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बार-बार चेताने के बावजूद मरकज में होता रहा हज़ारों का जुटान, तबलीगी जमात के बचाव में उतरा लिबरल गैंग

दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित तबलीगी जमात का 6 मंजिला इमारत भारत में कोरोना वायरस के संक्रमण का सबसे बड़ा सोर्स बन कर उभरा है। वहाँ से निकाले गए लोगों में से अब तक 117 में संकमण की पुष्टि हो चुकी है। इनमें से कई ऐसे हैं जिन्होंने तबलीगी जमात के कार्यक्रमों में हिस्सा लिया था। सामने आए तथ्यों से स्पष्ट है कि तबलीगी जमात द्वारा सारे नियम-कायदों और सरकारी दिशा-निर्देशों की धज्जियाँ उड़ा कर मस्जिद में मजहबी कार्यक्रम आयोजित किए गए। बजाए इस घटना की निंदा करने के गिरोह विशेष के कई बड़े पत्रकार इसका बचाव करने में लग गए हैं। इनमें एक नाम राणा अयूब का भी है।

राणा अयूब ने तबलीगी जमात को क्लीन-चिट देने की कोशिश करते हुए एक खबर की लिंक साझा की है। साथ ही दावा किया है कि जब 22 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘जनता कर्फ्यू’ का ऐलान किया, तभी मरकज में सारे कार्यक्रमों को स्थगित कर दिया गया। इसके बाद अयूब ने वहाँ इतनी संख्या में लोगों के छिपे होने के पीछे रेलवे का दोष गिना दिया है, क्योंकि देश भर में रेल सेवा बंद हो गई। उन्होंने लिखा है कि ‘अचानक से’ रेल सेवा बंद किए जाने के कारण कई यात्री मरकज में ही फँस गए। यहाँ सवाल ये उठता है कि अगर वो लोग सरकार के साथ सहयोग कर रहे थे (जैसा कि दावा किया गया है), तो फिर उन्हें लेने भेजी गई एम्बुलेंस को क्यों वापस लौटा दिया गया?

अब हम आपको बताते हैं कि मरकज में कैसे जनता कर्फ्यू और उसके बाद हुए लॉकडाउन के दौरान भी धड़ल्ले से कार्यक्रम चल रहे थे और मौलाना-मौलवी कोरोना वायरस की बात करते हुए न सिर्फ़ तमाम मेडिकल सलाहों की धज्जियाँ उड़ा रहे थे, बल्कि अंधविश्वास भी फैला रहे थे। 24 मार्च को यूट्यूब पर ‘असबाब का इस्तेमाल ईमान के ख़िलाफ़ नहीं- हजरत अली मौलाना साद’ नाम से ‘दिल्ली मरकज’ यूट्यूब चैनल पर एक वीडियो अपलोड किया गया। इसमें मौलाना ने लोगों को एक-दूसरे के साथ एक थाली में खाने और डॉक्टरों की बात मानने की बजाए अल्लाह से दुआ करने की सलाह दी। यूट्यब पेज पर स्पष्ट लिखा है कि ये कार्यक्रम 23 मार्च को हुआ।

इस वीडियो की डेट देखिए, ये कार्यक्रम मरकज़ की इमारत में मार्च 23, 2020 को हुआ था

इस वीडियो में बीच-बीच में लोगों की खाँसने की आवाज़ भी आ रही है। इसका मतलब है कि समस्या को जानबूझ कर नज़रअंदाज़ किया गया। स्थिति ये है कि तमिलनाडु और तेलंगाना से लेकर दिल्ली तक समुदाय विशेष के कई लोगों में कोरोना वायरस के लक्षण पाए गए हैं, जिन्होंने मरकज के कार्यक्रमों में शिरकत की थी। अगर आप ‘दिल्ली मरकज’ के यूट्यब पेज पर जाएँगे तो आपको पता चलेगा कि 17 मार्च से लेकर अब तक वहाँ 24 से भी अधिक वीडियो अपलोड किए गए हैं। सभी वीडियो में स्थान दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित मरकज इमारत को ही बताया गया है। इनमें से कई वहाँ हुए कार्यक्रमों के फुल वीडियो हैं तो कई शार्ट क्लिप्स।

17 मार्च से लेकर अब तक दिल्ली मरकज की इमारत में लगातार कार्यक्रम होते रहे

कोई भी व्यक्ति उन लोगों का खुलेआम बचाव कैसे कर सकता है, जो सार्वजनिक रूप से सरकारी दिशा-निर्देशों और मेडिकल सलाहों को धता बताते हों? ऐसा नहीं है कि उन्हें समझाया नहीं गया था। दिल्ली पुलिस ने 23 मार्च को ही उन्हें समझाया था कि मरकज में हमेशा डेढ़-दो हजार की गैदरिंग होती है, इसे रोकना चाहिए। मौलानाओं को बुला कर कैमरे और सीसीटीवी के सामने ही पुलिस ने समझाया था। पुलिस ने बता दिया था कि सारे धार्मिक स्थान बंद हैं और 5 लोगों से ज्यादा की गैदरिंग पर रोक है। पुलिस ने समझाया था कि ये आपलोगों की सुरक्षा के लिए हैं, हमारी सुरक्षा के लिए नहीं है। मौलानाओं को बताया गया था कि सोशल डिस्टेंसिंग का जितना पालन किया जाएगा, उतना अच्छा रहेगा क्योंकि ये कोरोना वायरस कोई धर्म या मजहब देख कर आक्रमण नहीं करता है। पुलिस ने मौलानाओं को नोटिस थमाते हुए कहा गया था कि सभी दिशा-निर्देशों का पालन किया जाए। उस समय भी मरकज के लोगों ने स्वीकार किया था कि उनकी इमारत में 1500 लोग मौजूद हैं और 1000 लोगों को वापस भेजा जा चुका है। इनमें लखनऊ और वाराणसी से लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों के लोग शामिल हैं। दिल्ली मरकज में हमेशा ऐसे कार्यक्रम चलते रहे हैं और हज़ारों लोग जुटते रहे हैं। पुलिस ने इन्हें सख्त शब्दों में चेतावनी दी थी, लेकिन इसका कोई असर नहीं पड़ा।

दिल्ली सरकार ने 13 मार्च को ही आदेश जारी कर 200 लोगों की किसी तरह की गैदरिंग पर रोक लगा दी थी। उस समस्य इस आदेश की समयावधि 31 मार्च तक रखी गई थी। बावजूद इसके मरकज में कार्यक्रम आयोजित किए गए। 16 मार्च को ख़ुद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ऐलान किया कि दिल्ली में कहीं भी 50 लोगों से ज्यादा की भीड़ नहीं जुटेगी। फिर 21 मार्च को 5 से ज्यादा लोगों के जुटान पर रोक लगा दी गई। बावजूद इसके मरकज में हज़ारों लोग रोजाना होने वाले कार्यक्रमों में शिरकत करते रहे। वहाँ लोग रहते रहे। 22 मार्च को जनता कर्फ्यू लगाया गया। इसके एक दिन बाद भी वहाँ 2500 लोग मौजूद थे, जिनमें से 1500 के चले जाने का दावा मौलाना ने किया है। अब सोचिए, इनमें से कई कोरोना कैरियर होंगे, जिन्होंने हजारों-लाखों लोगों तक संक्रमण फैलाया होगा।

25 मार्च को लॉकडाउन के दौरान भी 1000 लोग वहाँ मौजूद थे। 28 मार्च को एसीपी ने दिल्ली मरकज को नोटिस भेजी लेकिन उन्होंने जवाब देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री ने अपील की थी कि जो जहाँ है वहीं रहे, इसीलिए वहाँ लोग रुके हुए हैं। साथ ही दावा किया गया कि इतने लोग काफ़ी पहले से यहाँ पर मौजूद हैं। उपर्युक्त सभी बातों से स्पष्ट पता चलता है कि दिल्ली मरकज ने हर एक सरकारी आदेश की धज्जियाँ उड़ाई और जान-बूझकर इस संक्रमण के ख़तरे को नज़रअंदाज़ कर पूरे देश को ख़तरे में डाल दिया। अकेले तमिलनाडु में 50 ऐसे लोगों को कोरोना वायरस संक्रमण हो गया है, जो मरकज के कार्यक्रमों में शामिल हुए थे। देशभर में ये संख्या और बढ़ेगी, ऐसी आशंका जताई जा रही है। फिर भी कुछ मजहबी ठेकेदार पत्रकारों की वेशभूषा में इनका बचाव करने में लगे हुए हैं।

नार्थ-ईस्ट दिल्ली की 5 मस्जिदों से 48 विदेशी मिले, 12 जामा मस्जिद में थे: मरकज से जुड़े हैं तार

दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके में आयोजित मरकज़ के कार्यक्रम में शिरकत करने वाले विदेशियों की जानकारी अब सामने आ रही है। बीते दिनों हमने देखा कि पटना, राँची, अहमदनगर, अमीनाबाद जैसे कई जगहों पर मस्जिद से विदेशी मुस्लिम मिले थे। इससे पहले इनकी पूरी पड़ताल खत्म होती दिल्ली के मरकज़ कार्यक्रम की हकीकत सामने आ गई और सारी तस्वीर साफ हो गई। अब ताजा जानकारी के अनुसार, दिल्ली में विदेशियों के मिलने का सिलसिला शुरू हो गया है। उत्तर-पूर्वी दिल्ली के 5 मस्जिदों से 48 विदेशी मुस्लिम मिले हैं। बताया जा रहा है कि इन विदेशी नागरिकों ने भी निजामुद्दीन इलाके में मरकज के कार्यक्रम में हिस्सा लिया था।

दिल्ली पुलिस ने केजरीवाल सरकार को इस संबंध में एक चिट्ठी लिखी है। इसमें पुलिस ने दिल्ली सरकार से 157 विदेशी नागरिकों के मामले में तत्काल कार्रवाई की माँग की है। पुलिस का कहना है कि ये सभी विदेशी नागरिक दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके में मरकज में हुए कार्यक्रम में मौजूद थे और फिलहाल दिल्ली की कई मस्जिदों और अन्य जगहों में रुके हुए हैं।

वजीराबाद की जामा मस्जिद में 12 विदेशी नागरिक मौजूद थे। इसको लेकर मस्जिद के मौलवी के खिलाफ केस दर्ज किया गया है। इसी तरह भरत नगर की मस्जिद से आठ विदेशी मिले हैं।

इस बीच मरकज विवाद पर दिल्ली पुलिस ने एक विडियो जारी किया है। 23 मार्च के इस विडियो में पुलिस के एक अधिकारी वहॉं जुटान को लेकर आपत्ति जता रहे हैं। विडियो से जाहिर है कि दिल्ली पुलिस के बार-बार चेतावनी देने के बावजूद मरकज के जिम्मेदारों लोगों ने वहॉं से लोगों को हटाने को लेकर गंभीरता नहीं दिखाई।

गौरतलब है कि दिल्ली पुलिस ने मरकज कार्यक्रम की अगुवाई करने वाले मौलाना के खिलाफ कोरोना संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए कोई जनसभा आयोजित नहीं करने और सामाजिक दूरी बनाए रखने संबंधी सरकारी आदेशों के उल्लंघन को लेकर मामला दर्ज किया है। बता दें, 15 मार्च तक निजामुद्दीन में हुए कार्यक्रम में इंडोनेशिया और मलेशिया समेत अनेक देशों के 2,000 से अधिक मुस्लिम आए थे। इन्होंने 1 से 15 मार्च तक हजरत निजामुद्दीन में तबलीगी जमात में भाग लिया था और इसके बाद इनमें से कई अलग-अलग राज्य की ओर रवाना हो गए, जबकि 1400 के करीब लोग वहीं रुके रहे।


सिसली में शवों से भरे 12 जहाजों से लेकर वुहान के कोरोना तक: हमेशा गतिशील धनाढ्य वर्ग के कारण फैले ऐसे विषाणु

पिछले कई सदियों में भारत समेत पूरी दुनिया ने कई महामारियों का कहर देखा। कभी चेचक, कभी प्लेग तो कभी स्पेनिश फ्लू और आज कोरोना। हर बार महामारी शब्द तक पहुँचने के सफर में बीमारियों के शुरुआती बिंदु गंदगी और नासमझी जैसे कारण रहे। मगर, बाद में इनका प्रसार निश्चित ही एक तबके की वजह से हुआ। ये तबका गतिशील लोगों का था। ये तबका धनाकांक्षियों का था। ये तबका प्रवसन की क्षमता रखने वालों का था और इस तबके में नाविक, सैनिक, मिशनरी, प्रवासी, पर्यटक, व्यापारी सब आते थे। इतिहास गवाह रहा है कि जिनमें विदेशी शहरों तक जाने की क्षमता होती है, वही किसी भी महामारी के प्रथम वाहक होते हैं। हाँ बाद में इसका दोष स्थानीय गरीबों एवं मध्य वर्गीय लोगों पर मढ़ दिया जाता है। जैसे कोरोना के समय में हो रहा है।

सबसे पहले बात करें 14 वीं सदी में फैले प्लेग की। ये एक ऐसी बीमारी थी जिसने जब फैलना शरू किया तो यूरोप की आधी संख्या को निगल लिया। बताया जाता है एक समय में करीब 12 जहाज इटली (एक यूरोपीय शहर) के सिसली बंदरगाह पर पहुँचे। मगर, उससे कोई नीचे नहीं उतरा। इसके बाद लोगों ने अंदर जाकर देखा तो वहाँ लगभग सभी जहाज सवार मरे पड़े थे और इनमें से केवल कुछ ही जिंदा थे। शवों से भरा जहाज देखकर पहले तो लोग वहाँ हैरान हुए, मगर बाद में उन शवों को सामूहिक रूप से दफन कर दिया। इस समय तक वहाँ लोगों को ये नहीं मालूम था कि ये संक्रामक बीमारी है और उन शवों को छूने का नतीजा उन्हें लंबे अरसे तक भुगतना पड़ेगा। देखते ही देखते वहाँ के हालात बदतर हो गए। लोगों ने पहले घरों से निकलना बंद किया और बाद में घर के सदस्यों से मिलना-जुलना। उस समय खुद को अलग करने के सिवा कोई वहाँ के लोगों पर कोई चारा नहीं बचा। इस दौरान इस प्लेग को ब्लैक डेथ का नाम दिया गया। बाद में शोधों से पता चला कि ये चीन की देन थी, जो सिल्करूट के जरिए बंदरगाह तक पहुँचे थे।

बता दें, आज जिस कोरोंटाइन शब्द का प्रयोग धड़ल्ले से किया जा रहा है उसके बारे एक व्याख्या नाविकों से जुड़ी है, जो कहती है कि पहले गतिशील वर्ग का ये तबका खुद को महामारियों से बचाने के लिए जहाज खोलने और यात्रा के लिए प्रस्थान से पहले एकांतवास करते थे। उसे ही कोरोंटाइन कहा जाता था। हम कह सकते हैं कि इसका संबंध उनके गतिशील होने से था। मगर, प्लेग जैसी महामारियाँ एक समुदाय और वर्ग तक पहुँचने के बाद थमने का नाम कहाँ लेती हैं और इन्हें फैलाने वाले भी अपनी गलती कब मानते हैं? भारत की बात करें तो 1817 के आसपास प्लेग ने यहाँ भी महामारी का रूप लिया। इसे फैलाने की जिम्मेदार ब्रिटिश सेना की टुकड़ियाँ थी। जो एक राज्य से दूसरे राज्य घूमकर, इसे पसारते रहे। मगर, बाद में ब्रिटिश सैनिकों और व्यापारियों के जरिए ये इंग्लैंड पहुँच गया और वहाँ इसे भारतीय प्लेग नाम दिया गया। सोचिए, जो भारतीय जनता खुद इसकी पैसिव रेसिपिएंट थी, उन्हें इस चरण में जाकर इस बीमारी का प्रथम संवाहक बना दिया गया और उनकी बात दोयम दर्जे का।

ये ध्यान रखने वाली बात है महामारियाँ यात्रा करती हैं। उड़ान भरती हैं। और इसी माध्यम से वे एक स्थान से दूसरे स्थान पर तबाही मचाती हैं। ये तबाही कभी युद्ध के रूप में जाती है। कभी व्यापार के रूप में। इसका कोई चेहरा नहीं होता। कोई आकार नहीं होता। पहले के समय में ये अच्छी बात थी कि हवाई सुविधा उपलब्ध न होने के कारण इन महामारियों को सुदूर इलाकों तक पहुँने में समय लगता था और कई बार कुछ गाँव-नगर इनके कहर से छूट भी जाते थे। मगर, अब तकनीक के जरिए दुनिया मुट्ठी में होने के कारण संक्रमण का काम आसान हो गया है।

दुनिया में बीमारियों के महामारी बनने तक का सफर उपनिवेशों की खोज और उनपर अपना साम्राज्य स्थापित करने की लड़ाई से शुरू हुआ और व्यापार के फैलाव के साथ इनका प्रसार भी तेज हुआ। इतिहास पर गौर करें, तो जैसे-जैसे उपनिवेशाद के कारण विस्थापन और प्रवसन की प्रक्रियाओं में तेजी आई वैसे-वैसे पूरी दुनिया को महामारियों ने जकड़ लिया। इसी बिंदु को इंगित करवाते हुए  प्रोफेसर नोआ हरारी अपनी किताब में भी लिखते हैं कि यूरोपीय सभ्यताओं ने उपनिवेशवाद के दौर में हर जगह की मूल सभ्यताओं में बाहरी जीवाणु और तमाम वैसी बीमारियाँ ले गए जो ऐसी जगहों पर कभी नहीं थी। अपनी किताब “आने वाली कल का संक्षिप्त इतिहास” में वे हवाइयाँ द्वीप का जिक्र करते हैं और लिखते हैं कि 2 सदी पहले 18 जनवरी 1778 में एक ब्रटिश कैप्टेन जेम्ल कुक हवाईयाँ पहुँचा। उस समय वहाँ की संख्या 5 लाख के करीब थी। ये लोग यूरोपीय देशों और अमेरिका से कटकर रहते थे। मगर कुक ने वहाँ पहुँचकर पहली बार फ्लू, ट्यूबरक्लूसिस, सिफिलिस पैथोजन जैसी बीमारियों को फैलाया। इसके बाद अन्य यूरोपीय पर्यटकों ने यहाँ आकर टायफायड और स्मॉलपॉक्स का प्रसार किया। नतीजतन हवाई में 1853 तक केवल 70,000 सर्वाइवर जिंदा बचे।

इसके बाद स्पैनिश फ्लू के फैलने के पीछे भी यही हाल था। नोहा हरारी बताते हैं कि 1918 में अचानक उत्तरी  फ्राँस में लोगों के मौत की खबरें आने लगीं। उनमें अजीब तरह का फ्लू देखा गया। बाद में इस फ्लू संक्रमक क्षमता देखकर इसे स्पेनिश फ्लू नामक महामारी का नाम मिला। ये इतनी खतरनाक थी कि इसने दुनिया भर के 5 करोड़ लोगों का निगल लिया था। और इसके फैलने का कारण भी वही लोग थे। जिनमें प्रवसन उस समय सबसे अधिक होता था यानी सैनिक टुकड़ियाँ। कह सकते हैं इस महामारी के तेजी से फैलने के पीछे विश्व युद्ध भी एक बड़ा कारण था।

इसी तरह, चेचक। 5 मार्च 1520 को जहाज़ों का एक छोटा-सा बेड़ा क्यूबा के द्वीप से मैक्सिको की ओर रवाना निकला। इन जहाज़ों में घोड़ों के साथ 900 स्पेनी सैनिक, तोपें और कुछ अफ़्रीकी गुलाम सवार थे। इनमें से एक गुलाम, फ्रांसिस्को दि एगिया था। जो अपनी देह पर चेचक के विषाणु को एक जगह से दूसरी जगह ले जा रहा है। हालाँकि फ्रांसिस्को को इसकी जानकारी नहीं थी, लेकिन उसकी खरबों कोशिकाओं के बीच वो घातक विषाणु कई लोगों को मौत की नींद सुलाने के लिए सफर कर रहा था। फ़्रांसिस्को के मैक्सिको में उतरने के बाद इस विषाणु ने उसके शरीर में तेज़ी के साथ बढ़ना शुरू कर दिया, और अन्ततः उसकी त्वचा पर भयावह फुँसियों के रूप में फूट पड़ा। जब उसमें इसके लक्षण दिखने शुरू हुए तो फ़्रांसिस्को को केम्पोआलान नगर स्थित एक स्थानीय अमेरिकी परिवार के घर पर बिस्तर पर ले जाया गया। जहाँ पहुँचकर उसने सबसे पहले उस परिवार के सदस्यों को संक्रमित कर दिया और उस परिवार ने अपने पड़ोसियों को। दस दिन के भीतर केम्पोआलान एक क़ब्रगाह में बदल गया। बाद में शरणार्थियों ने इस बीमारी को आसपास के नगरों तक फैला दिया। मगर फिर भी, कई प्रायद्वीपों के लोगों ने ये मान लिया कि ये बीमारी कुछ दुष्ट देवताओं की साजिश है जो उड़कर इस बीमारी को फैलाते हैं। यानी उस समय भी ये गतिशील वर्ग (चाहे फ्रांसिसकों या फिर शर्णार्थी) दोषी करार नहीं दिए गए।

इन उदाहरणों से गौर करिए कि पैनडेमिक के पीछे कभी भी गरीब, पिछड़े और आम जीवन व्यतीत करने वालों का हाथ नहीं रहा। इसके पीछे प्राय: धनी, सुदृढ़, प्रवासी, धनाकांक्षी, गतिशील लोग होते थे और आज भी स्थिति वही है। फिर चाहे देश में पहला कोरोना केस बना वुहान से लौटा केरल का छात्र हो या लंदन से लौटी कनिका कपूर। सब एक समृद्ध समाज का हिस्सा हैं। जिनके लिए आज यहाँ कल वहाँ एक आम बात है।

वुहान के अलावा अगर किसी भी देश की गरीब जनता इस समय कोरोना बीमारी का शिकार होती है। तो जाहिर है वह उसकी पैसिव रेसिपिएंट होगी। मगर, धीरे-धीरे उन्हें ही इसका मुख्य संवाहक बना दिया जाएगा। जैसे 18 वीं सदी में भारतीय प्लेग के दौरान किया गया। महामारी तो सैनिकों और औपनिवेशिक गतिविधियों से जुड़े आयरिश लोगों के माध्यम से फैली। लेकिन उसका सारा ठीकरा फूटा भारतीय जनता पर। ऐसे ही यूरोप और अमेरिकी भूखंड में भी हुआ। वहाँ तो कई बार महामारियों के प्रसार के लिए स्थानीय यहूदी समुदाय को जिम्मेदार बताया गया और इसके लिए उन्हें दंड भी दिया गया। कोरोना के समय में यही प्रक्रिया चालू है।

गौरतलब है कि ये पश्चिमी देशों की सनक ने न केवल युद्द, व्यापार, दुनिया की खोज करने वाले अभियानों को बढ़ावा दिया। बल्कि इनके साथ महामारियों को भी एक माध्यम दिया। जिसके जरिए ये सफर करती रहीं और मानवता को चपेट में लेती रहीं। इस गतिशील कहे जाने वाले वर्ग ने विभिन्न जीवनशैलियों का अलग-अलग देशों में लेन-देन कराया मगर साथ ही ये भी साबित किया कि इनके प्रवसन के साथ साथ समाज में सिर्फ़ धन और दूसरे देशों की जीवनशैलियाँ नहीं आतीं बल्कि इनके साथ बीमारी और महामारियाँ भी आती हैं। जो नई धरातल पर, नए लोगों को देखकर नया विस्तार पाती हैं।

याद दिला दें, महात्मा गाँधी ने अपनी दूरदर्शिता से इन्हीं परिणामों को आँका था। उन्होंने बीमारियों को महामारी में तब्दील होते देखा था। उन्होंने महसूस किया था कि एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए सुविधाएँ जितनी विकसित होंगी, उसके साथ ही विकसित होगी महामारी फैलने की तेज रफ्तार। शायद यही कारण था कि उन्होंने रेल कॉन्सेप्त से मन कचोटा। उनका मानना था कि रेल का इस्तेमाल न केवल ब्रिटिश अपनी पकड़ जमाने के लिए करेंगे बल्कि इससे महामारियाँ भी फैलेंगी और व्यापारी ही इसका लाभ उठा पाएँगे। आज हम संदर्भ में कोरोना से जूझते हुए इसकी बात की महत्ता को समझ सकते हैं।

तमिलनाडु में सामने आए कोरोना के 50 नए मामले, प्रदेश से निजामुद्दीन मरकज में शामिल हुए 1500, 501 की हुई पहचान

लॉकडाउन के बीच पूरा देश कोरोना वायरस के खिलाफ जंग लड़ रहा है, लेकिन ऐसे में दिल्ली के निजामुद्दीन में हुए एक मजहबी सम्मेलन से निकले जमातियों ने पूरे देश में हड़कंप पैदा कर दिया है। अब देश में लगातार तेजी से बढ़ते मामलों के बीच तमिलनाडु से 50 कोरोना के नए मरीज सामने आए हैं। आश्चर्य की बात यह कि इन 50 नए मरीजों में से 45 मरीज वह हैं, जिन्होंने दिल्ली के निजामुद्दीन में हुए मजहबी सम्मेलन में हिस्सा लिया था। सम्मेलन में तमिलनाडु से शामिल होने वाले 501 जमातियों की पहचान हो गई है।

निजामुद्दीन से निकले जमातियों की जानकारी के बाद सभी राज्य अपने-अपने यहाँ जमातियों की पहचान करने में लगे हुए हैं। वहीं तमिलनाडु के स्वास्थ्य सचिव नीला राजेश ने जानकारी देते हुए बताया कि करीब 1,500 लोगों का एक बड़ा समूह दिल्ली धार्मिक सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए गया था, जिसमें से 1130 लोग तो लौट आए, लेकिन शेष सभी लोग दिल्ली में ही रह गए। साथ ही वापस लौटे लोगों में से 515 लोगों की पहचान कर ली गई है, जिनमें से 45 लोगों के कोरोना पॉजीटिव पाया गया है। इसके अतिरिक्त 5 और अन्य कोरोना के केस सामने आए हैं। दिल्ली से लौटने वाले लोगों की पहचान के बाद सभी को क्वारंटाइन किया जा रहा है।

इसी के साथ तमिलनाडु में कोरोना पॉजिटिव मामलों की संख्या बढ़कर अब 124 हो गई है। अब आशंका जताई जा रही है कि इन आँकड़ों में अभी और इजाफा हो सकता है। गौरतलब है कि मुख्यमंत्री के. पलानीस्वामी ने कहा था कि तमिलनाडु से हाल ही में एक आयोजन में भाग लेने दिल्ली गए लोगों में से भी कुछ लोग संक्रमित हुए हैं। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु से करीब 1,500 लोगों का समूह दिल्ली गया था।

45 किचेन, रोज बाँटे जा रहे 75000 पैकेट: लगे हैं ‘सेवा भारती’ के 5000 कार्यकर्ता, गोमाता का भी रखा जा रहा ध्यान

दिल्ली में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ काफ़ी काम कर रहा है और लगातार जनसेवा में लगा हुआ है। संघ के संगठन ‘सेवा भारती’ ने पूरी दिल्ली में ग़रीबों को खाना खिलाने से लेकर बेसहारा लोगों को ज़रूरी संसाधन मुहैया कराने के लिए दिन-रात एक किया हुआ है। आइए, यहाँ जानते हैं कि ‘सेवा भारती’ ने अब तक दिल्ली में क्या-क्या किया है। 5000 संघ कार्यकर्ता लगातार लोगों के बीच भोजन बाँटने में लगे हुए हैं। अगर वैसी स्थिति आती है तो रोजाना डेढ़ लाख भोजन के पैकेट वितरित किए जाएँगे। फ़िलहाल 75 हज़ार भोजन के पैकेट रोज बाँटे जा रहे हैं।

पूरी दिल्ली में 45 किचेन काम कर रहे हैं। समाजसेवा में डॉक्टरों और सरकार की सलाहों का भी पूरा ध्यान रखा जा रहा है। सोशल डिस्टन्सिंग का पालन किया जा रहा है। प्रत्येक कार्यकर्ता की जिम्मेदारी है कि वो एक स्थानीय बुजुर्ग की पूरी जिम्मेदारी उठाए और उनकी दवाओं से लेकर भोजन तक का इंतजाम किया जा रहा है। पूरी दिल्ली में क्राउड मैनेजमेंट के लिए भी काम किया जा रहा है। जैसे, आनंद विहार में जब केजरीवाल सरकार ने हजारों-लाखों मजदूरों को यूपी सीमा पर ढाह दिया, तब वहाँ अफरातफरी मचने पर 250 संघ कार्यकर्ताओं ने जाकर लोगों को सँभालने में पुलिस की मदद की।

दिल्ली की गायों का भी ध्यान रखा जा रहा है। गौशालाओं का ख्याल रखा जा रहा है। आवारा पशुओं और पक्षियों, जैसे गायों और कुत्तों के खाने-पीने का पूरा इंतजाम किया जा रहा है। दिल्ली के लिए ‘युवा हेल्पलाइन’ जारी किया गया है। ऐसा ही हेल्पलाइन नॉर्थ-ईस्ट के युवाओं के लिए भी जारी किया गया है। अकेले सोमवार (मार्च 30, 2020) को इस हेल्पलाइन नंबर पर 12,500 फोन कॉल्स आए। आज दिन भर में लगभग 30 हज़ार फोन कॉल्स आए। हेल्पलाइन नंबर पर भोजन और दवा से लेकर ट्रांसपोर्टेशन तक के लिए विकल्प उपलब्ध कराए गए हैं।

साथ ही डोनेशन के लिए भी विकल्प दिया गया है। साथ ही स्वयंसेवकों को भी स्वेच्छा से काम में लगाया जा रहा है। अब तक 750 लोगों से रजिस्टर कराया गया, जिन्हें अलग-अलग काम सौंपे गए हैं। 11 लोगों की टीम बनाई गई है, जो लगातार कॉल-मॉनिटरिंग में लगे हुए हैं। इसके अलावा 15 लोगों की डिलीवरी मॉनिटरिंग टीम बनाई गई है। अप्रैल 1, 2020 से ‘रॉ मटेरियल पैकेजिंग सेंटर’ भी चालू हो जाएगा। किसी भी सेवा के लिए रुपए नहीं लिए जा रहे हैं। सारी सेवाएँ मुफ्त ही दी जा रही है।

सेवा भारती ने आश्वासन दिया है कि एक ग्लोबल हेल्थ सेंटर का भी निर्माण किया जाएगा, जिसके लिए संगठन के पास पूरी क्षमता है और इसके लिए पूरी लगन भी है। हरि नगर स्कूल में मटेरियल सेंटर का भी निर्माण किया गया है। संगठन किसी इमरजेंसी स्थिति से निपटने के लिए हमेशा 20 हज़ार लोगों का राशन स्टोर में रखता है। ऐसी कई टीमें मौजूद हैं, जिनकी मदद से लोगों तक और उनके घरों तक पहुँचा जा रहा है।

मक्का से लौटे, क्वारंटाइन का नियम तोड़ा, मुहर मिटाई: माँ-बेटे पॉजिटिव, पीलीभीत के 35 लोगों पर मुकदमा

कोरोना वायरस ने जब तक भारत में प्रवेश भी नहीं किया था उसके पहले से ही सरकार ने भारत के अधिकांश हवाई अड्डों को सील कर दिया था, जहाँ से विदेशों से आने वाले लोगों को जाँच के बाद ही भारत में प्रवेश करने दिया जा रहा था। इसी बीच कुछ वायरस को गंभीरता से न लेकर कुछ यात्रियों द्वारा की गई लापरवाही आज पूरे देश के लिए भारी पड़ रही है। यही कारण है कि अब ऐसे लोगों के खिलाफ प्रशासन ने शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। कुछ ऐसा ही एक मामला उत्तर प्रदेश के जिला पीलीभीत से आया है। सऊदी अरब के मक्का से लौटने के बाद क्वारंटाइन का नियम तोड़ने वाले पीलीभीत के 35 लोगों के खिलाफ पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया है।

पीलीभीत के डीएम वैभव श्रीवास्तव ने जानकारी देते हुए बताया कि थाना अमरिया क्षेत्र के रहने वाले 35 लोग 25 फरवरी को उमरा करने के लिए सऊदी अरब गए थे, जो कि 20 मार्च को सऊदी अरब से मुंबई के एयरपोर्ट पहुँचे थे, जहाँ सभी की स्क्रीनिंग की गई। जाँच में संदिग्ध पाए जाने पर सभी लोगों को कोरोना वायरस संदिग्ध की मुहर लगाई गई और सभी लोगों को घरों में पृथक रहने के निर्देश दिए गए थे साथ ही 14 दिनों तक अपने घरों से न निकलने की भी सलाह दी गई थी, लेकिन सभी ने गाँव में पहुँचते ही एयरपोर्ट पर लगाई गई मुहर को एक खास स्प्रे से मिटा लिया।

वहीं बाद में इन 35 लोगों में से एक माँ और बेटे के कोरोना वायरस से संक्रमित होने की पुष्टि हुई, तो इस बात का खुलासा हुआ कि सभी लोगों ने क्वारंटाइन का पालन नहीं किया और हाथ पर लगाई गई मुहर को भी हटा लिया था। इसके बाद सभी 35 लोगों के खिलाफ नियमों का उल्लंघन करने पर मामला दर्ज कराया गया है। अमरिया के थाना अध्यक्ष उदयवीर सिंह ने बताया कि स्वास्थ्य विभाग की तहरीर के आधार पर 35 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। इसमें कोरोना संक्रमित माँ-बेटे का नाम भी शामिल है। उधर उत्तर प्रदेश में कोरोना से संक्रमित मरीजों की संख्या 100 के पार हो गई है। साथ ही योगी सरकार मस्जिदों में छापेमारी कराकर दूसरे प्रदेशों से आए जमातियों पर शिकंजा कसने में लगी हुई है।

जम्मू कश्मीर पर भारत को बदनाम करने में लगा है ध्रुव राठी, बलूचिस्तान पर साध लेता है चुप्पी

ध्रुव राठी ख़ुद को विश्व के सभी मामलों का जानकार मानता है। भूत और भविष्य से लेकर वर्तमान तक पर उसकी पकड़ उसके ‘भक्तों’ की नज़र में इतनी मजबूत है कि उसका एक-एक वीडियो को प्रोपेगंडा फैलाने के लिए हथियार बनाया जाता है। इससे पहले हमने बताया था कि किस तरह राठी पहले कोरोना वायरस को मीडिया द्वारा फैलाया गया हौवा बता रहा था और दावे कर रहा था कि चीन से बाहर के लोगों को इससे जरा भी डरने की ज़रूरत नहीं है। अब यही ध्रुव राठी कोरोना के इलाज से लेकर इसके प्रसार तक पर भाषण देता है और ‘भक्तगण’ बड़े चाव से प्रवचन की तरह सुनते हैं।

इसी बीच उसका एक और प्रोपेगंडा सामने आया है। वो कई देशों के स्वतंत्रता संग्राम पर भी वीडियो बनाता रहा है। इस दौरान वो जम्मू कश्मीर का नाम तो लेता है लेकिन कभी भी बलूचिस्तान के बारे में कुछ नहीं कहता। जबकि सच्चाई ये है कि पाकिस्तान में बलूचिस्तान के लोग आज़ादी के लिए कई दशकों से संघर्ष कर रहे हैं और पाकिस्तानी फ़ौज लम्बे समय से उनका दमन करती आई है। ध्रुव राठी ने एक वीडियो बना कर जम्मू कश्मीर में कर्फ्यू लगाने और वहाँ हिरासत में लिए जाने पर सवाल खड़ा किया था।

साथ ही ध्रुव राठी तिब्बत और हॉन्गकॉन्ग पर वीडियो बनाता है तो कश्मीर की भी चर्चा करता है। नीचे संलग्न की गई तस्वीरों में आप देख सकते हैं कि वो किस तरह कश्मीर मुद्दे पर भारत को बदनाम करता है। अपनी वीडियो में ध्रुव राठी ने यहाँ तक दावा किया था कि जम्मू कश्मीर में लोगों को भारत के बाकी राज्यों की तरह अधिकार नहीं मिलते। जबकि ये बिलकुल असत्य है। वहाँ सरकार सारी सुविधाएँ पहुँचाने के लिए कार्यरत रहती है और सेना वहाँ इसीलिए है ताकि पाकिस्तानी आतंकियों से वहाँ के नागरिकों को बचाया जा सके।

जब चीन में भारतीय छात्र फँसे हुए थे, तब उनमें कई कश्मीरी भी थे। वहाँ कोरोना वायरस के बढ़ते ख़तरे को देखते हुए भारत ने सभी कश्मीरी छात्रों को वहाँ से निकाला और उन्हें वापस लाया। एक कश्मीरी छात्र ने पीएम मोदी को इसके लिए धन्यवाद भी दिया। निज़ाम नामक मेडिकल छात्र ने बताया कि वो और उसके साथी भारत में उनलोगों के लिए किए गए इंतजामों से पूर्णतया ख़ुश थे। बावजूद इसके राठी जैसे लोग प्रोपेगंडा फैलाने में व्यस्त रहते हैं।

इस्लाम का राज स्थापित करना चाहता है तबलीगी जमात, आतंकियों से हैं सम्बन्ध: जानिए इसका पूरा इतिहास

बीते कुछ दिनों से दिनों से आप लगातार तबलीगी जमात का नाम सुन रहे होंगे। आपके मन में आ रहा होगा कि ये क्या है और इसका मतलब क्या है। निजामुद्दीन में इसके कई लोग एक मस्जिद में छिपे हुए पकडे गए हैं, तब से लोग इसके बारे में जानना चाह रहे हैं। कहा जाता है कि 2010 में तबलीगी जमात के 150 देशों में 8 करोड़ अनुयाई थे। इस शब्द का अर्थ हुआ एक ऐसा समाज, जो एक प्रकार की आस्था को फैला रहा है। ये एक वैश्विक सुन्नी इस्लामिक संगठन है, जिसकी जड़ें भारत में जमी हुई हैं। मौलाना मुहम्मद इल्यास कांधलवी इस जमात का संस्थापक था।

तबलीगी जमात का उद्देश्य है कि फिर से इस्लाम का राज्य स्थापित किया जाए, खिलाफत का राज स्थापित किया जाए और लोगों को इस्लाम के उस रूप की तरह ले जाया जाए, जैसे पैगम्बर मुहम्मद ने कहा था। चाल-ढाल से लेकर मजहबी प्रक्रियाओं तक, ये चाहता है कि सभी लोग पुराने सुन्नी तौर-तरीकों की ओर लौटें। इस आंदोलन की शुरुआत ही हुई थी हिन्दुओं से जूझने के लिए। इसका मानना है कि आधुनिक इस्लाम ‘हिन्दुओं से निपटने’ में नाकाम रहा है, इसीलिए गाँव-गाँव घूम कर सुन्नी इस्लाम की विचारधारा को फैलाया जाए। हालाँकि, इसके लोगों का कहना है कि धर्मान्तरण का वो कोई कार्य नहीं करते बल्कि सिर्फ अपने अनुयायियों पर ही फोकस रखते हैं।

इसकी शुरुआत 1926 में हुई थी। पहले इस्लामिक उपदेशकों का समूह बनाया गया था, जो इसके समर्थकों को घर-घर जाकर इस्लाम की शिक्षा देता था। ये लोग मस्जिदों में डेरा डालते हैं और फिर स्थानीय लोगों को नमाज और इज्तेमा के लिए बुलाते हैं, जहाँ उन्हें सिखाया-पढ़ाया जाता है। ये इस्लामिक उपदेशक अधिकतर 40 दिनों की यात्रा पर निकलते हैं और मस्जिदों में ही रुकते हैं। हालाँकि, ये उनके अनुभव पर निर्भर करता है कि वो और ज्यादा दिनों की यात्रा पर जाएँ या नहीं- जैसे 120 दिनों की। जम्मू कश्मीर में अचानक से कोरोना वायरस के मामले बढ़ जाने के पीछे भी तबलीगी जमात ही कारण है।

तबलीगी जमात ख़ुद के ग़ैर-राजनीतिक होने के दावे भी करता रहा है। पाकिस्तानी क्रिकेटर शाहिद अफरीदी से लेकर आईएसआई के प्रमुख रहे जावेद नसीर तक इसका अनुयायी रहे हैं। कई अन्य पाकिस्तानी सेलेब्रिटी भी तबलीगी जमात में शामिल हैं। हालाँकि, समुदाय विशेष में इस जमात को लेकर आपस में ही सिर-फुटव्वल चलती रहती है। सऊदी अरब में सुन्नी वहाबी उलेमाओं ने तो मुल्क में तबलीगी जमात द्वारा मजहबी उपदेश की गतिविधियाँ करने पर रोक लगाई ही है। इसके लिए फतवा भी जारी किया गया था।

तालिबान और अलकायदा से लेकर तमाम आतंकवादी संगठनों से इस जमात के सम्बन्ध सामने आते रहे हैं और उनके साथ इनकी बैठकें होती रहती हैं। ग्लासगो एयरपोर्ट पर हुए हमले में कफील अहमद नामक भारतीय नागरिक गिरफ़्तार किया गया ता, जो तबलीगी जमात से जुड़ा हुआ था। लश्कर-ए-तैयबा का सूडानी सरगना हामिर मोहम्मद जमात का सदस्य बन कर ही पाकिस्तान पहुँचा था। अलकायदा के कई बड़े आतंकी भी तबलीगी जमात के नाम पर अपनी गतिविधियाँ संचालित करते रहे हैं।

तबलीगी जमात पर पूरी चर्चा इस वीडियो में सुन सकते हैं

मेरठ में मौलाना के घर से पकड़े 14 जमाती, एक भी पॉजीटिव निकला तो टूट सकता है पूरे गाँव पर कहर

दिल्ली के निजामुद्दीन में हुई घटना ने पूरे देश में हड़कंप मचा दिया है। यही कारण है कि पहले तो मरकज में शामिल होने वाले जमातियों को खोज-खोजकर क्वारंटीन किया जा रहा है। वहीं योगी सरकार ने भी अपने प्रदेश में ऐसे जमातियों को खोजने का अभियान शुरू कर दिया है, जो लॉकडाउन के बाद भी दूसरे देशों या प्रदेशों से उत्तर प्रदेश में आकर इस्लाम के प्रचार के नाम पर गाँव-गाँव लोगों से मिलते हुए घूम रहे हैं या फिर मस्जिदों में ठहर रहे हैं। इसी कार्रवाई के तहत यूपी पुलिस ने मेरठ के मौलवी के घर से 14 जमातियों को हिरासत में लिया है। इसके बाद सभी को जाँच के लिए क्वारंटीन किया गया है।

न्यूज 18 हिंदी की खबर के मुताबिक मेरठ के काशी में एक मौलाना के घर से पकड़े गए 14 जमाती नेपाल, बिहार, दिल्ली और महाराष्ट्र के हैं, जो कि एक मस्जिद में रह रहे थे, लेकिन निजामुद्दीन में हुई घटना के बाद से मस्जिदों पर हो रही छापेमारी के बाद एक मौलाना ने इन जमातियों को अपने घर में छिपा लिया था। जानकारी के मुताबिक इंटेलीजेंस इनपुट के बाद पुलिस ने इन सभी को पकड़ा है। इसके बाद सभी को पुलिस ने क्वारंटीन करके सैंपल जाँच के लिए भेज दिए हैं। वहीं यूपी पुलिस अब आरोपी मौलाना के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की तैयारी कर रही है।

दूसरी ओर गाँव में छापेमारी के दौरान पकड़े गए जमातियों को देख गाँव में हड़कंप मच गया है और लोगों को भय है कि इनमें से अगर एक भी जमाती को कोरोना पॉजीटिव पाया जाता है तो एक मौलाना की गलती पूरे गाँव पर भारी पड़ सकती है, क्योंकि जमातियों ने मस्जिद में रहने के दौरान कई बार गाँव में भ्रमण किया था और सैकड़ों लोगों से अलग-अलग समय में मुलाकात भी की थी। अब सभी को रिपोर्ट का इंतजार है। दरअसल, इन सभी जमातियों ने दिल्ली में हुए मजहबी सम्मेलन में हिस्सा लिया था।

आपको बता दें कि निजामुद्दीन में हुए मजहबी सम्मेलन में उत्तर प्रदेश के 157 जमातियों ने हिस्सा लिया था। इसके बाद से यूपी सरकार ने सभी की पड़ताड़ करके क्वारंटीन करने का निर्देश दे दिया है। इसेक बाद से ही यूपी पुलिस जगह-जगह मस्जिदों में छापेमारी कर रही है। वहीं जमात से लौटे तेलंगाना के 6 लोगों समेत 10 की कोरोना वायरस के चलते मौत हो चुकी है।

निजामुद्दीन तबलीगी मरकज मामले में दिल्ली पुलिस की बड़ी कार्रवाई, मौलाना साद सहित कई अन्य के खिलाफ मुकदमा दर्ज

दिल्ली के निजामुद्दीन में कानून को ताक पर रख आयोजित किए गए मजहबी सम्मलेन और फिर उसके बाद आयोजकों द्वारा की गई लापरवाही को लेकर दिल्ली पुलिस ने बड़ी कार्रवाई की है। दिल्ली पुलिस ने तबलीगी जमात के मौलाना साद सहित कई अन्य के खिलाफ कई धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है। दरअसल, दिल्ली पुलिस ने यह कार्रवाई उपराज्यपाल के आदेश पर की है। इससे पहले दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने उपराज्यपाल को पत्र लिख आरोपितों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की थी।

वहीं निजामुद्दीन मरकज मामले में दिल्ली पुलिस कमिश्नर ने जानकारी देते हुए बताया कि इस मामले में दिल्ली पुलिस को एलजी की तरफ से दिशा निर्देश मिलने के बाद मौलाना साद सहित कई के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया गया है। इन सभी लोगों पर नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है। इनके खिलाफ आईपीसी की धारा 269, 270, 271 के तहत मामला दर्ज किया गया है। अब दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच आगे इस मामले की जाँच करेगी।

आपको बता दें कि दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन स्थित मरकज में मलेशिया, इंडोनेशिया, सऊदी अरब और किर्गिस्तान समेत कई देशों के करीब 2500 से अधिक लोगों ने 1 से 15 मार्च तक तबलीग-ए-जमात में हिस्सा लिया था। जिनका पता लगने के बाद से पूरे इलाके की कड़ी निगरानी की जा रही है और हर संदिग्ध को अस्पताल में एहतियात के तौर पर भर्ती किया जा रहा है। इनमें से 24 लोगों की रिपोर्ट कोरोना पॉजिटिव पाई गई है, इतना ही नहीं इसमें शामिल होने वाले तेलंगाना के 6 जमातियों की अभी तक मौत भी हो चुकी है। वहीं जम्मू कश्मीर में हुई 65 वर्षीय मृतक ने भी इस मजहबी सम्मेलन में हिस्सा लिया था।

बताया जा रहा है कि दिल्ली स्थित कार्यक्रम में शामिल होने वाले विदेशी जमातियों का ग्रुप दिल्ली आने से पहले 27 फरवरी से 1 मार्च के बीच मलेशिया गया था, जहाँ ये लोग एक धार्मिक जलसे में शामिल हुए थे। वहीं आपको बता दें कि दिल्ली में कोरोना के अभी तक 97 केस सामने चुके हैं, जिनमें से 24 मामले निज़ामुद्दीन मरकज़, 41 मामले विदेश की यात्रा करने वालों के और 22 विदेशी यात्रियों के परिवार के सदस्य हैं, जबकि 10 मामले ऐसे हैं, जिनका अभी तक पता नहीं चल सका है। वहीं पूरे देश में कोरोना से मरने वालों की संख्या 32, जबकि इससे संक्रमित लोगों की संख्या 1300 के पार हो गई है।