देश में स्वतंत्रता को चाहे कितने ही साल क्यों न बीत जाएँ लेकिन कॉन्ग्रेस को देखकर लगता है कि वो अपनी मूल नीतियों से कभी भी डगमगा नहीं सकती। हमेशा से ‘परिवारवाद’ को बढ़ावा देने वाली कॉन्ग्रेस सरकार में आज भी यह दौर चालू है। पहले इसकी बढ़ती सीमा सिर्फ़ हमें गाँधी परिवार तक ही देखने को मिलती थी, लेकिन अब पार्टी से जुड़े नेताओं में भी ‘परिवारवाद’ के प्रति यकीन देखने को मिल रहा है।
लोकसभा चुनावों को मद्देनजर रखते हुए कॉन्ग्रेस ने शुक्रवार (मार्च 16, 2019) को उम्मीदवारों की तीसरी लिस्ट जारी की। इस लिस्ट में असम, मेघालय, नागालैंड, सिक्किम, तेलंगाना और यूपी की 18 सीटों पर खड़े होने वाले उम्मीदवारों के नाम घोषित किए गए। इस तीसरी सूची में एक नाम तनुज पुनिया का भी है। तनुज पुनिया के बारे में बता दें कि वह यूपी के बाराबंकी लोकसभा सीट से कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद पीएल पुनिया के बेटे हैं।
पिछले कुछ दिनों से आंतरिक सर्वेक्षण में पीएल पुनिया का नाम आने के बाद वह माँग कर रहे थे कि उनके बेटे तनुज पुनिया को इस बार टिकट दिया जाए। ऐसे में आखिरकार पार्टी ने अपनी ‘रीत’ को आगे बढ़ाते हुए पी एल पुनिया की माँग सुन ली और तनुज पुनिया के नाम पर मुहर लगाते हुए उन्हें टिकट दे दिया। तनुज के अलावा कलियाबोर से कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता तरुण गोगोई के बेटे गौरव गोगोई को भी उम्मीदवार के रूप में उतारा गया है।
The Congress Central Election Committee announces the third list of candidates for the ensuing elections to the Lok Sabha. pic.twitter.com/h65DyWmcZH
स्पष्ट है ‘परिवारवाद’ कॉन्ग्रेस में अब सीमित न रहकर अपने विस्तार की ओर आगे बढ़ रहा है। बाक़ी नेताओं ने भी कॉन्ग्रेस में रहकर इसकी राह पकड़ ली है। बता दें कि इस सूची में इन दोनों उम्मीदवारों के अलावा कॉन्ग्रेस ने असम के करीमगंज से स्वरूप दास, सिल्चर से श्रीमती सुष्मिता देव, जोहराट से सुशांत बोरगोहेन, डिब्रूगढ़ से पवन सिंह घटोवार को टिकट दिया है।
इनके अलावा भरत बसनेट को सिक्किम से प्रत्याशी और केएल चिश्ती को नगालैंड से उम्मीदवार बनाया गया है। पूर्व केंद्रीय मंत्री विंसेट एच पाला को शिलॉन्ग से प्रत्याशी बनाया गया है। तेलंगाना की बात करें तो पेडापल्ली से ए चंद्रशेखर, दिलाबाद से रमेश राठौड़, करीमनगर से पोन्नम प्रभाकर, जहीराबाद से के मदन मोहन राव, मेडक से गली अनिल कुमार, मलकाजगिरी से ए रेवंथ रेड्डी को, कोंडा विश्वेश्वर रेड्डी को चेवेला से जबकि पोरिका बलराम नायक महमूदाबाद से प्रत्याशी बनाया गया है।
कल शुक्रवार (मार्च 16, 2019) को एक खबर आई कि पाटीदार नेता हार्दिक के कॉन्ग्रेस से जुड़ने के बाद पार्टी ने अपनी वेबसाइट पर उनकी सेक्स टेप की तस्वीरों को लगाकर अपने नए नेता का स्वागत किया। लेकिन आज खबर आ रही है कि ऐसा गुजरात कॉन्ग्रेस की वेबसाइट हैक होने के कारण हुआ था। पूरा मामला देखकर लग रहा है जैसे हैकर्स ने सिर्फ़ हार्दिक का ‘ऐसा’ स्वागत करने के लिहाज़ से ही वेबसाइट को हैक किया।
इस घटना के सामने आने के बाद कॉन्ग्रेस पार्टी हरकत में आई और वेबसाइट को तुरंत बंद कराया, इसके बाद नेताओं ने वेबसाइट की जाँच पर बात कही। नवभारत टाइम्स में छपी रिपोर्ट के अनुसार गुजरात प्रवक्ता मनीश दोशी ने उनके सहयोगी अखबार इकनॉमिक टाइम्स से इस मामले पर बात की और बताया कि उनकी वेबसाइट को हैक कर लिया गया है।
मनीष ने बताया कि इस घटना के बाद वेबसाइट को अस्थाई रूप से बंद कर दिया गया है, जाँच के बाद इसे फिर से लाइव किया जाएगा। मनीष का कहना है कि यह हरकत उन लोगों द्वारा की गई है, जो हार्दिक के कॉन्ग्रेस पार्टी में शामिल होने से खुश नहीं हैं।
कुछ दिनों पहले ही, हार्दिक पटेल, जो गुजरात में पाटीदार आंदोलन के दौरान उपद्रव करने के लिए प्रसिद्ध हुए और दंगों के दोषी भी पाए गए, आधिकारिक तौर पर कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी की उपस्थिति में कॉन्ग्रेस में शामिल हो गए हैं।
ख़ैर, गुजरात कॉन्ग्रेस की आधिकारिक वेबसाइट का अपनी पार्टी कॉन्ग्रेस की ही मिट्टी पलीद करने का एक और भी दिलचस्प इतिहास है। जानकारी के लिए बता दें कि इससे पहले, उन्होंने कॉन्ग्रेस को ठगों की पार्टी कहा था। यह भी कहा था कि पार्टी ने 70 साल तक भारत को लूटा। क्या पता सच गलती से ही सही, लेकिन बाहर आ गया था उस वक्त!
राजनीतिक गलियारे में हड़कंप का माहौल या खींचतान का होना कोई नई और अचंभित कर देने वाली बात नहीं। यह हड़कंप उस समय अपने चरम पर होता है जब देश में चुनाव का माहौल गरमाया हो। चुनावी दौर में आरोप-प्रत्यारोपों का दौर चल निकलता है, फिर भले ही वे आरोप मनगढ़ंत ही क्यों न हों। एक-दूसरे को नीचा और कमतर दिखाने की होड़ लग जाती है। राजनीतिक सभाएँ और रैलियाँ किसी जंग के मैदान से कम नहीं होतीं।
ख़ैर, यह सब तो स्वाभाविक ही है क्योंकि चुनाव में जीत हासिल कर सत्ता पर क़ाबिज़ होना हर कोई चाहता है। इसके लिए सभी अपने-अपने तौर-तरीक़ों का इस्तेमाल करते हैं। सत्ता में दो तरह के लोग आना चाहते हैं, एक वो जो सही मायने में देश-हित चाहते हैं और उसके लिए वे अपनी सटीक रणनीति का इस्तेमाल कर देश को विकास की राह पर ले जाना चाहते हैं, और दूसरे वो जो केवल सत्ता की भूख और लालसा को शांत करना चाहते हैं।
सदमे से उबरने में कॉन्ग्रेस अब तक नाक़ामयाब
फ़िलहाल कॉन्ग्रेस पार्टी का यही हाल है। वो सत्ता खो देने के सदमे से अब तक उबर नहीं पाई है। सदमे से न उबर पाने का एक महत्वपूर्ण कारण उसका पुश्तैनी रूप से राजनीति में बने रहना भी है, जिसकी उसे आदत हो गई थी। जिस तरह घर के बड़े-बुज़ुर्ग अपने पीछे विरासत स्वरूप धन-सम्पत्ति छोड़ जाते हैं और अगली पीढ़ी उस पर अपना हक़ जताकर उसे पूर्णत: अपना मान लेती है ठीक उसी प्रकार कॉन्ग्रेस को भी यही लगता है कि भारतीय राजनीति उनके पुरखों द्वारा छोड़ी गई ऐसी ही कोई विरासत है, जिस पर केवल उसी का एकछत्र राज होना चाहिए। कॉन्ग्रेस अपने इसी सपने को वर्षों से जीती आई है, जिसकी उसे ऐसी लत लग गई है कि वो अब राजनीति में बने रहने के लिए कुछ भी कर गुजरने और किसी भी हद को पार करने से पीछे नहीं हटेगी। इसी का जीता जागता प्रमाण उसके वो घोटाले हैं, जिन्हें नज़रअंदाज़ करके वो फिर से अपनी वापसी का ख़्वाब संजोए बैठी है, लेकिन इस ख़्वाब के पूरे होने में वो सबसे बड़ा रोड़ा प्रधानमंत्री मोदी को मानती है।
भारतीय राजनीति को अपनी जेब में रखकर चलने वाली कॉन्ग्रेस को साल 2014 में उस समय तगड़ा झटका लगा, जब केंद्र में मोदी सरकार आई। मोदी लहर कॉन्ग्रेस के उन सभी मनसूबों को बहाकर ले जाने में कामयाब रही, जिसके बीज कॉन्ग्रेस ने अपने शासनकाल के दौरान बोए थे। और तब के मनसूबों पर पानी फिरने की वजह से कॉन्ग्रेस अब तक पीएम मोदी को सिर्फ़ एक दुश्मन की नज़र से देखती है।
कब लगेगा गाँधी-वाड्रा परिवार के घोटालों की फेहरिस्त पर विराम
केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद एक-एक करके कॉन्ग्रेस के वो सभी काले चिट्ठे सामने आने लगे जो वर्षों से दबे पड़े थे। घोटालों की एक ऐसी फेहरिस्त बनती चली गई, जिस पर से धीरे-धीरे पर्दा उठता चला गया और कॉन्ग्रेस के ‘राजकुमार’ राहुल गाँधी समेत पूरे परिवार पर जाँच के काले घेरे मँडराने लगे। परिवारवाद की छवि वाली कॉन्ग्रेस पार्टी जो दूध की धुली होने का दावा करती थी, उसके कारनामे जगज़ाहिर होने लगे। इन काले कारनामों में टैक्स चोरी, मनी लॉड्रिंग, अगस्ता-वेस्टलैंड, खाद घोटाले से लेकर बोफ़ोर्स और पनडुब्बियों तक के हर घोटाले में कॉन्ग्रेस का हाथ शामिल था।
साल 2008 में राहुल गाँधी ने ज़मीन ख़रीदी और उसे साल 2012 में अपनी बहन प्रियंका गाँधी को बतौर तोहफ़े में दे दी। गाँधी-वाड्रा परिवार का सीधा संबंध हथियार डीलर संजय भंडारी से भी था। भंडारी ने तोहफे वाली उसी ज़मीन को अधिक क़ीमत देकर फिर से ख़रीद लिया। इसके पीछे राहुल गाँधी, रॉबर्ट वाड्रा और प्रियंका गाँधी वाड्रा के आपसी भाईचारा और एक गहरा रिश्ता तो उभरकर सामने आता ही है, साथ में दिखती है दलालों से संबंध की एक लंबी और कॉम्पलेक्स जोड़।
राहुल गाँधी का एक बेहद प्रगाढ़ रिश्ता HL पाहवा के साथ भी सामने आया। यह वही भंडारी है जिसके घर ED की छापेमारी के दौरान रक्षा सौदों से संबंधित गोपनीय दस्तावेज़ों की फोटोकॉपी बरामद हुई थी। मतलब साफ है कि यूपीए के शासनकाल में एक बिचौलिए की इतनी पहुँच थी कि वो बेहद संजीदा दस्तावेज़ों की फोटोकॉपी तक अपने पास रखता था। इससे साफ पता चलता है कि गाँधी-वाड्रा का परिवार मिलकर रक्षा सौदों में घालमेल करने की फ़िराक में था।
राहुल गाँधी ने 2008 में हसनपुर, पलवल में महेश कुमार नागर के माध्यम से ज़मीन ख़रीदी और फिर उस ज़मीन की क़ीमत को बढ़ाकर रॉबर्ट वाड्रा को बेच दिया गया। 2008 में मात्र ₹15 लाख में ख़रीदी गई ज़मीन को केवल 3 साल 10 महीने बाद ₹84.15 लाख में बेचा गया। इस तरह के ज़मीनी सौदों में गाँधी-वाड्रा परिवार की धोखाधड़ी का कनेक्शन सीधे तौर पर साफ़ नज़र आता है। ऐसे और भी कई ज़मीनी सौदे हुए, जिनमें गाँधी-वाड्रा परिवार के ज़मीन सौदागरों के साथ प्रगाढ़ रिश्ते उजागर हुए। इनमें एक नाम सीसी थम्पी का भी है, जिसने ज़मीन ख़रीद के लिए संजय भंडारी को धन की आपूर्ति की थी।
आरोपों से घिरी कॉन्ग्रेस को प्रधानमंत्री मोदी की साफ छवि कहाँ भाएगी
राहुल गाँधी जिस राफ़ेल को लेकर प्रधानमंत्री मोदी के इस्तीफ़े की माँग कर रहे थे, उस वक़्त उन्होंने मौन क्यों धारण कर लिया था जब राफ़ेल की असल क़ीमत पर से पर्दा उठा कि मोदी सरकार के दौरान हुई राफ़ेल डील यूपीए सरकार की तुलना में प्रति विमान ₹59 करोड़ सस्ती है। ऐसे हर आरोप पर राहुल गाँधी को मुँह की खानी पड़ी है, जब उन्होंने मोदी के ख़िलाफ़ बेवजह के मुद्दों को हवा देने की कोशिश की जबकि वो ख़ुद अपने भ्रष्ट आचरण को किसी से नहीं छिपा पाए। ये राहुल गाँधी का ओवर कॉन्फ़िडेंस ही है, जो ख़ुद तमाम विवादों में घिरे होने के बावजूद मोदी सरकार को घेरने से नहीं चूकते, फिर भले ही वो आरोप बेबुनियाद ही क्यों न हों।
राफ़ेल विवाद में एक बड़ा मोड़ तब आया, जब वीवीआईपी हेलीकॉप्टर अगस्ता वेस्टलैंड डील में बिचौलिया रहा क्रिश्चिन मिशेल का वो प्रकरण सामने आया, जिसमें ख़ुलासा हुआ कि वो राफ़ेल के ख़िलाफ़ सौदेबाज़ी कर रहा था। 2007 में जब भारत की तरफ से 126 मीडियम मल्टी रोल एयरक्राफ्ट ख़रीदने की बात कही गई थी तो उस समय कई कंपनियों ने बोली लगाई थी। साल 2011 आते-आते तक सिर्फ़ दो ही विमान आमने-सामने थे, एक दसौं की राफ़ेल और दूसरा यूरोफाइटर टाइफून। दलाल मिशेल यूरोफाइटर टाइफून की लॉबियिंग कर रहा था। आपको याद दिला दें कि अगस्ता-वेस्टलैंड सौदे में सोनिया गाँधी का कनेक्शन सामने आया था। इस पर ख़ुद को बचाने के लिए कॉन्ग्रेस ने मिशेल को बचाने के लिए अपने वकील को मैदान में उतारा था।
आरोपों से बचने के लिए कॉन्ग्रेस को पीएम मोदी में दिखता है अपना दुश्मन
चुनावी माहौल में अपने कारनामों को छिपाने के लिए कॉन्ग्रेस किसी न किसी बहाने बचने का रास्ता तलाशती रहती है। अपने इन प्रयासों में वो कभी कंधार प्रकरण में अजीत डोभाल पर आरोप मढ़ती दिखती है, तो कभी प्रधानमंत्री की छवि को ग़लत रूप से प्रचारित करने का दुस्साहस करती दिखती है। कभी चीन का रुख़ करके मोदी को कोसती है कि मसूद अज़हर पर प्रतिबंध लगाने में वो क्यों नाकामयाब हैं?
अब बात अगर प्रतिबंध की ही की जाए तो ऐसा पहली बार तो हुआ नहीं है, जब चीन ने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ जाने से इनकार किया हो या मसूद अज़हर को वैश्विक स्तर पर आतंकवादी घोषित करने से अपने पैर पीछे किए हों। यह बात विश्व-विख्यात है कि चीन और पाकिस्तान के मध्य कई व्यापारिक समझौते हैं, जिसकी वजह से चीन हमेशा पाकिस्तान के साथ अपना दोस्ती का रिश्ता निभाता चला आया है।
भारत के प्रति चीन का दोहरा रवैया तो काफी साल पुराना है। यह तब भी था जब केंद्र में कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार थी। कॉन्ग्रेस ने उस समय क्यों नहीं चीन को डरा धमका कर मसूद अज़हर पर प्रतिबंध लगवाया लिया? इसका जवाब तो कॉन्ग्रेस के पास तब भी नहीं था, जब वो सत्ता में थी और आज भी नहीं है जब सत्ता में उसकी वापसी का कोई ओर-छोर नहीं दिखता।
जब आतंकवादियों पर उमड़ा राहुल गाँधी का ‘जी’ भरकर प्रेम
हैरान कर देने वाली बात तो यह है कि मसूद अज़हर पर प्रतिबंध लगाने की बात करने वाले राहुल गाँधी तो आतंकवादियों को ‘जी’ भर-भर कर इज़्जत परोसते हैं। उनकी पार्टी के दिग्विजय सिंह उर्फ़ दिग्गी आतंकवादियों को ‘ओसामा जी और हाफ़िज सईद साहब’ बोलकर उनके सम्मान में चार चाँद लगाते हैं। भले ही राहुल गाँधी आतंकवादियों से अपनी इस बेइंतहा मोहब्बत पर कुछ न कहें लेकिन आतंकवादियों से उनका यह ‘अपनेपन’ का रिश्ता तो जगज़ाहिर हो ही गया है। राहुल गाँधी का यह प्यार भरा एहसास तो चीन जैसा ही जान पड़ता है, माने ऊपर से कुछ और अंदर से वही दोमुँहापन।
असल बात तो यह है कि सत्ता से दूर होने और वापसी का कोई रास्ता न बन पाने की बौखलाहट में कॉन्ग्रेस अपना आपा पूरी तरह से खो चुकी है। इसीलिए कोई रास्ता न सूझता देख राहुल गाँधी को ले-देकर केवल मोदी ही नज़र आते हैं। इसलिए वो कभी 56 इंच के सीने का जुमला रटते हैं तो कभी जनता को बेवजह भरमाने का काम करते हैं और कहते हैं कि वर्तमान केंद्र सरकार ने अपने शासनकाल में देश-हित में कुछ नहीं किया।
सच पूछें तो इस सवाल का जवाब कॉन्ग्रेस बखूबी जानती है कि मोदी ने जिस कुशलता के साथ अपने कार्यकाल को पूरा किया है, वो कॉन्ग्रेस से 70 सालों में नहीं हो सका। राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस पार्टी का गिरता स्तर पता नहीं कब क्या नया बखेड़ा खड़ा कर दे, इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता।
वो दिन दूर नहीं जब प्रधानमंत्री मोदी को बदनाम करने के लिए राहुल गाँधी उनकी फोटो को पोर्नोग्राफी के लिए भी इस्तेमाल कर लें। अपनी धूमिल होती छवि के सदमे में गाँधी परिवार पता नहीं कब पीएम मोदी को गाली-गलौच देने पर उतारू हो जाए क्योंकि सत्ता से दूरी कॉन्ग्रेस को हजम नहीं हो पा रही है और अपनी वापसी के लिए उसे केवल मोदी को कोसने का ही मार्ग दिख रहा है, जिस पर वो बड़ी तेज़ी से बिना कुछ सोचे-समझे लगातार बढ़ती जा रही है। लेकिन यह तेज़ी कॉन्ग्रेस को बड़ी महँगी साबित होगी क्योंकि हताशा के इस आलम में राहुल और उनकी पार्टी किंकर्तव्यविमूढ़ हो चुकी है। अब शायद उनकी चेतना लोकसभा चुनाव के परिणाम के बाद ही आने की संभावना है।
2014 के बाद एक आम आदमी के जीवन में जो सुधार आया है, पहले केवल उसकी कल्पना ही की जा सकती थी। देश के भीतर तो मोदी सरकार ने अनेकों लाभकारी योजनाओं से जन-जीवन को सुधारने के अपने लक्ष्य को तो पूरा किया ही, साथ में वैश्विक स्तर पर अन्य देशों से जो संबंध आज भारत के साथ स्थापित हैं, उन्हें सही दिशा और मज़बूती भी प्रदान की।
आज भारत के साथ हर बड़ी शक्ति कंधे से कंधा मिलाकर डटकर खड़ी है फिर चाहे वो व्यापार को लेकर हो या आतंकवाद जैसे मुद्दे को लेकर हो। विश्व में भारत की छवि एक ताक़तवर देश के रूप में बनकर उभरी है। इसका श्रेय निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही जाता है क्योंकि यह उनकी सूझबूझ और सटीक रणनीति का ही परिणाम है।
अभी हाल ही में कॉन्ग्रेस ने उन मतदाताओं को आड़े हाथों लिया, जिन्होंने 2014 में बीजेपी को वोट दिया था। जो राजनीतिक पार्टी अपने ही देश के मतदाताओं को एक दुश्मन की नज़र से देखे, इसे उसका पागलपन न कहा जाए तो और क्या कहा जाए! क्योंकि इस तरह का व्यवहार आज तक किसी देश में किसी राजनीतिक पार्टी द्वारा नहीं किया गया।
ऐसी स्थिति में कॉन्ग्रेस देश की जनता के समक्ष भला किस मुँह से जाएगी और किस आधार पर जनता से अपने पक्ष में वोट माँगने का साहस जुटा पाएगी, ये देखना बाक़ी है?
देश में जीएसटी लागू होते ही विपक्षी दलों ने इसका भरपूर विरोध किया था। इसमें कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी सबसे आगे रहे थे। उन्होंने हमेशा ही इसे ‘गब्बर सिंह टैक्स’ कहा। मगर इस सब से इतर दिल्ली में एक अवॉर्ड शो के दौरान एक अलग ही तरह का नजारा देखने को मिला। यहाँ वित्त मंत्री अरूण जेटली को जीएसटी काउंसिल के लिए अवॉर्ड दिया जा रहा था। इस अवॉर्ड फंक्शन की खास बात यह रही कि जेटली को अवॉर्ड देने वाले कोई और नहीं बल्कि पूर्व प्रधानमंत्री और कॉन्ग्रेस नेता मनमोहन सिंह थे।
Today GST COUNCIL got BUSINESS LINE-CHANGE MAKER OF YEAR AWARD. Presented to Finance Minister Shri @arunjaitley by Dr Manmohan Singh.
मीडिया संस्थान हिन्दू बिजनेस लाइन की तरफ से आयोजित चेंजमेकर अवॉर्ड्स में जीएसटी काउंसिल को ‘चेंजमेकर ऑफ द ईयर अवार्ड’ दिया गया। वित्त मंत्री अरूण जेटली ने जीएसटी काउंसिल का चेयरमैन होने के नाते इस अवॉर्ड को रिसीव किया।
बता दें कि जीएसटी काउंसिल को यह अवॉर्ड ‘वन नेशन वन टैक्स’ की दिशा में काम करने के लिए दिया गया। जीएसटी काउंसिल की खास बात यह है कि इसने संघवाद के सिद्धांतों पर काम करते हुए अलग-अलग राजनीतिक दलों को एक साथ लाया और पूरे देश में इसे सफलतापूर्वक लागू करवाया। इसके साथ ही इसकी कामयाबी को इस तरह से भी देखा जा सकता है कि इसे विवादित मुद्दों को सुलझाने के लिए कभी भी वोटिंग का सहारा नहीं लेना पड़ा। इस काउंसिल के सामने जितने भी विवाद या असहमति के मुद्दे आए, सभी सदस्यों ने आपसी सहमति से ही इसे सुलझाया।
We will not allow BJP to impose a Gabbar Singh Tax on India. They cannot break the back of the small and medium businesses, crush the informal sector and destroy millions of jobs. #GSTCouncilMeet
हालाँकि राहुल गाँधी ने हमेशा इसका विरोध ही किया और इसे लागू करने के तरीके को लेकर हमेशा मोदी सरकार पर उँगली उठाई। सरकार को घेरने की कोशिश की। लेकिन आज जब जीएसटी काउंसिल को चेंज मेकर ऑफ द ईयर का अवॉर्ड दिया गया तो यह बात साफ हो जाती है कि ना तो जीएसटी ‘गब्बर सिंह टैक्स’ है और ना ही इसे लागू करने के तरीके में कहीं कोई कमी रही। इस अवॉर्ड के साथ ही जीएसटी को लेकर जनता को गुमराह करने और राजनीतिक रोटियाँ सेंकने के लिए राहुल गाँधी की झोली में से एक और मुद्दा कम हो गया।
“कौन हो तुम वसंत के दूत, विरस पतझड़ में अति सुकुमार। घन तिमिर में चपल की रेख, तपन में शीतल मंद बयार।”
‘कामायनी’ में जयशंकर प्रसाद जी द्वारा लिखी गई ये पंक्तियाँ उत्तराखंड के लोकपर्व ‘फूलदेई’ या ‘फूल संक्रान्ति’ की सटीक व्याख्या करती हैं। देवभूमि उत्तराखंड विभिन्न संस्कृतियों को समेटे एक विशाल सभ्यता का नाम है। कई तरह की जाति और जनजातियों के मिश्रण से बना यह राज्य अपने नैसर्गिक रूप में ही अपने त्यौहारों के माध्यम से अपनी सुन्दर सांस्कृतिक धरोहरों को बयाँ करता है। उत्तराखंड में हिन्दू मास की प्रत्येक संक्रान्ति को एक विशेष त्यौहार के साथ मनाया जाता है जो उस माह की विशेषता से जुड़ा होता है। जैसे, फसल को बोने से लेकर काटने पर, स्थानीय ग्राम्य देवताओं की पूजा पर, विवाहिता महिलाओं के मायके से आने और जाने पर अलग-अलग त्यौहारों का खूब प्रचलन है।
इन्हीं में से एक है चैत्र मास के प्रथम दिन से मनाया जाने वाला पर्वतीय अंचल का लोकपर्व फूलदेई! इस त्यौहार का खास तौर पर बच्चों को बहुत इंतजार रहता है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार चैत्र मास से ही नवीन वर्ष शुरू होता है।इस संस्कृति का सबसे बड़ा महत्व ये भी देखने को मिलता है कि हिन्दू मान्यता में नवीन वर्ष को ठीक पतझड़ की समाप्ति और बसंत ऋतु के आगमन पर मनाया जाता है। और महीने भर चलने वाला यह लोकपर्व वैशाखी के दिन समाप्त हो जाता है।
यह समय नवीन ऊर्जा के संचार का होता है। खेतों में हरे गेहूँ और पीली सरसों नव वर्ष का स्वागत करते हैं। सर्दियों के मौसम की विदाई के उपरांत पहाड़ की ऊँची चोटियों पर पड़ी बर्फ धीरे-धीरे पिघलने लगती है। वनों में वृक्षों पर नई कोंपल आनी शुरू हो जाती हैं और हर फलदार वृक्ष फूलों से भर जाते हैं। लेकिन उत्तराखंड की पहचान विशेष रूप से खेतों की मुंडेर पर उगने वाले पीले फ्योंली के फूलों और जंगल में खिलने वाले लाल बुराँस के फूलों से की जा सकती है। ये दोनों फूल इतने खूबसूरत होते हैं कि कई लोक गीतों में प्रेमी और प्रेमिका के सौंदर्य की तुलना इनसे की जाती है। चारों ओर पहाड़ के जंगल, गाँवों में आड़ू, सेब, खुमानी, पोलम, मेलू के पेड़ों के रंग बिरंगे सफेद फूलों से बसंत के इस मौसम को बासंती बना देते है।
फुलारी
जंगलों से फूल चुनकर लाते बसंत के दूत
‘रिंगाल’ की टोकरियां जिनमें फूल लाए जाते हैं
फुलोंटी
घर की देहरी पर फूल
प्रकृति देवी की उपासना का प्रतीक है फूल संक्रान्ति
हिन्दू वेद और उपनिषदों में प्रकृति को देवी के रूप में पूजनीय बताया गया है। जिसका प्रमुख उद्देश्य निश्चित रूप से मानव को प्रकृति के साथ आत्मीयता बढ़ाना और उसका संरक्षण करना है। फूलदेई त्यौहार में गाँव के बच्चे सुबह उठकर जंगलों में जाकर रंगीन फूल चुनकर लाते हैं और सूर्योदय से पहले उन्हें अपने घर के पूजा-स्थान, देहरी और चूल्हे को चढ़ाते हैं। साथ ही बच्चे सुबह घर-घर जाकर घरों और मंदिरों की देहरी पर रंगबिरंगे फूल, चावल आदि बिखेरते हैं। पलायन जैसी महामारी झेल रहा उत्तराखंड राज्य आज अपनी हर संस्कृति से विमुख होता जा रहा है। समय के साथ हर बड़े रीति-रिवाज, त्यौहार और परम्पराएँ सोशल मीडिया तक सीमित होकर रह गई हैं।
बाँस की लकड़ियों से बनी टोकरी में लाते हैं रंगीन फूल
बच्चे चैत्र मास के पहले दिन से बुराँस, फ्योंली, सरसों, कठफ्योंली, आड़ू, खुबानी, भिटौर, गुलाब आदि फूलों को तोड़कर घर लाते हैं। फूलों को ‘रिंगाल’ से बनी टोकरी में सजाते हैं। बच्चे घर-घर जाकर “फूलदेई-फूल देई छम्मा देई दैणी द्वार भर भकार यो देई सौं बारंबार नमस्कार” कहकर घरों और मंदिरों की देहरी पर फूल बिखरते हैं। इन पंक्तियों का अर्थ है, “देहरी के फूल भरपूर और मंगलमयी हो, घर की देहरी क्षमाशील हों और सबकी रक्षा करें, सबके घरों में अन्न का पूर्ण भंडार हो।”
बदले में लोग बच्चों को आशीर्वाद देेकर गुड़, चावल, मिठाई और पैसे दक्षिणा के रूप में भेंट करते हैं। शाम को पारम्परिक गढ़वाली-कुमाउँनी पकवान बनाकर आस-पड़ोस में बाँटे जाते हैं। देखा जाए तो फूल संक्रान्ति बच्चों को प्रकृति प्रेम और सामाजिक चिंतन की शिक्षा बचपन से ही देने का एक आध्यात्मिक पर्व है।
जंगलों में खिला लाल बुराँस
विभिन्न किस्म के फूल
फ्योंली
‘फ्योंली’ की कहानी
फ्योंली के फूल के बिना उत्तराखंड राज्य का सौंदर्य अधूरा है और साथ ही फूल संक्रान्ति का यह त्यौहार भी। बंसत ऋतु के आगमन के साथ पहाड़ के कोनो-कोनो में फ्योंली का पीला फूल खिलने लगता है। लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी ने भी अपने एक प्रसिद्ध गढ़वाली गीत में गाया है, “म्यरा डांडी कांठ्युं का मुलुक जैलु, बसंत ऋतु माँ जैई।” इस गाने का अर्थ है- “मेरे पहाड़ों के देश जाओगे, तो बसंत ऋतु में जाना। जब हरे वनों में लाल बुराँस और खेतों में पीली फ्योंली खिली होगी।”
फ्योंली पहाड़ में प्रेम और त्याग की सबसे सुन्दर प्रतीक मानी जाती है। पौराणिक लोककथाओं के अनुसार फ्योंली एक गरीब परिवार की बहुत सुंदर कन्या थी। एक बार गढ़ नरेश राजकुमार को जंगल में शिकार खेलते खेलते देर हो गई। रात को राजकुमार ने एक गाँव में शरण ली। उस गाँव में राजकुमार ने बहुत ही खूबसूरत फ्योंली को देखा और उसकी सुंदरता में मंत्रमुग्ध हो गया। राजकुमार ने फ्योंली के माता पिता से फ्योंली के साथ शादी करने का प्रस्ताव रख दिया। फ्योंली के माता पिता ख़ुशी ख़ुशी राजा के इस प्रस्ताव को मान गए।
शादी के बाद फ्योंली राजमहल में आ तो गई, लेकिन गाँव की रहने वाली फ्योंली को राजसी वैभव कारागृह लगने लगा था। हर घड़ी उसका मन अपने गाँव में लगा रहता था। राजमहल की चकाचौंध फ्योंली को असहज करने लगी। फ्योंली ने इस पर राजकुमार से अपने मायके जाने की इच्छा जताई। गाँव में फ्योंली पहुँच तो गई, लेकिन इससे पहले ही फ्योंली की तबियत बिगड़ने लगी और वह मरणासन्न स्थिति में पहुँच गई।
बाद में राजकुमार ने गाँव आकर फ्योंली से उसकी अन्तिम इच्छा पूछी तो उसने कहा कि उसके मरने के बाद उसे गाँव की किसी मुंडेर की मिट्टी में ही दफना दिया जाए। इसके बाद फ्योंली को उसके मायके के पास दफना दिया गया। जिस स्थान पर उसे दफनाया गया था, वहीं कुछ दिनों बाद पीले रंग का एक सुंदर फूल खिला। इस फूल को फ्योंली नाम दे दिया गया। कुछ लोगों का मानना है कि उसकी याद में ही पहाड़ में फूलों का यह त्यौहार मनाया जाता है।
पहाड़ों से पलायन उत्तराखंड की संस्कृति को लीलता जा रहा है
पहाड़ों में बूढ़े घरों की अब यही कहानी है। बुजुर्ग अब बस इन घरों की ‘जग्वाळ’ करते देखे जाते हैं।
अपने गाँव के जंगल, नदी और बचपन को दूर से देखता एक पहाड़ी युवा (नॉस्टाल्जिया)
शिक्षा और रोजगार के लिए पहाड़ों से दूर जाना लोगों की मजबूरी बन चुकी है, जिसका नतीजा है कि अब पहाड़ धीरे-धीरे खाली होते जा रहे हैं। यहाँ के घर-गाँवो में सदियों से मनाए जाने वाले खुशियों और नव वर्ष के इस फुलारी/फूलदेई पर्व को भी पलायन ने अपनी चपेट में ले लिया है। पहाड़ के कई गाँवो में अब इस त्यौहार को मनाने के लिए बच्चे ही नहीं हैं क्योंकि इन गाँवो में केवल कुछ बुजुर्ग ही बाकी रह गए हैं, जो बस खंडहरों के प्रहरी की तरह अपने घरों की रखवाली करते नजर आते हैं।
उम्मीद है कि यह सभ्यता सोशल मीडिया तक सिमटने से पहले एक बार फिर जरूर गुलज़ार होगी। बसंत का यह त्यौहार उत्साह और उम्मीद का प्रतीक है, शायद पहाड़ अपने बसंत के दूतों की चहचहाहट से फिर जरूर महकेगा।
जैसे ही चीन ने जैश आतंकी मसूद अज़हर पर प्रतिबन्ध लगाने में चौथी बार पलीता लगाया, सोशल मीडिया में आग की तरह पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के उस कदम पर चर्चा प्रारंभ हो गई जिसमें उन्होंने कथित तौर पर भारत को मिल रही सुरक्षा परिषद की सीट चीन की ओर घुमा दी थी।
फिर फँसा ‘द हिन्दू’
अंग्रेज़ी दैनिक ‘द हिन्दू’ ने इस मान्यता को नकारते हुए प्रधानमंत्री नेहरू का संसद में दिया गया एक बयान छापा जिसमें हिन्दू ने नेहरू के संसद में इस बात को खारिज करने का दावा किया। हिन्दू के अनुसार, नेहरू ने 27 सितम्बर, 1955 को डॉ. जेएन पारेख के इसी विषय पर पूछे गए प्रश्न के उत्तर में यह कहा कि उन्हें कोई औपचारिक या अनौपचारिक प्रस्ताव मिला ही नहीं।
एक ट्विटर यूज़र True Indology ने हिन्दू और कॉन्ग्रेस प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी समेत कईयों के इस दावे के विपरीत यह दावा किया कि उपरोक्त बयान देने के पहले ही प्रधानमंत्री महोदय एक नहीं, दो-दो बार इस प्रस्ताव के दिए जाने और अपने उसे नकारने की बात स्वीकार चुके थे।
True Indology के मुताबिक मुख्यमंत्रियों को लिखे एक पत्र में नेहरू जी यह साफ तौर पर लिखते हैं कि भारत को चीन की जगह सुरक्षा परिषद का सदस्य बनने का प्रस्ताव आया था जिसे उन्होंने चीन के साथ अन्याय न होने देने के लिए अस्वीकार कर दिया।
4) But just a month earlier,on August 2 1955, Nehru in his letter to Chief Ministers clearly mentions there was indeed an informal offer from US for a UNSC seat.
Nehru denied it because he didn't want to take the seat "because it would be unfair to a great country like China" pic.twitter.com/5mxJbLHjwK
True Indology ने यह भी दावा किया कि 5 वर्ष पूर्व (1950 में) भी प्रधानमंत्री नेहरू को यह प्रस्ताव दिया गया था, जिसे उन्होंने चीन को नाराज़ न करने के लिए नकार दिया। यह प्रस्ताव तो उनकी बहन और भारत की अमेरिका में राजदूत डॉ. विजयलक्ष्मी पण्डित के ज़रिए आया था।
9) In a letter to Nehru dated 24th August 1950, Indian Ambassador to US and Nehru's sister Vijayalakshmi Pandit reveals that US State department made a proposal to India for UNSC seat.
Those were the days of Cold War and US was looking at a potential ally in India pic.twitter.com/9JsWFczDNv
10) Nehru wrote a response to this letter on August 30
He unequivocally denied the offer.
He said the UNSC seat would break "the impeccable relations between India and China". He further said "it would be an affront to China" and he would "press for China's admission in UNSC" pic.twitter.com/rRborruOzx
चूँकि प्रधानमंत्री नेहरू केवल कॉन्ग्रेस नहीं बल्कि पूरे देश के प्रधानमंत्री रह चुके हैं, और मृत होने के कारण अपना बचाव करने में अक्षम हैं, अतः उन पर तो हम झूठा होने का आरोप लगा नहीं सकते। तो अब बचा ‘द हिन्दू’।
राफ़ेल विवाद में रक्षा मंत्रालय का नोट क्रॉप कर भ्रष्टाचार के मनगढ़ंत सबूत बनाने के आरोपों का सामना पहले ही हिन्दू कर रहा है। ऐसे में हिन्दू को इसका स्पष्टीकरण देना चाहिए कि इन विरोधाभासी दस्तावेज़ों का तात्पर्य क्या है?
यदि हिन्दू कोई संतोषजनक उत्तर नहीं ला पाता है तो भारी दिल से हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि या तो देश के सबसे पुराने और ‘esteemed’ समाचार पत्रों में शुमार ‘द हिन्दू’ को ऐतिहासिक तथ्यों की जानकारी ही नहीं है, और या फिर हिन्दू ने जानबूझकर ऐसी बात कही जिसका तुरंत खण्डन होगा और हम बच्चों के प्यारे चाचा नेहरू पर सवालिया निशान लगेंगे।
या फिर हिन्दू ने नेहरू जी का जो बयान छापा वह ही गलत है? देश के दूसरे सबसे मशहूर चाचा (पहले चाचा चौधरी हैं) के साथ इनमें से कोई-न-कोई एक साज़िश करने के लिए द हिन्दू की जितनी भर्त्सना की जाए, कम है!
एक तरफ राहुल गाँधी कॉन्ग्रेस को फिर से खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं उनकी कोशिशों के असर होने की बजाय कॉन्ग्रेस पर एक के बाद एक कुठाराघात ही हो रहा है। कॉन्ग्रेस प्रवक्ता टॉम वडक्कन के भाजपा में शामिल होने के एक दिन बाद ही तिरुवनंतपुरम से कॉन्ग्रेसी सांसद शशि थरूरके मौसा-मौसी ने भी शुक्रवार (मार्च 15, 2019) को बीजेपी ज्वाइन कर लिया।
बता दें कि थरूर की माँ की बहन, सोभना शशिकुमार और उनके पति शशिकुमार तथा 13 अन्य लोग बीजेपी में शामिल हो गए। बीजेपी के राज्य अध्यक्ष पी.एस. श्रीधरन पिल्लै ने सभी का पार्टी में स्वागत किया। खास बात ये है कि कॉन्ग्रेसी सांसद शशि थरूर के मौसा-मौसी ने कहा कि बहुत लंबे समय से वे भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा का अनुसरण कर रहे हैं।
वर्तमान में केरल के तिरुवनंतपुरम से सांसद शशि थरूर कॉन्ग्रेस के बड़े नेताओं में से एक हैं। बीजेपी की लंबे समय से उनकी सीट पर नजर है। मीडिया रिपोर्टों में ऐसी भी चर्चा है कि हाल ही में मिजोरम के राज्यपाल पद से इस्तीफा देने वाले कुम्मानम राजशेखरन यहाँ से चुनाव लड़ सकते हैं।
गौरतलब है कि आरएसएस के निष्ठावान व्यक्ति माने जाने वाले और भाजपा की प्रदेश इकाई के पूर्व प्रमुख राजशेखरन को केरल में लोकसभा चुनाव में बीजेपी को बेहतर मौका नजर आ रहा है। हालाँकि, इस राज्य में पार्टी ने अभी तक अपना खाता नहीं खोला है।
मीडिया रिपोर्टों की माने तो, खबर ये भी है कि पूर्व मुख्यमंत्री ओमन चांडी, केपीसीसी प्रमुख एवं वर्तमान सांसद मुल्लापल्ली रामचंद्रन और वरिष्ठ नेता वीएम सुधीरन सहित कई वरिष्ठ कॉन्ग्रेसी नेताओं ने लोकसभा चुनाव लड़ने में अनिच्छा जाहिर की है जिससे कॉन्ग्रेसी नेतृत्व की मुश्किलें और बढ़ गई हैं।
अभी तो लोकसभा की जंग शुरू ही हुई है और कॉन्ग्रेस को झटके पर झटके लगते जा रहे हैं। अब देखना ये है कि क्या कॉन्ग्रेस ऐसे झटकों से उभर पाती है। या बीजेपी उसे हर कदम पर पटखनी देती है।
भूतपूर्व ‘सेक्स-स्लेव’ महिलाएँ वह बुरखे जला रहीं हैं जो उन्हें इस्लामिक स्टेट के आतंकी पहनने को विवश करते थे। आइएस के चंगुल से पिछले हफ़्ते फ़रार हुईं यज़ीदी महिलाओं के एक समूह ने कुर्दिश सेना (PKK) के समक्ष समर्पण करने के बाद पहला काम किया अपने बुरखे इकठ्ठा कर उन्हें आग के हवाले करने का।
‘काश मैं दएश (आइएस) को यहाँ ला पाती और जला पाती, जैसे मैंने अपने उन कपड़ों को जला दिया है।’
इस ‘हिंसक’ उद्गार के पीछे है अपमान और प्रताड़ना की वो दास्ताँ जहाँ इन यज़ीदी युवतियों को एक ओर रेगिस्तानी रातों में नंगा कर रात भर उनके साथ हिंसक-से-हिंसक तरीकों से बलात्कार किया जाता था। वहीं दूसरी ओर दिन की चिलचिलाती गर्मी में, भीषण-से-भीषण उमस में, बुरखे के पीछे कर दिया जाता था। बुरखा उतारने देने के लिए जब वह मिन्नतें करतीं थीं, गिड़गिड़ाती थीं कि इसके अन्दर से साँस नहीं ली जा रही, तो उन्हें कहा जाता था कि बाकी सब औरतें कैसे कर ले रहीं हैं।
एक ओर अपना मन भर जाने पर आइएस लड़ाके सेक्स-गुलामों की अदला-बदली कर लेते थे, और दूसरी ओर जब तक वह लड़की/औरत उनकी property रहती थी, उसके चेहरे पर अपने ही साथियों की नज़र भर पड़ जाना नागवार था।
अपना बुरखा उतार कर जलाते हुए इस युवती के चेहरे पर जो राहत, जो catharsis दिख रही है, वह इंसानी सभ्यता के लिए शर्मिंदगी का सबब है।
फिर जड़ में असहिष्णु, वर्चस्ववादी इस्लाम
इन महिलाओं, और इनके निर्ममता से क़त्ल कर दिए गए भाईयों, पिताओं, बेटों का गुनाह केवल इतना था कि वह ऐसी आबादी (यज़ीदियों) में पैदा हुए थे जिन्हें सलाफ़ी-वहाबी इस्लाम (जो कि आइएस ही नहीं, लगभग हर जिहाद के वैचारिक स्तम्भ हैं) शैतान के पुजारी और “काबिल-ए-क़त्ल” मानता है। आइएस के कट्टरपंथियों का मानना है कि उन्हें पूरी आज़ादी है यज़ीदी लोगों के साथ हत्या, बलात्कार, शोषण, और अत्याचार करने की क्योंकि यज़ीदी शैतान के पुजारी माने जाते हैं।
पुराना है इस्लाम के हाथों यज़ीदियों के उत्पीड़न का इतिहास
इस्लाम के हाथों यज़ीदी आज से नहीं, सदियों से कुचले जाते रहे हैं- और हर बार मज़हबी कारणों से ही। 1640 में 40,000 तुर्की इस्लामिक लड़ाकों ने सिंजर की पहाड़ी के आस-पास बसे यज़ीदियों पर हमला कर दिया, और 3000 से ज़्यादा यज़ीदी केवल जंग के मैदान में क़त्ल हो गए। उसके बाद अल्लाह के ‘जाँबाज़’ लड़ाकों ने 300 से ज़्यादा यज़ीदी गाँवों को आग के हवाले कर दिया। सिंजर पहाड़ी की गुफ़ाओं में बैठ कर किसी तरह जान बचाने की जद्दोजहद कर रहे हज़ारों यज़ीदियों को ढूँढ़-ढूँढ़ कर मौत के घाट उतारा।
1892 में इसी तुर्की खिलाफ़त के आख़िरी ‘ताकतवर’ चश्मोचिराग सुल्तान अब्दुल हमीद द्वितीय ने यज़ीदियों को अपने जिहादी दस्ते में शामिल हो जाने या उन्हीं जिहादियों के हाथों क़त्ल हो जाने का फ़रमान दिया।
2007 में इराक के मोसुल शहर में सुन्नियों ने एक बस को रोका, बस में सवार ईसाईयों और समुदाय विशेष को बाइज्ज़त रुखसत किया और 23 यज़ीदियों को इकठ्ठा कर उनकी गोली मारकर हत्या कर दी।
(Apologists यह कह कर डिफेंड कर सकते हैं कि बस घटना के पीछे यज़ीदियों द्वारा की गई एक यज़ीदी किशोरी की honor-killing थी, जो एक सुन्नी लड़के से प्रेम करती थी, पर सामूहिक-पहचान के आधार पर इस कत्ले-आम को सही ठहराना मानसिक दिवालियापन ही कहा जायेगा।)
मंडी भी थी, और रेट भी
जवान मर्दों और वृद्धों का क़त्ल करने के बाद उन्हें सामूहिक कब्रों में दफना दिया गया। आइएस ने बचे हुए यज़ीदियों को तीन हिस्सों में बाँटा। सबसे छोटे बच्चों को $500 में संतानहीन दम्पतियों को बेच दिया गया ताकि वे मजहबी परवरिश में ही पलें-बढ़ें।
उनसे थोड़े बड़े लड़कों को जिहादी लड़ाके बनने की ट्रेनिंग लेने भेज दिया गया। जो लड़ाके बनने में शारीरिक रूप से अक्षम पाए गए, उन्हें घरेलू नौकरों के तौर पर बेच दिया गया। अब बचीं किशोरियाँ और युवतियाँ। इनकी बाकायदा मंडी लगी और खरीददारों ने बोली लगाई- और हर लड़की को बेच दिया गया।
‘शरिया हमें इज़ाज़त देता है’
आइएस एक डिजिटल मैगज़ीन निकालता है- Dabiq। (‘अशिक्षा’ को आतंकवाद की जड़ के तौर पर प्रचारित करने वाले अब यह भी बता सकते हैं कि ज़रूरी नहीं है दो साल तक कई-कई भाषाओं में डिजिटल मैगज़ीन प्रकाशित और वितरित करने वाला पढ़ा-लिखा, और इस हैवानियत के अलावा दूसरे काम करने में भी सक्षम, हो)
अक्टूबर, 2014 के अपने अंक में आइएस ने साफ़-साफ़ कहा कि उसके इस भयावह कृत्य को शरिया का पूरा समर्थन है। वहाँ कहा गया है कि हज़रत मुहम्मद के साथी जीती हुई युद्धबंदी औरतों/लड़कियों को सेक्स-स्लेव के तौर पर बाँटते थे।
यज़ीदी औरतों और बच्चों के बारे में Dabiq में लिखा है, “… यज़ीदी औरतों और बच्चों को शरिया के मुताबिक सिंजर की लड़ाई में हिस्सा लेने वाले लड़ाकों में बाँट दिया गया… मुशरिक (मूर्ति-पूजक) गुलामों का इतने बड़े पैमाने पर बँटवारा शरिया हटाए जाने के बाद से शायद पहली बार हो रहा है।”
आइएस लक्षण है, बीमारी नहीं
महज़ कुछ साल पहले तक सीरिया के अलेप्पो से लेकर के इराक के बगदाद तक यही नंगा-नाच करने वाला आइएस भले ही आज एक कस्बे तक सीमित हो चुका है, पर वर्चस्ववाद को मज़हब बनाने वाली जिस ज़हरीली जड़ का वह फल है, वो आज भी कश्मीर, कन्नूर, से लेकर नाइजीरिया के बोको हराम तक खाद पानी पा रही है। जड़ में मट्ठा डाले बिना कल इसी पेड़ से ऐसा फल उगेगा, कि आइएस उत्पाती बच्चों का गुट लगने लगेगा।
इसका अर्थ यह बिलकुल नहीं कि क्राइस्टचर्च के पागल हमलावर की तरह मजहब के हर आदमी को गोली मारनी शुरू कर दी जाए। पर इसका यह अर्थ ज़रूर है कि पूरी दुनिया को इकठ्ठा होकर समुदाय विशेष पर यह दबाव बनाना ही होगा कि वह अपनी मज़हबी किताबों को सम्पादित कर उन हिस्सों को अप्रासंगिक घोषित करें जिनमें अल्लाह को न मानने भर से काफ़िर, मुशरिक, आदि गैर-इस्लामी लोगों के गैर-इस्लामी होने भर से उनके तौर तरीकों को हराम, और उन्हें काबिल-ए-क़त्ल, घोषित कर दिया जाता है।
जब तक 180 करोड़ लोगों की आस्था से ऐसे हिंसक और ज़हरीले ख्यालों को साफ़ तौर पर बाहर का रास्ता नहीं दिखाया जाता, आइएस जैसे संगठन दर्जनों के भाव आते ही रहेंगे।
आज न्यूज़ीलैंड में एक व्यक्ति ने क्राइस्टचर्च नगर में स्थित मस्जिद में गोलीबारी कर बेरहमी से लगभग 50 लोगों की जान ले ली। चारों तरफ इस कृत्य की निंदा हो रही है। न्यूज़ीलैंड की क्रिकेट टीम ने बांग्लादेश के साथ मैच रद कर दिया। ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री ने तो मारे गए लोगों के सम्मान में राष्ट्रीय ध्वज तक झुका दिया। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान सहित तमाम मुस्लिम देशों ने मारे गए लोगों के प्रति श्रद्धांजलि प्रकट की है। इमरान खान ने तुरंत ‘आतंकवाद का कोई रिलिजन नहीं होता’ वाला जुमला पलट कर फेंका। तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआँ ने क्राइस्टचर्च में हुए इस कत्लेआम को ‘इस्लामोफोबिया’ करार दिया।
लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बयान स्वयं न्यूज़ीलैंड की प्रधानमंत्री की तरफ से आया है। प्रधानमंत्री जसिन्डा एर्डर्न ने कहा कि यह न्यूज़ीलैंड के इतिहास में काला दिन है। एर्डर्न ने घटना की प्राथमिक जाँच पूरी होने से पहले ही अपने ट्वीट में यह बयान दिया, “मरने वालों में अधिकतर बाहर से आकर बसे हुए (माइग्रेंट समुदाय) लोग होंगे, न्यूज़ीलैंड जिनका घर है और वे हमारे अपने हैं।”
जिस व्यक्ति ने क्राइस्ट चर्च में लगभग पचास लोगों को मार दिया उसने एक मैनिफेस्टो जारी कर इस हमले की जिम्मेदारी ली और कारण भी बताया। आरोपित के अनुसार उसने न्यूज़ीलैंड में बाहर से आने वाले इमिग्रेंट्स (मुस्लिम समुदाय) को इसलिए निशाना बनाया क्योंकि वह अपनी मातृभूमि को उनसे आज़ाद करवाना चाहता था। वह चाहता था कि ‘यूरोपीय भूमि’ (ऐसे स्थान जहाँ यूरोपीय सभ्यता के लोग रहते हैं) पर इमिग्रेंट्स की संख्या में कटौती की जाए। मस्जिद जैसी जगह पर इतने बड़े स्तर पर हुए कत्लेआम की जितनी भर्त्सना की जाए उतनी कम है। पुलिस ने जिन तीन लोगों को गिरफ्तार किया है उन्हें दंड भी मिलेगा। लेकिन इस घटना के और भी आयाम हैं जिनपर चिंतन आवश्यक है।
विकसित देशों में इमीग्रेशन आज एक बड़ी समस्या बन चुका है। किसी देश में बाहर से आकर बसने वाले अपने साथ अपनी संस्कृति, खानपान, भाषा, पहनावा, उपासना पद्धति और रहन सहन का हर वो तरीका लेकर आते हैं जो उस देश से भिन्न होता है जहाँ वे जाते हैं। संख्याबल बढ़ने पर उस समुदाय विशेष के लोग उस स्थान की डेमोग्राफी और संस्कृति बदलने की क्षमता रखते हैं। यह धीमा लेकिन बेहद प्रभावशाली तरीका है किसी स्थान पर अपनी सामुदायिक विशिष्टता की जड़ें जमाने का।
यह भी सर्वविदित है कि इस्लाम जहाँ भी गया वहाँ तलवार के बल पर सत्ता कायम की। लेकिन एक सभ्य समाज में हम किसी समुदाय के पुरखों के कुकर्मों की सज़ा आज जीवित लोगों को नहीं दे सकते यह भी स्थापित सत्य है। लेकिन इस सवाल पर भी सोचने की आवश्यकता है कि जिस प्रकार यूरोपीय सभ्यता के लोग ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड में आकर बसे और वहाँ की आदिम जनजातियों को समाप्त कर दिया, क्या वही कृत्य आज स्वीकार्य होगा?
इस्लामी आक्रमण के कई उदाहरण हमारे सामने हैं। चाहे ईरान का पारसी समुदाय हो या बंगाली, बलोची, सिंधी, दरदी, बल्ती और मूलतः हिन्दू कश्मीरी अस्मिताएँ- ये सब एक इस्लामी स्टेट बनाने की ज़िद की भेंट चढ़ गए। आज भारत के पूर्वोत्तर में स्थित असम में बांग्लादेशियों की घुसपैठ का मामला उठता है तो कोर्ट में तर्क दिया जाता है कि बांग्लादेशियों का इतनी बड़ी संख्या में आगमन असम की सदियों पुरानी वनवासी जनजातियों के अस्तित्व पर खतरा है। म्यांमार में स्वभावतः शांत रहने वाले बौद्ध लोगों ने रोहिंग्यों के विरुद्ध हथियार उठा लिए हैं क्योंकि वे उनकी अस्मिता पर संकट बन गए हैं।
आज डेमोग्राफी चेंज किसी देश पर मंडराता सबसे बड़ा खतरा है। लेकिन यह दुःखद है कि यूरोपीय देश और पश्चिमी सभ्यता इस खतरे को देखकर भी आँखें मूँदे हुए हैं। आश्चर्य तो इस बात का है कि क्राइस्ट चर्च में नरसंहार करने वाले को तुरंत ‘आतंकवादी’ घोषित कर दिया गया जबकि उसने एक आपराधिक कृत्य किया था। मुस्लिम देशों के राजनेता अपराध और आतंकवाद में अंतर करना ही भूल गए।
नए ग्लोबल ऑर्डर को स्थापित करने में जो सबसे महत्वपूर्ण विचार है वह यह है कि अब समस्याएँ किसी एक देश की न होकर वैश्विक हैं और पूरा विश्व उनके समाधान में योगदान देगा। इसकी आड़ में लिबरल विचारों को हथियार के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसी का परिणाम है कि सच और झूठ में अंतर समझ में नहीं आता। सही और गलत का भेद धुंधला हो चला है।
यह एक नए प्रकार का शिष्टाचार युक्त रेसिज़्म है जिसमें प्रत्येक सभ्यता में अच्छाई जबरन खोजी जाती है। और जिसे वह न दिखाई दे उसे परले दर्ज़े का मूर्ख और फासीवादी मान लिया जाता है। सभी मनुष्य अच्छे हैं, किसी में कोई भेदभाव नहीं और सभी रिलिजन शांति का संदेश देते हैं- इस लिबरल रेसिज़्म के आदर्श वाक्य हैं। इन आदर्श वाक्यों पर चलने वाले वस्तुतः द्वितीय विश्व युद्ध के समय यहूदियों पर हुए अत्याचारों से उपजे अपराधबोध से इस कदर ग्रसित हैं कि उन्हें आतंकवाद और अपराध में अंतर समझ में ही नहीं आता।
इस्लामोफोबिया नामक बीमारी तो बता दी गई लेकिन इसका कारण नहीं बता पाए। आतंकवाद का रिलिजन नहीं होता यह स्थापित कर दिया गया लेकिन रिलिजन ही कई बार आतंकवादी मनोवृत्ति का उद्गम स्थल क्यों होता है इसकी पड़ताल नहीं की गई। यह बड़ी विचित्र वैश्विक व्यवस्था बनाई जा रही है जिसके घटकों का ओर-छोर पता नहीं चलता।
मल्टीकल्चरलिज़्म अर्थात मिलावटी संस्कृति इस व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण अंग है। लेकिन दुर्भाग्य से इसके सिद्धांत केवल सहिष्णु समुदाय के लोगों पर ही लागू होते हैं। मुस्लिम किसी दूसरे देश में जाकर बसें तो उस देश के लोगों पर मल्टीकल्चरलिज़्म लागू होगा लेकिन कोई सऊदी अरब या पाकिस्तान जाकर रहने लगे तो उसपर वही सिद्धांत लागू नहीं होते।
डगलस मरे अपनी पुस्तक The Strange Death of Europe में लिखते हैं कि सन 2012 की जनगणना के अनुसार लंदन के मात्र 44.9% निवासियों ने ही स्वयं को ‘white British’ कहा। आश्चर्य है कि जिस ब्रिटेन ने कभी हिटलर जैसे फासीवादी के सामने घुटने नहीं टेके थे आज वह पाकिस्तानी नागरिकों को सहर्ष गले लगाता है। समूचा यूरोप अपनी डेमोग्राफी बदलने के प्रति सचेत नहीं है।
जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल ने 2010 में लगभग पचास हज़ार शरणार्थियों को आने दिया था। पाँच वर्षों बाद यह संख्या डेढ़ करोड़ तक पहुँच गई। इसके बाद जर्मनी और बाकी यूरोपीय देशों में इस्लाम को न मानने वालों के खिलाफ हिंसक वारदातों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। काफिरों के विरुद्ध स्वतः हिंसा करने वाले ‘लोन वुल्फ’ अर्थात बिना किसी संगठन से जुड़े हुए आतंकी पहचाने गए।
मल्टीकल्चरलिज़्म और इस्लामोफोबिया के मुखौटे के पीछे की सच्चाई यही है कि कोई वैश्विक राजनेता सच स्वीकार नहीं करना चाहता। कोई यह खुलकर नहीं कहता कि इस्लामी देशों को अपने नागरिकों को खुद संभालना चाहिए। उन्हें नौकरी और सामाजिक सुरक्षा देने का जिम्मा किसी दूसरे देश ने नहीं ले रखा है। आयलान कुर्दी के नाम पर जिस ‘विक्टिमहुड’ को बड़ी चतुराई से बेचा गया था अब वह बर्दाश्त के बाहर हो चुका है। आज न्यूज़ीलैंड में एक साधारण नागरिक ने बंदूक उठाई और अपराध किया। उसे उसकी करनी की सज़ा मिलेगी लेकिन जो क्षोभ जनमानस के भीतर गहरा गया है वह विप्लव बन कर एक दिन उठेगा और सभ्यताओं के संघर्ष का कथन सत्य सिद्ध हो जाएगा।
इस लेख का उद्देश्य एनडीए सरकार द्वारा न्याय देने और लेनदारों (creditors) को बकाया राशि वसूलने के लिए शुरू की गई, नई दिवाला और दिवालियापन कानून, 2016 (new Insolvency and Bankruptcy Code, 2016) की दक्षता का मूल्यांकन है। अब तक ऐसी कई दिवालिया कंपनियों ने कॉन्ग्रेस शासन के दौरान बने उलझाऊ कानून की शरण लेकर खुद को बचाते आ रहे थे।
इनसॉल्वेंसी रेजोल्युशन प्रक्रिया में कॉन्ग्रेस के समय के शामिल कानून
बीमार औद्योगिक कंपनी अधिनियम, 1985 (The Sick Industrial Companies Act, 1985)
वित्तीय आस्तियों का प्रतिभूतिकरण और पुनर्निर्माण और सुरक्षा हित अधिनियम, 2002 का प्रवर्तन (The Securitisation and Reconstruction of Financial Assets and Enforcement of Security Interest Act, 2002)
बैंक और वित्तीय संस्थान अधिनियम, 1993 के कारण ऋण की वसूली (The Recovery of Debt Due to Banks and Financial Institutions Act, 1993)
कंपनी अधिनियम, 2013 (The Companies Act, 2013
कई कानूनी रास्ते और एक थकाऊ लम्बी कोर्ट प्रणाली के कारण भारत गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों का एक बड़ा ढेर बन चुका है। बैंकरप्सी कोड भारत में क्रेडिट को अधिक आसानी से प्रवाहित करने और अपने दावों के त्वरित निपटान के लिए निवेशकों में विश्वास पैदा करने का प्रयास है। कोड कॉरपोरेट संस्थाओं और व्यक्तियों के दिवालिया होने से संबंधित मौजूदा कानूनों को एकल कानून में समेकित करता है।
इस कानून ने लेनदारों (creditors) के वैधानिक अधिकारों के प्रवर्तन से संबंधित कानून को एकीकृत किया है और लेनदारों के अधिकारों को समाप्त किए बिना एक देनदार (debtor) कंपनी को अपने ऋण को बनाए रखने के लिए पुनर्जीवित किया जा सकता है।
इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड: – NDA Vs UPA
कॉन्ग्रेस ने कमर्शियल इन्सॉल्वेंसी को सुलझाने की जो पुरातन व्यवस्था की विरासत छोड़ी थी, उसके तहत कंपनी अधिनियम में कंपनी को बंद करने का प्रावधान था यदि वह अपने ऋण का भुगतान करने में असमर्थ थी। इसके अतिरिक्त, कॉन्ग्रेस सरकार ने बीमार कंपनियों के पुनर्वास के लिए 1980 के दशक में SICA लागू किया था। यह उन कंपनियों पर लागू होता है जिनकी निवल संपत्ति (Net Worth) नकारात्मक हो गई है।
यह कानून पूरी तरह से विफल साबित हुआ। यद्यपि यह कानून पुनर्वास के लिए बनाया गया था, लेकिन कई बीमार कंपनियों को लेनदारों के खिलाफ एक सुरक्षात्मक लोहे ढाल की तरह उपयोग किया गया। ऋण वसूली न्यायाधिकरण बैंकों को सभी बकाया राशि की वसूली के लिए सक्षम बनाने के लिए बनाया गया था। लेकिन ये भी कर्ज वसूलने के लिए अत्यधिक कुशल तंत्र साबित नहीं हुए हैं। गैर-कॉरपोरेट इनसॉल्वेंसी के लिए प्रांतीय इन्सॉल्वेंसी एक्ट लागू था। यह सभी कानून अप्रभावी था और उपयोग न होने के कारण भी अपनी उपयोगिता खो चुके थे।
अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार ने SARFAESI कानून बनाया था जो पहले के कानून से काफी बेहतर साबित हुआ था। वर्ष 2000 में, एनपीए ने दोहरे अंको के साथ उछाल भरी थी। SARFESI कानून और RBI द्वारा विवेकपूर्ण ब्याज दर प्रबंधन दोनों की वजह से NPA को नीचे लाने में मदद मिली।
इसके बाद, 2008 और 2014 के बीच, बैंकों ने अंधाधुंध उधार दिए। इससे एनपीए का प्रतिशत बहुत ज़्यादा बढ़ गया, जो आरबीआई के एसेट क्वालिटी रिव्यू द्वारा उजागर किया गया था। इस पर एनडीए सरकार द्वारा शीघ्र कार्रवाई की गई। एक विशेषज्ञ समिति नियुक्त की गई, जिसने 2015 में आईबीसी की सिफारिश करते हुए अपनी रिपोर्ट सबमिट की।
इसके बाद, एक विधेयक लोकसभा में पेश किया गया और संसद की संयुक्त समिति को रेफर किया गया। संसदीय समिति ने इस विधेयक पर अपने सुझाव दिए और विधेयक में कुछ बदलावों की सिफारिश करते हुए एक रिपोर्ट प्रस्तुत की। IBC को मई 2016 में संसद के दोनों सदनों द्वारा अनुमोदित किया गया था। यह आर्थिक विधायी परिवर्तन संसद द्वारा किया गया था।
तुरंत, एनसीएलटी का गठन किया गया, इनसॉल्वेंसी बैंकरप्सी बोर्ड ऑफ इंडिया की स्थापना की गई और नियमों को तैयार किया गया। 2016 के अंत तक कॉर्पोरेट इंसॉल्वेंसी के मामले एनसीएलटी द्वारा देखे जा रहे थे।
IBC प्रक्रिया के माध्यम से शुरुआत बेहद संतोषजनक रही है। इसने ऋणी-लेनदार संबंध को बदल दिया है। लेनदार अब देनदार का पीछा नहीं करता है। एनसीएलटी के गठन और आईबीसी के कार्यान्वयन पर इसकी कार्यक्षमता ने कानून में सुधार की आवश्यकता की तरफ ध्यान आकर्षित किया था। तब से दो विधायी हस्तक्षेप हुए हैं।
अब एनसीएलटी उच्च विश्वसनीयता का एक विश्वसनीय मंच बन गया है। जो कंपनियों को इंसॉल्वेंसी की तरफ ले जाते हैं, उन्हें ही प्रबंधन से बाहर निकाल दिया जाता है। नए प्रबंधन का चयन एक ईमानदार और पारदर्शी प्रक्रिया के तहत होती है। जिसमें कोई राजनीतिक या सरकारी हस्तक्षेप नहीं हुआ हो।
दिवालिया कंपनियों में डूबे धन की वसूली तीन तरीकों से हुई
सबसे पहले, धारा 29 (ए) की शुरुआत के बाद कंपनियां रेड लाइन को पार नहीं करने के लिए भुगतान कर रही हैं. साथ ही इसे एनसीएलटी को रेफर कर दिया जाता है। नतीजतन, बैंकों को संभावित देनदारों से धन प्राप्त होना शुरू हो जाता है जो डिफ़ॉल्टर घोषित होने से बचने के लिए भुगतान करते हैं। बकाएदारों को भी पता है कि एक बार जब वे IBC में आ गए तो वे निश्चित रूप से धारा 29 (A) के कारण प्रबंधन से बाहर हो जाएँगे।
दूसरे, एक बार लेनदार की एक याचिका एनसीएलटी के समक्ष दायर कर दी जाती है, तो देनदार पहले स्तर पर ही भुगतान करना शुरू कर देते हैं ताकि दिवालिया होने की घोषणा न हो।
तीसरा, कई बड़े दिवालिया मामलों को पहले ही हल कर लिया गया है और कई हल होने के करीब हैं। जिनका निराकरण नहीं किया जा सकता है वे परिसमापन (liquidation) की ओर अग्रसर हैं और बैंकों को परिसमापन मूल्य प्राप्त हो रहा है।
अब तक
1322 मामले एनसीएलटी द्वारा लिए गए हैं
प्रवेश से पहले (pre-admission stage) के चरण में 4452 मामलों का निस्तारण किया गया है
66 को स्थगन (adjudication) के बाद सुलझा लिया गया है
परिसमापन (liquidation) के लिए 260 मामलों को आदेश दिया गया है
अभी तक 66 रिज़ॉल्यूशन के मामलों में, लेनदारों द्वारा लगभग 80,000 करोड़ रुपए की वसूली हो चुकी है
एनसीएलटी डेटाबेस के अनुसार, पूर्व प्रवेश स्तर पर निपटाए गए 4452 मामलों में, जाहिर तौर पर तय की गई राशि लगभग 2.02 लाख करोड़ रुपए थी। भूषण पावर एंड स्टील लिमिटेड और एस्सार स्टील इंडिया लिमिटेड जैसे बड़े 12 मामलों में से कुछ रिज़ॉल्यूशन के उन्नत चरणों में हैं और इस वित्तीय वर्ष में हल होने की संभावना है, जिसमें लगभग 70,000 करोड़ रुपए प्राप्त होने की उम्मीद है।
मार्च 2019 तक, कई रेजॉल्युशन प्रस्ताव सॉल्व होने के करीब हैं। अंतिम चरणों में 1.80 लाख करोड़ रुपए रिकवरी की उम्मीद है। 52,000 करोड़ रुपए एस्सार स्टील लिमिटेड से और भूषण पावर एंड स्टील लिमिटेड से 18,000 करोड़ रुपए रिकवरी की उम्मीद है। अन्य तनावग्रस्त कंपनियों में मोनेट इस्पात, एमटेक ऑटो और रूचि सोया शामिल हैं।
एनपीए के मानक खातों में रूपांतरण में वृद्धि और एनपीए श्रेणी में आने वाले नए खातों में गिरावट, ऋण और उधार व्यवहार में एक निश्चित सुधार दिखाती है।
Insolvency and Bankruptcy code: आगे क्या
यह स्पष्ट है कि भारत सरकार भारत में ईज ऑफ डूइंग बिजनेस को बेहतर बनाने के अपने उद्देश्य में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। विधायिका, RBI, SEBI और न्यायपालिका ने एक एकीकृत मोर्चा प्रस्तुत किया है, जो भारत में अब तक अभूतपूर्व है। किसी भी तरह की स्पष्ट खामियों को जल्द से जल्द सुलझाया जा रहा है और कानून तेजी से विकसित हो रहा है।
इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड, 2016 के कार्यान्वयन को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। इन चुनौतियों का प्रभावी संशोधनों के साथ सामना किया गया है। IBC एक सराहनीय कार्य कर रहा है, और उन सभी अधिकारियों को उचित श्रेय दिए जाने की आवश्यकता है जिन्होंने इस कानून को लागू करने के लिए लगन से काम किया है।
यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है, कि, 2019 में, भारत ने पहले ही दुनिया भर में खुदरा निवेश के लिए शीर्ष 30 विकासशील देशों में अपना स्थान सुरक्षित कर लिया है और भारत में इन्सॉल्वेंसी रेजॉल्युशन एक अधिक सुव्यवस्थित, समेकित और शीघ्रतापूर्ण समाधान के रूप में उभरा है। यह देखने की जरूरत है कि क्या इन उपायों का इस्तेमाल बैंकिंग प्रणाली पर तनावग्रस्त परिसंपत्तियों (stressed assets) के बोझ को कम करने के लिए किया जा सकता है और क्या भारत इन्सॉल्वेंसी रेजॉल्युशन के मामले में अन्य विकसित राष्ट्रों के समकक्ष आ सकता है।