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4 साल के बच्चे को चू**या कहने पर NGO ने स्वरा भास्कर के ख़िलाफ़ करवाई शिकायत दर्ज

4 साल के बच्चे पर अभद्र और नस्लवादी टिप्पणी करने के आरोप में लीगल राइट्स प्रोटेक्शन फोरम नामक एक NGO ने स्वरा भास्कर के ख़िलाफ राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग में कानूनी शिकायत दर्ज करवाई है।

अपने पत्र में आयोग के अध्यक्ष को एनजीओ ने स्वरा द्वारा एक कार्यक्रम में बाल कलाकार पर की गई टिप्पणी के बारे में शिकायत की। एनजीओ ने पत्र में लिखा कि स्वरा भास्कर ने ‘सन ऑफ अबिश’ नामक एक यूट्यूब शो में दक्षिण भारत के निश्चित क्षेत्र से आने वाले बच्चे पर अभद्र टिप्पणी करते हुए नस्लवादी और भेदभावपूर्ण बयान दिया।

संगठन ने अपने पत्र में उस वायरल वीडियो का लिंक भी दिया, जिसमें स्वरा अपने शुरुआती विज्ञापन शूट के बारे में बताती दिखीं, जोकि एक साबुन से संबंधित था। जिसमें स्वरा को बताते देखा जा सकता है कि वो अपने ऐड के दौरान इस बात से काफ़ी आश्चर्यचकित रह गई थीं जब एक चार साल के बाल कलाकार ने उन्हें ‘ऑन्टी’ कहकर संबोधित किया। स्वरा ने इस घटना का ज़िक्र करते हुए उस बाल कलाकार को ‘चू ** या’ कहा।

अपनी शिकायत में एनजीओ ने United Nations Convention of Child Rights का भी उल्लेख किया, जो बच्चों के ख़िलाफ़ किसी भी प्रकार के भेद-भाव पर बात करता है। साथ ही इसमें भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 का हवाला देकर कहा गया कि जाति, वंश, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव करना कानूनी रूप से मना है।

शिकायत में कहा गया स्वरा द्वारा इस्तेमाल की गई भाषा पूरे भारत में एक गलत मिसाल कायम करती है, जिसने दक्षिण भारत के बच्चों को नकारात्मक तस्वीर में चित्रित किया है।

इसके अलावा अपनी शिकायत में लीगल राइट्स प्रोटेक्शन फोरम ने स्वरा भास्कर की इस वीडियो को हॉटस्टार, ट्विटर, यूट्यूब सबसे हटाने की माँग की और कहा स्वरा पर कड़ी कार्रवाई की जाए।

छठ घाट पर फाड़ डाला बजरंगबली का झंडा: सलामत, इजामुल, अंसारी गिरफ्तार – गिरिडीह में तनाव

गिरिडीह के हीरोडीह थाना क्षेत्र के नारायण सिंहडीह गाँव में छठ घाट पर लगे बजरंगबली के झंडे को कुछ उपद्रवियों द्वारा उखाड़कर फेंकने व गंदा किए जाने से ग्रामीण काफी आक्रोशित हैं। पुलिस ने मामले में तीन लड़कों को गिरफ्तार भी किया है। इनके नाम हैं – सलामत रज़ा, इजामुल हक और वसीद अंसारी।

इसके अलावा पुलिस, अभियुक्त के रूप में शोएब अंसारी, तनवीर अंसारी, शमिमुल्ला, सराफत अंसारी और बुधन अंसारी को अपने साथ ले गई है। ग्रामीणों की तरफ से रविन्द्र कुमार वर्मा ने कसियोटोल के 11 युवकों के विरुद्ध धार्मिक झंडा फाड़ने, गन्दा करने और धर्म विशेष को नीचा दिखाने का आरोप लगाते हुए प्राथमिकी के लिए आवेदन किया था।

दैनिक जागरण के गिरिडीह संस्करण में छपी खबर का स्क्रीनशॉट

बता दें कि रविवार (नवंबर 3, 2019) को कसियाटोल के कुछ लड़कों ने छठ पर्व की समाप्ति के बाद घाट पर लगे झंडे को उखाड़कर फाड़ दिया था, जिसको लेकर दो समुदायों के बीच तनाव पैदा हो गया। दोनों पक्षों के बीच मामला सुलझाने का प्रयास किया गया लेकिन तनाव कम नहीं हुआ। इस मामले में पुलिस की सारी कोशिशें अब तक नाकाम रही हैं।

पुलिस का कहना है कि दोनों पक्षों की आपस में सुलह हो जाती, लेकिन कुछ कट्टरपंथियों की वजह से ऐसा नहीं हो सका, क्योंकि वो लोग नहीं चाहते थे कि इनके बीच का तनाव समाप्त हो जाए। जिसकी वजह से बात बनते-बनते रह गई। 

अभी भी सुलह की कोशिशें की जा रही हैं। तनाव को कम करने के प्रयास में खोरीमहुआ एसडीएम धीरेंद्र सिंह, एसडीपीओ नवीन कुमार सिंह, जमुआ बीडीओ विनोद कर्मकार, सीओ रामबालक प्रसाद, पुलिस इंस्पेक्टर विनय राम ने दिन भर कसियोटोल एवं बदडीहा में कैंप किए। पुलिस ने कहा कि असामाजिक कार्य करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। जो भी दोषी होंगे, उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। इसके साथ ही ऐहतियात के तौर पर कसियोटोल में पुलिस बल के जवान तैनात कर दिए गए हैं, ताकि मामला और न बिगड़े।

‘शिवसेना का जन्म ही कॉन्ग्रेस के आशीर्वाद से हुआ था’ – बाल ठाकरे ने इमरजेंसी का किया था समर्थन

महाराष्ट्र का राजनीतिक ऊँट किसी भी करवट बैठ सकता है। ऐसा इसीलिए, क्योंकि शरद पवार ने सोनिया गाँधी के साथ बैठक की, जिसमें शिवसेना को समर्थन करने पर ज़रूर चर्चा हुई होगी। हालाँकि, पवार ने इसे सिर्फ़ राज्य के राजनीतिक परिदृश्य पर चर्चा करार दिया। वैसे देखा जाए तो शिवसेना और कॉन्ग्रेस पहले भी एक-दूसरे का समर्थन कर चुकी है। या कह सकते हैं कि शिवसेना ने कई मौक़ों पर कॉन्ग्रेस का समर्थन किया था। बाल ठाकरे ने आपातकाल के दौरान इंदिरा गाँधी का समर्थन कर सबको चौंका दिया था। यह और बात है कि शिवसेना के संस्थापक अपने हिंदुत्ववादी विचारों के लिए जाने जाते थे।

ये किस्सा 1975 का है, जब इंदिरा गाँधी ने आपातकाल लगा कर कई विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया था। तब बालासाहब ठाकरे पर भी गिरफ़्तारी की तलवार लटकी थी। ऐसा इसलिए, क्योंकि ठाकरे कॉन्ग्रेस के सबसे बड़े विरोधियों में से एक थे। कार्टूनिस्ट के रूप में अपना करियर शुरू करने वाले ठाकरे अपने कार्टूनों से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को निशाना बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे। वह अपने भाषणों में कॉन्ग्रेस के ख़िलाफ़ आग उगलते थे। फायरब्रांड नेता होने के कारण उनके बयान चर्चा में भी रहते थे। ऐसे में ठाकरे द्वारा इंदिरा गाँधी और आपातकाल का समर्थन करना चौंकाने वाला था।

बालासाहब इतने पर ही नहीं रुके थे। उन्होंने 1977 के आम चुनाव और 1978 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भी कॉन्ग्रेस का समर्थन किया था। इसका नतीजा ये हुआ कि पार्टी को न सिर्फ़ मुंबई बीएमसी बल्कि पूरे महाराष्ट्र में जनता का समर्थन नहीं मिला उन चुनावों में शिवसेना को कॉन्ग्रेस का समर्थन करना भरी पड़ा। ये मुद्दा जनवरी 2018 में फिर से तब उछला था, जब महाराष्ट्र सरकार ने इमरजेंसी के दौरान जेल गए लोगों को पेंशन देने की घोषणा की थी। एनसीपी ने शिवसेना से पूछा था कि क्या बाल ठाकरे द्वारा इमरजेंसी का समर्थन करना एक बड़ी भूल थी?

अगर आपको कोई कहे कि शिवसेना का जन्म ही कॉन्ग्रेस के आशीर्वाद से हुआ था, तो आपको शायद आश्चर्य हो। सीपीआई के संथापक और वयोवृद्ध वामपंथी नेता श्रीपद अमृत डांगे की बेटी रोजा देशपांडे का मानना है कि शिवसेना के उद्भव से लेकर उसके पूरे सेटअप के लिए कॉन्ग्रेस ही जिम्मेदार है। वह अपने इस बयान के पीछे तर्क देते हुए याद दिलाती हैं कि जब शिवसेना की स्थापना की घोषणा हुई थी, तब कॉन्ग्रेस नेता रामराव आदिक मंच पर मौजूद थे। शिवसेना की स्थापना 1966 में हुई थी। प्रसिद्ध वकील रामराव आदिक आगे जाकर महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री भी बने।

शिवसेना का उत्तर भारतीयों और दक्षिण भारतीयों, दोनों से ही संघर्ष के इतिहास रहा है। साथ ही पार्टी बौद्ध दलितों का भी विरोध कर चुकी है। यहाँ तक कि शिवसेना ने 1979 में मुस्लिम लीग के साथ भी गठबंधन किया था। आपातकाल के बारे में कई किस्से प्रचलित हैं। उनमें से एक ये भी है कि जब एक के बाद एक विपक्षी नेताओं को जेल भेजा जा रहा था, तब राज्य के मुख्यमंत्री शंकरराव चव्हाण ने ठाकरे के सामने दो विकल्प रखे थे। उन्होंने ठाकरे से या तो आपातकाल का समर्थन करने या फिर जेल जाने का विकल्प दिया था। जेल जाने से बचने के लिए बाल ठाकरे ने आपातकाल और इंदिरा गाँधी का समर्थन किया, ऐसा कहा जाता है।

इसके बाद न सिर्फ़ 1977 लोकसभा और 1978 के बीएमसी चुनाव बल्कि 1980 के लोकसभा चुनाव में भी बाल ठाकरे ने कॉन्ग्रेस का समर्थन किया था। उन्होंने कॉन्ग्रेस के ख़िलाफ़ प्रत्याशी ही नहीं उतारे। शिवसेना ने बहाना बनाया कि बाल ठाकरे के साथ तत्कालीन मुख्यमंत्री एआर अंतुले के साथ निजी रिश्ते हैं, इसीलिए शिवसेना कॉन्ग्रेस का समर्थन कर रही है। शिवसेना-भाजपा का गठबंधन 1989 में फाइनल हुआ लेकिन बाल ठाकरे उससे पहले कई ऐसे दलों और लोगों के साथ गठबंधन बना चुके थे या समर्थन कर चुके थे, जिनका विरोध करते वो और उनकी पार्टी थकती नहीं थी। इन विरोधाभासों के कारण कम्युनिष्ट पार्टी कहती है कि कॉन्ग्रेस ने वामपंथियों के मुक़ाबले शिवसेना को खड़ा किया था।

1980 में शिवसेना द्वारा कॉन्ग्रेस का समर्थन करने का पार्टी को इनाम भी मिला था। एआर अंतुले के समर्थन के एवज में 2 शिवसेना नेताओं को विधान परिषद में भेजा गया। 1977 के मेयर चुनाव में शिवसेना ने मुरली देवड़ा का समर्थन किया, जिसके कारण पार्टी के पहले मेयर डॉक्टर हेमचन्द्र गुप्ता ने शिवसेना से इस्तीफा दे दिया था। मुरली के बेटे मिलिंद देवड़ा अभी मुंबई रीजनल कॉन्ग्रेस कमिटी के मुखिया हैं। 1982 में वो मौक़ा भी आया, जब शिवसेना के संस्थापक-अध्यक्ष बाल ठाकरे ने शरद पवार और जॉर्ज फर्नांडिस के साथ मंच साझा किया। उन्होंने गिरनगाँव मिल में मजदूरों के हड़ताल को लेकर दशहरा रैली के दौरान पवार के साथ मंच साझा किया।

यह भी जानने लायक बात है कि ठाकरे ने उसी कॉन्ग्रेस का विरोध करने के लिए पवार के साथ मंच साझा किया, जिसके वो पहले समर्थक रहे थे। बाल ठाकरे के बाद के दिनों में भी हमें ऐसे मौके देखने को मिले जब उन्होंने 2007 में राष्ट्रपति पद के लिए कॉन्ग्रेस समर्थित उम्मीदवार प्रतिभा पाटिल का समर्थन किया था। उस दौरान वरिष्ठ भाजपा नेता भैरों सिंह शेखावत स्वतंत्र उम्मीदवार थे और उन्हें राजग का समर्थन प्राप्त था लेकिन शिवसेना ने गठबंधन लाइन से अलग जाकर पाटिल का समर्थन किया। इस बात पर भी गौर कीजिए कि जिस चीज का नाम लेकर ठाकरे ने शेखावत का विरोध किया था, आज उनकी पार्टी वही कर रही है।

बाल ठाकरे ने कहा था कि भैरोंसिंह शेखावत स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में इसीलिए चुनाव लड़ रहे हैं क्योंकि भाजपा की तरफ़ से खड़े होने पर उन्हें कई दलों का समर्थन नहीं मिलता। ठाकरे ने इसे ‘सौदेबाजी’ करार देते हुए कहा था कि वो इसका समर्थन नहीं करते। बाल ठाकरे की पार्टी आज भाजपा के साथ ‘सौदेबाजी’ में लगी है और रोज मोलभाव किए जा रही है। इसी तरह 2012 में शिवसेना ने राष्ट्रपति चुनाव में प्रणव मुखर्जी का समर्थन किया था। मुखर्जी ने फोन कर के बाल ठाकरे और उद्धव ठाकरे से बात की थी। उस समय संजय राउत ने ही इसकी घोषणा की थी कि शिवसेना मुखर्जी का समर्थन करेगी। प्रणव मुखर्जी ने मातोश्री पहुँच कर बाल ठाकरे से मुलाक़ात भी की थी।

कुल मिला कर देखें तो ‘सौदेबाजी’ और मोलभाव शिवसेना के भीतर तब से है, जब से उसकी स्थापना हुई थी। ‘ठाकरे’ फ़िल्म के डायलॉग ‘लूँगी उठाओ, पूँगी बजाओ’ को लेकर विरोध हुआ था क्योंकि इसमें दिखाया गया था कैसे बाल ठाकरे ने दक्षिण भारतीयों का विरोध किया था। एक समय ऐसा भी आया, जब मुंबई से बिहारियों को भगाया जाने लगा। बौद्ध दलितों से टकराव की बात हम ऊपर कर चुके हैं। बालासाहब ने मनमोहन सिंह को भी ‘काफ़ी बुद्धिमान और सौम्य’ प्रधानमंत्री बताया था। कुल मिला कर देखें तो शिवसेना की राजनीति विरोध और ‘सौदेबाजी’ पर ही टिकी हुई है।

…अब पाकिस्तान में टेनिस मैच भी नहीं खेला जाएगा, ITF ने लिया निर्णय: 5 दिन में माँगा Pak से जवाब

इंटरनेशनल टेनिस फेडरेशन (ITF) ने सुरक्षा कारणों के कारण भारत-पाकिस्तान के बीच होने वाले डेविस कप मुकाबले को न्यूट्रल वेन्यू पर करवाने का फैसला किया है। इस बात की जानकारी खुद ITF ने सोमवार (नवंबर 5, 2019) को बयान जारी करके दी। आईटीएफ ने बताया कि इस्लामाबाद में होने वाले टेनिस मुकाबले को न्यूट्रल वेन्यू पर शिफ्ट कर दिया गया है।

अपने बयान में आईटीएफ ने साफ कहा, “एशिया/ओसनिया ग्रुप-1 मुकाबले को इस्लामाबाद में नहीं करने का फैसला किया गया है। अब यह मुकाबला न्यूट्रल वेन्यू पर आयोजित किया जाएगा।” बता दें ये मुकाबला 29-30 नवंबर को खेला जाना है।

सोमवार को आए बयान के मुताबिक, ITF के सुरक्षा सलाहकारों की ओर से प्राप्त रिपोर्ट की समीक्षा के बाद डेविस कप कमिटी ने ये फैसला किया है कि अब भारत-पाक मैच न्यूट्रल वैन्यू पर खेला जाएगा। जिसके लिए पाकिस्तान टेनिस फेडरेशन के पास अब किसी भी न्यूट्रल वेन्यू को नॉमिनेट करने का विकल्प है, इसे चुनने के लिए उसे ITF से 5 दिन का समय मिला है।

ITF ने अपने बयान में बताया है कि विकल्प का चयन और उसपर स्वीकृति के बाद वेन्यू की जानकारी दी जाएगी। उल्लेखनीय है कि आईटीएफ और डेविस कप कमिटी की पहली प्राथमिकता ऐथलीटों, अधिकारियों और दर्शकों की सुरक्षा है। जिसके आधार पर उन्होनें ये फैसला लिया है।

ITF के इस फैसले को सोशल मीडिया पर यूजर्स द्वारा काफी सराहा जा रहा है। लोगों का कहना है कि ये बिलकुल उचित निर्णय है और इसके लिए ITF का धन्यवाद।

वहीं कुछ लोगों का ये भी कहना है कि इस मैच को दुबई या फिर अफगानिस्तान में करवाया जाना चाहिए। ताकि दोनों टीमों के हिस्से बराबर समर्थन आए।

गौरतलब है कि पाकिस्तान में खिलाड़ियों की आतंरिक सुरक्षा लंबे समय से एक बड़ी चुनौती का विषय बनी हुई है। अभी हाल ही में श्रीलंकाई खिलाड़ियों को भी पाकिस्तान में भारी सुरक्षा के बीच उनके होटल तक पहुँचाया गया था, तब सोशल मीडिया पर मजाक बना था कि पाक खुद जानता है उनके सरजमीं पर कोई सुरक्षित नहीं है, इसलिए खिलाड़ियों प्रधानमंत्री से भी ज्यादा सुरक्षा मुहैया करवाई गई है।

APJ अब्दुल कलाम का नाम अवॉर्ड से हटा दिया, मुख्यमंत्री ने उसके साथ अपने पापा का नाम जोड़ा

आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी की सरकार ने मिसाइल मैन और देश के पूर्व राष्ट्रपति एपीजी अब्दुल कलाम के नाम पर मेधावी छात्रों को दिए जाने वाले स्कॉलरशिप का नाम बदलकर वाईएसआर विद्या पुरस्कार कर दिया है। आंध्र प्रदेश सरकार ने 4 नवंबर को एक अधिसूचना जारी किया, जिसमें एपीजे अब्दुल कलाम के नाम पर दिए जाने वाले स्कॉलरशिप का नाम वाईएसआर विद्या पुरस्कार किए जाने की बात कही गई।

आंध्र प्रदेश सरकार ने मौलाना अबुल कलाम आजाद की जन्मतिथि पर यह बदलाव करने का फैसला किया। बता दें कि मौलाना अबुल कलाम आजाद की जन्मतिथि 11 नवंबर है और इसे पूरा देश राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के रूप में मनाता है। यह भी जानना जरूरी है कि जगन मोहन रेड्डी के पिताजी का नाम वाईएसआर रेड्डी है।

जगन मोहन रेड्डी सरकार का कहना है कि 11 नवंबर को राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के अवसर पर राज्य के मोधावी छात्रों को ‘वाईएसआर विद्या पुरस्कार’ के तहत स्कॉलरशिप दिया जाएगा। पहले इस स्कॉलरशिप का नाम मिसाइलमैन वैज्ञानिक और पूर्वराष्ट्रपति के नाम पर ‘डॉ एपीजे अब्दुल कलाम प्रतिभा पुरस्कार अवार्ड’ था। जिसका नाम बदल दिया गया है। इसमें किए गए संशोधन से संबंधित दिशा-निर्देश भी जारी किए गए हैं।

ये पुरस्कार केवल सरकारी स्कूल के बच्चों के लिए है। इसे सरकारी स्कूल के मेधावी बच्चों के बीच वितरित किया जाएगा। इस मौके पर जिला के मंत्री, सांसद और विधायक भी उपस्थित रहेंगे।

बगदादी की ‘आतंकी’ बहन अपने पति, बहू और 5 बच्चों के साथ गिरफ्तार: कंटेनर से खींच कर निकाला

आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (IS) के सरगना रहे अबु बकर अल-बगदादी के खात्मे के बाद अब सुरक्षा एजेंसियों की नजर उसके परिवार वालों पर है। इसी सिलसिले में बगदादी की बहन रशमिया अवद को उत्तरी सीरिया के शहर से गिरफ्तार कर लिया गया है। यह गिरफ्तारी खुफिया जानकारी के आधार पर की गई।

द न्यू यॉर्क टाइम्स अखबार के मुताबिक 65 वर्षीय बगदादी की बहन रशमिया को सोमवार (नवंबर 4, 2019) को उत्तरी सीरिया के अजाज शहर से गिरफ्तार किया गया। यहाँ वो अपनी पति और रिश्तेदारों के साथ रहती थी। छापे के दौरान बगदादी की बहन एक कंटेनर में छुपी बैठी थी।

इस गिरफ्तारी के बाद तुर्की की ओर से कहा गया है कि आतंकवाद के खिलाफ यह एक बड़ी सफलता है। तुर्की के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि छापे के दौरान बगदादी की बहन को उसके पति, बहू और पाँच बच्चों के साथ गिरफ्तार किया है। तुर्की की जाँच एजेंसियाँ इनसे गहन पूछताछ कर रही है।

अधिकारी ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि पूछताछ के दौरान बगदादी की बहन IS के कामकाज और उसकी खुफिया जानकारियों का खुलासा करेगी क्योंकि शक है कि रशमिया खुद भी एक आतंकी है और उसे बगदादी के साथ-साथ उसके पूरे नेटवर्क की जानकारी है। जिससे आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में और मजबूत होगी। इससे आतंकी संगठन आईएस को खत्म करने में मदद मिलेगी और इस काम में लिप्त बाकी लोगों को भी पकड़ा जा सकेगा।

इससे पहले 27 अक्टूबर को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने IS सरगना अबु बकर अल बगदादी को एक ऑपरेशन में मारने का दावा किया था। ट्रंप ने कहा था कि इडलिब में अमेरिकी डेल्टा फोर्स के एक ऑपरेशन में बगदादी मारा गया। ऑपरेशन के वक्त बगदादी एक मकान में था। जब अमेरिकी सेना ने उस पर हमला किया तो वो अपने तीन बच्चों के साथ एक सुरंग में भागने लगा। अमेरिका सेना और अमेरिकन आर्मी के कुत्तों ने कुछ देर तक उसे दौड़ाया इसके बाद चारों ओर से घिरा देख बगदादी ने खुद को उड़ा लिया था।

इस्सामिक स्टेट के प्रवक्ता अबु हमजा अल-कुरैशी ने 31 अक्टूबर को ऑडियो मैसेज जारी कर बगदादी के मारे जाने की पुष्टि की थी। उसने बताया था कि अबु इब्राहिम अल-हाशिमी अल-कुरैशी को बगदादी के स्थान पर संगठन का नया सरगना बनाया गया है।

CM पद को लेकर समझौता नहीं करेगी BJP: फडणवीस-ठाकरे, NCP-कॉन्ग्रेस-SS के बाद अब तीसरा विकल्प!

महाराष्ट्र में लगातार बदलते सियासी समीकरण के बीच सोमवार (नवम्बर 4, 2019) को एनसीपी के मुखिया ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी से मुलाक़ात की। इस मुलाक़ात का कोई ठोस परिणाम नहीं निकला क्योंकि क़रीब आधे घंटे तक चली बैठक के बाद निकल कर पवार ने दोहराया कि उन्हें विपक्ष में बैठने का जनादेश मिला है। साथ ही उन्होंने इस बात से भी इनकार किया कि सोनिया के साथ सरकार गठन को लेकर चर्चा हुई। उन्होंने इसे महाराष्ट्र के ताज़ा राजनीतिक परिदृश्य पर हुई चर्चा करार दिया। लेकिन हाँ, पवार अपने मौजूदा स्टैंड को साफ़ करते हुए ये कहने से भी नहीं चूके कि भविष्य में क्या होगा, उन्हें पता नहीं।

भाजपा के दो महासचिवों सरोज पांडेय और भूपेंद्र यादव को महाराष्ट्र भेजा गया था लेकिन ये दोनों ही दिल्ली लौट आए हैं। पार्टी आलाकमान से चर्चा करने के लिए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस भी दिल्ली में हैं। दोनों महासचिव शिवसेना से आखिरी दौर की बातचीत करने के बाद ही दिल्ली आए हैं लेकिन इसका कोई परिणाम नहीं निकला। भाजपा सीएम पद को लेकर किसी भी प्रकार का समझौता करने को तैयार नहीं है। उधर महाराष्ट्र के पर्यटन मंत्री जयकुमार रावल ने शिवसेना के रुख को देखते हुए राज्य में दोबारा चुनाव कराने की इच्छा व्यक्त की।

फडणवीस के क़रीबी मंत्री ने कहा कि शिवसेना के रुख से भाजपा कार्यकर्ता नाराज़ हैं और वो चाहते हैं कि दोनों दल अलग-अलग चुनाव लड़ें। भाजपा ‘देखो और इंतजार करो’ की भूमिका में है। पार्टी ने शिवसेना की माँगों के सामने झुकने से इनकार कर दिया है। एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने इकनोमिक टाइम्स को बताया कि शिवसेना ने 124 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जो महाराष्ट्र में कुल सीटों का आधा भी नहीं है। उनका सवाल था कि ऐसे में शिवसेना किस मुँह से 50-50 की बातें कर रही है? भाजपा इस बात को लेकर भी दृढ़ है कि शिवसेना को गृह मंत्रालय भी नहीं दिया जाएगा।

शिवसेना नेता संजय राउत ने राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी से मुलाक़ात कर कहा कि राज्य में जल्दी से जल्दी सरकार का गठन होना चाहिए। राउत ने दावा किया कि शिवसेना सरकार गठन की राह में रोड़ा नहीं अटका रही है। फडणवीस ने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से मुलाक़ात की। उन्होंने बताया कि वो महाराष्ट्र में हुए बेमौसम बरसात को लेकर केंद्र से मदद माँगने आए हैं। उधर एआईएमआईएम के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी ने भी कहा कि राज्य में जल्द से जल्द नई हुकूमत को आना चाहिए, जिससे बारिश से बेहाल किसानों के लिए कुछ किया जा सके। दिल्ली और मुंबई में हुई किसी भी हाई-प्रोफाइल बैठक का कोई नतीजा सामने नहीं आया।

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी की चिंता है कि विचारधारा अलग होने के कारण शिवसेना-कॉन्ग्रेस का गठबंधन चल पाएगा या नहीं? हालाँकि, पार्टी नेता कहते हैं कि बाल ठाकरे के रहते शिवसेना ने प्रणव मुखर्जी की राष्ट्रपति उम्मीदवारी का समर्थन किया था। प्रतिभा पाटिल के समय भी शिवसेना ने भाजपा उम्मीदवार के ख़िलाफ़ जाते हुए उनका समर्थन किया था। एनसीपी और कॉन्ग्रेस इस विकल्प पर भी विचार कर रही है कि शिवसेना को समर्थन देकर राज्य में सरकार बनाई जाए और भाजपा को सत्ता से बाहर रखा जाए। उधर 121 विधायकों के समर्थन का दावा कर रही भाजपा ने फ़िलहाल अल्पमत वाली सरकारी के गठन वाली बातों को नकार दिया है।

मीडिया सूत्रों का कहना है कि शिवसेना ख़ुद चाहती है कि भाजपा को सरकार गठन के लिए राज्यपाल की तरफ़ से न्योता मिले क्योंकि स्पीकर के चुनाव के समय ही यह पूरी तरह साफ़ हो जाएगा कि पार्टी को कितना समर्थन है? यह भी देखने वाली बात है कि शिवसेना के एकमात्र मंत्री केंद्र सरकार में बने हुए हैं, इसीलिए कई लोगों का मानना है कि पार्टी सिर्फ़ मोलभाव कर रही है। संजय राउत ने दोनों प्रमुख विपक्षी दलों से संपर्क साधा है। कॉन्ग्रेस के कई नेताओं का कहना है कि ज़रूरी नहीं है कि पार्टी सरकार में शामिल हो, शिवसेना को बाहर से समर्थन दिया जा सकता है।

कॉन्ग्रेस यह तभी करेगी जब शिवसेना राजग से पूरी तरह अलग हो जाए। कुछ दिनों में राम जन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आएगा। कॉन्ग्रेस की चिंता है कि अगर शिवसेना ने मंदिर बनाने का खुला समर्थन किया तो पार्टी क्या करेगी?

विराट कोहली ने बर्थडे पर खुद को लिखा लेटर, 15 साल की उम्र से अब तक का बताया जीवन संघर्ष

हैलो चीकू, सबसे पहले तो जन्मदिन की बहुत-बहुत शुभकमनाएँ। मुझे पता है कि तुम्हारे पास अपने भविष्य को लेकर बहुत सारे सवाल होंगे, जिनके जवाब तुम मुझसे जानना चाहोगे। मैं माफ़ी चाहता हूँ क्योंकि मैं उनमें से अधिकतर का जवाब नहीं दूँगा। ऐसा इसीलिए, क्योंकि भविष्य में आपके लिए क्या रखा हुआ है, इसकी जानकारी न होना किसी भी सरप्राइज को सुहाना बना देता है। ये सभी चुनौतियों को रोमांचकारी बना देता है और मायूसी को एक ऐसे मौके में बदल देता है, जिससे आपको कुछ सीख मिलती है। भले ही तुम्हें आज ये बात पता न चले लेकिन लक्ष्य से ज्यादा महत्व होता है लक्ष्य तक पहुँचने वाली यात्रा का।

विराट, मैं तुम्हें बताना चाहता हूँ कि ज़िंदगी में आगे तुम्हारे लिए काफ़ी कुछ रखा हुआ है। लेकिन हाँ, तुम्हें तुम्हारे रास्ते में आने वाले हर एक मौके के लिए ख़ुद को तैयार रखना पड़ेगा। जब भी ये मौके आएँ, इन्हें लपकने में देर मत करना। ये बात भी याद रखना कि तुम्हारे पास पहले से जो चीजें हैं, ऐसा मत समझना कि वो हमेशा के लिए यूँ ही रहेंगी। किसी भी चीज को ग्रांटेड मत लेना। तुम्हें असफलताएँ हाथ लग सकती हैं। सभी को अपने जीवन में असफलताओं का सामना करना पड़ता है।

तुम बस अपने आप से वादा करो कि तुम कभी भी आगे बढ़ना नहीं छोड़ोगे। अगर असफलता मिलती है तो फिर से प्रयास करोगे। तुम्हें काफ़ी ऐसे लोग मिलेंगे, जो तुमसे प्यार करेंगे। बहुत से ऐसे लोग भी मिलेंगे, जो तुम्हें नापसंद करेंगे। इनमें ऐसे लोग भी शामिल होंगे, जो तुम्हें जानते तक नहीं हैं। उनके बारे में सोचने की ज़रूरत नहीं है। बस ख़ुद पर विश्वास रखो।

मुझे पता है कि पापा ने जो जूते तुम्हें उपहार स्वरूप दिए हैं, वो तुम्हारे पाँव में नहीं आ रहे, तुम उसी पर सोच रहे हो।

लेकिन यह जान लो कि उनका महत्व सुबह-सुबह तुमसे गले लगने और तुम्हारी लम्बाई पर हँसी-हँसी में बात करने के सामने कुछ भी नहीं। इन्हें संजो कर रखो, इन्हें याद रखना। मुझे पता है कि वो कभी-कभी तुम्हें सख्त लगेंगे, लेकिन यह बस इसलिए है क्योंकि वो तुम्हें सबसे बेहतर होते देखना चाहते हैं। तुम्हें ये भी लगता होगा कि मम्मी-पापा तो हमें समझते ही नहीं, लेकिन याद रखना एक परिवार ही है जो हर स्थिति में हमारे साथ खड़ा रहता है, बिना किसी शर्त के। उन्हें भी प्यार करो, उनका सम्मान करो और जब तक उनके साथ हो, समय बिताओ उनके साथ। पापा को कहो कि तुम उनसे कितना प्रेम करते हो- बहुत ज़्यादा! उन्हें यह बात आज कहो, कल दोबारा कहो, हर बार कहो जब भी मौका मिले।

और अंत में, अपने दिल की सुनो, अपने सपनों का पीछा करो, स्वयं में करुणा का भाव जगाओ और दुनिया को दिखा दो कि बड़े सपने देखना ही हमें बेहतरीन बनाता है, बाकियों से अलग करता है। जो हो, वैसे बने रहो, अपने मूल रूप में।

और हाँ, ये पराठे तो खूब खाओ, स्वाद ले कर खाओ भाई! आने वाले दिनों में ये कितनी बड़ी बात बन जाएगी तुम्हें अंदाजा नहीं है।

हर दिन को बेहतरीन बनाओ

विराट

किसानों को जिम्मेदार ठहरा कर नाकामी छिपाने वालो, जरा प्रदूषण के असली कारकों पर भी गौर कर लो

दिल्ली में प्रदूषण को लेकर हरियाणा व पंजाब के किसानों को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है क्योंकि वो अपने खेतों में धान की पराली जलाते हैं और उसके धुएँ से पूरा एनसीआर एक गैस चैम्बर में तब्दील हो जाता है। सरकार किसी भी राज्य की हो, वो अख़बार में एक इश्तेहार देकर किसानों को पराली न जलाने की सलाह देती है और इतिश्री कर लेती है। बाकी काम केजरीवाल, खट्टर और अमरिंदर सिंह एक-दूसरे पर दोषारोपण कर के पूरा करते हैं। ये तीनों राज्यों में तीन अलग-अलग पार्टियों की सरकारें हैं लेकिन इस समस्या से निपटने में सभी फेल साबित हुए हैं।

तो फिर उपाय क्या है? क्या किसान ही प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हैं? टीवी न्यूज़ स्टूडियो से लेकर जिन्होंने कभी खेतों का मुँह भी नहीं देखा ऐसे लोगों तक, सभी किसानों को ही भला-बुरा कहने में लगे हुए हैं। लेकिन, किसान करे तो क्या? अगर किसान पराली नहीं जलाएगा तो दूसरे उपाय क्या हैं? पराली का एक किला बना कर उसे दबाने में 7 हज़ार रुपए ख़र्च हो जाते हैं। क्या सरकार प्रत्येक किसान को इसका भाव देगी? अगर किसान पराली नहीं जलाते हैं तो उन्हें 30 लीटर तेल ख़र्च करने के बाद भी खेत तैयार करने में सफलता नहीं मिलती।

अगर सरकार किसानों से धान के साथ-साथ पराली भी ख़रीदने लगे और उन्हें उचित दाम देने लगे तो शायद किसान पराली जलाना बंद कर दें। अब लोग कहेंगे कि पराली को बाजार में बेचना भी तो एक विकल्प है। अगर पराली बेचने से रुपए मिलते तो भला किसान उसे क्यों जलता? पराली बिक भी जाए तो उसे निकालने के लिए मजदूरों की आवश्यकता पड़ती है और इस काम के लिए मजदूर भी नहीं मिलते। गेहूँ की बुआई को लेकर चिंतित किसान मजदूरों पर 7-8 हज़ार रुपए ख़र्च करने की बजाय पराली को जला डालता है।

पराली दबाना विकल्प नहीं है। पराली को बेचना विकल्प नहीं है। कम से कम ये दोनों तब तक तो विकल्प नहीं ही हैं जब तक किसानों को इसका ख़र्च मिले। लेकिन, इस पूरे प्रकरण में कुछ और लोग भी दोषी हैं, जो शक्तिशाली हैं। सरकार और नेताओं की तो यहाँ चर्चा करना ही बेकार है क्योंकि अगर वो सुनने वाले होते तो ये समस्या आती ही नहीं या फिर कब की ख़त्म हो गई होती। इसीलिए यहाँ अन्य कई विकल्पों पर बात करते हैं। मसला इतना गंभीर हो चुका है कि सुप्रीम कोर्ट ने इसे देखने का फ़ैसला लिया है और कहा है कि लोग मरते रहें, ऐसा नहीं चलेगा। कोर्ट ने कहा कि पराली जलाया जाना रुकना चाहिए।

कुख्यात कम्पनी मोंसेंटो को भी जिम्मेदार ठहराते हुए उसपर कार्रवाई की जाए

इस कम्पनी के बारे में बात करने से पहले दक्षिण अमेरिका में स्थित ब्राजील के उदाहरण से शुरू करते हैं। 120 साल पुरानी दुनियाँ की सबसे बड़ी इस बीज कम्पनी का मकसद सिर्फ़ और सिर्फ़ अपना व्यापार बढ़ाना ही है। जो किसान इसके ख़रीददार हैं, उन्हीं किसानों से इसका टकराव भी चलता है। ब्राजील में किसान बीज बचा कर उसे रीप्लान्ट करने के लिए रख लेते थे, जिस कारण मोंसेंटो ने उन पर केस कर दिया। इस केस का परिणाम ये निकला कि शक्तिशाली मोंसेंटो की जीत हुई और 7.7 बिलियन डॉलर के इस लॉशूट को कम्पनी ने जीत लिया। 9 सदस्यीय पीठ ने किसानों के ख़िलाफ़ फ़ैसला सुनाया।

अब वापस भारत आते हैं। पंजाब में पानी बचाने के लिए ऐसा अभियान चलाया गया कि उसका नकारात्मक असर ही हो गया। पानी बचाने के क्रम में न सिर्फ़ पंजाब सरकार बल्कि कई वैज्ञानिकों ने भी धान की बुआई कम करने की अपील की। लेकिन फिर प्रश्न आया कि किसान धान नहीं उपजाएगा तो फिर खेत खाली छोड़ कर करेगा ही क्या? सरकार ने इसका निदान मक्के की खेती के रूप में निकाला। एक अभियान चला- धान की खेती का क्षेत्रफल घटाओ और मक्के की खेती को बढ़ाते चलो। पंजाब सरकार का कहना था कि किसानों को धान और गेहूँ के चक्कर से निकालने के लिए ‘क्रॉप डायवर्सिफिकेशन’ ज़रूरी है।

‘क्रॉप डायवर्सिफिकेशन’ के इस भूत ने अब अपना असली रंग दिखाना शुरू किया है। पंजाब सरकार ने इसके लिए मोंसेंटो के साथ मिल कर काम करना शुरू किया। मक्के के बीज के लिए मोंसेंटो को बादल सरकार ने एक रिसर्च सेंटर स्थापित करने को कहा। पंजाब सरकार और मोंसेंटो ने मिल कर धान की बुआई को 45% तक कम करने का लक्ष्य रख कर हाइब्रिड मक्के के बीज पर काम करना शुरू किया। अमेरिकी कम्पनी ने इसके बाद धान के विकल्प के रूप में खरीफ सीजन में मक्के की खेती पर जोर दिया। पंजाब सरकार का लक्ष्य था कि धान की खेती का एरिया 28 लाख हेक्टेयर से कम कर के 16 लाख हेक्टेयर किया जाए और 4 लाख हेक्टेयर में मक्का उगाया जाए।

मिट्टी में पानी की मात्रा को नियंत्रित रखने और उसे बढ़ाने के लिए मोंसेंटो किसानों को धान के बदले अपना जीएमओ क्रॉप्स उगाने को कहता है और इसके लिए ऑफर देता है। पाँच नदियों की सबसे उपजाऊभूमि को सिर्फ़ केमिकल कंपनियों और बाद में बीज कंपनियों का एक बाजार बना कर रख दिया गया। केमिकल खाद का प्रयोग किया जाता है। अर्थवर्म और फंगी न होने के कारण ह्यूमस पैदा नहीं होता और मिटटी की उपजाऊ क्षमता जाती रहती है। मिट्टी को ज्यादा पानी की ज़रूरत होती है। इससे फसल की सिंचाई भी ज्यादा करनी पड़ती है। एक तरह से पंजाब की मिट्टी को मारने की इस प्रक्रिया में ‘केमिकल कृषि’ का योगदान रहा।

किसानों को जब मक्का उगाने के लिए मजबूर किया जाने लगा तो उन्होंने ‘क्रॉप डायवर्सिफिकेशन’ का नया ही तरीका चुन लिया। अभी तक आप सोच रहे होंगे कि उपर्युक्त बातों का दिल्ली के प्रदूषण से क्या लेना-देना है। दरअसल, किसानों ने धान की ही अलग-अलग प्रजातियाँ उगानी शुरू की, जिनमें से कई ऐसी हैं जो कम समय में पूरी हो जाती हैं। उन्होंने धान उगाने के समय को बढ़ा दिया, अर्थात धान की खेती को कुछेक महीने आगे सरका दिया। इससे घाटा ये हुआ कि सामान्यतः सितम्बर के महीने में होने वाली कटाई नवम्बर तक पहुँचने लगी और पराली जलाने के सिलसिले से दिल्ली एक गैस चैंबर में तब्दील हो गया।

चूँकि, किसानों को भी धान उगाने के लिए एक निश्चित समयावधि दी गई थी, उन्होंने इससे निजात पाने के लिए अलग-अलग उपाय करने शुरू कर दिए। मोंसेंटो के जीएमओ प्रोडक्ट्स के कारण मधुमक्खियाँ मर जाती हैं। जैसा कि हम जानते हैं, प्याज जैसी कई फसलें पॉलिनेशन की प्रक्रिया के लिए जिन जीवों की मोहताज होती हैं, उनके मर जाने से उन फसलों को खासा नुकसान होता है। यूरोप की कई कंपनियों ने मोंसेंटो ब्रांड की मक्के की बीज को प्रतिबंधित कर रखा है। इससे मधुमक्खियों की पूरी की पूरी कॉलोनी ही मारी जाती हैं। इसके जीएमओ मक्के को मुर्गियों को खिलाया जाने लगा है जबकि गेंहूँ जानवरों को दिया जाता है।

2009 के वाटर एक्ट्स को कूड़े के डब्बे में फेंका जाए

जैसा कि ऊपर बताया गया, पंजाब और हरियाणा में किसान अक्टूबर-नवंबर में खेत खाली करने के लिए पराली जलाने लगे, जिसके कारण ये समस्याएँ उत्पन्न हुईं। इस देरी का कारण भी किसान नहीं हैं बल्कि सरकार ने ही उन्हें इसके लिए मजबूर किया है। इसके कारण सबसॉइल वाटर एक्ट्स हैं, जिन्हें पंजाब और हरियाणा की सरकारों ने 2009 में पारित किया था। यही वो क़ानून है जो किसानों को इस बात के लिए मजबूर करता है कि वो अप्रैल में धान की बुआई न कर के आधा जून बीतने तक इंतजार करें।

धान के अंकुरण और इसकी कटाई के बीच की समयावधि को देखें तो लगभग 4 महीने लग ही जाते हैं और इसका सीधा मतलब है कि अक्टूबर बीतते-बीतते और नवंबर आते-आते किसान खेतों से पराली की सफाई का कार्यक्रम शुरू करेंगे। बस दिल्ली में प्रदूषण हद से ज्यादा बढ़ने का कारण भी यही हो जाता है। यही वो समय होता है जब हवा की दिशा भी बदलती है और दिल्ली की जनता को आकाश में बादल न होने के बावजूद सूर्य का दर्शन करना भी नसीब नहीं होता। अभी भी ख़बर आई है कि नवम्बर का पहला हफ्ता बीतने के बाद ही हवा की दिशा में बदलाव आने की उम्मीद है और तब तक स्थिति भयावह बनी रहेगी।

हवा की गति काफ़ी धीमी होती है और वातावरण में नमी की अधिकता होती है, जो इस प्रदूषण की समस्या को और ज्यादा बढ़ाता है। इसीलिए, सरकारों को चाहिए कि पानी बचाने के नाम पर किसानों को तबाह न करे और रेन वाटर हार्वेस्टिंग जैसे उपाय करे। लेकिन सरकारें इसके लिए किसानों का ही दम घोंटने में लगी है। किसानों को इस बात की छूट मिलनी चाहिए कि वे अप्रैल-मई में ही धान की बुआई करें, ताकि सितम्बर ख़त्म होते-होते खेतों से धान की कटाई हो जाए और खेत खाली करने की प्रक्रिया भी पूरी कर ली जाए। सरकार को सभी किसानों को इसके लिए मशीन उपलब्ध कराने की व्यवस्था करनी चाहिए।

इन दोनों क़ानूनों को पास करने के पीछे का कारण यही था कि सरकारें किसानों को ही पानी की खपत के लिए जिम्मेदार ठहराती है। अर्थात, पंजाब-हरियाणा में किसान पानी पी जाते हैं और दिल्ली में प्रदूषण फैलाते हैं- सरकारों का यही सोचना है। धान की फसल में पानी की खपत ज्यादा होती है और इसीलिए पानी बचाने के लिए न सिर्फ़ धन की बल्कि किसानों के गले में भी लगाम लगा दी गई। किसानों की माँग है कि उन्हें सरकार की तरफ से 200 रुपए प्रति क्विंटल तो चाहिए ही चाहिए, जिससे पराली को जलाने की बजाय अन्य विकल्पों का इस्तेमाल किया जा सके।

ये उम्मीद करना बेमानी है कि 10 कट्ठा ज़मीन पर खेती करने वाला 14 लाख रुपए ख़र्च कर के किसान कम्बाइनर हार्वेस्टर ख़रीदे और मात्र 9-10 दिन चलने वाली कटाई में इसका इस्तेमाल करे। 10 दिन के काम के लिए छोटे किसान लाखों ख़र्च नहीं कर सकते। ये उम्मीद करना भी बेमानी है कि छोटे किसान हार्वेस्टर के मालिकों को रेंट देकर कटाई कराएँ क्योंकि जिनके पास ये मशीन है वो इसके प्रयोग के एवज में ज्यादा से ज्यादा रुपए वसूलते हैं। सरकार ऐसी मशीन ख़रीद कर प्रत्येक ग्राम पंचायत को जनसंख्या के हिसाब से दे ताकि किसान उनका प्रयोग कर सकें।

अगर सरकार को पानी का लेवल ही बढ़ाना है तो इसके लिए न सिर्फ़ रेन वाटर हार्वेस्टिंग को बढ़ावा देना पड़ेगा बल्कि कई कुएँ और तालाब भी खुदवाने होंगे। मोंसेंटो जैसी कंपनियों से वसूला जाना चाहिए और यह भी समझना चाहिए कि आखिर दुनिया के किसी भी हिस्से में किसानों से इस कम्पनी की क्यों नहीं बनती? इस रक़म को देशभर के किसानों को मशीनें उपलब्ध कराने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। बिहार-झारखण्ड में सबसॉइल वाटर एक्ट्स नाम की कोई चीज नहीं है और इससे किसानों को पराली हटाने के लिए ज्यादा समय मिलता है। खेत खाली करने में ज्यादा समय मिलने का मतलब है कि गेंहूँ की बुआई के लिए पर्याप्त समय। इसी बीच दिवाली और छठ जैसे त्यौहार भी आते हैं लेकिन बात नहीं बिगड़ती।

एलपीजी गैस कनेक्शन देने के अभियान को और तेज़ किया जाना चाहिए। इस दिशा में केंद्र सरकार ने काफ़ी प्रयास किया है और राज्यों में इसके परिणाम भी देखने को मिले हैं। जिन बच्चों की माँएँ मिट्टी के चूल्हे पर खाना बनाती थीं, उस घर के बच्चों के फेंफड़े काले पाए गए। सिर्फ़ किसानों को जिम्मेदार ठहराने की बजाय ऐसी छोटी-छोटी समस्याओं पर भी ध्यान देना पड़ेगा। जब पराली जलाने का मौसम नहीं होता है, तब भी दिल्ली में एयर क्वालिटी खतरनाक ही रहती है। अब इसके लिए किसानों को कैसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? पावर प्लांट्स को सही इमिशन सिस्टम पर काम करने के अलावा गाड़ियों की इंजनों को नए मानकों पर परखना होगा।

इसके लिए कमोबेश वो लोग भी जिम्मेदार हैं, जिन्होंने दिवाली के पटाखों के विरोध में अभियान चलाया और प्रदूषण के बड़े और असली कारणों को छिपाने में अपना योगदान दिया। सरकार से लेकर अदालतें तक पटाखों में उलझी रह गईं और अब जब मामला गंभीर हो चुका है, सुप्रीम कोर्ट इसे देख रही है। हंगामा इस तरह मचाया गया जैसे दिवाली के पटाखों के कारण ही सालों भर दिल्ली में प्रदूषण रहता है। पटाखे प्रतिबंधित किए गए और पुलिस ने सख्ती से इसका पालन कराया। कई लोग गिरफ़्तार हुए। लेकिन हाँ, प्रदूषण की स्थिति जस की तस रही। 24 घंटे के भीतर केजरीवाल ‘दिल्ली ने कर दिखाया’ से ‘पंजाब-हरियाणा की ग़लती है’ पर आ गए।

सबरीमाला दर्शन से दो हफ्ते पहले केरल की वामपंथी सरकार का फिर यू-टर्न: कहा- रजस्वला महिलाएँ करेंगी मंदिर में प्रवेश

केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन की वामपंथी सरकार ने सबरीमाला के मुद्दे पर एक बार फिर से यू-टर्न लेते हुए कहा है कि उनकी सबरीमाला के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश को लागू करने के लिए नीति निर्माण करेगी जिसके तहत सभी उम्र की महिलाएँ सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करेंगी और वहाँ की मान्यता के अनुसार घुसकर उसे अपवित्र कर देंगी।

सबरीमाला के भक्तों पर अत्याचार करने के बाद केरल के वामपंथियों ने जून 2019 में केंद्र सरकार से सबरीमाला के रीति-रिवाजों की रक्षा करता एक कानून बनाने को कहा था। जबकि यू-टर्न ले लेने के बाद अब वही वामपंथी कह रहे हैं कि हम सुप्रीम कोर्ट 2018 का फैसला मानेंगे। बता दें कि सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले में कहा गया था की सभी महिलाओं को अय्यप्पा भगवान के मंदिर में प्रवेश दिया जाना चाहिए।

एक रिपोर्ट के मुताबिक केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने सोमवार को कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ कानून लाकर उसे बदलना हमारे लिए संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि ‘जल्लीकट्टू’ की तरह मूल अधिकार का हवाला देकर हम इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ कोई कानून नहीं बना सकते। सबरीमाला में होने वाली साल की सबसे बड़ी तीर्थ यात्रा के दो हफ्ते पूर्व अपना यह बयान देते हुए मुख्यमंत्री विजयन ने कहा कि सभी भक्तों की सुरक्षा और शांति के लिए उनकी सरकार उपयोगी कदम उठाएगी।

कुछ दिन पहले केरल के मुख्यमंत्री ने मीडिया से बातचीत के दौरान कहा था कि उनकी एलडीएफ सरकार श्रद्धालुओं को मंदिर तक पहुँचाने और सर्वोच्च न्यायलय के आदेश का पालन करने के लिए हर संभव प्रयास करेगी। साथ ही उन्होंने कहा कि उनकी सरकार इस मामले में कोई भी पुनर्विचार याचिका दायर नहीं करेगी। उनके मुताबिक अगर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उनसे माँग की जाती है तो इस विषय पर वे अपना विचार रखेंगे।

2018 में भी सीपीएम ने सर्वोच्च न्यायालय के उस विवादित फैसले का समर्थन किया था जिसने उस परंपरा को अवैध करार दिया था जिसके तहत केरल के सबसे पवित्र तीर्थ स्थल सबरीमाला मंदिर में 10 साल से 50 साल की उम्र सीमा वाली महिलाओं का प्रवेश वर्जित था। उस वक़्त एक बड़ी संख्या वाली भीड़ ने न सिर्फ इस फैसले का विरोध किया था बल्कि इस परंपरा को जीवित रखने का भी प्रण लिया था।

इस स्थिति में राज्य की कानून-व्यवस्था को न संभाल पाने के चलते वामपंथी खेमे की काफी आलोचना हुई थी। सीपीआईएम के नेतृत्व वाले केरल प्रशासन ने जानबूझकर दो महिलाओं को स्वेच्छा से मंदिर में प्रवेश करा, प्राचीन परंपरा को तोड़कर मंदिर को ही दूषित कर दिया। यह वही प्रशासन है जिसने एक समय गैर-हिन्दुओं और कार्यकर्ताओं को मंदिर में घुसने के लिए मदद की है।

सबरीमाला के मामले में सदियों पुरानी परंपरा को तोड़ने पर केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन और वामपंथी सरकार सीधे आम लोगों के निशाने पर आई। लोगों ने अपने राज्य की सरकार के इस कदम को गलत माना। ऐसे ही एक मामले में सबरीमाला मंदिर से भक्तों को सुरक्षाबलों के दम पर घसीटकर निकालने की घटना पर केरल उच्च न्यायलय ने विजयन सरकार को फटकार भी लगाई थी।