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विंग कमांडर अभिनन्दन को मिल सकता है वीर चक्र, IAF ने प्रस्तावित किया नाम

भारतीय वायुसेना ने विंग कमांडर अभिनन्दन को वीर चक्र से सम्मानित करने का प्रस्ताव दिया है। पाकिस्तानी एफ-16 को मार गिराने और पाकिस्तान की सीमा के अंदर में भी अपने निडर रवैये के कारण भारतीय जनमानस के दिल में बस जाने वाले विंग कमांडर अभिनन्दन को यह पदक उनके अदम्य साहस और वीरता के लिए दिया जा सकता है। हालाँकि इस पर अंतिम निर्णय भारत सरकार को लेना होगा।

विंग कमांडर अभिनंदन के अलावा वायुसेना ने पाकिस्तान के बालाकोट स्थित आतंकी कैम्पों पर एयर स्ट्राइक करने वाले मिराज-2000 लड़ाकू विमानों के 12 पायलटों के लिए भी वायुसेना पदक (Vayusena Medal) प्रदान करने का प्रस्ताव दिया है। बता दें कि वो 27 फरवरी का दिन था जब अभिनन्दन ने पाकिस्तानी विमान को मार गिराया था। विंग कमांडर अभिनन्दन को श्रीनगर से किसी अन्य एयरबेस पर ट्रांसफर भी कर दिया गया है। कश्मीर घाटी में उनकी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया गया। ख़बरों के मुताबिक़, उन्हें वेस्टर्न सेक्टर में एक महत्वपूर्ण एयरबेस पर नियुक्त किया गया है।

ज्ञात हो कि 26 फरवरी को भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान स्थित आतंकी कैम्पों पर एयर स्ट्राइक की थी। इसमें सैकड़ों आतंकी मारे गए थे। पुलवामा में हुए हमले में जैश-ए-मोहम्मद का हाथ सामने आने के बाद ये भारत की तरफ़ से बड़ी कार्रवाई की गई थी। आतंकी ठिकानों पर भारतीय कार्रवाई से बौखलाए पाकिस्तान ने एक दिन बाद भारतीय सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने की हिमाकत की थी जिसमें वे सफल नहीं हो पाए थे। इसी दौरान अभिनन्दन ने पाकिस्तानी विमान का पीछा कर उसे मार गिराया। इस क्रम में उनके मिग बाइसन लड़ाकू विमान में आग भी लग गई थी और वो दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। विमान से इजेक्ट करने में सफल रहे अभिनन्दन पैराशूट से पाकिस्तान की धरती पर लैंड कर गए थे।

पाकिस्तानी सेना ने उन्हें अपने कब्ज़े में ले लिया था। अभिनन्दन के कई वीडियो वायरल हुए थे जिसमें वो पाकिस्तानी सेना के सवालों का निडरतापूर्वक जवाब देते हुए देखा जा सकता है। भारत एवं अंतरराष्ट्रीय समुदाय के दबाव के कारण पाकिस्तान अभिनन्दन को रिहा करने को मज़बूर हो गया था। उनकी रिहाई के दिन पूरे देश में ख़ुशी का माहौल था और उनकी एक झलक पाने को लोग लगातार टीवी से चिपके हुए थे। पाकिस्तान में अभिनन्दन की चाय पीते हुए वीडियो भी वायरल हुई थी। उनकी सकुशल भारत वापसी के बाद उन्हें कुछ दिनों की छुट्टी पर भेज दिया गया था। सुरक्षा कारणों से उनके ट्रांसफर स्थल का खुलासा नहीं किया गया है। अगर वह फ्लाइंग के लिए क्लियर पाए जाते हैं तो उन्हें इसकी भी अनुमति दी जाएगी।

द वायर, कारवाँ, स्क्रॉल में छपी यौन उत्पीड़न वाली ख़बर: रंजन गोगोई ने बताया इसके पीछे बड़ी ताकतें

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने अपने खिलाफ यौन उत्पीड़न का दावा करते हुए दाखिल किए गए शपथपत्र को हास्यास्पद करार दिया है। उन्होंने यह भी दावा किया कि कुछ बड़ी ताकतें अगले हफ्ते सुनवाई होने वाले महत्वपूर्ण मुकदमों से पहले उन्हें असहज करके न्यायपालिका को अस्थिर बनाना चाहती हैं।

अवमानना, मोदी बायोपिक, चुनाव स्थगन हैं महत्वपूर्ण मुक़दमे   

न्यायमूर्ति गोगोई के समक्ष जो मुकदमे अगले सप्ताह सुनवाई के लिए सूचित हैं उनमें सबसे बड़े हैं राहुल गाँधी के खिलाफ अदालत की अवमानना (राफेल मुद्दे पर, भाजपा सांसद मीनाक्षी लेखी द्वारा दायर), प्रधानमंत्री मोदी की बायोपिक की चुनावों के दौरान रिलीज पर रोक (फिल्म निर्माताओं द्वारा निर्वाचन आयोग के आदेश के विरुद्ध दायर) और तमिलनाडु में भारी तादाद में मतदाताओं को रिश्वत दिए जाने का स्वतः संज्ञान ले वहाँ चुनाव स्थगित किए जाने की याचिका। इन सब पर सुनवाई से पहले ही इस मामले (यौन उत्पीड़न) पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की याचिका पर मुख्य न्यायाधीश गोगोई की अध्यक्षता वाली विशेष पीठ एकत्र हुई थी। अपनी याचिका में तुषार मेहता ने 4 ऑनलाइन पोर्टलों द वायर, कारवाँ, स्क्रॉल और लीफलेट में छपी हुई ख़बरों का हवाला देते हुए मामले को सार्वजनिक महत्त्व का बताते हुए संज्ञान लेने की प्रार्थना की थी।

आर्थिक दाग लगा नहीं सकते थे, इसलिए चरित्र-हनन  

गोगोई ने यह भी कहा कि उनका आर्थिक पक्ष पूर्णतः स्वच्छ है और उन पर आर्थिक भ्रष्टाचार का मुकदमा कभी नहीं टिकता। इसलिए इस आरोप के जरिए उनकी छवि बिगाड़ने और न्यायपालिका को अस्थिर करने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि उपरोक्त पोर्टलों द्वारा उन्हें भेजे गए सवालों में समानता से उनके तार आपस में जुड़े नजर आते हैं।

मैं और PMO पूर्णतः स्वतंत्र, करता रहूँगा न्याय कार्यकाल के अंत तक

गोगोई ने साथ में यह भी जोड़ा कि उनका कार्यालय देश के दो सबसे स्वतंत्र कार्यालयों में से एक है (दूसरा उन्होंने प्रधनमंत्री कार्यालय को बताया) और आगामी चुनावी महीने में महत्वपूर्ण मुकदमों की सुनवाई के पहले यह उन्हें अस्थिर करने का प्रयास है।

उन्होंने न्यायिक स्वतंत्रता के भी गंभीर खतरे में होने के प्रति आगाह कराया। उन्होंने कहा, “अगर जजों को इस तरह खलनायक बना कर दिखाया जाएगा तो कौन भला इन्सान जज बनना चाहेगा? कौन जज बनकर महज ₹6.8 लाख के बैंक बैलेंस के साथ रिटायर होना चाहेगा?” गोगोई ने अपने दृढ़ निर्णय को भी दोहराया, “चाहे जो कुछ हो जाए, मैं अपने बचे हुए कार्यकाल के अगले सात महीनों तक मुकदमों का निपटारा करता रहूँगा। कोई मुझे रोक नहीं सकता।”

न्यायमूर्ति गोगोई से जुड़े इस मामले में हमारी पिछली कवरेज आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

बटला हाउस के हीरो एम सी शर्मा को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने सम्मानित किया

बटला हाउस मुठभेड़ के दौरान सबसे आगे रहने वाले बलिदानी मोहन चंद शर्मा को दिल्ली पुलिस ने सम्मानित किया है। शर्मा की फोटो को अब दिल्ली पुलिस के विशेष प्रकोष्ठ के प्रवेश द्वार पर लगाया गया है।

13 सितंबर 2008 को महेश चंद्र शर्मा उस समय आतंकवादियों की गोली से बुरी तरह से घायल हो गए थे जब वो दिल्ली में हुए विस्फोटों से जुड़े आतंकवादियों से मुठभेड़ कर रहे थे। उन्हें सभी आतंकवादियों के जामिया नगर में छिपे होने की सूचना मिली थी। दुर्भाग्य से घटना के दौरान उन्होंने बुलेट प्रूफ जैकेट नहीं पहनी हुई थी। बाद में उनकी मृत्यु हो गई थी।

ख़बर के अनुसार, शर्मा ने फरवरी 2007 में डीडीयू मार्ग पर एक मुठभेड़ के दौरान जैश-ए-मोहम्मद के चार आतंकवादियों को गिरफ़्तार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 2006 में, शर्मा जे एन स्टेडियम के पास एक मोस्ट वांटेड आतंकवादी अबु हमजा के साथ हुई मुठभेड़ में भी शामिल थे।

दिल्ली पुलिस के पूर्व इंस्पेक्टर शर्मा को अशोक चक्र से सम्मानित किया गया था। मोहन चंद्र शर्मा 1989 में दिल्ली पुलिस में सब-इंस्पेक्टर के रूप में भर्ती हुए थे। वे उत्तराखंड के अल्मोड़ा के चौखुटिया मौसी क्षेत्र के मूल निवासी थे। अपनी 19 वर्षों की सेवा देते हुए 19 सितंबर 2008 को वे वीरगति को प्राप्त हो गए।

‘मेरी दादी फुटबॉल में इटली टीम की प्रशंसक थीं’: प्रियंका गाँधी

केरल के एरिकोड में कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका वाड्रा ने एक रैली को संबोधित करते हुए बताया कि उनकी दादी इंदिरा गाँधी फुटबॉल देखती थीं और 1982 विश्व कप फाइनल में उन्होंने इटली टीम के जीतने की दुआ की थी।

प्रियंका ने यह भी दावा किया कि वो ख़ुद भी फुटबॉल प्रशंसक हैं। प्रियंका इतने पर भी नहीं रुकीं उन्होंने आगे कहा कि उनका पूरा परिवार 1982 का विश्व कप फाइनल देख रहा था, तब उन्होंने अपनी दादी से पूछा कि वह किस टीम का समर्थन कर रही हैं, तब इंदिरा गाँधी ने कहा था कि वो इटली का समर्थन करेंगी। ख़बर के अनुसार, उस समय भारत नहीं खेल रहा था। संयोग से इटली ने पश्चिम जर्मनी को 3-1 से हराकर खेल जीत लिया था।

प्रियंका के भाषण का एक वीडियो सोशल मीडिया पर छाया हुआ है। इसमें उन्होंने बार-बार फुटबॉल का ज़िक्र करते हुए ‘सॉकर’ शब्द का इस्तेमाल किया जो फुटबॉल प्रेमियों के बीच लोकप्रिय है।

इस वीडियो में वो बताती हैं कि उनका बेटा और उनका भाई राहुल गाँधी भी फुटबॉल के प्रशंसक हैं। अपने संबोधन में थोड़ा मज़ाकिया होते हुए महिलाओं की ओर इशारा करते हुए कहा कि वो समझ सकती हैं कि जब एक तरफ फुटबॉल मैच चल रहा हो तो महिलाएँ कैसा अनुभव कर रही होती हैं। इस भाषण को कॉन्ग्रेस का चुनावी हथकंडा कहा जा सकता है जिससे मतदाताओं को लुभाया जा सके क्योंकि केरल में बड़ी संख्या में फुटबॉल प्रशंसक हैं।

बंगाल में 15 साल पहले के बिहार जैसे हालात: EC के अधिकारी का बयान

एक ओर जहाँ निर्वाचन आयोग पूरी सख्ती के साथ किताबों का विमोचन रोकने और फिल्मों/वेब सीरियलों को प्रतिबंधित कर रहा है, वहीं आयोग के विशेष पर्यवेक्षक का कहना है कि बंगाल 15 साल पहले का बिहार बनता जा रहा है जहाँ जंगलराज चलता था। पर्यवेक्षक के अनुसार लोगों को पुलिस पर भरोसा नहीं है और 92 फीसदी के करीब मतदान केन्द्रों पर निष्पक्ष वोटिंग के लिए केन्द्रीय बलों की तैनाती होगी। यह बयान देने वाले चुनाव आयोग के विशेष पर्यवेक्षक अजय वी नायक पूर्व में बिहार के मुख्य चुनाव अधिकारी (सीईओ) रह चुके हैं।

बंगाल के सीईओ के सामने दिया बयान

पश्चिम बंगाल के सीईओ आरिज आफताब उस समय मौके पर मौजूद थे जब 1984 बैच के आईएएस नायक ने यह बात कही। नायक को पश्चिम बंगाल में अंतिम पाँच चरणों के चुनाव कराने का दायित्व सौंपा गया है। उन्होंने कहा, ‘पश्चिम बंगाल के मौजूदा हालात बिहार के 15 साल पुराने जैसे हालात की तरह हैं। बिहार में उस समय सभी मतदान केंद्रों पर केंद्रीय बलों की तैनाती की जरूरत पड़ती थी। अब ऐसी जरूरत पश्चिम बंगाल में पड़ती है, क्योंकि राज्य के लोगों को पश्चिम बंगाल पुलिस पर भरोसा नहीं रहा और वे सभी मतदान केंद्रों पर केंद्रीय बलों की तैनाती की मांग कर रहे हैं।’

नायक ने यह भी जोड़ा कि आगामी तीसरे चरण के दौरान केन्द्रीय बलों की तैनाती 92% से अधिक मतदान केन्द्रों पर होगी। गौरतलब है कि 324 कंपनियों की आवश्यकता महज 5 लोकसभा क्षेत्रों बलूरघाट, मालदा उत्तरी, मालदा दक्षिणी, जांगीपुर और मुर्शिदाबाद के लिए पड़ रही है।

चुनाव अधिकारी हो चुके हैं लापता, हटाए गए मालदा के पुलिस कमिश्नर

पश्चिम बंगाल में अराजकता का माहौल किस हद तक है इसका अंदाजा इस एक घटना से लगाया जा सकता है कि वहाँ चुनाव कराने में तैनात एक नोडल अधिकारी ही लापता हो गए हैं। अर्णब रॉय नादिया जिले की राणाघाट लोकसभा सीट के लिए गत 18 अप्रैल को हुए चुनाव के सिलसिले में बिप्रदास पाल चौधरी पॉलिटेक्निक कॉलेज पर तैनात किए गए थे। वह वीवीपैट और ईवीएम के इंचार्ज थे।

वह करीब 2 बजे दोपहर के भोजन के लिए गए और उसके बाद से लापता हैं। शुरू में उनकी गुमशुदगी को उनके निजी जीवन से जोड़ने की भी कोशिश की गई थी। वहीं चुनाव आयोग ने पुलिस कमिश्नर अर्णब घोष को हटाकर उनकी जगह अजय प्रसाद को मालदा जिले का पुलिस कमिश्नर बनाया है। कथित तौर पर तृणमूल के करीबी घोष को हटाने की माँग भाजपा की राज्य इकाई ने की थी।

ईस्टर के मौके पर श्रीलंका में सीरियल ब्लास्ट: 25 की मौत, 280 घायल

6 सीरियल धमाकों ने ईस्टर रविवार की सुबह ने श्रीलंका को हिला कर रख दिया। विस्फोटों से श्री लंका की राजधानी कोलंबो और देश के अन्य हिस्से दहल उठे। आरंभिक जानकारी में तीन चर्च और तीन लक्जरी होटलों को निशाना बनाया गया है लेकिन कुछ समाचार एजेंसियाँ 8 स्थान भी बता रही हैं जहाँ ब्लास्ट हुआ है। इस हमले में अभी तक कम से कम 25 लोगों के मारे जाने की ख़बर है, जबकि 280 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं। सोशल मीडिया पर इस हमले पर प्रतिक्रिया दर्ज हो रही है, जिसमें लोगों से घरों में रहने की अपील की गई है।

ख़बर के अनुसार, पुलिस प्रवक्ता रूवान गुनसेकेरा ने कहा कि विस्फोट रविवार सुबह (कोलंबो समयानुसार) सुबह 8.45 बजे हुआ।

श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में हुए सीरियल ब्लास्ट पर भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने ट्वीट किया, “मैं कोलंबो में भारतीय उच्चायुक्त के लगातार संपर्क में हूँ, हम स्थिति पर पूरी नज़र बनाए हुए हैं।”

श्रीलंका के प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने आपातकालीन बैठक बुलाई है।

इस गाँव में चुनाव प्रचार करने पर लगता है जुर्माना, लेकिन वोटिंग होती है 95-96%

देश के अधिकांश भागों में जहाँ 70% तक वोटिंग को ‘सफल’ मतदान माना जाता है वहीं गुजरात में ऐसा भी गाँव है जहाँ चुनाव प्रचार पर प्रतिबंध होने के बावजूद लगातार 95-96% तक मतदान होता रहा है। है। गाँव वालों का मानना है कि चुनाव प्रचार से व्यर्थ ही माहौल खराब होता है।

राजकोट का गाँव, यहाँ पर चुनाव प्रचार पर ₹51 जुर्माना

राजकोट जिले के राजसमढियाल गाँव में राजनीतिक दलों के चुनाव प्रचार पर मनाही है क्योंकि गाँव वालों के अनुसार इससे गाँव का माहौल प्रदूषित होता है। इसके बावजूद ग्रामीण मतदान को लेकर इतने सजग हैं कि मतदान न करने वालों पर ₹51 जुर्माना भी लगाया जाता है। सरपंच अशोक भाई वाघेरा प्रचार पर रोक की इस परंपरा का श्रेय अपने पूर्ववर्ती सरपंच हरदेव सिंह जडेजा को देते हैं।

वह यह भी कहते हैं कि असल मतदान 100% के करीब होता है, पर मृत लोगों का नाम मतदाता सूची से न कट पाने या शादी के बाद गाँव के बाहर चली गईं महिलाओं का भी नाम सूची में रह जाने के कारण यह गिरकर 95-96% के आधिकारिक आँकड़े पर आ जाता है।

देश को लेना चाहिए सबक  

देश के सभी मतदाताओं, खासकर कि शहरी मतदाताओं को, राजसमढियाल गाँव के लोगों से सीख लेने की जरूरत है। हमारे देश में एक ओर जहाँ अंधा राजनीतिक ध्रुवीकरण होता है, दूसरी ओर लोग मतदान करने निकलने से बचते हैं। इन चुनावों में भी पहले दो चरणों में भी क्रमशः 66.44% और 69.43% ही हुआ है, जोकि एक परिपक्व लोकतान्त्रिक देश के लिहाज से कतई संतोषजनक नहीं है।

जलते जहाज पर 900 टन पानी डालकर आग बुझाने की हुई थी कोशिश: अग्निशमन सप्ताह

अगर धमाका मुंबई में हो तो क्या शिमला में (1700 किलोमीटर दूर) धरती काँपेगी क्या? नहीं भाई अतिशयोक्ति अलंकार नहीं है ये, सिर्फ कोलाबा की ऑब्जर्वेटरी में ही नहीं, शिमला के भूकंप नापने के यंत्रों ने भी इस धमाके के कम्पन को, भूकंप समझकर रिकॉर्ड कर लिया था। कई टन के (मदर ऑफ़ आल बॉम्ब्स) MOAB की ख़बरें हैरत से पढ़ते-पढ़ते, बता दें की 1395 टन बारूद एक बार मुंबई में भी फटा था। एस.एस. फोर्ट स्टिकीन नाम का जहाज 14 अप्रैल, 1944 को बॉम्बे के बंदरगाह पर था। धमाका इसी जहाज में हुआ था।

इस जहाज में लदे 1395 टन विस्फोटकों में 238 टन क्लास A यानि टारपीडो, माइन, तोपों के गोले और गोलियाँ थीं। उसके अलावा कपास की गाँठें, तेल के पीपे, कबाड़ लोहा, लकड़ी और 890000 पौंड की सोने की ईटों के 31 कैरट लदे हुए थे। दोपहर करीब दो बजे जहाज के नाविकों को आग लगने की चेतावनी दी गई। जहाजी, तटरक्षक और आग बुझाने वाली नावें थोड़ी ही देर में आग बुझाने में नाकाम होने लगी। 900 टन पानी जहाज में पंप कर देने के बाद भी आग का स्रोत नहीं ढूँढा जा पा रहा था। आग बुझ नहीं रही थी और जहाज पर डाला जा रहा पानी उबलने लगा था।


14 अप्रैल 1944 के विस्फोट से बचकर बंदरगाह से भागते लोग

तीन पचास में जहाज छोड़ देने का आदेश दिया गया, इसके सोलह मिनट बाद ही पहला धमाका हुआ। इस धमाके से जहाज दो हिस्सों में टूट गया और करीब 12 किलोमीटर दूर तक की खिड़कियों के काँच टूट गए। जहाज में लदा हुआ कपास, जलता हुआ, आग की बारिश की तरह आस पास की झुग्गी झोपड़ियों पर बरसा। धमाके से दो स्क्वायर किलोमीटर का तटीय इलाका जल उठा। आस पास खड़े ग्यारह जहाजों में भी आग लग गई और वो भी डूबने लगे। दुर्घटना से बचाव के लिए लड़ते कई दस्ते खेते रहे। राहत कार्यों को दूसरा झटका 04:34 पर लगा जब दूसरा धमाका हुआ। इस धमाके की आवाज़ 50 मील (80 किलोमीटर) दूर तक सुनी गई थी। ‘पचास पचास कोस दूर, गाँव में…’ वाला जुमला कहाँ से आया होगा वो अंदाजा लगा लीजिये।


बंदरगाह से पांच किलोमीटर दूर के संत ज़ेवियर स्कूल में अगर गिरा एक प्रोपेल्लर का टुकड़ा By Nicholas (Nichalp) – Own work

विस्फोट में उड़े 31 कैरट सोने की ईटों को 2011 तक वापिस किया गया है, लगभग पूरा मिल गया। इस दुर्घटना में तेरह जहाज डूब गए थे, कई बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुए, लेकिन वो युद्ध का समय था इसलिए ख़बरें बाहर नहीं आई। गुलाम भारत के ब्रिटिश अधिकारियों ने मई के दूसरे सप्ताह में अख़बारों को ये खबर छापने की इजाजत दी। एक भारतीय सुधीश घटक ने इस घटना पर एक फिल्म सी बनाई थी जिसे ब्रिटिश अधिकारीयों ने जब्त कर लिया था। जापानी नियंत्रण वाले रेडियो साइगॉन ने सबसे पहले पंद्रह अप्रैल को ये खबर प्रसारित की। टाइम मैगज़ीन ने इसे 22 मई 1944 को छापा। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इन विस्फोटों में 800 से 1300 के लगभग लोग मारे गए थे।

इस भयानक आग को बुझाने के लिए कई अग्निशमन दल भी जुटे थे जिन्होंने जलते जहाज पर 900 टन पानी डालकर आग बुझाने की कोशिश की थी। उनमें से अधिकतर मारे गए। पहले विस्फोट के बाद जब लोग बंदरगाह से भाग रहे होंगे तो नुकसान को और बढ़ने से रोकने के लिए अग्निशमन दल के और कुछ बहादुर दो किलोमीटर में लगी आग के बीच घुस रहे होंगे। दूसरे विस्फोट पर उनमें से भी अधिकतर वीरगति को प्राप्त हुए। अग्निशमन दलों के 66 जवान इस राहत कार्य में शहीद हुए थे। हम उनमें से किसी का नाम नहीं पढ़ते, नहीं सुनते, नहीं जानते। हमारी लड़ाइयों के नायक भी खो गए हैं।

इस घटना की याद में भारत में 14 से 22 अप्रैल को अग्निशमन सप्ताह मनाया जाता है। हो सकता है किसी आग से बचाव के अभ्यास के लिए आपको भी इस गर्मी में ऑफिस के ए.सी. को छोड़कर धूप में आने का बेकार कष्ट उठाना पड़ा हो। अगर आप अपनी बड़ी ऑफिस की बिल्डिंगों में होने वाले मोक ड्रिल, बचाव अभ्यासों से परेशान हो रहे हैं तो उन सैकड़ों बहादुरों को जरूर याद कीजियेगा जो जलती आग की लपटों में जान-माल को बचाने कूदे थे। उनमें से कई बाहर नहीं आये होंगे। उन अज्ञात नामों को भी नमन, हमारी लड़ाइयों के वो नायक, जो कि खो गए हैं।

कमाल ‘अतातुर्क’ का ख़ूनी जुनून था जिन्ना के सर पर: अभिजित चावड़ा

थ्योरेटिकल फिजिसिस्ट, लेखक और इतिहास-भूराजनीति के जानकार अभिजित चावड़ा ने हाल ही में दिल्ली में भारत के बंटवारे, तुर्की के इस्लामिक इतिहास में इसकी जड़ों, और गाँधी जी की इसमें भूमिका पर संक्षिप्त वक्तव्य दिया। सृजन फाउंडेशन द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में उन्होंने जिन्ना के मुस्तफ़ा कमाल ‘अतातुर्क’ के प्रति जुनून का संबंध भारत के 1947 में विभाजन से सिद्ध किया, ‘महात्मा’ मोहनदास करमचंद गाँधी की इस पूरे कालखंड में भूमिका का संक्षिप्त अन्वेषण किया, और कमाल अतातुर्क व गाँधी के नेतृत्व में अंतर का विश्लेषण किया।

प्रथम विश्वयुद्ध में अतातुर्क का उदय, खलीफाई के अंत का प्रारंभ

प्रथम विश्वयुद्ध में तुर्की पर शासन कर रहे उस्मानी (Ottoman) खलीफ़ा ने जर्मनी और ‘केन्द्रीय राष्ट्रों’ (Central Powers) का साथ इसलिए दिया था क्योंकि ईसाई-बहुल यूरोप की बड़ी राजनीतिक ताकतों में इकलौता जर्मनी था जो उस्मानिया खलीफाई का समर्थक था। दरअसल अपनी स्थापना के समय से ही उस्मानी खलीफाओं ने तुर्की में गैर-इस्लामियों, जिनमें बहुतायत ईसाईयों की थी, के ऊपर भयावह अत्याचार किए थे। इसके अलावा यूनान की उस्मानी साम्राज्य से आज़ादी के संघर्ष के समय भी यूनानियों और ईसाईयों के कई सामूहिक हत्याकाण्ड हुए थे। चूँकि यूनान पाश्चात्य जगत में पाश्चात्य सभ्यता का जन्मस्थान माना जाता है, अतः अधिकांश पश्चिमी देशों के सम्बन्ध तुर्की के साथ तनावपूर्ण या खुली शत्रुता के थे- केवल जर्मनी इसका अपवाद था।

पर प्रथम विश्वयुद्ध में जर्मनी और केन्द्रीय राष्ट्रों की पराजय हुई, और इंग्लैंड, फ़्रांस, और रूस के नेतृत्व वाले मित्र राष्ट्रों ने तुर्की के पर कतरते हुए उसे केवल उत्तरी और केन्द्रीय एनाटोलिया तक सीमित कर दिया। हालाँकि मित्र राष्ट्रों ने उस्मानिया खलीफाई को आधिकारिक तौर पर ख़त्म नहीं किया, पर खलीफाई का अंत यहीं से शुरू हुआ।

इस युद्ध में तुर्की भले हार गया, पर उसे मुस्तफ़ा कमाल के रूप में नया नायक मिला। युद्ध में मुस्तफ़ा कमाल ने अपनी अपेक्षाकृत कमज़ोर टुकड़ी के साथ गलीपोली नामक मोर्चे पर अंग्रेज़ों और मित्र देशों की सेनाओं से लोहा लिया। लोहा ही नहीं लिया, बल्कि अपने युद्ध कौशल और नेतृत्व क्षमता का अद्भुत प्रदर्शन करते हुए जीत भी हासिल की। इससे तुर्की में उनकी ताकत जनता और शासक वर्ग दोनों में बढ़नी शुरू हुई। और अंततः एक स्टाफ़ कप्तान से शुरुआत करने वाले मुस्तफ़ा कमाल ने तुर्की में उस्मानिया खलीफाओं की खलीफाई का अंत कर तुर्की में एक पंथनिरपेक्ष गणराज्य की स्थापना की।

गाँधी के खाद-पानी पर बढ़ी हिंदुस्तानियत को दबाती इस्लामी पहचान

खलीफा अब्दुल हमीद (1876–1909) ने अपनी सत्ता बचाने के लिए और तुर्की में ‘पाश्चात्य विचार’ लोकतंत्र को कुचलने के लिए 19वीं शताब्दी के अंत में ही दुनिया के हर हिस्से में अपने ‘दूत’ भेजने शुरू कर दिए थे। उसी बीज की बिना पर मौलाना मुहम्मद अली जौहर और उनके भाई शौकत अली ने खिलाफ़त आन्दोलन की नींव रखी।

अभिजित चावड़ा के मुताबिक, इस आन्दोलन ने पहली बार इस विचारधारा की पुष्टि कर दी कि हिन्दुस्तानी मुस्लिमों की पहली वफ़ादारी इस देश और इसके लोगों के प्रति नहीं, मज़हबी आधार पर इस देश के बाहर इस्लामी ‘उम्मा’ के प्रति है। इस आन्दोलन ने पहचानों के संघर्ष में ‘मुस्लिम’ को ‘हिन्दुस्तानी’ के ऊपर रखने का सन्देश मुस्लिमों में पुख्ता किया। यही नहीं, गाँधी समेत कॉन्ग्रेस नेताओं का समर्थन ही इस मज़हबी आन्दोलन का जनाधार बढ़ाने में निर्णायक हुआ।

एक गुमनाम-से ट्विटर अकाउंट को किसी लाखों-करोड़ों ‘फॉलोअर्स’ वाले ट्विटर अकाउंट द्वारा फॉलो और रीट्वीट किए जाने का उदाहरण देते हुए वह समझाते हैं कि कैसे गाँधी और कॉन्ग्रेस के नेताओं के चलते ही न केवल खिलाफ़त को गैर-मुस्लिम वर्गों का समर्थन मिला, बल्कि मुस्लिमों का भी अधिकतम वर्ग गाँधी और कॉन्ग्रेस के चलते ही खिलाफ़त से जुड़ा। और खिलाफ़त के दौर में भरा गया मज़हबी जहर ही आगे जाकर मुस्लिम लीग-रूपी विषबेल का फल विभाजन बना। इसी दौरान जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय भी 1920 में हिंदुस्तानियत से अलग इस्लामी पहचान को पोषित करने के लिए ही बना।

खिलाफ़त की शुरुआत करने वाले मौलाना मुहम्मद अली जौहर ने ढाका में मुस्लिम लीग के ज़हरीले प्रस्तावों के आधिकारिक समर्थक बने।

जिन्ना: स्वनिर्वासन में ‘अतातुर्क’ बनने की सनक

हिंदुस्तान के बंटवारे के दूसरे सूत्रधार मुहम्मद अली जिन्ना के बारे में अभिजित खुलासा करते हैं कि जिन्ना तुर्की गणराज्य के संस्थापक मुस्तफ़ा कमाल पाशा ‘अतातुर्क’ की जीवनी से बहुत प्रभावित थे। गाँधी-नेहरू गुट द्वारा भारतीय राजनीति में किनारे लगा दिए गए जिन्ना स्वनिर्वासन में चले गए थे- और वह कभी न लौटते अगर लंदन में उन्होंने अतातुर्क की जीवनी न पढ़ी होती।

अतातुर्क से प्रभावित होकर ही जिन्ना न केवल हिंदुस्तान लौटे और मुस्लिम लीग की कमान अपने हाथ में ले इस देश का खूनी बँटवारा करा कर ही दम लिया, बल्कि उनके ‘Direct Action Day’ जैसे हिंसक पैंतरे भी सीधे-सीधे अतातुर्क द्वारा तुर्की में यूनानियों और अन्य गैर-मुस्लिमों के कत्लेआम की नक़ल थी। उनके अतातुर्क-प्रेम की तस्दीक उनकी बेटी दीना भी करतीं हैं जब वह बतातीं हैं कि जिन्ना कई-कई दिनों तक घर पर केवल तुर्की के राष्ट्रपिता की ही बात करते रहते थे; यहाँ तक कि एक समय दीना ने उन्हें भी अतातुर्क के लिए प्रयुक्त किए जाने वाला उपनाम ‘Grey Wolf’ दे दिया था।

पर यहीं से कमाल अतातुर्क और जिन्ना के बीच गंभीर विरोधाभास भी उभरने लगते हैं। अतातुर्क ने बेशक मुसलामानों के कट्टरपन  और इस्लाम के नाम पर सामूहिक हत्याकांडों का इस्तेमाल सत्ता हथियाने के लिए किया, पर सत्ता पार कर उन्होंने जो तुर्की बनाया वह पंथनिरपेक्ष, प्रगतिशील, आधुनिकता की ओर उन्मुख राष्ट्र था; वहाँ की जनता अपने नेता के सेक्युलर इरादों से इतनी नावाकिफ़ थी कि वह ‘पहले खलीफ़ा के दौर में वापिस चलने’ की ख़ुशी मना रही थी। इसके उलट जिन्ना का पाकिस्तान जन्म से ही कट्टरपंथ, मुल्ला-मौलवीवाद में डूब गया।

इसके अलावा जहाँ अतातुर्क ने एक स्पष्ट दृष्टिकोण के अंतर्गत सत्ता केन्द्रीयकृत कर सभी महत्वपूर्ण शक्तियाँ अपने हाथ में रखीं। वहीं दूसरी ओर जिन्ना पाकिस्तान बनते ही ‘राजा बाबू’ “कायदे-आज़म” बना किनारे लगा दी गए। उनके प्रधानमंत्री लियाक़त अली खान ने उन्हें “बाबा-ए-कौम” का उपनाम दे घर के बूढ़े बाबा की तरह खिसका दिया। और विदेश, रक्षा, सीमांत मामले जैसे कद्दावर मंत्रालयों पर केन्द्रीयकृत कब्ज़ा किए रहे।

इन विरोधाभासों से यह साफ़ होता है कि जिन्ना जिस ‘अतातुर्क’ जैसा बनने के लालच में लाखों के खून और करोड़ों विस्थापितों की आहों से अपने हाथ सन बैठे, वे काबिलियत में उस अतातुर्क के सामने कहीं नहीं ठहरते थे। बल्कि शायद नियति की यही विडंबना रही कि अतातुर्क जैसी जिस ताक़त के पीछे वह लाखों की लाशों को सीढ़ी बना भागे, वह उनकी बजाय लियाक़त अली खान की झोली में जा गिरी!!

गाँधी: नेतृत्व क्षमता में अतातुर्क से तुलना

अपने वक्तव्य के आखिर में चावड़ा हमारे सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न रखते हैं- क्या होता अगर हिंदुस्तान में मुस्तफ़ा कमाल पाशा ‘अतातुर्क’ जैसा कोई नेता होता, या फ़िर तुर्की में गाँधी जैसा कोई नेता?

और इस सवाल के जवाब में वे दोनों के नेतृत्व की तुलना करते हैं।

चावड़ा के अनुसार देश को एक नेता से पाँच प्रकार के राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखना होता है:

⦁ समृद्धि

⦁ सुरक्षा

⦁ भूक्षेत्रीय अखंडता (यानि देश की ज़मीन देश के हाथों और नियंत्रण में ही रहे)

⦁ स्वनिर्धारण क्षमता (यानि देश के लोग ही अपने भाग्य का निर्णय स्वयं करें)

⦁ सांस्कृतिक अखंडता

इन पाँचों में भी चावड़ा स्वनिर्धारण क्षमता को सबसे महत्वपूर्ण बताते हुए नेता और प्रबंधक में बहुत महत्वपूर्ण अंतर भेड़ों के गड़ेरिये का बताते हैं- गड़ेरिया भेड़ों के खाने से लेकर तबियत तक का ध्यान रखता है, उनकी हर सुख-सुविधा का ख्याल रखता है, उन्हें शिकारी पशुओं जैसे बाहरी खतरों  से भी बचाता है- पर क्यों? इसलिए नहीं कि वह भेड़ों की सेवा कर रहा होता है, बल्कि इसलिए कि उसकी असली निष्ठा भेड़ों के ‘ऊपर’ भेड़ों के ‘मालिक’ के प्रति होती है; उसके लिए भेड़ों की इच्छा का कोई महत्त्व नहीं होता।

उसी तरह जिस ‘नेता’ की असली निष्ठा उन लोगों के प्रति नहीं होती जिनके नेतृत्व और प्रतिनिधित्व का वह दावा करता है, वह नेता नहीं, महज़ एक प्रबंधक होता है। ज़रूरी नहीं वह जनता के साथ बुरा ही सुलूक करे, कभी-कभी वह गड़ेरिये की तरह वह दुलार-पुचकार भी सकता है, पर उसका मकसद और उसकी निष्ठा लोगों या उनके हित से नहीं जुड़ी होती।

इस उदाहरण को वह गाँधी जी के बँटवारे के दौरान के व्यवहार के समक्ष रख कई प्रश्न पूछते हैं, ऐसे प्रश्न जो शायद गाँधीवादियों को बहुत ज्यादा चुभ सकते हैं:

  • गाँधी जी ने कहा था कि यदि कॉन्ग्रेस विभाजन स्वीकार करती है तो वह ऐसा उनकी लाश के ऊपर से करेगी। विभाजन फिर गाँधी के जीवित रहते कैसे हो गया?

  • गाँधी विभाजन का जुबानी विरोध तो आखिरी समय तक करते रहे, पर उन्होंने विभाजन को असल में रोकने के लिए क्या किया? उनके जैसे प्रभाव-क्षेत्र वाला व्यक्ति अगर एक बार विभाजन के खिलाफ आन्दोलन की पुकार भी दे देता तो सभी न सही, एक बड़ा वर्ग सड़कों पर विभाजन करने और स्वीकार करने वालों के खिलाफ उतर आता। उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया?

  • विभाजन-विरोधी मुस्लिमों के नेता खान अब्दुल गफ्फार खान के गाँधी से आखिरी शब्द थे, ‘आपने हमें भेड़ियों के बीच झोंक दिया है।’ (उनका प्रान्त पख्तूनवा उस समय विभाजन-विरोधी था। पर उसका जबरन विलय पाकिस्तान के साथ हुआ)
    उन्होंने यह जिन्ना या विभाजन कर रहे किसी अन्य नेता की बजाय गाँधी जी को इंगित कर क्यों कहा?

अभिजित इन सवालों का उत्तर ‘क्योंकि गाँधी जी गृह-युद्ध टालना चाहते थे’ मानने से इंकार कर देते हैं। वह अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति लिंकन का उदाहरण देते हैं। ‘एक और नेता के सामने गृहयुद्ध या फिर गलत को सहते हुए बनी हुई एकता में से चुनाव था…’ और उसने क्या और क्यों चुना, और फिर क्या हुआ यह बताने की आवश्यकता नहीं…

मोदी का चेहरा अच्‍छा नहीं था, इसलिए पत्‍नी ने छोड़ा: कॉन्ग्रेस MLA जमीर अहमद खान

कर्नाटक में कॉन्ग्रेस व उसके मित्रों के खेमे से प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे को लेकर रोज अलग-अलग बयान आ रहे हैं। पहले कर्नाटक के मुख्यमंत्री कुमारास्वामी शिकायत करते हैं कि मोदी वैक्सिंग करा के आते हैं और उनका चेहरा चमकता रहता है, इसलिए हमें फुटेज नहीं मिलती। अब उनके मंत्री और कॉन्ग्रेस के विधायक जमीर अहमद खान ने कहा कि ‘मोदी का चेहरा अच्छा नहीं था, इसीलिए उनकी पत्नी ने उन्हें त्याग दिया।’

‘कौन देगा मोदी के चेहरे पर वोट?’

जमीर अहमद ने पत्रकारों से बात करते हुए भाजपा के लोकसभा सदस्य शिवकुमार के उदासी का जिक्र करते हुए कहा कि वह (शिवकुमार) दो बार के भाजपा एमपी हैं पर वह अपने काम की बजाय मोदी के नाम और चेहरे पर वोट माँग रहे हैं। उनकी इसी अपील की खिल्ली उड़ाने में खान को मर्यादा का भी होश न रहा, और वो आगे कह बैठे कि मोदी का चेहरा अच्छा नहीं था, इसीलिए उनकी पत्नी ने उन्हें त्याग दिया। ऐसे चेहरे पर वोट देना चाहिए क्या लोगों को, उन्होंने यह भी पूछा।

मोदी की पत्नी को हमेशा से घसीटते रहे हैं विपक्षी नेता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्यक्तिगत जीवन, खासकर कि उनकी पत्नी के साथ उनके विवादस्पद सम्बन्ध, सदा ही विपक्षी नेताओं के लिए हल्का निशाना रहे हैं। पिछले लोकसभा चुनावों के दौरान भी उनके और पत्नी के अलगाव को लेकर जमकर छींटाकशी हुई थी।

इन चुनावों के दौरान भी आंध्र के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने कहा कि मोदी परिवार प्रणाली का सम्मान नहीं करते क्योंकि उन्होंने अपनी पत्नी को छोड़ दिया है। तीन तलाक को आपराधिक बनाने के मोदी सरकार के निर्णय के विरुद्ध भी चौधरी अजित सिंह ने कहा कि उन्होंने अपनी पत्नी को बिना एक भी बार तलाक बोले छोड़ दिया था।