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मोदी पर Eros Now की वेब सीरीज, सोनू निगम ने PM की लिखी कविता को दी आवाज़

नरेंद्र मोदी पर विवेक ओबेरॉय अभिनीत फ़िल्म के अलावा एक सीरीज भी आ रही है। 10 एपिसोड वाली इस सीरीज में प्रसिद्ध गायक सोनू निगम पीएम मोदी की लिखी कविता को अपनी मधुर आवाज़ से सँवारेंगे। इस सीरीज का ट्रेलर जारी किया जा चुका है और इसे सोशल मीडिया पर लोगों द्वारा काफ़ी पसंद भी किया जा रहा है। ‘ओ माय गॉड’ और ‘102 नॉट आउट’ जैसी अवॉर्ड विनिंग फ़िल्में डायरेक्ट कर चुके उमेश शुक्ला इस सीरीज के निर्देशक हैं। गुजराती नाटक ‘कांजी vs कांजी’ के निर्देशक के रूप में गुजराती थिएटर जगत में प्रसिद्धि कमा चुके शुक्ला इस से पहले कई फ़िल्मों भी कर चुके हैं।

इरोज द्वारा जारी किया गया सीरीज का ट्रेलर

फैसल ख़ान इस सीरीज में किशोर नरेंद्र मोदी की भूमिका में दिखेंगे। लोकप्रिय संगीत निर्देशक सलीम-सुलेमान ने इसका म्यूजिक तैयार किया है। सोनू निगम ने पीएम मोदी की कविता ‘श्याम के रोगन रेले’ की रिकॉर्डिंग भी पूरी कर ली है। निर्देशक शुक्ला ने बताया कि उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) से नरेंद्र मोदी द्वारा रचित 10 कविताओं को संगीत के रूप में उतारने की अनुमति भी ले ली है। इस सबका प्रयोग आगामी सीरीज में किया जाएगा। इरोज नाउ के इस से जुड़े होने के कारण इस सीरीज को लेकर चर्चाएँ तेज़ हैं। बाजीराव मस्तानी, बजरंगी भाईजान, तनु वेड्स मनु और इंग्लिश इंग्लिश जैसी फ़िल्मों का निर्माण कर चुका इरोज सिनेमा की दुनिया में एक बड़ा नाम है।

सीरीज का दूसरा ट्रेलर

हर एक एपिसोड के ख़त्म होने पर आने वाले क्रेडिट्स में इन कविताओं का प्रयोग किया जाएगा। शुक्ला ने कहा कि सलीम-सुलेमान और सोनू निगम की जुगलबंदी के कारण इस गाने में चार चाँद लग गए हैं। इस वेब सीरीज को अप्रैल में रिलीज किया जाएगा। उमेश शुक्ला ने अंदेशा जताया कि उनकी ये सीरीज भी चुनाव आयोग के रडार पर आ सकती है क्योंकि चुनाव आयोग ने विवेक ओबेरॉय द्वारा मोदी पर बनाई जा रही बायोपिक को लेकर निर्माताओं से कमेंट माँगा है। लेकिन, शुक्ला ने कहा कि चूँकि वेब सीरीज थिएटर में और बॉक्स ऑफिस पर रिलीज नहीं होती, इसीलिए इस पर आचार संहिता लागू नहीं होगी।

अपनी फिल्म ‘ओ माय गॉड’ के बारे में बात करते हुए शुक्ला ने कहा कि उस दौरान भी उन्हें काफ़ी धमकियाँ मिली थीं और पूछा गया था कि वह ऐसी फ़िल्में भारत में कैसे बना सकते हैं? उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी पर बन रही सीरीज पर एक वर्ष पहले ही कार्य शुरू कर दिया गया था। उन्होंने बताया कि इसकी शूटिंग पूरी की जा चुकी है और ये अब एडिटिंग की प्रक्रिया में है। सभी एपिसोड आधे से लेकर पौन घंटे तक के होंगे। उन्होंने कहा कि इसे जल्द से जल्द रिलीज़ करने की कोशिश की जा रही है।

इस सीरीज की शूटिंग गुजरात के सिद्धपुर और वडनगर में की गई है। यही वो जगहें हैं, जहाँ पीएम मोदी का बचपन गुजरा था। इस सीरीज में मोदी चायवाला से प्रधानमंत्री बनने तक के सफर को उकेरा गया है। इसमें उनके सन्यासी के रूप में कुछ वर्ष बिताने से लेकर आपातकाल के दौरान उनके द्वारा किए गए कार्यों को भी दिखाया जाएगा। विवेक ओबेरॉय की फ़िल्म और उमेश शुक्ल की सीरीज के अलावा अभिनेता परेश रावल भी मोदी की बायोपिक बनाने तैयारी में हैं। वो कई बार कह भी चुके हैं कि सिल्वर स्क्रीन पर नरेंद्र मोदी की भूमिका उनसे अच्छी कोई नहीं निभा सकता।

‘आतंकवाद से लड़ने’ के बजाय फलाने दिन-तारीख-समय पर फलाने व्यक्ति को मारना है: अजित डोभाल

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार श्री अजित डोवाल ने हाल ही में मानव संसाधन विकास मंत्रालय के चीफ इनोवेशन ऑफिसर डॉ.अभय जेरे को एक साक्षात्कार दिया। लोकसभा टीवी द्वारा प्रसारित यह साक्षात्कार डोवाल का एनएसए बनने के बाद संभवतः पहला विस्तृत साक्षात्कार था। इसे हम दो हिस्सों में प्रकाशित कर रहे हैं।

प्रथम हिस्से के महत्वपूर्ण अंश:

‘बहुत महीन फर्क होता है सही निर्णय और गलत निर्णय में’

सवाल था कि बालाकोट के समय किसी भी मौके पर क्या उन्हें यह लगा कि इस निर्णय को लेना सही न रहा हो। डोवाल ने कहा कि सामान्यतः निर्णय का सही या गलत होना उसे ले लिए जाने और परिणाम आने के बाद ही समझ में आता है। और सही-गलत निर्णय लेने वालों की मानसिकता और क्षमता में कोई बहुत बड़ा अंतर नहीं होता। अतः ‘सही निर्णय’ लेने के लिए जरूरी मानसिक स्थिति को समझ कर उसका विकास करना सही निर्णय लेने की चिंता करने से अधिक आवश्यक है।

अपनी व्यक्तिगत निर्णय-प्रक्रिया के बारे में बात करते हुए अजित डोवाल ने कहा कि वे सबसे बुरी स्थिति को सबसे पहले दिमाग में स्पष्ट तौर पर कल्पित करते हैं। उसकी ‘कीमत’ के बारे में सोचते हैं- यहाँ तक कि लोगों की मृत्यु के खतरे को भी कीमत-बनाम-परिणाम के रूप में।

फिर वे उस worst-case-scenario के छोटे-छोटे हिस्सों में छोटे-छोटे सुधार करने के तरीके ढूँढ़ते हैं- (मसलन यदि 35 लोग  worst-case-scenario में मर रहे हैं तो इसे कम-से-कम कैसे किया जाए – यह सिर्फ उदाहरण के तौर पर दिया गया है, ताकि बात समझने में आसानी हो, डोवाल ने खुद नहीं कहा है।)

इस प्रक्रिया को करते हुए वह worst-case-scenario को उस स्तर पर ले आने की कोशिश करते हैं जहाँ निर्णय को लेने से होने वाला नुकसान, या उस निर्णय की ‘कीमत’, उससे होने वाले संभावित फायदे से कम हो जाए- यह उस निर्णय पर अमल करने की न्यूनतम शर्त होती है। बाद में वह इसमें और भी सुधार की जहाँ कहीं गुंजाईश हो, उसे करते रहते हैं।

इसके लिए वे जरूरी समय और तैयारी को आवश्यक मानते हैं। इसके अलावा उनके हिसाब से गुप्तचरों की दुनिया में तकनीकी और गुप्त सूचनाओं का भी आवश्यक स्तर पर होना महत्वपूर्ण होता है।

निर्णय लेने में होने वाले भय को लेकर उनका मानना है कि इस भय को भगाने का सबसे अच्छा तरीका अपने भय को विस्तारपूर्वक, स्पष्ट शब्दों में उल्लिखित करना होता है। उनके हिसाब से अधिकांश मामलों में ऐसा करने से हमें यह अहसास होता है कि हमारे भय का कारण असल में भय से बहुत छोटा है। जिन मामलों में ऐसा नहीं भी होता, वहाँ स्पष्ट रूप से भय को व्यक्त कर देने से उस स्थिति के बारे में क्या किया जा सकता है, यह समझ में आ सकता है।

बहुत महत्वपूर्ण निर्णयों- जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा, में वह इस पर भी जोर देते हैं कि किसी एक योजना पर पूरी तरह निर्भर न रहा जाए, बल्कि वैकल्पिक योजनाएँ तैयार रखीं जाएँ। इसके अलावा वे हर बदलती परिस्थिति से निपटने के लिए लचीलेपन का होना जरूरी मानते हैं।

‘कठिन निर्णय लेने के लिए जरूरी है…’

डोवाल की ‘कठिन निर्णय’ की परिभाषा है – ऐसा निर्णय जिसके परिणाम एक बड़ी संख्या के लोगों को एक लम्बे समय के लिए प्रभावित करें। ऐसे निर्णयों में वह बताते हैं कि छोटी-सी चूक कई बार इतिहास की पूरी धारा पलट देती है।

ऐसे महत्वपूर्ण निर्णय के लिए उदाहरण वे प्रथम प्रधानमंत्री पण्डित नेहरू के कश्मीर के मामले को संयुक्त राष्ट्र में ले जाने का देते हैं। उनके अनुसार उस निर्णय के कारण ही पीओके को पाकिस्तान के चंगुल से मुक्त नहीं कराया जा सका और कश्मीर ही भारत की सभी आतंकवादी समस्याओं के मूल में है। अतः पण्डित नेहरू का वह निर्णय संयुक्त राष्ट्र के कश्मीर पर निर्णय के चलते भारत के दीर्घकालीन हितों के साथ साम्य में नहीं साबित हुआ।

इस उदाहरण को पकड़कर वे आगे समझाते हैं कि दीर्घकालीन, महत्वपूर्ण निर्णय लेने के लिए लक्ष्य की स्पष्टता अति आवश्यक है। इसके लिए वे एक ‘टेक्नीक’ भी बताते हैं, जो कि नेताओं से लेकर आम आदमी तक हर किसी के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकती है।

डोवाल लक्ष्य को एक कथन में परिवर्तित करने की सलाह देते हैं। और उस कथन से सभी विशेषण और क्रियाविशेषण हटा देने को कहते हैं। यानि केवल संज्ञा और क्रिया बचे। यानि आप का लक्ष्य कथन यह बताए कि क्या करना है, और किन चीज़ों के साथ करना है। किन चीज़ों की भूमिका है।

उसे वे यथासंभव सरल और लघु बनाने को कहते हैं, और व्यर्थ की दार्शनिकता हटाने को कहते हैं।

“यह मत कहिए कि ‘हमें आतंकवाद से लड़ना है’।” वह उदाहरण देते हैं, “यह एक अस्पष्ट और बहुत ही सामान्यीकृत कथन है- यह लक्ष्य नहीं हो सकता। यह तय करिए कि फलाने दिन-तारीख-समय पर फलाने व्यक्ति या गुट को मार गिराना है।”

वह लक्ष्य की स्पष्टता पर जोर देते हुए यह भी इंगित करते हैं सामान्यतः भारतीयों में यह बीमारी होती है कि हम अति दार्शनिकता, तर्क, चिंतन आदि में लक्ष्य को अस्पष्ट और निर्णय को कमजोर कर देते हैं।

‘निर्णय कब नहीं लेना चाहिए’

आगे डोवाल यह समझाते हैं कि निर्णय लेने के लिए क्या-क्या आवश्यकताएँ निर्णय लेने से पहले पूरी होनी चाहिए। सबसे पहले निष्पक्ष भाव से अपनी शक्तियों, दुर्बलताओं, परिस्थितियों, संसाधनों और संभावनाओं की ईमानदार विवेचना आवश्यक है।

वे साथ में यह भी आगाह करते हैं कि भय या क्रोध के वशीभूत होकर निर्णय लेना हमेशा हानिकारक होता है क्योंकि इनके प्रभाव में व्यक्ति तटस्थ नहीं रहता। भयभीत व्यक्ति को ‘मिशन’ की सफलता से अधिक चिंता अपने भय की वस्तु (मसलन अपनी जान) की होती है; वहीं गुस्से में अँधा इंसान अपने अहम् की पूर्ति के लिए मिशन की सफलता के लिए जरूरी संसाधन (मसलन अपनी जान) को दाँव पर लगा बैठता है। यानी कि दोनों ही, क्रोध और भय, लक्ष्य आधारित निर्णय के शत्रु हैं।

डोवाल बताते हैं कि कोई भी निर्णय लेने के पूर्व वे खुद से यह जरूर पूछते हैं कि क्या वे भयभीत या क्रुद्ध तो नहीं हैं। यदि उत्तर हाँ में होता है तो वे निर्णय लेने को तब तक के लिए टाल देते हैं जब तक वे इन भावों पर जय न प्राप्त कर लें।

‘निर्णय ही नहीं, सही विकल्प का चयन भी है जरूरी’

अपने लक्ष्य को तय कर लेने के बाद डोवाल का अगला कदम होता है अपने सामने मौजूद विकल्पों की समीक्षा, और सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चुनाव। वह बताते हैं कि हालाँकि कठिन निर्णयों में विकल्प बहुत सीमित होते हैं, पर सर्वथा अभाव कभी नहीं होता। कई बार अपने अनुभव और ज्ञान से आप नए विकल्पों का ‘निर्माण’ भी कर सकते हैं।

गुप्तचरी में, डोवाल के अनुसार, हर विकल्प के साथ समय, मूल्य (आर्थिक व अन्य, यहाँ तक कि सैनिकों की जान के रूप में भी), और अवसर- यह तीन बाध्यताएँ या बंधन (constraints) होते हैं। हर विकल्प को इन तीन कसौटियों पर विश्लेषित कर यह तय करना होता है कि कम-से-कम कीमत पर लक्ष्य को पूरा करने के सबसे करीब कौन सा विकल्प है।

वे आगे बताते हैं कि अधिकांश समय निर्णय और लक्ष्य-निर्धारण भली-भांति कर लेने के बावजूद उस पर अमल करने के लिए गलत विकल्प का चुनाव असफलता का कारण बनता है। इसके अलावा कई बार असफलता का कारण यह भी हो जाता है कि सभी तरह के चुनाव सही कर लेने के बाद तैयारियों में मानवीय कमी रह जाती है- यानि हम अपना शत-प्रतिशत (100%) अपने लक्ष्य को नहीं देते। बाद में अहसास होता है कि यदि इसी चीज़ में अपना सौ फीसदी लगाते तो सफलता मिल सकती थी!

अंत में अजित डोवाल यह भी जोड़ते हैं कि कई बार लक्ष्य-निर्धारण और विकल्प का चुनाव सही होने पर भी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं, और उस स्थिति में अपने निर्णय के साथ दृढ़ता के साथ खड़े होकर जो भी परिस्थिति आए, उसमें अपने निर्णय को सही साबित भी करना पड़ता है। वह ऐसी स्थिति की मिसाल के तौर पर शादी को देखते हैं। जैसे कई बार सही इन्सान से शादी करने पर भी जीवन में हर परिस्थिति सही नहीं बीतती, और कई बार हर परिस्थिति में अपने शादी के निर्णय को ही सही साबित करना पड़ता है, अपने अनुकूल परिणाम लाकर।

‘अजित डोवाल में अलग क्या है?’

सवाल था कि अजित डोवाल के बारे में उन्हें जानने वाले कई सारी चीजें कहते हैं, कई सारी विशिष्टताएँ बताते हैं, जिनमें उनका तथाकथित एकाकीपन और टीम की बजाय अकेले गुप्तचर के तौर पर काम करना पसंद करना सबसे ज्यादा उभर कर सामने आता है।

जवाब में छद्म विनम्रता का नाटक न करते हुए डोवाल यह बिना लाग-लपेट के मान लेते हैं कि उनके गुप्तचर करियर से पहले के जीवन ने उनमें निश्चय ही कुछ विशिष्ट गुणों का विकास किया है, जिनका उनके करियर की सफलता में बड़ा योगदान रहा।

अपनी सबसे विशिष्ट चीज़ वह अकेले काम करने की प्रवृत्ति को मानते हैं। उन्होंने बताया कि उनके एकाकी स्वभाव और अकेले काम करने की ओर झुकाव को सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही तरीकों से देखा गया है। एकाकी इकाई के तौर पर काम करने के पीछे वह कारण यह बताते हैं कि एक गुप्तचर की तौर पर वह पूरी टीम की सभी परिस्थितियों को समझ पाने के बजाय अपनी खुद की सभी परिस्थितियों को समझ पाना और उनके अनुसार काम कर पाना और निर्णय ले पाना, ज्यादा आसान मानते थे।

उन्होंने बताया कि इसके अलावा एक और कारण था उनके अकेले काम करने का- गुप्तचरों के काम में खतरा बहुत ज्यादा होता है। और उन्हें यह पसंद नहीं था कि उनके कहने पर कोई खतरा मोल ले। अपने खतरे वह स्वयं उठाना पसंद करते थे। दूसरों को उनकी पसंद और इच्छा के हिसाब से क्या करना चाहिए, क्या खतरा उठाना चाहिए, ऐसा निर्णय लेने देना उन्हें ज्यादा सही लगता था।

डोवाल ने साथ में यह भी जोड़ा कि गुप्तचरी के क्षेत्र में हल्के से भी संशय के साथ काम करने वाले को असफलता का ही मुँह देखना पड़ता है- और वह अपने लिए तो पक्का पता कर सकते हैं कि उनके मन में लेशमात्र भी संशय न हो (वह गीता के श्लोक “संशयात्मा विनश्यति” को उद्धृत करते हैं) पर वह अपने साथ काम कर रहे किसी गुप्तचर के मन में संशय न होने को लेकर आश्वस्त नहीं हो सकते।

वह ऑपरेशन ब्लैक थंडर का उदाहरण देते हैं कि कैसे जब किसी-न-किसी को ऑपरेशन शुरू होने के पहले अन्दर जाकर आतंकियों की स्थिति के बारे में जानकारी एकत्र करनी थी तो उन्होंने अकेले ही जाना पसंद किया। (बता दें कि इस ऑपरेशन से पहले अजित डोवाल रिक्शा चालक बनकर स्वर्ण मंदिर के अन्दर घुसे थे और दो दिन में आतंकियों की संख्या और पोजीशन के विषय में अहम जानकारी जुटाई थी)

डोवाल ने बताया कि उस दौरान वे अकेले ज्यादा महफूज़ महसूस कर रहे थे। उनके अनुसार गुप्तचरी में अकेले होने का एक फ़ायदा यह भी होता है कि अगर आप गलती से पकड़े गए तो आपके झूठ को काट कर उससे अलग कह देने वाला कोई नहीं होता। इसलिए अगर अकेला गुप्तचर बहुत चालाक है तो वह पकड़े जाने पर भी गुप्त जानकारियाँ ज्यादा आसानी से दुश्मन के हाथ लगने से रोक सकता है और मौका मिलने पर दुश्मन को यथासंभव धोखा दे स्थिति अपने हक़ में पलट सकता है।

अपनी अगली खूबी वह अप्रत्याशित होना बताते हैं। उनके अनुसार उनके 75 वर्षीय जीवन में कभी भी काम करने का तय तरीका नहीं रहा, जिसे तड़ कर दुश्मन उनकी अगली चाल को भाँप जाए। वह हमेशा किसी भी कार्य को करने के लिए हमेशा नौसिखिए के अंदाज में जाते’ हैं। इससे उन्हें दो फायदे होते हैं- एक तो वह पहले से कुछ भी मान कर नहीं चलते, और दूसरा हर बार काम को करने का नया तरीका तलाशते रहते हैं। यहाँ वह कुछ पलों के लिए दार्शनिक हो कहते हैं, “जीवन का हर एक क्षण बचे हुए जीवन का पहला क्षण होता है और इसीलिए उसे बची हुई ज़िन्दगी की एक ताज़ा शुरुआत के तौर पर लेना चाहिए।”

अपनी गति को भी वह अपने गुप्तचर करियर की सफलता का श्रेय देते हैं- उनके अनुसार बेहतर होगा कि हमेशा तेजी से या तो हमला करो या पीछे हट जाओ। इससे सामने वाले को संभलने या पलटवार करने का मौका नहीं मिलता। वह यह भी बताते हैं कि कई बार द्रुत गति गुप्त सूचना लीक हो जाने या प्रक्रियात्मक गलती की भी भरपाई कर सकती है, बशर्ते आप दुश्मन से हमेशा एक कदम आगे चलने लायक तेज़ हों। उस स्थिति में हालाँकि आपकी जीत का अंतर भले ही सामान्य परिस्थिति के मुकाबले बहुत कम हो जाता है, पर कम से कम विजय मिल जाती है।

अंत में वह यह भी जोड़ते हैं कि ‘हर गुप्तचर के लिए वाक्पटु होना’ और ‘गुप्त सूचनाओं को गुप्त रख पाने में सक्षम होना’- दोनों ही अति आवश्यक हैं।

अभी के लिए इतना ही । इस साक्षात्कार का अगला भाग शीघ्र प्रकाशित होगा।

अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी पर आयकर विभाग ने कसा शिकंजा, ₹3.62 करोड़ की संपत्ति जब्त

जम्मू कश्मीर के अलगाववादी नेताओं में शुमार सैयद अली शाह गिलानी पर आयकर विभाग ने बड़ी कार्रवाई करते हुए दिल्ली की महंगी संपत्ति को सीज कर दिया है। आयकर विभाग के अधिकारियों ने सोमवार को दिल्ली के मालवीय नगर के खिड़की एक्सटेंशन स्थित प्रॉपर्टी को सीज कर दिया है।

पीटीआई के पास उपलब्ध आदेश की प्रति के मुताबिक, यह फ्लैट दक्षिण दिल्ली के मालवीय नगर में स्थित है और विभाग के कर वसूली अधिकारी (टीआरओ) ने 1996-97 से लेकर 2001-02 के बीच कथित तौर पर ₹3.62 करोड़ आयकर का भुगतान करने में विफल रहने पर इस घर को सील कर दिया। इसके अनुसार विभाग ने आयकर अधिनियम की धारा 222 के तहत यह कार्रवाई की और इसके अंतर्गत हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेता द्वारा संपत्ति के हस्तांतरण पर रोक रहेगी।

बता दें कि टीआरओ आयकर विभाग की प्रवर्तन कार्रवाई शाखा है और यह इरादतन कर न चुकाने के मामलों से निपटती है। अधिकारी बकाया कर के भुगतान के लिए संपत्ति जब्त कर सकते हैं और आगे उसकी नीलामी भी कर सकते हैं। इस संबंध में 29 मार्च को गिलानी के खिलाफ कार्रवाई का आदेश जारी किया गया था। इस आवास में गिलानी के दामाद की भी हिस्सेदारी बताई जा रही है। आयकर विभाग द्वारा गिलानी के खिलाफ शिकायत करने के बाद ईडी ने जाँच शुरू की।

गौरतलब है कि पिछले महीने यानी मार्च में प्रवर्तन निदेशालय ने अवैध रूप से 10,000 अमेरिकी डॉलर के विदेशी मुद्रा रखने के जुर्म में अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी पर ₹14.40 लाख का जुर्माना लगाया था। जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के अध्यक्ष यासीन मलिक के खिलाफ भी इस तरह की कार्यवाही होने के आसार हैं

तेज प्रताप ने बनाया लालू-राबड़ी मोर्चा: खुद निर्दलीय लड़ने की भी दी धमकी, यादव कुनबा धराशाई!

पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के बाग़ी पुत्र तेज प्रताप यादव ने अपने माता-पिता के नाम पर एक अलग राजनीतिक मोर्चा बनाने की बात कही है। लालू यादव के बड़े बेटे ने राजद नेताओं पर पार्टी और परिवार को तोड़ने का आरोप मढ़ा है। प्रदेश अध्यक्ष रामचंद्र पूर्वे पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि कुछ नेता उनके भाई तेजस्वी को भड़का रहे हैं ताकि पार्टी टूट जाए। उन्होंने अपने छोटे भाई तेजस्वी को अपना हृदय बताते हुए उनकी तुलना अर्जुन से की। उन्होंने दावा किया कि पूर्वे उनके हर काम को रोकने के लिए तेजस्वी से उनकी शिकायत करते हैं। उन्होंने राजद के ऐसे नेताओं को स्वार्थी बताते हुए कहा कि उन लोगों ने पार्टी के कई उच्च पदों को कब्ज़ा लिया है। पटना में तेज प्रताप ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अलग मोर्चा का ऐलान कर दिया है। उन्होंने कहा:

“मुझे दो सीट चाहिए जहानाबाद और शिवहर से, वहाँ से जो घोषित हुए हैं, वो पहले से हारे हुए हैं। दो बार, तीन बार चुनाव हारे हैं.. ये हमारे परिवार, भाई में लड़वाने वाले लोग हैं। आरएसएस के लोग, बजरंगदल के लोग लड़वा रहे हैं। हम ऐसे कैंडिडेट की माँग कर रहे हैं जो नौजवान और ईमानदार हैं। ऐसे लोग को कतई नजरअंदाज नहीं कर सकते। लालू और राबड़ी जी का आशीर्वाद हमेशा साथ है। मैंने पहले भी कहा है तेजस्वी मेरा अर्जुन है। निष्पक्ष लोगों को उम्मीदवार बनाएँगे। हम जरूरत पड़ी तो नया मोर्चा बनाएँगे। जरूरत पड़ी तो खुद निर्दलीय लड़ जाऊँगा। ये मेरा मोर्चा लालू-राबड़ी मोर्चा है। पार्टी में कुछ लोग डेरा जमाकर बैठे हैं। हमको जहानाबाद और शिवहर सीट चाहिए। लड़कर, जीतकर लेंगे। बेतिया से राजन तिवारी को लड़ाएँगे, हाजीपुर से लड़ाएंगे”

ज़ी न्यूज़ में प्रकाशित ख़बर के अनुसार, तेज प्रताप यादव ने कहा:

“ऐसे ही स्वार्थी लोगों के सफाए के लिए मैंने ‘लालू-राबड़ी’ मोर्चा बनाया है। यह मोर्चा ऐसे नेताओं का सफाया करेगा। तेजस्वी यादव समझदार हैं लेकिन उन लोगों की वजह से उनके आँखों पर पर्दा आ गया है। मेरी माँ राबड़ी देवी को भी सजग रहने की ज़रूरत है। मेरी बातें सभी लोगों को बाद में समझ आएँगी। जो लोग ख़ून-पसीने से पार्टी को सींचने का काम कर रहे हैं, उन्हें टिकट नहीं दिया गया। इसलिए तेजप्रताप यादव उनके लिए खड़ा हो गया है और पार्टी में अलग मोर्चे को तैयार कर रहा है।”

इंडिया का डीएनए 2019′ कार्यक्रम में बोलते हुए तेज प्रताप यादव ने दावा किया कि उन्होंने अपना हर उम्मीदवार चुनने से पहले जनता दरबार लगाया और आम लोगों की राय ली। इसके लिए उन्होंने हर क्षेत्र में घूमने का भी दावा किया। शिवहर और जहानाबाद लोकसभा क्षेत्रों के लिए राजद द्वारा घोषित उम्मीदवारों की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि उनके चयन में राजनीति की गई। सारण को अपनी पुश्तैनी सीट बताते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें इस पर किसी भी बाहरी व्यक्ति का कब्ज़ा मंज़ूर नहीं है। उन्होंने इस सीट पर चुनाव लड़ने के लिए अपनी माँ पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी का नाम प्रस्तावित किया।

हम बता चुके हैं कि कैसे जहानाबाद से अपने क़रीबी चंद्र प्रकाश यादव को टिकट दिलाने की जुगत में लगे तेज प्रताप को पार्टी से निराशा हाथ लगी और तेजस्वी ने सुरेंद्र यादव के नाम पर मुहर लगा दी। इस बात से बौखलाए तेज प्रताप ने समर्थकों से नामांकन दाखिल का आदेश देकर एक तरह से बगावत का ही ऐलान कर दिया। इसी तरह शिवहर से भी वह अंगेश यादव को टिकट देना चाहते थे लेकिन वहाँ भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी। गुरुवार (मार्च 28, 2019) को तेजस्वी यादव ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का ऐलान किया था लेकिन ऐन वक़्त पर पार्टी के बड़े नेताओं को इसकी भनक लग गई और उन्होंने तेज प्रताप को किसी तरह मनाया।

तेज प्रताप यादव के इस क़दम से राजद संगठन और कार्यकर्ताओं में असमंजस का माहौल पैदा हो सकता है। जिस लालू परिवार को यादव वोटों को एकजुट रखने की धुरी माना जाता था, उसके बिखरने से संगठन पर नकारात्मक असर पड़ेगा। अगर सारण से तेज प्रताप अपने ससुर के ख़िलाफ़ हैं तो लालू परिवार का पारिवारिक कलह राजनीतिक सतह पर आ जाएगा और विरोधियों को आलोचना करने का नया मौक़ा मिल जाएगा। हालाँकि, तेज प्रताप का कोई जनाधार नहीं है और न ही संगठन में उन्हें वरिष्ठ नेताओं का साथ मिल रहा है। लेकिन फिर भी, लालू के कुनबे की एकजुटता से बिहार का राजनीतिक और चुनावी समीकरण का निर्णय होता आया है।

उधर लालू यादव भी पटना से दूर राँची में अपनी सज़ा पूरी कर रहे हैं। लालू के पटना में उपस्थित रहने मात्र से ही राजद में चीजें सही रहती थीं लेकिन उनकी अनुपस्थिति में जब परिवार दो फाड़ हो चुका है, कार्यकर्ताओं को लामबंद रखने में परेशानी आ सकती है। लालू ने जेल से ही टिकट वितरण सहित सारे निर्णय लिए, कन्हैया को टिकट न देने के पीछे भी उनका ही हाथ था। अब अपने परिवार को साथ रख कर चलने में नाकाम लालू यादव के कुनबे का क्या होता है, इसका निर्णय संभवतः अब राँची से ही होगा।

देखिए: 1 अप्रैल को ट्विटर पर राहुल गाँधी के बयानों ने ‘बनाया माहौल’

1 अप्रैल के ‘शुभ अवसर’ पर आज ट्विटर पर #Pappudiwas ट्रेंड कर रहा है। “न जाने क्यों” ट्विटर यूजर्स द्वारा आज ‘पप्पू दिवस’ हैशटैग पर राहुल बाबा को जमकर याद किया जा रहा है। उनके तरह-तरह के वीडियो क्लिप यूजर्स द्वारा शेयर किए जा रहे हैं और उनके कई पुराने बयानों को दोबारा से आज के दिन से जोड़कर प्रासंगिक बना दिया गया है। इस बीच कई मीम भी शेयर हो रहे हैं।

अगर आपको यकीन न हो रहा हो तो खुद ट्विटर पर इस हैशटेग को क्लिक करके देख लीजिए, आपको हर रूप में राहुल बाबा के ही दर्शन होंगे।

इस ट्रेंड में आपको राहुल के वो दिल की बात सुनाई पड़ेगी जिसमें उन्होंने बेहद सीरियस चेहरे के साथ कहा था- “This morning i woke up at night…”

और साथ ही वो किस्सा भी मिलेगा जिसे सुनाते हुए राहुल ने कॉन्ग्रेस पार्टी को खुद ही एनआरआई लोगों की पार्टी बता दिया था।

इस बीच ट्विटर पर राहुल का एक और बयान भी दोबारा से प्रासंगिक होता दिखा जिसमें उन्होंने स्वीकारा है कि उनके जैसा बेवकूफ़ इस देश में नहीं हैं।

इसके अलावा अभी हाल ही में राहुल बाबा एक जनसभा में पहुँचे थे जहाँ पर मौजूद लोगों को उन्होंने जमकर ज्ञान दिया। यह भी समझाया कि “दुनिया को अपनी स्थिति से मत देखो बल्कि दुनिया को अपनी स्थिति से देखो।” दरअसल वो यहाँ पर कहना क्या चाहते थे यह पक्का पता तो सिर्फ बाबा को ही होगा। शायद इसलिए आज के मौके पर इस छोटे से वीडियो को करीब 582 बार रीट्वीट किया गया।

एक ऐसा वीडियो भी शेयर हुआ जहाँ राहुल दिखा रहे हैं कि तालियाँ कैसी बजाई गईं। इसमें शायद वो संसद में बजी तालियों पर इशारा कर रहे हैं।

इस हैशटेग पर कुछ लोगों ने अपनी कलाकारी भी दिखाई और अमिताभ बच्चन के करोड़पति और राहुल के भाषण को मिला करके एक मैशअप तैयार कर दिया।

ऐसे अनेकों ट्वीट और पोस्ट आज के दिन सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहे हैं। इनमें राहुल द्वारा जनता को किए ₹72000 का भी वादा है, जिसे सबसे छोटा अप्रैल फूल मैसेज बताया गया है।

ट्विटर पर कुछ लोगों ने राहुल को आज के दिन शुक्रिया भी कहा। इन लोगों का मानना है कि राहुल ने उन्हें इस दिन मुस्कुराने और हँसने की वजह दी है।

इसके अलावा कुछ लोगों ने यहाँ तक भी कहा कि अगर राहुल की बात को सुनकर पर कोई कंफ्यूजन हो जाता है तो इसमें गलती राहुल की नहीं हैं, कन्फ्यूज़ होने वाले की है।

सुकन्या समृद्धि योजना ‘ग़ैर-इस्लामिक’ घोषित: फ़तवा जारी, 200 से अधिक इस्लामिक जानकारों की सहमति

केंद्र की सुकन्या समृद्धि योजना को 200 से अधिक इस्लामिक जानकारों (मुफ्ती) ने ‘ग़ैर-इस्लामिक’ घोषित किया है। इस योजना के तहत बैंक में बालिकाओं के नाम पर उनके माता-पिता द्वारा खाता खुलवाया जाता है। शरिया के अनुसार यह योजना एक ग़ैर-इस्लामिक योजना है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद (JUH) के मीडिया प्रभारी अजिमुल्लाह सिद्दीकी के अनुसार, सुकन्या समृद्धि योजना ब्याज पर आधारित है, इसलिए यह योजना ग़ैर-इस्लामी है।

मोदी सरकार ने 2015 में ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओं’ अभियान के तहत यह योजना शुरू की थी। सुकन्या समृद्धि योजना केंद्र सरकार की ख़ास योजना है। इस योजना के तहत 10 साल तक की बच्चियों का बैंक खाता मात्र 250 रुपए में किसी पोस्ट ऑफिस या कमर्शियल ब्रांच की अधिकृत शाखा में उनके माता-पिता द्वारा खुलवाया जाता है। इस योजना के तहत खुलवाए गए खातों में जमा राशि पर 8.6% सालाना ब्याज (वर्तमान दर) दिया जाता है। शरिया के अनुसार, इस योजना के तहत मिलने वाला ब्याज ही इसे ग़ैर-इस्लामी बनाता है।

हालाँकि, विभिन्न मोबाइल ऐप के माध्यम से वित्तीय लेनदेन, जैसे कि PayTM या यहाँ तक ​​कि एक मोबाइल ऐप के माध्यम से टैक्सी बुक करने को भी शरिया के अनुसार वैध माना जाता है। इसके अलावा यह भी स्पष्ट किया गया कि वैध वस्तुओं के विज्ञापन के लिए Google AdSense का उपयोग करना भी वैध है, जबकि Google AdSense के ज़रिए फिल्मों और अवैध कार्यक्रमों को बढ़ावा देना वैध नहीं है।

जमीयत उलेमा ए हिन्द के मीडिया प्रभारी अजीमुल्लाह सिद्दीकी ने बताया कि इस हफ़्ते की शुरुआत में संगठन द्वारा आयोजित तीन दिवसीय सम्मेलन में बच्चियों के लिए चलाई जा रही छोटी बचत योजना पर एक प्रस्ताव पारित किया गया। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के कमाल फारुकी ने कहा कि बैंक के पास पूँजी के माध्यम से ब्याज अर्जित करना ‘ग़ैर-इस्लामी’ है।

दारुल उलूम देवबंद का ‘फतवा विभाग’ अक्सर ‘ग़ैर-इस्लामिक’ घोषित करने के लिए चर्चा में रहता है। पिछले साल इसने सीसीटीवी कैमरों को ‘ग़ैर-इस्लामिक’ घोषित किया था। इससे पहले, ऐसी ख़बर आई थी कि उन जगहों में ‘निकाह’ आयोजित नहीं किया जाएगा, जहाँ संगीत और नृत्य हो रहा या डीजे बज रहा हो। यह इस्लाम के ख़िलाफ़ है, इस तरह के निक़ाह का बहिष्कार किया जाएगा। दारुल उलूम देवबंद ने दुकानदारों द्वारा चूड़ियाँ पहनने को लेकर भी मुस्लिम महिलाओं के ख़िलाफ़ फ़तवा जारी किया था क्योंकि अजनबी पुरुषों द्वारा महिलाओं का हाथ छूना ‘एक बड़ा पाप’ है।

देवबंद के मौलवियों ने एक बार जीवन बीमा के ख़िलाफ़ भी फतवा जारी किया था, क्योंकि उन्होंने दावा किया था कि जीवन और मृत्यु अल्लाह के हाथ में है और कोई भी बीमा कंपनी किसी व्यक्ति की लंबी उम्र की गारंटी नहीं दे सकती है।

इसके अलावा कुछ दिनों पहले दारुल उलूम देवबंद से जुड़े एक मौलवी ने फुटबॉल देखने वाली महिलाओं के ख़िलाफ़ फ़तवा जारी किया, क्योंकि पुरुषों को नंगे घुटनों में खेलते हुए देखना महिलाओं के लिए मना है।

अतीत में फेसबुक और व्हाट्सएप जैसी सोशल मीडिया वेबसाइटों पर स्वयं और परिवार की तस्वीरें पोस्ट करने के ख़िलाफ़ भी फतवे जारी किए गए थे। नए साल के जश्न और डिजाइनर बुर्के भी इसी फतवे में शामिल थे।

15 साल की मुस्लिम लड़की को भगवान कृष्ण के रूप में तैयार करने और गीता का पाठ करने के ख़िलाफ़ भी फ़तवा जारी किया गया था। एक देवबंद उलेमा ने कथित तौर पर भगवान कृष्ण के रूप में तैयार लड़की पर अपनी नाराज़गी व्यक्त की थी और इसे इस्लाम विरोधी तक करार दिया था।

20 किलो की ‘कंकाल’: पति और सास की हैवानियत, दूधमुँहे बच्चों पर भी नहीं खाया तरस

30 मार्च को केरल के कोल्लम में तुषारा नाम की एक 27 वर्षीय युवती को दहेज के कारण भूख से तड़पा-तड़पा कर मार दिया गया। इस मामले में रोंगटे खड़े कर देने वाली बात यह है कि जिस समय युवती की मौत हुई, उस वक्त उसका वजन केवल 20 किलो था। महिला की अस्पताल में मौत के बाद पुलिस ने मामले की जाँच शुरू कर दी।

पुलिस के अनुसार महिला के पति (चंदूलाल) और सास (गीतालाल) द्वारा उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाता था। जिसके चलते दोनों ने तुषारा को खाना भी देना बंद कर दिया था। लंबे समय से महिला को केवल भीगे चावल और चीनी का पानी दिया जा रहा था। आज (अप्रैल 1, 2019) राष्ट्रीय महिला आयोग ने इस मामले से जुड़ी खबरों का संज्ञान लेते हुए केरल के पुलिस महानिदेशक को इस मामले में सख्त और तत्काल कार्रवाई करने के लिए एक पत्र भी जारी किया है।

पुलिस की मानें तो महिला का शरीर कंकाल जैसा दिखने लगा था, जिसमें मुश्किल से ही कोई मांस बचा था। रिश्तेदारों के आरोप हैं कि उसे इस प्रकार प्रताड़ित करने के पीछे दहेज मुख्य कारण था।

तुषारा की माँ विजयलक्ष्मी का कहना है कि उनकी बेटी को पिछले पाँच साल से परेशान किया जा रहा था और घर के किसी सदस्य से भी नहीं मिलने दिया जाता था। तुषारा की माँ कहती हैं कि उन्होंने पुलिस में इस बात की सूचना इसलिए नहीं दी थी क्योंकि उन्हें डर था कि वे लोग उसे मार देंगे। चंदूलाल के पड़ोसी का आरोप है कि महिला पर मानसिक और शारीरिक रूप से अत्याचार किया जाता था।

यहाँ बता दें कि महिला का विवाह 2013 में हुआ था। शादी के समय महिला के घरवालों ने कुछ सोने के गहने, रुपए लड़के के परिवार वालों को दिए थे और 2 लाख रुपए बाद में देने का वादा किया था। महिला के दो बच्चे हैं, एक की उम्र तीन साल है और एक की डेढ़ साल है।

Money Laundering: राहुल गाँधी के बहनोई रॉबर्ट वाड्रा को ज़मानत, लेकिन कोर्ट ने लगाई #शर्त

मनी लॉन्डरिंग के मामले में सोनिया गाँधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा को अदालत से ज़मानत मिल गई है। हालाँकि स्पेशल सीबीआई अदालत ने अग्रिम ज़मानत देते हुए वाड्रा को बिना अनुमति देश नहीं छोड़ने को कहा। वाड्रा के क़रीबी मनोज अरोड़ा को भी ज़मानत दे दी गई है। ये दोनों अभी अंतरिम ज़मानत पर बाहर थे। हालाँकि, स्पेशल सीबीआई कोर्ट ने ज़मानत के लिए शर्तें भी रखी हैं। ये दोनों ही आरोपित बिना अदालत की पूर्व अनुमति के देश छोड़ कर नहीं जा सकते। दोनों को ही जब भी बुलाया जाएगा, उन्हें आकर जाँच में सहयोग करना पड़ेगा। इसके अलावा कोर्ट ने उन्हें सबूतों के साथ छेड़छाड़ न करने व गवाहों को न बरगलाने के भी आदेश दिए।

कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी के पति रॉबर्ट वाड्रा और उनके सहयोगी को कोर्ट ने 5 लाख रुपए के निजी मुचलके पर ज़मानत दी है। बता दें कि ज़मीन ख़रीद और शेल कंपनियों के जरिए विदेशों में (लंदन और दुबई) संपत्ति खरीदने के मामले में वाड्रा से अब तक प्रवर्तन निदेशालय (ED) कई बार लंबी पूछताछ भी कर चुका है।

दुबई के जुमैरा में ई-74 नामक एक विला है, जिसकी क़ीमत ₹14 करोड़ बताई जा रही है। इसी विला को लेकर ED ने उनसे जानकारियाँ माँगी थी। दुबई की कम्पनी स्काईलाइट्स इंवेस्टमेंट्स से वाड्रा के संबंधों को लेकर भी उनसे सवाल किए गए थे। एजेंसी का मानना है कि वाड्रा ने इस कम्पनी में भारी मात्रा में नकदी जमा कराया था। वाड्रा की एक कम्पनी का नाम भी स्काईलाइट्स हॉस्पिटैलिटी है। जाँच अधिकारी इसे महज़ संयोग नहीं मान रहे।

वाड्रा से सीसी थम्पी नमक व्यक्ति से अपना सम्बन्ध स्पष्ट करने को भी कहा गया था। बता दें कि थम्पी स्काईलाइट्स इन्वेस्टमेंट का शेयरहोल्डर था। ED को शक है कि ये कोई शेल कम्पनी है। थम्पी ने ही जून 2010 में भगोड़े हथियार कारोबारी संजय भंडारी से लंदन का फ्लैट ख़रीदा था। पूछताछ के दौरान वाड्रा ने स्काईलाइट्स इंवेस्टमेंट्स के साथ किसी प्रकार के सम्बन्ध होने की बात को नकार दिया। अमर उजाला में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, पूछताछ के दौरान वाड्रा घबराए से लग रहे थे।

वाड्रा और उसकी माँ से बीकानेर ज़मीन ख़रीद में अनियमितताओं को लेकर सवाल किए जाएँगे। आरोप है कि वाड्रा ने बीकानेर जिले के कोलायत में 79 लाख रुपए में 270 बीघा जमीन खरीदकर तीन साल बाद उसे 5.15 करोड़ रुपए में बेच दी थी। रॉबर्ट वाड्रा के ख़िलाफ़ कई राज्यों में जमीन खरीद में अनियमितता बरतने के केस चल रहे हैं।

Seema-The Untold Story: 1962 में चीनी आक्रमण और सरकारी उदासीनता को दर्शाती फिल्म

राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म निर्माता हिरेन बोरा द्वारा बनाई गई असमिया भाषा की फिल्म सीमा- द अनटोल्ड स्टोरी ने सिनेमाघरों में धूम मचा दी है। ये फिल्म 29 मार्च को रिलीज हुई। इस फिल्म में 1962 में चीन द्वारा किए गए आक्रमण के दौरान असम के तेजपुर के लोगों की स्थिति को दर्शाया गया है। इसमें दिखाया गया है कि उस समय किस तरह डर गए थे और उन्होंने अपना बचाव किस तरह से किया था।

बता दें कि, फिल्म निर्माता हिरेन बोरा का होमटाउन तेजपुर है और जिस समय ये आक्रमण हुआ था, उस समय बोरा 12 साल के थे। उस घटना को इन्होंने अपनी आँखों से देखा है। चीनी आक्रमण के लगभग 6 दशक बाद, बोरा ने इस फिल्म के जरिए उस समय के भयावह स्थिति को दिखाने का प्रयास किया है। हिरेन का कहना है कि इस फिल्म के जरिए उन्होंने उस तेजपुर को श्रद्धांजलि दी है, जहाँ पर उनका बचपन बीता है। इस फिल्म में निपॉन गोस्वामी, अरुण नाथ और जहाँआरा बेगम जैसे कलाकारों ने मुख्य किरदार निभाए हैं। वहीं, जाने-माने अभिनेता जॉर्ज बेकर ने ब्रिटिश पत्रकार विलियम स्मिथ की प्रमुख भूमिका निभाई है।

हिरेन 1962 की घटना को याद करते हुए कहते हैं कि हालाँकि तेजपुर से उनकी काफी यादें जुड़ी हैं, लेकिन एक ऐसी याद है जो वहाँ से दूर जाने के बाद आज भी उनके जेहन में जिंदा है। बोरा बताते हैं कि तेजपुर में उस समय हाहाकार मच गया, जब 1962 में असम के एक छोटे से शहर तेजपुर में युद्ध की आशंका पैदा हुई। चीनी सैनिक तेजी से भारत में अपना रास्ता बनाकर लगभग 150 किमी दूर बोमडिला पहुँच गए थे। हालाँकि चीन ने युद्धविराम की घोषणा कर दी, मगर लोगों के मन में भय पहले से ही पैदा हो गया था। जब स्थिति को काबू करने में प्रशासन भी असफल हो गई, तो लोगों ने युद्ध के डर से भागना शुरू कर दिया।

हिरेन बोरा बताते हैं कि उनके दादा जी ने अपने बेटों को परिवार के साथ वहाँ से निकलकर पास के नागाँव जाने के लिए कहा। मगर उन्होंने खुद वहाँ पर रहकर अपने शहर की रक्षा करने का फैसला किया। हिरेन कहते हैं कि उनके दादाजी इस दौरान अकेले नहीं थे। कुछ और भी लोग थे वहाँ पर, जिनमें से कुछ लोगों के पास तो बचने का विकल्प नहीं था, तो कुछ लोग तेजपुर से लगाव की वजह से वहाँ रुक गए थे। हिरेन को इस बात का अफसोस है कि 1962 का चीनी आक्रमण पूर्वोत्तर भारत के इतिहास में एक बहुत बड़ी घटना होने के बावजूद इसे ना तो लोकप्रिय संस्कृति में, ना ही किताबों में चित्रित किया गया और ना ही फिल्मों में दिखाया गया।  

चिंतन: निराशावादी और विरोधाभासी है वामपंथ, समाज के विपरीत है इसकी अवधारणा

हेगेल के सिद्धांत के मुताबिक मानव मस्तिष्क की जीवन प्रक्रिया, अर्थात चिंतन की प्रक्रिया, जिसे हम ‘विचार’ के रूप में जानते हैं, एक विषय या कर्ता है, और वास्तविक दुनिया केवल इस विचार का प्रतिबिंब है।
एक अन्य संदर्भ में हेगेल ने विचारों को दुनिया के सृजनकर्ता के रूप में माना। लेकिन मार्क्स के अनुसार भौतिक दुनिया मानव मस्तिष्क में प्रतिबिंबित होती है, और फिर विचार बनते हैं। यानी कि कम्युनिज्म या वामपंथ का पूरा सिद्धांत “विचारों” पर केंद्रित है, बिना किसी विचारधारा के। साम्यवाद केवल ‘विचार’ की बात करता है, ‘विचारहीनता’ या ‘सोचने की प्रक्रिया’ की नहीं।

जैसा कि परंपरागत फिलोसफी में माना जाता है, विचार अल्पकालिक रहते हैं, सभी विचारों को बदला जा सकता और वे खुद भी प्रतिक्षण विलुप्त होते रहते हैं। इसके विपरीत, “विचार प्रक्रिया” कभी समाप्त नहीं होती है और यह लगभग दसियों या सैकड़ों अन्य विचारों को हर विचार के लिए संसाधित करती है, जो मर जाती है। कम्युनिज्म ये नोटिस ही नहीं करता है कि “इस दुनिया के प्रति हमारी प्रतिक्रिया ही हमारे विचारों को जन्म देती है”।

उदाहरण के लिए, अगर मैं फूल देखता हूँ- यहाँ ‘देखना’ एक विचार नहीं है और अगर मैं देख रहा हूँ तो कोई विचार नहीं उठेंगे। लेकिन जब बहुत ही तत्परता से मैं कहता हूं कि ‘फूल बहुत सुंदर है’, तो विचार पैदा होता है। अगर मैं केवल तभी देखूँ तो सुंदरता की भावना होगी, लेकिन विचार पैदा नहीं होगा। लेकिन जैसे ही हम इसे अनुभव करते हैं, हम इसे एक शब्द देना शुरू करते हैं। यह विचार ज्ञान को शब्द देने के रूप में जन्म लेता है, यहीं प्रतिक्रिया, शब्द देने की आदत, दर्शन को धारणा देती है। सनसनी दब जाती है, दर्शन उदास हो जाता है, पर शब्द मन में तैरते रहते हैं। ये शब्द एकमात्र विचार हैं!

मार्क्सवाद समाज को दो भागों में वर्गीकृत करता है, जो कि शोषण कर रहे हैं और जो शोषित हैं। यह उन परिभाषाओं के विपरीत है, जिन पर ‘समाज’ मौजूद है। और ये उन सभी सिद्धांतो को भी ख़ारिज करता है जो एक व्यक्ति या संस्था की सफलता और खुशी के उपायों का अनुमान लगाते हैं। तो, मूल रूप से कम्युनिज्म ये भविष्यवाणी करता है कि ‘समाज में कोई भी सफल नहीं है या कुछ अच्छा भला नहीं होता है।

और फिर यह कम्युनिस्टों द्वारा लिखी गई बहुत लोकप्रिय स्लोगन के विपरीत है, जो हर किसी को उसकी क्षमताओं के अनुसार देने और उनकी जरूरतों के अनुसार प्राप्त करने की वकालत करता है। इस प्रकार, किसी समाज की आवश्यकताओं को एक व्यक्ति की विशिष्ट आवश्यकताओं से ऊपर और उससे आगे रखा जाएगा, कम्युनिज्म अपनी इस एकमात्र थ्योरी को भी विरोधाभास की नजर से देखने लगता है।

इसलिए, एक आभासी विचारधारा पर आधारित कम्युनिज्म, नवाचार को पूरा करने पर या विचारों की प्रकृति निर्धारित करने वाली विचार प्रक्रिया पर काम नहीं करता। मैं समझता हूँ कि वामपंथ के पीछे छिपे पागलपन और विवेकशीलता का निर्धारण करने के लिए इतना ही काफ़ी है।

(उपर्युक्त चिंतन अमेरिकी लेखक और FBI के अधिकारी रहे W. Cleon Skousen की पुस्तक “The Naked Communist” को आधार बनाकर लिखा गया है। वामपंथियों ने इस पुस्तक को राइट विंग वालों का हथकंडा बताकर रिजेक्ट कर दिया था।)