एक तरफ जहाँ जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों ने आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई तेज कर दी है। वहीं छटपटाहट में आतंकी पिछले कई दिनों से आम आदमियों और पुलिस बलों को भी निशाना बनाना शुरू कर दिया है। एक बार फिर आतंकियों जम्मू-कश्मीर के शोपियाँ में एक महिला विशेष पुलिस अधिकारी (SPO) खुशबू जान को आतंकियों ने गोली मार दी। हालाँकि, आनन-फानन में खुशबू को अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका।
वहीं, पुलिस के साथ सुरक्षा बलों ने इलाके की घेराबंदी कर आतंकियों के खिलाफ सर्च ऑपरेशन तेज कर दिया है।
J&K Police: Terrorists today fired on a police woman Khushboo Jan at her village in Vehil area of Shopian district. She sustained critical injuries & was evacuated to hospital where she succumbed. We condemn this gruesome terror act & stand by her family at this critical juncture pic.twitter.com/rcOV4nAdFO
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, शोपियाँ के वेहिल इलाके में महिला पुलिस अधिकारी को आतंकियों ने उनके घर पर ही गोली मारी है।
बता दें कि इससे पहले बीते गुरुवार को पुलवामा में आतंकियों ने 40 वर्षीय एक व्यक्ति को जबरन उसके घर से निकालकर गोली मार दी थी। वहीं, बुधवार को पुलवामा में ही आतंकियों ने सेना के एक पूर्व जवान की भी गोली मारकर हत्या कर दी थी।
चुनाव की तारीख़ों की घोषणा होते ही सियासी हलचल काफी तेज हो गई है। सभी राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके से चुनाव जीतने की कोशिशें करती हुई नज़र आ रही है। इसी बीच खबर आ रही है कि बिहार में आरजेडी और कॉन्ग्रेस के बीच हुए महागठबंधन में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। साफ तौर पर तो नहीं, मगर अप्रत्यक्ष रूप से इनके बीच की खटपट सामने आने लगी है।
बता दें कि महागठबंधन के बीच का ये मनमुटाव सीट के बँटवारे को लेकर है। इस मसले पर आरजेडी के नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने ट्विटर पर बिना किसी का नाम लिए कॉन्ग्रेस पर तंज कसते हुए उसे अहंकारी पार्टी बताया।
तेजस्वी ने अपने ट्वीट में कहा, ”संविधान और देश पर अभूतपूर्व संकट है। अगर अबकी बार विपक्ष से कोई रणनीतिक चूक हुई तो फिर देश में आम चुनाव होंगे या नहीं, कोई नहीं जानता? अगर अपनी चंद सीटें बढ़ाने और सहयोगियों की घटाने के लिए अहंकार नहीं छोड़ा तो संविधान में आस्था रखने वाले न्यायप्रिय देशवासी माफ़ नहीं करेंगे।”
संविधान और देश पर अभूतपूर्व संकट है। अगर अबकी बार विपक्ष से कोई रणनीतिक चुक हुई तो फिर देश में आम चुनाव होंगे या नहीं, कोई नहीं जानता? अगर अपनी चंद सीटें बढ़ाने और सहयोगियों की घटाने के लिए अहंकार नहीं छोड़ा तो संविधान में आस्था रखने वाले न्यायप्रिय देशवासी माफ़ नहीं करेंगे।
तेजस्वी यादव के इस ट्वीट को कॉन्ग्रेस से इसलिए जोड़ा जा रहा है, क्योंकि इन्होंने ऐसे समय में ये बयान दिया है, जब आरजेडी और कॉन्ग्रेस के बीच सीटों के बँटवारे का मामला अटका हुआ है। इस मामले पर बिहार चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष और राज्य सभा सांसद अखिलेश सिंह ने कहा कि उनकी पार्टी बिहार में 11 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। हालाँकि, उम्मीदवारों के नाम की घोषणा होना अभी बाकी है।
महागठबंधन में राजद और कॉन्ग्रेस के बीच बढ़ती तल्खी को देखते हुए राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने खुद इस बारे में फैसला लेने का विचार किया है। आरजेडी प्रवक्ता और राज्यसभा सांसद मनोज झा ने बताया कि चुनाव से जुड़े सारे फैसले लालू प्रसाद यादव ही लेंगे। यानी कि महागठबंधन में सीटों के बँटवारे से लेकर आरजेडी के उम्मीदवारों के चयन में अंतिम मुहर लालू प्रसाद यादव की ही लगेगी।
भारत ने म्यांमार में अब तक दो सर्जिकल स्ट्राइक की हैं। एक जून 2015 में की गई थी और दूसरी हाल ही में फरवरी-मार्च (2019) के बीच चले ऑपरेशन में की गई जिसकी जानकारी कुछ दिन पहले ही मीडिया में आई। इस लेख में इन दोनों ऑपरेशन का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया गया है।
मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार फरवरी 17 से मार्च 2, 2019 के बीच भारतीय सेना की स्पेशल फ़ोर्स के जवानों ने म्यांमार में फिर से आतंकी ठिकानों पर हमला कर उन्हें ध्वस्त कर दिया। इस बार अराकान आर्मी को निशाना बनाया गया जो भारत के सहयोग से म्यांमार में निर्मित सित्वे पोर्ट के लिए खतरा बन चुके थे। ईरान में चाबहार के बाद अब म्यांमार में भी भारत के सहयोग से निर्मित सित्वे पोर्ट चालू हो चुका है जिसके बाद दक्षिण एशिया में भारत की रणनीतिक एवं व्यापारिक साख़ मज़बूत होनी निश्चित है। इसे चीन के बेल्ट एन्ड रोड इनिशिएटिव (BRI) के जवाब के रूप में देखा जा रहा है।
सित्वे पोर्ट का निर्माण कालादान मल्टी मोडल ट्रांज़िट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट के अंतर्गत हुआ है जिसके बहुआयामी उद्देश्य हैं। कालादान प्रोजेक्ट भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों और कलकत्ता को म्यांमार के रखाइन और चिन राज्यों से जल तथा भूमि मार्ग से जोड़ने के लिए 2008 में प्रारंभ किया गया था। भारत ने इस पूरे प्रोजेक्ट पर लगभग ₹3170 करोड़ का निवेश किया है जिसमें से सित्वे पोर्ट और पालेत्वा में अंतर्देशीय जलमार्ग पर लगभग ₹517 करोड़ व्यय हुए हैं।
BREAKING @IndiaToday: Big infra project vital for North East connecting Kolkata to Mizoram via Sitwe port in Myanmar under threat. How Indian Army thwarted the danger to #KaladanProject in a 2 week operation when focus was on responding to Pak post Pulwama More updates coming up pic.twitter.com/UgEzxCoHIw
चीन ने कालादान परियोजना को बाधित करने के भरसक प्रयास किए थे। यदि चीन म्यांमार स्थित सित्वे पोर्ट पर अपना अधिकार स्थापित कर लेता तो बंगाल की खाड़ी में भारतीय नौसेना को अपनी प्रभावी क्षमता पुनः प्राप्त करना अत्यंत कठिन होता। चीन ने म्यांमार के आतंकी गुटों से भी सम्पर्क स्थापित किए थे ताकि उन्हें बांग्लादेश और म्यांमार के मार्ग से भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में घुसपैठ कराई जा सके।
अराकान आर्मी म्यांमार सरकार द्वारा घोषित आतंकवादी संगठन है जो लगातार म्यांमार की सेना ‘तत्मादॉ’ से लड़ता रहता है। दिसंबर 2015 में इस संगठन ने रखाइन प्रान्त में सित्वे के पास कई दिनों तक हिंसक संघर्ष किया था। उसके बाद भी म्यांमार की सेना के विरुद्ध कई बार लड़ाई हुई। सित्वे को सुरक्षित रखना भारत के हित में जरूरी था इसलिए भारतीय सेना ने म्यांमार सेना के साथ मिलकर अराकान आर्मी को सबक सिखाया।
इस ऑपरेशन में करीब एक दर्जन आतंकी कैम्पों को ध्वस्त कर दिया गया। टाइम्स ऑफ इंडिया में रजत पंडित की रिपोर्ट के अनुसार भारत ने पहले से ही म्यांमार की 1600 किमी लंबी सीमा पर ऑपरेशन सनराईज़ के अंतर्गत इन्फैंट्री, असम राइफल्स, स्पेशल फ़ोर्स और ड्रोन के अतिरिक्त बल तैनात किए हैं। म्यांमार और भारतीय सेना ने चिन स्टेट और साउथ मिज़ोरम स्थित बॉर्डर पिलर 1-9 पर मिलिट्री ऑपरेशन कर अराकान आर्मी के 10-12 कैंप तबाह कर दिए जो कचिन इंडिपेंडेंस आर्मी के साथ मिलकर काम कर रहे थे। कचिन इंडिपेंडेंस आर्मी चीन के प्रभाव में काम करने वाला संगठन है। पूरे ऑपरेशन में NSCN (K), NDFB (S), ULFA (I) के उग्रवादियों को भी मार गिराया गया।
इससे पहले 2015 में की गई सर्जिकल स्ट्राइक में डोगरा रेजिमेंट के 18 सैनिकों की हत्या का बदला लिया गया था। 4 जून 2015 को NSCN के आतंकवादियों ने मणिपुर के चंदेल ज़िले में भारतीय सेना के 18 जवानों की हत्या कर दी थी। इसका प्रतिशोध लेने के लिए भारतीय सेना ने म्यांमार की सीमा के 10 किमी भीतर तक स्पेशल फ़ोर्स भेजी थी। उस समय तत्कालीन COAS जनरल दलबीर सिंह को ब्रिटिश आर्मी की गोरखा रेजिमेंट की 200वीं वर्षगाँठ पर ब्रिटेन जाने का न्योता मिला था जो उन्होंने स्थगित कर दिया था।
स्पेशल फ़ोर्स की जिस यूनिट (21 PARA SF) को म्यांमार भेजा गया था उसे ‘वाघनख’ नाम दिया गया था। यह नाम छत्रपति शिवाजी के उस वाघनख पर रखा गया था जिससे उन्होंने अफजल खान का वध किया था। स्पेशल फ़ोर्स की 21 PARA यूनिट पहले 21 मराठा लाइट इन्फैंट्री बटालियन थी। बाद में उसे स्पेशल फ़ोर्स यूनिट बनाया गया था। म्यांमार जाने से पहले स्पेशल फ़ोर्स की यूनिट संयुक्त राष्ट्र के मिशन पर साउथ सूडान जाने वाली थी। तभी उन्हें दिल्ली से नॉर्थ ईस्ट आने के आदेश मिले। इस पर एक जवान ने मजाक में कहा, “कहाँ तो हम प्लेन से विदेश जाने वाले थे लेकिन अब पैदल जाना पड़ेगा।”
स्पेशल फ़ोर्स को दो ठिकानों पर हमले करने थे- एक जिसमें करीब 150-200 आतंकी थे और दूसरा छोटा था जिसमें 50-60 आतंकी थे। हमले की पूरी प्लानिंग 57 डिविज़नल हेडक्वार्टर इंफाल में बनाई गई। निर्धारित रणनीति के तहत तत्कालीन कोर कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल बिपिन रावत ने पूरी गोपनीयता के साथ स्पेशल फ़ोर्स की टुकड़ी को ऑपरेशन को अंजाम देने के आदेश दिए। 9 जून को 50 सैनिकों की टुकड़ी म्यांमार के घने जंगलों में घुसी जहाँ बड़े कैंप पर अचानक हमला किया गया। उस कैंप में लगभग 150 आतंकी थे। स्पेशल फ़ोर्स को स्पष्ट निर्देश थे कि मारे गए आतंकियों की लाशें गिनने या फोटो लेने के लिए रुकना नहीं है। उन्हें काम खत्म कर लौटने का आदेश था।
स्पेशल फ़ोर्स के सर्जिकल स्ट्राइक कर लौटने के बाद अजित डोभाल और विदेश सचिव जयशंकर ने म्यांमार जाकर राजनयिक संबंध मजबूत किए जिसके कारण हमें म्यांमार से सटी अंतरराष्ट्रीय सीमा पर पूर्वोत्तर राज्यों में उग्रवादी और आतंकी संगठनों को समाप्त करने में म्यांमार आर्मी की सहायता मिली।
भारत के लिए सित्वे पोर्ट के महत्व को जानने के लिए यहाँ पढ़ें।
नोकिया-बीएसएनएल के सहयोग से बना पहला स्मार्ट पोल बीएसएनएल के परिसर में संचालन प्रारंभ करने के लिए तैयार है। इकोनोमिक टाइम्स में छपी खबर के अनुसार 21 मार्च (गुरुवार) को इस स्मार्ट पोल का परिचालन प्रारंभ हो सकता है।
यह पोल नोकिया के इंटेलिजेंट इन्फ्रास्ट्रक्चर ट्रांसफॉर्मेशन प्रोग्राम का अंग है।
वायु प्रदूषण रोकने में सहायक
इंडिया मोबाइल कॉन्ग्रेस के दौरान प्रेस से बात करते हुए बीएसएनएल के चेयरमैन व मैनेजिंग डाइरेक्टर अनुपम श्रीवास्तव ने कहा था कि इन पोल्स का विपणन और प्रसार (marketing and deployment) नोकिया और बीएसएनएल संयुक्त तौर पर करेंगे। “यह स्मार्ट पोल्स वायु प्रदूषण के स्तर को समय रहते भाँप कर सम्बंधित विभाग को सूचित कर देंगे। यह परली जलाने पर वायु प्रदूषण के स्तर में तेज़ बढ़ोतरी को भी समय रहते दर्ज कर लेगा (ताकि उसकी रोकथाम हो सके)।
गौरतलब है कि भारत के लिए वायु प्रदूषण एक अति-गंभीर और उतना ही विवादस्पद विषय के साथ-साथ चुनौती भी है। पिछले दो वर्षों से सुप्रीम कोर्ट दिवाली पर पटाखे चलाने पर किसी-न-किसी प्रकार रोक लगाने, या कम-से-कम कमी लाने, के लिए प्रयासरत है।
(यह बात अलग है कि खुद पटाखे बेचने वालों को अवमानना की चेतावनी देने के बाद हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अचानक ही यह सवाल कर डाला कि प्रदूषण के और बड़े-बड़े कारकों, जैसे वाहनों आदि के बदस्तूर जारी रहते हुए आखिर लोग पटाखों से ही क्यों नाराज़ हैं?)
दिल्ली के मुख्मंत्री अरविन्द केजरीवाल ने भी दिल्ली में वाहनों से वायु प्रदूषण रोकने के लिए ऑड-ईवेन फार्मूला लागू करने का प्रयास किया था।
और भी हैं प्रयोग
गत अक्टूबर में बीएसएनएल ने ₹46 लाख प्रति पोल की दर से नोकिया को 50 पोल की आपूर्ति के लिए अनुबंधित किया था।
इन स्मार्ट पोल्स का प्रयोग शहरों में वाई-फाई सुविधा प्रदान करने के लिए (केजरीवाल जी ध्यान दें), मोबाइल टॉवर, स्ट्रीट लाइटिंग और यहाँ तक कि सुरक्षा हेतु सर्विलांस के लिए भी हो सकता है।
5G की दौड़ में भी सहायक
4G की दौड़ में भले ही बीएसएनएल पिछड़ गया हो (बीएसएनएल के 4G प्लान को दूरसंचार विभाग ने हाल ही में मंजूरी दी है जबकि अधिकांश निजी सेवा-प्रदाताओं ने 2016 के अंत से लेकर 2017 की शुरुआत के बीच अपने 4G परिचालन प्रारंभ कर दिए थे), पर इस स्मार्ट पोल उपक्रम के ज़रिए वह 5G की दौड़ में शायद सबसे आगे निकल गया है। तकनीकी पोर्टल TechHerald के अनुसार यह पोल्स बीएसएनएल के आधारभूत ढाँचे को महत्वपूर्ण तकनीकों जैसे 5G व इन्टरनेट-ऑफ़-थिंग्स (IoT) के लिए तैयार करेंगे।
हमेशा से BJP की आलोचना करने के लिए पहचाने जाने वाले असदुद्दीन ओवैसी ने अपने ट्विटर हैंडल से ट्वीट करते हुए विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को धन्यवाद दिया है। ओवैसी द्वारा विदेश मंत्री को यह धन्यवाद कल न्यूजीलैंड में हमले का शिकार हुए लोगों के परिवार वालों को शीघ्र से शीघ्र वहाँ भेजने के लिए किए जाने वाले प्रयासों पर दिया गया।
दरअसल, कल (मार्च 16, 2019) न्यूज़ीलैंड में हुए हमले में जो लोग घायल हुए, उसमें हैदराबाद निवासी इक़बाल जहाँगीर के भाई अहमद जहाँगीर भी शामिल हैं। हमले की खबर सुनने के बाद इकबाल अपने भाई के परिवार को सहारा देने के लिए न्यूज़ीलैंड जाना चाहते थे। इसके लिए ओवैसी ने ट्वीटर के ज़रिए सुषमा स्वराज से माँग की थी कि इकबाल के न्यूजीलैंड जाने के लिए जरूरी प्रबंधन करा दें।
इस ट्वीट के कुछ देर बाद ही, इस मामले का अपडेट देने के लिए ओवैसी ने एक और ट्वीट किया। इसमें उन्होंने कहा कि वो सुषमा स्वराज का धन्यवाद करते हैं कि उन्होंने खुद उन्हें अहमद के परिवार वालों को समय से न्यूज़ीलैंड पहुँचाने संबंधी प्रयासों से अवगत कराया।
UPDATE: I’d like to thank @SushmaSwaraj for personally updating me about MEA’s efforts in assisting Ahmed’s & Ahsan’s families reach NZ in time
We are in touch with @MEAIndiaMEA & they have assured us that they’re making all efforts to get the visa process expedited https://t.co/pJ2O8a4BgL
ओवैसी ने लिखा कि वो भारत के विदेश मंत्रालय से संपर्क में हैं और उन्होंने आश्वासन दिया है कि वे वीजा प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए सभी प्रयास कर रहे हैं।
एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक अहमद जहाँगीर न्यूऑर्क में पिछले 15 सालों से हैदराबादी रेस्टरां चला रहे थे। शुक्रवार को अल-नूर मस्जिद में हुए हादसे के बाद वह गंभीर रूप से घायल हुए और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। इसके अलावा इस हमले में उन 9 भारतीय लोगों की सूची में एक नाम फरहाज अहसान का भी है, जो उस दिन मस्जिद में नमाज़ पढ़ने आए थे और तब से गायब हैं।
शिया वक्फ बोर्ड उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष वसीम रिज़वी की फ़िल्म ‘राम जन्मभूमि’ को सेंसर बोर्ड की मंज़ूरी मिल गई है और 29 मार्च को रिलीज़ होने वाली है। रिज़वी द्वारा लिखित और निर्मित इस फ़िल्म में 1990 में राम मंदिर आंदोलन के बाद हुई घटनाओं को दर्शाया गया है। निक़ाह-हलाला जैसी सामाजिक बुराई को उजागर करने के लिए फ़िल्म में ख़ुद रिज़वी ने काम किया है।
रिज़वी ने बताया कि इस फ़िल्म की रिलीज़िंग से पहले ही उन्हें धमकियाँ मिल रही हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें टाइगर मेमन के भाई अब्दुल मेमन द्वारा धमकी दी गई थी, जो 1993 के मुंबई बम विस्फोट मामले में एक प्रमुख संदिग्ध था। फ़िल्म को कई धार्मिक समूहों के ग़ुस्से का सामना करना पड़ रहा है, जिससे इसके प्रदर्शन पर जमकर विरोध हो रहा है। इसके अलावा रिज़वी को राजकुमार याकूब हबीउद्दीन तुसी ने एक क़ानूनी नोटिस भेजा, जो ख़ुद को अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर की छठी पीढ़ी के वंशज होने का दावा करता है, ने रिज़वी को फ़िल्म रिलीज़ न करने की चेतावनी दी, क्योंकि उसे लगता है कि यह फिल्म मुगल सम्राट बाबर का तिरस्कार करती है।
बाबरी मस्जिद को ‘देश का कलंक’ कहने के बाद रिज़वी को इस्लामी मौलवियों के कोप का सामना भी करना पड़ा। पिछले साल अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम के तीन संदिग्ध सहयोगियों को दिल्ली पुलिस के विशेष दल ने गिरफ़्तार किया था क्योंकि वे रिज़वी को मारने की योजना बना रहे थे। पुलिस ने तीनों संदिग्धों के पास से हथियार भी बरामद किए थे।
बता दें कि शिया वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिज़वी ने पीएम मोदी को पत्र लिखकर सभी मदरसों को बंद करने अपील की थी। इस पत्र में उन्होंने लिखा था कि मदरसों की शिक्षा छात्रों को आतंकवादी बनने के लिए प्रोत्साहित करती है। ऑल इंडिया फैज़ान-ए-मदीना काउंसिल (AIFMC) नामक एक मुस्लिम संगठन ने मदरसों पर अपनी टिप्पणी के बाद रिज़वी के सिर पर ₹10 लाख के इनाम की घोषणा कर दी थी।
कल न्यूजीलैंड में जो हमला हुआ वह किसी को भी भीतर तक झकझोर देने वाला है। काले कपड़े में मस्जिद में घुसा एक अनजान आदमी करीब 50 लोगों को मौत के घाट उतार कर चला गया। विश्व के कोने-कोने में इस कृत्य की निंदा हुई। ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री ने जहाँ मरे हुए लोगों को श्रद्धांजलि देने के लिए राष्ट्रीय झंडा तक झुकवा दिया, वहीं पाकिस्तान तक के प्रधानमंत्री इमरान खान भी अपने बयान पर अटल रहे कि ‘आतंकवाद का कोई मजहब नहीं होता’। लेकिन ऐसे गंभीर और संवेदनशील मुद्दे पर भी भारत के कुछ तथाकथित लिबरलों से चुप्पी नहीं साधी गई।
हर मुद्दे में अपनी विचारधारा के मुताबिक एंगल ढूँढ लेने वाला यह लिबरल गिरोह एक तरफ़ जहाँ पुलवामा/उरी जैसे हमले पर सरकार से जवाब माँगता है और IAF के हमले पर सवाल उठाता है। वहीं न्यूज़ीलैड की घटना पर एकदम से निर्णायक बनकर उभरा। कल इस हमले के बाद रात में करीब साढ़े आठ बजे न्यूज़ जगत की महान हस्तियों में से एक सागरिका घोष का ट्विटर पर एक ट्वीट आया। जिसकी उम्मीद शायद लोगों को पहले से ही थी। उन्होंने अपने इस ट्वीट में हमले का कारण न केवल दक्षिणपंथियों को बताया बल्कि उन्होंने दक्षिण पंथियों को आतंकवादी ही घोषित कर दिया।
Right wing terrorism and the right wing terrorist: the reality the world needs to wake up to #NewZealandTerroristAttack
‘WHY I AM A LIBERAL’ की लेखिका और भारतीय समाचार जगत के सबसे ऊँचे नामों में से एक सागरिका का यह ट्वीट निसंदेह ही हास्यास्पद है, लेकिन इस पर गंभीर विचार करने की भी बहुत आवश्यकता है। लिबरलों का वह गिरोह जो भारत में एक आतंकी की मौत पर शोक मनाने की सलाह और संवेदनाओं पर लंबा-चौड़ा लेख लिख देता है। उसी गिरोह के लोग न्यूज़ीलैंड जैसे मौक़ों पर एकतरफा निर्णय देने से नहीं चूकते। चूँकि, कल न्यूज़ीलैंड के किसी मस्जिद में यह हमला हुआ और हमलावार के निशाने पर इस्लाम को मानने वाले लोग थे। तो सागरिका ने सीधा इसके तार ‘दक्षिणपंथी’ आतंक से जोड़ दिए। जबकि हमलावार ने खुद फेसबुक के जरिए बताया था कि इस हमला को किन कारणों से प्लान किया गया था।
आतंकवाद को मजहब से न जोड़ने की सलाह देने वाली विचारधारा के लोग सीधे दक्षिणपंथियों को आतंकवादी घोषित कर गए। बिना यह जानें कि जिस ब्रेंटन टैरंट का नाम इस हमले में आ रहा है वह खुद को स्कॉटिश, इंग्लिश और आयरिश पेरेंट्स की संतान बताता है। 2017 में एक आतंकी हमले का शिकार हुई एब्बा नाम की लड़की की मौत से आहत व्यक्ति ने अपने भीतर बदले की आग को अगर आतंकवादी हमले का रूप दे दिया तो इसमें दक्षिणपंथियों की भूमिका कैसे आ गई?
U must be happy2tweet this. Anyway the NZ attacker,he was no Rt winger,he was a communist than got to be liberal and Vowed to destroy “CONSERVATISM “&saw it more in Islam&chose to attack https://t.co/jy8gacwHIc one can justify killings,but you don’t b happy,he wasn’t the RW wala.
ट्विटर पर 280 शब्दों की शब्द सीमा इतनी भी कम नहीं है सागरिका जी कि आप यह न समझा पाएँ कि आपने दक्षिणपंथियों को आतंकवाद का रूप क्यों बताया? आपके लिबरल हो जाने से हर दूसरी विचारधारा आतंकी नहीं हो जाती। इस हमले पर कल से हर कोई शोक मना रहा है जो दर्शाता है कि मानवता अब भी लोगों में बरकरार है। लेकिन शायद तथाकथित लिबरलों को इससे कोई लेना-देना नहीं हैं। तभी उन्होंने इस ऐसे मामले पर भी अपना एंगल मेंटेन कर लिया।
? ऐसे लोग अपने आप को इंटेलेक्चुअल समझते हैं, जिन्हें आतंक में भी सब कुछ दाहिना नजर आता है! वाह!
सागरिका जैसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर बात करने वाले लोग जब भूल जाते हैं कि उनके लिखे एक-एक शब्द का असर उनके पाठकों पर क्या पड़ रहा है तो उसे अतिवाद ही मान लेना चाहिए। क्योंकि ‘ऐसे’ समय में वो उस जनमत का निर्माण कर रहे होते हैं जो कि आने वाले समय में दो विचारधाराओं के बीच दंगे-फसाद का कारण बन सकता है। राजनैतिक और सामाजिक दृष्टि से किसी की भी हर मुद्दे पर दो राय हो सकती है लेकिन मानवता के लिहाज़ से कभी दो नज़रिए नहीं होते हैं। क्योंकि, उस लक्ष्य में भावनाओं को संरक्षित किया जाता है। इसको समझिए! परिस्थितियाँ चाहे कुछ भी हों, लेकिन आतंकवादी हमला करने वाले आतंकवादी ही कहलाते हैं। जो आप आज समाज को दे रहे हैं कल को समाज आपको वही लौटाएगा, और यह बात हर संदर्भ में प्रासांगिक है।
सोशल मीडिया पर पहले ही दो विचारधारा के लोगों को IT सेल की कार्यशैलियों द्वारा वॉर रूम के डिबेटर्स में तब्दील किया जा चुका है। अब व्यक्ति के भीतर तक ऐसे भावनाओं को मत उपजाएँ कि जाति-पाति से परेशान लोग सेकुलकर देश में एक दूसरे की धर्म और विचारों से तंग आकर खतरनाक रूप ले लें। सागरिका के ट्विटर से ही मालूम पड़ा कि उन्हें ऑक्सफॉर्ड यूनियन में वक्ता के रूप में बुलाया गया है। उम्मीद है कि वह वहाँ जाकर अपने ट्वीट की तरह लोगों को बाँटने का प्रयास नहीं करेंगी। और याद रखेंगी कि आपके लिबरल होने का मतलब दक्षिणपंथियों का या उनकी विचारधारा का आतंकी होना नहीं है।
इस्लामी आतंकियों और सेक्स कुंठा से भरे समाज के कई हिस्सों के बारे में जब कुछ बातें सामने आती हैं तो आश्चर्य होता है कि विरोधाभास और विडम्बना कहाँ तक जा सकती हैं। कल एक वीडियो सामने आया जहाँ यज़ीदी महिलाएँ, जो आईसिस द्वारा सेक्स स्लेव के रूप में हर दिन बलात्कार का शिकार होती रहीं थीं, बुर्कों को जला रही थीं।
इसके पीछे का कारण यह था कि आईसिस इस्लाम के उन तौर तरीक़ों में पूरी आस्था दिखाता है जो उसकी मर्ज़ी के हों। जैसे कि बुर्क़ा पहनना चाहिए, काफ़िरों को काट देना चाहिए, उन्हें बमों से उड़ा देना चाहिए, बलात्कार करना चाहिए आदि। बुर्क़ा पहनने के पीछे जो क्यूट कारण बताते हैं ये आतंकवादी, वो सुनकर कान से ख़ून निकल आता है, “ऐसे बाहर मत निकलो। मर्दों के आस-पास ऐसे मत दिखना।”
अब आप कहिए ‘वॉव, जस्ट फकिंग वॉव!’
शब्दों के लिए माफ़ी नहीं माँगूँगा क्योंकि ये सब जानने के बाद और कोई प्रतिक्रिया निकल नहीं पाती। पिछले सप्ताह कई सेक्स स्लेव (बलात्कार करने हेतु ग़ुलाम बनाई गई युवतियाँ और बच्चियाँ) इन आतंकियों के चंगुल से बाहर निकलकर आईं और रेगिस्तान में पंक्तिबद्ध खड़े होकर अपने बुर्क़ो को आग लगाया। हम या आप इन लड़कियों के अनुभव को समझ नहीं कर सकते क्योंकि इनकी यातना शरीर और दिमाग से परे इनकी निश्छल आत्माओं तक है। ये घाव हर स्तर पर गहरे हैं, और इनकी जिजीविषा से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं।
इस वीडियो में एक यज़ीदी लड़की कहती है, “जब उन्होंने पहली बार मुझे वह (बुर्क़ा) पहनने के लिए विवश किया, तो मुझे अपना दम घुटता सा लगा। मुझे उसमें काफ़ी परेशानी हो रही थी। मैं बुर्क़ा पहनना नहीं चाहती थी पर उन्होंने इसे उतारने की अनुमति नहीं दी। वो कहते थे कि हर कोई पहन रहा है। जब भी मैं अकेली होती थी तो उसे उतार फेंकती थी। वह कहते थे, ‘ऐसे बाहर मत निकलो।’ ‘मर्दों के आस-पास ऐसे मत दिखना।’ पर जब भी वे मुझे अकेले में छोड़ते थे, मैं उसे उतार देती थी। अब मैं (यहाँ) आ गई हूँ और इसे उतार दिया है, और जला दिया है। यह क़िस्सा ख़त्म कर दिया है, ईश्वर की कृपा से। काश मैं दएश (आईसिस) को यहाँ ला पाती और जला पाती, जैसे मैंने अपने उन कपड़ों को जला दिया है।”
यजीदी लड़कियाँ बता रही हैं आपबीती
इस विचारधारा की जड़ में इस्लाम को दुनिया पर स्थापित करने की पुरानी ज़िद है। लेकिन आज का विश्व आँख मूँद कर इस आतंक को ‘आतंक का कोई रिलीजन नहीं होता’ कहते हुए शुतुरमुर्ग की तरह नकार रहा है। उनके झंडे पर उनके मज़हब का नारा बुलंद है, उनके कुकर्मों से पहले ‘अल्लाह’ के नाम का जयघोष होता है, और आप कहते हैं कि आतंक का कोई मज़हब नहीं होता!
एक तरफ इस्लाम को स्थापित करने की चाह, एक तरफ बुर्क़ा पहनाकर महिलाओं को यह बताना कि मर्दों के आस-पास शरीर को ढक कर रखना चाहिए, और दूसरी तरफ बलात्कार? दिन-रात बलात्कार कर रहे हों और ज्ञान दे रहे हो कि बाहर बुर्क़े में रहा करो क्योंकि मर्दों के सामने ऐसे नहीं जाना चाहिए! ये उच्च क़िस्म का घटिया नशा है जो शायद इन्होंने एक साथ सीरिया के किसी कच्चे तेल के कुएँ से पीकर पाया होगा, क्योंकि लॉजिक तो घास ही चरता दिख रहा है!
ऐसे ही एक वीडियो देखा था जिसमें कई महिलाएँ (अलग-अलग जगहों पर) हिजाब पहनकर, कई अरबी/ इस्लामी कपड़ों में बैठे मर्दों के बीच उत्तेजक नृत्य कर रही थी। मैं कपड़ों का ज़िक्र कर रहा हूँ क्योंकि वीडियो से मज़हब का पता लगाना मुश्किल है। अंग्रेज़ी में इसे सिडक्टिव डान्स कह सकते हैं। क़ालीन बिछा हुआ है, मर्द घेरे पड़े हैं, टोपियाँ सर पर हैं, लड़की ने हिजाब से सर ढक रखा है और उसके कूल्हे थिरक रहे हैं। ये विचित्र स्तर का मानसिक दिवालियापन है कि सेक्सी नाच भी देखना है, और लड़की के संस्कार भी क़ायम रखने हैं। आप यूट्यूब पर वो वीडियो ख़ुद ढूँढ लीजिए क्योंकि वो इतना घटिया है कि मैं यहाँ रख नहीं सकता।
मतलब, समाज और मज़हबी जानकार कहते हैं कि महिला को सर ढक कर रखना चाहिए। इसलिए गर्दन से नीचे टू-पीस बिकिनी चलेगा, सेक्सी नाच चलेगा लेकिन सर तो ढका ही होना चाहिए क्योंकि मौलवी जी ने कहा है! ऐसे उदाहरणों पर आप न तो हँस सकते हैं, न गम्भीर हो सकते हैं। हँस इसलिए नहीं सकते कि हर व्यक्ति की भावनाएँ होती हैं, जज़्बात होते हैं, उन्हें उत्तेजक नृत्य देखना ज़रूरी लगता है, तो वो अपने मज़हबी बातों से रास्ता निकाल कर अपनी इच्छा की पूर्ति करते हैं।
गम्भीर इसलिए नहीं हो सकते कि आख़िर ये हो क्या रहा है! देखना है तो पूरा देख लो ठीक से कि नाचने वाली महिला ही है या किसी ने बुर्क़ा पहनकर पागल तो नहीं बनाया! ये कैसी मानसिकता है जिससे एक तरफ तो मज़हब का भी सम्मान हो रहा है और दूसरी तरफ अपनी ठरक का भी। जी, सही शब्द ‘ठरक’ ही है क्योंकि किसी महिला को उस तरह से घेरकर नचाना आपकी कुंठा की परिणति ही है, न कि आपके अंदर बैठा कला-प्रेमी जाग गया है।
ये इस विचारधारा का सत्य है। जो भी ऐसे आतंकियों के विरोध में नहीं हैं, वो इन्हें सहमति देने वाले हैं। क्योंकि किसी मसीहा और दूत के नाम पर बलात्कार, क़त्ल, ग़ुलामी आदि को जायज़ बताने को धिक्कार नहीं पाना बताता है कि आप भीतर से क्या चाहते हैं।
भारत एक लोकतांत्रिक देश है। हर प्रकार की कला-संस्कृति को फलने-फूलने का एकसमान अवसर मिलता है यहाँ। अभिव्यक्ति की आजादी भी है यहाँ। लेकिन कुछ विकृत मानसिकता वाले लोग भी यहाँ मौजूद हैं, जो अपनी उल-जलूल हरक़तों से बाज नहीं आते और अधिकारों का हवाला देकर अक्सर ऊट-पटांग सवाल कर बैठते हैं जिनका कोई औचित्य ही नहीं होता।
ऐसा ही एक मामला देश की शीर्ष अदालत की चौखट तक पहुँचा, जिसमें भारतीय मुस्लिमों को पाकिस्तान भेजने की माँग करने संबंधी एक याचिका सामने आई। इस याचिका पर न्यायमूर्ति रोहिंग्टन एफ नरीमन की अध्यक्षता वाली पीठ ने कड़ा रुख़ अख़्तियार किया और याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वकील से पूछा कि आपको अंदाज़ा भी है ये किस तरह की याचिका है? पीठ ने लगभग चेतावनी देते हुए यह भी कहा कि हम दलील सुनने के लिए तैयार हैं लेकिन आप इसका अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहिएगा। इस पर याचिकाकर्ता के वकील ने दलील पेश न करने में ही भलाई समझी। इसके बाद कोर्ट ने उस याचिका को ख़ारिज कर दिया।
कोर्ट से परे भी चले ख़ारिज वाला डंडा
आइए अब लौटते हैं इस तरह की मानसिकता वाले लोगों पर। ऐसे लोग प्रमाणित करते हैं कि खाली दिमाग वाकई शैतान का होता है और उसी दिमाग की उपज होती है इस तरह की वाहियात याचिकाएँ। ऐसा ही कुछ ‘सूचना के अधिकार (RTI)’ नियम के साथ भी होता है। इसके तहत कई बार ऐसी सूचनाएँ माँगी जाती हैं, जिनका कोई सिर-पैर ही नहीं होता।
ख़ासतौर पर प्रधानमंत्री कार्यालय का RTI विभाग आए दिन अजीबोगरीब आवेदनों से परेशान है। माँगी गई जानकारियों की जरा लिस्ट देखिए। और सोचिए कि इस तरह की जानकारियों का भला क्या मक़सद हो सकता है!
प्रधानमंत्री कार्यालय में कितने सिलेंडर इस्तेमाल होते हैं
वहाँ सब्ज़ी कौन लाता है
पीएम मोदी कौन सा मोबाइल इस्तेमाल करते हैं
पीएम मोदी को खाने में क्या पसंद है
ऐसा ही एक मामला सेंट्रल बैंक से भी है। यहाँ RTI के माध्यम से सूचना माँगी गई कि कितने पोल्ट्री फार्म्स में Battery Cages का प्रयोग किया जाता है। बता दें कि Battery Cages उन पिंजरों का संग्रह होता है, जिसका उपयोग अण्डा देने वाली मुर्गियों के आवास के लिए किया जाता है।
इस सूचना का जवाब देने के लिए एक लंबी प्रक्रिया का पालन करना पड़ेगा। बैंक इसके लिए विभिन्न स्तरों पर जानकारी जुटाएगा, तब जाकर इसका जवाब जानकारी माँगने वाले तक पहुँचाया जाएगा। सूचना माँगने वाले को तो शायद इस बात का अंदाज़ा भी नहीं होगा कि एक लाइन में माँगी गई जानकारी को जुटाने में बैंक का कितना समय बर्बाद होगा। फिर अगर कोई त्रुटि या देरी हो जाए तो यह कहने में देरी नहीं होगी कि बैंक कोई काम ही नहीं करता।
कई बार RTI का दुरुपयोग भी होता है, जिसका इस्तेमाल ब्लैकमेल करने के लिए किया जाता है। बेहतर होता कि RTI के सही इस्तेमाल पर ध्यान दिया जाए। फिर भी अगर इस तरह के वाहियात और बेबुनियाद सवाल पूछे जाते हैं तो उनका जवाब भी उसी ढंग से देना चाहिए, जिससे पूछने वाले को उसका स्तर पता चल सके।
बलात्कार शब्द जेहन में आते ही सामान्य तौर पर किसी लड़की की ही छवि उभर कर सामने आती है, ये सोचकर कि उसके साथ किसी लड़के ने दुष्कर्म किया होगा। आम तौर पर लोग यही सोचते हैं कि रेप सिर्फ लड़कियों का ही होता है, लड़कियाँ सुरक्षित नहीं है। मगर ऐसा नहीं है। आज की दुनिया में, इस समाज में कोई भी इंसान सुरक्षित नहीं है। ना तो लड़के, ना लड़कियाँ, ना महिलाएँ और ना ही बच्चे। हर दिन यौन हिंसाओं जैसी घटनाओं के बारे में सुनने में आता रहता है। आज के दौर में घर हो या फिर सड़क, कहीं पर भी लड़का या लड़की दोनों ही सुरक्षित नहीं हैं। कहीं ना कहीं कोई दरिन्दा अपनी मानसिक विकृति को लेकर हवस का मुंह फैलाए किसी कोने में छुपा होता है और मौका देखकर वो इस जघन्य अपराध को अंजाम दे देता है। या तो इन दरिन्दों को पता नहीं होता है कि वो क्या कर रहे हैं या फिर वो मानसिक रूप से इतने बीमार होते हैं कि वो जान बूझकर ये करते हैं। ऐसा देखा गया है कि दुष्कर्म के मामले में बहुत कम दोषियों को ही सजा मिल पाती है। अधिकतर आरोपी इतना बड़ा गुनाह करने के बाद भी खुले आम घूम रहा होता है, किसी और को अपना शिकार बनाने के लिए। ऐसा नहीं है कि हमारी कानून व्यवस्था कमजोर है, मगर कभी साक्ष्य की कमी की वजह से तो कभी किसी बेतुके से तर्क के आधार पर ये आरोपी बरी हो जाते हैं।
लड़की बदसूरत तो नहीं हो सकता रेप
ऐसा ही एक मामला सामने आया है इटली से। यहाँं साल 2016 में निचली अदालत ने पेरुवियन मूल के 2 लोगों को दुष्कर्म का दोषी करार दिया था। मगर अपीलीय अदालत ने इस फैसला को पलटते हुए दुष्कर्म आरोपी को ये कहते हुए बरी कर दिया कि महिला बदसूरत है और पुरुषों जैसी दिखती है, इसलिए इसके साथ रेप नहीं हो सकता। आपको बता दें कि ये फैसला जजों के उस पैनल ने सुनाया, जिसमें सारी जज महिलाएँ थीं।
क्या होता है बलात्कार?
अब यहाँ पर मन में एक सवाल यह उठता है कि क्या बलात्कार सुंदरता के आधार पर होता है? तो आइए सबसे पहले हम ये जान लें कि बलात्कार होता क्या है?
बलात्कार का मतलब होता है किसी इंसान की सहमति या अनुमति के बिना उसके साथ संबंध बनाना या जबरन किसी फॉरेन ऑब्जेक्ट का पेनिट्रेशन (forceful penetration of foreign object) करना। फिर चाहे वो पुरुष हो, महिला हो, बच्चा/बच्ची हो या फिर कोई प्रौढ़ महिला। कोई भी, कभी भी इसका शिकार हो सकता है। बलात्कार करने वाला इंसान सामने वाला की सुंदरता या उम्र नहीं देखता। ये तो उसकी मानसिक विकृति होती है। वरना क्यों किसी पुरुष, किसी बच्चे/बच्ची या फिर बुजुर्ग महिला के साथ ऐसा होता?
पुरुषों का भी होता है बलात्कार
ऐसा देखा गया है कि लोगों को लगता है कि रेप या बलात्कार केवल महिलाओं के साथ ही होता है। कुछ हद तक इसकी वजह यह भी है कि संचार माध्यमों और समाचारों में हम केवल यही देखते और सुनते हैं कि बलात्कार केवल महिलाओं के साथ ही होता है। पुरुषों के साथ हुए बलात्कार की बातें सामने नहीं आती हैं। लेकिन हम आपको बता दें कि यह पुरुषों के साथ भी होता है। एक पुरुष के साथ शारीरिक शोषण ना सिर्फ एक पुरुष कर सकता है बल्कि एक महिला भी पुरुष का बलात्कार (सेक्स से जुड़े खिलौनों का इस्तेमाल कर) कर सकती है। पुरुषों को भी बलात्कार की शिकार महिला पीड़ित की तरह ही मानसिक पीड़ा से होकर गुजरना पड़ता है। वास्तव में एक पुरुष होने के बावजूद बलात्कार का शिकार होने की शर्म, अविश्वास और इससे जुड़ी शर्मिंदगियों का पुरुषों पर अधिक प्रभाव डालता है। शायद यही वजह है कि आमतौर पर वो इसके खिलाफ शिकायत दर्ज़ नहीं करवाते। इसलिए पुरुषों के बलात्कार से जुड़े बेहद कम आँकड़े दर्ज हुए हैं।
भारत में पुरुषों के साथ रेप पर कोई कानून नहीं
हैरानी की बात तो ये भी है कि भारत, पाकिस्तान सहित चीन, इंडोनेशिया ऐसे एशियाई देश हैं, जहाँ पुरुषों के साथ रेप के खिलाफ कोई कानून नहीं है। भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 354 A, 354 B, 354 C, 354 D के तहत यौन उत्पीड़न, किसी को घूरना, किसी का पीछा करना आदि जुर्म माना गया है। लेकिन ये सभी कानून महिलाओं के पक्ष में है। इसके साथ ही धारा- 375 में भी रेप और उसके खिलाफ कानूनी प्रावधान की बातें कही गई हैं, लेकन यहाँ भी पुरूषों के साथ होने वाले रेप के बारे में कोई बात नहीं कही गई है। मगर चाहे वो महिला हो या पुरुष दोनों को ही पूरा अधिकार है कि वो अपने साथ हुए अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएँ और यह कानून की ज़िम्मेदारी है कि दोनों के सम्मान की पूरी तरह सुरक्षा करे।
बच्चे और बुर्जुर्ग महिला भी अछूते नहीं इस सामाजिक विकृति से
हमारे सामने कई ऐसी खबरें आती हैं, जिसमें हम पाते हैं कि छोटे-छोटे मासूम बच्चे, जिन्होंने अभी-अभी दुनिया को देखना-समझना शुरू किया ही था कि किसी दरिंदे ने उसे अपनी दरिंदगी का शिकार बना लिया। कभी स्कूल में शिक्षकों के द्वारा, कभी रिश्तेदारों-दोस्तों के द्वारा और कभी तो पिता के द्वारा ही इस घटना का शिकार हो जाती है। यानी कि बच्चियाँ अपने घर में भी सुरक्षित नहीं हैं। कठुआ और उन्नाव में बच्चियों के साथ होने वाले दुष्कर्म की घटना भी इसी के उदाहरण हैं, जो कि हमें हिलाकर रख देते हैं। इतना ही नहीं बुजुर्ग महिलाएँ भी महफ़ूज नहीं हैं आज के माहौल में। क्योंकि आए दिन हमें कभी 75 साल की, कभी 80 साल की, तो कभी 85 साल की महिला के साथ भी दुष्कर्म की घटनाएँ सुनने को मिल जाती है, जो हमें सोचने पर मजबूर कर देती है।
MeToo अभियान- यौन शोषण के खिलाफ एक लड़ाई
मी टू एक ऐसा अभियान है, जिसमें महिलाओं ने अपने यौन शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाई। ये अभियान एक तरह की लड़ाई थी, जिसमें महिलाएँ अपने ऊपर हुए अत्याचारों के खिलाफ एक जुट होकर लड़ीं और दोषियों को सामने भी लाया। बता दें कि, Metoo की शुरुआत साल 2006 में हुई थी, लेकिन चर्चा में आई यह 2017 में। इसकी शुरुआत अमेरिकी सिविल राइट्स एक्टिविस्ट तराना बर्क ने पहली बार 2006 में की थी। तराना बर्क के खुलासे के 11 साल बाद 2017 में यह सोशल मीडिया में खूब वायरल हुआ।
तराना बर्क के साथ भी हुआ है रेप और यौन उत्पीड़न
भारत में इसकी शुरुआत बॉलीवुड अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने की थी। उन्होंने अभिनेता नाना पाटेकर पर गलत तरीके से छूने का आरोप लगाया था। भारत में ‘मी टू’ अभियान शुरू होने के बाद कई बड़े बॉलीवुड हस्तियों के नाम सामने आए। नाना पाटेकर के साथ ही जिन पर आरोप लगाए गए, उनमें विकास बहल, चेतन भगत, रजत कपूर, कैलाश खैर, जुल्फी सुईद, आलोक नाथ, सिंगर अभिजीत भट्टाचार्य, तमिल राइटर वैरामुथु से लेकर एमजे अकबर और सुहेल सेठ आदि तक का नाम शामिल है।
किसी के भी साथ दुष्कर्म उसकी सुंदरता के आधार पर नहीं होता है। इसलिए इटली की अदालत में जिस बेतुके तर्क के आधार पर दोनों रेप आरोपी को बरी किया गया है, वो वाकई शर्मनाक है। अगर अदालत साक्ष्य ना मिलने के कारण या फिर गुनाह साबित ना हो पाने की वजह से बरी करे तो बात समझ में आती है। मगर इसे ये कहकर कि लड़की बदसूरत है और पुरूषों की तरह दिखती है, इसलिए इसका रेप नहीं हो सकता काफी निंदनीय है। अदालत के इस फैसले के बाद अदालत के बाहर ‘शर्म करो’ के नारे भी लगाए गए। हालाँकि देश भर में इस फैसले के खिलाफ हो रहे प्रदर्शन के बाद न्याय मंत्रालय ने फैसले की जाँच के आदेश दिए हैं।