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पंजाब के 5 मंत्रियों ने सिद्धू पर बोला हमला, आलाकमान ले सकता है कड़ा फैसला

पंजाब की सभी सीटों पर रविवार (मई 19, 2019) को लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण के तहत मतदान हुआ। सिद्धू द्वारा सीधा पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह पर निशाना साधना उन्हें भारी पड़ सकता है क्योंकि पार्टी की पंजाब प्रभारी आशा कुमारी ने प्रदेश कॉन्ग्रेस से सिद्धू को लेकर रिपोर्ट माँगी है। कहा जा रहा है कि अधिकतर नेता मुख्यमंत्री अमरिंदर के साथ हैं। गुरदासपुर से सनी देवल के ख़िलाफ़ कड़े चुनावी युद्ध में फँसे प्रदेश अध्यक्ष बलराम जाखड़ चुनावी प्रक्रिया से फ्री होते ही रिपोर्ट तैयार करेंगे। बता दें कि कम्प्टन अमरिंदर सिंह ने नवजोत सिंह सिद्धू पर महत्वाकांक्षी होने और उनको अपदस्थ कर के ख़ुद मुख्यमंत्री बनने की इच्छा रखने का आरोप लगाया था।

पंजाब कॉन्ग्रेस के दो शीर्ष नेताओं के इस झगड़े में पार्टी को नुकसान उठाना पड़ रहा है। लोकसभा चुनाव परिणाम आने के बाद इस सम्बन्ध में हाईकमान आगे की कार्रवाई कर सकता है। पंजाब के ग्रामीण विकास मंत्री तृप्त राजिंदर सिंह बाजवा ने नवजोत सिंह सिद्धू से दो टूक कहा है कि अगर वह कैप्टन के अंतर्गत कार्य करने में असमर्थ हैं तो उन्हें मंत्रिमण्डल से इस्तीफा दे देना चाहिए। उन्होंने कहा कि सिद्धू अगर कैप्टन को नेता नहीं मानते तो इस्तीफा दें। बाजवा ने कहा कि सिद्धू को जब पता ही नहीं है कि जहाज का कप्तान कौन है, तो उन्हें मंत्रिमंडल से निकाल बाहर किया जाए।

बाजवा सिद्धू पर निशाना साधने वाले पंजाब कैबिनेट के पाँचवें मंत्री हैं। उनसे पहले पंजाब के स्वास्थ्य मंत्री ब्रह्मा मोहिंद्रा ने राज्य के पर्यटन मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू पर निशाना साधते हुए पार्टी हाईकमान से उन पर कार्रवाई करने की माँग की थी। मंत्री मोहिंद्रा ने सिद्धू पर पीठ में छुरा घोपने का आरोप लगाते हुए कहा कि वह बेवक़्त बयान देते जा रहे हैं। उन्होंने सिद्धू के बारे में कहा कि वो सिर्फ़ 2 सालों से ही कॉन्ग्रेस में हैं और अपना नियम झाड़ते हुए अपना अजेंडा लागू करना चाह रहे हैं। मोहिंद्रा के अलावा ख़ुद कैप्टेन और पंजाब मंत्रिमंडल के उनके अन्य साथी भी सिद्धू की आलोचना कर चुके हैं।

ये सब विवाद तभी से चला आ रहा है जब पंजाब के पर्यटन मंत्री सिद्धू की पत्नी नवजोत कौर ने मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह पर उनका टिकट काटने के आरोप लगाया था। बाद में सिद्धू ने अपनी पत्नी के बयान का समर्थन किया था। नवजोत सिंह सिद्धू पर हमला बोलते हुए मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने कहा था, “सिद्धू मेरी जगह सीएम बनना चाहते हैं। सिद्धू कॉन्ग्रेस की छवि बिगाड़ रहे हैं, पार्टी को उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करनी चाहिए। अगर वह असली कॉन्ग्रेसी होते तो वह अपनी शिकायतों के लिए पंजाब चुनाव का वक्त नहीं चुनते।”

अभी हाल ही में आवाज़ जाने के ख़तरों के कारण सिद्धू अस्पताल में भर्ती थे जब 70 से अधिक चुनावी सभाओं को सम्बोधित करने के कारण उनकी स्वर तंत्रिका को नुकसान हुआ था। बाजवा ने सिद्धू की आलोचना करते हुए आगे कहा, “अगर वो सच में कॉन्ग्रेसी होते तो उन्होंने अपनी शिकायतों को सार्वजनिक करने का बेहतर समय चुना होता। उन्होंने पंजाब में मतदान से ठीक पहले ये बातें कही। ये सिर्फ़ उनका नहीं बल्कि पूरे कॉन्ग्रेस का चुनाव है। कॉन्ग्रेस अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं करती।” पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी ने भी सिद्धू को ‘कॉन्ग्रेस की संस्कृति’ समझने की सलाह दी।

बंगाल में चुनाव बाद भी हिंसा का दौर जारी, BJP ने राज्यपाल से मिल की सेना तैनात करने की माँग

लोकसभा चुनाव के अंतर्गत सातों चरण के चुनाव ख़त्म होने के बावजूद पश्चिम बंगाल में हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है। सातवें चरण के मतदान के दिन हुई कई हिंसक वारदातों के बाद अभी भी वहाँ राजनीतिक हिंसा का दौर थमता नहीं दिख रहा है। रविवार (मई 19, 2019) को भाटपारा विधानसभा क्षेत्र में मतदान हुआ। इसके अंतर्गत आने वाले कांकिनारा में रेल सेवा को बाधित किया गया। यहाँ तृणमूल कॉन्ग्रेस और भाजपा के कार्यकर्ताओं के बीच तीखी झड़प हुई, जिसके बाद सियालदह डिवीजन में रेल सेवा बाधित किए जाने के बाद यात्रियों में अफरातफरी का माहौल रहा। इतना ही नहीं, कांकिनारा रेलवे स्टेशन परिसर में क्रूड बम भी फेंके गए।

सबसे बड़ी बात तो यह कि पहले से ही प्रशासन को अलर्ट पर रखे जाने के बावजूद हिंसा की ये वारदातें हुईं। इसके अलावा विधाननगर विधानसभा के अंतर्गत सॉल्टलेक और दक्षिण 24 परगना जिले में भी तृणमूल और भाजपा समर्थक आपस में भिड़े। इस संघर्ष में भाजपा के कई कार्यकर्ताओं के घायल होने की सूचना है। इसके अलावा रविवार को भी भाजपा के 4 पोलिंग एजेंटों पर हमला किया गया था। शराब के नशे में धुत हमलावरों ने घर में घुस कर बेख़ौफ़ तोड़फोड़ मचाया और धारदार हथियारों से हमला भी किया। इस घटना के पीछे पीड़ितों ने तृणमूल कॉन्ग्रेस का हाथ बताया है।

एक अन्य घटना बासंती स्थित चड़विद्या में घटी। यहाँ तृणमूल कॉन्ग्रेस के गुंडों ने बबलू नामक भाजपा कार्यकर्ता को निशाना बनाया। हमले में बबलू बाल-बाल बच गए। पड़ोसियों के पहुँचने के बाद हमलावर बाइक छोड़ भाग खड़े हुए। भाजपा कार्यकर्ता बबलू का अस्पताल में इलाज चल रहा है। बंगाल भाजपा के अध्यक्ष दिलीप घोष की अध्यक्षता में एक प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल केसरी नाथ त्रिपाठी से राज्य में सेना तैनात करने की माँग की। इस मुलाक़ात के बाद घोष ने कहा:

“तृणमूल कॉन्ग्रेस ने जिस तरह से अपने गुंडों को खुला छोड़ रखा है, उससे तो लगता है कि वे बंगाल में अराजकता का माहौल बनाना चाहते हैं। यदि ऐसी स्थिति जारी रही तो केंद्र को स्थिति नियंत्रित करने के लिए तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए। यदि ज़रूरत पड़े तो भाटपारा में सेना बुलाई जाए। पुलिस तो तृणमूल कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं के रूप में कार्य कर रही है। इस मामले पर राज्यपाल ने हमारी माँगों को सुना है और इन्हें देखने का भरोसा भी दिया है। न केवल भाटपारा बल्कि उत्तर बंगाल के कई हिस्सों में तृणमूल कॉन्ग्रेस हमारे खिलाफ हिंसा कर रही है।”

उधर तृणमूल के वरिष्ठ नेता डेरेक ओ ब्रायन ने चुनाव आयोग से पूछा है कि क्या केंद्रीय बलों को राज्य में एक सप्ताह अतिरिक्त रखने का निर्णय आपातकाल लगाने के लिए लिया गया है? राज्यसभा सांसद डेरेक ने कहा कि बंगाल के लिए विशेष नियम बनाए जा रहे हैं और यह उनके लिए स्वीकार्य नहीं है। भाजपा द्वारा कई मतदान केंद्रों पर दुबारा मतदान कराने की माँगों के बीच डेरेक ने केंद्रीय बलों के वेश में भाजपा और संघ कार्यकर्ताओं के होने की बात दुहराई। भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय ने कहा कि ममता सरकार भाजपा प्रत्याशी अर्जुन सिंह का एनकाउंटर करवा सकती है। उन्होंने कहा कि सिंह की जान को ख़तरा है और उन्हें कुछ भी नुकसान होता है तो इसकी ज़िम्मेदार बंगाल की मुख्यमंत्री ख़ुद होंगी।

RISAT-2B: आतंकियों पर नजर के लिए तीसरी आँख, ISRO की बड़ी कामयाबी

खुफिया निगरानी, कृषि, वन और आपदा प्रबंधन में सहयोग जैसे क्षेत्रों के लिए इसरो ने सुबह साढ़े पाँच बजे श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र से RISAT-2B लॉन्च किया। हर तरह के मौसम में काम करने की क्षमता वाले रडार इमेजिंग पृथ्वी निगरानी उपग्रह को प्रक्षेपण यान पीएसएलवी-सी46 के जरिए भेजा गया। RISAT-2B को पृथ्वी की निचली कक्षा (लो अर्थ ऑर्बिट) में स्थापित किया गया।

RISAT-2B उपग्रह का भार 615 किलोग्राम है। इस उपग्रह की खूबी है – सिंथेटिक अपर्चर रडार (synthetic aperture radar) – जिसके कारण यह किसी भी मौसम में काम करता रहेगा, निगरानी रखता रहेगा। RISAT-2B में पूर्णतः स्वदेशी विक्रम प्रोसेसर लगा हुआ है।

RISAT-2B अपने प्रक्षेपण के 15वें मिनट के बाद 555 किलोमीटर के सर्कुलर ऑर्बिट में 37 डिग्री के झुकाव पर सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया गया। यह उपग्रह अगले 5 साल तक के लिए काम करेगा।

पीएसएलवी की बात करें तो यह इस प्रक्षेपण यान का 48वाँ मिशन था। साल 2019 में इसरो द्वारा यह तीसरा प्रक्षेपण है। अभी तक 350 उपग्रहों के जरिए PSLV प्रक्षेपण यानों से 50 टन का पेलोड अंतरिक्ष में सफलतापूर्वक भेजा जा चुका है – जो एक रिकॉर्ड है।

इसरो के प्रमुख के शिवन ने RISAT-2B के सफल प्रक्षेपण पर खुशी जताई। उन्होंने इसे ‘बहुत बहुत महत्वपूर्ण’ बताया। आपको बता दें कि प्रक्षेपण से पहले उन्होंने तिरूपति के प्रसिद्ध भगवान वेंकटेश्वर मंदिर में पूजा अर्चना भी की। RISAT-2B के बाद, इसरो चंद्रयान-2 पर काम करेगा, जिसका 9 से 16 जुलाई के बीच प्रक्षेपण का कार्यक्रम है।

यूट्यूब पर लोग KRK, दीपक कलाल और रवीश को ही देखते हैं और कारण बस एक ही है

KRK यानी, कमाल रशीद खान बॉलीवुड से लेकर भोजपुरी फिल्मों का एक बेहद जाना-पहचाना नाम है। कुछ साल पहले ही दीपिका पादुकोण के ‘माय लाइफ माय रूल्ज़’ के जवाब में KRK ने अपने विचार पेश किए थे। इन विचारों को जानने की लोगों में इतनी उत्सुकता रही कि लोगों ने जा-जाकर KRK को यूट्यूब पर तलाशा और उनको सब्स्क्राइब करने लगे। इतना ही नहीं, KRK के रोचक और महीन जानकारियों से भरपूर फिल्म रिव्यु देखने वालों का भी एक बड़ा फैन वर्ग है। फिल्म रिलीज बाद में होती है और दर्शक रिव्यु के लिए KRK के पास
पहले पहुँच जाते हैं।

फिल्म रिव्यु के मामले में KRK को एक ही बार ट्रैफिक और TRP से जूझना पड़ा था, जब दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल नए-नवेले मुख्यमंत्री हुआ करते थे। लेकिन फिर अरविन्द केजरीवाल को जबसे सड़कों पर कंटाप पड़ने लगे उन्होंने फिल्म रिव्यु देने ही बंद कर दिए और KRK के यूट्यूब पर आने वाले ट्रैफिक में जबरदस्त बढ़ोत्तरी देखने को मिली।

KRK के बाद यूट्यूब पर दीपक कलाल नाम के एक सज्जन को भी देखने के लिए लोग खूब दैनिक इंटरनेट का हिस्सा खर्च करते हैं। इस प्रकार यह तय कर पाना भी एक बड़ा चैलेंज है कि यूट्यूब पर आखिर किसके लिए लोग ज्यादा दीवाने हैं, KRK या फिर दीपक कलाल?

… लेकिन मैदान में अब एक और सिपाही भी है

अम्बानी द्वारा दिए जा रहे दैनिक सस्ते इंटरनेट का लाभ उठाते हुए कई लोगों ने आजकल ना जाने कितनों की ही आत्ममुग्धता में चार चाँद लगाए हैं। इनमें कुछ कॉन्ग्रेस द्वारा मोदी की इमेज की धज्जियाँ उड़ाने के लिए रखे गए कुणाल कामरा जैसे सस्ते कॉमेडियंस हैं, तो कुछ इंटरनेट ट्रोल और आम आदमी पार्टी के प्रोपेगैंडा मंत्री ध्रुव राठी जैसे ‘फैक्ट एंड फिगर्स’ में बात कर के विश्वसनीयता साबित कर चुके लोग भी हैं। मोदी घृणा में इतनी शक्ति है कि फर्जी न्यूज़ फैलाने की ध्रुव राठी की अद्भुत क्षमता को आँकते हुए NDTV और BBC जैसे निष्पक्ष मीडिया संस्थानों ने उन्हें अपना प्रोपेगैंडा पत्रकार बना लिया है।

लेकिन ये सब नए लोग हैं, इनकी आत्ममुग्धता माफ़ की जा सकती है क्योंकि ये लोग कैमरा के सामने नए आए हैं। लेकिन एक ऐसे वयस्क पत्रकार को आत्ममुग्धता ने घेर लिया है, जो दशकों से (जैसा कि उनका लेटेस्ट फेसबुक पोस्ट बताता है) रोजाना TV पर बैठकर दर्शकों से TV ना देखने की अपील करता रहता है। ये नाम है NDTV के वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार।

रवीश कुमार एग्जिट पोल के दिन से ही खुद को और दूसरों का हौंसला बढ़ाते नजर आ रहे हैं। ऑपइंडिया तीखीमिर्ची सेल ने यह भविष्यवाणी कर डाली थी कि रवीश एग्जिट पोल देखकर शायद अब किसी अज्ञात गुफा की ओर ‘कुछ नहीं रखा है दुनियादारी में’ कहते हुए रवाना हो जाएँ। ऐसा ही हुआ भी। वो एग्जिट पोल के दिन से ही लोगों से लम्बी साँसे खींचकर श्वसन करने की अपील कर रहे हैं। ताकि कम से कम एग्जिट पोल और 23 तारीख के बीच के समय को तो इस वहम में गुजार सकें कि कोई मोदी लहर इस देश में नहीं है और मोदी दोबारा प्रधानमंत्री नहीं बन रहे हैं।

यूँ ही नहीं मैं जीरो TRP एंकर बन जाता हूँ

रवीश ने आज एक फेसबुक पोस्ट लिखा है और अभी उम्मीद है कि वो इसका भी विभिन्न भाषाओं में अनुवाद करवाएँगे। लेकिन मैं हिंदी का पाठक हूँ और मैने बिना चतुराई दिखाए ही इस पोस्ट को समझ लिया है। एग्जिट पोल्स के नतीजों तक को वहम मानकर चल रहे रवीश कुमार के पास अब आखिरी विकल्प यही बच गया है कि वो घर बैठकर अपनी लोकप्रियता का हिसाब लगाएँ।

इस लेख को पढ़कर ही पता चल जाता है कि यह वरिष्ठ पत्रकार ना ही विद्यार्थियों के लिए चिंतित हैं, ना ही इन्हें सत्ता पक्ष और विपक्ष से फर्क पड़ता है। यह पत्रकार संन्यासी किस्म का है, जो अब सिर्फ भाड़ में जाए दुनियादारी कहकर खुद तक सीमित हो चुका है। रवीश कुमार यहाँ पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पीछे छोड़ चुके हैं। नरेंद्र मोदी को लेकर उनके कैमरा पर नजर आने को खूब मुद्दा बनाया गया है। रवीश कुमार पर इससे एक कदम आगे जाते हुए अपने यूट्यूब चैनल्स के व्यूज तलाशने का जुनून सवार हो चुका है। लेकिन जिस पत्रकार को देशवासियों ने सर पर बिठाया था, जिसे लोग TV पर देखने को उत्साहित रहते थे, वो पत्रकार अपनी पहचान यूट्यूब में क्यों समेट रहा है?

रवीश का कहना है कि EVM पर उनके शो को यूट्यूब पर जमकर देखा जा रहा है। उन्हें यह ध्यान देना चाहिए कि यूट्यूब पर KRK और दीपक कलाल को भी खूब देखा जाता है। इस तरह से अब तीन लोग यूट्यूब पर अम्बानी द्वारा दिए जा रहे दैनिक सस्ते इंटरनेट से जमकर देखे जाएँगे; KRK, दीपक कलाल और वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार।

इन तीनों में एक बात कॉमन है, लोग इन तीनों को करतब दिखाते देखना पसंद करने लगे हैं। लोग इन्तजार करते हैं कि कब ये तीनों कोई नया करतब दिखाएँ और वो सब वाह-वाही करते हुए इनके मजे लूट सकें। रवीश कुमार अब व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी के कुलपति होने के साथ-साथ ट्रोलाचार्य भी हो चुके हैं। अब उन्हें कला दिखाते रहना होगा वरना वो भुला दिए जाएँगे। वो उसी तरह से भुला दिए जाएँगे जिस तरह से उन्होंने रवीश को भुला दिया।

रवीश कुमार का त्याग बड़ा है, उन्होंने ट्रोलाचार्य बनने के लिए ‘रवीश की रिपोर्ट’ वाले रवीश को नकार दिया। रवीश ने उस रवीश की केंचुली को सिर्फ इसलिए उतार फेंका है क्योंकि वो अब घृणा में बहुत दूर निकल चुके हैं। रवीश कुमार की पत्रकारिता में विश्वास करने वाला मेरे जैसा दर्शक उनको यूट्यूब पर अपने व्यूज पर खुश होता देख निराश है।

वास्तव में देखा जाए तो रवीश के प्रशंसक का प्रेम में धोखा खाए प्रेमी जैसा हाल है। प्रेमिका अब बदल चुकी है, उसे प्रेमी के साथ कुछ भी अच्छा नहीं लगता। अब प्रेमी दफ्तर से छुट्टी लेकर प्रेमिका को लाजपत नगर में शॉपिंग करवाना चाहता है, लेकिन प्रेमिका को सरोजिनी नगर ही जाना है। रवीश कुमार की पत्रकारिता ने उनके प्रशंसकों के साथ ऐसा धोखा किया है, जिससे उनका प्रेमी प्रशंसक अब उबर नहीं पाएगा और ना ही किसी और खुदको पत्रकार कहने वाले पर यकीन कर पाएगा।

रवीश अब अपने दर्शकों से लगभग ब्रेकअप को उतारू प्रेमिका की तरह ब्लॉक करने लगे हैं, वो कहने लगे हैं कि तुम्हारी ही सब गलती थी, तुमने मुझे TRP नहीं दी, तुमने मेरे एजेंडा को प्राथमिकता नहीं माना। जब मुझे तुम्हारी जरूरत थी, तब तुम देशभक्त हो गए।

रवीश कुमार पत्रकारिता की निराशा हैं। उन्हें जो यूट्यूब व्यूज के नंबर अपनी प्रशंसा लग रही है असल में ये वो लोग हैं जो रवीश कुमार का चेहरा देखना चाहते हैं। लाख बार EVM को कोसने और फासीवाद, लोकतंत्र की हत्या, गोदी मीडिया, बिकाऊ मीडिया चिल्लाने के बाद भी एग्जिट पोल ने उन्हें नकार दिया है। यदि 23 तारीख को एग्जिट पोल वाली भविष्यवाणी सच साबित होती है तो अभी रवीश के यूट्यूब चैनल्स के व्यूज और उछाल मारने वाले हैं।

23 मई को रवीश कुमार को देखने उनका एक एक समर्थक, आलोचक और विरोधी उनको देखना चाहेगा। इसलिए हो सकता है कि वो आँकड़े रवीश कुमार को चौंका दें। सम्भावना यही हैं कि असल ट्रैफिक जीरो टीआरपी एंकर के यूट्यूब चैनल पर 23 मई को आने वाला है, आप कमर कसकर बैठ जाइए। हो सकता है कि 23 मई की शाम तक रवीश कुमार के पास गर्व करने के लिए कम से कम यूट्यूब पर देखे जाने वाले आँकड़े तो होंगे।

अशोक लवासा: कॉन्ग्रेस घोटालों से पुराने सम्बन्ध, चुनाव आयोग के कमिश्नर हैं

इलेक्शन कमिश्नर अशोक लवासा ने पहले भी यह कहकर तूफान उठाने की कोशिश की थी कि वह इलेक्शन कमीशन ऑफ़ इंडिया के भारतीय जनता पार्टी, प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह को मॉडल कोड ऑफ़ कंडक्ट के उल्लंघन पर दिए गए क्लीन चिट के निर्णय से सहमत नहीं हैं। उन्होंने कहा वह तब तक चुनाव आयोग की मीटिंग अटेंड नहीं करेंगे जब तक उनकी असहमति दर्ज़ नहीं की जाती। सुनील अरोड़ा लवासा के इस कमेंट पर टिप्पणी कर चुके हैं।

अब, टाइम्स नाउ की रिपोर्ट, कि लवासा चुनाव आयोग की मीटिंग अटेंड करने के लिए सहमत हो गए हैं, लवासा की असहमति खुद संदेह के घेरे में है।

बता दें कि पूरा का पूरा कॉन्ग्रेस इकोसिस्टम ने लवासा की असहमति का उपयोग यह आरोप लगाने के लिए किया कि इलेक्शन कमीशन बायस्ड है और मोदी, बीजेपी को सपोर्ट कर रही है। इससे पहले राहुल गाँधी भी अशोक लवासा के बोलने से बहुत पहले ही इलेक्शन कमीशन पर बायस्ड होने का आरोप लगा चुके हैं।

चलिए जानते हैं, कौन हैं अशोक लवासा, किसके साथ वह मीडिया में छाए रहे, नीचे उनके और उनके परिवार के बारे में कुछ विशेष खुलासे किए गए हैं।

अशोक लवासा-चिदम्बरम: खास कनेक्शन

1980 बैच के हरियाणा कैडर के आईएएस अधिकारी अशोक लवासा, जिनकी अप्रैल 2009 में पी चिदंबरम के गृहमंत्री के दौर में जॉइंट सेक्रेटरी के रूप में गृह मंत्रालय में एंट्री होती है। 2010 में ही पी चिदम्बरम ने “An Uncivil Servant” नामक अशोक लवासा की किताब का विमोचन भी किया था। इसके आलावा अशोक लवासा और उनकी पत्नी के ‘Travel photo exhibition’ का भी उद्घाटन किया था।

पी चिदंबरम अशोक लवासा और उनकी पत्नी के साथ

यह तस्वीर अभी वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं है। फिर भी तस्वीर के गूगल कैशे वर्जन को यहाँ देखा जा सकता है।

PGurus वेबसाइट का दावा है कि अशोक लवासा UPA सरकार के कई मंत्रियों के चहेते हुआ करते थे। इन सम्बन्धों के बदौलत, इन्हें कई लाभ भी हासिल हुए हैं।

अशोक लवासा की पत्नी का व्यावसायिक समीकरण

अशोक लवासा वित्त मंत्रालय, विदेश मंत्रालय के अलावा हरियाणा सरकार में पावर और रिन्यूएबल एनर्जी में भी थे। अशोक लवासा की पत्नी नॉवेल लवासा ऐसी कई कंपनियों में डायरेक्टर रह चुकी हैं जो रिन्यूएबल एनर्जी के क्षेत्र में काम करती है और अशोक लवासा के कार्यकाल में उनके मंत्रालय से सीधे संपर्क में थी।

PGurus के अनुसार, अशोक लवासा की वाइफ नॉवेल लवासा इंग्लिश में पोस्ट ग्रेजुएट है और 2005 में स्टेट बैंक के मैनेजर के पोस्ट से त्यागपत्र दे चुकीं हैं। उसके बाद से आईएएस ऑफिसर वाइव्स वेलफेयर एसोसिएशन के एक्टिविटीज और कुछ सोशल एक्टिविटीज को मैनेज कर रही थीं। उसके बाद कई कंपनियों में पति के अलग-अलग डिपार्टमेंट में पोस्टिंग के अनुसार डायरेक्टर बनीं।

नीचे, वह कुछ पोस्ट हैं जिन पर अशोक लवासा एक आईएएस अधिकारी के रूप में अपने कार्यकाल में कार्यरत रहे।

अशोक लवासा द्वारा धारण की गई पोस्ट

नॉवेल लवासा, बलरामपुर चीनी मिल्स प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की 6 फरवरी 2015 को डायरेक्टर बनीं। बलरामपुर शुगर मिल न सिर्फ चीनी उत्पादन नहीं बल्कि विद्युत उत्पादन के क्षेत्र में भी सक्रीय रही है।

जब अशोक लवासा की पत्नी चीनी मिल की डायरेक्टर बनीं उस समय अशोक लवासा पर्यावरण मंत्रालय में थे। नॉवेल लवासा, एक कंपनी ‘Omaz Autos Limited’ में डायरेक्टर के रूप में नियुक्त हुईं, जिसका पावर सेक्टर में भी इंटरेस्ट था।

वह एक और कंपनी पॉवेरलिंक्स ट्रांसमिशन लिमिटेड में 2 मई 2017 में डायरेक्टर के रूप में नियुक्त हुईं। कुलमिलाकर, नावेल लवासा ‘Walwhan and Welspun’ ग्रुप की 9 कंपनियों में डायरेक्टर रहीं, जो आपस में कॉमन डायरेक्टर से जुड़ी हैं। इन सभी कंपनियों का इंटरेस्ट रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर में रहा है।

कामनवेल्थ गेम स्कैम से जुड़ाव

ऑपइंडिया के पास शुंगलू कमिटी का वह रिपोर्ट है जिसमें अशोक लवासा की बेटी और बेटे के अनुचित लाभ उठाने की बात कही गई है। शुंगलू कमिटी ने ये साफ बताया है कि सिलेक्शन कमिटी द्वारा अन्वी लवासा के प्रोजेक्ट ऑफिसर (PO) के रूप में चयन में उन्हें उनके पॉवरफुल संबंधों की वजह से फेवर किया गया। जिसका विस्तृत वर्णन यहाँ देखा जा सकता है।

शुंगलू कमिटी रिपोर्ट का एक भाग
शुंगलू कमिटी रिपोर्ट का हिस्सा

पहले अन्वी लवासा को APO के रूप में चुना गया, बाद में प्रमोट कर PO अर्थात प्रोजेक्ट ऑफिसर बनाया गया।

अन्वी लवासा को APO से प्रमोट कर PO बनाया गया , उसका आर्डर

इसी रिपोर्ट में इस बात का भी खुलासा है कि अन्वी लवासा के भाई अबीर लवासा का भी APO के रूप में चयन किया गया।

फिलहाल, अन्वी लवासा कपिल सिब्बल के चैनल के साथ एक अनुबंध के तहत अभी लद्दाख में पोस्टेड हैं।

अबीर लवासा का व्यावसायिक जुड़ाव

अबीर लवासा, अशोक लवासा के बेटे हैं। अबीर लवासा ‘Nourish Organic Foods Private Limited’ कंपनी में 14th November 2017 को डायरेक्टर बने। वहाँ के सूत्रों से ऑपइंडिया को पता चला कि अबीर की नियुक्ति जब हुई थी, ठीक उसी समय दो दूसरे डायरेक्टर्स नरेश कुमार और सीमा जाजोदिया ने कंपनी से त्यागपत्र दे दिया।

यह जानना महत्वपूर्ण है यहाँ सीमा जाजोदिया मोनेट इस्पात से जुड़ी हैं जिस पर 1000 करोड़ रुपए के डिफ़ॉल्ट का आरोप है। SBI के अनुसार, कुल 2243 करोड़ रुपए का स्टील कंपनी द्वारा क्लेम किया गया था जबकि, यह डिफ़ॉल्ट केवल 1539 करोड़ का था।

सीमा जाजोदिया का विवाह मोनेट इस्पात एंड एनर्जी के प्रमोटर संदीप जाजोदिया के साथ हुआ है।

द टेलीग्राफ के अनुसार, “सीमा जजोदिया, जिन्हें मोनेट इस्पात के प्रमोटर के रूप में भी सूचीबद्ध किया गया था, ने 24 अक्टूबर को उपहार के रूप में अपने शेयरों को हस्तांतरित किया लेकिन कंपनी ने 27 जनवरी को ही बाउंस होने की सूचना दी। क्योंकि मोनेट के लिए बिड 12 दिसंबर को बंद कर दी गई थी। यह तुरंत पता नहीं लगाया जा सका है कि जब जाजोदिया को बोनेट्स द्वारा मोनेट के प्रमोटर के रूप में घोषित किया गया था। भूषण स्टील के कर्मचारियों द्वारा दायर एक याचिका दायर की गई थी, जिसमें JSW स्टील एक आवेदक था, ने दावा किया था कि मोनेट में जाजोदिया द्वारा शेयरों का हस्तांतरण एंटीडेटेड था।

मूल रूप से यह आरोप था कि सीमा जाजोदिया ने अपने भाई के जेएसडब्ल्यू स्टील को इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड, 2016 की धारा 29 ए के तहत यह स्पष्ट करने में सक्षम बनाने के लिए मोनेट इस्पात और ऊर्जा को “एंटीडेट” में अपने शेयर हस्तांतरित कर दिए थे। कारण था, बिना ऋण चुकाए स्ट्रेस एसेट्स से कंपनी को बचाना।

आरोप यह भी है कि नौरिश ऑर्गेनिक फूड्स प्राइवेट लिमिटेड में वर्तमान निदेशक नाम के निदेशक हैं और कंपनी का पूरा नियंत्रण अबीर लवासा के पास है।

बोनिता ट्रेडर्स प्राइवेट लिमिटेड नामक कंपनी द्वारा बड़ी संख्या में नूरिश के शेयर कथित तौर पर रखे गए हैं। अबीर लवासा को नौरिश में निर्देशक के रूप में नियुक्त करने से ठीक पहले सीमा जाजोदिया और निकिता जाजोदिया को बोनिता ट्रेडर्स प्राइवेट लिमिटेड में निदेशक के रूप में नियुक्त किया गया था।

वास्कोडिगामा की वो गन जो विपक्ष ने अपना नाम लेकर फायर किया (भाग 3)

विकास का नैरेटिव, विकास जो लोगों को दिखता है

एक लोकतंत्र जब आगे बढ़ रहा होता है, जब उसके लोगों तक सूचनाओं को पाने का तरीक़ा बदलता है, तो लोग जागरूक होने लगते हैं। जब आपके पास सिर्फ़ टीवी या अख़बार का ही विकल्प हो तो आप उसी झूठ को सच मानते रहेंगे क्योंकि आपके पास कोई तरीक़ा है ही नहीं सच जानने का। स्मार्टफ़ोन और इंटरनेट के सस्ते होने का सबसे बड़ा फायदा जनता को यह हुआ कि वो हर सूचना पा सकती थी। उसके हाथों में एक ऐसा ग़ज़ब का यंत्र था जो सही मायनों में सूचना का लोकतांत्रीकरण कर रहा था। वो घर बैठे, विडियो, ऑडियो या पाठ्य के ज़रिए जान सकती थी कि कौन सच कह रहा है, कौन झूठ।

यहाँ पर भाजपा और मोदी ने न सिर्फ़ काम किया बल्कि लोगों को जागरूक भी करते रहे कि किस योजना का लाभ कैसे लिया जाए। हर व्यक्ति पर सरकार लगभग 1,08,000 रुपए प्रति वर्ष ख़र्च कर रही है। और, ऐसा पहली बार हो रहा है कि बिना किसी दलाली आदि के सब्सिडी के पैसे लोगों के खाते में पहुँच रहे हैं। ये मामूली बात नहीं है। योजनाओं की जानकारी पहले मुखिया तक आकर बंद हो जाती थी। अगर आपको जानना है तो जिला मुख्यालय जाइए तो वहाँ बड़े-बड़े पीले बोर्ड पर काले अक्षरों में योजनाओं के नाम हुआ करते थे। किसको मिलेगा, कैसे मिलेगा ये तो बाद की बात है, आपके लिए योजना है, आपको वही पता नहीं चलने दिया जाता था।

वो बात जो पूरी तरह से बकवास है: योजना का नाम बदल दिया

योजनाओं के बारे में पहले खूब माहौल बना कि भाजपा ने तो बस नाम बदल दिया है, ये योजनाएँ तो कॉन्ग्रेस के समय से ही थीं। माहौल बनाना हो तो आप राहुल गाँधी को डिफ़ेंड करते हुए कहलवा सकते हैं कि विपक्ष को मीडिया में जगह नहीं मिली जबकि आधी से ज़्यादा मीडिया स्वयं ही विपक्ष बनी बैठी थी। योजनाएँ बना देने, और किसी महिला को जीवन में शौचालय का उपहार पहुँचा देने में बहुत अंतर है।

वित्तीय समावेषण के नाम से योजना बना देने, और ग़रीबों को बैंकिंग सिस्टम से जोड़ कर, उनके खाते में मनरेगा से लेकर सिलिंडर की सब्सिडी तक का पैसा पहुँचा देने में बहुत अतंर है। योजना बना देने और राजीव गाँधी का नाम लगा देने तथा घरों में बिजली पहुँचाने से लेकर एलईडी लाइट तक लगा देने में बहुत अंतर है। इंदिरा आवास लिख देने और करोड़ों के घर पर पक्की छत ढाल देने में बहुत अंतर है।

योजना ही नहीं, देश भी पहले से ही था, तो क्या काम ही न किया जाए? क्या योजना बना देने से ही काम हो जाता है? या फिर पुरानी योजना पर नए तरीके से काम करना और समाज को लाभ पहुँचाना कोई अपराध है? योजना का नाम ही नहीं, उसके क्रियान्वयन को भी मोदी सरकार ने पूरी तरह से बदला। यही कारण है कि सड़कों के बनने की रफ़्तार से लेकर रेल की पटरियों तक, इस सरकार का काम हर शहर में दिखता है। आप आँख मूँद कर गड्ढे में कूद जाएँ और कहें कि मोदी ने धक्का दे दिया, तो ये आपकी समस्या है।

वास्कोडिगामा की उस गन से इन्होंने अपना ही नाम लेकर फायर कर दिया

मीडिया और विपक्ष की सारी पार्टियों को यह लगा कि उनका ये कैम्पेन रंग लाएगा। इन्हें लगा कि भारत की आम जनता मूर्ख है और उनके द्वारा दिया जा रहा धीमा ज़हर अपना असर लोकसभा चुनावों में दिखाएगा जब इनके नेता रैलियों में लगातार रेंकेंगे। नेता रेंकते रहे, और अंत में माहौल ऐसा है कि ये सही मायनों में गधे साबित हो रहे हैं। इन्होंने अपनी ही विश्वसनीयता पर प्रहार कर लिया है। इनका प्रपंच लोगों द्वारा नकारा जा चुका है, और लोगों ने इन्हें एक सीख दे दी है कि मीडिया का काम राहुल गाँधी की भव्य छवि का निर्माण करना नहीं है, बल्कि सच को सच, और झूठ को झूठ कहना है। जबकि, मीडिया ने विपक्ष के झूठ को सच और सत्ता के सच को झूठ की तरह दिखाने की कोशिश की।

इसके बाद इन्होंने एक दो मुद्दे ऐसे पकड़े जो कि भारतीय लोकतंत्र के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। नेताओं ने ईवीएम को लेकर बयान दिए। शुरू में तो कुछ समय यह चला, लेकिन अपनी हार में मशीन को दोष और जीत में राहुल गाँधी की लीडरशिप का कमाल बताना, सबको समझ में आने लगा। लोगों को लिए यह समझना कठिन नहीं था कि अगर भाजपा ईवीएम हैक कर ही सकती है तो हर जगह दो तिहाई बहुमत क्यों नहीं ला रही? अगर ईवीएम हैक हो ही सकता है तो राज्यों के चुनाव में ममता जैसे लोग कैसे जीत जाते हैं?

इस लेख के बाकी तीन हिस्से यहाँ पढ़ें:
भाग 1: विपक्ष और मीडिया का अंतिम तीर, जो कैक्टस बन कर उन्हीं को चुभने वाला है
भाग 2: ज़मीर बेच कर कॉफ़ी पीने वाली मीडिया और लिबटार्डों का सामूहिक प्रलाप
भाग 4: लिबरलों का घमंड, ‘मैं ही सही हूँ, जनता मूर्ख है’ पर जनता का कैक्टस से हमला

ज़मीर बेच कर कॉफ़ी पीने वाली मीडिया और लिबटार्डों का सामूहिक प्रलाप (भाग 2)

मीडिया और डर की खेती

आपको मीडिया के उन्हीं लोगों ने पागल बनाया है जिन्हें आप आदर्श मानते रहे। ऑल्टरनेट जर्नलिज़्म के नाम पर एक पूरी लॉबी खड़ी की गई, जिसका पूरा मक़सद घृणा का माहौल बनाना था। आप याद कीजिए कि कितनी बार आपको उन्हीं मीडिया के लोगों ने बंगाल की हिंसा, वहाँ के दंगों पर उसी मात्रा में रिपोर्टिंग की जितनी रोहित वेमुला, नजीब अहमद, अखलाक, गौरी लंकेश की हत्या पर हुई?

क्या बिहार का राजदेव रंजन पत्रकार नहीं था? फिर क्या कारण है कि बाईस पत्रकारों की हत्या पर एक ट्वीट तक न करने वाले लोग किसी गौरी लंकेश की हत्या पर सड़क पर उतर आते हैं, और कोर्ट से पहले आपको बताते हैं कि इसमें सीधे संघ या मोदी का ही हाथ है? क्या कारण है कि आपके पास सिर्फ ‘ख़ास समुदाय’ के नाम वाले लोगों की मौत की ही ख़बर पहुँचती है और नारंग, पुजारी, राजीव, अंकित जैसे दसियों नाम इस तरह नकारे जाते हैं कि गूगल का एल्गोरिदम भी उन्हें ढूँढे में समय लगाता है? आप ये समझिए कि इन हत्याओं को आप सर्च भी नहीं कर पा रहे क्योंकि इस पर उतनी बात ही नहीं हुई। क्या ये मौतें साम्प्रदायिक नहीं थीं? क्या इस्लामी भीड़ द्वारा हिन्दू की हत्या कम जघन्य हो जाती है?

फिर समुदाय विशेष की मौत को आगे किया जाता रहा और माहौल बनाया गया कि लोगों में डर का माहौल है। एंकर स्टूडियो के भीतर इस तरह का चेहरा लेकर आने लगा कि उसे स्टूडियो के बाहर कुछ हिंदुओं ने थप्पड़ मार कर चेहरा सुजा दिया है। एंकर इस तरह से मरा हुआ मुँह लेकर बैठने लगा, और भद्दे ग्राफ़िक्स की मदद से आपको बताने लगा कि हत्या तो बस ख़ास समुदाय की ही हो रही है, और कैसे डर फैलाया जा रहा है।

जबकि, असल मायनों में डर की खेती तो इन्हीं लोगों ने की। इन लोगों ने सोते-जागते इन बातों को इतनी बार बोला कि सामान्य आदमी उन्माद में आ गया कि सच में ये सरकार यही कर रही है। आखिर आप करेंगे भी तो क्या? अगर बार-बार आपको वही चेहरा दिखे, वैसे ही ट्वीट मिलें, वैसे ही लेख पढ़ना पड़े तो आप तो सोचेंगे ही कि देश में चल क्या रहा है! जबकि आप अपने ऑफिस में, अपने घरों के आस-पास वही माहौल देख रहे होंगे जो सालों से है। लोग शांत हैं, अपना काम कर रहे हैं। लेकिन मीडिया ने इस क़दर धावा बोला कि आपके लिए सूचना के लिए वास्तविक दुनिया से ज़्यादा सही ये आभासी लोग हो गए, जिन्होंने आपको जबरदस्ती बताया कि तुम्हारे पड़ोस का आदमी तुमको कल सुबह सब्जी के ठेले पर काट देगा।

यही अचीवमेंट रही इस मीडिया की। इन्होंने छोटे अपराधों को वैश्विक स्तर तक कवर किया, जहाँ अपराधी हिन्दू था। कठुआ की पीड़िता पर हुए अपराध का ज़िम्मा शिव के त्रिशूल तक चला गया, लेकिन ग़ाज़ियाबाद की पीड़िता के बलात्कार करने वाले मौलवी का पाप किसी लाउडस्पीकर युक्त मीनार पर नहीं टँगा। क्यों? क्योंकि मतलब कठुआ की पीड़िता से कभी था ही नहीं। मतलब मजहबी रंग देने से था।

बड़े मीडिया संस्थानों ने बड़ी ही सूक्ष्म चालाकी से किसी बलात्कारी मौलवी को ‘प्रीस्ट’ लिख कर प्रतीकात्मक चित्र में हिन्दू संत की तस्वीर लगा दी। कोई अल्पसंख्यक, सामान्य सामाजिक अपराध का शिकार हुआ तो उसकी पहचान को हेडलाइन में ऐसे दिखाया गया जैसे कि उसके मजहब के कारण ही उस पर हमला हुआ हो। लेकिन, जिन मामलों में किसी के हिन्दू होने के कारण ही उस पर हमला हुआ हो, वहाँ अपराधियों की पहचान छुपा ली गई। आज भी, अगर आपको किसी ख़बर में, शुरु से अंत तक अपराधी का नाम न मिले, तो आपको समझ जाना चाहिए कि अपराधी किसी मज़हब विशेष का ही होगा। आप सर्च कर लीजिए उस घटना का नाम, किसी छोटे पोर्टल पर आपको सही नाम मिल जाएँगे।

मीडिया ने डर की खेती की, उसे अपने प्रपंचों से सींचा। रतजगा कर के इनके मठाधीशों ने रोजगार के आँकड़ों को नकारा, छोटी झड़पों को दंगा कहा, दंगों पर बात ही नहीं की, भाजपा कार्यकर्ता की हत्या को ऐसे नॉर्मल बनाया कि दूसरे पार्टी के लोगों की भी हत्या हुई है, तो ये तो चलता है। मीडिया का वो हिस्सा, जो अपने आप को स्वघोषित तौर पर आदर्श, निष्पक्ष और महान कहता रहा, उसने इस पूरे चुनाव में लोगों को सिर्फ ठगा है।

इस लगातार चलते रहे झूठ का असर

इस झूठ का असर यह हुआ कि लोगों ने मीडिया पर विश्वास करना बंद कर दिया। उनके लिए व्हाट्सएप्प पर आने वाले मीम और झूठी सूचनाएँ ही सत्य बन कर दिखने लगीं। इस निराशा से नकारात्मकता और अनभिज्ञता से उपेक्षा का जन्म हुआ, जिसका असर यह हुआ कि अफ़वाहों को सच माना जाने लगा। इसका फायदा भी जितना मोदी को विरोधियों ने उठाया, उतना किसी ने नहीं। पिछले साल का अप्रैल याद कीजिए, जब चौदह लोगों की जान एक ऐसे आंदोलन ने ले ली, जिनका संचालन ‘दलित’ कर रहे थे। दलित का मतलब होता है वो लोग; जिनका दमन किया गया हो।

आप जरा सोचिए कि ये लोग सड़कों पर कैसे उतर आए? क्या इन्होंने तय किया कि अब बहुत हो गया, आंदोलन किया जाए? जी नहीं। इनके व्हाट्सएप्प ग्रुपों में यह बात फैलाई गई कि सरकार ने आरक्षण ख़त्म करने का ऐलान किया है। जबकि सही ख़बर यह थी कि सुप्रीम कोर्ट में SC/ST कानून पर चर्चा हुई और कोर्ट ने माना कि इनके कई प्रावधान ऐसे हैं, जिससे ‘नेचुरल जस्टिस’ के आदर्शों को ठेस पहुँचती है। अतः, उन्हें सही करना ज़रूरी है। लोगों में बात फैला दी गई कि आरक्षण ख़त्म हो रहा है, सड़कों पर लोग उतरे और आग लगा दी। फिर कहा गया कि आंदोलन सफल रहा। जितनी हिंसा, उतनी ज़्यादा सफलता होती है ऐसे आंदोलनों की।

मीडिया और विपक्ष ने एक दूसरे के पूरक का रोल निभाया और जनता को लगातार बेवक़ूफ़ समझ कर एक के बाद एक वाहियात काम किए। इसका परिणाम यह रहा कि लोगों ने मीडिया को मृत मान कर सोशल मीडिया की तरफ रुख़ किया। इसके कारण गिरोह के प्रमुख अखबारों, पोर्टलों, चैनलों को देखने वाले कम होते गए, और जो बचे, उनमें से भी अधिकतर वैसे लोग थे जो इसलिए देखते थे कि आज इन्होंने क्या प्रपंच बेचा है।

क्रेडिबिलटी का अभाव विपक्ष के नेताओं तक पहुँचा

पार्टियों ने सोचा कि मीडिया भी उनके साथ है और वो एक दूसरे के लिए मैग्निफायर का काम करेंगे तो जनता उन्हें सच मान लेगी। इस मूर्खता का ख़ामियाज़ा उन्होंने कई बार भुगता जब नोटबंदी पर बाँटे गए प्रपंच को लोगों ने नकार दिया और उत्तर प्रदेश में भारी बहुमत से भाजपा की सरकार बनी। उसी तरह जीएसटी जैसे पाथब्रेकिंग टैक्सेशन सिस्टम पर जम कर बेहूदगी की गई, लेकिन चुनावों में लोगों ने कई राज्यों में भाजपा को बहुमत दिया।

इन मुद्दों को जनता ने लगातार नकारा लेकिन विपक्ष पता नहीं किस ख़ुमारी में था कि इसी की डुगडुगी बजाता रहा और मीडिया भी हो-हो करते हुए इनके पीछे लगी रही। क्या पार्टियों के योजनाकारों को यह बात नहीं दिखी कि लोगों ने उनकी इस योजना को नकार दिया? या वो हिटलर के प्रोपेगेंडा मंत्री के नक़्शेक़दम पर चलने का ठान कर इस कार्य में लगे रहे कि ‘एक झूठ पकड़ो, उसे लगातार बोलते रहे, अतंतः लोग उसे सच मान लेंगे’। यही हुआ लेकिन लोगों ने उसे सच नहीं माना क्योंकि लोगों को सोशल मीडिया के साथ-साथ सही मायनों में ऑल्टरनेटिव मीडिया के दर्शन होने शुरु हो गए।

जबकि, इनकी चालाकी देखिए कि जितनी बातें इन्होंने भाजपा और मोदी के सर पर फेंकी है, वो सारे काम, बहुत ही सहजता और धूर्तता से यही मीडिया वाले खुद ही करते रहे। आपातकाल कह-कह कर इन्होंने इस भयावह शब्द और दौर को मजाक बना दिया। ‘डर का माहौल’ इन्होंने इतना ज़्यादा बाँट दिया कि लोगों ने उसे सामान्य मान कर आगे बढ़ना शुरु कर दिया। कुल मिला कर विपक्ष के पूरे कैम्पेन को अगर किसी ने पटरी से उतारा, तो वह है यहाँ की मेनस्ट्रीम मीडिया का वह हिस्सा जिसने घृणा में डूब कर घटिया पत्रकारिता की।

इस लेख के बाकी तीन हिस्से यहाँ पढ़ें:
भाग 1: विपक्ष और मीडिया का अंतिम तीर, जो कैक्टस बन कर उन्हीं को चुभने वाला है
भाग 3: वास्कोडिगामा की वो गन जो विपक्ष ने अपना नाम लेकर फायर किया
भाग 4: लिबरलों का घमंड, ‘मैं ही सही हूँ, जनता मूर्ख है’ पर जनता का कैक्टस से हमला

लिबरलों का घमंड, ‘मैं ही सही हूँ, जनता मूर्ख है’ पर जनता का कैक्टस से हमला (भाग 4)

EVM और चुनाव आयोग की बात

ईवीएम एक मशीन है। मशीनें खराब होती हैं। लेकिन खराब मशीनों से चुनाव नहीं होता। चुनाव आयोग ने कई बार कहा है कि उनके 5% मशीनों के खराब होने की दर है, जिसके लिए वो रिज़र्व में उतनी ही मशीनें लेकर चलते हैं ताकि किसी भी ऐसी स्थिति में चुनाव शांतिपूर्ण तरीके से कराया जा सके। हम और आप, सबने, फ़लाँ जगह ईवीएम खराब हुआ, एक ही पार्टी को वोट जा रहे हैं, जैसी खबरें सुनी हैं। ये खबरें सच होती हैं।

जो ख़बर आप नहीं सुन पाते वो यह है कि उन मशीनों को बदला गया, और चुनाव सही तरीके से हो गया। जहाँ तक हैकिंग की बात है, तो वो संभव नहीं है। चुनाव आयोग ने सबको बुलाया और कहा कि वो हैक करके दिखा दें, तो लोग पहुँचे ही नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया है क्योंकि वो संतुष्ट हैं।

ईवीएम के तीन हिस्से होते हैं, जिसमें बैलेट यूनिट, कंट्रोल यूनिट और वीवीपैट होते हैं। वीवीपैट में आपको तीन सेकेंड तक एक पर्ची दिखती है कि आपने जो वोट डाला है, वो उसी पार्टी को गया जिसका आपने बटन दबाया था। बैलेट यूनिट पर आप उँगली से दबाते हैं, कंट्रोल यूनिट बाहर अधिकारी के पास होता है जो आपको वोट देने के लिए निर्देश देता है।

इसकी प्रक्रिया इतनी जटिल है कि पहले के दो स्तर तक किसी को पता नहीं होता कि किस बैलट यूनिट के साथ कौन सी कंट्रोल यूनिट जाएगी। इसलिए आप वहाँ छेड़-छाड़ करके भी कुछ नहीं पाएँगे। फिर, जिला मुख्यालयों में हर ईवीएम से, सारे पार्टियों के पोलिंग एजेंट की मौजूदगी में छद्म-वोटिंग कराई जाती है ताकि सबको तसल्ली हो जाए कि सारी मशीन ठीक हैं। यहाँ कई मशीनें खराब निकलती हैं, जिनको बदल दिया जाता है। उसके बाद, जब बूथ तक मशीन पहुँच जाती हैं, तो वोटिंग शुरु होने से पहले, हर बूथ पर, हर पार्टी के एजेंट की मौजूदगी में फिर से मॉक-वोटिंग होती है कि फिर से देख लिया जाए, सारी मशीनें ठीक काम कर रही हैं।

ये इसलिए होता है कि सबको संतुष्टि भी मिल जाए कि कोई गड़बड़ी नहीं है, और दूसरी बात यह कि मशीन है, आने-जाने में, हो सकता है कि बिगड़ जाए, तो सब लोग जब तक देख न लें, वोटिंग शुरु नहीं होती। इतने स्तर की प्रक्रिया के बाद ईवीएम अपना काम शुरू करती है। जब आम लोगों तक इस तरह की जानकारी पहुँचने लगे, तो उन्होंने भी इस नैरेटिव को नकारना शुरु किया। साथ ही, कई राज्यों में गैर-भाजपा सरकार बनने से भी लोगों ने माना कि हैकिंग की बात गलत है।

नई नौटंकी: स्ट्रॉन्ग रूम के पास लोग घूम रहे हैं

चूँकि, ईवीएम हैकिंग की बात अब विपक्ष की छवि बनाने में व्यस्त मीडिया भी नहीं कर रहा, तो अब नया नैरेटिव बनाने की ज़रूरत पड़ी। नया नैरेटिव मध्य प्रदेश चुनावों के समय में पहली बार जनता के बीच आया था। वो नैरेटिव था कि कुछ लोग स्ट्रॉन्ग रूम, जहाँ चुनावों के बाद ईवीएम रखे जाते हैं, वहाँ घूमते पाए गए। इसमें इनके पास कोई सबूत नहीं होता, बल्कि इन्हें लगता है कि अगर हारेंगे तो यही नैरेटिव चलाया जाएगा ताकि अविश्वास का माहौल बने। बात यह हुई कि कॉन्ग्रेस वहाँ जीत गई और फिर इस नौटंकी को सब भूल गए।

अब लोकसभा चुनावों के सातों चरण निपट गए, एग्जिट पोल में भाजपा को पूर्ण बहुमत की बात हो रही है, तो विपक्ष ने फिर से लोगों में अविश्वास फैलाने की कोशिश की है। ट्विटर और फेसबुक पर तस्वीरों शेयर की जानें लगीं कि गाड़ियों में ईवीएम भर कर कहीं ले जाया जा रहा है। कहीं पर यह कहा गया कि स्ट्रॉन्ग रूम में भाजपा वाले फ़लाँ रात को घुसने वाले हैं, इसलिए चौकसी बढ़ाई जाए।

इसमें दो समस्याएँ हैं। पहली यह है कि स्ट्रॉन्ग रूम में कैमरे से लगातार निगरानी होती है, हर ईवीएम आदि की पूरी विडियो रिकॉर्डिंग होती है, हर पार्टी को प्रतिनिधि की वहाँ मौजूदगी रहती है, अतः ये सब कहना कि वहाँ कुछ होने वाला है, महज़ डर फैलाने की बात है, और कुछ भी नहीं।

दूसरी बात, जब ईवीएम कहीं गए हैं, तो वहाँ से आएँगे भी। उसमें पैर तो हैं नहीं कि बूथों से वो खुद चल कर आएँगे। उन्हें किसी गाड़ी पर रखा जाएगा और वो गाड़ी जिला मुख्यालय जाएगी, वहाँ से कहीं और जाएगी। इस पूरी प्रक्रिया में, हर तरह की गाड़ियों का प्रयोग होता है। छोटी ट्राली से लेकर ट्रक तक। ये किसी जासूस फिल्म की तरह अंधेरे में नहीं लोड होते। अतः, आपको कुछ लोग ऐसी गाड़ियों की तस्वीरें भी शेयर करते नजर आ जाएँगे।

साथ ही, कई बार जिन गाड़ियों की दलील दी जाती है, उनमें ईवीएम नहीं, उनका खाली बक्सा ही रहता है। अब बक्सों के भीतर क्या है, ये जानने की दिलचस्पी न तो नेता में होती है, न जनता में। आपको किसी ने कह दिया कि देखो ट्रक पर ईवीएम है, ये कहाँ जा रहा है। आप भी पूछने लगते हैं कि देखो ट्रक पर ईवीएम है, ये कहाँ जा रहा है! आप अपने कॉमन सेन्स को कहीं परचून की दुकान पर भेज देते हैं, और फिर जो कुछ कहा जा रहा है, लपक लेते हैं।

ये तीर अब विपक्ष को ही लगा है, वो भी इनकी देख-रेख में

हवाई कैम्पेन और झूठ, सनसनी जैसी 1980 के काल की राजनीति से 2019 का चुनाव जीतने निकले विपक्ष को मीडिया ने नुकसान ही पहुँचाया। मीडिया की क्रेडिबिलिटी अगर खराब भी हुई तो, यहाँ तो दूसरा मीडिया तैयार था, लेकिन विपक्ष ने जो अपनी विश्वसनीयता खोई है, उसे पाने की ये लोग सोच भी नहीं रहे। ये इस फ़िराक़ में हैं कि 23 को कैसे, क्या किया जाए कि परिणाम इनकी तरफ हो जाए, या इन्हें कुछ समय मिल जाए।

इसलिए अब ये अपनी तरकश का अंतिम तीर लिए घूम रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 50 और 100% वीवीपैट वाली याचिकाओं को ख़ारिज कर दिया, तो ये नई बातें फैला रहे हैं। कुछ लोग यह लिख रहे हैं कि अगर सुप्रीम कोर्ट ही ऐसे कर रहा है तो फिर लोगों का विश्वास टूट जाएगा। कुछ लोग यह लिख रहे हैं कि चुनाव आयोग बिक गया है, मोदी के हिसाब से चल रहा है। जबकि अगर देखा जाए तो राहुल गाँधी ‘आदिवासियों को गोली मार सकती है मोदी सरकार’ पर क्लीन चिट पा जाते हैं, और योगी पर 72 घंटे का बैन लग जाता है, तो चुनाव आयोग तो दूसरी तरह से खेलती नजर आ रही है। बंगाल पर चुनाव आयोग की चुप्पी तो अलग स्तर की ही थी। इसके साथ ही फ़िल्मों पर बैन से लेकर शादी के कार्ड पर पार्टी के लिए सपोर्ट जुटाने वालों पर संज्ञान लेने तक चुनाव आयोग इस बार तो विचित्र तरीके से पेश आया है।

इन लोगों को आशा थी कि सुप्रीम कोर्ट तो चार बजे भी ‘लोकतंत्र की हत्या हो रही है’ के चक्कर में खुल जाएगा, तो इन्हें कुछ और टाइम मिल जाएगा नए प्रपंच गढ़ने में। लेकिन कोर्ट ने नकार दिया तो अब ये लोग कोर्ट और आयोग पर ही हमला बोल रहे हैं। वहीं आयोग जिसने इन्हें कई राज्यों में सत्ता दिलाई, इन्हीं ईवीएम की मदद से, वो भी उन राज्यों में जहाँ भाजपा सत्तारूढ़ थी।

‘मैं नहीं खेल रहा’ से लेकर ‘जनता मूर्ख है’ तक

इसलिए विपक्ष अब उस नकारे, उद्दंड बच्चे की तरह आचरण कर रहा है जो हारते वक्त लूडो की सारी गोटियाँ इधर-उधर फेंक कर भाग जाता है। अब चुनाव आयोग की निष्पक्षता से लेकर सुप्रीम कोर्ट की अथॉरिटी पर सवाल बस इसलिए किए जा रहे हैं कि परिणाम इनके हिसाब से नहीं आ रहे। इन्हें अपनी निकृष्टता पर अभी भी विश्वास नहीं हुआ है, ये डिनायल मोड में हैं कि इनकी हार के लिए ये खुद ज़िम्मेदार नहीं है।

मशीनों पर ज़िम्मा फेंकते हुए असफल रहने पर एक एलीट और एन्टायटल्ड हिस्सा नई बातें करने में व्यस्त है। अब वही हो रहा है जिसे अंतिम (कु)तर्क कह सकते हैं: जनता ही पागल है जो मोदी जैसे को सत्ता दे रही है! दुर्भाग्य से भारत में अभी भी अजीत भारती के भी वोट का उतना ही मान है, जितना एपीजे अबुल कलाम साहब का था।

एक घमंड है इन पार्टियों के समर्थकों और मोदी के विरोधियों के भीतर। वो घमंड यह है कि वो जो सोचते हैं, वो जिन्हें चाहते हैं, उन्हें अगर बहुमत नहीं मिल रहा तो जनता पागल है। ये अभिजात्य मानसिकता, ये निम्न स्तर का दंभ, उसी तरीके से दिमाग में चढ़ता है जैसे सत्ता में होने पर पावर का नशा। दो-चार अक्षर पढ़ जाने वाले लोग, कुछ बड़े नामों की नौकरी करने वाले लोग, सोशल मीडिया पर दस-पचास लाइक से आह्लादित होने वाले लोग, ये घमंडी ब्रीड यह सोचने लगती है कि अगर उनकी बातों से कोई इत्तेफाक नहीं रखता तो वो मूर्ख है, जो आगे भुगतेंगे।

ये मानवीय कमजोरी है जिसे एक मुहावरे में ‘खिसियानी बिल्ली खम्भा नोंचे’ से उल्लेखित किया जा सकता है। जब आप किसी चीज को दिल से चाहें, और कायनात मदद के लिए न आए, तो पूरी कायनात ही महामूर्खों की मंडली हो जाती है। तब आप उन्माद में, अपने एरोगेन्स में, इस बात को स्वीकार ही नहीं पाते कि आपने… स्वयं आप ने, आप जैसे समझदार, महान, आदर्श विभूतिए ने, कुछ सोचा और भारत की 42% जनता आपके हिसाब से नहीं चल रही, तो ये देश का, समाज का, ओर पूरी मानवता का दुर्भाग्य हो जाता है।

फिर आप ऐसी बहकी-बहकी बातें करने लगते हैं जिनमें उस व्यक्ति की छवि दिखती है जो अपना काम न होने पर श्राप देने लगता है कि तुम्हारे घर में आग लगे, तुम्हारे बच्चे मर जाएँ, तुम्हें राह चलते कुत्ता काट खाए…

यही है वो अंतिम तीर। ये तीर है अवसाद का, ये तीर है उन्माद के चरम का। ये तीर विपक्ष और उनके समर्थकों ने अपने हाथ में लिया है, और गुस्से में अपने शरीर के तमाम हिस्सों में घुसेड़ लिया है क्योंकि उनके लिए अपने आप को गलत होते देखना, और लोकतंत्र के प्रतिभागी नागरिकों के बड़े प्रतिशत का उनके हिसाब से नहीं चलना, बहुत ही कष्टकारी है। कितना कष्टकारी? बहुत कष्टकारी, बहुत ज़्यादा…

इसलिए, मुन्नी बेगम को सुनिए, और उसे फ़ॉलो कीजिए कि

आवारगी में हद से गुज़र जाना चाहिए
लेकिन कभी-कभार तो घर जाना चाहिए…

इस लेख के बाकी तीन हिस्से यहाँ पढ़ें:
भाग 1: विपक्ष और मीडिया का अंतिम तीर, जो कैक्टस बन कर उन्हीं को चुभने वाला है
भाग 2: ज़मीर बेच कर कॉफ़ी पीने वाली मीडिया और लिबटार्डों का सामूहिक प्रलाप
भाग 3: वास्कोडिगामा की वो गन जो विपक्ष ने अपना नाम लेकर फायर किया

मालेगाँव ब्लास्ट: विशेष अदालत ने साध्वी प्रज्ञा समेत दो अन्य को पेशी से छूट दी

मालेगाँव ब्लास्ट मामले में सुनवाई कर रही NIA की विशेष अदालत ने मामले के आरोपितों प्रज्ञा सिंह ठाकुर, लेफ़्टिनेंट कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित और सुधाकर चतुर्वेदी को कोर्ट में पेशी से छूट दे दी है। इन तीनों ने निजी समस्याओं और परेशानियों का ज़िक्र करते हुए अदालत से रियायत की माँग की थी।

ख़बर के अनुसार, भोपाल से बीजेपी की उम्मीदवार साध्वी प्रज्ञा और मिर्जापुर से निर्दलीय उम्मीदवार सुधाकर चतुर्वेदी ने अपनी याचिकाओं में चुनाव के दौरान अपनी व्यस्तताओं का हवाला दिया था। इनके अलावा कर्नल पुरोहित ने अपनी कुछ व्यक्तिगत परेशानियाँ बताई थीं। कोर्ट ने इन तीनों को पेशी से छूट तो दी ही इसके अलावा आरोपियों के वकीलों को विस्फ़ोट वाली जगह पर जाने की अनुमति भी दी।

हाल ही में, मुंबई की विशेष NIA कोर्ट ने मालेगाँव ब्लास्ट के आरोपितों के ख़िलाफ़ सख़्त रवैया अपनाया था। दरअसल, कोर्ट का यह सख़्त रवैया आरोपितों के कोर्ट में उपस्थित न होने के लिए था। पिछले काफ़ी समय से आरोपित कोर्ट में लगातार अनुपस्थित रहे थे, इसलिए कोर्ट ने सभी आरोपितों को सुनवाई के दौरान सप्ताह में एक बार कोर्ट रूम में हाज़िरी लगाने का निर्देश दिया था।

ख़बर के अनुसार, पिछले साल सितंबर में कर्नल पुरोहित पर आरोप तय करने पर स्टे की माँग ख़ारिज कर दी गई थी। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली शीर्ष अदालत की बेंच ने मालेगाँव ब्लास्ट मामले की SIT से जाँच कराने की याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए कहा था कि वो अपनी इस याचिका को ट्रायल कोर्ट में ही दाखिल करें।

इससे पहले साध्वी प्रज्ञा ठाकुर द्वारा चुनाव लड़ने के ख़िलाफ़ भी एनआईए कोर्ट में याचिका दायर की गई थी। एनआईए की स्पेशल कोर्ट ने साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने संबंधी याचिका को ख़ारिज कर दिया था। इस याचिका पर कोर्ट ने फ़ैसला लिया था कि वर्तमान में किसी के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने की ताक़त हमारे पास नहीं है। किसे चुनाव लड़ना है और किसे नहीं, इस बात का निर्णय निर्वाचन चुनाव आयोग करेगा। ऐसी सूरत में मालेगाँव ब्लास्ट की आरोपी साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के चुनाव लड़ने पर रोक नहीं लगाई जा सकती, इसलिए कोर्ट इस याचिका को ख़ारिज करती है। 

ग़ौरतलब है कि मालेगाँव में 29 सितंबर 2008 को एक मस्जिद के पास विस्फोट में 6 लोगों की मौत हो गई थी और 100 से अधिक लोग घायल हुए थे।

EVM को लेकर विपक्ष की नौटंकी जारी, चुनाव आयोग से मिलकर रखेंगे अपनी बात

लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजे आने में अभी वक़्त है और विपक्षी दलों में हलचल का दौर तेज़ हो चला है। ख़बर के अनुसार, मंगलवार (21 मई) को EVM और VVPAT के मुद्दे पर कॉन्ग्रेस, सपा, बसपा, तृणमूल कॉन्ग्रेस समेत सभी दलों के नेताओं ने मिलकर बैठक की। इस बैठक के बाद सभी चुनाव आयोग के पास जाएँगे और वे VVPAT की पर्चियों का मिलान सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार करने और कई जगहों पर स्ट्रांगरूम से EVM के कथित स्थानांतरण से जुड़ी शिकायतों पर कार्रवाई की माँग करेंगे।

बता दें कि विपक्षी दलों ने मतगणना के समय किसी भी मतदान केंद्र पर गड़बड़ी पाए जाने की स्थिति में देशभर में सभी विधानसभा क्षेत्रों में EVM के आँकड़ों के साथ VVPAT मशीन की पर्चियों से मिलान की माँग की थी। इस पर कोर्ट ने मतगणना के समय पूरे देश में हर विधानसभा क्षेत्र के पाँच मतदान केंद्रों के EVM आंकड़ों का मिलान VVPAT की पर्ची से करने के लिए निर्वाचन आयोग को कहा था, जिससे चुनाव के नतीजे आने में देरी हो सकती है।

दिल्ली में हुई इस बैठक में कॉन्ग्रेस से अहमद पटेल, अशोक गहलोत, गुलाम नबी आज़ाद और अभिषेक मनु सिंघवी, माकपा (मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी) से सीताराम येचुरी, तृणमूल कॉन्ग्रेस से डेरेक ओ ब्रायन, तेलुगू देशम पार्टी (TDP) से चंद्रबाबू नायडू, आम आदमी पार्टी (आप) से अरविंद केजरीवाल, सपा (समाजवादी पार्टी) से रामगोपाल यादव, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) से सतीश चंद्र मिश्रा और दानिश अली, द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (द्रमुक) से कनिमोझी, राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) से मनोज झा, राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (राकांपा) से प्रफुल्ल पटेल और माजिद मेमन समेत कई अन्य पार्टियों के नेता भी इस बैठक का हिस्सा थे।

केंद्र में बीजेपी की नेतृत्व वाली सरकार गठित ना हो सके, इस बात को लेकर पूरा विपक्ष एकजुट होता दिख रहा है। फिर भले ही इनके बीच पीएम और डिप्टी पीएम के पद को लेकर शर्तों का दौर लगातार जारी हो। EVM और VVPAT के नाम पर इकट्ठे हुए यह सभी विपक्षी दल केवल बीजेपी को हाशिये पर जाते देखने के इच्छुक है, जो शायद अभी संभव नहीं है। इसकी वजह एग्जिट पोल के वो आँकड़े हैं जो इस बात की ओर इशारा करते हैं कि केंद्र में दोबारा मोदी सरकार बन सकती है। अब यह देखना बाक़ी है कि जब 23 मई को चुनाव के परिणाम घोषित होने के बाद विपक्षी दल कौन-सा मुद्दा उठाएँगे जिस पर वो अपनी सियासत गरमा सकें।