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अल-क़ायदा की धमकियों से नहीं डरता भारत, हमारे सुरक्षा बल सक्षम: विदेश मंत्रालय

अल-क़ायदा सरगना अल जवाहिरी के धमकी भरे वीडियो को लेकर केन्द्र सरकार ने कहा है कि इसे गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने कहा, “ऐसी धमकियाँ हम सुनते रहते हैं, मुझे नहीं लगता कि हमें इन्हें गंभीरता से लेना चाहिए।” उन्होंने कहा है कि हमारे सुरक्षाबल क्षेत्रीय संप्रभुता और सुरक्षा को बनाए रखने में पूरी तरह सक्षम हैं।

आतंकवादी संगठन अल-क़ायदा के सरगना अयमान अल जवाहिरी ने एक वीडियो जारी कर कहा है कि भारतीय सेना और जम्मू-कश्मीर की सरकार पर बिना रुके हमले होते रहने चाहिए।

ख़बर के अनुसार, यह वीडियो अल-क़ायदा के मीडिया विंग कमांडर अल शबाब ने ‘डोन्ट फॉरगेट कश्मीर’ नाम से जारी किया। इसमें जवाहिरी ने कश्मीर में सीमा पार से आतंकवाद के मामलों में पाकिस्तान का हाथ होने की बात भी कही है।

वीडियो में जवाहिरी ने यह भी कहा है कि कश्मीर में मुजाहिद्दीन को भारतीय सेना और सरकार पर लगातार हमले करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। ऐसा करने से भारत की अर्थव्यवस्था तहस-नहस हो जाएगी और भारत के संसाधनों को लगातार क्षति पहुँचती रहेगी। इस वीडियो मैं हाल ही में मारे गए मूसा के बारे में जवाहिरी ने कोई ज़िक्र नहीं किया है, लेकिन अंसार गजवत-उल-हिंद के संस्थापक की तस्वीर स्क्रीन पर दिखाई गई है।

वहीं, करतारपुर कॉरिडोर के मुद्दे पर रवीश कुमार ने कहा, “हम चाहते हैं कि यह प्रोजेक्ट जल्द से जल्द पूरा हो जाए। जहाँ तक इन्फ्रास्ट्रक्चर की बात है तो दो पहलुओं पर काम चल रहा है। इनमें से एक अत्याधुनिक यात्री टर्मिनल और एक चार लेन का हाईवे है, जो करतारपुर कॉरिडोर के जीरो पॉइंट को राष्ट्रीय राजमार्ग से जोड़ेगा।”

उन्होंने कहा, “हमें उम्मीद है कि दोनों प्रोजेक्ट का काम समय पर पूरा हो जाएगा। यात्री टर्मिनल सितंबर 2019 तक और हाईवे का काम अक्टूबर 2019 तक पूरा होने की उम्मीद है। इसलिए ऐसी रिपोर्ट्स जो यह बता रही हैं कि हमारे प्रोजेक्ट धीमी गति से चल रहे हैं, ग़लत हैं।”

‘जय श्री राम के नारे से माहौल दूषित हुआ’ – इंडिया टुडे की इस रिपोर्ट को सोशल मीडिया पर पड़ी लताड़

दिल्ली के हौज़ काजी में मंदिर में तोड़फोड़ मचाई गई। इसमें कई मुस्लिम युवकों का नाम आया। मुस्लिमों ने मंदिर में प्रतिमाएँ विखंडित करने के साथ-साथ वहाँ के परदे को भी जला डाला। संजीव गुप्ता नामक दुकानदार की पिटाई भी की गई। अब माहौल सामान्य होने के बाद मंदिर में वापस से प्राण प्रतिष्ठा की गई है और नई मूर्तियाँ भी आई हैं। इसी क्रम में एकता रैली भी निकाली गई, जिसमें मुस्लिमों के भी भाग लेने की ख़बर है।

इस बीच इंडिया टुडे ने एक ख़बर प्रकाशित की, जिसमें इस एकता रैली और प्राण प्रतिष्ठा के बारे में बताया गया है। इंडिया टुडे ने अपनी इस ख़बर में लिखा है कि मार्च तो शांतिपूर्ण रहा लेकिन ‘जय श्री राम’ के नारे से माहौल बिगड़ा।

क्या किसी कार्यक्रम में ‘जय श्री राम’ का नारा लगने से माहौल दूषित हो जाता है? क्या ‘जय श्री राम’ बोलना आसपास के वातावरण को बिगाड़ देता है? सोशल मीडिया पर यूजर्स ने इंडिया टुडे से ऐसे कई सवाल पूछे। इंडिया टुडे ने अपनी ख़बर में लिखा था, “हालाँकि दोनों ही समुदायों ने इस बात को स्वीकार किया कि तनाव अब कम हुआ है और स्थिति सामान्य हो रही है लेकिन ‘जय श्री राम’ के नारे ने रैली को बिगाड़ दिया।“

PAK: हैदराबाद में नाबालिग हिन्दू लड़की अगवा, जबरन धर्म बदलवा कराया निकाह

पाकिस्तान में हिन्दू लड़कियों को अगवा कर जबरन उनका धर्म परिवर्तन कराने का सिलसिला खत्म होता नहीं दिख रहा। अब ऐसी ही एक घटना पाकिस्तान के हैदराबाद जिले से सामने आई है। पीड़ित लड़की पूजा कुमारी महज 13 साल की है। धर्म परिवर्तन के बाद उसका सैयद इरशाद शाह से निकाह करवा दिया गया।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक पीड़िता हैदराबाद जिले के होसरी तालुका के गांव बख्शो लाघरी निवासी फतन राठौर की बेटी है। फतन की शिकायत पर होसरी पुलिस सटेशन में सेक्शन 365-बी (शादी करने की नीयत से महिला को अगवा करना) के तहत मामला दर्ज किया गया है। मानवाधिकार कार्यकर्ता और वकील अख्तर लघारी के साथ पीड़ित परिवार थाने पहुॅंचा था।

मामला दर्ज किए जाने की पुष्टि करते हुए पुलिस ने बताया है कि इरशाद के भाई को गिरफ्तार कर लिया गया है, जबकि वह खुद फरार है। पीड़िता की अब तक बरामदगी नहीं हो पाई है।

पाकिस्तान में हाल के दिनों में ऐसे कई मामले सामने आए है। 20 मार्च को दो नाबालिग हिन्दू लड़कियों रवीना (13) और रीना (15) को सिंध प्रांत स्थित उनके घर से अगवा कर लिया गया था। बाद में जबरन धर्म बदलवाकर एक बुर्जुग से उनका निकाह करवा दिया गया। इस मामले के सामने आने के बाद पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिन्दुओं पर अत्याचार को लेकर काफी हंगामा मचा था।

इस घटना के चंद दिनों के भीतर ही सिंध प्रांत के बादिन जिले में मेघवार समुदाय की एक नाबालिग लड़की को इसी तरह अगवा कर लिया गया था।

यूरोपियन पार्लियामेंट के सदस्यों द्वारा हाल ही में जारी की गई रिपोर्ट में पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ होने वाले जुल्मों का उल्लेख किया गया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक हर साल अल्पसंख्यक समुदाय की करीब एक हजार लड़कियों का जबरन धर्म बदलवाया जाता है। यह संख्या और ज्यादा हो सकती है, क्योंकि काफी मामले दर्ज ही नहीं होते। रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि कैसे इस तरह के मामलों को प्रशासन दबाने की कोशिश करता है। ज्यादातर मामलों में पुलिस का झुकाव पाकिस्तान के बहुसंख्यक समुदाय की तरफ ही होता है।

कॉन्ग्रेस के डेटा एनालिटिक्स चीफ ने ख़ुद को ‘बलि का बकरा’ बनाने पर पार्टी को दिखाया आइना

प्रवीण चक्रवर्ती – कॉन्ग्रेस पार्टी के डेटा एनालिटिक्स टीम के प्रमुख। वही प्रवीण चक्रवर्ती जिनके डेटा और सिर्फ डेटा पर भरोसा करके राहुल गाँधी लोकसभा चुनाव की नैया पार करने वाले थे। हालाँकि चुनाव परिणाम के बाद राहुल को यह समझ आ गया होगा कि लोकतंत्र में डेटा का खेल तो है लेकिन जनता-जनार्दन के साथ केमिस्ट्री उससे बड़ी चीज है। खैर, उसी प्रवीण चक्रवर्ती ने चुनाव में कॉन्ग्रेस के प्रदर्शन के लिए ख़ुद को ‘बलि का बकरा’ बनाए जाने को लेकर कटाक्ष किया है। 2019 के लोकसभा चुनावों में कॉन्ग्रेस के बुरे प्रदर्शन के लिए राजनीतिक पंडितों द्वारा प्रवीण चक्रवर्ती को दोषी ठहराया गया था।

कॉन्ग्रेस पार्टी की डेटा एनालिटिक्स टीम के प्रमुख प्रवीण चक्रवर्ती ने ट्विटर पर ICC क्रिकेट विश्व कप में न्यूजीलैंड के ख़िलाफ़ भारत की हार का संदर्भ देते हुए कॉन्ग्रेस नेतृत्व और आलोचकों का मजाक उड़ाया। प्रवीण चक्रवर्ती ने तंज कसते हुए लिखा कि विश्व कप में भारत के हारने के बावजूद किसी ने भी इसके लिए सहयोगी स्टाफ को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया।

इसी तर्ज पर प्रवीण चक्रवर्ती ने नुक़सान (चुनावी हार) के लिए कॉन्ग्रेस अध्यक्ष के बजाए उनको दोषी ठहराए जाने को लेकर तंज कसा। चक्रवर्ती ने अपनी इस टिप्पणी के साथ ही एक बहस को हवा दे दी है। उन्होंने कॉन्ग्रेस नेतृत्व पर निशाना साधते हुए लिखा कि पार्टी के नेतृत्व की विफलता के लिए जानबूझकर उन्हें बलि का बकरा बनाया गया।

ख़बर के अनुसार, चुनाव के बाद किसी भी आलोचना से गाँधी-वंश को बचाने के लिए कॉन्ग्रेस के भीतर एक ठोस अभियान चलाया गया। पार्टी की हार का ठीकरा नेताओं के सिर मढ़ा गया। राहुल गाँधी की अक्षमता पर चादर डालते हुए प्रवीण चक्रवर्ती, जो कॉन्ग्रेस के डेटा एनालिटिक्स विभाग के प्रमुख थे, उन पर भी हार का ठिकरा फोड़ा गया।

कॉन्ग्रेस ने राहुल गाँधी को ‘ग़लत डेटा’ उपलब्ध कराने के लिए प्रवीण चक्रवर्ती को दोषी ठहराया था। पार्टी का मानना है कि ग़लत डेटा की वजह से ही उन्हें लोकसभा चुनाव 2019 में हार का सामना करना पड़ा। कॉन्ग्रेस ने संदेह जताया कि प्रवीण चक्रवर्ती मोदी सरकार का गुप्तचर था, जिसके ज़रिए कॉन्ग्रेस पार्टी को ग़लत जानकारी शेयर की जा सके और पार्टी को चुनाव में नुक़सान पहुँचाया जा सके।

इसके अलावा, कॉन्ग्रेस के नेतृत्व ने राहुल गाँधी को किसी भी तरह की जवाबदेही से बचाने के कई तरीके भी खोजे। पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी पदों से इस्तीफ़ा देने का फ़ैसला किया। इसी कड़ी में, ज्योतिरादित्य सिंधिया, मिलिंद देवड़ा पहले ही राहुल गाँधी को अपना इस्तीफ़ा सौंप चुके हैं।

फर्जी डिग्री मामला: ममता बनर्जी के सांसद भतीजे अभिषेक अदालत में तलब

फर्जी डिग्री मामले में दिल्ली की एक विशेष अदालत ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे और टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी को समन भेजा है। अदालत ने उन्हें 25 जुलाई को पेश होने को कहा है। यह मामला सुप्रीम कोर्ट के वकील सार्थक चतुर्वेदी ने दायर कर रखा है।

अपनी याचिका में चतुर्वेदी ने कहा है कि अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा चुनाव के नामांकन-पत्र में अपनी शैक्षणिक योग्यता को लेकर गलत जानकारी दी है। सार्थक के मुताबिक अभिषेक ने 2014 लोकसभा चुनाव के दौरान दाखिल नामांकन-पत्र में एमबीए की डिग्री जिस यूनिवर्सिटी से लेने की जानकारी दी है, उसे मान्यता प्राप्त नहीं है।

अभिषेक ने 2014 और 2019 लोकसभा चुनाव के दौरान दाखिल एफिडिवेट में बताया है कि उन्होंने एमबीए की डिग्री इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ प्लानिंग ऐंड मैनेजमेंट (IIPM) से 2009 में हासिल की थी। सार्थक का आरोप है कि यह डिग्री फर्जी है। इसी याचिका पर संज्ञान लेते हुए विशेष अदालत ने अभिषेक बनर्जी को कोर्ट में हाजिर होने के आदेश दिए हैं। अभिषेक पश्चिम बंगाल की डायमंड हार्बर सीट से सांसद हैं।

119410 अफसरों की जाँची गई फाइल: 312 भ्रष्ट अधिकारियों के जबरन रिटायरमेंट के पीछे की कहानी

मोदी सरकार द्वारा केंद्र सरकार के 312 कर्मचारियों को लापरवाही बरतने के चलते नौकरी से हटा देने की ख़बर सामने आई है। सरकार ने इन अधिकारियों को जबरन रिटायर किया है। नौकरी से हटाए गए इन अधिकारियों में कई वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल हैं। वरिष्ठ अधिकारियों में ज्वॉइंट सेक्ट्रेरी रैंक के अधिकारियों को हटाया गया है। अलग-अलग स्तर की बात करें तो सरकार ने ग्रुप-ए के 125 और ग्रुप-बी के 187 अधिकारियों को जबरन रिटायरमेंट दिया है।

दरअसल, प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) में मंत्री जितेंद्र सिंह ने इस बात की जानकारी डीएमके के सांसद ए राजा के सवाल पर दी। ए राजा ने लोकसभा में सवाल पूछा था कि सरकार ने कितने अधिकारियों को जबरन रिटायर किया और इनके ख़िलाफ़ किस आधार पर एक्शन लिया गया? इसी सवाल के जवाब में जितेंद्र सिंह ने बताया कि लागू अनुशासनात्मक नियमों के अंतर्गत सरकार के पास उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ़ कार्रवाई का अधिकार है।

सरकार को पूरा अधिकार है कि वह सार्वजनिक हित को देखते हुए सत्यनिष्ठा की कमी और लापरवाही दिखाने वाले अफसरों पर मौलिक नियमों के प्रावधान (एफआर) 56 (j) (i), केंद्रीय सिविल सर्विस के नियम 48, पेंशन नियम 1972 और सिविल सेवा नियम 16 (3) (संशोधित) के तहत कार्रवाई कर सकती है।

अपने जवाब में केंद्रीय मंत्री सिंह ने कहा कि जुलाई 2014 से मई 2019 की अवधि में ग्रुप-ए के 36,756 और ग्रुप-बी के 82,654 अधिकारियों की समीक्षा की गई थी। इसके बाद समीक्षा के दौरान दोनों ग्रुप के 312 अधिकारी भ्रष्ट पाए गए। उन्होंने इस बात की भी जानकारी दी कि मोदी सरकार के दोबारा सत्ता में आने के बाद कई अधिकारियों के ख़िलाफ़ एक्शन लिया गया है। कई विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों को जबरन रिटायरमेंट पर जाने के लिए कहा गया है।

जबरन रिटायरमेंट दिए जाने वाले अधिकारियों पर भ्रष्टाचार और अक्षमता के आरोप के अलावा कुछ पर यौन उत्पीड़न का भी आरोप है।

गिरिराज के बयान पर आज़म ख़ान का तंज: 2 से अधिक बच्चे पैदा करने पर फाँसी दो

केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने दो से अधिक बच्चे होने पर माता-पिता का वोटिंग अधिकार ख़त्म करने की वकालत की है। गिरिराज सिंह ने कहा कि चाहे वो हिन्दू हो या मुस्लिम, अगर 2 से अधिक बच्चे पैदा करता है तो उसे मताधिकार से वंचित कर देना चाहिए। गिरिराज सिंह ने ये बातें जनसंख्या नियंत्रण को लेकर कही। वहीं, सपा सांसद आज़म ख़ान ने गिरिराज के इस बयान पर तंज कसते हुए कहा है कि दो से अधिक बच्चे पैदा करने पर फाँसी ही दे देनी चाहिए। बिहार में भाजपा व जदयू ने गिरिराज के इस बयान का समर्थन करते हुए कहा कि जनसंख्या नियंत्रण क़ानून देश के हित में है।

वहीं, राजद विधायक भोला यादव ने कहा कि गिरिराज का बयान उनकी ओछी मानसिकता का परिचायक है। उन्होंने कहा कि गिरिराज सिंह को केंद्र में मंत्री नहीं होना चाहिए। कॉन्ग्रेस नेता प्रेमचंद मिश्र ने कहा, “गिरिराज सिंह अनाप-शनाप बयान देते रहते हैं। यह मानवाधिकार हनन की बात है। हम किसी के बच्चे कैसे नियंत्रित कर सकते हैं?” विश्व जनसंख्या दिवस के अवसर पर गिरिराज सिंह ने कहा:

“बढ़ती जनसंख्या भारत के लिए बड़ी समस्या है और इससे संसाधन और सामाजिक समरसता को ख़तरा पैदा हो गया है। जनसंख्या नियंत्रण के लिए सख़्त कानून की ज़रूरत है। इसके लिए सड़क से संसद तक प्रयास जरूरी हैं। देश में हिंदू-मुस्लिम दोनों के लिए दो बच्चों का नियम होना चाहिए। वोट के ठेकेदारों ने जनसंख्या को धर्म से जोड़ दिया है।”

केंद्रीय मंत्री ने कई इस्लामी देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि वहाँ भी जनसंख्या नियंत्रण क़ानून बना है, लेकिन भारत में उसका विरोध किया जाता है। उन्होंने चेतावनी दी कि जहाँ-जहाँ हिन्दुओं की जनसंख्या गिरती है, वहाँ-वहाँ सामाजिक समरसता को ख़तरा पैदा हो जाता है। उन्होंने असदुद्दीन ओवैसी का नाम लेते हुए कहा कि उनके जैसे लोग सामाजिक समरसता में सबसे बड़े बाधक हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि भारत 1947 की तरह सांस्कृतिक विभाजन की ओर आगे बढ़ रहा है।

GTA-5 गेम Video को हकीकत मान बैठे PAK सांसद, सोशल मीडिया पर उड़ी खिल्ली

पाकिस्तान की सत्ताधारी दल के वरिष्ठ सांसद खुर्रम नवाज़ ने सोशल मीडिया पर एक एयरक्राफ्ट का वीडियो शेयर करते हुए उसके पायलट की तारीफ की। इस वीडियो में एक प्लेन बिल्डिंग के पास से निकलते हुए जब लैंड करता है, तो सामने एक पेट्रोल टैंकर आ जाता है और जान बचाने के लिए पायलट उसी वक्त टेक ऑफ कर लेता है। खुर्रम द्वारा इस वीडियो को शेयर करने के बाद सोशल मीडिया पर उनका खूब मजाक उड़ रहा है। ऐसा क्यों? आइए आपको बताते हैं।

दरअसल, खुर्रम द्वारा शेयर वीडियो ग्राफिक्स की मदद से तैयार की गई GTA-5 गेम की एक झलक है, जिसे उन्होंने हकीकत मान लिया और पायलट के लिए लिखा, “एक एयरक्राफ्ट बड़े हादसे का शिकार होने से बाल-बाल बचा। पायलट का चमत्कारिक प्रजेंस ऑफ माइंड।”

इस पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर यूजर्स ने उन्हें खूब ट्रोल किया। इस वीडियो को देखकर कोई बच्चा
भी बता सकता है कि यह वास्तविक घटना का वीडियो नहीं है, बल्कि ग्राफिक्स का खेल है, लेकिन अफसोस खुर्रम इस बात को नहीं समझ पाए और हंसी के पात्र बन गए।

एक यूजर ने उनका मजाक उड़ाते हुए लिखा, आखिरकार पाकिस्तान में जीटीए-5 पहुँच गया। वहीं, किसी ने उन्हें स्टूपिड कहा तो किसी ने कहा कि यह हास्यास्पद है, लेकिन इनसे यही उम्मीद है।

बता दें, बुरी तरह ट्रोल होने के बाद खुर्रम नवाज ने यह ट्वीट डिलीट कर दिया है। लेकिन Theuigamer चैनल ने इसकी वीडियो को यूट्यूब पर शेयर किया है, आप इस वीडियो को नीचे दिए यूट्यूब लिंक में देख सकते हैं। खुर्रम पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान के करीबी माने जाते हैं। पूर्व सैन्य अधिकारी खुर्रम फ़िलहाल तहरीक़-ए-इंसाफ़ पार्टी के महासचिव और नेशनल असेंबली के सदस्य हैं।

‘मेरे 40 करोड़ टोपी वाले भाइयो! अल्लाह से माँगो कि हमको ताकत दे, पूरा हिन्दुस्तान बंद हो जाएगा’

बॉलीवुड अभिनेत्री पायल रोहतगी को लेकर टिप्पणी करते हुए भड़काऊ बयान देने के कारण चर्चा में आए बॉलीवुड एक्टर एजाज खान इस बार नए वीडियो में हिन्दुओं को अपमानित करते नजर आ रहे हैं। इस बार भी वो अपने बयान को लेकर सोशल मीडिया में छाए हुए हैं। कुछ लोग उनकी बातों का समर्थन कर रहे हैं तो काफी लोग उनके खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करवाने की बात भी लिख रहे हैं।

“जब हम ज्वालामुखी बनकर फटेंगे तो सब कलमा पढ़ने लगेंगे”

फेसबुक पर एजाज खान अपने भड़काऊ वीडियो के माध्यम से समाज में नफरत फैलाने और समुदाय विशेष को उकसाने का प्रयास करते हुए देखे जा रहे हैं। इस बार एजाज खान ने पीएम मोदी पर और RSS पर आरोप लगाते हुए कहा है कि वो लोगों को ‘जय श्री राम’ बुलवाने और देश का ‘सेक्युलर फ़ेब्रिक’ तोड़ने के लिए उकसा रहे हैं।

इस वीडियो में एजाज खान कहते देखे जा सकते हैं कि ‘जय श्री राम’ का नारा लगाने वाले लोग नाथू राम गोडसे को पूजते हैं, जो कि महात्मा गाँधी का हत्यारा है। एजाज खान का कहना है कि अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जय श्री राम बोलने वालों को रोकते हैं, तो वो उन्हें ‘आप’ नहीं बल्कि ‘तू’ कहना शुरू कर देंगे।

नाराज एजाज खान लोगों से अपील कर रहे हैं कि ‘जय श्री राम बुलवाने’ वालों को कभी उनसे (खुद एजाज से) ‘जय श्री राम’ बुलवाने की कोशिश करनी चाहिए। इसके बाद, एजाज खान कह रहे हैं कि वो ‘जय श्री राम’ बुलवाने वाले लोगों से ही अगर ‘अल्लाहु-अकबर’ ना बुलवा दें तो उनका नाम बदल दें। RSS पर ‘जय श्री राम’ कहकर लोगों को भड़काने का आरोप लगाते हुए एजाज खान इस वीडियो में कह रहे हैं, “अब पीर पर्वत सी हो चुकी, अब पिघलनी चाहिए और इनके पिछवाड़े से गंगा निकलनी चाहिए।”

एजाज खान इस वीडियो में कह रहे हैं-

“अल्लाह से माँगो कि हमको ताकत दे। हम लोग सड़क पर नहीं निकले, हमें शर्म आनी चाहिए। हम लोगों में एकता नहीं, हम लोग केकड़े हैं। हम लोग खाली बातों के शेर हैं। 2 दिन सड़क पर उतर आएँ तो हिन्दुस्तान पूरा बंद हो जाए। ये जो हम लोगों को डराने की कोशिश कर रहे हैं… मेरे भाइयो ये सब बंद हो जाएगा। खाली एक दिन निकलना है सड़क पर। चालीस करोड़ लोग हैं हम, वैध और अवैध मिलाकर… एक बार निकलना है खाली। मेरे टोपी वाले भाइयो, कब निकलेंगे टोपियाँ पहन-पहनकर सड़क पर। खाली एक दिन काम पर नहीं जाना है।”

कॉन्ग्रेस के डूबने में मोदी-शाह का ही हाथ नहीं, देश की सबसे पुरानी पार्टी की नाव में कई छेद

देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कॉन्ग्रेस पहले भी कई बार टूट चुकी है। उसके लोग विरोधी दलों में भी जाते रहे हैं। लेकिन, आज जितनी बेबस और लाचार कॉन्ग्रेस पहले कभी नहीं दिखी। एक के बाद एक झटके और दूर-दूर तक दिन बहुरने की उम्मीद नहीं। जब वह कर्नाटक में सरकार बचाने की जद्दोजहद में फँसी थी, तभी गोवा में उसके दो तिहाई विधायक पाला बदल लेते हैं और उसे इसकी भनक तक नहीं लगती। क्या इसका एकमात्र कारण मोदी-शाह की जोड़ी है (जैसा कि कॉन्ग्रेस आरोप लगाती है)? क्या कॉन्ग्रेस कथित धनबल और बाहुबल के आगे पस्त है? यकीनन नहीं!

वैसे, भी भारतीय राजनीति में कॉन्ग्रेस साम, दाम, दंड, भेद की घाघ खिलाड़ी रही है। सो, चुनावी पराजयों से उसके इस हुनर के भोथरा होने की बात मान लेना नासमझी ही कही जा सकती है। असल में कॉन्ग्रेस जिस दम पर (मजबूत संगठन, नेहरू-गांधी परिवार का नेतृत्व और क्षेत्रीय क्षत्रप) अपने पासे चलती थी, आज वही संकट में है। इसलिए ताज्जुब नहीं की पार्टी के कद्दावर नेता रहे जनार्दन द्विवेदी को कहना पड़ा, “हार के कारण पार्टी के भीतर है न कि बाहर।” एक अन्य वरिष्ठ नेता कर्ण सिंह ने कॉन्ग्रेस नेताओं की चाटुकारिता पर हमला करते हुए कहा कि नेताओं ने अधिकतर समय राहुल के इस्तीफे के बाद ख़ुशामद में बीता दिया।

वरिष्ठ नेताओं का इस तरह से बयान देना कॉन्ग्रेस के अंदर के घमासान को उजागर करता है। ऐसे में खुद को अलग-थलग और असुरक्षित महसूस कर रहे नेताओं का पलायन चौंकाने वाला नहीं है। मान लें की कुछ नेता सत्ता से ही चिपके रहना चाहते हैं तो फिर कर्नाटक कॉन्ग्रेस में फूट नहीं पड़नी चाहिए थी। वहाँ बीते साल चुनाव हारने के बावजूद जद (एस) के साथ कॉन्ग्रेस सरकार बनाने में कामयाब रही थी।

असल में, शीर्ष पर बैठे कॉन्ग्रेस नेताओं को इनकी फिक्र ही नहीं है। हेमंत बिश्व शर्मा के कॉन्ग्रेस छोड़ने से यह पहले ही जगजाहिर हो चुका है। अभी दिख रही उठापठक भी इससे अलग नहीं है।

कॉन्ग्रेस के लिए इसकी शुरुआत 2011 से ही होने लगी थी जब अन्ना हज़ारे और बाबा रामदेव के आन्दोलनों से देश भ्रष्टाचार और परिवारवाद के ख़िलाफ़ आक्रोशित था और कॉन्ग्रेस सत्ता में थी। इस पर बहुतों बार लिखा जा चुका है कि कैसे आंदोलन को कुचलने की कोशिश में पार्टी ने अपनी विश्वसनीयता खो दी।

इसके बाद 2012 में गुजरात विधानसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की लगातार तीसरी जीत ने देश के सारे राजनीतिक समीकरण पलट कर रख दिए। इस पर भी विस्तृत बहस हो चुकी है कि किस तरह आज़ादी के बाद से चले आ रहे कॉन्ग्रेसी वर्चस्व को उन्होंने धीरे-धीरे ऐसे ख़त्म कर दिया कि यह भारत के इतिहास में हमेशा एक नए समय की शुरुआत के रूप में याद किया जाएगा। आख़िर कॉन्ग्रेस की आज ऐसी हालत क्यों है?

नीचे संलग्न वीडियो को देखिए। लोकसभा में कॉन्ग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी बोल रहे हैं लेकिन उनके पीछे बेंच खाली पड़ी हुई है। उनके ख़ुद की ही पार्टी के नेता उन्हें सुनने के लिए तैयार नहीं हैं। ऐसे में, अगर किसी सक्षम व्यक्ति को पार्टी में अहम पद दिया भी जाए तो उसका कोई महत्व नहीं रह जाएगा। लोकसभा में अधीर रंजन चौधरी को कॉन्ग्रेस ने अपना नेता तो चुन लिया, लेकिन उनकी बात सुनने का समय उसके संसद नहीं निकाल पा रहे।

दूसरी बात, क्या कॉन्ग्रेस टिकट देते समय नेताओं की विश्वसनीयता को नहीं परखती? क्या ऐसे नेताओं को टिकट दे दिया जाता है जो दलबदलू होते हैं और जिनकी कोई विचारधारा नहीं होती? क्या कॉन्ग्रेस के विधायक बिकाऊ हैं? अगर ऐसा है तो शाह क्या कोई भी विपक्षी पार्टी का अध्यक्ष उन्हें ख़रीद लेगा। क्या कॉन्ग्रेस के विधायकों का स्तर इतना नीचे गिर गया है कि उनके सिर पर बोर्ड चस्पा है- “यह विधायक बिकाऊ है।”

सोनिया गाँधी द्वारा अपनी सक्रियता कम करने के बाद कॉन्ग्रेस में ऐसा पहली बार हो रहा है जब पार्टी में नेताओं को एक रखने के लिए कोई सक्षम नेता मौजूद नहीं है। जब कॉन्ग्रेस दो धड़ो में बँट गई थी, तब भी इंदिरा ने उसे संभाल लिया था। आज ऐसा कोई सक्षम नेता नहीं है। राहुल गाँधी के बारे में तो बात ही न की जाए तो अच्छा है क्योंकि एक ही झूठ को सच साबित करने की कोशिश करने वाला नेता कभी भी दूरदर्शी नहीं हो सकता। हाँ, उसकी बातों से जनता चिढ़ेगी ज़रूर।

और कॉन्ग्रेस किस नैतिकता की बात करती है। कर्नाटक की जनता ने उसे विपक्ष में बैठने का जनादेश दिया था। लेकिन भाजपा को रोकने के नाम पर उसने एक कामचलाऊ सरकार बनाई, जिसकी अकाल मौत की अटकलें उसके बनने के बाद ही शुरू हो गई थी।

आज हरियाणा में भी ऐसा ही हाल है। प्रदेश अध्यक्ष अशोक तँवर और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के बीच ऐसी गुटबाजी चल रही है कि वरिष्ठ नेता ग़ुलाम नबी आज़ाद की भी कोई नहीं सुन रहा। वहाँ भी कल को ऐसे ही हालत पैदा होंगे और फिर भाजपा को दोष दिया जाएगा। पंजाब में केंद्रीय नेतृत्व के लाडले सिद्धू दफ्तर छोड़ कर ही गायब हैं और मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह से उनकी उठापटक जारी है। बिहार में जदयू महागठबंधन से अलग क्या हुई, कॉंग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष ही नीतीश के साथ हो लिए। उत्तर प्रदेश में तो कलह का आलम यह है कि वहाँ प्रियंका और सिंधिया भी लाचार नज़र आए। गुजरात में एक-एक कर विधायक पाला बदल रहे हैं।

और यह केवल बाहुबल या धनबल का ही कमाल नहीं। अगर ऐसा होता तो गोवा में पार्टी छोड़ने वाले विधायकों ने अलग दल बनाया होता ताकि भविष्य में भी भाजपा के साथ मोल-भाव कर सकें। लेकिन, उन्होंने भाजपा में शामिल होने का फैसला किया। आखिर क्यों? असल में, आज भाजपा के अलावा नेताओं को कोई दूसरा दल नहीं दिख रहा जहां वे खुद का भविष्य सुरक्षित मान सके और मोदी के अलावा कोई दूसरा नेता नहीं दिखता जिसमें अपने लोगों की नैया पार लगाने की कूवत हो।

कॉन्ग्रेस पार्टी कई बार टूटी। 1956 में सी राजगोपालचारी ने अलग पार्टी बना ली। 1967 में चरण सिंह ने कॉन्ग्रेस को तोड़ कर अलग पार्टी बनाई। इंदिरा के समय भी कॉन्ग्रेस टूटी। 1977 में आपातकाल के बाद जगजीवन राम अलग पार्टी बना कर छिटक गए। दक्षिण में एके एंटनी, बंगाल में प्रणव मुखर्जी, महाराष्ट्र में शरद पवार, छत्तीसगढ़ में अजित जोगी और हरियाणा में बंसीलाल के नेतृत्व में समय-समय पर कॉन्ग्रेस विभाजित हुई। लेकिन यहाँ सवाल यह है कि अब पार्टी के विधायक अलग होकर नई पार्टी क्यों नहीं बना रहे? वे भाजपा के साथ ही क्यों जा रहे हैं? अगर वो नया दल बना लें तो वे ज्यादा मोलभाव करने की स्थिति में होंगे।

सार यह कि अब कॉन्ग्रेस पार्टी का कोई ख़ास कैडर नहीं रहा। नैरेटिव के इस दौर में लगातार ग़लत क़दम उठा कर जनता के बीच ग़लत सन्देश देने पर उसके बुरे परिणाम आपको भुगतने पड़ेंगे, भले ही इसमें समय लगे। मई 2018 में हुई ग़लती का परिणाम जुलाई 2019 में निकल कर आ रहा है। ऐसे में, पार्टी को एक ऐसा अध्यक्ष चाहिए जो क्षत्रपों को एक रखने के साथ-साथ सही निर्णय लेने की क्षमता रखता हो। अध्यक्ष के साथ नेताओं की एक ऐसी टीम चाहिए, जो सही रणनीति बना सके। अगर ऐसा नहीं होता है तो गाँधी के आदर्शों पर चलने का दावा करने वाली कॉन्ग्रेस शायद देश के राजनीतिक पटल से गायब ही न हो जाए।