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नदी से निकाल रहे थे रेत, निकला ऐतिहासिक शिव मंदिर: भगवान परशुराम से इस मंदिर के अभिषेक का अनुमान

आँध्र प्रदेश के नेल्लोर में मंगलवार (जून 16, 2020) को पेरुमलापाडु गाँव (Perumallapadu village) के पास पेन्ना नदी तल में रेत खनन के दौरान एक मंदिर जैसी संरचना नजर आई है। लोगों का दावा है कि यह 200 वर्ष पुराना शिव मंदिर है।

उनके अनुसार, साइट की एक विस्तृत जाँच की जाएगी और इसे भावी पीढ़ी के लिए संरक्षित करने के लिए कदम उठाए जाएँगे।

वहीं एंडोस्मेंट असिस्टेंट कमिश्नर वी रवीन्द्र रेड्डी कहते हैं कि मंदिर की बात सामने आने के बाद विभाग जल्द ही स्थानीय लोगों की इच्छा अनुसार मंदिर के नवीनीकरण के लिए कदम उठाएगा।

गौरतलब है कि इससे पहले ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर के नयागढ़ जिले में महानदी के जल में 500 साल पुराने गोपीनाथ मंदिर के अवशेष दिखाई दिए थे। स्थानीयों ने कहा था कि जल में लीन हो चुके इस मंदिर के दर्शन 11 साल पहले हुए थे। इसके बाद इसके अग्र भाग के दर्शन पानी का स्तर कम होने से अब फिर हुए हैं।

गोपीनाथ मंदिर के अग्र भाग दिखने के बाद इसे INTACH की महानदी वैली हेरिटेज साइट्स डॉक्यूमेंटेशन प्रोजेक्ट का हिस्सा बनाया गया था। एक स्थानीय ने बताया था कि सन् 1933 में उनका गाँव सम्पूर्ण रूप से नदी में विलीन हो गया था। उस समय उनकी उम्र 6 साल थी। तब उनके पाँच भाई-बहनों ने पद्मवती यूपी स्कूल में शरण ली थी। उस साल बाढ़ आने के साथ नदी अपनी धारा बदलकर सबके लिए काल बन गई थी।

वहीं, प्रोजेक्ट सचिव ने ओडिशा में जलमग्न हुए मंदिरों के बारे में जानकारी देते हुए बताया था कि ओडिशा में ऐसे बहुत से मंदिर हैं, जो पानी में डूबे हुए हैं। इसमें हीराकुद जलभंडार में 65 मंदिर शामिल हैं। नदियों में भी बहुत से मंदिर समाहित हैं, जिनका सर्वे होना चाहिए। कुछ मंदिर अभी भी खड़े हैं और कुछ ढह गए हैं। मॉडल के तौर पर गोपीनाथ मंदिर को पुन: महानदी से निकालकर जमीन में स्थापित किया जाना चाहिए। 

लद्दाख में चीन की कहानी और वो लोग जो हँसते हुए सवाल पूछ रहे हैं

लद्दाख के गलवान घाटी में जो हुआ वो संक्षेप में कुछ यूँ है कि जब दोनों ही सेनाओं के सीनियर अफसरों के बीच, सेना को पीछे ले जाने पर समझौता हो गया, तो कुछ भारतीय सेना के जवान और अफसरों ने, बिना किसी हथियार के चीनी सैनिकों द्वारा बनाए गए कैंप की तरफ जा कर हटने को कहा।

चीनी सैनिकों ने इस बात पर पत्थरबाजी कर दी और कमाडिंग ऑफिसर, कर्नल संतोष समेत भारतीय पार्टी पर कँटीले तारों से लिपटे डंडे आदि से बुरी तरह हमला किया। जब तक भारतीय खेमे तक बात पहुँचती, भारतीय सैनिकों को चीनी सेना के दूसरे कैंप से आए सैनिकों ने घेर लिया था। कर्नल संतोष वीरगति को प्राप्त हुए।

दोनों तरफ से झड़प लड़ाई चलती रही और यह बड़े इलाके में फैल गई। घाटी के नीचे तेज बहती नदी में कई जवान गिरे और दोनों ही तरफ से सैनिक बलिदान हुए। बाद में 17 घायल सैनिकों ने भयावह ठंढ और ऑक्सीजन की कमी वाली इस ऊँचाई पर अपने जख्मों से लड़ते हुए अंतिम साँस ली।

चीन ने अभी तक आधिकारिक आँकड़ा नहीं दिया है और उसकी प्रोपेगेंडा साइट यह बताने में लगी हुई है कि भारत ही उनके इलाके में घुस आया था और चीन की सेना डरपोक नहीं है, मुँहतोड़ जवाब देगी। अलग-अलग सूत्रों से पता लगा है कि चीन के कम से कम 43 जवान मरे हैं और यह संख्या बढ़ भी सकती है। भारत के जो 20 जवान वीरगति को प्राप्त हुए, वह भी ज्यादा हो सकती है।

भारत की सेना पर कुछ लोग उँगली उठा रहे हैं, राष्ट्र के नेतृत्व पर चटकारे ले कर सवाल पूछे जा रहे हैं।

सवाल पूछने में समस्या नहीं है, वो हमारा अधिकार है क्योंकि हमने सरकार चुनी है। लेकिन बात यह कि सवाल पूछने वाले लोग दो तरह के हैं। एक वो हैं जो इससे व्यथित हैं कि आखिर ये हो कैसे रहा है, भारत क्या कर रहा है, इसका कोई समाधान क्यों नहीं। दूसरे वो हैं जो पूछ रहे हैं कि कहाँ है 56 इंच का सीना। इनके सवाल में एक अश्लील हँसी बंद है, जो सवाल सिर्फ इसलिए पूछ रहा ताकि वो जता सके कि तुमने चीन का क्या बिगाड़ लिया, तुम तो कमजोर हो।

पहली तरह के लोगों का सवाल जायज है, और निराशा से उपजा है। यह निराशा कई कारणों से हो सकती है। कई बार हमें पता नहीं होता कि सीमावर्ती इलाके की चौकसी कैसे होती है, वहाँ की जमीनी सच्चाई क्या है, सेनाएँ काम कैसे करती हैं आदि। एक कारण यह हो सकता है कि सैनिकों के हताहत होने की खबर से एक नागरिक के तौर पर हम उद्विग्न होते हैं। एक कारण यह हो सकता है कि इतने सैन्य उपकरण खरीदने के बाद भी हम कमज़ोर क्यों दिखते हैं।

इस पर जवाब देने से पहले, उन दुरात्माओं पर टिप्पणी आवश्यक है जिनकी आँखों में भारतीय सेना पर हुए हर हमले के बाद एक अलग चमक दिखती है। इनके सवालों के पीछे दर्द नहीं होता, वेदना नहीं होती, बल्कि एक उपहास भरा तंज होता है। वो सवाल पूछते हुए जवाब दे रहे होते हैं कि भारत एक राष्ट्र के नाम पर बेकार है, और हमारी सेना किसी काम की नहीं।

ऐसे लोग चीन से पैसे भी लेते हैं, हथियारों के दलाल भी होते हैं, और वर्तमान सरकार के विरोध में किसी भी हद तक गिरने को तैयार हैं। इन्हें इस बात से मतलब नहीं है कि इनके कुकर्मों से सेना का मनोबल गिरेगा और लोगों में सामूहिक निराशा देखने को मिलेगी, जो कि सही नहीं।

यह निराशा की भावना पिछली सरकारों के समय से ही है जब चीन या पाकिस्तान किसी भी दर्जे की हरकत कर के निकल जाता था और भारतीय सेना के हाथ राजनैतिक कारणों से बँधे होते थे। आम जनता ने स्वयं के राष्ट्र को पाकिस्तान से भी ओछा मानना शुरू कर दिया क्योंकि हमेशा उसके द्वारा पोषित आतंकवाद ने हमारे देश को तबाह किया, घुसपैठिए आते रहे और सीमा पर हमारे सैनिकों की हत्या होती रही।

यह निराशा इस स्तर की हो चुकी है कि आम आदमी सरकार और सेना, दोनों पर ही, संदेह करने लगता है कि वो जो भी बोलेंगे, झूठ बोलेंगे और चीन ने तो भारत को बुरी तरह से पराजित किया है, जो कि ये बताना नहीं चाहते। इन लोगों को अपनी सेना द्वारा जवाब देने की घटना गलत और किसी तथाकथित रक्षा जानकार की बात सही लगने लगती है।

सरकार क्या कर रही है?

सरकार बहुत कुछ कर रही है, और हर बात पब्लिक में नहीं बताई जाती। जो बातें पब्लिक में हैं उनमें से एक है कि भारत अपनी सीमा पर, अपने इलाके में लगातार सैन्य ढाँचे बनाए जा रहा है। सड़कें और एयरस्ट्रिप बन रही हैं। मिलिट्री स्तर से ले कर रक्षा मंत्रालय और विदेश मंत्रालय के स्तर पर बातचीत जारी है।

कुछ लोग ‘बातचीत’ की बात पर हँसने लगते हैं, इसे कायरता मानते हैं। शायद इन्हीं लोगों के कारण सैनिकों की जानें जाती हैं। एक ग़ैरज़िम्मेदार नागरिक की तरह हमने अपनी सेना या सरकारों पर इतना दवाब बना दिया है, हमारी आशा ऐसी हो गई है कि सीमा पर कोई भी विवाद हो, हमारी इच्छा सीधे युद्ध की होती है।

युद्ध न तो संभव है, न करना चाहिए क्योंकि वहाँ लाशें हर दिन गिरेंगी, आर्थिक नुकसान इतना होगा कि हम पाँच साल पीछे चले जाएँगे। आपको क्या लगता है कि इन बीस बलिदानियों का कोई मोल नहीं? क्या आप यह नहीं चाहेंगे कि भले ही चीनी सेना दो दिन बाद वापस जाती, लेकिन यह रक्तपात न होता तो बेहतर रहता?

चीनी सेना कई कारणों से बदमाशी कर रही है। उसके देश के राजनैतिक हालात खराब हैं। उसने कई बार इस तरह की बातें की हैं जब वो भारतीय सीमा में घुस आते हैं। ये वो तब करते हैं जब उन्हें अपने राष्ट्र को यह दिखाना होता है कि वो तो दुनिया में किसी की नहीं सुनते। एक तानाशाही सरकार अपनी सैन्य क्षमता का तमाशा बनाने के लिए कई बार ऐसा कर चुकी है, फिर वापस चली जाती है।

चीन ने न तो ऐसा पहली बार किया है, न आखिरी बार। लेकिन हाँ डोकलाम से गलवान तक, उन्हें वैसा जवाब मिला जैसा उन्होंने सोचा नहीं था। इस बार लाशों की गिनती पर उनकी चुप्पी बताती है कि उनको कैसा झटका लगा है, बीजिंग से कुछ स्वतंत्र पत्रकार बता रहे हैं कि अस्पतालों में लगातार लाशें आ रही हैं, और उन्हें लगातार ‘जलाया’ जा रहा है।

बातचीत ही एकमात्र उपाय क्यों?

बातचीत एकमात्र उपाय इसलिए हो जाता है क्योंकि दूसरा कोई भी उपाय ऐसा नहीं जो प्रैक्टिकल हो। युद्ध जवाब नहीं है, न ही सैन्य क्षमता को एक स्तर के बाद ले जाना। गिरती अर्थव्यवस्था के दौर में, कोरोना से जूझते राष्ट्र युद्ध का सदमा नहीं झेल सकते। इसलिए, अंतरराष्ट्रीय दवाब बना कर चीन को अपनी प्रसारवादी नीतियों की समीक्षा करने पर मजबूर करना होगा।

बातचीत से ज़िंदगियाँ बचती हैं, इसलिए यह सही रास्ता है। बाकी के दूसरे रास्तों में चीन पर व्यापारिक दवाब बनाना भी है जिसमें दोनों देशों के बीत व्यापार के अंतर 50 बिलियन डॉलर से ज्यादा है। कुछ लोग कह रहे हैं कि व्यापार बंद कर दो। हो सकता है हो भी जाए, लेकिन जिन चीजों को भारत वहाँ से आयात करता है, वो क्या भारत में, उससे सस्ते, या उतने ही दामों पर बनाने की क्षमता भारत में है!

नहीं है। इसलिए, पहले अपनी मैनुफ़ैक्चरिंग ठीक किए बिना ऐसा करना अपनी ही इकॉनमी को तबाह करने जैसा होगा क्योंकि कई उद्योंगों में लगने वाले कई तरह की चीजें सीधे चीन से ही आती हैं। चीन किसी की बात नहीं मानता, इसलिए एक तरह से किसी बड़े राष्ट्र या यूएन से दबाव बनवाना भी उतना सही नहीं ही लगता।

हाँ, भारत अपनी तरफ से ताइवान और तिब्बत को स्वतंत्र राष्ट्र मान कर अपने दूतावास बना ले, उन्हें औपचारिक रूप से भाव देना शुरु करे, और बाकी मित्र राष्ट्रों से भी यह कराए तब चीन का नेतृत्व इसे एक चैलेंज की तरह देखेगा। तब भारत, एक तरह से, चीन को उसी की भाषा में दवाब देगा जहाँ वो बिना बात के किसी ऐसे इलाके में भटकते हुए घुस जाएगा जहाँ जाने का कोई औचित्य नहीं।

इसलिए, जब तक ऐसा नहीं हो रहा, अपनी सेना पर विश्वास रखिए। उन लोगों का मनोबल बढ़ाइए जो हमारी रक्षा कर रहे हैं। उन्हें एक संख्या में मत लपेटिए क्योंकि आपकी राजनैतिक विचारधारा अलग है। ऐसे समय पर सिर्फ भारत ही ऐसा देश है जहाँ के नागरिक यह मानने लगते हैं कि नेपाल भी हमसे आँखें उठा कर बोलेगा, और हम कुछ नहीं कर पाएँगे।

भारत के 20 बलिदान, तो चीन के 43 सैनिकों के हताहत होने की खबरें, संख्या बढ़ सकती है: मीडिया रिपोर्ट्स

भारत और चीन की सेनाओं के बीच लद्दाख बॉर्डर पर गलवान घाटी के पास हिंसक झड़प में चीन के 43 सैनिकों के हताहत होने की बात मीडिया में सामने आई है, जिसमें चीन के मारे गए, घायल और गंभीर घायल चीनी सैनिक भी शामिल बताए जा रहे हैं।

वहीं, भारतीय सेना ने स्पष्ट किया है कि इस झड़प में 20 भारतीय सैनिकों को वीरगति प्राप्त हुई, हालाँकि, यह भी बताया जा रहा है कि संख्या अभी 20 से अधिक भी हो सकती है।

भारतीय सेना ने आधिकारिक बयान में कहा है कि शून्य से काम के तापमान में चली इस झड़प में हमारी सेना के 17 सैनिक बुरी तरह से घायल थे जो बाद में वीरगति को प्राप्त हो गए।

आज दिन में ही दोनों तरफ से सेना और उनके अधिकारियों की मौत की खबरें सामने आई। इसमें भारतीय सेना के एक अफसर और दो जवान के बलिदान की खबरों के कुछ देर बाद ही भारतीय सेना द्वारा जारी एक अपडेट में बताया गया है कि इस झड़प में दोनों देशों की सेना के अधिकारियों को हानि पहुँची है।

चीन की ओर से जारी एक अधिकारिक बयान में आरोप लगाया है कि भारत के सैनिकों के द्वारा उनकी सीमा में घुसपैठ की कोशिशें की गईं और चीनी सैनिकों पर हमला किया गया।

बताया जा रहा है कि इस झड़प के दौरान किसी तरह की कोई गोली नहीं चली है, यानी हाथापाई और पत्थरबाजी हुईं, जिनमें सैनिकों को क्षति पहुँची है।

भारतीय सेना की ओर से जारी किए गए आधिकारिक बयान में कहा गया है- “गलवान घाटी में सोमवार की रात को डि-एस्केलेशन की प्रक्रिया के दौरान भारत और चीन के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई। इस दौरान भारतीय सेना के एक अफसर और दो जवान शहीद हो गए हैं। दोनों देशों के वरिष्ठ सैन्य अधिकारी इस वक्त इस मामले को शांत करने के लिए बड़ी बैठक कर रहे हैं।”

‘चीन के हाथों 45 सालों बाद जवानों का खून’ वामपंथी मीडिया द्वारा सुनाया जा रहा अक्साई चीन के सच का अधूरा हिस्सा है

पूर्वी लद्दाख के गलवान घाटी में भारतीय सेना की चीनी सैनिकों से झड़प के बाद मीडिया में एक बात को प्रमुखता से प्रकाशित किया जा रहा है कि पिछले 45 सालों में पहली बार चीनी सेना के हाथों भारतीय सेना का खून बहा है। ये वही मीडिया और तंत्र है, जो हमेशा ही इस अक्साई चीन क्षेत्र को ‘विवादित क्षेत्र’ बनाने वाले भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु के इस क्षेत्र के ‘महत्त्व’ पर दिए गए ऐतिहासिक बयान को सामने रखने में हिचकिचाता रहा है।

यह मीडिया दर्शकों, और अपने पाठकों को इस सूचना से वंचित रखता है कि इस अक्साई क्षेत्र में इतिहास में पहली बार भारत ने अपने निर्माण कार्य शुरू किए हैं, जो कि चीन की बौखलाहट का प्रमुख कारण बना हुआ है। यह सब कुछ ऐसे समय में घटित हुआ है, जब कुछ ही दिन पहले मीडिया में चीन द्वारा अपने सैनिकों को इस क्षेत्र से करीब डेढ़ किलोमीटर पीछे बुला लेने के समाचार देखे गए थे।

आज की घटना के बाद चीन के विदेश मंत्रालय ने भी इस झड़प को लेकर दोष पूरी तरह से भारतीय सेना पर डालते हुए कहा है कि सोमवार को भारतीय सेना ने नियंत्रण रेखा का गंभीर तौर पर उल्लंघन किया है। इस सबके बीच गलवान घाटी में पिछले कुछ समय से बढ़ रही गतिविधियों पर चर्चा किया जाना आवश्यक है।

सोमवार रात को दोनों देशों के सैनिकों के बीच झड़प हुई। जिस क्षेत्र में यह घटना हुई वो पूरा इलाका सामरिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील है। इस झड़प के दौरान दो परमाणु संपन्न देशों – भारत और चीन के जवान डंडो और पत्थरों से आपस भीड़ गए।

इस लाठीबाजी और पत्थरबाजी में जहाँ भारतीय सेना ने अपने एक अधिकारी और दो सैनिकों को खोया तो वहीं चीन अपने सैनिकों के ‘हताहत’ होने की बात तो स्वीकार कर रहा है, लेकिन यह स्पष्ट रूप से नहीं कह रहा है कि चीन के कितने सैनिक इस झड़प में मारे गए। लेकिन कोरोना जैसी वैश्विक त्रासदी का सृजन करने वाला यह कम्युनिस्ट देश किसी सच को स्वीकार करे, यह आशा करना भी महज एक छलावा है। हालाँकि, अभी हताहतों की संख्या बढ़ने की भी खबर है।

ऊँचाई पर स्थित ये हिस्सा सामरिक दृष्टि से संवेदनशील है

दरअसल, वर्ष 1975 में लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल यानी, एलएसी पर चीन ने घात लगाकर हमला किया था, जिसमें चार भारतीय सैनिकों ने जान गँवाई थी। तभी से दोनों देशों में झड़प तो कई बार हुई, लेकिन जान किसी की कभी नहीं गई। बीते एक माह में लद्दाख के इस क्षेत्र में कई मौकों पर भारत और चीन की सेनाएँ आमने-सामने हुईं हैं। दोनों देशों के सैनिकों के बीच हुई हाथापाई के वीडियो सोशल मीडिया पर भी शेयर किए गए।

जिस पूरे इलाके में आजकल चायनीज सेना और भारतीय सेना के बीच गतिविधियाँ तेज हुईं हैं, वह गलवान घाटी इस पूरे इलाके में सबसे ऊँचाई पर स्थित है। यह ऐसी जगह है, जहाँ से लम्बी दूरी तक नजर रखी जा सकती है, साथ ही इस जगह से उस सड़क को भी आसानी से निशाना बनाया जा सकता है, जहाँ से भारतीय सेना रसद और हथियारों की सप्‍लाई करती है। चीन की बौखलाहट का कारण भी यह सड़क ही है।

भारत ने हाल ही में इस क्षेत्र में सड़क निर्माण किया है। जिसका कि चीन की कम्युनिस्ट सरकार की ओर से काफी विरोध किया गया था। जबकि, भारत ने चीन के विरोध के बावजूद अक्साई चीन पर भारत के नियन्त्रण पर चीन को किसी ग़लतफ़हमी में ना रहने का सन्देश दिया। इसी जगह पर स्थित पैंगॉन्‍ग लेक का एक हिस्‍सा जहाँ भारत में आता है, तो वहीं दूसरा हिस्‍सा चीन में।

इसी गलवान घाटी से कुछ ही दूरी से अक्‍साई चिन का वो क्षेत्र शुरू हो जाता है, जिस पर चीन वर्ष 1962 से ही अवैध रूप से अपना अधिकार बताता आया है। इतने वर्षों बाद भारत ने चीन द्वारा इस क्षेत्र में किए जा रहे अवैध निर्माणों के विरोध में स्पष्ट कर दिया था कि ये क्षेत्र भारतीय सीमा के अंतर्गत आता है, और इसमें चीन का हस्‍तक्षेप किसी भी हाल में स्वीकार नहीं किया जाएगा।

चीन चाहता है कि वह इस इलाके में अपना प्रभुत्व स्थापित कर भारतीय सेना पर निरंतर नजर रख सके। लेकिन उसे ऐसा करने में पहली बार समस्या का सामना करना पड़ रहा है। यही कारण है कि भारतीय सैनिकों के बलिदान की आड़ लेकर वामपंथी मीडिया से लेकर कॉन्ग्रेस जैसे दल भी भारतीय सेना के बलिदान पर चिंतित नजर आ रही है। यह चिंता और कुछ नहीं, बल्कि केंद्र सरकार की कार्यशैली को लेकर जनता को गुमराह करना मात्र है। वरना यह वही विपक्षी दल है, जो हमेशा से ही भारतीय सेना के अधिकारों पर भद्दे चुटकुले बनाते और उनका समर्थन करते देखे गए हैं।

इसके अलावा अक्साई चीन क्षेत्र में चीन की सेना की बढ़ती गतिविधियों का एक और प्रमुख कारण चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का अपने ही देश और विश्वभर में कोरोना वायरस के संक्रमण को लेकर हो रहा विरोध प्रदर्शन भी है। ऐसे में चीन से कई बड़े निवेशकों द्वारा अपना निवेश वापस खींच लेने के कारण बढ़ी आर्थिक मंदी के कारण पार्टी पर जिनपिंग की पकड़ कमजोर हो रही है।

एक लम्बे समय से ही चीन की कम्युनिस्ट सरकार अपने पैसे के बल पर पूरे विश्वभर में ही संस्थाओं को प्रभावित करने में सक्षम रहा है। सोशल मीडिया से लेकर मुख्यधारा की मीडिया को खरीदने और उन्हें प्रभावित करने की खबरें भी निरंतर मीडिया में बनी हुई हैं। ये वो दल हैं जो चीन की ओर से कम्युनिस्ट सरकार के हितों की ढाल का काम कर रहे हैं।

ऐसे में भारतीय मीडिया द्वारा भारतीय सेना के बलिदान को 45 साल में हुए पहले ‘खूनी संघर्ष’ जैसी सनसनीखेज ख़बरों से पाटने के बजाए चीन का वास्तविक मर्म सामने रखना चाहिए, जो कि केंद्र सरकार और भारतीय सेना द्वारा अक्साई चीन क्षेत्र में दिखाया जा रहा साहस ही है और यही बौखलाहट चीन की कम्युनिस्ट सरकार के खोखलेपन को सामने रखने के लिए काफी है।

पालघर: दो साधुओं की पीट-पीट कर हत्या के मामले में 11 आरोपित कोरोना पॉजिटिव, 6 के रिपोर्ट का इंतज़ार

महाराष्ट्र के पालघर जिले में भीड़ द्वारा दो साधुओं और उनके ड्राइवर की पीट-पीट कर हत्या करने के मामले में गिरफ्तार 11 आरोपित कोरोना वायरस से संक्रमित पाए गए हैं। पुलिस ने मंगलवार (जून 16, 2020) को यह जानकारी दी।

बता दें कि पालघर जिले के गढ़चिंचले गाँव में भीड़ ने कार से मुंबई से सूरत जा रहे दो साधुओं और उनके चालक की पीट-पीट कर हत्या कर दी थी। इस मामले में कुल 156 लोगों को गिरफ्तार किया गया था।

पालघर पुलिस थाने के एक अधिकारी ने बताया कि सभी आरोपियों को न्यायिक हिरासत में ले लिया गया है, लेकिन उन्हें विभिन्न पुलिस हवालातों में रखा गया है, क्योंकि पालघर जेल में काम चल रहा है। उन्होंने बताया कि वाड़ा में पुलिस हवालात में रखे गए 17 आरोपियों की हाल में जाँच की गई, जिनमें से 11 लोग संक्रमित पाए गए और छ: अन्य की जाँच के परिणाम का इंतजार किया जा रहा है।

उन्होंने बताया कि संक्रमित पाए गए लोगों को स्थानीय अस्पतालों में भर्ती कराया गया है और उनके संपर्क में आए लोगों का पता लगाया जा रहा है। इससे पहले, गिरफ्तार किए गए कम से कम दो आरोपित कोरोना संक्रमित पाए गए थे।

गौरतलब है कि 16 अप्रैल 2020 को जूना अखाड़े से जुड़े दो साधु 70 वर्षीय कल्पवृक्ष गिरि महाराज और 35 वर्षीय सुशील गिरि महाराज अपने ड्राइवर 30 वर्षीय नीलेश तेलगेडे के साथ एक अन्य साधु के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए मुंबई से गुजरात जा रहे थे। इसी बीच पालघर जिले के गढ़चिंचले गाँव के 200 से अधिक लोगों की भीड़ ने इकठ्ठा होकर साधुओं पर हमला किर दिया था। इस दौरान भीड़ ने दोनों साधुओं के साथ उनके एक ड्राइवर की पीट-पीटकर हत्या कर दी थी।

बता दें कि साधु समेत तीन लोगों की पीट-पीट कर हत्या करने की पूरी घटना वहाँ मौजूद कुछ पुलिसकर्मियों के सामने हुई। मामले में अब तक 35 पुलिसकर्मियों का तबादला हो चुका है।

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने भी इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा था, “2 साधुओं की हत्या। क्या यह होना चहिए? क्या कानून-व्यवस्था किसी को हाथ में लेना चाहिए था? ऐसे में पुलिस की भूमिका क्या होनी चाहिए थी? ये सभी चीजें ऐसी हैं जिन पर सोचा जाना चाहिए।” 

वहीं अखिल भारतीय संत समिति केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर इस मामले की सीबीआई जाँच की माँग कर चुकी है। पत्र में उन्होंने हत्या के पीछे बड़ी साजिश की आशंका जताते हुए कहा कि उन्हें महाराष्ट्र के गृह मंत्री पर भरोसा नहीं है।

गोकशी किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं, फास्ट ट्रैक में सुने जाएँगे इससे जुड़े मामले: मनोहर लाल खट्टर

हरियाणा में गोकशी की बढ़ रही घटनाओं के बीच सीएम मनोहर लाल खट्टर ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि नूह जिले में गोकशी किसी भी हालत में नहीं होने दी जाएगी। गोकशी के मामलों को फास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाया जाएगा, ताकि आरोपितों के जल्द से जल्द सजा मिल सके।

मुख्यमंत्री ने यह बातें मंगलवार (जून 16, 2020) को नूह लघु सचिवालय सभागार में पत्रकारवार्ता में कही। इस दौरैन उन्होंने कई घंटों तक दोनों समुदाय के लोगों के साथ विस्तारपूर्वक बातचीत की और अधिकारियों के साथ बैठक करने के बाद कहा कि गोकशी की वजह से दोनों समाज में दूरियाँ बढ़ती हैं। मनमुटाव होता है।

पत्रकारों से बातचीत के दौरान मुख्यमंत्री ने कहा कि नूह जिले के एक गाँव में 2500 से अधिक गाय की खाल हाल ही में मिली हैं। हरियाणा में सख्त कानून होने के बावजूद भी कुछ लोग गोकशी में संलिप्त हैं। उन्होंने कहा कानून अगर और ज्यादा कड़ा बनाना पड़ा तो बनाएँगे। लेकिन गोकशी को पूरी तरह से रोका जाएगा।

इसकेे अलावा धर्म परिवर्तन मामलों पर भी सीएम मनोहर लाल खट्टर गंभीर नजर आए। उन्होंने कहा कि धर्म परिवर्तन जैसी घटनाओं को रोकने के लिए धर्म स्वतंत्र विधेयक नियम लेकर आएँगे, ताकि धर्म परिवर्तन की सूरत में मजबूती व सख्ती से कार्रवाई हो सके। पत्रकारों से बातचीत के दौरान सीएम मनोहर लाल ने कहा कि श्मशान घाट की जमीनों को लेकर जो विवाद होता है उसको निपटाने के लिए बोर्ड बनाया जाएगा। जहाँ हिंदू समाज के लोग अल्पसंख्यक दर्जे में हैं, वहाँ पर इसके तहत कार्रवाई होगी।

सीएम मनोहर लाल ने कहा पुलिस तंत्र को नूह जिले में मजबूत किया जाएगा। अवैध खनन तथा कई राज्यों से सटी सीमाओं पर स्मगलिंग को रोकना पुलिस की प्राथमिकता रहेगी। उन्होंने कहा कि नूह विकसित जिला होने जा रहा है। इसलिए सुरक्षा की दृष्टि से पुलिस तंत्र को मजबूत करना है। आईआरबी की बटालियन शीघ्र ही उचित स्थान पर स्थापित की जाएगी।

इसके अलावा गुरुग्राम जिले में आईआरबी की महिला बटालियन स्थापना होगी। उन्होंने दिल्ली–मुम्बई एक्सप्रेस-वे के साथ उद्योग धंधे स्थापित करने की बात भी कही। सीएम मनोहर लाल ने पत्रकारों से बातचीत के दौरान यह भी कहा कि आईएमटी मानेसर में भी कई बड़े उद्योग धंधे लगेंगे।

गौरतलब है कि नूह के जमालगढ़ गाँव में छापेमारी के दौरान पुलिस ने लोगों के घरों व गोदाम से 2572 गाय की खाल व एक टाटा 407 जब्त किया था। गोवंशों को रखने वालों के खिलाफ पुन्हाना पुलिस स्टेशन में केस दर्ज किया गया है। पुलिस ने आश्वासन दिया है कि मामले में शामिल सभी तस्करों को जल्द ही गिरफ्तार कर लिया जाएगा।

‘पाताल लोक’ में सिखों के अपमान पर मुश्किल में फँसी अनुष्का शर्मा: हाईकोर्ट ने भेजा नोटिस

बॉलीवुड एक्ट्रेस अनुष्का शर्मा काफी समय से अपने खास अभिनय से पहचानी जाती रही है, लेकिन इन दिनों वो अपनी डिजिटल डेब्यू को लेकर सुर्खियों में हैं। एक्ट्रेस ने अभिनय के साथ साथ बतौर प्रोड्यूसर के तौर पर काम करना शुरू किया है।

वो इन दिनों अमेजन प्राइम पर सीरिज ‘पाताल लोक’ को रिलीज करते ही चर्चे में आ गई थीं। लेकिन अब इस फिल्म को लेकर अनुष्का शर्मा काफी मुश्किलों में फँसी हुई हैं। अपनी फिल्म में उन्होंने एक जातिसूचक शब्द का उपयोग किया है इसलिए उनकी सीरीज पर सिख समुदाय ने घोर विरोध किया है।

प्रोड्यूसर अनुष्का शर्मा की अमेजन वेब सीरीज के तीसरे एपिसोड को लेकर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट की तरफ से प्रोड्यूसर अनुष्का शर्मा को नोटिस भेजा गया है। हाईकोर्ट ने इस मामले की सुनवाई दो जुलाई को तय की है।

दरअसल, इस सीरीज में सिख समुदाय की छवि को खराब करने का आरोप लगाते हुए याचिका दायर की गई है, जिस पर कोर्ट ने एक्ट्रेस को नोटिस भेजकर जवाब माँगा है। उन्होंने आरोप लगाया है कि इस वेब सीरीज में जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल हुआ है, जिससे पूरे सिख समुदाय का अपमान हुआ है।

मामले पर वकील गुरदपिंदर सिंह ढिल्लों ने याचिका दायर कर कहा है कि वेब सीरीज में जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण तरीके से सिखों की छवि को खराब करने की कोशिश की गई है। वकील ढिल्लों के मुताबिक शो के तीसरे एपिसोड से सिखों की छवि को ठेस पहुँची है।

पाताल लोक पर के प्रोड्यूसर आरोप लगाया गया है कि इसके तीसरे एपिसोड में सिखों को बदनाम करते हुए दिखाया गया है। इसमें दिखाया गया है कि किस तरह सिख समुदाय दलित और पिछड़ी जातियों का उत्पीड़न करते थे। इसके अलावा इसमें सिखों द्वारा महिला का यौन उत्पीड़न और बलात्कार करते हुए भी दिखाया गया है।

बता दें कि इससे पहले भी पाताल लोक पर नेपाली और नॉर्थ ईस्ट के लोगों की भावनाएँ आहत किए जाने का आरोप लगा था। इसके बाद बीजेपी विधायक नंद किशोर गुर्जर ने भी इसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। विधायक ने कहा कि एक अपराधी किस्म के किरदार के साथ उनकी तस्वीर को मॉर्फ्ड करके लगाया गया है और गुर्जर जाति के लिए अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया गया है। विधायक ने प्रोड्यूसर अनुष्का शर्मा के खिलाफ रासुका लगाए जाने की माँग भी की थी।

योग शिक्षिका राफिया को कट्टरपंथियों से मिल रही धमकी, सुरक्षा माँगने पर गेट से ही भगा दिया

झारखंड की राजधानी राँची के डोरंडा की रहने वाली राफिया नाज आज योग के क्षेत्र में एक जाना पहचाना नाम है। योग को धर्म से परे मानने वाली राफिया को आज योग के कारण ही निशाना भी बनाया जा रहा है। उनकी जान को अभी भी खतरा है, मगर प्रशासन की लापरवाही तो देखिए, इस मामले पर संज्ञान लेना तो दूर उनकी चिट्ठी तक नहीं रिसीव की गई।

राफिया नाज ने हमें इसकी जानकारी देते हुए बताया कि मंगलवार (जून 16, 2020) को इस संबंध में मुख्यमंत्री और उनके प्रधान सचिन को चिट्ठी देने गई तो उन्हें प्रोजेक्ट भवन के बाहर से ही भगा दिया गया। बकौल राफिया, “मैं मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और उनके प्रधान सचिव को चिट्ठी देकर ये मामला उनके संज्ञान में लाना चाहती थी, मगर मुझे गेट के बाहर से ही भगा दिया गया। जबकि मैंने साफ-साफ कहा कि मैं एक योगा टीचर हूँ। मेरी जान को खतरा है। मैं यहाँ पर सिर्फ चिट्ठी देने आई हूँ। उन्होंने कहा कि यहाँ पर कोई चिट्ठी रिसीव नहीं होती, जबकि मैंने पहले भी यहाँ पर चिट्ठी दी है। उन्होंने बिना मेरी कोई बात सुने भगा दिया। जब यहाँ पर आने के बाद ऐसा व्यवहार किया जाता है, तो फिर ये तो मेल वगैरह क्या खाक चेक करेंगे?”

ये कहते-कहते राफिया की आँखें नम हो जाती है। वो कहती हैं कि इतना करने के बाद भी जब सामने से ऐसी प्रतिक्रिया आती है तो बहुत दुख होता है। ये बातें उन्होंने फेसबुक लाइव करके भी कहा कि वो डेढ़ घंटे से गेट के बाहर खड़ी थी, लेकिन महिला सुरक्षा को लेकर बड़ी-बड़ी बातें करने वाली झारखंड सरकार के राज में उन्हें अंदर नहीं जाने दिया गया। उन्होंने कहा कि अगर उन्हें कुछ होता है तो इसकी जिम्मेदार झारखंड सरकार होगी।

राफिया नाज इसको लेकर मुख्यमंत्री, SSP, DIG सबसे गुहार लगा चुकी है। उन्होंने मुख्यमंत्री जन संवाद केंद्र पर भी मेल किया। SSP, DIG सभी को सूचित किया मगर कोई सुनवाई नहीं हुई। ट्विटर पर भी उनकी समस्या पर ये प्रतिक्रिया देकर प्रशासन निश्चिंत हो जाती है कि कार्रवाई की जाएगी। राफिया कहती है कि वो तो ये देखकर खुश हो जाती थी, मगर फिर बाद में उनके पास हताश होने के सिवा कोई और विकल्प नहीं बचता है। राफिया ने मंगलवार को SSP और DIG को लिखित में पत्र देकर अपनी समस्याओं से अवगत करवाया और तत्काल सुरक्षा देने की गुहार लगाई। इस दौरान उन्होंने अपने साथ घटी घटनाओं की कॉपी भी उपलब्ध करवाई।

राफिया नाज द्वारा वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को लिखा गया पत्र
राफिया नाज द्वारा वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को लिखा गया पत्र

दरअसल, लॉकडाउन में राहत मिलने के बाद अब राफिया को अनाथ बच्चों को योगा सिखाने के लिए जाना है और सितंबर 2019 में पुलिस का तरफ से उन्हें कहा गया था कि जब भी वो घर से बाहर निकले वो उन्हें सूचित करें, ताकि टाईगर मोबाइल और पीसीआर के जरिए उन्हें सुरक्षा मुहैया कराया जा सके। अब जब राफिया अपनी सुरक्षा के लिए गुहार लगा रही है तो कोई सुनने के लिए तैयार नहीं है। राफिया कहती हैं, “तो क्या थाने की तरफ से भेजा गया वो पत्र महज एक औपरचारिकता थी?”

डोरंडा थाना द्वारा सितंबर 2019 में भेजा गया पत्र

राफिया ने कहा, “मैं धमकियों से नहीं डरती, ये तो मैं 3-4 सालों से झेलती आ रही हूँ, मगर अपनी जान तो सभी को प्यारा होता है। खुद से ज्यादा लोगों को अपने परिवार की चिंता होती है। मेरे भी मम्मी, पापा, भाई, बहन हैं, उन्हें भी तो वो लोग नुकसान पहुँचा सकते हैंं। आज जब मैं चीख-चीख कर कह रही हूँ कि मेरी जान को खतरा है तो कोई नहीं सुन रहा, कल को यदि मुझे कुछ हो जाता है, तो फिर ये प्रशासन जागकर क्या करेगी? क्या फायदा ऐसे जागने से? मैं तो लौट कर नहीं आऊँगी न? ये लोग मुझे मरवाकर ही छोड़ेंगे। जब मैं मरुँगी तो सबका नाम लिखकर जाऊँगी।”

जब राफिया सुरक्षा की गुहार लगाते-लगाते हर तरफ से थक गई तो उन्होंने झारखंड के पूर्व सीएम रघुवर दास के सामने अपनी समस्या रखी, क्योंकि रघुवर दास ने ही अपने कार्यकाल के दौरान 2017 में राफिया की सुरक्षा का संज्ञान लिया था और उन्हें 24 घंटे सुरक्षा मुहैया करवाया गया था। उनके घर के बाहर रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) और सीआरपीएफ के जवान तैनात रहते थे। मगर पता नहीं, मार्च 2020 के अंतिम सप्ताह में उसे हटा लिया गया।

पूर्व मुख्यमंत्री ने राफिया को सुरक्षा मुहैया करवाने का आश्वासन दिया है। ऑपइंडिया ने भी इस बाबत रघुवर दास से बात की। उन्होंने इस बात की पुष्टि करते हुए कहा कि मामला संज्ञान में आया है। जल्द ही इस पर कार्रवाई की जाएगी।

इसके अलावा राफिया ने बताया कि जिस अनाथालय के बच्चों को योग सिखाती थी। उस अनाथालय को खाली करवा दिया गया। जिसके बाद बच्चे को जंगल की तरफ चले गए। वो सवाल उठाती हैं, “क्या इस स्थिति में बच्चे नक्सली नहीं बन जाएँगे?” वो आगे कहती हैं, “मुझे उन बच्चों को वापस लाना है। उनका भविष्य बनाना है। आज जब पूरा देश कोरोना महामारी से जूझ रहा है। सभी से इम्युनिटी बढ़ाने के लिए कही जा रही है। बड़े लोग तो महँगी-महँगी चीजें खाकर इम्युनिटी बढ़ा रहे हैं, लेकिन ये बच्चे कैसे करेंगे? इनके लिए तो योग ही एक सहारा है और योग में तो सोशल डिस्टेंसिंग का भी पूरा पालन होता है।”

उल्लेखनीय है कि झारखंड में ‘Yoga beyond religion’ अभियान का अहम हिस्सा बन चुकीं राफिया आज न केवल स्कूली बच्चों और विभिन्न संस्थानों में जाकर लोगों को नि:शुल्क योग का प्रशिक्षण देती हैं, बल्कि योग का एक स्कूल भी चलाती हैं। इसमें वो गरीब और अनाथ बच्चों को मुफ्त में योग सिखाती हैं और अब तक कई लोगों को उन्होंने योग सिखाकर योग शिक्षक के रुप में नौकरी भी उपलब्ध करवाई है।

राफिया को योग के कारण अपने ही समाज की कट्टरपंथियों के विरोध का सामना भी करना पड़ रहा है। उन्हें न केवल फोन और सोशल मीडिया पर गंदी और भद्दी गालियाँ दी जाती है, बल्कि उन्हें जान से मारने की धमकी भी दी जाती है। कई बार तो उन पर जानलेवा हमला भी किया गया। राफिया को हाल में ही एक बार फिर से धमकी मिली है। फोन पर भद्दी-भद्दी गालियाँ दी गईं। सोशल मीडिया पर उनके और उनके परिवार के ऊपर अश्लील टिप्पणियाँ की गई।

राफिया द्वारा दर्ज करवाई गई ऑनलाइ FIR की कॉपी
राफिया द्वारा दर्ज करवाई गई ऑनलाइन FIR की कॉपी

राफिया कहती है कि लॉकडाउन होने की वजह से उन्होंने ऑनलाइन FIR भी करवाया। मगर इसका भी कोई फायदा नहीं हुआ। आरोपित के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। इसमें आरोपित का नाम नजीब राजा बताया गया है, जिसने उन्हें फेसबुक पर गंदी गालियाँ दीं।

नजीब राजा द्वारा किए गए कमेंट्स के कुछ स्क्रीनशॉट्स

और तो और उनसे कहा गया कि अगर उन्हें फोन करके गंदी गालियाँ दी जा रही है, तो फोन यूज मत करो, नंबर बदल लो। जब सोशल मीडिया पर अश्लील टिप्पणियाँ की जाती है तो उनसे सोशल मीडिया इस्तेमाल न करके की सलाह दी जाती है। घर पर पत्थरबाजी होती है, तो कहा जाता है कि घर बदल लो। राफिया का कहना है कि ये तो कोई समाधान नहीं है। इससे तो अपराधियों के हौसले और भी बुलंद होंगे। वो कहती हैं कि लॉकडाउन के दौरान भी उन्हें कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा, मगर वो देश की भलाई की खातिर चुप रही, क्योंकि देश कोरोना महामारी से जूझ रहा है। अपनी सुरक्षा की माँग कर रही योगा शिक्षिका राफिया आज प्रशासन की इस निष्क्रियता से काफी आहत हैं।

कितना खोखला है अवसाद से घिरे व्यक्ति को कहना- प्लीज रीच आउट टू मी

सुशांत सिंह की मृत्यु ने सभी को झकझोरा हो अथवा चिंतित किया हो, ऐसा लगता नहीं है। आम आदमी तो इस हादसे से जरूर चिंतित है, लेकिन बनावटी और खोखला बॉलीवुड भी दुखी हो सकता है, ऐसा लगता तो नहीं है। किसी की मौत पर टीवी के सामने शृंगार करती मौकापरस्त हसीना इसका सिर्फ एक छोटा सा उदाहरण है। हाँ, मानव स्वभाव पर बहस की एक बार फिर से शुरुआत जरूर हो गई है।

भारतीय समाज की इकाई से शुरू करते हैं। दूसरों के जज्बातों और विचारों का सम्मान करना हमें ‘बचपन’ से सिखाया ही नहीं जाता है। ना ही इस पर चर्चा की जाती है और न इसे व्यावहारिक शिक्षा में शामिल करना ही जरूरी समझा जाता है। भारतीय समाज में ऐसे कितने अभिभावक होंगे जो अपने बच्चों को दूसरों के विचारों का सम्मान करना सिखाते होंगे? अंग्रेजी शिक्षा के रटंतू सिलेबस के बीच शो-ऑफ़ करना बच्चे जरुर सीख जाते हैं।

ऐसे हजारों-लाखों उदहारण हैं जहाँ माँ-बाप अपने बच्चों को उन हमउम्र बच्चों से दूर रहने को कहते हैं, जिन्हें अच्छी शिक्षा नहीं मिल पा रही या जो ‘फ़्लूएंट’ फ़ेक एक्सेंट में अंग्रेजी नहीं बोल पाते। जिन बच्चों का तिरस्कार किया जाता है, जिनके रूप-रंग और दशा पर सामूहिक हँसी और अट्टहास किया जाता है, उनमें हीन भावना घर करने लग जाती है। हमारे बचपन को सिखाया ही नहीं जाता कि दूसरों के विचारों या परिस्थितियों को समझना भी बेहद जरूरी है।

हमारे भारतीय समाज के डे और बोर्डिंग स्कूल या कॉलेज वैचारिक दमन का जीता-जागता प्रमाण हैं। स्कूल में सीनियर विद्यार्थियों का नए छात्रों को प्रताड़ित करना आम है। बोर्डिंग स्कूल का उदाहरण लेते हैं। ऐसे समय में, जब एक नया विद्यार्थी घर से दूर एक नए, अनजान माहौल में जीने का साहस जुटा रहा होता है, तब सीनियर विद्यार्थियों द्वारा उन्हें प्रताड़ित किया जाना, गाली-गलौज करना, हाथापाई करना, उनका सामान छीनना और जबरन अपने काम करवाना आम बात है।

डे और बोर्डिंग स्कूल चाहे कैसे भी दावे करें लेकिन स्कूलों में प्रताड़ना की वजह से छात्रों द्वारा आत्महत्या की कोशिशें यदा-कदा समाचारों में आती ही रहती हैं। हम और आप इस प्रताड़ना से गुजर रहे छात्र की मानसिक स्थिति को समझ ही नहीं सकते।

बेहतर होगा कि स्कूलों में व्यवस्था हो कि विद्यार्थियों के लिए ऐसे विषय भी पाठ्यक्रम में शामिल किए जाएँ जो उन्हें अन्य व्यक्तियों की परिस्थितियों और उनके विचारों का सम्मान करना सिखाएँ। अध्यापक, अभिभावक और वार्डन अधिक व्यावहारिक बनें ताकि बच्चे अपनी हर बात बिना हिचकिचाए उनके समक्ष रख सकें। फिर इनकी जिम्मेदारी है कि गंभीरता से, शान्तिपूर्वक छात्रों की समस्याओं का समाधान भी करें।

कॉलेज में रैगिंग के पक्ष में दिए जाने वाले तर्क सबसे अधिक हास्यास्पद होते हैं। मसलन, ‘रैगिंग से नए छात्रों के अंदर की हिचकिचाहट कम होती है, रैगिंग से सीनियर और जूनियर के बीच तालमेल बेहतर होता है, रैगिंग के बाद सीनियर्स अपने जूनियर्स की अधिक मदद करते हैं’ और भी न जाने क्या-क्या। अरे भई! आपको मदद करनी है तो नए विद्यार्थियों को उनका कोर्स समझने में मदद करिए न! स्कूल से, अलग-अलग बैकग्राऊंड से, सामाजिक, आर्थिक ताने-बाने से निकलकर आए, भाषाओं के अल्प ज्ञान से जूझते नए छात्रों के बाल कुतरवा कर आप क्या साबित करना चाहते हैं?

जबरन लड़कों की बेल्ट उतरवा कर और लड़कियों से दो चुटिया बनवाकर कॉलेज में आप कौन से फन्ने खाँ बन जाते हैं? इन नए बच्चों से ‘चार आना, आठ आना’ करवाकर और कॉलेज से हॉस्टल तक लाइन बनवाकर आप उनका मानसिक शोषण ही कर रहे हैं।

सीनियर के शोषण, पढ़ाई का प्रेशर और फ़ाइनल ईयर आते-आते नौकरी और GATE/GPAT/CAT/MAT क्लियर करने के दबाव में कॉलेज के हॉस्टल में रात-रात को दूसरों से छुपकर रोते हुए लड़के भी होते हैं साहब। ‘मर्द को दर्द नहीं होता’ या ‘लड़के कभी रोते नहीं’ जैसे फालतू बॉलीवुडिया डायलॉग बच्चों पर अनावश्यक दबाव बनाने का ही काम करते हैं।

सरकारी और कॉर्पोरेट दफ्तर की कहानी एक ही है। यहाँ कितने ही मुस्कुराते चेहरे या स्मार्ट पर्सनैलिटी दिखाई देती हों, अंदर से सब एक-दूसरे की तरक्की से जलते ही हैं। ‘स्मार्ट वर्क, स्मार्ट कल्चर, ऑन द टॉप अक्रॉस द ग्लोब’ जैसे जुमले सिर्फ ई-मेल पर ही ठीक लगते हैं।

हकीकत यह है कि लोग चाहते हैं कि आप गलती करें, आपको एप्रिसिएशन न मिले, आपके काम को रिकग्निशन न मिले। यदि मीटिंग में आपके काम की तारीफ होती है तो अंदर तारीफ़ करने वाले, ताली बजाने वाले सब होंगे लेकिन बाहर आते ही दस में से आठ लोग यह कहते पाए जाते हैं कि ‘ये तो बॉस का चाटुकार है’। आपको अवार्ड देने वाला बॉस ही चाय-सुट्टे पर अपने साथियों से कहता पाया जाएगा कि ‘अरे यार इसको देना नहीं था लेकिन क्या करें? सबको खुश रखना पड़ता है।’

सारांश यह कि हमारे समाज में कब यह सिखाया जाता है कि हम दूसरों की तरक्की से सचमुच खुश होना सीखें? हमारे समाज में इंटरव्यू के लिए सीवी पढ़कर नहीं बल्कि फेसबुक और इंस्टाग्राम पर तस्वीरें देखने के बाद बुलाया जाता है।

आप खुद से पूछिए कि आपके मेहनती सहकर्मी की तरक्की से आप कितने खुश होते हैं भला? ऐसे हजारों उदाहरण हैं – जहाँ दफ्तरों में बॉस अपने जूनियर्स पर चिल्लाते हैं, बदतमीजी करते हैं, मानसिक शोषण करते हैं, काम को कम-ज्यादा करने की हेराफेरी करते हुए दमन करते हैं।

इन सबके बीच सबसे बकवास और निहायती खोखला फ्रेज है- ‘प्लीज रीच आउट टू मी इन केस ऑफ़ एनी प्रॉब्लम, इस्यू, कंसर्न। आई एम ऑलवेज देयर फॉर यू’। पढ़ने सुनने में ये बहुत बढ़िया लग सकता है। लेकिन हकीकत में यह काम करता है क्या? जब आप ऐसा लिख रहे होते हैं तब आपका ईगो अपना काम कर रहा होता है। जब आप ऐसा लिख रहे होते हैं, आप जान रहे होते हैं कि किन लोगों को आपकी जरुरत है।

जब आप ऐसा लिखकर मेल भेज देते हैं, उसके बाद आप अपने कितने सहकर्मियों से या जूनियर्स से बात करते हैं? उनकी समस्याओं का समाधान करते हैं? उनकी चिंताएँ सुनते हैं? हमारे कल्चर में लोग सिर्फ बोलना चाहते हैं, बस सुनना कोई नहीं चाहता।

ऑफिस में बॉस से डाँट खाकर आई लड़की या लड़के के पास बैठकर कोई सांत्वना नहीं देना चाहता क्योंकि आपको डर है कि बॉस आपको भी अपना दुश्मन न समझ ले। कहीं बॉस आपका भी अप्रेजल न रोक दे। फिर आप मेल करते हैं- ‘प्लीज रीच आउट टू मी फॉर….’

सांत्वना, अपनापन, प्रेम सब कहीं खो जाते हैं। मानसिक विकार हावी होने लगता है। अपने आस-पास नजर घुमाइए। ऐसे दर्जनों उदाहरण आपको मिल जाएँगे।

बॉलीवुड ने फिर से साबित किया है कि इसकी नींव खाली है और दीवारें खोखली हैं। यहाँ ट्विटर पर प्रेम जताया जाता है, किसी की मौत पर पर्दे के पीछे मेक-अप चल रहा होता है। ऋषि कपूर, इरफ़ान, सुशांत सब भुला दिए जाते हैं।

काम बनता हो तो गधा भी बाप कहलाता है, मतलब न हो तो कला सड़कों पर दम तोड़ती जाती है। सोशल मीडिया पर बनावटी हैशटैग चलाए जाते हैं कि ‘काश! तुम मुझसे एक बार बात कर लेते’। लेकिन हे आर्टिफिशियल मनुष्य! तुम खुद क्यों नहीं बात कर सके उनसे, जब तुम कर सकते थे? तब तुम्हारा ईगो, तुम्हें रोकता था कि कहीं तुम उसकी मदद करने जाओ और वो तुमसे आगे न निकल जाए। कहीं वो तुमसे अधिक सफल न हो जाए। …आओ अब मेकअप कर लें। टीवी पर आने का वक़्त हो चला है।

नोट: ऐसा बिलकुल भी नहीं है कि हमारे आस-पास अच्छे लोग, स्कूल-कॉलेज या सकारात्मक वातावरण नहीं है या कुछ भी अच्छा नहीं हो रहा। लेकिन सुशांत के साथ हुई दुखद घटना हमारे समाज की कमजोरियों को भी उजागर करती है। जरुरत है कि हम इनसे सबक सीखें, आत्मचिंतन करें और अपनी आने वाली पीढ़ी को लोगों का, उनके विचारों को सुनने और समझने का महत्त्व समझाएँ। ताकि फिर किसी होनहार सुशांत के परिवार को ऐसी अप्रिय घटना का सामना न करना पड़े।

शिवसेना ने कॉन्ग्रेस को कहा ‘पुरानी खटिया’- महाविकास अघाड़ी में पड़ चुकी है दरार, ‘सामना’ के लेख से खुलासा

महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी (शिवसेना, एनसीपी और कॉन्ग्रेस) के 6 महीने पहले बने गठबंधन में दरार पड़ने लगी है। चर्चा है कि बड़े फैसलों से कॉन्ग्रेस को दूर रखने से पार्टी के कई बड़े नेता मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से नाराज चल रहे हैं।

इस बात को मंगलवार (जून 16, 2020) को एक बार फिर बल मिला, जब शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ में कॉन्ग्रेस के दो नेता- अशोक चव्हाण और बालासाहेब थोराट पर निशाना साधा गया। शिवसेना ने कॉन्ग्रेस की तुलना पुरानी खटिया से की है, जो रह-रह कर कुरकुर की आवाज करती है। सामना ने संपादकीय का शीर्षक दिया है ‘खटिया क्यों चरमरा रही है?’ 

लेख में अशोक चव्हाण और बालासाहेब थोराट का जिक्र करते हुए लिखा गया है कि दोनों मंत्री मुख्यमंत्री से मिलकर अपनी बात कहने वाले हैं। मुख्यमंत्री उनकी बात सुनेंगे और फैसला लेंगे। लेकिन कॉन्ग्रेस कहना क्या चाहती है? राजनीति की पुरानी खटिया कुरकुर की आवाज क्यों कर रही है? 

सामना के संपादकीय में कहा गया, “राज्य के मामले में मुख्यमंत्री का फैसला ही आखिरी होता है, ऐसा तय होने के बाद कोई और सवाल नहीं रह जाता। शरद पवार ने खुद इसका पालन किया है। समय-समय पर मुख्यमंत्री से मिलते रहते हैं और सुझाव देते हैं। उनका अनुभव शानदार है।”

कॉन्ग्रेस के बारे में शिवसेना ने लिखा है कि कॉन्ग्रेस पार्टी भी अच्छा काम कर रही है, लेकिन समय-समय पर पुरानी खटिया रह-रह कर कुरकुर की आवाज करती है। खटिया पुरानी है लेकिन इसकी एक ऐतिहासिक विरासत है। इस पुरानी खाट पर करवट बदलने वाले लोग भी बहुत हैं। इसलिए यह कुरकुर महसूस होने लगी है। मुख्यमंत्री ठाकरे को आघाड़ी सरकार में ऐसी कुरकुराहट को सहन करने की तैयारी रखनी चाहिए। 

सामना के लेख में विधानसभा में कॉन्ग्रेस के संख्याबल को याद दिलाकर उनकी महाविकास आघाड़ी में हैसियत क्या है, यह याद दिलाया गया है। कॉन्ग्रेस के पास सबसे कम यानी 44 विधायक हैं। इसके अलावा लेख में कहा गया है कि कॉन्ग्रेस को मंत्री पद मिले क्योंकि शिवसेना ने त्याग किया।

लेख के अंत में इस बात को लेकर भी चेताया गया है कि सीएम ठाकरे कुर्सी के लालची नहीं हैं, जो वो कोई भी शर्त मान लें। संपादकीय में लिखा गया है कि इस खेल में पत्तों का पिसना कभी नहीं थमता। इसलिए सरकार को खतरा पैदा होगा और राजभवन के दरवाजे किसी के लिए अल-सुबह फिर से खुल जाएँगे, इस भ्रम में कोई न रहे। चाहे कॉन्ग्रेस हो या राकांपा, राजनीति में मँझे लोगों की पार्टी है। उन्हें इस बात का अनुभव है कि कब और कितना कुरकुराना है, कब करवट को बदलना है।

उद्धव ठाकरे को सत्ता को लोभ नहीं। राजनीति अंततः सत्ता के लिए ही है और किसी को सत्ता नहीं चाहिए ऐसा नहीं है, लेकिन उद्धव ठाकरे ऐसे नेता नहीं हैं, जो सत्ता के लिए कुछ भी करेंगे।

शिवसेना के इस हमले के बाद भारतीय जनता पार्टी ने महाविकास आघाड़ी को घेरा है। बीजेपी ने सामना के संपादकीय का हवाला देते हुए कहा कि इन्हें (सरकार) महाराष्ट्र में कोरोना की वजह से जान गँवाते लोगों की फिक्र नहीं है बल्कि केवल कुर्सी की चिंता है।

बीजेपी के प्रवक्ता राम कदम ने मंगलवार को कहा, “ये लोग (महाविकास आघाड़ी) पुरानी खाट की आवाज पर बात कर रहे हैं, लेकिन दुख की बात है कि इन्हें महाराष्ट्र के अस्पतालों में बेड की कमी के चलते कोरोना मरीजों की मौत की कोई चिंता नहीं है। महाविकास आघाड़ी सिर्फ खाट और कुर्सी के बारे में सोचने में मशगूल है। यह भी सोचने वाली बात है कि इतनी बेइज्जती के बाद क्या कॉन्ग्रेस और एनसीपी में कोई आत्मसम्मान बचा है? महाराष्ट्र चीन बन गया है (कोरोना के मामले में) और ये लोग आपस में ही लड़ने पर आमादा हैं।”

गौरतलब है कि पिछले दिनों अशोक चव्हाण और बालासाहेब थोराट ने कहा था कि महा विकास अघाड़ी के सहयोगियों में कुछ मुद्दे हैं, जिसे वो मुख्यमंत्री के साथ मिलकर सुलझाना चाहते हैं।