दिल्ली चुनाव के नतीजों की शुरुआती तस्वीर में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने मोर्चा मारा हुआ है। 70 विधानसभा सीट वाली दिल्ली के कई इलाकों से भाजपा सुबह से ही आगे चल रही है। वहीं आम आदमी पार्टी के दिग्गज नेता अपनी सीटों पर पीछे हैं।
अभी तक आई जानकारी के अनुसार अरविंद केजरीवाल नई दिल्ली से पीछे चल रहे हैं तो वहीं मनीष सिसोदिया जंगपुरा से पीछे हैं और सत्येंद्र जैन शकूर बस्ती से पीछे चल रहे हैं। बीच में आतिशी ने कालकाजी में बढ़त बनाई थी, मगर अब वो पीछे होती दिख रही हैं।
बीजेपी ने आम आदमी पार्टी का प्रमुख सीटों पर लगातार बढ़त बनाई हुई है। खबर लिखने तक भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच बराबरी की टक्कर देखने को मिल रही थी। हालाँकि, थोड़ी देर में ही भाजपा ने अच्छा-खासा फासला बना लिया।
इंडिया टीवी की रिपोर्ट के अनुसार, 70 में से 70 सीटों पर रुझान आ चुके हैं। इनमें 28 में आम आदमी पार्टी आगे हैं तो वहीं भाजपा 42 सीट पर आती दिख रही हैं। कॉन्ग्रेस की बात करें तो इस बार वो भी अपना खाता खोलती दिख रही है। उनके खाते इस चुनाव में 1 सीट आती दिख रही है।
बता दें कि दिल्ली चुनावों के लिए मतदान 5 फरवरी 2025 को हुआ था। इस दिन चुनाव आयोग के मुताबिक 60.54 फीसदी मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था। इस बार कुल 94 लाख 51 हजार 997 लोगों ने वोट डाला था। इसके बाद एग्जिट पोल आए थे जिनमें ज्यादातर में भाजपा की जीत के अनुमान लगाए गए थे। अगर आज चुनावों के नतीजे भाजपा के पक्ष में जाते हैं तो पूरे 26-27 साल बाद भाजपा की राजधानी में वापसी होगी।
अमेरिका की सरकारी एजेंसी USAID के बारे में रोज नया खुलासा हो रहा है। USAID पर तालिबान को कंडोम का पैसा देने, नेपाल में नास्तिकता फैलाने के लिए करोड़ों देने और LGBT कॉमिक्स तक के लिए मोटा खर्च करने का आरोप लगा है। ऐसे ही कई खर्च अब सामने आ रहे हैं।
यह खुलासे अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प के सत्ता में आने के बाद होना चालू हुए हैं। USAID का दफ्तर अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया है। इसकी जाँच एलन मस्क की अगुवाई वाला DOGE नाम का एक विभाग कर रहा है। यह विभाग एलन मस्क का ही आइडिया है। अमेरिका की एक संसदीय कमिटी ने भी USAID पर कई खुलासे किए हैं।
तालिबान को दिए करोड़ों, अफीम उगाने में भी सहायता की
USAID पर तालिबान को कंडोम के लिए $15 मिलियन (₹120 करोड़+) देने का आरोप है। अमेरिकी सांसद ब्रायन मास्ट ने आरोप लगाया कि तालिबान को यह पैसा फालतू में दिया गया। गौरतलब है कि तालिबान लगातार महिलाओं का उत्पीड़न करता है और उसने अमेरिका को अफगानिस्तान में बड़े नुकसान पहुंचाए हैं। USAID के इस कंडोम खर्चे को लेकर मास्ट ने कहा कि अब जब हमने यह पैसा देना बंद कर दिया, तब भी किसी की मौत नहीं हो रही।
इसके अलावा USAID ने कथित तौर पर अफ़गानिस्तान में नहरों, कृषि उपकरणों और उर्वरक पर करोड़ों डॉलर का खर्च किया गया। बाद में इन सब सुविधाओं का इस्तेमाल तालिबान ने किया और अफीम उगाई। इससे उसने हेरोइन बना कर बेचीं। ऐसे में USAID के चलते ड्रग तस्करी बढ़ी।
नेपाल में नास्तिकता के लिए भी दिया पैसा
80% से अधिक हिन्दू आबादी वाले नेपाल में USAID ने नास्तिकता फैलाने के लिए खूब पैसा बहाया। नेपाल में नास्तिकता बढ़ाने के लिए USAID ने 4 लाख डॉलर (₹3 करोड़+) दिए। गौरतलब है कि नेपाल में नास्तिकता फैलाने के अलावा लगातार ईसाइयत को बढ़ाने के प्रयास भी चल रहे हैं। ऐसे में USAID के कदम की इस बात को लेकर भी आलोचना हुई है कि पहले हिन्दू आबादी को नास्तिक बनाया जाएगा और फिर मिशनरियाँ उन्हें अपनी तरफ मोड़ लेंगी।
LGBT विचारधारा को बढ़ाने के लिए भी दिए करोड़ों डॉलर
USAID ने सबसे ज्यादा पैसा दुनिया भर में जेंडर आइडियोलॉजी आगे बढ़ाने के लिए दिया। इसके तहत कैरिबियन देशों में केवल इस बात के लिए तक 3 मिलियन (₹2.5 करोड़+) दिए गए कि कोई अपने आप को LGBT के रूप में बताए। यानि वह महिला पुरुष पहचान से बाहर निकले, तो उसे अवार्ड मिलेगा। इसके अलावा कोलंबिया में ट्रांसजेंडर ओपेरा के लिए ₹40 लाख से अधिक का खर्च किया गया। इसके अलावा एडल्ट शो के लिए इक्वाडोर में ₹65 लाख से ज्यादा की राशि दी गई।
इसी तरह अफ्रीका में फ्रेंच बोलने वाले LGBTQ को बढ़ाने के लिए ₹8 करोड़ से ज्यादा खर्च किया गया। ग्वाटेमाला में अपना सेक्स चेंज करवाने के लिए USAID ने ₹17 करोड़ से अधिक दिए। यहाँ तक कि पेरू की एक LGBTQ पात्रों वाली कॉमिक के लिए ₹27 लाख से अधिक दिए गए। सीरिया में अल कायदा के लड़ाकों को खाना देने के लिए खर्च USAID ने किया। अमेरिका में अवैध रूप से घुसने वाले लोगों को ₹90 करोड़ से अधिक वाउचर दिए, जिससे वह खरीददारी कर सकें।
अहमदाबाद पुलिस ने एक हिंदू लड़की के अपहरण और यौन शोषण के मामले में एक मुस्लिम युवक को गिरफ्तार किया है। मुस्लिम युवक ने 10 महीने पहले पीड़िता का अपहरण किया था उसे वह अलग-अलग जगह ले जाकर हिन्दू बालिका के साथ रेप करता था। आरोपित की पहचान अब्दुल मुबीन हामिद खान पठान के रूप में हुई है। अब्दुल हामिद खान HIV-AIDS संक्रमित है।
पुलिस ने दोनों को मध्य प्रदेश से गिरफ्तार किया। पुलिस ने उसे हिन्दू लड़की के साथ मध्य प्रदेश से बरामद किया है। अब्दुल मुबीन ने मार्च, 2024 में लड़की का अपहरण किया था। हिन्दू लड़की 22 मार्च, 2024 को सगीरा शाहीबाग नाम की एक जगह पर शादी में गई थी।
यहाँ से वह रात आठ बजे अचानक गायब हो गई। इसके बाद उसे परिजनों ने ढूँढने की कोशिश की। जब कोई पता नहीं लगा तो वह पुलिस के पास गए। इस शिकायत के आधार पर पुलिस ने जाँच चालू की।
અમદાવાદઃ 6થી વધુ યુવતીઓને પ્રેમજાળમાં ફસાવનાર વિધર્મી ઝડપાયો… વિઘર્મી યુવકની પૂછપરછ દરમિયાન સામે આવી વિકૃત માનસિકતા… મહિલાઓ સાથે સંબંધ રાખી એઈડ્સથી સંક્રમિત કરવાનો હતો પ્લાન…#Gujarat#Ahmedabad#Lovetrappic.twitter.com/YBWkzaQYfy
तीन महीने की लगातार जाँच के बाद भी पुलिस लड़की के बारे में कुछ पता नहीं लगा पाई। इसके बाद मामला अहमदाबाद अपराध शाखा की मानव तस्करी पर काम करने वाली इकाई को सौंप दिया गया। वहीं हिन्दू लड़की के परिजन गुजरता हाई कोर्ट भी पहुँचे।
अहमदाबाद अपराध शाखा ने गुजरात समेत अन्य राज्यों में भी तलाश चालू की। फरवरी 2025 में उसे कुछ जानकारी हासिल हुई। किशोरी और मुस्लिम युवक दोनों के मध्य प्रदेश के बिजोरी में होने की सूचना मिलने पर टीम यहाँ पहुँची। इसके बाद लड़की को बरामद कर अब्दुल को गिरफ्तार कर लिया गया।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, आरोपित अब्दुल ने हिन्दू लड़की को बंधक की तरह रखा था और उसे खाना तक नहीं खिलाता था। अब्दुल ने यह मकान अपने रिश्तेदारों की मदद से लिया था। पुलिस ने अब अब्दुल को गिरफ्तार करके आगे की कार्रवाई चालू कर दी है।
शाहीबाग पुलिस ने ऑपइंडिया से बातचीत में इस कार्रवाई की पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि अब्दुल पठान मूल रूप से अहमदाबाद के बरेजा का रहने वाला है। वह पुलिस से बचने के लिए नाबालिग के साथ कई शहरों में घूम रहा था। फिलहाल आरोपित को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश करने और रिमांड हासिल करने के प्रयास किए जा रहे हैं।
पहले भी 6 लड़कियों को बना चुका शिकार
रिपोर्ट के अनुसार, शुरुआत में उसने लड़की को अहमदाबाद में ही रखा। कुछ दिन बाद वह एक वकील की सलाह पर उसे सूरत, औरंगाबाद, नागपुर, बीड़, हैदराबाद, बिलासपुर आदि शहरों में घुमाता रहा। पुलिस उसे सलाह देने वाले वकील पर भी अब कार्रवाई करेगी।
पुलिस ने बताया कि आरोपित को पता था कि वह HIV पॉजिटिव है, इसके बावजूद उसने पहले भी 6 लड़कियों को निशाना बनाया था। पुलिस अब उन सभी का पता लगा रही हैन उनके मिलने पर पुलिस मेडिकल परीक्षण भी करवाएगी।
जम्मू कश्मीर के बारामूला में एक ढोंगी पीर पकड़ा गया है। उसने जम्मू कश्मीर में ही सऊदी अरब की काबा मस्जिद जैसी एक इमारत बनवा ली थी। वह खुद को पैगम्बर के रूप में दिखाता था। उसने अपने खेत में एक इमारत बनवा रखी थी जहाँ वह गाँजा-चरस पीता था। उसकी मुरीदों में महिलाओं की बड़ी संख्या थी।
जम्मू कश्मीर पुलिस ने बारामूला से अब्दुल रज्जाक नाम के शख्स को पकड़ा है। अब्दुल रज्जाक खुद को जम्मू कश्मीर के सूफी संत नूरदीन नूरानी का अवतार बताता था। अब्दुल रज्जाक ने यही करके बड़ी संख्या में अपने मुरीद इकट्ठा कर लिए थे। उससे मिलने बड़ी संख्या में महिलाएँ भी आती थीं।
उसने अपने खेत में एक झोपड़ी भी बना ली थी। यहाँ वह लोगों को ताबीज बना कर देता था। वह यहाँ आए लोगों को चरस गांजा पिलाता था और खुद भी पीता था। आसपास के लोगों ने उसे मानसिक रूप से बीमार बताया है। उसकी बीवी तक उसे छोड़ कर चली गई थी।
अब्दुल रज्जाक खुद को पैगंबर तक बताने लगा था। उसने दावा किया था कि अल्लाह ने उसे बारामूला में ही काबा जैसी मस्जिद बनवाने का हुक्म दिया है। काबा वही मस्जिद है जहाँ हर साल करोड़ों मुस्लिम हज और उमरा के लिए जानते हैं। अब्दुल रज्जाक बताता था कि वह डुप्लीकेट काबा मस्जिद गरीबों के लिए बनवा रहा है, जो सऊदी अरब नहीं पहुँच पाते।
उसने इसका निर्माण चालू भी कर दिया था। कुछ ही दिनों में वह इसका उद्घाटन करने वाला था। हालाँकि, इसी बीच इस पूरे कारनामे की खबर किसी ने स्थानीय पत्रकारों को दे दी। वह उसके यहाँ उसके मुरीद बन कर गए और उसकी हरकतों के बारे में जानकारी हासिल की।
इस कथित पैगंबर का उन्होंने वीडियो भी बना लिया और उसकी सच्चाई सोशल मीडिया पर डाल दी। वीडियो वायरल होने पर उसके बारे में लोग जान गए और फिर पुलिस को भी यह सूचना दी गई। उसको पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। उसकी फर्जी काबा मस्जिद भी लोगों ने ध्वस्त कर दी और आग लगा दी। इसके वीडियो भी वायरल हो रहे हैं।
इस मस्जिद को कश्मीर के एक मौलाना ने गैर इस्लामी बताया और कहा कि शरिया में इसकी कोई जगह नहीं है।
उत्तर प्रदेश में वक्फ संपत्तियों पर विवाद गहराता ही जा रहा है। इस संबंध में हाल में संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की रिपोर्ट आई जिसे लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला के समक्ष प्रस्तुत किया गया। इसमें विवादित वक्फ संपत्तियों की जानकारी दी गई। बताया जा रहा है कि इस रिपोर्ट मे यूपी की ऐसी 57792 सरकारी संपत्तियों के बारे में बात है जिन पर वक्फ ने अपनी ओर से दावा किया हुआ है। ये संपत्ति 11712 एकड़ में फैली हुई है।
जानकारी के मुताबिक, वक्फ के नाम शाहजहाँपुर में 2589 संपत्तियाँ दर्ज हैं, जिनमें से 2371 सरकारी संपत्तियाँ हैं। रामपुर में 3365 वक्फ संपत्तियाँ हैं, जिनमें से 2363 सरकारी संपत्ति हैं। अयोध्या में 3652 संपत्तियों पर दावा किया जा रहा है, जिनमें से 2116 सार्वजनिक संपत्ति हैं। जौनपुर में 4167 में से 2096 और बरेली में 3499 वक्फ संपत्तियों में से 2000 सरकारी जमीनों पर स्थित हैं।
इसके अलावा उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों जैसे लखीमपुर खीरी (1,792), बुलंदशहर (1,778), फतेहपुर (1,610) आदि में भी वक्फ के दावे देखने को मिले हैं।
रिपोर्ट्स के अनुसार, इन सभी संपत्तियों का राजस्व रिकॉर्ड सार्वजनिक उपयोग वाली श्रेणी में आता है। यूपी सरकार ने जेपीसी को बताया कि इनमें से अधिकांश भूमि वर्ग 5 और वर्ग 6 के तहत आती है जो सरकारी और ग्राम सभा की सम्पत्ति मानी जाती है।
JPC रिपोर्ट में सिफारिश
जेपीसी की रिपोर्ट में वक्फ संपत्तियों की जाँच और उनके निपटारे को लेकर कुछ सिफारिशें की गई हैं। इसमें एक सिफारिश है कि केंद्रीय वक्फ काउंसिल में गैर-मुस्लिम सदस्यों की संख्या बढ़ाने की सिफारिश की गई है। इसके अलावा ट्रिब्यूनल के सदस्यों की संख्या और उनकी योग्यता को फिर से निर्धारित करने का सुझाव दिया गया है ताकि मामलों का निपटारा तेजी से हो सके।
मजहबी जमींदर बना वक्फ
बता दें कि जिस वक्फ ने मजहब के नाम पर भारत में इतनी संपत्ति पर कब्जा किया हुआ है उसके बारे में सुनकर आपको शायद हैरानी होगी कि वक्फ का कॉन्सेप्ट इस्लामी देशों तक में नहीं है। फिर वो चाहे तुर्की, लिबिया, सीरिया या इराक हो। लेकिन भारत में मुस्लिम तुष्टिकरण के चलते आज हालात ऐसे हैं कि इन्हें देश में तीसरा सबसे बड़ा जमींदार बताया जाता है। इनके पास अकूत संपत्ति है। अल्पसंख्यक मंत्रालय के अनुसार वक्फ बोर्ड के पास पूरे देश भर में 8,65,646 संपत्तियाँ पंजीकृत हैं। इनमें से 80 हजार से ज्यादा संपत्ति वक्फ के पास केवल बंगाल में हैं। इसके बाद पंजाब में वक्फ बोर्ड के पास 70,994, तमिलनाडु में 65,945 और कर्नाटक में 61,195 संपत्तियाँ हैं। देश के अन्य राज्यों में भी इस संस्थान के पास बड़ी संख्या में संपत्तियाँ हैं।
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने पंजाब की AAP सरकार को लताड़ा है। हाई कोर्ट ने कहा है कि AAP सरकार खर्चों के बारे में पूछी गई जानकारी नहीं देना चाहती। हाई कोर्ट ने AAP सरकार से विज्ञापन और गाड़ियों समेत कई कामों का खर्च माँगा था। हाई कोर्ट ने इस मामले में पंजाब सरकार के कोर्ट की अवमानना करने की बात कही थी।
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के जस्टिस कुलदीप तिवारी ने इस मामले में दाखिल किए गए पंजाब सरकार के हलफनामे परकहा, “हलफनामे में दिए गए कारणों से तो लगता है कि सरकार का हमारे निर्देश का पालन करने का कोई इरादा नहीं है।” हाई कोर्ट ने पंजाब सरकार से पूछा है कि क्या वह सही में अपने खर्च बताने की इच्छा भी रखती है या नहीं।
कोर्ट ने इस बात को लेकर नया हलफनामा दाखिल करने को कहा है। इस मामले की सुनवाई अब 14 फरवरी 2025 को होने वाली है। हाई कोर्ट ने सितम्बर, 2024 में आदेश दिया था कि पंजाब सरकार अपने विज्ञापनों, नई गाड़ियों, मंत्री-विधायको के आवास पर होने वाले खर्च और दिल्ली की अदालतों में केस मुकदमे लड़ने के लिए खर्च का ब्योरा दे।
हाई कोर्ट ने यह ब्यौरा कई अस्पतालों की याचिकाओं की सुनवाई पर माँगा था। अस्पतालों ने आरोप लगाया था कि केंद्र सरकार के पैसा देने के बावजूद पंजाब की भगवंत मान की सरकार उनका ₹500 करोड़ का बकाया भुगतान नहीं कर रही है। यह पैसा आयुष्मान योजना का था और अस्पतालों को मरीजों के इलाज के एवज में मिलना था।
हाई कोर्ट में पंजाब सरकार पैसा ना देने के मामले पर साफ जवाब नहीं दे पाई थी। इसके बाद हाई कोर्ट ने आदेश दिया था कि सारे खर्चों का एक विस्तृत ब्यौरा उसे दिया जाए। हालाँकि, पंजाब सरकार ने यह दाखिल नहीं किया। इस मामले में जब 23 जनवरी, 2025 को सुनवाई हुई तो कोर्ट ने कहा कि पंजाब सरकार ने रिकॉर्ड ना देकर अवमानना की है।
इसके बाद हुई सुनवाई में उसने पंजाब सरकार की मंशा पर ही प्रश्न उठा दिए। हालाँकि, यह कोई पहली बार नहीं है, जब पंजाब सरकार से उसके विज्ञापन जैसे खर्चों का रिकॉर्ड माँगा गया हो। इससे पहले हाल ही में फॉरेंसिक सुविधाओं के लिए जब पंजाब ने पैसा ना होने की बात कही थी, तो भी हाई कोर्ट ने यही जानकारी माँगी थी।
भारत ने ढाका में बांग्लादेश के राष्ट्रपिता बंगबंधु मुजीबुर रहमान का घर इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा ढहाए जाने की आलोचना की है। भारत ने इसे बर्बरता का कृत्य बताया है। भारत ने इसको लेकर कड़ा रुख जताया है। वहीं बांग्लादेश की सरकार शेख हसीना के भारत से ऑनलाइन रैली को लेकर खीझ गई है। उसने भारतीय हाई कमिश्नर को तलब किया है। इस बीच बांग्लादेश के कट्टरपंथी देश भर में आवामी लीग के कार्यालय धाने और शेख हसीना से जुड़े लोगों के घरों को तोड़ने में जुटे हैं।
भारत ने ढाका में बंगबंधु मुजीबुर रहमान के घर ‘धानमंडी 32’ को ढहाए और जलाए जाने के बाद बयान जारी किया है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा, “यह काफी दुखद है कि शेख मुजीबुर रहमान का ऐतिहासिक निवास, जो गुलामी और प्रताड़ना की ताकतों के खिलाफ बांग्लादेश के लोगों के प्रतिरोध का प्रतीक है, 5 फरवरी, 2025 को ढहा दिया गया।”
Our response to media queries regarding destruction of the historic residence of Sheikh Mujibur Rehman⬇️
भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा, “वे सभी लोग जो उस स्वतंत्रता संग्राम को महत्व देते हैं, जिसने बांग्ला पहचान के गौरव को बढ़ाया। वे बांग्लादेश की राष्ट्रीय चेतना के लिए इस घर के महत्व को जानते हैं। बर्बरता के इस कृत्य की कड़ी निंदा होनी चाहिए।”
इससे पहले ढाका में भारतीय हाई कमिश्नर को गुरुवार (6 फरवरी, 2025) को यूनुस सरकार ने तलब किया। बांग्लादेश ने शेख हसीना की की ऑनलाइन रैली को लेकर निंदा की और भारत से इसको लेकर कड़ा प्रतिरोध जताया। बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने यह रैली नई दिल्ली से ऑनलाइन माध्यम से की थी।
बांग्लादेश ने कहा कि शेख हसीना ने नई दिल्ली में बैठ कर भड़काने वाला बयान दिया और झूठे आरोप लगाए। शेख हसीना ने ऑनलाइन रैली में कहा था कि मोहम्मद यूनुस उनकी हत्या करवाना चाहते थे। शेख हसीना ने कहा था कि यूनुस पैसे की ताकत का इस्तेमाल करके और कई लोगों की लाशों पर कदम रखकर सत्ता में आए हैं।
गौरतलब है कि हसीना की इस रैली के बाद इस्लामी कट्टरपंथियों ने शेख हसीना के पैतृक निवास को ढाका के भीतर ढहा दिया था। यह वही घर था जहाँ से शेख हसीना के पिता और बंगबंधु मुजीबुर रहमान ने पकिस्तान के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन चलाया था।
शेख हसीना की रैली के जवाब में कट्टरपंथी हथौड़े और बुलडोजर लेकर पहुँचे थे। उन्होंने इस घर को पहले आग लगाई और फिर इसे तोड़ दिया। इस बीच मोहम्मद यूनुस की पुलिस और बांग्लादेशी सेना मूकदर्शक बनी खड़ी रही। उसने इन आताताइयों को रोकने की एक भी कोशिश नहीं की।
इस घर के अलावा शेख हसीना के खुद के घर ‘सुधा सदन’ को भी जमींदोज कर दिया गया। बांग्लादेश में आवामी लीग के कई कार्यालय भी जला और तोड़ दिए गए गए। इस पूरे काम में पुलिस चुप रही। यहाँ तक कि शेख हसीना के रिश्तेदारों तक के घरों को भी नहीं छोड़ा गया।
मोहम्मद यूनुस ने भी इस ऐतिहासिक इमारत को ढहाने जाने की आलोचना की लेकिन इस कृत्य का जिम्मेदार शेख हसीना को ही ठहरा दिया। यूनुस सरकार ने बांग्लादेश में हो रही हिंसा की आलोचना करने वाली अभिनेत्री मेहर अफरोज को भी गिरफ्तार कर लिया। उन पर देशद्रोह का आरोप लगाया गया।
अफरोज की माँ दो बार शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग से सांसद रही है जबक उनके पिता भी एक बार चुनाव लड़ चुके हैं। उनके घर को भी सिलहट में ‘धानमंडी 32’ की तरह ही जला और तोड़ दिया गया। उनको अभी जेल में रखा गया है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के आर्थिक कुप्रबन्धन और परमिट राज लाने को लेकर कॉन्ग्रेस पर हमला बोला है। पीएम मोदी ने आर्थिक मोर्चे पर भारत की बदनामी करवाने के लिए गाँधी परिवार को दोषी ठहराया है। पीएम मोदी ने अर्थव्यवस्था को लेकर भारतीयों की हुई बदनामी पर भी कॉन्ग्रेस को घेरा।
राज्यसभा में गुरुवार (6 फरवरी, 2025) को प्रधानमंत्री मोदी बजट अभिभाषण पर लाए गए धन्यवाद प्रस्ताव को लेकर बोल रहे थे। पीएम मोदी ने इस दौरान कॉन्ग्रेस की तमाम नीतियों की आलोचना के साथ जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी के कार्यकाल के दौरान धीमी पड़ी अर्थव्यवस्था को लेकर बात की।
पीएम मोदी ने कहा, “शाही परिवार के आर्थिक कुप्रबन्धन और गलत नीतियों के चलते पूरे समाज में भारतीयों को दोषी ठहराया गया और बदनाम किया गया। जबकि इतिहास देखें तो भारत के समाज में स्वभाव में लाइसेंस और परमिट नहीं थी। हम खुले समाज में विश्वास करते थे। हम दुनिया भर में मुक्त व्यापार और फ्री ट्रेड करते थे।”
दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, "शाही परिवार के आर्थिक कुप्रबंधन और गलत नीतियों के कारण पूरे समाज को दुनिया भर में दोषी ठहराया गया और बदनाम किया गया…"
पीएम मोदी का यह हमला कॉन्ग्रेस राज के दौरान भारत की धीमी विकास दर और ‘लाइसेंस राज’ के चलते देश के औद्योगिकिकीकरण में हुई बाधा को लेकर था। गौरतलब है कि भारत आजाद होने के बाद अपनी अर्थव्यवस्था को बंद किए हुए था और स्थिति काफी खराब होने के बाद इसमें 1991 में सुधार किया गया।
जिस आर्थिक कुप्रबन्धन और उससे हुई बदनामी की बात प्रधानमंत्री मोदी कर रहे हैं, उसका एक बड़ा उदाहरण ‘हिन्दू विकास दर’ शब्द है। कॉन्ग्रेस राज की नीतियों के चलते भारत की धीमी विकास दर को ‘हिन्दू विकास दर’ कहा जाने लगा था। नेहरू और इंदिरा सरकार की विफलता को छुपाने के लिए यह शब्द कम्युनिस्ट अर्थशास्त्रियों ने गढ़ा था।
कई दशकों की सरकार की विफलता को बताने की जगह तब ‘हिन्दू विकास दर’ कह कर पूरे भारत को धीमा और हिन्दुओं को आलसी बताने का प्रयास किया गया था। देश के आर्थिक विकास की जिम्मेदारी का पूरा ठीकरा हिन्दुओं पर रख दिया गया था। यह शब्द जब तब अब भी चर्चा में आता है।
‘हिंदू विकास दर’ शब्द साल 1978 में तथाकथित अर्थशास्त्री राज कृष्ण द्वारा गढ़ा गया था। यह उन्होंने साल 1950 से 1980 तक जीडीपी वृद्धि दर का उल्लेख करने के लिए तैयार किया था। ‘हिंदू विकास दर’ पूरी तरह से एक गलत शब्द है, क्योंकि उस समय और बाद में भी देश की अर्थव्यवस्था में हिंदुओं का सबसे बड़ा योगदान था।
1950-80 के दशक तक देश के विकास को लेकर कई प्रयास किए जा रहे थे। हालाँकि इसके बाद भी विकास कमोबेश स्थिर रहा। वास्तव में उस दौरान विकास दर करीब 3.5% थी। इसलिए उस समय स्थिर विकास दर को ‘हिंदू विकास दर’ कहते हुए एक गलत शब्द के प्रयोग की शुरुआत की गई।
इस हिन्दू विकास दर को असल में अर्थशास्त्रियों को नेहरू विकास दर कहना चाहिए था। जवाहर लाल नेहरू आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री थे। वह 1964 तक पद पर बने रहे। अधिकांश आर्थिक नीतियाँ नेहरू द्वारा तय या बनाई गई थीं। इसलिए, उनके शासन के दौरान और उसके बाद के वर्षों के आर्थिक विकास के लिए ‘नेहरू विकास दर’ शब्द सही प्रतीत होता है।
नेहरू समाजवाद के प्रति इतने जुनूनी थे कि भारत सरकार होटल भी चलाती थी। उस समय बिड़ला और टाटा जैसे मेहनती व्यक्तियों को अपने व्यवसाय का विस्तार करने की स्वतंत्रता नहीं दी गई थी। नेहरू की इस अदूरदर्शी दृष्टि को विकास की धीमी दर के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। पीएम मोदी ने संसद में इसी बात को दोहराया है।
नेहरूवादी नीतियों को उनकी बेटी इंदिरा गाँधी ने भी आगे बढ़ाया। इंदिरा गाँधी ने बैंकिंग, कपड़ा, कोयला, इस्पात, ताँबा जैसे क्षेत्रों का राष्ट्रीयकरण कर दिया था। इसके चलते इस ‘हिन्दू विकास दर’ का दंश देश कई दशकों तक झेलता रहा था। ऐसे में पीएम मोदी का यह कहना एकदम सही है कि शाही परिवार ने भारत की वैश्विक मंच पर बदनामी करवाई।
अमेरिका में अवैध रूप से घुसे 104 भारतीय वापस भारत आ गए हैं। इन्हें अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों ने गिरफ्तार करने के बाद भारत वापस भेजा। इन्हें अमृतसर में अमेरिकी सेना का प्लेन लेकर आया। अमेरिका से वापस भेजे जाने वाले भारतीय पंजाब, हरियाणा, गुजरात, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र से ताल्लुक रखते हैं। इसको लेकर राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है। इसी के साथ ही विदेश जाने की ललक और इसके लिए अपनाए जाने वाले तरीकों को लेकर भी बात हो रही है। इस बीच ‘डंकी रूट’ फिर से चर्चा में आया है।
क्या होती है डंकी?
‘डंकी’ शब्द पंजाबी भाषा में उपयोग होता है। डंकी का अर्थ एक जगह से उछल कर दूसरी जगह जाना है। लेकिन बीते कुछ समय में डंकी शब्द का अर्थ बदल गया है। ‘डंकी रूट’ नाम उस रास्ते को दे दिया गया है, जिससे कोई भी व्यक्ति अवैध तरीके से भारत छोड़ कर दूसरे देश को जाता है। यह शब्द हालिया समय में अमेरिका जाने के अवैध रास्ते का नाम हो गया है। इस नाम से रील्स बनती हैं, वीडियो बनते हैं, फिल्म तक बनाई गई है। इसका अपना एक ‘पॉप कल्चर’ (संस्कृति) है।
कैसे काम करता है ‘डंकी रूट’
डंकी रूट के जरिए भारतीयों को कई एजेंट विदेश भेजने का वादा करते हैं। जो लोग डंकी का रास्ता चुनते हैं, सबसे पहले उनका पासपोर्ट और वीजा तैयार करवाया जाता है। डंकी का काम करने वाले एजेंट पैसा लेकर किसी यूरोपियन या फिर लैटिन अमेरिका के किसी देश का वीजा तैयार करवाते हैं। अधिकांश मौकों पर यह टूरिस्ट वीजा होता है। इसी के सहारे डंकी वालों को भारत से निकाला जाता है। इनको नेपाल, दुबई और किसी अन्य देश में कुछ दिन यात्रा करवा कर इनकी एक यात्रा की पूरी कहानी तैयार करवाई जाती है।
इसके बाद डंकी रूट का सहारा लेने वाले की लैटिन अमेरिकी देश पहुँचते हैं। इन देशों में भारतीय डंकी एजेंटों के सहायक होते हैं, जो डंकी रूट लेने वालों को रास्ता बताते हैं और यहाँ अवैध तरीके से उनकी मदद करते हैं। कई बार यह लोग आपराधिक गैंग से जुड़े होते हैं। यह लोग इन्हें अमेरिका सीमा तक की यात्रा करवाते हैं। यह यात्रा जंगल, नदी और पहाड़ों से होकर गुजरती है। 40-50 किलोमीटर तक पैदल चलना भी पड़ता है। अमेरिका में घुसने के लिए सीमा लांघनी पड़ती है।
क्या है अमेरिका में घुसने का रास्ता?
अमेरिका में अवैध रूप से घुसने वाले लोग सबसे पहले किसी लैटिन अमेरिकी देश में हवाई यात्रा के जरिए पहुँचते हैं। यह देश ब्राजील, वेनेज़ुएला, बोलिविया, पेरू, कोलंबिया, निकारागुआ समेत कोई भी हो सकता है। यदि कोई व्यक्ति ब्राजील पहुँचा है तो उसे यहाँ से सीमा पर करके कोलंबिया पहुँचना होगा। इसके लिए कभी कभार मानव तस्करी करने वाले गाड़ी उपलब्ध करवाते हैं। फिर उस व्यक्ति को पनामा में घुसाया जाता है। पनामा में अधिकांश लोगों को चुपके से जंगल पार करना होता है।
इसके बाद निकारागुआ और गुआटेमाला होते यह लोग मेक्सिको पहुँचते हैं। मेक्सिको और अमेरिका आपस में सीमा साझा करते हैं। मेक्सिको की सुरक्षा एजेंसियों से बचते हुए यह यहाँ इकट्ठा होते हैं। अमेरिका और मेक्सिको की सीमा पर वर्तमान में ऊँची लोहे की बाड़ लगी हुई है। इसे पार करने के लिए रस्सियों का सहारा लिया जाता है। डंकी रूट लेने वाले लोग अमेरिकी सीमा फांद लेना एक उपलब्धि की तरह लेते हैं। इसकी फोटो भी सोशल मीडिया पर साझा होती है। इसका जश्न मनता है।
इस बीच इन्हें कई बार पहाड़, नदी तक पार करने होते हैं। डंकी रूट से गए एक व्यक्ति ने बताया, “हमने 17-18 पहाड़ियाँ पार कीं। अगर कोई फिसल जाता, तो उसके बचने की कोई उम्मीद नहीं थी। अगर कोई घायल हो जाता, तो उसे मरने के लिए छोड़ दिया जाता। हमने लाशें देखीं।” एक और व्यक्ति ने बताया कि उन्हें नाव की 10-15 घंटे तक की यात्रा करनी पड़ी। यात्रा में आने वाली इन कठिनाईयों के वीडियो भी अक्सर सामने आते हैं।
अमेरिका से वापस भेजे गए भारतीय बताते हैं कि डंकी रूट के सहारे जो लोग घुसने में कामयाब हो जाते हैं, वह शरणार्थी का दर्जा पाने का प्रयास करते हैं। सीमा पार करते समय अगर किसी शरणार्थी को अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियाँ पकड़ लेती हैं, तो वह अपना रटा हुआ वर्जन उन्हें बताते हैं। वह दावा करते हैं कि भारत में उनके साथ उत्पीड़न हो रहा है और वह खाने-पीने तक को मोहताज हैं। वह दावा करते हैं कि शरण लेने के लिए अमेरिका पहुँचे हैं। डंकी रूट लेने वालों को यह पूरी स्क्रिप्ट पहले ही रटा दी जाती है।
अमेरिका में पकड़े जाने वाले यह लोग वकील की सहायता लेते हैं और मुकदमा लड़ कर शरणार्थी का दर्जा पाने का प्रयास करते हैं। जो लोग पकड़े नहीं जाते, वह उन लोगों के साथ घुल मिल जाते हैं, जो पहले इसी तरीके से अमेरिका पहुँच चुके हैं। कई मामलों में लोगों को वापस भारत भेज दिया जाता है। कई मामलों में अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियाँ इनके पैर में एक ट्रैकर लगा का छोड़ देती हैं, जिन्हें यह बाद में काट कर फेंक देते हैं।
कौन करता है डंकी रूट का इस्तेमाल?
डंकी रूट बीते कुछ सालों में काफी पॉपुलर हुआ है। इसका प्रभाव सबसे पहले पंजाब और हरियाणा में आया। इसकी उन युवाओं में खासी पकड़ है, जो वैध तरीकों से विदेश जाने में अक्षम हैं। सामान्य तौर पर विदेश जाने के लिए वीजा लेना होता है। काम करने के लिए वीजा मिलने की प्रक्रिया काफी कठिन है। इसके लिए कई टेस्ट भी होते हैं। पढ़ाई में औसत छात्र इन्हें नहीं पार कर पाते। ऐसे में वह डंकी रूट को विकल्प के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। वर्तमान में हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्से और गुजरात आदि में इसका काफी क्रेज है।
जो बायडेन के अमेरिका के राष्ट्रपति रहते हुए डंकी का इस्तेमाल काफी बढ़ गया था। लोगों ने समझा कि बायडेन प्रशासन इन अवैध प्रवासियों के प्रति नरम है, ऐसे में अमेरिका जाना कोई बुरा सौदा नहीं है। एक रिपोर्ट बताती है कि वर्तमान में अमेरिका में 7.25 लाख भारतीय अवैध रूप से रह रहे हैं।
कितना पैसा लगता है?
डंकी रूट को लेकर अब तक सामने आई अधिकांश रिपोर्ट में बताया गया है कि इस काम में ₹30 लाख से ₹50 लाख का निवेश होता है। गुजरात से जाने वाले एक परिवार ने दावा किया है कि उनसे इस काम के ₹1 करोड़ तक लिए गए। पंजाब और हरियाणा से सामने आए डंकी के मामलों में देखा गया है कि युवा अपने खेत-जमीन बेच कर इन पैसों का इंतजाम करते हैं। कई रिश्तेदारों से भी उधार लेकर अमेरिका को जाते हैं।
डंकी रूट लेकर जाने वालों को उम्मीद होती है कि एक बार अमेरिका में पहुँचने के बाद वह महीने का ₹3 लाख तक बचा सकते है। ऐसे में उन्हें डंकी रूट पर खर्च होने वाली यह धनराशि बहुत छोटी लगती है। सारे कष्ट उठा कर भी इसी लिए हरियाणा के कई जिलों से युवा अमेरिका जाते हैं। कई मौकों पर इनसे डंकी के नाम पर ठगी भी हो जाती है। डंकी वाले एजेंटों का यह जाल हरियाणा पंजाब के गाँव-गाँव तक फ़ैल चुका है। सपने दिखाए जाने के बाद लोग अपना पैसा लगाने से नहीं डरते।
अब क्या बदलाव आया है?
बायडेन के खिलाफ चुनाव में डोनाल्ड ट्रम्प ने इन अवैध प्रवासियों को एक बड़ा मुद्दा बनाया था। ट्रम्प का कहना था कि लगातार अवैध रूप से घुस रहे प्रवासी अमेरिका के संसाधनों का गलत फायदा उठा रहे हैं। उन्होंने वादा किया था कि अमेरिका का राष्ट्रपति बनने पर अवैध प्रवासियों पर वह कड़ा एक्शन लेंगे। उनके राष्ट्रपति बनने के बाद तेजी से अमेरिका में इन अवैध तरीके से घुसने वालों के खिलाफ कार्रवाई हो रही है। कई देशों के अवैध अप्रवासी वापस भेजे जा रहे हैं। इसी कड़ी में भारत में भी पहली खेप के रूप में 104 लोग आए हैं।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दूसरी बार सत्ता में आने के बाद एक के बाद एक चौंकाने वाले फैसले ले रहे हैं। हाल में उन्होंने अमेरिका की सरकारी एजेंसी यूनाइटेड स्टेट्स एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (USAID) को बंद करने का आदेश दिया है। उनके इस निर्णय से अमेरिकी रिपब्लिकन जहाँ खुश हैं तो वहीं पाकिस्तान के आतंकी संगठनों के लिए ये बड़ी चिंता की बात हो गई है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि ये संगठन आतंकी समूह लश्कर-ए-तैयबा को फंडिंग दे चुका है और एलन मस्क तक इसके खिलाफ आवाज उठा चुके हैं।
क्या है USAID
1960 में राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी द्वारा शुरू की गई अमेरिकी एजेंसी USAID का पूरा नाम ‘यूएस एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट’ है। कहने को अमेरिकी की सरकारी एजेंसी के तौर पर काम कर रहा यूएसएड अंतरराष्ट्रीय विकास और मानवीय सहायता के लिए जिम्मेदार है।
इसे लेकर मौजूद जानकारी बताती है कि ये विभिन्न देशों में स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, और लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए कार्यक्रम चलाता है और इसका इसका मुख्य उद्देश्य दुनिया भर में गरीबी को कम करना, आर्थिक विकास को बढ़ावा देना, और मानवता की भलाई के लिए काम करना है। दुनिया भर में इसके क़रीब 10,000 कर्मचारी हैं और इसका सालाना बजट क़रीब 40 अरब डॉलर है।
आतंकी संगठनों को देता है फंडिंग
इस संगठन को लेकर पड़ताल करने पर पता चलता है कि मानव विकास की दिशा में काम करने वाली ये एजेंसी उन आतंकी समूहों को भी पैसे देता था जिन्हें अमेरिका तक में टेरर ऑर्गनाइजेशन माना गया है।
इनमें हाफिज सईद का लश्कर-ए-तैयबा तो है ही, इसके अलावा फलाह-ए-पाकिस्तान जैसे संगठन भी हैं जिसे यही आतंकी चैरिटी संगठन के तौर पर चलाते हैं और इनके जरिए मदद प्राप्त करके अपनी आतंकी गतिविधियों को अंजाम देते हैं।
रिपोर्ट्स के मुताबिक फलाह-ए-पाकिस्तान का सीधा कनेक्शन आतंकी हाफिज सईद से है। साल 2010 में अमेरिकी विभाग उसे आतंकी संगठन भी घोषित कर चुका है, लेकिन बावजूद इसके USAID इतने समय से उसे फंड देने में लगा था। 2019 में आतंकी संगठन को यूएसएड ने 110,000 डॉलर की मदद दी थी।
एजेंसी ने साल 2021-23 से USAID ने हेल्पिंग हैंड फॉर रिलीफ एंड डेवलपमेंट (HHRD) को भी फंडिंग की है। HHRD, एक मिशिगन स्थित पाकिस्तानी संगठन है, जो लश्कर-ए-तैयबा और जमात-ए-इस्लामी से जुड़ा हुआ है।
#USAID & Jihad: Pak Terror group Lashkar Tayyaba's front Falah-e-Insaniyat was receiving funds through #USAID in the form of charities, though it was banned by the US government. The funds were used for carrying out subversive activities against India, according to IndiaToday. pic.twitter.com/lNxrR6uEqo
ये संगठन कुछ अन्य कार्यों के लिए भी विभिन्न देशों को मदद मुहैया कराता है। एलन मस्क की टाइमलाइन पर साझा ट्वीट के अनुसार इसने ग्वाटेमाला में सेक्स परिवर्तन और ‘एलजीबीटीक्यू एक्टिविज्म’ के लिए 2 मिलियन डॉलर की मदद की, जमाएका मे LGBT के कार्यों को सफल कराने के लिए 1.5 मिलियन डॉलर (13,13,61,049) दिए, अमेरिका में ही उद्यमों के जरिए LGBTQ समाज को समानता दिलाने के लिए 2 मिलियन डॉलर दिए और युगांडा में भी इन्हीं काम के लिए 5.5 मिलियन डॉलर दिए गए।
USAID has been completely unaccountable for decades, run by bureaucrats with agendas who believed they answered to nobody.
Here are a few more of the ridiculous projects on which they spent YOUR money:
— $7.9 million to teach Sri Lankan journalists how to avoid “binary-gendered… pic.twitter.com/c2LnxUelWn
रिपोर्ट्स बताती हैं कि यूएसएड कार्यक्रम के तहत करीबन 120 देशों में विभिन्न योजनाएँ चल रही हैं। साल 2023 में इस एजेंसी के कार्यक्रमों के तहत विभिन्न देशों और संस्थाओं को 72 अरब डॉलर की मदद की थी। इसके बंद होने की सूचना पाने के बाद पूर्व राष्ट्रपति बाइडन, ओबामा के प्रशासन में काम करने वाले अधिकारियों ने चिंता जाहिर की। तर्क दिया गया कि ये फैसला अमेरिका के लोगों के लिए नुकसान दायक होगा। इससे कई देशों को मदद मिलती है वो बंद हो जाएगी।
संस्थान के कर्मचारियों को घर लौटने का नोटिस
उल्लेखनीय है कि ट्रंप के इस फैसले के बाद यूएसएड में काम करने वालों को कार्यालय में घुसने से पहले ही वापस भेज दिया था और उनके लॉग-इन आईडी से उनका एक्सेस ले लेकर कहा गया शहर में एजेंसी के कार्यालय सप्ताह के शेष दिनों के लिए बंद रहेंगे। थोड़ी समय बाद यूएसएड की साइट भी ऑफलाइन हो गई। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक संस्थान में काम करने वालों को एक नोटिस देकर घर लौटने के लिए 30 दिन का समय दिया गया था।
एलन मस्क ने किया एजेंसी बंद करने का समर्थन
विदेशों में मदद करने के नाम पर चल रहा ये संगठन पिछले काफी दिनों से एलन मस्क के निशाने पर था। उन्होंने साफतौर पर इसे आपराधिक संगठन बताया था और इसकी तमाम खामियों को उजागर करते हुए कहा था कि ये ‘कट्टर वामपंथी सनकियों’ द्वारा संचालित किया जाता है।
इसके अलावा उन्होंने ये भी कहा था कि इस संस्था के जरिए अमेरिकी करदाताओं का पैसा बर्बाद किया जा रहा है, साथ ही साथ भ्रष्टाचार भी हो रहा है। अब जब डोनाल्ड ट्रंप ने इस पर ताला लगा दिया है तो मस्क इस फैसले का स्वागत कर रहे हैं