Home Blog Page 5408

वामपंथी और जिहादी एक दूसरे के पर्याय हैं, इसीलिए अभी इनकी साथ-साथ सुलग रही है, पहचानिए इन्हें

आजकल वामपंथी वायरस फिर से सक्रिय हो उठें हैं। कुछ दिनों तक वो सुसुप्तावस्था में थे क्योंकि कुछ ढंग का करने के लिए था नहीं। अब कमलेश तिवारी हत्याकांड के बाद इनके टेनटेक्ल्स हिलने लगे हैं। लगातार घटती लोकप्रियता और हर पोस्ट पर आम लोगों द्वारा उठते सवालों का जवाब न दे पा रहे वामपंथी बीच-बीच में गायब हो जाते हैं, या फैज-फराज की शायरी करने लगते हैं।

कमलेश तिवारी की हत्या पर पूरा वामपंथी गिरोह शांत था। किसी ने एक लेख नहीं लिखा कि हत्यारों ने मजहबी उन्माद में जो किया है वो गलत है। नहीं कहा, क्योंकि वामपंथी और मजहबी जिहाद का पूरा हिंसक इतिहास बिलकुल एक जैसा रहा है। वामपंथियों ने एक से बढ़ कर एक तानाशाह पैदा किए, जिन्हें आप तानाशाह नहीं कह सकते, लेकिन काम पूरा तानाशाहों वाला ही रहा है।

लाखों की व्यवस्थित हत्याओं का खून वामपंथ के सर पर है। चूँकि इनके पास लिखने वाले लोग थे तो उसे ‘सर्वहारा की क्रांति’ जैसा विचित्र और निहायत ही वाहियात और झूठा नाम दे कर अपनी हिंसा को जायज ठहराने का उपक्रम किया। उसी तरह जिहादियों को देखिए, लगातार हत्याएँ कर रहे हैं और हमें अच्छा मुसलमान और बुरा मुसलमान वाला झुनझुना थमा दिया जाता है!

वामपंथी लम्पट जो जेएनयू के गंगा ढाबा के पास के पत्थरों पर बैठे हुए, भीख माँग कर गाँजा फूँकने को ही वामपंथी विचार मान लेते हैं, उनसे और उम्मीद भी क्या की जाए। वो तो यही समझेंगे कि माओ और लेनिन जैसे हत्यारे अपनी नहीं, सर्वाहारा की लड़ाई लड़ रहे थे। इसीलिए माओ जैसे क्रूर हत्यारे और लेनिन जैसे हिंसक कातिल इनके लिए पूज्य हैं। उन्होंने कभी ये समझने की कोशिश ही नहीं की कि गरीबी अगर एक तरह की हिंसा है, तो उसका जवाब किसी दूसरे गरीब जवान को गढचिरौली में मार देना नहीं है।

खैर, भारत में हर जिहादी वामपंथी हो गया है, और वामपंथियों में तो जिहादियों की रक्तधारा तो है ही। इसलिए दोनों सुर में सुर मिला कर चलते हैं। एक जिहादी, जो स्वयं को वामपंथी कहता है, वो अचानक से अपने कपड़े उतार कर मुसलमान हो जाता है क्योंकि उसके मजहब को कुछ लोग कोस रहे हैं। तब वामपंथी भी पूँछ उठा कर, स्वयं को एक्सपोज करते हुए, ‘हुआँ-हुआँ’ करने लगता है। तब वामपंथी लम्पट भूल जाता है कि उसके विचार में तो धर्म, मजहब या रिलीजन की तो कोई जगह है ही नहीं।

कूल दिखने के चक्कर में रे, जे और गे हो जाने वाले नए वामपंथी, जिनके अभी वामपंथी बाल उगने शुरु ही हुए हैं, वो बेचारे कन्फ्यूज्ड हैं कि इस अल्पविकसित दिमाग का उपयोग कहाँ करें। नाम तो कूल कर लिया, लेकिन काम तो छिछोरों वाला ही रहेगा जो ये जेएनयू छात्र चुनावों में विरोधी प्रत्याशियों पर अपनी वामपंथन को ‘मोलेस्टेशन’ का चार्ज लगाने के लिए आगे कर के किया करते थे।

ये लोग रवीश ‘मेले बाबू ने नौतली थिलीज की’ कुमार को अपना आराध्य मानते हैं क्योंकि उसके जैसा धूर्त अब कोई है नहीं। इसलिए रवीश कमलेश पर, जिहादी मुसलमानों पर, इस मजहबी उन्माद पर, कुछ नहीं बोलेगा, तो ये लोमड़ी समूह भी पूँछ को दोनों पैरों के बीच में दबाए ‘कूँ’ और ‘कीं-कीं-कीं’ करता रहेगा। तब न ये याद आएगा कि साम्प्रदायिक सौहार्द को किसने बिगाड़ा, न यह याद आएगा कि ब्लासफेमी जैसे कानून किसी भी लोकतंत्र में लोकतांत्रिक मूल्यों का मजाक बनाते हैं।

ये भी पढ़ें: आपस में लड़ते-कटते शिया, सुन्नी, अहमदिया… आखिर कौन है सच्चा मुसलमान? रब भी न जानें!

नया नैरेटिव: प्रेम की बात कीजिए, आँख मत फोड़िए

उसके बाद जो इन्होंने किया है वो बहुत ज्यादा घृणित कार्य है। आजकल ये नववामपंथी कमलेश तिवारी की हत्या का बोझ भी हिन्दुओं को ही सर पर डालते दिख रहे हैं। हत्या के बाद के दिनों में अपनी चुप्पी और इस हत्या को मौन सहमति देने के बाद, अब ये कहते पाए जा रहे हैं कि मुसलमानों के प्रति हिन्दू समाज जो घृणा दिख रहा है उसका जवाब मुसलमानों को प्रेम से देना चाहिए।

ये लाइन बिलकुल सही है कि मुसलमानों को प्रेम से जवाब देना चाहिए, लेकिन समस्या यही है कि प्रेम की परिभाषा आज कल हर व्यक्ति और मजहब के लिए अलग हो गई है। आदमी से प्रेम करना एक खास मजहब के लोगों को शायद आता ही नहीं। क्योंकि उनके लिए किसी अनजान तत्व से प्रेम करना इतना ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है कि उसके नाम पर जान लेने में वो नहीं हिचकते।

हिन्दू घृणा फैला रहा है? कमलेश तिवारी के गर्दन पर जो पंद्रह बार चाकू चला, जो बारह सेंटीमीटर लम्बा और तीन सेंटीमीटर गहरा घाव हलाल स्टाइल में रेतने से बना, जो सात बार छाती पर चाकू चला, जो चेहरे में गोली मारी गई, उससे कौन सा प्रेम फैल रहा है? हत्यारे जो ये कहते फिर रहें हैं कि ये हत्या शरीयत के अनुसार सही है और वाजिब-उल-कत्ल है, इससे किस तरह के प्रेम की उत्पत्ति होती है?

ये गिरहकट वामपंथी और जिहादियों के हिमायती बता सकेंगे कि हत्या से कौन-प्रेम उत्पन्न होता है? मुझे रॉबर्ट ब्राउनिंग की एक कविता याद आती है कि पोरफिरिया के प्रेमी ने उसे, उसके ही सुनहरे बालों से गला घोंट कर, मार दिया था क्योंकि उसे लगा कि इससे ज़्यादा प्रेम पोरफिरिया उसे कभी नहीं कर पाएगी और एक समय आएगा जब वो समाज के दबाव में आ जाएगी। अतः उस क्षण को सहेजने के लिए उसने उसकी हत्या कर दी।

मुझे नहीं लगता कि अशफाक और मोइनुद्दीन, या हजारों जिहादी, और आतंकियों के करोड़ों हिमायती जब किसी की जान लेते होंगे तो प्रेम को सहेजने के लिए लेते होंगे। कमलेश की हत्या या बाजारों में काफिरों के बीच फट जाना, किस प्रेम का प्रदर्शन है? ये प्रेम मानव के लिए तो नहीं है। ये घृणा है, मुसलमानों की तरफ से हिन्दुओं को लिए विशुद्ध घृणा कि यही उनका विधान है और वो कोर्ट, प्रशासन और सत्ता से परे हैं।

ये भी पढ़ें: हिन्दू, मुसलमान से घृणा करने लगा है: कमलेश की हत्या के बाद वामपंथी हिन्दू को ही गुनहगार कह रहे हैं!

नैरेटिव नंबर दो: यूपी पुलिस इतनी चुस्त कैसे है?

हत्या पर तो चुप रहे, उसके तुरंत बाद इन्होंने जो प्रतिक्रियाएँ देनी शुरु की, वो काबिलेतारीफ थी। सबसे पहला सवाल पूछा गया कि हिन्दू जो मुसलमानों का नाम ले रहे हैं, वो कैसे जानते हैं कि मुसलमानों ने हत्या की? इन्हें लगा कि पुलिस नहीं पकड़ पाएगी और हिन्दुओं को ये लोग फिर से पागल बना लेंगे ये कह कर हर बात में हिन्दू-मुसलमान नहीं होना चाहिए।

फिर धीरे-धीरे जब पत्ते खुलने लगे, मुसलमानों का हाथ, पैर, सर और दिमाग सब इसमें दिखने लगा, तो इन्होंने कहा कि कमलेश की माताजी तो कह रही हैं कि फलाने नेता ने मरवाया है। अचानक से माताजी की बात सबसे ज्यादा ज़रूरी बात हो गई क्योंकि वामपंथियों और जिहादियों के लाइन से ये मिल रहा था। गुजरात तक इसके तार मिले और एटीएस ने वहाँ लोगों को पकड़ा तो बेहूदे सवाल उठे कि इतनी जल्दी पुलिस गुजरात कैसे पहुँच गई? कातिल गुजरात क्या हवाई जहाज से गया?

मतलब, पूरी कोशिश यह बताने की कि पुलिस ही अपना काम नहीं कर रही, कहानी गढ़ रही है। फिर बताया गया कि इसमें कई लोग शामिल थे, और दो महीने से योजना बनाई जा रही थी, तब इन्होंने फिर से गोलपोस्ट शिफ्ट कर लिया। अब जिहादियों और वामपंथियों का नैरेटिव यह बना कि ट्विटर पर जो ट्रेंड हो रहा है वो भड़काने की कोशिश है।

आप यह देखिए कि कमलेश की हत्या, उसकी हलाल गर्दन, छाती के घाव सब गौण हो जाते हैं, और ये चम्पक मंडली अब इस पर चर्चा में लग जाती है कि ट्विटर पर ट्रेंड क्या हो रहा है। यही दोगले वामपंथी अभी तक गौरी लंकेश, डभोलकर, पनसरे और कलबुर्गी को भूल नहीं पा रहे और नए-नए शब्द गढ़ कर वृहद समाज पर थोप रहे हैं कि समाज एंटी-इंटेलेक्चुअलिज्म की राह पर चल रहा है। सत्य यह है कि गौरी लंकेश एक टुटपुँजिया पत्रकार थी, उसे मैं इंटेलेक्चुअल नहीं मानता। चूँकि वामपंथी किसी को मरने के बाद महान बताने लगते हैं, तो वो वैसे नहीं हो जाते।

दक्षिणपंथ के खिलाफ ज़हर फेंकने वाले लोग, एक पूरी विचारधारा और धर्म पर लगातार गलत मंशा से विरोध करने वाले लोगों को मैं इंटेलेक्चुअल नहीं मानता। इंटेलेक्चुअल या बुद्धिजीवी समाज की बेहतरी को लिए, समाज में रह कर, समाधान लाने की कोशिश करता है, वो अपने शब्दों से किसी को नीचा नहीं दिखाता। ये जितने इंटेलेक्चुअल वामपंथी गिनाते रहते हैं, इन सबने हिन्दुओं के खिलाफ विषवमन किया था। लेकिन फिर भी, उनकी हत्या जायज नहीं है। कोई घटिया लेख लिख रहा है तो बेहतर लेख लिख कर जवाब देना चाहिए, न कि उसकी जान ले ली जाए।

खैर, वामपंथी और जिहादी, दोनों ही हिंसक प्रवृत्ति के लोग बताने लगे कि किसके प्रोफेट ने क्या कहा था और कैसे आज हिन्दू घृणा फैला रहे हैं। ये तो वही बात हो गई कि कातिल के बाप ने कहा कि उसका बेटा तो पाँच बार नमाज पढ़ता है और दाढ़ी भी रखता है, इसलिए वो तो निर्दोष है। अब वामपंथी ये कहने में चूक गए कि मुसलमान हत्यारे के बाप की बात को सही माना जाए और कमलेश की माँ के पहले बयान को, और केस को खत्म मान लिया जाए। क्योंकि इन्होंने ऐसी ज्ञान की बातें अंकित सक्सेना की हत्या के बाद भी की थी।

उसके बाद इन्होंने यूपी पुलिस पर सवाल उठाने शुरु किए कि ब्राह्मण मरा है इसलिए पुलिस सक्रिय है, हजारों दलितों पर तो कुछ नहीं हो रहा। ये एक लाइन में किसी को भी डिसमिस कर देना वामपंथी अपनी कुमाता जेएनयू के गर्भ से सीख कर आते हैं। इन्होंने ये नहीं बताया कि कितने दलित मरे, और उस पर पुलिस कहाँ चुप बैठी है। ये मानते हैं कि इन्होंने कह दिया, इसे मान लिया जाए।

ये भी पढ़ें:कट्टरपंथी मुसलमानों और वामपंथियों का तीन तिकड़म, राम मंदिर लटकाएँगे और टपकाएँगे

वामपंथी अब समीकरण से बाहर हो चुके हैं

बात बस इतनी है कि लोग अब इस नैरेटिव को न तो सामाजिक तौर पर स्वीकार रहे हैं, न राजनैतिक तौर पर कि एक खास समुदाय के लोग प्रेम और शांति की बात करते हैं। जो समुदाय ऐसी हत्याओं पर मौन रहता है उसे शांतिप्रिय मानना आले दर्जे की मूर्खता है। इसलिए, राजनैतिक तौर पर तुष्टीकरण से उबा हुआ आदमी, उन सारे लोगों को नकार रहा है जो साम्प्रदायिक सौहार्द के नाम पर ठग रहे हैं।

ये भी पढ़ें: उधर कमलेश तिवारी का गला रेत डाला, इधर रवीश मेक्सिको-अमेरिका का झगड़ा दिखाते रहे…

जगने की कोशिश करते हिन्दू नाक़ाबिलेबर्दाश्त हैं

लोग अभी जगे तो नहीं हैं लेकिन उनके घरों में अलार्म बजना शुरू हो गया है। वो अब घड़ी को खोज रहे हैं कि आवाज कहाँ से आ रही है। दशकों से जो घड़ी स्नूज़ कर दी जाती थी, अब वो बज कर कहीं छुप रही है। अब हिन्दू उस घड़ी को खोजने के लिए जग रहा है ताकि वो यह देख सके कि इस अंधेरे के लिए जिम्मेदार कौन है, और कौन इस अंधेरे का फायदा उठाने की कोशिश में है। अब हिन्दू जग कर ये देखना चाह रहा है कि उसके दरवाजे पर लम्बा चाकू ले कर जो उसकी गर्दन उतारने को तैयार है, वो आखिर है कौन, उसकी पहचान क्या है?

इसलिए, वामपंथियों और जिहादियों की सुलग रही है। दोनों ही नकारे जा रहे हैं। वामपंथी तो अब स्कूलों के मॉनीटर का चुनाव जीत कर ‘बच्चों ने दिखाया मोदी को ठेंगा’ जैसी हेडलाइन खुद लिखते हैं, और खुद पढ़ते हैं क्योंकि अब उनकी पत्रकारिता भी गायब होती जा रही है। लोग इन्हें पढ़ते भी हैं तो कमेंट में गरियाने के लिए कि पत्रकारिता के नाम पर जो ये पीला रायता फैलाया जा रहा है, वो बंद करो। तब इनका गिरोह लोमड़ी की तरह आता है और ‘आईटी सेल-आईटी सेल’ कह कर गँड़खुल्ला नाच नाचने लगता है।

ये राजनैतिक तौर पर गायब हो चुके हैं, और सामाजिक तौर पर आप इनके बहिष्कार को सोशल मीडिया पर देख सकते हैं। रवीश ‘मेले बाबू ने नौतली थिलीज की’ कुमार के फेसबुक पर जाइए और देखिए कि सकारात्मक और नकारात्मक टिप्पणियों का अनुपात क्या है। ये कहना बहुत आसान है कि ये तो ट्रोल हैं, लेकिन यह स्वीकारना बहुत मुश्किल है कि लोग तुम्हारी पत्रकारिता पर थूक रहे हैं। इनकी जो मंडली है, जो चाह कर भी इंटेलेक्चुअल लेजिटिमेसी की वन-वे पर घृणा से नहाए शब्दों के साथ लम्बा रास्ता तय करने के बाद वापस नहीं लौट सकती, वो ही इनकी पत्रकारिता और विचार पर ऑर्गेज्म पा रहे हैं।

जब तथ्य और तर्क खत्म हो जाते हैं तब वामपंथी ‘आईटी सेल’ और ट्रोल बोल कर स्वयं को सांत्वना देता है। जब उसके द्वारा स्थापित मानदंड टूटते हैं और करोड़ों नए लोग उसी मीडिया पर अपनी राय देने लगते हैं, जिन पर इनका वर्चस्व रहा हो, तो ये ‘आईटी सेल’ वाला राग अलापते हैं। ये अब इतने खौफ में हैं कि अपने छोटे समूह में फेसबुक पर किसी की प्रोफाइल की मास रिपोर्टिंग करके उसे ब्लॉक करवाने की फिराक में रहते हैं। इनका दुर्भाग्य कि फेसबुक ने वो सिस्टम साल भर पहले ही हटा दिया।

ये बेचारे बस सुलग रहे हैं। ये देख रहे हैं कि जो सोए लोग थे, जिन्होंने आँखों पर पट्टी बाँध रखी थी, वो अब जगने की कोशिश कर रहे हैं, तो ये हैमलिन से पाइडपाइपर की तरह पुरानी धुन सुनाना चाह रहे हैं। हिन्दू अब सोएगा नहीं, वो मजहबी घृणा को स्कोडा-लहसुन तहजीब के नाम पर बर्दाश्त नहीं करेगा। हिन्दू अब लिखेगा, बोलेगा और सवाल पूछेगा कि तुम जिस प्रेम की बात कर रहे हो, वो चाकू द्वारा बनाए हुए बारह सेंटीमीटर लम्बे और तीन सेंटीमीटर गहरे घाव के रूप में क्यों दिखता है? हिन्दू ये पूछेगा कि तुम्हारे द्वारा तय भाषा में जो पत्रकारिता हो रही है, उसमें तुम शब्दों की धूर्तता से एक मजहब के लोगों को क्यों बचाते हो, वैसी पत्रकारिता क्यों की जाए?

हिन्दू पूछेगा कि किसी पर लगातार मजहबी प्रहार करने वालों को नाम लेकर, उसके मजहब के कथित जिम्मेदार लोगों से क्यों सवाल नहीं कर रहे कुछ लोग? यही वो सवाल हैं जिससे वामपंथी मीडिया गिरोह और उसके अल्पविकसित चेले-चपाटे जो फेसबुक पर रे, जे और गे बने फिरते हैं, वो मानसिक संतुलन खो रहे हैं। उन्हें अब उनके दोगलेपन को दिखाया जा रहा है। इसलिए अंग विशेष में दर्द उठता है।

तुम जलो वामपंथियों और जिहादियों क्योंकि तुम्हारी यही नियति है। हिन्दू घृणा नहीं बाँटता, वो हजारों सालों से अपनी जगह पर प्लूरलिज्म, सहिष्णुता और सर्वसमावेशी होने के बुनियादी आदर्शों को जी रहा है। वो हमेशा से अकोमोडेटिव, यानी दूसरों के साथ शांति से रहने वाला, बन कर रहा है। लेकिन, सहने की एक सीमा होती है, किसी को इतना मत डराओ कि उसका डर खत्म हो जाए।

एक खास मजहब के उत्पात को, उनके उन्माद को हमेशा ‘भटका हुआ नौजवान’, ‘हेडमास्टर का बेटा’, ‘उसे बचपन में एक अफसर ने उठक-बैठक कराई थी’ जैसे शब्दों और वाक्यांशों के नीचे छुपाने की कोशिशें होती रहीं। ये कहा जाता रहा कि वो अल्पसंख्यक हैं, उन्हें उनके हिसाब से रहने दो। लोगों ने रहने दिया, खिसकते गए, सीट देते गए। लेकिन जब कमलेश तिवारी की तरह उसे हलाल करोगे, तो लोगों के भीतर पलता गुस्सा तो फूटेगा ही।

और ये तुम्हारी तरह नहीं फूटेगा। तुम्हारी जान का प्यासा कोई नहीं है, वो बस ये बताना चाह रहा है कि हर बार तुम कमलेश तिवारी को हलाल कर के ये उम्मीद मत पालो कि तुम बच जाओगे। हिन्दू बस संगठित हो रहा है, राजनैतिक रूप से स्वयं को अपने ही देश में बचाने की कोशिश कर रहा है, वो अपने जीवन को ले कर चिंतित है क्योंकि तुमने उसे ऐसा करने पर मजबूर किया है।

डरना ज़रूरी है हिन्दुओं के लिए। क्योंकि जब अपनी जान पर बन आती है, और जब आदमी को यह अहसास हो जाता है कि दरवाजे पर जो व्यक्ति खड़ा है वो उसके किसी सोशल मीडिया पोस्ट के कारण आहत हो कर उसका कत्ल करने आया है, तब वो अपनी जान बचाने के लिए उपाय करना शुरु कर देता है। आज मोइनुद्दीन और अशफाक ने हत्याकांड के जरिए यह बताया है कि हत्यारों की मदद के लिए हर जगह पर लोग तैयार थे, और उनकी सामूहिक मौन स्वीकृति यह बताती है कि सेंसिबल बातों करने वाले लोग इनके मजहब में नहीं है। होते तो पता चलता क्योंकि सब चुप हैं।

इसलिए, चाकू भले ही एक आदमी ने मारा, लेकिन हत्यारा तो पूरा तंत्र है जो हर कदम पर मदद देता रहा। इसी तंत्र से लड़ाई है, और इसके लिए संगठित होना, आवाज उठाना पहला कदम है। क्योंकि यह भी समझिए कि ये बाबरी विवाद पर बाहरी दबाव की तरह भी काम में लाया जा सकता है। इस हत्या से संदेश यह भी है कि उनके मन की बात नहीं हुई तो और भी कमलेश मर सकते हैं। सोचना आपको है कि आप अपने स्तर पर इस कैंसर से कैसे निपटेंगे।

हत्यारों ने शरीयत के मुताबिक की कमलेश तिवारी की हत्या, मानते हैं इसे वाजिब-उल-कत्ल

कमलेश तिवारी हत्याकांड में आए दिन नए खुलासे हो रहे हैं। हर रोज नए चेहरों के पकड़े जाने के साथ इस मामले में हर गुत्थी सुलझती नजर आ रही है। ताजा खबर के अनुसार गुजरात-राजस्थान बॉर्डर के पास से पकड़े गए दोनों हत्यारों (अशफ़ाक़ और मोइद्दीन ) ने पूछताछ में कहा है कि उन्हें इस हत्या को करने का कोई अफसोस नहीं है, क्योंकि ये शरीयत के मुताबिक था।

मीडिया रिपोर्ट्स में मुताबिक हत्यारों ने अपनी करतूत पर बिना कोई अफसोस जताए कहा कि वे इसे वाजिब- उल-कत्ल मानते हैं। इसके अलावा ये भी पता चला कि पहले मौलाना मोहसिन ने शरीयत का हवाला देकर ही इन दोनों का ब्रेन वॉश किया था और बाद में इन्होंने कत्ल करने से पहले कई अन्य मौलानाओं से भी सलाह मशविरा किया था।

यहाँ बता दें कि आरोपितों के गुनाह कबूल करने के बाद आज कमलेश तिवारी की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी मीडिया में आ गई है। रिपोर्ट के मुताबिक कमलेश तिवारी को 15 बार चाकू मारा गया था। हत्यारों ने पहले गोली मारी और फिर धारदार हथियार से ताबड़तोड़ वार किए गए। चाकू से सीने पर ही 7 बार वार किए गए। चाकू के वार से गर्दन पर 12 सेंटीमीटर लंबा और 3 सेंटीमीटर गहरा घाव हुआ। गला रेतने के कारण ही कमलेश की मौत हो गई थी।

इसके अलावा रिपोर्ट में बताया गया है कि तिवारी के चेहरे के बाईं तरफ बुलेट इंजरी मिली है। गोली उनके चेहरे पर दागी गई थी। हालाँकि, ये भी जाँच का विषय है कि किसी ने बुलेट की आवाज़ क्यों नहीं सुनी? पॉइंट 32 बोर पिस्टल से चली गोली की आवाज़ न तो उनके बॉडीगार्ड और न ही उनकी पत्नी को सुनाई दी। जबकि वारदात के समय ग्राउंड फ्लोर पर ही मौजूद थे। पिस्टल को चाकू के साथ मिठाई के डब्बे में ही ले जाया गया था या फिर इसे कहीं और छिपाया गया था, इस बारे में पुलिस को भी कुछ संशय है।

कमलेश तिवारी की हत्या से लेकर अब तक: इन 20 पॉइंट्स में समझें इस हत्याकांड का पूरा घटनाक्रम

हिन्दू समाज पार्टी के अध्यक्ष कमलेश तिवारी की हत्या के मामले में 5 दिन बाद सभी आरोपित पकड़े जा चुके हैं। इस क्रम में यूपी पुलिस की एसटीएफ और गुजरात एटीएस ने दिन-रात एक कर के कार्रवाई की। यहाँ हम इस हत्याकांड को लेकर अब तक क्या-क्या हुआ, इस सम्बन्ध में जानकारी दे रहे हैं। चूँकि, अलग-अलग शहरों से गिरफ्तारियाँ हुई हैं, हम आपको हर एक अपडेट के साथ बताएँगे कि इस केस में पुलिस कैसे आगे बढ़ी और सोशल मीडिया से लेकर मीडिया पर क्या-क्या चलता रहा। यहाँ देखें:

  1. दिल्ली के खुर्शेदबाग इलाक़े में स्थित कमलेश तिवारी के घर में 2 लोग भगवा वस्त्रों में आए और उन्होंने उनकी हत्या कर दी। मिठाई के डब्बे में हथियार ले गए थे हत्यारे। वह राम मंदिर मामले में पक्षकार रहे थे।
  2. कमलेश तिवारी के नौकर ने बताया कि उसे सामान लेने के लिए बाहर भेजा गया और जब वो वापस आया तो उसने कमलेश तिवारी की लाश पड़ी देखी। अल-हिन्द ब्रिगेड नामक संगठन के नाम से कुछ मैसेज वायरल हुए, जिसमें कहा गया कि उसने कमलेश तिवारी की हत्या की है और जंग शुरू हो चुकी है। हालाँकि, इसकी सत्यता की पुष्टि नहीं हो पाई।
  3. कमलेश तिवारी के परिजनों ने जाँच से असंतुष्टि जताई। बाद में उन्होंने सीएम योगी आदित्यनाथ से मुलाक़ात के बाद हत्यारों के लिए मृत्युदंड की माँग की और जाँच से संतुष्टि जताई।
  4. हालाँकि, मीडिया में लगातार उनकी माँ का ही बयान चलाया जाता रहा, जिसमें वो स्थानीय राजनीति के कारण अपने बेटे की हत्या की जाने की बात कहती रहीं।
  5. सोशल मीडिया पर कई मुस्लिमों द्वारा ‘हा हा’ रिएक्ट करने और जश्न मनाने की बातें सामने आईं। यूपी पुलिस ने ऐसे 14 मामलों में कार्रवाई की। 67 एकाउंट्स ब्लॉक किए गए।
  6. सरकार ने घोषणा करते हुए कहा कि कमलेश तिवारी के परिजनों को सरकारी आवास दिया जाएगा। उनके बड़े बेटे को आत्मरक्षा के लिए लाइसेंसी हथियार देने की घोषणा की गई।
  7. कई अन्य हिंदूवादी नेताओं ने भी धमकी मिलने की शिकायत की। राष्ट्रीय बजरंग दल के अध्यक्ष ने अपनी जान की चिंता जताई। नोएडा के हिंदूवादी नेता अमित जानी को धमकी मिली।
  8. कमलेश तिवारी के साथ ही हिन्दू समाज पार्टी के यूपी प्रकोष्ट के अध्यक्ष गौरव गोस्वामी को भी मारने का प्लान था लेकिन वो वहाँ पहुँच नहीं पाए।
  9. गुजरात एटीएस ने इस हत्या के बाद सूरत से 3 लोगों को गिरफ़्तार किया। तीनों के नाम फैजान, रशीद और सलीम हैं। इन तीनों ने ही इस हत्याकांड की साजिश रची थी। बिजनौर से अनवारुल हक़ और नईम नामक दो मौलानाओं को गिरफ़्तार किया गया।
  10. नागपुर से आसिम अली नामक नेता को गिरफ़्तार किया गया, जिसने इस हत्याकांड के बाद हत्यारों का जमानत कराने और पूरा ख़र्च वहन करने की जिम्मेदारी उठाई थी। उसने नितिन गडकरी के ख़िलाफ़ चुनाव भी लड़ा था।
  11. पुलिस ने लखनऊ स्थित खालसा होटल के उस कमरे को ढूँढ निकाला, जहाँ दोनों हत्यारे रुके हुए थे। होटल में भगवा वस्त्र और खून से सने कपड़े मिले।
  12. दोनों हत्यारों की पहचान अशफ़ाक़ और मोईनुद्दीन के रूप में हुई। अशफ़ाक़ ने फ़र्ज़ी फेसबुक अकाउंट बना कर ख़ुद को हिंदूवादी दिखाया और राम मंदिर के लिए भीड़ जुटाने का लालच देकर कमलेश तिवारी से मिलने का समय माँगा था। दोनों पर ढाई-ढाई लाख का इनाम रखा गया।
  13. राजनीतिक विश्लेषक अब्दुल रज्जाक ने कमलेश तिवारी की हत्या की निंदा करने से इनकार किया। ओवैसी का एक पुराना वीडियो वायरल हुआ, जिसमें वो कमलेश तिवारी को धमकी देते दिख रहे हैं।
  14. यूपी एसटीएफ को पता चला कि दोनों हत्यारे शाहजहाँपुर में छिपे हैं। एक ड्राइवर तौहीद को हिरासत में लिया गया, जिसने इन दोनों को गाड़ी मुहैया कराई थी। बरेली से एक मुफ़्ती को हिरासत में लिया गया, जिसनें इन दोनों का इलाज किया था।
  15. उधर जिस क्षेत्र में आरोपितों के छिपे होने की आशंका थी, उसी इलाक़े में स्थित लखीमपुर में टेरर फंडिंग का मामला सामने आया। पूर्व प्रधान सहित 14 लोग एटीएस की रडार में आए।
  16. 22 अक्टूबर की शाम को गुजरात एटीएस ने दोनों आरोपितों को शामलाजी के पास वाले इलाक़े से धर-दबोचा। उन्हें गुजरात-राजस्थान सीमा से गिरफ़्तार किया गया।
  17. कमलेश तिवारी की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि उन्हें 15 बार चाकू मारा गया। उनके सीने में 4 सेंटीमीटर सुराख़ मिला। उनके चेहरे पर गोली भी मारी गई थी। उनके सीने पर 7 बार वार किया गया और गर्दन पर 12 सेंटीमीटर।
  18. यूपी के क़ानून मंत्री बृजेश पाठक ने कहा कि आरोपितों की डे-टू-डे सुनवाई के लिए फ़ास्ट ट्रैक अदालत में मामला चलाया जाएगा। कोर्ट में सजा-ए-मौत की माँग की जाएगी।
  19. सभी आरोपितों ने अपना गुनाह कबूल कर लिया। गुजरात एटीएस ने आरोपितों को यूपी पुलिस को सौंपने की तैयारी शुरू की।
  20. कमलेश तिवारी पर 2015 में पैगम्बर मुहम्मद पर टिप्पणी करने का आरोप लगा था। यही उनकी हत्या का कारण भी बना।

कुल मिलकर देखें तो इस मामले में अब तक सूरत से फैजान, रशीद और मोहसिन गिरफ़्तार हुए हैं। बरेली से मुफ़्ती बेग अली को पुलिस ने शिकंजे में लिया। बिजनौर से मौलानाओं अनवारुल हक़ और नईम को पुलिस ने अपनी गिरफ़्त में लिया। महाराष्ट्र पुलिस ने नागपुर से आसिम अली को गिरफ़्तार किया। अंत में अशफ़ाक़ और मोईनुद्दीन को गिरफ़्तार किया गया। सीसीटीवी में दिख रही एक अन्य महिला शहनाज बानो का इस घटना से कोई लिंक सामने नहीं आया। बरेली से गिरफ़्तार ड्राइवर तौहीद से पूछताछ के लिए उसे हिरासत में लिया गया। वहीं सूरत में गिरफ़्तार आरोपित के पिता ने अपने परिवार के पाँच वक़्त के नमाजी होने और दाढ़ी बढ़ाने को बचाव के रूप में प्रस्तुत किया।

बजरंग बली के दर पर प्रियंका गाँधी, अटैची लेकर पहुँचे नेताओं का मोबाइल बाहर रखवाया

महासचिव प्रियंका गॉंधी के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण शिविर बुधवार को शुरू हुआ। यूपी में पार्टी को मजबूत करने के मकसद से यह शिविर प्रियंका की मॉं और कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गॉंधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली में हो रहा है। शिविर में शामिल होने से पहले प्रियंका ने चुरुवा के हनुमान मंदिर में पूजा-अर्चना की।

दो दि​वसीय प्रशिक्षण शिविर में कार्यकर्ताओं को भाजपा से लड़ने के गुर सिखाए जाएँगे। कॉन्ग्रेस नेताओं को समझ नहीं आ रहा है कि अनुच्छेद 370 और पाकिस्तान पर भाजपा को कैसे जवाब दें? इस कार्यशाला में इन्हीं बातों का तार्किक जवाब देने के गुर सिखाए जाएँगे और भाजपा के ख़िलाफ़ माहौल बनाने की योजना बनाई जाएगी। प्रशिक्षण छह सत्रों का होगा। इस दौरान कार्यकर्ताओं व नेताओं को सिखाया जायेगा कि भाजपा सरकार को किन-किन मुद्दों पर घेरना है। कार्यशाला को पूरी तरह गोपनीय रखा गया है।

प्रशिक्षण कार्यशाला में कॉन्ग्रेस के चुने हुए 45 नेता भाग ले रहे हैं। रायबरेली शहर से कुछ किलोमीटर दूर भुएमऊ गेस्ट हाउस में कॉन्ग्रेस नेताओं का जमावड़ा लगा है। परिसर में ही सभी नेता रुके हुए हैं। सभी नेता अटैची में अपना सामान लेकर पहुँचे। शिविर शुरू होने से पहले हरेक नेता से मोबाइल फोन ले लिया गया ताकि कोई भी तस्वीर या सूचना लीक न हो।

प्रशिक्षण शिविर के लिए प्रियंका मंगलवार को ही यूपी पहुॅंच गईं थी। उन्होंने नेताओं के साथ विचार-विमर्श किया और रणनीति को लेकर गुप्त चर्चा की। रायबरेली जाते समय रास्ते में कई जगहों पर मोदी सरकार पर आर्थिक मंदी के लिए और योगी सरकार पर ‘बढ़ते अपराध के लिए’ निशाना साधा।

कमलेश तिवारी हत्याकांड: हत्यारे अशफाक़ और मोईनुद्दीन ने ट्रेन में छोड़ दिया मोबाइल, शहर-शहर दौड़ती रही पुलिस

हिन्दू महासभा के सदस्य और हिन्दू समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष कमलेश तिवारी की हत्या के आरोप में गिरफ्तार आरोपितों से पूछताछ में नए नए खुलासे हो रहे हैं। ताज़ा जानकारी में पता चला है कि मुख्य आरोपित शेख अशफाक हुसैन व पठान मोईनुद्दीन अहमद ने पुलिस को 4 दिन तक चकमा देने के लिए बेहद शातिराना तरीके का इस्तेमाल किया था। उन्होंने पुलिस को अपनी लोकेशन ट्रेस करने से रोकने के लिए अपना मोबाइल ट्रेन में छोड़ दिया और ट्रेन के गंतव्य से इतर अलग ही दिशा में फ़रार हो गए। उत्तर प्रदेश पुलिस, STF और ATS उन्हें ढूँढ़ते हुए देश की सीमा के पास अम्बाला में उनके पाकिस्तान निकल भागने की आशंका को रोकने की जद्दोजहद में लगी रहीं, क्योंकि मोबाइल सिग्नल की आखिरी लोकेशन अम्बाला की ही थी, वहीं दूसरी ओर हत्या के आरोपित शहर के बाद शहर बदल कर पुलिस के हत्थे चढ़ने से बच कर निकल रहे थे।

इस बीच पठान और हुसैन के छोड़े हुए मोबाइल को किसी और ने उठा लिया। उसने मोबाइल में लगा हुआ सिम कार्ड निकाल कर अपना कार्ड लगा दिया और फ़ोन का इस्तेमाल करने लगा। इधर पुलिस फ़ोन की पहचान संख्या (IMEI नंबर) का पीछा करने में लगी रही। हालाँकि, उत्तर प्रदेश पुलिस बरेली और शाहजहाँपुर पर भी नज़र बनाए थी, लेकिन दोनों आरोपित अम्बाला की ओर पुलिस का ध्यान भटकाकर पश्चिमी सीमा की ओर निकल भागने में सफ़ल हो गए। यह बात अलग है कि वहाँ भी वे गुजरात-राजस्थान बॉर्डर पार करने के चक्कर में गुजरात पुलिस के आतंकरोधी दस्ते (ATS) के हाथों में पड़ ही गए।

न्यूज़ 18 की रिपोर्ट के अनुसार जिस समय उत्तर प्रदेश पुलिस शातिर जिहादियों के जाल में फँस कर उनकी गलत लोकेशन के पीछे भाग रही थी, उसी समय गुजरात एटीएस ने उन दोनों के परिजनों को ढूँढ़ निकाला था। गुजरात एटीएस के उप महानिदेशक (डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल) हिमांशु शुक्ल ने मीडिया को बताया कि दोनों के पैसे खत्म हो गए तो पहले तो उन्होंने रिश्तेदारों और दोस्तों को फ़ोन कर पैसे के लिए सम्पर्क किया, लेकिन पुलिस के डर से किसी ने उनके खाते में पैसे नहीं डाले। अंत में उन्हें हार कर पैसा नकद लेने के लिए गुजरात में घुसने का प्लान बनाना पड़ा। एटीएस को इसके बारे में आरोपितों में से एक की पत्नी के ज़रिए पता लग गया। पुलिस ने जाल बिछाया और राजस्थान बॉर्डर पर शामलजी से राज्य की सीमा में दाखिल होने की कोशिश में उन्हें हिरासत में ले लिया गया।

अयोध्या: दीपोत्सव राजकीय मेला घोषित, योगी सरकार ने दिए ₹133 लाख

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने अयोध्या में होने वाले दीपोत्सव को ‘स्टेट फेयर’ यानी राजकीय मेला घोषित किया है। इसके लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली कैबिनेट ने 133 लाख के बजट को मंजूरी दी है। साथ ही कैबिनेट ने ऑडिट का प्रस्ताव भी पारित किया ताकि इस पैसे का दुरुपयोग न हो सके।

बता दें कि अयोध्या में तीन दिवसीय दीपोत्सव के दौरान अयोध्या की भव्यता देखते ही बनती है। पूरे शहर में रोशनी के खास इंतजाम किए जाते हैं। दीपावली पर होने वाले इस आयोजन में अपनी कला का प्रदर्शन करने के लिए देशभर से कलाकारों को बुलाया जाता है।

26 अक्टूबर को, दीपावली से एक दिन पहले शुरू होने वाले इस त्योहार में यूपी सरकार ने करीब 5.5 लाख दीप जलाने का फैसला किया है। उत्तर प्रदेश सरकार के प्रवक्ता और मंत्री श्रीकांत शर्मा ने मीडिया से बातचीत में बताया कि दीपोत्सव को राजकीय मेला घोषित करने की मांग अयोध्या के जिलाधिकारी की ओर से आई थी। उन्होंने बताया कि डीएम इस बात की माँग पहले भी (15 जनवरी और 3 जुलाई को) दो बार कर चुके थे।

कैबिनेट मंत्री शर्मा ने कहा, “मौजूदा समय में दीपोत्सव राज्य के पर्यटन विभाग द्वारा संचालित किया जाता है। लेकिन इसकी व्यापकता को देखते हुए इसे राजकीय मेले का दर्जा देने का फैसला किया गया है।।” उन्होंने बताया कि इस मेले का प्रबंधन जिलाधिकारी के पास रहेगा।

बता दें कि पिछले साल भी अयोध्या में दीपोत्सव का आयोजन किया गया था। इस दौरान सरयू नदी के तट पर करीब तीन लाख दीये प्रज्ज्वलित किए गए थे। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह आयोजन काफी चर्चित रहा था। दक्षिण कोरिया की प्रथम महिला किम जंग सूक भी इस मौके पर मौजूद थीं। योगी आदित्यनाथ की सरकार ने 2017 में इस आयोजन की शुरुआत की थी। उस साल सरयू नदी के किनारे सभी घाट और मंदिरों में 1.5 लाख दीये प्रज्ज्वलित किए गए थे।

गौरतलब है कि बहुप्रतीक्षित अयोध्या विवाद में अगले महीने सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने की भी उम्मीद है। शीर्ष अदालत में 40 दिन चली सुनवाई के दौरान इतिहास और साक्ष्य हिंदुओं के पक्ष में नजर आए थे।

मुस्लिम हिंदुस्तान में कॉन्ग्रेस की रहम-ओ-करम पर नहीं हैं, हम यहाँ हैं तो अल्लाह की मेहरबानी से: ओवैसी

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहालदुल मुस्लिमीन के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने कॉन्ग्रेस पार्टी पर आज फिर से (अक्टूबर 23, 2019) जोरदार निशाना साधा है। दरअसल, आज ओवैसी के नाम और तस्वीर के साथ उनकी पार्टी ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से एक पोस्टर शेयर किया है। जिसमें लिखा है कि भारत में मुस्लिम कॉन्ग्रेस की मेहरबानी से नहीं बल्कि बाबा साहेब और अल्लाह की मेहरबानी से है।

बुधवार (अक्टूबर 23, 2019) की दोपहर में शेयर हुए इस पोस्टर को हिन्दी के साथ-साथ उर्दू में भी शेयर किया गया है। इसमें ओवैसी के नाम के ऊपर उनका कथन स्पष्ट लिखा है, “मुस्लिम हिंदुस्तान में है तो कॉन्ग्रेस की मेहरबानी या रहम ओ करम पर नहीं। हम यहाँ है तो बाबा साहेब के संविधान की वजह से और अल्लाह की मेहरबानी की वजह से।”

उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व भी ओवैसी कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी पर खुलेआम तंज कस चुके हैं। महाराष्ट्र में चुनाव प्रचार दौरान उन्होंने कहा था कि जब कोई जहाज डूबता है, तो जहाज का कैप्टन सभी को सुरक्षित निकाल लेता है, लेकिन राहुल गाँधी ऐसे कप्तान हैं जो कॉन्ग्रेस के जहाज को डूबता देख छोड़कर भाग गए।

बता दें AIMIM के प्रमुख ओवैसी ने कुछ दिन पहले अयोध्या राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद के मामले में भी एक ट्वीट किया था। इसमें उन्होंने अपने ट्विटर अकॉउंट पर लिखा था, “मुझे नहीं पता क्या फैसला आएगा, लेकिन मैं चाहता हूँ फैसला ऐसा आए जिससे कानून के हाथ मजबूत हों। बाबरी मस्जिद को गिराया जाना कानून का मजाक था।”

इसके अलावा कुछ दिन पहले ओवैसी ने मोहन भागवत पर भी जमकर निशाना साधने का प्रयास किया था। उन्होंने कहा था, “भारत को हिंदू राष्ट्र बताकर यह मेरा इतिहास नहीं मिटा सकते। ये काम नहीं करेगा। वह यह नहीं कह सकते कि हमारी संस्कृति, आस्था पहचान हिंदुओं से जुड़ी है।” ओवैसी के अनुसार भारत न कभी हिन्दू राष्ट्र था, न है और न कभी बनेगा। इंशाल्लाह!!

‘जिहादी’ और ‘एंटी-नेशनल’ अपराध श्रेणियाँ हुईं आधिकारिक: NCRB ने जारी किए 2017 के आँकड़े

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के ताज़ा आँकड़े जारी हो गए हैं। वर्ष 2017 अपराध की घटनाओं की संख्या के इन आँकड़ों में पहली बार ‘एंटी नेशनल एलिमेंट्स (राष्ट्र विरोधी तत्व)’ और ‘जिहाद’ का ज़िक्र किया गया है। एंटी नेशनल तत्वों में उत्तर पूर्व के आठ राज्यों (सिक्किम, असम, नागालैंड, मिज़ोरम, मेघालय, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश और त्रिपुरा) के उग्रवादी संगठनों से जुड़े लोग, नक्सली, माओवादी आदि वामपंथी चरमपंथी आतंकी, ‘जिहादी’ (इस्लामी आतंकवादी) आदि शामिल किए गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर पूर्व के उग्रवादियों ने 10 लोगों की हत्याएँ की हैं, जिनमें से 8 लोग एक ही राज्य झारखंड के हैं।

नक्सलियों, माओवादियों और अन्य वामपंथी आतंकियों ने 82 हत्याएँ की हैं। एक बार फिर, इन मृतकों में 79 केवल एक ही राज्य छत्तीसगढ़ के हैं। इसी तरह जिहादी आतंकवाद के हाथों मारे गए 36 लोगों में से 34 मृतक केवल जम्मू कश्मीर के हैं।

NCRB के अनुसार नक्सलियों ने 2017 में 652 आपराधिक वारदातों को अंजाम दिया था। जिहादी और आतंकवादी वारदातें 377 हुईं और उत्तर पूर्व के उग्रवादियों ने 421 अपराध किए थे। न्यूज़ पोर्टल The Week की रिपोर्ट के अनुसार NCRB ने अपराध के कुछ मापदंडों को शामिल इसलिए नहीं किया है क्योंकि उन पैमानों पर उपलब्ध जानकारी और आँकड़े “अस्पष्ट” और “भरोसे लायक नहीं” थे। गृह मंत्री के एक अधिकारी के हवाले से यह भी दावा किया गया है कि जिन मापदंडों को रिपोर्ट से बाहर रखा गया है, उनमें मॉब लिंचिंग से हुई हत्याएँ, RTI कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं इत्यादि के साथ हुए अपराध भी शामिल हैं।

अपराधों की तहरीर (FIR) की बात करें तो उत्तर प्रदेश इसमें चोटी पर है, जहाँ 3 लाख से अधिक आपराधिक मामले दर्ज किए गए हैं। इसके बाद महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, केरल और राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली का नंबर आता है। अगर राष्ट्रीय स्तर पर दर्ज कुल आपराधिक मामलों की बात करें तो 2017 में 30,62,579 केस दर्ज किए गए थे। यह संख्या पिछले दो सालों 2016 और 2015 के क्रमशः 29,75,711 और 29,49,400 FIR से अधिक है। यह आँकड़े कल रात (22 अक्टूबर, 2019 को) जारी किए गए थे।

देश के सबसे अधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में 3,10,084 मामले दर्ज हुए थे, जो कि राष्ट्रीय कुल योग का 10% अकेले है। देश की ही तरह उत्तर प्रदेश में भी दर्ज FIR की संख्या लगातार तीसरे साल बढ़ी है- 2016 में 2,82,171 और 2015 2,41,920 मुकदमे लिखवाए गए थे। 2017 में महाराष्ट्र में देश की कुल 9.4% और मध्य प्रदेश में 8.8% तहरीरें लिखवाईं गईं।

AMU में भाजपा विधायक की गाड़ी से उतरवाया झंडा, कैंपस में नाती से हो चुका है गाली-गलौच भी

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) एक बार फिर चर्चाओं में हैं। इस बार वहाँ भाजपा विधायक दलवीर सिंह चौधरी की गाड़ी को यूनिवर्सिटी परिसर में अंदर जाने की अनुमति तभी मिली जब उस पर लगा बीजेपी का झंडा हटाया गया। अगस्त के आखिर में कैंपस में चौधरी के नाती के साथ गाली-गलौच की घटना भी हुई थी।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार बरौली सीट से भाजपा विधायक दलवीर सिंह का ड्राइवर मंगलवार (अक्टूबर 22, 2019) को दोपहर करीब 3:30 बजे उनके नाती को लेने के लिए गाड़ी लेकर यूनिवर्सिटी पहुँचा। गाड़ी पर बीजेपी का झंडा लगा देख उसे सैय्यद गेट के पास रोक लिया गया। गाड़ी से बीजेपी का झंडा उतरवाने के बाद ही प्रॉक्टोरियल बोर्ड की टीम ने उसे कैंपस में प्रवेश की अनुमति दी।

मामले के तूल पकड़ने के बाद यूनिवर्सिटी ने कहा है कि परिसर में किसी भी दल का झंडा लगी गाड़ी को प्रवेश की अनुमति नहीं है। भाजपा विधायक ने इसकी शिकायत करते हुए कार्रवाई की माँग की है। विधायक ठाकुर दलवीर सिंह ने एएमयू की प्रॉक्टोरियल टीम पर ड्राइवर से अभद्रता करने का आरोप लगाया है। उनके ड्राइवर ने भी अलीगढ़ पुलिस के पास इस मामले में केस दर्ज करवाया है। ड्राइवर का कहना है कि परिसर के बाहर जबरदस्ती गाड़ी से झंडा उतरवाया गया।

विधायक ने घटना से अलीगढ़ के एसपी को अवगत करवा दिया है। साथ ही बताया है कि उन्होंने थाना सिविल लाइंस में तहरीर दे दी है। विधायक ने कहा है कि वे इस घटना की शिकायत मानव संसाधन विकास मंत्री से भी करेंगें।

चौधरी के नाती विजय कुमार सिंह ने इसी साल एएमयू के विदेशी भाषा विभाग (स्पेनिश) में दाखिला लिया है। 28 अगस्त को यूनिवर्सिटी में शिक्षकों के सामने ही कुछ सीनियर छात्रों ने उनसे अभद्रता की थी।

कॉन्ग्रेस ने चुनाव परिणाम से पहले ही हरियाणा में भंग किया संगठन: साधा EVM पर निशाना

हरियाणा में सोमवार (अक्टूबर 21, 2019) विधानसभा चुनाव के बाद सभी उम्मीदवारों की किस्मत मतपेटियों में बंद हो गई है और सभी की निगाहें अब गुरुवार को आने वाले चुनाव परिणाम पर टिकी हैं। अधिकतर एग्जिट पोल्स में मनोहर लाल खट्टर मुख्यमंत्री के रूप में वापस लौटते दिख रहे हैं। कॉन्ग्रेस चुनाव से पहले पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा की चुनौती से जूझ रही थी, जिन्होंने बगावती तेवर अपना लिए थे। अब ख़बर आई है कि कॉन्ग्रेस पार्टी ने हरियाणा में पूरे संगठन को ही भंग कर दिया है। हालाँकि, मतगणना का इंतजार किए बिना यह फ़ैसला क्यों किया गया, इस सम्बन्ध में कुछ स्पष्ट नहीं हो सका है।

यह निर्णय हरियाणा कॉन्ग्रेस की अध्यक्ष कुमारी शैलजा ने लिया। उन्हें चुनाव से ऐन पहले प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी दी गई थी क्योंकि पूर्व सीएम हुड्डा और तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष अशोक तँवर के बीच मतभेद काफ़ी बढ़ गए थे। यूपीए-2 में केंद्रीय मंत्री रह चुकीं शैलजा को कॉन्ग्रेस दलित चेहरे के रूप में पेश करती रही है। कहा जा रहा है कि संगठन में सुधार करने के लिए उन्होंने ये क़दम उठाया है। संगठन के सभी प्रकोष्ठों को भंग कर दिया गया है और साथ ही पार्टी पदाधिकारियों की भी छुट्टी कर दी गई है।

पार्टी ने बताया है कि जल्द ही नए सिरे से सदस्यता अभियान चलाया जाएगा और संगठन का विस्तार किया जाएगा। हालाँकि, कुमारी शैलजा ने चुनाव के दौरान आपात स्थिति में जो नियुक्तियाँ की थीं, उन्हें बरक़रार रखा गया है। विधानसभा के दौरान 18 ऐसे नेता थे, जिन्हें कॉन्ग्रेस ने पार्टी-विरोधी गतिविधियों में संलग्न रहने का आरोप लगा कर 6 साल के लिए निकाल बाहर किया था। वहीं अशोक तँवर को लेकर पार्टी ने अभी तक स्थिति साफ़ नहीं की है, जिन्होंने चुनाव के दौरान जम कर जेजेपी का प्रचार किया। उनका इस्तीफा स्वीकार हुआ है या नहीं, इस पर पार्टी चुप है।

वहीं हुड्डा ने एग्जिट पोल्स को नकारते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस की जीत होगी और फिर विधायक मिल कर सीएम चुनेंगे। वह इस सवाल पर कन्नी काट गए कि क्या उनके बेटे दीपेंद्र सिंह के सीएम बनने की सम्भावना है? वहीं कुमार शैलजा ने एक क़दम और आगे बढ़ते हुए बिना परिणाम आए ही ईवीएम पर टिप्पणी कर दी। हरियाणा में कॉन्ग्रेस की ये हालत आंतरिक कलह और गुटबाजी की वजह से हुई है। जहाँ राष्ट्रीय स्तर पर कॉन्ग्रेस अध्यक्ष विहीन होकर कई दिनों तक जूझती रही, हरियाणा में गुलाम नबी आज़ाद के कई प्रयासों के बावजूद पार्टी की स्थिति सुधर नहीं पाई।