानी करते थे। क्या मजाल था कि सिवान जिले के लोग शहाबुद्दीन के खिलाफ चले जाएँ।
शहाबुद्दीन को लालू का ‘आशीर्वाद’ प्राप्त था और लालू को इसके बदले चुनाव में वोट मिलते थे। शहाबुद्दीन लालू को अपना सब कुछ मानता था, तो लालू उसे अपनी राजनीतिक नौके का खेवय्या मानता था। व्यापारियों के अपहरण, धन उगाही, हत्या जैसी बातें तो इस अपराधी के लिए आम थीं। लालू की छत्रछाया में इसने न सिर्फ सिवान बल्कि पूरे बिहार में लोगों का जीना दूभर कर दिया। लोग इसके डर से थर-थर काँपते थे।
1980 के दशक तक सिवान की सियासत में आपराधिक तत्वों का बोलबाला था। 1980 के दशक में कई अपराधों में नाम आने के बाद शहाबुद्दीन ने सियासत में एंट्री की और बाहुबल के दम पर दो बार विधायक और 4 बार सांसद रहा। एक दौर था, जब तेजाब कांड हो, चंद्रशेखर हत्याकांड हो या सिवान में कोई भी अपराध, शहाबुद्दीन का नाम हमेशा सुर्खियों में रहता था। जिले के अस्पताल हो, स्कूल हों या बैंक या फिर कोई भी दफ्तर… हर जगह ‘छोटे सरकार’ के नाम से मशहूर शहाबुद्दीन का कानून चलता था।
19 साल की उम्र में 1986 में दर्ज हुआ था पहला मामला
अपराध की सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते राजनीति के गलियारे तक पहुँचने वाले शहाबुद्दीन पर हत्या, अपहरण, रंगदारी, घातक हथियार रखने और दंगा फैलाने जैसे दर्जनों मामले दर्ज हैं। शहाबुद्दीन की अपराध की दास्तान तब शुरू हो गई थी, जब महज 19 साल की उम्र में शहाबुद्दीन के खिलाफ सिवान के एक थाने में पहला मामला दर्ज हुआ था।
शहाबुद्दीन का सियासी सफर शुरू होने से काफी पहले उनकी दबंगई के चर्चे आम थे। रिकॉर्ड के मुताबिक उस पर पहली एफआईआर 1986 में सिवान जिले के हुसैनगंज थाने में दर्ज हुई थी। उसके बाद उसकी छवि ऐसी बनी कि लोग सरेआम उसका नाम लेने से भी डरते थे। चुनाव लड़ने के दौरान सिवान शहर में शहाबुद्दीन की पार्टी को छोड़कर दूसरे किसी प्रत्याशी का झंडा लगाने की हिम्मत किसी को नहीं होती थी।
सिवान में शहाबुद्दीन का खौफ किस तरह था, इसका अंदाजा सिर्फ इस बात से भी लगा सकते हैं कि लोग अपने लिए भी खर्च करने से बचते थे। घरों में सभी लोग नौकरी नहीं करते थे। व्यापारी नई गाड़ियाँ नहीं खरीदते थे। क्योंकि, संपन्नता दिखने पर उन्हें “टैक्स” के रूप में उसे रंगदारी देनी पड़ सकती थी। मना करने पर जान तक जा सकती थी। इतना ही नहीं 15 साल पहले तक लोग अपने घरों और दुकानों में उसकी तस्वीर टाँग कर रखते थे। ऐसा इसलिए कि कहीं से भी यह न लगे कि फलाँ उसके विरोध में हैं और उसका सम्मान नहीं करता है।
धीरे-धीरे शहाबुद्दीन सिवान का मोस्ट वांटेड क्रिमिनल बन गया। शहाबुद्दीन पर उसकी उम्र से भी ज्यादा 56 मुकदमे दर्ज हैं। इनमें से 6 में उसे सजा हो चुकी है। भाकपा माले के कार्यकर्ता छोटेलाल गुप्ता के अपहरण व हत्या के मामले में वह आजीवन कारावास की सजा भुगत रहा है।
2003 में शहाबुद्दीन को वर्ष 1999 में माकपा माले के सदस्य का अपहरण करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन वो स्वास्थ्य खराब होने का बहाना कर सिवान जिला अस्पताल में रहने लगा, जहाँ से वो 2004 में होने वाले चुनाव की तैयारियाँ करने लगा। चुनाव में उसने जनता दल यूनाइटेड के प्रत्याशी को 3 लाख से ज्यादा वोटों से हराया।
इसके बाद शहाबुद्दीन के समर्थकों ने 8 जदयू कार्यकर्ताओं को मार डाला तथा कई कार्यकर्ताओं को पीटा। समर्थकों ने ओमप्रकाश यादव के ऊपर भी हमला कर दिया, जिसमें वे बाल-बाल बचे, मगर उनके बहुत सारे समर्थक मारे गए। इस घटना के बाद मोहम्मद शहाबुद्दीन के ऊपर राज्य के कई थानों में 34 मामले दर्ज हो गए।
लालू यादव की छत्रछाया और राजनीतिक शुरुआत
देश में अपराध से आगे बढ़कर राजनीति की दुनिया में कदम रखने वालों कमी नहीं है। शहाबुद्दीन ने भी यही रास्ता चुना। बाहुबली शहाबुद्दीन पहली बार राजनीति की गलियों में तब चर्चा में आया, जब लालू प्रसाद यादव की छत्रछाया में उसने जनता दल की युवा इकाई में कदम रखा। जनता दल में आते ही शहाबुद्दीन की ताकत और दबंगई का पुराना रंग दिखाने लगा। साल 1990 में शहाबुद्दीन को विधानसभा का टिकट मिला और वह जीत गया।
1996 में विधानसभा से लोकसभा पहुँचा
शहाबुद्दीन ने 1995 में भी चुनाव जीता। उसकी बढ़ती ताकत को देखते हुए पार्टी ने 1996 में लोकसभा का टिकट थमाया और शहाबुद्दीन सांसद बन गया। लालू के खास शहाबुद्दीन को 1997 में राष्ट्रीय जनता दल के गठन के साथ ही पार्टी में जगह मिली। बिहार में आरजेडी की सरकार और शहाबुद्दीन की ताकत सत्ता के साथ बढ़ गई।
तमाशबीन बनने पर मजबूर हुई पुलिस
साल 2001 की बात है। राज्यों में सिविल लिबर्टीज के लिए ‘पीपुल्स यूनियन’ की एक रिपोर्ट ने खुलासा किया कि आरजेडी सरकार शहाबुद्दीन को संरक्षण दे रही है। कानूनी कार्रवाई के दौरान शहाबुद्दीन को सरकार का साथ मिलता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि पुलिस शहाबुद्दीन की आपराधिक गतिविधियों के बावजूद तमाशबीन बनकर खड़ी रहती है। यही नहीं, शहाबुद्दीन के खौफ से उसके खिलाफ न तो एफआईआर होती है और ना ही कोई कार्रवाई।
पुलिस अधिकारियों को पीटने से भी नहीं किया गुरेज, मारा थप्पड़
धीरे-धीरे शहाबुद्दीन पर सत्ता का नशा भी चढ़ गया। कानून को ठेंगा दिखाने वाले शहाबुद्दीन ने अधिकारियों के साथ भी मनमानी करनी शुरू कर दी थी। इस बीच कई अधिकारियों से शहाबुद्दीन की मारपीट की भी खबरें आने लगीं। एक बार तो मामला पुलिस वालों पर गोली चलाने का भी आया। जिस तरह से उत्तर प्रदेश में विकास दुबे ने 8 पुलिसकर्मियों को मौत के घाट उतार दिया था, उसी तरह शहाबुद्दीन भी पुलिसकर्मियों को मार डालता था और उस पर कार्रवाई तक नहीं होती थी।
मार्च 2001 में एसपी बीएस मीणा की अगुवाई में जब पुलिस टीम आरजेडी के स्थानीय अध्यक्ष मनोज कुमार पप्पू के खिलाफ एक वारंट लेकर पहुँची तो शहाबुद्दीन ने गिरफ्तार करने आए अधिकारी संजीव कुमार को थप्पड़ मार दिया था। इस मुठभेड़ में 2 पुलिसकर्मी सहित 8 लोग मारे गए थे।
इस घटना ने बिहार पुलिस को झकझोर कर रख दिया। बिहार पुलिस ने तुरंत राज्य टास्क फोर्स तथा उत्तर प्रदेश पुलिस के साथ मिलकर मोहम्मद शहाबुद्दीन के गाँव तथा घर को घेरकर हमला कर दिया। इस हमले के बाद दोनों ओर से कई राउंड गोलियाँ चलीं, जिसमें पुलिस वाले सहित कई लोग मारे गए। पुलिस के वाहनों में आग लगा दी गई। हालाँकि मुठभेड़ के बाद मोहम्मद शहाबुद्दीन घर से भागकर नेपाल पहुँच गया।
बताया जाता है कि स्थानीय पुलिसवालों के साथ वह जिस तरह अपमानजनक तरीके से पेश आता था, उससे पुलिसवालों में शहाबुद्दीन के प्रति गुस्सा भरा हुआ था और यह ऑपरेशन उसी का परिणाम था। लेकिन शहाबुद्दीन के दबदबे का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि छापे के अगले ही दिन राबड़ी देवी सरकार ने मीणा समेत जिले के सभी वरिष्ठ अधिकारियों का तबादला कर दिया।
उस वक्त शहाबुद्दीन गिरफ्त में तो नहीं आया लेकिन पुलिस ने छापे में उसके घर से एके-47 राइफलों समेत हथियारों का जखीरा बरामद किया। इसके बाद शहाबुद्दीन ने यह कहते हुए एसपी को मारने की कसम खाई कि भले ही इसके लिए उसका राजस्थान (एसपी के गृह प्रदेश) तक पीछा करना पड़े।
1996 में एसपी एसके सिंघल पर गोली चलाई, 10 साल की सजा
बिहार के डीजीपी गुप्तेश्वर पाण्डेय के वीआरएस (स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ) के बाद राज्य सरकार ने आईपीएस अफसर एसके सिंघल को डीजीपी का प्रभार सौंपा है। बता दें कि 1988 रैंक के यह वही आईपीएस अधिकारी हैं, जिन पर 24 साल पहले बाहुबली शहाबुद्दीन ने सिवान में कातिलाना हमला किया था। 1996 में लोकसभा चुनाव के दिन ही एक बूथ पर गड़बड़ी फैलाने के आरोप में उसे गिरफ्तार करने निकले तत्कालीन एसपी एसके सिंघल पर गोलियाँ चलाई गईं। आरोप था कि खुद शहाबुद्दीन ने गोलियाँ दागी और सिंघल को जान बचाकर भागना पड़ा था।
फिर, उस समय केंद्रीय मंत्री बनने की दौड़ में शामिल इस बाहुबली को सबक सिखाने के लिए उन्होंने वर्दी और कानून की ताकत दिखाई थी। नतीजा यह रहा कि उसे दस साल की सजा सुनाई गई और मंत्री बनने का सपना आज तक नहीं पूरा हो सका। इतना ही नहीं कोर्ट से तेजाब कांड के मामले में उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। फिलहाल वह 2005 से जेल में सजा काट रहा है।
2003 में शहाबुद्दीन पर डीपी ओझा ने कसा था शिकंजा
मोहम्मद शहाबुद्दीन को लंबे समय तक राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद का राजनीतिक संरक्षण मिलता रहा और आज भी उसके साथ ही है। हालाँकि 2003 में डीपी ओझा ने डीजीपी बनने के साथ ही शहाबुद्दीन पर शिंकजा कसना शुरू कर दिया। उन्होंने शहाबुद्दीन के खिलाफ सबूत इकट्ठे कर कई पुराने मामले फिर से खोल दिए।
इन मामलों की जाँच का जिम्मा सीआईडी को सौंपा गया था, उनकी भी समीक्षा कराई गई। माले कार्यकर्ता मुन्ना चौधरी के अपहरण व हत्या के मामले में शहाबुद्दीन के खिलाफ वारंट जारी हुआ और उसे अदालत में आत्मसर्पण करना पड़ा। शहाबुद्दीन के आत्मसमर्पण करते ही सूबे की सियासत गरमा गई और मामला आगे बढ़ता देख राज्य सरकार ने डीपी ओझा को ही डीजीपी पद से हटा दिया।
ISI से थे संबंध, घर में मिले थे पाक निर्मित हथियार
राज्य के तत्कालीन डीजीपी डीपी ओझा ने शहाबुद्दीन के आईएसआई से लिंक के बारे में 100 पेज की रिपोर्ट दी थी। तब वह रिपोर्ट देश भर में चर्चा में थी। दरअसल, अप्रैल 2005 में सिवान के तत्कालीन एसपी रत्न संजय और डीएम सीके अनिल ने शहाबुद्दीन के प्रतापपुर स्थित घर पर छापेमारी की थी। उस दौरान पाकिस्तान निर्मित कई गोलियाँ, एके 47 सहित ऐसे उपकरण मिले थे, जिसका इस्तेमाल सिर्फ मिलिट्री में ही किया जाता है।
उसमें नाइट ग्लास गॉगल्स और लेजर गाइडेड गन भी शामिल था। इन उपकरणों पर पाकिस्तान ऑर्डिनेंस फैक्टरी के मुहर लगे हुए थे। इस घटना के बाद जिले में तनाव ज्यादा बढ़ गया, जिसे सँभालने के लिए जिले में कई महीनों तक टास्क फोर्स मौजूद रही। शहाबुद्दीन के संबंध न सिर्फ कश्मीर के आतंकवादी संगठनों, बल्कि आइएसआइ और दाऊद इब्राहिम के साथ भी थे।
JNU छात्र संघ के अध्यक्ष की हत्या का आरोप
मार्च 1997 में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष रहे चंद्रशेखर को सिवान में तब गोलियों से छलनी कर दिया गया था, जब वो एक कार्यक्रम के सिलसिले में नुक्कड़ सभा कर रहे थे। इस हमले में शहाबुद्दीन के बेहद करीबी रहे रुस्तम मियाँ को सजा हो चुकी है।
लगता था कोर्ट, सुनाया जाता था फैसला
सामाज पर शहाबुद्दीन का प्रभाव तो पहले से ही पड़ना शुरू हो गया था। जैसे-जैसे सत्ता का संरक्षण मिलता गया, उसकी ताकत भी बढ़ती गई। शहाबुद्दीन की अदालत काफी सुर्खियों में रही थी। शहाबुद्दीन फिल्मी अंदाज में 2000 के दशक तक सिवान जिले में समानांतर सरकार चला रहा था।
शहाबुद्दीन की अदालत लगती थी (साभार: सोशल मीडिया)
वह अदालत की तरह लोगों के लिए फैसले किया करता था। डर की वजह से लोग उसका फैसला तुरंत मान भी लेते थे। सिवान में तब भूमि विवादों का निपटारा, जिले के डॉक्टरों की फीस सब कुछ शहाबुद्दीन के अनुसार तय होता था। साल 2004 में लोकसभा चुनाव से ठीक आठ महीने पहले शहाबुद्दीन को गिरफ्तार कर लिया गया। मामला 1999 में एक सीपीआई (एमएल) कार्यकर्ता के अपहरण और संदिग्ध हत्या का था।
जिसकी सरेआम पिटाई की, उसी ने 2 बार हराया
अपहरण और हत्या के मामले में शहाबुद्दीन को 2007 में आजीवन कारावास की सजा हुई थी। आपराधिक मामले में सजा मिलने के बाद चुनाव आयोग ने उसके चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया। इस तरह 2009 के लोकसभा चुनाव में वह चुनाव नहीं लड़ सका। ऐसे में राजद ने 2009 और 2014 में शहाबुद्दीन की पत्नी हीना शहाब को टिकट दिया था, पर निर्दलीय ओम प्रकाश यादव ने 2009 में उन्हें करीब 60 हजार वोटों से हरा दिया था।
इसके बाद 2014 में बीजेपी के टिकट पर ओम प्रकाश ने 1 लाख से भी ज्यादा वोटों से हीना को हरा दिया। यह वही ओम प्रकाश थे, जिन्हें कभी शहाबुद्दीन ने सरेआम पीटा था। इस समय शहाबुद्दीन की पत्नी राजद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य हैं।
दो भाइयों को तेजाब से नहलाकर मार दिया
प्रतापपुर गाँव में दो भाइयों को 2004 में तेजाब से नहलाकर मार दिया गया था। ये चंदा बाबू के बेटे थे। घटना में सरकार की भूमिका सिर्फ इसी बात से समझी जा सकती है कि पुलिस ने अपराधियों पर कार्रवाई के बजाय चंदाबाबू के घरवालों को ही कहीं और चले जाने को कह दिया।
10-12 फ़ीट लम्बाई-चौड़ाई वाली जमीन के लिए एक ही परिवार के तीन बेटों की हत्या कर दी गई थी। अगस्त 2004 के पहले सप्ताह में सिवान के गोशाला रोड निवासी चंदा बाबू के निर्माणाधीन मकान में बनी एक दुकान पर असामाजिक तत्वों ने कब्जे की कोशिश की। इसी दौरान दोनों भाइयों की तेजाब डाल कर बेरहमी से हत्या कर दी गई।
घटना में मारे गए दोनों भाइयों की हत्या का चश्मदीद गवाह तीसरा भाई राजीव था। वो इस केस का एकमात्र गवाह था। लेकिन शहाबुद्दीन के खिलाफ वो गवाही न दे पाए, इसलिए कोर्ट में पेशी से पहले ही उसे भी मार दिया गया। इस हत्याकांड ने देश भर को हिलाकर रख दिया था। पुलिस की भूमिका पर भी सवाल खड़े हुए। मामला विशेष अदालत में पहुँचा और शहाबुद्दीन को उम्रकैद की सजा मिली। नीतीश कुमार की सरकार बनने के बाद शहाबुद्दीन जेल की सलाखों के पीछे पहुँचा।
दो भाइयों की हत्या मामले में पटना हाईकोर्ट ने भी शहाबुद्दीन की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी। इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई लेकिन पटना हाईकोर्ट का फैसला ही बरकरार रखा गया। शहाबुद्दीन के आपराधिक करियर में बहुत साल बाद का ये मामला एक बानगी भर नहीं है। उसके नाम ऐसे कई खौफनाक मामले दर्ज हैं, जबकि कई मामले लोगों ने भयवश दर्ज ही नहीं कराए।
पत्रकार की हत्या, कम्युनिस्ट नेता की हत्या, पुलिस के अफसर को थप्पड़ मारना, रेड मारने आई पुलिस फोर्स पर अंधाधुंध फायरिंग करना, घर में पाकिस्तानी हथियारों का जखीरा, जेलर और जज को धमकाना, रंगदारी वसूलना… कई ऐसे मामले हैं, जो शहाबुद्दीन के दुस्साहस की कहानी कहते हैं। वो अपनी अदालतें भी लगाता था। उसे यह दुस्साहस राजनीतिक रसूख की वजह से मिली।
जेल में शहाबुद्दीन के ठाठ की कहानियाँ भी बाहर आईं। नीतीश कुमार की वजह से ही शहाबुद्दीन जेल पहुँचा था। लेकिन जब 2015 में नीतीश ने लालू के साथ सरकार बनाई, उसे जमानत मिल गई थी। 2016 में जेल से निकलने के बाद 1300 गाड़ियों का काफिला लेकर शहाबुद्दीन सिवान के लिए निकला था।
उसने खुलेआम लालू यादव को अपना नेता बताया और कहा कि नीतीश तो ‘परिस्थितियों के नेता’ हैं। जेल जाने के बाद उसकी पत्नी चुनाव लड़ती रही है। इस चुनाव में भी शहाबुद्दीन एक बड़ा मुद्दा होगा।
ये अपराधी लालू का कितना ‘लाडला’ है, इसका अंदाजा इस बात से भी लगा सकते हैं कि आरजेडी ने 2019 के चुनाव में भी शहाबुद्दीन की पत्नी हीना शहाब को अपना उम्मीदवार बनाया था। हालाँकि वो चुनाव जीत नहीं पाई। लालू प्रसाद ने भी एक सभा के दौरान स्वीकार किया था कि सिवान मंडलकारा में बंद रहने के दौरान राजद के पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन से उसकी टेलिफोनिक बातचीत हुई थी।
इन 8 मामलों में हुई सजा
2007 में छोटेलाल अपहरण कांड में उम्र कैद की सजा हुई
2008 में विदेशी पिस्तौल रखने के मामले में 10 साल की सजा
1996 में एसपी एसके सिंघल पर गोली चलाई थी, 10 साल की सजा
1998 में माले कार्यालय पर गोली चलाई थी, दो साल की सजा हुई
2011 में सरकारी मुलाजिम राजनारायण के अपहरण मामले में 3 साल की सजा
चोरी की गई बाइक बरामद में 3 साल की सजा हुई
जीरादेई में थानेदार को धमकाने के मामले में 1 साल की सजा हुई
सिवान के तेजाब कांड में उम्रकैद की सजा
ऐसा भी नहीं कि नीतीश कुमार प्रशासन का किसी डॉन के साथ संबंध नहीं रहा। नीतीश की पार्टी जनता दल यूनाइटेड के कई विधायक बाहुबली थे, लेकिन उन्हें संरक्षण कम ही मिला। नीतीश ने कानून को अपने तरीके से काम करने की अनुमति दी और पार्टी के विधायकों से जुड़े किसी भी मामले की जाँच में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। नतीजा यह हुआ कि सुनील पांडेय और अनंत सिंह जैसे कई हाई-प्रोफाइल बाहुबली उनकी पार्टी से अलग हो गए।
सोशल मीडिया पर टाटा समूह के ‘Titan’ की सब्सिडियरी कम्पनी ‘Tanishq’ ज्वेलरी के नए प्रचार वीडियो को लेकर जबरदस्त विरोध प्रदर्शन हुआ क्योंकि इसमें ‘लव जिहाद’ को बढ़ावा देने के आरोप लगे थे। अब कुछ लोगों ने ‘Tanishq’ की वेबसाइट पर सर्च रिजल्ट्स को लेकर विरोध दर्ज कराया है। इसकी वजह है कि ‘हिन्दू’ और ‘मुस्लिम’, इन दोनों कीवर्ड्स को लेकर जो सर्च रिजल्ट्स आ रहे हैं, वो चौंकाने वाले हैं।
सोशल मीडिया पर ‘धार्मिक बाबा’ नाम के ट्विटर हैंडल ने दोनों कीवर्ड्स डाल कर ‘Tanishq’ की वेबसाइट पर सर्च किया और जो भी परिणाम आए, उनका स्क्रीनशॉट शेयर किया। इसमें देखा जा सकता है कि सर्च बॉक्स में ‘मुस्लिम’ कीवर्ड डालने पर कुल 352 रिजल्ट्स दिखाए जाते हैं। इसमें किस्म-किस्म की अंगूठियों से लेकर कई तरह के गहने दिखाए जाते हैं। वहीं ‘हिन्दू’ कीवर्ड पर चौंकाने वाले परिणाम आते हैं।
शेयर किए जाए रहे स्क्रीनशॉट्स के अनुसार, ‘Tanishq’ की वेबसाइट पर ‘हिन्दू’ कीवर्ड से एक भी परिणाम उपलब्ध नहीं है। इस कीवर्ड को सर्च करने के बाद बताया जाता है कि कोई परिणाम सामने नहीं आता है। इसमें स्पेलिंग को डबल चेक करने की बात की जाती है। लोगों का कहना था कि दोनों के लिए अलग-अलग रवैया क्यों अपनाया जा रहा है। एक के लिए 352 प्रोडक्ट्स और एक के लिए एक भी नहीं।
Search results- on their website for two words – “Hindu” and “Muslim”, and their respective results pages. pic.twitter.com/I49OXLiTnN
ज्ञात हो कि शुक्रवार (अक्टूबर 9, 2020) को ‘तनिष्क ज्वेलरी’ का एक नया प्रचार वीडियो आया, जिसमें एक गर्भवती हिन्दू महिला की मुस्लिम परिवार में गोदभराई की रस्म दिखाई गई है। इस वीडियो में दिखाया गया है कि गहनों से लदी हुई एक महिला गोदभराई की रस्म के लिए तैयार हो रही है। जानने लायक बात ये है कि ‘तनिष्क ज्वेलरी’ की इस वीडियो में जिस जोड़े को दिखाया गया है, वो इंटरफेथ कपल होता है, अर्थात पति-पत्नी अलग-अलग धर्म के होते हैं।
विज्ञापन (वीडियो) तनिष्क के आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर साझा किया गया था जिसे फ़िलहाल प्राइवेट कर दिया गया है। इसके अलावा, 2 दिनों से ट्विटर पर तनिष्क ज्वैलर्स के बहिष्कार का हैशटैग भी ट्रेंड में रहा था। हालाँकि, प्रचार वीडियोज में इस तरह की चीजें दिखाना कोई नई बात नहीं है। इससे पहले ‘सैफ एक्सेल’ और ‘रेड लेबल टी’ इसी तरह की हरकतें कर के जनता का विरोध झेल चुके हैं।
3 चरणों में होने वाले आगामी बिहार विधानसभा चुनाव 2020 के लिए राजनीतिक तैयारियाँ अपने चरम पर हैं। राज्य की कुल 243 विधानसभा सीटों पर 28 अक्टूबर, 3 नवंबर और 7 नवंबर को मतदान होना है। इसी कड़ी में भारतीय जनता पार्टी ने रविवार (11 अक्टूबर) को पहले चरण के चुनावों के लिए 30 स्टार प्रचारकों की सूची जारी की।
इस सूची में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस समेत अन्य दिग्गज नेताओं का नाम शामिल है। मीडिया रिपोर्ट्स में इस बात का दावा किया जा रहा है कि योगी आदित्यनाथ ऐसे नेता हैं जिनकी प्रधानमंत्री मोदी के बाद चुनाव प्रचार के लिए सबसे ज़्यादा चर्चा है।
न्यूज़ 18 हिन्दी द्वारा प्रकाशित ख़बर के अनुसार बिहार चुनाव प्रचार के लिए योगी आदित्यनाथ दूसरी दूसरी सबसे बड़ी पसंद के तौर पर उभर कर सामने आ रहे हैं। जनता दल यूनाइटेड के तमाम नेता चुनाव प्रचार के लिए उनसे लगातार संपर्क भी कर रहे हैं जिससे वह चुनाव प्रचार का हिस्सा बनें।
ऐसा माना जाता है कि बिहार में भी उनका प्रभाव काफी व्यापक है। उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री होने के अलावा योगी आदित्यनाथ गोरखपुर स्थित गोरक्षनाथ मंदिर के महंत हैं और गौ रक्षक मंच जिसे अब हिन्दू युवा वाहिनी के नाम से जाना जाता है इसके मुखिया भी हैं।
इन सभी पहलुओं का बिहार के लोगों में अच्छा भला प्रभाव है। इन बातों को मद्देनज़र रखते हुए योगी आदित्यनाथ को बिहार विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी के सबसे प्रबल चुनाव कैम्पेनर माना जा रहा है। इसी तरह जब गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और दिल्ली के चुनाव थे तब योगी आदित्यनाथ की जनसभाओं और रैलियों में काफी भीड़ इकट्ठा होती थी।
भाजपा नीतीश कुमार की जनता दल (यूनाइटेड) के साथ गठबंधन में बिहार विधानसभा चुनाव लड़ रही है। कल दोनों दलों ने राज्य में साझा रैलियों की शुरुआत की। चुनाव दिशा निर्देशों में बदलाव के बाद हुई इस जनसभा में भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने जनता को सम्बोधित किया। गया जिले में हुई इस रैली में जेपी नड्डा ने कहा, “मोदी हैं तो मुमकिन है और नीतीश हैं तो सम्भव है।”
बिहार की कुल 243 विधानसभा सीटों के लिए कुल 3 चरणों में चुनाव होने हैं। यह चुनाव 28 अक्टूबर से 7 नवंबर के बीच होंगे। 28 अक्टूबर को 71 विधानसभा सीटों के लिए पहले चरण का चुनाव होगा। 94 विधानसभा सीटों के लिए दूसरे चरण का चुनाव 3 नवंबर को होगा और 7 नवंबर को 78 विधानसभा सीटों के लिए तीसरे और अंतिम चरण का मतदान होगा। इसके अलावा 10 नवंबर को मतगणना होगी।
कोरोना वायरस महामारी के बाद यह देश में होने वाले पहले चुनाव हैं, लिहाज़ा चुनाव आयोग ने सामाजिक दूरी बनाए रखने के लिए तमाम ज़रूरी दिशा निर्देश जारी किए हैं। मतदान की अवधि एक घंटे बढ़ाई गई है, यानी मतदान सुबह 7 बजे से लेकर शाम 6 बजे तक होगा। चुनाव आयोग में कार्यरत अधिकारियों और कर्मचारियों को महामारी के दौरान सुरक्षित रखने के लिए चुनाव आयोग ने कुल 7 लाख हैंड सेनेटाईज़र, 46 लाख मास्क और 6 लाख पीपीई किट उपलब्ध कराए हैं। इसके अतिरिक्त 6.7 लाख फेस शील्ड और 23 लाख दस्ताने भी उपलब्ध कराए गए हैं।
फ़िल्मी दुनिया से जुड़े 34 फिल्म निर्माताओं जिसमें अभिनेता और निर्देशक भी शामिल हैं, इन्होंने 4 पत्रकारों के विरुद्ध दिल्ली की उच्च न्यायालय में याचिका दर्ज कराई। याचिका मीडिया वालों द्वारा बॉलीवुड पर अभद्र और अपमानजनक टिप्पणी करने के चलते दायर की गई थी। अब इस पर प्रतिक्रिया आना शुरू हुई है, इस ख़बर के सामने आते ही ट्विटर पर एक हैशटैग ट्रेंड करने लगा #BoycottBollywood। लोग इस बात को लेकर बॉलीवुड की जम कर आलोचना कर रहे हैं और मज़े भी ले रहे हैं।
इस मामले में सबसे ज़्यादा उल्लेखनीय हैं सलमान खान, शाहरुख खान और आमिर खान। यह खुद में कितनी हैरानी की बात है कि चाहे सुशांत सिंह राजपूत का मामला रहा हो या बॉलीवुड में ड्रग्स के इस्तेमाल का मुद्दा। इनमें से किसी ने भी इतने अहम और गम्भीर मुद्दों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी। अमूमन यह बॉलीवुड से जुड़े हर मुद्दों पर सामने आते हैं और अपनी प्रतिक्रिया देते हैं, चाहे वह संजय दत्त के बचाव में खड़े होना ही क्यों न रहा हो। लेकिन उन्हीं तथाकथित बॉलीवुड स्टार्स ने इन मुद्दों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
इसके अलावा जब महाराष्ट्र सरकार ने कंगना रनौत का मुंबई स्थित कार्यालय तोड़ने का फैसला लिया था। इस घटनाक्रम पर भी इन तीनों खानों की तिकड़ी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी जबकि कंगना भी उसी बॉलीवुड का हिस्सा हैं जिसके लिए इन्होंने दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर की है। शिवसेना सांसद संजय राउत ने तो कंगना रनौत पर अपमानजनक और अभद्र टिप्पणी की थी, यहाँ तक कि धमकी भी दे डाली थी। इतना होने के बावजूद शाहरुख, सलमान या आमिर में किसी भी अभिनेता की प्रतिक्रिया नहीं आई।
इंडिया टुडे के राहुल कँवल को भी आया ‘जोश’
वहीं दूसरी तरफ याचिका वाली ख़बर के सामने आते ही इंडिया टुडे के न्यूज़ डायरेक्टर राहुल कँवल ने एक ट्वीट किया। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा, “ये अच्छा है कि बॉलीवुड एकजुट होकर जहरीले चैनलों का सामना करने को तैयार है। ऐसा नहीं हो सकता कि कोई अनर्गल आरोप लगाकर आपकी छवि खराब करे और आप खामोश रहें। पगलाए एंकर्स और एडिटर्स को समझना चाहिए कि बिना सबूत किसी पर आरोप लगाने का अंजाम बुरा हो सकता है। ये बहुत पहले हो जाना चाहिए था।” इसके बाद नेटिज़न्स ने उन्हें भी इस ट्वीट पर जम कर ट्रोल किया।
ये अच्छा है कि बॉलीवुड एकजुट होकर जहरीले चैनलों का सामना करने को तैयार है. ऐसा नहीं हो सकता कि कोई अनर्गल आरोप लगाकर आपकी छवि खराब करे और आप खामोश रहें. पगलाए एंकर्स और एडिटर्स को समझना चाहिए कि बिना सबूत किसी पर आरोप लगाने का अंजाम बुरा हो सकता है. ये बहुत पहले हो जाना चाहिए था.
यह बात खुद में कितनी हास्यास्पद है कि इंडिया टुडे समूह ने खुद सुशांत सिंह राजपूत और ड्रग्स मामले में किस तरह की पत्रकारिता का नमूना पेश किया था। उस दौरान आजतक ने इस मुद्दे पर प्रकाशित अपनी ख़बर में हेडलाइन कुछ इस तरह रखी थी: “ऐसे कैसे हिट विकेट हो गए सुशांत”?, “सुशांत ज़िन्दगी की पिच पर हिट विकेट कैसे हो गए”?, “सुशांत इतने अशांत कैसे”? NBSA ने इस तरह की हर हेडलाइन को निंदनीय बताया था और कहा कि इन चैनलों ने कवरेज से संबंधित तयशुदा निर्देशों (Specific Guideline Covering Reportage) का उल्लंघन किया है।
अब उसी समाचार समूह के राहुल कँवल यह बता रहे हैं कि ‘छवि खराब’ की जा रही है। सुशांत सिंह राजपूत मामले के अलावा इंडिया टुडे समूह ने ड्रग्स मुद्दे पर भी कई तरह की हैडलाइन प्रकाशित की थी। जिसमें सबसे ज़्यादा चर्चित हुई थी ‘उड़ता बॉलीवुड’ और ‘कितना गहरा और बड़ा है ड्रग्स का मायाजाल।’
ऐसे मामलों में विडंबना कितनी भीषण होती है, आलोचना इस दुनिया के सबसे आसान कामों में एक है। शायद यही वजह है कि राहुल कँवल ने ऐसा विरोधाभासी और दोयम दर्जे का दावा करने से पहले अपने कोने की हरकतों की ओर निगाह नहीं दौड़ाई। बॉलीवुड को बताने में देर नहीं की ‘सभी को साथ मिल कर आगे आना चाहिए।’ यह नहीं देखा कि खुद के चैनल ने उन्हीं बातों का कितना मज़ाक बनाया।
क्योंकि दावों और हरकतों के बीच दूरी इतनी ज़्यादा थी इसलिए नेटिज़न्स ने भी अपनी ज़िम्मेदारी निभाने में देरी नहीं दी। ट्विटर पर तमाम यूज़र्स ने राहुल कँवल की इस बात पर उन्हें खूब ट्रोल किया और बताया कि कब कब उनके चैनल ने सुशांत सिंह राजपूत और ड्रग्स मामले का मज़ाक बनाया।
सबसे पहले एक ट्विटर यूज़र ने सुशांत सिंह राजपूत मामले पर ‘आज तक’ की अलौकिक पत्रकारिता का नमूना दिखाया। जिसमें रिया सुशांत पर काला जादू करती हुई नज़र आ रही हैं,
आज ही फ़िल्मी दुनिया से जुड़े 34 फिल्म निर्माताओं (फिल्म निर्देशक, अभिनेता) और 4 बॉलीवुड एसोसिएशन ने 2 समाचार चैनलों और 4 पत्रकारों के विरुद्ध दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दर्ज कराई थी। इन्होंने पत्रकारों पर आरोप लगाया था कि वह हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री को बदनाम करने का प्रयास करते हैं और बॉलीवुड पर अभद्र, अपमानजनक टिप्पणी करते हैं।
याचिका दर्ज कराने वालों में बॉलीवुड के तमाम मशहूर अभिनेता, निर्माता – निर्देशकों और उनके बैनर का नाम शामिल है। इसमें शाहरुख खान, आमिर खान, सलमान खान, करण जौहर, फरहान अख्तर, अजय देवगन, अक्षय कुमार, अनिल कपूर, ज़ोया अख्तर, आदित्य चोपड़ा, सोहेल खान, विशाल भारद्वाज, विनोद चोपड़ा, रोहित शेट्टी, राकेश ओम प्रकाश मेहरा, कबीर खान, साजिद नाडियावाला, अरबाज़ खान समेत अन्य के बैनर शामिल हैं।
salman shahrukh amir silent on various issues rahul kanwal making assertions about bollywood
केंद्रीय अपराध शाखा (Central Crime Branch) ने सोमवार (अक्टूबर 12, 2020) को अगस्त, 2020 में बेंगलुरु के डीजे होली और केजी हल्ली क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर हुए दंगों के संबंध में एक प्रारंभिक आरोप पत्र दायर किया है। 850 पन्नों के आरोप पत्र में 52 लोगों के नाम आरोपित के रूप में शामिल हैं। इसमें 30 से अधिक चश्मदीद शामिल हैं।
बेंगलुरु हिंसा मामले में कॉन्ग्रेस ‘कड़ी’ सामने आई है। आरोप पत्र में दो कॉन्ग्रेस नगरसेवकों- पूर्व मेयर संपत राज और जाकिर हुसैन को क्रमशः आरोपित नंबर 51 और 52 बताया गया है। इससे पहले, राज के निजी सहायक अरुण कुमार को केंद्रीय अपराध शाखा ने गिरफ्तार किया था। उन्होंने कथित तौर पर एसडीपीआई नेता मुज़म्मिल पाशा और अन्य को 10 से अधिक कॉल किए, जो कि दंगों के मामले में आरोपित हैं।
सूत्रों के अनुसार, पुलिस ने आरोप लगाया है कि कॉन्ग्रेस नेताओं ने एसडीपीआई के साथ मिलकर बेंगलुरु दंगों को भड़काया। आरोप पत्र वीडियो और तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर तैयार किया गया है। एनआईए ने इस मामले में आईपीसी, यूएपीए, कर्नाटक प्रिवेंशन ऑफ डिस्ट्रक्शन एंड लॉस ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने की विभिन्न धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की है।
ग़ौरतलब है कि बेंगलुरु में हुए दंगों का एक और वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आया था। इस वीडियो में केजी हल्ली पुलिस स्टेशन के कर्मचारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों से आत्मरक्षा के लिए गोली चलने की इजाज़त माँग रहे थे। वीडियो में साफ़ देखा जा सकता है कि इस्लामियों की अनियंत्रित भीड़ पुलिस वालों पर टूट पड़ती है। हालात इतने भयावह हो जाने के बाद पुलिसकर्मियों ने वरिष्ठ अधिकारियों से अनुमति माँगी।
इसके अलावा कर्नाटक के गृह मंत्री बसवराज बोम्मई ने बुधवार (अगस्त 12, 2020) को कहा था कि राज्य सरकार बेंगलुरु हिंसा की घटना में शामिल लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करेगी। बोम्मई ने एक महत्वपूर्ण घोषणा करते हुए कहा कि सार्वजनिक संपत्ति और वाहनों को नुकसान की भरपाई क्षति पहुँचाने वाले दंगाइयों को करना होगा।
दंगों के संबंध में 12 अगस्त को सैयद नदीम नाम के युवक को गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तारी के बाद उसे न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया था। इसके बाद पुलिस ने उसे आगे की पूछताछ के लिए हिरासत में लिया था।
दिल दहला देने वाली घटना को याद करते हुए कॉन्ग्रेस विधायक आर अखंड श्रीनिवास मूर्ति ने कहा था कि उनके घर पर संप्रदाय विशेष के 2000-3000 लोगों की भीड़ पहुँची, पथराव किया, पेट्रोल डाला, टायर जलाए और घर में आग लगा दी। उन्होंने बताया कि उग्र दंगाइयों ने तलवार, कुल्हाड़ी, लाठी से हमला किया और उनके आवास पर पेट्रोल बम भी फेंके।
राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने चेन्नई के अहमद अब्दुल कादिर (40) और बेंगलुरु के इरफ़ान नासिर (33) को गिरफ्तार किया। दोनों ही इस्लामिक स्टेट (आईएस) मॉड्यूल के संदिग्ध हैं और इन पर युवाओं को कट्टरपंथी बनाने और उन्हें आतंकवादी गतिविधियों में शामिल कराने के लिए फंडिंग उपलब्ध कराने का आरोप है।
दोनों को विशेष एनआईए अदालत ने 10 दिन की हिरासत में भेज दिया है। एनआईए ने बताया कि अब्दुल कादिर तमिलनाडु के चेन्नई स्थित एक बैंक में बतौर बिज़नेस एनालिस्ट (विश्लेषक) काम करता था। वहीं नासिर बेंगलुरु में बतौर चावल व्यापारी काम करता था।
एनआईए ने बुधवार को चेन्नई में कादिर और बेंगलुरु के नासिर के आवासों पर छापा मारा था। जाँच एजेंसी ने इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और दोषी ठहराने वाले सबूत बरामद किए हैं। एनआईए की तरफ से यह कार्रवाई तब हुई जब जाँच के दौरान बेंगलुरु आधारित अब्दुर रहमान नाम के नेत्र विशेषज्ञ को आईएसआईएस से जुड़ी आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में 17 अगस्त को गिरफ्तार किया गया।
एनआईए अधिकारियों ने बताया कि रहमान 2014 में सीरिया में आईएसआईएस के आतंकवादियों के साथ लगभग 10 दिनों तक रहा था और आतंकवादियों की मदद के लिए एक एप्लीकेशन डेवलप कर रहा था। उसने कादिर और नासिर के नामों का खुलासा एनआईए से किया था।
एनआईए का आरोप है कि इन्होंने साल 2013 से 2014 के बीच युवाओं को सीरिया भेजने के लिए फंडिंग इकट्ठा की थी। एनआईए ने बताया कि जाँच में यह बात सामने आई है कि अहमद अब्दुल कादिर, इरफ़ान नासिर और इनके अन्य सहयोगी हिज्ब-उत-तहरीर नाम के संगठन के सदस्य थे।
उन्होंने ‘कुरान सर्किल’ नाम का नया संगठन बना लिया था, जिसमें वह भोले नौजवानों को शामिल करके उन्हें कट्टरपंथी बनाते थे और उन्हें आतंकवादी गतिविधियों से जोड़ने के लिए फंडिंग करके उन्हें सीरिया भेजते थे। उनके द्वारा सीरिया भेजे गए 2 युवाओं की मौत हो गई।
एनआईए ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा है कि दोनों आरोपित संगठन के युवाओं को कट्टरपंथी और आतंकवादी गतिविधियों का हिस्सा बनाने में अहम भूमिका निभाते थे। वह हमेशा इस कोशिश में रहते थे कि ज़्यादा से ज़्यादा युवा आईएस के आतंकवादी मॉड्यूल का हिस्सा बनें।
इसके अलावा एनआईए ने दोनों आरोपितों के ठिकानों पर तलाशी ली, जहाँ से इलेक्ट्रॉनिक और अन्य प्रकार के उपकरण बरामद हुए थे। इसके अलावा अब्दुल कादिर और इरफ़ान नासिर को एनआईए की विशेष अदालत में पेश किया जा चुका है। फ़िलहाल उन्हें पूछताछ के लिए 10 दिन की हिरासत में रखा जाएगा। एनआईए का इस मुद्दे पर कहना है कि बड़े षड्यंत्रों के खुलासे के लिए मामले की जाँच जारी है, जल्द ही कई अहम बातें सामने आएँगी।
ज्वैलरी ब्रांड तनिष्क ने विवाद का कारण बने उस विज्ञापन को हटा लिया है जिसकी वजह से उस पर लव जिहाद को फैलाने का आरोप लगाया गया था। विज्ञापन (वीडियो) तनिष्क के आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर साझा किया गया था जिसे फ़िलहाल प्राइवेट कर दिया गया है। इसके अलावा, आज पूरे दिन ट्विटर पर तनिष्क ज्वैलर्स के बहिष्कार का हैशटैग भी ट्रेंड में रहा था।
इस विज्ञापन को लेकर सोशल मीडिया से लेकर तमाम दर्शकों और ग्राहक वर्ग ने तनिष्क ज्वैलर्स की खूब आलोचना की थी। इस वीडियो में एक गर्भवती हिन्दू महिला की मुस्लिम परिवार में गोदभराई की रस्म दिखाई गई थी।
दरअसल शुक्रवार (अक्टूबर 9, 2020) को ‘तनिष्क ज्वैलरी’ का एक नया विज्ञापन वीडियो सामने आया था, जिसमें एक गर्भवती हिन्दू महिला की मुस्लिम परिवार में गोदभराई की रस्म दिखाई गई थी। इस वीडियो में दिखाया गया है कि गहनों से लदी हुई एक महिला गोदभराई की रस्म के लिए तैयार हो रही है। जानने लायक बात ये है कि ‘तनिष्क ज्वैलरी’ की इस वीडियो में जिस जोड़े को दिखाया गया है, वो इंटरफेथ कपल होता है, अर्थात पति-पत्नी अलग-अलग धर्म के होते हैं।
‘लव जिहाद’ की कई खबरों के बीच आए इस वीडियो में महिला को पारम्परिक साड़ी, बिंदी और गहने पहने हुए दिखाया गया था। हालाँकि, उसके साथ परिवार में जो अन्य लोग हैं, वो मुस्लिम हैं। उसके साथ जो बुजुर्ग महिला दिख रही है, उसने बिंदी भी नहीं लगाई है।
परिवार के लोग गहनों से लदी हिन्दू महिला को सरप्राइज के लिए बगीचे में लेकर जा रहे होते हैं। बैकग्राउंड में दीपमालाएँ हैं और नटराज की प्रतिमा भी है। मुस्लिम परिवार को एकदम ‘सहिष्णु’ दिखाने का प्रयास किया गया है।
साथ ही मुस्लिम परिवार का बुजुर्ग भी साज-सजावट में व्यस्त रहता है। बैकग्राउंड में एक महिला कहती है, “रिश्ते हैं कुछ नए-नए, धागे हैं कुछ कच्चे-पक्के। अपने बल से इन्हें सहलाएँगे, प्यार पिरोते जाएँगे।एक से दूजा सिरा जोड़ देंगे, एक बँधन बनते जाएँगे।”
इस वीडियो में भरा-पूरा मुस्लिम परिवार दिखता है, जहाँ बुजुर्गों से लेकर बच्चों तक गर्भवती महिला को सरप्राइज देने के लिए बगीचे में इन्तजार कर रहे हैं।
अंत में वो महिला अपनी सास से पूछती है, “ये रस्म तो आपके घर में होती भी नहीं है न?” इस पर उसकी सास उसे जवाब देती है, “पर बिटिया को खुश रखने की रस्म तो हर घर में होती है न?“ इसके बाद “एक जो हुए हम, तो क्या ना कर जाएँगे।” के साथ इस वीडियो में ‘एकता’ की बात की गई है।
हालाँकि, ध्यान देने वाली बात है कि इसमें दिखाया गया है कि एक हिन्दू महिला की मुस्लिम परिवार में शादी हुई है, जहाँ लोग उसे खासा प्यार कर रहे हैं।
हाथरस मामले में पीड़ित परिवार का प्रतिनिधित्व करने वाली वकील सीमा कुशवाहा ने मामले को उत्तर प्रदेश से बाहर स्थानांतरित करने की माँग की है। कुशवाहा ने सोमवार (अक्टूबर 12, 2020) को इलाहाबाद HC की लखनऊ बेंच में मामले की सुनवाई के दौरान यह माँग की।
पीड़ित परिवार की वकील सीमा कुशवाहा ने बताया कि उन्होंने कोर्ट के सामने अपनी तीन माँग रखी हैं। पहली यह कि सीबीआई की रिपोर्ट को गोपनीय रखा जाए, दूसरी माँग में केस को उत्तर प्रदेश से बाहर ट्रांसफर कर दिया जाए और तीसरी माँग यह है कि पीड़ित परिवार को केस की सुनवाई पूरी होने तक सुरक्षा उपलब्ध कराई जाए।
The victim’s family has demanded that reports of CBI be kept cofidential. We had also prayed that the case be transferred out of UP. The third demand is that the family be provided security until the case completely concludes: Seema Kushwaha, lawyer of #Hathras victim’s family https://t.co/zh7SB1q16Epic.twitter.com/uDpUtJEiMR
वहीं उत्तर प्रदेश सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे अतिरिक्त महाधिवक्ता वीके शाही ने कहा, “हमने अदालत में अपना पक्ष प्रस्तुत किया। अदालत ने पीड़ित परिवार के साथ-साथ राज्य सरकार के शीर्ष अधिकारियों से पूछताछ की।” उन्होंने बताया कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने हाथरस मामले की अगली सुनवाई के लिए दो नवंबर की तारीख तय की है। इलाहाबाद हाईकोर्ट में हाथरस गैंगरेप मामले की सुनवाई सोमवार को दोपहर बाद शुरू हुई थी। इस दौरान पीड़िता के परिजन अदालत के समक्ष उपस्थित हुए।
The Court will give a decision. The next date of hearing is 2nd November, 2020: Aditional Advocate General VK Shahi, representing Uttar Pradesh government before Lucknow Bench of Allahabad High Court, in #Hathras case https://t.co/zh7SB1q16Epic.twitter.com/gRku23HlUa
बता दें कि अदालत की ओर से इस मामले का स्वत: संज्ञान लिया गया था और संबंधित पक्ष को नोटिस जारी किया गया था। आज कोर्ट ने हाथरस गैंगरेप मामले में पुलिस की कार्रवाई पर नाराजगी भी जताई। कोर्ट ने मामले की सुनवाई के लिए दो नवंबर की तारीख तय की है, उस दिन परिजनों के बयान पर बहस होगी।
इससे पहले कड़ी सुरक्षा व्यवस्था में पीड़िता के माता पिता समेत पाँच परिजन सोमवार सुबह 6 बजे हाथरस से लखनऊ के लिए रवाना हुए थे और दोपहर बाद कड़ी सुरक्षा व्यवस्था में यहाँ पहुँचे थे। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने हाथरस कांड का स्वत: संज्ञान लेते हुए इस मामले में आला अधिकारियों को एक अक्टूबर को तलब किया था।
गौरतलब है कि 19 वर्षीय पीड़िता का उसके गाँव में 14 सितंबर को चार लोगों द्वारा सामूहिक बलात्कार और हमला किया गया था। हालाँकि, यूपी पुलिस ने बलात्कार या सामूहिक बलात्कार के आरोपों से इंकार किया था और फोरेंसिक रिपोर्ट में भी यही बात सामने आई है।
मंगलवार (सितम्बर 29, 2020) की सुबह दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में पीड़िता की मौत के बाद से हाथरस मामले को लेकर काफी बहस और राजनीतिक उथल-पुथल देखी जा सकती हैं। हाथरस पुलिस ने कहा कि ‘जबरन यौन क्रिया’ की अभी तक भी पोस्टमार्टम रिपोर्ट में पुष्टि नहीं हो पाई है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गला घोंटने से मौत को मौत का कारण बताया गया था।