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असम में अब सौरभ दास की निर्मम हत्या, सेसा नदी में फेंकी लाश: रहीमुद्दीन, बहादुर अली समेत 3 गिरफ्तार

असम के डिब्रूगढ़ जिले के लेजाई में एक और हिन्दू युवक की हत्या के बाद तनाव फैल गया है। मृत युवक की पहचान सौरभ दास के रूप में हुई है। जानकारी के मुताबिक शुक्रवार (जून 19, 2020) रात बदमाशों ने सौरभ की हत्या कर लाश कथित तौर पर सेसा नदी में फेंक दी।

पुलिस ने हत्या के सिलसिले में रहीमुद्दीन अली और बहादुर शाह अली समेत तीन लोगों को गिरफ्तार किया है। उनसे पूछताछ की जा रही है।

स्थानीय लोगों के अनुसार, सौरभ की हत्या लव अफेयर संबंधी विवादों में हत्या की गई है। वहीं कुछ लोगों का कहना है कि सौरभ शुक्रवार यानी हत्या वाले दिन रहीमुद्दीन अहमद के घर गया था और उनके बीच गर्मागर्म बहस हो गई थी।

एक स्थानीय निवासी ने कहा, “यह एक पूर्व नियोजित हत्या है। हम घटना की उचित जाँच की माँग करते हैं। हम तब तक चुप नहीं रहेंगे, जब तक दोषियों को सख्त सजा नहीं मिल जाती।”

लेजाई के एक अन्य निवासी ने कहा, “हम अब ऐसी घटनाओं को बर्दाश्त नहीं करेंगे। हम दोषियों को मृत्युदंड देने की माँग करते हैं। अगर हमारी माँग पूरी नहीं हुई, तो हम आंदोलन तेज करेंगे।”

सौरभ दास की हत्या के विरोध में शनिवार (जून 20, 2020) को लेजाई क्षेत्र के निवासियों ने राष्ट्रीय राजमार्ग 37 को ब्लॉक कर दिया और टायर जलाकर विरोध दर्ज कराया। उत्तेजित भीड़ ने दोषियों को मृत्युदंड देने की माँग की।

इस बीच, डिब्रूगढ़ जिला प्रशासन ने लेजाई और बोर्डोइबाम क्षेत्रों में बिगड़ती कानून-व्यवस्था को देखते हुए जिले में धारा 144 लागू कर दी गई है। इस आदेश का उल्लंघन करना धारा 188 आईपीसी के तहत दंडनीय है।

गौरतलब है कि इससे पहले 22 मई को सनातन डेका की साइकिल दो युवकों की स्कूटी से टकराई और स्कूटी पर खरोंच आ गई थी। स्कूटी चालकों को वह मामूली सी खरोंच देखकर इतना गुस्सा आया कि पहले उन्होंने सनातन को खुद पीटा और फिर अपने तीन अन्य साथियों को बुलवाकर उसे इतना मारा कि उसकी मौके पर ही मौत हो गई। पुलिस ने इस मामले में फैजुल हक और युसूफउद्दीन अहमद को गिरफ्तार किया था।

इसके बाद 29 मई 2020 को 23 वर्षीय देबाशीष गोगोई की मॉब लिंचिंग करके हत्या कर दी गई थी। देबाशीष के पिता ने बताया कि उनकी आँखों के सामने ही उनके बेटे को मारा-पीटा जाता रहा। इस मामले में आसिफ नायक, अशोक सावरा, सचिन सावरा और राधेश्याम कुर्मी चौकीदार दीपक छाबरा को गिरफ्तार किया गया था। इसी तरह मुस्लिम युवकों ने रितुपर्णा नाम के युवक की दिनदहाड़े हत्या कर कर दी थी। मामले में दुलाल अली, इब्राहिम अली, इब्राहिम की अम्मी मनोवर खातुन, हुसैन अली और अरमान अली को गिरफ्तार किया गया था।

गालीबाज कर्मचारी पर एक्शन लेने की बात पर फेसबुक ने साधी चुप्पी, सवालों का जवाब देने से किया इनकार

सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के कारण ऑपइंडिया ने पिछले दिनों प्रशांत किशोर के साथ काम करने वाले सिद्धार्थ मजूमदार नाम के युवक पर रिपोर्ट की थी। खबर में हमने उस युवक का कनेक्शन न केवल प्रशांत किशोर से पाया, बल्कि ये भी बताया कि ट्विटर पर अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करने वाला यह युवक फेसबुक का ही कर्मचारी है।

इस खबर के बाद फेसबुक ने ऑपइंडिया की रिपोर्ट पर संज्ञान लिया। ऑपइंडिया की रिपोर्ट पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए फेसबुक ने हमसे बताया कि ऐसे मामलों को फेसबुक बेहद गंभीरता से लेता है। हालाँकि जब हमने उनसे आधिकारिक तौर पर संपर्क करके पूछा कि अब उस गालीबाज कर्मचारी के ऊपर क्या एक्शन लिया जाएगा, तो उन्होंने हमें ये बताने से मना कर दिया।

18 जून को ऑपइंडिया ने सिद्धार्थ मजूमदार पर अपनी रिपोर्ट में बताया था कि कैसे सिद्धार्थ अपने विरोधियों पर न्यायसहाय नाम के अपने अलग अकाउंट के जरिए अभद्र टिप्पणी करता है। कैसे एक के बाद एक सिरों को जोड़ते हुए हम उसकी हकीकत तक पहुँचे। हमने एक आर्टिकल के जरिए पहले उसका पुराना अकाउंट जाँचा, जो sid_mazumdar के नाम से ही था।

इसके बाद हम सिद्धार्थ के कुछ अन्य आर्टिकल्स तक पहुँचे। धीरे-धीरे पता चला कि वह Citizens for Accountable Governance का संस्थापक है और प्रशांत किशोर के साथ काम भी करता है। आगे की पड़ताल में हम उसके linkendIn के अकाउंट पर गए। यहाँ से हमें पता चला कि वह तो फेसबुक से जुड़ा हुआ है। वो भी पब्लिक पॉलिसी मैनेजर के पद पर।

इसके बाद सिद्धार्थ की हकीकत की सारी तस्वीर साफ होती गई। मालूम चला कि आखिर कैसे एक फेसबुक कर्मचारी दूसरे अकाउंट से भारतीयों को नीचा दिखाता है। मोदी सरकार का अपमान करता है और हिंदुओं की भावनाओं से ख़िलवाड़ करता है।

सारी सूचना इकट्ठा कर हमने सोशल मीडिया साइट से आधिकारिक तौर पर ई-मेल के जरिए संपर्क किया। पूछा कि देश की अखंडता को हानि पहुँचाने वाले अपने पब्लिक पॉलिसी मैनेजर के ख़िलाफ़ वे क्या एक्शन लेने वाले हैं?

ऑपइंडिया ने इस संबंध में फेसबुक 5 सवाल किए

  1. क्या फेसबुक को इस घटना के बारे में मालूम था?
  2. क्या सिद्धार्थ के फेसबुक से जुड़ने से लेकर अब तक उनके गाली वाले ट्वीट फेसबुक के लिए चिंता का कारण हैं? क्या फेसबुक उनके ख़िलाफ़ कोई लीगल एक्शन लेने की सोच रहा है?
  3. क्या फेसबुक को लगता है कि राजनीति में सक्रिय व्यक्ति अपने कार्यों का निर्वाहन करते हुए निष्पक्ष रह सकता है?
  4. ट्विटर पर इस बात पर जोर दिया गया है कि फेसबुक ऐसे गालीबाज और पक्षपाती कर्मचारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करे- क्या फेसबुक इसे लेकर कोई कार्रवाई करेगा?
  5. क्या फेसबुक के पास सोशल मीडिया के उपयोग के लिए कोई विशिष्ट नीति है जो उसके कर्मचारियों पर लागू होती है? यदि हाँ, तो नीति क्या है और सिद्धार्थ मजूमदार के आचरण से उस नीति का उल्लंघन होता है क्या?

मगर, हमारे सवालों का जवाब देने के बजाय उन्होंने ट्विटर पर एक छोटा सा बयान जारी कर दिया। इसमें उन्होंने लिखा कि ये मामला हमारे संज्ञान में आ चुका है। हम अपने सारे कर्मचारियों से नैतिक आचार संहित का पालन करने की उम्मीद करते हैं और फेसबुक इन मामलों को बहुत गंभीरता से लेता है।

फेसबुक प्रवक्ता की ओर से ये रिप्लाई पाने के बाद हमने बयान जारी करने वाले प्रवक्ता से ही बात करने का प्रयास किया। दरअसल, हम जानना चाहते थे कि क्या सिद्धार्थ के ख़िलाफ़ कोई जाँच होगी भी या उससे कोई सवाल भी पूछे जाएँगे?

हालाँकि, यहाँ फेसबुक ने हमारे पहले सवालों का जवाब देना मुनासिब नहीं समझा। लेकिन, दूसरी बार में जब एक्शन पर सवाल किया तो सफाई के तौर पर जवाब आया कि फेसबुक अपनी कार्रवाई को सार्वजनिक तौर पर नहीं बता सकता।

अब विचार योग्य बात ये है कि जिस फेसबुक ने हमारी रिपोर्ट को संज्ञान में लेते हुए बयान जारी किया कि फेसबुक ऐसे मामलों पर गंभीरता से लेता है, उसी फेसबुक में सिद्धार्थ मजूमदार अभी भी सार्वजनिक नीति प्रबंधक हैं। तो सवाल है कि ऐसी क्या कार्रवाई की जाने वाली है, जिसकी पुष्टि फेसबुक वर्तमान में नहीं कर सकता?

सिद्धार्थ मजूमदार का हालिया ट्वीट

सबसे दिलचस्प बात देखिए। हमारी रिपोर्ट के बाद और फेसबुक के संज्ञान में आने के बाद अब भी सिद्धार्थ मजूमदार लगातार ट्विटर पर जहर उगल रहा है और सुप्रीम कोर्ट जाकर एक स्वतंत्र जाँच आयोग की बात कर रहा है, क्योंकि उसे लगता है कि चीन के मामले में सरकार भ्रामक बयान दे रही है। अब देखना यही है कि क्या फेसबुक सभी चीजों की जानकारी होने के बावजूद भी उसपर एक्शन लेती है या फिर नहीं।

‘तुम्हारे लेख भड़काऊ और उत्तेजक हैं’: पत्रकारों पर FIR के बाद अब कॉन्ग्रेस ने फर्स्टपोस्ट को भेजा कानूनी नोटिस

अपने शासन वाले विभिन्न राज्यों में पत्रकारों के ख़िलाफ़ एफआईआर कराने वाली कॉन्ग्रेस ने अब फर्स्टपोस्ट को लीगल नोटिस भेजा है। मानहानि के क़ानूनी नोटिस में पार्टी ने आरोप लगाया है कि फर्स्टपोस्ट के लेख न सिर्फ़ उत्तेजक हैं, बल्कि भड़काऊ और समाज में वैमनस्य पैदा करने वाले हैं।

कॉन्ग्रेस के राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा ने कहा कि मीडिया को सत्ताधारी पार्टी का प्रवक्ता बनने से बचना चाहिए और अपनी लिमिट में रहना चाहिए। उन्होंने फर्स्टपोस्ट को लीगल नोटिस भेजे जाने की सूचना देते हुए ट्विटर पर पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम, कपिल सिब्बल और कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी को टैग किया। इसके बाद लोगों ने कॉन्ग्रेस पार्टी की ख़ासी आलोचना करते हुए कहा कि पार्टी फ्री स्पीच पर वार कर रही है।

पत्रकार अभिजीत मजूमदार ने कहा कि ये कॉन्ग्रेस की स्टाइल का ‘फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन’ है। साथ ही उन्होंने फर्स्टपोस्ट के लिए लिखे गए अपने उस लेख को भी शेयर किया, जिसमें उन्होंने कॉन्ग्रेस की तुलना एक ऐसे खानदानी अमीर व्यक्ति से की है जो भले ही ग़लत जॉब में घुस गया हो, लेकिन वो पब सर्किट में लोकप्रिय है और सोशल मीडिया पर भले उत्तेजक बातें लिख कर कमेंट कमाता हो, लेकिन ज़रूरत पड़ने पर उसे अपने फोन में एक अदद नंबर तक ढ़ूँढ़ने के लिए संघर्ष करना पड़ता है।

उन्होंने अपने इस लेख में ध्यान दिलाया कि किस तरह राहुल गाँधी ने एक घायल सैनिक के पिता का वीडियो शेयर कर नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा था। बाद में उनकी बेइज्जती तब हो गई जब सैनिक के पिता ने राहुल गाँधी को राजनीति न करने की सलाह दी। उन्होंने राहुल गाँधी द्वारा नरेंद्र मोदी को ‘सरेंडर मोदी’ बताए जाने का भी जिक्र किया। उन्होंने दिखाया कि किस तरह वो भारत विरोधी पक्ष ले रहे हैं।

हालाँकि, इस विषय में एडिटर्स गिल्ड ने कुछ नहीं कहा है। जब पत्रकार अर्नब गोस्वामी से मुंबई पुलिस ने 11 घंटे लगातार पूछताछ की थी, तब भी एडिटर्स गिल्ड ने चुप्पी साध ली थी। पश्चिम बंगाल में पत्रकारों पर हमले पर भी गिल्ड चुप ही रहता है। बता दें कि महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस सत्ताधारी पार्टी है। पत्रकार सुधीर चौधरी को मिल रही धमकियों और अमीश देवगन को मिली जान से मारने की धमकियों पर भी गिल्ड चुप रहा था।

ट्रांसजेंडर समुदाय को समर्पित होगा नोएडा सेक्टर-50 मेट्रो स्टेशन, मिलेगी नौकरी के साथ विशेष सुविधाएँ

नोएडा मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (NMRC) पूरे उत्तर भारत में एक अनोखी और सराहनीय पहल करने जा रहा है। इसके तहत नोएडा-ग्रेटर नोएडा की एक्वा लाइन मेट्रो के सेक्टर-50 स्टेशन को ट्रांसजेंडरों के लिए समर्पित किया जाएगा।

यहाँ ट्रांसजेंडर समुदाय को विशेष सुविधाएँ दी जाएँगी। रोजगार के अवसर दिए जाएँगे। ट्रांसजेंडर समुदाय की समाज में भागीदारी बढ़ाने के लिए मेट्रो स्टेशन पर टिकट काउंटर, हाउस कीपिंग सर्विस में भी ट्रांसजेंडर्स की ही तैनाती की जाएगी।

इसका उद्देश्य समाज में ट्रांसजेंडरों की भूमिका को बढ़ावा देना है। NMRC की निदेशक रितु माहेश्वरी ने बताया कि यह ट्रांसजेंडर स्टेशन भी पिंक स्टेशन की तर्ज पर होगा। पिंक स्टेशन का उद्घाटन 8 मार्च 2020 को किया गया था। जिसमें एनएमआरसी ने महिलाओं के लिए खास इंतजाम किए थे। इसी तर्ज पर सेक्टर-50 स्टेशन ट्रांसजेंडरों को समर्पित होगा। हालाँकि यह सभी प्रकार के यात्रियों के लिए खुला रहेगा।

उन्होंने बताया कि इस स्टेशन पर बने शौचालयों के स्ट्रक्चर में बदलाव किया जाएगा। साथ ही ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए अलग सुरक्षा जाँच पर भी विचार किया जा रहा है। उनका कहना है कि अगले एक महीने में नोएडा सेक्टर-50 मेट्रो स्टेशन ट्रांसजेंडर स्टेशन के रूप में तैयार हो जाएगा।

ट्रांसजेंडरों के लिए होंगी यह सुविधाएँ

  • एनएमआरसी द्वारा अपने स्टेशनों व ट्रेनों के अंदर सूचनाओं व घोषणाओं के जरिए ट्रांसजेंडर समुदाय के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाने की पहल की जाएगी।
  • नोएडा मेट्रो अपने स्टॉफ को ट्रांसजेंडर समुदाय से सौहार्दपूर्ण और संवेदनशील तरीके से व्यवहार करें। इसके लिए उन्हें प्रशिक्षित भी किया जाएगा।
  • एनएमआरसी टिकट काउंटरों व अन्य क्षेत्रों में ट्रांसजेंडर समुदाय की सहभागिता सुनिश्चित की जाएगी।
  • इसके लिए ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों को मेट्रो स्टाफ की तर्ज पर प्रशिक्षण दिया जाएगा।
  • इसके लिए विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों से बातचीत की जा रही है। ताकि ट्रांसजेंडर समुदाय की चुनौतियों को कम किया जा सके।

बता दें कि नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्वा मेट्रो लाइन ने इसी साल 8 मार्च को मेट्रो स्टेशन को महिलाओं को समर्पित करते हुए पिंक बनाया गया था। इस स्टेशन पर महिलाओं के लिए स्तनपान से लेकर सभी प्रकार की सुविधाएँ उपलब्ध हैं। इसके साथ ही यहाँ पर काफी संख्या में महिला कर्मचारी भी कार्यरत हैं।

रेजांग ला का युद्ध: जब 123 भारतीय जवानों ने 3000 चीनी सैनिकों को दी मात, 1300 की लाशें बिछा दी

कुछ लोगों ने भारत-चीन तनाव के बीच देश को डराने का ठेका ले रखा है। ये वो लोग हैं, जो चीन का गुणगान करते हुए उसे अजेय बताते हैं और भारत के बारे में ऐसे बात करते हैं जैसे हमारी सेना की शक्ति कुछ हो ही नहीं। ये वही लोग हैं, जो चाहते हैं कि आप 1962 भारत-चीन युद्ध में लद्दाख के रेजांग ला दर्रा के युद्ध को भूल जाएँ। वो चाहते हैं कि आप भारतीय सेना के गौरवमयी अतीत को भूल कर डर के साए में जिएँ।

रेजांग ला युद्ध उस लड़ाई की गाथा है, जिसके बारे में कई लोगों ने तो ये मानने से भी इनकार कर दिया था कि हमारी सेना ने इतनी बड़ी संख्या में चीनियों को मार गिराया होगा। ये युद्ध नवंबर 18, 1962 को हुआ था। 13 कुमाऊँ रेजिमेंट के मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में 123 सैनिक बहादुरी के प्रतिमान गढ़ इतिहास में दर्ज हो गए। कुछ ऐसा ही, जैसा सारागढ़ी किले को बचाने के लिए मुट्ठी भर सिख सैनिकों ने किया था।

रेजांग ला युद्ध में भारत के 6 सैनिक ही बच पाए, जिन्होंने समय-समय पर अपने अनुभवों और साथियों की बहादुरी से दुनिया को अवगत कराया। 13 कुमाऊँ रेजिमेंट की चार्ली कम्पनी ने चुसुल में मुस्तैद होकर चीनियों के आक्रमण को ध्वस्त किया, जिससे लद्दाख शेष भारत से अलग होने से बच गया। मेजर (रिटायर्ड) गौरव आर्या अपने ब्लॉग पर लिखते हैं कि 13 कुमाऊँ रेजिमेंट को बारामुला से युद्धस्थल पर भेजा गया था।

गन हिल, गुरुंग पहाड़ी और मुग्गेर पहाड़ियों पर विभिन्न बटालियनों को तैनात किया गया था। इसी तरह चार्ली कम्पनी को रेजांग ला का जिम्मा सौंपा गया था। हड्डी गला देने वाली ठंड, शीत लहर और पत्थरों के बीच हमारे जवान उस परिस्थिति में लड़े, जिसके वे आदी नहीं थे। समुद्र से 16,000 फ़ीट की ऊँचाई पर उनके पास न तो कवर था और न सपोर्ट के लिए कोई और दस्ता। सबसे पहले 9वें पलटन पर 350 चीनी सेना ने आक्रमण किया।

चीनी जैसे ही नजदीक पहुँचे, भारतीय सेना के जवानों ने ऐसा आक्रमण किया कि वहाँ केवल चीनी सैनिकों की ही लाशें नज़र आईं। मेजर शैतान सिंह एक पलटन से दूसरे पलटन तक घूम-घूम कर स्थिति की समीक्षा कर रहे थे और सैनिकों का हौसला बढ़ा रहे थे। कहते हैं कि उन्होंने ऐसा युद्ध किया था कि उन्हें अपने शरीर, अपनी सुरक्षा और अपने आसपास का कुछ भान ही नहीं था। हालाँकि, इस युद्ध में 7वें और 8वें पलटन का एक भी जवान जिन्दा नहीं बचा, सब बलिदान हो गए।

मेजर गौरव आर्या ने अपने ब्लॉग में चीनी सैनिकों की संख्या 3000 के करीब बताई है। हालॉंकि इस युद्ध में जीवित बचे सैनिकों के अनुसार चीनी 5-6 हजार की संख्या में थे। चीनियों के पास अत्याधुनिक हथियार थे और बैकअप के रूप में भी उन्होंने पूरी तैयारी की हुई थी। रामचंद्र यादव और निहाल सिंह उनमें से थे, जो जिन्दा बच गए। उन्होंने भारत-चीन 1962 युद्ध के 50 वर्ष पूरे होने के मौके पर ‘एनडीटीवी 24×7’ के शो ‘वॉक द टॉक’ में बताया था कि चूँकि कोई उनकी बातों का विश्वास ही नहीं कर रहा था कि उनलोगों ने चीनियों को इतनी भारी क्षति पहुँचाई है, उन्हें कोर्ट मार्शल किए जाने तक की धमकी दी गई थी।

यादव, शैतान सिंह के रेडियो मैन थे और निहाल लाइट मशीनगन के साथ उनके गार्ड थे। उन्होंने बताया था कि 50 साल बाद भी युद्ध के उन दृश्यों को याद कर उन्हें नींद नहीं आती। निहाल ने गोली लगने के बाद अपने मशीनगन को दूसरे सैनिकों को प्रयोग के लिए दे दिया।

चीनियों ने उन्हें बंकर से निकाल कर बँधक बना लिया था। हालाँकि, वो अँधेरे का फायदा उठा कर वहाँ से भाग निकले। भागने के बाद उन्हें चीनियों की फायरिंग की आवाज़ सुनाई दी थी।

वे दोनों कहते हैं कि भले ही राजस्थान के मेजर शैतान सिंह का नाम जो भी हो, वो भगवान से कम नहीं थे। उन दोनों ने इस बात की पुष्टि की थी कि उस दिन 114 जवानों ने 1300 चीनियों को मार गिराया था। अंत में दोनों सेनाओं के बीच ‘हैंड टू हैंड कॉम्बैट’ हुआ, लेकिन उसमें भी भारतीय सेना ने चीनियों के छक्के छुड़ा दिए थे। सबसे पहले पलटन 7 पर हमला किया गया था। वो ऊपर चढ़ना चाह रहे थे और उन्होंने सबसे आगे वाली पलटन 9 पर हमला नहीं किया, सीधा 7 पर किया।

वीर चक्र पाने वाले नाइक सिंह राम के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने अपने साथियों के साथ चाकू लेकर चीनी सैनिकों पर हमला बोला था। हालाँकि, चीनी सैनिकों ने बचाव की पूरी तैयारी कर रखी थी और चाकू या ब्लेड से बार-बार वार करने के बावजूद उनका बाल भी बाँका नहीं हो रहा था। इसके बाद राम सिंह ने चीनी सैनिकों का सिर पकड़ कर पत्थर पर मारना शुरू कर दिया। वो पहलवान भी थे और इस युद्ध में सिद्धहस्त थे।

रामचंद्र यादव ने ही बताया था कि उन्होंने मेजर शैतान सिंह की मृत्यु अपनी आँखों के सामने देखी थी। वो ऐसी घड़ी पहनते थे, जो नाड़ी की धड़कन के साथ चलती थी और उसके बंद होते ही घड़ी भी बंद। जब वो दिल्ली पहुँचे तो कमांडर ने ही उनकी बातों पर यकीन करने से इनकार कर दिया और उन्हें कोर्ट मार्शल की धमकी दी। कहते हैं, भारतीय सैनिकों का मृत शरीर वहाँ पड़ा हुआ था और वो नजारा बड़ा ही ह्रदय विदारक था।

किसी के हाथ में ग्रेनेड पड़ा हुआ था और वो बलिदान हो गया था। किसी ने मृत्यु के बाद भी हाथ से मशीनगन नहीं छोड़ा था। कइयों ने मरने के बाद भी मुट्ठी में चाकू जकड़े हुए थे। लेकिन, उन्होंने चीनियों को रोक लिया था और लद्दाख बच गया। चीनियों को सबसे पहले ऊपर आते हुए नाइक हुकुम चंद ने देखा था। रात के अँधेरे में आगे बढ़ते चीनियों को रोकने के लिए उन्होंने फायरिंग रेंज खोली और उनके मंसूबों को नाकाम कर उनकी पहली लाइन को ध्वस्त किया।

इस युद्ध के बाद लता मंगेशकर ने भी ‘एक-एक ने दस को मारा’ गाना गाकर बलिदानी जवानों को श्रद्धांजलि दी थी। रामचंद्र द्वारा सुनाए गए एक वाकए के अनुसार जब उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण के आशीर्वाद से वो लड़ेंगे तो मेजर शैतान सिंह ने कहा कि उनका सरनेम भाटी है तो क्या हुआ, वो भी एक यादव हैं और उसी जज्बे से लड़ रहे हैं। वो इसी तरह सारे जवानों का आत्मविश्वास को मजबूत किया करते थे।

इसीलिए, जब भी कोई आपके सामने चीन को अजेय बताए, तो उसे रेजांग ला याद दिलाएँ। जब कोई चीनी सैनिकों का डर दिखाए तो उसे मेजर शैतान सिंह और कुमाऊँ रेजिमेंट द्वारा लद्दाख को बचाने के लिए किए गए युद्ध की याद दिलाएँ। उन्हें बताएँ कि जब भारत-चीन युद्ध में हमारी हार की बात होती है, तो इस मोर्चे पर चीन कितनी बुरी तरह परास्त हुआ था, ये भी बच्चों को पढ़ाया जाना चाहिए।

हिन्दुओं की हुई जीत: सुप्रीम कोर्ट ने दी जगन्नाथ रथ यात्रा को इजाजत, पहले लगाई थी रोक

सुप्रीम कोर्ट ने पुरी में होने वाली जगन्नाथ रथ यात्रा पर अपने पिछले आदेश में लगाई गई रोक को हटा लिया है। यानी कल (23 जून 2020 को) पुरी में भगवान जगन्नाथ की पारंपरिक व ऐतिहासिक रथ यात्रा निकलेगी। सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए मंदिर कमिटी, राज्य व केंद्र सरकार को समन्वय बना कर करने को कहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने आज (22 जून, 2020) ओडिशा के पुरी में जगन्नाथ रथ यात्रा पर रोक संबंधी आदेश में संशोधन करने के अनुरोध पर सुनवाई की। केंद्र की ओर से मामले का विशेष उल्लेख सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने किया। उन्होंने यहाँ कुछ प्रतिबंधों के साथ रथयात्रा की अनुमित देने का अनुरोध किया।

जगन्नाथ पुरी में भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा मामले में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यह रथयात्रा सदियों पुरानी है और इसे रोकना ठीक नहीं होगा। उन्होंने कोर्ट के समक्ष इस मामले में कुछ शर्तों और हिदायतों के साथ पूर्व के आदेश में संशोधन का आग्रह किया।

न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने मामले का उल्लेख करते हुए सॉलिस्टर जनरल तुषार मेहता ने कहा, “यह कई करोड़ लोगों की आस्था का मामला है। अगर भगवान जगन्नाथ को कल बाहर नहीं लाया गया तो परंपरा के मुताबिक उन्हें अगले 12 साल तक बाहर नहीं निकाला जा सकता है।” इस पीठ में दोपहर बाद मुख्य न्यायधीश भी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जुड़ गए।

सॉलिस्टर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि इस रथयात्रा में कवल उन लोगों का चयन होगा, जिनका कोरोना टेस्ट नेगेटिव आया हो और वे भगवान जगन्नाथ मंदिर में सेवायत के रूप में काम कर रहे हों। उन्होंने बताया कि भीड़ को रोकने के लिए राज्य सरकार कर्फ्यू लगा सकती है। हालातों को देखते हुए कदम उठाए जा सकते हैं और जन भागीदारी के बिना रथ यात्रा आयोजित हो सकती है।

वहीं, ओडिशा सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने भी केंद्र की दलील का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि अगर याचिकाकर्ता पूरे एहतियात के साथ रथयात्रा आयोजित करते हैं, तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। जिसके बाद जस्टिस मिश्रा ने कहा कि वह सभी मामलों की सुनवाई के बाद भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श लेकर आदेश में संशोधन के मामले पर विचार करेंगे।

इसके बाद चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया नागपुर से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए इस मामले पर सुनवाई के लिए जुड़े। 18 जून के आदेश के मामले में संशोधन की माँग वाले मामले की अध्यक्षता इसके बाद CJI ने ही की।

गौरतलब है कि इससे पहले 18 जून को कोरोना वायरस की महामारी को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 23 जून को पुरी (ओडिशा) के जगन्नाथ मंदिर में होने वाली वार्षिक रथ यात्रा पर रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर हमने इस साल रथयात्रा की इजाजत दे दी तो भगवान जगन्नाथ हमें माफ नहीं करेंगे।

इसके बाद पुरी के राजा गजपति दिब्यसिंह ने शनिवार (जून 20, 2020) को मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को पत्र लिख कर रथ यात्रा को अनुमति देने के लिए अपने आदेश को संशोधित करने के लिए तत्काल सुप्रीम कोर्ट का रूख करने की अपील की थी। वहीं भाजपा ने भी दिब्यसिंह देब के प्रस्ताव के अनुसार कदम उठाने की अपील की थी। उन्होंने कहा कि ओडिशा सरकार को पुरी शंकराचार्य से भी चर्चा करनी चाहिए।

यहाँ बता दें कि भुवनेश्वर के ओडिशा विकास परिषद एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन दायर कर इस मामले को उठाया था। उन्होंने अपनी दायर में कहा ता कि रथयात्रा से कोरोना फैलने का खतरा हो सकता है। इसमें कहा गया था कि अगर लोगों की सेहत को ध्यान में रखकर कोर्ट दीपावली पर पटाखे जलाने पर रोक लगा सकता है तो फिर रथयात्रा पर रोक क्यों नहीं लगाई जा सकती?

बाँधों के मरम्मत कार्य को रोक रहा नेपाल, बिहार के बड़े हिस्से में बाढ़ का खतरा

भारत के साथ सीमा विवाद के बीच नेपाल सरकार बिहार को परेशान कर रही है। नेपाल सरकार ने पूर्वी चम्पारण के ढाका अनुमंडल में लाल बकेया नदी पर बन रहे तटबंध के पुर्निर्माण कार्य को रोक दिया है। बिहार के जल संसाधन मंत्री संजय कुमार झा ने बताया कि नेपाल गंडक बांध के लिए मरम्मत कार्य की अनुमति नहीं दे रहा है।

उन्होंने कहा कि इसके अलावा नेपाल ने कई अन्य स्थानों पर मरम्मत का काम रोक दिया है। जल संसाधन मंत्री ने कहा, “पहली बार हम लोग इस तरह की समस्या का सामना कर रहे हैं। हम मरम्मत कार्य के लिए सामग्री तक नहीं पहुँचा पा रहे हैं। हमारे स्थानीय इंजीनियर और डीएम संबंधित अधिकारियों के साथ बातचीत कर रहे हैं और अब मैं मौजूदा स्थिति के बारे में विदेश मंत्रालय को पत्र लिखूँगा।”

उन्होंने आगे कहा कि यदि इस मुद्दे को समय पर नहीं देखा गया तो बिहार के बड़े हिस्से में बाढ़ आ जाएगी। संजय झा ने कहा कि अगर हमारे इंजीनियरों के पास बाढ़ से लड़ने वाली सामग्री नहीं पहुँचेगी तो बाँध की मरम्मत का काम प्रभावित होगा। अगर नेपाल में भारी वर्षा के कारण गंडक नदी का जल स्तर बढ़ता है तो यह एक गंभीर समस्या पैदा कर देगा।

संजय कुमार झा ने कहा कि गंडक बैराज के 36 गेट हैं, जिनमें से 18 नेपाल साइड में हैं। उसमें उन्होंने बैरियर लगा रखे हैं जो आजतक कभी नहीं हुआ। आगे बाढ़ का समय है उस तरफ बिहार सरकार ही जाकर बाँध को ठीक करती है। नेपाल सरकार बाँध मरम्मत के लिए सामग्री नहीं ले जाने दे रही है। कल भी बाँध से 1.5 लाख क्यूसेक पानी छोड़ा गया था। यदि बाढ़ से लड़ने वाली सामग्री और हमारे अधिकारी वहाँ नहीं जा पाते हैं, तो उस स्थिति में गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है।

इसी तरह नेपाल ने पूर्वी चंपारण जिले के गुवारी गाँव में लालबकेया नदी के दाहिने तटबंध पर चल रहे मरम्मत और कटावरोधी कार्यों पर रोक लगा दी है। ललबकेया नदी ‘नो मैंस लैंड’ का हिस्सा है। यह बाँध 20 सालों से है। बिहार ने नदी के ऊपर तटबंध का निर्माण किया था और मानसून से पहले हर साल किलेबंदी का काम करता था। मंत्री के अनुसार उन्हें कभी नेपाल से ऐसी आपत्तियों का सामना नहीं करना पड़ा।

उन्होंने कहा, “मरम्मत का काम पिछले साल तक बिना किसी समस्या के हुआ करता था। इस बार वे ऐसा नहीं होने दे रहे हैं। मधुबनी के जयनगर में कमला नदी के ऊपर भी वे हमें मरम्मत करने नहीं दे रहे हैं।” मंत्री ने यह भी कहा कि स्थानीय इंजीनियर और जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) इस मुद्दे को सुलझाने के लिए प्रशासन के साथ बातचीत कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि वह इस मामले को उच्च अधिकारियों के सामने उठाएँगे। संजय झा ने कहा, “मैं उन्हें इस मुद्दे से अवगत कराने के लिए तुरंत विदेश मंत्रालय को एक पत्र लिखूँगा। अगर जल्द ही इसका हल नहीं किया गया तो बिहार का एक बड़ा हिस्सा बारिश के मौसम में बाढ़ में बह जाएगा।”

कोरोना के कारण इस बार काँवड़ यात्रा नहीं, 3 राज्यों के CM ने आपसी सहमति से लिया फैसला

कोरोना संक्रमण के मद्देनजर काँवड़ यात्रा को इस वर्ष उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने रद्द करने का फैसला किया है। सीएम योगी ने यह फैसला 20 जून को हरियाणा के सीएम मनोहर लाल खट्टर और उत्तराखंड के सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग पर बात करने के बाद लिया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मुख्यमंत्री के पास यह प्रस्ताव साधु संतों व धार्मिक गुरुओं के जरिए आया था। तीनों मुख्यमंत्री की बैठक के बाद इसे मँजूरी मिल गई।

इस निर्णय के बाद सीएम योगी आदित्यनाथ ने सभी जोनल महानिदेशकों और सभी जोनल कमिश्नरों को अपने-अपने क्षेत्रों में प्रोटोकॉल लागू कराने का निर्देश दे दिया है। जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि एक स्थान पर पाँच से अधिक लोग इकट्ठे न हों।

बता दें, सीएम ने इस दौरान स्थानीय धर्मगुरुओं व काँवड़ यूनियन और शांति कमेटी से भी बात की। साथ ही लोगों को इस निर्णय के बारे में सूचित करने व इसका पालन करने के लिए भी कहने को कहा गया। इसके अलावा सीएम ने अगस्त में आने वाली बकरीद को लेकर भी निर्देश दिया कि उस समय भी 5 से ज्यादा लोग इकट्ठा नहीं होंगे।

उल्लेखनीय है कि हर वर्ष सावन के महीने में काँवड़ यात्रा का विशेष महत्व होता है। लाखों श्रद्धालु अपने घरों से इस यात्रा के लिए निकलते हैं और शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं। ऐसे में जगह-जगह इन श्रद्धालुओं के रुकने का इंतजाम, खाने-पीने का इंतजाम सरकार को करना पड़ता है।

इस बार आशंका है कि यदि ऐसा कोई आयोजन होता है, तो उससे संक्रमण काबू होने की बजाय और बढ़ेगा। काँवड़ यात्रा में इकट्ठा हुई भीड़ में सोशल डिस्टेंसिंग सुनिश्चित करवा पाना बहुत मुश्किल होता है। इसलिए, इस वर्ष धार्मिक गुरुओं की सलाह को देखते हुए इसे स्थगित करने का फैसला किया गया है।

चीन ने धोखे से हड़प लिया नेपाल का गाँव, बॉर्डर पोस्ट हटा दिए, तिब्बत का बना दिया हिस्सा

भारत के साथ कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा जैसे क्षेत्रों के लिए आपसी संबंध बिगाड़ने वाले नेपाल को लेकर खबर है कि उसके एक गाँव पर चीन ने कब्जा जमा लिया है। चीन ने नेपाल के गोरखा जिले के रुई गाँव पर कब्जा किया है। अब ये हिस्सा चीन के स्वायत्त क्षेत्र तिब्बत के कब्जे में आ चुका है। मगर, नेपाल सरकार इस सच्चाई को बताने से गुरेज कर रही है।

रुई नामक इस गाँव को भले ही नेपाल अब भी अपने मैप में दर्शा रहा है, लेकिन ये पूर्ण रूप से चीन के कब्जे में है। चीन ने वहाँ अपना व्यापार स्थापित करने के लिए सभी सीमाओं को हटा दिया है।

न्यूज 24 की रिपोर्ट के अनुसार, रुई गाँव में केवल 72 घर हैं। लेकिन, नेपाल सरकार की घोर लापरवाही और उच्च अधिकारियों की उदासीनता की वजह से चीनियों ने घुसपैठ करते हुए इस पर कब्‍जा कर लिया। करीब 60 साल तक नेपाल सरकार के अधीन रहने वाले रुई गाँव के गोरखा अब चीन के दमनकारी शासन के अधीन हो गए। नेपाली अखबार अन्‍नपूर्णा पोस्‍ट के मुताबिक रुई गाँव वर्ष 2017 से तिब्‍बत के स्‍वायत्‍त क्षेत्र का हिस्‍सा है। 

भू-राजस्व कार्यालय गोरखा के अनुसार, कार्यालय के पास अभी भी रुई गाँव के निवासियों से एकत्र राजस्व का रिकॉर्ड है। रुई भोट क्षेत्रों के निवासियों द्वारा भुगतान किए गए राजस्व का विवरण भूमि राजस्व कार्यालय में अभी भी फ़ाइल संख्या एक में सुरक्षित है।

रिपोर्ट के मुताबिक, भूमि राजस्व कार्यालय गोरखा के एक सहायक कर्मचारी ने बताया, “कार्यालय के रिकॉर्ड अनुभाग में अथारा साया खोले से रुई भोट तक के लोगों द्वारा प्रस्तुत राजस्व का रिकॉर्ड है।”

इतिहासकार रमेश धुंगल इस संबंध में कहते हैं कि रुई और तेइगा गाँव गोरखा जिले के उत्तरी भाग में थे। धुंगल के अनुसार, “रुई गाँव नेपाल का हिस्सा है। न तो नेपाल ने इसे युद्ध में खोया और न ही यह तिब्बत से संबंधित किसी विशेष समझौते या अनुबंध के अधीन था। पिलर को ठीक करने के समय में हुई लापरवाही के कारण नेपाल ने रुई और तेघा दोनों गाँव खो दिए।”

इसी प्रकार, चूमुबरी ग्रामीण नगर पालिका वार्ड नंबर 1 के वार्ड अध्यक्ष बीर बहादुर लामा दावे के साथ कहते हैं कि रुई गाँव सहित क्षेत्र गोरखा का हिस्सा था और वहाँ के निवासी नेपाल सरकार को राजस्व जमा करते थे, लेकिन अब वे तिब्बत के निवासी बन गए हैं।

उन्‍होंने कहा कि कुछ भ्रष्ट नेपाली अधिकारियों की सहमति से 35 नंबर पिलर को समदो और रुई गाँव के बीच की सीमा तय कर दिया गया। इससे पूरा गाँव चीनी नियंत्रण में आ गया। साम गाँव, सामडो और रुई की भाषा, संस्कृति और परंपराएँ एक जैसी हैं और प्रार्थना की जगह भी एक ही है।

लामा कहते हैं, “कई लोग तिब्बत में शामिल नहीं होना चाहते थे और इसके बजाय समडो भाग गए। उनके पास ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दस्तावेज थे जो 1000-1200 वर्ष पुराने थे। उन्होंने यहाँ अपने पूजा स्थल बनाए। पवित्र स्थलों में अभी भी मल्ल राजाओं के दो ऐतिहासिक देवताओं आदित्य मल्ल और पुण्य मल्ल के ऐतिहासिक प्रमाण मौजूद हैं।”

वहीं, नेपाली इतिहासकार धुंगेल इस कब्जे को नेपाल सरकार की बड़ी लापरवाही मानते हैं। वे कहते हैं, “भारत की सीमा में आना-जाना बहुत आसान है। लोग इसके चारों ओर घूमते हैं। इसलिए भारत के साथ सीमा के मुद्दे सभी को दिखाई दे रहे हैं, लेकिन उत्तरी सीमा में तिब्बत की सीमा से लगे इलाके में नेपाल का हाल बहुत ही खराब है।”

गौरतलब है कि पिछले महीने लिपुलेख से धारचूला तक सड़क का उद्घाटन होने के बाद से नेपाल दावे कर रहा है कि कालापानी क्षेत्र (पिथौरागढ़ जिला) पर नेपाल का ‘निर्विवाद रूप से’ हक है। इसके मद्देनजर उसने नया नक्शा भी पास कर दिया। लेकिन, नेपाल के इस कदम के पीछे भी पिछले दिनों चीन कनेक्शन निकलकर सामने आया था।

दरअसल, खुफिया एजेंसियों को मालूम चला था कि नेपाल में चीन की युवा राजदूत होऊ यांगी ने इसमें अहम भूमिका निभाई और भारत के खिलाफ बड़ा कदम उठाने के लिए प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को तैयार किया। इसी के बाद ओली ने ऐसी रूपरेखा तैयार की और राष्ट्रीय मानचित्र के विस्तार के इस प्रस्ताव पर विपक्षी नेपाली कॉन्ग्रेस भी सरकार के साथ आ गई।

सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या पर सलमान के बाद अरबाज खान का ट्वीट, लिखा – ‘खाली दिमाग, शैतान का घर’

अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या को लेकर बॉलीवुड कलाकर सलमान खान द्वारा किए गए ट्वीट के बाद अरबाज खान ने भी एक ट्वीट किया है। इसमें अरबाज खान ने लिखा है, “खाली दिमाग, शैतान का घर।” इस ट्वीट के बाद अरबाज खान सोशल मीडिया पर जमकर ट्रोल हो रहे हैं।

सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद से ही उनके प्रशंसक सलमान खान और खान फैमिली पर फिल्म इंडस्ट्री में भाई-भतीजावाद को बढ़ावा देने का आरोप लग रहे हैं।

सोशल मीडिया पर सलमान की हो रही तीखी आलोचना को लेकर उनके अभिनेता भाई अरबाज खान ने एक ट्विट करते हुए लिखा, “खाली दिमाग शैतान का घर है। यह अंग्रेजी कहावत हमने स्कूल में पढ़ी थी। मैं तब इसका गहरा अर्थ समझने के लिए बहुत छोटा था, लेकिन आज हमारे चारों तरफ जो कुछ भी हो रहा है, उसे देखते हुए, अब यह पुरानी कहावत अब पूरी तरह से समझ में आ रही है।”

अरबाज खान द्वारा किया गया ट्वीट

इससे पहले शनिवार (20 जून, 2020) को फिल्म अभिनेता सलमान खान ने सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद अपने ऊपर लग रहे आरोपों पर ट्वीट के जरिए अपने प्रशंसकों से अनुरोध किया था कि वे उनके खिलाफ जारी नाराजगी के बीच खुद को शांत रखें।

दरअसल निर्देशक अभिनव कश्यप ने एक पोस्ट के माध्यम से अरबाज खान को निशाना बनाया था। साथ ही अभिनव कश्यप ने आरोप लगाया था कि सलमान खान और उनके परिवार ने उन्हें धमकाया है और फिल्म इंडस्ट्री के दबाव का उपयोग कर उनके करियर के साथ छेड़छाड़ की है। उन्होने आरोप लगाते हुए कहा था कि 2010 की फिल्म दबंग के निर्देशन के बाद सलमान खान और उनके भाइयों ने उनके कई प्रोजेक्ट्स के साथ छेड़छाड़ की थी।

उन्होंने दावा करते हुए कहा था, “दस साल पहले मैं ‘दबंग 2’ बनाने से दूर इसलिए हुआ था क्योंकि अरबाज खान और सोहेल खान अपने परिवार की मिलीभगत से मुझे धमका रहे थे और मेरे करियर को कंट्रोल करने की कोशिश कर रहे थे। अरबाज खान ने श्री अष्टविनायक फिल्म्स के साथ मेरे दूसरे प्रोजेक्ट में भी छेड़छाड़ की थी।”

अभिनव कश्यप ने यह भी आरोप लगाया था कि राज मेहता को फोन करके उनके साथ (अभिनव) फिल्म बनाने पर उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी गई थी। इतना ही नहीं, इसके बाद अभिनव कश्यप को श्री अष्टविनायक फिल्म को साइनिंग अमाउंट लौटानी पड़ी और ऐसा उनके साथ वायकॉम पिक्चर्स के साथ भी हुआ था।

आपको बता दें कि पिछले रविवार (14 जून, 2020) को बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत ने मुंबई स्थित अपने आवास पर आत्महत्या कर ली थी। इसके बाद से सुशांत की मौत को लेकर फिल्म इंडस्ट्री के लोग एक दूसरे को उनकी मौत का जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।