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5 पूर्व CM, पूर्व मंत्रियों और सांसदों ने लिखा सोनिया गाँधी को लेटर: पार्टी नेतृत्व पर सवाल, बड़े बदलाव की माँग

कॉन्ग्रेस में पार्टी के बड़े नेताओं ने अंतरिम अध्‍यक्ष सोनिया गाँधी को पत्र लिखकर कॉन्ग्रेस में बड़े बदलाव करने की माँग की है। यह माँग कॉन्ग्रेस के 23 बड़े नेताओं ने लिखित पत्र के माध्यम से की है। इनमें 5 पूर्व मुख्‍यमंत्री, शशि थरूर जैसे सांसद, कॉन्ग्रेस कार्यसमिति के सदस्‍य और तमाम पूर्व केंद्रीय मंत्री शामिल हैं।

कॉन्ग्रेस के इन तमाम 23 नेताओं ने परोक्ष तौर पर गाँधी परिवार को निशाने पर लिया है। उनके अनुसार पार्टी प्रमुख में बदलाव करके कॉन्ग्रेस पार्टी को हो रहे नुकसान से बचा जा सकता है। बता दें कि सीडब्ल्यूसी की अहम बैठक (CWC Meet) 24 अगस्त की सुबह 11 बजे होनी है। इसके मद्देनजर वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी आलाकमान सोनिया गाँधी को यह पत्र लिखा है।

23 नेताओं में गुलाम नबी आज़ाद, कपिल सिब्बल, भूपेन्द्र सिंह हुड्डा, विरप्पा मोइली, राज बब्बर, मिलिंद देवड़ा, संदीप दीक्षित, रेणुका चौधरी, मनीष तिवारी और कई अन्य वरिष्ठ नेता शामिल हैं।

पत्र में नेताओं ने दावा किया है कि नेतृत्व पर अनिश्चितताओं के कारण पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा है। उन्होंने पत्र में कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पद को लेकर भी वकालत की।

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, यह पत्र बीजेपी की प्रगति की ओर इशारा करता है। यह स्वीकार करते हुए कि युवाओं ने निर्णायक रूप से नरेंद्र मोदी को वोट दिया है। पत्र बताता है कि कॉन्ग्रेस को बुनियादी रूप से समर्थन का घाटा हुआ है। युवाओं का विश्वास खोना गंभीर चिंता का विषय है।

यह पत्र करीब दो हफ्ते पहले भेजा गया था। पत्र के जरिए बड़े नेताओं ने एक ‘पूर्णकालिक और प्रभावी नेतृत्व’ लाने की माँग की है, जो कि धरातल पर दिखे भी और सक्रिय भी रहे। साथ ही पार्टी के पुनरुद्धार के लिए सामूहिक रूप से संस्थागत नेतृत्व तंत्र की तत्काल स्थापना के लिए भी कहा गया है।

पत्र में कहा गया है कि लोकसभा चुनाव में हार के एक साल बाद भी पार्टी ने लगातार गिरावट के कारणों का पता लगाने के लिए कोई आत्मनिरीक्षण नहीं किया है। सीडब्ल्यूसी ने पार्टी सदस्यों के मार्गदर्शन को लेकर भी कोई बात नहीं की है।

वहीं कॉन्ग्रेस की होने वाली बैठक को लेकर यह जानकारी सामने आई ही कि पार्टी के पदों में महत्वपूर्ण फेरबदल हो सकता है। इसके अलावा राजनीतिक मुद्दों, अर्थव्यवस्था की स्थिति और कोरोना वायरस संकट जैसे कई मुद्दों पर भी बात की जा सकती है।

वहीं सूरजेवाला ने इस मुद्दे को लेकर कहा था कि आज व्हाट्सएप में मीडिया-टीवी डिबेट गाइडेंस पर विशेष गलत सूचना समूह ने फेसबुक-बीजेपी लिंक से ध्यान हटाने के लिए कॉन्ग्रेस नेताओं के गैर-मौजूद पत्र की कहानी चलाने का निर्देश दिया गया। अलबत्ता, भाजपा के दिग्गजों ने इस पर कार्रवाई शुरू कर दी है।

कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद शशि थरूर ने भी रविवार को पार्टी में निराशा और जुनून की कमी को बताते हुए ट्वीट किया है। उन्होनें पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को भी अपने पोस्ट में मेंशन किया है।

कॉन्ग्रेस शासित निकायों को नहीं मिल रहे डेवलपमेंट फंड्स: महाराष्ट्र के 11 कॉन्ग्रेस विधायकों ने खोला मोर्चा

महाराष्ट्र के कॉन्ग्रेस विधायक ने आरोप लगाया है कि राज्य में जितने भी स्थानीय निकायों पर उनकी पार्टी का शासन है, उन्हें शिवसेना के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार द्वारा नज़रअंदाज़ किया जा रहा है। बता दें कि कॉन्ग्रेस भी राज्य में सत्ता की साझीदार है और पार्टी के कई मंत्री उद्धव ठाकरे ने नेतृत्व वाले मंत्रिमंडल का हिस्सा हैं। ऐसे में कॉन्ग्रेस विधायक का डेवेलोमेंट फंड्स को लेकर ऐसे आरोप लगाना चौंकाने वाला है।

महाराष्ट्र की ‘महाविकास अघाड़ी’ सरकार में एनसीपी भी शामिल है। जालना के विधायक कैलाश गोरंटयाल ने आरोप लगाया कि राज्य का शहरी विकास मंत्रालय कॉन्ग्रेस के शासन वाले स्थानीय निकायों को विकास के लिए फंड्स देने में कोताही बरतते हुए अन्याय कर रहा है। उन्होंने अपने स्थानीय निकाय के बारे में भी यही आरोप लगाया। कॉन्ग्रेस विधायक ने शुक्रवार (अगस्त 21, 2020) को ये बातें कही।

विधायक ने ये भी बताया कि उनके 10 अन्य साथियों ने भी महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस के प्रभारी को इस समस्या से अवगत कराया है। पार्टी प्रभारी मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ-साथ प्रदेश अध्यक्ष बालासाहब थोराट को भी इस समस्या से विधायकों ने अवगत कराया है। इससे पहले कॉन्ग्रेस विधायकों के एक प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से मुलाकात कर डेवलपमेंट फंड्स के बराबर वितरण की माँग रखी थी, ताकि सभी स्थानीय निकायों को इसका फायदा हो।

हालाँकि, विधायक ने ये भी कहा कि सीएम ने इस मामले को देखने का आश्वासन दिया है। जहाँ राज्य में पार्टी गुटबाजी से परेशान है, वहीं दूसरी तरफ एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार के कारण उसे स्वतंत्र रूप से कुछ भी करने का मौक़ा नहीं मिल रहा है। कॉन्ग्रेस की राज्य यूनिट का कहना है कि सारे मलाईदार विभाग एनसीपी के पास हैं और कॉन्ग्रेस को बचे-खुचे विभाग दे दिए गए हैं और पार्टी का नेतृत्व इस तरफ ध्यान ही नहीं दे रहा।

UAE से 5 लाख का ‘रमजान किट’, बाँटने के लिए कुरान की प्रतियाँ: केरल के मंत्री KT जलील के खिलाफ केंद्रीय जाँच?

केरल के वामपंथी सरकार में मंत्री केटी जलील को केंद्रीय मंजूरी के बिना UAE से विदेशी सहायता स्वीकार करने के लिए बुक किया गया है। जलील के खिलाफ केंद्रीय जाँच हो सकती है। केंद्रीय वित्त मंत्रालय केटी जलील द्वारा विदेशी मुद्रा अधिनियम का उल्लंघन करने की जाँच की तैयारी कर रहा है। इस मामले में अब एनआईए भी एंट्री ले सकती है।

‘मातृभूमि’ की ख़बर के अनुसार, जलील ने खुद फेसबुक पर पोस्ट किया था कि उन्हें संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के वाणिज्य दूतावास से मदद मिली है। इसके आधार पर, केंद्र सरकार के पास कई शिकायतें दर्ज कराई गई थी। जलील को कुरान के वितरण से संबंधित आरोपों का भी सामना करना पड़ रहा है। केंद्रीय वित्त मंत्रालय के समक्ष केरल की कई शिकायतें आने के बाद मंत्रालय अब जाँच की तैयारी कर रहा है।

केंद्रीय वित्त मंत्रालय को आशंका है कि इस मामले में विदेशी मुद्रा विनियमों का उल्लंघन हुआ है। वहीं विदेश मंत्रालय में भी इस मुद्दे को लेकर चर्चा हुई है। केंद्र सरकार ने लाइफ मिशन से जुड़े मुद्दों पर चर्चा के दौरान जलील मुद्दे पर भी चर्चा की। इसके आधार पर यह मामला वित्त मंत्रालय के संज्ञान में आया। अगले ही सप्ताह इस मामले की कार्रवाई शुरू किए जाने की उम्मीद है, जिसमें एनआईए भी शामिल हो सकती है।

यूएई काउंसलेट से मदद लेने के मामले में केरल के उच्च-शिक्षा मंत्री केटी जलील फॉरेन एक्सचेंज के उल्लंघन के मामले में फँसते दिख रहे हैं। दरअसल, उन्हें यूएई के वाणिज्य दूतावास की ओऱ से 5 लाख रुपए के मूल्य का ‘रमजान किट’ दिया गया था। उन्होंने UAE दूतावास से सीधे ये चीजें प्राप्त की थी। इसके अलावा उन्हें कुरान की कई प्रतियाँ भी मुहैया कराई गई थीं, जिन्हें उन्होंने मल्ल्पुरम में स्थित अपने विधानसभा क्षेत्र थवनूर में वितरित किया था।

बताया गया है कि ‘रमजान किट’ में कई फ़ूड आइटम्स थे। वहीं केटी जलील का कहना है कि वो किसी भी प्रकार की जाँच से नहीं डरते हैं और किसी भी एजेंसी का सामना करने को तैयार हैं। फ़िलहाल वो आइसोलेशन में हैं, क्योंकि उनके एक गार्ड को कोरोना संक्रमित पाया गया था। उन्होंने बताया कि वो फोन पर किसी भी प्रकार के पूछताछ के लिए उपलब्ध हैं। उनके खिलाफ केंद्र के पास कई शिकायतें गई हैं।

ये घटना मई 2020 की है, जब रमजान का महीना चल रहा था। फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (FCRA) के सेक्शन 4.2 में मंत्रियों के ‘कोड ऑफ कंडक्ट’ में बताया गया है कि केंद्रीय या राज्यों के मंत्री किसी भी विदेशी संस्था से 5000 रुपए से ज्यादा के व्यक्तिगत गिफ्ट स्वीकार नहीं कर सकते। केटी जलील केरल सोने की तस्करी मामले में फँसी स्वप्ना सुरेश से 16 बार फोन कॉल पर बात करने को लेकर भी निशाने पर हैं।

ज्ञात हो कि केरल में डिप्लोमेटिक बैगेज की आड़ में सोने की तस्करी का मामला स्वप्ना सुरेश से शुरू हुआ और फिर इसके तार मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के दफ्तर तक पहुँच गए। स्वप्ना सुरेश ने कहा था कि उनके अकाउंट से जो 1 करोड़ रुपए जब्त किए गए हैं, वो उन्हें केरल सरकार से ‘लाइफ मिशन प्रोजेक्ट’ के एजेंट के रूप में काम करने के लिए बतौर कमीशन मिले थे। ये केरल सरकार का फ्लैगशिप प्रोजेक्ट है जिसे 2017 में लॉन्च किया गया था।

इसमें केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन का नाम इसीलिए आता है क्योंकि इस प्रोजेक्ट के मुखिया वही हैं और उन्होंने UAE की यात्रा भी की थी ताकि इसके लिए 20 करोड़ का डोनेशन जुटा सकें। UAE के ‘Red Crescent’ से उन्हें 20 करोड़ रुपए मिले, जिस पर सवाल उठ रहे हैं। स्वप्ना सुरेश ने कहा है कि इस प्रोजेक्ट को पास कराने के लिए उन्हें 1 करोड़ रुपए कमीशन मिले। कॉन्ग्रेस का तो यहाँ तक आरोप है कि केरल सीएम के UAE जाने के बाद ही स्वप्ना सुरेश और IT सचिव एम शिवशंकर भी दुबई गए थे।

ऑटोप्सी से 10-12 घंटे पहले ही हो गई थी सुशांत की मौत, AIIMS के डॉक्टर करेंगे जाँच: कुर्ते वाला एंगल भी आया सामने

सुशांत सिंह राजपूत की कथित आत्महत्या मामले की जाँच सीबीआई कर रही है। इससे पहले इस बात पर बहस हो रही थी कि सुशांत सिंह राजपूत की ऑटोप्सी रिपोर्ट में उनकी मृत्यु के समय का कोई जिक्र नहीं था। इसकी जाँच के लिए एम्स के 4 डॉक्टरों की एक टीम तैयार की गई है, जो रिपोर्ट का विश्लेषण कर सीबीआई को रिपोर्ट देगी। गुप्ता के नेतृत्व वाली टीम इसकी जाँच करने के बाद मुंबई के लिए प्रस्थान करेगी।

बता दें कि सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद कूपर हॉस्पिटल में उनकी ऑटोप्सी कराई गई थी। मुंबई पुलिस ने भी ऑटोप्सी करने वाली डॉक्टरों की टीम को मृत्यु के समय को लेकर सवाल भेजे हैं। इसके बाद उन्हें 5 अगस्त को डॉक्टरों ने जवाब भी दिया था। ये रिप्लाई सुप्रीम कोर्ट को सब्मिट की गई रिपोर्ट का भी हिस्सा है, जिसे सीबीआई को सौंपा गया है। डॉक्टरों ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा है कि पोस्टमॉर्टम से 10-12 घंटे पहले उनकी मृत्यु हो गई थी।

बता दें कि सुशांत का पोस्टमॉर्टम 14 जून को रात 11:30 बजे हुआ था। उनकी मृत्यु के समय घटनास्थल से कुर्ता भी मिला था, जिसे टेंसाइल रिपोर्ट के लिए भेजा गया। इसके बाद 27 जुलाई को ये रिपोर्ट पुलिस को मिली। रिपोर्ट में कहा गया कि ये कुर्ता 200 किलो तक का वजन बर्दाश्त कर सकता है। अभिनेता के गर्दन पर मिले फाइबर को कुर्ते के फाइबर से मैच किया गया, जो समान निकला।

इधर सुशांत सिंह राजपूत के घर पर जाकर सीबीआई ने क्राइम सीन को रिक्रिएट किया। इस दौरान उसके साथ सुशांत के कुक नीरज और रूममेट सिद्धार्थ पिठानी भी साथ थे। सुशांत के घर से लेकर बेडरूम तक की तस्वीरें क्लिक की गईं और वीडियो भी शूट किया गया। सीबीआई की टीम ने भी कूपर हॉस्पिटल जाकर डॉक्टरों से मुलाकात की। सीबीआई इस मामले में और भी लोगों से आज पूछताछ करेगी।

सुशांत सिंह के कुक नीरज से शुक्रवार को पूछताछ की गई थी। इसके अगले दिन सुशांत के फ्लैटमेट सिद्धार्थ पिठानी से पूछताछ की गई। आज फिर पूछताछ के लिए सिद्धार्थ पिठानी को पूछताछ के लिए DRDO गेस्ट हाउस बुलाया गया है, जहाँ सीबीआई की टीम मौजूद है। सिद्धार्थ पिठानी और नीरज को आमने-सामने बैठाकर पूछताछ किए जाने की योजना है। कुल 6 घंटे तक सुशांत के फ्लैट पर जाँच की गई।

बांद्रा में जिस किराए के मकान में सुशांत सिंह राजपूत का 14 जून को शव लटका हुआ मिला था, वहाँ पर पड़ोसी ने बड़ा खुलासा किया है। उन्होंने कहा कि 13 जून की रात करीब 10.30-10.45 के बीच सुशांत राजपूत के कमरे की सभी लाइट्स बंद हो गई थी। सिर्फ किचन की लाइट जल रही थी। सुशांत के घर की लाइट 13 जून की रात को 10.30-10.45 बजे अचानक बंद हो गई थी। ऐसा अमूमन नहीं होता था, क्‍योंकि वह देर तक जागते थे।

एक हफ्ते के भीतर राम मंदिर को बम से उड़ाना चाहता था आतंकी युसूफ, खुद के तैयार किए बम का कर चुका था टेस्ट

दिल्ली में गिरफ्तार किए गए ISIS के आतंकी अबू युसूफ खान के ठिकानों और उससे जुड़े लोगों की तलाश के लिए दिल्ली पुलिस और यूपी एटीएफ बलरामपुर पहुँची हुई है, जहाँ उसका निवास स्थान है। सभी टीमें उतरौला कोतवाली क्षेत्र के बढ़या भैसाही ग्राम में उसके साथी आतंकी युसूफ के घर में तलाशी अभियान चला रही है। आरोपित की निशानदेही पर उसके घर के पास स्थित तालाब से मानव बम में प्रयोग किए जाने वाले दो जैकेट जब्त किए गए हैं।

साथ ही उसके घर से विस्फोटक व आपत्तिजनक साहित्य भी बरामद किए गए हैं, जिनकी जाँच की जा रही है। एक और बड़ा खुलासा हुआ है कि ISIS आतंकी अबू युसूफ खान अयोध्या में राम मंदिर स्थल को बम से उड़ाना चाहता था, जहाँ हाल ही में भूमिपूजन का कार्यक्रम संपन्न हुआ है। बलरामपुर पुलिस की इस बात को लेकर आलोचना हो रही है कि उनके इलाक़े के आतंकी की भनक उसे ही नहीं लगी।

शनिवार (अगस्त 22, 2020) की सुबह 11 बजे पुलिस की टीमें बलरामपुर पहुँची। इसके उतरौला कोतवाली के बढ़या भैसाही ग्राम को चारों ओर से सील कर के स्थानीय पुलिस ने तलाशी अभियान शुरू किया। गाँव में आने-जाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। यहाँ तक कि मीडियाकर्मियों को भी वहाँ प्रवेश की अनुमति नहीं दी गई। आतंकी मुस्तकीन शुक्रवार की सुबह ही घर से भाग खड़ा हुआ था, ऐसा पता चला है।

लगभग 10 बजे उसने परिजनों को फोन करके बताया कि वह लखनऊ निवासी अपने मामा के यहाँ गया है, जहाँ उसका ममेरा भाई बीमार है। इसके बाद उसका मोबाइल फोन बंद हो गया। साथ ही वह अपने मामा के यहाँ भी नहीं पहुँचा। लखनऊ में उसके पहुँचने के बाद परिजन रात भर उसे फोन करते रहे। इसके बाद थाने में उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई गई। इसके बाद पुलिस सक्रिय हुई।

उसके पिता ने कहा है कि अबु युसुफ की रीढ़ की हड्डी खिसकी हुई है, जिसका 2 साल से लखनऊ में इलाज चल रहा है। वो शुक्रवार को लखनऊ में अपने मामा के बेटे की किडनी के इलाज के लिए गया था। उसने अपनी बहन को बताया कि वो उसके घर पर रुकेगा पर वहाँ पहुँचा नहीं और उसका फोन बंद आने लगा। उसके भाई आकिब ने कहा कि उसे ISIS के झंडे की पहचान नहीं है पर रात को झंडा देखा। काले रंग के झंडे पर सफेद रंग से अरबी में ‘अल्लाह हू अकबर ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुन रसूलुल्लाह‘ लिखा था। वो सऊदी और अन्य जगहों पर रहे थे।

वहीं ISIS आतंकी अबू युसूफ खान के घर से दो मानव बम जैकेट, विस्फोटक और भड़काऊ साहित्य के अलावा पत्नी तथा चार बच्चों के पासपोर्ट बरामद करने में पुलिस ने सफलता पाई है। बलरामपुर में तलाशी के बाद देर रात दिल्ली पुलिस आतंकी को लेकर वापस राष्ट्रीय राजधानी के लिए निकल गई। उससे जुड़े 3 लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है। पूरी यूपी अलर्ट पर है। राम मंदिर को लेकर गुस्से में आतंकी उसे एक हफ्ते के भीतर विस्फोट करना चाहते थे।

उसने अपने आकाओं के आदेश पर खुद बम तैयार किया था, जिसमें बस टाइमर लगाने की देरी थी। उसने दिसंबर 2019 में अपने गाँव के कब्रिस्तान में छोटी डिवाइस के साथ बम का टेस्ट भी किया था। पुलिस उससे पूछताछ कर पता लगा रही है कि वाकई में उसने बम खुद ही तैयार किए थे या फिर उसे किसी और ने ये दिए थे।

ज्ञात हो कि ISIS आतंकी अबू युसूफ खान को दिल्ली के करोलबाग और धौलाकुआँ के बीच रिज रोड इलाके से गिरफ्तार किया गया था। उसने पुलिस पर फायरिंग भी की थी। पुलिस ने उस पिस्टल को भी जब्त कर लिया है, जिसका इस्तेमाल कर उसने गोली चलाई थी। गिरफ्तार करने से पहले पुलिस और आतंकी के बीच कुछ देर तक शूटआउट भी चला। उसे आधी रात 12 बजे के करीब गिरफ्तार किया गया। 

7 लोगों ने किया गैंगरेप और वीडियो कर दिया वायरल: एक महीने बाद वीडियो के कारण ही 6 गिरफ्तार

बिहार के पटना के गौरीचक थाना क्षेत्र में एक 45 वर्षीय विधवा महिला के साथ सात लोगों ने सामूहिक बलात्कार किया। पुलिस ने इस मामले में सात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है और छह आरोपितों को गिरफ्तार किया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, आरोपितों ने न केवल महिला के साथ सामूहिक बलात्कार किया बल्कि इस दरिंदगी का वीडियो भी रिकॉर्ड कर लिया। इसके बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर वीडियो को वायरल भी कर दिया। सोशल मीडिया पर बलात्कार का वीडियो सामने आने के बाद पटना गौरीचक पुलिस स्टेशन ने शुक्रवार देर रात मामले को संज्ञान में लेते हुए केस दर्ज किया।

पुलिस अधिकारियों ने इसके बाद गौरीचक पुलिस थाना क्षेत्र के पास एक गाँव से पीड़िता को खोज निकाला। उनका बयान दर्ज करने के बाद पुलिस आरोपितों की गिरफ्तारी में जुट गई।

कथित तौर पर, महिला गाँव से बाहर काम करने जाती थीं। काम कर वह अपने गाँव वापस लौट रही थीं, जिस दौरान यह घटना घटित हुई। पीड़िता एक ऑटो-रिक्शा पर सवार थी। तभी एक आरोपित मोटरसाइकिल से उनके पास आया और उन्हें घर छोड़ने के लिए कहा।

इसके बाद आरोपित महिला को घर छोड़ने की जगह एक सुनसान इलाके में ले गया और अपनी मोटरसाइकिल को एक अलग जगह पर खड़ा कर दिया। जिसके बाद वहाँ पर छह युवक और आ गए। उन दरिन्दों ने महिला के साथ बलात्कार किया और पूरी घटना के वीडियो को मोबाइल में रिकॉर्ड कर लिया।

बाद में, उन्होंने पीड़िता को उनके घर के पास छोड़ दिया और घटना के बारे में किसी को बताने पर उनके परिवार के सदस्यों को जान से मारने की धमकी दी। पुलिस को दिए गए बयान में महिला ने कहा है कि आरोपी नशे में थे और यहाँ तक ​​कि उसे भी शराब पीने के लिए मजबूर कर रहे थे।

गैंगरेप मामले के बारे में जानकारी देते हुए एसएसपी उपेंद्र शर्मा ने कहा, ”घटना एक महीने पहले हुई थी। पीड़ित की उम्र लगभग 45 वर्ष है और वह विधवा है।” पीड़िता ने कहा कि वह समाज के डर से शिकायत के लिए पुलिस के पास नहीं गई।

‘मेरी किताब अब ब्लूम्सबरी से नहीं छपेगी’ – लेखकों ने रद्द किया कॉन्ट्रैक्ट, दिल्ली दंगों पर ‘सच्ची किताब’ सेंसर मामला

जैसे ही प्रकाशन संस्था ब्लूम्सबरी ने दिल्ली दंगों की सच्चाई बताने वाली पुस्तक ‘दिल्ली रायट्स 2020: द अनटोल्ड स्टोरी’ का प्रकाशन रोकने का फैसला किया, भारत के कई लेखकों ने उसके साथ अपने करार को ख़त्म कर दिया। लेखकों ने इस निर्णय के विरोध प्रदर्शन के रूप में अपनी आने वाली पुस्तकों के लिए ब्लूम्सबरी को प्रकाशक के रूप में हटा दिया। कई लेखकों ने प्रकाशन संस्था की इस मनमानी का विरोध किया है।

बता दें कि ब्लूम्सबरी ने इस्लामी कट्टरवादी और वामपंथी लॉबी के आगे झुकते हुए ये फैसला लिया। जेएनयू के प्रोफेसर और वैज्ञानिक आनंद रंगनाथन को ब्लूम्सबरी ने एडवांस में रुपए दिए हैं, ताकि वो उनकी पुस्तक का प्रकाशन अधिकार पा सके। रंगनाथन ने घोषणा की है कि अगर दिल्ली दंगों पर आने वाली पुस्तक के प्रकाशन रोकने का फैसला वापस नहीं लिया जाता है वो और उनके सह-लेखक उस धनराशि को वापस लौटा देंगे और अपनी आगामी पुस्तक का प्रकाशन अधिकार भी उससे छीन लेंगे।

उन्होंने कहा कि कम्पनी ने जिस तरह से वामपंथी और इस्लामी लॉबी के आगे घुटने टेके हैं, इससे वो चकित हैं। उन्होंने कहा कि फासिस्ट ताकतों के दबाव में ब्लूम्सबरी द्वारा लिए गए इस निर्णय का हर एक लेखक और पाठक को विरोध करना चाहिए। ब्लूम्सबरी की वेबसाइट के अनुसार, आनंद और शीतल रंगनाथन की पुस्तक ‘फॉरगॉटन हीरोज ऑफ़ इंडियन साइंस’ जुलाई 2021 में रिलीज होने वाली है।

इससे पहले कम्पनी ने इन्हीं लेखक (आनंद रंगनाथन) के उपन्यास ‘द रैट ईटर’ को प्रकाशित किया था। लेखक संदीप देव ने भी घोषणा की है कि वो इस प्रकाशन संस्था से वो सारी किताबों के प्रकाशन अधिकार वापस ले रहे हैं, जो भविष्य में आने वाली थी। उन्होंने कम्पनी की ताज़ा हरकत को विचारों की हत्या करार देते हुए कहा कि उसने वामपंथी लॉबी के दबाव में आकर दिल्ली दंगों पर आने वाली पुस्तक के प्रकाशन पर रोक लगाई है।

संदीप देव की अब तक 6 पुस्तकें ब्लूम्सबरी द्वारा प्रकाशित की जा चुकी है और आगे 9 ऐसी पुस्तकें आने वाली थीं, जिनका प्रकाशन उक्त कम्पनी को ही करना है। उन्होंने उन सभी 9 किताबों के प्रकाशन का अधिकार ब्लूम्सबरी से छीन लिया है। उन्होंने घोषणा की है कि वो इस कम्पनी के साथ अब भविष्य में कभी काम नहीं करेंगे। वो अंग्रेजी, हिंदी, पंजाबी और मराठी में कई पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं।

आईएएस अधिकारी संजय दीक्षित ने भी Nullifying Article 370और Enacting CAA नामक पुस्तकों को ब्लूम्सबरी से प्रकाशित न कराने का फैसला लिया है। ये पुस्तकें 20 सितम्बर को ही रिलीज होने वाली थी। उन्होंने प्रकाशन संस्था के सेंसरशिप को अस्वीकार्य करार देते हुए कहा कि वो उनके साथ अपने संबंधों को ख़त्म कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि कम्पनी को भी दर्द होना चाहिए, इसीलिए वो पब्लिशिंग हटाने वाला पत्र उसे लिख रहे हैं।

संजय दीक्षित ने तो उसके द्वारा प्रकाशित की जाने वाली हैरी पॉटर सीरीज की किताबों का भी सम्पूर्ण बहिष्कार करने की अपील की। उन्होंने कहा कि रोज के 10-15 करोड़ रुपए तो कम्पनी इसी टाइटल से कमा लेती है, इसीलिए हमें इन किताबों को न खरीदने का संकल्प लेना चाहिए। उन्होंने एक यूजर की सलाह पर ये भी कहा कि अगर कम्पनी अगले कुछ दिनों में इस निर्णय को वापस नहीं लेती है तो हैरी पॉटर सीरीज की पुस्तकों को सार्वजनिक रूप से जलाया जाना चाहिए।

अर्थशास्त्री संजीव सान्याल ने घोषणा की है कि वो ब्लूम्सबरी से अपनी किसी भी पुस्तक का प्रकाशन नहीं कराएँगे। उन्होंने कहा कि प्रकाशन जगत में चंद लोगों का बड़ा प्रभाव और एक लॉबी के एकाधिकार को लेकर उन्होंने पहले भी आवाज़ उठाई है। उन्होंने इसे वैचारिक सेंसरशिप करार दिया। हरसद मधुसूदन ने भी ऐसा ही ऐलान किया है। इस बीच गरुड़ प्रकाशन ब्लूम्सबरी से हटाई गई पुस्तकों के प्रकाशन के लिए आगे आया है।

वहीं फाइनेंस प्रोफेशनल और संस्कृत विशेषज्ञ नित्यानंद मिश्रा ने भी ऐलान किया है कि उन्होंने ‘सुनामा: ब्यूटिफुल संस्कृत नेम्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन ब्लूम्सबरी से न कराने का फैसला लिया है। इससे पहले इसका प्रकाशन वही करने वाली थी। उन्होंने कहा एक संगठित लॉबी एक विचारधारा के विरुद्ध है और दिल्ली दंगों पर आने वाली पुस्तक के लेखकों के प्रति समर्थन जताते हुए वो ये निर्णय ले रहे हैं।

वो अब तक ब्लूम्सबरी के साथ 5 पुस्तकें प्रकाशित कर चुके हैं और छठी आने वाली थी। उन्होंने कहा कि इसके अलावा भी कई अन्य पुस्तकों को लेकर बातचीत चल रही थी, जो अब उक्त प्रकाशन संस्था के साथ नहीं आएगी। हालाँकि, इस कारण उनकी अगली पुस्तक कुछ हफ़्तों बाद रिलीज हो सकेगी। उन्होंने दूसरे पब्लिशरों को उनसे संपर्क करने को कहा है और पाठकों से देरी के लिए माफ़ी माँगी है।

इधर आतिश तासीर ने मोनिका अरोड़ा की दिल्ली दंगों पर आने वाली पुस्तक को सत्ता का प्रोपेगेंडा करार देते हुए कहा कि विलियम डेलरिम्पल ने इसके प्रकाशन पर रोक लगाने में अहम भूमिका निभाई है, जिसके लिए वो उनके आभारी हैं। उन्होंने तो यहाँ तक कहा कि स्कॉटिश लेखक के बिना ये संभव नहीं हो पाता। मोनिका अरोड़ा की इस पुस्तक में जाँच और इंटरव्यूज के हवाले से दिल्ली दंगों का विश्लेषण किया गया है।

अंकित शर्मा की हत्या के लिए ताहिर हुसैन जिम्मेदार, घर और मस्जिद से किया दंगाइयों का नेतृत्व: अदालत

दिल्ली की एक अदालत ने शुक्रवार (21 अगस्त, 2020) को फरवरी में हुए हिंदू विरोधी दंगों में शामिल AAP के पूर्व नेता ताहिर हुसैन के खिलाफ दायर चार्जशीट पर संज्ञान लेते हुए कहा कि ताहिर हुसैन के उकसावे पर संप्रदाय विशेष के लोग हिंसक हो गए और हिंदू समुदाय पर पथराव शुरू कर दिया था।

रिपोर्ट्स के अनुसार, अदालत ने फरवरी में उत्तर-पूर्व दिल्ली में हुए हिंदु विरोधी दंगों के दौरान खुफिया (आईबी) अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या से संबंधित मामले और दंगों को भड़काने में हुसैन की भूमिका के खिलाफ दायर आरोपपत्र का संज्ञान लेते हुए यह टिप्पणी की। अदालत ने आरोपितों के खिलाफ प्रोडक्शन वारंट भी जारी किया और उन्हें 28 अगस्त को वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए पेश करने का निर्देश दिया।

हालाँकि, पुलिस ने बताया कि उन्हें हुसैन और अन्य सह-अभियुक्तों से इस मामले में संबंधित अधिकारियों से राजद्रोह के मामले में चार्ज लेने की मंजूरी मिलनी बाकी है।

मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट पुरुषोत्तम पाठक ने कहा कि हालाँकि मंजूरी प्राप्त करने के लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है और मामले में किसी देरी से वह मकसद पूरा नहीं होगा, जिसके लिए दंगा मामलों की सुनवाई की खातिर विशेष अदालतें बनाई गई हैं।

न्यायाधीश ने अपने आदेश में कहा, ”मेरा विचार है कि आरोपितों द्वारा किए गए अपराधों का संज्ञान लेने के लिए रिकॉर्ड में पर्याप्त सामग्री है।”

दिल्ली पुलिस द्वारा दायर आरोप-पत्र का संज्ञान लेते हुए, अदालत ने कहा कि दिल्ली में हिंदू-विरोध दंगे एक “सुनियोजित तरीके” से हुए और इसके लिए “अच्छी तरह से साजिश रची गई।” और भीड़ के नेता ताहिर हुसैन और अन्य सह-आरोपियों द्वारा कथित तौर पर इसे बढ़ावा दिया गया।

अदालत ने कहा, “आरोपी ताहिर हुसैन ने उन्हें अपनी इमारत की छत पर जाने की सुविधा दी और अन्य सहायता प्रदान की ताकि बड़े पैमाने पर दंगे हो सकें और दूसरे समुदाय के जानमाल और संपत्ति का नुकसान हो।”

अदालत ने कहा, ”प्रथम दृष्टया आरोपी ताहिर हुसैन अपने घर से और 24 तथा 25 फरवरी को चांद बाग पुलिया के पास मस्जिद से भी भीड़ का नेतृत्व कर रहे थे। अदालत ने कहा कि साजिश के तहत हसीन, नाजिम, कासिम, समीर खान, अनस, फिरोज, जावेद, गुलफाम और शोएब आलम के साथ गैरकानूनी भीड़ को इकट्ठा करने में ताहिर की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

कोर्ट ने कहा, “उन्होंने हिंदुओं और संप्रदाय विशेष के लोगों के बीच धर्म के आधार पर दुश्मनी को बढ़ावा देने के उद्देश्य से दूसरे समुदाय के खिलाफ अपने समुदाय को उकसाया, जिसमें ताहिर ने दावा किया कि हिंदू लोगों ने संप्रदाय विशेष के कई लोगों को मार दिया है और उनकी दुकानों को शेरपुर चौक पर आग लगा दी गई है और उन्हें किसी भी हिंदू को छोड़ना नहीं चाहिए।”

“उसके उकसाने और भड़काने पर, संप्रदाय विशेष के लोग हिंसक हो गए।और 24.02.2020 और 25.02.2020 को वे हिंसक हो गए और हिंदू समुदाय पर जलते हुए पेट्रोल बमों और पत्थरों को फेकना शुरू कर दिया। वहीं उस इलाके में स्थित हिंदु घरों को भी निशाना बनाया।”

कोर्ट ने कहा “तत्पश्चात, अनियंत्रित भीड़ दंगाइयों में बदल गई और अंकित शर्मा को निशाना बनाते हुए पकड़ लिया और घसीटते हुए चांद बाग पुलिया ले जाकर उस पर हमला कर दिया, जिससे उसकी मौत हो गई। अंकित की धारदार हथियारों से क्रूर तरीके हत्या की गई थी। और सबूत मिटाने के लिए उसके शव को नाले में फेंक दिया था।”

कोर्ट आर्डर (साभार: पत्रकार जितेंद्र शर्मा)

चार्जशीट में नौ अन्य लोगों के साथ हुसैन को मुख्य आरोपी में नामित किया गया है। अन्य आरोपियों में अनस, फिरोज, जावेद, गुलफाम, शोएब आलम, सलमान, नजीम, कासिम, समीर खान शामिल हैं।

पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में कहा गया था कि संप्रदाय विशेष की भीड़ ने अंकित शर्मा की धारदार वस्तुओं से हत्या कर दी थी। शर्मा के शरीर पर 51 चोट के निशान पाए गए थे। चार्जशीट में कहा गया है कि शर्मा की हत्या दंगाइयों ने की थी, जिसने लोगों को दहला दिया और क्षेत्र के निवासियों के मन में एक डर पैदा कर दिया था।

आम आदमी पार्टी (आप) पार्षद ताहिर हुसैन, मुख्य रुप से दिल्ली दंगों की साजिश रचने में शामिल थे। दिल्ली पुलिस और विशेष प्रकोष्ठ द्वारा दायर आरोपपत्रों में यह बात सामने आई है कि ताहिर हुसैन ने ‘इंडिया अगेंस्ट हेट’ समूह के उमर खालिद और खालिद सैफी से मुलाकात कर दिल्ली दंगों की साजिश रची और 8 जनवरी को वापस आया। यह बैठक शाहीन बाग में आयोजित की गई थी जहाँ सीएए का विरोध हो रहा था।

चार्जशीट में यह भी कहा गया है कि ताहिर हुसैन को शेल कंपनियों से इन दंगों को आयोजित करने के लिए पैसे मिलते थे। एक अन्य खुलासे में यह बताया गया कि दिल्ली दंगों के लिए धन इकट्ठा करने के लिए खालिद सैफी इस्लामवादी जाकिर नाइक से मिलने के लिए मलेशिया भी गया था।

ताहिर हुसैन ने बताया कि कैसे उन्होंने हिंदुओं से बदला लेने के लिए उसने दंगों का आयोजन किया और ‘काफ़िरों ’को सबक सिखाया। वह दंगों के बीच पीसीआर को कॉल भी करता था, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वह दोषी नहीं है। इसके अलावा, उसने यह भी खुलासा किया कि दंगों को अंजाम देने के लिए उन्होंने चांद बाग इलाके में संप्रदाय विशेष के हजारों लोगों को किस तरह इकट्ठा किया था।

जिसने दिल्ली दंगों की सच्चाई बताने वाली पुस्तक का प्रकाशन रुकवा दिया… वो विदेशी है, वामपंथी है लेकिन रहता दिल्ली में है

दिल्ली दंगा मामले में अधिवक्ता मोनिका अरोड़ा की पुस्तक ‘दिल्ली रायट्स 2020: द अनटोल्ड स्टोरी’ का प्रकाशन ब्लूम्सबरी ने वापस ले लिया है। प्रकाशन संस्थान ने इस्लामी कट्टरपंथियों और वामपंथी लॉबी के दबाव में आकर ऐसा किया। अब इस्लामी कट्टरवादी आतिश तासीर ने खुलासा किया है कि स्कॉटिश इतिहासकार और लेखक विलियम डेलरिम्पल ही वो व्यक्ति है, जिसने इस पुस्तक के प्रकाशन पर रोक लगवाई है।

आतिश तासीर ने मोनिका अरोड़ा की दिल्ली दंगों पर आने वाली पुस्तक को सत्ता का प्रोपेगेंडा करार देते हुए कहा कि विलियम डेलरिम्पल ने इसके प्रकाशन पर रोक लगाने में अहम भूमिका निभाई है, जिसके लिए वो उनके आभारी हैं। उन्होंने तो यहाँ तक कहा कि स्कॉटिश लेखक के बिना ये संभव नहीं हो पाता। मोनिका अरोड़ा की इस पुस्तक में जाँच और इंटरव्यूज के हवाले से दिल्ली दंगों का विश्लेषण किया गया है।

साथ ही उन्होंने (आतिश तासीर) इस पुस्तक के प्रकाशन को वापस लेने के लिए ब्लूम्सबरी इंडिया का धन्यवाद भी किया। उन्होंने कहा कि सत्ताधारी पार्टी और इसके हिंसक लोगों द्वारा इतिहास को बदलने का प्रयास बलपूर्वक किया जा रहा है, इसीलिए इस पुस्तक को वापस लिया ही जाना था। बता दें कि अगस्त 21, 2020 को भी विलियम डेलरिम्पल ने घोषणा की थी कि वो दिल्ली दंगों पर आने वाली पुस्तक का प्रकाशन रोकने के लिए प्रयास कर रहे हैं।

कॉन्ग्रेस ट्रोल साकेत ने स्कॉटिश इतिहासकार से ऐसा करने के लिए निवेदन किया था, जिसके जवाब में उन्होंने कहा था कि वो इस काम में लगे हुए हैं, ठीक उसी तरह जैसे ब्लूम्सबरी के लिए लिखने वाले अन्य लेखक इस काम में लगे हैं। उन्होंने एक अन्य ट्विटर यूजर को भी जवाब दिया था कि वो इस पर प्रयासरत हैं। उन्होंने कई अन्य वामपंथी लेखकों को भी टैग क्या था, ताकि वो सब प्रकाशन संस्था पर दबाव बना कर इसकी पब्लिशिंग पर रोक लगा सकें।

बता दें कि इस पुस्तक की लेखिका मोनिका अरोड़ा, सोनाली चितलकर और प्रेरणा मल्होत्रा हैं। यह फैक्ट्स पर आधारित किताब है। लेखकों ने फील्ड में घूम कर, कई लोगों से इंटरव्यू लेकर और पुलिस जाँच के आधार पर इसे लिखा और संपादित किया गया है। इसे सितम्बर में ही रिलीज किया जाना था। लेखक और अतिथिगण वर्चुअल बैठक के जरिए इसकी रिलीज के लिए बैठक कर रहे थे, बावजूद इसके इस पर रोक लगा दिया गया है।

पुस्तक के प्रकाशन को वापस लेने का निर्णय सोशल मीडिया पर प्रमुख ’बुद्धिजीवियों’ के नेतृत्व वाली वामपंथी उग्र भीड़ के विरोध के बाद आया, जिसने पब्लिकेशन हाउस पर ऐसा निर्णय लेने के लिए पर दबाव डाला था। आक्रोशित वामपंथी भीड़ में विवादास्पद अभिनेत्री स्वरा भास्कर और अन्य प्रख्यात ‘पत्रकारों’ और ‘बुद्धिजीवियों’ जैसे कई व्यक्तित्व शामिल थे। दक्षिण एशिया सॉलिडैरिटी इनिशिएटिव ने भी ब्लूम्सबरी इंडिया को पुस्तक का प्रकाशन वापस लेने के लिए धमकी दी थी।

किसानों को MSP से भी ज्यादा कीमत… लेकिन ‘गैंग’ बना रहा भय का माहौल, कर रहा खेतिहरों का नुकसान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार किसानों से जुड़े तीन अध्यादेश जून 2020 में लेकर आई, जिन्हें राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई है। कृषि उपज, वाणिज्य और व्यापार (संवर्धन व सुविधा) अध्यादेश, दूसरा मूल्य आश्वासन एवं कृषि समझौता अध्यादेश और तीसरा आवश्यक वस्तु (संशोधन) अध्यादेश।

पहला अध्यादेश किसानों को मंडी व्यवस्था से अलग फसल बेचने की वैकल्पिक व्यवस्था देगी। जिसकी माँग लंबे अर्से से किसान संगठन कर रहे थे। किसानों की माँग थी कि उन्हें अपनी फसल अपनी मर्जी के भाव बेचने की आजादी मिलनी चाहिए। दूसरे में किसान कम्पनियों के साथ कॉन्ट्रैक्ट कर सकेंगे। ताकि मुनाफा देने वाली फसलों की खेती की जा सके और तीसरे में खेती उत्पादों के 1955 के एक्ट को सुधारा गया है। जिसमें खेती उत्पाद को संग्रह नहीं करने के कठोर नियम थे, उनमें छूट दी गई है। हालाँकि इस छूट लेकर जमाखोरी और कालाबाजारी की चिंता जाहिर की जा रही है।

दरअसल खेती में सबसे ज्यादा मुश्किल उसकी मार्केटिंग में आती है। खेत में कुछ भी उगाना उतना मुश्किल नहीं होता। मुश्किल होता है, उस फसल का बढ़िया दाम मिलना। दाम नहीं मिलने की स्थिति में किसान अपनी फसलों को विरोध स्वरूप सड़कों तक पर डाल देते थे।

इस बढ़िया दाम को लेकर राजनीति ज्यादा होती रही है, दामों की असल चिंता कम होती है। या यूँ कह सकते हैं कि किसानों को उनकी फसलों का उचित दाम कैसे मिल सकता है, इसको लेकर गंभीरता से विचार-विमर्श कम होता है। खैर, इन अध्यादेशों से एक उम्मीद बढ़ी है कि खेती उत्पादों के बिक्री और खरीद में इजाफा होगा और किसानों की खुशहाली का रास्ता खुलेगा।

इन अध्यादेशों का विरोध करने वालों का आरोप है कि ये तीनों अध्यादेश मंडी व्यवस्था को खत्म कर देंगे। पर तीनों अध्यादेश पढ़कर ऐसा कहीं से नहीं लगता। उनकी इस शंका का कोई ठोस आधार नजर नहीं आता, बल्कि विरोध तथ्यात्मक होने के बजाय विचाराधारा से प्रेरित नजर आ रहा है।

दूसरे जब मंडी व्यवस्था जारी रहेगी तो MSP का सवाल भी बेमानी लगता है, क्योंकि मंडी व्यवस्था में एमएसपी ऐसे ही लागू रहेगा। हैरानी इस बात से होती है कि जो संगठन अब तक मंडी व्यवस्था को शोषण का केंद्र मानती थी, वही संगठन अब मंडी व्यवस्था के गुणगान में लगे हुए हैं।

कुछ जगह यह भी विरोध उभरकर सामने आया है कि कंपनियाँ किसानों को बढ़िया कीमत देने से मुकर जाएँगी। जबकि अध्यादेश में साफ है कि सभी कमिटमेंट (समझौते) लिखित रूप में होंगे। जिसका उद्देश्य यह है कि किसान अपने कृषि उत्पादों को स्पॉन्सर्स को आसानी से बेच सकें।

स्पॉन्सर में व्यक्ति, पार्टनरशिप फर्म्स, कंपनियाँ, लिमिटेड लायबिलिटी ग्रुप्स और सोसाइटियाँ कोई भी शामिल हो सकते हैं। ये समझौते निम्नलिखित के बीच हो सकते हैं:

1. किसान और स्पॉन्सर

2. किसान, स्पॉन्सर और तीसरा पक्ष

तीसरे पक्ष में एग्रीगेटर भी शामिल हैं। जबकि एग्रीगेटर वे होते हैं, जो एग्रीगेशन से संबंधित सेवाएँ प्रदान करने के लिए किसान और स्पॉन्सर के बीच बिचौलिए का काम करते हैं। राज्य सरकार कृषि समझौते की इलेक्ट्रॉनिक रजिस्ट्री के लिए एक रजिस्ट्रेशन अथॉरिटी स्थापित करेगी।

कृषि समझौते में उनकी भूमिका और सेवाओं का स्पष्ट रूप से उल्लेख होगा। समझौते में दोनों पक्ष मिलकर कृषि उत्पाद की सप्लाई, गुणवत्ता, मानदंड और मूल्य से संबंधित नियमों और शर्तों तथा कृषि सेवाओं की सप्लाई से संबंधित नियमों का उल्लेख कर सकते हैं।

ये नियम और शर्तें खेती और पालन की प्रक्रिया के दौरान, या डिलीवरी के समय निरीक्षण और सर्टिफिकेशन का विषय हो सकते हैं। ये समझौता एक फसल से लेकर अधिकतम पाँच साल के लिए होगा।

एक चिंता यह भी जताई जा रही है कि कंपनियाँ या खरीदार खरीदते वक्त किसानों से पहले से तय मूल्य देने से मुकर सकते हैं। जबकि इसमें साफ है कि मूल्य पहले से निर्धारित होंगे और लिखित में होंगे। मूल्य में बदलाव की स्थिति में समझौते में निम्नलिखित चीजें शामिल होनी चाहिए:

1. ऐसे उत्पाद के लिए गारंटीशुदा मूल्य

2. गारंटीशुदा मूल्य के अतिरिक्त राशि, जैसे बोनस या प्रीमियम का स्पष्ट संदर्भ

यह संदर्भ मौजूदा मूल्यों या दूसरे निर्धारित मूल्यों से संबंधित हो सकता है। गारंटीशुदा मूल्य सहित किसी अन्य मूल्य के निर्धारण के तरीके और अतिरिक्त राशि का उल्लेख भी कृषि समझैते में होगा।

सबसे बड़ी चिंता यह जाहिर की जा रही है कि किसान कोर्ट में अपना केस नहीं ले जा सकते, जबकि किसान और कंपनियाँ दोनों ही के बीच उठे विवाद को निपटाने के लिए एक प्रक्रिया जरूर निर्धारित की गई है। विवाद निपटारे के लिए कन्सीलिएशन बोर्ड और सुलह की प्रक्रिया के लिए कृषि समझौता प्रदान किया है।

अगर तीस दिनों में बोर्ड विवाद का निपटारा नहीं कर पाता, तो पक्ष समाधान के लिए सब डिविजनल मेजिस्ट्रेट (SDM) से संपर्क कर सकते हैं। उनके पास यह अधिकार होगा कि मेजिस्ट्रेट के फैसले के खिलाफ अपीलीय अथॉरिटी (कलेक्टर या एडिशनल कलेक्टड की अध्यक्षता वाली) में अपील कर सकते हैं।

मेजिस्ट्रेट और अपीलीय अथॉरिटी को आवेदन प्राप्त होने के तीस दिनों के भीतर विवाद का निपटारा करना होगा। मेजिस्ट्रेट या अपीलीय अथॉरिटी समझौते का उल्लंघन करने वाले पक्ष पर जुर्माना लगा सकते हैं। हालाँकि किसी बकाए की वसूली के लिए किसान की खेती की जमीन के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती।

बाकी फिलहाल तो अध्यादेश किसान और कंपनियों दोनों के लिए फायदे का ही सौदा लग रहा है। बाकी अमल में आने के बाद की समस्याओं को लेकर अभी से भय खड़ा करना किसानों को डरा सकता है। जिसके कारण किसान इस दिशा में आगे बढ़ने से पीछे हट सकते हैं। इसलिए किसानों के भीतर भय का माहौल बनाकर किसानों का नुकसान नहीं करना चाहिए।

खेती में उत्पादन की अधिकता ने इसके अर्थशास्त्र को बिगाड़ा हुआ है। विविधता इसमें अप्रत्याशित सुधार ला सकती है। मंडी व्यवस्था इसे ऑपन मार्केट बनाने में बड़ी बाधक थी, जिसे अध्यादेश के जरिए वैकल्पिक बनाया गया है।

अब यह किसान पर निर्भर करता है कि वह मंडी में सरकार द्वारा निर्धारित एमएसपी पर बेचते हैं या खुले बाजार में बेहतर भाव पर बेचते हैं। उसके सामने ये दो विकल्प खुल गए हैं। दूसरा वैकल्पिक व्यवस्था से सरकार के बजट पर अतिरिक्त बोझ कम होगा और जो युवा खेती से जुड़े क्षेत्रों में बिजनेस करना चाहते हैं, उनके लिए अपार संभावनाएँ खुलेंगी।

छोटे और मझले किसान खेती में रिस्क लेने की हालत में नहीं होते और न उनके पास ज्यादा बजट की खेती करने के लिए बजट होता है। ऐसे में कंपनियाँ रिस्क उठाने और पैसा लगाने में नहीं हिचकेंगी। एक सवाल यह आ रहा है कि किसान तो पहले भी मंडी से बाहर बेच देते थे। अब क्या बदल जाएगा? पहले किसान व्यक्तिगत तौर पर बेच देते थे, पर कंपनियाँ कानूनी तौर पर खरीद सकेंगी और उन्हें मार्केट में अपने अनुसार उतार सकेंगी। संग्रह कर सकेंगी। जिसकी कानूनी मान्यता अब मिली है। जो मंडी व्यवस्था उन्हें देती थी।

The Farmers (Empowerment and protection) agreement on price Assurance and Farm services ordinance, 2020

यह अध्यादेश मूलतः किसानों और व्यापारियों के बीच कृषि उत्पादों के व्यापार को लेकर बनाया गया है, क्योंकि खेती में उत्पादन से बड़ी समस्या इसकी मार्केटिंग में आती है। इस अध्यादेशों से जुड़े उन बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे, जिन्हें लेकर किसानों में अनर्गल भय का वातावरण क्रिएट किया जा रहा है। इसे आप पहले जो ‘भय का माहौल’ है कहा जाता है, का अगला चरण भी कह सकते हैं।

तथाकथित विद्वानों द्वारा कहा जा रहा है कि इससे केवल व्यापारियों का फायदा होगा और किसान तो केवल मजदूर भर बनकर रह जाएँगे। जबकि अध्यादेश का सेक्शन 3.3 के अनुसार, “इस लिखित समझौते की अवधि एक फसल चक्र से लेकर अधिक से अधिक 5 साल तक ही हो सकती है।” सेक्शन 4 के मुताबिक- दोनो पार्टी यानी किसान और व्यापारी आपस में मिलकर समझौते का पत्र तैयार करेंगे।

जिसमें हर चीज़ के बारे में साफ-साफ उत्पाद की क्वालिटी, ग्रेड और स्टैंर्ड के बारे में लिखा होगा। जहाँ समझौता होगा। वहाँ की मिट्टी व मौसम आदि को ध्यान में रखकर ही समझौते होंगे। इसमें सरकार या सरकारी एजेंसी की मदद ली जा सकती है। इस समझौते में दोनों पार्टी कौन-से पेस्टिसाइड का प्रयोग करेंगे और उनकी क्या मात्रा व गुणवत्ता होगी, सुरक्षा क्या होगी। ये सभी लिखित रूप में होंगे।

दोनो पार्टियाँ आपस में मिलकर किसी भी तीसरी पार्टी से बुआई से लेकर फसल पकने तक और बीच-बीच में मुआयना करवा सकती हैं। फसल पकने के बाद व्यापारी फसल की डिलीवरी के लिए बाध्य होगा।

एक बात जो बहुत जोर देकर विरोध में कही जा रही है कि कंपनियाँ फसल पकने के बाद किसान को कम दाम देने के लिए बाध्य करेंगी और इस तरह किसान का शोषण होगा। जबकि फसल का क्या भाव होगा, ये सब पहले से ही लिखित रूप में होगा।

जैसे ही उत्पाद व्यापारी के पास पहुँचेगा, उसी समय भुगतान पूरा हो जाएगा। अगर बीज-उत्पाद के लिए अगर समझौता हुआ है तो 2/3rd भुगतान डिलीवरी के टाइम और बाकी 1/3rd 30 दिन के अंदर-अंदर होगा। किसान पर स्टॉक लिमिट का कोई कानून लागू नहीं होगा। सिर्फ उन फसलों पर जिन पर समझौता किया गया है।

इसी अध्यादेश के सेक्शन 8 के अनुसार- “फसल समझौते के सिवाय, किसान और व्यापारी में किसान की जमीन की खरीद-फरोख्त, लिज या गिरवी जैसा कोई और समझौता नहीं हो सकता। व्यापारी संस्था किसान की जमीन पर कोई भी ढाँचा या कुछ भी ऐसा चेंज नहीं कर सकती, जिसे समझौता खत्म होने पर ठीक ना किया जा सके। ये व्यापारी की जिम्मेदारी होगी कि जैसी जमीन उसे मिली उसी अवस्था मे उसे वापस करे।”

सेक्शन 11 के अनुसार- किसान और व्यापारी किसी भी समय आंतरिक समझौते को रद्द कर सकते हैं।

सेक्शन 14 के अनुसार: कोई भी विवाद सबसे पहले एसडीएम के द्वारा बनाई गई कमिटी करेगी, जिसे यह विवाद 30 दिन में खत्म करना होगा।

अगर किसान दोषी मिलता है, तो उससे सिर्फ उतना ही पैसा लिया जाएगा, जो उस पर देय होगा। लेकिन अगर व्यापारी दोषी मिलता है तो उस पर 50% तक अधिक जुर्माना वसूला जा सकता है। इसके साथ-साथ अगर व्यापारी चालाकी से अध्यादेश से अलग नियमों पर समझौता करता है तो किसान से किसी तरह की भी उगाही नहीं होगी। इसके अलावा अगर किसान की फ़सल बाढ़, आग या किसी भी प्राकृतिक आपदा से नष्ट हो जाती है, तो समझौते के तहत उस पर कोई कार्यवाही नहीं होगी और ना ही पैसों की उगाही होगी।

सेक्शन 15 के अनुसार- अगर किसान डिफॉल्टर होता है और समझौते की शर्तें पूरी नहीं करता, तब भी किसी भी सिचुएशन में किसान की जमीन से उगाही नहीं हो सकती। यानी जमीन किसान की ही रहनी है।

इस अध्यादेश को किन नियमों व रेगुलशन के तहत चलाएँगे, यह सरकार लोकसभा और राज्यसभा में विचार-विमर्श करने के बाद तय करेंगे।

The farmers produce trade and commerce (promotion and facilitation) ordinance, 2020

मुख्य तौर पर यह अध्यादेश पहले वाले अध्यादेश का ही एक हिस्सा है। इसका जो मुख्य मकसद है “एक देश एक मार्केट”

इसके तहत कोई भी किसान अपनी फसल अपने प्रदेश में या दूसरे प्रदेश में बेच सकता है। उसी तरीके से कोई भी व्यापारी अपने प्रदेश के किसानों से या दूसरे प्रदेश के किसानों से व्यापार कर सकता है। इसे राज्य से बाहर और राज्य के भीतर किसान-व्यापारी समझौता कह सकते हैं। ये इस चीज को मद्देनजर रख कर बनाया गया है कि मार्केट में जितनी प्रतिस्पर्धा होगी, अच्छे किसान और अच्छे व्यापारी को उतनी ही अच्छी क़ीमत मिल सकती है।


इस अध्यादेश के सेक्शन 4 के अनुसार– कोई भी व्यापारी या किसान किसी भी प्रदेश के व्यापारी के साथ व्यापार कर सकते हैं। हर वो व्यक्ति जिसके पास PAN कार्ड नम्बर है, वो भी व्यापार कर सकता है। एकाध जगह किसानों के पेन कार्ड को लेकर ही विरोध किया जा रहा है।

सेक्शन 4.3 के अनुसार- जो भी व्यापारी किसान से उसका उत्पाद खरीदेगा, वो डिलीवरी के टाइम पूरा पेमेंट करेगा या फिर अधिक से अधिक 3 दिन के अंदर किसान को पूरा पैसा देना पड़ेगा।

सेक्शन 5 के अनुसार- “कोई भी संगठन, एग्रीकल्चर कोऑपरेटिव सोसायटी, राज्य के भीतर या राज्य के बाहर या इलैक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग कर सकते हैं। इसके लिए वो क्या प्रोसीजर अपनाएँगे, क्या फीस होगी, कौन-सी तकनीक या सॉफ्टवेयर इस्तेमाल करेंगे, कैसे किसान को पेमेंट करेंगे, किसानों के लिए क्या गाइड लाइन होगी, वो भी साफ-साफ कैसे किसान तक पहुँचेगी, ये सब व्यापारी को पहले से ही तैयार रखना होगा और इस पर सरकार की नजर रहेगी।”

सेक्शन 6 के अनुसार- “जो व्यापारी और किसान (जो अलग-अलग प्रदेश से हैं) व्यापार करेंगे उन पर कोई भी प्रदेश की मार्किट फीस, टैक्स कर वगैरह नहीं लगेगा।”

केंद्रीय सरकार किसानों के लिए एक सेंटरलाइज प्राइस इनफोर्मेशन और मार्किट इनटेलिजेंस सिस्टम बनाएगी, ताकि किसान और व्यापारी के पास अलग-अलग किस्म की फसलों के दामों का ब्यौरा रहे और व्यापार में पारदर्शिता रहे।

किसी भी विवाद का उसी तरह से समाधान होगा जैसा कि पहले वाले अध्यादेश में जिसकी चर्चा की गई है। अगर कोई व्यापारी कानून के तहत नहीं चलता तो उस पर व्यापारिक प्रतिबंध लगाया जा सकता है।

एसडीम के बाद, केस एग्रीकल्चर मार्किटिंग एडवाइजर से होते हुए, जॉइंट सेक्रेटरी तक जा सकता है। कुल मिला कर किसी भी विवाद का फैसला 30 दिन से 90 दिन (अधिकतम) में देना होगा।

सेक्शन 11 के अनुसार- “जो भी व्यापारी सेक्शन 4 के रूल के तहत काम नहीं करेगा, उस पर 25000-5,00,000 तक जुर्माना किया जा सकता है। उसी तरह जो व्यापारी इलैक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग करेगा और सेक्शन 5 ओर 7 के बनाए नियम को तोड़ेगा, या धोखाधड़ी करेगा, तो उस पर 50,000 से 10 लाख तक जुर्माना हो सकता है। साथ ही साथ व्यापार पर प्रतिबंध भी लग सकता है।”

इस अध्यादेश को किन नियमों और रेगुलेशन के तहत चलाएँगे। इन सभी नियमों को सरकार लोकसभा और राज्यसभा में विचार-विमर्श के बाद तय करेगी।

अगर दोनों अध्यादेशों का सूक्ष्म अध्ययन करने पर एक बात तो साफ है कि इसमें कुछ भी किसान विरोधी नहीं है, बल्कि किसानों के प्रोटेक्शन का विशेष ध्यान रखा गया है। बल्कि सरकार ने किसानों को इन अध्यादेशों के माध्यम से एक वैकल्पिक व्यवस्था मुहैया कराई है। ताकि किसान अपनी फसल मंडी व्यवस्था या ऑपन मार्केट जहाँ मन करे और जहाँ ज्यादा मुनाफा मिले बेच सकता है।

ऐसा भी नहीं है कि इससे पहले इस तरह की कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग या राज्य के भीतर व बाहर एग्रीकल्चर व्यापार नहीं होता था। बस फर्क यह है कि अबकी बार सरकार सीधे तौर पर किसान और व्यापारी के साथ खड़ी होकर इस व्यवसाय को मोनिटर कर सकेगी। जो प्रगतिशील किसान हैं, जो डिमांड के अनुसार फसलों को पैदा करने में दिलचस्पी लेते हैं। उनको अब कानून के तहत काम करना पड़ेगा और दोनों तरफ के लोगों यानी किसान और व्यापारी दोनों पर पारदर्शिता का दवाब बना रहेगा।

कुछ संगठनों ने यह भी आरोप लगाया है कि इससे एमएसपी खत्म होगा। लेकिन किसी ने भी ये नहीं बताया कि कैसे खत्म होगा? इसलिए उनके कहे में सच कम और राजनीतिक अंध विरोध ज्यादा है। एक तपका यह भी आवाज उठा रहा है कि ऑपन मार्केट से किसानों को उनकी फसल के रेट कम मिलेंगे। जबकि बहुत से किसान प्राइवेट व्यापारियों से व्यापार करेंगे तो सरकार पर आर्थिक बोझ कम होगा। सरकार का अतिरिक्त बोझ कम होगा तो सरकार भी किसानों को बढ़िया रेट (एमएसपी) देने के लिए बाध्य होगी।

हालाँकि इन अध्यादेशों का एमएसपी से सीधा कोई संबंध नहीं है, क्योंकि यह सभी किसानों पर लागू नहीं होगा। जो किसान स्वैच्छिक तौर पर वैकल्पिक व्यवस्था का हिस्सा बनना चाहते हैं। उनके लिए ही ये अध्यादेश लाए गए हैं। अब यह तो किसानों को तय करना है कि वह अपनी फसल सरकार को बेचता है या व्यापारी या कंपनी को।

दरअसल ये अध्यादेश पारंपरिक तरीके से खेती करने वालों के लिए नहीं बल्कि उन प्रगतिशील किसानों के लिए है, जो जोखिम उठाते हैं और प्रयोगिक खेती के माध्यम से इसे सफल व्यवसाय में बदलने का जुनून रखते हैं। ऐसे किसान अभी तक बिना किसी सरकारी सरंक्षण या ढाल के यह काम कर रहे थे, उन्हें अब सरकारी संरक्षण देने का काम ये अध्यादेश करेंगे।

किसान और व्यापारी के बीच डील में किसानों के ठगे जाने के डर को लेकर भी चिंता व्यक्त की जा रही है। जो कि वाजिब भी हैं। परंतु इन समझौतों में अगर जागरूक संस्थाएँ या गाँव के प्रतिनिधि अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करेंगे तो लिखित समझौतों में किसानों के साथ होने वाले किसी भी प्रकार के छल से उन्हें बचाया जा सकता है।