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सुनो, पाकिस्तानी मलाला, भारतीय सेना की पदचाप J&K में डर नहीं बल्कि विश्वास पैदा करती है

मलाला युसुफ़ज़ई को जम्मू-कश्मीर की बड़ी चिंता है। सिंध में अल्पसंख्यक (हिन्दू, सिख एवं ईसाई) लड़कियों के धर्मान्तरण से उन्हें दिक्कत नहीं है, लेकिन जम्मू-कश्मीर की किसी लड़की ने उन्हें कथित तौर पर कह दिया कि वहाँ खिड़की के बाहर से सेना के पदचाप सुनाई देते हैं और उन्होंने एक के बाद एक सात ट्वीट्स लिख डाले। मलाला ने किस लड़की से बात की, वो लड़की जम्मू-कश्मीर के किस क्षेत्र में रहती है और उन्होंने कितनी लड़कियों से बात कर के अपनी राय बनाई, यह सब किसी को नहीं पता।

जम्मू-कश्मीर में सीमा पर पाकिस्तान की तरफ़ से लगातार गोलीबारी हो रही है। सन 2019 को बीतने में अभी 3 महीने से भी अधिक बचे हैं, लेकिन पाकिस्तान 2050 बार सीमा पर सीजफायर का उल्लंघन कर चुका है। इससे किसे दिक्कत होती है? सीमा के आसपास कई गाँव हैं, उनमें रह रहे लोगों को। बूढ़ों-महिलाओं-बच्चों को। यहाँ तक कि सीमा के आसपास रह रहे जानवरों को भी नुकसान पहुँचता है और वे मारे जाते हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में बताया था कि सरकार 15,000 बंकर सिर्फ़ सीमा पर रह रहे लोगों व पशुधन की सुरक्षा के लिए बनवा रही है।

मलाल युसुफ़ज़ई ने किस आधार पर किसी काल्पनिक लड़की से संवाद कर उसके हवाले से कह दिया कि जम्मू-कश्मीर में सेना की पदचाप सुनाई देने से डर का माहौल है, यह चर्चा का विषय है। लेकिन, आँकड़े कहते हैं कि राज्य में भारतीय सेना के पदचाप से नहीं, बल्कि पाकिस्तानी फ़ौज की गोलीबारी से लोगों को दिक्कत है। लोग मारे जाते हैं। उनके जानवर मारे जाते हैं। बच्चे स्कूल नहीं जा पाते। ऐसे समय में उनकी मदद के लिए कौन आता है? मलाला युसुफ़ज़ई नहीं आतीं। भारत की सेना आती है।

आपने भी वह वीडियो देखा होगा, जिसमें भारतीय सेना एक स्कूल में फँसे बच्चों को बचा कर निकाल रही है। बालाकोट सेक्टर स्थित मेंढर तहसील में एक स्कूल में बच्चे फँस गए, क्योंकि अचानक से पाकिस्तान ने फायरिंग शुरू कर दी। तब भारतीय सेना वहाँ पहुँची और बच्चों को बचाया। जब वे बच्चे पाकिस्तान की गोलीबारी के बीच डरे-सहमे रो रहे होंगे, तब भारतीय सेना की पदचाप से उन्हें राहत मिली होगी, एक आस जगी होगी, डर नहीं लगा होगा। एक-एक कर के तीन स्कूलों के बच्चों को सेना ने पाकिस्तानी फ़ौज की गोलीबारी के चंगुल से निकाला।

मलाला युसुफ़ज़ई को इन बच्चों से बात करनी चाहिए। कश्मीर की किस लड़की से उन्होंने बात की, यह तो नहीं पता, लेकिन वीडियो में प्रत्यक्ष दिख रहे बच्चों से बात कर के उन्हें जानना चाहिए कि वे आतंकित किस से हैं और कौन उनके बचाव के लिए जान न्यौछावर कर रहा है? हरेक कुछ दिन पर मलाला का कथित कश्मीर प्रेम जगता है और वह सिर्फ़ जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तानी प्रोपगेंडा को हवा देने भर तक ही सीमित होता है, पीओके पर वह कुछ नहीं बोलतीं। पीओके पर उन्हें क्यों बोलना चाहिए, इस पर चर्चा करेंगे, लेकिन उससे पहले श्रीश्री रविशंकर का एक बयान याद करते हैं।

मई 2016 में ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ के संस्थापक श्रीश्री रविशंकर ने साफ़-साफ़ कहा था कि मलाला युसुफ़ज़ई नोबेल पुरस्कार के लायक नहीं थीं। हालाँकि, पाकिस्तान में मलाला के साथ जो भी हुआ वह दुःखद है और अपनी आवाज़ उठाने के लिए उनकी प्रशंसा होनी चाहिए। लेकिन, श्रीश्री का पूछना था कि नोबेल पुरस्कार पाने के लिए उन्हों क्या किया है? साथ ही श्रीश्री ने यह भी कहा था कि नोबेल पुरस्कार ने अब अपना महत्व खो दिया है। श्रीश्री के कई बयानों पर विवाद हो सकता है लेकिन उनके इस बयान का सार यह था कि एक 16 वर्षीय लड़की को नोबेल दे दिया गया, जिसने उस अवॉर्ड को पाने लायक कुछ नहीं किया।

अब आते हैं कर्नाटक के उडुपी-चिकमंगलूर से भाजपा सांसद शोभा करंदलाजे के बयान पर। उन्होंने मलाला पर पलटवार करते हुए उन्हें एक अच्छी सलाह दी है। कर्नाटक सरकार में मंत्री रह चुकीं शोभा ने नोबेल विजेता मलाला से कहा कि वे पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों के साथ भी कुछ पल गुजारें। भाजपा सांसद ने याद दिलाया कि मलाला के अपने ही देश में अल्पसंख्यकों का जबरन धर्मान्तरण हो रहा है और उन पर अत्याचार किए जा रहे हैं। उन्होंने मलाला को इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की सलाह दी। साथ ही उन्होंने मलाला से कहा कि कश्मीर में कुछ ‘बुरा’ नहीं हुआ है, विकास की बयार अब वहाँ और अच्छे से पहुँचेगी।

भाजपा सांसद का यह बयान हलके में लेने लायक नहीं है, क्योंकि पाकिस्तान के ख़ुद के मानवाधिकार संगठन ने यह पाया है कि अकेले दक्षिण सिंध में सिर्फ़ 2018 में 1,000 से भी अधिक अल्पसंख्यकों को जबरन इस्लामिक मज़हब कबूलने को मजबूर किया गया। यह पूरे सिंध का भी आँकड़ा नहीं है, तो पाकिस्तान की बात ही छोड़ दीजिए। कहीं शिक्षक ने ही छात्र का जबरन धर्मान्तरण करा दिया तो कहीं लड़कियों का अपहरण कर उनसे शादी रचाई गई और इस्लाम कबूल करवाया गया। मलाला युसुफ़ज़ई के ख़ुद के देश में चल रहे इस ख़तरनाक खेल के ख़िलाफ़ उन्होंने कभी चूँ तक नहीं किया।

मलाला ने कहा है कि 4,000 लोगों को जेल में ठूँस दिया गया है, जिनमें कई बच्चे भी शामिल हैं। जबकि कहीं भी इस प्रकार का कोई रिपोर्ट नहीं है जहाँ बच्चों को जेल में डालने की बात सामने आई हो। इसके लिए मलाला ने किसी न्यूज़ पोर्टल की ख़बर का भी हवाला नहीं दिया। अर्थात, हवा में आरोप लगाए जा रहे हैं, क्योंकि नोबेल विजेता ने कह दिया तो सबूतों और गवाहों की कोई ज़रूरत नहीं होती। भारत जैसे विशाल देश के आंतरिक मुद्दे के बारे में बर्मिंघम में बैठ कर ट्वीट करना आसान है, ग्राउंड जीरो पर जाकर काम करना मुश्किल। लेकिन, ट्वीट करने से सुर्खियाँ मिलती हैं।

मलाला को पीओके पर क्यों बोलना चाहिए? वह जम्मू-कश्मीर का पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाला हिस्सा तो है और साथ ही वहाँ की जनता को भी पाक फ़ौज द्वारा दबाया जाता है। असली अत्याचार वहाँ है। पाकिस्तान के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री फवाद चौधरी ने दावा किया था कि पाक अधिकृत कश्मीर में लोग बहुत ख़ुश हैं और कोई भी आकर इस चीज को देख सकता है। लेकिन, बलूच नेता मेहरान मारी ने उनकी पोल खोलते हुए उन्हें बेशर्म आदमी बताया। इसी तरह पीओके के सामाजिक कार्यकर्ता आरिफ आजाकिया ने पाकिस्तानी नेताओं को लताड़ते हुए कहा कि दुनिया मेट्रो पर घूम रही है, लेकिन पाकिस्तान अभी भी रिक्शे से बाहर नहीं निकल रहा।

मलाला का यह भी कहना है कि बच्चे कश्मीर में 40 दिन से स्कूल नहीं जा पाए हैं। 12 अगस्त को कुछ छात्रों की परीक्षाएँ छूट गईं। हालाँकि, लोगों ने उन्हें यह याद दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि अगस्त 12 , 2019 को बकरीद था और छुट्टियों के दिन वैसे भी स्कूल बंद ही रहते हैं। अब मलाला द्वारा कश्मीर की छात्राओं के हवाले से कई गई हर चीज काल्पनिक लगती है क्योंकि इसमें एक-एक बात झूठ पर आधारित प्रतीत होती है। मलाला शायद अपनी देशभक्ति निभा रही हैं। या फिर इमरान ख़ान के उस बयान को आधार बना कर कार्य कर रही हैं जिसमें उन्होंने पाकिस्तान को पूरी दुनिया के इस्लामवादियों का रहनुमा बताया था।

मलाला अगर सच में जम्मू-कश्मीर के लिए चिंतित हैं तो उन्हें ज़मीन पर आकर स्थिति देखनी चाहिए। अगर वह बच्चों की शिक्षा को लेकर चिंतित हैं तो पाकिस्तान को गोलीबारी रोकने को कहना चाहिए। अगर वह जम्मू-कश्मीर में ‘डर के माहौल’ को लेकर चिंतित हैं तो उन्हें जिहादी आतंकियों की निंदा करनी चाहिए। अगर वह मीडिया की आज़ादी और ‘आवाज़ उठाने की स्वतंत्रता’ को लेकर चिंतित हैं तो उन्हें पीओके और चीन के कब्जे वाले कश्मीर के सामाजिक कार्यकर्ताओं की आवाज़ सुननी चाहिए। लेकिन अभी तक के उनके बयानों से तो ऐसा ही लग रहा कि वह एक पाकिस्तानी की नज़र से ही चीजों को देख रही हैं, जैसे वहाँ के सियासतदान देखते हैं।


स्कूल के मुस्लिम प्रिंसिपल ने हिजाब किया अनिवार्य, कहा- लड़कियों को बुरी नजर से बचाता है

असम के करीमगंज के एक स्कूल में लड़कियों के लिए हिजाब पहनना अनिवार्य कर दिया गया है। करीमगंज स्थित ईस्ट पॉइंट पब्लिक स्कूल के प्रिंसिपल एबी हन्नान ने सोशल मीडिया पर अपने फेसबुक अकाउंट के जरिए सूचना दी है कि स्कूल में लड़कियों के लिए हिजाब पहनना अनिवार्य कर दिया गया है और यह फैसला उन्हें बुरी नज़रों से बचाने के लिए किया गया है।

हन्नान ने फेसबुक पर हिजाब पहने हुए लड़कियों की तस्वीर भी पोस्ट की है। एबी हन्नान के फेसबुक प्रोफ़ाइल में लिखा हुआ है कि वो भारत सरकार के अंतर्गत मानव संसाधन मंत्रालय में काम करते हैं। हालाँकि, उनका फेसबुक अकाउंट ही उन्हें IAS?ACS अभ्यर्थी भी बताता है।

इसके अलावा हन्नान का इंस्टाग्राम अकाउंट बताता है कि वो करीमगंज में ईस्ट पब्लिक स्कूल में प्रिंसिपल के रूप में कार्यरत हैं। उनकी सोशल मीडिया तस्वीरों से भी यही जानकारी मिलती है कि वो करीमगंज में स्कूल में प्रिंसिपल हैं, ना कि भारत सरकार के अंतर्गत काम करते हैं। हालॉंकि यह स्पष्ट नहीं है कि इस स्कूल में पढ़ने वाले सारे बच्चे मुस्लिम ही हैं या फिर दूसरे धर्म के बच्चे भी यहॉं पढ़ते हैं।

हिजाब इस्लामिक शरिया कानून के अनुसार आवश्यक बताया जाता है। मुस्लिम देशों में हिजाब के नियम को तोड़ने या उसकी अवमानना पर सख्त सजाएँ हैं। हालाँकि, ईरान जैसे देशों में महिलाएँ इस प्रथा के खिलाफ आवाज उठाते हुए देखी जाती हैं।

बार-बार नोटिस के बावजूद सरकारी आवास में जमे हैं 82 पूर्व सांसद: बिजली, पानी, गैस कनेक्शन कटेगा

दिल्ली के लुटियंस जोन में लगातार चेतावनी के बावजूद अभी तक 82 पूर्व सांसदों ने सरकारी बंगला खाली नहीं किया है। अगर इन पूर्व सांसदों ने आवास खाली नहीं किया तो सरकार इनसे लोक आवास अधिनियम के तहत घर खाली करा सकती है। इनके इस व्यवहार को अनधिकृत कब्जे के रूप में गिना जाएगा। लोकसभा आवास समिति ने कहा है कि इन पूर्व सांसदों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। इन्हें बार-बार नोटिस भेजा जा रहा है लेकिन वे बंगला खाली नहीं कर रहे।

अधिकारी उस आदेश का इंतजार कर रहे हैं, जिसमें इन पूर्व सांसदों से आवास खाली कराने को कहा जाएगा। आदेश के साथ ही इनके बंगलों की बिजली, पानी और गैस कनेक्शन काट दिए जाएँगे। नियमानुसार, दोबारा चुन कर न आए सांसदों को लोकसभा भंग होने के एक महीने के भीतर अपना सरकारी आवास खाली करना होता है। राष्ट्रपति कोविंद ने 25 मई को ही पिछली लोकसभा भंग कर दी थी। इस हिसाब से देखें तो अब तक लगभग 4 महीने हो चुके हैं।

ज्ञात हो कि लोकसभा की हाउसिंग कमिटी ने सभी पूर्व सांसदों को सरकारी आवास खाली करने के लिए 7 दिनों की समय सीमा दी थी। कमिटी की अध्यक्ष चंद्रकांत पाटिल ने कहा था कि जो पूर्व सांसद सरकारी आवास खाली करने में आनाकानी कर रहे हैं, उनके घर में बिजली और पानी की सप्लाई काट दी जाएगी। ऐसा करने के लिए अधिकारियों को निर्देश दे दिया गया था। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, 200 ऐसे पूर्व सांसद थे जो सरकारी आवासों में जमे हुए थे।

इसके बाद ख़बर आई थी कि पानी और बिजली के कनेक्शन काट दिए जाने के निर्देश के कारण, या यूँ कहें कि डर के कारण सरकारी बंगलों में रहने वाले 50% से अधिक पूर्व सांसदों ने अपना-अपना सरकारी आवास खाली कर दिया है। कुछ नए मंत्री अपने आधिकारिक आवास की प्रतीक्षा कर रहे हैं क्योंकि अभी पूर्व सांसदों ने अपने आवास खाली नहीं किए हैं। कुछ दोबारा चुने हुए सांसदों को, जिन्हें मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली, उन्हें वर्तमान आवास को खाली करने के लिए लोकसभा निकाय से नया आवास लेने की आवश्यकता होगी।

प्रार्थना सभा के बहाने ईसाई मिशनरियों ने किया ग़रीबों के धर्मान्तरण का प्रयास, विहिप ने जताया ऐतराज

हिमाचल प्रदेश के सुंदरनगर जिले में शुक्रवार (सितंबर 13, 2019) को विश्व हिन्दू परिषद ने लेक व्यू गेस्ट हाउस में आयोजित ईसाई मिशनरियों की प्रार्थना सभा के दौरान आयोजन स्थल के बाहर जमकर हंगामा किया। संगठन ने आरोप लगाए कि ईसाई मिशनरी सम्मेलन की आड़ में धर्मांतरण को अंजाम दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि गरीब, जरूरतमंद, बीमार और बेसहारों को सम्मेलन में बुलाकर ईसाई धर्म अपनाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। इस दौरान प्रशासन व पुलिस के खिलाफ जमकर नारेबाजी की गई।

विरोध-प्रदर्शन के दौरान पुलिस और विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता के बीच कहासुनी भी हुई। इसके बाद पुलिस बल को मौके पर बुलाकर स्थिति को नियंत्रण में लिया गया। सूचना मिलते ही नायब तहसीलदार सुंदरनगर मौके पर पहुँच गए। उन्होंने ईसाई मिशनरी की प्रार्थना सभा के आयोजकों से संबंधित कार्यक्रम की अनुमति के दस्तावेज माँगे। मगर, ईसाई मिशनरी कार्यक्रम की अनुमति के कागजात नहीं दिखा पाए। जिसके बाद पुलिस की मदद से सभा को बंद करवा दिया गया। इस दौरान काफी तनावपूर्ण माहौल बन गया। 

विश्व हिंदू परिषद के प्रांत समन्वय प्रमुख शमशेर सिंह ठाकुर ने कहा कि ईसाई मिशनरी की प्रार्थना सभा की आड़ में धर्म परिवर्तन किया जा रहा है। इसकी भनक हिंदू समाज के लोगों को लगते ही गेस्ट हाउस के बाहर एकत्रित हुए और प्रदर्शन किया। हिंदू संगठनों ने प्रशासन से माँग की है कि भविष्य में इस प्रकार की गतिविधियों पर नजर रखें।

इस दौरान विश्व हिंदू परिषद के साथ ही बजरंग दल, आरएसएस और विभिन्न हिंदू संगठन शामिल हुए थे। इन संगठनों ने स्थानीय लोगों से भी अपील की है कि जो लोग इस प्रकार धर्म परिवर्तन कर रहे हैं, वो सरकार की तरफ से मिलने वाली सुविधाओं का त्याग कर दें।

वहीं, ईसाई मिशनरी की प्रार्थना सभा के आयोजक अमर सिंह ने हिंदू संगठनों द्वारा लगाए गए आरोप से इनकार करते हुए अन्य धर्म गुरूओं द्वारा आयोजित किए जाने वाले कार्यक्रम की तरह ही अपनी वार्षिक प्रार्थना को भी बताया। अमर सिंह ने कहा कि इसमें किसी तरह का धर्म परिवर्तन नहीं किया जाता है। लोगों को केवल धर्म के बारे में प्रवचन सुनाए जाते हैं।

गौरतलब है कि, इससे पहले 1 सितंबर को उत्तर प्रदेश के फूलबेहड़ क्षेत्र के सुंदरवल कस्बे में विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल ने ईसाई मिशनरी की प्रार्थना सभा कर रहे लोगों के विरोध किया था। इस दौरान भी हिन्दू संगठनों ने ईसाई मिशनरी पर प्रर्थना सभा के बहाने लोगों का धर्म परिवर्तन करने का आरोप लगाया था।

हिन्दीभाषियों का घमंड और कुतर्क बनाम हिन्दी से घृणा करने वाले कूढ़मगज

हिन्दी को समर्पित दिवस आया और चला गया। वही हुआ जो हर साल होता है। कुछ लोगों ने खूब लिखा कि हिन्दी के लिए ये होना चाहिए, वो करना चाहिए। कुछ लोगों ने अंग्रेजी में लिख कर अपनी बुद्धिमत्ता, कटाक्ष या घृणा का परिचय दिया। राजनैतिक दृष्टिकोण से भी बातें हुईं कि हिन्दी को थोपना जरूरी नहीं। मैंने भी लिखा कि थोपा नहीं जा रहा, एक व्यवहारिक बात कही जा रही है कि जिस भाषा को सबसे ज्यादा लोग बोलते-समझते हैं, उसे प्रोत्साहन मिले तो उसे एक जोड़ने वाली भाषा के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

आप तार्किक बातें करते हैं तो कुछ लोग सुनते हैं, कुछ लोग पहले से ही मूड में रहते हैं कि अगर हिन्दी पर कुछ कहा जा रहा है तो बेकार का प्रमोशन होगा और वाहियात तर्क दिए जाएँगे। वो कमेंट में पिल पड़ते हैं, बिना पढ़े। साथ ही, दूसरे तरह के लोग दिमाग बंद कर के सीधे कहने लगते हैं कि हिन्दी ही सबसे श्रेष्ठ है, सबको पढ़ाओ। दोनों ही कूढ़मगज लोग हैं।

हिन्दीभाषियों के कुतर्क

पहले वाले एक्सट्रीम में रहने वाले लोगों को इससे भी दिक़्क़त है कि हिन्दी में उर्दू और अंग्रेजी बहुत ज़्यादा घुस गया है, इसे साफ करने की जरूरत है। ये लोग यह बात नहीं जानते कि हिन्दी स्वयं कोई स्वतंत्र भाषा नहीं है, बल्कि कई क्षेत्रीय भाषाओं के शब्दों और संस्कृत के व्याकरण से अत्यधिक प्रभावित है हिन्दी। इसमें हिन्दीभाषी क्षेत्र के हर भाषा के शब्द हैं, इसी कारण ये इतनी समृद्ध है।

जिन्हें लगता है कि हिन्दी तो शुद्ध ही बोली जानी चाहिए, वो वास्तविकता के धरातल से ऊपर हवा में चल रहे हैं। उन्हें यह पता नहीं कि भाषा इवॉल्व कैसे करती है, उसकी फ़्लेक्सिबिलिटी या लोच उसके बेहतर होने में बहुत बड़ा कारण बनती है। अंग्रेजी ने कई भाषाओं के शब्दों को लिया और आज दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में से एक है। उपनिवेशवाद भी उसका एक कारण है, लेकिन उसके बावजूद उसकी स्वीकार्यता हर जगह बढ़ी ही है।

इसलिए, ऐसा कहना कि उर्दू और अंग्रेजी के शब्द निकाल देने चाहिए, निहायत ही गलत और नकारात्मक बात है। अगर भारत की ही सारी भाषाएँ हिन्दी से अपने शब्द वापस माँग लें तो हिन्दी के पास अपना कुछ बचेगा ही नहीं। इसलिए, आप क्या बोलते हैं, उसे आज के दौर की वास्तविकताओं के हिसाब से बोलिए।

दूसरी बात जो हिन्दीभाषियों में देखने को मिलती है वो यह है कि इसमें एक प्रकार का घमंड है। यह घमंड किस बात का है मेरी समझ में नहीं आता। हिन्दीभाषी राज्यों की हालत देखिए कि जीडीपी में कितना योगदान है, वहाँ शिक्षा और स्वास्थ्य में क्या झंडे गाड़े गए हैं। किस बात का घमंड है आपको? साहित्य का? हर भाषा का साहित्य समृद्ध है और हिन्दी से सैकड़ों साल पुराना है उनका साहित्य।

दूसरी भाषाएँ हीन कैसे हो जाती हैं? ख़ैर, किसी भी भाषा पर घमंड जताने वालों को गम्भीरता से नहीं लेना चाहिए। कोई भी भाषा किसी दूसरी से कमतर या बेहतर नहीं है। जो ऐसा सोचते हैं, चाहे वो बंगाली हों, तमिल हों, मराठी हों या बिहारी, उन्हें अपने दिमाग का इलाज कराना चाहिए।

चूँकि आपके द्वारा बोली जाने वाली भाषा सबसे ज्यादा लोगों के द्वारा बोली जाती है, तो उसकी इसी ‘सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा’ होने के कारण उसे सबको सिखाने की बातें हो रही हैं। इसका यह बिलकुल मतलब नहीं है कि चूँकि ये सबको सिखाने की बात हो रही है तो ये महान हो गई। बिल्कुल नहीं, क्योंकि किसी की व्यवहारिकता मात्र उसे सबसे बेहतर नहीं बना देती। हमारे पास एक भाषा को ज्यादा लोगों तक पहुँचाने का विकल्प है, तो हमें उस पर उसकी व्यवहारिकता के लिहाज से विचार करना चाहिए।

हिन्दी सबसे ज्यादा बोली जाती है, समझी जाती है, इसका मतलब है कि सबसे कम लोगों को यह भाषा सिखानी पड़ेगी। इसलिए, इसे एक लिंक लैंग्वेज बनाने की बात होती है। वरना कोई गुजराती हिन्दी को लेकर क्यों कैम्पेन करेगा, ये मेरी समझ से बाहर है। हाँ, भाषा थोपी नहीं जानी चाहिए। जैसा कि मैंने पिछले लेख में लिखा था कि हर बच्चे को तीन भाषाएँ सिखाइए ताकि वो भारत को आगे चल कर समझ सके। दक्षिण वाले को उत्तर, उत्तरपूर्व और पश्चिम की भाषाएँ सिखाइए; उत्तर वाले को दक्षिण, पूरब और पश्चिम की; पूरब वाले को उत्तर, पश्चिम और दक्षिण की; तथा पश्चिम वाले को उत्तर, दक्षिण और पूरब की। या, इसी तरह से जिसके मूल में भारतीयता सन्निहित हो, राजनैतिक स्वार्थ या घृणा नहीं।

हिन्दी से घृणा करने वालों के कुतर्क

इसके दूसरे एक्सट्रीम पर वो लोग हैं जो हिन्दीभाषियों को घृणा से देखते हैं। एक बंगाली व्यक्ति ने लिखा कि हिन्दी वाले गुटखा खाने वाले हैं, गाली देने वाले हैं, भ्रूणहत्या करने वाले हैं, ज्यादा बच्चे पैदा करने वाले हैं, ढोकला चुराने वाले हैं, भुजिया खाने वाले रक्तचूसक कीड़े हैं। कोई पढ़ा लिखा व्यक्ति जब ऐसी घृणा दिखाता है तो सबसे पहली बात यही निकल कर आती है कि इनकी मानसिक बीमारी के लिए चिकित्सा की संस्तुति की जानी चाहिए क्योंकि इन्होंने बस एक ट्वीट से जता दिया कि शिक्षित होने और टाइप कर पाने में बहुत अंतर है।

दूसरे ने लम्बा लेख लिखा कि हिन्दीभाषियों की साजिश है कि क्षेत्रीय भाषाओं को फूहड़ बता दिया जाए, ताकि हिन्दी स्वतः बेहतर दिखने लगे। ये बात मैंने पहली बार सुनी। खोजने की कोशिश की कि ऐसी बात किसी ने कभी कही हो, या जताई ही हो, कोई नहीं मिला। आगे यहाँ तक लिखा गया कि हिन्दी एक एलीट जबान है, जो उत्तर भारत में भी थोपी गई है।

ये बात अनभिज्ञता और घृणा दोनों से उपजी है। हिन्दी के कारण कितनी बोलियाँ नष्ट हुईं? हाँ, अंग्रेजी के कारण कई भारतीय भाषाएँ शिक्षा के माध्यम के तौर पर गायब हो चुकी हैं, या सिर्फ सरकारी विद्यालयों में सिमट कर रह गई हैं। जहाँ तक हिन्दी को एलीट कहने की बात है, वो अनभिज्ञता इसलिए है कि जब राज्य सरकार शिक्षा नीति लाती है, तो उसे एक भाषा चाहिए जिसे ‘मीडियम ऑफ इन्सट्रक्शन’ की तरह लागू किया जा सके।

यहाँ लोग कहेंगे कि हर जिले की अपनी बोली है, उसमें शिक्षा क्यों नहीं दी जाए। ये कहने में आसान लगता है, लेकिन उसके प्रभाव को हम भूल जाते हैं। यही उत्तर प्रदेश बोर्ड से पढ़ा विद्यार्थी जब किसी आईसीएसी वाले से बहुत कम नंबर लिए डीयू में एडमिशन के लिए पहुँचता है, और स्वयं को बेहतर कहते हुए भी एडमिशन नहीं ले पाता क्योंकि डीयू के लिए प्रतिशत ही मानदंड है, तो उसे अच्छा नहीं लगता।

हर जिले में अलग भाषा क्यों, एक जिले में ही कई बोलियाँ बोली जाती हैं, फिर तो हर गाँव के हिसाब से पढ़ाई होनी चाहिए, परीक्षाएँ हों, बोर्ड हों… इस कुतर्क का कोई अंत नहीं है। हिन्दी को सरकारी विद्यालयों में शिक्षा का माध्यम बनाना उसकी लिपि को समझने की सहजता और उसके वहाँ की मूल भाषाओं को समाहित करने की क्षमता के कारण है न कि ये जताने के लिए कि हिन्दी महान है, क्षेत्रीय भाषाएँ फूहड़।

राजनीति देखने वाले लोग

कुछ लोग हिन्दी के खिलाफ बस इसलिए बोल रहे हैं क्योंकि उन्हें इसमें राजनीति दिख रही है। राजनीति देख पाना एक सही बात है, लेकिन परिणामवश आप भाषा को ही हीन बताने पर पिल पड़े हैं तो आप दया के पात्र हैं। हिन्दी ने कभी नहीं कहा कि वो महान है, या उसे ही पढ़ाया जाना चाहिए। न ही हिन्दी के साहित्यकारों ने अपनी गाथा गाते हुए दूसरी भाषाओं को घटिया या मछली खाने वालों की भाषा कहा है। ये अपने छोटे होने, संकीर्ण मानसिकता का परिचायक है।

राजनीति कोई कर रहा है, कोई नेता इसे ऐसे दिखा रहा है कि वो सिर्फ अपने सत्ता के दम्भ में आ कर हर जगह हिन्दी लगवा देगा, तो बेशक वो व्यक्ति हिन्दी की सेवा नहीं कर रहा, वो अपना स्वार्थ साध रहा है। साथ ही, जो नेता इसे अपनी संस्कृति पर हमला बता रहे हैं, उनसे सीधा सवाल है कि हिन्दी की पढ़ाई संस्कृति पर हमला कैसे करती है? क्या पूरे देश में अंग्रेजी पढ़ने से संस्कृतियाँ बर्बाद हो गईं? जब तक आपको यह न कह दिया जाए कि आपके राज्य की भाषा स्कूलों में मत पढ़ाइए, तब तक हिन्दी हमला कैसे कर रही है समझ में नहीं आता।

राजनीति से जुड़े लोग अगर चाहते हैं कि दक्षिण के लोग, या गैर-हिन्दीभाषी हिन्दी को अपनाएँ तो आप यह भी सुनिश्चित कीजिए की हिन्दीभाषी राज्यों के पर्यटन स्थलों, दिशानिर्देश वाले बोर्डों पर लिखी बातें हर राज्य की भाषा में उपलब्ध हो। आप बोर्ड बड़ा करें, या नाम छोटे करें, ये आपकी समस्या है। या फिर दक्षिण के राज्यों से ऐसे अनुबंध किए जाएँ कि हमारे राज्य में आपके राज्य की भाषा को हर जगह प्राथमिकता दी जाएगी, हर जगह दिखाया जाएगा, ताकि आपके नागरिकों को समस्या न हो।

ताली दोनों हाथों से बजती है

जब तक आप एक हाथ नहीं बढ़ाएँगे, दूसरा इसे अपने ऊपर हमले की तरह देखेगा क्योंकि वहाँ के नेता के लिए इसका डर पैदा करना एक मुद्दा है। एक नई भाषा जानना किसी भी लिहाज से नकारात्मक नहीं, वह आपको हमेशा मदद ही करेगी। लेकिन यह नई भाषा सिर्फ तमिलनाडु के लिए हिन्दी सीखना ही न रहे, बिहार में भी कन्नड़ बन कर दिखे, उड़ीसा में मणिपुरी बन कर दिखे, गुजरात में तमिल बन कर दिखे, कश्मीर में तेलुगु बन कर दिखे।

इसलिए, हिन्दी न तो सबसे महान भाषा है, न ही यह गुटखा खाने वालो की भाषा है। सारी भाषाएँ राष्ट्र की धरोहर हैं, विरासत हैं। सबकी समृद्धि इसी में है कि इनके शब्दों को दूसरे के साहित्य में, बोलचाल में जगह मिले, एक-दूसरे के इलाकों में वो साइनबोर्ड पर दिखें, कोई कनपुरिया तमिल में बोल कर दूसरे पर इम्प्रेशन झाड़े और कोई कन्नडिगा दूसरे लड़के को कहे कि ‘अबे जानते हो, बनारस के घाट पर दस रुपए की चार इडली मिलती है!’

ताली दो हाथों से बजती है। हमारी पीढ़ी तो इसी राजनीति में निकल गई। हमारे बच्चे अगर घर आएँ और बताएँ कि ‘मम्मी, तुम्हें पता है मम्मी को तमिल में क्या कहते हैं?’ इससे किसी भी माँ को कभी ऐसा नहीं लगेगा कि उसका बच्चा संस्कृति त्याग रहा है। मम्मी सुनने में समस्या नहीं तो अम्मा, आई, तल्ली, अव्वा, तल्लई सुनने में क्या समस्या है!

पूरी मानवता नई चीजें सीखने में लगी है, हर जगह भाषाओं को बचाने के लिए तमाम प्रयत्न किए जा रहे हैं, और यहाँ हम 130 करोड़ की आबादी लिए अपनी संस्कृति को समृद्ध करने की जगह अपनी घृणा और पूर्वग्रहों से उसे संकुचित करने की फिराक में हैं। इतने लोग हैं, अगर एक-एक नई भाषा सीख लेंगे तो उस भाषा और संस्कृति को बढ़ने का ही मौका मिलेगा।

सिकंदर ने भाई अंसार और साले सोहिल के साथ मिलकर भाभी के साथ किया गैंगरेप

उत्तर प्रदेश के आगरा में 25 वर्षीय एक महिला के साथ गैंगरेप की खबर सामने आई है। बाइक पर सवार 3 लोगों ने मिलकर पहले महिला को अगवा किया फिर उसके साथ गैंगरेप की वारदात को अंजाम दिया। घटना शुक्रवार (सितंबर 13, 2019) की है। महिला शौच से वापस घर आ रही थी जब बाइक सवार तीन लोगों ने उसे अगवा कर लिया और फिर सुनसान जगह पर ले जाकर रेप किया।

बता दें कि, रेप करने वाले 3 आरोपितों में से दो महिला के सगे देवर हैं। जानकारी के मुताबिक, महिला राजस्थान के धौलपुर की रहने वाली है। वह अपने मायके आगरा आई हुई थी। 13 सितंबर को महिला के दोनों सगे देवर अंसार और सिकंदर अपनी भाभी के घर के पास पहुँच गए। फिर सिकंदर ने साले सोहिल के साथ मिलकर शौच से वापस आ रही भाभी को जबरदस्ती बाइक पर बैठा लिया। तीनों ने कपड़े से उसका मुँह बाँध दिया और फिर उसे पास के बिशनगिरी गाँव ले गए। जहाँ उसके साथ गैंगरेप की वारदात को अंजाम दिया।

जब कुछ लोगों ने महिला की चिल्लाती हुई आवाज सुनी तो वे घटनास्थल पर पहुँचे। गाँव के लोगों ने दो संदिग्धों को पकड़ लिया, जबकि तीसरा आरोपित भाग निकलने में कामयाब हो गया। धौलपुर की स्टेशन हाउस ऑफिसर (एसएचओ) महेंद्र शर्मा ने कहा कि महिला ने शिकायत दर्ज कराई है। मामले की जाँच की जा रही है।

कुर्ती की लम्बाई घुटनों से ऊपर होने पर छात्राओं के साथ धक्का-मुक्की: सेंट फ्रांसिस कॉलेज का अजीब नियम

हैदराबाद के सेंट फ्रांसिस कॉलेज ने छात्राओं को सिर्फ़ इसीलिए सज़ा दी है क्योंकि उनकी कुर्ती की लम्बाई घुटनों से ऊपर तक थी। तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद के सिकंदराबाद स्थित ‘सेंट फ्रांसिस कॉलेज फॉर वीमेन’ में अजीबोगरीब नियम है कि छात्राओं की कुर्ती की लम्बाई घुटनों से नीचे तक होनी चाहिए। शुक्रवार (सितम्बर 13, 2019) को कई लड़कियों को कॉलेज में प्रवेश करने से रोक दिया गया, क्योंकि उनकी कुर्ती उनके घुटनों से एक इंच ऊपर थी।

इसके बाद छात्रों और सिक्योरिटी गार्ड्स के बीच झड़प हुई। इस घटना का वीडियो भी वायरल हो गया इसमें सिक्योरिटी गार्ड्स छात्रों की कुर्ती खींचते हुए पूछ रही हैं कि उन्होंने ‘ये क्या पहन रखा है?‘ गार्ड्स ने सभी लड़कियों की कुर्ती की आधार पर यह तय किया कि किसे कॉलेज में प्रवेश दिया आजाएगा और किसे नहीं, ऐसा वीडियो में देखा जा सकता है। यहाँ तक की प्रिंसिपल सिस्टर सैंड्रा होर्टा ने भी छात्रों से उनकी कुर्ती की लम्बाई को लेकर सवाल किए।

सिक्योरिटी गार्ड्स छात्राओं की कुर्ती की लम्बाई चेक करने के बाद ही उन्हें अंदर जाने देती हैं

छात्राओं ने प्रिंसिपल को समझाने की कोशिश करते हुए कहा कि वे बार-बार नए-नए ड्रेस नहीं सिलवा सकतीं क्योंकि इसके लिए उनके पास पैसे नहीं हैं। कॉलेज ने ये मोरल पुलिसिंग जुलाई में ही शुरू कर दी थी, जब यह नियम बनाया गया था कि छात्राओं की कुर्ती की लम्बाई घुटने से नीचे तक होनी चाहिए। कॉलेज ने 1 अगस्त से इस नियम को लागू किया। इस सर्कुलर को कॉलेज के व्हाट्सप्प ग्रुप के माध्यम से छात्राओं तक पहुँचाया गया।

इतना ही नहीं, छात्राओं ने बताया कि क्लास में पढ़ाते समय भी शिक्षक उन्हें खड़ा कर उनकी कुर्ती की लम्बाई देखते हैं और उसके बाद ही यह निर्णय लेते हैं कि अटेंडेंस दिया जाएगा या नहीं। अगर उनकी कुर्ती की लम्बाई घुटनों के ऊपर तक होती है तो लेक्चर के दौरान उपस्थित रहने के बावजूद उन्हें अटेंडेंस नहीं दिया जाता। छात्राओं ने बताया कि इस ड्रेस कोड का उल्लंघन करने वाली छात्राओं के माता-पिता को प्रिंसिपल से माफ़ी माँगनी पड़ती है।

‘द न्यूज़ मिनट’ की ख़बर के अनुसार, एक छात्रा ने बताया कि कुछ दिनों पहले ही कॉलेज में महिला सिक्योरिटी गार्ड्स की नियुक्ति की गई है। पहले तो छात्राओं को सिर्फ़ चेतावनी दी गई कि अगर उनकी कुर्ती की ‘सही लम्बाई’ नहीं रही तो उन्हें कॉलेज परिसर में प्रवेश नहीं दिया जाएगा। लेकिन, शुक्रवार को हालात तब बिगड़ गए जब इन छात्राओं के साथ बदतमीजी की गई, उनकी कुर्ती खींची गई और उनके साथ धक्का-मुक्की हुई।

मुजफ्फरपुर शेल्टर होम पीड़िता के साथ गैंगरेप, अगवा कर 4 ने बनाया हवस का शिकार

मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड की एक पीड़ित लड़की का अपहरण कर गैंगरेप करने का मामला सामने आया है। पीड़िता ने गैंगरेप का आरोप दो सगे भाइयों समेत 4 पर लगाया है। घटना बेतिया के नगर थाना इलाके की है। पीड़िता का आरोप है कि आरोपितों ने उसे अगवा कर चलती गाड़ी में गैंगरेप किया। पीड़िता की शिकायत पर पुलिस नगर थाना में प्राथमिकी दर्ज कर मामले की जाँच में जुट गई है।

खबर के मुताबिक, वह कोतवाली चौक स्थित अपनी भाभी के घर जा रही थी। इसी दौरान कार सवार चार दरिंदे आए और उसे गाड़ी में जबरन बैठा लिया। सभी आरोपितों ने अपने चेहरे ढँक रखे थे। लेकिन पीड़िता ने दो का नकाब उतार दिया और उनको पहचान लिया है। पीड़ि‍ता ने बताया कि उसके साथ चलती गाड़ी में भी रेप किया गया, फिर उनलोगों ने संतघाट नहर के पास दोबारा घिनौनी घटना को अंजाम दिया। इसके बाद दरिंदों ने उसे उसके मोहल्ले में लाकर छोड़ दिया।

दुष्कर्मियों ने गैंगरेप के बाद पीड़िता को धमकी भी दी थी। लेकिन पीड़िता ने हिम्मत दिखाते हुए पुलिस से शिकायत की। पीड़िता की शिकायत पर पुलिस ने केस दर्ज कर मामले की जाँच शुरू कर दी है। फिलहाल, किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है।

वहीं गैंगरेप के बाद पीड़िता का गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज के आईसीयू वार्ड में इलाज चल रहा है। लड़की की स्थिति चिंताजनक बताई जा रही है। घटना की सूचना पर नगर थानाध्यक्ष शशिभूषण ठाकुर, महिला थानाध्यक्ष पूनम कुमारी अस्पताल में पहुँचकर मामले की जाँच में जुटे हैं।

शादीशुदा रहमान ने ख़ुद को हिन्दू बता लड़की को प्रेम-पाश में फँसाया, दोस्तों संग मिल रेप कर नदी में फेंका

क़रीब 1 सप्ताह पहले पश्चिम बंगाल के दक्षिण दिनाजपुर जिले के गंगरापुर क्षेत्र में नदी में एक युवती की लाश मिली थी। युवती के शरीर पर कपड़े भी ठीक से नहीं थे। इस मामले में 2 आरोपितों को गिरफ़्तार किया गया था। दोनों ही आरोपितों ने युवती का बलात्कार और हत्या करने के आरोपों को स्वीकार कर लिया है। एक आरोपित का नाम मजिदुर रहमान है, जिसने अपनी पहचान पिंटू सरकार बता कर लड़की से प्रेम सम्बन्ध स्थापित किया और अपना मज़हब छिपाया।

शनिवार (सितम्बर 7, 2019) को जहाँगीरपुर के पुनर्भाबा नदी में लड़की की लाश मिली थी। उसके अधिकतर कपड़े गायब थे। गला रेत कर उसकी हत्या की गई थी और चेहरे पर कई निशानों से पता चला की हत्या से पहले उसके साथ काफ़ी दरिंदगी की गई थी। कुछ दिनों बाद पता चला कि लड़की का नाम जबा रॉय था। बुधवार (सितम्बर 11, 2019) को मजिदुर रहमान को भारत-बांग्लादेश सीमा से गिरफ़्तार किया गया।

अब यह पता चला है कि मजिदुर न सिर्फ़ पहले से ही शादीशुदा है बल्कि उसने जबा से प्रेम सम्बन्ध बनाने के लिए अपना मज़हब भी छिपाया। मजिदुर एक मेडिकल लेबोरेटरी में काम करता था और उक्त युवती वहीं पर इलाज कराने के लिए आया करती थी। इसी दौरान दोनों में जान-पहचान हुई और वे रिलेशनशिप में आ गए। बाद में जबा गर्भवती हो गई और उसके बाद उसे मजिदुर की सच्चाई पता चली। वह मजिदुर से शादी करने की ज़िद करने लगी लेकिन वह टालता रहा।

6 सितम्बर को उसने युवती को शादी के बारे में बात करने के बहाने से बुलाया और नदी किनारे एक सुनसान जगह पर ले गया। वहाँ उसके दो अन्य साथी पहले से ही इंतजार कर रहे थे। उनमें से एक मजिदुर के साथ ही लेबोरेटरी में काम करता था। वहाँ उन तीनों ने मिल कर युवती के साथ बलात्कार किया और फिर मार कर उसे नदी में फेंक दिया।

मजिदुर के अलावा एक अन्य आरोपित को गिरफ़्तार कर कोर्ट में पेश किया गया, जहाँ से उन्हें पुलिस रिमांड में भेज दिया गया। तीसरा आरोपित अभी भी फरार है। इस घटना के ख़िलाफ़ क्षेत्र में ख़ूब विरोध प्रदर्शन भी हुए। विश्व हिन्दू परिषद सहित अन्य संगठनों ने हाइवे जाम कर विरोध प्रदर्शन किया, जिसके बाद पुलिस की कार्रवाई में कई प्रदर्शनकारी घायल हो गए। कइयों को गिरफ़्तार भी किया गया।

भाजपा सांसद लॉकेट चटर्जी ने पीड़िता के परिवार वालों से मिल कर उन्हें ढाँढस बँधाया। उन्होंने पीड़ित परिवार को आश्वासन दिया कि उन्हें हर प्रकार की क़ानूनी मदद मुहैया कराई जाएगी। क्षेत्र में लोगों की माँग है कि आरोपितों को फाँसी की सज़ा दी जाए। भरी पुलिस बल की तैनाती के कारण शांति है लेकिन इलाक़े में अभी भी तनाव व्याप्त है।

मॉब लिंचिंग: क़मरुद्दीन कुरैशी को मारने वाले शहाबुद्दीन शेख, इस्तियाक खान समेत 6 लोग गिरफ्तार

मालेगाँव में गुरुवार को 20 साल के युवक की हत्या के मामले में मालेगाँव पुलिस ने 6 लोगों को गिरफ्तार कर लिया है। मालेगाँव के सलामताबाद में क़मरुद्दीन कुरैशी उर्फ अमिन गोली की एक मामूली विवाद के चलते 6 लोगों ने मिलकर धारदार हथियार से हत्या कर दी थी।

TOI की रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले में पुलिस ने अब तक शहाबुद्दीन शेख, इस्तियाक खान अब्दुल गफुर खान, शेख आसिफ शेख मक़सूद, शेख शोएब शेख मक़सूद, शेख वसीम शेख यूनुस, और सलमान खान ज़ाकिर को गिरफ्तार किया है। ये सभी मालेगाँव के रहने वाले हैं। इन 6 के अलावा पुलिस अभी एक अन्य आरोपित की तलाश कर रही है।

बताया जाता है कि गुरुवार की शाम कमरुद्दीन की आरोपितों के साथ बहस हुई थी। उनलोगों ने उसे मारने की धमकी दी थी। बाद में हमलवारों ने उसे सलामताबाद जोहर मस्जिद के पास कल्लू स्टेडियम रोड पर पकड़ लिया और धारदार हथियार से वार किए।

घटना की जानकारी मिलने पर, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक संदीप घुगे, पुलिस उपाधीक्षक रत्नाकर नवले, इंस्पेक्टर जीएसआर पाटिल और अन्य अधिकारी मौके पर पहुँचे। हमले से गंभीर रूप से घायल हुए कमरुद्दीन को नजदीकी अस्पताल ले जाया गया। जहाँ डॉक्टर ने उसे मृत घोषित कर दिया। सीसीटीवी फुटेज से पुलिस आरोपितों को पकड़ने में सफल रही।