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नियमों के पालन में गड़बड़ी को लेकर NDTV पर ₹2 करोड़ के SEBI का जुर्माना बरकरार

प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण (सैट/SAT-The Securities Appellate Tribunal) ने मीडिया समूह एनडीटीवी पर सेबी द्वारा लगाए गये दो करोड़ रुपए के जुर्माने को बरकरार रखा है। सेबी (SEBI) ने कंपनी पर 450 करोड़ रुपए की कर (Tax) माँग से जुड़ी सूचनाएँ सार्वजनिक करने में खामी पाए जाने के कारण समाचार चैनल एनडीटीवी (NDTV) पर जुर्माना लगाया था।

जारी रहेगा 19 लाख रूपए का जुर्माना

रिपोर्ट्स के अनुसार, न्यायाधिकरण ने कंपनी के साथ उसके प्रवर्तक प्रणय रॉय और राधिका रॉय समेत तीन अधिकारियों पर सेबी की ओर से लगाए गए 19 लाख रुपए के जुर्माने को भी कायम रखा है। हालाँकि, सैट (SAT) ने कहा है कि सूचीबद्धता समझौते के उल्लंघन के लिए कंपनी के अनुपालन अधिकारी अनूप सिंह जुनेजा पर लगाया गया दो लाख रुपए का जुर्माना उचित नहीं है। अपीलीय न्यायाधिकरण के आदेश के मुताबिक, जुनेजा भेदिया कारोबार निरोधक (पीआईटी) नियमों के तहत एक लाख रुपए का जुर्माना देने के लिए उत्तरदायी है। न्यायाधिकरण का यह फैसला एनडीटीवी की ओर से दायर अपील पर आया है।

2018 में भी NDTV और उसके चार अधिकारियों पर 22 लाख रुपए का जुर्माना

एनडीटीवी ने सेबी के जून 2015 और मार्च 2018 के आदेश के खिलाफ अपील दायर की थी। दरअसल, एनडीटीवी ने आयकर विभाग द्वारा की गई 450 करोड़ रुपए की कर (Tax) माँग और कंपनी के शीर्ष कार्यकारी अधिकारियों द्वारा की गई शेयरों की बिक्री संबंधी सूचनाएँ शेयर बाजारों को देने में देरी की थी। इसी मामले में सेबी ने जुर्माना लगाया था।

सेबी ने 2015 में कंपनी पर दो करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया था। इसी मामले में मार्च 2018 में भी एनडीटीवी और उसके चार अधिकारियों पर 22 लाख रुपए का जुर्माना लगाया गया था।

SAT द्वारा जारी आदेश आप यहाँ पढ़ सकते हैं –

आजम खान के ‘घर’ की औरतें भी जगीं, शौहर के मुॅंह पर दे मारा तीन तलाक का पेपर

तीन तलाक को अपराध बनाने से मुस्लिम महिलाओं को किस कदर ताकत मिली है इसका एक प्रमाण आजम खान के संसदीय क्षेत्र रामपुर की एक महिला ने दिया है। 52 वर्षीय महिला ने काउंसलिंग के दौरान तीन तलाक का पेपर शौहर के सामने फाड़ते हुए दो टूक कहा कि अब यह नहीं चलने वाला है। दंपती को काउंसलिंग के लिए मुरादाबाद के नारी उत्थान केन्द्र में बुलाया गया था।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक पीड़ित महिला ने मुरादाबाद एसपी को शिकायत करते हुए पति पर दहेज के लिए प्रताड़ित करने का आरोप लगाया था। एक जुलाई को शौहर ने कागज पर तीन बार तलाक लिखकर उसे थमा दिया। इसके बाद एसपी ने इस दंपती को नारी उत्थान केन्द्र जाकर काउंसलर से मिलने को कहा।

मंगलवार को काउंसलर संध्या राउत ने काउंसलिंग के लिए दंपती को बुलाया था। काउसंलर दोनों की बात सुन ही रहे थे कि पत्नी ने तीन तलाक के पेपर को फाड़ दिया। बीवी के इस तेवर से शौहर के होश गुम हो गए और वह उसे साथ रखने को राजी हो गया। दोनों की शादी 26 साल पहले हुई थी और उनके तीन बच्चे हैं।

रावत ने बताया, “काउंसलिंग के दौरान महिला ने साहस दिखाते हुए पति से दो टूक कहा कि इस तरह वह उसे छोड़कर नहीं जाने वाली है और कागज के एक टुकड़े पर तीन बार तलाक लिख देने का कोई मतलब नहीं है। जब वह तीन तलाक के कागज को फाड़ रही थी तो हमने इसे मोबाइल में शूट कर लिया।”

उन्होंने कहा कि यह बेहद भावुक था। उम्मीद है कि भविष्य में यह वीडियो दिखाकर हम और दंपतियों के बीच सुलह करवाने में कामयाब होंगे।

तीन तलाक को अपराध बनाने वाले ऐतिहासिक बिल के अमल में आने के बाद इस तरह की यह दूसरी घटना है। इससे पहले सहारनपुर में मोहम्मद अली ने कानून के डर से अपनी पत्नी को अपना लिया था।

आज शाम 8 बजे राष्ट्र को सम्बोधित करेंगे PM मोदी, कुछ बड़े ऐलान किए जाने की संभावना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज गुरुवार (जुलाई 8, 2019) को शाम 8 बजे देश को सम्बोधित करेंगे। माना जा रहा है कि इस सम्बोधन में जम्मू-कश्मीर को लेकर बड़ा ऐलान किया जा सकता है। पीएम मोदी इस दौरान अनुच्छेद 370 के अहम प्रावधानों को निरस्त करने और जम्मू-कश्मीर को दो अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेशों के रूप में पुनर्गठित करने के सम्बन्ध में देश की जनता के साथ अपनी बात साझा करेंगे।

पीएम मोदी ने इससे पहले 27 मार्च को देश को सम्बोधित किया था। तब उन्होंने बताया था कि अंतरिक्ष में सक्रिय सैटेलाइट को मार गिरा कर भारत यह क्षमता हासिल करने वाले देशों में शुमार हो गया है। प्रधानमंत्री का यह सम्बोधन ऐसे समय में हो रहा है जब स्वतन्त्रता दिवस भी नजदीक है और लाल किले की प्राचीर से भी उनका भाषण होना है।

मीडिया रिपोर्ट्स का यह भी कहना है कि प्रधानमंत्री बुधवार (अगस्त 7, 2019) को ही राष्ट्र को सम्बोधित करने वाले थे लेकिन पूर्व केंद्रीय विदेश मंत्री व भाजपा की कद्दावर नेता सुषमा स्वराज के निधन के कारण इस कार्यक्रम को टाल दिया गया। अब सबकी नज़रें इस बात पर टिकी हैं कि पीएम आज के अपने सम्बोधन में क्या नया ऐलान करते हैं?

‘मुसलमान भी राम, कृष्ण और शिव के हैं वंशज, राम मंदिर के समर्थन में खड़े हों वो भी’

प्रयागराज पहुँचे बाबा रामदेव ने जम्मू-कश्मीर मामले पर मोदी सरकार द्वारा लिए गए निर्णय का स्वागत करते हुए जल्द ही राम मंदिर बनने की बात कही। उन्होंने इस दौरान देश के मुसलमानों से अपील की कि वे सभी अपने पूर्वजों का सम्मान करते हुए राम मंदिर के निर्माण के समर्थन में खड़े हों। उन्होंने मुसलमानों से कहा कि हमारे मजहब अलग हो सकते हैं लेकिन हमारे पूर्वज एक ही हैं।

इस बातचीत के दौरान उन्होंने बोला, “हमारे पूर्वज राम हैं, कृष्ण हैं, शिव हैं और गौतम पतंजलि जैसे कई ऋषि मुनि हैं। इसलिए उनका (मुसलमानों) का डीएनए कहीं बाहर का नहीं है।” उनकी मानें तो देश में रह रहे मुसलमान कहीं मक्का-मदीना, मिस्र, यूनान और ईरान से नहीं आए हैं। वे यही के हैं।

जनसत्ता की रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने कहा कि राम मंदिर का हल मध्यस्ता से निकलने वाला मामला नहीं है, अब इसमें अदालत को साहस करना होगा। क्योंकि अगर ये मामला मध्यस्ता से सुलझने वाला होता तो अब तक हो गया होता। उनका कहना है कि अगर इस मामले में कोर्ट से सही निर्णय नहीं हो तो कानून के जरिए मंदिर बनाना होगा। लेकिन राम मंदिर बनकर रहेगा।

प्रयागराजम में नरेंद्र गिरी से मिलने बागंभरी मंदिर पहुँचे रामदेव ने कहा, “हनुमान जी के दर्शन से अभिभूत हूँ। मजहब से बड़े अपने पूर्वज होते हैं इसलिए मुसलमानों को खड़ा होकर समर्थन करना चाहिए। हमारे और मुसलमानों के डीएनए एक है, ये मक्का-मदीना से नहीं आए। पूर्वज हमारे एक है, राम हैं, कृष्ण हैं, शिव हैं।”

इस दौरान वे कहते हैं कि राम मंदिर बनना ही चाहिए और बनकर भी रहेगा। उन्होंने कहा है कि यदि कोर्ट का फैसला आने में देरी होती है तो यह देश का दुर्भाग्य होगा।

माहौल अशांत करने की आशंका में श्रीनगर पहुँचते ही उलटे पाँव लौटाए गए ग़ुलाम नबी आज़ाद

जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद आज गुरुवार (जुलाई 8, 2019) को श्रीनगर पहुँचे लेकिन उन्हें अगली ही फ्लाइट से वापस भेज दिया गया। बता दें कि जम्मू कश्मीर का पुनर्गठन और अनुच्छेद 370 के अहम प्रावधानों को निरस्त करने के विरोध में आजाद काफ़ी मुखर रहे हैं। राज्यसभा में विपक्ष के नेता के रूप में भाषण देते हुए उन्होंने सरकार पर कई गंभीर आरोप लगाए थे और मीडिया से बात करते हुए सरकार के इस निर्णय का विरोध किया था। एनएसए अजीत डोभाल द्वारा कश्मीरियों से संवाद करने पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि ऐसा करने के लिए उन्हें रुपए दिए गए

गुलाम नबी आजाद के साथ जम्मू कश्मीर कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष गुलाम अहमद मीर भी मौजूद थे। दोनों ही नेताओं को श्रीनगर एयरपोर्ट पर ही रोक दिया गया। जम्मू कश्मीर के 100 से अधिक नेता व अलगाववादी पहले से ही नजरबन्द किए जा चुके हैं ताकि जनता को भड़काने की कोई भी कोशिश सफल न हो सके। आशंका जताई गई है कि गुलाम नबी आजाद के पहुँचने के बाद विपक्षी नेता जनता को उकसा सकते हैं, जिसके बाद उन्हें वापस भेज दिया गया।

गुलाम नबी आजाद ने केंद्र सरकार के इस दावे का भी खंडन किया है कि जम्मू कश्मीर में माहौल शांतिपूर्ण है। सरकार सुरक्षा को लेकर काफ़ी गंभीर है और जनता को विरोध प्रदर्शन करने के लिए उकसाने की हर एक सम्भावना पर विराम लगाने के लिए सुरक्षा बल भी चुस्त-दुरुस्त हैं। ऐसे में देखना होगा कि वापस दिल्ली लौटने पर गुलाम नबी आजाद की क्या प्रतिक्रिया रहती है?

ज्योतिरादित्य सिंधिया सहित के कई बड़े नेता अनुच्छेद 370 पर केंद्र सरकार के निर्णय का समर्थन किया है। महाराजा हरि सिंह के पूर्व व कॉन्ग्रेस नेता कर्ण सिंह ने भी इस निर्णय का स्वागत किया है। जम्मू कश्मीर के सदर-ए-रियासत रह चुके कर्ण सिंह राज्य के प्रथम राज्यपाल भी रह चुके हैं। केंद्रीय मंत्रिमंडल में कई अहम विभाग संभाल चुके सिंह का बयान के लिए एक और झटका है।

Bigg Boss एक्ट्रेस ने 80000 लोगों की मदद करने वाली सुषमा स्वराज पर की अभद्र टिप्पणी

सिर्फ़ ट्विटर के जरिए 80,000 से ज्यादा लोगों की मदद करने वाली सुषमा स्वराज आज हम सबके बीच नहीं हैं। कोई आज उन्हें सशक्त राजनेत्री के रूप में याद कर रहा है तो कोई माँ के रूप में। सुषमा स्वराज ने अपने कार्यकाल धर्म-जाति-पंथ-देश-विदेश जैसे दायरों से उठकर लोगों की मदद की। उन्होंने उन लोगों पर ध्यान दिया जो सालों से मदद की गुहार लगाए बैठे थे लेकिन उनकी सुनवाई नहीं हो रही थी।

पाकिस्तानी बच्चे रोहान के ईलाज से लेकर गलती या धोखे से पाकिस्तान पहुँची हिंदुस्तानी लड़कियाँ गीता और उज्मा की वापसी इसके बड़े उदहारण हैं। जानकारी के मुताबिक पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने 15 से ज्यादा पाकिस्तानियों के 2017 तक मेडिकल वीज़ा दिलाया लेकिन अफसोस की बात है कि उनके देह त्यागने के बाद आज पाकिस्तानी उनके किए एहसानों को भुलाकर उनके जाने की खुशी मना रहे हैं। जिसमें एक नाम वीना मलिक का भी शामिल है।

वीना मलिक ने अपने ट्विटर पर सुषमा स्वराज के लिए न केवल अभद्र टिप्पणी है बल्कि इस बात का भी सबूत दिया है कि वो भारत और उसके राजनेताओं के बारे में कैसी सोच रखती है। उसने सुषमा स्वराज के जाने के बाद R.I.H लिखा और साथ में एक आग वाली ईमोजी भी लगाई। अब इस ‘R.I.H’ का  मतलब ‘आपको स्वर्ग मिले’ या ‘आपको नर्क मिले’ दोनों हो सकता था, लेकिन चूँकि वीना ने उसके संदेश के साथ आग वाली ईमोजी लगाई तो उसे देखकर सोशल मीडिया यूजर्स उसकी ओछी हरकत भाँप गए और उसे आड़े हाथों ले लिया। सोशल मीडिया पर अपनी हरकत के कारण लोगों ने उसे खूब ट्रोल किया।

अधिकतर लोगों ने बिग बॉस में हुए अश्मित पटेल वाले किस्से पर मीम बना बनाकर उसे ट्रोल किया। जबकि गीता स्वामी नाम की यूजर ने लिखा, “ऐसे ही पाकिस्तानी सुषमा स्वराज जी के निधन पर प्रतिक्रिया देते हैंl जोकि एक अच्छी नेता थी और इंसानियत को प्रधानता देती थीl शायद वह हाफिज सईद को मानते हैंl”

जबकि दूसरे यूजर ने उन्हें अश्मित पटेल की चड्डी धोने वाली औरत बताया। और स्क्रीनशॉट के साथ दिखाया कि उसमें और सुषमा स्वराज में क्या अंतर है। एक ओर सुषमा स्वराज लोगों की मदद करती थी और दूसरी ओर वीना उनकी मृत्यु पर उन्हें नर्क में जलने वाले इशारे कर रही है।

कुछ ने डॉन न्यूजपेपर के स्क्रीनशॉट दिखाए, जिसमें लिखा था कि पाकिस्तान में करीब 50 मिलियन लोग कॉमन मेंटल डिसऑर्डर से जूझ रहे हैं। जिसमें 15 से 35 मिलियन व्यस्क है। इसलिए वो समझ सकते हैं कि पाकिस्तान में हर चौथा आदमी (आम बातचीत में पागल कह सकते हैं आप) है। मतलब वीना की बातों का कोई औचित्य नहीं है, पाकिस्तान में ये सब आम है।

गौरतलब है कि इससे पहले वीना मलिक अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावी होने पर भी भारत के प्रति अपनी कुंठा निकाल चुकी है और अब सुषमा स्वराज की मृत्य पर ठिठोली करने की कोशिश की।

क्या कश्मीरी जनता बिकाऊ है? – गुलाम नबी आजाद के विवादित बयान पर लोगों ने समझाया ‘मतलब’

कॉन्ग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने अजित डोभाल के कश्मीर दौरे पर विवादित टिप्पणी की है। बता दें कि डोभाल ने कश्मीर दौरे के क्रम में वहाँ के स्थानीय लोगों से संवाद किया और सड़क किनारे खाना खाते हुए आम जनता से बातचीत की। डोभाल ने आम लोगों के बीच जाकर स्थिति को समझा और सुरक्षा बलों से मिलकर कर स्थिति का जायजा लिया। कश्मीरियों के साथ खाना खाते हुए डोभाल के वीडिओज़ सोशल मीडिया पर ख़ूब वायरल हुए और लोगों ने जमीन से जुड़ कर काम करने के लिए उनकी सराहना की।

वहीं इस सम्बन्ध में जब राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद से पूछा गया तो उन्होंने कहा, “पैसे देकर आप किसी को भी साथ ले सकते हो।” जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री आजाद का यह मानना है कि एनएसए डोभाल से बातचीत करने के लिए कश्मीरियों को रुपए दिए गए। ट्विटर पर लोगों ने आजाद से पूछा कि क्या कश्मीरी जनता बिकाऊ है? लोगों ने इसे न सिर्फ़ डोभाल बल्कि कश्मीर के लोगों का भी अपमान बताया।

इससे पहले लोकसभा में कॉन्ग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने कश्मीर को भारत का आंतरिक मुद्दा माने से इनकार कर दिया था। कश्मीर को द्विपक्षीय मुद्दा साबित करने की कोशिश में उन्होंने अपनी किरकिरी करा ली थी। कॉन्ग्रेस पर यह भी आरोप लगा कि वह पाकिस्तान के एजेंडे को आगे बढ़ा रही है। अनुच्छेद 370 के अहम प्रावधानों को निरस्त करने के बाद जम्मू कश्मीर और लद्दाख को दो अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेशों के रूप में पुनर्गठित किया गया है।

एनएसए डोभाल ने कश्मीर की जनता से मुलाकात के दौरान कहा कि आमजनों की सलामती और हिफाजत सरकार का ध्येय है। अजीत डोभाल ने कहा, “हमलोग इस दिशा में प्रयास कर रहे हैं कि किस तरह से आपके बच्चे और उनके बच्चे सुकून से रह सकें और आगे बढ़ सकें। वे क्षेत्र, मजहब और देश की तरक्की में योगदान दे सकें।

अनुच्छेद 370: महाराजा हरि सिंह के पुत्र, कॉन्ग्रेस नेता कर्ण सिंह ने किया सरकार के निर्णय का स्वागत

पूर्व केंद्रीय मंत्री कर्ण सिंह ने जम्मू कश्मीर का पुनर्गठन और अनुच्छेद 370 पर भारत सरकार के निर्णय का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि इस निर्णय की निंदा किए जाने का वह समर्थन नहीं करते। उन्होंने अपने बयान में कहा है कि लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश घोषित करने वाला निर्णय स्वागत योग्य है। उन्होंने लिखा कि अनुच्छेद 370 के कारण महिलाओं से जो भेदभाव किया जा रहा था, उसे ठीक करना ज़रूरी था। साथ ही डॉक्टर सिंह ने लिखा कि 1965 में जब वे जम्मू कश्मीर के सदर-ए-रियासत थे, उन्होंने तभी राज्य के पुनर्गठन का प्रस्ताव दिया था।

उन्होंने पश्चिमी पाकिस्तान से आए लाखों शरणार्थियों को मताधिकार मिलने और अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगों को आरक्षण का अधिकार मिलने का भी स्वागत किया। उन्होंने इन सभी को ताज़ा निर्णय के पॉजिटिव पक्ष के रूप में गिनाया। जम्मू कश्मीर के दिवंगत महाराजा हरि सिंह और महारानी तारा देवी के बेटे कर्ण सिंह भारत सरकार में विभिन्न मंत्रालय संभाल चुके हैं और उधमपुर से सांसद भी रहे हैं। वह जम्मू कश्मीर के प्रथम राज्यपाल रहे हैं।

जम्मू कश्मीर के प्रथम राज्यपाल कर्ण सिंह का ताज़ा बयान

हालाँकि, डॉक्टर सिंह ने जम्मू कश्मीर के दोनों प्रमुख पार्टियों के नेताओं को रिहा करने की भी माँग की। बता दें कि सरकार ने माहौल बिगड़ने से बचाने के लिए 100 से अधिक नेताओं व अलगाववादियों को नजरबन्द कर लिया है। कर्ण सिंह संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में भारत के एम्बेसडर भी रह चुके हैं। ऐसे समय में जब कॉन्ग्रेस का नेतृत्व सरकार के निर्णय का विरोध कर रहा है, कर्ण सिंह का बयान काफ़ी मायने रखता है।

कश्मीर पर भूलों का करना था पिंडदान, कॉन्ग्रेस ने खुद का कर लिया

पांडे जी अरसे से फेसबुकिया मित्र हैं। आए दिन सहज, सरल शब्दों में भाजपा को घेरते रहते हैं। 6 अगस्त को पांडे जी फेसबुक पर पोस्ट करते हैं, “दरअसल कॉन्ग्रेसी विरोध नहीं कर रहे हैं, बल्कि कॉन्ग्रेस का पिंडदान कर रहे हैं।” 5 और 6 अगस्त को आर्टिकल 370 के प्रावधानों को निष्प्रभावी करने के लिए राज्यसभा और लोकसभा में चर्चा के दौरान सोशल मीडिया में की गई प्रतिक्रियाओं की यह बानगी भर है।

आप चाहें तो ऐसी प्रतिक्रियाओं को पांडे जी या उन जैसों की कुंठा, इतिहास या राजनीति की कम समझ या फिर रवीश कुमार की शैली में ह्वाट्सएप यूनिवर्सिटी से प्रशिक्षित कह कर खारिज कर सकते हैं। यह भी कह सकते हैं कि उन्होंने हवा देख ‘दिल्ली वाले सरजी’ की तरह पाला बदल लिया। चाहें तो संसद में बहस के दौरान #ShameOnCongress और #congressselfgoal के ट्रेंड करने को ट्विटर का आरएसएस एजेंट होना कह कर नकार सकते हैं। वैसे भी जब पाकिस्तानी चैनल पर पैनलिस्ट अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दामाद जेरेड कुश्नर को इस फैसले के पीछे बता सकते हैं तो ट्विटर के को-फाउंडर और सीईओ जैक डर्सी को सेट करना कौन सी बड़ी बात है। अरे याद आया बीते नवंबर में ही तो मोदी ने डर्सी से मुलाकात कर गुफ्तगू भी की थी।

लेकिन, उन सवालों का क्या जो कॉन्ग्रेस के भीतर से उठ रहे हैं। जब राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष गुलाम नबी आजाद कश्मीरियत, जम्हूरियत का हवाला देकर आर्टिकल 370 को निष्प्रभावी करने और जम्मू-कश्मीर को दो केन्द्र शासित प्रदेशों (यूटी) में बॉंटने के सरकार के कदम का विरोध करते हुए कह रहे थे, “मोदी सरकार ने भारत के मस्तक के टुकड़े कर दिए। सरकार देश के टुकड़े-टुकड़े करना चाहती है। जम्मू-कश्मीर के लोग केन्द्र सरकार के साथ नहीं हैं।”, उससे पहले ही कॉन्ग्रेस के कई नेताओं को आभास हो चुका था कि पार्टी लाइन जनभावना के खिलाफ है। पार्टी सांसद और राज्यसभा के ह्विप भुवनेश्वर कालिता ने यह कहते हुए, ‘कॉन्ग्रेस आत्महत्या कर रही है और मैं इसमें उसका भागीदार नहीं बनना चाहता’, सदन की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। जर्नादन द्विवेदी, दीपेंद्र हुड्डा, मिलिंद देवड़ा जैसे गॉंधी परिवार के करीबी रहे नेताओं ने भी इस मसले पर पार्टी से इतर राय रखने में वक्त जाया नहीं किया। जर्नादन द्विवेदी ने कहा, “मैंने राम मनोहर लोहिया जी के नेतृत्व में राजनीति की शुरूआत की थी। वह हमेशा इस अनुच्छेद के खिलाफ थे। आज इतिहास की एक गलती को सुधार लिया गया है।”

उन्होंने अपने बयान को निजी विचार बताया था। लेकिन, सालों तक सोनिया के बेहद करीब होने के कारण उन्हें यह इल्म जरूर रहा होगा कि पार्टी शायद अपनी लाइन थोड़ी दुरुस्त कर पाए। जाहिर है ऐसा नहीं हुआ और अगले दिन लोकसभा में चर्चा के दौरान कॉन्ग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी ने कुछ ऐसा कह दिया जिससे उनके बगल में बैठीं सोनिया भी असहज नजर आईं। चौधरी ने कहा, “जिस कश्मीर को लेकर शिमला समझौते और लाहौर डिक्लेरेशन हुआ है वह हमारा अंदरूनी मामला कैसे हो गया।”

इस बीच पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी ने ट्वीट कर कहा, “जम्मू-कश्मीर को दो हिस्सों में बॉंटकर, चुने हुए प्रतिनिधियों को जेल में डालकर और संविधान का उल्लंघन करके देश का एकीकरण नहीं किया जा सकता। देश उसकी जनता से बनता है न कि जमीन के टुकड़ों से। सरकार द्वारा शक्तियों का दुरुपयोग राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए घातक साबित होगा।” लेकिन, अधीर ने जो आग लगाई ​थी उसकी तपिश इससे कम नहीं हुई। मजबूरन, ज्योतिरादित्य सिंधिया, अनिल शास्त्री, रंजीत रंजन, अदिति सिंह जैसे कई नेताओं को पार्टी लाइन से हटकर रुख अख्तियार करना पड़ा।

राजनीति बौद्धिक बहसों से ज्यादा जमीनी सूझबूझ की कला है। जनभावना का मिजाज भॉंपने का चातुर्य है। लेकिन, ऐसा लगता है कि कॉन्ग्रेस का शीर्ष नेतृत्व लगातार चुनावी पराजयों की वजह से जमीन से ऐसे कटा है कि उसे कालिता और जर्नादन द्विवेदी जैसे अपने वरिष्ठ नेताओं के बयानों में छिपा संदेश भी समझ नहीं आ रहा।

असल में जम्मू-कश्मीर शेष भारत के लिए दो समुदायों का मसला नहीं है। जैसा कि कॉन्ग्रेस और इस बिल का विरोध कर रहे अन्य पार्टियों के नेता इसे पेश करने की कोशिश कर रहे थे। न ही यह जमीन का टुकड़ा खरीदने की आजादी से जुड़ा है और न ही कश्मीरी से ब्याह रचाने से, जैसा कुछ नीच सोशल मीडिया में इस बहस का स्तर गिराते हुए मीम शेयर कर रहे हैं। असल में कश्मीर वो भावनात्मक मसला है जो पूरे भारत को पाकिस्तान के खिलाफ, आतंकवाद के खिलाफ एक सूत्र में पिरोता है। इसका एहसास ‘जहॉं बलिदान हुए मुखर्जी, वो कश्मीर हमारा है’ से लेकर ‘कश्मीर हो या कन्याकुमारी-अपना देश अपनी माटी’ का नारा लगाने वाले छोटे से बच्चे को भी होता है। पर अफसोस कॉन्ग्रेस यह समझ नहीं पाई या समझना ही नहीं चाहती। शायद यही उसकी समस्या के मूल में है।

आम धारणा में इस बात की भी मजबूत पैठ है कि जम्मू-कश्मीर पूरी तरह भारत में घुलमिल नहीं पाया तो इसकी वजह नेहरू की नीतियॉं थी। अब आप इतिहास की पंक्तियों को अपने सिरे से व्याख्यायित करने की कितनी भी कोशिशें कर ले, आरएसएस और भाजपा के दुष्प्रचार का जितना रोना रोए, यह धारणा इतनी गहरी है कि उसे रातोंरात मिटाना मुमकिन नहीं। एक तरह से मोदी सरकार ने इस बिल के माध्यम से कॉन्ग्रेस को यह मौका दिया ​था कि वह जनभावना के सम्मान के नाम पर साथ आकर कश्मीर पर नेहरू की कथित भूलों से छुटकारा पाकर खुद को नए पायदान पर खड़ा कर ले।

लेकिन, तब सरकार की हर बात का विरोध करने की विपक्ष की अघोषित भूमिका का क्या होता? इसका रास्ता कॉन्ग्रेस के ही महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया के ट्वीट में छिपा है। उन्होंने ट्ववीट किया था, “जम्मू कश्मीर और लद्दाख को लेकर उठाए गए कदम और भारत देश में उनके पूर्ण रूप से एकीकरण का मैं समर्थन करता हूॅं। संवैधानिक प्रक्रिया का पूर्ण रूप से पालन किया जाता तो बेहतर होता, साथ ही कोई प्रश्न भी खड़े नहीं होते। लेकिन ये फैसला राष्ट्रहित में लिया गया है और मैं इसका समर्थन करता हूॅं।’

इसी तरह के रुख से कॉन्ग्रेस अपना विपक्ष का कथित धर्म भी निभा लेती और राष्ट्रधर्म के लिहाज से पूरे नंबर भी पाती। सदन में नेहरू की गलतियों का बार-बार जिक्र होने से होने वाली असहजता से भी छुटकारा पा लेती।

लेकिन, कॉन्ग्रेस ने खुद ही अपने हाथ जलाने का फैसला किया। हालॉंकि अब उसे नुकसान का एहसास हो रहा है। बताया जाता है कि 7 अगस्त को पार्टी कार्यसमिति की बैठक में युवा बिग्रेड और वरिष्ठ नेताओं के बीच जमकर बहस हुई। युवा बिग्रेड ने आर्टिकल 370 को हटाने के पक्ष में व्यापक जनभावना को देखते हुए इसका विरोध करने पर सवाल उठाए। बताया जाता है कि झारखंड के प्रभारी और पूर्व केन्द्रीय राज्य मंत्री आरपीएन सिंह ने इस बैठक में कहा, “नीतिगत आधार पर पार्टी का नजरिया भले सही हो, लेकिन जनता को इस बारे में समझाना मुश्किल है। इसलिए जनता के बीच जाने के लिए इस मसले पर सहज और व्यवहारिक नजरिया क्या होना चाहिए, यह पार्टी को स्पष्ट करना होगा।” अब इस मसले पर 9 अगस्त को पार्टी ने सभी राज्यों के नेताओं की विशेष बैठक बुलाई है।

लेकिन, इन कवायदों से पार्टी का तब तक भला होता नहीं दिख रहा जब तक गुलाम नबी आजाद जैसे नेता सेल्फ गोल करने वाला बयान देते रहेंगे। आजाद का ताजा बयान घाटी में कश्मीरियों के साथ बतियाते, खाना खाते राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल के वीडियो पर है। बकौल आजाद, “वीडियो के लिए आप पैसा देकर किसी को भी अपने साथ ला सकते हैं।”

वजूद बचाने के इस सवाल का जवाब बिन अध्यक्ष चल रही कॉन्ग्रेस को खुद ही तलाशना होगा। जैसा आउटलुक के एक लेख में हरिमोहन मिश्र कहते हैं, “देखना है कॉन्ग्रेस अपने संकट से निजात पाने का कोई तरीका ढूँढ़ पाती है या देश की सबसे पुरानी पार्टी इतिहास के पन्नों में समा जाती है।” जाहिर है, इस भँवर से निकलने का रास्ता ढूँढ़ने में पार्टी जितनी देरी करेगी 370 के प्रावधानों की तरह इतिहास में उसके दफन होने के मौके भी उतने ही मजबूत होते जाएँगे।

370 पर त्वरित सुनवाई से SC का इनकार, क्या UN भारत के संविधान संशोधनों पर रोक लगा सकता है?

सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 370 को लेकर त्वरित सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। बता दें कि अधिवक्ता एमएल शर्मा ने अनुच्छेद 370 पर जारी किए गए राष्ट्रपति के नोटिफिकेशन को अदालत में चुनौती दी है। शर्मा ने अपनी दलील में कहा कि इस मसले को संयुक्त राष्ट्र तक ले जाया जा सकता है, जिसके बाद हम कश्मीर को खो सकते हैं। इस पर अदालत ने पूछा कि क्या संयुक्त राष्ट्र (UN) भारत के संविधान संशोधनों पर रोक लगा सकता है?

जस्टिस रमना ने अधिवक्ता शर्मा को इन त्रुटियों को दूर करने को कहा और बताया कि इस मसले को उचित समयावधि के भीतर लिस्ट किया जाएगा। कॉन्ग्रेस नेता तहसीन पूनावाला ने भी कश्मीर में कर्फ्यू हटाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है। जस्टिस रमना ने कहा कि इसमें कब सुनवाई होगी, यह सीजेआई गोगोई तय करेंगे।

बता दें कि भारत सरकार ने अनुच्छेद 370 के अहम प्रावधानों को निरस्त कर दिया, जिसके बाद जम्मू कश्मीर को मिला विशेष राज्य का दर्जा भी नहीं रहा। इससे राज्य को दो अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेशों के रूप में पुनर्गठित करने की राह आसान हो गई। फलस्वरूप, जम्मू कश्मीर और लद्दाख के रूप में देश को दो नए केंद्र शासित प्रदेश मिले।